शहनाज गिल का बोल्ड लुक फैंस को नहीं हुआ हजम, इन फोटोज के कारण हुईं ट्रोल

बिग बौस 13 फेम एक्ट्रेस शहनाज गिल की फैन फोलोइंग किसी के कम नहीं है, कम फिल्मों में अपनी एक्टिंग और टैलेंट के दम पर एक्ट्रेस ने लोगों का खूब दिल जिता हैं. एक्ट्रेस सोशल मीडिया पर एक्टिव रहती है. शहनाज गिल अक्सर अपनी तस्वीरें शेयर करती रहती हैं. जिन पर फैंस जमकर प्यार लुटाते हैं. शहनाज गिल ने कई बार अपनी बोल्ड फोटोज शेयर कर ट्रोल्स के निशाने पर आ चुकी हैं. एक्ट्रेस का बोल्ड लुक लोगों के लिए परेशानी बन जाता हैं. वही, इन फोटो की वजह से लोग उन्हे खरी-खोटी सुनाते है.

 

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शहनाज गिल इंस्टाग्राम पर काफी एक्टिव रहती हैं. शहनाज गिल अक्सर अपनी तस्वीरें फैंस के लिए शेयर करती रहती हैं. शहनाज गिल इंस्टाग्राम पर अच्छी फैन फॉलोइंग है. शहनाज गिल की तस्वीरें आते ही वायरल हो जाती हैं.

 

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शहनाज गिल की फोटो को फैंस पसंद करते हैं. इसके साथ ही अपनी पसंदीदा एक्ट्रेस शहनाज गिल पर प्यार बरसाते हैं. शहनाज गिल कई बार बोल्ड फोटोज शेयर करती हैं. शहनाज गिल की इन अदाओं की फैंस तारीफ करते हैं. शहनाज गिल अपनी बोल्डनेस के चलते ट्रोल भी हो जाती हैं. शहनाज गिल को लेकर काफी निगेटिव कमेंट आते हैं. शहनाज गिल की तस्वीरों को देखकर अधिकतर लोगों का कहना होता है वह सादगी में अच्छी लगती हैं. शहनाज गिल को ड्रेसिंग सेंस को लेकर नसीहत दी जाती है. शहनाज गिल को ट्रोल्स की बातों से फर्क नहीं पड़ता है.शहनाज गिल अपनी बोल्ड तस्वीरें शेयर करती रहती हैं.

लाइव कॉन्सर्ट के दौरान सुनिधि चौहान के साथ हुई बदतमीजी, फेंकी गई बोतल

सुनिधि चौहान ने अपनी अवाज से सबको अपना दीवाना बनाया है, उनकी सिंगिग की जितनी तारीफ की जाएं उतनी कम है. उनके गाने सुनने वालों लाखों करोडों फैन हैं, जो उन्हे आज भी फोलो करते है.हाल में सुनिधि चौहान एक कॉन्सर्ट में पहुंची थीं. जहां का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है.  दरअसल, सुनिधि चौहान के लाइव कॉन्सर्ट के दौरान लोग उनकी आवाज पर झूमते नजर आ रहे थे कि अचानक कुछ ऐसा हुआ जिसने लोगों को हैरान कर दिया.

सुनिधि चौहान के कॉन्सर्ट में काफी संख्या में उनके फैंस पहुंचते हैं, सुनिधि चौहान के एक कॉन्सर्ट का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है और इसको लेकर वह सुर्खियों में आ गई है.


एंटरटेनमेंट की मशहूर गायिका सुनिधि चौहान अपने गानों से महफिल अपने नाम कर लेती हैं. सुनिधि चौहान लाइव कॉन्सर्ट भी करती हैं और अपनी बेहतरीन आवाज से लोगों को झमूने पर मजबूर कर देती हैं. हाल में सुनिधि चौहान का देहरादून के एक कॉलेज में लाइव कॉन्सर्ट था. इस दौरान सुनिधि चौहान गा रही थीं और लोग उनकी गायकी सुनकर मस्त थे कि अचानक भीड़ से किसी ने उन पर बोतल फेंक दी. ये देखकर लोग हैरान रह गए लेकिन सुनिधि चौहान को इस पर गुस्सा नहीं बल्कि उन्होंने मजेदार तरीक से रिएक्शन दिया. सुनिधि चौहान का ये वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है.

सुनिधि चौहान ने बोतल फेंकने के बाद अपने लाइव कॉन्सर्ट को जारी रखा. हालांकि, सुनिधि चौहान ने कहा, ‘ये क्या हो रहा है? बोतल फेंकने से क्या होगा? शो रुकेगा, क्या तुम ऐसा चाहते हो?’ उनकी बात सुनकर फैंस नहीं नहीं चिल्लाने लगती है. सुनिधि चौहान का वीडियो वायरल होने के बाद उनके फैंस सपोर्ट में आए हैं और उनकी सादगी की जमकर तारीफ कर रहे हैं.


बता दें कि सुनिधि चौहान ने फिल्मों के लिए एक से बढ़कर एक गाने गाए हैं. सुनिधि चौहान की प्यारी आवाज सुनने के लिए लोग इंतजार करते हैं.

 

क्यों नहीं चल पाती समलैंगिकता से जुडी फिल्में

समलैंगिकता हमेशा से समाज में रही है, लोगों ने बस स्वीकार करने में देरी की है. सिनेमा भी उसी अनुरूप ढलता रहा. आज क्वीर फिल्में बनाई तो जा रही हैं पर दर्शकों में शर्म और झिझक के चलते ये फिल्में चल नहीं पातीं. जानिए आने वाले समय में क्या है क्वीर फिल्मों का भविष्य.पिछले कुछ सालों से क्वीर फिल्मों का निर्माण देश में बढ़ा है, क्योंकि अब कानून इस को अपराध नहीं मानता. उन्हें अपने तरीके से जीने का अधिकार देता है, लेकिन शादी करने की मान्यता नहीं देता.

ऐसे में कुछ अलग तरीके के भाव और रहनसहन को फौलो करने वाले लोगों को छिप कर रहने की अब जरूरत नहीं रही, लेकिन परिवार, समाज और धर्म के कुछ लोग आज भी इन्हें हीन दृष्टि से देखते हैं. उन्हें अपनी भावनाओं को खुल कर कहने या रखने की आजादी नहीं है.

कोर्ट के फैसले से अब उन्हें खुल कर अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का कुछ मौका अवश्य मिला है. ऐसे में अच्छी समलैंगिक फिल्में भी बनीं, मसलन ‘फायर’, ‘तमन्ना’, ‘दरमिया’, ‘माय ब्रदर निखिल’, ‘बौम्बे टाकीज’ आदि, जिन की गिनती अच्छी फिल्मों में की गई और लोगों ने इन की मेकिंग को सराहा भी.

क्वीर फिल्मों का इतिहास 

समय के साथसाथ यह मौका पूरे विश्व में ‘न्यू क्वीर सिनेमा’ के रूप मे जाना गया, जिसे पहली बार 80 और 90 के दशकों में सब के सामने लाया गया, जिस पर कई सालों तक बहस छिड़ी और प्राइड मार्च हुए ताकि उन्हें ऐसी अलग कहानी कहने का मौका दिया जाए. अंत में कई देशों ने इसे कानूनी मान्यता दी और उन्हें आजादी से जीने का अधिकार दिया.

इस के बाद निर्मातानिर्देशकों ने ऐसे अलग विषयों को ले कर कई फिल्में बनाईं, फिल्म फैस्टिवल करवाए गए. इतने सब के बावजूद इन फिल्मों को बौक्सऔफिस पर लाने से हमेशा रोका जाता रहा. पहले इन फिल्मों को नैशनल फिल्म डैवलपमैंट कौर्पोरेशन (हृस्नष्ठष्ट) हौल तक लाने में सहयोग करता था, लेकिन उस का सहयोग अब कम मिल पाता है. आज भी थिएटर हौल मिलने में मुश्किलें हैं, दर्शकों की पहुंच से आज भी ये फिल्में दूर हैं. आखिर क्वीर फिल्मों के साथ इतना भेदभाव क्यों है, क्या है इन का भविष्य?

क्या हैं क्वीर फिल्में

समलैंगिकों को आम बोलचाल की भाषा में एलजीबीटी यानी लैस्बियन, गे, बाईसैक्सुअल और ट्रांसजैंडर कहते हैं. वहीं कई और दूसरे वर्गों को जोड़ कर इसे क्विटयर  समुदाय का नाम दिया गया है. इसलिए इसे रुत्रक्चञ्जक्त भी कहा जाता है. सभी क्वीर फिल्मों में प्यार को अधिक महत्त्व दिया गया और बताया गया है कि प्यार कभी भी किसी से हो सकता है और इसे स्वीकार करना जरूरी है.

समलैंगिक सिनेमा अपना आधिकारिक लैवल दिए जाने से पहले दशकों तक अस्तित्व में था, जैसे कि फ्रांसीसी रचनाकारों जीन कोक्ट्यू, डी अन पोएटे और जीन जेनेट की फिल्में ऐसी ही कहानियों को कहती हैं.

जिम्मेदार सभी

इस बारे में फिल्म निर्माता, निर्देशक ओनीर कहते हैं, ‘‘मु?ो वह अच्छा लग रहा है कि मेरी फिल्म पाइन कोन क्वीर सैंट्रिक फिल्म होने के बावजूद ब्रिटिश फिल्म ‘इंस्टिट्यूट फ्लेर’ लंदन में दिखाई जा रही है और उसे देखने वाले भी काफी हैं. भारत में भी इन फिल्मों का निर्माण बढ़ा है, लेकिन हौल तक पहुंचने में मुश्किल है.

‘‘इस के अलावा इन फिल्मों को बढ़ावा मिलने की मुश्किल होने की वजह समाज और धर्म है, क्योंकि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक शादी को कानूनन मान्यता देने की बात आई तो यही बात सामने आई कि समाज तैयार नहीं है और मना हो गया. समाज इसे बहुत धीरेधीरे मान रहा है कि इस तरीके के व्यक्तित्व वाले लोग हमारे समाज में हैं.

‘‘मैं जब किसी आम फिल्म को देखने हौल तक जाता हूं तो मेरे दिमाग में एक लव स्टोरी देखने की बात सामने आती है, इस के आगे और कुछ भी नहीं सोचता, लेकिन ऐसी आम फिल्म बनाने वालों को बहुत मुश्किल होती है. क्वीर फिल्मों की लव स्टोरी को देखना, इतना डर, असुरक्षा की भावना उन के अंदर क्यों आती है, मुझे समझ में नहीं आता, लेकिन उन्हीं फिल्मों को औनलाइन लोग छिपछिप कर देखते हैं. आंकड़ों के अनुसार, समाज में करीब 10 प्रतिशत लोग क्वीर समुदाय के हैं, क्या उन्हें अपनी तरह से जीने का अधिकार नहीं होना चाहिए?’’

ओनीर आगे कहते हैं, ‘‘लोगों का डर मैं ने तब भी देखा था जब मेरी पहली फिल्म ‘माई ब्रदर निखिल’ रिलीज हुई थी. तब भी इंटरवल में जब कुछ दर्शकों को पता चलता है कि मुख्य भूमिका निभाने वाला समलैंगिक है तो वे उठ कर चले गए. पुरुष दर्शकों को इस की चिंता अधिक होती है कि कोई उन्हें समलैंगिक फिल्में देखते हुए देख न ले. डर तो उन्हें तब लगना चाहिए जब वे काफी पैसे खर्च कर हिंसात्मक फिल्में देखने हौल तक जाते हैं. प्यार से इतना डर क्यों? किसी की खुशी को मानने से उन्हें डर क्यों होता है? ये कमियां हमारे समाज और धर्म की हैं, जो इसे स्वीकार नहीं करतीं.

