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लैटर बौक्स: प्यार और यौवन का खत भाग 2

छवि ने शायद मेरी आवाज का भारीपन महसूस किया. उस की आंखों में आश्चर्य के भाव प्रकट हो गए, फिर अचानक ही हंस पड़ी, ‘‘अच्छा, आप क्या लिखते हैं?’’ उस ने बहुत चालाकी से एक असहज करने वाले विषय को टाल दिया था.

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साहित्य पर चर्चा चल रही थी. तभी नेहा चाय, बिस्कुट और नमकीन ले कर आ गई. चाय पीते हुए कई विषयों पर चर्चा चली. छवि  एक बुद्धिमान और जिज्ञासु लड़की थी. उस का सामान्यज्ञान भी काफी अच्छा था. जब खुल कर बातें हुईं तो नेहा के मन से छवि के प्रति पूर्वाग्रह समाप्त हो गया.

छवि अपनी गरमी की छुट्टियां मुंबई में बिताने वाली थी. उस की दीदी और जीजा, दोनों ही सरकारी नौकरी में थे. दिनभर छवि घर पर रहती थी और टीवी देखती थी. कभीकभी आसपास घूमने चली जाती थी. छुट्टी के दिन अपनी दीदी और जीजा के साथ घूमने जाती थी.

मुझ से मिलने के बाद अब वह कहानी, कविता और उपन्यास पढ़ने लगी. मुझ से कई सारी किताबें ले गई थी. दिन का काफी समय वह पढ़ने में बिताती, या मेरी पत्नी के साथ बैठ कर विभिन्न विषयों पर बातें करती. मैं स्वयं एक सरकारी दफ्तर में ग्रेड ‘बी’ अफसर था, इसलिए केवल छुट्टी के दिन छवि से खुल कर बात करने का मौका मिलता था. बाकी दिनों में हम सभी शाम की चाय अवश्य साथसाथ पीते थे.

छवि के चेहरे में अनोखा सम्मोहन था. ऐसा सम्मोहन, जो बरबस किसी को भी अपनी तरफ खींच लेता है. संभवतया हर स्त्री में यह गुण होता है, कुछ में कम, कुछ में ज्यादा, परंतु कुछ लड़कियां ऐसी होती हैं जो पुरुषों को चुंबक की तरह अपनी तरफ खींचती हैं. छवि ऐसी ही लड़की थी. वह युवा थी, पता नहीं उस का कोई प्रेमी था या नहीं, परंतु उसे देख कर मेरा मन मचलने लगता था.

सामाजिक दृष्टि से यह गलत था. मैं एक शादीशुदा व्यक्ति था, परिवार के प्रति मेरी कुछ जिम्मेदारियां थीं और मैं सामाजिक बंधनों में बंधा हुआ था. परंतु मन किसी बंधन को नहीं मानता और हृदय किसी के लिए भी मचल सकता है. प्यार के  मामले में यह बच्चे के समान होता है, जो हर सुंदर लड़की और स्त्री को पाने की लालसा सदा मन में पालता रहता है.

मैं नेहा को देखता तो हृदय में अपराधबोध पैदा होता, परंतु जैसे ही छवि को देखता तो अपराधबोध गायब हो जाता और खुशी की एक ऐसी लहर तनमन में दौड़ जाती कि जी चाहता, यह लहर कभी खत्म न हो, शरीर के अंगअंग में ऐसी लहरें उठती ही रहें और मैं उन लहरों में डूब जाऊं.

छवि सामान्य ढंग से मेरे घर आती, हमारे साथ बैठ कर बातें करती, चाय पीती और चली जाती. कभी पुस्तकें मांग कर ले जाती और पढ़ कर वापस कर देती. उस ने मेरी भी कहानियां पढ़ी थीं, परंतु उन पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी. मैं पूछता, तो बस इतना कहती, ‘ठीक हैं, अच्छी लगीं.’ बस, और कोई विश्ेष टिप्पणी नहीं.

उस की बातों से नहीं लगता था कि वह मेरे लेखन या व्यक्तित्व से प्रभावित थी. यदि वह मेरे किसी गुण की प्रशंसा करती तो मैं समझ सकता था कि उस के हृदय में मेरे लिए कोई स्थान था, फिर मैं उस के हृदय में प्रवेश करने का कोई न कोई रास्ता तलाश कर ही लेता. मेरी सब से बड़ी कमजोरी थी कि मैं शादीशुदा था. सीधेसीधे बात करता तो वह मुझे छिछोरा या लंपट समझती. मुझे मन मार कर अपनी भावनाओं को दबा कर रखना पड़ रहा था.

मेरे मन में उस से अकेले में मिलने की लालसा बलवती होती जा रही थी, परंतु मुझे कोई रास्ता नहीं दिखाई पड़ रहा था. इस तरह 15 दिन निकल गए. जैसजैसे उस के पुणे जाने के दिन कम हो रहे थे, वैसेवैसे मेरे मन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी.

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फिर एक दिन कुछ आश्चर्यजनक हुआ. मैं औफिस जाने के लिए सीढि़यों से उतर कर नीचे आया, तो देखा, नीचे छवि खड़ी थी. मैं ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘यहां क्या कर रही हो?’’

‘‘आप का इंतजार,’’ उस ने आंखों को मटकाते हुए कहा.

‘‘क्या?’’ मुझे हलका सा आश्चर्य हुआ. एक बार दिल भी धड़क कर रह गया. क्या उस के  दिल में मेरे लिए कुछ है? बता नहीं सकता था, क्योंकि लड़कियां अपनी भावनाओं को छिपाने में बहुत कुशल होती हैं.

‘‘हां, आप को औफिस के लिए देर तो नहीं होगी?’’

‘‘नहीं, बोलिए न.’’

‘‘मैं घर में सारा दिन पड़ेपड़े बोर हो जाती हूं. टीवी और किताबों से मन नहीं बहलता. कहीं घूमने जाने का मन है, क्या आप मेरे साथ कहीं घूमने चल सकते हैं?’’

उस का प्रस्ताव सुन कर मेरा मन बल्लियों उछलने लगा, परंतु फिर हृदय पर जैसे किसी ने पत्थर रख दिया. मैं शादीशुदा था और नेहा को घर में छोड़ कर मैं उसे घुमाने कैसे ले जा सकता था. नेहा को साथ ले जाता, तो छवि को घुमाने का क्या लाभ? मैं ने असमंजसभरी निगाहों से उसे देखते हुए कहा, ‘‘आप के दीदीजीजा तो रविवार को आप को घुमाने ले जाते हैं.’’

‘‘नहीं, मैं आप के साथ जाना चाहती हूं.’’

मेरा दिल फिर से धड़का, ‘‘परंतु नेहा साथ रहेगी?’’

‘‘छुट्टी के दिन नहीं,’’ उस ने निसंकोच कहा, ‘‘आप दफ्तर से एक दिन की छुट्टी ले लीजिए. फिर हम दोनों बाहर चलेंगे.’’

‘‘अच्छा, अपना मोबाइल नंबर दो. मैं दफ्तर जा कर फोन करूंगा.’’ उस ने अपना नंबर दिया और मैं खूबसूरत मंसूबे बांधता हुआ दफ्तर आया. मन में लड्डू फूट रहे थे. अपने केबिन में पहुंचते ही मैं ने छवि को फोन मिलाया. बड़े उत्साह से उस से मीठीमीठी बातें कीं, ताकि उस के मन का पता चल सके.. इस के बावजूद मैं अपने मन की बात उस से नहीं कह पाया. छवि की बातों से भी ऐसा नहीं लगा कि उस के मन में मेरे लिए कोई ऐसीवैसी बात है.

हम ने बाहर घूमने की बात तय कर ली. परंतु फोन रखने पर मेरा उत्साह खत्म हो चुका था. शायद मेरे साथ बाहर जाने का छवि का कोई विशेष उद्देश्य नहीं था, वह केवल घूमना ही चाहती थी.

मैरीन ड्राइव के चौड़े फुटपाथ पर धीमेधीमे कदमों से टहलते हुए एक जगह हम रुक गए और धूप में चांदी जैसी चमकती हुई समुद्र की लहरों को निहारने लगे. मेरे मन में भी समुद्र जैसी लहरें उफान मार रही थीं. मैं चाह कर भी कुछ नहीं कह पा रहा था. लहरों को ताकते हुए छवि ने पूछा, ‘‘क्या आप इस बात पर विश्वास करते हैं कि प्रथम दृष्टि में प्यार हो सकता है.’’

मैं ने आश्चर्ययुक्त भाव से उस के मुखड़े को देखा. उस के चेहरे पर ऐसा कोई भाव दृष्टिमान नहीं था जिस से उस के मनोभावों का पता चलता. मैं ने अपनी दृष्टि को आसमान की तरफ टिकाते हुए कहा, ‘‘हां, हो सकता है, परंतु…’’

अब उस ने मेरी ओर हैरत से देखा और पूछा, ‘‘परंतु क्या?’’

‘‘परंतु…यानी ऐसा प्रेम संभव तो होता है परंतु इस में स्थायित्व कितना होता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि दोनों व्यक्ति कितने समय तक एकदूसरे के साथ रहते हैं.’’

छवि शायद मेरी बात का सही मतलब समझ गईर् थी. इसलिए आगे कुछ नहीं पूछा.

मैं ने छवि से कहीं बैठने के लिए कहा तो उस ने मना कर दिया. फिर हम टहलते हुए तारापुर एक्वेरियम तक गए. मैं ने उसे एक्वेरियम देखने के लिए कहा तो उस ने बताया कि वह देख चुकी थी. मुंबई देखने का उस का कोई इरादा भी नहीं था. उस ने बताया कि वह केवल मेरे साथ घूमना चाहती थी.

दोपहर तक हम लोग मैरीन ड्राइव में ही घूमते रहे… निरुद्देश्य. हम दोनों ने बहुत बातें की, परंतु मैं अपने मन की गांठ न खोल सका. उस की बातों से भी ऐसा कुछ

नहीं लगा कि उस के मन में मेरे प्रति कोई ऐसावैसा भाव है. मैं शादीशुदा था, इसलिए अपनी तरफ से कोईर् पहल नहीं करना चाहता था.

लगभग 2 बजे मैं ने उस से लंच करने के लिए कहा तो भी उस ने मना कर दिया. मुझे अजीब सा लगा, कैसी लड़की है, सुबह से मेरे साथ घूम रही है और खानेपीने का नाम तक न लिया. कब तक भूखी रहेगी. मैं उसे जबरदस्ती पास के एक रेस्तरां में ले गया और जबरदस्ती डोसा खिलाया. आधा डोसा मुझे ही खाना पड़ा.

Crime Story: प्यार में मिट गई सिमरन- भाग 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

लेखक- सुनील वर्मा

एक तरह से सिमरन आमिर के प्यार में पूरी तरह दीवानी हो चुकी थी. करीब 6 महीने तक दोनों का प्यार इसी तरह चोरीछिपे परवान चढ़ता रहा. प्यार की हर कहानी एकदम सीधी नहीं होती. उस में कई बाधाएं होती हैं और सिमरन का प्यार तो वैसे भी पहली नजर का अंधा प्यार था, जिस में न तो भविष्य की भलाई देखी गई थी न ही भावी जिदंगी की कड़वी सच्चाई को परखा गया था.

