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Women’s Empowerment Story : अस्तित्व

Women’s Empowerment Story.

चैप्टर 1 : कांच की दीवारें

माया के लिए सुबह का मतलब सूरज की पहली किरण नहीं, बल्कि किचन में बजने वाली बरतनों की आवाज थी. 32 साल की माया, जो कभी अपने कालेज में ‘बैस्ट डिबेटर’ हुआ करती थी, अब एक आदर्श बहू, पत्नी और मां के सांचे में पूरी तरह ढल चुकी थी.

शहर के एक मिडिल क्लास परिवार में माया की शादी विवेक से हुई थी. विवेक बुरा इनसान नहीं था, लेकिन वह उन मर्दों में से था, जिन्हें लगता है कि घर के कामों में हाथ बंटाना उन की ‘मर्दानगी’ के खिलाफ है और पत्नी का सपना सिर्फ एक अच्छी ‘हौबी’ तक सीमित होना चाहिए.

‘‘माया, मेरी नीली शर्ट कहां है?’’ विवेक ने बैडरूम से आवाज लगाई. ‘‘अलमारी के दाहिने कोने में टंगी है,’’ माया ने रोटी बेलते हुए जवाब दिया. ‘‘मिल नहीं रही, तुम ही आ कर देख लो.’’

माया ने गैस धीमी की और बैडरूम की तरफ भागी. यही उस की जिंदगी का सार था, अपनी गति छोड़ कर दूसरों की सुविधा के लिए दौड़ना. शर्ट विवेक के सामने ही थी, बस उस ने उठाने की जहमत नहीं की थी.

उस दिन दोपहर में, जब घर के सब लोग काम पर और बच्चे स्कूल जा चुके थे, माया ने पुराने स्टोररूम की सफाई करने की सोची. वहां धूल भरी किताबों के बीच उसे अपनी पुरानी पेंटिंग किट और एक अधूरी डायरी मिली.

डायरी का पहला पन्ना खुला, जिस पर लिखा था, ‘मैं उड़ना चाहती हूं, उस आसमान में, जहां मेरी अपनी पहचान हो.’

माया की आंखों में आंसू आ गए. वह पहचान कहीं खो गई थी.

चैप्टर 2 : पुरानी यादें,नई कसक

उस शाम माया की सहेली अदिति का फोन आया. अदिति अब एक कामयाब आर्किटैक्ट थी.

‘‘माया, अगले महीने हमारे कालेज का रीयूनियन है. तुझे आना ही होगा,’’ अदिति ने उत्साह से कहा. माया हिचकिचाई, ‘‘अदिति, घर पर कैसे… विवेक और मम्मीजी शायद नहीं मानेंगे.’’ ‘‘कब तक दूसरों की मरजी से जिएगी माया? तू क्या थी और क्या बन गई है, कभी आईने में खुद को देखा है?’’ अदिति के इन शब्दों ने माया के दिल पर चोट लगी.

उस रात डिनर टेबल पर माया ने दबी आवाज में विवेक से कहा, ‘‘विवेक, अगले महीने कालेज का रीयूनियन प्रोग्राम है. मैं दिल्ली जाना चाहती हूं, 2 दिन के लिए.’’ पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया. विवेक की मां ने चश्मा ठीक करते हुए कहा, ‘‘2 दिन? घरगृहस्थी वाली औरतों को बाहर जाना शोभा नहीं देता. और बच्चों का क्या?’’ विवेक ने बिना सिर उठाए कहा, ‘‘छोड़ो न माया, क्या करोगी वहां जा कर? घर पर सब ठीक तो है.’’

माया को उस दिन पहली बार महसूस हुआ कि वह इस घर का हिस्सा तो है, लेकिन उस की अपनी कोई इच्छा, कोई वजूद नहीं है. वह बस एक मशीन है, जिसे रिमोट से चलाया जाता है.

चैप्टर 3 : विद्रोह की पहली किरण

अगले कुछ दिन माया बहुत शांत रही. वह अपना काम करती, लेकिन उस की आंखों में एक नई चमक थी. एक फैसला. उस ने स्टोररूम से अपनी पेंटिंग किट निकाली और उसे साफ किया. उस ने तय किया कि वह अपनी अधूरी पेंटिंग पूरी करेगी.

एक दोपहर, जब उस की सास सो रही थी, माया ने कैनवास पर रंग बिखेरना शुरू किया. उस ने एक पिंजरे का चित्र बनाया, जिस का दरवाजा खुला था, लेकिन पंछी अभी भी अंदर बैठा था, शायद बाहर की दुनिया के डर से.

अचानक आवाज आई, ‘‘यह क्या कूड़ा फैला रखा है?’’ सासू मां दरवाजे पर खड़ी थीं, ‘‘माया, यह सब करने की उम्र है तुम्हारी? जाओ, शाम की चाय की तैयारी करो.’’ माया ने इस बार नजरें नीची नहीं कीं. उस ने शांत स्वर में कहा, ‘‘मांजी, यह कूड़ा नहीं है. यह मेरा शौक है और चाय 10 मिनट बाद बन जाएगी, तब तक मैं यह रंग सुखाना चाहती हूं.’’

सासू मां अवाक रह गईं. माया के लहजे में बदतमीजी नहीं थी, पर एक ऐसी मजबूती थी जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखी थी. उस रात माया ने डायरी में लिखा, ‘पिंजरा खुला है, बस पंखों को फड़फड़ाने की आदत डालनी है.’’

चैप्टर 4 : सपनों की उड़ान

दिल्ली जाने की तारीख नजदीक आ रही थी. घर में तनाव का माहौल साफ महसूस किया जा सकता था. विवेक ने माया से बात करना लगभग बंद कर दिया था और सासू मां हर बात पर ताना मार रही थीं. लेकिन इस बार माया के भीतर कुछ बदल गया था. उसे अब अपराधी जैसा महसूस नहीं हो रहा था.

रीयूनियन वाली सुबह, माया ने अपनी साड़ी पहनी, हलका मेकअप किया और अपना बैग उठाया. विवेक ड्राइंगरूम में बैठा अखबार पढ़ रहा था. ‘‘मैं निकल रही हूं,’’ माया ने शांति से कहा.

विवेक ने अखबार नीचे किया. उस की आंखों में गुस्सा और हैरानी थी, ‘‘तुम सच में जा रही हो? घर और बच्चों को इस हाल में छोड़ कर?’’ ‘‘बच्चे अब बड़े हो गए हैं विवेक, और मम्मी जी भी यहां हैं. मैं ने फ्रिज में 2 दिन का खाना बना कर रख दिया है. बस 2 दिन की ही तो बात है,’’ माया ने सूझ बूझ के साथ जवाब दिया.

जब माया टैक्सी में बैठी, तो उस के हाथ कांप रहे थे, लेकिन दिल में एक अजीब सी शांति थी. जैसे ही ट्रेन ने स्टेशन छोड़ा, उसे लगा कि उस के ऊपर से बरसों पुराना कोई बोझ उतर गया है. वह दिल्ली सिर्फ अपनी सहेलियों से मिलने नहीं, बल्कि अपनी खुद से ही मिलने जा रही थी.

चैप्टर 5 : दिल्ली की वह शाम

दिल्ली के एक आलीशान होटल में पुरानी सहेलियों का जमघट लगा था. कोई जज बन चुकी थी, कोई बड़ी कंपनी की मालकिन. जब माया वहां पहुंची, तो सब उसे देख कर खुशी से झूम उठीं.

बातोंबातों में अदिति ने माया की पेंटिंग वाली बात छेड़ दी, ‘‘तुम्हें पता है, माया कालेज में सब से अच्छी पेंटर थी. माया, तुम ने वह पिंजरे वाली पेंटिंग पूरी की?’’ माया ने झिझकते हुए अपने फोन में वह अधूरी पेंटिंग की फोटो दिखाई.

वहां मौजूद एक महिला, जो आर्ट गैलरी चलाती थीं, पेंटिंग देख कर दंग रह गईं और बोलीं, ‘‘माया, इस पेंटिंग में जो दर्द और जो उम्मीद है, वह कमाल की है. क्या तुम इसे मेरी एग्जीबिशन के लिए पूरा कर सकती हो?’’ माया की आंखों में चमक आ गई. सालों बाद किसी ने उसे उस के काम के लिए सराहा था.

उस रात, होटल के कमरे में बैठ कर माया ने महसूस किया कि वह सिर्फ एक ‘मशीन’ नहीं है. उस के पास एक हुनर है, जिसे दुनिया देखना चाहती है.

माया ने अदिति से कहा, ‘‘मैं वापस जा कर अपनी जिंदगी को फिर से पेंट करूंगी.’’

चैप्टर 6 : वापसी और टकराव

2 दिन बाद जब माया घर लौटी, तो घर का नजारा बदला हुआ था. सिंक में जूठे बरतन पड़े थे, ड्राइंगरूम में सामान बिखरा था और विवेक चिड़चिड़ाया हुआ था. ‘‘आ गईं तुम? देख लिया अपना रीयूनियन प्रोग्राम? यहां देखो क्या हाल हो रखा है,’’ विवेक चिल्लाया.

माया ने चुपचाप अपना बैग रखा और रसोई में जाने के बजाय सोफे पर बैठ गई और बोली, ‘‘विवेक, 2 दिन में अगर घर बिखर गया, तो सोचो मैं पिछले 10 सालों से इसे कैसे संभाल रही हूं और अब से चीजें ऐसी नहीं रहेंगी.’’ ‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’ सासू मां कमरे से बाहर आते हुए बोलीं.

‘‘मतलब यह कि अब मैं अपनी पेंटिंग को समय दूंगी. मुझे एक गैलरी से औफर मिला है. मैं घर के काम करूंगी, लेकिन अब मैं खुद को नहीं मारूंगी.’’ विवेक हंसने लगा, ‘‘पेंटिंग? उस से घर चलेगा? यह पागलपन छोड़ो और चाय बनाओ.’’

माया उठी, लेकिन रसोई की तरफ नहीं, बल्कि अपने स्टोररूम की तरफ गई. उस ने मुड़ कर कहा, ‘‘चाय खुद बना लीजिए विवेकजी, मुझे अपना कैनवास तैयार करना है.’’

विवेक और उस की मां अवाक रह गए. यह वह माया नहीं थी, जो हर बात पर ‘जी’ कहती थी. यह वह औरत थी, जिस ने अपने अस्तित्व को पहचान लिया था.

चैप्टर 7 : खामोश जंग

अगले कुछ हफ्ते घर में एक ‘कोल्ड वार’ जैसा माहौल रहा. विवेक ने माया से दूरी बना ली थी और सासू मां हर छोटे काम के लिए उसे ताना मारती रहतीं. लेकिन माया ने एक बात गांठ बांध ली थी कि वह अब सफाई नहीं देगी, बल्कि कर के दिखाएगी.

