सौजन्य: मनोहर कहानियां
नरेशपाल त्यागी न सिर्फ बड़े कौन्ट्रैक्टर थे बल्कि अपने भांजे विधायक अजीतपाल त्यागी के राजनीतिक सलाहकार भी थे. विधायक अजीत त्यागी भी अपने घर वालों के बजाय मामा नरेश त्यागी को ज्यादा अहमियत देते थे. विधायक के बड़े भाई गिरीश त्यागी ने ऐसी साजिश रची कि…
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में महानगर की पौश कालोनियों में शुमार लोहिया नगर में सुबह की सैर करने वालों की हलचल शुरू हो चुकी थी. मूलरूप से निवाड़ी थाना क्षेत्र के गांव सारा के रहने वाले नरेश त्यागी (60) पत्नी व 2 बेटों अभिषेक त्यागी उर्फ शेखर एवं अविनाश त्यागी उर्फ शैंकी के साथ पिछले 30 सालों से लोहिया नगर में रह रहे थे. वह नगर निगम, पीडब्लूडी समेत कई सरकारी विभागों में कौन्ट्रैक्टर थे.
उम्र बढ़ने के साथ वह अपनी सेहत को ले कर काफी संजीदा थे, इसलिए खुद को चुस्तदुरुस्त और स्वस्थ रखने के लिए उन्होंने सुबह की सैर को अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया था.
लोहिया नगर में ज्यादातर कोठियां और बंगले पूर्व नौकरशाहों और राजनीति से जुड़े लोगों के हैं, इसलिए इलाके में एक बड़ा सा पार्क भी है. इसी औफिसर पार्क में इलाके के लोग सुबह की सैर के लिए जाते हैं.
9 अक्तूबर, 2020 की सुबह के करीब पौने 6 बजे का वक्त था. हमेशा की तरह नरेश त्यागी अपने घर से निकले और करीब एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित लोहिया नगर के औफिसर पार्क की तरफ जा रहे थे. नरेश त्यागी जैसे ही पूर्व सांसद के.सी. त्यागी की कोठी के सामने स्थित पार्क के पास पहुंचे तो उसी समय ग्रे कलर की स्कूटी उन के पास आ कर रुकी. पल भर के लिए वह ठिठक गए.
स्कूटी पर 2 युवक सवार थे, दोनों ने हेलमेट और मास्क पहने थे, जिस से वह उन का चेहरा तो नहीं देख पाए, लेकिन बदमाशों ने स्कूटी रुकते ही जब उन से कहा, ‘राम राम जी’ तो प्रत्युत्तर में उन की राम राम का जवाब देते हुए नरेश सोचने लगे कि शायद वे कोई जानकार होंगे और कोई पता पूछने के लिए उन के पास रुके होंगे.
नरेश त्यागी यह सोच ही रहे थे कि अचानक स्कूटी पर पीछे बैठे युवक ने कमर में खोंसा पिस्तौल निकाल कर उन पर ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं. स्कूटी ड्राइव कर रहे युवक ने भी कमर में लगा तमंचा निकाला और नरेश त्यागी पर फायर झोंक दिए.
एक के बाद एक 6 फायरों की आवाज से इलाका गूंज उठा. सुबह की सैर करने वाले जो इक्कादुक्का लोग उस वक्त सड़क पर मौजूद थे, उन्होंने दूर से यह माजरा देखा तो सहम गए.
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सब कुछ इतनी जल्दी घटित हुआ था कि नरेश त्यागी को संभलने का मौका नहीं मिला. उन के शरीर में पिस्तौल की गोलियां पेवस्त हो चुकी थीं, फिर भी वह जान बचाने के लिए करीब 70 मीटर तक भागे, लेकिन स्कूटी पर बैठे बदमाश ने उतर कर पीछा करते हुए जब उन के सिर में 2 गोलियां उतार दीं तो उन की हिम्मत जवाब दे गई. खून से सराबोर हो चुके नरेश त्यागी लहरा कर वहीं जमीन पर गिर गए.
भाजपा विधायक के मामा
गोलियों की गूंज सुन कर कुछ राहगीर तथा आसपास की कोठियों में रहने वाले लोग बाहर निकल आए थे. नरेश त्यागी मुरादनगर विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी के विधायक अजीत पाल त्यागी के सगे मामा थे और उन के राजनीतिक कामकाज भी वे ही संभालते थे. लिहाजा लोहिया नगर इलाके में उन्हें सब अच्छी तरह पहचानते थे.
किसी ने फोन कर के जब यह सूचना उन के बेटों को दी तो वे भी दौड़ते हुए मौके पर पहुंच गए. कुछ लोगों ने तब तक पुलिस को फोन कर दिया. उन का बेटा शैंकी गाड़ी ले आया था. गाड़ी में लाद कर नरेश त्यागी को समीप के एक बड़े नर्सिंगहोम ले जाया गया. लेकिन वहां के डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.
वारदात की जानकारी मिलने के बाद सिहानी गेट थाने के प्रभारी निरीक्षक कृष्णगोपाल शर्मा, एसआई ब्रजकिशोर व स्टाफ को ले कर मौके पर पहुंच गए.
मामला चूंकि एक सत्तारूढ़ पार्टी के पदासीन विधायक के मामा की हत्या का था, लिहाजा कुछ ही देर में सीओ (सिटी) अवनीश कुमार, एसपी (सिटी) अभिषेक मिश्रा और एसएसपी कलानिधि नैथानी आसपास के थानों की पुलिस और उच्चाधिकारी मौके पर पहुंच गए.
नरेश त्यागी की हत्या की खबर पूरे शहर में जंगल की आग की तरह फैल गई. वैसे भी लोहिया नगर में जहां पर नरेश त्यागी की हत्या हुई, वह गाजियाबाद की पुरानी पौश कालोनी है. यहां पर जनता दल के राष्ट्रीय महासचिव व पूर्व सांसद के.सी. त्यागी, पूर्व कांग्रेसी विधायक के.के. शर्मा समेत कई पुलिस अधिकारी व प्रशासनिक अधिकारियों के आवास भी हैं. वहां हुई एक रसूखदार व्यक्ति की हत्या ने लोगों को चौंका दिया था.
सुबह का सूरज चढ़ने के साथ लोहिया नगर में उन के आवास पर लोगों का हुजूम उमड़ आया. पुलिस ने तब तक घटनास्थल पर लोगों से पूछताछ कर ली थी. वारदात पर कोई भी चश्मदीद नहीं मिला था. संयोग से पुलिस को घटनास्थल के पास एक सीसीटीवी कैमरा जरूर मिल गया, जिस में पूरी वारदात कैद हो गई थी.
इस बीच सिहानी गेट पुलिस ने अस्पताल जा कर नरेश त्यागी का शव पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. वारदात की गंभीरता को भांप कर मेरठ परिक्षेत्र के आईजी प्रवीन कुमार भी नरेश त्यागी के घर पहुंचे. उन के द्वारा पूछने पर परिजनों ने सीधे तौर पर किसी पर भी हत्या का शक नहीं जताया.
इस बीच उच्चाधिकारियों के निर्देश पर सिहानी गेट थाने में अज्ञात हत्यारों के खिलाफ भादंसं संहिता की धारा 302 के तहत हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया.
