Valentine’s Special- अंतराल: भाग 3

कुछ दिन बाद उन के फोन करने पर पापा, मां और चारू को ले कर मुंबई आ गए थे क्योंकि सोफिया के मम्मीपापा भी भारत आ गए थे.

मुंबई पहुंचने पर निश्चित हुआ कि अगले दिन लंच सब लोग एक ही होटल में करेंगे और दोनों परिवार वहीं एकदूसरे से मिल कर विवाह की संक्षिप्त रूपरेखा तय कर लेंगे. दोनों परिवार जब मिले तो सामान्य शिष्टाचार के बाद पापा ने ही बात शुरू की थी, ‘आप को मालूम ही है कि आप की बेटी और मेरा बेटा एकदूसरे को पसंद करते हैं. हम लोगों ने उन की पसंद को अपनी सहमति दे दी है. इसलिए आप अपनी सुविधा से कोई तारीख निश्चित कर लें जिस से दोनों विवाह सूत्र में बंध सकें.

पापा के इस सुझाव के उत्तर में सोफिया के पापा ने कहा था, ‘पर इस के लिए मेरी एक शर्त है कि शादी के बाद आप के बेटे को हमारे साथ जरमनी में ही रहना होगा और इन की जो संतान होगी वह भी जरमन नागरिक ही कहलाएगी. आप अपने बेटे से पूछ लें, उसे मेरी शर्त स्वीकार होने पर ही इस शादी के लिए मेरी अनुमति हो सकेगी.’

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उन की शर्त सुन कर सभी चौंक गए थे. सोफिया को भी अपने पापा की यह शर्त अच्छी नहीं लगी थी. उधर वह सोच रहे थे कि नहीं, इस शर्त के लिए वह हरगिज सहमत नहीं हो सकते. वह क्या इतने खुदगर्ज हैं जो अपनी खुशी के लिए अपने मांबाप और बहन को छोड़ कर विदेश में रहने चले जाएं? पढ़ते समय वह सोचा करते थे कि जिस तरह मम्मीपापा ने उन के जीवन को संवारने में कभी अपनी सुखसुविधा की ओर ध्यान नहीं दिया, उसी तरह वह भी उन के जीवन के सांध्यकाल को सुखमय बनाने में कभी अपने सुखों को बीच में नहीं आने देंगे.

उन्होंने दूर खड़ी उदास सोफिया से कहा, ‘तुम्हारे पापा की शर्त के अनुसार मुझे अपने परिवार और देश को छोड़ कर जाना कतई स्वीकार नहीं है, इसलिए अब आज से हमारे रास्ते अलग हो रहे हैं, पर मेरी शुभकामनाएं हमेशा तुम्हारे साथ हैं.’

दरवाजे की घंटी बजी तो अपने अतीत में खोए पंकज अचानक वर्तमान में लौट आए. देखा, पोस्टमैन था. पत्नी की कुछ पुस्तकें डाक से आई थीं. पुस्तकें प्राप्त कर, अधूरे पत्र को जल्द पूरा किया और पोस्ट करने चल दिए.

कुछ दिनों बाद, देर रात्रि में टेलीफोन की घंटी बजी. उठाया तो दूसरी ओर से सोफिया की आवाज थी. कह रही थी कि पत्र मिलने पर बहुत खुशी हुई. अगले मंडे को बेटी के साथ वह मुंबई पहुंच रही है. उसी पुराने होटल में कमरा बुक करा लिया है, पर व्यस्तता के कारण केवल एक सप्ताह का समय ही निकाल पाई है. उम्मीद है आप का परिवार भी घूमने में हमारे साथ रहेगा.

टेलीफोन पर हुई पूरी बात, सुबह पत्नी और बेटे को बतलाई. वे दोनों भी घूमने के लिए सहमत हो गए. सोफिया के साथ घूमते हुए पत्नी को भी अच्छा लगा. अभिषेक और जूली ने भी बहुत मौजमस्ती की. अंतिम दिन मुंबई घूमने का प्रोग्राम था. पर सब लोगों ने जब कोई रुचि नहीं दिखाई तो अभिषेक व जूली ने मिल कर ही प्रोग्राम बना लिया.

रात्रि में दोनों देर से लौटे. सोते समय सोफिया ने अपनी बेटी से पूछा, ‘‘आज अभिषेक के साथ तुम दिन भर, अकेले ही घूमती रहीं. तुम्हारे बीच बहुत सी बातें हुई होंगी? क्या सोचती हो तुम उस के बारे में? कैसा लड़का है वह?’’

‘‘मम्मी, अभि सचमुच बहुत अच्छा और होशियार है. एम.बी.ए. के पिछले सत्र में उस ने टाप किया है. आगे बढ़ने की उस में बहुत लगन है.’’

‘‘इतनी प्रशंसा? कहीं तुम्हें प्यार तो नहीं हो गया?’’

‘‘हां, मम्मी, आप का अनुमान सही है.’’

‘‘और वह?’’

‘‘वह भी.’’

‘‘तो क्या अभि के पापा से तुम दोनों के विवाह के बारे में बात करूं?’’

‘‘हां, मम्मी, अभि भी ऐसा ही करने को कह रहा था.’’

‘‘पर जूली, तुम्हारे पापा को तो ऐसा लड़का पसंद है, जो उन के साथ रह कर बिजनेस में उन की मदद कर सके. क्या अभि इस के लिए तैयार होगा.’’

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‘‘क्यों नहीं, यह तो आगे बढ़ने की उस की इच्छा के अनुकूल ही है. फिर वह क्यों मना करने लगा?’’

‘‘भारत छोड़ देने पर, क्या उस के मम्मीपापा अकेले नहीं रह जाएंगे?’’

‘‘तो क्या हुआ? भारत में इतने वृद्धाश्रम किस लिए हैं?’’

‘‘क्या इस बारे में तुम ने अभि के विचारों को जानने का भी प्रयत्न किया?’’

‘‘हां, वह इस के लिए खुशी से तैयार है. कह भी रहा था कि यहां भारत में रह कर तो उस की तमन्ना कभी पूरी नहीं हो सकती. लेकिन मम्मी, अभि की इस बात पर आप इतना संदेह क्यों कर रही हैं?’’

‘‘कुछ नहीं, यों ही.’’

‘‘नहीं मम्मी, इतना सब पूछने का कुछ तो कारण होगा? बतलाइए.’’

‘‘इसलिए कि बिलकुल ठीक ऐसी ही परिस्थितियों में अभि के पापा ने भारत छोड़ने से मना कर दिया था.’’

‘‘पर तब आप ने उन्हें समझाया नहीं?’’

‘‘नहीं, शायद इसलिए कि मुझे भी उन का मना करना गलत नहीं लगा था.’’

‘‘ओह मम्मी, आप और अभि के पापा दोनों की बातें और सोच, मेरी समझ के तो बाहर की हैं. मैं तो सो रही हूं. सुबह जल्दी उठना है. अभि कह रहा था, वह सुबह मिलने आएगा. उसे आप से भी कुछ बातें करनी हैं.’’

बेटी की सोच और उस की बातों के अंदाज को देख, सोफिया को लग रहा था कि पीढ़ी के ‘अंतराल’ ने तो हवा का रुख ही बदल दिया है.

Valentine’s Special- अंतराल: भाग 2

दोपहर में चारू तो अपनी सहेली के साथ बाजार चली गई, मां को फुरसत में देख, वह उन के पास जा कर बैठ गए और बोले, ‘मां, आप से कुछ बात करनी है.’

‘ऐसी कौन सी बात है जिसे मां से कहने में तू इतना परेशान दिख रहा है?’

‘मां…दरअसल, बात यह है कि मुझे मुंबई में एक लड़की पसंद आ गई है.’

मां कुछ चौंकीं तो पर खुश होते हुए बोलीं, ‘अरे, तो अब तक क्यों नहीं बताया? कैसी लगती है वह? बहुत सुंदर होगी. फोटो लाया है? क्या नाम है? उस के मांबाप भी क्या मुंबई में ही रहते हैं? क्या करते हैं वे?’

मां की उत्सुकता और उन के सवालों को सुन कर वह तब मौन हो गए थे. उन्हें इस तरह खामोश देख कर मां बोली थीं, ‘अरे, चुप क्यों हो गया? बतला तो, कौन है, कैसी है?’

