बेचारी दिव्यांशी : ब्यूटीपार्लर से कौन हुआ रफूचक्कर

महल्ले के कई लोग अचरज भरी निगाहों से उस कमरे को देख रहे थे जहां पर कोई नया किराएदार रहने आ रहा था और जिस का सामान उस छोटे से कमरे में उतर रहा था. सामान इतना ही था कि एक सवारी वाले आटोरिकशा में पूरी तरह से आ गया था.

सब यही सोच रहे थे और आपस में इसी तरह की बातें कर रहे थे कि तभी एक साइकिल रिकशा से एक लड़की उतरी जो अपने पैरों से चल नहीं सकती थी, इसीलिए बैसाखियों के सहारे चल कर उस कमरे की तरफ जा रही थी.

अब महल्ले की औरतें आपस में कानाफूसी करने लगीं… ‘क्या इस घर में यह अकेले रहेगी?’, ‘कौन है यह?’, ‘कहां से आई है?’ वगैरह.

कुछ समय बाद उस लड़की ने उन सवालों के जवाब खुद ही दे दिए, जब वह अपने पड़ोस में रहने वाली एक औरत से एक जग पानी देने की गुजारिश करने उस के घर गई.

घर में घुसते ही शिष्टाचार के साथ उस ने नमस्ते की और अपना परिचय देते हुए बोली, ‘‘मेरा नाम दिव्यांशी है और मैं पास के कमरे में रहने आई हूं. क्या मुझे पीने के लिए एक जग पानी मिल सकता है? वैसे, नल में पानी कब आता है? मैं उस हिसाब से अपना पानी भर लूंगी.’’

‘‘अरे आओआओ दिव्यांशी, मेरा नाम सुमित्रा है और पानी शाम को 5 बजे और सुबह 6 बजे आता है. कहां से आई हो और यहां क्या करती हो?’’ पानी देते हुए सुमित्रा ने पूछा.

‘‘आंटी, आप मेरे कमरे पर आइए, तब हम आराम से बैठ कर बातें करेंगे. अभी मुझे बड़ी जोरों की भूख लगी है. वैसे, मैं शहर के नामी होटल रामभरोसे में रिसैप्शनिस्ट का काम करती हूं, जहां मेरा ड्यूटी का समय सुबह 6 बजे से है. मेरा काम दोहपर के 3 बजे तक खत्म हो जाता है.’’

बातचीत में सुमित्रा को दिव्यांशी अच्छी लगी और उस के परिवार के बारे में ज्यादा जानने की उत्सुकता में शाम को पानी आने की सूचना ले कर वह दिव्यांशी के कमरे पर पहुंच गई.

दिव्यांशी अब अपने बारे में बताने लगी, ‘‘आज से तकरीबन 16 साल पहले मैं अपने मातापिता के साथ मोटरसाइकिल से कहीं जा रही थी कि तभी एक ट्रक से भीषण टक्कर होने से मेरे मातापिता मौके पर ही मर गए थे.

‘‘चूंकि मैं दूर छिटक गई थी इसलिए जान तो बच गई, पर पास से तेज रफ्तार से गुजरती बाइक मेरे दोनों पैरों पर से गुजर गई और मेरे दोनों पैर काटने पड़े. तभी से चाचाचाची ने अपने पास रखा और पढ़ायालिखाया.

‘‘उन के कोई बच्चा नहीं है. इस वजह से भी वे मुझ से बहुत स्नेह रखते हैं. चाचा की माली हालत ज्यादा अच्छी नहीं है, फिर भी वे मेरी नौकरी करने के खिलाफ हैं, पर मैं अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं, इसीलिए शहर आ कर मैं ने इस नौकरी को स्वीकार कर लिया.

‘‘इस होटल की नौकरी के साथसाथ मैं सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में हिस्सा लेती हूं ताकि कोई सरकारी नौकरी लग जाए. मैं अपनी योग्यता पर विश्वास रखती हूं इसी कारण किसी तरह की कोचिंग नहीं लेती हूं, बल्कि 3 बजे होटल से आ कर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हूं. इस से मेरी प्रतियोगिता की तैयारी भी हो जाती है और कुछ कमाई भी.

‘‘इस महल्ले में कोई बच्चा अगर ट्यूशन लेना चाहता हो तो उन्हें मेरे पास भेजिए न भाभी,’’ दिव्यांशी ने अपनेपन से सुमित्रा से कहा.

‘‘जरूर. मैं अपने सभी मिलने वालों से कहूंगी…’’ सुमित्रा ने पूछा, ‘‘और तुम अपने खाने का क्या करती हो?’’

‘‘सुबह का नाश्ता और दोपहर का खाना तो मैं होटल की पैंट्री में ही खा लेती हूं और शाम को इस आटोमैटिक हौट प्लेट पर दालचावल या खिचड़ी जैसी चीजें पका लेती हूं.’’

