मैं एक तांत्रिक से प्यार करती हूं, क्या करूं?

सवाल

मैं 34 वर्षीय पढ़ीलिखी महिला हूं. पति बिजनैस करते हैं. वे सरल स्वभाव के हैं. ससुराल में कभी किसी चीज की कमी नहीं रही. पर मेरी समस्या थोड़ी अलग है. मेरी शादी 21 साल की उम्र में ही हो गई थी. शादी के 10 सालों तक संतानसुख से वंचित रही थी. दर्जनों डाक्टरों को दिखाया और सासूमां के कहने पर न जाने कहांकहां मन्नतें भी मांगी थीं. अंत में पता चला दोष पति में है.

सासूमां के दबाव में उन के दूर के एक रिश्तेदार, जिन्हें ये लोग गुणी तांत्रिक बताते हैं, से हमारी मुलाकात करवाई गई. तांत्रिक ने बताया कि इन में मां बनने के पर्याप्त अवसर हैं पर ग्रहों की स्थिति सही नहीं है. सासूमां के आग्रह पर तांत्रिक बराबर घर आने लगा. 2-4 दिन रहता फिर चला जाता. इस दौरान मैं तांत्रिक के बहकावे में आ गई और हमारे बीच जिस्मानी संबंध बन गए. धीरेधीरे मुझे खुद भी आनंद आने लगा. तांत्रिक हम उम्र है और जिस्मानी सुख देने में काफी माहिर भी. उस का आनाजाना बेरोकटोक जारी रहा. सासूमां सहित किसी को भी कोई शक नहीं होता. हमारे संबंध और भी मजबूत होते गए. इस बीच मैं गर्भवती हो गई तो ससुराल और मायके वालों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. सब उस तांत्रिक रिश्तेदार की ही कृपा बताते और उस के गुणगान में लगे रहते. संतानप्राप्ति के कुछ महीनों बाद तांत्रिक ने घर आना कम कर दिया.

मैं बराबर फोन करती रही. उस के सामीप्य के लिए तरसती रही. बारबार बुलाने पर वह 2-3 बार आया तो मन को शांति मिली. हमारे फिर से जिस्मानी संबंध बने. इधर 1-2 सालों से वह हमारे घर नहीं आ रहा. मेरे फोन का जवाब भी नहीं देता. मैं चाहती कि घर से बाहर इस रिश्ते को ताउम्र निभाऊंगी पर उस की बेरुखी से मन आहत रहता है. उस ने सिर्फ इतना कहा कि तुम अब अपनी जिंदगी जीओ. इस राज को मैं कभी जाहिर नहीं करूंगा.

मैं पति को नहीं छोड़ सकती, क्योंकि वे मुझे बेहद प्यार करते हैं. उन्होंने कभी मुझ पर शक नहीं किया. पर डरती हूं कि जब बेटा बड़ा होगा और यह राज अगर पति जान लेंगे तो फिर मैं क्या करूंगी? बड़ी उलझन में हूं. क्या पति को सबकुछ सचसच बता दूं? कृपया सलाह दें?

जवाब

शादी के बाद पति से संतान न होना एक बड़ी समस्या है पर आप के पास संतानसुख के लिए और भी बेहतर विकल्प थे. आजकल विज्ञान की तरक्की के चलते तकनीक द्वारा बांझता का दंश झेलने वाली औरतें भी मांएं बन रही हैं.

आप किसी बेसहारे बच्चे को गोद ले कर भी संतानसुख प्राप्त कर सकती थीं. बेहतर होता कि आप खुद व अपनी सासूमां को अंधविश्वास से दूर रखतीं. क्योंकि इस तरह के संबंधों में रिस्क बहुत होता है. वह तांत्रिक आप को कभी भी ब्लैकमेल कर सकता है.

खैर जो होना था वह हो गया. जरूरत है इस गलती के लिए आप को महसूस हो कि आप ने गलती की है और भविष्य में दोबारा ऐसी नादानी नहीं करेंगी. फिलहाल तो उचित यही होगा कि इस राज से परदा न उठने दें.

पति और ससुराल वालों की नजरों में कोई ऐब नहीं है तो दांपत्य को बचाने के लिए इस राज को आप अपने अंदर ही दफन रहने दें. हो सकता है वे इस बारे में जानते हों पर बात मुंह पर न लाते हों पर कुछ को तो यह राज मालूम होगा और कभी भी लीक कर सकता है.

दोषी आप ही नहीं आप की सासूमां और ससुराल के लोग भी हैं जिन्होंने 21वीं सदी में भी अंधविश्वास का लबादा ओढ़े रखा है. उन की सोच आदिम जमाने की है तभी तो वैज्ञानिक युग में भी पूजापाठ, तंत्रमंत्र पर यकीन करते हैं.

यह अच्छी बात है कि तांत्रिक आप की ससुराल वालों का दूर का रिश्तेदार है. शायद इसीलिए वह इस रिश्ते को उजागर नहीं करना चाहता होगा या फिर उस की दुकानदारी बंद न हो जाए, यह सोच कर वह नहीं चाहता होगा कि उस की बदनामी हो. अन्यथा ऐसे धोखेबाज पाखंडी ब्लैकमेल तक करने से गुरेज नहीं करते. आप को दिल पर पत्थर रख कर इस बात को अब हमेशा के लिए दफन करना चाहिए.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
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News Kahani: स्पैनिश औरत का रेप कांड

भारत के झारखंड राज्य का एक आदिवासी जिला है गोड्डा, जिसे 17 मई, 1983 को पुराने संथाल परगना जिले से बाहर बनाया गया था. इसी गोड्डा जिले का बसंत राय तालाब बहुत ज्यादा मशहूर है. यहां का बिसुआ मेला लोगों की जिंदगी में अलग ही रंग बिखेर देता है.

15 दिनों तक चलने वाले इस बिसुआ मेले की पौराणिक और ऐतिहासिक अहमियत है. मेले के दौरान तालाब में सुबह से ही आदिवासी और गैरआदिवासी लोग नहाना शुरू कर देते हैं.

साफा होड़ आदिवासी समुदाय के लोग तालाब में डुबकी लगाने के बाद सादा कपड़े पहन कर कांसे के बरतन में पूजा शुरू करते हैं. इस के बाद उन्हें मांस और शराब का सेवन छोड़ देना होता है.

इसी बसंत राय तालाब से चंद दूरी पर कुछ और ही नजारा था. रात के 8 बजे थे और तालाब से थोड़ा हट कर एक बड़ा शामियाना लगा हुआ था.

दरअसल, नजदीक के एक गांव के दबंग मुखिया श्याम मुर्मू ने हाल ही में पंचायत का चुनाव जीता था. अपने गुरगों को खुश करने के लिए उस ने वहां शराब, कबाब और शबाब का पूरा इंतजाम किया हुआ था.

श्याम मुर्मू का अपने इलाके में पूरा दबदबा था. वह जंगल से गैरकानूनी कमाई करता था. उस के बड़े नेताओं के साथ अच्छे संबंध थे. जिले के एसपी मनोज सिंह से उस की यारी थी. वह खुद बहुत बड़ा औरतखोर था.

अपनी इसी हवस को पूरा करने के लिए श्याम मुर्मू ने आज वहां आरकैस्ट्रा भी बुलाया था, जिस में 2 जवान लड़कियां कम और तंग कपड़ों में फूहड़ गानों पर कमर मटका रही थीं. उन की मांसल देह, मादक डांस स्टैप और पाउडर व लिपस्टिक से लिपेपुते चेहरे बता रहे थे कि वे इस फील्ड की माहिर खिलाड़ी थीं.

स्टेज के नीचे उस गांव के जवान से ले कर बूढ़े तक ललचाई नजरों से उन दोनों लड़कियों के नाजुक अंगों को देख रहे थे. बहुत से लड़के तो उन्हें छू कर अपनी प्यास बुझाने की कोशिश कर रहे थे.

उन्हीं सब में 5 जवान लड़के भी शामिल थे, जो मुखिया के मुंह लगे थे और शराब के नशे में चूर भी. वे पांचों लड़के 18 से 22 साल की उम्र के थे और सभी ज्यादा पढ़ेलिखे भी नहीं थे. वे लड़कियों को देखने में इतना डूबे हुए थे कि उन के शरीर में तरावट सी आ गई थी.

‘‘भाई, अगर यह चिकने गाल वाली लड़की मुझे मिल जाए, तो मैं इसे छील कर रख दूंगा,’’ ब्रजेश मांझी ने कहा.

‘‘सही कहा तुम ने. मन तो मेरा भी कर रहा है कि आज शराब और कबाब के साथसाथ शबाब भी मिल ही जाए,’’ टोनी संथाल ने अपनी छाती पर हाथ फेरते हुए ब्रजेश मांझी से कहा.

‘‘अरे, दूसरी लड़की कौन सा कम है. इस के उभार तो गजब के हैं,’’ तीसरा लड़का प्रदीप मुर्मू बीयर गटकते हुए बोला.

‘‘लेकिन, इस भीड़ में यह लड़की मानेगी? आज तो जेब भी खाली है, वरना अभी इस के मुंह पर पैसे फेंक कर सौदा कर लेता,’’ ब्रजेश मांझी उस लड़की की तरफ आंख मारते हुए बोला.

उस लड़की ने जीभ निकाल कर गंदा इशारा किया, तो वे सब कनखियों से एकदूसरे को देख कर मुसकरा दिए.

इतने में मुखिया का एक गुरगा उन के पास आया और इशारे से बोला कि साहब बुला रहे हैं.

वे पांचों फौरन वहां से चल दिए. जातेजाते ब्रजेश मांझी ने उस लड़की को फ्लाइंग किस दे दी, तो उस लड़की ने भी उसे दूर से चुम्मा चिपका दिया.

‘‘तुम लोग अभी गांव की ओर निकल जाओ. हवेली में मेरा कमरा तैयार करा दो. आज रात को इन दोनों लड़कियों का मजा जो लूटना है,’’ कुछ पुलिस वालों के साथ शराब पी रहे मुखिया श्याम मुर्मू ने एक लड़के ज्ञानू किस्कू के कान में कहा.

‘‘जी, मुखियाजी,’’ ज्ञानू किस्कू धीरे से बोला.

इस के बाद वे सारे लड़के 2 मोटरसाइकिलों पर बैठ कर गांव की ओर निकल गए. पर उन सब के मन में अभी भी वे दोनों लड़कियां समाई हुई थीं.

थोड़ी दूर चलने पर उन्हें एक मोटरसाइकिल पर कोई जोड़ा नजर आया. ज्यादा रोशनी न होने पर पहले तो उन्होंने उस जोड़े पर ध्यान नहीं दिया, पर जब वे नजदीक से गुजरने लगे तो उन पांचों की आंखें फटी की फटी रह गईं. उस मोटरसाइकिल पर एक विदेशी जोड़ा सवार था. वे दोनों जवान थे और लड़की तो एकदम सैक्सी लग रही थी.

संजय उरांव नाम के लड़के को थोड़ी बहुत इंगलिश आती थी. उस ने तेज आवाज में उस जोड़े से इंगलिश में पूछा, ‘‘कहां से हो?’’

लड़की ने इंगलिश में ही कहा, ‘‘इक्वाडोर से. हम स्पैनिश हैं.’’

इतने में ब्रजेश मांझी ने पता नहीं क्या सोच कर उस लड़की की तरफ फ्लाइंग किस का इशारा कर दिया.

उस लड़की ने भी हंसते हुए उसी अंदाज में जवाब दे दिया. दरअसल, उस जोड़े ने सुन रखा था कि अब भारत एक सेफ कंट्री बन गया है और यहां पर विदेशी मेहमानों के साथ दोस्ताना बरताव किया जाता है.