एसएसपी के निर्देश पर एसपी सिटी ने एक विशेष टीम का गठन कर दिया, जिस की निगरानी का जिम्मा सीओ (द्वितीय) अवनीश कुमार को सौंपा गया. विशेष टीम में थानाप्रभारी कृष्णगोपाल शर्मा के साथ स्वाट टीम के प्रभारी इंसपेक्टर संजय पांडेय व उन के सहयोगी एसआई अरुण मिश्रा, सर्विलांस टीम के प्रभारी इंसपेक्टर लक्ष्मण वर्मा व उन के सहयोगी एसआई नरेंद्र कुमार, एसआई ब्रजकिशोर गौतम, हैडकांस्टेबल बालेंद्र, राजेंद्र, कांस्टेबल मनोज, रविंद्र, अखिलेश व खुर्शीद को शामिल किया गया.
सब से पहले पुलिस ने सर्विलांस टीम के जरिए मृतक नरेश त्यागी के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवा कर उसे खंगालना शुरू किया. साथ ही उन के वाट्सऐप की चैट से भी कातिलों का सुराग लगाने की कोशिश शुरू कर दी.
सर्विलांस टीम ने घटनास्थल से एक्टिव मोबाइल नंबरों के डंप डाटा भी खंगालना शुरू कर दिया, जिस से पता चल सके कि वहां उस वक्त कौन लोग मौजूद थे.
सीसीटीवी कैमरे की फुटेज से पता चला कि कातिल जिस स्कूटी पर सवार हो कर घटनास्थल पर पहुंचे थे, उस का नंबर यूपी14 सी जेड 7446 था. ग्रे कलर की वह स्कूटी मोदी नगर के सौंदा रोड निवासी ज्योति शर्मा के नाम पंजीकृत थी.
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पुलिस की एक टीम जब उक्त पते पर पहुंची तो पता चला कि ज्योति अपने भाई विपिन शर्मा के साथ दिल्ली के न्यू अशोक नगर में रहती है और दिल्ली में जौब करती है.
ज्योति से पूछताछ की गई तो जानकारी मिली कि वह यदाकदा ही स्कूटी का उपयोग करती थी. अधिकांशत: उस का भाई विपिन ही उस का उपयोग करता है.
9 अक्तूबर, 2020 की सुबह स्कूटी उस का भाई विपिन ले कर गया था. कुछ घंटों बाद वह स्कूटी घर पर खड़ी कर के कहीं चला गया था. साथ ही वह यह हिदायत भी दे गया था कि कुछ दिन तक स्कूटी को ले कर कोई बाहर न जाए. उस के बाद से परिवार में किसी को नहीं पता कि विपिन कहां और किस हाल में है.
ज्योति ने बताया कि उस के भाई का मोबाइल नंबर भी तभी से बंद आ रहा है. उस के बाद पुलिस टीम के सादा लिबास पुलिस वालों ने विपिन शर्मा के घर की निगरानी शुरू करा दी.
सर्विलांस टीम ने विपिन के मोबाइल फोन की कालडिटेल्स निकाल कर उस के बारे में छानबीन शुरू की. लेकिन मोबाइल फोन बंद होने के कारण लोकेशन ट्रेस नहीं हो सकी.
पुलिस ने विपिन के बारे में और जानकारी एकत्र की तथा उस की जानपहचान वाले लोगों को भी पकड़ कर पूछताछ शुरू की. मगर कोई फायदा नहीं हुआ. इसलिए जांच विपिन से आगे नहीं बढ़ सकी.
पुलिस की सभी टीमें अलगअलग ऐंगल पर जांच कर रही थीं. पुलिस इस मामले में लगातार मृतक के भांजे विधायक अजीत पाल त्यागी के संपर्क में भी थी. क्योंकि अगर इस हत्याकांड के पीछे कोई राजनीतिक रंजिश रही होगी तो जाहिर है उस का आभास अजीत पाल त्यागी को जरूर होगा.
नरेश त्यागी पूर्व मंत्री राजपाल त्यागी के साले भी थे. 6 बार विधायक रहने के बाद राजपाल त्यागी ने बढ़ती उम्र के कारण राजनीति से किनारा कर लिया था. जिस के बाद मुरादनगर विधानसभा क्षेत्र में कई नेता सक्रिय हो गए थे.
ये नेता क्षेत्र में राजपाल की विरासत को संभालने के प्रयास में थे, लेकिन राजपाल ने अपने पुराने राजनीतिक संबंधों का फायदा उठाते हुए 2017 के विधानसभा चुनाव में अपने छोटे बेटे और जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुके अजीत पाल त्यागी को न केवल बीजेपी से टिकट दिलवाने में सफलता हासिल कर ली बल्कि उम्रदराज होने के बाद भी धुआंधार प्रचार कर उन्हें विधायक बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी.
नरेश की व्यक्तिगत रंजिश के साथसाथ पुलिस पूर्व मंत्री राजपाल त्यागी की 3 दशकों से चल रही रंजिश की भी जांच कर रही थी.
राजनैतिक दुश्मनी पर शुरू की जांच
दरअसल, राजपाल त्यागी की ब्राह्मणों के प्रभावशाली नौरंग पंडित परिवार से दुश्मनी चल रही थी. इस रंजिश के कारण ही राजपाल त्यागी के 2 भाइयों गाजियाबाद बार असोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष कुशल पाल त्यागी और फिर कानपुर विकास प्राधिकरण के चीफ इंजीनियर रहे टी.पी.एस. त्यागी की हत्या हो चुकी थी.
हालांकि राजपाल त्यागी के लोगों पर भी पंडित परिवार के रिश्तेदारों और करीबियों की हत्या कराने के आरोप लगे हैं. लेकिन बाद में कुछ लोगों ने कई हत्याओं के बाद दोनों परिवारों में समझौता करवा कर इस 3 दशक पुरानी दुश्मनी को खत्म कर दिया था.
पुलिस को भनक मिली थी कि अक्तूबर 2009 में 50 हजार के इनामी पूर्व ब्लौकप्रमुख रविंद्र त्यागी की पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत के बाद रविंद्र की पत्नी ने राजपाल त्यागी की भूमिका पर अंगुलियां उठाई थीं. लेकिन इस बिंदु पर जांच के बाद भी पुलिस किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी.
पूछताछ चल रही थी कि इसी बीच 9 नवंबर को इस मामले में अचानक एक नया मोड़ आया. हुआ यूं कि पूर्व मंत्री राजपाल त्यागी ने अपने छोटे बेटे भाजपा विधायक अजीत पाल त्यागी पर गंभीर आरोप लगा दिए. उन्होंने मीडिया से कहा कि अजीत अपने बड़े भाई गिरीश त्यागी को इस हत्याकांड में फंसाने के प्रयास में है.
राजपाल त्यागी ने कहा कि उन का बड़ा बेटा गिरीश त्यागी अपनी और अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए शस्त्र लाइसैंस व गनर की मांग को ले कर 7 अक्तूबर से लखनऊ में था.