‘मां, वह एक जरमन लड़की है, जो रिसर्च के सिलसिले में मुंबई आई हुई है और मेरे होस्टल के पास ही होटल में रहती है. हमारी मुलाकात अचानक ही एक यात्रा के दौरान हो गई थी. मां, कहने को तो सोफिया जरमन है पर देखने में उस का नाकनक्श सब भारतीयों जैसा ही है.’

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अपने बेटे की बात सुन कर मां एकदम सकते में आ गई थीं. कहने लगीं, ‘बेटा, तुम्हारी यह पसंद मेरी समझ में नहीं आई. तुम्हें अपने परिवार में सब संस्कार भारतीय ही मिले पर यह कैसी बात कि शादी एक विदेशी लड़की से करना चाहते हो? क्या मुंबई जा कर लोग अपनी परंपराओं और संस्कृति को भूल कर महानगर के मायाजाल में इतनी जल्दी खो जाते हैं कि जिस लड़की से शादी करनी है उस के घरपरिवार के बारे में जानने की जरूरत भी महसूस नहीं करते? क्या अपने देश में सुंदर लड़कियों की कोई कमी है, जो एक विदेशी लड़की को हमारे घर की बहू बनाना चाहते हो?’

फिर यह कहते हुए मां उठ कर वहां से चली गईं कि एक विदेशी बहू को वह स्वीकार नहीं कर पाएंगी.

शाम को चाय पर फिर एकसाथ बैठे तो मां ने समझाते हुए बात शुरू की, ‘देखो बेटा, शादीविवाह के फैसले भावावेश में लेना ठीक नहीं होता. तुम जरा ठंडे दिमाग से सोचो कि जिस परिवेश में तुम पढ़लिख कर बड़े हुए और तुम्हारे जो आचारविचार हैं, क्या कोई यूरोपीय संस्कृति में पलीबढ़ी लड़की उन के साथ सामंजस्य बिठा पाएगी? माना कि तुम्हें मुंबई में रहना है और वहां यह सब चलता है पर हमें तो यहां समाज के बीच ही रहना है. जब हमारे बारे में लोग तरहतरह की बातें करेंगे तब हमारा तो लोगों के बीच उठनाबैठना ही मुश्किल हो जाएगा. फिर चारू की शादी भी परेशानी का सबब बन जाएगी.’

‘मां, आप चारू की शादी की चिंता न करें,’ वह बोले थे, ‘वह मेरी जिम्मेदारी है और मैं ही उसे पूरी करूंगा. लोगों का क्या? वे तो सभी के बारे में कुछ न कुछ कहते ही रहते हैं. रही बात सोफिया के विदेशी होने की तो वह एक समझदार और सुलझेविचारों वाली लड़की है. वह जल्दी ही अपने को हमारे परिवार के अनुरूप ढाल लेगी. मां, आप एक बार उसे देख तो लें, वह आप को भी अच्छी लगेगी.’

बेटे की बातों से मां भड़कते हुए बोलीं, ‘तेरे ऊपर तो उस विदेशी लड़की का ऐसा रंग चढ़ा हुआ है कि तुझ से कुछ और कहना ही अब बेकार है. तुझे जो अच्छा लगे सो कर, मैं बीच में नहीं बोलूंगी.’

पापा के आफिस से लौटने पर जब उन के कानों तक सब बातें पहुंचीं, तो पहले वह भी विचलित हुए थे फिर कुछ सोच कर बोले, ‘बेटे, मुझे तुम्हारी समझदारी पर पूरा विश्वास है कि तुम अपना तथा परिवार का सब तरह से भला सोच कर ही कोई निर्णय करोगे. यदि तुम्हें लगता है कि सोफिया के साथ विवाह कर के ही तुम सुखी रह सकते हो, तो हम आपत्ति नहीं करेंगे. हां, इतना जरूर है कि विवाह से पहले एक बार हम सोफिया और उस के मातापिता से मिलना अवश्य चाहेंगे.’

पापा की बातों से उन के मन को तब बहुत राहत मिली थी पर वह यह समझ नहीं पाए थे कि उन की बातों से आहत हुई मां को वह कैसे समझाएं?

उन के मुंबई लौटने पर जब सोफिया ने उन से घर वालों की राय के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने कहा था, ‘मैं ने तुम्हारे बारे में मम्मीपापा को बताया तो उन्होंने यही कहा यदि तुम खुश हो तो उन की भी सहमति है और तुम्हारे मम्मीपापा के भारत आने पर उन से मिलने वे मुंबई आएंगे.’

सोफिया से यह सब कहते हुए उन्हें अचानक ऐसा लगा था कि सोफिया के साथ विवाह का निर्णय कर कहीं उन्होंने कोई गलत कदम तो नहीं उठा लिया? लेकिन सोफिया के सौंदर्य और प्यार से अभिभूत हो जल्दी ही उन्होंने अपने इस विचार को झटक दिया था.

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उन के मुंबई लौटने के बाद घर में एक अजीब सी खामोशी छा गई थी. मां और चारू दोनों ही अब घर से बाहर कम ही निकलतीं. उन्हें लगता कि यदि किसी ने बेटे की शादी का जिक्र छेड़ दिया तो वे उसे  क्या उत्तर देंगी?

पापा यह कह कर मां को समझाते, ‘मैं तुम्हारी मनोस्थिति को समझ रहा हूं, पर जरा सोचो कि मेरे अधिक जोर देने पर यदि वह सोफिया की जगह किसी और लड़की से विवाह के लिए सहमत हो भी जाता है और बाद में अपने वैवाहिक जीवन से असंतुष्ट रहता है तो न वह ही सुखी रह पाएगा और न हम सभी. इसलिए विवाह का फैसला उस के स्वयं के विवेक पर ही छोड़ देना हम सब के हित में है.’

Valentine’s Special- अंतराल: भाग 1

25 साल बाद जरमनी से भेजा सोफिया का पत्र मिला तो पंकज आश्चर्य से भर गए. पत्र उन के गांव के डाकखाने से रीडाइरेक्ट हो कर आया था. जरमन भाषा में लिखे पत्र को उन्होंने कई बार पढ़ा. लिखा था, ‘भारतीय इतिहास पर मेरे शोध पत्रों को पढ़ कर, मेरी बेटी जूली इतना प्रभावित हुई है कि भारत आ कर वह उन सब स्थानों को देखना चाहती है जिन का शोध पत्रों में वर्णन आया है, और चाहती है कि मैं भी उस के साथ भारत चलूं.’

‘तुम कहां हो? कैसे हो? यह वर्षों बीत जाने के बाद कुछ पता नहीं. भारत से लौट कर आई तो फिर कभी हम दोनों के बीच पत्र व्यवहार भी नहीं हुआ, इसलिए तुम्हारे गांव के पते पर यह सोच कर पत्र लिख रही हूं कि शायद तुम्हारे पास तक पहुंच जाए. पत्र मिल जाए तो सूचित करना, जिस से भारत भ्रमण का ऐसा कार्यक्रम बनाया जा सके जिस में तुम्हारा परिवार भी साथ हो. अपने मम्मीपापा, पत्नी और बच्चों के बारे में, जो अब मेरी बेटी जूली जैसे ही बडे़ हो गए होंगे, लिखना और हो सके तो सब का फोटो भी भेजना ताकि हम जब वहां पहुंचें तो दूर से ही उन्हें पहचान सकें.’

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पत्नी और बेटा अभिषेक दोनों ही उस समय कालिज गए हुए थे. पत्नी हिंदी की प्रोफेसर है और बेटा एम.बी.ए. फाइनल का स्टूडेंट है. शनिवार होने के कारण पंकज आज बैंक से जल्दी घर आ गए थे. इसलिए मन में आया कि क्यों न सोफिया को आज ही पत्र लिख दिया जाए.

पंकज ने सोफिया को जब पत्र लिखना शुरू किया तो उस के साथ की पुरानी यादें किसी चलचित्र की तरह उन के मस्तिष्क में उभरने लगीं.

तब वह मुंबई के एक बैंक में प्रोबेशनरी अधिकारी के पद पर कार्यरत थे. अभी उन की शादी नहीं हुई थी इसलिए वह एक होस्टल में रह रहे थे.