‘‘समस्या हो रही है कि थिएटर में ऐसी फिल्मों को रिलीज होने के लिए जगह नहीं मिलती. पहले नैशनल फिल्म डैवलपमैंट कौर्पोरेशन (हृस्नष्ठष्ट) इन फिल्मों को रिलीज करने में सहयोग देता था. अभी तो किसी फिल्म को दिखाने के लिए थिएटर को रकम देनी पड़ती है, पहले ऐसा नहीं था. अभी छोटी फिल्मों को रिलीज करना बहुत मुश्किल हो चुका है. ओटीटी पर भी रिलीज करने के लिए भी कई समस्याएं आती हैं, मसलन हीरो कितना बड़ा है, कैसी फिल्म है आदि के बारे में उन्हें बताना पड़ता है.

‘‘क्वीर फिल्मों को इस लिहाज से अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता, उन्हें चुनने वाले ही ऐसी फिल्मों को रिलीज करने में असहज महसूस करते हैं. क्वीर फिल्मों की समस्या हर स्तर पर अलगअलग होती है. ऐसे में वही फिल्में हौल तक पहुंच पाती हैं जिन की कहानी आम दर्शकों के स्वीकार करने योग्य हों. एक अलग रंग या व्यक्तित्व को जब तक कोई मान्यता नहीं मिलेगी, इन फिल्मों को स्वीकारा नहीं जाएगा. सो, दर्शक कैसे बढ़ेंगे?

‘‘साल 2005 में मैं ने फिल्म ‘माई ब्रदर निखिल’ बनाई थी और अब ‘पाइन कोन’ ले कर आया हूं. यह फिल्म अपनी जिंदगी. प्यारमोहब्बत, लिविंग आदि के बारे में है. इसलिए यहां पर इसे कम लोग स्वीकार कर रहे हैं, जबकि विदेशों में इसे देखने वाले काफी हैं. मु?ो यह नहीं सम?ा आता है कि 100 करोड़ की घटिया फिल्मों को थिएटर हौल मिल जाते हैं, लेकिन 2 या 3 करोड़ की छोटी और क्वीर फिल्मों को क्यों नहीं? ऐसी कई बड़ी फिल्में आईं और नहीं चलीं, दर्शक नहीं मिले, क्या हौल मालिक को घाटा नहीं हुआ?’’

माध्यमों की कमी का नहीं होगा असर 

छोटी और क्वीर फिल्मों को दिखाने के माध्यम की कमी भले ही हो, लेकिन इसे बनाना बंद नहीं करना है, क्योंकि ऐसी फिल्में कई अलग माध्यमों में भी दिखाई जा सकती हैं और इन के दर्शक भी हैं.

निर्देशक ओनीर कहते है, ‘‘लोग मुझ से पूछते हैं कि मैं ने समलैंगिक फिल्में क्यों बनाईं, इस की जरूरत क्या है? मैं ने उन से कहा कि, मुझे अदृश्य रह कर जीना मंजूर नहीं और मैं ने ही समलैंगिक विषयों पर फिल्में बनाई हैं और आगे भी बनाता रहूंगा. मैं जब बड़ा हुआ, तो ऐसी फिल्में नहीं थीं, क्योंकि समाज ऐसी बातों को नजरअंदाज करता था.’’

इक्वल ह्यूमन राइट्स

वे आगे कहते हैं, ‘‘मेरी फिल्म ‘पाइन कोन’ उन लोगों के लिए है जो इक्वलिटी इन ह्यूमन राइट को समझें. इन फिल्मों के लिए विजन की जरूरत है. ऐसे में फिल्म फैस्टिवल में भी दिखाया जाना एक अच्छा कदम है. आजकल थोड़े जागरूक लोग इन फिल्मों के को देखते हैं, क्योंकि प्राइड मार्च अब छोटेछोटे शहरों में भी होता है. इस का अर्थ यह है कि लोग इसे स्वीकार कर रहे हैं और आगे आने वाली यंग जनरेशन छोटी और क्वीर फिल्में बनाना नहीं छोड़ेगी. आगे दर्शकों का प्यार उन्हें मिलेगा, फिल्में हौल तक जाएंगी.’’

क्या बला है बौडी पौजिटिविटी मूवमैंट और यह फेल क्यों हुआ

तकरीबन 13 वर्षों पहले सोशल मीडिया पर शुरू हुआ बौडी पौजिटिविटी मूवमैंट ‘मी टू’ मूवमैंट की तरह दम तोड़ चुका है. हां, अब युवा खुद को ज्यादा एक्सपोज करते हैं. सोशल मीडिया पर हो रही ट्रोलिंग कहती है कि लोगों की मेंटैलिटी इस मामले में नहीं बदली है.

‘तू मोटी है, तू काली है, तू नाटा है, इस की नाक देखो कैसी पकौड़े जैसी है, इस का पेट देखो कितना बाहर निकला हुआ है’ इसी तरह के कमैंट इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया पर छाए रहते हैं. ऐसा लगता है मानो कुछ लोग बस दूसरों को यह बताना चाहते हैं कि उन की बौडी, उन की पर्सनैलिटी सही नहीं है. उस में कुछ न कुछ कमी है.

इसी का एक उदाहरण इलियाना डिक्रूज है. एक बार इलियाना (इलियाना प्रैग्नैंसी न्यूज) ने अपने इंस्टाग्राम पर ‘आस्क एनीथिंग’ सैशन रखा था. तब एक यूजर ने उन से पूछा कि आप अपनी अजीब बौडीटाइप से कैसे डील करती हैं? इस पर ऐक्ट्रैस ने जवाब देते हुए कहा, ‘‘पहली बात मेरी बौडीटाइप अजीब नहीं है. मेरी क्या किसी की नहीं होती. दूसरी बात मैं अपनी बौडीटाइप को ले कर बहुत क्रिटिसाइज हुई हूं. लेकिन मैं अपनेआप से प्यार करना सीख रही हूं और किसी दूसरे के आदर्शों के अनुरूप नहीं बनना चाहती हूं.’’

कहने का अर्थ यह है कि आम नागरिक क्या, सैलिब्रिटीज भी यानी सभी अपनी बौडी, स्किन के लिए कभी न कभी क्रिटिसाइज जरूर हुए हैं लेकिन युवाओं ने इस मुद्दे को ऐड्रैस किया और साल 2012 के आसपास एक मूवमैंट की शुरुआत हुई जिसे बौडी पौजिटिवटी मूवमैंट कहा गया. इस का उद्देश्य अपनी शारीरिक बनावट को स्वीकार करना और आत्मसम्मान को बढ़ावा देना था.

मूवमैंट की शुरुआत

यह मूवमैंट 2012 में इंस्टाग्राम पर उभरा था. इस मूवमैंट के शुरू होने के बाद इंस्टाग्राम पोस्ट पर बड़ी संख्या में बौडी पौजिटिविटी हैशटैग देखने को मिले. बौडी पौजिटिविटी मूवमैंट बौडी की शेप को बेहतर बनाने की कोशिश में शरीर के प्रति प्यार और एक्स्पैक्टेशन को बढ़ावा देता है. साथ ही, यह सभी शारीरिक आकृतियों, साइज, लिंग और त्वचा टोन की स्वीकृति को बढ़ावा देता है. लेकिन 13 वर्षों बाद यह मूवमैंट फेल होता दिखाई दे रहा है. इस के फेल होने के कई कारण रहे.

बौडी पौजिटिविटी मूवमैंट के फेल होने का एक कारण यह है कि शरीर के अतिरिक्त वजन उठाने से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों को बौडी पौजिटिविटी की अवधारणा नजरअंदाज करती है. आलोचकों का कहना था बौडी पौजिटिविटी मूवमैंट के चलते लोग मोटापे को इग्नोर करेंगे और मोटापे से होने वाली बीमारियों से घिर जाएंगे, जो उन की हैल्थ के लिए बिलकुल भी सही नहीं है.

दूसरा कारण यह था कि बौडी पौजिटिविटी मूवमैंट के हैशटैग का यूज करने वाले ज्यादातर इंस्टाग्राम पोस्ट युवा, श्वेत, पारंपरिक रूप से आकर्षक, गैरविकलांग, सिजैंडर महिलाओं को दर्शाता था. जो बाकी जातीय लोगों, पुरुषों, एलजीबीक्यूटी प्लस समुदायों के लोगों और बूढ़े लोगों को सही प्रतिनिधित्व नहीं देता है.

तीसरा कारण यह था कि बहुत से लोग सोशल मीडिया पर जो फोटो और वीडियो पोस्ट करते हैं वह एडिट किया गया होता था, ऐसे में दूसरों के लिए यह जान पाना बहुत मुश्किल हो गया कि सच क्या है और ?ाठ क्या.

चौथा कारण यह था कि कुछ लोग इसे सिर्फ अभिनेत्रियों की एक प्रकार की पहचान मानते थे. इस का मतलब है कि वे उन्हें केवल उन की शारीरिक सुंदरता के आधार पर मापते थे.  बौडी पौजिटिविटी मूवमैंट का मुख्य उद्देश्य यह था कि सभी शरीरों को स्वीकार किया जाए, लेकिन यह मूवमैंट कुछ लोगों के लिए बस एक विदेशी कला बन गया था.

पांचवां कारण यह था कि कुछ लोगों का मानना था कि इस में शारीरिक सुंदरता के आधार पर महिलाओं को अधिक प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिस से कि यह केवल महिलाओं के बारे में ही सिमट कर रह गया है. बौडी पौजिटिविटी मूवमैंट को सामाजिक समता के प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए था, लेकिन कुछ लोगों ने इसे एक महिला आंदोलन के सिवा कुछ और नहीं सम?ा था.

हवाहवाई बन गया कैंपेन

यह मूवमैंट इसलिए भी फेल रहा क्योंकि कुछ लोग इसे एक सामाजिक सुधार प्रक्रिया की तरह देखते थे, जिस में शारीरिक सुंदरता और हैल्थ के मानकों को सामाजिक व राजनीतिक परिवर्तन के साथ जोड़ा गया. कुछ लोग इस मूवमैंट को एक संघर्ष के रूप में देखते थे जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के बीच एक विवाद का विषय बन गया.

इस ने सोसाइटी के अलगअलग ग्रुप्स के लोगों के बीच एक खाई पैदा कर दी. बजाय इस के कि यह एक ग्रुप के रूप में मिल कर बौडी पौजिटिविटी के उद्देश्यों के लिए काम करता, बल्कि इस ने उन गु्रप्स के बीच विरोधात्मक भावना पैदा कर दी.

बौडी पौजिटिविटी को बढ़ावा देना आमतौर पर एक अच्छी बात है. लेकिन जरूरी यह है कि इस पौजिटिविटी की धारा में समाज के सभी सेगमैंट्स को जोड़ा जाए न कि इक्कादुक्का और फिल्मी सैलिब्रिटी को. अगर इन कारणों को नहीं सुधारा गया तो जबजब बौडी पौजिटिविटी मूवमैंट आएंगे, फेल ही कहलाएंगे.

बौडी पौजिटिविटी मूवमैंट आखिर क्यों फेल हुआ. अगर इस सवाल का जवाब ढूंढ़ा जाए तो इस का सब से बड़ा जवाब यही है कि यह मूवमैंट एक हवाहवाई मूवमैंट था, बिलकुल वैसे ही जैसे कुछ सालों पहले ‘मी टू’ मूवमैंट आया था, जिस ने हल्ला खूब मचाया पर उस से निकला क्या, किसी को कुछ नहीं पता. इस मूवमैंट का भी कोई सिरपैर न था. हालांकि यह सच है कि इस मूवमैंट के जरिए लोगों में सैल्फ कौन्फिडैंस आया लेकिन उस कौन्फिडैंस का क्या फायदा जो आप को बीमारियों का घर बना दे.

