Murder Story : पत्नी की लाश के ऊपर लगाया आम का पेड़

Murder Story : समरजीत करीब एक साल बाद दिल्ली से अपने भाइयों अरविंद और धर्मेंद्र के साथ गांव धनजई लौटा तो मोहल्ले वालों ने उस में कई बदलाव देखे. उस के पहनावे और बातचीत में काफी अंतर चुका था. उस का बातचीत का तरीका गांव वालों से एकदम अलग था. इस से गांव वाले समझ गए कि दिल्ली में उस का काम ठीकठाक चल रहा है. धनजई गांव उत्तर प्रदेश के जिला सुलतानपुर के थाना कूंड़ेभार में पड़ता है.

देखने से ही लग रहा था कि समरजीत की हालत अब पहले से अच्छी हो गई है, लेकिन गांव वाले एक बात नहीं समझ पा रहे थे कि जब वह गांव से गया था तो गांव के ही रहने वाले रामसनेही की बेटी दीपा को भगा कर ले गया था. लेकिन उस के साथ दीपा दिखाई नहीं दे रही थी. दरअसल, दीपा और समरजीत के बीच काफी दिनों से प्रेमसंबंध चल रहा था. जिस के चलते वह और दीपा करीब एक साल पहले गांव से भाग गए थे. बाद में रामसनेही को पता लगा कि समरजीत दीपा के साथ दक्षिणपूर्वी दिल्ली के पुल प्रहलादपुर गांव में रह रहा है. गांव के ही लड़के के साथ बेटी के भाग जाने की बदनामी रामसनेही झेल रहा था. उसे जब पता लगा कि समरजीत के साथ दीपा नहीं आई है तो यह बात उसे कुछ अजीब सी लगी. बेटी को भगा कर ले जाने वाला समरजीत उस के लिए एक दुश्मन था.

इस के बावजूद भी बेटी की ममता उस के दिल में जाग उठी. उस ने समरजीत से बेटी के बारे में पूछ ही लिया. तब समरजीत ने बताया, ‘‘वह तो करीब एक महीने पहले नाराज हो कर दिल्ली से गांव चली आई थी. अब तुम्हें ही पता होगा कि वह कहां है?’’ यह सुन कर रामसनेही चौंका. उस ने कहा, ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो? वो यहां आई ही नहीं है.’’

‘‘अब मुझे क्या पता वह कहां गई? आप अपनी रिश्तेदारियों वगैरह में देख लीजिए. क्या पता वहीं चली गई हो.’’

समरजीत की बात रामसनेही के गले नहीं उतरी. वह समझ नहीं पा रहा था कि समरजीत जो दीपा को कहीं देखने की बात कह रहा है, वह कहीं दूसरी जगह क्यों जाएगी? फिर भी उस का मन नहीं माना. उस ने अपने रिश्तेदारों के यहां फोन कर के दीपा के बारे में पता किया, लेकिन पता चला कि वह कहीं नहीं है. बात एक महीना पुरानी थी. ऐसे में वह बेटी को कहां ढूंढ़े. बेटी के बारे में सोचसोच कर उस की चिंता बढ़ती जा रही थी. यह बात दिसंबर, 2013 के आखिरी हफ्ते की थी. समरजीत के साथ उस के भाई अरविंद और धर्मेंद्र भी गांव आए थे. रामसनेही ने दोनों भाइयों से भी बेटी के बारे में पूछा. लेकिन उन से भी उसे कोई ठोस जवाब नहीं मिला. 10-11 दिन गांव में रहने के बाद समरजीत दिल्ली लौट गया.

बेटी की कोई खैरखबर मिलने से रामसनेही और उस की पत्नी बहुत परेशान थे. वह जानते थे कि समरजीत दिल्ली के पुल प्रहलादपुर में रहता है. वहीं पर उन के गांव का एक आदमी और रहता था. उस आदमी के साथ जनवरी, 2014 के पहले हफ्ते में रामसनेही भी पुल प्रहलादपुर गयाथोड़ी कोशिश के बाद उसे समरजीत का कमरा मिल गया. उस ने वहां आसपास रहने वालों से बेटी दीपा का फोटो दिखाते हुए पूछा. लोगों ने बताया कि जिस दीपा नाम की लड़की की बात कर रहा है, वह 22 दिसंबर, 2013 तक तो समरजीत के साथ देखी गई थी, इस के बाद वह दिखाई नहीं दी है. समरजीत ने रामसनेही को बताया था दीपा एक महीने पहले यानी नवंबर, 2013 में नाराज हो कर दिल्ली से चली गई थी, जबकि पुल प्रहलादपुर गांव के लोगों से पता चला था कि वह 22 दिसंबर, 2013 तक समरजीत के साथ थी. इस से रामसनेही को शक हुआ कि समरजीत ने उस से जरूर झूठ बोला है. वह दीपा के बारे में जानता है कि वह इस समय कहां है?

रामसनेही के मन में बेटी को ले कर कई तरह के खयाल पैदा होने लगे. उसे इस बात का अंदेशा होने लगा कि कहीं इन लोगों ने बेटी के साथ कोई अनहोनी तो नहीं कर दी. यही सब सोचते हुए वह 6 जनवरी, 2014 को दोपहर के समय थाना पुल प्रहलादपुर पहुंचा और वहां मौजूद थानाप्रभारी धर्मदेव को बेटी के गायब होने की बात बताई. रामसनेही ने थानाप्रभारी को बेटी का हुलिया बताते हुए आरोप लगाया कि समरजीत और उस के भाइयों, अरविंद धर्मेंद्र ने अपने मामा नरेंद्र, राजेंद्र और वीरेंद्र के साथ बेटी को अगवा कर उस के साथ कोई अप्रिय घटना को अंजाम दे दिया है. थानाप्रभारी धर्मदेव ने उसी समय रामसनेही की तहरीर पर भादंवि की धारा 365, 34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कराकर सूचना एसीपी जसवीर सिंह मलिक को दे दी.

मामला जवान लड़की के अपहरण का था, इसलिए एसीपी जसवीर सिंह मलिक ने थानाप्रभारी धर्मदेव के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में इंसपेक्टर आर.एस. नरुका, सबइंसपेक्टर किशोर कुमार, युद्धवीर सिंह, हेडकांस्टेबल श्रवण कुमार, नईम अहमद, राकेश, कांस्टेबल अनुज कुमार तोमर, धर्म सिंह आदि को शामिल किया गया. उधर दिल्ली में रह रहे समरजीत और उस के भाइयों को जब पता चला कि दीपा का बाप रामसनेही पुल प्रहलादपुर आया हुआ है तो तीनों भाई दिल्ली से फरार हो गए. पुलिस टीम जब उन के कमरे पर गई तो वहां उन तीनों में से कोई नहीं मिला. चूंकि तीनों आरोपी रामसनेही के गांव के ही रहने वाले थे, इसलिए पुलिस टीम रामसनेही को ले कर यूपी स्थित उस के गांव धनजई पहुंची. लेकिन घर पर समरजीत और उस के घर वालों में से कोई नहीं मिला.

अब पुलिस को अंदेशा हो गया कि जरूर कोई कोई गड़बड़ है, जिस की वजह से ये लोग फरार हैं. गांव के लोगों से बात कर के पुलिस ने यह पता लगाया कि इन के रिश्तेदार वगैरह कहांकहां रहते हैं, ताकि वहां जा कर आरोपियों को तलाशा जा सके. इस से पुलिस को पता चला कि सुलतानपुर और फैजाबाद के कई गांवों में समरजीत के रिश्तेदार रहते हैं. उन रिश्तेदारों के यहां जा कर दिल्ली पुलिस ने दबिशें दीं, लेकिन वे सब वहां भी नहीं मिले. दिल्ली पुलिस ने समरजीत के सभी रिश्तेदारों पर दबाव बनाया कि आरोपियों को जल्द से जल्द पुलिस के हवाले करें. उधर बेटी की चिंता में रामसनेही का बुरा हाल था. वह पुलिस से बारबार बेटी को जल्द तलाशने की मांग कर रहा था.

समरजीत या उस के भाइयों से पूछताछ करने के बाद ही दीपा के बारे में कोई जानकारी मिल सकती थी. इसलिए दिल्ली पुलिस की टीम अपने स्तर से ही आरोपियों को तलाशती रही9 जनवरी, 2014 को पुलिस को सूचना मिली कि समरजीत सुलतानपुर के ही गांव नगईपुर, सामरी बाजार में रहने वाले अपने मामा के यहां आया हुआ है. खबर मिलते ही पुलिस नगईपुर गांव पहुंच गई. सूचना एकदम सही निकली. वहां पर समरजीत, उस के भाई अरविंद और धर्मेंद्र के अलावा उस का मामा नरेंद्र भी मिल गयाचूंकि दीपा समरजीत के साथ ही रह रही थी, इसलिए पुलिस ने सब से पहले उसी से दीपा के बारे में पूछा. इस पर समरजीत ने बताया, ‘‘सर, नवंबर, 2013 में दीपा उस से लड़झगड़ कर दिल्ली से अपने गांव जाने को कह कर चली आई थी. इस के बाद वह कहां गई, इस की उसे जानकारी नहीं है.’’

‘‘लेकिन पुल प्रहलादपुर में जहां तुम लोग रहते थे, वहां जा कर हम ने जांच की तो जानकारी मिली कि दीपा 23 दिसंबर, 2013 को दिल्ली में ही तुम्हारे साथ थी.’’ थानाप्रभारी धर्मदेव ने कहा तो समरजीत के चेहरे का रंग उड़ गयाथानाप्रभारी उस का हावभाव देख कर समझ गए कि यह झूठ बोल रहा है. उन्होंने रौबदार आवाज में उस से कहा, ‘‘देखो, तुम हम से झूठ बोलने की कोशिश मत करो. दीपा के साथ तुम लोगों ने जो कुछ भी किया है, हमें सब पता चल चुका है. वैसे एक बात बताऊं, सच्चाई उगलवाने के हमारे पास कई तरीके हैं, जिन के बारे में तुम जानते भी होगे. अब गनीमत इसी में है कि तुम सारी बात हमें खुद बता दो, वरना…’’

इतना सुनते ही वह डर गया. वह समझ गया कि अगर सच नहीं बताया कि पुलिस बेरहमी से उस की पिटाई करेगी. इसलिए वह सहम कर बोला, ‘‘सर, हम ने दीपा को मार दिया है.’’

‘‘उस की लाश कहां है?’’ थाना प्रभारी ने पूछा.

‘‘सर, उस की लाश बाग में दफन कर दी है.’’ समरजीत ने कहा तो पुलिस चारों आरोपियों के साथ उस बाग में पहुंची, जहां उन्होंने दीपा की लाश दफन करने की बात कही थी. समरजीत के मामा नरेंद्र ने पुलिस को आम के बाग में वह जगह बता दी. लेकिन उस जगह तो आम का पेड़ लगा हुआ था. नरेंद्र ने कहा कि लाश इसी पेड़ के नीचे है. उन लोगों की निशानदेही पर पुलिस ने वहां खुदाई कराई तो वास्तव में एक शाल में गठरी के रूप में बंधी एक महिला की लाश निकली. उस समय रामसनेही भी पुलिस के साथ था. लाश देखते ही वह रोते हुए बोला, ‘‘साहब यही मेरी दीपा है. देखो इन्होंने मेरी बेटी का क्या हाल कर दिया. मुझे पहले ही इन लोगों पर शक हो रहा था. इन के खिलाफ आप सख्त से सख्त काररवाई कीजिए, ताकि ये बच सकें.’’

वहां खड़े गांव वालों ने तसल्ली दे कर किसी तरह रामसनेही को चुप कराया. गांव वाले इस बात से हैरान थे कि समरजीत दीपा को बहुत प्यार करता था, जिस के कारण दोनों गांव से भाग गए थे. फिर समरजीत ने उस के साथ ऐसा क्यों किया?

पुलिस ने लाश का मुआयना किया तो उस के गले पर कुछ निशान पाए गए. इस से अनुमान लगाया कि दीपा की हत्या गला घोंट कर की गई थी. मौके की जरूरी काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए सुलतानपुर के पोस्टमार्टम हाऊस भेज दिया और चारों अभियुक्तों को गिरफ्तार कर के दिल्ली ले आई. थाना पुल प्रहलादपुर में समरजीत, अरविंद, धर्मेंद्र और इन के मामा नरेंद्र से जब पूछताछ की गई तो दीपा और समरजीत के प्रेमप्रसंग से ले कर मौत का तानाबाना बुनने तक की जो कहानी सामने आई, वह बड़ी ही दिलचस्प निकली. उत्तर प्रदेश के जिला सुलतानपुर के थाना कूंड़ेभार में आता है एक गांव धनजई, इसी गांव में सूर्यभान सिंह परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे धर्मेंद्र, अरविंद और समरजीत थे. अरविंद और धर्मेंद्र शादीशुदा थे. दोनों भाई दिल्ली में ड्राइवर की नौकरी करते थे. समरजीत गांव में ही खेतीकिसानी करता था. वह खेतीकिसानी करता जरूर था, लेकिन उसे अच्छे कपड़े पहनने का शौक था.

वह जवान तो था ही. इसलिए उस का मन ऐसा साथी पाने के लिए बेचैन था, जिस से अपने मन की बात कह सके. इसी दौरान उस की नजरें दीपा से दोचार हुईं. दीपा रामसनेही की 20 वर्षीया बेटी थी. दीपा तीखे नयननक्श और गोल चेहरे वाली युवती थी. दीपा उस की बिरादरी की नहीं थी, फिर भी उस का झुकाव उस की तरफ हो गया. फिर दोनों के बीच बातों का सिलसिला ऐसा शुरू हुआ कि वे दोनों एकदूसरे के करीब आते गएदोनों ही चढ़ती जवानी पर थे, इसलिए जल्दी ही उन के बीच शारीरिक संबंध बन गए. एकदूसरे को शरीर सौंपने के बाद उन की सोच में इस कदर बदलाव आया कि उन्हें अपने प्यार के अलावा सब कुछ फीका लगने लगा. उन्हें ऐसा लग रहा था, जैसे उन की मंजिल यहीं तक हो. मौका मिलने पर दोनों खेतों में एकदूसरे से मिलते रहे. उन के प्यार को देख कर ऐसा लगता था, जैसे भले ही उन के शरीर अलगअलग हों, लेकिन जान एक हो.

उन्होंने शादी कर के अपनी अलग दुनिया बसाने तक की प्लानिंग कर ली. घर वाले उन की शादी करने के लिए तैयार हो सकेंगे, इस का विश्वास दोनों को नहीं था. इस की वजह साफ थी कि दोनों की जाति अलगअलग थी और दूसरे दोनों एक ही गांव के थे. घर वाले तैयार हों या हों, उन्हें इस बात की फिक्र थी. वे जानते थे कि प्यार के रास्ते में तमाम तरह की बाधाएं आती हैं. सच्चे प्रेमी उन बाधाओं की कभी फिक्र नहीं करते. वे परिवार और समाज के व्यंग्यबाणों और उन के द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा को लांघ कर अपने मुकाम तक पहुंचने की कोशिश करते हैं. समरजीत और दीपा भले ही सोच रहे थे कि उन का प्यार जमाने से छिपा हुआ है, लेकिन यह केवल उन का भ्रम था. हकीकत यह थी कि इस तरह के काम कोई चाहे कितना भी चोरीछिपे क्यों करे, लोगों को पता चल ही जाता है. समरजीत और दीपा के मामले में भी ऐसा ही हुआ. मोहल्ले के कुछ लोगों को उन के प्यार की खबर लग गई.

फिर क्या था. मोहल्ले के लोगों से बात उड़तेउड़ते इन दोनों के घरवालों के कानों में भी पहुंच गई. समरजीत के पिता सूर्यभान सिंह ने बेटे को डांटा तो वहीं दूसरी तरफ दीपा के पिता रामसनेही ने भी दीपा पर पाबंदियां लगा दीं. उसे इस बात का डर था कि कहीं कोई ऐसीवैसी बात हो गई तो उस की शादी करने में परेशानी होगी. कहते हैं कि प्यार पर जितनी बंदिशें लगाई जाती हैं, वह और ज्यादा बढ़ता है यानी बंदिशों से प्यार की डोर टूटने के बजाय और ज्यादा मजबूत हो जाती है. बेटी पर बंदिशें लगाने के पीछे रामसनेही की मंशा यही थी कि वह समरजीत को भूल जाएगी. लेकिन उस ने इस बात की तरफ गौर नहीं किया कि घर वालों के सो जाने के बाद दीपा अभी भी समरजीत से फोन पर बात करती है. यानी भले ही उस की अपने प्रेमी से मुलाकात नहीं हो पा रही थी, वह फोन पर दिल की बात उस से कर लेती थी.