सोफिया से उन की मुलाकात एलीफेंटा जाते हुए जहाज पर हुई थी. वह भारत में पुरातत्त्व महत्त्व के स्थानों पर भ्रमण के लिए आई थी और उन के होस्टल के पास ही होटल गेलार्ड में ठहरी थी. सोफिया को हिंदी का ज्ञान बिलकुल नहीं था और अंगरेजी भी टूटीफूटी ही आती थी. उन के साथ रहने से उस दिन उस की भाषा की समस्या हल हो गई तो वह जब भी ऐतिहासिक स्थानों को घूमने के लिए जाती, उन से भी चलने का आग्रह करती.

सोफिया को भारत के ऐतिहासिक स्थानों के बारे में अच्छी जानकारी थी. उन से संबंधित काफी साहित्य भी वह अपने साथ लिए रहती थी, इसलिए उस के साथ रहने पर चर्चाओं में उन को आनंद तो आता ही था साथ ही जरमन भाषा सीखने में भी उन्हें उस से काफी मदद मिलती.

साथसाथ रहने से उन दोनों के बीच मित्रता कुछ ज्यादा बढ़ने लगी. एक दिन सोफिया ने अचानक उन के सामने विवाह का प्रस्ताव रख उन्हें चौंका दिया, और जब वह कुछ उत्तर नहीं दे पाए तो मुसकराते हुए कहने लगी, ‘जल्दी नहीं है, सोच कर बतलाना, अभी तो मुझे मुंबई में कई दिनों तक रहना है.’

यह सच है कि सोफिया के साथ रहते हुए वह उस के सौंदर्य और प्रतिभा के प्रति अपने मन में तीव्र आकर्षण का अनुभव करते थे पर विवाह की बात उन के दिमाग में कहीं दूर तक भी नहीं थी, ऐसा शायद इसलिए भी कि सोफिया और अपने परिवार के स्तर के अंतर को वह अच्छी तरह समझते थे. कहां सोफिया एक अमीर मांबाप की बेटी, जो भारत घूमने पर ही लाखों रुपए खर्च कर रही थी और कहां सामान्य परिवार के वह जो एक बैंक में अदने से अधिकारी थे. प्रेम के मामले में सदैव दिल की ही जीत होती है, इसलिए सबकुछ जानते और समझते हुए भी वह अपने को सोफिया से प्यार का इजहार करने से नहीं रोक पाए थे.

उन दिनों मां ने अपने एक पत्र में लिखा था कि आजकल तुम्हारे विवाह के लिए बहुत से लड़की वालों के पत्र आ रहे हैं, यदि छुट्टी ले कर तुम 2-4 दिन के लिए घर आ जाओ तो फैसला करने में आसानी रहेगी. तब उन्होंने सोचा था कि जब घर पहुंच कर मां को बतलाएंगे कि मुंबई में ही उन्होंने एक लड़की सोफिया को पसंद कर लिया है तो मां पर जो गुजरेगी और घर में जो भूचाल उठेगा, क्या वह उसे शांत कर पाएंगे पर कुछ न बतलाने पर समस्या क्या और भी जटिल नहीं हो जाएगी…

तब छोटी बहन चारू ने फोन किया था, ‘भैया, सच कह रही हूं, कुछ लड़कियों की फोटो तो बहुत सुंदर हैं. मां तो उन्हें देख कर फूली नहीं समातीं. मां ने कुछ से तो यह भी कह दिया कि मुझे दानदहेज की दरकार नहीं है, बस, घरपरिवार अच्छा हो और लड़की उन के बेटे को पसंद आ जाए…’

बहन की इन चुहल भरी बातों को सुन कर जब उन्होंने कहा कि चल, अब रहने दे, फोन के बिल की भी तो कुछ चिंता कर, तो चहकते हुए कहने लगी थी, ‘उस के लिए तो मम्मीपापा और आप हैं न.’

मां को अपने आने की सूचना दी तो कहने लगीं, ‘जिन लोगों के प्रस्ताव यहां सब को अच्छे लग रहे हैं उन्हें तुम्हारे सामने ही बुला लेंगे, जिस से वे लोग भी तुम से मिल कर अपना मन बना लें और फिर हमें आगे बढ़ने में सुविधा रहे.’

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‘नहीं मां, अभी किसी को बुलाने की जरूरत नहीं है. अब घर तो आ ही रहा हूं इसलिए जो भी करना होगा वहीं आ कर निश्चित करेंगे…’

‘जैसी तेरी मरजी, पर आ रहा है तो कुछ निर्णय कर के ही जाना. लड़की वालों का स्वागत करतेकरते मैं परेशान हो गई हूं.’

घर पहुंचा तो चारू चहकती हुई लिफाफों का पुलिंदा उठा लाई थी, ‘देखो भैया, ये इतने प्रपोजल तो मैं ने ही रिजेक्ट कर दिए हैं…शेष को देख कर निर्णय कर लो…किनकिन से आगे बात करनी है.’

उन्होंने उन में कोई रुचि नहीं दिखाई, तो रूठने के अंदाज में चारू बोली, ‘क्या भैया, आप मेरा जरा भी ध्यान नहीं रखते. मैं ने कितनी मेहनत से इन्हें छांट कर अलग किया है, और आप हैं कि इस ओर देख ही नहीं रहे. ज्यादा भाव खाने की कोशिश न करो, जल्दी देखो, मुझे और भी काम करने हैं.’

जब वह उन के पीछे ही पड़ गई तो वह यह कहते उठ गए थे कि चलो, पहले स्नान कर भोजन कर लें…मां भी फ्री हो जाएंगी…फिर सब आराम से बैठ कर देखेंगे. मां ने भी उन का समर्थन करते हुए चारू को डपट दिया, ‘भाई ठीक ही तो कह रहा है, छोड़ो अभी इन सब को, आया नहीं कि चिट्ठियों को ले कर बैठ गई.’

Crime: एक ठग महिला से ‘दोस्ती का अंजाम’

सोशल मीडिया पर  खूबसूरत महिला से दोस्ती कुछ लोग गर्व का सबब मानते हैं. मृगतृष्णा सामान सोशल मीडिया का यह संसार मन को आकर्षित करता है. जहां कोई खूबसूरत चेहरा देखा तो फ्रेंडशिप करने के लिए मन लालयित हो उठता है. ऐसे में अगर कोई खूबसूरत चेहरा फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट भेजे  तो कौन मना कर सकता है!

और जब खूबसूरत चेहरा  फोन पर बात करने लगता है ऐसे में आमतौर पर पुरुष वर्ग अपनी सुध बुध बिसार बैठता है. और कब यह खूबसूरत अदाएं ” बला” बन जाती है, पता ही नहीं चलता.

इस रिपोर्ट में आज आपको कुछ ऐसी ही घटनाओं के बारे में बताते हुए हम यह ठोस जानकारी दे रहे हैं कि आप और आपके आसपास के लोग सुरक्षित रहे.

पहली घटना-

मध्य प्रदेश के कटनी में सोशल मीडिया की फ्रेंडशिप में,एक उद्योगपति एक खूबसूरत लड़की के फेर में पड़कर लाखों रूपए लुटाने के बाद होश में आया. मामला पुलिस तक पहुंचा तो लड़की फरार हो गई. आखिर जेल की हवा खा रही है.

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दूसरी घटना-

राजस्थान की राजधानी जयपुर में एक अफसर महिला के मोह जाल में फंस गया ब्लैकमेल का शिकार हो गया जब मामला पुलिस तक पहुंचा तो पुलिस ने न्याय किया महिला जेल भेज दी गई.

तीसरी घटना-

छत्तीसगढ़ के रायपुर में एक अभिनेता महिला के चक्कर में पड़ गया लाखों रुपए ब्लेक मेल करने पर देने पड़े अंततः महिला पुलिस के शिकंजे में फसी.

सोशल मीडिया की बला!

फेसबुक पर दोस्ती कर पैसे ऐंठने वाली एक महिला को बस्तर पुलिस ने दिल्ली से गिरफ्तार किया है. साथ में उसके दो साथियों को भी पुलिस ने दबोचा है. आरोपियों के कब्जे से लाखों रुपये नगदी समेत अन्य सामान भी बरामद किया . पुलिस ने हमारे संवाददाता को बताया कि अगस्त 2020 में सरदार दरबारा सिंह ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि फेसबुक के माध्यम से एक “खूबसूरत महिला” ने उससे दोस्ती की.