कमियों को स्वीकारना जरूरी

अगर आप मोटे हैं, आप का शरीर थुलथुला है, आप की तोंद आप की पैंट में नहीं फंसती तो आप के लिए यह एक समस्या है, न कि इसे पौजिटिव माना जाए. ऐसे में आप को शरीर पर काम करना चाहिए न कि बौडी पौजिटिविटी के नाम पर प्राउड.

याद रखें, अगर आप मोटे हैं तो लोग आप को मोटा ही कहेंगे. आप के सामने नहीं तो आप के पीठपीछे ही सही, पर कहेंगे जरूर. आप उन की आवाज पर रोक लगा सकते हैं पर सोच पर नहीं. यही उन की मानसिकता है. लेकिन आप औरों के लिए नहीं, खुद के लिए, खुद को बदलें. इस से न सिर्फ आप हैल्दी रहेंगे बल्कि बीमारियों से आप की दोस्ती भी नहीं होगी.

वहीं अगर आप बौडी पौजिटिविटी के नाम पर मोटापे को अपनी बौडी पर कब्जा करने देंगे तो आप भविष्य में जरूर पछताएंगे. मोटापा कोई अच्छी चीज नहीं है. इस से पर्सनैलिटी और कौन्फिडैंस खराब ही होता है.

बौडी पौजिटिविटी उन मानो में अच्छा है जहां यह रंगत की बात करता हो. अगर आप काले हैं, आप की स्किन पर निशान हैं, आप की बौडी पर ज्यादा हेयर हैं और लोग आप को इन चीजों के लिए चिढ़ा रहे हैं तो यहां आप का बौडी पौजिटिविटी वाला एटिट्यूड काम आएगा क्योंकि रंगत से आप की हैल्थ को कोई नुकसान नहीं होगा.

सैक्स सिखाता है आपको साफ रहना

रानी और रजनी पक्की सहेलियां हैं. दोनों मध्यवर्गीय, पढ़ीलिखी, उदार, सहिष्णु, मितव्ययी, परिवार का खयाल रखने वाली, नईनई चीजों को सीखने की इच्छुक हैं. बस दोनों में एक ही अंतर है. यह अंतर देह प्रेम को ले कर है. एक छत के नीचे रहते हुए भी रानी और उस के पति के बीच देह प्रेम उमड़ने में काफी वक्त लगता है. महीनों यों ही निकल जाते हैं. उधर रजनी और उस का पति हफ्ते में 1-2 बार शारीरिक निकटता जरूर पा लेते हैं. रानी इस प्रेम को गंदा भी समझती है, जबकि रजनी ऐसा नहीं सोचती है. दोनों एकदूसरे के इस अंतर को जानती हैं.

आप कहेंगे कि भला यह क्या अंतर हुआ? जी हां, यही तो बड़ा अंतर है. पिछले दिनों इस एक अंतर ने दोनों सहेलियों में कई और अंतर पैदा कर दिए थे.

इस एक अंतर से ही रानी तन को स्वच्छ रखने में संकोची हो गई थी. केवल वह ही नहीं, बल्कि उस के पति का भी यही हाल था. उसे अपने कारोबार से ही फुरसत नहीं थी. वह हर समय गुटका भी चबाता रहता था.

सैक्स सिखाए स्वच्छ रहना

उधर, रजनी नख से शिख तक हर अंग को ले कर सतर्क थी. बेहतर तालमेल, प्रेम, अंतरंगता और नियमित सहवास की वजह से रजनी को यह एहसास रहता था कि एकांत, समय और निकटता मिलने पर पति कभी भी उसे आलिंगन में भर सकता है. वह कभी भी उस के किसी भी अंग को चूम सकता है. कभी भी दोनों के यौन अंगों का मिलन हो सकता है. ऐसे में वह अंदरूनी साफसफाई को ले कर लापरवाह नहीं हो सकती थी. रजनी की तरफ से इसी प्रकार की कोई भी प्रतिक्रिया उस के पति को भी अंदरूनी रूप से स्वच्छ रखने में मदद करती थी.

इस एक अंतर से ही रानी अपनी देह और खानपान के प्रति भी लापरवाह हो गई थी. जब देह को निहारने वाला, देह की प्रशंसा करने वाला कोई न हो तो अकसर शादी के बाद इस तरह की लापरवाही व्यवहार में आ जाती है. रानी इस का सटीक उदाहरण थी. इस वजह से समय बीतने के साथ उस ने चरबी की कई परतों को आमंत्रण दे दिया था. उधर रजनी का खुद पर पूरा नियंत्रण था, लिहाजा वह छरहरे बदन की स्वामिनी थी.

इस एक अंतर के कारण ही रानी एक दिन डाक्टर के सामने बैठी थी. रजनी भी साथ थी. रानी को जननांग क्षेत्र में दर्द की समस्या थी, जो काफी अरसे से चली आ रही थी. डाक्टर ने बताया कि इन्फैक्शन है. इन्फैक्शन का कारण शरीर की साफसफाई पर ठीक से ध्यान नहीं दिया जाना है. साफसफाई में लापरवाही से समस्या गंभीर हो गई थी.

रानी का मामला रजनी के पति को भी पता चल गया था. वास्तव में हर वह बात जो रजनी और उस के पति में से किसी एक को पता चलती थी, वह दूसरे की जानकारी में आए बिना नहीं रहती थी. वे दोनों हर मामले पर बात करते थे. रात में जब रजनी ने पति राजेश को सारी बात बताई तो राजेश ने कहा, ‘‘तुम्हें अपनी सहेली को समझाना चाहिए कि देह प्रेम गंदी क्रिया नहीं है. मैं यह तो नहीं कहता कि ऐसे सभी विवाहित लोग जो सहवास नहीं करते, वे शरीर की साफसफाई को ले कर लापरवाह रहते होंगे, लेकिन मैं यह गारंटी से कह सकता हूं कि यदि पतिपत्नी नियमित अंतराल पर देह प्रेम करते हैं, तो दोनों ही अपने तन की स्वच्छता के प्रति लापरवाह नहीं रह सकते यानी यदि वे सहवास का आनंद लेते हैं तो वे ज्यादा स्वस्थ और स्वच्छ रहते हैं.’’

दवा है सैक्स

राजेश ने बिलकुल ठीक कहा. दरअसल, जब पतिपत्नी को यह एहसास रहता है कि वे एकदूसरे को प्यार करते हैं और उन्हें शारीरिक रूप से जल्दीजल्दी निकट आना है, तो दोनों ही स्वाभाविक रूप से अपने हर अंग की साफसफाई के प्रति सचेत रहते हैं. इस से न सिर्फ उन का व्यक्तित्व निखरता है और दोनों में प्रेम बढ़ता है, बल्कि कई रोग भी शरीर से दूर रहते हैं. इस के उलट जो दंपती शारीरिक संबंधों के प्रति उदासीन रहते हैं, वे अपनी साफसफाई के प्रति भी लापरवाह हो सकते हैं.

हम सभी जानते हैं कि वैवाहिक जीवन में पतिपत्नी के बीच शारीरिक संबंध के 2 प्रमुख उद्देश्य होते हैं. पहला संतान की उत्पत्ति और दूसरा आनंद की प्राप्ति. लेकिन बारीकी से नजर डालें तो सहवास से एक परिणाम और निकलता है, जिसे तीसरा उद्देश्य भी बनाया जा सकता है. दरअसल, सहवास से पतिपत्नी अच्छा स्वास्थ्य भी पा सकते हैं. इसे हम यों भी कह सकते हैं कि यदि पतिपत्नी के बीच नियमित अंतराल पर शारीरिक संबंध बन रहे हैं, तो इस बात की संभावना ज्यादा है कि वे स्वस्थ भी रहेंगे.

जी हां, पतिपत्नी के बीच सैक्स को कई तरह की दिक्कतें दूर करने की दवा बताया गया है. सैक्स को ले कर दुनिया भर में अनेक शोध किए गए हैं और किए जा रहे हैं. विभिन्न शोधों के बाद दुनिया भर के विशेषज्ञों ने सैक्स के फायदे कुछ इस तरह गिनाए हैं:

– पतिपत्नी के बीच नियमित अंतराल पर शारीरिक संबंध बनने से तनाव और ब्लड प्रैशर नियंत्रण में रखने में सहायता मिलती है. तनाव में कमी आती है, तो अनेक अन्य रोग भी पास नहीं फटकते हैं.

– सप्ताह में 1-2 बार किया गया सैक्स रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है.

– सैक्स अपनेआप में एक शारीरिक व्यायाम है और विशेषज्ञों के अनुसार आधे घंटे का सैक्स करीब 90 कैलोरी कम करता है यानी सैक्स के जरीए वजन घटाने में भी मदद मिलती है.

– एक अध्ययन कहता है कि जो व्यक्ति हफ्ते में 1-2 बार सैक्स करते हैं उन में हार्ट अटैक की आशंका आधी रह जाती है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि शारीरिक प्यार एक तरह से भावनात्मक प्यार का ही बाहरी रूप है, इसलिए जब हम शारीरिक प्यार करते हैं, तो भावनाओं का घर यानी हमारा दिल स्वस्थ रहता है.

– वैज्ञानिकों के अनुसार सैक्स, फील गुड के एहसास के साथसाथ स्वसम्मान की भावना को भी बढ़ाने में सहायक होता है.

– शारीरिक संबंध प्रेम के हारमोन औक्सीटौसिन को बढ़ाने का काम करता है, जिस से स्त्रीपुरुष का रिश्ता मजबूत होता है.

– सैक्स शरीर के अंदर के स्वाभाविक पेनकिलर ऐंडोर्फिंस को बढ़ावा देता है, जिस से सैक्स के बाद सिरदर्द, माइग्रेन और यहां तक कि जोड़ों के दर्द में भी राहत मिलती है.

– वैज्ञानिकों के अनुसार जिन पुरुषों में नियमित अंतराल पर स्खलन (वीर्य का निकलना) होता रहता है, उन में ज्यादा उम्र होने पर प्रौस्टेट संबंधी समस्या या प्रौस्टेट कैंसर की आशंका काफी कम हो जाती है. यहां नियमित अंतराल से मतलब 1 हफ्ते में 1-2 बार सहवास से है.

– सैक्स नींद न आने की दिक्कत को भी दूर करता है, क्योंकि सैक्स के बाद अच्छी नींद आती है.

सहवास एक दवा है. दवा भी ऐसी जिस का कोई साइड इफैक्ट भी नहीं है, इसलिए पतिपत्नी को स्वस्थ रहने के लिए इस दवा का नियमित अंतराल पर सेवन अवश्य करना चाहिए.

घरवाले मेरी लव मैरिज नहीं कर रहे हैं इसलिए मैं भाग रही हूं, क्या मेरा निर्णय सही है?

सवाल
मेरी उम्र 18 साल है, मुझे अपने कालेज के एक लड़के से प्यार हो गया है. वह भी मुझ से बहुत प्यार करता है और शादी भी करना चाहता है. यहां तक कि उस ने अपने घर में भी इस बारे में जिक्र किया है. लेकिन दोनों की फैमिली वाले मानने को तैयार नहीं हैं. लेकिन मैं उस के बिना नहीं रह सकती, चाहे मुझे घर से भागना ही क्यों न पड़े. बताएं कि क्या मेरा निर्णय सही है?

जवाब
देखिए अभी आप की उम्र पढ़ाई लिखाई व लोगों को जाननेसमझने की है क्योंकि अभी न ही आप और न ही वह युवक इतना मैच्योर हुआ है कि आप शादी जैसे जिम्मेदारीभरे रिश्ते में बंध जाएं. आप के परिवार वाले आप के हितैषी हैं तभी तो वे इस रिश्ते के लिए अभी इनकार कर रहे हैं ताकि आप को बाद में पछताना न पड़े. आप दोनों मिल कर परिवार वालों को समझाएं कि हम दोनों एकदूसरे से बहुत प्यार करते हैं और शादी करना चाहते हैं लेकिन कैरियर बनने के बाद.