सिमरन बहनों में सब से छोटी थी और मां बाप की लाड़ली भी. मां बाप चाहते थे कि जवानी की दहलीज पर खड़ी सिमरन की शादी भी किसी अच्छे परिवार में कर दी जाए. इसीलिए वे उस के लिए अच्छा वर तलाश रहे थे.

सिमरन के प्यार से अंजान मां ने जब एक दिन सिमरन को रिश्ते के लिए एक लड़के की फोटो दिखाई तो सिमरन को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसे हसीन सपना देखते हुए जगा दिया हो.

‘‘अम्मी अभी शादी की क्या जल्दी है.. मुझे घर से निकालना चाहती हो क्या?’’ सिमरन ने बेमन से लड़के की फोटो देखने के बाद कहा.

‘‘नहीं बेटा, लड़की मांबाप के लिए एक जिम्मेदारी होती है जितनी जल्दी ये जिम्मेदारी पूरी हो जाए मांबाप का मन हल्का हो जाता है. और तेरा निकाह हो जाएगा तो उस के बाद फिरोज के लिए भी तो दुल्हन लानी है घर में.’’

शाबरी बेगम ने सिमरन के शादी के ऐतराज को स्वभाविक रूप से लिया. लेकिन वे इस बात से कतई अंजान थी कि बेटी के मन में क्या चल रहा है.

सिमरन जानती थी कि अगर उस ने अपनी अम्मी को अपनी पंसद के बारे में बताया तो वे आमिर से उस की शादी के लिए कतई तैयार नहीं होगी. क्योंकि आमिर का परिवार उस की दूसरी बहनों की ससुराल की तरह समृद्ध नहीं था.

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आमिर के पिता शाहिद मूलरूप से मेरठ के रहने वाले हैं. वे जवानी के दिनों में ही दिल्ली आ गए थे. आजादपुर मंडी में आढ़तियों को लेबर सप्लाई करने वाले शाहिद के परिवार में उन की बीवी आबिदा के अलावा 10 बच्चे थे, 3 बेटियां व 7 बेटे.

परिवार लंबाचौड़ा था और खर्चे अधिक. मंदे समय में उन्होेंने किसी तरह अपने परिवार के लिए मंडोली की गली नंबर 9 में मकान तो बना लिया था, लेकिन 3 बेटियों की शादी करने और 7 बेटों को पालपोस कर जवान करतेकरते वे उम्र से पहले ही बूढे हो कर बीमार रहने लगे थे. उन का कोई भी बच्चा 5वीं जमात से ज्यादा नहीं पढ़ सका था.

मेरठ के सरूरपुर, जैनपुर में पनीर बनाने के कई प्लांट हैं. शाहिद के लगभग सभी बेटे इन्हीं फैक्ट्रियों में काम करते हैं. 2 बड़े बेटे अपने परिवार के साथ जैनपुर में ही किराए का मकान ले कर रहते थे.

आमिर से छोटे भाई की भी शादी हो चुकी थी, लेकिन उस की पत्नी दिल्ली में शाहिद व उन की पत्नी आबिदा के पास ही रहती थी.3 बेटों की अभी शादी नहीं हुई थी.

ढाई साल पहले जिन दिनों सिमरन और आमिर का प्यार परवान चढ़ रहा था उन दिनों आमिर पनीर बनाने का काम सीख रहा था. उस ने अभी नौकरी शुरू नहीं की थी. अलबत्ता 10 हजार रूपए में उस की नौकरी एक प्लांट में पक्की हो गई थी.

इधर जब सिमरन ने आमिर को बताया कि उस के अम्मी अब्बू उस का जल्द से जल्द कहीं दूसरी जगह निकाह कराने की तैयारी कर रहे है तो आमिर सकते में आ गया. क्योंकि वो चाहता था कि सिमरन के साथ अभी एक साल उस के प्रेम संबध यूं ही चलते रहें.

उस ने सोचा था कि नौकरी कर के पहले पैसा कमाएगा फिर सिमरन से शादी करेगा. लेकिन जब अचानक सिमरन ने बताया कि परिवार वाले उस का निकाह कराने की तैयारी कर रहे हैं तो उस के हाथपांव फूल गए.

उसे समझ नहीं आया कि वह क्या करें. सिमरन ने उसे ये भी बता दिया था कि उस के परिवार की हैसियत देख कर उस के परिवार वाले कभी दोनों की शादी के लिए तैयार नहीं होंगे.

सिमरन दिल्ली में रहने वाली और 12वीं क्लास तक पढ़ी लड़की थी. उसे पता था कि अगर परिवार शादी की इजाजत ना दे तो बालिग प्रेमियों को शादी के लिए क्या करना चाहिए.

सिमरन मिली भावी ससुराल वालों से

इसलिए सिमरन ने आमिर से पूछा कि क्या उस के परिवार वाले उसे अपनाने के लिए तैयार हैं. सिमरन अच्छे संपन्न परिवार की पढ़ीलिखी सुंदर लड़की थी. जब आमिर ने उसे अपने परिवार वालों से मिलाया तो सब ने शादी के लिए हां कर दी.

अब सवाल यह था कि सिमरन के परिवार वाले दोनों का निकाह कराने के लिए तैयार नहीं होंगे. तय हुआ कि सिमरन व आमिर कोर्ट मैरिज कर लें. बाद में सिमरन का परिवार अपने आप मान जाएगा.

सिमरन व आमिर ने शाहदरा मैरिज कोर्ट में शादी के लिए आवेदन कर दिया. चूंकि दोनों ही बालिग थे और परिवार के तौर पर दोनों की तरफ से आमिर के दोस्त गवाह थे, लिहाजा दोनों की कोर्ट मैरिज होने में कोई अड़चन नहीं आई.

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लेकिन जब कोई लड़की निकाह करती है तो भले ही परिवार से कुछ ना बताए लेकिन उस के रहनसहन और पहनावे में इतना परिवर्तन तो आ ही जाता है कि सवालों का पहाड़ अपने आप ही खड़ा हो जाए.

कोर्ट मैरिज के बाद सिमरन जब चूड़ा पहन कर अपने घर गई तो उस की अम्मी को शक हुआ, तो उन्होंने सवालों की बौछार कर दी. सिमरन जानती थी कि एक ना एक दिन सब को सच बताना ही पडे़गा. लिहाजा उस ने अपनी मां को बता दिया कि वह आमिर नाम के एक लड़के से प्यार करती है और उस ने कोर्ट मैरिज कर ली है.

बेटी के लिए अच्छे घर का सपना देखने वाले मातापिता के लिए बेटी के प्रेम विवाह की खबर किसी वज्रपात से कम नहीं होती. उन्होंने जब लड़के व उस के परिवार के बारे में पूछा तो सिमरन ने सब कुछ सचसच बता दिया.

जैसा कि सिमरन को आशंका थी वैसा ही हुआ. मां ने सिमरन को लानतमलानत दी और उस की पिटाई कर दी. अब्बू के घर आने के बाद तो जम कर हंगामा हुआ. पिता ने उसी दिन आमिर को अपने घर बुलाया और उसे धमकी देते हुए अपनी बेटी को भूल जाने के लिए कहा.

आमिर ने सिमरन से सच्ची मोहब्बत की थी. भूल जाने का तो सवाल ही नहीं उठता था. लिहाजा उस ने साफ कह दिया कि वह दुनिया में सब को छोड़ सकता है लेकिन सिमरन को छोड़ना उस के लिए मुमकिन नहीं.

मोहम्मद शरीफ ने जब उसे अपनी हैसियत देखने के लिए कहा तो आमिर ने साफ कह दिया कि उस ने सिमरन की हैसियत से नहीं, बल्कि दिल से प्यार किया है.

शरीफ ने आमिर को मारपीट कर घर से भगा दिया और उसे चेतावनी दे दी कि भूल कर भी सिमरन से मिलने का प्रयास न करें. आमिर जानता था कि अगर उस ने जरा सी भी देर कर दी तो सिमरन के घर वाले जल्दी ही कहीं उस का निकाह कर देंगे. लिहाजा उस ने अपनी जान पहचान के कुछ लोगों से बात की और हर्ष विहार थाने पहुंच गया.

अगले भाग में पढ़ें- क्या मांबाप का दिल तोड़ कर खुश थी सिमरन

Short Story: गृहस्थी की डोर

लेखक- एन.के. सोमानी

मनीष उस समय 27 साल का था. उस ने अपनी शिक्षा पूरी कर मुंबई के उपनगर शिवड़ी स्थित एक काल सेंटर से अपने कैरियर की शुरुआत की, जहां का ज्यादातर काम रात को ही होता था. अमेरिका के ग्राहकों का जब दिन होता तो भारत की रात, अत: दिनचर्या अब रातचर्या में बदल गई.

मनीष एक खातेपीते परिवार का बेटा था. सातरस्ते पर उस का परिवार एक ऊंची इमारत में रहता था. पिता का मंगलदास मार्केट में कपड़े का थोक व्यापार था. मनीष की उस पुरानी गंदी गलियों में स्थित मार्केट में पुश्तैनी काम करने में कोई रुचि नहीं थी. परिवार के मना करने पर भी आई.टी. क्षेत्र में नौकरी शुरू की, जो रात को 9 बजे से सुबह 8 बजे तक की ड्यूटी के रूप में करनी पड़ती. खानापीना, सोनाउठना सभी उलटे हो गए थे.

जवानी व नई नौकरी का जोश, सभी साथी लड़केलड़कियां उसी की उम्र के थे. दफ्तर में ही कैंटीन का खाना, व्यायाम का जिमनेजियम व आराम करने के लिए रूम थे. उस कमरे में जोरजोर से पश्चिमी तर्ज व ताल पर संगीत चीखता रहता. सभी युवा काम से ऊबने पर थोड़ी देर आ कर नाच लेते. साथ ही सिगरेट के साथ एक्स्टेसी की गोली का भी बियर के साथ प्रचलन था, जिस से होश, बदहोश, मदहोश का सिलसिला चलता रहता.

शोभना एक आम मध्यम आय वाले परिवार की लड़की थी. हैदराबाद से शिक्षा पूरी कर मुंबई आई थी और मनीष के ही काल सेंटर में काम करती थी. वह 3 अन्य सहेलियों के साथ एक छोटे से फ्लैट में रहती थी. फ्लैट का किराया व बिजलीपानी का जो भी खर्च आता वे तीनों सहेलियां आपस में बांट लेतीं. भोजन दोनों समय बाहर ही होता. एक समय तो कंपनी की कैंटीन में और दिन में कहीं भी सुविधानुसार.

रात को 2-3 बजे के बीच मनीष व शोभना को डिनर बे्रक व आराम का समय मिलता. डिनर तो पिज्जा या बर्गर के रूप में होता, बाकी समय डांस में गुजरता. थोड़े ही दिनों में दफ्तर के एक छोटे बूथ में दोनों का यौन संबंध हो गया. मित्रों के बीच उन के प्रेम के चर्चे आम होने लगे तो साल भर बीतने पर दोनों का विवाह भी हो गया, जिस में उन के काल सेंटर के अधिकांश सहकर्मी व स्टाफ आया था. विवाह उपनगर के एक हालीडे रिजोर्ट में हुआ. उस दिन सभी वहां से नशे में धुत हो कर निकले थे.