वैसे, जब यह जोड़ा दुनिया घूमने निकला था, तब लंदन में रहने के दौरान कुछ भारतीय लोगों ने इन्हें कहा भी था कि भारत में थोड़ा संभल कर रहना, पर चूंकि वह कैथोलिक लड़की, जिस का नाम विवियाना था और जो इक्वाडोर में योग सिखाती थी, को उस के भारत में बैठे योगगुरुओं ने कहा था कि तुम भारत आओ, स्वागत है.

यह जोड़ा ऋषिकेश से होता हुआ अब उत्तरपूर्वी राज्यों की तरफ जा रहा था. रास्ते में झारखंड देखने की इच्छा हुई, तो यहां गोड्डा के पास एक सस्ते होटल में रह रहा था और अब इस सुनसान रास्ते से हो कर होटल जा रहा था. इन्हें अगले ही दिन यहां से रवाना होना था.

जब विवियाना ने ब्रजेश मांझ को फ्लाइंग किस दी, तो इन पांचों को लगा कि यह विदेशी गोरी तो लाइन दे रही है. शराब का नशा और हवस तो इन पर पहले से ही हावी थी, तो इन्होंने उन दोनों को रुकने का इशारा कर दिया.

विवियाना के साथ जो लड़का था, उस का नाम मार्कोस था. उस ने सोचा कि ये चोरउचक्के हैं. वह विवियाना से स्पैनिश में बोला, ‘‘मोटरसाइकिल की सीट के नीचे एक सीक्रेट कंपार्टमैंट में पिस्टल रखी है. निकाल लूं क्या?’’

विवियाना ने स्पैनिश में ही कहा, ‘‘रहने दो. ये सब शराब के नशे में हैं और थोड़ी मस्ती कर रहे हैं. हो सकता है कि इन्हें किसी तरह की मदद की जरूरत हो, तो तुम मोटरसाइकिल रोक दो.’’

विवियाना के कहने पर मार्कोस ने मोटरसाइकिल रोक दी. वे पांचों भी रुक गए.

इतने में संजय उरांव ने इंगलिश में पूछा, ‘‘भरी हुई सिगरेट पीनी है?’’

कार्लोस ने इंगलिश में पूछा, ‘‘आप का मतलब चरस से है?’’

‘‘हां,’’ संजय उरांव ने कहा और 3 सिगरेट जला लीं और उन में से 2 सिगरेट उन्हें पकड़ा दीं.

विवियाना ने झना टौप और देह दिखाता पाजामा पहना हुआ था. कमीज के ऊपर के 2 बटन खुले हुए थे. उस के बड़े उभार और काली ब्रा मानो उन पांचों को न्योता दे रही थी.

इक्वाडोर में इस तरह का खुला माहौल हमेशा ही रहता है. वहां सैक्स और नशे का आलम इतना ज्यादा है कि यह देश बरबादी के कगार पर पहुंच गया है.

मार्कोस और विवियाना चरस भरी सिगरेट पीने लगे. उन्हें अंदाजा नहीं था कि जिस देश को वे योगगुरु और सेफ कंट्री समझ कर आए थे, वहां उन के साथ क्या होने वाला है.

चरस की सिगरेट पीते ही वे दोनों भी नशे में हो गए. मार्कोस इंगलिश में बोला, ‘‘मैं जरा पेशाब कर के आता हूं. आप ऐंजौय करो.’’

‘ऐंजौय’ शब्द सुन कर उन पांचों की जवानी जोर मारने लगी. मार्कोस के थोड़ा दूर जाते ही ब्रजेश मांझी ने अपने हाथों से विवियाना का मुंह बंद दिया और प्रदीप मुर्मू व ज्ञानू किस्कू ने टांगों से पकड़ कर उसे जमीन पर लिटा दिया.

विवियाना समझ गई कि ये लड़के किसी और इरादे से यहां आए हैं. उस ने छूटने की कोशिश की, पर नाकाम रही. बाकी 2 लड़के संजय उरांव और टोनी संथाल मार्कोस को रोकने के लिए घात लगा कर बैठ गए.

मार्कोस जब पेशाब कर के आया तो उस ने देखा कि विवियाना जमीन पर पड़ी है. उस के बदन पर कमीज नहीं है और ब्रा भी न के बराबर ही है. उस का नशा काफूर हो गया.

मार्कोस सवा 6 फुट का हट्टाकट्टा नौजवान था. वह विवियाना की तरफ लपका तो संजय उरांव और टोनी संथाल ने उसे दबोचना चाहा, पर मार्कोस ने फुरती दिखाते हुए खुद को उन से अलग किया और उन दोनों पर ताबड़तोड़ घूंसे बरसा दिए.

इस हमले से संजय उरांव और टोनी संथाल अपना होश खो बैठे, पर इतने में प्रदीप मुर्मू पीछे से वहां आया और उस ने मोटरसाइकिल के पाने से मार्कोस के सिर पर वार कर दिया. मार्कोस वह वार झेल नहीं पाया और गिर कर बेहोश हो गया.

रास्ता साफ देख कर वे तीनों भी विवियाना के पास जा पहुंचे. वह इंगलिश में गिड़गिड़ा रही थी, ‘‘हमें जाने दो. हम तो तुम्हें दोस्त समझ रहे थे, पर तुम ने हमें धोखा दिया.’’

ब्रजेश मांझी के सिर पर तो हवस सवार थी. उस ने विवियाना का पाजामा खींच दिया और उस पर सवार हो गया.

प्रदीप मुर्मू बोला, ‘‘भाई, जल्दी कर. हमें भी मजे लेने हैं. गांव की सड़क पर विदेशी लड़की का स्वाद कहां बारबार चखने को मिलेगा…’’

संजय उरांव ने कहा, ‘‘आज तो हम विवियाना को दुनिया की सैर यहीं करा देंगे.’’

विवियाना समझ गई थी कि अब वह ज्यादा जोर लगाएगी तो ये सब उसे मार डालेंगे. उस ने खुद को ढीला छोड़ दिया. उन पांचों ने बारीबारी से उसे रौंदा और ऐसे ही सड़क पर छोड़ कर भाग गए.

विवियाना और मार्कोस कुछ देर तक वहीं पड़े रहे, फिर थोड़ी जान आने पर विवियाना उठी, धीरेधीरे अपने कपड़े पहने और मार्कोस के पास गई. उस की बेहोशी तो टूट चुकी थी, पर सिर से खून ज्यादा बह गया था.

विवियाना किसी तरह मार्कोस को मोटरसाइकिल पर लाद कर पास के एक सरकारी अस्पताल में ले गई.

इतनी रात को कोई उस अस्पताल में डाक्टर तो था नहीं, पर वहां के मुलाजिम समझ गए थे कि कोई बड़ा कांड हुआ है. उन्होंने डाक्टर और पुलिस दोनों को फोन कर दिया.

पुलिस इंस्पैक्टर हरि उईके ने विवियाना और मार्कोस की हालत देख कर अंदाजा लगा लिया कि यह मामला तो दुमका जैसा ही लग रहा है, जहां 1 मार्च को ऐसा ही कांड हुआ था.

इंस्पैक्टर हरि उईके के हाथपैर फूल गए. उसे ज्यादा इंगलिश भी नहीं आती थी. उस ने तुरंत जिले के एसपी मनोज सिंह को फोन लगा दिया.

एसपी मनोज सिंह भी आननफानन वहां पहुंच गए और डाक्टर से मामला समझ.

डाक्टर ने बताया, ‘‘रेप और मारपीट का मामला है. विदेशी नौजवान ज्यादा घायल है, पर खतरे से बाहर है. लड़की का गैंगरेप हुआ है.’’

एसपी मनोज सिंह ने इंगलिश में उस जोड़े से बात की और उन पांचों लड़कों का हुलिया लिया.

अस्पताल के एक मुलाजिम को शक हुआ कि मुखिया के जश्न में शामिल उस के गुरगों ने यह कांड किया होगा. उस ने एसपी साहब को चुपके से यह बात बता दी.

एसपी मनोज सिंह ने विवियाना से इंगलिश में पूछा, ‘‘आप क्या चाहती हैं? यह मामला ज्यादा उछला तो आप की भी बदनामी होगी. हाल ही में दुमका जिले में भी ऐसा ही कांड हुआ है.’’

‘‘कैसा कांड…?’’ पूछते हुए विवियाना को हैरत हुई.

एसपी मनोज सिंह ने बताया, ‘‘पिछली 1 मार्च की बात है. कई देशों से होता हुआ बंगलादेश के बाद एक विदेशी स्पैनिश जोड़ा मोटरसाइकिल से भारत आया था और उसे यहां से आगे नेपाल जाना था. वे दोनों पतिपत्नी झारखंड के दुमका में पहुंचे थे, जो यहां से सटा हुआ जिला है. वहां वे लोग हंसडीहा थाना इलाके के कुरमाहाट गांव में टैंट लगा कर रुके थे. वहीं यह कांड हुआ था.

‘‘वह औरत 28 साल की थी, जबकि उस का पति कुछ ज्यादा बड़ी उम्र का था. वे दोनों मोटरसाइकिल पर दुनिया घूमने निकले थे. जब वे कुरमाहाट पहुंचे, तो 1 मार्च की रात को कुछ लड़कों, जो तादाद में 7-8 थे, ने उन्हें दबोच लिया था.

‘‘उस औरत ने पुलिस को आपबीती सुनाते हुए बताया था, ‘यहां आ कर हम ने जंगल के पास एक टैंट गाड़ दिया था. शाम के 7 बजे जब हम अपने टैंट में थे, तब बाहर कुछ आवाजें आने लगीं. हम टैंट से बाहर आए, तो देखा कि 2 लोग फोन पर बात कर रहे थे. साढ़े 7 बजे के आसपास 2 मोटरसाइकिल पर कुछ और लोग भी आ गए. फिर उन्होंने बाहर से हमें कहा कि ‘हैलो फ्रैंड्स’.’’

‘‘इस के बाद उस औरत ने आगे बताया था, ‘हम दोनों टैंट से बाहर आए और हैड टौर्च जलाई. हम ने देखा कि अचानक 5 लोग हमारी तरफ आए और 2 लोग हमारे टैंट की तरफ गए. वे सब अपनी लोकल भाषा में बातचीत कर रहे थे और बीचबीच में इंगलिश भी बोल रहे थे.’

‘‘उस औरत ने बताया था, ‘कुछ देर के बाद 3 लड़के मेरे पति से झगड़ने लगे और उन के हाथ बांध दिए. बाकी

4 लड़कों ने मुझे छुरा दिखाया और जबरदस्ती उठा लिया. फिर मुझे जमीन पर पटक दिया और लातघूंसों से खूब मारा. इस के बाद उन सब ने मेरे साथ रेप किया. मुझे महसूस हुआ कि उन सब ने शराब पी रखी थी. यह पूरा कांड शाम के साढ़े 7 बजे और रात के 10 बजे के बीच हुआ.’’’

विवियाना बड़े ध्यान से यह सब सुन रही थी. पास ही बिस्तर पर लेटे मार्कोस ने इंगलिश में कहा, ‘‘हमारे साथ भी तो ऐसा ही हुआ है.’’

एसपी मनोज सिंह ने इंगलिश में कहा, ‘‘लेकिन, आप के साथ कोई लूटपाट नहीं हुई है, जबकि उस औरत ने आगे बताया था, ‘उन लोगों ने हमारा एक स्विस नाइफ (एक तरह का चाकू), कलाई घड़ी, हीरा जड़ी एक प्लेटिनम की अंगूठी, चांदी की अंगूठी, काले रंग के ईयरपौड, काले रंग का पर्स, क्रेडिट कार्ड, चांदी का चम्मच और कांटा छीन लिए थे. 13,000 रुपए नकद और 300 डौलर भी ले लिए थे.’