इस बारे में पूछने पर राजपाल त्यागी ने साफ कर दिया कि उन का छोटा विधायक बेटा अजीत पाल त्यागी नहीं चाहता कि गिरीश त्यागी का परिवार राजनीतिक रूप से सक्रिय हो. गिरीश के बेटे मोहित की पत्नी रश्मि जिला पंचायत चुनाव लड़ना चाहती थी. जबकि अजीत पाल ऐसा नहीं चाहता. उन्होंने कहा कि अब मेरे सगे साले नरेश त्यागी की हत्या के बाद पुलिस के साथ मिल कर मेरे बेटे गिरीश त्यागी को फंसाने की साजिश रची जा रही है.
राजपाल त्यागी ने पुलिस को यह भी बताया कि अजीत ने मेरे और गिरीश के ऊपर यह भी आरोप लगाए थे कि 2017 व 2019 में चुनावों में हम ने उस की मुखालफत की थी. जबकि सच्चाई यह है कि उन्होंने अजीत को पूरी ताकत और सहयोग के साथ चुनाव लड़वाया.
अगले भाग में पढ़ें- फूलप्रूफ रची थी साजिश
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हत्या का हुआ खुलासा
मामला चूंकि अब राजनीतिक रंग लेने लगा था और पुलिस की मुश्किल यह थी कि पीडि़त परिवार जो राजनीतिक रूप से काफी प्रभावशाली था. उसी परिवार में एक दूसरे पर आरोपप्रत्यारोप लगने शुरू हो गए थे. इसलिए एसएसपी ने इस मामले में सभी टीमों को निर्देश दिया कि कातिलों पर हाथ डालने से पहले वे बेहद सावधानी से पुख्ता सबूत एकत्र कर लें और जांच की प्रक्रिया को पूरी तरह गोपनीय रखें.
इसी बीच सिहानी गेट पुलिस टीम के साथ कुछ महत्त्वपूर्ण सुराग लगे और उस ने 18 नवंबर को अचानक नरेश त्यागी की हत्या का खुलासा करते हुए हिंदू युवा वाहिनी के पूर्व जिलाध्यक्ष जितेंद्र त्यागी को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस का कहना था कि विधायक के बड़े भाई गिरीश त्यागी और हिंदू युवा वाहिनी के पूर्व जिलाध्यक्ष जितेंद्र त्यागी ने घटना से 2 महीने पहले नरेश त्यागी की हत्या की रूपरेखा तैयार कर ली थी.
हालांकि पुलिस ने 18 नवंबर को भाड़े के हत्यारों और हत्या के मकसद के बारे में विस्तार से तो कुछ नहीं बताया, जिस के बाद इस बात के कयास व आरोप लगाए जाने लगे कि कहीं किसी दबाव में तो पुलिस ने बेगुनाहों को बलि का बकरा नहीं बना दिया.
लेकिन 2 दिन बाद ही पुलिस ने इस मामले में जब 3 अन्य लोगों की गिरफ्तारी की तो सारे कयास व आरोप निराधार साबित हो गए.
पुलिस ने विपिन शर्मा निवासी सौंदा रोड, मोदीनगर व हाल निवासी न्यू अशोक नगर दिल्ली, अर्पण चौधरी निवासी गांव खुशहाल, बुलंदशहर और मनोज कुमार निवासी सद्दीक नगर, थाना सिहानी गेट को गिरफ्तार किया. उन के कब्जे से .30 बोर का एक पिस्तौल तथा 315 बोर का कारतूसों के साथ एक तमंचा बरामद किया गया.
ये वही हथियार थे, जिन का इस्तेमाल नरेश त्यागी की हत्या में किया गया था. दोनों के कब्जे से वो स्कूटी भी बरामद हो गई, जिस का इस्तेमाल नरेश त्यागी की हत्या में किया गया था. पुलिस ने बरामद हथियार सीएफएल भेज दिए.
इन तीनों आरोपियों से पुलिस ने पूछताछ के बाद जो जानकारी हासिल की तो नरेश त्यागी हत्याकांड में उन के भांजे गिरीश त्यागी का नाम मुख्य खलनायक के किरदार के रूप में सामने आया. हालांकि गिरीश त्यागी पुलिस की पकड़ में नहीं आया था, इसलिए इस बात की तत्काल पुष्टि नहीं हो सकी कि पकड़े गए चारों आरोपियों ने जो आरोप लगाए हैं, उन में कितनी सच्चाई है.
मुख्य आरोपी जितेंद्र त्यागी के मुताबिक नरेश त्यागी की हत्या की पूरी साजिश का असली सूत्रधार गिरीश त्यागी था. जो अपने छोटे भाई अजीत त्यागी के बढ़ते प्रभाव के कारण मन ही मन अजीत त्यागी से जलने लगा था. अजीत के विधायक बन जाने के बाद से रिश्तेदार व बिरादरी के लोग भी परिवार का बड़ा बेटा होने के बावजूद उसे नहीं, बल्कि अजीत को ही पूछते थे. इस से गिरीश खुद को अपमानित महसूस करता था.
कुछ साल पहले तक अजीत अपने पिता व भाई से राजनीतिक मामलों में सलाहमशविरा करता तथा अपने लोगों को कहां किस पद पर चुनाव लड़ाना है या पार्टी संगठन में फिट कराना ये सब सलाह लेता था. मगर पिछले 1-2 सालों में यह जगह मामा नरेश त्यागी ने ले ली थी.
गिरीश ने मामा नरेश त्यागी से 1-2 बार कहा भी था कि वे अजीत को समझाएं कि वह उन की बात सुना करें, लेकिन मामा ने उस की बात को यह कह कर हवा में उड़ा दिया कि अजीत में उस से कहीं ज्यादा राजनीति की समझ है. बस, कुछ ऐसी ही छोटी बातें थीं जिन के कारण गिरीश मानने लगा कि मामा के कारण उस का व उस के बच्चों का रातनीतिक भविष्य नहीं बन सकता.
मामा नरेश के लिए मन में पल रही रंजिश उस वक्त अपने आखिरी मुकाम पर पहुंच गई, जब एक दिन परिवार के बीच विचारविमर्श के दौरान गिरीश ने जिला पंचायत सदस्य के लिए अपने बेटे मोहित की पत्नी रश्मि को चुनाव लड़ाने की बात कही. लेकिन अजीत ने इस बात का विरोध कर दिया और इस में मामा ने अहम भूमिका निभाई.
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विधायक के भाई का सामने आया नाम
इस के बाद गिरीश ने मामा नरेश त्यागी को रास्ते से हटाने का मन बना लिया. जितेंद्र त्यागी ने बताया कि वह गिरीश त्यागी का पुराना दोस्त है.
सिहानी गांव के सद्दीक नगर का रहने वाला जितेंद्र त्यागी मार्च 2018 तक गाजियाबाद जिले का हिंदू युवा वाहिनी का अध्यक्ष रह चुका है. प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ हिंदू युवा वाहिनी के संस्थापक अध्यक्ष हैं.
बीजेपी के कई बड़े नेताओं से उस के करीबी संबध थे. गिरीश त्यागी से भी उस के बेहद करीबी संबध थे.
दरअसल, उसे युवा वाहिनी के अध्यक्ष पद से हर्ष फायरिंग करने के आरोप में हटाया गया था. दीपावली के दिन अपने बेटे से फायरिंग करवाते उस का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था. इस मामले में पुलिस ने उस के खिलाफ मामला दर्ज किया था. बाद में मार्च 2019 में उसे गिरफ्तार कर लिया गया था.