यह सुन कर सुमित्रा मन ही मन दिव्यांशी की हिम्मत की तारीफ कर रही थी. तकरीबन आधा घंटे तक दिव्यांशी के साथ बैठने के बाद वह अपने घर वापस आ गई.

सुबह साढ़े 5 बजे वही साइकिल रिकशा वाला जो दिव्यांशी को छोड़ने आया था, लेने आ गया. साफ था, दिव्यांशी ने उस का महीना बांध कर लाने व छोड़ने के लिए लगा लिया था.

सुमित्रा ने भी अपना काम बखूबी निभाया और महल्ले में सभी को दिव्यांशी के बारे में बताया. तकरीबन सभी ने उस की हिम्मत की तारीफ की. हर कोई चाहता था कि कैसे न कैसे कर के उस की मदद की जाए. कई घरों के बच्चे दिव्यांशी के पास ट्यूशन के लिए आने लगे थे.

दिव्यांशी को इस महल्ले में आए अभी पूरा एक महीना होने में 2-3 दिन बचे थे कि एक दिन महल्ले वालों ने देखा कि दिव्यांशी किसी लड़के के साथ मोटरसाइकिल पर आ रही है.

सभी को यह जानने की इच्छा हुई कि वह लड़का कौन है. पूछने पर पता चला कि उस का नाम रामाधार है और उसी के होटल में कुक है और आज ही उस ने यह सैकंडहैंड बाइक खरीदी है.

1-2 दिन के बाद ट्यूशन खत्म होने पर दिव्यांशी ने एक बच्चे को भेज कर महल्ले की 4-5 औरतों को अपने कमरे में बुलवा लिया और कहने लगी, ‘‘मैं इतने दिनों से आप लोगों के साथ रह रही हूं इसलिए आप लोगों के साथ एक बात करना चाहती हूं. रामाधार हमारे होटल में कुक है और वह चाहता है कि मैं रोज उस के साथ औफिस जाऊं.

‘‘वैसे भी रिकशे वाला 2,000 रुपए महीना लेता है. अगर आप लोगों को कोई एतराज न हो तो मैं उस के साथ आनाजाना कर लूं?’’

‘‘जब तुम पूछ कर सभी के सामने आनाजाना कर रही हो तो हमें क्या दिक्कत हो सकती है और पिछले एक महीने में इतना तो हम तुम्हें समझ ही गए हैं कि तुम कोई गलत काम कर ही नहीं सकती. तुम निश्चिंत हो कर रामाधार के साथ आजा सकती हो, ‘‘सुमित्रा बाकी सब औरतों की तरफ देख कर बोली. सभी औरतों ने अपनी सहमति दे दी.

रामाधार 26-27 साल का नौजवान था. उस की कदकाठी अच्छी थी. फूड और टैक्नोलौजी का कोर्स करने के बाद दिव्यांशी के होटल में ही वह कुक का काम करता था. वह दिव्यांशी को लेने व छोड़ने जरूर आता था, पर कभी भी दिव्यांशी के कमरे के अंदर नहीं गया था.

अब तक 3 महीने गुजर चुके थे. ट्यूशन पढ़ रहे सभी बच्चों के मासिक टैस्ट हो चुके थे और तकरीबन सभी बच्चों ने कहीं न कहीं प्रगति की थी. इस कारण दिव्यांशी का सम्मान और ज्यादा बढ़ गया था.

एक दिन अचानक दिव्यांशी ने फिर से सभी औरतों को अपने घर बुलवा लिया. इस बार मामला कुछ गंभीर लग रहा था.

सुमित्रा की तरफ देख कर दिव्यांशी बोली, ‘‘मैं ने आप सभी में अपना परिवार देखा है, आप लोगों से जो प्यार और इज्जत मिली है, उसी के आधार पर मैं आप लोगों से एक बात की इजाजत और चाहती हूं. मैं और रामाधार शादी करना चाहते हैं.

‘‘दरअसल, रामाधार को दुबई में दूसरी नौकरी मिल गई है और उसे अगले 3 महीनों में कागजी कार्यवाही कर के वहां नौकरी जौइन करनी है. वहां जाने के बाद वह वहां पर मेरे लिए भी जौब की जुगाड़ कर लेगा. जाने से पहले वह शादी कर के जाना चाहता है, ताकि पतिपत्नी के रूप में हमें एक ही संस्थान में काम मिल जाए.

‘‘मैं ने अपने चाचा को भी बता दिया है. वे भी इस रिश्ते से सहमत हैं, पर यहां आने में नाकाम हैं, क्योंकि उन के साले का गंभीर ऐक्सिडैंट हो गया है.’’