इस से वे भी आप को जरूर समझेंगे और इस रिश्ते को समय आने पर स्वीकार भी करेंगे. और आप भूल कर भी घर से भागने की बात मन से निकाल दीजिए वरना बाद में पछतावे के सिवा कुछ हाथ नहीं लगेगा क्योंकि जल्दबाजी में कुछ नहीं रखा. आप ही सोचिए जब आर्थिकरूप से आप दोनों सशक्त होंगे तो आप को जिंदगी जीने का अलग ही आनंद आएगा वरना पैसों की कमी के कारण आप जीवनभर इस निर्णय पर पछताएंगी ही.

एआई तकनीक का चक्रव्यूह : मोबाइल फोन से लूटे रुपए

दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके में रहने वाली 24 साल की प्रतिभा एक बड़ी कंपनी में इंफौर्मेशन टैक्नोलौजी डिपार्टमैंट के सपोर्ट सिस्टम में काम करती थी. वह अपने काम में माहिर थी. उस का पूरा परिवार इलाहाबाद में रहता था, बस यहां पश्चिम विहार में उस का 18 साल का छोटा भाई राघव साथ में रहता था. राघव का कालेज में पहला साल था और वह मैट्रो से कालेज आताजाता था.

प्रतिभा के घर वाले उस के लिए लड़का ढूंढ़ रहे थे, लेकिन वह अपने औफिस के एक लड़के दीपक को पसंद करती थी. दोनों में खूब जमती थी और वे डेट पर भी जाते थे.

प्रतिभा का औफिस ओखला में था और वह मैट्रो से आनाजाना करती थी. 10 से 6 बजे का औफिस था. सुबह 8 बजे घर से निकलना और रात के 8 बजे तक घर वापसी.

एक दिन प्रतिभा औफिस के काम में मगन थी. सोमवार था शायद. दोपहर के 12 बजे उस के मोबाइल फोन की घंटी बजी. ह्वाट्सएप काल थी. अनजान नंबर होने के बावजूद प्रतिभा ने वह काल पिक कर ली, ‘‘हैलो…’’

सामने से एक रोबीली मर्दाना आवाज आई, ‘आप प्रतिभा बोल रही हैं?’

‘‘जी कहिए, क्या काम है?’’ प्रतिभा ने कहा.

‘काम तो ऐसा है मैडमजी कि आप के छोटे भाई ने बहुत बड़ा कांड कर दिया है,’ उस आवाज ने यह कह कर अचानक बम सा फोड़ दिया.

‘‘मतलब…?’’ राघव का खयाल आते ही प्रतिभा के तनबदन में डर की ?ार?ारी सी फैल गई.

‘मतलब, राघव ने तगड़ा क्लेश कर दिया है और वह अभी पुलिस हिरासत में है,’ उस रोबीली आवाज की सख्ती धीरेधीरे बढ़ने लगी थी.

‘‘क्या बकवास कर रहे हैं आप? राघव तो अभी कालेज में होगा,’’ अपना सारा डर दबाते हुए प्रतिभा बोली. पर तब तक उस के माथे पर पसीना आ गया था.

‘तेरा भाई कालेज में ड्रग्स लेते पकड़ा गया है. पैडलर है वह. ड्रग्स की स्मगलिंग भी करता है,’ इतना सुनते ही प्रतिभा को मानो लकवा सा मार गया.

‘और सुन, मैं बोल रहा हूं स्पैशल पुलिस विंग का इंस्पैक्टर. हमारा काम ही ऐसे स्लीपर पैडलर को पकड़ना है. अब तो वह लंबे समय के लिए गया जेल में,’ उस आदमी की आवाज मानो और भी कड़क होती जा रही थी.

प्रतिभा की अब तक घिग्घी बंध चुकी थी. उस के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था. उसे लगा कि जैसे वह किसी गहरे अंधे कुएं में गिर गई है और कोई उस पर मिट्टी डाल रहा है. उसे चक्कर सा आ गया.

इतने में प्रतिभा के साथ वाली सीट पर बैठी सुधा को शक हुआ कि कुछ तो गड़बड़ है. उस ने प्रतिभा का हाथ पकड़ कर झिड़का. हाथ एकदम ठंडा पड़ा हुआ था. प्रतिभा जैसे नींद से जागी और उसे अहसास हुआ कि वह तो औफिस में बैठी है.

प्रतिभा ने तुरंत मोबाइल फोन पर हाथ रखा और सुधा को इग्नोर करते हुए वाशरूम की तरफ बढ़ गई. सुधा ने इशारे से दीपक को बुलाया.

दीपक उस कंपनी में कंप्यूटर इंजीनियर था और जैसे ही उस ने सुधा से प्रतिभा के बारे में सुना, तो वह दबे पैर प्रतिभा के पीछे गया.

‘‘आप मेरे भाई से बात कराइए,’’ प्रतिभा उस फोन करने वाले से कह रही थी.

थोड़ी देर तक दूसरी तरफ से आवाज नहीं आई, तो प्रतिभा ने कहा, ‘‘हैलो…’’

‘दीदी, प्लीज मुझे बचा लो. मैं आगे से ऐसा काम नहीं करूंगा. दीदी, इन्होंने मुझे बहुत मारा. मेरा हाथ तोड़ दिया है. पुलिस वाले अंकल को किसी भी तरह मना लो. मेरा कैरियर खत्म हो जाएगा. प्लीज दीदी…’ इतना कहते ही आवाज आनी बंद हो गई.

यह तो राघव की आवाज थी. प्रतिभा के दिल में तेज चुभन सी हुई और उस के पैर लड़खड़ा गए.

‘‘प्रतिभा, सब ठीक है न?’’ पीछे खड़े दीपक ने उसे संभालने की कोशिश की.

प्रतिभा एकदम से गरजी, ‘‘तुम यहां क्या कर रहे हो? दफा हो जाओ. मैं ठीक हूं…’’

दीपक ने बहुत कोशिश की कि प्रतिभा उसे फोन पकड़ा दे, पर वह नाकाम रहा और वहां से चला गया.

‘हां जी मैडम, फिर क्या विचार है आप का? इस लड़के को छोड़ दें या बना दें कोई पक्का केस?’ फोन पर आवाज आई.

‘‘आप को क्या चाहिए?’’ प्रतिभा गिड़गिड़ाई.

‘‘जी, वैसे तो हम पुलिस वाले रिश्वत लेने में विश्वास नहीं करते हैं, पर आप के भाई ने कांड ही इतना बड़ा कर दिया कि बिना पैसे लिए छोड़ नहीं सकते. ऐसा करो, आप 50,000 रुपए हमारे खाते में डलवा दो और अपने भाई को छुड़वा लो.’

प्रतिभा ने आव देखा न ताव और तुरंत उस आदमी द्वारा बताए गए एक खाते में 20,000 रुपए ट्रांसफर कर दिए.

‘‘देखो, मैं ने पैसे भेज दिए हैं. अब आप मेरे भाई को छोड़ दो…’’ प्रतिभा अपनी बात पूरी कर पाती, इस से पहले ही फोन कट गया.

प्रतिभा हैरान रह गई. उस ने दोबारा वही नंबर मिलाया, पर नहीं लगा. वह सम?ा गई कि उस के साथ कोई धोखाधड़ी हुई है. हालांकि, उस ने 20,000 रुपए ट्रांसफर कर दिए थे, फिर भी उस ने मोबाइल एसएमएस पर चैक किया. 20,000 रुपए का चूना लग चुका था. फिर उस ने यह सोच कर तसल्ली कर ली कि चलो, भाई तो महफूज है.

प्रतिभा सीट पर आई ही थी कि दोबारा उसी आदमी का फोन आ गया, ‘मैडम, यह आप ने क्या कर दिया. सिर्फ 20,000 रुपए ही भेजे हैं. अब तो हमारे बड़े साहब नाराज हो गए हैं. वे बोल रहे हैं कि ड्रग्स का मामला है, कम से कम 2 लाख रुपए और लगेंगे.’

प्रतिभा बोली, ‘‘आप मु?ो थोड़ा समय दें. मु?ो इतने सारे रुपए जमा करने में 2 घंटे से ज्यादा का समय लगेगा.’’

उधर से आवाज आई, ‘जल्दी कर जो करना है…’ और फोन कट गया.

प्रतिभा को रोते देख कर आसपास का स्टाफ वहां जमा हो गया. थोड़ी देर के बाद प्रतिभा ने बताया कि पिछले 15 मिनट में उस की जिंदगी में कितना बड़ा तूफान तबाही मचा कर गया है.

सब लोग हैरान थे कि अगर राघव अपने कालेज में था, तो फिर वह आवाज किस की थी, जिसे राघव सम?ा लिया गया? साइबर क्राइम का यह कैसा घिनौना रूप है, जो आप को पैसे के साथसाथ दिमागी तौर पर भी तोड़ देता है?

दीपक ने कहा, ‘‘आजकल मोबाइल फोन पर लोगों को इस तरह ?ाठ के जाल में बरगलाया जाता है कि अच्छाभला पढ़ालिखा इनसान भी गच्चा खा जाता है.

‘‘इसे एक सच्ची खबर से सम?ाते हैं. हाल ही में मुंबई में रहने वाले एक सीनियर सिटीजन के पास कनाडा से एक फोन आया. यहां ठग ने पीडि़त शख्स से कहा कि मैं आप के बेटे का दोस्त बोल रहा हूं. उस ने हूबहू बेटे के दोस्त की आवाज में बात की थी. इसी के साथ ठग ने

3 लाख रुपए की चपत लगा दी.

‘‘यह 2 मार्च, 2024 का मामला है. पुलिस ने बताया कि 63 साल के शिकायत करने वाले आदमी की

2 बेटियां और एक बेटा है. तीनों विदेश में रहते हैं. 2 मार्च को उन के पास एक अनजान नंबर से ह्वाट्सएप पर वौइस काल आई.

‘‘काल करने वाले ने अपना नाम विकास गुप्ता बताया. चूंकि पीडि़त विकास गुप्ता को बचपन

से जानते थे और काल करने वाले की आवाज विकास गुप्ता से मिलतीजुलती थी, इसलिए पीडि़त ने उस आवाज पर भरोसा कर लिया.

‘‘इस के बाद फोन करने वाला यह कहते हुए रोने लगा कि वह मुसीबत में है और उसे तुरंत पैसों की जरूरत है. इस के बाद पीडि़त ने काल करने वाले के खाते में 2 लाख रुपए ट्रांसफर कर दिए और अपने

2 दोस्तों से भी 50-50 हजार रुपए और ट्रांसफर करवा दिए.

‘‘जब जालसाज ने फिर से पैसों की मांग की तो पीडि़त को शक हुआ कि कुछ गड़बड़ है. उस ने काल करने वाले को वीडियो काल किया, जिस का जवाब नहीं दिया गया, तब पुष्टि हुई कि उन के साथ धोखाधड़ी हुई है.’’

दीपक की बात सुन कर सब हैरान रह गए. फिर एक लड़की सुरभि ने दूसरी खबर का हवाला देते हुए कहा, ‘‘सर, यह तो एकदम ताजा मामला है. साइबर ठगों ने एआई डीपफेक की मदद से आईआईटी से इंजीनियरिंग कर रहे छात्र की आवाज में उस की मां को ह्वाट्सएप काल कर 40,000 रुपए हड़प लिए.

‘‘आईआईटी कानपुर में पढ़ रहे इंजीनियरिंग के एक छात्र उत्कर्ष सिंह ने बताया कि बीती 3 अप्रैल को किसी अनजान शख्स ने उन की मां सरिता देवी को ह्वाट्सएप काल की. किसी पुलिस वाले की डीपी लगे नंबर से काल करने वाले ने खुद को पुलिस वाला बताते हुए कहा कि उन के बेटे को दुष्कर्म व हत्या के मामले में पकड़ा गया है.