जितेंद्र त्यागी का भाई अमित राणा मुरादनगर थाने का हिस्ट्रीशीटर था. उस ने छात्रों के बीच विवाद में मोदीनगर के एक कौन्वेंट स्कूल में अपने 2 साथियों के साथ गोलीबारी की थी.
अमित राणा भी अपने भाई के साथ हिंदू युवा वाहिनी से जुड़ा था. जितेंद्र त्यागी से पूछताछ में पता चला कि भाई अमित के कारण ही वह अजीत पाल त्यागी से रंजिश रखता था. क्योंकि विधायक अजीत पाल त्यागी के पुलिस पर दबाव के कारण ही अमित 2-3 मामलों में गिरफ्तार हुआ था.
जितेंद्र ने पुलिस को बताया कि गिरीश से उस की दोस्ती इतनी प्रगाढ़ हो गई थी कि गिरीश बेहिचक अपने मन की बात जितेंद्र से कह लेता था. बस एक दिन अपने मामा के बारे में बता कर गिरीश ने जब अपने मामा नरेश को खत्म करने की इच्छा जताई. इस से जितेंद्र त्यागी को लगा कि यही मौका है, जब वो अजीत पाल त्यागी को कमजोर कर सकता है. लिहाजा उस ने गिरीश को भरोसा दिलाया कि वह उस के लिए ये काम जरूर करेगा .
बस उसी दिन जितेंद्र त्यागी हत्याकांड की साजिश रचने में जुट गया. नरेश त्यागी की हत्या की पूरी योजना घटना से करीब 2 माह पहले तैयार हो गई थी.
फूलप्रूफ रची थी साजिश
जितेंद्र ने गिरीश के कहने पर भाड़े के हत्यारों का इंतजाम कर लिया. और ऐसी साजिश तैयार की जिस से हत्याकांड में उस का या गिरीश का कहीं भी नाम न आए.
जितेंद्र ने सिहानी गेट के ही सद्दीक नगर में रहने वाले अपने खास साथी मनोज कुमार को इस काम को करने के लिए चुना. जितेंद्र ने उसे बताया लोहिया नगर में नरेश नाम के एक आदमी की हत्या करनी है, इस के लिए कुछ लड़कों का इंतजाम करने में मदद करें. अच्छीखासी रकम मिलेगी.
मनोज ने कहा, ‘‘भैया लड़के तो हैं और आप उन को जानते भी हो.’’
‘‘कौन है?’’ जितेंद्र ने पूछा.
‘‘अरे भैया विपिन और अर्णव है… लौकडाउन के कारण आजकल कोई कामधाम नहीं है, इसलिए कमाई करने के लिए फड़फड़ा रहे हैं.’’ मनोज ने कहा.
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इस के कुछ दिन बाद मनोज ने दिल्ली में विपिन और अर्पण चौधरी से जितेंद्र की मीटिंग करवा दी.
अगले भाग में पढ़ें- हत्यारों तक कैसे पहुंचे हथियार
लेखक- नीरज कुमार मिश्रा
‘‘पापा, सब लोग हम को घर में घुस कर देख क्यों रहे हैं? ऐसा लग रहा है, जैसे वे कोई अजूबा देख रहे हों,’’ नरेश की 22 साला बेटी नेहा बेटी ने पूछा.
‘‘वह… दरअसल, आज हम लोग शहर से आने के बाद क्वारंटीन सैंटर में 14 दिन रहने के बाद अपने घर जा रहे हैं न, इसीलिए सब लोग हमें अजीब नजरों से देख रहे हैं,’’ गांव में नरेश ने अपनी बेटी नेहा को बताया.
नरेश पिछले 20 साल से दिल्ली शहर में रह रहा था. अपनी शादी के कुछ दिनों बाद ही वह अपनी पत्नी के साथ शहर चला गया था.
शहर में कोई काम शुरू करने के लिए नरेश के पास रकम तो थी नहीं, बस थोड़ाबहुत पैसा अपने बड़े भाई से मांग कर ले गया था, जो वहां सामान खरीदने में ही खर्च हो गया.
पर नरेश ने हिम्मत नहीं हारी और महल्ले के लोगों की गाडि़यां साफ करने का काम ले लिया. बस एक बालटी, एक पुराना कपड़ा, कार शैंपू और पानी तो कार वालों के यहां मिल ही जाता था.
जैसेजैसे लोगों के पास गाडि़यां बढ़ीं, वैसेवैसे नरेश का काम भी बढ़ता चला गया और वह ठीकठाक पैसे कमाने लगा.
शहर में ही नरेश की पत्नी ने 2 बेटियों को जन्म दिया और अब तो बड़ी बेटी नेहा 22 साल की हो चली थी और छोटी बेटी 16 साल की.
नेहा के लिए तो लड़के वालों से बातचीत भी हो गई थी और रिश्ता भी पक्का हो गया था, पर इस लौकडाउन ने तो सभी के सपनों पर पानी ही फेर दिया. बहुत सारे मजदूरों को शहर छोड़ने पर मजबूर कर दिया था.
माना कि यह संकट कुछ महीनों में चला जाएगा, पर तब तक नरेश के पास इतनी जमापूंजी तो थी नहीं कि वह हालात सामान्य होने का इंतजार कर ले और वैसे भी बहुत से कार मालिकों ने अब नरेश को काम से हटा दिया था.
इस कोरोना काल में नरेश और उस का परिवार जितना सामान साथ ले सकते थे उतना ले आए और बाकी का सामान उन्हें मजबूरी के चलते शहर में ही छोड़ना पड़ गया था. पर मरता क्या न करता, जान बचाने के आगे भला सामान की चिंता कौन करता.
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गांव में नरेश के बड़े भाई राजू का परिवार था. जब नरेश का परिवार गांव में अपने घर के दरवाजे पर पहुंचा तो सिर्फ राजू ही दरवाजे पर खड़ा था. उस ने उंगली के इशारे से ही नरेश और उस के परिवार को वहीं बाहर वाले कमरे में रुक जाने को कहा. उस कमरे में बरसात के दिनों में जानवरों को बांधा जाता था.
नरेश को पहले तो बहुत बुरा लगा, पर बाद में मन मार कर उस ने उसी कमरे को अपना घर बना लिया.
‘‘मैं ने पहले से ही कुछ दिनों का राशनपानी, एक चूल्हा और ईंधन इसी कमरे में रखवा दिया था, ताकि जब तुम लोग आओ तो दिक्कत का सामना न करना पड़े,’’ राजू ने नरेश से कहा.
‘‘हां भैया, बहुत अच्छा किया आप ने,’’ नरेश ने कहा और मन ही मन सोचने लगा, ‘भैया ने तो पानी भी नहीं पूछा और उलटा हम से अछूतों जैसा बरताव कर रहे हैं.’
नरेश रोज सुबह राजू को बैलों की जोड़ी को हांक कर खेत ले जाते देखता, तो उस का भी मन हो आता कि वह भी इस तरह ही खेती करे.
‘‘हां… तो जाते क्यों नहीं… खेती और मकान में हम लोगों का भी तो हिस्सा होगा न,’’ नरेश की पत्नी संध्या ने कहा.