‘‘उस औरत ने यह भी बताया था कि अब तक उन दोनों ने 20,000 किलोमीटर का सफर तय किया था, पर किसी भी देश में ऐसी कोई वारदात नहीं हुई थी. हालांकि, उस ने भारत के लोगों की तारीफ की, पर यह कांड तो भारत में हुआ न…’’

‘‘क्या उस औरत को भी चोटें आई थीं?’’ विवियाना ने एसपी मनोज सिंह से इंगलिश में पूछा.

‘‘उस औरत ने पुलिस को बताया था, ‘मुझे लग रहा था कि आरोपी उस रात मेरी हत्या कर देंगे, मगर मैं अभी भी जिंदा हूं. घटना के बाद मैं खुद बाइक चला कर इलाज के लिए अस्पताल पहुंची थी,’’’ एसपी मनोज सिंह ने जानकारी दी.

कुछ देर वहां चुप्पी छाई रही, फिर एसपी मनोज सिंह ने आगे कहा, ‘‘आप लोगों को रात को अकेले नहीं घूमना चाहिए था.’’

इतने में अस्पताल के एक मुलाजिम ने अपने मोबाइल फोन पर देखते हुए बताया, ‘‘साहब, ईटीवी भारत की एक खबर और रेप के आंकड़ों पर नजर डालें, तो पता चलता है कि साल 2018 से ले कर 2023 के दिसंबर तक झारखंड के अलगअलग जिलों में दुष्कर्म की 14,162 वारदातें अलगअलग थानों में दर्ज की गई थीं.

‘‘बोकारो में 762, चाईबासा में 497, देवघर में 446, धनबाद में 1021, दुमका में 318, गढ़वा में 897, गिरिडीह में 925, गोड्डा में 669, गुमला में 605, हजारीबाग में 967, जमशेदपुर में 740, जामताड़ा में 198, खूंटी में 237, कोडरमा में 281, लातेहार में 384, लोहरदगा में 416, पाकुड़ में 357, पलामू में 704, रेल धनबाद में

5, रेल जमशेदपुर में 3, रामगढ़ में 318, रांची में 1,484, साहिबगंज में 872, सरायकेला में 295 और सिमडेगा में 323 रेप के मामले दर्ज किए गए.’’

‘‘तो क्या इन रेपिस्टों का कुछ नहीं होगा?’’ विवियाना ने एसपी मनोज सिंह से इंगलिश में सवाल किया.

‘‘होगा क्यों नहीं? हम इन्हें धर दबोचेंगे. दुमका के एसपी पीतांबर सिंह खेरवार ने भी उस मामले में बड़ी गंभीरता और तेजी दिखाई थी. जब वे तीनों आरोपियों के पकड़े जाने के बाद जानकारी दे रहे थे, तब उन्होंने इस मामले के बारे में एकएक बात पर रोशनी डाली थी.

‘‘उन्होंने कहा था, ‘1 और 2 मार्च की आधी रात में पुलिस टीम इलाके से गुजर रही थी, जब उन्हें युगल मिला. शुरुआत में पुलिस को लगा कि यह मारपीट का मामला है. उन्हें अस्पताल ले जाया गया और डाक्टर ने कहा कि महिला के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ है.’

‘‘फिर एसपी साहब ने आगे कहा था, ‘मैं ने पुलिस टीम के साथ पहले अस्पताल का दौरा किया और फिर उस जगह का दौरा किया, जहां घटना हुई थी. स्पैनिश जोड़े द्वारा पुलिस को दी गई जानकारी के आधार पर हम ने छापामारी की और 3 लोगों को हिरासत में लिया, जिन्होंने इस जघन्य अपराध में अपनी संलिप्तता स्वीकार की.

‘‘उन्होंने अपने सहयोगियों के नामों का भी खुलासा किया. अन्य दोषियों की गिरफ्तारी के लिए एसआईटी गठित कर छापामारी की जा रही है. मैं व्यक्तिगत रूप से मामले की निगरानी कर रहा हूं.’’’

विवियाना और मार्कोस एकदूसरे को देख रहे थे. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि भारत में इतने ज्यादा रेप कांड क्यों होते हैं और वे दोनों बेवजह यहां फंस गए हैं.

एसपी मनोज सिंह समझ गए थे कि उन दोनों के मन में क्या चल रहा है. उन्होंने विवियाना को थोड़ा दूर ले जा कर इंगलिश में कहा, ‘‘जिन लड़कों ने आप के साथ यह कांड किया है, पुलिस उन्हें छोड़ेगी नहीं. मेरी उस मुखिया से जानपहचान है. मैं उसे धमका कर आप को 10 लाख रुपए दिलवा सकता हूं. हम मामला यहीं रफादफा कर देते हैं. फिर 1-2 दिन बाद आप यहां से चली जाना.’’

विवियाना खामोश रही. एसपी मनोज सिंह ने इस चुप्पी को रजामंदी समझाते हुए मुखिया श्याम मुर्मू को फोन लगाया और बोले, ‘‘मुखियाजी, आप के लड़कों ने कांड कर दिया है. रेप किया है एक विदेशी लड़की का.’’

उधर से मुखिया श्याम मुर्मू ने कहा, ‘ये पांचों मेरे ही पास बैठे हैं. एसपी साहब, मैं ने अभी ही सरपंच का चुनाव जीता है. अगर यह मामला खुल गया, तो पूरे इलाके में मेरी थूथू हो जाएगी.’

‘‘थूथू ही नहीं होगी, बल्कि मैं तुम्हारे पिछले कांड भी खुलवा दूंगा. बड़ा पैसा बनाया है दो नंबर की कमाई से. थोड़ा जेब को ढीला करो. 10 लाख इस लड़की को दो और 5 लाख मुझे. यह बड़ी मुश्किल से मानी है, वरना तुम्हारे घर पर बुलडोजर चलवा दूंगा,’’ एसपी मनोज सिंह ने धमकी दी.

मुखिया श्याम मुर्मू मान गया. एसपी मनोज सिंह अगले दिन विवियाना और मार्कोस को मुखिया के यहां ले गए और उन से पैसे दिलवा दिए. वे अपने 5 लाख रुपए भी लेने नहीं भूले. विवियाना और मार्कोस भी समझ गए थे कि पैसे लेने में ही भलाई है.

और मैंने जीना सीख लिया: हवस के चक्रव्यूह में फंसी कोमल

कोमल रसोईघर में खाना बना रही थी कि तभी मां ने आवाज दी, ‘‘कोमल, पापा को पानी पिला दे. बुखार से उन के होंठ सूख रहे होंगे.’’

कोमल कटोरीचम्मच ले आई और पापा को थोड़ा सा पानी पिला दिया.

पापा के पैर दबाते हुए मां ने कहा, ‘‘जरा अलमारी में देखना कि कितने पैसे रखे हैं. तुम्हारे पापा की दवा खत्म हो गई है.’’

कोमल ने देखा कि अलमारी में तो इतने पैसे भी नहीं थे कि एक वक्त की दवा आ सके. वह परेशान हो गई कि अब क्या करे? किसी से मदद मिलने की कोई उम्मीद भी नहीं थी, क्योंकि उन्होंने पहले ही बहुत लोगों से कर्ज ले रखा था.

अचानक कोमल को अपने पापा के पुराने दोस्त सूरज अंकल का खयाल आया. किसी जमाने में वे दोनों अच्छे दोस्त थे, पर पता नहीं किसी वजह से उस के पापा ने सूरज अंकल से दोस्ती तोड़ ली थी.

कोमल उसी वक्त सूरज अंकल के घर चल पड़ी.

सूरज घर में अकेले थे. अचानक कोमल को देख कर वे चौंक गए. कुछ समय पहले एक छोटी सी बच्ची दिखने वाली कोमल आज खिलती कली सी खूबसूरत लग रही थी. उस की निखरती जवानी को देख कर सूरज का चेहरा खिल उठा.

जब कोमल ने बताया कि उस के पापा की तबीयत ज्यादा खराब है और वह मदद के लिए आई है, तो उस की मजबूरी में सूरज को अपनी हैवानियत की जीत नजर आ रही थी.

उस ने कोमल से कहा, ‘‘चलो, मैं किसी एटीएम से पैसे निकाल कर तुम्हें दे देता हूं.’’

इस के साथ ही वे दोनों गाड़ी में बैठ कर घर से निकल पड़े. रास्ते में सूरज ने कोमल के साथ छेड़खानी करनी चाही.

कोमल को अपने पिता की उम्र के शख्स से इस तरह के घटिया बरताव की उम्मीद नहीं थी. लिहाजा, वह गुस्से में गाड़ी से उतर गई.

सूरज ने बेहूदगी से गाड़ी मोड़ते हुए कहा, ‘‘अगर किसी भी मदद की जरूरत हो, तो एक रात के लिए मेरे पास आ जाना. तुम जो चाहोगी, मैं दे दूंगा.’’

कोमल ने नफरत से मुंह फेर लिया था. अब वह समझ चुकी थी कि उस के पापा ने यह दोस्ती क्यों तोड़ी थी.

खुद को बेबस महसूस करती कोमल भारी कदमों से घर की ओर चल पड़ी. घर पहुंचते ही उस के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई, क्योंकि उस के पापा इस दुनिया से जा चुके थे.

मां कोमल को देखते ही बिलख उठीं, ‘‘तू कहां चली गई थी बेटी? देख, तेरे पापा हमें छोड़ कर चले गए.’’

मां रो रही थीं. तीनों छोटे भाईबहन भी रो रहे थे. कुछ पड़ोसी भी आ गए थे. पर कोमल की आंखों में आंसू नहीं थे. वह तो जैसे पत्थर हो गई थी.

वह सोच रही थी कि जब घर में दवा के लिए पैसे नहीं हैं, तो पिता के अंतिम संस्कार के लिए पैसे कहां से आएंगे?

अब कोमल की इज्जत और पिता का अंतिम संस्कार तराजू के दो पलड़ों में तुल रहे थे और पिता के अंतिम संस्कार का पलड़ा भारी रहा. कोमल चल दी सूरज के पास, अपने वजूद का अंतिम संस्कार करने के लिए.

सुबह होने से पहले कोमल पैसे ले कर लौट आई थी. उस के पिता का अंतिम संस्कार अच्छी तरह से हो गया. कुछ दिनों के खाने का भी इंतजाम हो गया था, लेकिन फिर वही चिंता कि छोटे भाईबहनों की पढ़ाई और खानेपीने का खर्च कहां से आएगा?

सूरज ने कोमल को नौकरी दिलाने का भरोसा दिया था. शर्त वही थी एक रात. बूढ़ी मां, भाईबहन की जरूरतों को पूरा करने के लिए कोमल ने अपने सपनों की आहुति दे दी और सूरज के पास चली गई.

सूरज ने कोमल को अपने ही दफ्तर में नौकरी पर रख लिया. अब जब भी सूरज चाहता, कोमल को बुला लेता. न चाहते हुए भी कोमल इस दलदल में फंसती चली गई.

कोमल की मां कुछकुछ समझ रही थीं, पर विरोध नहीं कर पाती थीं, क्योंकि वे जानती थीं कि बिना पैसों के गुजारा करना मुश्किल था.

धीरेधीरे कोमल के दोनों भाइयों ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली और कोमल की मदद से ही दोनों ने अपने अलगअलग कारोबार शुरू कर लिए.