दोस्ती करने के बाद विदेश से गिफ्ट मंगाकर उसे भेजने और गिफ्ट में कस्टम ड्यूटी के बहाने अलग-अलग किश्तों में 27 लाख 75 हजार 7 सौ रुपये अपने खाते में जमा कराए. कुछ दिनों बाद एहसास हुआ कि वह ठगी का शिकार हो चुका है.

मामला दर्ज होते ही पुलिस कप्तान दीपक कुमार झा के दिशा-निर्देश पर बोधघाट टीआई राजेश मरई और निरीक्षक धनंजय सिन्हा के नेतृत्व में एक टीम का गठन किया गया. जिसके बाद टीम ने मामले की जांच शुरू की. जांच के दौरान ही पुलिस को पुख्ता सबूत मिलते चले गए. सबूतों के आधार पर पुलिस टीम को आरोपियों की दिल्ली में होने की सूचना मिली. पुलिस ने तीन आरोपियों शोभराज थापा (37), रेणुका पोंडेल (33) और राजू हितांग (26) को दिल्ली से गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

पुलिस अधिकारी ने हमारे संवाददाता कोबताया कि यह तीनों आरोपी मूलतः नेपाल के रहवासी  हैं. कुछ सालों से दिल्ली में रह कर ठगी का नेटवर्क चला रहे थे.

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खूबसूरत बलाओं से कैसे बचें?

सोशल मीडिया के इस्तेमाल के समय खूबसूरत चेहरे जो आकर्षित करते हैं. उनके पीछे का सच आप नहीं जानते. आपको पता नहीं कि इस चेहरे के पीछे  कोई महिला अथवा ऐसा पुरुष सकता है जो आपको “गहरा दंश” दे सकता है.

जैसे की कहावत है- सुरक्षा हटी दुर्घटना घटी वैसे ही सोशल मीडिया के प्लेटफार्म में भी- जैसे ही आप का ध्यान हटा और आप का एक्सीडेंट हुआ!

लाखों रुपए बर्बाद होना संभव हो सकता है. ऐसे में कुछ महत्वपूर्ण बातों को अपने मन मस्तिष्क में बैठा कर आप हमेशा के लिए एक सुरक्षा कवच बना सकते हैं.

जिसमें सबसे महत्वपूर्ण पहली बात यह है कि सोशल मीडिया में आप अपनी मर्यादा बनाए रखें. कभी भी मर्यादा का बंधन नहीं तोड़े. लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन न करें.

पुलिस अधिकारी इंद्रपाल सिंह के मुताबिक आजकल सोशल मीडिया का जाल विस्तार ले चुका है और आए दिन लोगों के लोग जाने का मामला प्रकाश में आ रहा है. ऐसे में हम यही सलाह देंगे की फेसबुक आदि सोशल मीडिया पर बहुत ही समझदारी से आप भूमिका निभाएं. आर्थिक मामलों में वकील अथवा पुलिस से सलाह ले कर के ही आपका कदम आगे बढ़ना चाहिए.

निशाने पर एकता: भाग 1

दिल्ली में किन्नरों के कई ग्रुप हैं, जो मोटी कमाई करते हैं. अंडरवर्ल्ड की तरह किन्नरों में भी आपसी रंजिश रहती है. कई हत्याएं भी हुई हैं. एकता जोशी की हत्या भी किसी ग्रुप ने ही कराई, लेकिन किस ग्रुप ने, यह पता लगाना आसान नहीं होगा. फिर भी…

पूर्वी दिल्ली के जीटीबी एनक्लेव में बने डीडीए के जनता फ्लैट्स का वह कंपाउंड सब से आलीशान था. 6 फ्लैट के इस पूरे कंपाउड को 3 किन्नरों ने खरीद कर इसे आलीशान बंगले के रूप में तब्दील कर दिया था. इस बंगलेनुमा कंपाउंड में 3 किन्नरों के परिवार रहते हैं. किन्नरों के इस ग्रुप ने कुछ महीनों पहले ही इस कपांउड में आ कर रहना शुरू किया था.

इन्हीं में एक परिवार था एकता जोशी (40) का. एकता मूलरूप से उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल की रहने वाली थी. एकता के पिता दिल्ली के पूसा इंस्टीट्यूट में जौब करते हैं, जबकि मां और भाई गांव में रहते हैं.

एकता ने भाई के बच्चों 3 बेटों व एक बेटी को अपने पास रखा हुआ था. जबकि भाईभाभी और मां गांव में रहते थे. एकता चाहती थी कि उस के भाई के बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़लिख कर काबिल बने.चारों बच्चों की पढ़ाई के खर्चे एकता खुद उठाती थी.

एकता बचपन से किन्नर थी, इसलिए युवावस्था में पहले वह उत्तराखंड में रही, इस के बाद दिल्ली के किन्नर समाज में आ कर रहने लगी. किन्नरों की गुरू अनीता का एकता से खास लगाव था. इसलिए जिस कंपाउंड में एकता रहती थी, अनीता का निवास भी उसी कंपाउंड में था.

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धर्मालु स्वभाव और घूमनेफिरने की शौकीन एकता की सुंदरता के कारण लोगों को इस बात का पता ही नहीं चलता था कि वह किन्नर है. एकता का एक ही सपना था कि उस के भतीजेभतीजी पढ़लिख कर काबिल बने और उन्हें जीवन की हर खुशी मिले.

एकता का अपने परिवार से बहुत ज्यादा लगाव था. इसीलिए वह हमेशा परिवार के संपर्क में रहती थी. कभी वह बच्चों को ले कर गांव चली जाती तो कभी मां, भाई और भाभी उस से मिलने के लिए चले आते थे.

5 सितंबर, 2020 की रात के लगभग 9 बजे का वक्त था. उस दिन बड़े भतीजे अमित ने बुआ एकता से नई जींस और कुछ दूसरे कपड़े खरीदने की फरमाइश की थी.

कोरोना महामारी के चलते लगे लौकडाउन के बाद से एकता ने बच्चों के लिए और अपने लिए भी कोई नई ड्रैस नहीं खरीदी थी. इसलिए वह भतीजे अमित को ले कर लक्ष्मीनगर में शौपिंग करने के लिए निकल गई. अपने व सभी बच्चों के लिए उस ने कुछ ना कुछ खरीदा.

कई घंटे तक शौपिंग करने के बाद 9 बजे वह वापस घर लौट आई. अमित कपड़ों से भरे बैग ले कर घर के भीतर चला गया. एकता कार को घर के सामने पार्क करने के बाद जैसे ही बाहर निकली, अचानक तेजी से एक सफेद रंग की स्कूटी उस के पास आ कर रुकी.

अज्ञात स्कूटी सवारों का हमला

स्कूटी पर 2 लोग सवार थे, दोनों ने चेहरों पर मास्क और सिर पर हेलमेट पहने थे. एकता जब तक स्कूटी सवार आगंतुकों से कुछ पूछती, तब तक उन दोनों ने पैंट के अंदर खोंस रखे पिस्तौल निकाले और एक के बाद एक 4 गोलियों की आवाजों से इलाका गूंज उठा. आगंतुक स्कूटी सवारों के पिस्तौल से बेहद करीब से चलाई गई चारों गोलियां एकता के शरीर के नाजुक हिस्सों में लगी थी.

गोलियां लगते ही एकता के हलक से बचाओ…ओ….ओ की चीख निकली और खून में नहाया उस का शरीर लहरा कर जमीन पर गिर गया. गोलियों की आवाज और एकता की चीख सुन कर उस कंपाउंड में रहने वाले किन्नरों के परिवार और राहगीर वहां एकत्र हो गए.

इस बीच एकता पर गोलियां दागने वाले स्कूटी सवार जिस तेजी से आए थे, उसी तेजी के साथ वहां से नौ दो ग्यारह हो गए.

एकता के भाई के चारों बच्चे भी शोर व गोलियों की आवाज सुन कर वहां पहुंच गए. एकता को खून में लथपथ देख वे फूटफूट कर रोने लगे. तब तक किसी ने अस्पताल ले चलने की बात कही तो कंपाउंड में रहने वाले कुछ किन्नर एकता को जल्दी से गाड़ी में डाल कर समीप के जीटीबी अस्पताल ले गए. लेकिन वहां पहुंचते ही डाक्टरों ने बता दिया कि उस की मौत हो चुकी है. किन्नरों के कंपाउंड में रहने वाले किसी व्यक्ति ने तब तक पुलिस नियंत्रण कक्ष को फोन कर के वारदात की सूचना दे दी थी.