‘‘हां… होना तो चाहिए… पर इतने बरसों से इस जमीन की देखभाल भैया ही कर रहे हैं, इसलिए पूछने की हिम्मत नहीं हो रही है,’’ नरेश ने संध्या से कहा.
‘‘पर नहीं पूछोगे, तो यहां गांव में क्या करोगे… किस के सहारे 2 बेटियों को ब्याहोगे… और खुद भी क्या खाओगे भला,’’ संध्या ने नरेश को समझाते हुए कहा.
जब नरेश को उस कमरे में रहते हुए 15 दिन हो गए, तो एक दिन जब राजू खेत की ओर जा रहा, तो नरेश भी वहां पहुंच गया और बोला. ‘‘भैया वहां गांव के बाहर भी हम सैंटर में 14 दिन रुके थे और अब अपने घर के बाहर भी हम 15 दिन तक पड़े रहे हैं… तो क्या अब हम घर के अंदर आ जाएं?’’
‘‘हां… कोई जरूरत हो तो आ जाना. वैसे, उस कमरे में भी कोई दिक्कत तो होगी नहीं तुम को…’’ राजू ने पूछा.
‘‘नहीं भैया… दिक्कत तो कोई नहीं है… साथ ही, मैं यह बात जानना चाह रहा था कि खेती में हमारा भी तो हिस्सा होगा, तो वह भी बता दीजिए, तो हम
भी अपना धंधापानी शुरू कर दें,’’ नरेश ने कहा.
इतना सुनते ही राजू के तेवर बदल गए. वह घर के अंदर गया. थोड़ी ही देर में वापस आ गया और एक कागज नरेश को दिखाते हुए बोला, ‘‘लो… पहचानो इस कागज को… शहर जाते समय जब तुम्हें पैसे की जरूरत थी, तब तुम्हीं ने तो अपने हिस्से का मकान और खेत सब मेरे नाम कर दिया था. देखो, तुम्हारा ही तो अंगूठा लगा है न?’’
यह सुन कर सन्न रह गया था नरेश… उसे आज भी अच्छी तरह याद था कि शहर जाने के लिए जब उसे कुछ पैसे की जरूरत थी, तब उस ने अपने बड़े भाई से पैसे मांगे थे. तब राजू ने यह कह कर उसे पैसे दिए थे कि वह ये पैसे गांव के चौधरी से ले कर आया है और उसे इस पैसे पर एक निश्चित ब्याज हर महीने देना होगा. इसी बात के इकरारनामे पर अंगूठा लगाया था नरेश ने… अपने ही सगे भाई ने लूट लिया था उसे.
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‘‘अरे, यह तो मैं बड़ा भाई होने का फर्ज निभा रहा हूं जो तुम्हें घर में आने भी दिया है, वरना तो तुम लोग बीमारी फैलाने वाले बम से कम नहीं हो इस समय. देख लो गांव में जा कर, कोई पास भी खड़ा हो जाए तो नाम बदल देना मेरा,’’ राजू बोला.
नरेश चुपचाप वहां से लौट गया. नरेश के पास राशन अब खत्म होने को आया था. पत्नी के साथ बातचीत के बाद उस ने सोचा कि क्यों न गांव में बनी दुकान से कुछ राशन उधार ले आऊं, बाद में कुछ काम जम जाएगा, तो लाला का उधार चुकता कर देगा.
‘‘लालाजी, कुछ राशन चाहिए… पर पैसा अभी नहीं दे पाऊंगा… कुछ दिनों बाद काम जमते ही मैं आप को पूरे पैसे दे दूंगा,’’ नरेश ने लाला के पास जा
कर कहा.
‘‘अरे भैया… खुद हमारे पास ही सामान ज्यादा नहीं बचा है और पीछे से भी आवक बंद है. ऐसे में अगर तुम उधार की बात करोगे, तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी… उधार तो नहीं दे पाऊंगा अब. जब तुम्हारे पास पैसे हों… तब गल्ला ले जाना आ कर,’’ लाला की बात सुन कर अपना सा मुंह ले कर रह गया था नरेश.
नरेश अब उलझन में पड़ गया था. बच्चों का पेट तो भरना ही होगा, पर कैसे?
लेखक- नीरज कुमार मिश्रा
अब नरेश के पास आखिरी चारा था कि कुछ सामान गिरवी रख दिया जाए, जिस के बदले में जो पैसे मिलें उस से राशन खरीद लिया जाए.
जब नरेश ने यह बात संध्या को बताई, तो वह अपने कान की बालियां ले आई और बोली, ‘‘आप इन्हीं को गिरवी रख दीजिए और जो पैसे मिलें उस से सामान खरीद लाइए.’’
कोई चारा न देख नरेश बालियां ले कर गांव के एक पैसे वाले आदमी के पास पहुंचा, जो गांठगिरवी का काम करता था.
‘‘अरे भैया… ये सारे काम तो हम ने बहुत पहले से ही बंद कर रखे हैं. और अब तो सरकार का भी इतना दबाव है, फिर तुम तो शहर से आए हो… तुम्हारे पास से ली हुई किसी भी चीज से बीमारी लगने का ज्यादा खतरा है…
‘‘भाई, तुम से तो हम चाह कर भी कुछ नहीं ले सकते… हमें माफ करना भाई… हम तुम्हारी कोई मदद नहीं कर पाएंगे,’’ उस आदमी के दोटूक शब्द थे.
इधर नरेश गल्ला और पैसे के लिए परेशान हो रहा था, तो उधर उस की पत्नी संध्या और बेटियां एक दूसरी ही तरह की समस्या से जूझ रही थीं.
दरअसल, गांव की लड़कियों के पहनावे और शहर की लड़कियों के पहनावे में बहुत फर्क होता है. शहरों में किसी भी तबके की लड़की के लिए लोअर, टीशर्ट और जींस पहनना आम बात है, पर गांवों में अभी भी लड़कियां सलवारसूट पहनती हैं और ऊपर से दुपट्टा भी डालती हैं. यही फर्क नरेश की बेटियों के लिए परेशानी का सबब बन रहा था. गांव के लड़के तो लड़के, बड़ी उम्र के लोग भी उन्हें अजीब ललचाई नजरों से देखते थे.
एक दिन की बात है. गांव के नजदीक बहने वाली नदी के पानी में एक निठल्ले गैंग के 5 लड़के पैर डाल कर बैठे हुए थे.
‘‘यार, वह जो परिवार दिल्ली से आया है, उस में माल बहुत मस्त है…’’ पहले लड़के ने कहा.
‘‘लड़कियां तो लड़कियां… उन की मां भी बहुत मस्त है,’’ दूसरा लड़का बोला.
‘‘अरे यार, उन लड़कियों से दोस्ती करवा दो मेरी… मैं हमेशा से ही जींस वाली लड़कियों से दोस्ती करना चाहता था…’’ तीसरा लड़का बोला.
‘‘ठीक है भाई… तू उन लड़कियों से दोस्ती करना और हम लोग… तो करेंगे प्रोग्राम…’’
‘‘नहींनहीं… भाई ऐसी बात भी मन में मत लाना… वे लोग शहर से आए हैं और अगर उन लड़कियों के साथ प्रोग्राम किया, तो हम लोगों को भी कोरोना हो जाएगा,’’ थोड़ी समझदारी दिखाते हुए एक लड़का बोला, जो मोबाइल और इंटरनैट की कुछ जानकारी रखता था.