कोमल की छोटी बहन की भी पढ़ाई पूरी हो चुकी थी. उस के स्वभाव और खूबसूरती को देखते हुए उसी के कालेज के प्राध्यापक ने शादी का प्रस्ताव भेजा. कोमल को भी यह रिश्ता अच्छा लगा. सो, चट मंगनी पट ब्याह हो गया.

कोमल बड़ी थी. मां ने उस से शादी करने के लिए कहा, पर वह चुप रही. वह जानती थी कि जिस दलदल में वह फंस चुकी है, अब उस से बाहर नहीं निकल सकती.

सूरज अब कोमल के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताता था, इसलिए उस ने एक फ्लैट ले लिया था. वह अब उस की इज्जत करता था. अकसर उस के लिए तोहफे लाता, कभीकभी बाहर भी घुमाने ले जाता.

कोमल खूबसूरत तो थी ही, अच्छे रहनसहन और महंगे कपड़ों ने उस के रूप को और भी निखार दिया था. वक्त के साथसाथ कोमल ने अपनी अदाओं से लोगों का दिल जीतना भी सीख लिया था.

एक दिन कोमल को मौडलिंग करने का औफर मिला. बस, फिर क्या था. एक के बाद एक नए औफर आने लगे और कोमल मिस काम्या के नाम से मशहूर हो गई.

बहुत से रईस नौजवान लड़के मिस काम्या के दोस्त बन गए थे. वह उन को अपने इशारों पर नचाती थी.

मिस काम्या के कई मौडल दोस्तों को उस को इतनी ऊंचाइयों पर देख कर जलन होती थी.

अब अकसर पार्टियां होती रहतीं और नौजवान लड़के लड़कियां अपनी ख्वाहिशें भी पूरी करते और पैसों की बरसात भी होती रहती.

मिस काम्या किसी भी लड़की को अपने धंधे में लाने का मोटा कमीशन लेती थी. बड़े घरों की बिगड़ी लड़कियों के खर्चे भी ज्यादा होते थे, जो मिस काम्या की वजह से आसानी से पूरे हो जाते थे.

मिस काम्या अब कोमल को पूरी तरह भूल गई थी. घर में भी सब उस को इज्जत की निगाह से देखते.

मिस काम्या खुश थी कि अब उस ने भी जीना सीख लिया था.

शापित: आखिर रश्मि अपने बेटे के साथ क्यों नहीं रहना चाहती थी

‘‘रश्मि, कहां हो तुम?

‘‘भई यह करेलों का मसाला तो कच्चा ही रह गया है.’’

फिर थोड़ी देर रुक कर भूपिंदर हंसते हुए बोला, ‘‘सतीशजी जिस दिन कुक नहीं आती हैं, ऐसा ही कच्चापक्का खाना बनता है.’’

ये सब बातें करतेकरते भूपिंदर यह भी भूल गया था कि आज रश्मि कोई नईनवेली दुलहन नहीं है, बल्कि सास बनने वाली है और आज जो खाने की मेज पर मेहमान बैठे हैं वे उस की होने वाली बहू के मातापिता हैं.

मम्मी के हाथों में करेले पकड़ाते हुए आदित्य बोला, ‘‘क्या जरूरत थी सोनाक्षी के मम्मीपापा को घर पर बुलाने की? ‘‘आप को पता है न वे कैसे हैं?’’

जैसे ही आदित्य बाहर आया तो भूपिंदर बोला, ‘‘भई, यह आदित्य तो अब तक मम्मा बौय है, सोनाक्षी को बहुत मेहनत करनी पड़ेगी.’’

आदित्य भी बिना लिहाज करे बोला, ‘‘मैं ही नहीं पापा, सोनाक्षी भी मम्मा गर्ल ही बनेगी.’’

तभी रश्मि खिसियाते हुए डाइनिंगटेबल पर फिर से करेलों की प्लेट ले कर आ गई. नारंगी और हरी तात कौटन की साड़ी में रश्मि बहुत ही सौम्य और सलीकेदार लग रही थी. खाना अच्छा ही बना हुआ था और डाइनिंगटेबल पर बहुत सलीके से लगा भी हुआ था, परंतु भूपिंदर फिर भी कभी नैपकिन के लिए तो कभी नमकदानी के लिए रश्मि को टोकता ही रहा.

माहौल में इतना अधिक तनाव था कि अच्छेखासे खाने का जायका खराब हो गया था. खाने के बाद भूपिंदर सतीश को ले कर ड्राइंगरूम में चला गया तो पूनम मीठे स्वर में रश्मि से बोली, ‘‘खाना बहुत अच्छा बना था और लगा भी बहुत सलीके से था.’’

‘‘परंतु लगता है भाईसाहब कुछ ज्यादा ही परफैक्शनिस्ट हैं.’’

रश्मि की बड़ीबड़ी शरबती आंखों में आंसू दरवाजे पर ही अटके हुए थे, उन्हें पीते हुए धीरे से बोली, ‘‘पूनमजी पर मेरा आदित्य अपने पापा से एकदम अलग हैं… हम आप की सोनाक्षी को कोई तकलीफ नहीं होने देंगे.’’

पूनम अच्छी तरह समझ सकती थी कि रश्मि के मन पर क्या बीत रही होगी.

आदित्य और सोनाक्षी दोनों रोहिणी के जयपुर गोल्डन हौस्पिटल में डाक्टर हैं. दोनों एकदूसरे को पसंद करते हैं और जैसेकि आजकल होता है परिवार ने उन की पसंद पर सहमति की मुहर लगा दी थी. आज विवाह की आगे की बातचीत के लिए पूनम और सतीश आदित्य के घर खाने पर आए थे. भूपिंदर का यह रूप उन्हें अंदर तक हिला गया था. आदित्य का गुस्सा भी उन से छिपा नही था.

रास्ते में पूनम से रहा न गया, तो सतीश से बोली, ‘‘सबकुछ ठीक है, पर क्या तुम्हें लगता है कि आदित्य ठीक रहेगा अपनी सोनाक्षी के लिए?’’

‘‘उस के पापा उस की मम्मी को कितना बेइज्जत करते हैं. लड़का वही देख कर बड़ा हुआ है. मुझे तो डर है कि कहीं आदित्य भी सोनाक्षी के साथ ऐसा ही व्यवहार न करे.’’

सतीश बोला, ‘‘देखो हम सोनाक्षी को सब बता देंगे, उस की जिंदगी है, फैसला भी उसी का होगा.’’

उधर रश्मि को लग रहा था कि कहीं भूपिंदर के व्यवहार के कारण सोनाक्षी और आदित्य के विवाह में रुकावट न आ जाए.

आदित्य सोनाक्षी के मम्मीपापा के जाते ही भूपिंदर पर उबल पड़ा, ‘‘क्या जरूरत थी आप को सोनाक्षी के मम्मीपापा के सामने ऐसा व्यवहार करने की?’’

भूपिंदर बोला, ‘‘घर मेरा है, मैं जो चाहूं करूं. इतनी ही दिक्कत है तो अलग रह सकते हो.’’

तभी आदित्य ने दरवाजे पर खटखट की, तो रश्मि मुसकराते हुए बोली, ‘‘अंदर आ

जा, खटखट क्यों कर रहा है.’’

आदित्य बोला, ‘‘मम्मी, पापा का यह व्यवहार और तुम्हारा चुपचाप सब सहन करना मुझे अंदर तक आहत कर जाता है. आज मैं सोनाक्षी के मम्मीपापा के सामने आंख भी नहीं उठा पाया हूं. गुलाम बना कर रखा हुआ है इन्होंने हमें.’’

रश्मि आदित्य के सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, ‘‘आदित्य शिखा तेरी छोटी बहन तो गोवा में मैडिकल की पढ़ाई कर रही है और तू बेटा शादी के बाद अलग घर ले लेना.’’

आदित्य बोला, ‘‘मम्मी और आप? मैं क्या इतना स्वार्थी हूं कि आप को अकेला छोड़ कर चला जाऊंगा?’’

रश्मि उदासी से बोली, ‘‘मैं तो शापित हूं, इस साथ के लिए बेटा. पर मैं बिलकुल नहीं चाहती कि तुम या सोनाक्षी ऐसे डर के साथ जिंदगी व्यतीत करो.’’

आदित्य का हौस्पिटल जाने का समय हो गया था. आज उस की नाइट शिफ्ट थी. फिर रश्मि आंखें बंद कर के सोने का प्रयास करने लगी पर नींद थी कि आंखों से कोसों दूर. आदित्य की शादी की उस के मन में कितनी उमंगें थीं. मगर वो अच्छी तरह जानती थी. हर बार गहनेकपड़ों के लिए उसे भूपिंदर

के आगे हाथ फैलाना पड़ेगा. भूपिंदर कितनी लानत भेजेगा और साथ ही साथ वह यह भी जोड़ेगा कि उस ने आदित्य की मैडिकल की पढ़ाई में क्व25 लाख खर्च किए हैं.

रश्मि का कितना मन करता था कि वह अपनी पसंद के कपड़े ले, परंतु भूपिंदर ही उस के लिए कपड़े खरीदता था, क्योंकि उस के हिसाब से रश्मि को तमीज ही नहीं है अच्छे कपड़े खरीदने की.

रश्मि के वेतन की पाईपाई का हिसाब भूपिंदर ही रखता था. जब कोई भी रश्मि के कपड़ों की तारीफ करता तो भूपिंदर छूटते ही बोलता, ‘‘मैं जो खरीदता हूं अन्यथा यह तो दलिद्र ही खरीदती और पहनती है.’’

रिश्तेदारों और पड़ोसियों को लगता था कि भूपिंदर जैसा शाहखर्च कौन हो सकता है, जो अपनी बीवी का वेतन उस के गहनेकपड़ों पर ही खर्च करता है. आजकल के जमाने में ऐसे पतियों की कमी नहीं है जो अपनी पत्नी के वेतन से घर खर्च चलाते हैं. रश्मि कैसे समझाए किसी को, गहने, कपड़ों से अधिक महत्त्व सम्मान का होता है.

यह जरूर था कि भूपिंदर अपने काम का पक्का था, इसलिए दिनदूनी और रात चौगुनी तरक्की कर रहा था. इस तरक्की के साथसाथ उस का अहम भी सांप के फन की तरह फुफकारने लगा था. शादी के कुछ वर्षों के बाद ही रश्मि के कानों में भूपिंदर के अफेयर की बातें पड़ने लगी थीं. पर जब भी अलग होने की सोचती तो आदित्य और शिखा का भविष्य दिखने लगता. कैसे पढ़ा पाएगी वह दोनों बच्चों को दिल्ली जैसे शहर की इस विकराल महंगाई में. नालायक ही सही पर सिर पर बाप का साया तो रहेगा.

रश्मि के हथियार डालते ही भूपिंदर उस पर और हावी हो गया था. रातदिन वह रश्मि को कोंचता रहता था पर अब उस हिमशिला पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था.

घर 3 कोणों में बंट गया था, एक पाले में रश्मि, आदित्य और दूसरे पाले में था भूपिंदर. शिखा आज के दौर की स्मार्ट लड़की थी इसलिए वह किसी भी पाले में नहीं थी, वह अपने हिसाब से पाला बदलती रहती थी. आदित्य बेहद ही संवेदनशील युवक था. रातदिन के तनाव का प्रभाव आदित्य पर पड़ रहा है. 30 वर्ष की कम उम्र में ही उसे पाइपर टैंशन रहने लगी थी.

आदित्य जैसे ही अस्पताल पहुंचा, सोनाक्षी वहीं खड़ी थी. वह धीमे स्वर में बोली, ‘‘आदित्य, कल ड्यूटी के बाद मुझे तुम से जरूरी बात करनी है. आदित्य को पता था कि सोनाक्षी क्या कहना चाहती है.