एक बार रामसनेही ने उसे रात को फोन पर बात करते देखा तो उस ने उस से पूछा कि किस से बात कर रही है. तब दीपा ने साफ बता दिया कि वह समरजीत से बात कर रही है. इतना सुनते ही रामसनेही को गुस्सा गया और उस ने उस की पिटाई कर दी. रामसनेही ने सोचा कि पिटाई से दीपा के मन में खौफ बैठ जाएगा. लेकिन इस का असर उलटा हुआ. सन 2012 में दीपा समरजीत के साथ भाग गई. समरजीत प्रेमिका को ले कर हरिद्वार में अपने एक परिचित के यहां चला गया. तब रामसनेही ने थाना कूंडे़भार में बेटी के गायब हेने की सूचना दर्ज करा दीचूंकि गांव से समरजीत भी गायब था. इसलिए लोगों को यह बात समझते देर नहीं लगी कि दीपा समरजीत के संग ही भागी है. तब रामसनेही ने गांव में पंचायत बुला कर पंचों की मार्फत समरजीत के पिता सूर्यभान सिंह पर अपनी बेटी को ढूंढ़ने का दबाव बनाया.

आज भी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के कुछ गांवों में पंचों की बातों का पालन किया जाता है. सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कई मामलों में पंचायतों के फैसले सही भी होते हैं. अपनी मानमर्यादा और सामाजिक दबाव को देखते हुए लोग पंचों की बात का पालन भी करते हैं. पंचायती फैसले के बाद सूर्यभान सिंह ने अपने स्तर से समरजीत और दीपा को तलाशना शुरू किया. बाद में उसे पता लगा कि समरजीत और दीपा हरिद्वार में हैं तो वह उन दोनों को हरिद्वार से गांव ले आया. दोनों के घर वालों ने उन्हें फिर से समझाया. समरजीत और दीपा कुछ दिनों तक तो ठीक रहे, इस के बाद उन्होंने फिर से मिलनाजुलना शुरू कर दिया. फिर वे दोनों अंबाला भाग गए. वहां पर समरजीत की बड़ी बहन रहती थी. समरजीत दीपा को ले कर बहन के यहां ही गया था. उस ने भी उन दोनों को समझाया. उस ने पिता को इस की सूचना दे दी. सूर्यभान सिंह इस बार भी उन दोनों को गांव ले आए.

बेटी के बारबार भागने पर रामसनेही और उस के परिवार की खासी बदनामी हो रही थी. अब उस के पास एक ही रास्ता था कि उस की शादी कर दी जाए. लिहाजा उस ने उस की फटाफट शादी करने का प्लान बनाया. वह उस के लिए लड़का देखने लगादीपा को जब पता चला कि घर वाले उस की जल्द से जल्द शादी करने की फिराक में हैं तो उस ने आखिर अपनी मां से कह ही दिया कि वह समरजीत के अलावा किसी और से शादी नहीं करेगी. उस की इस जिद पर मां ने उस की पिटाई कर दी. इस के बाद 27 फरवरी, 2013 को दीपा और समरजीत तीसरी बार घर से भाग गए. इस बार समरजीत उसे दिल्ली ले गया. दक्षिणपूर्वी दिल्ली के पुल प्रहलादपुर गांव में समरजीत के भाई धर्मेंद्र और अरविंद रहते थे. वह उन्हीं के पास चला गया. बाद में समरजीत और दीपा ने मंदिर में शादी कर ली. फिर उसी इलाके में कमरा ले कर पतिपत्नी की तरह रहने लगे.

पुल प्रहलादपुर में रामसनेही के कुछ परिचित भी रहते थे. उन्हीं के द्वारा उसे पता चला कि दीपा समरजीत के साथ दिल्ली में रह रही है. खबर मिलने के बावजूद भी रामसनेही ने उसे वहां से लाना जरूरी नहीं समझा. वह जानता था कि दीपा घर से 2 बार भागी और दोनों बार उसे घर लाया गया था. जब वह घर रुकना ही नहीं चाहती तो उसे फिर से घर लाने से क्या फायदा. समरजीत के भाई अरविंद और धर्मेंद्र ड्राइवर थे. जबकि समरजीत को फिलहाल कोई काम नहीं मिल रहा था. उस की गृहस्थी का खर्चा दोनों भाई उठा रहे थेसमरजीत भाइयों पर ज्यादा दिनों तक बोझ नहीं बनना चाहता था, इसलिए कुछ दिनों बाद ही एक जानकार की मार्फत ओखला फेज-1 स्थित एक सिक्योरिटी कंपनी में नौकरी कर ली. उस की चिंता थोड़ी कम हो गई.

दोनों की गृहस्थी हंसीखुशी से चल रही थी. चूंकि समरजीत सिक्योरिटी गार्ड के रूप में काम कर रहा था, इसलिए कभी उस की ड्यूटी नाइट की लगती थी तो कभी दिन की. वह मन लगा कर नौकरी कर रहा था. जिस वजह से वह पत्नी की तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दे पा रहा था. इस का नतीजा यह निकला कि पास में ही रहने वाले एक युवक से दीपा के नाजायज संबंध बन गए. समरजीत दीपा को जीजान से चाहता था, इसलिए उसे पत्नी पर विश्वास था. लेकिन उसे इस बात की भनक तक नहीं लगी कि उस के विश्वास को धता बता कर वह क्या गुल खिला रही है. कहते हैं कि कोई भी गलत काम ज्यादा दिनों तक छिपाया नहीं जा सकता. एक एक दिन किसी तरीके से वह लोगों के सामने ही जाता है.

दीपा की आशिकमिजाजी भी एक दिन समरजीत के सामने गई. हुआ यह था कि एक बार समरजीत की रात की ड्यूटी लगी थी. वह शाम 7 बजे ही घर से चला गया था. दीपा को पता था कि पति की ड्यूटी रात 8 बजे से सुबह 8 बजे तक की है. जब भी पति की रात की ड्यूटी होती थी, दीपा प्रेमी को रात 10 बजे के करीब अपने कमरे पर बुला लेती थी. मौजमस्ती करने के बाद वह रात में ही चला जाता था. उस दिन भी उस ने अपने प्रेमी को घर बुला लिया.  रात 11 बजे के करीब समरजीत की तबीयत अचानक खराब हो गई. ड्यूटी पर रहते वह आराम नहीं कर सकता था. वह चाहता था कि घर जा कर आराम करे. लेकिन उस समय घर जाने के लिए उसे कोई सवारी नहीं मिल रही थी. इसलिए उस ने अपने एक दोस्त से घर छोड़ने को कहा. तब दोस्त अपनी मोटरसाइकिल से उसे उस के कमरे के बाहर छोड़ आया.

समरजीत ने जब अपने कमरे का दरवाजा खटखटाया तो प्रेमी के साथ गुलछर्रे उड़ा रही दीपा दरवाजे की दस्तक सुन कर घबरा गई. उस के मन में विचार आया कि पता नहीं इतनी रात को कौन गया. प्रेमी को बेड के नीचे छिपने को कह कर उस ने अपने कपड़े संभाले और बेमन से दरवाजे की तरफ बढ़ी. जैसे ही उस ने दरवाजा खोला, सामने पति को देख कर वह चौंक कर बोली, ‘‘तुम, आज इतनी जल्दी कैसे गए?’’

‘‘आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है इसलिए ड्यूटी बीच में ही छोड़ कर गया.’’ समरजीत कमरे में घुसते हुए बोला. कमरे में बेड के नीचे दीपा का प्रेमी छिपा हुआ था. दीपा इस बात से डर रही थी कि कहीं आज उस की पोल खुल जाए. समरजीत की तो तबीयत खराब थी. वह जैसे ही बेड पर लेटा, उसी समय बेड के नीचे से दीपा का प्रेमी निकल कर भाग खड़ा हुआ. अपने कमरे से किसी आदमी को निकलते देख समरजीत चौंका. वह उस की सूरत नहीं देख पाया था. समरजीत उस भागने वाले आदमी को भले ही नहीं जानता था, लेकिन उसे यह समझते देर नहीं लगी कि उस की गैरमौजूदगी में यह आदमी कमरे में क्या कर रहा होगावह गुस्से में भर गया. उस ने पत्नी से पूछा, ‘‘यह कौन था और यहां क्यों आया था?’’

‘‘पता नहीं कौन था. कहीं ऐसा तो नहीं कि वह चोर हो. कोई सामान चुरा कर तो नहीं ले गया.’’ दीपा ने बात घुमाने की कोशिश करते हुए कहा और संदूक का ताला खोल कर अपना कीमती सामान तलाशने लगीतभी समरजीत ने कहा, ‘‘तुम मुझे बेवकूफ समझती हो क्या? मुझे पता है कि वह यहां क्यों आया था. उसे जो चीज चुरानी थी, वह तुम ने उसे खुद ही सौंप दी. अब बेहतर यह है कि जो हुआ उसे भूल जाओ. आइंदा यह व्यक्ति यहां नहीं आना चाहिए. और ही ऐसी बात मुझे सुनने को मिलनी चाहिए.’’

पति की नसीहत से दीपा ने राहत की सांस ली. समरजीत तबीयत खराब होने पर घर आराम करने आया था, लेकिन आराम करना भूल कर वह रात भर इसी बात को सोचता रहा कि जिस दीपा के लिए उस ने अपना गांव छोड़ा, उसे पत्नी बनाया, उसी ने उस के साथ इतना बड़ा विश्वासघात क्यों किया. वह इस बात को अच्छी तरह जानता था कि जब कोई भी महिला एक बार देहरी लांघ जाती है तो उस पर विश्वास करना मूर्खता होती है. अगले दिन जब वह ड्यूटी पर गया तो वहां भी उस का मन नहीं लगा. उस के मन में यही बात घूम रही थी कि दीपा अपने यार के साथ गुलछर्रे उड़ा रही होगी. घर लौटने के बाद उस ने अपने भाइयों अरविंद और धर्मेंद्र से दीपा के बारे में बात की. यह बात उस ने अपने मामा नरेंद्र को भी बताई

उन सभी ने फैसला किया कि ऐसी कुलच्छनी महिला की चौकीदारी कोई हर समय तो कर नहीं सकता. इसलिए उसे खत्म करना ही आखिरी रास्ता है. दीपा को खत्म करने का फैसला तो ले लिया, लेकिन अपना यह काम उसे कहां और कब करना है, इस की उन्होंने योजना बनाई. काफी सोचनेसमझने के बाद उन्होंने तय किया कि दीपा को दिल्ली में मारना ठीक नहीं रहेगा, क्योंकि लाख कोशिशों के बाद भी वह दिल्ली पुलिस से बच नहीं पाएंगे. अपने जिला क्षेत्र में ले जा कर ठिकाने लगाना उन्हें उचित लगा. समरजीत को पता था कि दीपा सुलतानपुर जाने के लिए आसानी से तैयार नहीं होगी. उसे झांसे में लेने के लिए उस ने एक दिन कहा, ‘‘दीपा, सुलतानपुर के ही नगईपुर में मेरे मामा रहते हैं. उन के कोई बच्चा नहीं है और उन के पास जमीनजायदाद भी काफी है. उन्होंने हम दोनों को अपने यहां रहने के लिए बुलाया है. तुम्हें तो पता ही है कि दिल्ली में हम लोगों का गुजारा बड़ी मुश्किल से हो रहा है. इसलिए मैं चाहता हूं कि हम लोग कुछ दिन मामा के घर पर रहें.’’

पति की बात सुन कर दीपा ने भी सोचा कि जब उन की कोई औलाद नहीं है तो उन के बाद सारी जायदाद पति की ही हो जाएगी. इसलिए उस ने मामा के यहां रहने की हामी भर दी. 23 दिसंबर, 2013 को समरजीत दीपा को ट्रेन से सुलतानपुर ले गया. उस के साथ दोनों भाई अरविंद और धर्मेंद्र भी थे. जब वे सुलतानपुर स्टेशन पहुंचे, अंधेरा घिर चुका था. नगईपुर सुलतानपुर स्टेशन से दूर था. नगईपुर गांव से पहले ही समरजीत के मामा नरेंद्र का आम का बाग था. प्लान के मुताबिक नरेंद्र उन का उसी बाग में पहले से ही इंतजार कर रहा था. बाग के किनारे पहुंच कर तीनों भाइयों ने दीपा की गला घोंट कर हत्या कर दी और बाग में ही गड्ढा खोद कर लाश को दफना दिया.

जिस गड्ढे में उन्होंने लाश दफन की थी, जल्दबाजी में वह ज्यादा गहरा नहीं खोदा गया था. नरेंद्र को इस बात का अंदेशा हो रहा था कि जंगली जानवर मिट्टी खोद कर लाश खाने लगें. ऐसा होने पर भेद खुलना लाजिमी था इसलिए इस के 2 दिनों बाद नरेंद्र रात में ही अकेला उस बाग में गया और वहां से 20-25 कदम दूर दूसरा गहरा गड्ढा खोदा. फिर पहले गड्ढे से दीपा की लाश निकालने के बाद उस ने उसे उसी की शाल में गठरी की तरह बांध दियाउस गठरी को उस ने दूसरे गहरे गड्ढे में दफना कर उस के ऊपर आम का एक पेड़ लगा दिया ताकि किसी को कोई शक हो. दीपा को ठिकाने लगाने के बाद वे इस बात से निश्चिंत थे कि उन के अपराध की किसी को भनक लगेगी. यह जघन्य अपराध करने के बाद अरविंद और धर्मेंद्र पहले की ही तरह बनठन कर घूम रहे थे. उन को देख कर कोई अनुमान भी नहीं लगा सकता था कि उन्होंने हाल ही में कोई बड़ा अपराध किया है.

गांव के ज्यादातर लोगों को पता था कि दीपा दिल्ली में समरजीत के साथ पत्नी की तरह रह रही है. जब उन्होंने समरजीत को गांव में अकेला देखा तो उन्होंने उस से दीपा के बारे में पूछाजब दीपा के पिता रामसनेही को भी जानकारी मिली कि समरजीत के साथ दीपा गांव नहीं आई है तो उस ने उस से बेटी के बारे में पूछा. तब समरजीत ने उसे झूठी बात बताई कि दीपा एक महीने पहले उस से झगड़ा कर के दिल्ली से गांव जाने की बात कह कर गई थी. समरजीत की यह बात सुन कर रामसनेही घबरा गया था. फिर वह बेटी की छानबीन करने दिल्ली पहुंचा और बाद में दिल्ली के पुल प्रहलादपुर थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी.

इस के बाद ही पुलिस अभियुक्तों तक पहुंची. पुलिस ने समरजीत, अरविंद, धर्मेंद्र और मामा नरेंद्र को अपहरण कर हत्या और लाश छिपाने के जुर्म में गिरफ्तार कर 9 जनवरी, 2013 को दिल्ली के साकेत न्यायालय में महानगर दंडाधिकारी पवन कुमार की कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

   —कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

Murder Story : हत्या के बाद घर में ही कर दिया दफन

Murder Story : शादीशुदा संतोष का दिल अपने दोस्त की बहन रेखा पर आ गया. उसे पाने के लिए उस ने एक चाल चली. उस चाल में उस की मनोकामना तो पूरी हो गई पर रामकुमार बेवजह मारा गया. सुबह के करीब साढ़े 10 बजे रायबरेली के पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय जैसे ही अपने कार्यालय के सामने गाड़ी से उतरे, बूढ़ा चंद्रपाल यादव अपनी पत्नी जनकदुलारी के साथ उन के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया. उन के चेहरों से ही लग रहा था कि उन पर कोई भारी विपत्ति आई है. चंद्रपाल ने कांपते स्वर में कहा, ‘‘साहब, पिछले एक महीने से हमारा जवान बेटा रामकुमार लापता है. हम ने उसे बहुत ढूंढ़ा, थाने में गुमशुदगी भी दर्ज कराई, लेकिन कुछ पता नहीं चला. हर तरफ से निराश हो कर अब आप के पास आया हूं.’’

बात पूरी होते ही पतिपत्नी फफकफफक कर रोने लगे. पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय ने चंद्रपाल का हाथ थाम कर सांत्वना देते हुए कहा, ‘‘आप अंदर आइए, हम से जो हो सकेगा, हम आप की मदद करेंगे.’’