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‘‘वह तो सब हो जाएगा… सरकार का कहना है कि अगर हम रबड़ के दस्ताने इस्तेमाल करेंगे, तो इंफैक्शन का खतरा नहीं होगा,’’ पहले वाले ने ज्ञान बघारा.
‘‘अबे तो फिर क्या तू पूरे शरीर में रबड़ पहनेगा?’’ ठहाका मारते हुए एक लड़का बोला.
उस के बाद सब आपस में प्लान बनाने में बिजी हो गए.
नरेश अपनी उधेड़बुन में परेशान चला आ रहा था… उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अब शहर से गांव आ कर कैसे गुजारा करेगा, शहर में होता तो कुछ भी काम कर लेता, पर यहां गांव में न तो काम है और न ही कोई किसी भी तरह से मदद करने को तैयार है.
‘‘चाचाजी, नमस्ते.’’
नरेश ने आवाज की दिशा में सिर घुमाया, तो सामने निठल्ले गैंग का हैड खड़ा था.
नरेश जब से गांव में आया था, तब से सब लोगों की अनदेखी ही झेल रहा था, ऐसे में अपने लिए चाचाजी के संबोधन ने उसे बड़ा अच्छा महसूस कराया.
नरेश के होंठों पर एक मुसकराहट दौड़ गई, ‘‘भैया नमस्ते.’’
‘‘अरे चाचा… क्यों परेशान दिख रहे हैं… कोई समस्या है क्या?’’ वह लड़का बोला.
‘‘भैया… अब क्या बताऊं… वहां की सारी समस्याएं झेल कर परिवार के साथ अपने गांव में पहुंचा हूं, पर यहां भी राशन खत्म हो गया है. न ही कोई पैसे उधार दे रहा है और न ही कोई गल्ला देने को तैयार है,’’ नरेश ने अपनी लाचारी दिखाते हुए कहा.
‘‘अरे तो इस में क्या दिक्कत है चाचा… सरकार की तरफ से सब लोगों को मुफ्त राशन दिया तो जा रहा है,’’ वह लड़का बोला.
‘‘पर भैया… उस के लिए तो राशनकार्ड होना चाहिए… और हमारे पास राशनकार्ड तो है नहीं,’’ नरेश ने कहा.
‘‘अरे चाचा तो इस में कौन सी बड़ी बात है… रोज दोपहर यहां स्कूल में राशनकार्ड वाले बाबूजी बैठते हैं, जो गांव आए हुए लोगों का राशनकार्ड बनाते हैं… बस, आप को इतना करना है कि पूरे परिवार समेत कल दोपहर स्कूल पर पहुंच जाना. मेरी बाबूजी से अच्छी पहचान है… मैं उन से कह कर आप का कार्ड बनवा दूंगा, और फिर जितना चाहो उतना राशन भी दिलवा दूंगा आप को,’’ निठल्ले गैंग के हैड ने कहा.
अचानक से अपनी समस्याओं का अंत होते देख कर नरेश बहुत खुश हो गया और घर आ कर कल दोपहर होने का इंतजार करने लगा. वह सोचने लगा, ‘एक बार पेट भरने की समस्या का अंत हो जाए, फिर यही गांव के बाजार में कुछ कामधंधा जमाऊंगा. कुछ पैसा बैंक से लोन ले कर, शहर से सामान ले कर बाजार में बेचा करूंगा और फिर भैया का यह कमरा भी छोड़ दूंगा. फिर आराम से अपनी बेटियों का ब्याह करूंगा,’ बस इसी तरह के भविष्य के सपनों में नरेश की आंख लग गई.
अगले दिन 12 बजने से पहले ही नरेश अपनी दोनों बेटियों और पत्नी को ले कर स्कूल में बाबू से मिलने चलने लगा.
अचानक से रास्ते में निठल्ले गैंग का हैड नरेश के सामने आ गया और नरेश की पत्नी और लड़कियों को घूरते हुए बोला, ‘‘अरे चाचा, वे राशनकार्ड वाले बाबूजी कह रहे थे कि आप सब लोगों का एक पहचानपत्र भी जरूरी है. क्या उस की कौपी लाए हैं आप लोग?’’
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‘‘नहीं भैया… आप ने तो कल ऐसा कुछ बताया ही नहीं था…’’ अपनी नासमझी पर परेशान हो उठा था नरेश.
लेखक- नीरज कुमार मिश्रा
‘‘अरे चाचा… आप परेशान हो रहे हो… वे देखो सामने मेरी झोंपड़ी है. उस में इन बच्चों को आराम से बिठा देते हैं. और हम और आप चल कर पहचानपत्र ले आते हैं,’’ लड़के ने कहा.
‘‘हां, ठीक?है… ऐसा है संध्या… जब तक हम लोग अपना पहचानपत्र नहीं ले कर आते, तुम वहीं झोंपड़ी में बैठ जाओ,’’ नरेश ने अपनी पत्नी से कहा.
नरेश उस लड़के के साथ वापस हो लिया, जबकि उस की पत्नी संध्या अपनी दोनों बेटियों के साथ झोंपड़ी में चारपाई पर जा बैठीं.
रास्ते में जब नरेश उस लड़के के साथ आ रहा था, तब एक जगह वह लड़का रुका और बोला, ‘‘चाचा, बड़ी गरमी है. सामने ही मेरे दोस्त का घर है. पहले एक गिलास पानी पी लें, फिर चलते हैं.’’
दोनों के सामने बिसकुट और शरबत आया. शरबत पीते ही नरेश का अपने शरीर पर कोई जोर नहीं रहा और उसे बेहोशी आने लगी. वह वहीं गिर गया.
उधर जिस झोंपड़ी में नरेश अपने परिवार को छोड़ कर आया था, वहां पर 3-4 लड़के एकसाथ आ गए.
‘‘वाह भाई… आज तो हम शहरी माल के साथ सटासट करेंगे… चलो पहले कौन है लाइन में,’’ बेशर्मी से निठल्ले गैंग का एक लड़का बोल रहा था.
संध्या को उन लड़कों की नीयत पर शक हो गया और वह बचाव का रास्ता खोजने लगी.
अचानक एक लड़के ने संध्या के सीने को हाथों से भींच लिया, जिसे देख कर दूसरा लड़का हंसने लगा.
‘‘अरे, जब बछिया पास में हो तो… गाय को काहे को परेशान करना…’’
‘‘अरे, तुझे बछिया के साथ मजे लेने हैं, तो उस के साथ ले… मुझे तो यह गाय ही पसंद आ गई है.’’
दूसरे लड़के ने संध्या को चारपाई पर बांध दिया और इसी तरह जबरदस्ती उस की दोनों बेटियों के भी हाथमुंह बांध दिए गए.
पूरा निठल्ला गैंग इस परिवार पर टूट पड़ा और लड़के बलात्कार करने में जुट गए, इतने में वहां गैंग का हैड भी आ गया.
‘‘अरे, अकेले ही सब माल मत खा जाना… मेरे लिए भी छोड़ देना.’’
‘‘अरे, लो यार… आज तो 3-3 हैं. जिस के साथ चाहो, उस के साथ मजे करो.’’