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दूसरे साल मनीष ने काल सेंटर की नौकरी से इस्तीफा दे कर अपने एक मित्र के छोटे से दफ्तर में एक मेज लगवा कर एक्सपोर्ट का काम शुरू किया. उन दिनों रेडीमेड कपड़ों की पश्चिमी देशों में काफी मांग थी. अत: नियमित आर्डर के मुताबिक वह कंटेनर से कोच्चि से माल भिजवाने लगा. उधर शोभना उसी जगह काम करती रही थी. अब उन दोनों की दिनचर्या में इतना अंतराल आ गया कि वे एक जगह रहते हुए भी हफ्तों तक अपने दुखसुख की बात नहीं कर पाते, गपशप की तो बात ही क्या थी. दोनों ही को फिलहाल बच्चे नहीं चाहिए थे, अत: शोभना इस की व्यवस्था स्वयं रखती. इस के अलावा घर की साफसफाई तो दूर, फ्लैट में कपड़े भी ठीक से नहीं रखे जाते और वे चारों ओर बिखरे रहते. मनीष शोभना के भरोसे रहता और उसे काम से आने के बाद बिलकुल भी सुध न रहती. पलंग पर आ कर धम्म से पड़ जाती थी.

मनीष का रहनसहन व संगत अब ऐसी हो गई थी कि उसे हर दूसरे दिन पार्टियों में जाना पड़ता था जहां रात भर पी कर नाचना और उस पर से ड्रग लेना पड़ता था. इन सब में और दूसरी औरतों के संग शारीरिक संबंध बनाने में इतना समय व रुपए खर्च होने लगे कि उस के अच्छेभले व्यवसाय से अब खर्च पूरा नहीं पड़ता.

किसी विशेष दिन शोभना छुट्टी ले कर मनीष के साथ रहना चाहती तो वह उस से रूखा व्यवहार करता. साथ में रहना या रेस्तरां में जाना उसे गवारा न होता. शोभना मन मार कर अपने काम में लगी रहती.

यद्यपि शोभना ने कई बार मनीष को बातोंबातों में सावधान रहने व पीने, ड्रग  आदि से दूर रहने के संकेत दिए थे पर वह झुंझला कर सुनीअनसुनी कर देता, ‘‘तुम क्या जानो कमाई कैसे की जाती है. नेटवर्क तो बनाना ही पड़ता है.’’

एक बार मनीष ने एक कंटेनर में फटेपुराने चिथड़े भर कर रेडीमेड के नाम से दस्तावेज बना कर बैंक से रकम ले ली, लेकिन जब पोर्ट के एक जूनियर अधिकारी ने कंटेनर खोल कर तलाशी ली तो मनीष के होश उड़ गए. कोर्ट में केस न दर्ज हो इस के लिए उस ने 15 लाख में मामला तय कर अपना पीछा छुड़ाया, लेकिन उस के लिए उसे कोच्चि का अपना फ्लैट बेचना पड़ा था. वहां से बैंक को बिना बताए वापस मुंबई शोभना के साथ आ कर रहने लगा. बैंक का अकाउंट भी गलत बयानी के आधार पर खोला था. अत: उन लोगों ने एफ.आई.आर. दर्ज करा कर फाइल बंद कर दी.

इस बीच मनीष की जीवनशैली के कारण उस के लिवर ने धीरेधीरे काम करना बंद कर दिया. खानापीना व किडनी के ठीक न चलने से डाक्टरों ने उसे सलाह दी कि लिवर ट्रांसप्लांट के बिना अब कुछ नहीं हो सकता. इस बीच 4-6 महीने मनीष आयुर्वेदिक दवाआें के चक्कर में भी पड़ा रहा. लेकिन कोई फायदा न होता देख कर आखिर शोभना से उसे बात करनी पड़ी कि लिवर नया लगा कर पूरी प्रक्रिया में 3-4 महीने लगेंगे, 12-15 लाख का खर्च है. पर सब से बड़ी दुविधा है नया लिवर मिलने की.

‘‘मैं ने आप से कितनी बार मना किया था कि खानेपीने व ड्रग के मामले में सावधानी बरतो पर आप मेरी सुनें तब न.’’

‘‘अब सुनासुना कर छलनी करने से क्या मैं ठीक हो जाऊंगा?’’

सारी परिस्थिति समझ कर शोभना ने मुंबई के जे.जे. अस्पताल में जा कर अपने लिवर की जांच कराई. उस का लिवर ऐसा निकला जिसे मनीष के शरीर ने मंजूर कर लिया. अपने गहनेजेवर व फ्लैट को गिरवी रख एवं बाकी राशि मनीष के परिवार से जुटा कर दोनों अस्पताल में इस बड़ी शल्यक्रिया के लिए भरती हो गए.

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मनीष को 6 महीने लगे पूरी तरह ठीक होने में. उस ने अब अपनी जीवन पद्धति को पूरी तरह से बदलने व शोभना के साथ संतोषपूर्वक जीवन बिताने का निश्चय कर लिया है. दोनों अब बच्चे की सोचने लगे हैं, ता

Crime Story: जंगल में चोरी के लिए

Crime Story: जंगल में चोरी के लिए- पार्ट 1

सौजन्य- मनोहर कहानियां

लेखक- शैलेंद्र कुमार ‘शैल’ 

अनरजीत और उस की दूसरी पत्नी रीमा की हत्या पुलिस के लिए एक पहेली बन गई थी. 2 महीने तक पुलिस ने सभी पहलुओं पर जांच की लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. बाद में हत्याकांड का परदाफाश हुआ तो ऐसी वजह सामने आई, जिस की किसी ने…

रीमा गौड़ गोरखपुर जिले के गुलरिहा क्षेत्र के शंकर टोला गांव में पति अनरजीत गुप्ता के साथ रहती थी.

रीमा का मायका इसी गांव में था, लेकिन वह अपने मांबाप के घर से दूर गांव के बाहर बने टिनशेड वाले मकान में रहती थी. यह मकान उस के पति अनरजीत ने बनवाया था. बात 6 अगस्त, 2020 की है. सुबहसुबह रीमा के चाचा बैजनाथ गौड़ घूमते हुए उस के घर पहुंचे तो उन्हें रीमा के घर का मुख्य दरवाजा  खुला मिला.

बैजनाथ ने दरवाजे से ही 2 बार ‘रीमा…रीमा…’ नाम से आवाज लगाई. आवाज देने के बावजूद अंदर कोई हलचल नहीं हुई तो बैजनाथ खुद अंदर कमरे में दाखिल हो गए.

जैसे ही वह कमरे में पहुंचे, तो वहां की दिल दहला देने वाला हाल देख कर उलटे पांव लौट आए. कमरे के अंदर तख्त पर रीमा और जमीन पर औंधे मुंह उस के पति अनरजीत की रक्तरंजित लाश पड़ी थीं. अनरजीत के सिर पर और रीमा की गरदन पर फावड़े से वार किए गए थे. बगल में खून से सना फावड़ा भी पड़ा था.

बेटी और दामाद की खून में डूबी लाशें देख बैजनाथ के हाथपांव फूल गए और वह घबराहट में वहां से वापस लौट आए.

रीमा पति अनरजीत के साथ गांव में रहती थी. उस की अपनी कोई औलाद नहीं थी. अनरजीत रीमा का तीसरा पति था, जबकि रीमा, अनरजीत की दूसरी पत्नी थी. अनरजीत की पहली पत्नी संगीता से 14 और 10 साल के 2 बेटे थे.

उस की पत्नी संगीता गुलरिहा थाना क्षेत्र के गांव जैनपुर के टोला मोहम्मद बरवा में दोनों बच्चों के साथ अलग रहती थी. अनरजीत ने संगीता और बच्चों को छोड़ा नहीं था, बल्कि स्वेच्छा से पत्नी और बच्चों का भरणपोषण होता था. वह परिवार से मिलने जैनपुर आता था लेकिन ज्यादातर समय दूसरी पत्नी रीमा के साथ ही बिताता था.

बहरहाल, बैजनाथ गौड़ दौड़ेभागे घर पहुंचे और सारी बात बड़े भाई रामरक्षा और भतीजे अखिलेश को बताई. छोटे भाई के मुंह से बेटी और दामाद की हत्या की खबर सुनते ही उन के हाथपांव कांपने लगे और वह धम्म से गिर पड़े. यही नहीं, बेटी और दामाद की हत्या की खबर सुन घर में भी कोहराम मच गया.

बैजनाथ ने फोन द्वारा यह सूचना बेटी की ससुराल में भी दे दी. थोड़ी देर में अनरजीत और रीमा की हत्या की खबर जंगल की आग की तरह पूरे गांव में फैल गई. खबर मिलते ही गांव वाले मौके पर जुट गए. भीड़ में से किसी ने घटना की सूचना गुलरिहा थाने को दे दी.

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दोहरे हत्याकांड की सूचना मिलते ही थानेदार अनिल पांडेय पुलिस टीम के साथ शंकर टोला पहुंच गए और घटना की सूचना तत्कालीन एसएसपी डा. सुनील गुप्ता, एसपी (नार्थ) अरविंद कुमार पांडेय और सीओ (चौरीचौरा) रचना मिश्रा को दे दी. इस के बाद जांच में जुट गए.

सूचना मिलने के कुछ देर बाद सभी पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंच गए. घटनास्थल की बारीकी से जांच की गई. जांच के दौरान अनरजीत के सिर के पीछे और रीमा की गरदन पर गहरे घाव के निशान पाए गए. तख्त के बगल में खून से सना फावड़ा पड़ा था.

पुलिस जुटी जांच में

पुलिस ने अनुमान लगाया कि हत्यारे ने फावड़े से वार किया होगा. पुलिस ने साक्ष्य के तौर पर फावड़ा अपने कब्जे में ले लिया. जांचपड़ताल के दौरान कमरे में 4 जूठी थालियां भी मिलीं.

घर में तो 2 ही सदस्य थे तो थालियां भी 2 होनी चाहिए, लेकिन वहां 4 थालियां थीं. इस का मतलब रात में वहां 2 अन्य लोग रुके थे, जो अनरजीत या रीमा दोनों में से किसी के जानने वाले रहे होंगे और दोनों की हत्या कर के अलमारी से गहने लूट कर फरार हो गए होंगे. क्योंकि जांचपड़ताल के दौरान अलमारी खुली हुई मिली थी. जेवर का डिब्बा खुला हुआ था.

स्थिति को देख कर पुलिस पता लगा रही थी कि हत्या लूट के चलते की गई थी या लूट दोनों की हत्या के बाद हुई थी. कहीं ऐसा तो नहीं, पुलिस को गुमराह करने के लिए हत्यारों ने घटना को लूट का रंग देने की कोशिश की हो. लेकिन यह बात कातिलों के पकड़े जाने के बाद ही पता चल सकता है.

