रिश्तों की कसौटी : क्या था उस डायरी में

रिश्तों की कसौटी : भाग 2- क्या था उस डायरी में

संयोग से मालती के बचपन की फोटो वाला अलबम अमित के हाथ लगा था, जिस में हर एक तसवीर को देख कर वह मालती को चिढ़ाचिढ़ा कर मजे ले रहा था. अचानक एक तसवीर पर जा कर उस की नजर ठहर गई.

‘यह कौन है, मालती, जिस की गोद में तुम बैठी हो?’ अमित जैसे कुछ याद करने की कोशिश कर रहा था.

‘यह मेरी मां हैं. तुम्हें तो पता ही है कि ये हमारे साथ नहीं रहतीं. पर तुम ऐसे क्यों पूछ रहे हो? क्या तुम इन्हें जानते हो?’ मालती ने उत्सुकता से पूछा.

‘नहीं, बस ऐसे ही पूछ लिया,’ अमित ने कहा.

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‘ये हम सब को छोड़ कर वर्षों पहले ही मुंबई चली गई थीं,’ यह स्वर बूआजी का था.

बात वहीं खत्म हो गई थी. शाम को अमित सब से विदा ले कर दिल्ली चला गया.

इतना पढ़ने के बाद सुरभी ने देखा कि डायरी के कई पन्ने खाली थे. जैसे उदास हों.

फिर अचानक एक दिन अमित साहनी के पिता का माफी भरा फोन आया कि यह शादी नहीं हो सकती. सभी को जैसे सांप सूंघ गया. किसी की समझ में कुछ नहीं आया. अमित 2 सप्ताह के लिए बिजनेस का बहाना कर जापान चला गया. इधरउधर की खूब बातें हुईं पर बात वहीं की वहीं रही. एक तरफ अमित के घर वाले जहां शर्मिंदा थे वहीं दूसरी तरफ मालती के घर वाले क्रोधित व अपमानित. लाख चाह कर भी मालती अमित से संपर्क न बना पाईं और न ही इस धोखे का कारण जान पाईं.

जगहंसाई ने पिता को तोड़ डाला. 5 महीने तक बिस्तर पर पड़े रहे, फिर चल बसे. मालती के लिए यह दूसरा बड़ा आघात था. उन की पढ़ाई बीच में छूट गई.

बूआजी ने फिर से मालती को अपने आंचल में समेट लिया. समय बीतता रहा. इस सदमे से उबरने में उसे 2 साल लग गए तो उन्होंने अपनी पीएच.डी. पूरी की. बूआजी ने उन्हें अपना वास्ता दे कर अमित साहनी जैसे ही मुंबई के जानेमाने उद्योगपति के बेटे परेश से उस का विवाह कर दिया.

अब मालती अपना अतीत अपने दिल के एक कोने में दबा कर वर्तमान में जीने लगीं. उन्होंने कालेज में पढ़ाना भी शुरू कर दिया. परेश ने उन्हें सबकुछ दिया. प्यार, सम्मान, धन और सुरभी.

सभी सुखों के साथ जीते हुए भी जबतब मालती अपनी उस पुरानी टीस को बूंदबूंद कर डायरी के पन्नों पर लिखती थीं. उन पन्नों में जहां अमित के लिए उस की नफरत साफ झलकती थी, वहीं परेश के लिए अपार स्नेह भी दिखता था. उन्हीं पन्नों में सुरभी ने अपना बचपन पढ़ा.

रात के 3 बजे अचानक सुरभी की आंखें खुल गईं. लेटेलेटे वे मां के बारे में सोच रही थीं. वे उन के उस दुख को बांटना चाहती थीं, पर हिचक रही थीं.

अचानक उस की नजर उस बड़ी सी पोस्टरनुमा तसवीर पर पड़ी जिस में वह अपने मम्मीपापा के साथ खड़ी थी. वह पलंग से उठ कर तसवीर के करीब आ गई. काफी देर तक मां का चेहरा यों ही निहारती रही. फिर थोड़ी देर बाद इत्मीनान से वह पलंग पर आ बैठी. उस ने एक फैसला कर लिया था.

सुबह 6 बजे ही उस ने पापा को फोन लगाया. सुन कर सुरभी आश्वस्त हो गई कि पापा के लौटने में सप्ताह भर बाकी है. वह पापा की गैरमौजूदगी में ही अपनी योजना को अंजाम देना चाहती थी.

उस दिन वह दिल्ली में रह रहे दूसरे पत्रकार मित्रों से फोन पर बातें करती रही. दोपहर तक उसे यह सूचना मिल गई कि अमित साहनी इस समय दिल्ली में अपने पुश्तैनी मकान में हैं.

शाम को मां को बताया कि दिल्ली में उस की एक पुरानी सहेली एक डाक्युमेंटरी फिल्म तैयार कर रही है और इस फिल्म निर्माण का अनुभव वह भी लेना चाहती है. मां ने हमेशा की तरह हामी भर दी. सुरभी नर्स और कम्मो को कुछ हिदायतें दे कर दिल्ली चली गई.

अब समस्या थी अमित साहनी जैसी बड़ी हस्ती से मुलाकात की. दोस्तों की मदद से उन तक पहुचंने का समय उस के पास नहीं था, इसलिए उस ने योजना के अनुसार अपने ससुर ईश्वरनाथ से अपनी ही एक दोस्त का नाम ले कर अमित साहनी से मुलाकात का समय फिक्स कराया. ईश्वरनाथ के लिए यह कोई बड़ी बात न थी.

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अगले दिन सुबह 10 बजे का वक्त सुरभी को दिया गया. आज ऐसे वक्त में पत्रकारिता का कोर्स उस के काम आ रहा था.

खैर, मां की नफरत से मिलने के लिए उस ने खुद को पूरी तरह से तैयार कर लिया.

अगले दिन पूरी जांचपड़ताल के बाद सुरभी ठीक 10 बजे अमित साहनी के सामने थी. वे इस उम्र में भी बहुत तंदुरुस्त और आकर्षक थे. पोतापोती व पत्नी भी उन के साथ थे.

परिवार सहित उन की कुछ तसवीरें लेने के बाद सुरभी ने उन से कुछ औपचारिक प्रश्न पूछे पर असल मुद्दे पर न आ सकी, क्योंकि उन की पत्नी भी कुछ दूरी पर बैठी थीं. सुरभी इस के लिए भी तैयार हो कर आई थी. उस ने अपनी आटोग्राफ बुक अमित साहनी की ओर बढ़ा दी.

अमित साहनी ने जैसे ही चश्मा लगा कर पेन पकड़ा, उन की नजर मालती की पुरानी तसवीर पर पड़ी. उस के नीचे लिखा था, ‘‘मैं मालतीजी की बेटी हूं और मेरा आप से मिलना बहुत जरूरी है.’’

पढ़ते ही अमित का हाथ रुक गया. उन्होंने प्यार भरी एक भरपूर नजर सुरभी पर डाली और बुक में कुछ लिख कर बुक सुरभी की ओर बढ़ा दी. फिर चश्मा उतार कर पत्नी से आंख बचा कर अपनी नम आंखों को पोंछा.

सुरभी ने पढ़ा, लिखा था : ‘जीती रहो, अपना नंबर दे जाओ.’

पढ़ते ही सुरभी ने पर्स में से अपना कार्ड उन्हें थमा दिया और चली गई.