‘‘इतना ही नहीं, यकीन दिलाने के लिए शातिरों ने आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस (एआई) से बेटे की आवाज में एक संदेश भी सुनाया, जिस में बेटा खुद को बचा लेने की गुहार लगा रहा था. उस ने कहा कि मेरे दोस्तों ने मु?ो फंसा दिया है, मु?ो बचा लीजिए.

‘‘बेटे की आवाज सुनाई देने पर तुरंत मां ने बताए गए बैंक खाते में 40,000 रुपए ट्रांसफर कर दिए. हालांकि, जब रुपए देने के बाद मांबेटे की आपस में बात हुई, तो इस साइबर ठगी का पता चला.’’

‘‘पर, यह हूबहू आवाज कैसे मिला दी जाती है?’’ किसी ने सवाल किया.

दीपक ने बताया, ‘‘जहां तक मैं जानता हूं, आजकल बहुत से ऐसे वौइस इंजन टूल हैं, जो सिर्फ छोटे से औडियो से ही क्लोन वौइस जैनरेट करने की ताकत रखते हैं. इस के साथ ही ये कई भाषाओं में काम कर सकते हैं.

‘‘इतना ही नहीं, ये टूल्स आवाज के साथसाथ किसी इनसान की शक्ल से भी लोगों को बेवकूफ बना सकते हैं. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस नई तकनीक के गलत इस्तेमाल पर अपनी चिंता जाहिर की है.

‘‘एक एआई ऐक्सपर्ट अतुल रौय ने बताया है, ‘एआई के जरीए क्लोन बनाना अब आसान हो गया है, जिस का फायदा अपराधी भी उठा रहे हैं. ऐसे में जरूरी है कि हम सतर्क रहें और अपनी जानकारी को बढ़ाएं.’

‘‘आप को याद होगा कि कुछ साल पहले एक वैब सीरीज आई थी ‘जामताड़ा-सब का नंबर आएगा’. इस में इसी मुद्दे को उठाया गया था कि मोबाइल फोन में सिम बदलबदल कर कैसे लोगों को लालच दे कर उन से पैसा किसी अनजान अकाउंट में डलवाया जाता था.

‘‘अब एआई तकनीक ने इस साइबर क्राइम को और ज्यादा भयावह बना दिया है. पर अगर जरा सी सावधानी बरती जाए, तो समय रहते बचा भी जा सकता है.’’

‘‘पर कैसे?’’ दीपक के एक साथी ने पूछा.

‘‘जब भी आप के पास कोई काल आए तो सामने वाले की पहचान पूरी होने के बाद ही अपनी जानकारी उसे दें. स्कैमर्स आप को काल लगाते हैं और पर्सनल जानकारी मांगते हैं, इसलिए कोई काल करने के साथ ही पैसे या पर्सनल जानकारी मांगे, तो सम?ा जाएं कि स्कैमर्स हैं.

‘‘पर भारत में लोग अभी भी इस सब तकनीकी से अनजान हैं. एक खबर के मुताबिक, दुनिया में आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस वौइस स्कैम का सब से ज्यादा भारत के ही लोग शिकार हो रहे हैं. एक सर्वे में शामिल 47 फीसदी से ज्यादा भारतीयों ने माना है कि या तो वे खुद पीडि़त हैं या ऐसे किसी को जानते हैं, जो वौइस स्कैम का शिकार हुआ है.’’

फिर दीपक ने कुछ आंकड़ों का हवाला दिया कि दुनिया के 7 देशों में 7,054 लोगों पर किए गए सर्वे की रिपोर्ट इस तरह है :

* 83 फीसदी लोग यह पता लगाने में नाकाम हैं कि उन के पास आया स्पैम काल किसी मशीन या सौफ्टवेयर की मदद से किया गया है या सच में कोई इनसान बोल रहा है.

* 66 फीसदी भारतीयों ने बताया है कि ऐसे वौइस स्कैम वाले ज्यादा काल किसी दोस्त या परिवार के सदस्य से आते हैं, जिसे पैसे की तत्काल जरूरत होती है.

* स्कैम वौइस काल में सब से ज्यादा दावा किया गया था ‘मैं लुट गया हूं’ (70 फीसदी). इस के बाद ‘कार हादसा हो गया’ (69 फीसदी), ‘फोन खो गया या पर्स खो गया’ (65 फीसदी) या ‘विदेश में हू्ं पैसे की तुरंत जरूरत है’ (62 फीसदी) जैसे बहाने बनाए गए.

‘‘तो फिर ठगी का शिकार लोग क्या करें और कहां गुहार लगाएं?’’ किसी ने दीपक से सवाल किया.

‘‘आज हमारे औफिस में यह कांड हुआ है, तो मैं प्रतिभा से कहूंगा कि वह पहले तो खुद को संभाले और फिर सब से पहले अपने बैंक अकाउंट से धोखाधड़ी कर के निकाले गए पैसों को वापस लेने के लिए अपने बैंक से बात करे. अगर बैंक की ब्रांच दूर है, तो फोन कर के कस्टमर केयर को जानकारी दे.

‘‘जिस के साथ भी यह कांड हुआ है, वह तुरंत पुलिस को जानकारी दे. धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज करने के लिए अपने स्थानीय पुलिस स्टेशन से संपर्क करें. आप साइबर सुरक्षा अधिकारियों को भी रिपोर्ट कर सकते हैं, जैसे कि नैशनल साइबर सिक्योरिटी एजेंसी या नैशनल इनफार्मेशन सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन.’’

सब लोग दीपक की बात बड़े ध्यान से सुन रहे थे और प्रतिभा उसे देखे जा रही थी. वह चुप हो गया. जब सब लोग चले गए, तो प्रतिभा ने दीपक से कहा, ‘‘बांट दिया ज्ञान… अब काम करने का समय आ गया है. उस आदमी का लालच बढ़ गया है. उस ने 2 लाख रुपए की डिमांड की है. हमारे पास बस 2 घंटे हैं उसे ट्रेस करने के लिए.’’

दीपक ने एक आंख दबाते हुए कहा, ‘‘तुम तो बड़ी दिलेर निकली, जो 20,000 रुपए का रिस्क ले लिया. अगर वह ट्रेस नहीं हो पाया तो…?’’

‘‘ट्रेस तो उस का बाप भी होगा. तुम किस मर्ज की दवा हो. चलो, अपने अड्डे पर और करते

हैं उस बेवकूफ का सबकुछ हैक,’’ प्रतिभा बोली.

‘‘अजी, आप की खातिर हम उसे ट्रेस तो कर देंगे, पर इस गरीब को क्या इनाम मिलेगा?’’ दीपक थोड़ा रोमांटिक होते हुए बोला.

‘‘डार्लिंग, आज यह मिशन पूरा होते ही मैं सारी रात तुम्हारे साथ अपार्टमैंट्स पर रहूंगी, क्योंकि राघव तो इलाहाबाद गया हुआ है. फिर निकाल लेना अपने दिल के अरमान. पूरी रात जश्न मनेगा.’’

दरअसल, प्रतिभा और दीपक एक एआई कंपनी के लिए काम करते थे. दीपक किसी के भी फोन से उस इनसान की सारी जानकारी निकाल लेता था, जिसे हैकिंग कहते हैं. अब जब उस आदमी का 2 लाख रुपए लेने के लिए फोन आएगा, तब प्रतिभा उसे बातों में उल?ा कर रखेगी और दीपक उस की लोकेशन से फोन के जरीए उसे हैक कर लेगा.

थोड़ी देर में वे दोनों एक ऐसे औफिस में बैठे थे, जो उन्हीं की कंपनी में गुप्त तरीके से बना हुआ था. वहां सिर्फ स्पैशल लोग ही जा सकते थे, जैसे आज प्रतिभा और दीपक का मिशन था.

2 घंटे होते ही उस आदमी का फोन आ गया. दीपक ने प्रतिभा को सम?ा दिया कि वह किसी तरह उसे बातों में उल?ा कर उस बैंक अकाउंट तक पहुंच जाए, फिर वह उसे हैक कर लेगा.

प्रतिभा बोली, ‘‘देखिए भाई साहब, मैं आप को

2 लाख रुपए तो एकसाथ नहीं दे पाऊंगी, पहले 10,000 रुपए आप के अकाउंट में आएंगे और फिर उस के आधे घंटे के बाद पूरी रकम आप को मिल जाएगी.’’

‘यह क्या नौटंकी है. जो करना है जल्दी कर. अगर बड़े साहब नाराज हो गए, तो रकम बढ़ जाएगी. फिर मत रोना,’ यह कहते हुए उस आदमी ने अपना अकाउंट नंबर बता दिया. थोड़ी देर में ही उस के खाते में 10,000 रुपए चले गए.

इधर दीपक अपना काम कर रहा था. वह हैकिंग का मास्टर था. उस ने नई तकनीक की मदद से उस आदमी का फोन हैक कर के उस के बैंक अकाउंट में सेंध लगा दी थी. उस आदमी ने भी लापरवाही बरतते हुए अपना फोन स्विच औफ नहीं किया था और न ही सिमकार्ड बदला था.

5 मिनट में ही दीपक ने उस आदमी का फोन पूरी तरह से हैक कर लिया था. इतना ही नहीं, उस के सोशल मीडिया अकाउंट से 10 और दोस्तों के फोन हैक कर के उन के बैंक अकाउंट की डिटेल भी अपने कब्जे में ले ली थी.

दीपक को यह सब जानने के बाद शक हुआ कि यह कोई बड़ा गिरोह है, जो साइबर क्राइम को अंजाम देता है और इस गिरोह के सरगना विदेश में बैठे हैं और बड़े जालिम हैं.

दीपक ने अपनी करामात दिखाते हुए उन सब के अकाउंट से 1-1 लाख रुपए एक अनजान बैंक अकाउंट में भेज दिए.

इस के बाद दीपक ने प्रतिभा से कहा, ‘‘अभी उस आदमी का फोन आएगा. उसे पता चल चुका होगा कि उस के बैंक अकाउंट से पैसे कहीं ट्रांसफर हुए हैं. अब तुम उसे दिन में तारे दिखा देना.’’

‘‘मैं भी फोन आने का इंतजार कर रही हूं,’’ इतना कह कर प्रतिभा ने दीपक को चूम लिया.

वही हुआ भी. ह्वाट्सएप काल आ गया. उधर से आवाज आई, ‘यह सब क्या माजरा है? मेरे अकाउंट से पैसे कहां चले गए. क्या किया है तुम ने?’

‘‘क्या हुआ?’’ प्रतिभा ने ?ाठी हैरानी जताते हुए कहा.

‘तुम ने किया क्या है और तुम हो कौन?’ उस आदमी की हेकड़ी जैसे निकल रही थी.

‘‘क्या किसी पुलिस वाले को कोई चूना लगा गया? अपने बड़े साहब को बता दो या फिर मैं तुम्हारे आका का भी फोन हैक करूं. खुद को बड़ा शातिर सम?ाता है न.

‘‘बेटा, अभी तुम इस खेल के नए खिलाड़ी हो. तुम ने गलत इनसान से पंगा ले लिया है. तेरे ही क्या, तेरे और दूसरे 10 साथियों के अकाउंट से पैसे ट्रांसफर हुए हैं, वे भी तेरे बैंक अकाउंट में. उन का फोन आने ही वाला होगा.

‘‘तुम लोगों ने आम जनता की जिंदगी जहन्नुम कर रखी है. उन की गाढ़ी कमाई को साइबर क्राइम से लूट लेते हो और फिर कोई सुबूत भी नहीं छोड़ते. पर, मैं जहां नौकरी करती हूं, वहां आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस पर ही काम होता है.

‘‘तू ने हमें अपना शिकार नहीं बनाया है, बल्कि हम ने तु?ो किसी चूजे की तरह फांसा है. ज्यादा चूंचपड़ की तो ऐसा हाल करेंगे कि जिंदगीभर किसी को बेवकूफ नहीं बना पाएगा.