सभी औरतें एकदूसरे की तरफ देखने लगीं. 16 नंबर मकान में रहने वाली कमला ताई दिव्यांशी की हमदर्द बन गई थीं. उन की आंखों में सवाल देख दिव्यांशी बोली, ‘‘ताईजी, रामाधार की कहानी भी मेरे ही जैसी है. उस के मातापिता की मौत बचपन में ही हो गई थी. कोई और रिश्तेदार न होने के कारण पड़ोसियों ने उसे अनाथ आश्रम में दे दिया था. वहीं पर रह कर उस ने पढ़ाई की और आज इस लायक बना.’’

अब तो सभी के मन में रामाधार के प्रति हमदर्दी के भाव उमड़ पड़े.

‘‘शादी कब करने की सोच रहे हो,’’ 10 नंबर वाली कल्पना भाभी ने पूछा.

‘‘इसी हफ्ते शादी हो जाएगी तो अच्छा होगा और कागजी कार्यवाही करने में भी आसानी होगी.’’

‘‘इतनी जल्दी तैयारी कैसे होगी?’’ सुमित्रा ने सवाल किया.

‘‘तैयारी क्या करनी है, हम ने सोचा है कि हम आर्य समाज मंदिर में शादी करेंगे और शाम का खाना रामभरोसे होटल में रख कर आशीर्वाद समारोह आयोजित कर लेंगे. दूसरे दिन सुबह रामाधार अपनी कागजी कार्यवाही के लिए दिल्ली चला जाएगा और 10-12 दिन बाद जब वापस आएगा तो मैं उस के घर चली जाऊंगी.

‘‘मैं आप लोगों से अनुरोध करूंगी कि आप मुझे ट्यूशन की फीस अगले 3 महीने की एडवांस में दे दें. सामान के बदले में मुझे कैश ही दें क्योंकि सामान तो मैं साथ ले जा नहीं पाऊंगी.’’

सभी को दिव्यांशी की भविष्य के प्रति गंभीरता पसंद आई. 11 नंबर मकान में रहने वाली चंदा चाची उत्सुकतावश बोली, ‘‘बिना जेवर के दुलहन अच्छी नहीं लगती इसलिए शादी के दिन मैं अपना नया वाला सोने का सैट, जो अपनी बेटी की शादी के लिए बनवाया है, उस दिन दिव्यांशी को पहना दूंगी.’’

‘‘जी चाचीजी, रिसैप्शन के बाद मैं वापस कर दूंगी,’’ दिव्यांशी बोली.

अब तो होड़ मच गई. कोई अंगूठी, तो कोई पायल, कोई चैन, तो कोई कंगन दिव्यांशी को देने को तैयार हो गया. सुधा चाची ने अपनी लड़की का नया लहंगा दे दिया.

कुल 50-55 घरों वाले इस महल्ले में कन्यादान करने वालों की भी होड़ लग गई. कोई 5,000 रुपए दे रहा था, तो कोई 2,100 रुपए.

शादी के दिन महल्ले में उत्सव जैसा माहौल था. सभी छुट्टी ले कर घर पर ही थे. अपनेअपने वादे के मुताबिक सभी ने अपने गहनेकपड़े दिव्यांशी को दे दिए थे.

शादी दोपहर 12 बजे होनी थी. इसी वजह से दिव्यांशी को सुबह 9 बजे ब्यूटीपार्लर पहुंचना था और वहीं से आर्य समाज मंदिर. लेकिन सब से बड़ा सवाल यह था कि दिव्यांशी को ब्यूटीपार्लर ले कर जाएगा कौन?

इतनी सुबह उस के साथ जाने का मतलब था कि खुद को बिना तैयार किए शादी में जाना, इसलिए यह निश्चित हुआ कि सुमित्रा के पति दिव्यांशी को अपने साथ ले कर जाएंगे और ब्यूटीपार्लर की जगह पर छोड़ देंगे. जैसे ही पार्लर का काम पूरा हो जाएगा, दिव्यांशी फोन कर के उन्हें बुलवा लेगी और वहीं से सभी आर्य समाज मंदिर चले जाएंगे.

तय समय के मुताबिक ही सारा कार्यक्रम शुरू हो गया. सुबह साढ़े 8 बजे सुमित्रा के पति अपनी कार ले कर दिव्यांशी के दरवाजे पर पहुंच गए और उस के बताए ब्यूटीपार्लर पर सारे सामान के साथ ले गए. पार्लर अभीअभी खुला ही था. वह उसे पार्लर पर छोड़ कर चले गए.

अब सभी तैयार होने लगे. चूंकि रिसैप्शन शाम को होना था इसीलिए तकरीबन सभी घरों में या तो सिर्फ नाश्ता बना या खिचड़ी.