फोन से उस का पता मालूम कर तड़के साढ़े 5 बजे ही अमित साहनी सिर पर मफलर डाले सुरभी के सामने थे.

‘‘सुबह की सैर का यही 1 घंटा है जब मैं नितांत अकेला रहता हूं,’’ उन्होंने अंदर आते हुए कहा.

सुरभी उन्हें इस तरह देख आश्चर्य में तो जरूर थी, पर जल्दी ही खुद को संभालते हुए बोली, ‘‘सर, समय बहुत कम है. इसलिए सीधी बात करना चाहती हूं.’’

‘‘मुझे भी तुम से यही कहना है,’’ अमित भी उसी लहजे में बोले.

तब तक वेटर चाय रख गया.

‘‘मेरी मम्मी आप की ही जबान से कुछ जानना चाहती हैं,’’ गंभीरता से सुरभी ने कहा.

सुन कर अमित साहनी की नजरें झुक गईं.

‘‘आप मेरे साथ कब चल रहे हैं मां से मिलने?’’ बिना कुछ सोचे सुरभी ने अगला प्रश्न किया.

‘‘अगर मैं तुम्हारे साथ चलने से मना कर दूं तो?’’ अमित साहनी ने सख्ती से पूछा.

‘‘मैं इस से ज्यादा आप से उम्मीद भी नहीं करती, मगर इनसानियत के नाते ही सही, अगर आप उन का जरा सा भी सम्मान करते हैं तो उन से जरूर मिलिएगा. वे अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं,’’ कहतेकहते नफरत और दुख से सुरभी की आंखें भर आईं.

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‘‘क्या हुआ मालती को?’’ चाय का कप मेज पर रख कर चौंकते हुए अमित ने पूछा.

‘‘उन्हें कैंसर है और पता नहीं अब कितने दिन की हैं…’’ सुरभी भरे गले से बोल गई.

‘‘ओह, सौरी बेटा, तुम जाओ, मैं जल्दी ही मुंबई आऊंगा,’’ अमित साहनी धीरे से बोले और सुरभी से उस के घर का पता ले कर चले गए.

दोपहर को सुरभी मां के पास पहुंच गई.

‘‘कैसी रही तेरी फिल्म?’’ मां ने पूछा.

‘‘अभी पूरी नहीं हुई मम्मी, पर वहां अच्छा लगा,’’ कह कर सुरभी मां के गले लग गई.

‘‘दीदी, कल रात मांजी खुद उठ कर अपने स्टोर रूम में गई थीं. लग रहा था जैसे कुछ ढूंढ़ रही हों. काफी परेशान लग रही थीं,’’ कम्मो ने सीढि़यां उतरते हुए कहा.

थोड़ी देर बाद मां से आंख बचा कर उस ने उन की डायरी स्टोर रूम में ही रख दी.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

खुदकुशी का अनोखा मामला, जांघ पर लिखा हाल ए दिल

पति द्वारा सताए जाने की दहशत पत्नी के दिलोदिमाग पर इस कदर हावी थी कि सुसाइड करने से पहले पति को सबक सिखाने के लिए क्या किया जाए के बारे में कई बार सोचा होगा. फिर अंत में पत्नी ने ऐसी जगह को चुना, जहां हर किसी की निगाह ही न जाए यानी जांघ पर सुसाइड नोट लिख कर हर किसी को हैरत में डाल दिया.

भले ही अपनी जिंदगी को खत्म करना इतना आसान नहीं होता, लेकिन फिर भी कई बार लोग सुसाइड करने पर मजबूर हो जाते हैं.

30 साला महिला अपने पति से इतनी डरी हुई थी कि उस ने सुसाइड नोट लिखने के लिए अपने शरीर का गुप्त हिस्सा जांघ चुना. यह खुलासा पोस्टमार्टम के दौरान पुलिस द्वारा बनाए जा रहे पंचनामे से हो पाया.

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जी हां, चौंकाने वाला यह अजीबोगरीब मामला राजस्थान के उदयपुर जिले के सेमारी थाना क्षेत्र के मल्लाड़ा गांव का है. पति खेमराज की प्रताड़ना से तंग हो कर रेखा मेघवाल नाम की महिला ने जहर खा लिया. जहर खाने से पहले उस ने अपनी जांघ पर सुसाइड नोट लिख कर पति को सजा देने की गुहार लगाई.

रेखा अपने पति से इस कदर डरी हुई थी कि उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वो सुसाइड नोट कहां लिखे? जब पुलिस ने उस की जांघ पर लिखा सुसाइड नोट देखा तो हैरान रह गई.

रेखा ने साफसाफ लिखा कि अगर वह कागज पर सुसाइड नोट लिखती तो उस का पति फाड़ देता. दीवार पर लिखती तो मिटा देता. कहीं और छिपा कर रखती तो ढूंढ़ लेता. यही वजह है कि उसे जांघ से बेहतर कोई जगह नजर नहीं आई क्योंकि वहां पर उस की नजर नहीं पड़ती, इसलिए उस ने ऐसी जगह को चुना.

suicides

रेखा मेघवाल ने गुरुवार, दिनांक 27 अगस्त, 2020 की सुबह साढे़ 7 बजे जहर खा लिया था. पति और उस के घर वाले उसे तुरंत ही सलूंबर अस्पताल ले गए, लेकिन महिला को बचाया न जा सका.

पुलिस के मुताबिक, एक साल पहले खेमराज रेखा को नाता प्रथा के तहत ले आया था. रेखा के कोई औलाद नहीं थी, वहीं खेमराज की यह तीसरी शादी थी. खेमराज पहले से ही शादीशुदा था और उस के 4 बच्चे थे. एक बेटे की शादी हो चुकी है. बेटे की शादी के बाद से ही घर के सभी लोगों ने उस के साथ बुरा बरताव करना शुरू कर दिया. यहां तक कि उसे सताया जाना शुरू कर दिया. इस वजह से वह हमेशा डरी रहती थी.

मानसिक और शारीरिक परेशानी झेल रही रेखा ने अंत में आत्महत्या का रास्ता चुना. आत्महत्या का कारण सभी के सामने आए, इस के लिए उस ने सुसाइड नोट अपनी जांघ पर लिख दिया.

यह तो अच्छा हुआ कि पोस्टमार्टम के दौरान पुलिस द्वारा पंचनामा तैयार करते समय नजर चली गई और मामले का खुलासा हो गया.

साफ है कि रेखा के मन में पति द्वारा सताए जाने का खौफ मरते दम तक देखा गया. वहीं सुसाइड नोट से महिला के सताए जाने की पूरी कहानी पुलिस की समझ में आ गई.

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जहर खाने से पहले महिला ने जांघ पर 14 लाइन का सुसाइड नोट लिखा. इस में लिखा कि पति कहता था कि तेरे जैसी 17 और ले आऊंगा. लेकिन तुझे पहले खत्म कर दूंगा. वह हमेशा कहता था कि इतना मजबूर कर दूंगा कि तू सुसाइड कर ले. अगर कहीं सुसाइड लैटर किसी को लिख कर दिया तो उस को भी खत्म कर दूंगा. इसलिए मैं मजबूरी में यह लाइनें जांघ पर लिख रही हूं.

पुलिस ने पति खेमराज के खिलाफ महिला को आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया है. देखते हैं कि आने वाले समय में पति के खिलाफ पुलिस या अदालत क्या कार्यवाही करती है.