बहरहाल, काररवाई करतेकरते दोपहर के 12 बज गए. पुलिस ने दोनों लाशें पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघव दास मैडिकल कालेज, गोरखपुर भिजवा दीं और थाने लौट आई.

थाने पहुंच कर थानाप्रभारी ने दोनों मृतकों के पिता की संयुक्त तहरीर पर अज्ञात के खिलाफ धारा 302 आईपीसी का मुकदमा दर्ज कर के आगे की काररवाई शुरू कर दी.

जैसेजैसे जांच की काररवाई आगे बढ़ी, अनरजीत और रीमा की जिंदगी से जुड़ी हैरान करने वाली त्रिकोणीय कहानी सामने आई, जिस में रीमा की जिंदगी से जुड़ी भूतकाल की कहानी भी थी. अनरजीत के जीवन से जुड़ी कहानी भी कम हैरतअंगेज नहीं थी.

पता चला कि छोटी बहन राजमती के बहकते कदम रोकने के लिए अनरजीत ने उस के प्रेमी प्रदीप यादव पर बहन के अपहरण का मुकदमा दर्ज करा कर उसे जेल भिजवाया था. 3 माह जेल में रहने के बाद जब प्रदीप जमानत पर बाहर आया तो राजमती और प्रदीप का प्यार फिर से जवां हो गया. नतीजा यह हुआ कि राजमती दूसरी बार प्रेमी के साथ घर छोड़ कर भाग गई.

राजमती के इस कदम से अनरजीत और उस के घर वालों की खूब जगहंसाई हुई. अनरजीत और उस के घर वाले बहुत दुखी थे. बहन के चालचलन से दुखी अनरजीत ने राजमती को उस के हाल पर छोड़ दिया था. अलबत्ता बहन से नाराज हो कर उस ने उस के कुछ कीमती जेवरात अपने पास रख लिए थे.

अनरजीत का तर्क था कि राजमती जब पहली बार प्रदीप के साथ भागी थी उस ने उस की तलाश में हजारों रुपए पानी की तरह बहाए थे. उधर भाई द्वारा जेवर रखने की बात राजमती ने अपने प्रेमी प्रदीप को बता दी थी.

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तब जेवरों को ले कर अनरजीत और प्रदीप के बीच विवाद भी हुआ था. पुलिस ने अपनी जांच में इसे भी शामिल कर लिया कि कहीं इस कांड के पीछे प्रदीप ही तो नहीं  है.

जैसेजैसे जांच आगे बढ़ी पुलिस के सामने रीमा और अनरजीत की उलझी हुई जिंदगी की चौंकाने वाली कहानी सामने आई. पता चला कि अनरजीत से प्रेम विवाह करने से पहले रीमा के कई युवकों से मधुर संबंध थे. तब वह दारू बेचने का धंधा करती थी. उस के दारू के ठीहे पर कई दिलफेंक आशिक दारू पीने आते थे और उन की नजरें रीमा के जवान शरीर पर जमी रहती थीं.

अगले भाग में पढ़ें-  पुलिस उलझी अंधविश्वास में

Crime Story: जंगल में चोरी के लिए- पार्ट 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

लेखक- शैलेंद्र कुमार ‘शैल’ 

खूबसूरत और जवान युवती दारू के ठीहे पर हो और बवाल न हो, ऐसा संभव नहीं. दिलफेंक युवक दारू पीने कम, रीमा के गदराए बदन को घूरने ज्यादा आते थे. रीमा को ले कर वहां अकसर मारपीट होती थी. पुलिस को शक था कि कहीं इन्हीं में से उस का कोई पुराना आशिक तो नहीं, जिस ने इस दोहरे हत्याकांड को अंजाम दिया हो. पुलिस ने इस दृष्टिकोण को भी जांच में शामिल कर लिया था.

उलझी जिंदगी की चौंकाने वाली कहानी

इस के साथ ही पुलिस को जांच में रीमा से जुड़ी एक और चौंकाने वाली बात पता चली. रीमा की 3 शादियां हुई थीं. पहली शादी के 15 दिनों बाद ही रीमा विधवा हो गई थी. उस के पति की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. उस के बाद रीमा मायके आ गई और वहीं रहने लगी थी. सफेद साड़ी में लिपटी जवान बेटी को देख कर पिता रामरक्षा परेशान रहते थे. वह सोचते थे कि इतना लंबा जीवन बेटी कैसे काटेगी. ठीकठाक वरघर देख कर उस की गृहस्थी फिर से बस जाए तो अच्छा है.

रिश्तेदारों के माध्यम से रामरक्षा ने महराजगंज के बेलवा काजी के रहने वाले रविंद्र गौड़ से बेटी का दूसरा ब्याह कर दिया. विवाह से पहले उन्होंने बेटी की पिछली जिंदगी के बारे में सब कुछ साफसाफ बता दिया था, ताकि पिछली जिंदगी नासूर न बने.

लेकिन होनी को भला कौन टाल सकता है, शादी के कुछ महीनों बाद रीमा फिर ससुराल से हमेशा के लिए मायके लौट आई. पता चला कि दूसरा पति रविंद्र गौड़ अव्वल दर्जे का दारूबाज था. दारू हलक से नीचे उतरने के बाद नशे में धुत हो कर वह रीमा को बिना वजह बुरी तरह मारतापीटता था.

पति के अत्याचारों से तंग आ कर वह पति का घर हमेशा के लिए छोड़ कर मायके आ कर रहने लगी थी.

पत्नी के इस कदम से रविंद्र परेशान था. वह नहीं चाहता था रीमा मायके में जा कर रहे, वह चाहता था कि जो हुआ उसे भुला कर रीमा घर लौट आए. लेकिन रीमा पति की बात मानने के लिए कतई तैयार नहीं थी, वह ससुराल आने के लिए तैयार नहीं हुई.

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इस बात को ले कर शंकर टोला गांव में पंचायत बुलाई गई. पंचायत में गांव वालों के साथसाथ रीमा, रीमा के घर वाले, बगल के गांव जैनपुर टोला मोहम्मद बरवा का अनरजीत और पति रविंद्र मौजूद था. पंचायत के सामने रविंद्र ने पत्नी रीमा के सामने घर वापस आने का प्रस्ताव रखा. लेकिन रीमा ने पति का प्रस्ताव नामंजूर कर दिया.

रीमा की बातों से हमदर्दी दिखाते अनरजीत बीचबीच में उछल कर बोलता रहा. अनरजीत की बातों से नाराज रविंद्र ने उसे ललकारा कि बहुत हमदर्द बनते हो तो क्यों नहीं उस से ब्याह कर लेते?

रविंद्र की बातों को अनरजीत ने दिल पर ले लिया और भरी पंचायत में रविंद्र की ललकार चुनौती के रूप में ले ली. उस ने पंचायत के बीच कह दिया कि यदि रीमा राजी हो तो वह उस से ब्याह करने के लिए तैयार है. रीमा ने हामी भर दी. पंचायत वहीं खत्म हो गई. उस दिन के बाद से रीमा और अनरजीत लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगे.

बाद में दोनों ने दुर्गा मंदिर बांसस्थान में गंधर्व विवाह कर लिया. इस बिंदु को भी पुलिस ने अपनी जांच में शामिल कर लिया.

पुलिस ने रविंद्र गौड़ से पूछताछ की. लेकिन इस हत्याकांड में उस का कोई हाथ नजर नहीं आया. डेढ़ महीना बीत जाने के बावजूद भी पुलिस जहां से चली थी, फिर वहीं आ कर खड़ी हो गई थी. त्रिकोण कहानी में उल्लिखित बातों का कोई सूत्र नहीं मिला था.

मतलब साफ था अनरजीत और रीमा हत्याकांड में उन की जिंदगी से जुड़ी घटना का कहीं इन्वौल्वमेंट नहीं था. पुलिस यह सोचसोच कर परेशान थी कि आखिर दोहरे हत्याकांड को किस ने और क्यों अंजाम दिया था? पुलिस अभी तक हत्या का मोटिव भी पता नहीं लगा सकी थी.

पुलिस उलझी अंधविश्वास में

इस बीच कहानी में उस समय एक नया मोड़ आ गया, जब मृतका की चाची सीमा के शरीर पर तथाकथित अदृश्य शक्ति ने सवारी कर सभी को चौंका देने वाली बात कही. सीमा बोली, ‘‘मैं रीमा की आत्मा हूं. मुझे पता है कि मेरी और अनरजीत की हत्या किस ने की है?’’

फिर उस ने गांव के 5 लोगों के नाम बताए. सीमा के बताए नामों के आधार पर पुलिस ने पांचों लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. ऐसा करना पुलिस की मजबूरी थी. हत्यारों का अभी तक पता नहीं चला था. पुलिस का तर्क था कि हो सकता है कातिल इन्हीं में से कोई हो.

पुलिस पांचों लोगों से पूरी रात सख्ती से पूछताछ करती रही. लेकिन यहां भी नतीजा शून्य रहा, पूछताछ बेनतीजा निकली.

पांचों आरोपियों का हत्या में कहीं हाथ नहीं मिला तो उन्हें हिदायत दे कर छोड़ दिया गया. पुलिस घटना की तह में जाने के लिए सर्विलांस की मदद ले रही थी. पुलिस मृतकों के फोन की काल डिटेल्स भी निकाल कर कई बार अध्ययन कर चुकी थी. साथ ही मुखबिरों की भी मदद ले रही थी.

पहली अक्तूबर, 2020 को एक मुखबिर ने पुलिस को ऐसी सूचना दी, जिसे सुन कर पुलिस चौंक गई. मुखबिर ने पुलिस को बताया कि घटना से कुछ दिनों पहले लकड़ी तस्कर रहमुद्दीन उर्फ रामदीन का अनरजीत से रुपयों को ले कर विवाद हुआ था. रामदीन उसे देख लेने की धमकी दे कर चला गया था.

मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने अपनी जांच लकड़ी तस्कर रामदीन उर्फ रहमुद्दीन की ओर मोड़ दी. छानबीन के दौरान पता चला कि घटना से महीने भर पहले चोरी से जंगल से सागौन की कीमती लकडि़यां कटवा कर रात के समय ले जाते हुए रामदीन को पुलिस ने धर दबोचा था और गाड़ी सहित लकडि़यां जब्त कर ली थीं.

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रामदीन गाड़ी छुड़ाने के लिए अनरजीत के पास कर्ज मांगने आया था. वह उस के सामने गिड़गिड़ाया भी था, लेकिन अनरजीत ने रुपए देने से इंकार कर दिया था.

महत्त्वपूर्ण सुराग

अनरजीत और रामदीन दोनों पुराने दोस्त थे. वह जानता था कि अनरजीत के पास लाखों रुपए की रकम जमा रहती है. यह रकम वह अपने घर पर ही रखता है. फिर भी मदद करने से इंकार कर रहा है. यह बात रामदीन को चुभ गई थी. छानबीन में पाया गया अनरजीत और रामदीन के बीच वाकई में विवाद हुआ था. इस से शक की सुई रामदीन की ओर घूम गई थी. शक के आधार पर पुलिस ने 5 अक्तूबर, 2020 को रामदीन उर्फ रहमुद्दीन को हिरासत में ले लिया.