सूचना मिलने के 10 मिनट बाद ही पीसीआर की गाड़ी मौके पर पहुंच गई. वारदात की पुष्टि करने के बाद पीसीआर ने घटनास्थल से संबंधित इलाके के जीटीबी एनक्लेव थाने को फोन कर के घटना की जानकारी दे दी और तत्काल वहां पहुंचने के लिए कहा.

सूचना मिलते ही जीटीबी थाने के एसएचओ अरुण कुमार अपने इंसपेक्टर इनवैस्टीगेशन धर्मेंद्र कुमार को ले कर वारदात वाले स्थान पर पहुंच गए.

पता चला कि एकता किन्नर को कुछ लोग जीटीबी अस्पताल ले गए हैं और उस की मौत हो चुकी है. एसएचओ अरुण कुमार ने इंसपेक्टर धर्मेंद्र कुमार को पंचनामे की काररवाई के लिए जीटीबी अस्पताल भेज दिया और खुद घटनास्थल पर जांच व पूछताछ का काम शुरू कर दिया.

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सब से पहले उन्होंने अमित से पूछताछ की, जिस ने लक्ष्मीनगर बाजार से शौपिंग कर के लौटने और घर के भीतर जाने के बाद बाहर अपनी बुआ को गोली मार जाने की सारी बात बता दी.

तब तक वारदात की सूचना पा कर एसीपी (सीमापुरी) मुकेश त्यागी और शाहदरा जिले के डीसीपी अमित शर्मा भी क्राइम व फोरैंसिक टीम के साथ मौके पर आ गए.

पूछताछ में पता चला कि वारदात के बाद कातिल मुश्किल से 5 मिनट में वारदात को अंजाम दे कर वहां से फरार हो गए थे.

इंसपेक्टर धर्मेंद्र कुमार भी एकता के शव की जांचपड़ताल और उस के शव के पंचनामे की काररवाई कर के वापस घटनास्थल पर पहुंच गए.

एकता के सीने व पेट में 4 गोली लगी थीं. गोली मारने के बाद मौके से स्कूटी पर फरार हुए कातिलों का चेहरा किसी ने नहीं देखा था. जिस कंपाउंड में एकता व अन्य किन्नरों के परिवार रहते थे, उस के गेट पर सीसीटीवी कैमरे लगे थे.

पुलिस ने सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को जांच के लिए अपने कब्जे में ले लिया.एसीपी मुकेश त्यागी के निर्देश पर उसी रात एसएचओ अरुण कुमार ने धारा 302 के तहत हत्या का मुकदमा दर्ज कर जांच का काम इंसपेक्टर इनवैस्टीगेशन धर्मेंद्र के सुपुर्द कर दिया. साथ ही उन की मदद के लिए एक विशेष टीम का गठन कर दिया.

अगले भाग में पढ़ें-  किन्नर एकता जोशी की हत्या किसने की ?

निशाने पर एकता: भाग 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

जांच का काम शुरू करते ही पुलिस ने सब से पहले सीसीटीवी फुटेज की जांच की, लेकिन उस से कोई विशेष मदद नहीं मिली. क्योंकि बदमाशों के चेहरे पूरी तरह हेलमेट व मास्क से ढके थे. पुलिस को वारदात में इस्तेमाल की गई स्कूटी के नंबर से मदद मिलने की उम्मीद थी. क्योंकि सीसीटीवी में उस का नंबर स्पष्ट नजर आ रहा था.

लेकिन जब नंबर की पड़ताल की गई तो पता चला कि इस नंबर पर स्कूटी रजिस्टर्ड ही नहीं है, जिस से साफ हो गया कि कातिलों ने स्कूटी पर फरजी नंबर प्लेट का इस्तेमाल किया था. पुलिस को शक था कि संभव है पिछले दिनों एकता का किसी से कोई झगड़ा हुआ हो या फिर किसी ने धमकी दी हो. क्योंकि आमतौर पर किन्नर समाज में सब से ज्यादा झगड़े इलाके को ले कर होते हैं.

कई ग्रुप हैं किन्नरों के

दिल्ली में किन्नरों के अलगअलग ग्रुप हैं और अकसर इलाके में काम करने को ले कर कोई ग्रुप किसी दूसरे इलाके में घुस आता है तो उस इलाके में काम करने वाले किन्नर झगड़ा कर लेते हैं.

जब इस बिंदु पर जांच हुई और कंपाउंड में रहने वाले किन्नरों से पूछताछ की गई तो पता चला एकता स्वभाव से बेहद मिलनसार थी. उस का किसी से कोई विवाद नहीं था.

पूछताछ करने पर पता चला कि इसी कंपाउंड में रहने वाली अनीता जोशी इस इलाके की गुरु हैं, जिन्होंने एकता को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था. इसलिए पैसे के लेनदेन का सारा हिसाब एकता ही रखती थी. किन्नर समाज में एकता का रुतबा बन चुका था. वह पूरी दिल्ली की गुरु बनने की रेस में शामिल हो गई थी.

एकता के करीबियों से पूछताछ में यह भी पता चला कि जिस रात एकता की हत्या हुई, उसी सुबह नंदनगरी 212 बस स्टैंड पर जनता फ्लैट्स के किन्नर ग्रुप का दूसरे किन्नरों के ग्रुप से विवाद हुआ था.

दूसरा ग्रुप कमजोर पड़ गया था, जिस ने रात को देख लेने की धमकी दी थी. इसलिए पुलिस को आशंका हुई कि कहीं इस हत्याकांड को आपसी रंजिश के तहत अंजाम न दिया गया हो.

पुलिस ने किन्नरों से पूछताछ के बाद किन्नरों के दूसरे गुट के बारे में जानकारी हासिल की और कुछ किन्नरों को हिरासत में ले कर पूछताछ की. लेकिन पूछताछ के बाद भी पुलिस किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी.

फिर भी न जाने क्यों एसएचओ अरुण कुमार को अंदेशा था कि किन्नर समाज के लोग ही इस हत्या में शामिल हैं, गुरु की कुरसी हासिल करने के चलते भी यह हत्या हो सकती है. जिन संदिग्ध लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया था, उन से हत्याकांड के बारे में तो पता नहीं चला लेकिन यह जरूर पता चल गया कि एकता को उत्तराधिकारी घोषित किए जाने के बाद दिल्ली में कई किन्नर गुरु एकता से नाराज थे.

दूसरी तरफ पुलिस की टीम ने इलाके के सौ से ज्यादा लोगों से पूछताछ कर ली थी और 2 सौ से ज्यादा कैमरों की फुटेज खंगाल चुकी थी. लेकिन इस के बावजूद कोई ठोस जानकारी हासिल नहीं हो पाई थी.

कुछ किन्नरों से पूछताछ के बाद पुलिस को ऐसे संकेत मिले कि एकता जोशी की हत्या में भाड़े के हत्यारों का इस्तेमाल हो सकता है. ऐसा इसलिए भी लग रहा था क्योंकि गोली चलाने वाले बेहद प्रोफेशनल थे.

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दूसरी तरफ देश के कई हिस्सों में किन्नर समाज के लोगों ने एकता जोशी की हत्या पर आक्रोश जताते हुए हत्याकांड का जल्द खुलासा करने की मांग शुरू कर दी थी.

एकता के रुतबे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि उस की हत्या के बाद शिवसेना के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष जयभगवान भी शोक प्रकट करने के लिए उस के घर पर पहुंचे. किन्नर महामंडलेश्वर लक्ष्मी किन्नर एकता को अपनी खास दोस्त मानती थी, इसलिए वह भी शोक प्रकट करने के लिए उन के घर पहुंची.

एसएचओ अरुण कुमार ने जांचपड़ताल में साइबर सेल टीम की भी मदद ली थी. साइबर टीम के सहयोग से पुलिस ने घटनास्थल के आसपास उस रात एक्टिव मोबाइल फोन नंबरों का डंप निकाल कर छानबीन शुरू कर दी थी. एकता जोशी के मोबाइल की काल डिटेल्स निकाल कर पुलिस ने उस की भी छानबीन की.