तकरीबन साढ़े 11 बजे सुमित्रा सपरिवार दिव्यांशी को लेने के लिए पार्लर पहुंची, पर दिव्यांशी तो वहां थी ही नहीं. ज्यादा जानकारी लेने पर पता चला कि पार्लर तो साढ़े 10 बजे खुलता है. 9 बजे तो सफाई वाला आता है जो पार्लर के कर्मचारियों के आने के बाद चला जाता है. आज सुबह 9 बजे किसी का भी किसी तरह का अपौइंटमैंट नहीं था.

सुमित्रा को चक्कर आने लगे. वह किसी तरह चल कर कार तक पहुंची और पति को सारी बात बताई.

पति तुरंत पार्लर के अंदर गए और उन के अनुरोध पर उस सफाई वाले को बुलवाया गया, ताकि कुछ पता चल सके.

सफाई वाले ने जो बताया, उसे सुन कर सभी के होश उड़ गए. उस ने बताया, ‘‘सुबह जो लड़की पार्लर में आई थी, उस ने बताया था कि वह एक नाटक में एक विकलांग भिखारी का रोल कर रही है. उसे हेयर कट और मेकअप कराना है.

‘‘तब मैं ने बताया कि पार्लर तो सुबह साढ़े 10 बजे खुलेगा, तो वह कहने लगी कि तब तक मेरा पैर फालतू ही मुड़ा रहेगा, मैं वाशरूम में जा कर पैरों में लगी इलास्टिक को निकाल लूं क्या? जब तक पार्लर खुलेगा, मैं नाश्ता कर के आ जाऊंगी.

‘‘मैं ने कहा ठीक है. देखिए, इस कोने में उस की बैसाखियां और निकला हुआ इलास्टिक रखा है.’’

सभी ने देखा, बैसाखियों के साथ एक छोटी सी थैली रखी थी. इस में चौड़े वाले 2 इलास्टिक और दिव्यांशी के फोन का सिम कार्ड रखा हुआ था.

आर्य समाज मंदिर में सभी लोग अपनेआप को ठगा सा महसूस करते हुए एकदूसरे की तरफ देख रहे थे.

बढ़ई की बेटी : उर्मिला ने भरी नई उड़ान

‘‘जगता चाचा, ओ, जगता चाचा,’’ कुंदन ने दरवाजे पर खड़े हो कर जगता बढ़ई को आवाज लगाई.

‘‘हां कुंदन बेटा, क्यों चिल्ला रहा है? दरवाजा खोल कर अंदर आ जा.’’

‘‘अरे चाचा, आप को खाट की बाही और पाए बनाने को दिए थे. इतने दिन हो गए, लेकिन कुछ हुआ नहीं…’’

‘‘हां बेटा, बस कुछ दिन की और बात है. टांग ठीक हो जाए, तो मैं चारपाई छोड़ कर कामधंधे में लगूं. सब से पहले तुम्हारी खाट ही तैयार करूंगा.’’

‘‘चाचा, हमें खाट की बहुत जरूरत है. पिताजी ने कहलवा कर भेजा है कि खाट बुनने के लिए तैयार न हो, तो उस की लकड़ी वापस ले आना. हम दूसरे गांव के बढ़ई से बनवा लेंगे.’’

‘‘कुंदन बेटा, तुम कैसी बातें करते हो? तुम्हारे परिवार का कोई काम कभी मेरे हाथों पीछे छूटा हो तो बताओ. अब ऐसी मजबूरी आ पड़ी है कि उठा तक नहीं जाता. जब से हादसे में टांग टूटी है, लाचार हो गया हूं. बस, कुछ दिन और रुक जाओ बेटा.’’

‘‘नहीं चाचा, अब हम और नहीं रुक सकते. हमें खाट की सख्त जरूरत है. हम दूसरों की खाट मांग कर काम चला रहे हैं.’’

‘‘ठीक है बेटा. नहीं रुक सकते तो ले जाओ अपनी लकडि़यां, वे पड़ी हैं उस कोने में.’’ कुंदन कोने में पड़ी अपनी लकडि़यां उठाने लगा.

जगता बढ़ई की बेटी सुनीता दरवाजे के पीछे खड़ी सारी बातें सुन रही थी. वह बाहर आई और कुंदन से बोली, ‘‘कुंदन भैया, अगर तुम शाम तक का समय दो, तो तुम्हारी बाही और पाए दोनों तैयार हो जाएंगे. उन्हें ठोंकपीट कर तुम्हारी खाट का भी ढांचा तैयार हो जाएगा.’’

‘‘लेकिन सुनीता, यह तो बताओ इन को तैयार कौन करेगा? जगता चाचा तो अपनी चारपाई से नीचे भी नहीं उतर सकते.’’

‘‘मैं तैयार करूंगी कुंदन भैया. तुम परेशान क्यों होते हो? आखिर मैं बढ़ई की बेटी हूं. इतना तो तुम मुझ पर यकीन कर ही सकते हो.’’