उपलब्धि : ससुर के भावों को समझ गई बहू

दगाबाजी एक आशिक की

उपलब्धि : भाग 3- ससुर के भावों को समझ गई बहू

‘‘कमरे में रुई के गुब्बारे नहीं, उस के मथे हुए अरमानों की धूल उड़ रही थी. मेरे देखते ही देखते उन्होंने रजाई के चीथड़े कर दिए. ठंड से ठिठुर कर वह जाड़ा गुजारा मैं ने, पर मामा से दूसरी रजाई मांगने का साहस न जुटा पाया. जीवनभर कभी भी किसी से जिद कर के कुछ मांगने का दिन नहीं आया. ‘‘आज किसी बच्चे की कोई भी जिद पूरी कर के मुझे बड़ी आत्मतृप्ति होती है.

‘‘इस कच्ची उम्र में होस्टल में मत भेजो, जबकि तुम लोग जिंदा हो, मैं जिंदा हूं. कल से मैं पढ़ाया करूंगा मीतू को. वह सुधर जाएगी. मांबाप के प्यार में वह ताकत है जो शायद होस्टल के कठोर अनुशासन में नहीं है.’’ छोटी बहू की आंखें सजल हो उठतीं. क्या किसी के पास थोड़ा सा भी अतिरिक्त प्यार नहीं बचता है एक अनाथ बच्चे के लिए? थोड़ा सा स्नेह जहां जादू कर सकता है, सारे विष को अमृत में बदल सकता है, वहां ये समर्थ दुनिया वाले अपनी क्षमता का दुरुपयोग क्यों करते हैं?

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कुछ देर के लिए बाबूजी की उन धुंधली आंखों की सजल गहराई में डूबतीउतराती वह वर्षों पीछे घिसटती चली जाती. प्यार का लबालब भरा प्याला किसी के होंठों से लगा है, पर वह उस स्वाद की अहमियत नहीं जानता और जिस के आगे से अचानक प्यार की भरी लुटिया खींच ली गई हो वह प्यासे मृग की भांति भाग रहा है. और वह खो जाती है अपने वार्षिक परीक्षाफल की घोषणा के दिनों की याद में. वह कक्षा में प्रथम आती है और उस से उम्र में बड़ी चचेरी बहन किसी तरह पास हो जाती है. चाची हाथ मटकामटका कर कहती है, ‘‘देखो, आजकल की बहुरूपिया लड़कियों को, कैसे दीदे फाड़ कर चीखती थी कि हाय, मेरा परचा बिगड़ गया. इधर देखो तो पहला नंबर ले कर आ रही है. हाय, कितने नाटक रचे.’

वह प्रथम आई है, इस की खुशी मनाना तो दूर रहा, पर कभी परचा बिगड़ जाने पर रो पड़ने की बात पर चाची उलाहना देना न भूलीं. स्वाभाविक था कि कितना भी अच्छा विद्यार्थी हो, वह परीक्षा के दिनों में ऊटपटांग सोचता है, डरता है. पर उस के लिए तो स्वाभाविक बात या व्यवहार करना भी संभव न था. वह सब की नजरों में एक वयस्क, समझदार और सख्त लड़की थी, जिस के लिए नाबालिग की तरह व्यवहार करना अशोभन था. और जब आर्थिक झंझटों के बावजूद बाबूजी ने उसे अपनी छोटी बहू मनोनीत किया था, तब तो मानो कहर बरपा था.

‘क्या देख कर ले जा रहे हैं?’ एक ने कटाक्ष करते हुए कहा था. ताईजी का स्नेह जरूर था इस पर. हौलेहौले वे बोली थीं, ‘अजी, ऐसा मत कहो. हमारी बिटिया का चेहरामोहरा तो अच्छा है. हरदम हंसती आंखें, तीखी नाक और पढ़ाई में अव्वल.’

हां, उस के साधारण से चेहरे पर एक ही असाधारण बात थी. उस की हंसती हुई आंखें-जैसे प्रतिज्ञा कर ली थी उन आंखों ने कि हर उदासी को हरा कर रहेंगे और यही उस का गुण बन गया था-हंसमुख बने रहना. वह अपने आसपास देखती कि इस अभावग्रस्त दुनिया में सुखसुविधा के बीच भी आदमी अभाव का अनुभव कर रहा है. जो भौतिक सुखों से वंचित है वह भी और जो सुविधाप्राप्त है वह भी. शायद भौतिक सुख दुनिया के हर कोने तक पहुंचाने में हम असमर्थ हैं, पर स्नेह के अगाध सागर से लबालब भरा है यह मानव मन. यदि थोड़ा सा भी सिंचन करना शुरू कर दे हर कोई तो सारी धरती, सारी जगती सिंच जाए. इतना थोड़ा सा त्याग वह भी करेगी और करवाएगी. आखिर इस में तो कोई खर्च नहीं है? आजकल की दुनिया में हिसाब से चलना पड़ता है, पर मन का कोई बजट नहीं बन सका है आज तक और न ही प्यार का कोई माप. इसलिए जहां तक स्नेहप्रेम खर्च करने का सवाल है, बेझिझक आगे बढ़ा जा सकता है. वहां न कोई औडिट होगा न कोई चार्ज.

पर हिसाबी है न मानव मन. हो सकता है कभी कोई माप निकल आए और स्नेह का भी हिसाब देना पड़े. शायद यही सोच कर स्नेह के भंडार भरे पड़े हैं और रोते दिलों को लुटाने को कोई तैयार नहीं दूरदर्शी, समझदार आदमी की जात. खिलखिला कर हंस उठी वह. ‘‘कैसी पगली हो तुम? मन ही मन हंसती हो और रोती हो,’’ पति की मीठी झिड़की सुन कर चुप हो गई वह. फिर तुनक कर बोली, ‘‘क्यों, हंसने पर कोई टैक्स तो है नहीं और जहां तक रोने का सवाल है, तुम्हें पा कर, तुम लोगों के बीच इस ग्रीन हाउस की ठंडी छांव में रो कर भी शांति मिलती है. मानो, बीती कड़वी यादों को धो कर बहाए दे रही हूं.’’

कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी. परिवार के सभी सदस्य रजाई में दुबके पड़े थे, पर इतना शोरगुल होने लगा कि एकएक कर सब उठने को मजबूर हो गए. बैठक से शोरगुल की आवाज आ रही थी. एकएक कर सब भीतर झांकने लगे.

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‘‘आइए, आइए,’’ छोटी का सदा सहास स्वर. मेज पर एक बड़ा सा केक रखा था. और चाय की प्यालियां सजी थीं. सारे बच्चे बाबूजी को खींच कर मेज तक ला रहे थे. छोटी ने प्यालियां भरनी शुरू कीं. चाय की सुगंध से कमरा महक उठा. बच्चों ने दादाजी को ताजे गुलाब के फूलों का गुलदस्ता भेंट किया. छोटी ने उन की कांपती उंगलियों में छुरी पकड़ा दी. बच्चे एकसाथ गाने लगे, ‘‘हैप्पी बर्थ डे टू यू… दादाजी, जन्मदिन मुबारक हो…’’

परिवार के सदस्यों ने भुने हुए काजुओं के साथ चाय की चुस्की ली. केक का बड़ा सा टुकड़ा छोटी ने बाबूजी को पकड़ा दिया. कनखियों से सास की ओर देखा बाबूजी ने. फिर उन की आंखों में जो स्नेह का सागर उमड़ रहा था वह सब के कल्याण के लिए, सारी दुनिया के वंचित लोगों के लिए, सारी जगती के अतृप्त बच्चों के मंगल के लिए बहने लगा… ‘‘मेरा जन्मदिन आज तक किसी ने नहीं मनाया था, बेटी…’’ और छोटी को लगा, स्नेह के इन कीमती मोतियों को वह पिरो कर रख ले.