पूछताछ में रामदीन ने अपना जुर्म कबूल लिया. पता चला कि रुपयों के लिए उसी ने अनरजीत और उस की पत्नी रीमा की हत्या की थी.

2 महीने से रहस्य बने दोहरे हत्याकांड का पटाक्षेप हो गया. उसी दिन शाम को सीओ कपिलदेव मिश्र ने गुलरिहा थाने में प्रैसवार्ता बुला कर आरोपी रामदीन उर्फ रहमुद्दीन को पेश किया. पत्रकारों के सामने आरोपी रामदीन ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. पूछताछ करने पर अनरजीत और रीमा की हत्या की कहानी ऐसे सामने आई—

अगले भाग में पढ़ें- अनरजीत का हमप्याला था रामदीन

Crime Story: जंगल में चोरी के लिए- पार्ट 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

लेखक- शैलेंद्र कुमार ‘शैल’ 

40 वर्षीय अनरजीत मूलरूप से गोरखपुर के गुलरिहा थानाक्षेत्र के जैनपुर टोला मोहम्मद बरवा का रहने वाला था. उस के परिवार में मांबाप के अलावा पत्नी संगीता और 2 बेटे थे. अनरजीत ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था, लेकिन मेहनती बहुत था. एक साथ वह कई काम करता था. उस का मुख्य काम रसोई गैस सप्लाई का था. वह गुलरिहा स्थित एक गैस एजेंसी का सब से विश्वासपात्र डिलिवरीमैन था.

वह दिन भर में करीब 10-12 गाड़ी यानी करीब 450 सिलेंडर डिलीवर कर लेता था. शाम तक उस के पास करीब 3 लाख रुपए से ज्यादा की रकम जमा हो जाती थी. यह अनरजीत का रोज का काम था.

इस के साथ ही उस ने अपने घर पर किराने की दुकान भी खोल रखी थी. दुकान उस की पत्नी संगीता चलाती थी. इसी आमदनी से उस ने काफी रुपए बैंक बैलेंस कर लिए थे. वह दोनों बेटों की अच्छी शिक्षा पर पैसे खर्च करता था. बाद के दिनों में उस ने किराए पर चलाने के लिए एक सवारी गाड़ी खरीद ली थी. उस से भी उसे अच्छा मुनाफा हो जाया करता था. कुल मिला कर अनरजीत के घर में रुपयों की कोई कमी नहीं थी. उस का एक ही सपना था कि दोनों बेटे पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़े हो जाएं.

पता नहीं उस की गृहस्थी को किस की बुरी नजर लगी कि सब कुछ चिंदीचिंदी बिखर गया. एक पत्नी के जीवित रहते हुए उस ने शान में आ कर दूसरी शादी कर ली. दूसरी शादी करते ही पहली पत्नी संगीता और अनरजीत के बीच में झगड़ा शुरू हो गया.

संगीता अपनी सौतन रीमा को साथ रखने के लिए कतई तैयार नहीं थी. उस ने पति से साफ कह दिया था कि इसे जहां मन हो, ले जा कर रखो. लेकिन मैं इसे अपने घर में नहीं रहने दूंगी. हार मान कर अनरजीत ने रीमा के मायके शंकर टोला गांव के बाहर जमीन खरीद कर 2 कमरों वाला टिन का मकान बनवा कर रीमा के साथ रहना शुरू कर दिया.

अनरजीत ने भले ही रीमा से गंधर्व विवाह कर लिया था, लेकिन उस ने पहली पत्नी संगीता और बच्चों की देखरेख की जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ा था. इस में रीमा की भी रजामंदी थी. पति के इस निर्णय से वह बेहद खुश थी. बल्कि वह तो यहां तक चाहती थी कि वह संगीता के साथ उसी घर में जा कर रहे, जबकि संगीता को यह मंजूर नहीं था. घर में शांति बनी रहे, इसीलिए अनरजीत ने ऐसा किया था.

अनरजीत का हमप्याला था रामदीन

खैर, अनरजीत के शंकर टोला में रहते हुए उस के कई दोस्त बन गए थे, जिस में जंगल डुमरी नंबर- 2, टोला सकलदीपपुर का रहने वाला रामदीन उर्फ रहमुद्दीन उस का हमप्याला था. रामदीन की पैठ अनरजीत के घर के अंदर तक थी. इसलिए वह उस के हर राज को जानता था.

रामदीन लकड़ी का कारोबारी था. जंगल से चोरी से सागौन और अन्य कीमती लकडि़यां काट कर बेचना उस का मुख्य धंधा था.

ऐसा नहीं था कि वह अकेला ही इस काम को अंजाम देता था. इस काम को वह जंगल के अधिकारियों की मिलीभगत से अंजाम देता था. बदले में वह उन्हें मोटी रकम खिलाता था. इसीलिए उस का धंधा रात के अंधेरे में चलता था.

3 अगस्त, 2020 को रामदीन रात के अंधेरे में जंगल से सागौन की बेशकीमती लकडि़यां काट कर चोरी से अपनी गाड़ी पर लाद कर ले जा रहा था. तभी पुलिस ने पकड़ कर उस की गाड़ी सीज कर दी. गाड़ी सीज करने से रामदीन बुरी तरह परेशान हो गया. उस का धंधा बंद हो गया. वह जल्द से जल्द अपनी गाड़ी छुड़ाना चाहता था लेकिन पैसे नहीं होने से वह गाड़ी नहीं छुड़ा पाया.

ऐसे में उसे दोस्त अनरजीत की याद आई. वह उस के पास पहुंचा और अपनी समस्या बता कर उस से एक लाख रुपए कर्ज मांगा. अनरजीत ने रुपए देने से मना किया तो वह दोनों हाथ जोड़ कर उस के सामने गिड़गिड़ाया, मिन्नतें कीं, लेकिन अनरजीत ने रुपए देने से मना कर दिया.

रामदीन जान रहा था कि अनरजीत झूठ बोल रहा है. पैसे होते हुए भी वह देने से मना कर रहा है. उसे अनरजीत का यह व्यवहार काफी नागवार लगा. उसी पल उस के दिमाग में एक खतरनाक योजना ने जन्म लिया.

रामदीन जानता था कि रात के समय अनरजीत के पास लाखों रुपए जमा रहते हैं. क्यों न उस रकम को ही हासिल कर लिया जाए. लेकिन रुपए हासिल करना आसान नहीं था. रुपए कैसे हासिल करने हैं, उस ने यह योजना भी बना ली.

योजना के मुताबिक 5 अगस्त, 2020 की रात 11 बजे रामदीन अनरजीत के घर पहुंचा. उस समय अनरजीत और उस की पत्नी रीमा गहरी नींद में सो रहे थे. दरवाजा भिड़ा हुआ था. जैसे ही उस ने हाथ लगाया दरवाजा भीतर की ओर खुल गया. कमरे में घुसने से पहले उस ने बाहर की ओर देखा. दूरदूर तक कोई दिखाई नहीं दिया तो वह दबे पांव कमरे में घुस गया.

अनरजीत और रीमा दोनों तख्त पर सो रहे थे. अनरजीत को देखते ही रामदीन को गुस्सा आ गया. गुस्से में रामदीन ने अपने पास लाई नुकीली हथौड़ी से नींद में सो रहे अनरजीत के सिर पर जोरदार वार किया. फिर उस पर चाकू से वार किया. अनरजीत नीचे फर्श पर गिर कर मौत के आगोश में समा गया. फिर उस ने रीमा की गरदन पर पास में रखे फावड़े से वार किया, जिस से उस की भी मौत हो गई.

दोनों को मौत के घाट उतारने के बाद रामदीन ने घर की अलमारी को खंगाला.  लेकिन अलमारी से उसे 30 हजार रुपए ही मिले. उस ने सोचा था कि घर में रखे लाखों रुपए हाथ लगेंगे तो सब काम बन जाएगा. लेकिन सब उल्टा हो गया. रुपयों के चक्कर में उस ने 2 जान ले ली थी. फिर जो उस के हाथ आया, उसे ले कर वहां से फरार हो गया.

आखिरकार मुखबिर की सूचना पर 2 महीने बाद पुलिस को घटना का परदाफाश करने में कामयाबी मिल गई. पुलिस ने आरोपी रामदीन से कत्ल में प्रयुक्त नुकीली हथौड़ी और धारदार चाकू बरामद कर लिया. विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने रामदीन उर्फ रहमुद्दीन को कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे मंडलीय कारागार गोरखपुर भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक पुलिस ने अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर दिया था. आरोपी रामदीन उर्फ रहमुद्दीन अपने किए का नतीजा सलाखों के पीछे भुगत रहा है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Serial Story: दस्विदानिया भाग 1

दीपक उत्तरी बिहार के छोटे से शहर वैशाली का रहने वाला था. वैशाली पटना से लगभग 30 किलोमीटर दूर है. 1982 में गंगा नदी पर गांधी सेतु बन जाने के बाद वैशाली से पटना आनाजाना आसान हो गया था. वैशाली की अपनी एक अलग ऐतिहासिक पहचान भी है.

दीपक इसी वैशाली के एनएनएस कालेज से बीएससी कर रहा था. उस की मां का देहांत बचपन में ही हो चुका था. उस के पिता रामलाल की कपड़े की दुकान थी. दुकान न छोटी थी न बड़ी. आमदनी बस इतनी थी कि बापबेटे का गुजारा हो जाता था. बचत तो न के बराबर थी. वैशाली में ही एक छोटा सा पुश्तैनी मकान था. और कोई संपत्ति नहीं थी. दीपक तो पटना जा कर पढ़ना चाहता था, पर पिता की कम आमदनी के चलते ऐसा नहीं हो सका.

दीपक अभी फाइनल ईयर में ही था कि अचानक दिल के दौरे से उस के पिता भी चल बसे. उस ने किसी तरह पढ़ाई पूरी की. वह दुकान पर नहीं बैठना चाहता था. अब उसे नौकरी की तलाश थी. उस ने तो इंडियन सिविल सर्विस के सपने देखे थे या फिर बिहार लोक सेवा आयोग के द्वारा राज्य सरकार के अधिकारी के. पर अब तो उसे नौकरी तुरंत चाहिए थी.

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दीपक ने भारतीय वायुसेना में एअरमैन की नियुक्ति का विज्ञापन पढ़ा, तो आवेदन कर दिया. उसे लिखित, इंटरव्यू और मैडिकल टैस्ट सभी में सफलता मिली. उस ने वायुसेना के टैक्नीकल ट्रेड में एअरमैन का पद जौइन कर लिया. ट्रेनिंग के बाद उस की पोस्टिंग पठानकोट एअरबेस में हुई. ट्रेनिंग के दौरान ही वह सीनियर अधिकारियों की प्रशंसा का पात्र बन गया. पोस्टिंग के बाद एअरबेस पर उस की कार्यकुशलता से सीनियर अधिकारी बहुत खुश थे.