‘‘और हां, यह मत सम?ा लेना कि मु?ो किसी तरह का नुकसान पहुंचा पाएगा. तेरे फरिश्ते भी मु?ा तक नहीं पहुंच पाएंगे, पर हम लोग तेरी एकएक रग से वाकिफ हो चुके हैं. मु?ो कहीं भी और कभी भी एक खरोंच तक आई, तो तेरे पूरे गिरोह का बैंड बजा देंगे. वैसे भी तेरी तो उलटी गिनती शुरू हो चुकी है…’’ प्रतिभा ने अपना असली रूप दिखा दिया.

इतना सुनना था कि दूसरी तरफ से फोन कट गया. दीपक और प्रतिभा ने एकदूसरे को देखा और खिलखिला कर हंस दिए. उन के औफिस स्टाफ को भी नहीं मालूम था कि वे किस तरह से यह खुफिया काम करते हैं.

दीपक प्रतिभा के बालों में हाथ फेरते हुए बोला, ‘‘डार्लिंग, उस आदमी को तो तुम ने दिन में तारे दिखा दिए हैं, अब आज रात का क्या सीन है?’’

प्रतिभा बोली, ‘‘जो वादा किया था, आज रात को पूरा होगा. फिर कर लेना अपने मन की.’’

इस के बाद वे दोनों अपना मिशन पूरा कर के औफिस की तरफ चल दिए, जहां वे आम मुलाजिमों की तरह काम करते थे.

Mother’s Day 2024: मां का बटुआ – फलसफा जिंदगी का

मैं अकेली बैठी धूप सेंक रही हूं. मां की कही बातें याद आ रही हैं. मां को अपने पास रहने के लिए ले कर आई थी. मां अकेली घर में रहती थीं. हमें उन की चिंता लगी रहती थी. पर मां अपना घर छोड़ कर कहीं जाना ही नहीं चाहती थीं. एक बार जब वे ज्यादा बीमार पड़ीं तो मैं इलाज का बहाना बना कर उन्हें अपने घर ले आई. पर पूरे रास्ते मां हम से बोलती आईं, ‘हमें क्यों ले जा रही हो? क्या मैं अपनी जड़ से अलग हो कर तुम्हारे यहां चैन व सुकून से रह पाऊंगी? किसी पेड़ को अपनी जड़ से अलग होने पर पनपते देखा है. मैं अपने घर से अलग हो कर चैन से मर भी नहीं पाऊंगी.’

मैं उन्हें समझाती, ‘मां, तुम किस जमाने की बात कर रही हो. अब वो जमाना नहीं रहा. अब लड़की की शादी कहां से होती है, और वह अपने हसबैंड के साथ रहती कहां है. देश की तो बात ही छोड़ो, लोग अपनी जीविका के लिए विदेश जा कर रह रहे हैं. मां, कोई नहीं जानता कि कब, कहां, किस की मौत होगी.

‘घर में कोई नहीं है. तुम अकेले वहां रहती हो. हम लोग तुम्हारे लिए परेशान रहते हैं. यहां मेरे बच्चों के साथ आराम से रहोगी. बच्चों के साथ तुम्हारा मन लगेगा.’

कुछ दिनों तक तो मां ठीक से रहीं पर जैसे ही तबीयत ठीक हुई, घर जाने के लिए परेशान हो गईं. जब भी मैं उन के पास बैठती तो वे अपनी पुरानी सोच की बातें ले कर शुरू हो जातीं. हालांकि मैं अपनी तरफ से वे सारी सुखसुविधाएं देने की कोशिश करती जो मैं दे सकती थी पर उन का मन अपने घर में ही अटका रहता.

आज फिर जैसे ही मैं उन के पास गई तो कहने लगीं, ‘सुनो सुनयना, मुझे घर ले चलो. मेरा मन यहां नहीं लगता. मेरा मन वहीं के लिए बेचैन रहता है. मेरी सारी यादें उसी घर से जुड़ी हैं. और देखो, मेरा संदूक भी वहीं है, जिस में मेरी काफी सारी चीजें रखी हैं. उन सब से मेरी यादें जुड़ी हैं. मेरी मां का (मेरी नानी के बारे में) मोतियों वाला बटुआ उसी में है. उस में तुम लोगों की छोटीछोटी बालियां और पायल, जो तुम्हारी नानी ने दी थीं, रखी हैं. तुम्हारे बाबूजी की दी हुई साड़ी, जो उन्होंने पहली तनख्वाह मिलने पर सब से छिपा कर दी थी, उसी संदूक में रखी है. उसे कभीकभी ही पहनती हूं. सोचा था कि मरने के पहले तुझे दूंगी.’

मैं थोड़ा झल्लाती हुई कहती, ‘मां, अब उन चीजों को रख कर क्या करना.’

आज जब उन्हीं की उम्र के करीब पहुंची हूं तो मां की कही वे सारी बातें सार्थक लग रही हैं. आज जब मायके से मिला पलंग किसी को देने या हटाने की बात होती है तो मैं अंदर से दुखी हो जाती हूं क्योंकि वास्तव में मैं उन चीजों से अलग नहीं होना चाहती. उस पलंग के साथ मेरी कितनी सुखद स्मृतियां जुड़ी हुई हैं.

मैं शादी कर के जब ससुराल आई तो कमरे का फर्श हाल में ही बना था, इसलिए फर्श गीला था. जल्दीजल्दी पलंग बिछा कर उस पर गद्दा डाल कर उसी पर सोई थी. आज भी जब उस पलंग को देखती हूं या छूती हूं तो वे सारी पुरानी बातें याद आने लगती हैं. मैं फिर से वही 17-18 साल की लड़की बन जाती हूं. लगता है, अभीअभी डोली से उतरी हूं व लाल साड़ी में लिपटी, सिकुड़ी, सकुचाई हुई पलंग पर बैठी हूं. खिड़की में परदा भी नहीं लग पाया था. चांदनी रात थी. चांद पूरे शबाब पर था और मैं कमरे में पलंग पर बैठी चांदनी रात का मजा ले रही हूं.

कहा जाता है कि कभीकभी अतीत में खो जाना भी अच्छा लगता है. सुखद स्मृतियां जोश से भर देती हैं, उम्र के तीसरे पड़ाव में भी युवा होने का एहसास करा जाती हैं. पुरानी यादें हमें नए जोश, उमंग से भर देती हैं, नब्ज तेज चलने लगती है और हम उस में इतना खो जाते हैं कि हमें पता ही नहीं चलता कि इस बीच का समय कब गुजर गया. मैं बीचबीच में गांव जाती रहती हूं. अब तो वह घर बंटवारे में देवरजी को मिल गया है पर मैं जाती हूं तो उसी घर में रहती हूं. सोने के लिए वह कमरा नहीं मिलता क्योंकि उस में बहूबेटियां सोती हैं.

मैं बरामदे में सोती हुई यही सोचती रहती हूं कि काश, उसी कमरे में सोने को मिलता जहां मैं पहले सोती थी. कितनी सुखद स्मृतियां जुड़ी हैं उस कमरे से, मैं बयान नहीं कर सकती. ससुराल की पहली रात, देवरों के साथ खेल खेलने, ननदों के साथ मस्ती करने तक सारी यादें ताजा हो जाती हैं.

अब हमें भी एहसास हो रहा है कि एक उम्र होने पर पुरानी चीजों से मोह हो जाता है. जब मैं घर से पटना रहने आई तो मायके से मिला पलंग भी साथ ले कर आई थी. बाद में नएनए डिजाइन के फर्नीचर बनवाए पर उन्हें हटा नहीं सकी. और इस तरह सामान बढ़ता चला गया. पुरानी चीजों से स्टोररूम भरता गया. बच्चे बड़े हो गए और पढ़लिख कर सब ने अपनेअपने घर बसा लिए. पर मैं ने उन के खिलौने, छोटेछोटे कपड़े, अपने हाथों से बुने हुए स्वेटर, मोजे और टोपियां सहेज कर रखे हुए हैं. जब भी अलमारी खोलती हूं और उन चीजों को छूती हूं तो पुराने खयालों में डूब जाती हूं. लगता है कि कल ही की तो बातें हैं. आज भी राम, श्याम और राधा उतनी ही छोटी हैं और उन्हें सीने से लगा लेती हूं. वो पुरानी चीजें दोस्तों की तरह, बच्चों की तरह बातें करने लगती हैं और मैं उन में खो जाती हूं.

वो सारी चीजें जो मुझे बेहद पसंद हैं, जैसे मांबाबूजी, सासूमांससुरजी व दोस्तों द्वारा मिले तोहफे भी. सोनेचांदी और आभूषणों की तो बात ही छोडि़ए, मां की दी हुई कांच की प्लेट भी मैं ने ड्राइंगरूम में सजा कर रखी हुई है. मां का मोती वाला कान का फूल और माला भी हालांकि वह असली मोती नहीं है शीशे वाला मोती है पर उस की चमक अभी तक बरकरार है. मां बताती थीं कि उन को मेरी नानी ने दी थी. मैं ने उन्हें भी संभाल कर रखा हुआ है कि नानी की एकमात्र निशानी है. और इसलिए भी कि पुरानी चीजों की क्वालिटी कितनी बढि़या होती थी. आज भी माला पहनती हूं तो किसी को पता नहीं चलता कि इतनी पुरानी है. वो सारी स्मृतियां एक अलमारी में संगृहीत हैं, जिन्हें मैं हर दीवाली में झाड़पोंछ कर फिर से रख देती हूं.

राधा के पापा कहते हैं, ‘अब तो इन चीजों को बांट दो.’ पर मुझ से नहीं हो पाता. मैं भी मां जैसे ही सबकुछ सहेज कर रखती हूं. उस समय मैं मां की कही बातें व उन की भावनाएं नहीं समझ पाती थी. अब मेरे बच्चे जब अपने साथ रहने को बुलाते हैं तो हमें अपना घर, जिसे मैं ने अपनी आंखों के सामने एकएक ईंट जोड़ कर बनवाया है, को छोड़ कर जाने का मन नहीं करता. अगर जाती भी हूं तो मन घर से ही जुड़ा रहता है. पौधे, जिन्हें मैं ने वर्षों से लगा रखा है, उन में बच्चों जैसा ध्यान लगा रहता है. इसी तरह और भी कितनी ही बेहतरीन यादें सुखदुख के क्षणों की साक्षी हैं जिन्हें अपने से अलग करना बहुत कठिन है.

अब समझ में आता है कि कितनी गलत थी मैं. मेरी शादी गांव में हुई. पति के ट्रांसफरेबुल जौब के चलते इधरउधर बहुत जगह इन के साथ रही. सो, अब जब से पटना में घर बनाया और रहने लगी तो अब कहीं रहने का मन नहीं होता. जब मुझे इतना मोह व लगाव है तो मां बेचारी तो शादी कर जिस घर में आईं उस घर के एक कमरे की हो कर रह गईं. वे तो कभी बाबूजी के साथ भी रहने नहीं गई थीं. इधर आ कर सिर्फ घूमने के लिए ही घर से बाहर गई थीं. पहले लोग बेटी के यहां भी नहीं जाते थे. सो, वे कभी मेरे यहां भी नहीं आई थीं. घर से बाहर पहली बार रह रही थीं. ऐसे में उन का मन कैसे लगता. आज उन सारी बातों को सोच कर दुख हो रहा है कि मैं मां की भावनाओं की कद्र नहीं कर पाई. क्षमा करना मां, कुछ बातें एक उम्र के बाद ही समझ में आती हैं.

बस एक बार आ जाओ : प्यार का अनोखा एहसास

प्यार का एहसास अपनेआप में अनूठा होता है. मन में किसी को पाने की, किसी को बांहों में बांधने की चाहत उमड़ने लगती है, कोई बहुत अच्छा और अपना सा लगने लगता है और दिल उसे पूरी शिद्दत से पाना चाहता है, फिर कोई भी बंधन, कोई भी दीवार माने नहीं रखती, पर कुछ मजबूरियां इंसान से उस का प्यार छीन लेती हैं, लेकिन वह प्यार दिल पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाता है. हां सुमि, तुम्हारे प्यार ने भी मेरे मन पर अमिट छाप छोड़ी है. हमें बिछड़े 10 वर्ष बीत गए हैं, पर आज भी बीता हुआ समय सामने आ कर मुंह चिढ़ाने लगता है.