उपलब्धि : भाग 2- ससुर के भावों को समझ गई बहू

बाबूजी के प्रति एक नई स्नेहधारा प्रवाहित होने लगी उस के हृदय में. उस की थीसिस जमा हो गई थी. अब बाकी रहा था साक्षात्कार. सुबहसुबह बस से इंटरव्यू के लिए जाना था. घर के सभी सदस्य अभी सो रहे थे. उस के एक परीक्षक आज ही वापस भी चले जाने वाले थे शाम की गाड़ी से, इसलिए इतनी सुबह जाना था. किसी तरह तैयार हो कर वह निकली. सामने कांपते हाथों में चाय का प्याला पकड़े बाबूजी खड़े थे. लज्जित हो वह बोली, ‘‘आप ने क्यों तकलीफ की?’’

सस्नेह वे बोले, ‘‘मेरी कामना है कि तुम्हारा उद्देश्य सफल हो.’’ झुक कर उन के पांव छू कर वह चल दी.

एकांत के सुनहरे क्षणों में स्नेहमयी बांहों की घेराबंदी से अपने को मुक्त करती हुई वह बोली, ‘‘आज मुझे सुबहसुबह बड़ी अजीब सी स्थिति का सामना करना पड़ा. बाबूजी ने स्वयं अपने हाथों से मुझे चाय बना कर ला कर दी है.’’

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‘‘तो इस में इतना परेशान होने की क्या बात है, रानी? बाबूजी तो काफी समय से यही करते आए हैं. मां इतनी सुबह उठ नहीं पाती थीं. रात में घर के ढेरों काम रहते थे. बाबूजी रोज 5 बजे सुबह हम लोगों को चाय बना कर देते थे. तब कहीं जा कर हम लोग पढ़ने के लिए बैठते थे.’’ ‘‘ओह डार्लिंग, जिस बात को तुम लोग इतना सामान्य मानते हो, वह मेरे लिए एक निहायत ही मूल्यवान अनुभव है,’’ वह बोली, और उत्तर में मिली एक मुसकान.

इस घर के चारों ओर जो हरियाली थी उसी के कारण पड़ोसी उसे ग्रीन हाउस कहते और इस परिवार के सदस्यों का आपसी स्नेह सब की ईर्ष्या की वस्तु थी. नई बहू का शोषण करने के इरादे से कोई बातूनी आ कर कहती, ‘‘चलो न, छोटी, आज मेरे पति फ्री हैं. हम दोनों नाइट शो देख आएं. मेरे पति, तुम्हारे पति के सहकर्मी ही नहीं, जिगरी दोस्त भी हैं.’’ तनिक झिझक से वह कहती, ‘‘बाबूजी को ज्यादा रात गए घर लौटना पसंद नहीं है.’’

‘‘ओह, अपने बूढ़े ससुर से कहो ये दकियानूसी बातें भूल जाएं. आखिर एक मैट्रिकुलेट का देखनेसोचने का क्षेत्र तो सीमित होगा ही.’’

छोटी का दिल छलनी होने लगा. बाबूजी ज्यादा पढ़ नहीं पाए, क्या इसलिए वे व्यापक रूप से देखसमझ नहीं पाते? काश, ये छींटे कसने वाली यह गु्रेजुएट महिला जानती कि कितनी तमन्ना थी उन में पढ़ने की. पर कौन पढ़ाता उन्हें? दूर के रिश्ते के एक मामा ने मैट्रिक पास करते ही असम के जंगलों में भेज दिया उन्हें नौकरी करने. किसी तरह अपने को संभाल कर बोली, ‘‘छोटी ननदें हैं न घर में, उन पर क्या असर पड़ेगा?’’ ‘‘अरे, छोड़ो भी. वे क्या तुझे आदर्श बना कर जी रही हैं. ये स्कूलकालेजों में पढ़ने वाली छोकरियां तो अब तक अपना आदर्श ढूंढ़ चुकी होंगी.’’

अब वह क्या कहती? शिक्षा के दीवाने बाबूजी क्या उन लोगों को छोड़ने वाले हैं? हाथ धो कर पीछे लगे रहते हैं ताकि उन लोगों की पढ़ाई पूरी हो जाए. शांत, समझदार सास कभीकभी तुनक भी उठतीं, ‘पढ़ाई के पीछे होशोहवास खो बैठते हैं. यही एक नशा है इन को. लड़कियां घर का कामधाम भले ही न सीखें, बस दिनरात किताबें लिए रटती रहेंगी. लड़कों को तो पढ़ालिखा कर बड़ा लाट बना दिया.’ ‘लाट नहीं तो क्या? उन के ठाठ क्या किसी से कम हैं?’ बाबूजी एक संतोषपूर्ण मुखमुद्रा में चिल्लाचिल्ला कर कहते, ‘पड़ोसी पूछते हैं कि तुम्हारा कितना बैंक बैलेंस है? मैं कहता हूं कि मैं ने अपना पैसा बैंकों में जमा कर दिया है. पांचों बेटे मेरे हीरे हैं.’ उन्हें बैंक बैलेंस शून्य होने का कोई भी दुख नहीं था.

बेटे कभीकभी चिढ़ जाते, ‘हां, हां, लिखायापढ़ाया ही तो है. और क्या दिया है? हम लोग अपनी मेहनत से आगे बढ़े. तुम ने खापी कर सब खर्च कर दिया.’ ‘जरूर किया. कमाया है, खाऊंगा नहीं?’ बाबूजी अपना धीरज खो बैठते. भिन्नभिन्न प्रकार के पकवानों के प्रति वे अपना लोभ न रोक पाते. खाने का शौक बराबर रहा है उन्हें. यह तो उन के बाजार से अपनी मनपसंद चीजें लाने का शौक देख कर ही वह समझ जाती. दूसरी बहुएं और सास मुंह में कपड़ा ठूंस कर ठिठोली करतीं, ‘‘दांत नहीं रहे, फिर भी खाते किस शौक से हैं. शायद उम्र के साथ लालच और भी बढ़ गया है.’’

मनोविज्ञान की छात्रा छोटी सोचती कि इन लोगों को कौन समझाए. स्नेह और प्यार की वह भूख जो मिट न पाई, उसे जीभ की संतुष्टि द्वारा पेटभर कर मिटाना चाहता है स्नेह का प्यासा वह व्यक्ति. उस के अतृप्त मन ने अपना समाधान खोज निकाला है, पर यदि वह बोलने लगे तो वे हंस कर बोलेंगी, ‘‘चल री, यह कोई तेरी विश्वविद्यालय की कक्षा है, जो लैक्चर झाड़ रही है. अपनी छात्राओं को सिखाना जा कर.’’ प्यार मिला नहीं, पर प्यार लुटाना आता है बाबूजी को. पतंग पकड़ने के लिए जाने पर किस तरह मामा के हाथों पिटाई हुई थी, वही किस्सा सुनातेसुनाते वे मंडू को पतंग बनाना सिखाते. ‘‘स्कूल खुल रहे हैं, मीतू की बरसाती लानी है,’’ सुबह से ही वे हल्ला मचाने लगते मानो मीतू की बरसाती लाने से बड़ा कोई काम इस दुनिया में बचा ही न हो. जब मीतू शैतानी करती तब संझली कहती, ‘‘अब मैं इसे होस्टल में डाल दूंगी.’’