सुबह आदित्य और सोनाक्षी जब कैंटीन में आमनेसामने थे तो सोनाक्षी बोली, ‘‘आदित्य देखो मुझे गलत मत समझना पर मैं  ऐसे माहौल में ऐडजस्ट नहीं कर सकती हूं. क्या हम विवाह के बाद अलग फ्लैट ले कर रह सकते हैं?’’

आदित्य बोला, ‘‘सोना, मुझे मालूम है तुम अपनी जगह सही हो, पर मैं अपनी मम्मी को अकेले उस घर में नहीं छोड़ सकता हूं.’’

सोनाक्षी बोली, ‘‘अगर तुम्हारी मम्मी हमारे साथ रहना चाहें, तो मुझे कोई प्रौब्लम नहीं है.’’

जब आदित्य ने यह बात घर पर बताई तो भूपिंदर गुस्से से आगबबूला हो उठा. गुस्से में बोला, ‘‘तुम्हारा तो यही होना था गोबर गणेश. जो लड़का मां का पल्लू पकड़ कर चलता है वह बीवी के इशारों पर ही नाचेगा.’’

आदित्य बोला, ‘‘पापा आप चिंता न करो. आप को मुझे से और मम्मी से बहुत प्रौब्लम है न तो मैं मम्मी को भी अपने साथ ले जाऊंगा. ऐसा लगता है, घर घर नहीं है एक जेल है और हम सब कैदी.’’

भूपिंदर दहाड़ उठा, ‘‘हां यह जेल है न तो रिहाई की भी कीमत है. अपनी मम्मी को क्या ऐसे ही ले कर चला जाएगा वह मेरी पत्नी है और सुन लड़के, तेरी पढ़ाई पर क्व25 लाख खर्च हुए हैं, पहले वे वापस दे देना और फिर अपनी मम्मी को रिहा कर ले जाना.’’

आदित्य के विवाह की तिथि निश्चित हो गई थी और भूपिंदर न चाहते हुए भी जोरशोर से तैयारी में जुटा था.

जब नवयुगल हनीमून से वापस आ जाएंगे तो वह अलग फ्लैट में शिफ्ट हो जाएंगे. आदित्य किसी भी कीमत पर अपनी मम्मी को अकेले उस यातनागृह में नहीं छोड़ना चाहता था. इसलिए आदित्य ने किसी तरह से क्व20 लाख का बंदोबस्त कर लिया था.

विवाह बहुत धूमधाम से संपन्न हो गया. 14 दिन बाद आदित्य और सोनाक्षी सिंगापुर से घूम कर लौट आए थे. आदित्य ने मां को सूचित कर दिया था कि वह अपना सारा सामान ले कर उन के पास आ जाए.

मगर रश्मि का फोन आया कि आदित्य रविवार को एक बार घर आ जाए. उस के बाद ही वह आदित्य के पास रहने आ जाएगी. आदित्य को लग रहा था कि शायद मम्मी को निर्णय लेने में मुश्किल हो रही है या फिर पापा उन्हें ताने मार रहे होंगे.

जब आदित्य और सोनाक्षी घर पहुंचे तो देखा घर पर मरघट सी शांति छाई हुई थी. आदित्य ने देखा मां बहुत थकीथकी लग रही थीं.

आदित्य बोला, ‘‘मम्मी कमाल करती हो, तुम आज भी पापा के कारण निर्णय नहीं ले पा रही हो. आप चिंता मत करो, मैं ने क्व20 लाख का बंदोबस्त कर लिया है.’’

रश्मि बोली, ‘‘बेटे तेरे पापा को 5 दिन पहले लकवा मार गया था.

‘‘रातदिन वह बिस्तर पर ही रहते हैं, अब बता उन्हें ऐसी स्थिति में छोड़ कर कैसे आ सकती हूं और तुम लोगों से बात करे बिना मैं भूपिंदर को ले कर तुम्हारे घर कैसे आ सकती थी?’’

इस से पहले आदित्य कुछ कहता सोनाक्षी बोल उठी, ‘‘मम्मी, आप यहीं रहिए, हमारा फ्लैट तो बहुत छोटा है.’’

‘‘पापा की अच्छी तरह देखभाल नहीं हो पाएगी, हम एक के बजाय 2 नर्स ड्यूटी पर लगा देंगे. फिर मम्मी मैं घर पर भी हौस्पिटल जैसा माहौल नहीं चाहती हूं.’’

आदित्य बोला, ‘‘मम्मी, नर्स का इंतजाम मैं कर दूंगा. आप चलो यहां से, बहुत कर लिया आप ने पापा के लिए.’’

रश्मि बोली, ‘‘आदित्य बेटा तू मेरी चिंता मत कर… पर मैं भूपिंदर को इस हाल

में छोड़ कर नहीं जा सकती हूं.’’

आदित्य बोला, ‘‘मम्मी कब तक तुम पापा के कारण जिंदगी से दूर रहोगी.’’

रश्मि बोली, ‘‘बेटा, तू खुश रह, मैं तो इस साथ के लिए शापित हूं, पहले मानसिक यातना भोगती थी अब अकेलापन भोगने के लिए शापित हूं.’’

आदित्य बोला, ‘‘मम्मी यह शापित जीवन आप ने खुद ही चुना है, अपने लिए. सामने खुला आकाश है पर आप को इस पिंजरे में रहना ही पसंद है,’’ कह कर आदित्य क्व20 लाख मेज पर रख कर तीर की तरह निकल गया.

दूसरी औरत : अब्बू की जिंदगी में कौन थी वो औरत

मैं मोटरसाइकिल ले कर बाहर खड़ा था. अम्मी अंदर पीर साहब के पास थीं. वहां लोगों की भीड़ लगी थी. भीतर जाने से पहले अम्मी ने मुझ से भी कहा था, ‘आदिल बेटा, अंदर चलो.’

‘मुझे ऐसी फालतू बातों पर भरोसा नहीं है,’ मैं ने तल्खी के साथ कहा था.

‘ऐसा नहीं कहते बेटा,’ कह कर अम्मी पर्स साथ ले कर अंदर चली गई थीं.

न जाने बाबाबैरागियों के पीछे ये नासमझ लोग क्यों भागते हैं? मैं देख रहा था कि कोई नारियल तो कोई मिठाई ले कर वहां आया हुआ था.

पिछले जुमे पर भी जब अम्मी यहां आई थीं, तो 5 सौ रुपए दे कर अपना नंबर लगा गई थीं. फोन से ही आज का समय मिला था, तो वे मुझे साथ ले कर आ गई थीं. मैं घर का सब से छोटा हूं, इसलिए सब के लिए आसानी से मुहैया रहता हूं. मैं ने अम्मी को कई बार समझाया भी था, लेकिन वे मानने को तैयार नहीं थीं. यह बात आईने की तरह साफ थी कि पिछले 2-3 सालों में हमारे घर की हालत बहुत खराब हो गई थी. इस के पहले सब ठीकठाक था.

मेरे अब्बा सरकारी ड्राइवर थे और न जाने कहां का शौक लगा तो एक आटोरिकशा खरीद लिया और उसे किराए पर दे दिया. कुछ आमदनी होने लगी, तो बैंक से कर्ज ले कर 2-3 आटोरिकशा और ले लिए और उसी हिसाब से आमदनी बढ़ गई थी.

अब्बा घर में मिठाई, फल लाने लगे थे. 1-2 दिन छोड़ कर चिकन बिरयानी या नौनवेज बनने लगा था. फ्रिज में तो हमेशा फल भरे ही रहते थे. अम्मी के लिए चांदी के जेवर बन गए थे और फिर हाथ के कंगन. गले में सोने की माला आ गई थी. मेरी पढ़ाई के लिए अलग से कोचिंग क्लास लगा दी गई थी.

मेरी बड़ी बहन यानी अप्पी भी हमारे शहर में ही ब्याही गई थीं. उन की ससुराल में अम्मी कभी भी खाली हाथ नहीं जाती थीं. बड़ी अप्पी के बच्चे तो नानानानी का मानो इंतजार ही करते रहते थे.

फिर अब्बा परेशान रहने लगे. वे किसी से कुछ बात नहीं कहते थे. मुझे कभी कपड़ों की या कोचिंग के लिए फीस की जरूरत होती, तो वे झिड़क देते थे, ‘कब तक मांगोगे? इतने बड़े हो गए हो. खुद कमाओ…’ अब्बा के मुंह से कड़वी बातें निकलने लगी थीं. नए कपड़े दिलाना बंद हो गया था. अम्मी अब बड़ी अप्पी के यहां खाली हाथ ही जाने लगी थीं.

अम्मी घरखर्च के लिए 3-4 बार कहतीं, तब अब्बा रुपए निकाल कर देते थे. आखिर ऐसा क्यों हो रहा था? अम्मी कहतीं कि घर पर किसी की नजर लग गई या किसी शैतान का बुरा साया घर में आ गया है.हद तो तब हो गई, जब अब्बा ने अम्मी से सोने के कड़े उतरवा कर बेच दिए और जो रुपए आए उस का क्या किया, पता नहीं?

अम्मी को भरोसा हो गया था कि कुछ न कुछ गलत हो रहा है. वे मौलाना से पानी फुंकवा कर ले आईं, कुछ तावीज भी बनवा लिए. अब्बा के तकिए के नीचे दबा दिए, लेकिन परेशानियां दूर नहीं हुईं.

एक दिन शाम को अम्मी ने एक पीर साहब को बुलवाया. वे पूरा घर घूम कर कहने लगे, ‘कोई बुरी शै है.’ इसे दूर करने के लिए पीर साहब ने 2 हजार रुपए मांगे. अम्मी ने जो रुपए जोड़ कर रखे थे, वे निकाल कर दे दिए और तावीज ले लिया. घर में पानी का छिड़काव कर दिया. दरवाजों के बीच में सूइयां ठुंकवा लीं, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला.

अब्बा ने अम्मी से चांदी के जेवर भी उतरवा लिए. अम्मी ने मना किया, तो बहुत झगड़ा हुआ. अब तो मुझे भी यकीन होने लगा था कि मामला गंभीर है, क्योंकि ऐसी खराब हालत हमारे परिवार की कभी नहीं हुई थी. म्मी ने यह बात अपनी बहनों से भी की और कोई बहुत पहुंचे हुए पीर बाबा के बारे में मालूम किया. अम्मी ने पिछले जुमे को पैसा दे कर अपना नंबर लगवा लिया था.

मैं अपनी यादों से लौट आया. मैं ने घड़ी में देखा. रात के 9 बज रहे थे. तभी देखा कि अम्मी बाहर बदहवास से आ रही थीं.

मैं घबरा गया और पूछा, ‘‘क्या बात है अम्मी?’’

‘‘कुछ नहीं बेटा, घर चल,’’ घबराई सी आवाज में अम्मी ने कहा और कहतेकहते उन का गला भर आया.

‘‘आखिर माजरा क्या है? पीर साहब ने कुछ कहा क्या?’’ मैं ने जोर दे कर पूछा.

‘‘तू घर चल, बस… अम्मी ने गुस्से में कहा.

बड़ी अप्पी घर पर आई हुई थीं. अम्मी तो अंदर आते ही अप्पी के गले लग कर रोने लगीं.

आखिर दिल भर रो लेने के बाद अम्मी ने आंसुओं को पोंछा और कहा, ‘‘मैं जो सोच रही थी, वह सच था.’’

‘‘क्या सोच रही थीं? कुछ साफसाफ तो बताओ,’’ बड़ी अप्पी ने पूछा.