माया सुबह जल्दी उठ कर घर का सारा काम निबटाती, बच्चों को स्कूल भेजती और फिर दोपहर के 2 घंटे अपनी पेंटिंग के लिए सुरक्षित रखती. उन 2 घंटों में वह दुनिया को भूल जाती. उस ने उस ‘खुले पिंजरे’ वाली पेंटिंग को पूरा किया और उस का नाम रखा, ‘रिहाई’.

अदिति को फोन पर पेंटिंग का पूरा हो जाने का खबर दे दी गई और इस पेंटिंग को अदिति का ठिकानों में पोस्ट के जरीए भेज दिया.

एक दिन अदिति का फोन आया, ‘‘माया, तुम्हारी पेंटिंग मैं ने गैलरी के मालिक को दिखाई थी. उन्होंने अगले हफ्ते एक आर्ट फेयर में तुम्हारी पेंटिंग के लिए जगह बुक की है. तुम्हें जरूर आना होगा.’’

माया का दिल जोर से धड़का. यह सिर्फ एक पेंटिंग नहीं थी, यह उस की 10 सालों की खामोश चीख थी. उस ने धीरे से कहा, ‘‘मैं आऊंगी अदिति, चाहे कुछ भी हो जाए.’’

चैप्टर 8 : सफलता की पहली दस्तक

आर्ट फेयर का दिन आ गया. माया ने अपनी सब से सुंदर नीली साड़ी पहनी. जब वह हाल में पहुंची, तो अपनी पेंटिंग को एक खूबसूरत फ्रेम में दीवार पर टंगा देख उस की आंखों में आंसू आ गए.

लोग वहां आ रहे थे, पेंटिंग देख रहे थे और माया के बारे में चर्चा कर रहे थे. तभी एक बुजुर्ग आदमी, जो खुद एक मशहूर पेंटर थे, माया के पास आए और कहा, ‘‘बेटी, इस पेंटिंग में जो रंगों का तालमेल है, वह तो अच्छा है ही, लेकिन जो भाव है, वह दर्द और आजादी की कशमकश, वह दिल को छू लेती है. बहुत खूब… बहुत खूब…’’

शाम होतेहोते खबर मिली कि माया की पेंटिंग एक बड़े बिजनैसमैन ने ऊंचे दाम पर खरीद ली है. उसे एक चैक मिला, जिस पर लिखी रकम विवेक की 5 साल की सैलरी के बराबर थी. माया को उस कागज के टुकड़े से ज्यादा उस सम्मान की खुशी थी, जो उसे वहां मिल रहा था.

जब माया घर लौटी, तो विवेक सोफे पर बैठा इंतजार कर रहा था, ‘‘कहां थी इतनी देर? घर की कोई फिक्र है या नहीं?’’  माया ने शांति से वह चैक विवेक के सामने टेबल पर रख दिया. ‘‘यह क्या है?’’ विवेक ने हैरानी से पूछा. ‘‘यह मेरी मेहनत की कमाई है विवेक. उसी ‘कूड़े’ से मिली है, जिसे तुम ‘पागलपन’ कह रहे थे.’’

विवेक चैक देख कर सन्न रह गया. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि माया, जो कल तक एकएक रुपए के लिए उस से पूछती थी, आज खुद कमा रही है.

चैप्टर 9 : दीवारें ढहने लगीं

चैक की रकम ने घर का माहौल बदल दिया, लेकिन माया का मकसद पैसा नहीं था. सासू मां, जो अब तक बातबात पर टोकती थीं, अचानक शांत हो गई थीं. शायद पैसे की ताकत ने उन्हें चुप करा दिया था, लेकिन माया को बुरा लग रहा था कि उस का सम्मान उस की कला से ज्यादा उस चैक से जुड़ा था.

एक रात विवेक बिस्तर पर लेटा हुआ था. उस ने अचानक कहा, ‘‘माया, मुझे माफ कर दो. मुझे लगा था कि तुम बस बोरियत मिटाने के लिए यह सब कर रही हो. मुझे नहीं पता था कि तुम इतनी काबिल हो.’’

माया ने खिड़की के बाहर चांद को देखते हुए कहा, ‘‘विवेक, मुझे तुम्हारे माफी की जरूरत नहीं है, सिर्फ साथ की जरूरत थी. काबिल मैं हमेशा से थी, बस तुम ने कभी मुझे एक इनसान की तरह देखा ही नहीं. तुम ने मुझे सिर्फ एक ‘पत्नी’ और ‘बहू’ के सांचे में देखा.’’

विवेक खामोश रहा. उस रात उसे पहली बार एहसास हुआ कि उस ने अपनी पत्नी के सपनों का गला घोंट कर अपनी सुखसुविधाओं की दीवार खड़ी की थी.

अगले दिन विवेक खुद बाजार से माया के लिए नए ब्रशेस और रंगों का सैट ले कर आया. उस ने उन्हें टेबल पर रखते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी अगली एग्जीबिशन में हम सब साथ चलेंगे.’’

माया की आंखों में उम्मीद की एक नई किरण थी. उस ने समझ लिया था कि बदलाव रातोंरात नहीं आता, लेकिन अगर आप खुद को न बदलें, तो दुनिया कभी नहीं बदलेगी.

चैप्टर 10 : सपनों की कार्यशाला

विवेक के बरताव में आया बदलाव माया के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था. लेकिन माया जानती थी कि यह सिर्फ शुरुआत है. उस ने तय किया कि वह अब घर के उस अंधेरे स्टोररूम में नहीं, बल्कि एक ऐसी जगह पेंटिंग करेगी जहां रोशनी और उम्मीद दोनों हों.

माया ने घर के पास ही एक छोटा सा कमरा किराए पर लिया और उसे अपना ‘स्टूडियो’ बनाया. उस का नाम रखा, ‘अस्तित्व आर्ट स्टूडियो’. शुरुआत में महल्ले के लोगों ने तरहतरह की बातें कीं, ‘‘देखो, 2 बच्चों की मां अब दुकान खोल कर बैठेगी.’’ ‘‘घर के काम कौन करेगा?’’

लेकिन माया ने इन बातों पर ध्यान देना छोड़ दिया था. अब उस के बच्चे स्कूल से आ कर सीधा उस के स्टूडियो पहुंचते और अपनी मां को रंगों से खेलते देख गर्व महसूस करते.

एक दिन माया ने अपनी सासू मां को स्टूडियो आने का न्योता दिया. सासू मां हिचकिचाते हुए आईं, लेकिन जब उन्होंने वहां माया का बनाया हुआ उन का खुद का एक पोट्रेट (चित्र) देखा, तो उन की आंखें भर आईं. उस पेंटिंग में माया ने उन की ?ार्रियों को कमजोरी नहीं, बल्कि अनुभव की सुंदरता के रूप में दिखाया था.

उस दिन पहली बार सासू मां ने माया का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘बहू, मैं ने तुझे कभी समझा ही नहीं.’’

चैप्टर 11 : समाज और सवाल

जैसेजैसे माया का नाम बढ़ने लगा, चुनौतियां भी बढ़ती गईं. शहर की एक बड़ी आर्ट काउंसिल ने उसे ‘वुमन औफ द ईयर’ के पुरस्कार के लिए चुना. यह खबर अखबारों में छपी, तो विवेक के कुछ रिश्तेदारों ने नाकभौं सिकोड़ना शुरू कर दिया.

एक पारिवारिक समारोह में विवेक के चाचाजी ने तंज कसा, ‘‘विवेक, अब तो तुम्हारी पत्नी सैलिब्रिटी बन गई है. सुना है, अब वह घर पर खाना भी नहीं बनाती?’’

विवेक गुस्से से लाल हो गया, लेकिन उस से पहले ही माया ने मुसकराते हुए जवाब दिया, ‘‘चाचाजी, खाना तो मैं अभी भी बनाती हूं, बस अब उस खाने में और मेरी जिंदगी में स्वाद बढ़ गया है, क्योंकि अब मैं खुश हूं. और क्या खुशी बांटना गलत है?’’

उस दिन माया को समझ आया कि समाज को एक सफल औरत से उतनी दिक्कत नहीं होती, जितनी एक ‘आजाद’ और ‘आत्मविश्वासी’ औरत से होती है. उस ने तय किया कि वह अपनी कला के जरीए उन औरतों की आवाज बनेगी, जो अभी भी बंद दरवाजों के पीछे अपने सपनों को दम तोड़ते देख रही हैं.

चैप्टर 12 : अस्तित्व की गूंज

माया के स्टूडियो में अब सिर्फ पेंटिंग्स नहीं बनती थीं, बल्कि वहां आसपास की महिलाएं भी आने लगी थीं. कोई सिलाईकढ़ाई में माहिर थी, तो किसी को लिखने का शौक था. माया ने अपने स्टूडियो का एक हिस्सा उन महिलाओं के लिए खोल दिया.

एक दिन एक कम उम्र की लड़की, रश्मि, माया के पास आई. उस की आंखों में वही डर और बेबसी थी, जो सालों पहले माया की आंखों में हुआ करती थी. रश्मि ने कहा, ‘‘दीदी, मुझे पढ़ना है, लेकिन मेरी ससुराल वाले कहते हैं कि पढ़ाई सिर्फ लड़कियों की शादी तक के लिए होती है.’’

माया ने रश्मि का हाथ थामा और उसे अपनी वही ‘रिहाई’ वाली पेंटिंग दिखाई और कहा, ‘‘रश्मि, पिंजरा कभी बाहर से बंद नहीं होता, वह हमारे मन के अंदर बंद होता है. अगर तुम ठान लो, तो कोई तुम्हें नहीं रोक सकता.’’

माया ने रश्मि की पढ़ाई का जिम्मा उठाया और उसे अपने पास पार्टटाइम काम दिया. धीरेधीरे, माया का वह छोटा सा स्टूडियो एक आंदोलन बन गया. अब वह सिर्फ एक पेंटर नहीं थी, वह एक ‘उम्मीद’ बन चुकी थी.

विवेक अब गर्व से लोगों को बताता, ‘‘मैं माया का पति हूं,’’ उस के शब्दों में अब अधिकार नहीं, बल्कि सम्मान था.

चैप्टर 13 : क्षितिज के पार

समय का पहिया तेजी से घूम रहा था. माया की पेंटिंग्स अब सिर्फ स्थानीय गलियारों तक सीमित नहीं थीं. एक सुबह उसे एक ईमेल मिला, जिस ने उस की दुनिया बदल दी. लंदन की एक मशहूर आर्ट गैलरी ने उसे अपनी ‘इंटरनैशनल विमेन आर्टिस्ट्स’ प्रदर्शनी के लिए मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था.

यह माया के लिए एक सपना जैसा था. लेकिन इस बार वह डरी हुई नहीं थी. जब उस ने यह खबर विवेक और अपनी सासू मां को सुनाई, तो घर में उत्सव का माहौल हो गया.