सुनीता की बात सुन कर कुंदन मुसकराया और बोला, ‘‘ठीक है, सुनीता. तुम कहती हो, तो शाम तक इंतजार कर लेते हैं,’’ इतना कह कर कुंदन वहीं लकडि़यां छोड़ कर चला गया.

कुंदन के जाने के बाद जगता ने कहा, ‘‘सुनीता बिटिया, यह तुम ने कुंदन से कैसा झूठा वादा कर लिया?’’

‘‘नहीं पिताजी, मैं ने कोई झूठा वादा नहीं किया है,’’ सुनीता ने जोश में आ कर कहा.

‘‘तो फिर खाट की बाही और पाए कौन तैयार करेगा?’’

‘‘मैं तैयार करूंगी पिताजी.’’

यह सुन कर जगता चौंक गया. उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि सुनीता अपने कंधों पर यह जिम्मेदारी ले सकती है.

जगता का नाम वैसे तो जगत सिंह धीमान था, लेकिन जटपुर गांव के लोग उसे ‘जगता’ कह कर ही पुकारते थे. जगता को पता था कि सुनीता को बचपन से ही बढ़ईगीरी का शौक है. इसी शौक के चलते वह बढ़ईगीरी के औजार हथौड़ा, बिसौली, आरी, रंदा, बरमा आदि चलाना अच्छे से सीख गई है, लेकिन जगता ने अपनी बेटी सुनीता से कोई काम पैसे कमाने के लिए कभी नहीं कराया था, शौकिया चाहे वह कुछ भी करे.

लेकिन आज मुसीबत के समय सुनीता खाट की बाही और पाए तैयार करने के लिए बड़ी कुशलता से औजार चला रही थी. उस की कुशलता को देख कर जगता भी हैरान था.

सुनीता ने चारों बाही और पाए तैयार कर के और उन्हें ठोंकपीट कर खाट का ढांचा दोपहर तक तैयार कर दिया. फिर कुंदन को कहलवा भेजा कि वह अपनी खाट ले जाए, तैयार हो गई है.

कुंदन जब आया तो उस ने देखा कि उस की खाट तैयार है. उस ने पैसे पकड़ाए और चलते समय कहा, ‘‘सुनीता, हम तो यही सोच रहे थे कि जगता चाचा ने तो चारपाई पकड़ ली है और अब लकड़ी का सारा काम पड़ोस के गांव के बढ़ई से ही करवाना पड़ा करेगा.’’

तब सुनीता ने बड़े यकीन के साथ कहा, ‘‘कुंदन भैया, ऐसा है कि जितना भी लकड़ी का काम तुम्हारे पास है, सब ले आना. सारा काम समय से कर के दूंगी, दूसरे गांव में जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी.’’

‘‘सुनीता, जब सारा काम गांव में ही हो जाएगा, तो कोई बेवकूफ ही होगा, जो दूसरे गांव जाने की सोचेगा.’’

यह कहते हुए कुंदन तो खाट का ढांचा उठा कर चला गया, लेकिन ये सब बातें सुन कर जगता कहां चुप रहने वाला था. उस ने कहा, ‘‘सुनीता, तू कुंदन से क्या कह रही थी कि लकड़ी का सारा काम ले आना, मैं कर के दूंगी? बिटिया, क्या मैं अब इतना गयागुजरा हो गया हूं कि बेटी की कमाई खाऊंगा और अपने सिर पर बुढ़ापे में पाप चढ़ाऊंगा?’’

‘‘अरे पिताजी, छोडि़ए इन पुराने ढकोसलों को. इन पुरानी बातों पर अब कौन ही यकीन करता है? अपने पिता की मदद करने से बेटी के बाप को पाप लगता है, यह कौन से शास्त्र में लिखा है?’’

‘‘लेकिन, बिटिया…’’

‘‘पिताजी, आप चिंता न करें. आप की बेटी बेटों से कम है क्या? देखो, तुम्हारे दोनों बेटे अजीत और सुजीत बढ़ईगीरी का पुश्तैनी काम छोड़ कर और इसे छोटा काम समझ कर बनियों की दो टके की नौकरी करने शहर भाग गए. लेकिन, इस में भी उन का गुजारा नहीं होता, हर महीने आप के सामने हाथ फैलाए खड़े रहते हैं.

‘‘इस से अच्छा तो यह होता पिताजी कि वे अपने पुश्तैनी काम को आगे बढ़ाते. गांव के कितने ही लोग अब दूसरे गांव जा कर या शहर से लकड़ी का काम करवा कर लाते हैं, क्योंकि आप अकेले से इतना काम नहीं हो पाता. गांव भी हर साल फैल रहा है.’’