वायुसेना के रसियन प्लेन को बीचबीच में मैंटेनैंस के लिए रूस जाना पड़ता था. दीपक के अफसर ने उसे बताया कि उसे भी जल्दी रूस जाना होगा. वह यह सुन कर बहुत खुश हुआ. उस ने जल्दीजल्दी कुछ आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले रसियन शब्द और वाक्य सीख लिए. अपने एक दोस्त, जो 2 बार रूस जा चुका था से हैवी रसियन ओवरकोट भी उधार ले लिया. रूस की जबरदस्त ठंड के लिए यह जरूरी था.

1 महीने के अंदर ही दीपक को एक रसियन प्लेन के साथ बेलारूस की राजधानी मिंस्क जाना पड़ा. उस जहाज का कारखाना वहीं था. तब तक सोवियत संघ का बंटवारा हो चुका था और बेलारूस एक अलग राष्ट्र बन गया था.

अपने दोस्तों की सलाह पर उस ने भारत से कुछ चीजें जो रूसियों को बेहद पसंद थीं रख लीं. ये स्थानीय लोगों को मित्र बनाने में काम आती थीं. चूंकि जहाज अपना ही था, इसलिए वजन की सीमा नहीं थी. उस ने टूथपेस्ट, परफ्यूम, सुगंधित दार्जिलिंग चायपत्ती, ब्रैंडेड कौस्मैटिक आदि साथ रख लिए.

‘‘लेडीज कौस्मैटिक वहां की लड़कियों को इंप्रैस करने में बहुत काम आएंगे,’’ ऐसा चलते समय दोस्तों ने कहा था.

मिंस्क में लैंड करने के बाद दीपक का सामना जोरदार ठंड से हुआ. मार्च के मध्य में भी न्यूनतम तापमान शून्य से थोड़ा नीचे था. मिंस्क में उस के कम से कम 2 सप्ताह रुकने की संभावना थी. खैर, उस के मित्र का ओवरकोट प्लेन से निकलते ही काम आया.

दीपक के साथ पायलट, कोपायलट, इंजीनियर और क्रू  मैंबर्स भी थे. दीपक को एक होटल में एक सहकर्मी के साथ रूम शेयर करना था. वह दोस्त पहले भी मिंस्क आ चुका था. उस ने दीपक को रसियन से दोस्ती के टिप्स भी दिए.

अगले दिन से दीपक को कारखाना जाना था. उस की टीम को एक इंस्ट्रक्टर जहाज के कलपुरजों, रखरखाव के बारे में रूसी भाषा में समझाता था. साथ में एक लड़की इंटरप्रेटर उसे अंगरेजी में अनुवाद कर समझाती थी.

नताशा नाम था उस लड़की का. बला की खूबसूरत थी वह. उम्र 20 साल के आसपास होगी. गोरा रंग तो वहां सभी का होता है, पर नताशा में कुछ विशेष आकर्षण था जो जबरन किसी को उस की तारीफ करने को मजबूर कर देता. सुंदर चेहरा, बड़ीबड़ी नीली आंखें, सुनहरे बाल और छरहरे बदन को दीपक ने पहली बार इतने करीब से देखा था.

दीपक की नजरें बारबार नताशा पर जा टिकती थीं. जब कभी नताशा उस की ओर देखती दीपक अपनी निगाहें फेर लेता. वह धीमे से मुसकरा देती. जब वह सुबहसुबह मिलती तो दीपक हाथ मिला कर रूसी भाषा में गुड मौर्निंग यानी दोबरोय उत्रो बोलता और कुछ देर तक उस का हाथ पकड़े रहता.

नताशा मुसकरा कर गुड मौर्निंग कह आगे बोलती कि प्रस्तिते पजालास्ता ऐक्सक्यूज मी, प्लीज, हाथ तो छोड़ो. तब दीपक झेंप कर जल्दी से उस का हाथ छोड़ देता.

उस की हरकत पर उस के साथी और इंस्ट्रक्टर भी हंस पड़ते थे. लंच के समय कारखाने की कैंटीन में दीपक, नताशा और इंस्ट्रक्टर एक ही टेबल पर बैठते थे. 1 सप्ताह में वे कुछ फ्रैंक हो गए थे. इस में इंडिया से साथ लाए गिफ्ट आइटम्स की अहम भूमिका थी.

नताशा के साथ अब कुछ पर्सनल बातें भी होने लगी थीं. उस ने दीपक को बताया कि रूसी लोग इंडियंस को बहुत पसंद करते हैं. उस के मातापिता का डिवोर्स बहुत पहले हो चुका था और कुछ अरसा पहले मां का भी देहांत हो गया था. उस के पिता चेर्नोबिल न्यूक्लियर प्लांट में काम करते थे और वह उन से मिलती रहती थी.

लगभग 10 दिन बाद दीपक को पता चला कि प्लेन को क्लीयरैंस मिलने में अभी 10 दिन और लगेंगे. एक दिन दीपक ने इंस्ट्रक्टर से कहा कि उस की मास्को देखने की इच्छा है.

इंस्ट्रक्टर ने कहा, ‘‘ओचिन खराशो (बहुत अच्छा) शनिवार को नताशा भी किसी काम से मास्को जा रही है. तुम भी उसी की फ्लाइट से चले जाओ. मात्र 1 घंटे की फ्लाइट है.’’

‘‘स्पासिबा (थैंक्स) गुड आइडिया,’’ दीपक बोला और फिर उसी समय नताशा से फोन पर अपनी इच्छा बताई तो वह बोली नेत प्रौब्लेमा (नो प्रौब्लम).

दीपक बहुत खुश हुआ. उस ने अपने दोस्त से मास्को यात्रा की चर्चा करते हुए पूछा, ‘‘अगर मुझे किसी रूसी लड़की के कपड़ों की तारीफ करनी हो तो क्या कहना चाहिए?’’

जवाब में दोस्त ने उसे एक रूसी शब्द बताया. शनिवार को दीपक और नताशा मास्को पहुंचे. दोनों होटल में आसपास के कमरों में रुके. नताशा ने उसे क्रेमलिन, बोलशोई थिएटर, बैले डांस, रसियन सर्कस आदि दिखाए.

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1 अप्रैल की सुबह दोनों मिले. उसी दिन शाम को उन्हें मिंस्क लौटना था. नताशा नीले रंग के लौंग फ्रौक में थी, कमर पर सुनहरे रंग की बैल्टनुमा डोरी बंधी थी, जिस के दोनों छोरों पर पीले गुलाब के फूलों की तरह झालर लटक रही थी. फ्रौक का कपड़ा पारदर्शी तो नहीं था, पर पतला था जिस के चलते उस के अंत:वस्त्र कुछ झलक रहे थे. वह दीपक के कमरे में सोफे पर बैठी थी.

दीपक बोला, ‘‘दोबरोय उत्रो. तिह क्रासावित्सा (यू आर लुकिंग ब्यूटीफुल).’’

‘‘स्पासिबा (धन्यवाद).’’

वह नताशा की ओर देख कर बोला ‘‘ओचिन खराशो तृसिकी.’’

‘‘व्हाट? तुम ने कैसे देखा?’’

‘‘अपनी दोनों आंखों से.’’

‘‘तुम्हारी आंखें मुझ में बस यही देख रही थीं?’’

फिर अचानक नताशा सोफे से उठ खड़ी हुई और बोली, ‘‘मैं इंडियंस की इज्जत करती हूं.’’

‘‘दा (यस).’’

‘‘व्हाट दा. मैं तुम्हें अच्छा आदमी समझती थी. मुझे तुम से ऐसी उम्मीद नहीं थी,’’ और फिर बिना दीपक की ओर देखे कमरे से तेजी से निकल गई.

दीपक को मानो लकवा मार गया. वह नताशा के कमरे के दरवाजे की जितनी बार बैल बजाता एक ही बात सुनने को मिलती कि चले जाओ. मैं तुम से बात नहीं करना चाहती हूं.

उसी दिन शाम की फ्लाइट से दोनों मिंस्क लौट आए. पर नताशा ने अपनी सीट अलग ले ली थी. दोनों में कोई बात नहीं हुई.

अगले दिन लंच के समय कारखाने की कैंटीन में दीपक, उस का मित्र, नताशा और इंस्ट्रक्टर एक टेबल पर बैठे थे. दीपक बारबार नताशा की ओर देख रहा था पर नताशा उसे नजरअंदाज कर देती. दीपक ने इंस्ट्रक्टर के कान में धीरे से कुछ कहा तो इंस्ट्रक्टर ने नताशा से धीरे से कुछ कहा.

नताशा से कुछ बात कर इंस्ट्रक्टर ने दीपक से पूछा, ‘‘तुम ने नताशा से कोई गंदी बात की थी? वह बहुत नाराज है तुम से.’’

‘‘मैं ने तो ऐसी कोई बात नहीं की थी,’’ बोल कर दीपक ने जो आखिरी बात नताशा को कही थी उसे दोहरा दिया.

इंस्ट्रक्टर ने भी सिर पीटते हुए कहा, ‘‘बेवकूफ यह तुम ने क्या कह दिया? इस का मतलब समझते हो?’’

‘‘हां, तुम्हारी ड्रैस बहुत अच्छी है?’’

‘‘नेत (नो), इस का अर्थ तुम्हारी पैंटी बहुत अच्छी है, होता है बेवकूफ.’’

तब दीपक अपने मित्र की ओर सवालिया आंखों से देखने लगा. फिर कहा, ‘‘तुम ने ही सिखाया था यह शब्द मुझे.’’

नताशा भी आश्चर्य से उस की तरफ देखने लगी थी. दोस्त भी अपनी सफाई में बोला, ‘‘अरे यार मैं ने तो यों ही बता दिया था. मुझे लेडीज ड्रैस का यही एक शब्द आता था. मुझे क्या पता था कि तू नताशा को बोलने जा रहा है. आई एम सौरी.’’

फिर नताशा की ओर देख कर बोला, ‘‘आई एम सौरी नताशा. मेरी वजह से यह गड़बड़ हुई है. दरअसल, दीपक ने तुम्हारी ड्रैस की तारीफ करनी चाही होगी… यह बेचारा बेकुसूर है.’’

यह सुन कर सभी एकसाथ हंस पड़े.

दीपक ने नताशा से कहा, ‘‘ईजवीनीते (सौरी) नताशा. मैं ने जानबूझ कर उस समय ऐसा नहीं कहा था.’’

‘‘ईजवीनीते. प्रस्तिते (सौरी, ऐक्सक्यूज मी). हम दोनों गलतफहमी के शिकार हुए.’’

इंस्ट्रक्टर बोला, ‘‘चलो इसे भी एक अप्रैल फूल जोक समझ कर भूल जाओ.’’

इस के बाद नताशा और दीपक में मित्रता और गहरी हो चली. दोनों शालीनतापूर्वक अपनी दोस्ती निभा रहे थे. दीपक तो इस रिश्ते को धीरेधीरे दोस्ती से आगे ले जाना चाहता था, पर कुछ संकोच से, कुछ दोस्ती टूटने के भय से और कुछ समय के अभाव से मन की बात जबान पर नहीं ला रहा था.