‘‘तुम्हें जाना चाहिए माया, यह तुम्हारा हक है,’’ विवेक ने गर्मजोशी से कहा. ‘‘लेकिन विवेक, घर और बच्चे?’’ माया ने मुसकराते हुए पूछा, जैसे वह उस की पुरानी यादों को कुरेद रही हो.

विवेक ने माया का हाथ थामते हुए कहा, ‘‘घर हम संभाल लेंगे. तुम ने 10 साल हमें संभाला है, क्या हम 10 दिन तुम्हें अपनी उड़ान भरने के लिए नहीं दे सकते?’’

जब माया लंदन के उस विशाल हाल में खड़ी थी, जहां दुनियाभर के दिग्गज कलाकार मौजूद थे, उसे अपना वह छोटा सा किचन और वह धूल भरा स्टोररूम याद आया. उस ने महसूस किया कि ‘अस्तित्व’ की तलाश में सब से बड़ा कदम घर की दहलीज पार करना नहीं, बल्कि अपने मन के डर को पार करना था.

चैप्टर 14 : विरासत

लंदन से लौटने के बाद माया सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि एक प्रतीक बन चुकी थी. उस के स्टूडियो में अब सैकड़ों लड़कियां और महिलाएं अपनी कला और अपने सपनों के साथ आती थीं.

एक दिन माया ने देखा कि उस की 12 साल की बेटी, जो पहले सिर्फ पढ़ाई और मोबाइल में बिजी रहती थी, कोने में बैठ कर एक कैनवास पर कुछ उकेर रही थी.

माया चुपचाप उस के पीछे जा कर खड़ी हो गई. बेटी ने एक मजबूत पेड़ बनाया था, जिस की जड़ें जमीन में गहरी थीं, लेकिन उस की टहनियां आसमान को छू रही थीं.

‘‘यह क्या है बेटा?’’ माया ने पूछा. ‘‘मम्मी, यह आप हो. आप घर को भी संभालती हो और आसमान को भी छूती हो. मैं भी बड़ी हो कर आप के जैसा बनना चाहती हूं,’’ बेटी ने गर्व से कहा.

माया की आंखों में खुशी के आंसू आ गए. उसे सम?ा आया कि उस की सफलता सिर्फ पुरस्कारों और पैसों में नहीं थी, बल्कि उस आत्मविश्वास में थी जो उस ने अपनी अगली पीढ़ी को विरासत में दिया था. उस ने एक ऐसी राह बना दी थी, जिस पर उस की बेटी को कभी अपनी पहचान के लिए समझोता नहीं करना पड़ेगा.

चैप्टर 15 : नया सवेरा

कहानी वहीं पहुंच गई थी जहां से शुरू हुई थी. एक सुबह की पहली किरण. लेकिन आज किचन में बरतनों की आवाज के साथसाथ एक मधुर संगीत भी बज रहा था. विवेक आज खुद चाय बना रहा था और बच्चे अपना नाश्ता खुद तैयार कर रहे थे.

माया बालकनी में खड़ी उगते हुए सूरज को देख रही थी. उस के हाथ में वही पुरानी डायरी थी. उस ने डायरी का वह आखिरी पन्ना खोला, जो खाली था और उस पर लिखा, ‘अस्तित्व किसी और की दी हुई पहचान नहीं है, यह वह आग है जो हमारे भीतर जलती है. हम औरतें त्याग की मूरत नहीं, बल्कि असीम संभावनाओं का सागर हैं. पिंजरा अब नहीं है, क्योंकि मैं ने उड़ना सीख लिया है.’

आज माया के चेहरे पर वह उदासी नहीं थी, जो कांच की दीवारों के पीछे कैद औरतों के चेहरे पर होती है. आज उस के पास उस की अपनी दुनिया थी, अपना नाम था और अपना सम्मान था. वह अब सिर्फ ‘विवेक की पत्नी’ या ‘बच्चों की मां’ नहीं थी, वह ‘माया’ थी, एक पूर्ण, सशक्त और स्वतंत्र स्त्री.

सूरज की रोशनी माया के चेहरे पर पड़ रही थी और वह मुसकरा रही थी. एक नए सफर की शुरुआत के लिए.  Women’s Empowerment Story

लेखक : अशोक नंदन

Story : बसंती

Story. गांव का एकलौता पुरोहित भोला इस बात से पूरी तरह वाकिफ था कि मरने से पहले बसंती की मां बेटी के पास कुछ चांदी के सिक्के व जेवरात छोड़ गई है, जिसे किसी बहाने से हासिल कर के वह कुछ दिनों के लिए अपनी बदहाली तो दूर कर ही सकता है.

थोड़ी देर में ही पूजा का काम खत्म कर उस ने एक गहरी नजर से बीमार सुमन की ओर देखा. फिर बसंती की ओर मुखातिब हो कर बोला, तेरी बेटी को कोई प्रेतात्मा परेशान कर रही है. अब इसे बचाना बड़ा मुश्किल है. अच्छा होगा कि तू इस मनहूस बच्ची का मोह छोड़ कर फिर से गोद भरने की कोशिश करे.

पुरोहित से ऐसा जवाब सुन कर बसंती दुखी आवाज में बोली, बाबा, अगर मेरी एकलौती बेटी मर गई, तो फिर मैं अपनी सूनी गोद ले कर यह पहाड़ सी जिंदगी कैसे काट पाऊंगी? बसंती की इस कमजोरी से पुरोहित को अपने अंधविश्वास का तीर सही निशाने पर लगने का एहसास हुआ. उस ने सहज ही यह जान लिया कि अब देरसवेर वह उस की झोली  में जरूर आ गिरेगी.

पुरोहित भोला मन ही मन मुसकराते हुए मीठी आवाज में बोला, तेरी मां अपने मन में धनदौलत का मोह लिए ही मर गई, इसलिए उस की आत्मा प्रेतलोक में बेचैन भटक रही है. अब वही बेचैन आत्मा प्रेतलोक से लौट कर इस घर में आ बैठी है, जिस के असर से तेरी गोद और सुमन की जिंदगी दोनों खतरे में है.

तो फिर इस प्रेतात्मा से पीछा छुड़ाने का कोई उपाय बताइए बाबा? बसंती ने सहमते हुए पूछा. तुम फौरन अपनी मां के सारे जेवरात और चांदी के सिक्के अपने हाथ से छू कर किसी ब्राह्मण को दान कर दो. उसी दान की बदौलत सुमन को एक नई जिंदगी मिलेगी और तुम्हें मां बनने का सुनहरा मौका.

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पुरोहित की कही बात पर गंवार बसंती ने पूरी तरह यकीन कर लिया. फिर भी वह अपनी लाचारी जाहिर करते हुए बोली, “लेकिन बाबा, मैं तो बेटी की बीमारी दूर होने की उम्मीद पर पहले से ही अपने सारे जेवर बेच चुकी हूं, अब इस हाल में मां के जेवर भी दान में दे दूंगी, तो फिर वक्त पड़ने पर किस के आगे हाथ पसारने जाऊंगी? कौन सहारा देगा मुझे ’’

बसंती की मजबूरी को सुन कर पुरोहित को अपना खेल बिगड़ता नजर आया. लेकिन तुरंत ही लोभ का दूसरा पासा फेंकते हुए वह बोला, ‘‘क्या तेरे मन में बेटा पाने की तनिक भी लालसा नहीं है?’’ ‘‘लालसा तो कब से लगी है…’’ बसंती झेंपते  हुई बोली, ‘‘सिर्फ एक बेटे की कमी से मेरी पूरी जिंदगी बोझ जैसी बन गई है. एक बेटा पाने के लिए मैं कब से तरस रही हूं.’’ ‘‘तो ठीक है, कल सुबह तुम अपनी मां के सारे जेवर मुझे दान में दे देना. फिर देखना, मैं तेरे अंधेरे घर में कितनी जल्दी उजाला कर देता हूं,’’ इतना कहते हुए भोला की नजर बसंती की देह से फिसलती हुई वहां जा कर ठहर गई, जहां लोहे की पुरानी संदूकची पड़ी हुई थी.

अब बसंती को पुरोहित की नीयत समझने में जरा भी देर नहीं हुई, पर घर में अकेली और देह से कमजोर बसंती मन मसोस कर रह गई. ‘‘अब क्या सोचने लगी?’’ भोला ने उसे टोका, ‘‘क्या मेरा सुझाव ठीक नहीं लगा?’’ ‘‘नहीं, बिलकुल नहीं,’’ बसंती ने ऊंची आवाज में नफरत से कहा, ‘‘अपनी गोद दोबारा भरने के लिए मां के कीमती जेवर किसी और के हाथ में देने की हिम्मत मुझ में नहीं है.’’

बसंती के इस रूखे बरताव ने पुरोहित के लहलहाते अरमानों पर ओले बरसा दिए. फिर भी पुरोहित ने हार नहीं मानी और धीमी आवाज में बोला, ‘‘जब बेटी की बीमारी दूर होने की उम्मीद पर तुम ने अपने जेवर बेच दिए, तो दोबारा मां बनने की उम्मीद में तुम अपनी मां के पुराने गहने पुरोहित को दान में नहीं दे सकतीं? जानती नहीं, पुरोहित को दिया हुआ दान लोकपरलोक दोनों को सुधारता है?’’

पुरोहित ने एक बार फिर उस संदूकची की ओर देखा, तो बसंती का रोमरोम एक अनजाने खौफ से सिहर उठा. अभी वह खामोश खड़ी थी कि पुरोहित की पत्नी कमला पति को तलाशती हुई वहां आ पहुंची और तेज आवाज में बोली, ‘‘क्योंजी, यजमानी के इस काम से जो आमदनी होती है, उसे आप शराब और गांजा पीने में उड़ा देते हैं, फिर यह धंधा सिर पर ढोने से क्या फायदा, जब घर में बीवीबच्चे रोटी के लिए तरस रहे हों?’’

‘‘ठीक है, आज का ‘सीधा’ बसंती बहू से ले लो और घर जा कर भोजन बनाओ,’’ पुरोहित ने पत्नी को टालने की नीयत से कहा और जल्दी से पोथीपतरा समेट कर दूसरे यजमान के घर कथा बांचने चला गया.

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भोला के जाते ही ‘सीधा’ लेने के लिए ठहरी कमला बसंती को उदास देख कर संजीदगी से पूछ बैठी, ‘‘इस पूजापाठ के पीछे तेरी क्या मुराद है बहू?’’ ‘‘मासूम बेटी की सलामती, जो अब मुमकिन नहीं लगती.’’ ‘‘ऐसा क्यों?’’ कमला उतावली हो कर पूछ बैठी, ‘‘क्या इस पूजापाठ पर तुझे बिलकुल भरोसा नहीं?’’ ‘‘भरोसा तो है चाची, लेकिन आज के पुरोहित पूजापाठ की ओट में अपने यजमान को उलटा पाठ पढ़ाना शुरू कर दिए हैं. धर्मकर्म के नाम पर अब ये ढोंगी अपने यजमान का धन और धर्म दोनों लूट लेना चाहते हैं.’’