‘‘कहती तो ठीक हो बेटी. मैं ने तेरे दोनों भाइयों को कितना समझाया कि अपने काम को आगे बढ़ाओ, मालिक बन कर जिओ. दूसरों की नौकरी बजाने से अपना काम लाख बेहतर होता है. लेकिन उन्हें तो बढ़ईगीरी करने में न जाने कितनी शर्म आती है?’’

‘‘लेकिन पिताजी, तुम्हारी इस बेटी को बढ़ईगीरी करने में कोई शर्म नहीं आती है, बल्कि गर्व महसूस होता है.’’

‘‘लेकिन सुनीता, तुम्हें अभी अपनी पढ़ाई भी तो करनी है. अभी तुम्हारा इंटर ही तो हुआ है.’’

‘‘देखो पिताजी, अब बहुत ज्यादा पढ़ाई करने से भी कोई फायदा नहीं. हमारे यहां पढ़ाई करने का मकसद सिर्फ और सिर्फ नौकरी पाना ही तो है. हमारी सरकारों ने मैकाले की शिक्षा पद्धति को ही तो आगे बढ़ाया है, पढ़ाई सिर्फ नौकर पैदा करने के लिए, शासक या मालिक बनने के लिए नहीं.’’

जगता अपनी बेटी की बातों को बड़े ध्यान से सुन रहा था. उसे उस की बातों में दम नजर आ रहा था, फिर भी जगता ने कहा, ‘‘लेकिन बिटिया, फिर भी ज्यादा पढ़नालिखना जरूरी है. लड़के वाले शादी के समय यह जरूर पूछते हैं कि आप की लड़की कितनी पढ़ीलिखी है.’’

‘‘और चाहे पिताजी एमए पास लड़की को एप्लिकेशन तक लिखनी न आती हो. बस, रद्दी डिगरी जमा करने का धंधा बन गया है, फिर भी आप कहते हो तो मैं बीए, एमए कर लूंगी, लेकिन प्राइवेट कालेज से.’’

‘‘बिटिया, यह तू जाने. मैं ने तो किसी डिगरी कालेज का मुंह तक नहीं देखा. 8वीं जमात तक गांव की ही पाठशाला में पढ़ा और उस के बाद कान पर पैंसिल लगा कर पुश्तैनी काम बढ़ईगीरी करने लगा.’’

इस के बाद तो सुनीता ने बढ़ईगीरी का सब काम अपने हाथ में ले लिया. जगता के ठीक होने पर बापबेटी दोनों मिल कर बढ़ईगीरी का काम करते. लेकिन जगता पर बुढ़ापा हावी होने लगा था. एक ही काम को करते हुए सुनीता थकती नहीं थी, लेकिन जगता हांफने लगता था.

एक दिन गांव की ही एक लड़की उर्मिला बैठने की एक पटरी बनवाने के लिए सुनीता के पास आई. दोनों में बातें होने लगीं.

सुनीता ने पूछा, ‘‘उर्मिला, अब तू कहां एडमिशन ले रही है?’’

‘‘कहीं भी नहीं. बापू कह रहे हैं कि इंटर कर लिया और कितना पढ़ेगी? तेरी पढ़ाई पर ही खर्च करते रहेंगे, तो तेरी शादी में दहेज के लिए पैसे कहां से जुटाएंगे?’’

उर्मिला की बात सुन कर सुनीता ने आरी चलाना रोक दिया और बोली, ‘‘उर्मिला, अपने बापू से कह देना कि उन्हें तुम्हारी पढ़ाई का खर्च उठाने की जरूरत नहीं है. बता देना कि तुम अपनी पढ़ाई का खर्च खुद उठा सकती हो.’’

‘‘लेकिन सुनीता, मैं अपनी पढ़ाई का खर्च खुद कैसे उठा सकती हूं? मेरी तो कोई आमदनी ही नहीं है.’’

‘‘तेरी आमदनी होगी न उर्मिला. अगर तू मेरी बात माने तो मेरे यहां दिहाड़ी पर काम कर ले. तेरी पढ़ाई का खर्चा तो निकलेगा ही और तू चार पैसे अपने दहेज के लिए भी जुटा लेगी.’’

‘‘बात तो तू पते की कह रही है सुनीता, लेकिन तेरी बात तब कामयाब होगी, जब मेरा बापू मानेगा.’’

घर जा कर उर्मिला ने जब यह बात अपनी मां को बताई, तो वे तुरंत मान गईं, लेकिन यही बात सुन कर उस का बापू भड़क गया, ‘‘उर्मिला, तुझे यह बात कहते हुए शर्म नहीं आई. अब एक ब्राह्मण की बेटी बढ़ईगीरी करेगी. क्या कहेगा समाज?’’