और उस निठल्ले गैंग के पांचों लड़कों ने बारीबारी से और बारबार संध्या और उस की बेटियों का बलात्कार किया और इतना ही नहीं, बल्कि जो लड़का इंटरनैट की जानकारी रखता था, उस ने अपने मोबाइल से अश्लील वीडियो भी शूट किया और जी भर जाने के बाद वहां से भाग गए.
कुछ ही देर में संध्या का सबकुछ लुट चुका था. आज उस के ही सामने उस की बेटियों और उस का बलात्कार हो गया. उसे और कुछ समझ नहीं आ रहा था. वह पागल सी हो रही थी. अचानक उस ने अपनी दोनों बेटियों को साथ लिया और गांव के नजदीक बहने वाली नदी में छलांग लगा दी.
इधर जब नरेश होश में आया, तो दौड़ कर उस झोंपड़ी में पहुंचा. पर, वहां के हालात तो कुछ और ही बयान कर रहे थे. अब भी उस की कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक उस का परिवार कहां चला गया.
तभी नरेश की नजर अंदर बैठे हुए निठल्ले गैंग के लड़कों पर पड़ी, जिन पर मस्ती का नशा अब भी चढ़ा हुआ था. वह उन की ओर लपका.
‘‘ऐ भैया… हम अपनी पत्नी और बेटियों को यहीं छोड़ कर गए थे… अब कहां हैं वे सब… कुछ समझ नहीं आ रहा है हम को.’’
‘‘ओह… तो तू होश में आ गया… ले यह मोबाइल में देख ले और समझ ले कि तेरे बच्चे कहां हैं,’’ उस मोबाइल वाले लड़के ने मोबाइल पर बलात्कार का वीडियो नरेश की आंखों के सामने कर दिया.
अपनी बेटियों और पत्नी का एकसाथ बलात्कार होते देख नरेश का खून खौल गया. उस ने कोने में रखी लाठी उठाई और उन लड़कों पर हमला कर दिया. एक तो नरेश पर नशे का असर अब भी था, ऊपर से वे जवान 5 लड़के.
उन लड़कों ने नरेश के हाथों से लाठी छीन ली और तब तक मारा जब तक वह मर नहीं गया.
इस कोरोना संकट और गांव पलायन ने नरेश की मेहनत से बनाए हुए सपनों के छोटेमोटे घोंसले को बरबाद कर दिया था.
नरेश और उस का पूरा परिवार अब खत्म हो चुका था. अब उसे न तो घर की जरूरत थी, न पैसे की, न नौकरी की, न ही राशन की और न ही राशनकार्ड की…
सौजन्य- मनोहर कहानियां
लेखक- सुनील वर्मा
बड़ी बात यह है कि अपराध से शुरू हुआ इन माफिया सरगनाओं का सफर एक दिन पुलिस की गोली खा कर खत्म होता है. लेकिन ऐसे सरगनाओं की भी एक बड़ी फेहरिस्त है, जो अपने इसी बाहुबल के सहारे सियासत की ऊंचाइयों तक पहुंच गए.
पूर्वांचल की धरती पर कई माफियाओं का जन्म हुआ है. कुछ माफिया तो ऐसे हैं, जिन की कहानी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. राजनीति के गलियारों में इन की धमक अकसर सुनाई देती रहती है. इन माफियाओं ने प्रदेश में ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों में भी आतंक का खूनी खेल खेला.
अपराध की संगीन वारदातों को अंजाम दे कर पूर्वांचल की धरती दहलाने वाले इन्हीं माफिया में एक नाम है बृजेश सिंह का, जिन्होंने जुर्म की दुनिया को दहलाने के बाद अब सियासत में अपनी जमीन तैयार कर ली है. लेकिन राजनीति का लबादा ओढ़ने के बाद भी बृजेश सिंह के ऊपर जेल में रह कर रंगदारी वसूलने, ठेके पर हत्या कराने और टेंडर सिंडीकेट चलाने के आरोप लगते रहे हैं.
बृजेश सिंह की कहानी किसी फिल्म की स्टोरी से कम नहीं है. वह एक ऐसा माफिया सरगना रहा, जिस का आतंक उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों में भी देखा जाता था.
बृजेश सिंह उर्फ अरुण कुमार सिंह का जन्म वाराणसी के धरहरा गांव में एक संपन्न परिवार में हुआ था. उस के पिता रविंद्र सिंह इलाके के रसूखदार लोगों में गिने जाते थे. सियासी तौर पर भी उन का रुतबा कम नहीं था और इलाकाई राजनीति में सक्रिय रहते थे. बृजेश सिंह बचपन से ही पढ़ाईलिखाई में काफी होनहार था.
सन 1984 में इंटरमीडिएट की परीक्षा में उस ने बहुत अच्छे अंक हासिल किए थे. उस के बाद बृजेश ने बनारस के यूपी कालेज से बीएससी की पढ़ाई की. वहां भी उस का नाम होनहार छात्रों की श्रेणी में आता था.
बृजेश सिंह के पिता रविंद्र सिंह को अपने होनहार बेटे से काफी लगाव था और इसीलिए वह चाहते थे कि बृजेश पढ़लिख कर अच्छा इंसान बने. समाज में उस का नाम हो.
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. 27 अगस्त, 1984 को वाराणसी के धौरहरा गांव में बृजेश के पिता रविंद्र सिंह की इलाके की राजनीति की रंजिश में हत्या कर दी गई. इस काम को उन के सियासी विरोधी हरिहर सिंह और पांचू सिंह ने साथियों के साथ मिल कर अंजाम दिया था.
राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में पिता की मौत ने बृजेश सिंह के मन में बदले की भावना को जन्म दे दिया. इसी भावना के चलते बृजेश ने जानेअनजाने में अपराध की दुनिया में अपना कदम बढ़ा दिया.
बृजेश सिंह अपने पिता की हत्या का बदला लेने लिए तड़प रहा था. उस ने बदला लेने के लिए एक साल तक इंतजार किया. आखिर वह दिन आ ही गया, जिस का बृजेश को इंतजार था. 27 मई, 1985 को रविंद्र सिंह का हत्यारा बृजेश के सामने आ गया. उसे देखते ही बृजेश का खून खौल उठा और उस ने दिनदहाड़े अपने पिता के हत्यारे हरिहर सिंह को मौत के घाट उतार दिया.
बदले की आग ने बदला जीवन
यह पहला मौका था जब बृजेश के खिलाफ थाने में मामला दर्ज हुआ. लेकिन वारदात के बाद बृजेश सिंह पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा बल्कि फरार हो गया. क्योंकि उस का इंतकाम अभी पूरा नहीं हुआ था.
हरिहर को मौत के घाट उतारने के बाद भी बृजेश सिंह का गुस्सा शांत नहीं हुआ, उसे उन लोगों की भी तलाश थी, जो उस के पिता की हत्या में हरिहर के साथ शामिल थे. जल्द ही उसे अपना बदला लेने का मौका मिल गया.
9 अप्रैल, 1986 को चंदौली जिले का सिकरौरा गांव तब गोलियों की आवाज से गूंज उठा, जब बृजेश सिंह ने अपने साथियों के साथ पिता रविंद्र सिंह की हत्या में शामिल रहे गांव के पूर्वप्रधान रामचंद्र यादव सहित उन के परिवार के 6 लोगों को एक साथ गोलियों से भून डाला.