इस बिंदु पर की गई छानबीन के बाद पुलिस को पता चला कि एकता जोशी की पश्चिमी यूपी के मेरठ व गाजियाबाद में कुछ लोगों से बातचीत होती थी. जिन नंबर से उन्हें काल आती या की जाती, वे सभी मेरठ के अपराधियों के नंबर थे. इसीलिए एसीपी मुकेश त्यागी ने मेरठ में एसटीएफ टीम से संपर्क कर हत्याकांड में मदद करने के लिए कहा था.

उत्तर प्रदेश पुलिस की स्पैशल टास्क फोर्स के डीएसपी बृजेश सिंह ने अपने तेजतर्रार इंसपेक्टर रविंद्र कुमार के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी, जिस में सबइंसपेक्टर संजय कुमार, हेडकांस्टेबल संजय सिंह, रवि वत्स, रकम सिंह, कांस्टेबल दीपक कुमार व अंकित श्यौरान को शामिल किया गया.

छानबीन पहुंची मेरठ तक

पुलिस की इस टीम के पास मेरठ के अधिकांश अपराधियों की कुंडली थी. दिल्ली पुलिस से सूचना मिलने के बाद पुलिस ने अपने मुखबिर नेटवर्क का इस्तेमाल करना शुरू किया. एसटीएफ की टीम ने ऐसे अपराधियों को चिह्नित करना शुरू किया, जो सुपारी ले कर हत्या करने के लिए जाने जाते थे. पुलिस ने चिह्नित किए गए सभी बदमाशों के मोबाइल नंबर हासिल कर उन की काल डिटेल्स निकाल कर उसे खंगालना शुरू कर दिया.

इसी पड़ताल के दौरान एसटीएफ की टीम को आमिर गाजी नाम के एक बदमाश के मोबाइल की लोकेशन 5 सितंबर को दिल्ली में मिली. संयोग से आमिर के मोबाइल की लोकेशन रात को साढ़े 8 से 9 बजे के करीब जीटीबी एनक्लेव के जनता फ्लैट के आसपास थी और यहीं एकता जोशी की हत्या हुई थी.

एसटीएफ की टीम समझ गई कि दिल्ली पुलिस का शक सही है कि एकता जोशी की हत्या करने वाले बदमाशों का संबंध मेरठ से है. इतनी जानकारी मिलने के बाद एसटीएफ की टीम ने आमिर गाजी को ट्रैक करना शुरू कर दिया. और 9 नवंबर को सटीक सूचना मिलने के बाद एसटीएफ टीम ने शाम को करीब 7 बजे उसे इस्माइल वाली गली से गिरफ्तार कर लिया.

आमिर के साथ एक अन्य युवक भी था. तलाशी लेने के बाद दोनों के कब्जे से एक आटोमैटिक पिस्टल और एक तमंचा बरामद हुआ. आमिर के साथ पकड़े गए युवक का नाम सुहैल खान था.

पुलिस को दोनों से पूछताछ करने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी. थोड़ी सी सख्ती के बाद आमिर ने कबूल कर लिया कि उसी ने अपने एक दोस्त गगन पंडित के साथ मिल कर किन्नर एकता जोशी की हत्या की थी.

आमिर मेरठ के कुख्यात अपराधी और गाजियाबाद की डासना जेल में बंद सलमान गाजी का छोटा भाई है. सलमान की मेरठ के दूसरे कुख्यात अपराधी शारिक से जानलेवा दुश्मनी चल रही है.

एक जमीन को ले कर कई साल पहले शुरू हुई शारिक व सलमान की दुश्मनी में अब तक दोनों के गैंग के कई लोग मारे जा चुके हैं. इन दिनों सलमान व शारिक दोनों ही जेल में बंद हैं.

आमिर गाजी ने बताया कि कोतवाली क्षेत्र में सराय बहलीम निवासी गगन पंडित ने किन्नर गुरु एकता जोशी की हत्या कराई थी. चूंकि उस के भाई सलमान के गैंग की रंजिश शारिक गैंग से चल रही है. इसलिए जेल में बंद सलमान ने आमिर से कहा था कि किसी भी तरह शारिक की हत्या करा दें तो शहर में उन की पकड़ मजबूत हो जाएगी.

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बस इसी काम के लिए आमिर ने कुछ दिन पहले गगन पंडित से मदद मांगी थी. आमिर की गगन पंडित से 6 महीने पहले ही हाजी याकूब गली में रहने वाले असलम पहलवान के जरिए मुलाकात हुई थी. दोनों की जानपहचान जल्द ही दोस्ती में बदल गई थी.

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निशाने पर एकता: भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

3 महीने पहले गगन पंडित ने आमिर से कहा था कि वह पहले दिल्ली के शाहदरा में जीटीबी एनक्लेव में एक हत्या करने में उस की मदद कर दे तो उस के बाद वह शारिक गैंग का खात्मा कराने में उस की मदद करेगा.

आमिर ने कह दिया कि वह उस के काम में मदद जरूर करेगा, लेकिन उस के बाद उसे शारिक गैंग को खत्म करने में उस की मदद करनी पडे़गी. इस बात पर दोनों की ही सहमति बन गई थी.

5 सितंबर, 2020 को आमिर मेरठ में था जब सुबह के वक्त उस के पास गगन पंडित का फोन आया. उस ने बताया कि वह दिल्ली में है. गगन ने उस से कहा, दोस्त जिस काम के लिए तुम्हें मेरी मदद करनी है उसे पूरा करने का वक्त आ गया है. इसी वक्त दिल्ली चले आओ.

मदद लेने से पहले दोस्त की मदद करने का वायदा किया था, लिहाजा आमिर उसी समय दिल्ली के लिए रवाना हो गया. शाम को 3 बजे के करीब वह दिल्ली पहुंच गया और नंदनगरी में उस जगह पहुंचा, जहां गगन ने उसे पहुंचने के लिए कहा था.

गगन पंडित के साथ वहां कुछ और लोग भी थे. यहीं पर गगन ने उसे बताया कि जीटीबी एनक्लेव में रहने वाले एक किन्नर एकता जोशी से उस की खुन्नस चल रही है.

‘‘किन्नर से तुम्हारी किस बात की खुन्नस गगन भाई?’’ आमिर ने उत्सुकता में पूछा.

‘‘मेरी सीधी तो खुन्नस नहीं है लेकिन उसी की बिरादरी के कुछ लोग हैं, जिन से अपनी दोस्ती है और वे मदद भी करते रहते हैं. उन्हीं के रास्ते का कांटा बन गई है एकता जोशी, बस इसीलिए टपकाना है. समझो, पीछे से डिमांड मिली है.’’ गगन जोशी ने थोड़े शब्दों में पूरी बात बता दी.

‘‘ठीक है भाई, आप चाहते हो तो टपका देते हैं साली को.’’ आमिर ने जोश के साथ कहते हुए पूछा, ‘‘सामान वगैरह है या जुगाड़ करने पडें़गे?’’

‘‘चिंता मत करो पूरा सामान है.’’ कहते हुए गगन ने उसे एक इंग्लिश पिस्टल दी और खुद भी एक पिस्टल निकाल कर अपनी पैंट में खोंस ली.

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गगन का खेल

इस के बाद वे किसी के फोन का इंतजार करने लगे. शाम को किसी का फोन आने के बाद गगन आमिर को एक स्कूटी पर बैठा कर अपने साथ जीटीबी एनक्लेव में जनता फ्लैट के पास पहुंचा और इंतजार करने लगा. पहचान छिपाने के लिए दोनों ने सिर पर हेलमेट लगा लिए थे और चेहरे पर मास्क भी पहन रखे थे. उन्हें बैकअप देने के लिए गगन के कुछ साथी भी स्कूटी ले कर उन के आसपास थे.

रात करीब 9 बजे जैसे ही एकता जोशी की कार उस के कंपाउंड के बाहर आ कर रुकी तो गगन ने थोड़ी दूर पर खड़ी अपनी स्कूटी स्टार्ट की और जब तक एकता कार से बाहर निकलती, तब तक स्कूटी ले जा कर एकता के पास रोक दी.

एकता जैसे ही कार से बाहर निकली आमिर और गगन ने उस पर 2-2 गोलियां इतने नजदीक से दागीं कि उस के बचने की गुजांइश ही नहीं थी. गोलियां मारने के बाद दोनों फौरन घटनास्थल से फरार हो गए.