इस का जवाब दिया उर्मिला की मां ने. वे भड़कते हुए बोलीं, ‘‘क्यों, क्या दे रहा है समाज तुम्हें? बेटी को पढ़ाने के लिए दो कौड़ी नहीं. वह कुछ करना चाहती है तो ब्राह्मण होने का घमंड… तुम्हारे पूजापाठ से जिंदगीभर दो वक्त की रोटी ठीक से खाने को मिली नहीं. दान के कपड़े से अपना और परिवार का जैसेतैसे तन ढकती रही, तब तुम्हें शर्म नहीं आई? अब बेटी मेहनत के दो पैसे कमाने चली तो उस में भी अड़ंगा…’’

‘‘लेकिन पंडिताइन, सुनो तो…’’

‘‘कुछ नहीं सुनना मुझे. तुम ने मेरी जिंदगी तो लाचार बना दी, लेकिन मैं अपनी बेटी के साथ ऐसा नहीं होने दूंगी. वह पढ़ेगी भी और काम भी करेगी. देखती हूं कि कौन रोकता है उसे ऐसा करने से. जान ले लूंगी उस की.’’

पंडिताइन का गुस्सा देख कर उर्मिला का बापू सहम गया.

अगले दिन से ही उर्मिला ने सुनीता के पास काम पर जाना शुरू कर दिया. जब शाम को उर्मिला ने 500 रुपए ले जा कर अपनी मां के हाथ में रखे, तो उस खुशी को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता.

कुछ लोगों ने कुछ दिन तक जरूर उर्मिला पर तंज कसे कि देखो तो क्या समय आ गया है? ब्राह्मण की बेटी बढ़ईगीरी कर रही है, लेकिन उर्मिला ऐसी बातों पर कान न धरती. वह ऐसी बातों को अनसुना कर देती. अपने काम पर ध्यान देना उस का मकसद था.

सुनीता अब अपने बुजुर्ग पिता को ज्यादा से ज्यादा आराम करने की सलाह देती. वह उर्मिला के साथ मिल कर हाथों में आए काम को जल्दी निबटाने की कोशिश करती. खाली समय में वह बची हुई लकड़ी से स्टूल, पटरी, पीढ़े, खुरपी और फावड़े के बिट्टे यानी हत्थे वगैरह बनाती. गांव में ऐसे सामान की खूब मांग थी.

सुनीता का काम बढ़ा, तो हाथों की जरूरत भी बढ़ी. उस ने एक दिन गत्ते पर लिख कर अपनी कार्यशाला से बाहर एक इश्तिहार लगा दिया, ‘बढ़ईगीरी के काम के लिए 2 लड़कियों/औरतों की जरूरत. दिहाड़ी 500 रुपए रोज’.

इश्तिहार देख कर दलित समाज के नथवा की बेटी बबीता काम मांगने आई. नथवा को उस के बढ़ईगीरी के काम करने से कोई गुरेज नहीं था. वह खुद मजदूरी करता था. वह जानता था कि घर कितनी मुश्किल से चलाया जाता है.

लेकिन मामला तब गरम हो गया, जब चौधरी रामपाल की विधवा पुत्रवधू विमला अपने 3 साल के बच्चे को गोद में ले कर सुनीता के यहां काम पर गई.

विमला का पति पिछले साल सड़क हादसे का शिकार हो गया था. तब से उस के ससुर चौधरी रामपाल और देवर इंदर ने उस की जमीन पर कब्जा कर रखा था. इस के बदले वे उसे कुछ देते भी नहीं थे और घर और घेर (गौशाला) का सारा काम उस से करवाते थे. वह पैसेपैसे से मुहताज थी.

जैसे ही विमला अगले दिन सुनीता की कार्यशाला में काम पर पहुंची, चौधरी रामपाल और इंदर भी लट्ठ ले कर वहां पहुंच गए. इंदर बिना कोई बात किए जबरदस्ती विमला का हाथ पकड़ कर उसे घसीट कर ले जाने लगा.

रामपाल दूसरों को अपनी अकड़ दिखाने के लिए चिल्ला कर कहने लगा, ‘‘अरे, चौधरियों की बहू अब बढ़ई के यहां काम करेगी क्या? सुन लो गांव वालो, अभी चौधरियों के लट्ठ में खूब दम बाकी है.’’

तभी आपे से बाहर होते हुए रामपाल और इंदर विमला को गालियां बकने लगे, ‘‘बदजात, तू यहां इन की गुलामी करेगी, हमारी नाक कटवाने के लिए.’’

इतना सुनते ही विमला ने एक ही झटके में इंदर से अपना हाथ छुड़ाया और तन कर बोली, ‘‘सुनो, अगर तुम चौधरी हो तो मैं भी चौधरी की बेटी हूं. जितना लट्ठ चलाना तुम जानते हो, उतना लट्ठ चलाना मैं भी जानती हूं. मैं तुम दोनों के जुल्मों से तंग आ गई हूं. अब तुम अपनी चौधराहट अपने पास रखो. और सुनो, बदजात होगी तुम्हारी मां.’’