‘‘यह तुम क्या बकने लगी बहू?’’ कमला हैरत से बोली, ‘‘मैं ने क्या पूछा और तू जवाब क्या देने लगी?’’ ‘‘सच कहती हूं चाची…’’ बसंती का गला भर आया, ‘‘बेटी की लंबी बीमारी ने मुझे बुरी तरह से झकझोर दिया है और इसी आफत में पुरोहितजी दोबारा गोद भरने का लालच दे कर मेरा सबकुछ ठग लेना चाहते हैं.’’ बसंती की पीड़ा सुन कर कमला का दिमाग झनझना उठा. उस के हाल पर तरस खा कर वह बोली, ‘‘ठीक है बहू, इस समय मैं खाना बनाने जा रही हूं. लेकिन शाम को इस बारे में तुम से फिर बात करूंगी.’’

शाम को कमला बसंती से मिल कर उस की आपबीती से पूरी तरह वाकिफ हो चुकी थी. दूसरे दिन सुबह पुरोहित जैसे ही कथा बांचने के लिए बसंती के घर पहुंचा, तो उस के पीछेपीछे कमला भी आ गई. पत्नी को इस तरह आया देख पुरोहित अपनी लाल आंखों से उसे घूरते हुए रूखे स्वर में बोला, ‘‘आज सुबह से ही तुम मेरे पीछे क्यों पड़ी हो? क्या चाहती हो तुम?’’ ‘‘बस यही कि अब आप यह यजमानी का पेशा छोड़ दीजिए,’’ कमला ने कहा. ‘‘वह क्यों?’’ भोला ने हैरत से पूछा.

‘‘क्योंकि अब यह पेशा शरीफ ब्राह्मणों का सुकर्म नहीं, बल्कि खातेपीते ब्राह्मणों का कुकर्म बन गया है. अब यह पेशा पुरोहित और यजमान के पाक रिश्ते के बीच एक ऐसी दरार पैदा करता जा रहा है, जो आने वाले दिनों में दोनों की शराफत पर एक सवालिया निशान लगा सकता है,’’ कमला ने पति की ओर देख कर संजीदगी से कहा.

पुरोहित ने जोर से चीख कर कमला को एक जबरदस्त धक्का दिया, जिस से वह सामने की दीवार से जा टकराई और उस का सिर लहूलुहान हो गया. चोट बड़ी गंभीर लगी थी. कमला फूटफूट कर रो पड़ी, लेकिन भोला पर इस का कोई असर नहीं हुआ. वह गुस्से में अपनी पत्नी को और भी भलाबुरा कहने लगा.

पति की घुड़की से बेअसर कमला बरसती आंखों से उसे देखती हुई बोली, ‘‘आज मुझे भी पता चल गया है कि पुरोहित कितना नीच और घटिया इनसान होता है, जो अपने यजमान की मजबूरी पर तरस खाने के बजाय उस की दौलत व इज्जत लूटने को तैयार हो जाता है.

‘‘अब मेरे लिए विधवा की जिंदगी जी लेना आसान है, मगर किसी ढोंगी, लोभी, पाखंडी, ठग और धर्मकर्म का पेशा करने वाले पुरोहित की सुहागन बन कर जी लेना आसान नहीं. ऐसा कभी नहीं होगा.’’ इतना कह कर कमला जैसे ही वहां से चलने को हुई कि अचानक पुरोहित के भीतर का इनसान जाग उठा और कमला के सिर पर हाथ रखते हुए वह भरे गले से बोला, ‘‘तेरी कसम, यह पूजापाठ, हवन, जाप, लोकपरलोक, पुरोहित और यजमान सब बनावटी बातें हैं.”

‘‘अब इस गलत काम को मैं कभी नहीं दोहराऊंगा. ऐसे दकियानूसी विचारों में कोरे अंधविश्वास व दिमागी वहम के सिवा कुछ और नहीं है. तुम आखिरी बार मुझे माफ कर दो.’’  फिर कमला बिना पति की ओर देखे बसंती की बीमार बेटी सुमन को गोद में उठा कर तेज कदमों से डाक्टर के पास चल पड़ी. Story

Exclusive Interview: मैं तीन तलाक को पसंद नहीं करती – स्मृति मिश्रा

Exclusive Interview: मुसलिम औरतों के हक से जुड़े शाहबानो बनाम मोहम्मद अहमद खान के ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कोर्टरूम ड्रामा फिल्म ‘हक’ को भले ही बौक्स आफिस पर ज्यादा कामयाबी न मिली हो, मगर इस फिल्म में शाजिया बानो के किरदार में यामी गौतम और शाजिया बानो के साथ खड़े रहने वाले नौकरानी उज्मा के किरदार में स्मृति मिश्रा की अदाकारी को काफी सराहा जा रहा है.

रायबरेली से लखनऊ, लखनऊ से दिल्ली और दिल्ली से मुंबई तक का सफर करने वाली हीरोइन स्मृति मिश्रा पिछले 13 सालों से ऐक्टिंग जगत में हैं. वे अब तक ‘सावधान इंडिया’, ‘अधूरी कहानी हमारी’, ‘गुस्ताख दिल’, ‘मंफोर्डगंज की बिनिया’, ‘धर्मपत्नी’ जैसे सीरियलों और ‘अ से अनार’, ‘रेड’, ‘तुम को मेरी कसम’ जैसी फिल्मों के अलावा नैटफ्लिक्स की वैब सीरीज ‘शी2’ में ऐक्टिंग कर चुकी हैं.

पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश :

आप की एक फिल्म ‘हक’ चर्चा में है. इस को ले कर आप क्या कहेंगी?

आप सभी जानते हैं कि यह फिल्म शाहबानो कांड पर आधारित है, जिस में मैं ने उज्मा का किरदार निभाया है. मतलब लोग मु झे उज्मा के किरदार में देख रहे हैं. सभी को पता है कि शाहबानो के संघर्ष में उज्मा चट्टान की तरह खड़ी रह कर उस का साथ देती रही. इस फिल्म मेरे सभी सीन हीरोइन यामी गौतम के साथ ही हैं, क्योंकि उज्मा तलाक के खिलाफ है.

उज्मा का मानना है कि तलाक देना गलत है. इसी वजह से मैं ने इस किरदार को करने के लिए हामी भरी, क्योंकि मैं ने महसूस किया है और लोगों से बातचीत कर के भी मु झे यही पता चला कि छोटे से छोटे तबके के लोग भी तलाक के खिलाफ हैं. वैसे भी औरत कोई चीज नहीं है कि आप ने तीन बार तलाक कह कर उसे तलाक दे दिया.

निजी जिंदगी में आप का साबका कभी उज्मा जैसी किसी औरत से पड़ा है या नहीं और तलाक को ले कर आप की अपनी सोच क्या है?

यह बहुत विवादास्पद विषय है. इस पर ज्यादा बोलना मेरे लिए ठीक नहीं होगा. लेकिन मैं ने जोकुछ पढ़ा है, उस आधार पर मैं तीन तलाक को कभी पसंद नहीं करती. तीन बार तलाक कह कर आप ने एक औरत को छोड़ दिया. इसे जायज कभी नहीं ठहराया जा सकता.

आप ने एक औरत के साथ रहते हुए एक लंबा वक्त गुजारा, आप के बच्चे हुए, पर छोटी सी बात पर बिना किसी सोचविचार के उस औरत को अपनी सफाई में कुछ कहने का मौका दिए बिना, सिर्फ तीन बार तलाक बोला और तलाक दे दिया… मेरी सम झ में नहीं आता कि कैसे लोग इसे कानूनी सही कहते रहे हैं.

13 साल के अपने ऐक्टिंग कैरियर के अनुभव को ले कर आप क्या कहना चाहेंगी?

इन 13 सालों में बतौर कलाकार मु झे सीखने को बहुतकुछ मिला. यह मौका किसी दूसरे क्षेत्र में नहीं मिल सकता. हम हर उस किरदार को जीते हैं, जो इस दुनिया में है. हम सिर्फ ऐक्टिंग नहीं करते, हम परदे पर किसी भी किरदार को जीते हुए उसे अंदर से महसूस करते हैं.

फिल्म ‘पवई’ में क्या खास है?

फिल्म ‘पवई’ में मुंबई के इस विकासशील उपनगर पवई में रहने वाली 3 अलगअलग औरतों की कहानियों को दिखाया गया है. इस में मैं ने उषा का किरदार निभाया है. इसी फिल्म में 2 और औरतों की कहानी है. इस फिल्म में इस बात को दिखाया गया है कि औरत चाहे अमीर हो या गरीब हो या फिर कामकाजी हो, सभी को संघर्ष करना पड़ता है, भले ही उन के संघर्ष के तरीके अलग हों.

अपने किरदार उषा को ले कर आप क्या कहना चाहेंगी?

उषा का किरदार एक ऐसी औरत का है, जो अपने पति के साथ बिहार से मुंबई आती है. अब उस का पति नहीं है और वह लोगों के घरों का काम करती है. वह अपनी बेटी की भी परवरिश कर रही है. उस को मुंबई के बारे में कुछ नहीं पता है. वह तो अपने पति के भरोसे यहां आई थी, पर अब पति नहीं है. उस के पति ने जो मकान खरीदा था, उसे भी उस का देवर हड़पने की कोशिश कर रहा है.

इस किरदार के लिए आप ने किस तरह का होमवर्क किया?

मेरे घर में एक कामवाली बाई है. उस की दोस्त के साथ भी ऐसा हादसा हो चुका है. उस का पति उसे गांव से शहर ले कर आया था. पर शहर आते ही कि कुछ समय के बाद उस का पति बीमार हुआ और इस संसार को अलविदा कह गया. उस के बाद उस ने जिस तरह का संघर्ष किया, वह सब उस ने मु झे बताया था, तो इस किरदार को निभाते समय मु झे वह सब याद आया और मैं ने स्क्रिप्ट की भी मदद ली.

किसी भी किरदार को निभाते समय आप अपनी निजी जिंदगी के अनुभवों का कैसे उपयोग करती हैं?

जब किसी किरदार से जुड़ा कोई हादसा मेरे साथ कभी घट चुका होता है, तो मैं उसे याद कर अपने किरदार में डालने की कोशिश करती हूं. अगर वैसा हादसा मेरी जिंदगी में न घटा हो, तो आसपास के लोगों से बात कर के जानने की कोशिश करती हूं.

कलाकार होने के साथसाथ आप पत्नी, बहू और एक बेटे की मां भी हैं. आप इन सारी जिम्मेदारियों को कैसे निभाती हैं?