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‘‘मजाक में भी होस्टल का नाम मत लेना. बेटी, मांबाप के रहते बच्ची को भला होस्टल में क्यों रहना पड़े इस कच्ची उम्र में? मुझे भी मामा ने 9वीं कक्षा में होस्टल में रख दिया था…’’ वे खो जाते उन दिनों की याद में जब उन्हें पोखर से कमल चुरा कर लाने में बड़ा आनंद आता था. लालाजी के कुम्हड़े की बेल काट कर फेंक देने में हर्ष होता था. और कितना मजा आता था चाचाजी की गाय के बछड़े को छोड़ देने में, जिस से पूरा दूध बछड़ा पी जाए और लल्लन चाचा उसे गालियां सुनाने घर आ धमकें. इस खेल में उपलब्धि शायद भौतिक लाभ की दृष्टि से कुछ भी न होती, पर एक किशोर बालक का अहं तृप्त हो जाता. पर किस को परवा थी उस के अहं की. वह तो पराश्रित अनाथ बालक था, इसीलिए मामा ने उसे होस्टल में भरती कर दिया था. ‘‘जाड़े के दिन थे. बहू और मामा नई रजाई दे गए थे मुझे. लड़कों ने मेरी नईनई रजाई देखी तो ईर्ष्यावश दौड़े आए और हंसने लगे, ‘अरे, मुंडी रजाई है, मुंडी.’ मेरी रजाई के किनारों पर पाइपिंग नहीं थी. बस, छोकरों को बहाना मिल गया. सब के सब टूट पड़े मुंडी रजाई पर और सारी रुई नोचनोच कर हवा में उछालने लगे. एक असहाय किशोर पर उस रात क्या बीती, यह उस का दिल ही जानता है.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

उपलब्धि : भाग 1- ससुर के भावों को समझ गई बहू

पहले आने वालों का तांता लगा रहा और अब जाने वालों का सामान बंध रहा था. घर एक चौराहा बन गया था, न वहां किसी को पहचानने का काम था न जानने की फुरसत. सपने की तरह दिन बीत गए और अब एकदूसरे के करीब आने का वक्त मिला था. बैंडबाजे, शहनाई की इतराती धुन और बच्चों के कोलाहल के बाद यह मधुर शांति अच्छी ही लग रही थी उसे. केवल बहुत ही नजदीकी संबंधियों और इस बड़े परिवार के सदस्यों के सिवा लगभग सभी मेहमान विदा हो चुके थे.

जब भी खाली समय मिलता, अवकाशप्राप्त वृद्ध ससुर नई छोटी बहू के पास आ कर बैठ जाते. नयानया घूंघट बारबार खिसक जाता और मंद मुसकान से भरी 2 आंखें वृद्ध की ओर सस्नेह ताकती रहतीं. यह सब बिलकुल नयानया लग रहा था उसे. वास्तविकता की क्रूर धरती पर पली, आदर्श की सूखी ऋतुओं को झेलती, हर परिस्थिति से जूझने की क्षमता रखने वाली वह इस अनोखे स्नेहसिक्त ‘ग्रीन हाउस’ की छत तले अपनेआप को नए सांचे में ढाल रही थी. ‘‘बेटी, अधूरी मत छोड़ना अपनी पढ़ाई, तुझे कोई सहयोग दे न दे, मैं पूरा सहयोग दूंगा. मैं तो दीवाना हूं लिखाईपढ़ाई का.’’ वृद्ध बारबार उस से यह आशा कर रहे थे कि वह उन की बात का उत्साह से जवाब देगी जबकि वह लाज से सिमटी कनखियों से जेठानी व ननदों की भेदभरी मुसकान का सामना कर रही थी.

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क्या बाबूजी भूल गए कि उस का ब्याह हुए केवल 3 ही दिन हुए हैं और अभी वह जिस दुनिया में विचर रही है, वह पढ़ाईलिखाई से कोसों दूर है? पर बाबूजी की निरंतर कथनी न जाने किस अंतरिक्षयान की सी तेज रफ्तार से उसे चांदसितारों की स्वप्निल दुनिया से वास्तविकता की धरती पर ला पटके दे रही थी. पिछले कुछ दिनों में वह लगभग भूल गई थी कि उसे अपने शोधकार्य की थीसिस इसी माह के अंत में जमा करनी है. नातेरिश्तेदारों के मानसम्मान, आवभगत और बच्चों के कोलाहल के बीच भी बाबूजी बराबर उसे आआ कर कुरेदते रहते थे, ‘‘देख बेटी, राजा अपने देश में ही पूज्य होता है, पर विद्वान

का हर जगह सम्मान होता है. तुम विदुषी हो, अपना ध्यान बंटने न देना. तुम्हारे हमजोली लाख भड़काएं, तुम अडिग रहना.’’ और यह कुछ हद तक सच भी था. बड़ी ननद 2-3 बार मजाक में कह चुकी थी, ‘‘अब मेरा भैया ही इस की थीसिस बन गया है. क्या होगी अब लिखाईपढ़ाई इस से. और पीएचडी कर के भी क्या करना है? आखिर में तो वही चूल्हाचौका करना है.’’

‘‘सिर्फ यही दीदी?’’ मझली जेठानी ने आंख मारते हुए कहा था और लाज से उस के कान लाल हो उठे थे. परिवार की हमउम्र सदस्याएं कहती थीं, ‘‘यह दिन रोजरोज नहीं आएगा. जाओ, क्वालिटी में तुम दोनों आज नाइट शो में फिल्म देख आओ.’’ भरेपूरे परिवार में 2 सहमतेधड़कते दिलों को मिलाने वाले मासूम एकांत क्षण, भविष्य के सुनहरे स्वप्नजाल और एकदूसरे में खो जाने के अरमान, पर घड़ी की टिकटिक की तरह बूढ़े बाबूजी की वही रट हरदम मानो कानों पर चोट करती रहती और वह अपनेआप को अपराधी महसूस करने लगती. ओह, ज्यादा पढ़लिख लेना भी अच्छा नहीं, जीना दूभर हो जाता है.

मधुर मिलन की मीठी घडि़यों में भी एक अपराधी सी हो उठती वह. क्या यही चीज कभी उस की कम पढ़ीलिखी जेठानी या बड़ी ननद को कचोटती न रही होगी? कभी नहीं. वे तो जीवन की स्थूल उपलब्धि से ही बेहद संतुष्ट दिखलाई देती हैं. वह केवल सूक्ष्मतम उपलब्धि की बात क्यों सोचती है? इतने बड़े मकान की बंद हवा में वह घुटन सी महसूस करती और इसीलिए वह छत पर जा कर आसमान के नीचे खुले में खड़ी हो जाती. एक बार वह बादल के एक सफेद टुकड़े की सूर्यकिरणों के साथ होती अठखेलियां देखने में मग्न थी कि उस के कानों में कुछ खुसुरफुसुर सुनाई दी.