एसपी साहब ने वहां खड़े संतरी को उन्हें अंदर ले कर आने का इशारा किया. साहब का इशारा पाते ही एक सिपाही दोनों को अंदर ले गया. पांडेयजी ने दोनों को प्यार और सम्मान के साथ बैठा कर उन की पूरी बात सुनी. चंद्रपाल यादव उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली, थाना भदोखर के गांव बेलहिया का रहने वाला था. वैसे तो इस गांव में सभी जाति के लोग रहते हैं, लेकिन यादवों की संख्या कुछ ज्यादा है. गांव के ज्यादातर लोगों की रोजीरोटी खेतीकिसानी पर निर्भर है. चंद्रपाल के परिवार में पत्नी जनकदुलारी के अलावा 2 बेटे थे श्यामकुमार तथा रामकुमार और एक बेटी थी श्यामा. श्यामकुमार और श्यामा की शादी हो चुकी थी. श्यामा अपनी ससुराल में रहती थी. जबकि श्यामकुमार अपने परिवार के साथ मांबाप से अलग रहता था. एक तरह से रामकुमार ही मांबाप के बुढ़ापे का सहारा था.

14 जनवरी, 2013 की रात रामकुमार खापी कर घर में सोया था, लेकिन सुबह को वह गायब मिला. 15 जनवरी की सुबह से ही चंद्रपाल ने 23 वर्षीय रामकुमार की तलाश शुरू कर दी, लेकिन काफी खोजबीन के बाद भी उस के बारे में कुछ पता नहीं चला. कोई रास्ता न देख चंद्रपाल ने थाना भदोखर में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. पुलिस ने 2-4 दिन इधरउधर देखा, उस के बाद वह भी शांत हो कर बैठ गई. धीरेधीरे महीना भर से ज्यादा बीत गया. जब रामकुमार का कुछ पता नहीं चला तो गांव वालों ने चंद्रपाल को शहर जा कर कप्तान साहब से मिलने की सलाह दी. इसी के बाद चंद्रपाल पत्नी के साथ पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय से मिलने आया था. एसपी साहब ने उसे सांत्वना देते हुए कहा था कि वे लोग परेशान न हों. वह जल्द से जल्द उन के बेटे के बारे में पता लगवाने की कोशिश करेेंगे.

पुलिस अधीक्षक के इस आश्वासन पर चंद्रपाल और उस की पत्नी जनकदुलारी को काफी राहत महसूस हुई. इस के बाद पुलिस ने नए सिरे से छानबीन शुरू की. पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय के निर्देश पर थाना भदोखर पुलिस, क्राइम ब्रांच और सर्विलांस सेल सभी सक्रिय हो गए. उन दिनों थाना भदोखर के थानाप्रभारी आर.पी. रावत थे. वह अपनी पुलिस टीम के साथ रामकुमार की खोज में लग गए. यह देख कर पुलिस से नाउम्मीद हो चुके चंद्रपाल को लगा कि शायद अब उन के बेटे के बारे में पता चल जाएगा. लेकिन पुलिस की तत्परता के बावजूद दिन पर दिन बीतते जा रहे थे. रामकुमार का कहीं कोई पता नहीं चल पा रहा था. धीरेधीरे पुलिस ने लाख युक्ति लगाई, लेकिन कोई भी युक्ति काम नहीं आई. गांव वालों की ही नहीं, पुलिस की भी समझ में नहीं आ रहा था कि रामकुमार को जमीन खा गई या आसमान निगल गया.

रामकुमार के पता न चल पाने से पुलिस अधीक्षक भी हैरान थे. उन की भी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उस के बारे में पता क्यों नहीं चल रहा है. गांव में उस की किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं थी. गांव वालों के अनुसार, वह अपने काम से काम रखने वाला लड़का था. उस की शादी भी नहीं हुई थी. उस का चालचरित्र भी ऐसा नहीं था कि उस बारे में कुछ ऐसावैसा सोचा जाता. हर कोई रामकुमार को ले कर परेशान था कि उसी बीच कुछ ऐसा हुआ कि रामकुमार के लापता होने का रहस्य अपनेआप खुल गया.

26 जुलाई की रात इतनी ज्यादा बारिश हुई कि बेलहिया गांव में पानी ही पानी भर गया. चंद्रपाल के घर में भी पानी भर गया था. घर का पानी निकालने के लिए चंद्रपाल नाली बना रहा था तो जनकदुलारी ने कहा, ‘‘रामू के बप्पा रामू के कमरे में भी पानी भर गया है. उस में रखा तख्त सरका देते तो मैं वहां का पानी भी बाहर निकाल देती.’’

रामकुमार का अपना अलग कमरा था. जब से वह गायब हुआ था, जनकदुलारी उस कमरे में कम ही जाती थी. क्योंकि उस में रामकुमार का सारा सामान रखा था, जिसे देख कर उसे बेटे की याद आ जाती थी. इसी वजह से चंद्रपाल का भी उस कमरे में जाने का मन नहीं करता था. इसलिए उस ने टालने वाले अंदाज में कहा, ‘‘ऐसे ही काम चल जाए तो चला लो, मेरा उस कमरे में जाने का मन नहीं करता.’’

‘‘मन तो मेरा भी नहीं करता. लेकिन कच्ची दीवार है. पानी भरा रहेगा तो दीवारें गिर सकती हैं.’’

चंद्रपाल तख्त हटाने के लिए कमरे में पहुंचा तो उस ने देखा तख्त के नीचे की मिट्टी अंदर धंसी हुई है. वहां गढ्ढा सा बना हुआ था. उस गड्ढे को देख कर चंद्रपाल को हैरानी हुई, क्योंकि वह कोठरी काफी पुरानी थी. उस की जमीन काफी मजबूत थी. उस में इस तरह का गड्ढा खुदबखुद नहीं हो सकता था. बहरहाल उस ने जैसे ही तख्त हटवाया, उसे जो दिखाई दिया, उस से उस की आंखें खुली की खुली रह गईं. गड्ढे की धंसी हुई मिट्टी में सड़ागला एक इंसानी हाथ दिखाई दे रहा था. चंद्रपाल ने जल्दीजल्दी हाथों से मिट्टी हटानी शुरू की तो थोड़ी ही देर में उस के बेटे रामकुमार की लाश निकल आई.

रामकुमार की लाश निकलते ही चंद्रपाल बदहवास सा चिल्लाने लगा. उस की चीखपुकार सुन कर जनकदुलारी और आसपड़ोस के लोग भी आ गए. रामकुमार की सड़ीगली लाश देख कर घर में कोहराम मच गया. गांव वाले भी हैरान थे. बहरहाल रामकुमार की लाश मिलने की सूचना थाना भदोखर पुलिस को दे दी गई. वहां से यह सूचना पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय को दी गई.

पुलिस के लिए यह सूचना हैरान करने वाली थी. आननफानन में थाना भदोखर के थानाप्रभारी रामराघव सिंह सिपाही कन्हैया सिंह और अमरचंद्र शुक्ला को साथ ले कर गांव बेलहिया आ पहुंचे. थोड़ी ही देर में पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय भी फौरेंसिक टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस ने सावधानी से लाश गड्ढे से बाहर निकाली. वह पूरी तरह से सड़गल चुकी थी. लाश के साथ लाल रंग का एक दुपट्टा मिला, जिसे पुलिस ने कब्जे में ले लिया. इस के बाद अन्य काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए रायबरेली भेज दिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि रामकुमार की हत्या गला दबा कर की गई थी. महीनों पहले हुई हत्या का मामला था, इसलिए पुलिस के लिए यह चुनौती जैसी थी. हत्या की कोई वजह नजर नहीं आ रही थी. लाश घर के अंदर मिली थी, साफ था हत्या घर के अंदर ही की गई थी. ऐसी स्थिति में इस मामले में घरवालों का ही हाथ हो सकता था. लेकिन घर में सिर्फ बूढ़े मांबाप थे. वे अपने बेटे की हत्या क्यों करते? जबकि वही उन का सहारा था. वैसे भी वह ऐसा नहीं था कि मांबाप उस से परेशान होते. पुलिस ने हत्यारों तक पहुंचने के लिए जब चंद्रपाल और जनकदुलारी से विस्तारपूर्वक पूछताछ की तो उन्होंने एक बात ऐसी बताई, जिस पर पुलिस को संदेह हुआ. पतिपत्नी ने पुलिस को बताया था कि जिस रात रामकुमार गायब हुआ था, उस रात उन का रिश्ते का एक भांजा संतोष आया हुआ था.

वह पंजाब से एक लड़की साथ लाया था, जिस की शादी वह रामकुमार से कराना चाहता था. पुलिस ने जब चंद्रपाल से उन के उस भांजे संतोष के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वह पंजाब के अंबाला शहर में रहता है. पुलिस को उस पर संदेह हो रहा था, इसलिए पुलिस उस से ही नहीं, उस लड़की से भी पूछताछ करना चाहती थी, जो उस के साथ आई थी. पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय ने चंद्रपाल के भांजे संतोष और उस के साथ आई लड़की को रायबरेली लाने के लिए एक पुलिस टीम अंबाला भेज दी. पुलिस ने दोनों को रायबरेली ला कर पूछताछ की तो 11 महीने पुराने रामकुमार हत्याकांड से पर्दा उठ गया. उन दोनों ने रामकुमार की हत्या की जो कहानी पुलिस को सुनाई थी, वह इस प्रकार थी.

रायबरेली के ही थाना डलमऊ के गांव ठाकुरद्वारा का रहने वाला दिनेश कुमार अपने साले संतोष कुमार के साथ पंजाब के अंबाला शहर में रहता था. वहां दोनों एक साइकिल बनाने की फैक्ट्री में नौकरी करते थे. दोनों ने पंजाबी बाग मोहल्ले में किराए का एक कमरा ले रखा था, जिस में वे एक साथ रहते थे. उसी मोहल्ले में पटना की साधु बस्ती का रहने वाला रमेश कुमार यादव भी रहता था. वह कृषिकार्य की मशीनें बनाने के कारखाने में काम करता था. रमेश के साथ उस का परिवार भी रहता था. रमेश के परिवार में पत्नी सुधा, 10 साल का बेटा राजू और 20 साल की बहन रेखा थी.

एक मोहल्ले में रहने की वजह से और एक ही जाति का होने की वजह से दिनेश और रमेश की पहले जानपहचान हुई, जो बाद में दोस्ती में बदल गई. बीच में दिनेश के साले संतोष की नौकरी छूट गई तो रमेश ने उसे अपनी फैक्ट्री में नौकरी दिलवा दी थी. इस के बाद संतोष से भी रमेश की दोस्ती हो गई थी. अकसर सभी एकसाथ बैठते और एकदूसरे का सुखदुख बांटते. ऐसे में ही एक दिन रमेश ने कहा, ‘‘भाई दिनेश, सब तो ठीक है. मुझे चिंता रेखा की है. समझ में नहीं आ रहा कि उस की शादी कहां करूं, क्योंकि गांव से अब मेरा कोई रिश्ता नहीं रह गया है.’’

‘‘रमेश भाई, परदेश में आप ने हमारी बहुत मदद की है. मैं इस मामले में आप की मदद कर सकता हूं. दरअसल संतोष के एक मामा हैं चंद्रपाल. वह रायबरेली के नजदीक बेलहिया गांव में रहते हैं. उन का खातापीता परिवार है. उन के पास खेती की ठीकठाक जमीन है. उन का बेटा रामकुमार आप की बहन रेखा के लिए एकदम ठीक है. जातिबिरादरी भी एक है. आप कहें तो बात चलाऊं?’’ दिनेश ने कहा.

‘‘दिनेश भाई, तुम कह तो ठीक रहे हो. लेकिन परेशानी यह है कि मेरी बहन कई सालों से यहां शहर में हमारे साथ रह रही है. वह गांव में कैसे रहेगी?’’ रमेश ने अपनी परेशानी बताई तो दिनेश ने कहा, ‘‘रमेश भाई, आप भी कैसी बात करते हैं. न जाने कितने लोगों को आप ने नौकरी दिलवाई है. शादी के बाद बहनोई को भी यहीं बुला लेना. उस के बाद आप की बहन यहीं रहेगी.’’

दिनेश की बात रमेश को सही लगी. इस के बाद उस ने अपनी पत्नी सुधा से बात की तो उस ने भी हामी भर दी. इस के बाद तो दिनेश और संतोष से रमेश की और भी गहरी दोस्ती हो गई. रमेश की बहन रेखा की उम्र बामुश्किल 20 साल थी. उस का गोल चेहरा, बोलती आंखें किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकती थीं. संतोष तो उसे देख कर पागल सा हो गया था. अब वह अकसर रमेश के घर आनेजाने लगा. उस की पत्नी को वह भाभी कहता था. अगर रेखा वहां होती तो वह उस की शादी की बात छेड़ देता. वह अपने मामा के बेटे रामकुमार की खूब तारीफें करता था. ऐसी ही बातों के बीच एक दिन सुधा ने कहा, ‘‘आप मेरी ननद को तो देख ही रहे हैं इस का दूल्हा भी इस जैसा है कि नहीं? अगर दूल्हा सुंदर न हुआ तो रेखा उस के साथ नहीं जाएगी. बारात को बिना दुल्हन के ही जाना होगा.’’

‘‘ऐसा नहीं होगा भाभीजी, रामकुमार भी कम सुंदर नहीं है. एकदम हीरो लगता है. लड़कियां उस पर जान छिड़कती हैं.’’

‘‘अच्छा तो यह बताओ कि वह मेरी रेखा को पसंद कर लेगा या नहीं?’’ सुधा ने हंसते हुए पूछा.

‘‘रेखा भी कहां कम है,’’ संतोष ने रेखा की ओर तिरछी नजरों से देखते हुए कहा, ‘‘एकदम हीरोइन लगती है. अगर मैं शादीशुदा न होता तो खुद ही इस से शादी कर लेता.’’

रेखा का दीवाना हो चुका संतोष रेखा की तारीफों के कसीदे काढ़ने लगा. दरअसल वह किसी भी तरह रेखा के नजदीक जाना चाहता था. दिलफेंक संतोष जानता था कि लड़कियों को अपनी तारीफ अच्छी लगती है. इसीलिए वह उस की तारीफ कर के उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहा था. दरअसल वह किसी भी तरह रेखा को पाने के सपने देखने लगा था और किसी भी तरह अपने उसी सपने को पूरा करने का तानाबाना बुन रहा था. रमेश, दिनेश और संतोष जब भी मिलते, रेखा की शादी को ले कर चर्चा जरूर होती. ऐसे में ही एक दिन दिनेश और संतोष ने रमेश की रायबरेली के रहने वाले अपने रिश्तेदार चंद्रपाल से बात भी कराई. इस के बाद संतोष ने कहा, ‘‘मामा, आप चिंता न करें. अगले सप्ताह मैं आ रहा हूं. अपने साथ आप की होने वाली बहू को भी ले आऊंगा. आप लोग उसे अपने घर रख कर कायदे से देख लीजिएगा.’’

चंद्रपाल अपने बेटे रामकुमार के लिए लड़की तलाश ही रहा था. संतोष और दिनेश ने इस रिश्ते की बात की तो उस ने हामी भर दी. संतोष रमेश का विश्वस्त था. उस ने जब रेखा को दिखाने के लिए उसे अपने साथ रायबरेली स्थित अपने गांव ले जाने की बात की तो वह इनकार नहीं कर सका. दिसंबर, 2012 के आखिरी सप्ताह में संतोष रेखा को साथ ले कर अपने गांव जाने के लिए रवाना हुआ. रास्ते में उस ने रेखा को अकेली पा कर उस से खूब प्यारभरी बातें कीं. बहाने से उस के संवेदनशील अंगों को भी छुआ. लेकिन रेखा सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनी रही. इस से संतोष की हिम्मत बढ़ गई. घर जा कर उस ने रेखा को अपनी पत्नी रमा और 3 साल की बेटी सुमन से मिलवाया. संतोष ने रमा को बताया कि रेखा को वह बेलहिया के रहने वाले मामा के बेटे रामकुमार से शादी कराने के लिए लाया है.

रमा को इस में क्या परेशानी हो सकती थी. उस ने रेखा की खूब आवभगत की. लेकिन घर मे रहते हुए रेखा और संतोष एकदूसरे से कुछ ज्यादा ही खुल गए. एक दिन मौका मिलने पर संतोष ने रेखा को बांहों में भर लिया. थोड़ी नानुकुर के बाद रेखा ने भी स्वयं को उसे समर्पित कर दिया. इस के बाद जब भी मौका मिलता, संतोष और रेखा अपनी इच्छा पूरी करते. संतोष और रेखा मिलते तो थे सब की नजरें बचा कर, लेकिन उन के हावभाव से रमा को उन पर शक हो गया. इस की एक वजह यह थी कि रमा को अपने पति की फितरत पता थी. उस ने रेखा को अपने घर में रखने से मना किया तो संतोष ने उसे अपने मामा चंद्रपाल के यहां बेलहिया पहुंचा दिया. अपनी होने वाली ससुराल देख कर और होने वाले पति से मिल कर रेखा खुश थी. संतोष ने वहां पहुंच कर चंद्रपाल से कहा था,

‘‘मामा, तुम्हारी होने वाली बहू ले आया हूं. कुछ दिन रख कर देख लो. मैं 10 दिन बाद अंबाला जाऊंगा, तब इसे साथ ले जाऊंगा.’’