इस वारदात को अंजाम देने के बाद बृजेश सिंह पहली बार गिरफ्तार हुआ. दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में बृजेश पर 32 साल तक मुकदमा चला.
इसे बृजेश का बाहुबल और राजनीतिक रसूख ही मान सकते हैं कि इस घटना में चश्मदीद गवाह होने के बावजूद स्थानीय अदालत ने 32 साल बाद 2018 में गवाहों के बयानों को विरोधाभासी बताते हुए बृजेश को बरी कर दिया.
बहरहाल, पिता के हत्यारों को मौत की नींद सुलाने के बाद जब बृजेश सिंह सलाखों के पीछे पहुंचा तो यहीं से उस की जिंदगी की दिशा और दशा बदल गई.
कहते हैं जेल की सलाखों के पीछे एक ऐसी पाठशाला होती है, जहां इंसान की जिंदगी एक नया मोड़ लेती है. जो कैदी यहां आ कर अपने गुनाह का प्रायश्चित करना चाहता है, वह सुधर जाता है. और जिस कैदी की मंजिल अपराध की डगर पर आगे बढ़ने की होती है, वह जेल की सलाखों के पीछे अपराध के नए गुर सीखने और नए साथी बनाने में जुट जाता है.
अगले भाग में पढ़ें- बृजेश का मुख्तार अंसारी से हुआ सामना
सौजन्य- मनोहर कहानियां
लेखक- सुनील वर्मा
गिरफ्तारी के बाद बृजेश जब वाराणसी जेल पहुंचा तो वहां उस की मुलाकात गाजीपुर के मुडियार गांव के त्रिभुवन सिंह से हुई. त्रिभुवन सिंह हिस्ट्रीशीटर अपराधी था. बृजेश के हौसलों को देखते हुए त्रिभुवन ने उस से दोस्ती कर ली.
त्रिभुवन सिंह भी अपने भाई व पिता की हत्या का बदला लेने के लिए जरायम की दुनिया में उतरा था. इसीलिए दोनों की दोस्ती हो गई और दोस्ती का एक कारण यह भी था कि दोनों ही ठाकुर समुदाय से थे. कुछ लोग बृजेश के साथ थे तो कुछ त्रिभुवन के साथ. दोनों ने हाथ मिलाया तो जेल से निकलने के बाद साथ मिल कर काम करने लगे.
त्रिभुवन की मंजिल जहां पैसा और शोहरत कमाना था तो बृजेश ने समूचे पूर्वांचल में अपना सिक्का जमा कर अकूत दौलत कमाने का ख्वाब पाल लिया था.
अपराध की दुनिया में एक कहावत यह भी है कि इस दुनिया में ख्वाब उन्हीं के पूरे होते हैं जिन के हौसले और हिम्मत बुलंद होते हैं. बृजेश और त्रिभुवन सिंह की दोस्ती जल्द ही रंग लाने लगी, क्योंकि दोनों के ही हौसले और हिम्मत बुलंद थे. धीरेधीरे इन का गैंग पूर्वांचल में सक्रिय होने लगा.
दोनों ने मिल कर यूपी में शराब, रेशम और कोयले के धंधे में अपने पांव जमाने शुरू कर दिए. दोनों ने अपने बाहुबल से पहले छोटेमोटे काम शुरू किए फिर बड़ेबड़े काम करने लगे.
बृजेश का मुख्तार अंसारी से हुआ सामना
इसी बीच, 1990 के दशक में बृजेश सिंह ने धनबाद के पास झरिया का रुख किया. वह धनबाद के बाहुबली विधायक और कोयला माफिया सूर्यदेव सिंह के कारोबार की देखभाल करने के लिए उन के शूटर की तरह काम करने लगा. सूर्यदेव सिंह के इशारे पर बृजेश सिंह ने हत्या की 6 वारदातों को अंजाम दिया.
अपने कारनामों और कोयले के काले कारोबार के कारण बृजेश सिंह की दुश्मनी का दायरा भी लगातार बढ़ता जा रहा था. असली खेल तब शुरू हुआ, जब बृजेश सिंह और माफिया डौन मुख्तार अंसारी कोयले की ठेकेदारी को ले कर आमनेसामने आ गए. मुख्तार अंसारी ने शुरुआत में चेतावनी दे कर कोयले के धंधे से दूर रहने की चेतावनी दी. लेकिन बृजेश सिंह को अपने बाहुबल और हौसले पर कुछ ज्यादा ही गुमान हो चला था.
बृजेश ने बाहुबली माफिया डौन मुख्तार अंसारी की ताकत आंकने में गलती कर दी. क्योंकि बृजेश को उस वक्त इस बात का आभास नहीं था कि राजनीतिक तौर पर मुख्तार अंसारी कितना मजबूत है. ठेकेदारी और कोयले के कारोबार को ले कर दोनों गैंगों के बीच कई बार गोलीबारी हुई. दोनों तरफ से जानमाल का नुकसान भी हुआ.
मुख्तार अंसारी के प्रभाव की वजह से बृजेश पर पुलिस और नेताओं का दबाव बढ़ने लगा. बृजेश के लिए कानूनी तौर पर काफी दिक्कतें पैदा होने लगी थीं.
जिस ने भी ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ फिल्म देखी होगी, उसे पता होगा कि ठीक उसी खतरनाक तरीके से काम करने वाले गैंग्स 2009-10 के दौर में बनारस, मऊ, गाजीपुर और जौनपुर में पूर्वांचल की राजनीति पर हावी थे.
ये वो दौर था जब मुख्तार अंसारी का कारवां निकलता था तो लाइन से एक साथ 15-20 एसयूवी गाडियां गुजरती थीं. दिलचस्प बात यह होती थी कि सारी गाडि़यों के नंबर 786 से खत्म होते थे. किसी की क्या मजाल कि पूरे शहर का भारी ट्रैफिक उन्हें 2 मिनट भी रोक सके. इन इलाकों में पान, चाय की दुकान पर बैठे चचा लोग बता देंगे कि मुख्तार अंसारी जब चलता था, तो बौडीगार्ड समेत अपने पूरे गैंग में सब से लंबा दिख जाता था.
दरअसल, पूरा पूर्वांचल मुख्तार अंसारी के खानदान की हिस्ट्री से वाकिफ था. क्योंकि मुख्तार के दादाजी मुख्तार अहमद अंसारी कभी कांग्रेस पार्टी के प्रेसिडेंट रह चुके थे. इन के भाई अफजाल 4 बार कम्युनिस्ट पार्टी से एमएलए रह चुके हैं और एक बार समाजवादी पार्टी से. मुख्तार के अब्बा और दादाजी स्वतंत्रता सेनानी भी रह चुके थे. साथ ही चाचा और दादाजी नेहरू, सुभाषचंद्र बोस और गांधीजी के भी काफी करीब थे.
चाचा हामिद अंसारी अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी के वीसी और देश के उपराष्ट्रपति बने थे. अब बात बृजेश सिंह की करते हैं.
अगले भाग में पढ़ें- बृजेश को मिला राजनैतिक संरक्षण