Society: हमारे समाज में कुछ फैसले ऐसे लिए गए हैं जिन पर कभी बहस नहीं हुई, फिर भी वे सौ फीसदी सच मान लिए गए हैं.
उन्हीं में से एक है ‘घर बनाती भी औरत है और और घर बिगाड़ती भी वही है.’ परिवार में सुख, संस्कार और रिश्तों में मिठास हो तो कहा जाता है कि
‘बहू बहुत अच्छी मिली है’. लेकिन घर में तनाव या टूट होते ही आरोप सब से पहले उसी पर आता है, मानो घर किसी एक इनसान द्वारा चलने वाला सिस्टम हो.
यह केवल समाज द्वारा पहले से बना ली गई राय नहीं, बल्कि वह सोच है जिस ने औरत के बलिदान को फर्ज और उस के दर्द को किस्मत मान लिया है. सवाल यह नहीं है कि औरत का रोल खास है या नहीं... वह यकीनन है, बल्कि यह है कि क्या वह अकेली जिम्मेदार है?
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अगर घर बनाना सामूहिक कामयाबी है, तो उस का बिगड़ना भी सामूहिक नाकामी है. फिर हर बार कठघरे में केवल औरत ही क्यों? यह सवाल परिवार के भविष्य से जुड़ा है.
घर एक सिस्टम है, कोई इनसान नहीं
हम अकसर घर को चार दीवारों और छत का नाम मान लेते हैं, जबकि वह भावनाओं, संघर्षों और रिश्तों से बना एक जीताजागता सिस्टम है. वहां भावनाएं, उम्मीदें, सम झौते और रिश्ते सभी रहते हैं.
इस में माता, पिता, बच्चे और बुजुर्ग सभी का रोल समान रूप से खास होता है. फिर भी यह सोच बना ली गई है कि घर की कामयाबी का क्रेडिट पूरे परिवार को मिलेगा, लेकिन उस की नाकामी का ठीकरा केवल औरत के सिर पर फोड़ा जाएगा.
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