चंद्रपाल ने रेखा को अपने घर में रख लिया. रामकुमार अपनी होने वाली पत्नी से बातचीत तो करता था, लेकिन संतोष की तरह कभी उस के नजदीक जाने की कोशिश नहीं की थी. वह सोचता था कि जो काम शादी के बाद होता है, उसे शादी के बाद ही होना चाहिए. रेखा को मामा के यहां छोड़ कर संतोष अपने घर तो लौट गया, लेकिन जल्दी ही उसे रेखा की याद सताने लगी. 2-3 दिन तो उस ने किसी तरह बिताए, लेकिन जब उस से नहीं रहा गया तो वह मामा के घर आ गया. रेखा चंद्रपाल के यहां घर के अंदर वाले कमरे में लेटती थी, जबकि रामकुमार अपनी मां जनकदुलारी के साथ वाले कमरे में सोता था. संतोष के सोने की व्यवस्था रामकुमार वाले कमरे में की गई थी.

रात में जब संतोष को लगा कि रामकुमार सो गया है तो वह चुपके से उठा और रेखा के कमरे में जा पहुंचा. रेखा ने उसे मना किया तो उस ने कहा, ‘‘यहां सभी घोड़े बेच कर सो रहे हैं, इसलिए चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. तुम्हें पता होना चाहिए कि इतनी दूर मैं सिर्फ तुम से मिलने आया हूं.’’

रेखा मान गई तो संतोष उस के साथ शारीरिक संबंध बनाने लगा. इसी बीच अचानक रामकुमार की आंख खुल गई तो उसे रेखा के कमरे में फुसफुसाने की आवाज सुनाई दी. उस ने संतोष का बिस्तर टटोला तो वह गायब था. रामकुमार सारा माजरा समझ गया, वह उठ कर सीधे रेखा के कमरे में जा पहुंचा. उस ने वहां जो देखा, उसे देख कर उसे गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन उस ने उस गुस्से को जब्त कर के सिर्फ इतना ही कहा, ‘‘तुम लोगों पर भरोसा कर के मैं ने शादी के लिए हामी भर दी थी. लेकिन यह सब देख कर मेरा इरादा बदल गया है. निश्चिंत रहो, मैं यह बात किसी से नहीं बताऊंगा. तुम लोग चुपचाप अपने घर चले जाना.’’

उन दोनों को चेतावनी दे कर रामकुमार अपने बिस्तर पर आ कर लेट गया. रामकुमार की इस धमकी से रेखा और संतोष सन्न रह गए. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें. पलभर सोचविचार कर के रेखा बोली, ‘‘तुम शादीशुदा हो, इसलिए मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती. चिंता की बात यह है कि अंबाला लौट कर हम भैयाभाभी को क्या जवाब देंगे कि रामकुमार शादी क्यों नहीं करना चाहता? अगर रामकुमार ने यह बात सब को बता दी तो हम किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे.’’

सुन कर संतोष परेशान हो उठा. वह कुछ सोच कर बोला, ‘‘अगर रामकुमार न रहे तो किसी को पता ही नहीं चलेगा कि रात में क्या हुआ था. इस का हल अब यही है कि उसे खत्म कर दें. इस से सारा झंझट ही खत्म हो जाएगा.’’

‘‘मार तो देंगे, लेकिन उस की लाश का क्या करेंगे?’’ रेखा ने चिंता जाहिर की तो संतोष बोला, ‘‘उस की चिंता करने की जरूरत नहीं है. मैं ने इस बारे में भी सोच लिया है.’’

उस समय रात के करीब 12 बज रहे थे. रेखा और संतोष दबे पांव रामकुमार के कमरे में पहुंचे. तब तक वह सो गया था. संतोष ने रेखा का दुपट्टा ले कर फुर्ती से रामकुमार के गले में डाला और जल्दी से कस दिया. रामकुमार छटपटा कर मर गया. इस के बाद दोनों लाश को उसी कमरे में ले आए, जहां थोड़ी देर पहले रंगरलियां मना रहे थे. उन्होंने तख्त हटा कर वहां 3 फुट गहरा गड्ढा खोदा और उस में लाश डाल कर मिट्टी भर दी. सारा काम निपटा कर संतोष ने कहा,  ‘‘रेखा हमें यहां 3-4 दिन रुकना पड़ेगा. अन्यथा लोग हम पर शंका करेंगे. जब मामला शांत हो जाएगा, उस के बाद अंबाला चले जाएंगे.’’

‘‘लेकिन लाश से बदबू आने लगेगी तो हमारा राज खुल जाएगा.’’ रेखा ने आशंका व्यक्त की.

‘‘तुम बेकार ही परेशान हो रही हो. आज मुझे किसी ने यहां आते देखा तो है नहीं. केवल रामकुमार जानता था, वह रहा नहीं. कल मैं 5-6 किलो नमक ले आऊंगा. उसे डाल देंगे तो लाश गल जाएगी और बदबू नहीं आएगी.’’ कह कर संतोष रात में ही अपने गांव चला गया. सुबह किसी ने रामकुमार की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. लेकिन जैसेजैसे समय बीता, उस की तलाश शुरू हुई. शाम होतेहोते पूरे गांव में खबर फैल गई कि रामकुमार गायब है. रेखा भी घर वालों के साथ रामकुमार की तलाश में लगी थी.

चंद्रपाल ने संतोष को रामकुमार के गायब होने की बात बताई तो वह भी उस की तलाश के बहाने बेलहिया आ गया. जब सब सो गए तो वह रेखा के कमरे में गया और रामकुमार की लाश पर पड़ी मिट्टी हटा कर अपने साथ लाया नमक उस पर डाल कर ठीक से मिट्टी फैला कर गड्ढा बंद कर दिया. इस के बाद उस के ऊपर तख्त डाल दिया. उस कमरे में अंधेरा रहता था, इसलिए किसी का भी इस ओर ध्यान नहीं गया कि वहां गड्ढा खोदा गया है. घर में अब रामकुमार की मां जनकदुलारी ही रह गई थी. ऐसे में उन्हें किसी का डर नहीं था. इसलिए संतोष रामकुमार की लाश के ऊपर पड़े तख्त पर रेखा के साथ हर रात रंगरलियां मनाने लगा. चूंकि उन्हें इस के बाद इस तरह का मौका फिर मिलने वाला नहीं था. इसलिए इस का वे भरपूर लाभ उठा रहे थे.

रामकुमार का जब कई दिनों तक पता नहीं चला तो चंद्रपाल ने थाना भदोखर में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. पुलिस ने भी 2-4 दिनों तक राजकुमार को इधरउधर खोजा. जब उस के बारे में कुछ पता नहीं चला तो पुलिस भी सुस्त पड़ गई. अब तक सभी को यकीन हो गया था कि रामकुमार घर छोड़ कर कहीं चला गया है. उधर जब संतोष को पूरा यकीन हो गया कि गांव और घर वालों ने रामकुमार को लापता मान लिया है तो वह रेखा को ले कर वापस अंबाला चला गया. वहां उस ने रामकुमार के गायब होने की बात बता कर रेखा और रामकुमार की शादी वाली बात खत्म कर दी.

बाद में संतोष को रेखा से भी डर लगने लगा कि कहीं वह किसी से सच्चाई न बता दे. इस से बचने के लिए उस ने रेखा की शादी भोपाल के कटरा सुल्तान के रहने वाले रामगोपाल यादव से करा दी. रामगोपाल उसी के साथ नौकरी करता था. इस के बाद संतोष निश्चिंत हो गया, क्योंकि उस ने फंसने के सारे रास्ते साफ कर दिए थे. वह समयसमय पर फोन कर के रामकुमार के पिता चंद्रपाल से उस का हालचाल लेता रहता था. लेकिन रामकुमार की लाश मिली तो पुलिस ने चंद्रपाल से विस्तार से पूछताछ की. उस ने उस रात घर में रेखा और संतोष के होने की बात बता कर उन के बारे में भी सारी बातें बता दी थीं.

पुलिस को रेखा और संतोष पर संदेह हुआ तो अंबाला जा कर दोनों को पकड़ लिया. पहले तो वे आनाकानी करते रहे, लेकिन पुलिस ने अंतत: सच्चाई उगलवा ही ली. रेखा और संतोष ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया तो थाना भदोखर पुलिस ने दोनों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर उन्हें अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है.

Family Crime : साली ने किया अपने जीजे का कत्ल

Family  Crime : काजल उत्तराखंड के जिला हरिद्वार की कोतवाली लक्सर के गांव कलसिया के रहने वाले वीर सिंह की बेटी थी. 9 जून, 2014 को उस की शादी थी. शादी की वजह से घर में खूब गहमागहमी थी. बारात आने में ज्यादा समय नहीं रह गया था, इसलिए लगभग सारे नातेरिश्तेदार और दोस्तपरिचित वीर सिंह के घर इकट्ठा हो  गए थे. उसी बीच जब काजल को सजाने के लिए ब्यूटीपार्लर ले जाने की बात चली तो उस ने साफ कहा कि वह सजने के लिए ब्यूटीपार्लर अनिल जीजा के साथ जाएगी.

शादी के माहौल में काजल को ब्यूटीपार्लर ले जाने वाले तमाम लोग थे, लेकिन जब उस ने स्वयं अनिल जीजा के साथ ब्यूटीपार्लर जाने की बात कही थी तो भला कोई दूसरा चलने की बात कैसे करता. नातेरिश्तेदारों तथा घर वालों को लगा कि काजल जीजा से अकेले में कुछ व्यक्तिगत बातें करना चाहती होगी, इसीलिए उस के साथ जाना चाहती है. घर में भीड़भाड़ थी, कुछ औरतों ने हंसी भी की, लेकिन किसी बात पर ध्यान दिए बगैर काजल ब्यूटीपार्लर जाने के लिए जीजा के साथ निकल पड़ी.

इधर अनिल और काजल निकले, उधर बारात आ गई. सभी बारात के स्वागत में लग गए. घर वाले जरूरी रस्में पूरी करने लगे तो बराती नाश्ते और खाने में जुट गए. द्वारपूजा की तैयारी हो रही थी कि तभी वीर सिंह के मोबाइल फोन की घंटी बजी. उन्होंने जेब से मोबाइल निकाल कर स्क्रीन पर नंबर देखा तो फोन काजल का था. उन्होंने जल्दी से फोन रिसीव कर के मोबाइल कान से लगाया, ‘‘हां बोलो बेटा, क्या बात है?’’

‘‘पापा, बड़ी गड़बड़ हो गई, बदमाशों ने अनिल जीजा को गोली मार दी है.’’ काजल ने कहा.

यह सुन कर वीर सिंह सन्न रह गया. उस ने घबरा कर पूछा, ‘‘कहां…?’’

‘‘सैदाबाद के पास.’’ दूसरी ओर से काजल ने कहा.

इस के बाद वीर सिंह ने जैसे ही फोन काटा, आसपास खड़े लोग उस की ओर सवालिया नजरों से ताकने लगे. क्योंकि फोन पर बातचीत के दौरान उस के चहरे पर जो भाव आए थे, उसी से उन लोगों ने अंदाजा लगा लिया था कि कहीं कुछ गड़बड़ हुई है. वीर सिंह के सामने बड़ी विषम परिस्थिति थी. जो कुछ हुआ था, उसे बताने पर उस की सारी तैयारी, सारे खर्च पर पानी फिर जाने वाला था. जबकि बताना भी जरूरी था. इसलिए उस ने सिर थाम कर बैठते हुए कहा, ‘‘काजल का फोन था, लक्सर जाते समय सैदाबाद के पास बदमाशों ने अनिल को गोली मार दी है.’’

वीर सिंह का इतना कहना था कि वहां खड़े लोग सन्न रहे. घर में कोहराम मच गया. पल भर में ही यह बात घर से ले कर जहां बारात ठहरी थी, वहां तक पहुंच गई. बैंड बाजा बज रहा था, डीजे पर लोग डांस कर रहे थे, सब बंद हो गया. चारों ओर खुसुरफुसुर होने लगी कि अब क्या होगा. वीर सिंह अपने खास रिश्तेदारों तथा घर वालों के साथ घटनास्थल की ओर भागा. काजल वहां गांव के ही सुभाष के साथ घायल अनिल को अस्पताल ले जाने की कोशिश कर रही थी. सभी लोग गाडि़यों से आए थे, इसलिए जल्दी से अनिल को उठा कर गाड़ी में डाला और लक्सर स्थित सरकारी अस्पताल में गए, जहां जांच के बाद डाक्टरों ने बताया कि यह मर चुका है.

अस्पताल से ही इस घटना की सूचना कोतवाली लक्सर पुलिस को दे दी गई थी. अब तक काफी रात हो चुकी थी. जिस समय इस घटना की सूचना कोतवाली लक्सर को दी गई थी, उस समय कोतवाली प्रभारी भुवनेश कुमार शर्मा गश्त पर थे. उस समय थाने में सीनियर सबइंसपेक्टर प्रशांत बहुगुणा मौजूद थे. उन्होंने तत्काल इस घटना की सूचना कोतवाली प्रभारी भुवनेश कुमार शर्मा को देने के साथ एसएसपी डा. सदानंद दाते, एसपी (देहात) अजय सिंह तथा क्षेत्राधिकारी जी.बी. पांडेय को दे दी.

पुलिस अधिकारियों को घटना की सूचना दे कर एसएसआई प्रशांत बहुगुणा थाने से कुछ सिपाहियों को साथ ले कर सरकारी अस्पताल पहुंच गए. वह लाश का निरीक्षण कर  रहे थे कि कोतवाली प्रभारी भुवनेश कुमार शर्मा और क्षेत्राधिकारी जी.बी. पांडेय भी आ गए. इस के बाद सभी पुलिस अधिकारियों ने लाश का निरीक्षण किया. मृतक की उम्र 30-35 साल रही होगी. उस के सीने में गोली मारी गई थी. घाव देख कर ही लग रहा था कि गोली एकदम करीब से मारी गई थी.

अस्पताल में मृतक अनिल की ससुराल वालों के अलावा तमाम नातेरिश्तेदार तथा गांव वाले इकट्ठा थे. सभी को इस बात पर गुस्सा था कि हंसीखुशी के मौके पर बदमाशों ने ऐसा काम कर दिया कि सारी खुशियों पर तो पानी फिर गया. एक बेटी की जिंदगी बरबाद हो गई और दूसरी के भविष्य पर सवालिया निशान लग गया. अनिल की ससुराल वालों का रोरो कर बुरा हाल था. उस की पत्नी ममतेश तो सिर पटकपटक कर रो रही थी. माहौल बड़ा गमगीन था, फिर भी पुलिस को अपनी काररवाई तो करनी ही थी. अब तक एसएसपी डा. सदानंद दाते और एसपी (देहात) अजय सिंह भी आ गए थे. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में कोतवाली प्रभारी भुवनेश कुमार शर्मा ने अनिल की लाश को कब्जे में ले कर पंचनामा की सारी काररवाई पूरी कर के उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

इस के बाद पुलिस ने घटनास्थल का भी निरीक्षण किया. अनिल को जिस जगह गोली मारी गई थी, वहां उस के शरीर से निकला खून सूख चुका था. सारी स्थितियों से अंदाजा लगाया गया कि अनिल मोटरसाइकिल से उतर कर खड़ा था, तभी उसे गोली मारी गई थी. जिस तरह हत्या की गई थी, उस से यही लगता था कि अनिल की रंजिशन हत्या की गई थी. गोली सामने से मारी गई थी तो क्या अनिल सामने से आने वाले अपने दुश्मनों को पहचान नहीं पाया था. पुलिस ने घटनास्थल से वह तमंचा भी बरामद कर लिया था, जिस से इस वारदात को अंजाम दिया गया था.

सारी बातों को ध्यान में रख कर पुलिस अधिकारियों ने जब घटना के बारे में मृतक की ससुराल वालों से पूछताछ की तो पता चला कि मृतक अनिल अपनी साली काजल, जिस की शादी थी, उस का मेकअप कराने अपनी मोटरसाइकिल से लक्सर जा रहा था. वह रायसी-लक्सर रोड पर स्थित गांव सैदाबाद के पास पहुंचा तो काजल ने उसे लघुशंका के लिए रोक लिया. वह सड़क के किनारे लघुशंका करने लगा तो काजल भी थोड़ी दूर स्थित झाडि़यों में लघुशंका के लिए चली गई. काजल लघुशंका कर रही थी कि तभी उसे गोली चलने और अनिल के चीखने की आवाज सुनाई दी. वह जल्दी से उठी. पलट कर देखा तो अनिल जमीन पर पड़ा तड़प रहा था. उस ने इधरउधर देखा तो थोड़ी दूर पर मोटरसाइकिल से 2 लोग लक्सर की ओर जाते दिखाई दिए. शायद उन्हीं लोगों ने अनिल को गोली मारी थी.