एकता की हत्या के बाद आमिर और गगन दोनों ही मेरठ वापस आ गए. हालांकि आमिर के साथ गिरफ्तार हुए सुहैल खान उर्फ सोनू का एकता की हत्या से कोई वास्ता नहीं था, लेकिन उस से पुलिस ने अवैध हथियार बरामद किया था. इसलिए एसटीएफ ने उस के खिलाफ भी आमिर के साथ शस्त्र अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर लिया.

मेरठ के नूरनगर का रहने वाला सुहैल ईव्ज चौराहे पर कार वाशिंग का काम करता है. सुहैल 2 साल से आमिर के संपर्क में था. श्यामनगर निवासी इरफान ने परवेज से उस का संपर्क कराया था. परवेज मेरठ के एक बड़े गैंगस्टर हाजी इजलाल का भाई है.

इजलाल ने 10 साल पहले दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड एसीपी एस.के. गिहा के भतीजे पुनीत गिरि, उस के दोस्त सुनील ढाका और कुलदीप उज्ज्वल की हत्या कर उन के शव बागपत नहर में डाल दिए थे.

इजलाल ने अपनी प्रेमिका के कहने पर मेरठ कालेज में पढ़ने वाले इन तीनों लड़कों की बेरहमी से हत्या की थी. इस हत्याकांड में परवेज भी जेल गया था, लेकिन 2 साल पहले उसे जमानत मिल गई थी.

उसी इजलाल के भाई परवेज ने सुहैल को 2 हत्याओं के लिए 10-10 लाख रुपए की सुपारी दी थी, लेकिन उस ने अभी यह नहीं बताया था कि उसे किस की हत्या करनी है.

परवेज ने सुहैल से कहा था कि किस की हत्या करनी है और कब करनी है, इस के बारे में आमिर उसे बताएगा. आमिर को परवेज ने बता दिया था कि उसे सुहैल के साथ मिल कर किन लोगों की हत्या को अंजाम देना है.

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आमिर गाजी के एकता हत्याकांड के कबूलनामे के बाद एसटीएफ के डीएसपी बृजेश सिंह ने सीमापुरी एसीपी मुकेश त्यागी और जीटीबी एनक्लेव थाने के एसएचओ अरुण कुमार को आमिर की गिरफ्तारी और एकता हत्याकांड के खुलासे की सूचना दे दी और उन के खिलाफ शस्त्र अधिनियम का मामला दर्ज कर मेरठ की अदालत में पेश कर दिया. जहां से उन्हें मेरठ जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक हत्याकांड में शामिल गगन पंडित की गिरफ्तारी नहीं हुई थी. पुलिस को आशंका है कि एकता की हत्या किसी विरोधी किन्नर ग्रुप ने सुपारी दे कर कराई है. आमिर व गगन से पूछताछ के बाद ही पूरे राज से परदा उठेगा. लेकिन वह लापता है.

Valentine’s Special- हरिनूर: नीरज और शबीना की प्रेम कहानी

Valentine’s Special- हरिनूर: भाग 2

जब नई अम्मी को बेटा हुआ, तो जोया आपा और अम्मी को बेदखल कर उसी हवेली में नौकरों के रहने वाली जगह पर एक कोना दे दिया गया.

अम्मी दिनभर सिलाईकढ़ाई करतीं और जोया आपा भी दूसरों के घर का काम करतीं तो भी दो वक्त की रोटी मुहैया नहीं हो पाती थी.

अम्मी 30 साल की उम्र में 50 साल की दिखने लगी थीं. ऐसा नहीं था कि अम्मी खूबसूरत नहीं थीं. वे हमेशा अब्बू की दीवानगी के किस्से बयां करती रहती थीं.

सभी ने अम्मी को दूसरा निकाह करने को कहा, पर अम्मी तैयार नहीं हुईं. पर इधर कुछ दिनों से वे काफी परेशान थीं. शायद जोया आपा के सीने पर बढ़ता मांस परेशानी का सबब था. मेरे लिए वह अचरज, पर अम्मी के लिए जिम्मेदारी.

‘‘शबीना… ओ शबीना…’’ जोया आपा की आवाज ने शबीना को यादों से वर्तमान की ओर खींच दिया.

‘‘ठीक है, उस लड़के को ले कर आना, फिर देखते हैं कि क्या करना है.’’

लड़के का फोटो देख शबीना खुशी से उछल गई और चीख पड़ी. भविष्य के सपने संजोते हुए वह सोने चली गई.

अकसर उन दोनों की मुलाकात शहर के बाहर एक गार्डन में होती थी. आज जब वह नीरज से मिली, तो उस ने कल की सारी घटना का जिक्र किया, ‘‘जनाब, आप मेरे घर चल रहे हैं. अम्मी आप से मुलाकात करना चाह रही हैं.’’

‘‘सच…’’ कहते हुए नीरज ने शबीना को अपनी बांहों में भर लिया. शबीना शरमा कर बड़े प्यार से नीरज को देखने लगी, फिर नीरज की गाड़ी से ही घर पहुंची.

नीरज तो हैरान रह गया कि इतनी बड़ी हवेली, सफेद संगमरमर सी न शीदार दीवारें और एक मुगलिया संस्कृति बयां करता हरी घास का लान, जरूर यह बड़ी हैसियत वालों की हवेली है.

नीरज काफी सकुचाते हुए अंदर गया, तभी शबीना बोली, ‘‘नीरज, उधर नहीं, यह अब्बू की हवेली है. मेरा घर उधर कोने में है.’’

हैरानी से शबीना को देखते हुए नीरज उस के पीछेपीछे चल दिया. सामने पुराने से सर्वैंट क्वार्टर में शबीना दरवाजे पर टंगी पुरानी सी चटाई हटा कर अंदर नीरज के साथ दाखिल हुई.

नीरज ने देखा कि वहां 2 औरतें बैठी थीं. उन का परिचय शबीना ने अम्मी और जोया आपा कह कर कराया.

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अम्मी ने नीरज को देखा. वह उन्हें बड़ा भला लड़का लगा और बड़े प्यार से उसे बैठने के लिए कहा.

अम्मी ने कहा, ‘‘मैं तुम दोनों के लिए चाय बना कर लाती हूं. तब तक अब्बू और भाईजान भी आते होंगे.’’

‘‘अब्बू, अरे… आप ने उन्हें क्यों बुलाया? मैं ने आप से पहले ही मना किया था,’’ गुस्से से चिल्लाते हुए शबीना अम्मी पर बरस पड़ी.

अम्मी भी गुस्से में बोलीं, ‘‘चुपचाप बैठो… अब्बू का फैसला ही आखिरी फैसला होगा.’’

शबीना कातर निगाहों से नीरज को देखने लगी. नीरज की आंखों में उठे हर सवाल का जवाब वह अपनी आंखों से देने की कोशिश करती.

थोड़ी देर तक वहां सन्नाटा पसरा रहा, तभी सामने की चटाई हिली और भरीभरकम शरीर का आदमी दाखिल हुआ. वे सफेद अचकन और चूड़ीदार पाजामा पहने हुए थे. साथ ही, उन के साथ 17-18 साल का एक लड़का भी अंदर आया.

आते ही उस आदमी ने नीरज का कौलर पकड़ कर उठाया और दोनों लोग नीरज को काफी बुराभला कहने लगे.

नीरज एकदम अचकचा गया. उस ने संभलने की कोशिश की, तभी उस में से एक आदमी ने पीछे से वार कर दिया और वह फिर वहीं गिर गया.

शबीना कुछ समझ पाती, इस से पहले ही उस के अब्बू चिल्ला कर बोले, ‘‘खबरदार, जो इस लड़के से मिली. तुझे शर्म नहीं आती… वह एक हिंदू लड़का है और तू मुसलमान…’’ नीरज की तरफ मुखातिब हो कर बोले, ‘‘आज के बाद शबीना की तरफ आंख उठा कर मत देखना, वरना तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का वह हाल करेंगे कि प्यार का सारा भूत उतर जाएगा.’’

नीरज ने समय की नजाकत को समझते हुए चुपचाप चले जाना ही उचित समझा.

अब्बू ने शबीना का हाथ झटकते हुए अम्मी की तरफ धक्का दिया और गरजते हुए बोले, ‘‘नफीसा, शबीना का ध्यान रखो और देखो अब यह लड़का कभी शबीना से न मिले. इस किस्से को यहीं खत्म करो,’’ और यह कहते हुए वे उलटे पैर वापस चले गए.