मैं इन सभी जिम्मेदारियों के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश करती हूं और मेरी कोशिश रहती है कि मैं किसी को भी शिकायत करने का मौका न दूं. पर मु झे इन सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए कई बार अपनी दीदी और पति से भी सहयोग लेना पड़ता है. Exclusive Interview

Women’s Safety: बेटियों को दहेज में सोनेचांदी की जगह दें रिवौल्वर और तलवार

Women’s Safety: हाल ही में ग्रेटर नोएडा से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है जिस ने सभी को झकझोर कर रख दिया. बताया जा रहा है कि दहेज के कारण एक पति ने अपनी ही पत्नी को आग के हवाले कर दिया. हालांकि, इस पूरे मामले को लेकर अलगअलग तरह की बातें सामने आ रही हैं. कुछ लोगों का कहना है कि महिला का किसी और से संबंध था और जब पति को इस की जानकारी मिली तो उस महिला ने मानसिक दबाव में आ कर खुद को आग लगा ली. वहीं दूसरी तरफ, परिजनों का आरोप है कि दहेज की मांग पूरी न होने पर पति ने बेरहमी से पत्नी को जिंदा जला दिया.

इसी घटना के बाद बागपत के गौरीपुर मितली गांव में ठाकुर समाज की एक महापंचायत बुलाई गई, जहां बेटियों की सुरक्षा और उन पर बढ़ते अपराधों को ले कर गहरी चिंता व्यक्त की गई. पंचायत में यह फैसला लिया गया कि समाज को अपनी पुरानी परंपरा को दोबारा जीवित करते हुए दहेज में सोनाचांदी देने की बजाय बेटियों को सेल्फ डिफेंस के लिए रिवौल्वर, तलवार और कटार जैसे हथियार देने चाहिए, ताकि वे खुद को सुरक्षित रख सकें.

आज हमारा समाज इस कदर बेरहम हो गया है कि किसी भी उम्र की लड़की खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पाती. आएदिन ऐसी घटनाएं सामने आती हैं जो रूह को झकझोर देती हैं. कभी किसी मासूम के साथ बलात्कार, तो कभी किसी लड़की की बेरहमी से हत्या. हर बार ऐसी खबरें सुन कर मन में यही सवाल उठता है कि आखिर ऐसे अपराधियों को इस से हासिल क्या होता है? चंद पलों की अपनी हवस के लिए वे न सिर्फ अपनी जिंदगी जेल की सलाखों के पीछे बरबाद कर लेते हैं, बल्कि उस लड़की और उस के परिवार की पूरी दुनिया को हमेशा के लिए उजाड़ देते हैं. पर रिवौल्वर और तलवार भी इस का इलाज नहीं है. Women’s Safety

Social Issue: औरतों पर जोरजुल्म नेता सब से आगे

Social Issue, विधायकों और सांसदों पर बलात्कार के आरोप

151 वर्तमान सांसदविधायक ऐसे हैं, जिन्होंने औरतों के ऊपर जोरजुल्म से जुड़े मामले घोषित किए हैं, जिस में स्त्री की लज्जा भंग करने के आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग (आईपीसी-354) विवाह आदि के करने को विवश करने के लिए किसी स्त्री का अपहरण करना, या उत्प्रेरित करना (आईपीसी-366) संबंधी मामले दर्ज हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक वर्तमान में 14 विधायकों और 2 सांसदों पर रेप के आरोप हैं. भाजपा और कांग्रेस के 5-5 विधायकोंसांसदों पर ये आरोप हैं.

इस में भाजपा के 3 विधायक और 2 सांसद हैं. वहीं, कांग्रेस के 5 विधायकों पर इस तरह के आरोप हैं. आम आदमी पार्टी, भारत आदिवासी पार्टी, बीजू जनता दल, तेलुगु देशम पार्टी के 1-1 विधायक शामिल हैं.

महिला मुख्यमंत्री होने के बाद भी देश का पश्चिम बंगाल ऐसा राज्य है, जो औरतों पर होने वाले जोरजुल्म में नंबर एक पर बना हुआ है. वर्तमान में पश्चिम बंगाल में 25, आंध्र प्रदेश में 21 और ओडिशा में 17 विधायकोंसांसदों पर महिला अपराध से संबंधित मामले दर्ज हैं, जबकि भाजपा के 55, कांग्रेस के 44, आम आदमी पार्टी के 13 विधायकसांसदों इस तरह के आरोप हैं.

मौजूदा दौर में जनप्रतिनिधियों पर इस तरह के आपराधिक आरोप लगने के चलते भारत में चुनाव सुधार की मांग भी बढ़ती जा रही है. एडीआर रिपोर्ट राजनीतिक दलों के लिए अपने उम्मीदवारों की गहन जांच करने और सार्वजनिक पद चाहने वालों के आपराधिक रिकौर्ड के बारे में मतदाताओं को जागरूक करती है. लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास बहाल करने के लिए भारतीय राजनीति में ज्यादा पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत है.

भारत के नागरिकों, समाजिक संगठनों और राजनीतिक नेताओं को यह तय करना है कि आपराधिक बैकग्राउंड के शख्स को सार्वजनिक पद पर न बिठाएं, ताकि देश की अखंडता और राजनीति में सुचिता बरकरार रहे.

संविधान की प्रस्तावना में यह साफ लिखा है कि भारतीय संविधान जनता से शक्ति प्राप्त करता है. जनता दागी छवि वाले नेताओं को न चुन कर भारतीय राजनीति में सुधार ला सकती है. मगर अफसोस की बात यह है कि इन पदों पर चुनाव लड़ने वाले ज्यादातर लोगों पर गंभीर किस्म के आपराधिक मामले दर्ज रहते हैं.

शादीशुदा औरतों पर जोरजुल्म करने के मामले केवल गरीब या मिडिल क्लास परिवारों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि हाईप्रोफाइल सोसाइटी में भी औरतें महफूज नहीं हैं. मध्य प्रदेश के कांग्रेस विधायक के परिवार की एक बहू काम्या भी इस जोरजुल्म की शिकार हुई हैं.

कांग्रेस विधायक सुरेंद्र सिंह बघेल के छोटे भाई देवेंद्र सिंह बघेल से काम्या दुबे की शादी 8 फरवरी, 2018 को धूमधाम से हुई थी. शादी के बाद से ही काम्या, देवेंद्र और उन की मां पीथमपुर में रहने लगे थे.

काम्या यही सम?ाती थीं कि उन के पति ‘बघेल फिलिंग्स’ नाम के पैट्रोलपंप पर जाते हैं. पर शादी के कुछ ही दिनों बाद घर में काम करने वाले एक नौकर ने काम्या को बताया कि उन के पति घर से कारोबार संभालने की बजाय शराब पीने के लिए जाते हैं.

काम्या के सपने जल्द ही बिखरने लगे थे. उन्हें भरोसा ही नहीं हो रहा था कि इस तरह एक इज्जतदार परिवार के? लोग उन्हें धोखा दे कर उन पर जोरजुल्म करेंगे.

पर जब काम्या के सब्र का बांध टूटा, तो 13 मई, 2025 को वे महिला पुलिस थाना पहुंचीं, जहां पर एसीपी निधि सक्सेना और थाना प्रभारी अंजना दुबे को अपने साथ हुए जोरजुल्म की जानकारी देते हुए लिखित में शिकायत दर्ज कराई.

भोपाल महिला थाना पुलिस ने इस मामले में कांग्रेस विधायक सुरेंद्र सिंह बघेल, उन की पत्नी शिल्पा सिंह बघेल, भाई देवेंद्र सिंह बघेल, मां चंद्रकुमारी और बहन शीतल सिंह बघेल के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 85, 351(2), 3(5) और दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 की धाराओं 3 और 4 के तहत मामला दर्ज कर लिया.

नेता प्रतिपक्ष पर भी गंभीर आरोप

मध्य प्रदेश के कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार पर भी अपनी पत्नी पर जोरजुल्म करने के अलावा अपनी लिवइन पार्टनर सोनिया भारद्वाज की हत्या का गंभीर आरोप लग चुका है.

इस मामले में मार्च, 2025 में उन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में स्पैशल लीव पिटीशन दायर की गई है. यह पिटीशन और किसी ने नहीं, बल्कि उमंग सिंघार की पहली पत्नी प्रतिमा मुदगल ने दायर की है.

मामला 16 मई, 2021 का है. उमंग सिंघार के भोपाल वाले बंगले के बैडरूम में सोनिया भारद्वाज की लाश मिली थी. पुलिस ने तब आईपीसी की धारा 306 के तहत आत्महत्या का केस दर्ज किया था. उस समय उमंग सिंघार के एक आईपीएस रिश्तेदार के दबाव में पुलिस ने महिला की मौत के मामले को सुसाइड में बदल दिया था.

उमंग सिंघार की पत्नी प्रतिमा मुदगल ने इस मामले में एक याचिका दायर की है, जिस में उन्होंने कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं. याचिका में प्रतिमा मुदगल ने कहा है कि मृतक सोनिया के बेटे ने डीजीपी को एक खत लिखा था, जिस में बेटे ने कहा था कि उस की मां की जान ली गई है, पर उमंग सिंघार और पुलिस ने मिल कर मामले को दूसरा रूप दे दिया है.

पुलिस में मामला दर्ज होने के बाद केस ट्रायल के लिए पहुंच गया. इसी बीच एफआईआर रद्द करने के लिए हाईकोर्ट जबलपुर में अपील की गई. कोर्ट ने सुनवाई के बाद 5 जनवरी, 2022 को एफआईआर रद्द करने के आदेश दिए. याचिकाकर्ता पहली पत्नी ने इसी आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की है.

उमंग सिंघार की पत्नी प्रतिमा मुदगल ने अब खुल कर इस का विरोध कर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका लगाई है. 142 पन्ने की याचिका में प्रतिमा मुद्गल ने साल 2022 में जबलपुर हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिस के तहत उमंग सिंघार को क्लीनचिट दी गई थी.

उमंग सिंघार ने 16 अप्रैल, 2022 को भोपाल में प्रतिमा मुद्गल से शादी की थी. प्रतिमा ने आरोप लगाते हुए कहा है कि शादी के 2 महीने बाद उमंग सिंघार का बरताव बदल गया था. वे उन्हें मानसिक रूप से सताने लगे थे. उमंग सिंघार ने उन्हें कई बार जान से मारने की धमकी भी दी थी. इस पूरे मामले की शिकायत उन्होंने धार थाने में की थी.

बहू को सुसाइड करने पर मजबूर किया

कानून की शपथ लेने वाले मंत्री भी जातबिरादरी की खाई को पाटने की बजाय उसे और गहरा करने पर आमादा हैं. इस का सुबूत मध्य प्रदेश के एक कैबिनेट मंत्री पर लगे आरोप दे रहे हैं.