काजल भाग कर अनिल के पास पहुंची. वह अकेली तो कुछ कर नहीं सकती थी. तभी संयोग से उस के गांव का सुभाष आ गया. उस ने सुभाष से अपने पिता को फोन कराया. थोड़ी देर बाद सभी लोग आ गए तो अनिल अस्पताल पहुंचाया गया, जहां पता चला कि वह मर चुका है. इस पूछताछ से जब पुलिस को पता चला कि घटना के समय मृतक की साली साथ थी तो पुलिस को लगा कि काजल से पूछताछ में हत्यारों का जरूर कोई सुराग मिल सकता है. इस के बाद पुलिस ने काजल से पूछताछ की. उस ने भी वही सब बताया, जो उस के पिता वीर सिंह बता चुके थे.

क्योंकि वीर सिंह को उसी ने यह सब बताया था. अंत में जब उस ने कहा कि हत्यारे जीजाजी के सीने में गोली मार कर तमंचा वहीं फेंक कर भाग गए थे तो पुलिस को थोड़ा हैरानी हुई कि हत्यारे जब मोटरसाइकिल से आए थे और मोटरसाइकिल से चढ़ेचढ़े ही गोली मारी थी तो उन्होंने तमंचा वहां क्यों फेंक दिया था. इस के बाद जब काजल से पूछा गया कि उस ने बदमाशों को देखा था, वे किस रंग की कौन सी मोटरसाइकिल से थे? तो वह पुलिस के इन सवालों पर हकबका सी गई. फिर खुद को संयत करते हुए उस ने बताया था कि उस के बाहर आतेआते बदमाश इतनी दूर निकल गए थे कि वह न तो बदमाशों को देख पाई थी और न उन की मोटरसाइकिल को.

पुलिस ने काजल को बहुत कुरेदा, लेकिन उस से उन्हें मतलब की कोई जानकारी नहीं मिली. लेकिन इस बातचीत में पुलिस को यह आभास जरूर हो गया कि काजल को जीजा की हत्या के बाद जिस तरह दुखी और परेशान होना चाहिए, वैसा दुख और परेशानी न तो उस के चेहरे पर दिखाई दे रही है न बातचीत में. वह इस तरह बातचीत कर रही थी, जैसे हत्या उस के अपने सगे जीजा की न हो कर गांव के किसी आदमी की हुई है. बहरहाल, उस समय ऐसा माहौल था कि इस तरह की कोई बात नहीं की जा सकती थी. वैसे भी वहां इकट्ठा लोगों का मूड ठीक नहीं लग रहा था. मृतक अनिल की पत्नी की हालत ऐसी थी कि उस समय उस से पूछताछ नहीं की जा सकती थी. घटना की सूचना अनिल के घर वालों को भी दे दी गई थी. इस स्थिति में शादी होने का सवाल ही नहीं उठता था, इसलिए बारात बिना शादी के ही लौट गई थी.

अनिल की हत्या की सूचना पा कर उस का छोटा भाई सुनील आ गया था. अगले दिन उसी की ओर से अनिल की हत्या का मुकदमा कोतवाली लक्सर में अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. एसएसपी डा. सदानंद दाते ने इस मामले की जांच कोतवाली प्रभारी भुवनेश कुमार शर्मा को सौंपते हुए क्षेत्राधिकारी जी.बी. पांडेय को इस मामले पर नजर रखने का आदेश दिया. पुलिस को संदेह ही नहीं, पूरा विश्वास था कि अनिल की हत्या रंजिश की वजह से की गई थी. उस की किस आदमी से ऐसी रंजिश थी, जो उस की हत्या कर सकता था? यह बात घर वाले ही बता सकते थे. भाई सुनील से पूछा गया तो वह इस बारे में पुलिस की कोई मदद नहीं कर सका. क्योंकि वह गांव में रहता था, जबकि अनिल हरिद्वार में रहता था.

पत्नी ममतेश अभी इस स्थिति में नहीं थी कि उस से पूछताछ की जा सकती. बहरहाल अगले दिन पोस्टमार्टम के बाद शव घर वालों को मिला तो उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार अनिल को गोली एकदम करीब से मारी गई थी, जो तिरछी लगी थी. पुलिस को काजल पर संदेह था, इसलिए उस के बारे में पता करने के लिए मुखबिरों को तो लगाया ही गया, उस के घर के सभी फोन नंबरों को भी सर्विलांस पर लगवा दिया गया कि शायद उन की आपसी बातचीत से हत्यारे के बारे में कोई जानकारी मिल सके. इस के अलावा काजल और उस के घर वालों के बारे में जानकारी जुटाने के लिए पुलिस ने ग्रामप्रधान विनोद चौधरी से भी पूछताछ की.

अनिल के घर वालों ने पुलिस को बताया था कि उन्हें उस के ऐसे दुश्मन के बारे में कोई जानकारी नहीं है, जो उस की हत्या कर सकता था. लेकिन जब इस बारे में ममतेश से पूछा गया तो उस ने कहा कि और कोई भले न जानता हो, लेकिन काजल को हत्यारों के बारे में जरूर पता होगा. पुलिस को तो काजल पर पहले से ही संदेह था, ममतेश की इस बात ने पुलिस के संदेह को और बढ़ा दिया. 18 जून, 2014 को मृतक अनिल की पत्नी ममतेश क्षेत्राधिकारी जी.बी. पांडेय से मिली और उस ने उन से साफसाफ कहा कि उस के पति की हत्या में उस के मायके वालों की अहम भूमिका हो सकती है. उन्हीं लोगों ने साजिश रच कर हत्या की है. अगर उन लोगों से सख्ती से पूछताछ की जाए तो निश्चित इस हत्याकांड से परदा उठ सकता है.

क्षेत्राधिकारी ने ममतेश से वजह पूछी कि उस के मायके वाले उस के पति की हत्या क्यों करेंगे तो उस ने बताया कि उस की मंझली बहन मीना की आत्महत्या के बाद से उस के मायके वाले उस के पति से रंजिश रखने लगे थे. उसी की वजह से करीब 4 साल तक आनाजाना बंद रहा. इस साल काजल की शादी तय हुई तो आनाजाना शुरू हुआ. इस के अलावा मुखबिरों से पुलिस को जो सूचनाएं मिली थीं, वे भी अनिल की ससुराल वालों को हत्यारा बता रही थीं. ये सारी बातें काजल और उस के पिता वीर सिंह को थाने बुला कर पुलिस को पूछताछ करने के लिए मजबूर कर रही थीं. जब सारी बातें एसएसपी डा. सदानंद दाते को बताई गईं तो उन्होंने काजल और वीर सिंह को थाने ला कर सख्ती से पूछताछ करने का आदेश दिया.

इस के बाद कोतवाली प्रभारी भुवनेश कुमार शर्मा एसएसआई प्रशांत बहुगुणा और कुछ सिपाहियों के साथ वीर सिंह के घर पहुंचे और बापबेटी को पकड़ कर थाने ले आए. थाने में काजल और वीर सिंह से पूछताछ शुरू हुई. दोनों वही बातें दोहराते रहे, जो उन्होंने पुलिस को पहले बताई थीं. लेकिन अब उन बातों पर पुलिस को विश्वास नहीं था, इसलिए पुलिस उन से सच उगलवाना चाहती थी, जबकि बापबेटी सच बोलने को राजी नहीं थे. क्षेत्राधिकारी जी.बी. पांडेय ने देखा कि ये सीधे सच बताने को तैयार नहीं हैं तो उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘तुम दोनों को ही पता होना चाहिए कि कानून और पुलिस, दोनों के ही हाथ बहुत लंबे होते हैं. इसलिए इन से कोई भी अपराधी नहीं बच सकता.

अपने सूत्रों से मुझे पता चल गया है कि अनिल की हत्या तुम्हीं लोगों ने की है. अब तुम लोग सच्चाई अपने आप बता दो तो अच्छा रहेगा, वरना हम अपनी तरह से उगलवाएंगे तो तुम दोनों को बहुत परेशानी होगी.’’

वीर सिंह और काजल कोई पेशेवर अपराधी तो थे नहीं. उन्होंने भले ही पुलिस की मार नहीं देखी थी, लेकिन फिल्मों और सीरियलों में तो देखा ही था. इस के अलावा पुलिस की थर्ड डिग्री के तमाम किस्से भी सुन रखे थे. जब उन्होंने देखा कि अब पुलिस का रुख कड़ा हो रहा है तो बापबेटी, दोनों ही फफकफफक कर रो पड़े. उन दोनों के रोते ही क्षेत्राधिकारी समझ गए कि अब उन का काम हो गया है. ये दोनों अब अपना अपराध स्वीकार कर लेंगे. इसलिए पुलिस ने उन्हें रोने दिया, जिस से मन हलका हो जाए.

और सचमुच रो कर मन हलका हो गया तो काजल और वीर सिंह ने अनिल की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. काजल ने बताया कि उसी ने अनिल की गोली मार कर हत्या की थी. यह हत्या उस ने अपनी बहन की मौत का बदला लेने के लिए की थी. इस के बाद वीर सिंह और काजल ने अनिल की हत्या के पीछे की जो कहानी सुनाई, वह कुछ इस प्रकार थी. उत्तराखंड के जिला हरिद्वार की कोतवाली लक्सर के गांव कलसिया के रहने वाले वीर सिंह अपनी 3 बेटियों में बड़ी बेटी ममतेश की शादी मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के थाना मंडावर के गांव फतेहपुर के रहने वाले चंद्रपाल के बेटे अनिल के साथ की थी. अनिल हरिद्वार में हर की पौड़ी में फोटोग्राफी करता था. उस का जमाजमाया काम था, इसलिए शादी के बाद ममतेश को भी वहीं ले आया. यह करीब 10 साल पहले की बात है.

ममतेश से छोटी थी मीना, जो उन दिनों इंटर में पढ़ रही थी. इंटर पास करने के बाद वह बीए करना चाहती थी. इस के लिए मांबाप से अनुमति ले कर उस ने हरिद्वार के डिग्री कालेज में दाखिला ले लिया. घर से रोजना हरिद्वार जा कर पढ़ाई करना संभव नहीं था, इसलिए पढ़ाई के लिए उस ने हरिद्वार में ही रहने का फैसला किया. वहां उस की बहन और बहनोई रहते ही थे, इसलिए उसे वहां रहने में कोई दिक्कत नहीं थी. मीना बहन ममतेश के घर साथ रह कर बीए की पढ़ाई करने लगी. उस का बीए का अंतिम साल था. अब तक मीना पूरी तरह जवान हो चुकी थी. खूबसूरत वह थी ही. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि अचानक एक दिन वीर सिंह को सूचना मिली की मीना ने आत्महत्या कर ली है.

वीर सिंह कुछ खास लोगों के साथ हरिद्वार पहुंचा और बेटी का शव चुपचाप ले कर गांव आ गया. उस ने सोचा कि शोरशराबा करने पर बात पुलिस तक पहुंचेगी तो परेशानी भी बढ़ जाएगी और इज्जत का भी तमाशा बनेगा. इसलिए उस ने वहां किसी से कोई बात तक नहीं की. घर लाने के बाद उस ने शव देखा तो उसे कहानी कुछ और ही लगी. उसे मीना के शरीर पर चोट और खरोंच के निशान दिखाई दिए. वीर सिंह बेवकूफ नहीं था कि चोट और खरोंच के निशानों का मतलब न समझता. सब कुछ जानसमझ कर भी वह इज्जत की खातिर चुप रहा कि अगर बात खुलेगी तो उसी की बदनामी होगी और गांव वाले उसी की हंसी उड़ाएंगे. यह 4 साल पहले की बात है.

उस समय वीर सिंह भले ही चुप रह गया था, लेकिन उसे दामाद से ही नहीं, बेटी से भी नफरत हो गई थी. क्योंकि उस ने स्वार्थ के लिए पति का साथ दिया था. स्थितियां बता रही थीं कि मीना ने ऐसे आत्महत्या नहीं की थी, उसे इस के लिए इस तरह मजबूर कर दिया गया था कि उस ने खुद को जीने लायक नहीं समझा था और इस सब में उस की बेटी का भी हाथ था. वीर सिंह का सोचना था कि अनिल तो पराया था, लेकिन ममतेश तो उस की अपनी थी. वह पति के प्यार में इस तरह अंधी हो गई थी कि उस ने मांबाप की इज्जत का भी नहीं खयाल किया. उस बहन के बारे में भी नहीं सोचा, जिस को उस ने बचपन में खेलायाकुदाया था. यही सब सोचसोच कर उन्हें दामाद से ही नहीं, बेटी से भी नफरत हो गई और उन्होंने बेटीदामाद से संबंध तो तोड़ ही लिए, यह भी तय कर लिया कि वह मीना की मौत का बदला जरूर लेगा.

समय धीरेधीरे बीतता रहा. समय बीतने के साथ वीर सिंह के मन में बेटी और दामाद के लिए जो नफरत थी, वह कम होने के बजाय बढ़ती गई. मीना से छोटी काजल भी समझदार हो गई थी. कभीकभार घर में मीना की चर्चा होती तो घर वालों को गुस्सा होते देख काजल को भी बहनबहनोई पर गुस्सा आता कि उन्होंने उस के मांबाप की इज्जत का जरा भी खयाल नहीं किया. यही नहीं, उन्हीं की वजह से उस की बहन को मौत को गले लगाना पड़ा. घर वालों की बातें सुनसुन कर काजल को भी बहनबहनोई से नफरत हो गई थी और वह भी बहन की मौत का बदला लेने के बारे में सोचने लगी. इस साल उस की शादी तय हुई तो उसने वीर सिंह से कहा कि उस की शादी में जीजा और बहन को भी बुलाएं. वीर सिंह इस के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन काजल ने जब उन्हें मन की बात बताई तो वह अनिल और ममता को बुलाने को तैयार हो गए. यह कीरब 4 महीने पहले की बात है.

काजल के कहने पर वीर सिंह हरिद्वार स्थित ममतेश के घर गए और उसे घर आने को कहा. इस के बाद अनिल और ममतेश कलसिया आनेजाने लगे. संबंध सुधर गए तो काजल की शादी की तैयारी में अनिल और ममतेश ने भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया. 9 जून, 2014 को काजल की शादी थी. शादी में अनिल और ममतेश को भी बुलाया गया था. बहुत दिनों बाद संबंध सुधरे थे, इसलिए शादी में दोनों आए भी थे. शाम को दुल्हन के रूप में सजने के लिए काजल को लक्सर स्थित ब्यूटीपार्लर जाना था. वैसे तो काजल को ले जाने वाले बहुत लोग थे, लेकिन काजल ने जीजा अनिल के साथ जाने की इच्छा व्यक्त की. अनिल भला क्यों मना करता. मना करने की कोई वजह भी नहीं थी. उस का सोचना था कि मन की सारी कड़वाहट धुल चुकी है, इसलिए वह मोटरसाइकिल ले कर तैयार हो गया.

अनिल तैयार हो गया तो काजल ने घर में रखा तमंचा, जिसे वीर सिंह ने मुजफ्फरनगर के अपने एक रिश्तेदार की मदद से खरीदा था, उसे पर्स में रख कर ऊपर से शाल ओढ़ कर अनिल की मोटरसाइकिल पर बैठ गई. अनिल मोटरसाइकिल ले कर सैदाबाद गांव के पास सुनसान जगह पर पहुंचा तो लघुशंका की बात कह कर काजल ने मोटरसाइकिल रुकवा ली. लघुशंका करने के बहाने वह झाडि़यों की ओट में गई और वहां उस ने तमंचे में गोली भरी. अनिल मोटरसाइकिल पर ही बैठा था. काजल झाडि़यों से निकल कर उस के पास आई और तमंचा उस के सीने से सटा कर गोली चला दी. गोली लगते ही अनिल जमीन पर गिर कर छटपटाने लगा. काजल को लगा कि उस का काम हो गया है तो उस ने शोर मचा दिया.

संयोग से उसी समय उस के गांव का सुभाष वहां पहुंच गया. सुभाष की मदद से उस ने घटना की सूचना घर वालों को दी. थोड़ी ही देर में घर वाले भी आ गए. इस के बाद अनिल को अस्पताल पहुंचाया गया, जहां पता चला कि वह मर चुका है. इस के बाद वीर सिंह ने भी माना कि उन्हें अनिल की हत्या की जानकारी ही नहीं थी, बल्कि काजल के साथ वह भी हत्या की इस योजना में शामिल थे. काजल ने बताया कि अनिल की हत्या के लिए शादी वाला दिन उस ने इसलिए चुना था कि कोई भी नहीं सोचेगा कि जिस की शादी के लिए दरवाजे पर बारात आ गई हो, ऐसे समय में हत्या जैसा अपराध करेगी. वह भी अपने सगे बहनोई की हत्या.