अब्बू के जाते ही जो शबीना अभी तक तकरीबन बेहोश सी पड़ी थी, तेजी से खड़ी हो गई और अम्मी से बोली, ‘‘अम्मी, यह सब क्या है? आप ने इन लोगों को क्यों बुलाया? अरे, मुझे तो समझ में नहीं आ रहा है कि ये इतने सालों में कभी तो हमारा हाल पूछने नहीं आए. हम मर रहे हैं या जी रहे हैं, पेटभर खाना खाया है कि नहीं, कैसे हम जिंदगी गुजार रहे हैं. दोदो पैसे कमाने के लिए हम ने क्याक्या काम नहीं किया.

‘‘बोलो न अम्मी, तब ये कहां थे? जब हमारी जिंदगी में चंद खुशियां आईं, तो आ गए बाप का हक जताने. मेरा बस चले, तो आज मैं उन का सिर फोड़ देती.’’

‘‘शबीना…’’ कहते हुए अम्मी ने एक जोरदार चांटा शबीना को रसीद कर दिया और बोलीं, ‘‘बहुत हुआ… अपनी हद भूल रही है तू. भूल गई कि उन से मेरा निकाह ही नहीं हुआ है, दिल का रिश्ता है. मैं उन के बारे में एक भी गलत लफ्ज सुनना पसंद नहीं करूंगी. कल से तुम्हारा और नीरज का रास्ता अलगअलग है.’’

Valentine’s Special- हरिनूर: भाग 3

शबीना सारी रात रोती रही. उस की आंखें सूज कर लाल हो गईं. सुबह जब अम्मी ने शबीना को इस हाल में देखा, तो उन्हें बहुत दुख हुआ. वे उस के बिखरे बालों को समेटने लगीं. मगर शबीना ने उन का हाथ झटक दिया.

बहरहाल, इसी तरह दिनहफ्ते, महीने बीतने लगे. शबीना और नीरज की कोई बातचीत तक नहीं हुई. न ही नीरज ने मिलने की कोशिश की और न ही शबीना ने.

इसी तरह एक साल बीत गया. अब तक अम्मी ने मान लिया था कि शबीना अब नीरज को भूल चुकी है.

उसी दौरान शबीना ने अपनी फैशन डिजाइन के काम में काफी तरक्की कर ली थी और घर में अब तक सब नौर्मल हो गया था. सब ने सोचा कि अब तूफान शांत हो चुका है.

वह दिन शबीना की जिंदगी का बहुत खास दिन था. आज उस के कपड़ों की प्रदर्शनी थी. वह तेजतेज कदमों से लिफ्ट की तरफ बढ़ रही थी, तभी लिफ्ट का दरवाजा खुला, तो सामने खड़े शख्स को देख कर उस के पैर ठिठक गए.

‘‘कैसी हो शबीना?’’ उस ने बोला, तो शबीना की आंखों से आंसू आ गए. बिना कुछ बोले भाग कर वह उस के गले लग गई.

‘‘तुम कैसे हो नीरज? उस दिन तुम्हारी इतनी बेइज्जती हुई कि मेरी हिम्मत ही नहीं हुई कि तुम से कैसे बात करूं, पर सच में मैं तुम्हें कभी भी नहीं भूली…’’

नीरज ने उस के मुंह पर हाथ रख दिया, ‘‘वह सब छोड़ो, यह बताओ कि तुम यहां कैसे?

‘‘आज मेरे सिले कपड़ों की प्रदर्शनी लगी है, पर तुम…’’

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‘‘मैं यहां का मैनेजर हूं.’’

शबीना ने मुसकराते हुए प्यारभरी निगाहों से नीरज को देखा. नीरज को लगा कि उस ने सारे जहां की खुशियां पा ली हैं.

‘‘अच्छा सुनो, मैं यहां का सारा काम खत्म कर के रात में 8 बजे तुम से यहीं मिलूंगी.’’

आज शबीना का मन अपने काम में नहीं लग रहा था. उसे लग रहा था कि जल्दी से नीरज के पास पहुंच .

शबीना को देखते ही नीरज बोला, ‘‘कुछ इस कदर हो गई मुहब्बत तनहाई से अपनी कि कभीकभी इन सांसों के शोर को भी थामने की कोशिश कर बैठते हैं जनाब…’’

शबीना मुसकराते हुए बोली, ‘‘शिकवा तो बहुत है मगर शिकायत कर नहीं सकते… क्योंकि हमारे होंठों को इजाजत नहीं है तुम्हारे खिलाफ बोलने की,’’ और वे दोनों खिलखिला कर हंस पड़े.

‘‘नीरज, तुम्हें पता नहीं है कि आज मैं मुद्दतों बाद इतनी खुल कर हंसी हूं.’’

‘‘शायद मैं भी…’’ नीरज ने कहा. रात को दोनों ने एकसाथ डिनर किया और दोनों चाहते थे कि इतने दिनों की जुदाई की बातें एक ही घंटे में खत्म कर दें, जो कि मुमकिन नहीं था. फिर वे दोनों दिनभर के काम के बाद उसी पुराने गार्डन या कैफे में मिलने लगे.

लोग अकसर उन्हें साथ देखते थे. शबीना के घर वालों को भी पता चल गया था, पर उन्हें लगता था कि वे शादी नहीं करेंगे. वे इस बारे में शबीना को समयसमय पर हिदायत भी देते रहते थे.

इसी तरह साल दर साल बीतने लगे. एक दिन रात के अंधेरे में उन दोनों ने अपना शहर छोड़ एक बड़े से महानगर में अपनी दुनिया बसा ली, जहां उस भीड़ में उन्हें कोई पहचानता तक नहीं था. वहीं पर दोनों एक एनजीओ में नौकरी करने लगे.

उन दोनों का घर छोड़ कर अचानक जाना किसी को अचरज भरा नहीं लगा, क्योंकि सालों से लोगों को उन्हें एकसाथ देखने की आदत सी पड़ गई थी. पर अम्मी को शबीना का इस तरह जाना बहुत खला. वे काफी बीमार रहने लगीं. जोया आपा का भी निकाह हो गया था.

इधर शबीना अपनी दुनिया में बहुत खुश थी. समय पंख लगा कर उड़ने लगा था. एक दिन पता चला कि उस की अम्मी को कैंसर हो गया और सब लोगों ने यह कह कर इलाज टाल दिया था कि इस उम्र में इतना पैसा इलाज में क्यों बरबाद करें.

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शबीना को जब इस बात का पता चला, तो उस ने नीरज से बात की.

नीरज ने कहा, ‘‘तुम अम्मी को अपने पास ही बुला लो. हम मिल कर उन का इलाज कराएंगे.’’

शबीना अम्मी को इलाज कराने अपने घर ले आई. अम्मी जब उन के घर आईं, तो उन का प्यारा सा संसार देख कर बहुत खुश हुईं.

नीरज ने बड़ी मेहनत कर पैसा जुटाया और उन का इलाज कराया और वे धीरेधीरे ठीक होने लगीं. अब तो उन की बीमारी भी धीरेधीरे खत्म हो गई. मगर अम्मी को बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती. नीरज उन की परेशानी को समझ गया.

एक दिन शाम को अम्मी शबीना के साथ बैठी थीं, तभी नीरज भी पास आ कर बैठ गया और बोला, ‘‘अम्मी, जिंदगी में ज्यादा रिश्ते होना जरूरी नहीं है, पर रिश्तों में ज्यादा जिंदगी होना जरूरी है. अम्मी, जब बनाने वाले ने कोई फर्क नहीं रखा, तो हम कौन होते हैं फर्क रखने वाले.

‘‘अम्मी, मेरी तो मां भी नहीं हैं, मगर आप से मिल कर वह कमी भी पूरी हो गई.’’

अम्मी ने प्यार से नीरज को गले लगा लिया, तभी नीरज बोला, ‘‘आज एक और खुशखबरी है, आप जल्दी ही नानी बनने वाली हैं.’’

अब अम्मी बहुत खुश थीं. वे अकसर शबीना के घर आती रहतीं. समय के साथ ही शबीना ने प्यारे से बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम शबीना ने हरिनूर रखा.

शबीना ने यह नाम दे कर उसे हिंदूमुसलमान के झंझावातों से बरी कर दिया था.

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