मार्च, 2018 में मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार के तब के मंत्री रामपाल सिंह की बहू ने खुदकुशी कर अपनी जान दे दी थी, क्योंकि मंत्री और उन का परिवार उसे अपनी बहू मानने को राजी नहीं था.

राजपूत जाति के मंत्री के दूसरे बेटे गिरजेश प्रताप सिंह ने 20 जून, 2017 को आर्य समाज मंदिर में उदयपुरा की प्रीति रघुवंशी से लवमैरिज की थी, जो मंत्री को नागवार गुजरी थी.

रामपाल सिंह अपने बेटे के इस ब्याह को सामाजिक तौर पर मंजूरी देने को तैयार नहीं थे और उस की दूसरी शादी कराने पर तुले हुए थे.

जब गिरिजेश की पत्नी प्रीति को पता चला कि उस के ससुर ने पति की दूसरी सगाई इंदौर में करा दी है, तो प्रीति रघुवंशी ने फांसी लगा कर अपनी जान दे दी. मामला मीडिया में आने के बाद भी मंत्री रामपाल लगातार प्रीति को अपनी बहू मानने से इनकार करते रहे, लेकिन उन का बेटा गिरिजेश प्रीति के अस्थि विसर्जन में शामिल हुआ था.

हालांकि, इस घटना के बाद रामपाल सिंह को रघुवंशी समाज के विरोध का सामना करना पड़ा था और उन का राजनीतिक कैरियर भी खत्म होने के कगार पर पहुंच गया है.

सताने में नेता कम नहीं हैं

हमारे देश में औरतों पर होने वाले जोरजुल्म का मुद्दा एक गंभीर चिंता की बात बना हुआ है. देश में रोजाना औरतों पर जोरजुल्म की वारदातें हो रही हैं, पर सरकार इन्हें रोकने में नाकाम ही रही है. औरतों सताने में जनता के चुने हुए जनप्रतिनिधि भी पीछे नहीं हैं.

एडीआर यानी एसोसिएशन औफ डैमोक्रेटिक रिफौर्म्स की ओर से जारी एक रिपोर्ट से पता चलता है कि औरतों को सताने में जनप्रतिनिधियों की लंबी लिस्ट है.

इस लिस्ट में हिमाचल प्रदेश के भी एक जनप्रतिनिधि का नाम शामिल है. हिमाचल प्रदेश से 4 लोकसभा और 3 राज्यसभा सांसद आते हैं, जबकि 68 विधायक हिमाचल विधानसभा के सदस्य हैं. इन में से एक विधायक का नाम एडीआर की रिपोर्ट में शामिल है.

हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले की चिंतपूर्णी सीट से कांग्रेस विधायक सुदर्शन बबलू पर भी महिला अपराध से जुड़ा मामला दर्ज है.

एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, उन पर महिला अपराध से जुड़ी आईपीसी की धारा 509 (महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के इरादे से शब्द, इशारा या कृत्य) के तहत एक मामला दर्ज है.

वैसे, हिमाचल प्रदेश के अलावा मणिपुर, दादर नगर हवेली और दमन और दीव ही 2 ऐसे राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हैं, जहां 1-1 जनप्रतिनिधि के खिलाफ महिला अपराध से जुड़े मामले चल रहे हैं.

इस के बाद गोवा, असम में 2-2, पंजाब, ?ारखंड में 3-3, उत्तर प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु में 4-4, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, केरल में 5-5 जनप्रतिनिधि इस लिस्ट में शामिल हैं.

इस के अलावा राजस्थान में 6, कर्नाटक में 7, बिहार में 9, महाराष्ट्र और दिल्ली में 13-13, ओडिशा में 17, आंध्र प्रदेश में 21 और पश्चिम बंगाल में सब से ज्यादा 25 सांसद और विधायक इस लिस्ट में शामिल हैं. Social Issue

Social Update: औरतों की अपनी भी जिंदगी है

Social Update, लेखक – डा. इम्तियाज अहमद गाजी

शादीशुदा औरतों के अपने पति को छोड़ कर अपने से कम उम्र के दूसरे लड़कों के साथ भाग जाने की खबरें लगातार आ रही हैं. लगातार हो रही इन घटनाओं में यह साफतौर पर दिखाई दे रहा है कि औरतें लोकलाज को परे रख कर अपनी निजी जिंदगी को बेहतर तरीके से जीने को अब प्राथमिकता देने लगी हैं.

एक के बाद एक हो रही घटनाओं से दूसरी औरतों को भी प्रेरणा मिल रही है. ये घटनाएं मर्दों को सावधान करने वाली हैं, साथ ही उन्हें अपनी जिम्मेदारियों के प्रति अगाह करने वाली भी हैं. अगर मर्दों ने इन वजहों की तह में जा कर अपनेआप को दुरुस्त नहीं किया तो इस तरह की घटनाएं किसी के भी साथ हो सकती हैं. कोई भी पति अपनी पत्नी से हाथ धो सकता है.

ऐसी घटनाओं से पति को अपनी पत्नी के बिछुड़ जाने का सिर्फ दर्द ही नहीं होता, इस के साथसाथ समाज में मुंह दिखाना भी बेहद मुश्किल हो जाता है.

पिछले दिनों सब को चौंका देने वाली घटना उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुई. एक औरत ने अपनी बेटी की शादी एक लड़के से तय कर दी. शादी की तारीख तय होने के बाद लड़का अकसर ही अपनी ससुराल आनेजाने लगा और फोन पर भी बातें करने लगा.

इस दौरान उस लड़के की त्यादातर बातें अपनी होने वाली सास से होने लगीं. बातोंबातें में अपनापन इतना ज्यादा बढ़ा कि दोनों में प्यार हो गया. चंद रोज ही शादी को बचे थे. इसके बावजूद वह औरत आपने होने वाले दामाद के साथ भाग गई.

दूसरी घटना भी उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर में हुई. यहां एक 50 साल की औरत को अपने रिश्ते के 30 साल के पोते से प्यार हो गया. प्यार इतना ज्यादा परवान चढ़ा कि दोनों ने शादी रचा ली.

उत्तर प्रदेश के ही बदायूं जिले में बेटाबेटी की शादी तय करने के दौरान होने वाले समधी और समधन में प्यार हो गया. इस घटना में 4 बच्चों की मां अपने होने वाले समधी के साथ घर से भाग गई.

मध्य प्रदेश के इंदौर जिले में एक बूआ अपने भतीजे से प्यार करने लगी. घर वालों का विरोध और गुस्सा देख कर वह अपने भतीजे के साथ घर से भाग गई. दूसरे शहर में जा कर उस ने भतीजे से शादी रचा ली.

इसी तरह एक औरत ने अपने पति को छोड़ कर अपने से कम उम्र के चाचा के साथ शादी रचा ली. एक औरत के घर उस के बच्चों को पढ़ाने के लिए ट्यूटर आता था. वह औरत लोकलाज को किनारे रख कर ट्यूटर से प्यार करने लगी और अब वह उसी से शादी करने को अड़ी है. उस का पति अरब देश में नौकरी करता है.

इस तरह की तमाम दूसरी घटनाएं लगातार सामने आ रही है. इन सारी ही घटनाओं में तकरीबन सभी औरतों की उम्र 50 साल या इस से ज्यादा है. इस तरह के कुछ मामले प्रकाश में आते हैं, बहुत सारे प्रकाश में नहीं आ पाते. इन की जड़ों में जा कर देखा जाए तो एक तरह से ये औरतों के जागरूक होने के मामले दिखाई दे रहे हैं.

आमतौर पर होता यह है कि ऐसी औरतें अनदेखी की शिकार होती हैं. इन की जिंदगी बेटाबेटी और नातेरिश्तेदारों की देखभाल में ही गुजर रही होती है. इन पर परिवार की जिम्मेदारियां इतनी ज्यादा डाल दी जा रही हैं कि उन की अपनी जिंदगी बदरंग हो जाती है.

ऐसे मामलों में औरतें घुटघुट कर जीने को मजबूर हो रही हैं. उन की अपनी जिंदगी कोई माने नहीं रख
रही है, जबकि हर इनसान की तरह उम्रदराज घरेलू औरतों को भी प्यार, सैक्स और हमदर्दी की बेहद जरूरत होती है. इन के बिना उन की अपनी जिंदगी बेमतलब सी दिखाई देती है.

इन्हें अपने परिवार से यह संदेश मिलने लगता है कि तुम्हारी अपनी जिंदगी कुछ भी नहीं. तुम्हें अपने पति, बच्चों और दूसरे परिवार वालों को ही खुश करने और उन्हें कामयाब बनाने के लिए काम करना और जीना है, जबकि हर किसी की अपनी निजी जिंदगी भी होती है.

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि अगर किसी औरत को उस के पति का प्यार नहीं मिलता, उस के सैक्स की भरपाई नहीं होती, घर के लोग उस की खुशी और दुख पर ध्यान नहीं देते हैं, तब वह औरत एक तरह से दिमागीतौर पर बीमार हो जाती है. फिर उसे ऐसे लोग बहुत अच्छे लगने लगते हैं, जो उस की निजी जिंदगी की खुशी और दुख का ध्यान रखते हैं, उस की बातें करते हैं.

ऐसी औरतों की जिंदगी में जब कोई ऐसा मर्द आ जाता है, तब वे उस से प्यार करने लगती हैं. ऐसे हालात में उन के लिए यह बात कोई मायने नहीं रखती कि सामने वाला उम्र में उन से छोटा है या उन का सगासंबंधी है.

ऐसे हालात में पति को अपनी पत्नी की निजी जिंदगी पर खूब ध्यान देने की जरूरत है. उस के साथ प्यार भरा बरताव करें और उस की सैक्स की भूख को भी समझें, वरना उन के साथ भी ऐसी ही घटना घट सकती है. Social Update

Social Issue: टौप पोस्ट तक नहीं पहुंच रहीं टौपर लड़कियां

Social Issue: यूपीएससी ने सिविल सेवा परीक्षा 2024 का अंतिम परिणाम घोषित कर दिया. शक्ति दुबे ने टौप किया, जबकि दूसरे स्थान पर हर्षिता गोयल रहीं. टौप 25 में 11 लड़कियां हैं. पिछले 11 सालों के आंकडे़ देखें तो यह साफ हो जाता है कि 6 साल लड़कियां टौप पर रही हैं. साल 2014 में इरा सिंघल, 2015 में टीना डाबी, 2016 में नंदिनी केआर, 2021 में श्रुति किशोर और 2022 में इशिता किशोर ने टौप पोजीशन हासिल की.