सुमि, तुम कहां हो. मैं आज भी तुम्हारी राहों में पलकें बिछाए बैठा हूं, यह जानते हुए भी कि तुम पराई हो चुकी हो, अपने पति तथा बच्चों के साथ सुखद जीवन व्यतीत कर रही हो और फिर मैं ने ही तो तुम से कहा था, सुमि, कि य-पि यह रात हम कभी नहीं भूलेंगे फिर भी अब कभी मिलेंगे नहीं. और तुम ने मेरी बात का सम्मान किया. जानती हो बचपन से ही मैं तुम्हारे प्रति एक लगाव महसूस करता था बिना यह सम झे कि ऐसा क्यों है. शायद उम्र में परिपक्वता नहीं आई थी, लेकिन तुम्हारा मेरे घर आना, मु झे देखते ही एक अजीब पीड़ा से भर उठना, मु झे बहुत अच्छा लगता था.

तुम्हारी लजीली पलकें  झुकी होती थीं, ‘अनु है?’ तुम्हारे लरजते होंठों से निकलता, मुझे ऐसा लगता था जैसे वीणा के हजारों तार एकसाथ  झंकृत हो रहे हों और अनु को पा कर तुम उस के साथ दूसरे कमरे में चली जाती थीं.’

‘भैया, सुमि आप को बहुत पसंद करती है,’ अनु ने मुझे छेड़ा.

‘अच्छा, पागल लड़की फिल्में बहुत देखती है न, उसी से प्रभावित होगी,’ और मैं ने अनु की बात को हंसी में उड़ा दिया, पर अनजाने में ही सोचने पर मजबूर हो गया कि यह प्यारव्यार क्या होता है सम झ नहीं पाता था, शायद लड़कियों को यह एहसास जल्दी हो जाता है. शायद युवकों के मुकाबले वे जल्दी युवा हो जाती हैं और प्यार की परिभाषा को बखूबी सम झने लगती हैं. ‘संभल ऐ दिल तड़पने और तड़पाने से क्या होगा. जहां बसना नहीं मुमकिन, वहां जाने से क्या होगा…’

यह गजल तुम अनु को सुना रही थी, मुझे भी बहुत अच्छा लगा था और उसी दिन अनु की बात की सत्यता सम झ में आई और जब मतलब सम झ में आने लगा तब ऐसा महसूस हुआ कि तुम्हारे बिना जीना मुश्किल है. कैशौर अपना दामन छुड़ा चुका था और मैं ने युवावस्था में कदम रखा और जब तुम्हें देखते ही अजीब मीठीमीठी सी अनुभूति होने लगी थी. दरवाजे के खटकते ही तुम्हारे आने का एहसास होता और मेरा दिल बल्लियों उछलने लगता था. कभी मु झे महसूस होता था कि तुम अपलक मु झे देख रही हो और जब मैं अपनी नजरें तुम्हारी ओर घुमाता तो तुम दूसरी तरफ देखने लगती थी, तुम्हारा जानबू झ कर मु झे अनदेखा करना मेरे प्यार को और बढ़ावा देता था. सोचता था कि तुम से कह दूं, पर तुम्हें सामने पा कर मेरी जीभ तालु से चिपक जाती थी और मैं कुछ भी नहीं कह पाता था कि तभी एक दिन अनु ने बताया कि तुम्हारा विवाह होने वाला है. लड़का डाक्टर है और दिल्ली में ही है. शादी दिल्ली से ही होगी. मैं आसमान से जमीन पर आ गिरा.

यह क्या हुआ, प्यार शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया, ऐसा कैसे हो सकता है, क्या आरंभ और अंत भी कभी एकसाथ हो सकते हैं. हां शायद, क्योंकि मेरे साथ तो ऐसा ही हो रहा था. मेरा मैडिकल का थर्ड ईयर था, डाक्टर बनने में 2 वर्ष शेष थे. कैसे तुम्हें अपने घर में बसाने की तुम्हारी तमन्ना पूरी करूंगा. अप्रत्यक्ष रूप से ही तुम ने मेरे घर में बसने की इच्छा जाहिर कर दी थी, मैं विवश हो गया था.  दिसंबर के महीने में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. इसी माह तुम्हारा ब्याह होने वाला था. मेरी रातों की नींद और दिन का चैन दोनों ही जुदा हो चले थे. तुम चली जाओगी यह सोचते ही हृदय चीत्कार करने लगता था, ऐसी ही एक कड़कड़ाती ठंड की रात को कुहरा घना हो रहा था. मैं अपने कमरे से तुम्हारे घर की ओर टकटकी लगाए देख रहा था. आंसू थे कि पलकों तक आआ कर लौट रहे थे. मैं ने अपना मन बहुत कड़ा किया हुआ था कि तभी एक आहट सुनाई दी, पलट कर देखा तो सामने तुम थी. खुद को शौल में सिर से लपेटे हुए. मैं तड़प कर उठा और तुम्हें अपनी बांहों में भर लिया. तुम्हारी आवाज कंपकंपा रही थी.

‘मैं ने आप को बहुत प्यार किया, बचपन से ही आप के सपने देखे, लेकिन अब मैं दूर जा रही हूं. आप से बहुत दूर हमेशाहमेशा के लिए. आखिरी बार आप से मिलने आई हूं,’ कह कर तुम मेरे सीने से लगी हुई थी.

सुमि, कुछ मत कहो. मु झे इस प्यार को महसूस करने दो,’ मैं ने कांपते स्वर में कहा.

‘नहीं, आज मैं अपनेआप को समर्पित करने आई हूं, मैं खुद को आप के चरणों में अर्पित करने आई हूं क्योंकि मेरे आराध्य तो आप ही हैं, अपने प्यार के इस प्रथम पुष्प को मैं आप को ही अर्पित करना चाहती हूं, मेरे दोस्त, इसे स्वीकार करो,’ तुम्हारी आवाज भीगीभीगी सी थी, मैं ने अपनी बांहों का बंधन और मजबूत कर लिया. बहुत देर तक हम एकदूसरे से लिपटे यों ही खड़े रहे. चांदनी बरस रही थी और हम शबनमी बारिश में न जाने कब तक भीगते रहे कि तभी मैं एक  झटके से अलग हो गया. तुम कामना भरी दृष्टि से मु झे देख रही थी, मानो कोई अभिसारिका, अभिसार की आशा से आई हो. नहींनहीं सुमि, यह गलत है. मेरा तुम पर कोई हक नहीं है, तुम्हारे तनमन पर अब केवल तुम्हारे पति का अधिकार है, तुम्हारी पवित्रता में कोई दाग लगे यह मैं बरदाश्त नहीं कर सकता हूं. हम आत्मिक रूप से एकदूसरे को समर्पित हैं, जो शारीरिक समर्पण से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, तुम मु झे, मैं तुम्हें समर्पित हूं.

हम जीवन में कहीं भी रहें इस रात को कभी नहीं भूलेंगे. चलो, तुम्हें घर तक छोड़ दूं, किसी ने देख लिया तो बड़ी बदनामी होगी. तुम कातर दृष्टि से मु झे देख रही थी. तुम्हारे वस्त्र अस्तव्यस्त हो रहे थे, शौल जमीन पर गिरा हुआ था, तुम मेरे कंधों से लगी बिलखबिलख कर रो रही थी. चलो सुमि, रात गहरा रही है और मैं ने तुम्हारे होंठों को चूम लिया. तुम्हें शौल में लपेट कर नीचे लाया. तुम अमरलता बनी मु झ से लिपटी हुई चल रही थी. तुम्हारा पूरा बदन कांप रहा था और जब मैं ने तुम्हें तुम्हारे घर पर छोड़ा तब तुम ने कांपते स्वर में कहा, ‘विकास, पुरुष का प्रथम स्पर्श मैं आप से चाहती थी. मैं वह सब आप से अनुभव करना चाहती थी जो मु झे विवाह के बाद मेरे पति, सार्थक से मिलेगा, लेकिन आप ने मु झे गिरने से बचा लिया. मैं आप को कभी नहीं भूल पाऊंगी और यही कामना करती हूं कि जीवन के किसी भी मोड़ पर हम कभी न मिलें, और तुम चली गईं.

10 वर्ष का अरसा बीत चला है, आज भी तुम्हारी याद में मन तड़प उठता है. जाड़े की रातों में जब कुहरा घना हो रहा होता है, चांदनी धूमिल होती है और शबनमी बारिश हो रही होती है तब तुम एक अदृश्य साया सी बन कर मेरे पास आ जाती हो. हृदय से एक पुकार उठती है. ‘सुमि, तुम कहां हो, क्या कभी नहीं मिलोगी?’

नहीं, तुम तड़पो, ताउम्र तड़पो,’ ऐसा लगता है जैसे तुम आसपास ही खड़ी मु झे अंगूठा दिखा रही हो. सुमि, मैं अनजाने में तुम्हें पुकार उठता हूं और मेरी आवाज दीवारों से टकरा कर वापस लौट आती है, क्या मैं अपना पहला प्यार कभी भूल सकूंगा?

Mother’s Day 2024 : सासुमां के सात रंग – ससुराल में नई बहू का आना

जब मैं नईनई बहू बन कर ससुराल आई तो दूसरी बहुओं की तरह मेरे मन में भी सास नाम के व्यक्तित्व के प्रति भय व शंका सी थी. सहेलियों व रिश्तेदारों की चर्चा में हर कहीं सास की हिटलरी तानाशाही का उल्लेख रहता. जब पति के घर गई तो मालूम हुआ कि मेरे पति कुछ ही दिनों बाद विदेश चले जाएंगे. नया घर, नए लोग, नया वातावरण और एकदम नया रिश्ता. मुझे तो सोच कर ही घबराहट हो रही थी.

कुछ दिनों का साथ निभा कर मेरे पति नरेन को दूर देश रवाना होना था. इसी क्षण मुझे सासुमां का पहला रंग स्पष्ट रूप से ज्ञात हुआ. आवश्यक रीतिरिवाज व पार्टी वगैरह के बाद सासुमां ने ऐलान किया कि आज से 2 माह के लिए बहू ऊषा और नरेन दोनों उस संस्था के मकान में रहने चले जाएंगे, जहां नरेन काम करते हैं. नरेन द्वारा आनाकानी करने पर वे दृढ़ शब्दों में बोलीं, ‘‘ऊषा को समय देना तुम्हारा पहला कर्तव्य है. आखिर तुम्हारी अनुपस्थिति में वह तुम्हारी यादें ले कर ही तो यहां शांति से रह पाएगी.’’

विदेश यात्रा के 2 दिन पूर्व हम लोग सासुमां के पास आए. 26 साल तक जो बेटा उन के तनमन का अंश बन कर रहा, उस जिगर के टुकड़े को एक अनजान लड़की को किस सहजता से उन्होंने सौंप दिया, यह सोच कर मैं अभिभूत हो उठी. नरेन को विदा कर हम लोग जब लौटे तो मेरी आंखों के आंसू अंदर ही अंदर उफन रहे थे. सोच रही थी फूटफूट कर रो लूं, पर इतने नए लोगों के बीच यह अत्यंत मुश्किल था. रास्ते के पेड़पौधों को यों ही मैं देख रही थी. अचानक मैं ने सासुमां का हाथ अपने कंधे पर महसूस किया.