काजल ने होशियारी तो बहुत दिखाई, लेकिन बच नहीं सकी. पुलिस ने वह तमंचा पहले ही बरामद कर लिया था, जिस से अनिल की हत्या की गई थी. काजल के बयान के बाद कोतवाली लक्सर पुलिस ने पहले से दर्ज मुकदमे में अज्ञात लोगों की जगह बापबेटी यानी काजल और वीर सिंह का नाम दर्ज कर दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कोतवाली प्रभारी भुवनेश्वर कुमार शर्मा सुभाष की भूमिका की जांच कर रहे हैं कि वह अनिल की हत्या के बाद वहां संयोग से पहुंचा था या उसे पहले से मालूम था. कथा लिखे जाने तक सुभाष के बारे में कुछ पता नहीं चला था. काजल और वीर सिंह जेल में थे.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अपने ही “मासूम” की बलि….

अगर आज ऐसा होता है तो इसका मतलब यह है कि आज भी हम सैकड़ो साल पीछे की जिंदगी जी रहे हैं. जहां अपने अंधविश्वास में आकर बलि चढ़ा दी जाती थी, अपने बच्चों को या किसी मासूम को. बलि चढ़ाना तो अंधविश्वास की पराकाष्ठा ही है.

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में शख्स ने अपने चार वर्षीय बेटे की बेरहमी से गला रेंतकर हत्या कर दी. घटना की वजह अंधविश्वास बताया गया है. शख्स की मानसिक स्थिति कुछ दिनों से ठीक नहीं थी. एक रात उसने परिवारजनों से कहा – “सुनो सुनो! मै किसी की बलि दे दूंगा.”

उसकी बात पर किसी ने तवज्जो नहीं दिया लगा कि यह मानसिक सन्निपात में कुछ का कुछ बोल रहा है.
एक रात उसने चाकू से एक मुर्गे को काटा फिर अपने मासूम बेटे का गला काट दिया. यह उद्वेलित करने वाला मामला शंकरगढ़ थानाक्षेत्र का है. हमारे संवाददाता को पुलिस ने बताया -शंकरगढ़ थानाक्षेत्र अंतर्गत ग्राम महुआडीह निवासी कमलेश नगेशिया (26 वर्ष) दो दिनों से पागलों की तरह हरकत कर रहा था. उसने परिवारजनों के बीच कहा – उसके कानों में अजीब सी आवाज सुनाई दे रही है, उसे किसी की बलि चढ़ाने के लिए कोई बोल रहा है.

एक दिन वह कमलेश चाकू लेकर घूम रहा था एवं उसने परिवारजनों से कहा कि आज वह किसी की बलि लेगा. उसकी मानसिक स्थिति को देखते हुए परिवारजनों ने उसे नजरअंदाज कर दिया था . मगर रात को खाना खाने के बाद कमलेश नगेशिया की पत्नी अपने दोनों बच्चों को लेकर कमरे में सोने चली गई. कमलेश के भाईयों के परिवार बगल के घर में रहते हैं, वे भी रात को सोने चले गए.

देर रात कमलेश ने घर के आंगन में एक मुर्गे का गला काट दिया. फिर कमरे में जाकर वह अपने बड़े बेटे अविनाश (4) को उठाकर आंगन में ले आया. उसने बेरहमी से अपने बेटे अविनाश का चाकू से गला काट दिया. अविनाश की मौके पर ही मौत हो गई. सुबह करीब चार बजे जब कमलेश की पत्नी की नींद खुली तो अविनाश बगल में नहीं मिला. उसने कमलेश से बेटे अविनाश के बारे में पूछा तो उसने पत्नी को बताया कि उसने अविनाश की बलि चढ़ा दी है.

घटना की जानकारी मिलने पर घर में कोहराम मच गया. सूचना पर शंकरगढ़ थाना प्रभारी जितेंद्र सोनी के नेतृत्व में पुलिस टीम मौके पर पहुंची. पुलिस ने आरोपी को हिरासत में ले लिया . बच्चे के शव को पंचनामा पश्चात् पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया . थाना प्रभारी जितेंद्र सोनी ने बताया – परिजनों से पूछताछ कर उनका बयान दर्ज किया गया है. आरोपी दो दिनों से ही अजीब हरकत कर रहा था. पहले वह ठीक था. एक शाम परिवारजनों के सामने उसने किसी की बलि चढ़ाने की बात कही थी, लेकिन परिवारजनों ने उसे गंभीरता से नहीं लिया. मामले में पुलिस ने धारा 302, 201 का अपराध दर्ज किया है. मामले की जांच की जा रही है.

इस घटनाक्रम में परिजनों ने समझदारी से काम लिया होता और इसकी शिकायत पहले ही पुलिस में की होती या फिर उस व्यक्ति को मानसिक चिकित्सालय भेज दिया गया होता तो मासूम बच्चे की जिंदगी बच सकती थी. मासूम की बाली के इस मामले में सबसे अधिक दोषी मां का वह चेहरा भी है जो दोनों बच्चों को लेकर कमरे में सो रही होती है और पति एक बच्चे को उठाकर ले जाता है.

एक पुलिस अधिकारी के मुताबिक गांव देहात में इस तरह की घटनाएं घटित हो जाती है, इसका दोषी जहां परिवार होता है वही आसपास के रहवासी भी दोषी हैं मगर पुलिस सिर्फ एक हत्यारे पर कार्रवाई करके मामले को बंद कर देती है.

कुल मिलाकर के ऐसे घटनाक्रम सिर्फ एक खबर के रूप में समाज के सामने आते है और फिर समाज सुधारक भूल जाते है कुल मिला करके आगे पाठ पीछे सपाट की स्थिति .यह एक बड़ी ही सोचनीय स्थिति है. इस दिशा में अब सरकार के पीछे-पीछे दौड़ने या यह सोचने से की सरकार कुछ करेगी यह अपेक्षा छोड़ कर हमें स्वयं आगे आना होगा ताकि फिर आगे कोई ऐसी घटना घटित ना हो.

बलि और हैवानियत का गंदा खेल

हमारे देश में सैकड़ों सालों से अंधविश्वास चला आ रहा है. दिमाग में कहीं न कहीं यह झूठ घर करा दिया गया है कि अगर गड़ा हुआ पैसा हासिल करना है, तो किसी मासूम की बलि देनी होगी. जबकि हकीकत यह है कि यह एक ऐसा झूठ है, जो न जाने कितनी किताबों में लिखा गया है और अब सोशल मीडिया में भी फैलता चला जा रहा है.

ऐसे में कमअक्ल लोग किसी की जान ले कर रातोंरात अमीर बनना चाहते हैं. मगर पुलिस की पकड़ में आ कर जेल की चक्की पीसते हैं और ऐसा अपराध कर बैठते हैं, जिस की सजा तो मिलनी ही है.

सचाई यह है कि यह विज्ञान का युग है. अंधविश्वास की छाई धुंध को विज्ञान के सहारे साफ किया जा सकता है, मगर फिर अंधविश्वास के चलते एक मासूम बच्चे की जान ले ली गई.

देश के सब से बड़े धार्मिक प्रदेश कहलाने वाले उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में एक तथाकथित तांत्रिक ने2 नौजवानों के साथ मिल कर एक 8 साल के मासूम बच्चे की गला रेत कर हत्या कर दी थी और तंत्रमंत्र का कर्मकांड किया गया था. उस बच्चे की लाश को गड्डा खोद कर छिपा दिया गया था.

ऐसे लोगों को यह लगता है कि अंधविश्वास के चलते किसी की जान ले कर के वे बच जाएंगे और कोई उन्हें पकड़ नहीं सकता, मगर ऐसे लोग पकड़ ही लिए जाते हैं. इस मामले में भी ऐसा ही हुआ.

अंधविश्वास के मारे इन बेवकूफों को लगता है कि ऐसा करने से जंगल में कहीं गड़ा ‘खजाना’ मिल जाएगा, मगर आज भी ऐसे अनपढ़ लोग हैं, जिन्हें लगता है कि जादूटोना, तंत्रमंत्र या कर्मकांड के सहारे गड़ा खजाना मिल सकता है.

समाज विज्ञानी डाक्टर संजय गुप्ता के मुताबिक, आज तकनीक दूरदराज के इलाकों तक पहुंच चुकी है और इस के जरीए ज्यादातर लोगों तक कई भ्रामक जानकारियां पहुंच जाती हैं. मगर जिस विज्ञान और तकनीक के सहारे नासमझी पर पड़े परदे को हटाने में मदद मिल सकती है, उसी के सहारे कुछ लोग अंधविश्वास और लालच में बलि प्रथा जैसे भयावाह कांड कर जाते हैं, जो कमअक्ली और पढ़ाईलिखाई की कमी का नतीजा है.

डाक्टर जीआर पंजवानी के मुताबिक, कोई भी इनसान इंटरनैट पर अपनी दिलचस्पी से जो सामग्री देखतापढ़ता है, उसे उसी से संबंधित चीजें दिखाई देने लगती हैं, फिर पढ़ाईलिखाई की कमी और अंधश्रद्धा के चलते, जिस का मूल लालच है, अंधविश्वास के जाल में लोग उल?ा जाते हैं और अपराध कर बैठते हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता सनद दास दीवान के मुताबिक, अपराध होने पर कानूनी कार्यवाही होगी, मगर इस से पहले हमारा समाज और कानून सोया रहता है, जबकि आदिवासी अंचल में इस तरह की वारदातें होती रहती हैं. लिहाजा, इस के लिए सरकार को सजग हो कर जागरूकता अभियान चलाना चाहिए.

हाईकोर्ट के एडवोकेट बीके शुक्ला ने बताया कि एक मामला उन की निगाह में ऐसा आया था, जिस में एक मासूम की बलि दी गई थी. कोर्ट ने अपराधियों को सजा दी थी.

दरअसल, इस की मूल वजह पैसा हासिल करना होता है. सच तो यह है कि लालच में आ कर पढ़ाईलिखाई की कमी के चलते यह अपराथ हो जाता है.

लोगों को यह सम?ाना चाहिए कि किसी भी अपराध की सजा से वे किसी भी हालत में बच नहीं सकते और सब से बड़ी बात यह है कि ऐसे अपराध करने वालों को समाज को भी बताना चाहिए कि उन के हाथों से ऐसा कांड हो गया और उन्हें कुछ भी नहीं मिला, उन के हाथ खाली के खाली रह गए.

Crime: सोशल मीडिया : महिलाएं और झूठ के धंधे का फंदा

Crime in Hindi: आज देश में शहर से गांव गलियों तक विस्तारित सोशल मीडिया के चंगुल में महिलाएं किस तरह फंस रही हैं. यह एक सोचनीय विषय बनकर हमारे सामने आ रहा है, देश में जाने कितनी ऐसी घटनाएं घटित हो चुकी हैं जिसमें पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं सोशल मीडिया के संजाल में फंस कर अपनी अस्मत, अपने गाढ़ी कमाई के लाखों रूपए दोनों हाथों से लूटा चुकी हैं. आज प्रश्न यही है कि आमतौर पर महिलाएं सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म फेसबुक, व्हाट्सएप आदि पर अपेक्षाकृत अधिक क्यों फंसकर अपना सर्वस्व लुटा रही है. ऐसे क्या कारण है कि महिला फेसबुक में मित्रता करती है और आने वाले समय में बर्बाद हो जाती है. आखिर इस लूट का मनोविज्ञान क्या है?

क्या महिलाएं इसके लिए दोषी हैं… क्या महिलाएं इतनी भोली भाली एवं सहज हैं कि फेसबुक की सामान्य सी मित्रता में अपना सब कुछ दांव पर लगा देती हैं. आज सोचने वाला मसला यही है कि यह भयंकर दानव सदृश्य सोशल मीडिया क्यों और कैसे महिलाओं को अपना ग्रास बना रहा है. इसके लिए महिलाएं कैसे अपनी सुरक्षा करें. जैसा की सर्वविदित है फेसबुक एवं सोशल मीडिया का प्लेटफार्म सभी को अपनी और आकर्षित कर रहा है.

जहां यह मंच अपने आप में एक आकर्षण का विषय है, जहां यह हमें एक नई ऊर्जा प्रदान करता है. वहीं यह भी सच है कि छोटी सी चूक आप को बर्बाद कर सकती है इसी का उदाहरण है महिलाओं का सतत सोशल मीडिया के मंच पर शोषण एवं ठगी का शिकार बनना. आइए, आज इस गंभीर मसले पर एक विमर्श को समझे.

विदेशी ठगों की शिकार महिलाएं

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में फेसबुक के जरिए महिलाओं को फंसाकर ठगी करने वाले विदेशी को पुलिस ने दिल्ली से गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की है. आरोपी ने पार्सल से रकम के साथ जूते, बैग भेजने की बात कहते हुए प्रार्थियों से कुल 5 लाख 10 हजार रुपए की ठगी की थी.प्रार्थिया महिला ने थाना सिविल लाइन में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि अगस्त 2019 में प्रार्थिया की दोस्ती फेसबुक के जरिए एलेक्स एंटोनी नामक व्यक्ति से हुई थी.

इसके बाद से दोनों के बीच बातचीत होती रहती थी. इसी दौरान एलेक्स एंटोनी ने प्रार्थिया को फोन पर कुछ आयटम जैसे- जूते, बैग और कुछ पैसे पार्सल करने की बात कही. इसके बाद पार्सल के क्लियरेंस के नाम पर, एंटी टेरेरिस्ट सर्टिफिकेट के नाम पर और फाइनेंस मिनिस्ट्री में टैक्स देने के नाम पर प्रार्थिया से कुल 5,10,000 की ठगी कर ली थी. इसके बाद भी रकम मांगे जाने पर प्रार्थिया को ठगी का अहसास हुआ. उसने आरोपियों के विरूद्ध थाना सिविल लाइन में अपराध पंजीबद्ध कराया.पुलिस ने धारा 420, 34 भादवि. का अपराध पंजीबद्ध मामले की जांच शुरू की.

जांच के लिए गठित पुलिस की विशेष टीम ने पूर्व में इसी तरह के घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए नाइजीरियन गिरोह पर फोकस किया. आरोपियों एवं प्रार्थिया के मध्य फेसबुक के जिस आईडी व मैसेज तथा मोबाइल नंबरों के माध्यम से बातचीत हुई थी, उसका तकनीकी विश्लेषण करने के बाद आरोपी के लोकेशन का पता लगाया और थाना डाबरी क्षेत्र में निवास करने वाले नाइजीरियन नागरिक आरोपी क्रिस्टोफर को पकड़कर कड़ाई से पूछताछ की, जिसमें उसने प्रार्थिया को अपने झांसे में लेकर प्रलोभन देकर पैसे लेने की बात स्वीकार की. पुलिस ने आरोपियों को जेल भेज दिया है. वहीं यह भी तथ्य है कि छत्तीसगढ़ में ही ऐसी अनेक घटनाएं घटी हैं. हाल ही में राजनांदगांव में में भी एक पुलिस अधिकारी की पत्नी से लगभग 45 लाख रुपए की ठगी की घटना घटित हुई है.

महिला वर्ग: सावधान

फेसबुक सोशल मीडिया के मंच पर महिलाएं जिस कदर ठगी जा रही हैं. यह एक दुश्चिंता का विषय बना हुआ है.अक्सर यह खबरें आ रही हैं कि महिलाओं को फेसबुक पर लुभावने वादे करके ठगा जा रहा है दूसरी तरफ सोशल मीडिया में मित्रता करके महिलाओं के साथ उनके दैहिक शोषण की घटनाओं में भी अचानक वृद्धि हो गई है.

इस संदर्भ में पुलिस अधिकारी इंद्र भूषण सिंह कहते हैं -इसका सहज सरल कारण है महिलाओं का भोलापन, वे मीठी- मीठी बातों में पुरुषों की अपेक्षा जल्दी आ फंसती हैं. उन्होंने इस संदर्भ में सुझाव देते हुए उन्होंने कहा है कि सोशल मीडिया में मित्रता चैटिंग सिर्फ और सिर्फ चिर परिचित लोगों से ही किए जाने पर महिलाएं सुरक्षित रह सकती हैं. अनजान व्यक्तियों से मित्रता उन्हें धोखा देने का पूरा सबब बन सकता है.

झूठ का कारोबार ज्यादा….