सिविल सेवा परीक्षा 2024 की टौपर शक्ति दुबे मूलरूप से उत्तर प्रदेश के प्रयागराज शहर की रहने वाली हैं. उन की स्कूलिंग होम टाउन प्रयागराज से ही हुई है. शक्ति दुबे बताती हैं कि उन की ग्रेजुएशन की पढ़ाई इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से हुई है. ग्रेजुएशन के बाद शक्ति दुबे बनारस आ गईं. फिर उन्होंने साल 2018 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से बायोकैमिस्ट्री में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिगरी हासिल की.

दूसरे स्थान पर रहने वाली हर्षिता गोयल हरियाणा की रहने वाली हैं. पिछले कई सालों से वे गुजरात के वडोदरा में रह रही हैं. हर्षिता एक चार्टर्ड अकाउंटैंट हैं. उन्होंने समाज सेवा के लिए अपनी फाइनैंस की दुनिया को छोड़ दिया. वे थैलेसीमिया और कैंसर से जूझ रहे बच्चों की मदद करने वाले एनजीओ के साथ जुड़ी थीं. हर्षिता की सफलता सामाजिक समर्पण और दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रतीक है.

चौथे स्थान पर रहने वाली शाह मार्गी चिराग गुजरात के अहमदाबाद की रहने वाली हैं. गुजरात टैक्नोलौजिकल यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर इंजीनियरिंग करने वाली मार्गी ने समाजशास्त्र को वैकल्पिक विषय के रूप में चुना और औल इंडिया में चौथा स्थान हासिल किया. टैक्निकल बैकग्राउंड के बावजूद समाज से जुड़ाव ने उन्हें इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा दी.

कोमल पूनिया उत्तर प्रदेश के सहारनपुर की रहने वाली हैं. उन्होंने दूसरे प्रयास में यूपीएससी क्लियर कर जिले का नाम रोशन किया है. कोमल की मेहनत और जज्बे ने यह दिखा दिया कि लगन और निरंतर प्रयास से कोई भी मंजिल पाई जा सकती है.

मध्य प्रदेश के ग्वालियर की रहने वाली आयुषी बंसल ने 2022 में 188वीं और 2023 में 97वीं रैंक हासिल की थी. आयुषी के जीवन में पिता का साया बचपन में ही उठ गया था, लेकिन मां की प्रेरणा और अपनी मेहनत से उन्होंने यह कठिन परीक्षा पास की.

गाजियाबाद की आशी शर्मा को 12वां रैंक प्राप्त हुआ है. आशी का यह दूसरा अटैंप्ट था.

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले की रहने वाली सौम्या मिश्रा को यूपीएससी में 18वां रैंक प्राप्त हुआ है. सौम्या के पिता राघवेंद्र कुमार मिश्र पेशे से शिक्षक हैं. पीसीएस 2021 की परीक्षा में सौम्या मिश्रा ने टौप किया था. इस बार सौम्या के साथ उन की बहन सुमेघा मिश्रा ने भी 53वीं रैंक हासिल कर परीक्षा पास की है.

उत्तर प्रदेश की शक्ति दुबे के साथ कोमल पुनिया, आशी शर्मा, सौम्या मिश्रा, मुसकान श्रीवास्तव, शोभिका पाठक और अवधिजा गुप्ता ने टौप 20 में जगह बनाने में सफलता हासिल की. देश की सब से कठिन परीक्षाओं में यूपीएससी का नाम आता है. इस को पास करना बहुत कठिन होता है. अब लड़कियों ने इस परीक्षा की टौप लिस्ट में अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है. यूपीएससी सिविल सर्विस 2024 की फाइनल लिस्ट में उत्तर प्रदेश की लड़कियों का दबदबा रहा है. टौप 20 में उत्तर प्रदेश की 4 लड़कियों के नाम हैं.

बड़ा सवाल यह है कि आईएएस और आईपीएस में टौप करने वाली ये लड़कियां जब नौकरी करती हैं तो इन को टौप पोस्ट पर काम करने का मौका नहीं दिया जाता. आज का दौर बदल रहा है. अब जमाना मसल्स का नहीं, माइंड का है. यूपीएससी परीक्षाओं में टौप पर रह कर लड़कियों ने दिखा दिया है कि उन में भी दम है. अब उन को टौप पोस्ट संभालने के लिए दी जा सकती हैं. आईएएस बनने वाली महिला अफसरों को जिलों में डीएम की पोस्ट भी दी जानी चाहिए. आईपीएस बनने वाली महिला अफसरों को जिले में एसपी, एसएसपी और पुलिस कमिश्नर बनने का मौका दिया जाना चाहिए.

टौप ब्यूरोक्रेसी में भी महिलाओं को मुख्य सचिव के पद कम मिलते हैं. पीएमओ और रक्षा विभागों में अफसर के रूप में काम करने के मौके महिलाओं को कम दिए जाते हैं. महिलाएं परीक्षा पास कर के अपनी क्षमता के बारे में बता रही हैं. वे यह हक भी मांग रही हैं कि उन को भी पुरुषों के बराबर काबिल समझ कर टौप पोस्ट दी जाएं. महिला को पुरुष के बराबर हक नहीं दिया जाता है. उत्तर प्रदेश में नीरा यादव के बाद कोई महिला मुख्य सचिव नहीं बनी है. महिला डीजीपी तो अभी तक कोई भी महिला नहीं बनी है.

भले ही परीक्षाओं में महिलाएं टौप कर रही हों लेकिन लीडरशिप यानी अगुआई और निर्णय लेने वाले पदों पर पहुंचने वाली महिलाओं की संख्या काफी कम है. जरूरत है कि इस को दूर किया जाए. जब तक यह भेदभाव खत्म नहीं होगा तब तक उन का यूपीएससी परीक्षा में बराबरी करना भी बेमकसद सा हो जाता है.

Grihshobha Inspire Awards 2025 में प्रेरणादायक महिलाओं को किया सम्मानित

Grihshobha Inspire Awards 2025: नई दिल्ली, 21 मार्च 2025 –गृहशोभा इंस्पायर अवार्ड्स 2025 का आयोजन 20 मार्च 2025 को त्रावणकोर पैलेस, नई दिल्ली में किया गया. इस कार्यक्रम में उन असाधारण महिलाओं को सम्मानित किया गया जिन्होंने अपने क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. इस कार्यक्रम में लोक कला, शासन, सार्वजनिक नीति, सामाजिक कार्य, व्यवसाय, विज्ञान, ऑटोमोटिव और मनोरंजन जैसे क्षेत्रों की प्रभावशाली और उपलब्धि हासिल करने वाली महिलाओं को सम्मानित किया गया. यह पुरस्कार उन लोगों को दिया गया जिन्होंने जिन्होनें अपने सामने आने वाली सभी मुश्किलों को पार कर एक नई राह बनाई.

इस इवेंट को लाइव देखने के लिए लिंक पर क्लिक करें – https://www.facebook.com/share/v/15annFyN5g/?mibextid=wwXIfr

इस समारोह में, सार्वजनिक स्वास्थ्य और शासन में परिवर्तनकारी नेतृत्व के लिए केरल की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सुश्री के.के. शैलजा को पुरूस्कृत किया गया. साथ ही प्रसिद्ध अदाकारा सुश्री शबाना आज़मी को सिनेमा में उनके योगदान और मजबूत एवं मुश्किल किरदारों के प्रदर्शन के लिए मनोरंजन के माध्यम से सशक्तिकरण – आइकन के रूप में सम्मानित किया गया. डॉ. सौम्या स्वामीनाथन को सार्वजनिक स्वास्थ्य और वैज्ञानिक अनुसंधान में उनके अग्रणी नेतृत्व के लिए नेशन बिल्डर – आइकन पुरस्कार मिला. टाइटन वॉचेस की सीईओ सुश्री सुपर्णा मित्रा को कॉर्पोरेट नेतृत्व में नए स्टैंडर्ड स्थापित करने के लिए बिजनेस लीडरशिप – आइकन पुरूस्कार दिया गया.

अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कार विजेताओं में सुश्री मंजरी जरूहर शामिल रहीं, जिन्हें पुलिसिंग में उनके अग्रणी करियर के लिए फियरलेस वारियर – आइकन के रूप में सम्मानित किया गया. ग्रामीण कारीगरों को सशक्त बनाने वाली जमीनी स्तर की नेता सुश्री रूमा देवी को ग्रासरूट्स चेंजमेकर – आइकन पुरस्कार मिला, जबकि सुश्री अमला रुइया को जल संरक्षण में उनके अग्रणी कार्य के लिए ग्रासरूट्स चेंजमेकर – अचीवर के रूप में सम्मानित किया गया. सुश्री विजी वेंकटेश को कैंसर देखभाल में उनके सरहानीय योगदान के लिए न्यू बिगिनिंग- आइकन से सम्मानित किया गया.

बिजनेस इंडस्ट्री में, भारत की पहली कीवी वाइन मैकर सुश्री तागे रीता ताखे को बिजनेस लीडरशिप-अचीवर से सम्मानित किया गया, जबकि मेंस्ट्रुपीडिया की फाउंडर सुश्री अदिति गुप्ता को होमप्रेन्योर-अचीवर से सम्मानित किया गया. सुश्री कृपा अनंथन को ऑटोमोटिव इंडस्ट्री में चेंजमेकर के रूप में सम्मानित किया गया, और सुश्री किरुबा मुनुसामी को उनकी कानूनी सक्रियता के लिए सोशल इम्पैक्ट-अचीवर से पुरूस्कृत किया गया. डॉ. मेनका गुरुस्वामी और सुश्री अरुंधति काटजू को लैंगिक समानता और LGBTQ समुदाय के अधिकारों के लिए उनकी ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई के लिए संयुक्त रूप से सोशल इम्पैक्ट-चेंजमेकर से सम्मानित किया गया.

लोक कलाओं के संरक्षण में उनके योगदान के लिए, डॉ. रानी झा को फोल्क हेरिटेज-आइकन से सम्मानित किया गया. डॉ. बुशरा अतीक को STEM में उत्कृष्टता के लिए सम्मानित किया गया.

एंटरनमेंट और डिजिटल इन्फ्लुएंस में, सुश्री तिलोत्तमा शोम और और सुश्री कोंकणा सेन को मनोरंजन के माध्यम से सशक्तिकरण के लिए ऑनस्क्रीन और ऑफस्क्रीन सम्मानित किया गया. सुश्री लीजा मंगलदास को कंटेंट क्रिएटर -एम्पावरमेंट, सुश्री श्रुति सेठ को कंटेंट क्रिएटर – पेरेंटिंग और डॉ. तनया नरेंद्र को कंटेंट क्रिएटर – हेल्थ में उनकी उत्कृष्टता के लिए सम्मानित किया गया.