‘‘क्या बताऊं? हम तो बरबाद हो गए. पीर साहब ने साफसाफ बताया है कि इन की जिंदगी में दूसरी औरत है, जिस की वजह से यह बरबादी हो रही है…’’ अम्मी जोर से रो रही थीं.

मैं ने सुना, तो मैं भी हैरान रह गया. अब्बा ऐसे लगते तो नहीं हैं. लेकिन फिर हम बरबाद क्यों हो गए? इतने रुपए आखिर जा कहां रहे हैं?

अम्मी को अप्पी ने रोने से मना किया और कहा, ‘‘अब्बा आज आएंगे, तो बात कर लेंगे.’’

हम सब ने आज सोच लिया था कि अब्बा को घर की बरबादी की पूरी दास्तां बताएंगे और पूछेंगे कि आखिर वे चाहते क्या हैं?

रात के तकरीबन साढ़े 10 बजे अब्बा परेशान से घर में आए. वे अपने कमरे में गए, तो अम्मी वहीं पर पहुंच गईं. अब्बा ने उन्हें देख कर पूछा, ‘‘क्या बात है बेगम, बहुत खामोश हो?’’

अम्मी चुप रहीं, तो अब्बा ने दोबारा कहा, ‘‘कोई खास बात है क्या?’’

‘‘जी हां, खास बात है. आप से कुछ बात करनी है,’’ अम्मी ने कहा.

‘‘कहो, क्या बात है?’’

‘‘हमारे घर के हालात पिछले 2 सालों से बद से बदतर होते जा रहे हैं, इस पर आप ने कभी गौर किया है?’’

‘‘मैं जानता हूं, लेकिन कुछ मजबूरी है. 1-2 महीने में स ठीक हो जाएगा,’’ अब्बा ने ठंडी सांस खींच कर कहा.

‘‘बिलकुल ठीक नहीं होगा, आप यह जान लें, बल्कि आप हमें भिखारी बना कर ही छोड़ेंगे,’’ अम्मी की आवाज बेकाबू हो रही थी.

हम दरवाजे की ओट में आ कर खड़े हो गए थे, ताकि कोई ऊंचनीच हो, तो हम अम्मी की ओर से खड़े हो सकें.

‘‘ऐसा नहीं कहते बेगम.’’

‘‘क्यों? क्या कोई कसर छोड़ रहे हैं आप? आप को एक बार भी अपने बीवीबच्चों का खयाल नहीं आया कि हम पर क्या गुजरेगी,’’ कह कर अम्मी रोने लगी थीं.

‘‘मैं पूरी कोशिश कर रहा हूं कि हम इन बुरे दिनों से पार निकल जाएं.’’

‘‘लेकिन निकल नहीं पा रहे, यही न? उस औरत ने आप को जकड़ लिया है,’’ अम्मी ने अपनी नाराजगी जाहिर कर तकरीबन चीखते हुए कहा.

‘‘खामोश रहो. तुम्हारे मुंह से ऐसी बेहूदा बातें अच्छी नहीं लगतीं.’’

‘‘क्यों… मैं सब सच कह रही हूं, इसलिए?’’

‘‘कह तो तुम सच रही हो, लेकिन बेगम मैं क्या करूं? पानी को कितना भी तलवार से काटो, वह कटता नहीं है,’’ अब्बा ने अपना नजरिया रखा.

‘‘आज आप फैसला कर लें.’’

‘‘कैसा फैसला?’’ अब्बा ने हैरत से सवाल किया.

‘‘आखिर आप चाहते क्या हैं? उस औरत के साथ रहना चाहते हैं या हमारे साथ जिंदगी बसर करना चाहते हैं?’’ अम्मी ने गुस्से में कहा.

‘‘क्या मतलब है तुम्हारा? साफसाफ कहो?’’ अब्बा भी नाराज होने लगे थे.

‘‘मैं आज बड़े पीर साहब के पास गई थी. उन्होंने मुझे सब बता दिया है,’’ अम्मी ने राज खोलते हुए कहा.

‘‘क्या सब बता दिया है?’’ अब्बा ने हैरत से सवाल किया.

‘‘आप किसी दूसरी औरत के चक्कर में सबकुछ बरबाद कर रहे हैं. लानत है…’’ अम्मी ने गुस्से में कहा.

‘‘चुप रहो. जानती हो कि वह दूसरी दूसरी औरत कौन है?’’ अब्बा ने गुस्से में कांपते हुए कहा.

‘‘कौन है?’’ अम्मी ने भी उतनी ही तेजी से ऊंची आवाज में पूछा.

‘‘तुम्हारी ननद है, मेरी बड़ी बहन. उस की मेहनत की वजह से ही मैं पढ़ाई कर पाया और अपने पैरों पर खड़ा हो सका और उस की एक छोटी सी गलती की वजह से हमारे पूरे परिवार ने उसे अपने से अलग कर दिया था, क्योंकि उस ने अपनी मरजी से शादी की थी.

‘‘मुझे पिछले एक साल पहले ही मालूम पड़ा कि उस के पति को कैंसर है, जिस की कीमोथैरैपी और इलाज के लिए उसे रुपयों की जरूरत थी. उस के बच्चे भी ऊंचे दर्जे में पढ़ रहे थे. उन्होंने तो तय किया था इलाज नहीं कराएंगी, लेकिन जैसे ही मुझे खबर लगी, तो मैं ने इलाज और पढ़ाई की जिम्मेदारी ले ली, ताकि वह परिवार बरबाद होने से बच सके.

‘‘मेरी बहन के हमारे सिर पर बहुत एहसान हैं. अगर मुझे जान दे कर भी वे एहसान चुकाने पड़ें, तो मैं ऐसा खुशीखुशी कर सकता हूं,’’ कहतेकहते अब्बा जोर से रो पड़े.

अम्मी हैरान सी सब देखतीसुनती रहीं.

‘‘मुझ से कैसा बड़ा गुनाह हो गया,’’ अम्मी बड़बड़ाईं. हम भी दरवाजे की ओट से बाहर निकले और अब्बा के गले से लिपट गए.‘‘अब्बा, हमें माफ कर दो. अगर हमें  और भी मुसीबतें झेलना पड़ीं, तो हम झेल लेंगे, लेकिन आप उन्हें बचा लें,’’ मैं ने कहा.

अब्बा ने आंसू पोंछे और कहा, ‘आदिल बेटा, उन का पूरा इलाज हो गया है. वे ठीक हो गए हैं और भांजे को नौकरी भी लग गई है. ‘‘यह सब तुम लोगों की मदद की वजह से ही सब हो पाया. तुम लोग खामोश रहे और मैं उस परिवार की मदद कर के उन्हें जिंदा रख पाया,’’ अब्बा की आवाज में हम सब के प्रति शुक्रिया का भाव नजर आ रहा था.

अम्मी ने शर्म के मारे नजरें नीची कर ली थीं.अब्बा ने कहा, ‘‘कल सुबह मेरी बहन यहां आने वाली हैं. अच्छा हुआ, जो सब बातें रात में ही साफ हो गईं.’’

‘‘हम सब कल उन का बढि़या से इस्तकबाल करेंगे, ताकि बरसों से वे हम से जो दूर रहीं, सारे गम भूल जाएं,’’ अम्मी ने कहा.

‘‘क्यों नहीं,’’ अब्बा ने कहा, तो हम सब हंस दिए. रात में हमारी हंसी से लग रहा था, मानो रात घर में बिछ गई हो और खुशियों के सितारे उस में टंग गए हों.

झूठे प्रचार की मिली सजा : रामदेव की सुप्रीम कोर्ट में माफी

योग के जरीए देशदुनिया में अपनी पहचान बनाने वाले बाबा रामदेव ने सुप्रीम कोर्ट में हाथ जोड़ कर माफी मांग कर देश की जनता को जता दिया है कि अपने झूठे विज्ञापनों के चलते वे देश से माफी मांग रहे हैं और ऐसा काम आगे नहीं करेंगे.

दरअसल, कोरोना काल में कोरोनील नाम की एक दवा आई थी, जिसे लोगों ने विश्वास कर के खरीदा और रामदेव ने करोड़ों रुपए कमा लिए. यह सीधासीधा किसी लूट से कम नहीं था, मगर नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार ने तब आंखें बंद कर ली थीं.

इस का सीधा सा मतलब यह है कि अगर आप हमारे काम आते हैं तो आप का सारा अपराध माफ है. यह कल्पना की जा सकती है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने रामदेव के बरताव और काम करने के तरीके पर ध्यान नहीं दिया होता तो रामदेव आज भी मुसकराते हुए बड़ेबड़े दावे कर के अपनी उन दवाओं को देश की जनता को बेचते रहते, जिसे सीधेसीधे झूठ और ठगी काम कहा जा सकता है. इतना ही नहीं, देशभर के बड़े चैनलों में विज्ञापन को दे कर अपनी बात को सच बताना भी कोई छोटामोटा अपराध नहीं है. यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट में इसे गंभीरता से लिया और आखिरकार रामदेव ने वहां हाजिर हो कर माफी मांग ली.

इस तरह जो काम नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं कर पाई उसे देश के सुप्रीम कोर्ट ने देश की जनता के सामने ला कर रख दिया और चेहरे पर से नकाब उतार दी या कहें कि रामदेव के तन से वह चोला उतार दिया, जिस के भरोसे वे देश की जनता और कानून को ठेंगा दिखाते रहे हैं. यह साबित हो गया है कि रामदेव कोई जनसेवा या देश की जनता के हमदर्द नहीं हैं, बल्कि वे भी एक ऐसे व्यापारी हैं, जो सिर्फ मुनाफा कमाना चाहता है.

आप को बता दें कि पहले भ्रामक विज्ञापन के मामले में पतंजलि आयुर्वेद को सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई थी और बाबा रामदेव व कंपनी के एमडी आचार्य बालकृष्ण को पेशी पर बुलाया था. आखिर तय तारीख पर रामदेव और बालकृष्ण दोनों ही बड़ी अदालत पहुंचे. इस दौरान सुनवाई शुरू हुई तो बाबा रामदेव के वकील ने कहा कि हम ऐसे विज्ञापन के लिए माफी मांगते हैं. आप के आदेश पर खुद योगगुरु रामदेव अदालत आए हैं और वे माफी मांग रहे हैं और आप उन की माफी को रिकौर्ड में दर्ज कर सकते हैं.

बाबा रामदेव के वकील ने आगे कहा, ‘हम इस अदालत से भाग नहीं रहे हैं. क्या मैं यह कुछ पैराग्राफ पढ़ सकता हूं? क्या मैं हाथ जोड़ कर यह कह सकता हूं कि जैंटलमैन खुद अदालत में मौजूद हैं और अदालत उन की माफी को दर्ज कर सकती है.

सुनवाई के दौरान पतंजलि के वकील ने भ्रामक विज्ञापन को ले कर कहा कि हमारे मीडिया विभाग को सुप्रीम कोर्ट के आदेश की जानकारी नहीं थी, इसलिए ऐसा विज्ञापन चला गया.

इस पर बैंच में शामिल जस्टिस अमानुल्लाह और जस्टिस हिमा कोहली की बैंच ने कहा कि यह मानना मुश्किल है कि आप को इस की जानकारी नहीं थी.

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर, 2023 में ही रामदेव के पतंजलि को आदेश दिया था कि वह भ्रामक दावे करने वाले विज्ञापनों को वापस ले. यदि ऐसा नहीं किया गया तो फिर हम ऐक्शन लेंगे. ऐसी हालत में पतंजलि के हर गलत विज्ञापन पर 1 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया जाएगा.