‘‘बाबूजी का सारा स्नेह मानो बरसात की तरह उमड़ा आ रहा है. छोटी बहू ने आज क्या खाना खाया? वह कमजोर होती जा रही है? और देखा, ढेर सारे फल उस के लिए बाजार से खरीद लाए. खाए चाहे न खाए. हम लोगों से भी तो पूछना था?’’ तभी उसे याद आया. नई जगह में आ कर उसे भूख ही नहीं लग रही थी. यह बात जान कर कि उसे रोज रात को गरम दूध पीने की आदत थी, ससुर अपने सामने बैठा कर दूध का गिलास देने लगे थे. फिर जब भूख नहीं सुधरी तो बारबार पूछते, ‘‘तुम्हें क्या तकलीफ है, बेटी, शरमाना मत. जरूर बतलाना.’’ और फिर एक दिन ढेरों फल ले आए थे. वह क्या बोलती? स्मितभरी आंखों से उन की ओर ताकती रही. उसे यह सब अजीब सा लगता.

बचपन में ही वह मातापिता को खो बैठी थी. ताऊचाचा, ताईचाची और फुफेरेचचेरे भाईबहनों के कठोर अनुशासन के बीच वह जान ही न पाई थी कि ममता का स्रोत उस के जीवन में सूख गया है. स्नेहममता का यह नया झरना उस के लिए अनोखा था. समय पर उसे खानेपहनने को मिल जाता है. पर कभी किसी ने उस के दिल में क्या है, जानने का न तो प्रयत्न किया था और न ही कभी यह सोचा था कि उस की भी कोई इच्छा हो सकती है. ये छोटीछोटी बातें, ये जराजरा से आग्रह उस के लिए तो हिमालय जैसे थे.

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सीढि़यों पर पदचाप ऊपर की ओर ही आ रहा था. मझली के उलाहने का उत्तर देती हुई मझली बोली, ‘‘तुम ठीक कह रही हो, दीदी, पर बाबूजी ने छोटी को देखने के बाद यही कहा था, ‘लड़की देखनेसुनने में साधारण है, पर प्रतिभाशाली लगती है. खैर, प्रतिभाशाली लड़कियां तो मेरे छोटे बेटे के लिए कई मिली हैं, लेकिन मैं यहीं उस की शादी करूंगा.’ मालूम है क्यों? छोटी के मांबाप नहीं हैं न. बाबूजी उस की पीड़ा शायद हम लोगों से ज्यादा समझते हैं.’’ ‘‘हां, यह तो सच है. उस लिहाज से देखो तो बाबूजी का स्नेह भले ही पक्षपातपूर्ण हो, पर है सही.’’

उस ने हौलेहौले चूडि़यां खनका दीं. दोनों तब तक ऊपर आ चुकी थीं. ‘‘अरे छोटी, तेरी चूडि़यों की खनक से पता चला, तू यहां है. तेरी ही बात हो रही थी. बाबूजी तुम से बेहद स्नेह करते हैं. मालूम है क्यों? उन्हें भी न मां का प्यार मिला, न पिता का लाड़.’’ फिर उसे प्यार से अपनी छाती से सटा कर मझली बोली, ‘‘मेरे प्यारे देवर को पाने के बाद तुझ सा प्रसन्न भला और कौन हो सकता है?’’ प्यार के इस छोटे से प्रदर्शन से ही उस का दिल कुलांचें भरने लगा. कभी भी किसी ने उसे इस तरह प्यार नहीं किया था. बचपन से ही वह वयस्कों में मानी जाने लगी थी. उस की बालसुलभ आकांक्षाओं को भी तो असमय ही कुचल दिया गया था अनुशासन की कुल्हाड़ी से.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

दगाबाजी एक आशिक की : भाग 4

प्रिया आए दिन उस से सारा पैसा लौटाने का दबाव बना रही थी, लेकिन अचानक लौकडाउन लग गया. 28 मार्च को शमशाद लेबर को पैसे देने के लिए एक प्रकाशक से 2.80 लाख रुपए लाया था. प्रिया ने शमशाद के पास इतनी बड़ी रकम देख कर जब अपने पैसे मांगे तो शमशाद ने कहा कि यह पैसा मजदूरों को देना है.

लौकडाउन के कारण उन के पास खाने का कुछ नहीं है जब हालात थोड़ा ठीक होंगे और पैसा आएगा तो वह सारा पैसा चुका देगा. बस इसे ले कर दोनों में विवाद शुरू हो गया. बात हाथापाई तक पहुंच गई. उस वक्त रात का समय था.

प्रिया ने नाखूनों से शमशाद का मुंह नोंच डाला. इस के बाद वह दौड़ कर रसोई में गई और चाकू ले आई. उस ने शमशाद पर हमला कर दिया. इस हमले में शमशाद के हाथ की कलाई कट गई.

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हाथ से खून बहता देख शमशाद गुस्से से पागल हो गया और उस ने प्रिया को जोर का धक्का दे दिया. प्रिया जमीन पर गिर पड़ी.

शमशाद ने लपक कर जमीन पर पड़ी प्रिया का गला पकड़ लिया और जोर से दबाने लगा. गुस्से और जुनून में शमशाद उस का गला तब तक दबाता रहा जब तक उस के शरीर ने छटपटाना बंद नहीं कर दिया.

शमशाद के सिर पर चढ़ा गुस्से का उबाल जब शांत हुआ तो उस ने अपने सामने प्रिया का शिथिल पड़ा शरीर देखा. उस ने प्रिया को हिला डुला कर देखा. पहले उसे लगा कि शायद वो बेहोश हो गई है. लेकिन उस ने प्रिया की नब्ज से ले कर नथुनों से आने वाली सांसों को टटोला. तब उसे यकीन हुआ कि उस ने गुस्से में आ कर क्या कर दिया है. प्रिया की मौत हो चुकी थी. तभी शमशाद के दिमाग में एकाएक खुद को बचाने के लिए एक शैतानी खयाल आया.

उस ने सोचा कि क्यों  न प्रिया के साथ उस की बेटी कशिश को भी खत्म कर दिया जाए. जब कोई गवाह ही नहीं रहेगा तो पुलिस उसे किस सबूत के आधार पर पकड़ेगी.

कुछ देर बाद शमशाद लंबी सांस छोड़ते हुए इस तरह निश्चिंत हो गया मानो उस ने सब कुछ तय कर लिया हो. इस के बाद शमशाद पूरा हैवान बन गया. वह दूसरे कमरे में गया, जहां खुद के लिए खतरा बन चुकी प्रिया की 9 साल की बेटी कशिश गहरी नींद सो रही थी.

उस ने कशिश की मासूमियत की परवाह किए बिना बेदर्दी से गला दबा कर उसे भी मार डाला. तब तक 28 मार्च की रात के करीब 12 बज चुके थे.

मांबेटी की हत्या करने के बाद शमशाद ने दोनों लाशों को ठिकाने लगाने की योजना बनाई. पहले उस ने दोनों लाशों को कहीं बाहर ले जा कर ठिकाने लगाने की सोची, मगर पकड़े जाने के डर से योजना बदल दी. 29 मार्च की सुबह करीब 5 बजे शमशाद ने अपने घर के बेडरूम में करीब 3 फुट गहरा गड्ढा खोदा. इस के बाद दोनों लाशों को एक साथ चादर में अच्छी तरह से लपेटा और लाशें गड्ढे में डाल दीं.

लाश जल्दी से गल जाए और बदबू ना आए, इस के लिए उस ने दोनों लाशों के नीचे और ऊपर नमक डाल दिया. ऊपर से मिट्टी डाल कर शमशाद ने ऊपर से वैसा ही सीमेंट वाला प्लास्टर कर दिया जैसा पहले था.