इसी बीच दीपक के इंडिया लौटने का दिन भी आ गया था. एअरपोर्ट पर नताशा दीपक को बिदा करने आई थी. उस ने आंखों में छलक आए आंसू छिपाने के लिए रंगीन चश्मा पहन लिया. दीपक को पहली बार महसूस हुआ जैसे वह भी मन की कुछ बात चाह कर भी नहीं कर पा रही है. दीपक के चेहरे की उदासी किसी से छिपी नहीं थी.

‘‘दस्विदानिया, (गुड बाई), होप टु सी यू अगेन,’’ बोल कर दोनों गले मिले.

Serial Story: दस्विदानिया भाग 2

दीपक भारत लौट आया. नताशा से उस का संपर्क फोन से लगातार बना हुआ था. इसी बीच डिपार्टमैंटल परीक्षा और इंटरव्यू द्वारा दीपक को वायुसेना में कमीशन मिल गया. वह अफसर बन गया. हालांकि उस के ऊपर कोई बंदिश नहीं थी, उस के मातापिता गुजर चुके थे, फिर भी अभी तक उस ने शादी नहीं की थी.

इस बीच नताशा ने उसे बताया कि उस के पापा भी चल बसे. उन्हें कैंसर था. संदेह था कि चेर्नोबिल न्यूक्लियर प्लांट में हुई भयानक दुर्घटना के बाद कुछ लोगों में रैडिएशन की मात्रा काफी बढ़ गई थी. शायद उन के कैंसर की यही वजह रही होगी.

पिता की बीमारी में नताशा महीनों उन के साथ रही थी. इसलिए उस ने नौकरी भी छोड़ दी थी. फिलहाल कोई नौकरी नहीं थी और पिता के घर का कर्ज भी चुकाना था. वह एक नाइट क्लब में डांस कर और मसाज पार्लर जौइन कर काम चला रही थी. उस ने दीपक से इस बारे में कुछ नहीं कहा था, पर बराबर संपर्क बना हुआ था.

लगभग 2 साल बाद दीपक दिल्ली एअरपोर्ट पर था. अचानक उस की नजर नताशा पर पड़ी. वह दौड़ कर उस के पास गया और बोला, ‘‘नताशा, अचानक तुम यहां? मुझे खबर क्यों नहीं की?’’

नताशा भी अकस्मात उसे देख कर घबरा उठी. फिर अपनेआप को कुछ सहज कर कहा, ‘‘मुझे भी अचानक यहां आना पड़ा. समय नहीं मिल सका बात करने के लिए…तुम यहां कैसे?’’

‘‘मैं अभी एक घरेलू उड़ान से यहां आया हूं. खैर, चलो कहीं बैठ कर कौफी पीते हैं. बाकी बातें वहीं होंगी.’’

दोनों एअरपोर्ट के रेस्तरां में बैठे कौफी पी रहे थे. दीपक ने फिर पूछा, ‘‘अब बताओ यहां किस लिए आई हो?’’

नताशा खामोश थी. फिर कौफी की चुसकी लेते हुए बोली, ‘‘एक जरूरी काम से किसी से मिलना है. 2 दिन बाद लौट जाऊंगी.’’

‘‘ठीक है पर क्या काम है, किस से मिलना है, मुझे नहीं बताओगी? क्या मैं भी तुम्हारे साथ चल सकता हूं?’’

‘‘नहीं, मुझे वहां अकेले ही जाना होगा.’’

‘‘चलो, मैं तुम्हें ड्रौप कर दूंगा.’’

‘‘नेत, स्पासिबा (नो, थैंक्स). मेरी कार बाहर खड़ी होगी.’’

‘‘कार को वापस भेज देंगे. कम से कम कुछ देर तक तो तुम्हारे साथ ऐंजौय कर लूंगा.’’

‘‘क्यों मेरे पीछे पड़े हो?’’ बोल कर नताशा उठ कर जाने लगी.

दीपक ने उस का हाथ पकड़ कर रोका और कहा, ‘‘ठीक है, तुम जाओ, मगर मुझ से नाराजगी का कारण बताती जाओ.’’

नताशा तो रुक गई, पर अपने आंसुओं को गालों पर गिरने से न रोक सकी.

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दीपक के द्वारा बारबार पूछे जाने पर वह रो पड़ी और फिर उस ने अपनी पूरी कहानी बताई, ‘‘मैं तुम से क्या कहती? अभी तक तो मैं सिर्फ डांस या मसाज करती आई थी पर मैं पिता का घर किसी भी कीमत पर बचाना चाहती हूं. मैं ने एक ऐस्कौर्ट एजेंसी जौइन कर ली है. शायद आने वाले 2 दिन मुझे किसी बड़े बिजनैसमैन के साथ ही गुजारने पड़ेंगे. तुम समझ रहे हो न मैं क्या कहना चाहती हूं? ’’

‘‘हां, मैं समझ सकता हूं. तुम्हें किस ने हायर किया है, मुझे बता सकती हो?’’

‘‘नो, सौरी. हो सकता है जो नाम मैं जानती हूं वह गलत हो. मैं ने भी उसे अपना सही नाम नहीं बताया है. वैसे भी इस प्रोफैशन की बात किसी तीसरे आदमी को हम नहीं बताते हैं. मैं बस इतना जानती हूं कि मुझे 3 दिनों के लिए 4000 डौलर मिले हैं.’’

‘‘तुम उसे फोन करो, उसे पैसे वापस कर देंगे.’’

‘‘नहीं, यह आसान नहीं है. वह मेरी एजेंसी का पुराना भरोसे वाला ग्राहक है.’’

कुछ देर सोचने के बाद दीपक ने कहा ‘‘एक आइडिया है, उम्मीद है काम कर जाएगा. उस का फोन नंबर तो होगा तुम्हारे पास?’’

‘‘नहीं, मुझे होटल का नंबर और रूम नंबर पता है.’’

‘‘गुड, तुम उसे फोन लगाओ और कहो कि तुम्हें कस्टम वालों ने पकड़ लिया है. तुम्हारे पर्स में कुछ ड्रग्स मिले. तुम्हें खुद पता नहीं कि कहां से ड्रग्स पर्स में आ गए और अब वही तुम्हारी सहायता कर सकता है.’’

नताशा ने फोन कर उस बिजनैसमैन से बात कर वैसा ही कहा.

उधर से वह फोन पर गुस्सा हो कर नताशा से बोला, ‘‘यू इडियट, तुम ने मेरे या

इस होटल के बारे में कस्टम औफिसर को क्या बताया है?’’

‘‘सर, मैं ने तो अभी तक कुछ नहीं बताया है… पर परदेश में बस आप का ही सहारा है. आप कुछ कोशिश करें तो मामला रफादफा हो जाएगा. मैं अपने डौलर तो साथ लाई नहीं हूं.’’

‘‘मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता हूं. खबरदार दोबारा फोन करने की कोशिश की.

अब तुम जानो और तुम्हारा काम… भाड़ में जाओ तुम और तुम्हारे 4000 डौलर,’’ और उस ने फोन काट दिया.

बिजनैसमैन की बातें सुन कर दोनों एकसाथ खुशी से उछल पड़े. नताशा बोली, ‘‘अब तो मेरे डौलर भी बच गए. पापा के घर का काफी कर्ज चुका सकती हूं. मेरा रिटर्न टिकट तो 2 दिन बाद का है. फिर भी मैं कोशिश करती हूं कि आज रात की फ्लाइट मिल जाए,’’ कह वह रसियन एअरलाइन एरोफ्लोट के काउंटर की तरफ बढ़ी.

दीपक ने उसे रोक कर कहा, ‘‘रुको, इस की कोई जरूरत नहीं है. तुम अभी मेरे साथ चलो. कम से कम 2 दिन तो मेरा साथ दो.’’

दीपक ने नताशा को एक होटल में ठहराया. काफी देर दोनों बातें करते रहे. दोनोें एकदूसरे का दुखसुख समझ रहे थे. रात में डिनर के बाद दीपक चलने लगा. उसे गले से लगाते हुए होंठों पर ऊंगली फेरते हुए बोला, ‘‘नताशा, या लुवलुवा (आई लव यू). कल सुबह फिर मिलते हैं. दोबरोय नोचि (गुड नाइट).’’

‘‘आई लव यू टू,’’ दीपक के बालों को सहलाते हुए नताशा ने कहा.

अगले दिन जब दीपक नताशा से मिलने आया तो वह स्कारलेट कलर के सुंदर लौंग फ्रौक में बैठी थी. बिलकुल उसी तरह जैसे मास्को के होटल में मिली थी.

दीपक बोला, ‘‘दोबरोय उत्रो. क्रासावित्सा (गुड मौर्निंग, ब्यूटीफुल).’’

‘‘कौन ब्यूटीफुल है मैं या तृसिकी?’’ वह हंसते हुए बोली ‘‘दोनों.’’

‘‘यू नौटी बौय,’’ बोल कर नताशा दीपक से सट कर खड़ी हो गई.

दीपक ने उसे अपनी बांहों में ले कर कहा, ‘‘अब तुम कहीं नहीं जाओगी. मैं तुम से शादी करना चाहता हूं. मैं कल ही अपनी शादी के लिए औफिस में अर्जी दे दूंगा.’’

‘‘आई लव यू दीपक, पर मुझे कल जाने दो. मैं ने पिता की निशानी बचाने के लिए अपनी अस्मिता दांव पर लगा दी… मुझे अपने देश जा कर सबकुछ ठीक करने के लिए मुझे कुछ समय दो.’’

अगले दिन नताशा एरोफ्लोट की फ्लाइट से मास्को जा रही थी. दीपक उसे छोड़ने दिल्ली एअरपोर्ट आया था. उस के चेहरे पर उदासी देख कर वह बोली, ‘‘उम्मीद है फिर जल्दी मिलेंगे. डौंट गैट अपसैट. बाय, टेक केयर, दस्विदानिया,’’ और वह एरोफ्लोट की काउंटर पर चैक इन करने बढ़ गई. दोनों हाथ हिला कर एकदूसरे से बिदा ले रहे थे.

कुछ दिनों बाद दीपक ने अपने सीनियर से शादी की अर्जी दे कर इजाजत मांगने की बात की तो सीनियर ने कहा, ‘‘सेना का कोई भी सिपाही किसी विदेशी से शादी नहीं कर सकता है, तुम्हें पता है कि नहीं?’’

‘‘सर, पता है, इसीलिए तो पहले मैं इस की इजाजत लेना चाहता हूं.’’

‘‘और तुम सोचते हो तुम्हें इजाजत मिल जाएगी? यह सेना के नियमों के विरुद्ध है, तुम्हें इस की इजाजत कोईर् भी नहीं दे सकता है.’’

‘‘सर, हम दोनों एकदूसरे से बहुत प्यार करते हैं. मैं शादी उसी से करूंगा.’’

‘‘बेवकूफी नहीं करो, अपने देश में क्या लड़कियों की कमी है?’’

‘‘बेशक नहीं है सर, पर प्यार तो एक से ही किया है मैं ने, सिर्फ नताशा से.’’

‘‘तुम अपना और मेरा समय बरबाद कर रहे हो. तुम्हारा कमीशन पूरा होने में कितना वक्त बाकी है अभी?’’

‘‘सर, अभी तो करीब 12 साल बाकी हैं.’’