इस दौरान जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि रामदेव ने योग के मामले में बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन एलोपैथी दवाओं को ले कर ऐसे दावे करना ठीक नहीं है, जबकि इंडियन मैडिकल एसोसिएशन के वकील ने कहा कि वे अपना विज्ञापन करें, लेकिन उस में एलोपैथी चिकित्सा पद्धति की बेवजह आलोचना नहीं होनी चाहिए.

सुनवाई के दौरान जस्टिस हिमा कोहली ने केंद्र सरकार की भी खिंचाई की. उन्होंने कहा कि हमें हैरानी है कि आखिर इस मामले में केंद्र सरकार ने अपनी आंखें बंद रखीं.

इस पूरे मामले पर अगर देश की जनता गौर करे तो यह साफ है कि रामदेव ने सिर्फ रुपए कमाने के लिए झूठा विज्ञापन जारी किया और सीधेसीधे जनता को ठग लिया. दरअसल, ये सारे पैसे सरकार को वसूल लेने चाहिए, ताकि देश में यह संदेश चला जाए कि ठगी करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा.

मैं राजस्थान गांव से हूं. मेरे घरवाले मुझसे देह धंधा करवाना चाहते हैं, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं 21 साल की लड़की हूं और राजस्थान के एक गांव में रहती हूं. हमारे समाज में लड़की से देह धंधा कराया जाता है और इसे गलत नहीं समझा जाता है. उन्हें पढ़ने भी नहीं दिया जाता है. मैं ने किसी तरह अपने परिवार से लड़झगड़ कर 10वीं जमात पास कर ली है और आगे भी पढ़ना चाहती हूं, पर घर वाले मुझ से देह धंधा कराना चाहते हैं. इस बात से मैं बड़ी परेशान रहती हूं. क्या करूं?

जवाब

आप तारीफ के काबिल काम कर रही हैं, इसलिए बिना घर वालों की परवाह किए अपनी पढ़ाई जारी रखें. जातिगत देह व्यापार ने कैसे कई औरतों को नरक सी जिंदगी जीने के लिए मजबूर कर दिया है, यह आप अपने ही घर, रिश्तेदारी और समाज में देख चुकी हैं. खुद भी इस दलदल से बाहर निकलें और दूसरी लड़कियों को भी निकालें.

घर वाले अगर देह धंधे के लिए मजबूर करें, तो पुलिस की और अपने जिले के कलक्टर की मदद लें. आजकल जातिगत देह व्यापार से छुटकारा दिलाने के लिए सरकार और कुछ सामाजिक संस्थाएं भी पीडि़ताओं के लिए योजना चला रही है.

इसी साल मध्य प्रदेश के नीमच जिले में बांछड़ा समुदाय की 56 बेटियों को कोर्ट में सम्मानित किया गया था, क्योंकि वे परंपरागत देह धंधा छोड़ कर आप की ही तरह पढ़ाई कर रही हैं. इस में शौर्य वैलफेयर सोसाइटी ने योगदान दिया था. नीमच के कई वकील बांछड़ा जाति के हक की लड़ाई अदालत में लड़ रहे हैं, आप उन से मिल सकती हैं.

लोकतंत्र में बढ़ती तानाशाही

लोकतंत्र का मतलब यह माना जाता है कि जो भी काम होंगे, वे जनता के हित में उन के चुने हुए प्रतिनिधि करेंगे. जिस देश में जितने ज्यादा नागरिकों को वोट देने का हक रहता है, उस देश को उतना ही ज्यादा लोकतांत्रिक समझ जाता है. इस तरह भारत दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में सब से बड़ा है. यहां वोट देने वाले नागरिकों की तादाद दुनियाभर में सब से बड़ी है.

भारतीय संविधान ने अनुच्छेद 326 के तहत बालिगों को वोट डालने का हक दिया है. वोटर के लिए जरूरी है कि वह 18 साल या उस से ज्यादा उम्र का हो, साथ ही भारत का निवासी भी हो.

भारत में 1935 के ‘गवर्नमैंट औफ इंडिया ऐक्ट’ के मुताबिक, तब केवल 13 फीसदी जनता को वोट का हक हासिल था. वोटर का हक हासिल करने की बड़ीबड़ी शर्तें थीं. केवल अच्छी सामाजिक और माली हालत वाले नागरिकों को यह हक दिया जाता था. इस में खासतौर पर वे लोग ही थे, जिन के कंधों पर विदेशी शासन टिका हुआ था. पर आजाद भारत में वोट का हक सभी को दिया गया.

लोकतंत्र के बाद भी हमारे देश में लोक यानी जनता की जगह पर तंत्र यानी अफसर और नेताओं का राज चलता है. इस में जनता घरेलू मामलों से ले कर अदालतों तक के बीच चक्की में गेहूं की तरह पिसती है. आखिर में उस का आटा ही बन जाता है. अब शायद कोई ही ऐसा हो, जो इस चक्की में पिस न रहा हो. घर के अंदर तक कानून घुस गया है. पतिपत्नी के बीच से ले कर घर के बाहर सीढ़ी और छत आप की अपनी नहीं है. जो जमीन आप अपनी समझ कर रखते हैं, असल में वह आप की नहीं होती है.

लोकतंत्र में जो तंत्र का हिस्सा है, वह लोक को अपनी जायदाद समझाता है. कानून लोक के लिए तंत्र के हिसाब से चलता है. अगर हम इस को घर के अंदर से देखें तो आप अपनी सुविधा के मुताबिक न तो छत पर कोई कमरा बनवा सकते हैं और न ही घर से बाहर निकलने के लिए सीढ़ियां. तंत्र को देख रहे अफसर अपने हिसाब से नियम बनाते हैं. हाउस टैक्स, प्रौपर्टी टैक्स जैसे नियम अफसर बनाते हैं. जनता से कभी पूछा नहीं जाता है. यही अफसर जनता के हित में अलग तरह से काम करते हैं, जबकि अफसरों, नेताओं के हित में अलग तरह से काम होता है.

लोकतंत्र में तानाशाही बढ़ती जा रही है. वोट पाने के लिए वोटर को लुभाया जा रहा है और विपक्ष को डराया जा रहा है. यह उसी तरह से है, जैसे घर के मालिक को तमाम तरह के टैक्स से परेशान किया जा रहा है. रोजगार पाने के लिए भटक रहे छात्रों को परेशान किया जा रहा है.

नौकरी के लिए इम्तिहान होता है, तो पेपर आउट करा दिया जाता है. बेरोजगारी का आलम यह है कि चपरासी की नौकरी के लिए पीएचडी वाले छात्र लाइन लगा कर खड़े होते हैं. नेताओं के पास इतना पैसा है कि वे वोट को मैनेज करते हैं.

सत्ता को बनाए रखने के लिए यह कोशिश होती है कि विपक्षी को चुनाव न लड़ने दिया जाए. बाहुबली नेता धनंजय सिंह के मसले में उन का कहना है कि ‘चुनाव लड़ने से रोकने के लिए यह किया जा रहा है’. ऐसे उदाहरण कई हैं, जहां लोकतंत्र में तानाशाही दिखती है.

आम आदमी पार्टी का मसला हो, सांसद महुआ मोइत्रा का मामला हो, तमाम उदाहरण सामने हैं. कांग्रेस नेता राहुल गांधी को ले कर भी उन की ऐसी ही घेराबंदी की गई थी.

असल में लोकतंत्र की बात करने वाला या लोकतंत्र के जरीए ही सत्ता संभालने वाला कब तानाशाह बन जाता है, इस का पता नहीं चलता.

दुनियाभर में इस के तमाम उदाहरण भरे पड़े हैं. नैपोलियन, हिटलर और पुतिन जैसे शासकों ने अपनी शुरुआत लोकतंत्र से की, बाद में तानाशाह बन गए. भारत में जिस तरह से विरोधी नेताओें को चुनाव लड़ने से रोका जा रहा है, उस से तानाशाही बढ़ने का खतरा साफतौर पर दिख रहा है.

जानें महिला और पुरुष कब करना चाहते है सैक्स

महिलाओं और पुरुषों में यौनक्रीड़ा की इच्छा का समय अलग-अलग होता है. एक सर्वेक्षण से यह बात और स्पष्ट हो गई है कि महिलाओं में सोने से पहले रात के 11.21 बजे यौन संबंध बनाने की इच्छा होती है. वहीं पुरुषों में सुबह के 7.54 बजे यौन संबंध बनाने की इच्छा होती है.

सर्वेक्षण के शोध में पता चला है कि महिलाओं में रात के 11 बजे से दो बजे तक यौनसंबंध बनाने की इच्छा चरम पर होती है, जबकि पुरुषों में सुबह पांच बजे से नौ बजे तक यौन संबंध बनाने की इच्छा प्रबल होती है.

एक अखबार के मुताबिक, लवहनी के सहसंस्थापक रिचर्ड लांगहर्स्ट ने कहा, “पुरुष नाश्ते के पहले यौनसंबंध बनाने के लिए तैयार रहते हैं, जबकि महिलाएं रात के समय यौनसंबंध बनाना चाहती हैं.”

ब्रिटेन में 2,300 लोगों पर किए गए सर्वेक्षण में यह भी निष्कर्ष निकला है कि लोग उस साथी के साथ घर बसाना चाहते हैं जिनमें यौन संबंध बनाने की समान प्रवृत्ति हो.

सेक्सटॉयज बनाने वाली कंपनी लवहनी द्वारा कराए गए इस सर्वेक्षण में पता चला है कि 68 फीसदी महिलाओं और 63 फीसदी पुरुषों ने किसी ऐसे व्यक्ति से प्रेम संबंध बनाए हैं जिसकी यौन रुचि स्वयं की यौन रुचि से अलग थी.

सर्वेक्षण में पता चला है कि पुरुषों में सुबह के समय यौनसंबंध बनाने की इच्छा प्रबल होती है, लेकिन इस दौरान मात्र 11 फीसदी महिलाओं में ही यौनसंबंधों की इच्छा होती है. वहीं सोने से पहले केवल 16 फीसदी पुरुष ही यौन संबंध बनाने के इच्छुक होते हैं.

गवाही : क्यों हुई नारायण की गिरफ्तारी

चकवाड़ा गांव में कल दोपहर को हुआ दंगा आज सुबह अखबारों की सुर्खियां बन गया. 6 घर जल गए. 3 बच्चों, 4 औरतों व 2 मर्दों की मौत के अलावा कुल 12 लोग घायल हो गए. कुछ लोगों को हलकीफुलकी चोटें आईं.

इत्तिफाक से पुलिस का गश्ती दल वहां पहुंच गया और दंगे पर काबू पा लिया गया. पुलिस ने 30 लोगों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया.

गिरफ्तार हुए लोगों में नारायण भी एक था. उस ने जिंदगी में पहली बार जेल में रात काटी थी. जेल की उस बैरक में नारायण अकेला एक कोने में सहमा सा लेटा रहा. वह उन भेड़ियों के बीच चुपचाप आंखें बंद किए सोने का बहाना करता रहा. बाकी सभी जेल में मटरगश्ती कर रहे थे.

सुबह होते ही सब के साथ नारायण को भी कचहरी लाया गया. भीड़ से अलग, उदासी की चादर ओढ़े वह एक कोने में बैठ गया.

पुरानी, मटमैली सफेद धोती, आधी फटी बांहों वाली बदरंग सी बंडी, दोनों पैरों में अलगअलग रंग के जूते, बस यही उस की पोशाक थी.

कचहरी के बरामदे में फैली चिलचिलाती धूप सब को परेशान कर रही थी, पर नारायण धूप से ज्यादा अपने मन में छाए डर से परेशान था.