राजधानी रायपुर में पदस्थ पुलिस अधिकारी विवेक शर्मा ने इस मसले पर बातचीत करने पर बताया- सोशल मीडिया एक आकर्षक स्थान है जहां महिलाएं युवतियां निरंतर ठगी जा रही है और पुलिस के पास इसकी अनेक शिकायतें आती रहती हैं. अगर महिलाएं इससे बचना चाहें तो इसका सीधा सा सरल तरीका है ऐसे किसी भी मसले पर जब उन्हें आर्थिक प्रलोभन दिया जाता है वह अपने परिजनों से अवश्य चर्चा करें. इस हेतु शासन द्वारा बनाए गए परामर्श केंद्रों से भी महिलाएं परामर्श ले सकती हैं.

सबसे अहम मसला यह है कि फेसबुक को महिलाएं अंतिम सत्य मान लेती है,जबकि यह एक ऐसा प्लेटफार्म है जहां झूठ का कारोबार ज्यादा होता है. महिला थोड़ी भी बुद्धिमानी विवेक से काम ले तो वह इस ठगी से बच सकती है हम आज इस लेख के माध्यम से महिलाओं को आगाह करते हुए कहना चाहते हैं कि किसी भी आर्थिक मसले पर एक बार अवश्य सोचें और अपने आंख कान खुले रखें ऐसी स्थिति में वे कदापि ठगी नहीं जाएंगी.

विकट की वासना का ऐसा था खूनी अंजाम

15 मार्च, 2017 की सुबह गोवा के पणजी से करीब 80 किलोमीटर दूर थाना काणकोण पुलिस को किसी ने सूचना दी कि आगोंद और देववांग स्थित कडेंला के जंगल में एक विदेशी युवती का शव पड़ा है. सूचना मिलते ही थाना काणकोण में ड्यूटी पर तैनात इंसपेक्टर फिलोमेनो कोस्ता कुछ सिपाहियों को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

लाश की स्थिति देख कर ही लग रहा था कि दुष्कर्म के बाद युवती की हत्या की गई है. मृतका के शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था. उस की हत्या भी बड़ी बेरहमी से की गई थी. शिनाख्त न हो सके, इस के लिए हत्यारे ने मृतका का चेहरा किसी नुकीली चीज से बिगाड़ दिया था.

इंसपेक्टर फिलोमेनो कोस्ता ने इस घटना की जानकारी अधिकारियों को दे दी थी. यही वजह थी कि वह लाश और घटनास्थल का निरीक्षण कर के लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश कर रहे थे, तभी गोवा के पुलिस उपायुक्त संभी नावरिश के साथ थाना काणकोण के थानाप्रभारी उत्तम राऊत और देसाई भी फोरैंसिक टीम के साथ पहुंच गए. फोरैंसिक टीम का काम निपट गया तो सभी ने एक बार फिर घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया.

घटनास्थल पर बीयर की एक टूटी बोतल के अलावा ऐसी कोई भी चीज नहीं मिली थी, जिस से मृतका या हत्यारे के बारे में कुछ पता चलता. उस टूटी हुई बीयर की बोतल में खून लगा था, इस से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि युवती की हत्या करने के बाद इसी बोतल से उस का चेहरा बिगाड़ा गया था.

घटनास्थल की सारी औपचारिकताएं पूरी कर के पुलिस लाश को पोस्टमार्टम के लिए गोवा स्थित मैडिकल कालेज भिजवा दिया गया.

घटनास्थल की काररवाई निपटाने के बाद थाने लौट कर पुलिस ने विदेशी युवती की हत्या का मामला दर्ज कर लिया और हत्यारे तक पहुंचने के बारे में विचार करने लगी. लेकिन हत्यारे तक तभी पहुंचा जा सकता था, जब उस युवती के बारे में कुछ पता चलता.

विदेशी युवती की लाश का पोस्टमार्टम 2 डाक्टरों के पैनल ने किया. पुलिस का अनुमान था कि मृतका की हत्या और उस के साथ की गई जबरदस्ती में एक से अधिक लोग शामिल रहे होंगे. लेकिन पुलिस का यह अनुमान गलत निकला, क्योंकि पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों और फोरैंसिक टीम की रिपोर्ट के अनुसार, दुष्कर्म और हत्या एक ही आदमी ने की थी. लेकिन वह क्रूरता की सारी हदें पार कर गया था.

विदेशी युवती की हत्या का मामला था, इसलिए पुलिस ने इस मामले को काफी गंभीरता से ही नहीं लिया, बल्कि मामले की जांच में तेजी से जुट भी गई. इस मामले पर पुलिस उपायुक्त संभी नावरिश नजर ही नहीं रखे हुए थे, बल्कि जांच की बागडोर भी खुद ही संभाले हुए थे. उन्होंने थानाप्रभारी उत्तम राऊत और अन्य अधिकारियों के साथ बैठक कर जांच की रूपरेखा तैयार की और सभी को विदेशी युवती के बारे में पता लगाने के लिए लगा दिया.

संयोग से युवती के बारे में पता चलने में ज्यादा देर नहीं लगी. पुलिस वालों ने जब समुद्र किनारे आनंद ले रहे विदेशी पर्यटकों से लाश की फोटो दिखा कर पूछताछ की तो कलाई पर बने टैटू को देख कर उस के दोस्तों ने उस की पहचान डेनियल मैकलागलिन के रूप में की. पता चला कि आयरलैंड से होली का त्यौहार मनाने गोवा आई डेनियल मैकलागलिन करीब 18 घंटे से गायब है.

डेनियल मैकलागलिन की हत्या हो चुकी है, यह जान कर उस के दोस्त परेशान हो उठे. जैसे ही डेनियल की हत्या की खबर गोवा में फैली, थोड़ी ही देर में थाना काणकोण के सामने विदेशी पर्यटकों की भीड़ लग गई. इस भीड़ में विदेशी पत्रकार भी थे. विदेशी पर्यटकों की नाराजगी को देखते हुए संभी नावरिश ने आश्वासन दिया कि वह जल्द से जल्द हत्यारे को गिरफ्तार कर लेंगे.

इस के बाद कुछ पर्यटक मोमबत्ती और फूलों का गुलदस्ता ले कर डेनियल को श्रद्धांजलि देने घटनास्थल पर भी गए. डेनियल के बारे में पूरी जानकारी मिल गई तो पुलिस ने उस की हत्या की जानकारी उस के घर वालों को दे दी थी. सूचना मिलते ही उस के घर वाले गोवा आ गए और उस की शिनाख्त कर दी.

घर वालों के आने से पुलिस पर हत्यारे की गिरफ्तारी का दबाव बढ़ गया था. पुलिस का मानना था कि डेनियल की हत्या किसी अपराधी प्रवृत्ति के ही युवक ने की है, इसलिए पुलिस ऐसे युवकों के बारे में पता लगाने लगी. कुछ युवकों को थाने बुला कर पूछताछ भी की गई, लेकिन कुछ पता नहीं चला.

हत्या के इस मामले में इंसपेक्टर फिलोमेनो कोस्ता कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी ले रहे थे. इसलिए पुलिस अधिकारियों ने उन्हें ही इस मामले की जांच सौंप दी. सहयोगियों की मदद से वह उन युवकों के बारे में पता कर रहे थे, जिन की गतिविधियां विदेशी पर्यटकों के बीच संदिग्ध थीं. काफी कोशिश के बाद भी जब वह हत्यारे तक नहीं पहुंच सके तो उन्होंने गोवा और काणकोण के समुद्री किनारे पर बने पबों और रेस्टोरेंटों में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवा कर देखी.

उन की यह तकनीक सफल रही और एक फुटेज में उन्हें डेनियल एक युवक के साथ जाती दिखाई दे गई. उस युवक को वह पहचानते थे. उस का नाम विकट भगत था और वह गोवा का शातिर अपराधी था. उस के जिला बदर का मामला जिलाधिकारी के पास विचाराधीन था.

विकट भगत एक शातिर अपराधी था, इसलिए पुलिस को उस तक पहुंचने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई. उसे उस समय गिरफ्तार कर लिया गया, जब वह मुंबई जाने की तैयारी कर रहा था. गिरफ्तारी के बाद पुलिस अधिकारियों ने जब उस से विस्तार से पूछताछ की तो डेनियल की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

गोवा का समुद्री किनारा विदेशी पर्यटकों को काफी आकर्षित करता है. इस की एक वजह यह भी है कि वहां कोकेन, चरस और एलएसडी जैसी नशे की चीजें आसानी से मिल जाती हैं. शाम होते ही यहां रेव पार्टियां शुरू हो जाती हैं, जो गोवा के वातावरण में रंगीनियां और मदहोशियां घोलती हैं.

इस बात का फायदा यहां के अपराधी प्रवृत्ति के लोग खूब उठाते हैं. अपराधी प्रवृत्ति के लोग विदेशियों की कमजोरी पकड़ कर उन्हें उन के पसंद की चीज उपलब्ध करा कर उन से दोस्ती गांठ लेते हैं. इस के बाद मौका मिलते ही इस का फायदा उठाने से नहीं चूकते. इस में सब से ज्यादा फंसती हैं विदेशी महिलाएं. वे ऐसे लोगों के झांसे में जल्दी आ जाती हैं.

जाल में फंसते ही ये शातिर लोग उन की कमजोरी का पूरा फायदा उठाते हैं. कभीकभी ऐसी महिलाओं को जान भी गंवानी पड़ती है. डेनियल का भी ऐसा ही मामला था. इस के पहले भी इंग्लैंड की रहने वाली 14 साल की स्कारलेट की हत्या हो चुकी थी.

डेनियल का हत्यारा 23 वर्षीय विकट भगत भी ऐसा ही शातिर अपराधी था. वह गोवा की पणजी तहसील के थाना काणकोण का रहने वाला था. स्वस्थ और सुंदर विकट के घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, जिस की वजह से वह ज्यादा पढ़लिख नहीं सका. पिता के पास थोड़ी जमीन थी, उसी पर खेती कर के वह किसी तरह परिवार को पाल रहे थे. जिम्मेदारियों को निभाने के चक्कर में वह बेटे पर ज्यादा ध्यान नहीं दे सके, जिस की वजह से वह आवारा ही नहीं, अपराधी भी बन गया.

अभावग्रस्त और आवारा दोस्तों के साथ रहने की वजह से 13 साल की उम्र में ही विकट अपराध की राह पर चल पड़ा था. अपने कुछ आवारा दोस्तों के साथ वह पूरा दिन गोवा और काणकोण के समुद्री किनारों पर घूमता रहता और विदेशी पर्यटकों की पसंद की चीजें यानी चरस, गांजा, कोकेन, एलएसडी जैसे मादक पदार्थ उपलब्ध कराता.

ऐसे में ही मौका मिलने पर कभीकभी विकट विदेशी पर्यटकों का सामान भी उड़ा देता. उस सामान को बेच कर वह दोस्तों के साथ मौजमजा करता. जैसेजैसे उस की उम्र बढ़ती गई, वैसेवैसे वह शातिर होता गया. वह पढ़ालिखा भले कम था, लेकिन गोवा के माहौल में रहने की वजह से अंगरेजी अच्छी बोल लेता था.

18 साल का होतेहोते विकट शातिर अपराधी बन गया था. अब वह बड़ी आसानी से गोवा आने वाले विदेशी पर्यटकों के बीच अपनी पैठ बना कर अपने वाकचातुर्य से उन का विश्वास जीत लेता था. इस के बाद मौका मिलते ही वह उन के साथ विश्वासघात करने से नहीं चूकता था.

मार्च, 2014 में पहली बार काणकोण पुलिस ने विकट भगत को उस समय गिरफ्तार किया था, जब वह किसी विदेशी पर्यटक के सामान पर हाथ साफ कर रहा था. पूछताछ में उस ने विदेशी पर्यटकों के साथ किए गए बीसों अपराध स्वीकार किए थे. लेकिन ठोस सबूत न होने की वजह से वह अदालत से जल्दी ही बरी हो गया था.

28 वर्षीया डेनियल मेकलागालिन और विकट भगत की मुलाकात नवंबर, 2015 में गोवा में हुई थी. उस समय डेनियल अपने कुछ दोस्तों के साथ गोवा घूमने आई थी. तब गाइड बन कर विकट ने उसे गोवा ही नहीं घुमाया था, बल्कि उस की हर तरह से मदद भी की थी. यही वजह थी कि डेनियल की विकट से गहरी दोस्ती हो गई थी.

जब तक डेनियल गोवा में रही, विकट उस की सेवा में लगा रहा. अपने सेवाभाव से उस ने डेनियल को इस तरह प्रभावित किया कि अपने देश लौट कर भी वह उसे भुला नहीं सकी. खूबसूरत डेनियल मैकलागलिन आयरलैंड की रहने वाली थी. वहां वह एक बार में काम करती थी. जितनी वह तन की गोरी थी, उतनी ही वह मन की भी सुंदर थी.

खूबसूरत डेनियल को गरीबों के प्रति काफी लगाव था. उस से गरीबों का दुख देखा नहीं जाता था. यही वजह थी कि वह अपनी कमाई का एक हिस्सा गरीबों में दान करती थी. यह बात वहां के अखबारों से सामने आई है.

भारत घूम कर डेनियल अपने देश लौट गई, लेकिन उस का दिल गोवा में ही रह गया था. अपने देश पहुंच कर भी वह गोवा के मनोहारी दृश्यों और समुद्री किनारों को नहीं भूल पाई थी. इस के अलावा विकट भी उस का गहरा दोस्त बन गया था. दोनों फेसबुक और वाट्सऐप पर घंटों चैटिंग करते थे.

3 फरवरी, 2017 को डेनियल एक बार फिर टूरिस्ट वीजा पर अपने दोस्तों के साथ गोवा आई. गोवा आने की सूचना उस ने विकट को पहले ही दे दी थी, इसलिए उस के गोवा पहुंचते ही विकट उस से मिलने पहुंच गया. उस के आने से विकट काफी खुश था.

इस के बाद दोनों गोवा की कई रंगीन रेव पार्टियों में शामिल हुए. डेनियल विकट के साथ घंटों घूमतीफिरती और बातें करती. इस का विकट ने कुछ अलग ही अर्थ निकाला. उसे लगा कि डेनियल उसे प्यार करने लगी है. उस का सोचना था कि विदेशी औरतें दिलफेंक और खुले विचारों की होती हैं. वे सैक्स में किसी तरह का परहेज नहीं करतीं. उस ने डेनियल को भी इसी तरह की समझा.

जबकि डेनियल ऐसी नहीं थी. फिर भी वह डेनियल के पीछे पड़ गया. वह डेनियल को सैक्स के लिए राजी कर पाता, उस के पहले ही होली का त्यौहार आ गया. डेनियल ने भी दोस्तों के साथ होली खेली. उस ने थोड़ी भांग भी खा ली थी. होली खेल कर देह पर लगा रंग समुद्र के पानी में साफ कर रही थी, तभी उसे विकट भगत अपने 4-5 दोस्तों के साथ आता दिखाई दे गया. विकट ने भी डेनियल को देख लिया था. उस समय डेनियल ऐसे कपड़ों में थी कि विकट की नजर उस की देह पर चिपक कर रह गई.

डेनियल को उस स्थिति में देख कर विकट की हवस जाग उठी. मन में तूफान उठा तो वह दोस्तों को भेज कर खुद डेनियल के पास पहुंच गया. उसे देख कर डेनियल पानी से बाहर आ गई. लेकिन उस के बालों से अभी भी पानी टपक रहा था, साथ ही उस के कपड़े भी भीग कर शरीर से चिपके थे, जो विकट के मन में दबी वासना को भड़का रहे थे.

पानी से बाहर आने के बाद डेनियल विकट से बातें करते हुए समुद्र के किनारे धूप में टहलती रही. विकट के मन में क्या चल रहा है, डेनियल को इस बात का आभास नहीं हो सका. उस के कपड़े सूख गए तो वह विकट के साथ जा कर एक रेस्टोरेंट में बैठ गई. खाना खाते हुए वह विकट से बातें करती रही. बातें करते हुए विकट ने डेनियल को एक नई जगह दिखाने को कहा तो वह उस के साथ चलने को राजी हो गई.

इस के बाद वह डेनियल को अपनी मोटरसाइकिल पर बिठा कर कडेंला के जंगल की ओर चल पड़ा. जंगल में सुनसान जगह पर मोटरसाइकिल रोक कर उस ने डेनियल से शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा जाहिर की तो वह राजी नहीं हुई. यही नहीं, उस ने विकट को आड़े हाथों लेते हुए खूब खरीखोटी भी सुनाई. उस का कहना था कि  वह उस का दोस्त है, इसलिए उसे दोस्त के बारे में ऐसा नहीं सोचना चाहिए.