माननीय अतिथि

सभी पुरस्कार आरटीआई कार्यकर्ता सुश्री अरुणा रॉय, वरिष्ठ अधिवक्ता सुश्री इंदिरा जयसिंह, प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना सुश्री शोवना नारायण और महिला अधिकार कार्यकर्ता एवं राजनीतिज्ञ सुश्री सुभाषिनी अली द्वारा प्रदान किए गए. इन विशिष्ट अतिथियों ने अपने प्रेरणादायक शब्दों के साथ विजेताओं की उपलब्धियों के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया.

जूरी पैनल

पुरस्कारों का निर्णय प्रतिष्ठित और सम्मानित महिलाओं के एक प्रतिष्ठित जूरी पैनल द्वारा किया गया, जिसमें लेखिका और फेमिना की पूर्व संपादक सुश्री सत्या सरन, लोकप्रिय अभिनेत्री सुश्री पद्मप्रिया जानकीरमन, चंपक की संपादक सुश्री ऋचा शाह, लर्निंग लिंक्स फाउंडेशन की अध्यक्ष सुश्री नूरिया अंसारी, आउटवर्ड बाउंड हिमालय की डायरेक्टर सुश्री दिलशाद मास्टर और कारवां की वेब संपादक सुश्री सुरभि कांगा शामिल थीं.

कार्यक्रम में बोलते हुए, दिल्ली प्रेस के प्रधान संपादक और प्रकाशक श्री परेश नाथ ने कहा: “गृहशोभा इंस्पायर अवार्ड उन लोगों को श्रद्धांजलि है जो आम धारणाओं को चुनौती देते हैं, और बदलाव लाने के लिए और भविष्य को आकार देने के लिए रचनात्मकता और साहस का उपयोग करते हैं. शोर से अभिभूत दुनिया में, ये पुरस्कार विजेता हमें याद दिलाते हैं कि सच्चा नेतृत्व उन लोगों के शांत लेकिन परिवर्तनकारी प्रभाव में निहित है जो सत्ता के सामने सच बोलने और ईमानदारी के साथ नेतृत्व करने का साहस करते हैं.”

गृहशोभा के बारे में:

गृहशोभा, जिसे दिल्ली प्रेस द्वारा प्रकाशित किया जाता है, भारत की सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली हिंदी महिला मैगजीन है, जिस के 10 लाख से अधिक रीडर्स हैं. यह मैगजीन 8 भाषाओं (हिंदी, मराठी, गुजराती, कन्नड़, तमिल, मलयालम, तेलुगु और बंगाली) में प्रकाशित होती है और इस में घरगृहस्थी, फैशन, सौंदर्य, कुकिंग, स्वास्थ्य और रिश्तों पर रोचक लेख शामिल होते हैं. पिछले 45 सालों से गृहशोभा महिलाओं के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शन का स्रोत बनी हुई है.

दिल्ली प्रेस के बारे में:

दिल्ली प्रेस भारत के सबसे बड़े और विविध पत्रिका प्रकाशनों में से एक है. यह परिवार, राजनीति, सामान्य रुचियों, महिलाओं, बच्चों और ग्रामीण जीवन से जुड़ी 36 पत्रिकाएं 10 भाषाओं में प्रकाशित करता है. इस की पहुंच पूरे देश में फैली हुई है.

मीडिया से संपर्क करें:
अनंथ नाथ/ एला
9811627143/ 8376833833

मर्द की मार कब तक सहेंगी महिलाएं

कुछ साल पहले एक फिल्म देखी थी. फिल्म का नाम था ‘मृत्युदंड’. सिनेमाघर के अंदर मिडिल क्लास परिवारों के मर्द औरत बैठे थे. फिल्म के एक सीन में तालाब के किनारे 2 औरतें बैठ कर आपस में बातचीत कर रही थीं. पहली औरत ने पूछा, ‘तुझे तेरा मरद मारता है?’

दूसरी औरत बोली, ‘हां, मारता है. अब जब बैल के सींग में खुजली होती है तो सिर हिलाता ही है.’

पहली औरत ने कहा, ‘तुम विरोध नहीं करती हो.’

दूसरी औरत ने बताया, ‘अब क्या है दीदी… मरद कभी कभी हाथ चला देता है. सहना तो पड़ता ही है.’

‘सींग में खुजली’ वाली बात पर आसपास बैठे फिल्म देख रहे दर्शक हंस पड़े. मैं ने गौर किया कि एक भी औरत नहीं हंसी थी. हो सकता है कि डायलौग में मजाक होने की वजह से हंसी आई हो और सिनेमाघर में बैठे दर्शक औरतों के प्रति वैसा नजरिया न रखते हों, जैसा परदे पर दिखाया जा रहा था. पर क्या इस हंसी में कहीं वह न दिखने वाला राज तो नहीं छिपा था जो औरतों पर जोर जुल्म के लिए जाने अनजाने ही सही रजामंदी देता है?

फिल्म का ऐंड एक संदेश के साथ पूरा होता है. साथ ही, इस फिल्म में सालों से समाज में हो रहे जोर जुल्म के खिलाफ विद्रोह को बहुत अच्छी तरह से दिखाया गया, जिस में जमींदार, सामंत, महंत और ठेकेदार शामिल हैं. पूरे दक्षिण एशिया में औरतों पर जोर जुल्म होता है. गरीबी, पढ़ाईलिखाई की कमी, कुपोषण और ज्यादा आबादी जैसी समस्याएं यहां अपनी हद पर हैं.

सामान्य हालात में देखा जाए तो औरतों पर जोर जुल्म के 2 रूप सामने आते हैं. सरकारी आंकड़े तो 2 बिंदुओं पर सिमट जाते हैं. ये हैं बलात्कार और दहेज. पर समाज में औरतों पर कई स्तरों पर जोर जुल्म फैले हुए हैं.

गांवों के सामाजिक हालात शहरों से अलग हैं या फिर तरक्की भी हुई है तो अधकचरी, बेमतलब और उलटी दिशा में.

यहां के समाज में औरतों की दशा तालाब में जमे पानी जैसी है. उन्हें अपने हकों तक का पता नहीं है. यहां के छोटे किसान और मजदूर समाज के पास अपनी जमीन नहीं है, जो मजदूरी या दूसरे के खेतों के सहारे ही अपनी रोजीरोटी चलाता है. इन घरों की औरतें बहुत मुश्किल हालात में अपनी जिंदगी बिताती हैं. घर और बाहर दोनों मोरचों पर इन्हें काम करना पड़ता है.

बीमार और जिस्मानी तौर पर कमजोर औरतें न सिर्फ घर के सारे काम करती हैं, बल्कि उन्हें खेतों, ईंटभट्ठों या दूसरों के घर बनवाने में मजदूरों की तरह भी काम करना पड़ता है. यहां पर एक सामाजिक बीमारी आसानी से देखी जा सकती है कि मर्द घर के काम नहीं करते हैं.

औरतों पर जोरजुल्म का एक दूसरा रूप छोटे शहरों और गांवों में देखा जा सकता है. देश के कई हिस्सों में आज भी सामंती और जमींदारी प्रथा बरकरार है. चाहे बिहार का मैदानी भाग हो या उत्तर प्रदेश का पूर्वी इलाका या फिर भारत का सब से पढ़ालिखा राज्य केरल.

ऐसी बात नहीं है कि मर्द सिर्फ बाहरी औरतों के साथ ही ऐसा बरताव करते हैं, बल्कि अपने घर की औरतों के साथ भी कोई बेहतर सुलूक नहीं करते हैं.

औरतें जागरूक नहीं

इन इलाकों में औरतों पर जोरजुल्म के लिए जाति प्रथा की जकड़ भी कम कुसूरवार नहीं है. ऊंची जाति वालों के तथाकथित नियम निचली जाति की औरतों से जिस्मानी संबंध तो बनाते हैं, पर शादी उन की शान में रुकावट होती है. दलितों पर जोरजुल्म को ऊंची जाति वाले अपना हक मानते हैं.

इसी तरह औरतों को भोग की चीज, बच्चा जनने और पालने के लायक ही मानते हैं, इसलिए यह साफ है कि औरतों की हालत आज के दलितों से अलग कर के नहीं देखी जा सकती है.

तरक्की के इस बदलाव के दौर में कई नए तरह के हालात सामने आए हैं. इलैक्ट्रौनिक मीडिया के चलते इस की पहुंच गांवगांव तक हो गई है. टैलीविजन और अखबार नए रूप में हमारे सामने हैं.

गांव के गरीब और निचले तबके के परिवार काम की तलाश में शहरों में आते हैं और न बयां करने वाली मुसीबतें झेलते हैं. इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि झुग्गीझोंपडि़यों में रहने वाली औरतों का क्या हश्र होता होगा.

यहां जोरजुल्म के कई रूप देखने को मिलते हैं. गांव की गरीब औरतें पढ़ाईलिखाई की कमी, कुपोषण के चलते पिसती हैं तो शहर की औरतें खुलेपन के खौफ में.

यहां अपराध के नएनए रूप भी देखने को मिलते हैं. ‘समाज में खुलापन आया है’ इस वाक्य को न जाने हम कितना दोहराते हैं, पर यह खुलापन किसलिए?

राष्ट्रीय महिला आयोग ने औफिसों में औरतों पर हो रहे जोरजुल्म को काफी गंभीरता से लिया है. जिन औफिसों में औरतों का यौन शोषण या दूसरी तरह के जोरजुल्म होते हैं, इस को रोकने के लिए कई तरह के नियम बनाए गए हैं.

उदारीकरण यानी खुलेपन के इस दौर में यह भरम फैल गया है कि अगर औरत माली तौर पर आजाद हो जाएगी तो ऐसे जोरजुल्म बंद हो जाएंगे. पर ऐसी आजादी औरतों पर हो रहे जोरजुल्म को कम नहीं करती. औफिसों में हो रहा जोरजुल्म तो महज एक उदाहरण है.

हमारे समाज में तो ज्यादातर हुनर इसलिए कुंद हो जाते हैं कि यहां शादी सब से बड़ी बात होती है. कई लड़कियों का ‘कैरियर’ अगर शादी के नाम पर कुरबान कर दिया जाता है, तो इस के पीछे वही छिपी हुई साजिश होती है जो औरतों पर जोरजुल्म करने को मंजूरी दिए हुए है.

जरूरत है सोच बदलने की

खुलेपन ने जहां निजी आजादी और शख्सीयत को बनाने के मौके दिए हैं, वहीं परंपरागत सोच को बदलने का कोई उपाय नहीं बताया. असल समस्या की जड़ यही है. औरत एक ‘शख्सीयत’ के रूप में ताकतवर हो, यह हमें गवारा नहीं. हम नहीं चाहते कि औरत अपने तर्क के सहारे दुनिया की रचना करे.

यहां हमें उदारीकरण या खुलापन कोई सहयोग नहीं देता, बल्कि जोरजुल्म करने के लिए उकसाता है, इसलिए सामाजिक तौर पर उदारीकरण ‘अफीम की गोली सा’ लगता है, जो हमें नशे में रखता है.

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