नारायण को इस बात का भी डर था कि अगर आज का सारा दिन कचहरी में ही लग गया तो दिनभर के कामधाम का क्या होगा. शायद आज घर वालों को भूखा ही सोना पड़ेगा.

नारायण को मालूम था कि कचहरी में एक मजिस्ट्रेट होता है, वकील होते हैं और तरहतरह के गवाह होते हैं. जेल से छूटने के लिए जमानत भी देनी पड़ती है.

‘पर आज कौन देगा उस की जमानत? कैसे बताएगा वह अपनी पहचान? कैसे वह अपनेआप को इस कचहरी के चक्कर से बचा पाएगा?’ ये सारे सवाल उस का डर बढ़ाए जा रहे थे.

‘‘नारायण हाजिर हो,’’ कचहरी के गलियारे में एक आवाज गूंजी.

लोगों की भीड़ से नारायण उठा और मजिस्ट्रेट के कमरे की तरफ बढ़ा.

कमरे के दरवाजे पर खड़े चपरासी ने उसे टोका, ‘‘हूं, तुम हो नारायण,’’ उस चपरासी की रूखी आवाज में हिकारत भी मिली हुई थी.

‘‘हां हुजूर, मैं ही हूं नारायण.’’

‘‘यहीं खड़े रहो. अभी तुम्हारा नंबर आने वाला है.’’

थोड़ी देर खड़े रहने के बाद चपरासी की दूसरी आवाज पर वह मजिस्ट्रेट के कमरे में घुस गया. उस ने उन मवालियों की तरफ देखा तक नहीं, जो रातभर जेल में उस के साथ बंद थे.

कमरे में घुसते ही नारायण को एक जोरदार छींक आ गई. सभी उस की तरफ देखने लगे, जैसे उस का छींकना भी जुर्म हो गया हो.

नारायण की नजर जब एक आदमी पर पड़ी तो वह चौंक पड़ा और सोचने लगा, ‘अरे, यह आदमी तो अपने गांव का गुंडा है. यही तो गांव में दंगेफसाद कराता है.’

‘‘हां, तो आप दे रहे हैं इस की जमानत?’’ मजिस्टे्रट ने उस आदमी से पूछा.

सफेद कुरतापाजामा में वह पूरा नेता लग रहा था. मजिस्ट्रेट ने कागज देखा, फिर वकील से पूछा, ‘‘जगन नाम है न इस का? क्या करता है यह? ऐसा कोई कागज दिखाइए, जिस से इस की कोई पहचान हो सके. भई, अब तो सरकार ने सब को मतदाताकार्ड दे दिए हैं. कोई राशनकार्ड हो तो वह दिखा दो.’’

वकील ने कहा, ‘‘हुजूर, ये मगेंद्रजी इस की जमानत देने आए हैं. अपने मंत्रीजी की बहन के बेटे हें. मैं भी इस को पहचानता हूं. इस का दंगे में कोई हाथ नहीं. यह तो बड़े शरीफ इज्जतदार लोगों के बीच उठताबैठता है.’’

नारायण हैरानी से कभी वकील को तो कभी जगन को देख रहा था. वह सोचने लगा, ‘कितना मीठा बोल रहा है वकील. इस का बस चले तो मजिस्ट्रेट को धरती पर लेट कर प्रणाम कर ले.

‘…और यह जगन तो हमेशा नशे में धुत्त रहता है. बड़ीबड़ी गाडि़यां इसे गांव तक छोड़ने आती हैं. लोग इसे गांव के सरपंच और इस इलाके के मंत्री का खास आदमी बताते हैं तभी तो मंत्री का भांजा इस की जमानत देने आया है.

‘कल भी दंगा इसी ने कराया होगा. पर इस की तो ऊंची पहुंच है, यह पक्का मुजरिम तो जमानत पर छूट जाएगा, पर मेरा क्या होगा?’ सोचतेसोचते नारायण ने अपनेआप से सवाल किया.

नारायण के पास न कोई वकील है, न राशनकार्ड, न मतदाताकार्ड यानी उस के पास पहचान का कोई सुबूत नहीं है.

राशनकार्ड बना तो था, जिस से कभीकभार उस की बीवी कैरोसिन लाती थी तो कभी मटमैली सी शक्कर भी मिल जाती थी. थोड़े दिन पहले उस की बीवी ने उसे बताया था कि दुकानदार ने राशनकार्ड रख लिया है.

‘दुकानदार ने, पर क्यों?’ नारायण ने झुंझला कर अपनी बीवी से पूछा था.

वह बोली थी, ‘दुकानदार कह रहा था कि सरकार का हुक्म आया है कि राशन की चीजें उसे मिलेंगी, जो इनकाम टकस (इनकम टैक्स) नहीं देता है.

‘यह बात तेरे मर्द को कागज पर लिख कर देनी पड़ेगी. अपने मर्द से इस कागज पर दस्तखत करवा कर लाना. तब मिलेगा राशनकार्ड. यह परची दी है दुकानदार ने.’

नारायण चौथी जमात तक पढ़ा था, पर ये ‘इनकम टैक्स’ क्या होता है, उस की समझ में नहीं आया था. पड़ोसियों की देखादेखी उस ने भी कागज पर दस्तखत कर दिए थे.

नारायण की बीवी उस परची को ले कर राशन की दुकान पर 5-6 बार चक्कर लगा आई थी, पर राशनकार्ड नहीं मिला था. दुकान खुले तभी तो राशनकार्ड मिले.

किसी खास समय में ही खुलती थी राशन की दुकान. फिर अगर नारायण को राशनकार्ड मिल भी जाता तो क्या होता. कौन उसे जेब में रख कर घूमता है.

नारायण को याद आया कि मतदाताकार्ड भी बना था. पूरे एक दिन का काम खोटा हो गया था. गांव के सरपंच, प्रधान व पंच जैसे लोग आए थे और सब को जीप में बैठा कर ले गए थे.

पंचायतघर के अहाते में फोटो खिंचवाने वालों की लाइन लग गई थी. मतदाताकार्ड पर फोटो तो नारायण का ही था, पर खुद नारायण भी उसे पहचान नहीं पाया. अजीब सी डरावनी शक्ल हो गई थी उस की.

प्रधानी के चुनाव हो गए, तो फिर पंच आए और सब के मतदाताकार्ड छीन कर ले गए. पूछने पर वे बोले, ‘आप लोग क्या करेंगे कार्ड का. कहीं गुम हो जाएगा तो बेवजह पुलिस में एफआईआर दर्ज करानी पड़ेगी. हमें दे दो, संभाल कर रखेंगे. चुनाव आएंगे तो फिर से दे दिए जाएंगे.’

गांव के अनपढ़ लोगों को तो जैसे उल्लू बनाएं, बन जाते हैं बेचारे. कार्ड बटोरने के बाद पंचसरपंच भी कन्नी काटने लगे.

नारायण अपने खयालों में खोया हुआ था कि तभी जगन की मोटी भद्दी सी आवाज आई, ‘‘अच्छा हुजूर, बड़ी मेहरबानी हुई.’’

फिर सब एकएक कर कमरे से बाहर निकल गए थे. कमरे में नारायण, मजिस्टे्रट व चपरासी वगैरह रह गए थे.

‘‘आगे चलो,’’ चपरासी ने नारायण को आगे की ओर धकेला. धक्का इतना जोरदार था कि अगर वह मजबूती से खड़ा न होता तो सीधा मजिस्ट्रेट के सामने जा कर गिरता.

मजिस्ट्रेट ने नारायण को ऊपर से नीचे तक देखा. इस के बाद उस ने नारायण की फाइल देखते हुए पूछा, ‘‘नाम क्या है तुम्हारा?’’

‘‘जी हुजूर, ना… ना… नारायण.’’

वह ‘हुजूर’ तो आसानी से कह गया, पर ‘नारायण’ शब्द उस की जबान पर ठीक से नहीं आ सका. आवाज हलक में ही अटक गई.

मजिस्ट्रेट ने अपनी नजरें ऊपर उठाईं और नारायण की आंखों में झांका. नारायण ने आंखें झुका लीं. इधर मजिस्ट्रेट ने अपने तजरबे के तराजू में नारायण को तौल लिया था.

मजिस्टे्रट बोला, ‘‘अब क्यों डर रहे हो? दंगा करते समय डर नहीं लगा था क्या? शराब पीना और दंगा करना, बस यही काम जानते हो तुम गंवार लोग.

‘‘अच्छा सचसच बताओ, फावड़े से किस को मारा था तुम ने?’’ मजिस्ट्रेट की आवाज में कड़कपन था.

नारायण से यह झूठ बरदाश्त नहीं हुआ, बल्कि उस की ताकत बन गया. इस बार उस की आवाज में बिलकुल भी घबराहट नहीं थी.

नारायण बोला, ‘‘नहीं हुजूर, मैं कभी शराब नहीं पीता. मैं तो दिनभर दूसरों के खेत में मेहनतमजदूरी करता हूं. अगर नशा करूं तो मेरे बीवीबच्चे भूखे मर जाएं…’’

नारायण में आया यह बदलाव मजिस्ट्रेट को अच्छा नहीं लगा. वह नारायण की बात को बीच में ही काटते हुए बोला, ‘‘अपनी रामकहानी मत सुनाओ मुझे. मेरी बात का जवाब दो.

‘‘मैं ने तुम से पूछा था कि तुम ने फावड़े से किसे मारा था? पुलिस की रिपोर्ट में साफ लिखा है कि पुलिस ने जब तुम्हें पकड़ा तो तुम्हारे हाथ में फावड़ा था.’’

मजिस्ट्रेट की डांट से नारायण फिर घबरा गया. हाथ जोड़ कर वह मजिस्ट्रेट से बोला, ‘‘हुजूर, फावड़े से तो मैं खेत में निराईगुड़ाई कर के आया था. जब दंगा हो रहा था तब मैं खेत से सीधा घर लौट रहा था. मुझे पता नहीं था कि गांव में दंगा हो रहा है. जब फावड़ा मेरे हाथ में था, तभी पुलिस ने मुझे पकड़ लिया.’’

मजिस्ट्रेट का गुस्सा अभी कम नहीं हुआ था. वह बोला, ‘‘बड़ी अच्छी कहानी बनाई है. अच्छा चलो, पहले अपना पहचानपत्र दो. तुम्हारा न तो कोई वकील है, न जमानत देने वाला और न तुम्हारी पहचान साबित करने वाला कोई गवाह है.

‘‘मुझे तो तुम्हारी बात पर बिलकुल भी यकीन नहीं है. मैं जानता हूं, तुम सब झूठ बोलने में माहिर हो. कोई सुबूत हो तो जल्दी पेश करो, नहीं तो जेल की हवा खानी पड़ेगी.’’

‘‘हुजूर, मेरे पास तो कोई पहचानपत्र नहीं है. गरीबी की क्या पहचान, हुजूर. मेरी पहचान का सुबूत तो यह मेरा शरीर और ये 2 हाथ हैं,’’ नारायण ने गिड़गिड़ाते हुए कहा और अपने दोनों हाथ की बंद मुट्ठियां मजिस्ट्रेट के सामने खोल दीं.

उस की दोनों हथेलियां छालों से भरी हुई थीं. उस के हाथों के छाले उस की पहचान के पक्के सुबूत थे, जिन्हें किसी वकील की मदद के बिना सबकुछ कहना आता था.

ऐसी ठोस ‘गवाही’ उस मजिस्ट्रेट ने अपनी जिंदगी में पहली बार देखी थी. यह देख कर मजिस्ट्रेट की आंखें भर आईं.

मजिस्ट्रेट ने अपनेआप को संभाला और फिर हुक्म दिया, ‘‘इसे बाइज्जत बरी किया जाता है.’’

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