किसी को शक न हो इसलिए ऊपर अपना डबलबैड डाल दिया. वह रात को उसी बैड पर सोता जिस के नीचे कल तक उस की अंकशायिनी बन कर रहने वाली प्रिया व उस की बेटी की लाश दबी थीं.

जिस मकान में यह वारदात हुई, वहां शमशाद अकेला रहता था. फिलहाल वहां फरनीचर फिटिंग का काम चल रहा था. उस की पत्नी गाजियाबाद के इंदिरापुरम में किराए के मकान में रहती थी. पत्नी को बिना बताए उस ने यहां प्रिया के साथ दूसरा घर बसा रखा था.

पूछताछ में पता चला कि बिहार के बेगूसराय का रहने वाला शमशाद करीब 16 साल पहले मेरठ आया था. यहां भूड़बराल में किराए का प्लौट ले कर उस ने उस में 2 कमरे बनाए और वहां बुक बाइंडिंग का काम करने लगा. वहीं वह रहता भी था.

पुलिस को पूछताछ में यह भी पता चला कि शमशाद ने एक और शादी कर रखी थी. बेगूसराय की रहने वाली अफसाना से उस ने परिवार वालों की मरजी से शादी की थी. पत्नी अफसाना व अपने साले दिलावर के साथ वह गाजियाबाद के इंदिरापुरम में किराए पर रहता था. ये मकान भूड़बराल में ही रहने वाले उस के दोस्त कपिल विकल का था.

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शमशाद ने अपनी पत्नी अफसाना व उस के भाई को बता रखा था कि शादी के पहले से ही उस के संबध एक विवाहित महिला प्रिया से हैं, जिन के साथ वो परतापुर में रहता है. शमशाद ने अपनी पत्नी को बताया था कि प्रिया के पास कुछ प्रौपर्टी है, जैसे ही वह प्रौपर्टी उस के कब्जे में आ जाएगी, प्रिया व उस की बेटी को रास्ते से हटा देगा.

जब उस ने प्रिया व उस की बेटी की हत्या कर दी तो अगले दिन गाजियाबाद जा कर अपनी पत्नी व साले को सारी बात बताई कि उस ने किस तरह प्रिया को अपने रास्ते से हटा दिया है. इस के बाद पत्नी अफसाना व साला दिलावर किसी तरह उस के साथ मेरठ पहुंचे और उन्होंने घर में प्रिया की निशानी के सभी सबूत खत्म कर दिए.

इस दौरान भूड़बराल गांव में रहने वाले शमशाद के एक दोस्त नीरज शर्मा को जब अचानक पता चला कि प्रिया और उस की बेटी लापता हैं तो उस ने कपिल विकल के साथ शमशाद से उन के बारे में पूछा शमशाद ने दोनों को सारी हकीकत बता दी और वादा किया कि अगर वे इस झमेले से निकलने में उस की मदद करेंगे तो वह उन को पैसा देगा.

सारी बात जानने के बाद भी उन्होंने पुलिस को ये बात नहीं बताई और उलटा शमशाद की मदद करते हुए न सिर्फ चंचल को धमकाते रहे बल्कि पुलिस से भी शमशाद को बेकुसूर बता कर उस की पैरवी करते रहे.

शमशाद से पूछताछ में इस बात की जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने उस के खिलाफ दर्ज मुकदमे में धारा 302, 201,120बी, 34 जोड़ कर शमशाद की पत्नी अफसाना, उस के भाई दिलावर और भूडबराल निवासी नीरज को भी साजिश में शामिल होने व सबूत नष्ट करने का आरोपी बना दिया.

नीरज को तो पुलिस ने भूड़बराल से गिरफ्तार कर लिया. मगर गाजियाबाद में रहने वाली शमशाद की पत्नी अफसाना व साला दिलावर उस की गिरफ्तारी की भनक पा कर फरार हो गए.

पुलिस उन की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी कर रही थी. हालांकि इस दौरान शमशाद ने भी पुलिस की गिरफ्त से भागने का प्रयास किया था, लेकिन पुलिस ने उसे 24 घंटे बाद ही मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार कर लिया.

आजाद जिंदगी बसर करने की चाह में अलग रहने वाली प्रिया को अपने मातापिता से मतभेद कर के एक ऐसा जीवनसाथी चुनना कितना महंगा पड़ा जो न तो उस के धर्म का था और न उस की नीयत साफ थी.

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प्रिया को अपनी इस गलती के लिए पछताने का भी मौका नहीं मिला. अगर उस की सहेली चंचल अचानक उस के लापता होने पर उस की खोजबीन नहीं करती और इंसाफ के लिए आवाज नहीं उठाती तो हो सकता है प्रिया और उस की बेटी कशिश की मौत का राज कभी उजागर नहीं होता.

(कथा पुलिस की जांच, आरोपियों से पूछताछ व चंचल के बयानों पर आधारित)

दगाबाजी एक आशिक की : भाग 3

वैसे तो चंचल और और प्रिया के बीच सप्ताह में एकदो बार फोन पर बातचीत हो ही जाती थी लेकिन इस बार उसे सप्ताह भर तक बात करने का मौका नहीं मिला. उस ने 30 मार्च को जब प्रिया से बात करने की कोशिश की तो प्रिया का फोन बंद मिला.

अगले दिन उस ने फिर प्रिया से बात करने के लिए फोन मिलाया तो तब भी फोन बंद मिला. जब कई दिन तक ऐसा होता रहा तो चंचल ने शमशाद को फोन कर के पूछा कि प्रिया का फोन बंद क्यों है. उस की तबियत तो ठीक है.

शमशाद ने चंचल को बताया कि हां उस की तबीयत तो ठीक है लेकिन उस का फोन खराब हो गया था. वह अपने किसी रिश्तेदार के घर गई हुई है. चंचल को ये जानकर हैरानी हुई कि आखिर ऐसा कौन सा रिश्तेदार है, जिस के बारे में प्रिया ने उसे नहीं बताया.

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इधर प्रिया का फोन नहीं मिल रहा था, दूसरी ओर वह जब भी शमशाद से प्रिया के बारे में पूछती तो वह इधरउधर की बातें कर के टरका देता था. चंचल समझ गई कि प्रिया के साथ कोई ऐसी अनहोनी हो गई है, जिस की वजह से शमशाद उसे सच नहीं बता रहा है. दिक्कत यह थी कि लौकडाउन के कारण घर से बाहर जा कर भी प्रिया की तलाश नहीं की जा सकती थी.

अचानक अप्रैल महीने में परतापुर थाने का एक दरोगा वीर सिंह चंचल के घर पहुंच गया. उस ने बताया कि शमशाद ने उस के खिलाफ शिकायत दी है कि उस की बीवी प्रिया का चचंल ने बहलाफुसला कर अपहरण कर लिया है. उस ने प्रिया और उस की बेटी की हत्या की आशंका भी जताई है.

इस से चंचल समझ गई कि शमशाद ने प्रिया व उस की बेटी के साथ जरूर कोई अहित कर दिया है और खुद को बचाने के लिए अब उस के ऊपर ही आरोप लगा रहा है. क्योंकि वह प्रिया की छानबीन कर रही थी.