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सासुमां के स्पर्श ने मेरी भावनाओं के सारे बंधन तोड़ दिए. मैं ने अपना सिर उन की गोद में रख दिया और आंसुओं को बह जाने दिया. अब मुझे कोई भय, कोई संकोच, कोई दुविधा न थी. सासुमां की ममता के रंग ने मुझे आश्वस्त कर दिया था, ‘मैं अकेली नहीं हूं. मेरे साथ मेरी मां है.’ सासुमां का दूसरा रंग मैं ने छोटे देवर की शादी में देखा. बरात विदा होने से पहले लक्ष्मीपूजन का कार्यक्रम था. वधू पक्ष द्वारा लिया गया सजासजाया हौल, साजोसामान सब उन्होंने नकार दिया और अपनी ओर से पूरा खर्च कर लक्ष्मीपूजन संपन्न किया.’’

उन के अंदर के हठ का रंग मुझे करीब 10 वर्ष बाद देखने को मिला. ससुरजी ने मकान बनाने के लिए जो योजना बनाई थी, वह सिवा सासूमां के, सब को पसंद थी. ससुरजी 4 शयनकक्षों और एक हौल वाला दोमंजिला बंगला बनवाना चाहते थे. नीचे 2-2 शयनकक्ष और रसोईघर वाले 2 फ्लैट और ऊपर 2 शयनकक्ष के साथ एक बड़ा हौल, रसोई समेत बनवाया जाए. नीचे बगीचे और गैरेज के लिए जगह रखी जाए. एक दिन ससुरजी कागजों का एक पुलिंदा लाए और बोले, ‘‘लो वसंती, तुम्हारी इच्छानुसार मकान का नक्शा बनवा कर लाया हूं. अब उठ कर मेरे साथ कुछ खापी लो.’’

सासुमां के चेहरे पर विजय की एक स्निग्ध रेखा अभर आई. इस घटना के वर्षों बाद मुझे अपनी सासुमां के सत्याग्रह का असली अर्थ समझ में आया. 4 हिस्से वाले इस घर में रहते हुए पूरे परिवार में जो सुख, शांति और अपनत्व है, उस का श्रेय सासुमां के उस सत्याग्रह व दूरदृष्टि को जाता है.

सासुमां के अंदर की ईर्ष्या का रंग तब अचानक ही उभर आता जब नानीसास हम से मिलने आतीं, हमारे लिए तरहतरह के कीमती उपहार लातीं. महंगी साड़ी सासुमां को भेंट देतीं और पूरे समय अपने डाक्टर बेटे की दौलत, व्यवसाय और प्रतिष्ठा का गुणगान करतीं. नानीमां जितने दिन रहतीं, सासुमां विचलित और अशांत रहतीं. किसी का भी दिल न दुखाने वाली सासुमां का अपनी ही मां से किया जाने वाला रूखा व्यवहार मेरी समझ से बाहर था.

एक दिन हमेशा की तरह ‘मामापुराण’ शुरू हुआ था. ‘‘अब बस भी करो अम्मा,’’ सासुमां ने रुखाई से कहा.

‘‘कमाल है,’’ नानीमां अचकचा कर बोलीं, ‘‘सगे भाई की दौलत, खुशी की तारीफ तुझ से सही नहीं जाती. देख रही हूं तुझे तो कांटा ही चुभ रहा है.’’ सासुमां ने सीधे अपनी मां की ओर तीव्र दृष्टि डाली और कड़े शब्दों में बोलीं, ‘‘सो क्यों है, यह तुम अच्छी तरह से जानती हो.’’

इस घटना के बाद नानीमां जब भी हमारे घर आतीं, मामाजी की दौलत और प्रतिष्ठा के बारे में अपना मुंह बंद ही रखतीं. काफी समय बाद सासुमां के इस व्यवहार का असली कारण मुझे तब पता चला जब मेरी बेटी सुरभि का मैडिकल में दाखिला होना था. उसी समय सुधीर, मेरे बेटे, को रीजनल कालेज में प्रवेश लेना था. सुरभि और सुधीर, दोनों को बाहर छात्रावास में रख कर पढ़ाई का खर्र्च उठाना संभव नहीं था. लिहाजा, हम ने सुरभि को घर में रह कर एमएससी करने को कहा. लेकिन सासुमां ने जब सुना तो बहुत नाराज हुईं, ‘‘सुधीर के लिए सुरभि के भविष्य की बलि क्यों चढ़ा रही हो. सुधीर को स्थानीय कालेज में इंजीनियरिंग पढ़ने दो, सुरभि का खर्च मैं उठाऊंगी. आखिर मेरे जेवर किस काम आएंगे. मैं नहीं चाहती कि एक और वसंती को अपने स्वप्नों के टूटने का दुख भोगना पड़े.’’

तब मैं ने जाना कि डाक्टर मामा की खातिर ही सासुमां का डाक्टर बनने का सपना अधूरा रह गया था. मेरे बेटे सुधीर की शादी के लिए 6 दिन बचे थे. घर में नाचगाने की योजना थी. सहभोज और वीडियो शूटिंग का कार्यक्रम था. अचानक ससुरजी का पैर फिसला और पैर की हड्डी टूट गई. उन्हें अस्पताल में भरती कराया गया. जाहिर है, ऐसे में सासुमां को ससुरजी की देखभाल के लिए अस्पताल में ही रहना था. ससुरजी की तबीयत संभलने के तीसरे दिन सासुमां घर वापस आईं और सन्नाटा व उदास माहौल देख कर बोलीं, ‘‘अरी ऊषा, यह शादी का घर है क्या? न कहीं रौनक, न कहीं उत्साह…’’

‘‘वह क्या है…’’ मैं दुविधा में बोली. ‘‘अब रहने भी दे, 2 दिन के लिए मैं घर छोड़ कर क्या गई, सब के सब एकदम सुस्त हो गए,’’ वे नाराज हो कर बोलीं. फिर नरेन से बोलीं, ‘‘तेरे पिताजी की तबीयत अब ठीक है, आज तुम दोनों भाई उन के साथ रहना. मैं कल सुबह अस्पताल आऊंगी. घर में 2-2 बहुएं हैं, 2-2 लड़कियां हैं, पर शादी का घर तो एकदम भूतघर जैसा लग रहा है. मेरे पोते की शादी में ऐसी खामोशी क्यों भला, ऐसा खुशी का मौका क्या बारबार आता है?’’

फिर क्या पूछना, उस रात ऐसी महफिल जमी कि आज तक भुलाए नहीं भूलती. देररात तक संगीतसमारोह की रौनक रही. सासुमां खुद खूब नाचीं और हर एक को उठाउठा कर हाथ पकड़ कर खूब नचाया.

सुबह हुई तो स्नान कर के वे अस्पताल के लिए चल दीं. मैं उन की ममता और स्नेह से अभिभूत थी. अपने दुख, अपनी चिंता, परेशानी को छिपा कर उन्होंने किस तरह मेरी खुशी को महत्त्व दिया था, उसे मैं कभी नहीं भूल पाती. उत्साह का वह रंग कभीकभार आज भी उन में उभर आता है. सासुमां के व्यक्तित्व के 7 रंगों में एक रंग और था और वह था, अंधविश्वास का. घर में कोई भी समस्या हो, निवारण हेतु वे सब से पहले गुरुजी के पास दौड़ी जातीं. फिर मनौती, चढ़ावा, पूजा, हवन वगैरह का दौर शुरू हो जाता.

एक बार छोटे देवर ट्रैकिंग पर गए हुए थे. प्रतिदिन वहां के समाचारों में बादल, वर्षा, तूफान का जिक्र रहता. जब वे निश्चित समय तक नहीं लौटे तो हम सभी चिंता से व्याकुल हो गए. सासुमां ने तुरंत गुरुजी की सलाह ली और दूसरे दिन से अंधेरे में स्नानध्यान कर गीले कपड़ों में मंदिर जाने लगीं.

‘‘अम्मा, इस तरह परेशानी पर परेशानी बढ़ाओगी क्या. अब तुम भी बीमार पड़ कर रहीसही कसर पूरी कर दो,’’ एक दिन नरेन बरस पड़े. अम्माजी ने शांतसहज उत्तर दिया, ‘‘भोलेनाथ की कृपा से हरेंद्र जल्दी घर वापस आएगा और रही मेरी बात, तो मुझे कुछ नहीं होगा. देखना, तेरा पोता गोद में खिलाने के बाद ही मरूंगी.’’

वक्तबेवक्त नहाने, खाने और सोने से एक दिन जब सासुमां मंदिर में ही मूर्च्छित हो गईं तो उन्हें अस्पताल में भरती कराया गया. 15 दिन बाद देवरजी सकुशल लौटे. आते ही सासुमां ने उन्हें गले लगा लिया और भावविह्वल स्वर में बोलीं, ‘‘मेरे भोलेनाथ की कृपा से तुम मौत के मुंह से लौटे हो.’’

देवरजी अवाक उन की तरफ देखते रहे और बोले, ‘‘क्या कह रही हो अम्मा, मैं और मौत के मुंह में, कुछ समझ नहीं आ रहा है…’’ पूरी बात बताने पर वे उन पर बरस पड़े, ‘‘अम्मा, जाने कैसेकैसे लोग तुम्हारे इस अंधविश्वास का फायदा उठा कर तुम से पैसे ऐंठ लेते हैं. इस व्रतउपवास के चक्कर में तुम ने अपना क्या हाल बना लिया है. मैं तो नहीं पर तुम खुद ही अपने इन अंधविश्वासों के कारण मौत के मुंह में जा रही थीं.’’

देवरजी ने बताया कि उन का ट्रैकिंग कार्यक्रम अचानक स्थगित हो गया और उन्हें वहीं से औफिस के काम से मुंबई जाना पड़ा. इस की जानकारी उन्होंने पत्र द्वारा घर भेज दी थी. पर संभवतया किसी कारण से पत्र मिला नहीं. वह दिन और आज का दिन, सासुमां ने नजर उतारना, मनौती, चढ़ावा सब छोड़ दिया है. अपनी इतनी पुरानी मान्यता तो छोड़ पाना उन की दृढ़ता का ही परिचायक था.

सासुमां में सही समय पर विरक्ति का रंग भी छलक उठा. मेरे बेटे के संपन्न ससुराल वाले अपनी बेटी को वे सब सुविधाएं देना चाहते थे, जिन की वह आदी थी. लेकिन सासुमां की इच्छानुसार हम ने कुछ भी लेने से इनकार कर दिया. जैसेजैसे समय बीतता गया, हम ने महसूस किया कि उन सुविधाओं के अभाव में बहू को यहां समझौता करना मुश्किल हो रहा है.

हम दुविधा में थे, इधर बहू भी अशांत थी. लेकिन अम्माजी समधियाने का सामान लेने में खुद को अपमानित महसूस करती थीं. हमारी उलझन को समझ कर एक दिन वे बोलीं, ‘‘बहू, अब सीढ़ी चढ़नाउतरना मुझ से होता नहीं. मेरे रहने के लिए नीचे ही इंतजाम कर दो. तुम लोग ऊपर के दोनों हिस्सों में चले जाओ. बुढ़ापे में मोहमाया जरा कम कर लेने दो. अब मुझे घर की जवाबदारी से मुक्त करो, न सलाह मांगो, न देखभाल का जिम्मा दो.’’ तब से अब तक सासुमां अपनेआप में मगन हैं. उन्होंने अपने चारों तरफ विरक्ति की दीवार खड़ी कर ली है, पर उस विरक्ति में रूखापन नहीं है. वे आज भी उतनी ही ममतामयी और जागरूक हैं, जितनी पहले थीं.

आश्चर्य की बात तो यह है कि बहू का ज्यादा से ज्यादा समय अपनी दादीसास के साथ ही गुजरता है. वह अपनी दादीसास की सब से ज्यादा लाड़ली है. उस ने भी महसूस कर लिया है कि अपने परिवार की सुखशांति के लिए ही दादीमां खुद ही तटस्थ हो गई हैं. अपने अधिकारों को छोड़ कर वे सब के कल्याण में लगी हुई हैं.

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