‘‘तब 2 ही उपाय हैं या तो 12 साल इंतजार करो या फिर नताशा को अपनी नागरिकता छोड़ने को कहो. और कोई उपाय नहीं है.’’

‘‘अगर मैं त्यागपत्र देना चाहूं तो?’’

‘‘वह भी स्वीकार नहीं होगा. देश और सेना के प्रति तुम्हारा कुछ कर्तव्य बनता है जो प्यार से ज्यादा जरूरी है, याद रखना.’’

‘‘यस सर, मैं अपनी ड्यूटी भी निभाऊंगा… मैं कमीशन पूरा होने तक इंतजार करूंगा,’’ कह वह सोचने लगा कि पता नहीं नताशा इतने लंबे समय तक मेरी प्रतीक्षा करेगी या नहीं. फिर सोचा कि नताशा को सभी बातें बता दे.

दीपक ने जब नताशा से बात की तो उस ने कहा, ‘‘12 साल क्या मैं कयामत तक तुम्हारा इंतजार कर सकती हूं… तुम बेशक देश के प्रति अपना फर्ज निभाओ. मैं इंतजार कर लूंगी.’’

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Serial Story: दस्विदानिया भाग 3

नताशा से बात कर दीपक को खुशी हुई. दोनों में प्यारभरी बातें होती रहती थीं. वे बराबर एकदूसरे के संपर्क में रहते. धीरेधीरे समय बीतता जा रहा था. करीब 2 साल बाद एक बार नताशा दीपक से मिलने इंडिया आई थी. दीपक ने महसूस किया उस के चेहरे पर पहले जैसी चमक नहीं थी. स्वास्थ्य भी कुछ गिरा सा लग रहा था.

दीपक के पूछने पर उस ने कहा, ‘‘कोई खास बात नहीं है, सफर की थकावट और थोड़ा सिरदर्द है.’’

दोनों में मर्यादित प्रेम संबंध बना हुआ था. एक दिन बाद नताशा ने लौटते समय कहा, ‘‘इंतजार का समय 2 साल कम हो गया.’’

‘‘हां, बाकी भी कट जाएगा.’’

बेलारूस लौटने के बाद से नताशा का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता था. कभी जोर से सिरदर्द, कभी बुखार तो कभी नाक से खून बहता. सारे टैस्ट किए गए तो पता चला कि उसे ब्लड कैंसर है. डाक्टर ने बताया कि फिलहाल दवा लेती रहो, पर 2 साल के अंदर कुछ भी हो सकता है. नताशा अपनी जिंदगी से निराश हो चली थी. एक तरफ अकेलापन तो दूसरी ओर जानलेवा बीमारी. फिर भी उस ने दीपक को कुछ नहीं बताया.

इधर कुछ महीने बाद दीपक को 3-4 दिनों से तेज बुखार था.

वह अपने एअरफोर्स के अस्पताल में दिखाने गया. उस समय फ्लाइट लैफ्टिनैंट डाक्टर ईशा ड्यूटी पर थीं. चैकअप किया तो दीपक को 103 डिग्री से ज्यादा ही फीवर था.

डाक्टर बोली, ‘‘तुम्हें एडमिट होना होगा. आज फीवर का चौथा दिन है…कुछ ब्लड टैस्ट करूंगी.’’

दीपक अस्पताल में भरती था. टैस्ट से पता चला कि उसे टाईफाइड है.

डा. ईशा ने पूछा, ‘‘तुम्हारे घर में और कौनकौन हैं, आई मीन वाइफ, बच्चे?’’

‘‘मैं बैचलर हूं डाक्टर… वैसे भी और कोई नहीं है मेरा.’’

‘‘डौंट वरी, हम लोग हैं न,’’ डाक्टर उस की नब्ज देखते हुए बोलीं.

बीचबीच में कभीकभी दीपक का खुबार 103 से 104 डिग्री तक हो जाता तो वह नताशानताशा पुकारता. डा. ईशा के पूछने पर उस ने नताशा के बारे में बता दिया. डाक्टर ने नताशा का फोन नंबर ले कर उसे फोन कर दिया. 2 दिन बाद नताशा दीपक से मिलने पहुंच गई. उस दिन दीपक का फीवर कम था. नताशा उस के कैबिन में दीपक के बालों को सहला रही थी.

तभी डा. ईशा ने प्रवेश किया. बोलीं, ‘‘आई एम सौरी, मैं बाद में आ जाती हूं. बस रूटीन चैकअप करना है. आज इन्हें कुछ आराम है.’’

दीपक बोला, ‘‘नहीं डाक्टर, आप को जाने की जरूरत नहीं है. आप अपना काम कर लें… अब नताशा आ गई है, तो मैं ठीक हो जाऊंगा.’’

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डा. ईशा ने नताशा से पूछा, ‘‘तुम इंडिया कितने दिनों के लिए आई हो?’’

‘‘ज्यादा से ज्यादा 2 दिन तक रुक सकती हूं.’’

‘‘ठीक है, इन का बुखार उतरना शुरू हो गया है. उम्मीद है कल तक कुछ और आराम मिलेगा.’’

डाक्टर के जाने के बाद दीपक ने नताशा से पूछा, ‘‘क्या बात है, तुम्हारी तबीयत तो ठीक है? थकीथकी लग रही हो?’’

‘‘नहीं, मैं बिलकुल ठीक हूं. तुम आराम करो. मैं अभी चलती हूं. फिर आऊंगी शाम को विजिटिंग आवर्स में.’’

नताशा डा. ईशा से मिलने उन के कैबिन में गई तो डा. ईशा बोलीं, ‘‘आप लंच मेरे साथ लेंगी… मेरे क्वार्टर में आ जाना, मैं वेट करूंगी.’’

लंच के बाद नताशा डा. ईशा से बैठी बातें कर रही थी. डा. ईशा ने कहा, ‘‘क्या बात है, इंडियन खाना पसंद नहीं आया? तुम ने तो कुछ खाया ही नहीं. तुम्हें तो इंडियन खाने की आदत डालनी होगी.’’

‘‘नहीं, खाना बहुत अच्छा था. मैं ने भरपेट खा लिया है.’’

‘‘दीपक तुम्हें बहुत चाहते हैं… तुम्हारे लिए लंबा इंतजार करने को तैयार हैं.’’

उसी समय नताशा के सिर में जोर का दर्द हुआ और नाक से खून रिसने लगा. डा. ईशा उसे सहारा दे कर वाशबेसिन तक ले गई, फिर बैड पर आराम करने के लिए लिटा दिया और पूछा, ‘‘तुम्हें क्या तकलीफ है और ऐसा कितने दिनों से हो रहा है?’’

नताशा ने अपने बैग से दवा खाई और अपनी पूरी बीमारी विस्तार से बता दी. फिर अपनी फाइल और रिपोर्ट उन्हें दिखा कर कहा, ‘‘अब मेरी जिंदगी कुछ ही महीनों की बची है. डाक्टर ने कहा है कि ज्यादा से ज्यादा 1 साल. मैं चाहती हूं आप दीपक को धीरेधीरे समझाएं… हो सकता है मैं इस के बाद अब उस से मिल न सकूं, क्योंकि लंबी यात्रा के लायक नहीं रहूंगी.’’

अगले दिन दीपक को अस्पताल से छुट्टी मिल गई. वह अपने क्वार्टर में नताशा के साथ था. नताशा को अगले दिन जाना था. दीपक बोला, ‘‘मैं तो एअरफोर्स में हूं, मेरा विदेश जाना संभव नहीं है. तुम्हीं मिलने आ जाया करो. मुझे बहुत अच्छा लगता है तुम से मिल कर.’’

‘‘अच्छा तो मुझे भी लगता है, पर मुझे लगता है तुम्हारी देखभाल करने वाला कोई यहां होना चाहिए. मेरे इंतजार में कहीं तुम्हारे स्वास्थ्य पर बुरा असर न पड़े.’’

‘‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा. मैं वेट कर लूंगा.’’

नताशा जा रही थी. दीपक से बिदा लेते समय उस की आंखों से आंसू बह रहे थे. डाक्टर ने दीपक को एअरपोर्ट जाने से मना कर दिया था.

नताशा बोली, ‘‘दस्विदानिया, दोस्त.’’

डा. ईशा नताशा के साथ एअरपोर्ट आई थीं.

नताशा बोली, ‘‘डाक्टर, अब मैं दीपक से मिलने नहीं आ सकती हूं…आप समझ ही रही हैं न… मैं ने दीपक से कुछ नहीं कहा है. पर आप उसे सच बता दीजिएगा.’’

नताशा चली गई. डा. ईशा ने उस की बीमारी के बारे में दीपक को बता दिया. वह बहुत दुखी हुआ. डा. ईशा दीपक से अकसर मिलने आतीं और उसे समझातीं. लगभग 6 महीने बाद नताशा का आखिरी फोन उसे मिला. वह अस्पताल में अंतिम सांसें गिन रही थी.

नताशा ने कहा, ‘‘सौरी दोस्त, मैं अब और तुम्हारा इंतजार नहीं कर सकती हूं. किसी भी पल आखिरी सांस ले सकती हूं. टेक केयर औफ योरसैल्फ. दस्विदानिया, प्राश्चे नवसेदगा (गुड बाय सदा के लिए).’’

करीब आधे घंटे के बाद नताशा की मृत्यु की खबर दीपक को मिली. वह बहुत दुखी हुआ. उस की आंखों से भी लगातार आंसू बह रहे थे. डा. ईशा दीपक को सांत्वना दे रही थी.

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बीमारी के बाद दीपक और ईशा दोनों अकसर मिलने लगे थे. एक दिन दोनों साथ बैठे थे. दीपक थोड़ा सहज हो चला था. वह बोला, ‘‘अकेलापन काटने को दौड़ता है.’’

‘‘आप देश के बहादुर सैनिक हो. अपना मनोबल बनाए रखो. ड्यूटी के बाद कुछ अन्य कार्यों में अपनेआप को व्यस्त रखो.’’

‘‘मैं नताशा को भुला नहीं पा रहा हूं.’’

‘‘यादें इतनी आसानी से नहीं भूलतीं, पर कभीकभी यादों को हाशिए पर रख कर जिंदगी में आगे बढ़ना होता है. मैं भी उसे कहां भूल सकी हूं.’’

‘‘किसे?’’

‘‘फ्लाइंग अफसर राकेश से मेरी शादी तय हुई थी. हम दोनों एकदूसरे को चाहते भी थे, पर एक टैस्ट फ्लाइट के क्रैश होने से वह नहीं रहा.’’

‘‘उफ , सो सौरी.’’

कुछ दिन बाद क्लब में डा. ईशा और दीपक एक सीनियर अफसर स्क्वाड्रन लीडर उमेश के साथ बैठे थे. उमेश ने कहा, ‘‘तुम दोनों की कहानी मिलतीजुलती है. क्यों न तुम दोनों एक हो कर एकदूसरे के सुखदुख में साथ दो.’’

डा. ईशा और दीपक एकदूसरे को देखने लगे. उमेश ने महसूस किया कि दोनों की आंखों से स्वीकृति का भाव साफ छलक रहा है.

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