चंचल समझ गई कि अब अगर प्रिया का पता लगाना है तो उसे खुल कर सामने आना होगा. इसलिए वह दरोगा वीर सिंह के बुलावे पर परतापुर थाने पहुंच गई. क्योंकि वहां इंसपेक्टर (क्राइम) भूपेंद्र सिंह शमशाद की शिकायत पर इस मामले की छानबीन कर रहे थे.

चंचल ने उन्हें सब कुछ बता दिया कि कैसे शमशाद ने खुद को हिंदू बता कर प्रिया के साथ छल से प्यार किया और फिर किस तरह उस का भेद खुला. अप्रैल महीने में ही चंचल ने भी इंसपेक्टर भूपेंद्र को लिखित में एक शिकायत दी, जिस में उस ने आरोप लगाया कि उसे आशंका है, शमशाद ने प्रिया व उस की बेटी की हत्या कर लाश कहीं गायब कर दी है.

चंचल ने इंस्पेक्टर भूपेंद्र पर इस बात का भी दबाव डाला कि वे शमशाद और प्रिया के मोबाइल की काल डिटेल्स निकालें. जिस से पता चल सकता है कि जिस समय प्रिया का फोन बंद हुआ उस की व शमशाद की लोकेशन कहां थी.

लेकिन पुलिस तो पुलिस होती है. जब जांच नहीं करनी हो तो वह फरियादी को उलटी कहानी समझा देती है, डरातीधमकाती है. शमशाद के खिलाफ चंचल की शिकायत मिलने के बाद भी पहले परतापुर चौकी इंचार्ज और फिर परतापुर थाने के इंसपेक्टर (क्राइम) भूपेंद्र सिंह उसे बारबार डांट लगाते रहते कि वह क्यों पराई आग में अपने हाथ जला रही है. अगर जांच शुरू हुई तो वो उलटा फंस सकती है.

इतना ही नहीं कभीकभी तो इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह चंचल से बात करते समय अश्लीलता की हद पार कर जाते थे और गालीगलौज तक करने लगते थे. इसी दौरान शमशाद और भूड़बराल में रहने वाले उस के कुछ साथियों ने भी चंचल पर फोन कर के दबाव डाला कि वह इस मामले से दूर रहे वरना खुद फंस जाएगी.

इसी तरह 4 महीने बीत गए. चंचल के सामने कोई चारा नहीं रहा तो उस ने इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह के साथ शमशाद व उस के साथियों से फोन पर हुई बातचीत के औडियो सोशल मीडिया में वायरल कर दिए.

मामला चूंकि संवेदनशील था सो औडियो की बातचीत सुन कर कुछ हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने चंचल से संपर्क साधा और परतापुर पुलिस से इस मामले में काररवाई करने की मांग की.

लेकिन पुलिस ने तो मानो इस मामले में शमशाद को पाकसाफ मानने की कसम खा ली थी. जब हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने देखा की पुलिस कोई एक्शन नहीं लेना चाहती तो 14 जुलाई, 2020 को कई दरजन हिंदू संगठनों के कार्यकर्ता एकत्रित हो कर परतापुर थाने पहुंच गए और परतापुर थानाप्रभारी आनंद प्रकाश मिश्र से मिले और सारी बात बताई.

दबाव बढ़ता देख एसएचओ आनंद मिश्रा ने उसी दिन चंचल की शिकायत पर परतापुर थाने में चंचल व उस की बेटी का मुकदमा अपहरण की धारा 364 आईपीसी के तहत दर्ज करवा दिया. जांच का काम उन्होंने भूपेंद्र सिंह को ही सौंपा. साथ ही इस मामले में जल्द काररवाई करने का सख्त आदेश दिया.

लेकिन पुलिस यहां पर भी नहीं चेती. शमशाद को थाने बुला कर पूछताछ तो की लेकिन बाद में पता चला कि चौकी इंचार्ज वीर सिंह ने 20 हजार व इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह ने 78 हजार रुपए ले कर उसे छोड़ दिया और कोई काररवाई नहीं की.

इस दौरान चंचल परतापुर थाने की पुलिस को फोन कर के रोज पूछती कि शमशाद के खिलाफ कोई काररवाई हुई. लेकिन हर बार उसे नया बहाना बना कर टरका दिया जाता. चंचल समझ गई कि घी सीधी अंगुली से नहीं निकलेगा.

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जिस तरह रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए दबाव बनाया गया था, उसी तरह काररवाई के लिए भी टेढ़ा रास्ता ही अपनाना होगा. और फिर 21 जुलाई को चंचल हिंदू संगठनों के सैकड़ों कार्यकर्ताओं को ले कर परतापुर थाने पहुंच गई.

सैकड़ों की तादाद में लोगों द्वारा थाने को घेरने और प्रदर्शन करने की जानकारी जब पुलिस मुख्यालय में एसएसपी अजय साहनी को मिली तो वे अपनी टीम के साथ परतापुर थाने पहुंचे और उसी रात इस मामले में एक्शन कराया.

जब शमशाद नहीं मिला तो पुलिस ने उस के घर पर बुलडोजर चलवा दिया. लेकिन उसी रात पुलिस की दूसरी टीम ने शमशाद को मुखबिर की सूचना पर गिरफ्तार कर लिया. शमशाद से पूछताछ के बाद उस के घर में बैडरूम के फर्श के नीचे दबे प्रिया व उस की बेटी के कंकाल बरामद हो गए.

मांबेटी की लाशें शमशाद के घर से मिलने के बाद लोग पुलिस के खिलाफ इतने आक्रोशित हो गए कि उन्होंने आरोपी एसआई वीर सिंह तथा इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह को दौड़ा लिया. हालात काबू करने के लिए पीएसी बुलानी पड़ी. तब जा कर भीड़ को काबू किया गया.

इस से यह बात साफ हो गई कि इस मामले में उन दोनों की भूमिका संदिग्ध थी. अगर वे ठीक से जांच करते तो मामला 4 महीने पहले ही खुल जाता. लिहाजा एसएसपी अजय साहनी ने इंसपेक्टर व एसआई को उसी समय सस्पेंड कर दिया और उन के खिलाफ लगे आरोपों तथा वायरल हुए औडियो की जांच का काम सीओ चक्रपाणि त्रिपाठी को सौंप दिया.

पुलिस को शमशाद से पूछताछ में पता चला कि पिछले कुछ समय से प्रिया छोटीछोटी बातों पर उस से लड़ने लगी थी. उसे बातबात में ताना देती थी कि उस ने अपना धर्म छिपा कर उस की जिंदगी खराब कर दी है. इस बीच शमशाद प्रिया पर कभीकभी नमाज अदा करने के लिए भी दबाव बनाता था, जिस की वजह से दोनों के बीच तकरार और ज्यादा बढ़ जाती थी.

हुआ यह कि प्रिया ने कांशीराम कालोनी में जो फ्लैट खरीदा था, शमशाद ने उसे प्रिया पर दबाव डाल कर 3 लाख रुपए में बिकवा दिया और उस से वादा किया कि कुछ दिनों में उस के पास एक बड़ी पेमेंट आने वाली है, जिसे मिला कर वह प्रिया को एक महंगा मकान दिलवा देगा.

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लेकिन 2 महीना गुजर जाने के बाद भी न तो शमशाद ने दूसरा मकान खरीदवाया और न ही बिके हुए मकान की रकम लौटाई. ज्यादा दबाव डालने पर उस ने एक दिन प्रिया को 30 हजार रुपए जरूर लौटाए.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

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