लेकिन वासना की आग में अंधे विकट भगत पर डेनियल की बातों का कोई असर नहीं हुआ. वह उस के साथ जबरदस्ती करने लगा. डेनियल ने उस का जम कर विरोध किया. अपने मकसद में कामयाब होते न देख विकट को गुस्सा आ गया. वह डेनियल के साथ मारपीट करने लगा. डेनियल भी उस से भिड़ गई, जिस से विकट को भी चोटें आईं.

आसानी से काबू में आते न देख विकट ने डेनियल का गला पकड़ कर दबा दिया. डेनियल बेहोश कर गिर पड़ी तो विकट ने उस के सारे कपड़े उतार कर अपनी वासना की आग ठंडी की.

डेनियल के साथ जी भर कर मनमानी करने के बाद उसे लगा कि होश में आने के बाद यह उसे पकड़ा सकती है तो उस ने उस की हत्या कर दी. इस के बाद उस की पहचान न हो सके, उस ने साथ लाई बीयर की बोतल को तोड़ कर उस का चेहरा बिगाड़ दिया. इस के बाद उस का सारा सामान ले कर वापस आ गया. पुलिस ने हत्या के इस मामले को मात्र 36 घंटे में सुलझा लिया था. पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे गोवा के मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रैट की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. आगे की जांच इंसपेक्टर फिलोमेनो कोस्ता कर रहे थे.

गलत आदतों के शिकार हो रहे हैं बच्चें

सैक्स की जरूरत केवल लडक़ों को ही होती हो, लड़कियों को नहीं, यह जरूरी नहीं. फरीदाबाद दिल्ली के निकट एक मामले में एक लडक़ी की शिकायत पर एक लडक़े को जेल भेज दिया गया क्योंकि वह लडक़ा घर के सामने ही रहता था और उसे 2-3 साल से गंदे मैसेज भेजता था, उस पर सैक्स करने का दबाव डालता था. लडक़ी की शिकायत थी कि उस ने उस के अंगों में उंगली डाल कर उस का रेप किया था.

सवाल उठता है कि उंगल डाली हो या यौनांग यह क्या लडक़ी की रजामंदी के बिना हो सकता है. क्या कोई महीनों एक तरफा गंदे या प्यार के मैसेज किसी के फोन पर बारबार भेज सकता है. क्या कोई लडक़ा महीनों किसी लडक़ी का पीछा करेगा और अगर उसे जरा सा भी बढ़ावा लडक़ी से नहीं मिले.

सैक्स रेप के मामलों में ज्यादातर बात रजामंदी से काफी हद तक बढ़ती है और फिर लडक़ा कपड़े उतारने और साथ हम बिस्तर होने को कहता है. रेप आनंद नहीं दे सकता, हां मर्दानगी जरूर दिखा सकता है. बहुत बार रेप किया जाता है लडक़ी को या उस के घरवालों को सबक सिखाने के लिए. कई बार दुश्मनी की वजह से रेप किया जाता है. पर जहां महीनों लडक़ा घर से दफ्तर और दफ्तर से घर तक लडक़ी का पीछा करता हो, वहां लडक़ी की इच्छा भी न जागती हो यह कहना सच से मुंह मोडऩा होगा.

औरतों को हक देने के नाम पर सैक्स गुनाहों पर समाज अब कठोर हो रहा है पर अदालती बूटी के नीचे अब कंकरपत्थर और वोटों के साथसाथ प्यार के खुशबूदार फूल भी पिसने लगे हैं.

बहुत से लडक़ेलडक़ी के पहली बार नकारने के बाद आगे नहीं बढ़ते अब क्योंकि उन्हें डर होता है कि कहीं लडक़ी हंगामा खड़ा न कर दे. असल में वे रुकता है कि यह पहले कदम को नकारना केवल शर्माना हो, यह जताना हो कि लडक़ी चालू नहीं है, या फिर लडक़ी डरीसहमी हो और लडक़े को परखना चाहती हो.

आज के कानूनों ने उस प्यार को रौक दिया है. बहुत से लडक़े डर कर लड़कियों से दूर भाग जाते है कि वहीं वह नाराज हो कर शिकायत न कर दे. यह भागना लड़कियों को भारी पड़ता है क्योंकि लडक़ी समझती है कि उस में कहीं कोर्ई कमी नहीं है कि लडक़े उसे प्यार नहीं करते.

14-15 साल की होते ही हर लडक़ी के मन में एक ऐसे प्यार की जरूरत होने लगती है जो उस पर जान छिडक़े, उस के साथ घूमे, उस के दुखदर्द शेयर करे. उस की गोद में लेट कर अपने गम भुला सके. दुनिया भर से बचा सके. कानूनों ने यह सब बंद कर दिया है.

वैसे ही अब समाज और कट्टर होने लगा ङ्क्षहदूमुसलिम भेदभव तो ही रहा है. साथ ही जाति का भेद भी बढऩे लगा है जबकि अब हर जाति का रहनसहन और खानपीन एक सा होने लगा है. स्कूल, कालेज या काम की जगह जब लडक़े लडक़ेलडक़ी मिलते हैं, एकदूसरे को पसंद करने लगते हैं तो महीनों उन्हें जाति का पता भी नहीं चलता.

जब प्यार पकने लगे तो कानून का डर आ जाता है. किसी भी बात पर अनबन होने पर पुलिस बीच में आ जाती है. पुलिस इन मामलों में खूब इंटरेस्ट लेती है क्योंकि ये कानून व्यवस्था के नहीं होते. इस में मोटी रिश्वत मिलती है. मामले को सुलझाने के नाम पर दोनों पक्ष खूब खिलातेपिलाते हैं. जज भी अपने को लड़कियों को बचाने के नाम पर लडक़ों को सजा दे देते हैं पर भूल जाते हैं कि यह औरतों के लिए गलत फैसला है. यह समाज के फिर से पुराने जमाने में ले जा रहा है जहां लडक़ेलड़कियां शादी मांबाद और बिचौलिए पंडितों के हिसाब से करते थे. तब शादी तो हो जाती थी पर दोनों अपने मनचाहों को शादी के बाद ढूढ़तेफिरते थे और घर कलहों बटें में डूबते थे. आज के युग में ढील देना जरूरी है.

रेप और धर्म

मुंबई की एक स्पैशल पौक्सो कोर्ट ने कहा है कि रेप तो मर्डर से भी ज्यादा सीरियस क्राइम है क्योंकि यह विक्टिम की आत्माउस के वजूद और उस के आत्मविश्वास की हत्या कर देता है. रेप असल में आदमी का औरत के खिलाफ सब से ज्यादा खतरनाक हथियार है. जहां पशु जगत में यह सैक्स मादा की मरजी से ही होता है,

 

वहां सिविलाइज्ड सोसाइटियों में औरत को मैंटली और फिजिकली ऐसा बना दिया गया है कि वे रेप होते समय न केवल अपनी हैल्पनैस पर तड़पें बल्कि रेप घंटोंदिनोंहफ्तों और सालों बाद भी भूल न पाएं.

रेप का मतलब केवल मेल और्गन का फीमेल और्गन में एंट्री नहीं हैउस का मतलब है अनचाहे तौर पर औरत की सारी प्रौपर्टी लूट लेना कि उसे लगे कि वह अब खाली हाथ रह गई है. जब रेप अबोध छोटी बच्चियों से होता है तो उन्हें इस शारीरिक दर्द होने के सामाजिक परिणाम नहीं मालूम होते हैं. उन के साथ जो हो रहा है वह उन्हें पता रहता कि कुछ अलग हैपर जो लड़कियां मांबाप की मारपीट की आदी होती हैं उन्हें भी इस का दर्द अलग सा होता है क्योंकि रेप का दर्द सब कौंशियस माइंड तक पहुंचता है.

रेप को रोकने का कोई उपाय नहीं है. जब किसी पुरुष पर रेप करने का भूत सवार होता है तो वह सबकुछ भूल जाता है. वह रेप मौमेंट्री प्लेजर के लिए भी कर सकता हैसिर्फ हैबिचुअली कर सकता है और  पनिश करने के लिए भी कर सकता है. घरों में जानपहचान वाली का रेप कई बार निरंतर ब्लैकमेल करने के लिए किया जाता है. जब प्लेजर के लिए किया जाता है तो पुरुष पागल सा होता है और एहसास भी नहीं होता कि इस का परिणाम क्या होगायह उस का जीवन भी खराब कर सकता है और लड़की का भी. रेप के कानून के बारे में सब को मालूम है पर उस समय उस तरह का पागलपन सवार होता है कि सारे कानून धरे रह जाते हैं. उस समय यह भी नहीं मालूम होता कि यह लड़की शोर मचा सकती हैबाद में जेल भेज सकती है या चुप रह कर फिर ब्लैकमेल को तैयार हो जाएगी या फिर इस रेप को इनएविटेबेल मान कर एंजौय करेगी.

सेना और पुलिस तो रेप को लड़की या उस के अजीज को पनिश करने के लिए इस्तेमाल करते हैं. आमतौर पर किसी भी अपराधी की बेटीबीवी या बहन का रेप पुलिस थाने में किया जाता है तो अपराधी से अपराध कुबूल करवाने के लिए किया जाता है. इस की तो शिकायत भी नहीं की जाती. अदालतें भी नहीं सुनतीं क्योंकि वे सम?ाती हैं कि पुलिस के साथ छेड़खानी आसान नहीं है.

यूक्रेन में रूसी सैनिक लगातार यूक्रेनी लड़कियों और औरतों का रेप कर रहे हैं. लड़ाई में मौत से बचने के लिए भागी औरतों और लड़कियों को पोलैंडरोमानिया आदि में रेप कर के फ्लैश ट्रेड के लिए तैयार किया जा रहा हैबिना यह सोचे कि ये बेचारी दुखों की मारी लड़कियां तो अपना घरबारपिताबेटाप्रेमी या पति को छोड़ कर आ रही हैं.

सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि वे धर्म रेप के मामलों में क्यों गायब हो जाते हैं जो हर जने की सुरक्षा की गारंटी देते फिरते हैंलड़ाइयों में चर्च और मसजिद नष्ट नहीं हो रहेमंदिरों को अगर नष्ट किया जाता था केवल डौमिनैंस दिखाने के लिए. धर्म औरतों को क्यों नहीं बचातेधर्म हर पुरुष में यह खौफ क्यों नहीं भरते कि जैसे चर्च या मंदिर से चोरी नहीं की जा सकतीउसी तरह लड़की का रेप नहीं किया जा सकता?

इस की वजह साफ है. धर्म ने खुद लड़कियों का रेप किया है. धर्म टिके ही औरतों की संपत्ति पर हैं. हर धर्म की किताबों में रेप या रेप जैसे कामों की कहानियां हैं. जीसस हो या पांडुपुत्र अहल्या या शकुंतलाइस तरह की कहानियां हर धर्मग्रंथ में भरी हैं. हर धर्म में औरतों को पनाह देने की जगह नहीं है जहां उन्हें धर्म के रखवालों के हाथों फिर रेप किया गया है. जिस धर्म में रेप पर प्रतिबंध हो वह केवल विचार बन कर फुस्स हो जाता है. जहां रेप के किसी भी रूप को भी एक्सैप्ट किया गया होवहां धर्म के दुकानदारों पर  औरतें भी बरसती हैंपैसा भी.

रामरहीम और आशाराम 21वीं सदी की देन ही नहीं हैंये तो युगों से चलते आ रहे हैं और लगभग हर धर्म में दोषी लड़की होती है जिस का रेप किया जाता है. उसे या तो मौत गले लगानी होती थी या प्रौस्टिट्यूशन में जाना पड़ता था या फिर कड़वा घूंट ले कर चुप रह जाना होता था. अपने ही धर्म की लड़की का रेप करने की सजा किसी धर्म ने दी होइस का उदाहरण ढूंढ़े नहीं मिलेगा.

फैसला: पागल बलात्कारी और मासूम लड़कियां

लेखक- डा. बसंतीलाल बाबेल

बहुत छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार एक आम बात है. स्कूल जाने वाली लड़कियां, भेड़बकरियां चराने वाली और मजदूरी पर जाने वाली लड़कियां अकसर बलात्कार की शिकार होती रहती हैं.

बलात्कार के बाद बलात्कारी अपने बचाव के उपाय सोचता है. आमतौर पर बलात्कार के समय शिकारी अपनेआप को आधा पागल या गरमी में होने का बचाव लेता है. एक किस्सा दशकों पहले ?ालावाड़ (राजस्थान) का है. मैं उन दिनों वहां एडिशनल सैशन जज था. मेरे समय ऐसा ही एक मामला आया था.

एक 15 साल की छोटी लड़की एक खेत में भेड़बकरियां चरा रही थी. तभी वहां शिकारी आता है और उस लड़की को एक दूसरे खेत में यह कह कर ले जाता है कि वहां एक तरह के फल, बेर हैं, साथसाथ बेर खाएंगे.

लड़की उस आदमी के साथ उस खेत में चली जाती है. शिकारी उस के मुंह पर पट्टी बांध देता है, उसे जमीन पर गिरा देता है और नंगा कर देता है. बेरहमी से उस की छातियों को नोचता है और उस के साथ बलात्कार करता है.

जबरदस्ती करने की वजह से उस लड़की के अंग से खून बहने लगता है और वह बेहोश हो जाती है. वह अपराधी उसे वहीं छोड़ कर भाग जाता है. पर वह लड़की की निशानदेही पर पकड़ा जाता है.

जब अपराधी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 376 के तहत रेप का मुकदमा चलता है, तो शिकारी बलात्कार के समय अपनेआप के पागल होने का दावा करता है, ताकि वह छूट जाए.

वह एक मनोरोग चिकित्सालय से अपने पागल होने का सर्टिफिकेट भी कुछ पैसे दे कर ले आता है. मुलजिम को भरोसा था कि उसे आरोप से मुक्ति मिल जाएगी, लेकिन मेरे यह बात गले नहीं उतर रही थी. प्रोसीक्यूशन की चार्जशीट से बलात्कार साबित हो रहा था. खुद अपराधी भी इस तथ्य को तो स्वीकार कर रहा था कि उस के द्वारा बलात्कार तो हुआ है, पर बलात्कार के समय वह पागल था. वह उस समय क्या कर रहा था और उस का नतीजा क्या होगा, यह सम?ाने में नाकाम था. वह भारतीय दंड संहिता की धारा 84 का फायदा पाने का हकदार है.

लेकिन मैं उसे आरोप से मुक्त करने को तैयार नहीं था. मेरे मन में बारबार यह विचार आ रहा था कि मुलजिम अगर पागल था, तो वह उस अबोध बालिका को बेर खाने का बहाना बना कर दूसरे खेत में क्यों ले गया? पागल होता तो उसी खेत में बलात्कार कर लेता, जहां वह भेड़बकरियां चरा रही थी, पर उसे खतरा था कि वहां कोई देख लेगा. मतलब यह हुआ कि मुलजिम में पूरी सोच व सम?ा थी. वह पागल नहीं था. मनोरोग चिकित्सालय का प्रमाणपत्र था. मैं ने उसे कुसूरवार ठहराते हुए 10 साल की कठोर कारावास की सजा दी.

ऐसे बलात्कारी आज एक नहीं, अनेक हैं, जो अबोध बालिकाओं की इज्जत से खेल रहे हैं. ऐसे बलात्कारियों को सजा मिलनी ही चाहिए.

दलित लड़कियों के रेप आजकल बहुत बढ़ गए हैं, क्योंकि दबंग पिछड़ी जाति के सिरफिरे जवान कोई शिकार ढूंढ़ते रहते हैं.

खाली बैठे बेरोजगार, जिन की शादी भी नहीं हुई होती और जिन को कोई प्रेमिका नहीं मिलती है जो साथ सो सके, वे जबरदस्ती किसी को भोगने की ताक में रहते हैं.

लड़कियां अब घरों में बंद कर के नहीं रखी जा सकतीं और उन्हें बाहर घूमने की छूट रहती है. मांबाप दोनों काम पर गए हों, तो अकसर 10-15 साल की लड़कियां अकेले ही बाहर निकल जाती हैं और इस तरह के बिगड़े हुए लड़कों के हत्थे चढ़ जाती हैं.

बाद में मांबाप पैसा जुटा कर वकील करते हैं. डाक्टरों को पैसा दे कर नकली मैडिकल रिपोर्ट बनाने की कोशिश करते हैं. पुलिस भी पैसा खा लेती है. दलितों को यह सम?ा दिया गया है कि यह सब कर्मों का फल है, इसलिए वे चुप ही रह जाते हैं. अगर मामला पता चल जाए, तो पागलपन का दौरा चढ़ गया था का बचाव वकील सु?ा देते हैं.

इस से अच्छा है कि लड़कियां अपना साथी चुन लें, जो उन का साथ तो दें.

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