यह वाक्य चौधरी रामपाल के दिल में बुझे तीर की तरह चुभा. वह लट्ठ ले कर विमला की तरफ बढ़ा, ‘‘बहू हो कर ऐसी गंदी जबान चलाती है, अभी ठहर…’’

वह विमला पर लट्ठ चलाने ही वाला था, तभी सुनीता ने पीछे से उस का लट्ठ मजबूती से पकड़ लिया. चौधरी रामपाल का संतुलन बिगड़ा और वह धड़ाम से पीठ के बल गिरा.

इतनी देर में वहां भीड़ जमा हो गई. कुछ लोगों ने चौधरी रामपाल और इंदर को पकड़ लिया और उन्हें समझानेबुझाने लगे, लेकिन वे तो अपनी बेइज्जती पर झंझलाए बैठे थे.

आखिर में गांव में पंचायत हुई और विमला के हिस्से में 4 बीघा जमीन और मकान का एकतिहाई हिस्सा आया. विमला को लगा कि कई बार झगड़ा करने से भी बात बन जाती है. उस ने अपनी जमीन तो बंटाई पर दे दी और चार पैसे कमाने के लिए खुद सुनीता की कार्यशाला में काम करती रही. उस की तो मानो झगड़ा कर के लौटरी ही लग गई.

सुनीता ने अपना काम और बढ़ाया. अब उस ने दरवाजे और खिड़कियां बनाना और चढ़ाना भी सीख लिया. शहर जा कर सोफा सैट बनाने का तरीका भी सीख लिया. अब उसे गांव के बाहर भी काम मिलने लगा, तो उस ने मोटरसाइकिल खरीद ली. अब उस ने पहचान के लिए अपनी कार्यशाला का नामकरण किया ‘जगता बढ़ई कारखाना’ और बाहर इसी नाम का बोर्ड टांग दिया.

धीरेधीरे सुनीता का काम इतना ज्यादा बढ़ गया कि शहर के फर्नीचर वाले भी उसे फर्नीचर बनाने का और्डर देने लगे. जैसेजैसे काम बढ़ा, वैसेवैसे कारखाने में काम करने वालियों की तादाद भी बढ़ने लगी.

सुनीता ने अपना एक छोटा सा केबिन बनवा लिया. वही उस का औफिस था, जहां बैठ कर वह और्डर लेती, सब से मिलतीजुलती और सब का हिसाबकिताब करती.

आमदनी और बढ़ी, तो सुनीता इनकम टैक्स भरने लगी. उस ने कार भी खरीद ली और फर्नीचर का शोरूम बनाने के लिए जमीन भी.

सुनीता के काम और कामयाबी की चर्चा दूरदूर तक होने लगी. अखबार वालों ने भी उस के बारे में छापा. कलक्टर के कानों तक यह खबर पहुंची

तो सचाई जानने के लिए उस ने जटपुर के प्रधान मान सिंह को अपने औफिस में बुलवाया. बात सही थी. फिर कलक्टर खुद सुनीता का हुनर देखने के लिए जटपुर पहुंचे.

कलक्टर ने सुनीता के कारखाने में 13 औरतों को काम करते देखा. वे सुनीता के काम और हुनर से इतने प्रभावित हुए कि उस का नाम पुरस्कार और सम्मान हेतु राज्य सरकार को भेजा.

सुनीता को पुरस्कार देते हुए और उस का सम्मान करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, ‘‘साथियो, सुनीता ने यह साबित कर दिया है कि कामयाबी पाने के लिए कोई समस्या आड़े नहीं आ सकती. बस, आप के अंदर कामयाबी पाने की लगन होनी चाहिए.

‘‘सुनीता किसी नौकरी के पीछे नहीं दौड़ी. उस ने अपने पुश्तैनी काम बढ़ईगीरी को ही आगे बढ़ाया, जिस को करने से औरतें तो क्या मर्द भी हिचकते हैं.

‘‘आज यह जान कर बड़ी खुशी हुई कि सुनीता के कारखाने में 13 औरतें काम कर रही हैं. सुनीता ने रूढ़ियों और परंपराओं को तोड़ कर महिला जगत को ही नहीं, बल्कि हम सब को एक नई राह दिखाई है.’’

सुनीता ने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच मुख्यमंत्री से पुरस्कार और सम्मान हासिल किया. उस की मुसकान बता रही थी कि उस के हौसले बुलंद हैं.

किस्मत का खेल : किसने उजाड़ी अनवर की दुनिया

अनवर बिजनौर जिले के नगीना शहर का रहने वाला था. उस की शादी साल 2010 में बिजनौर जिले के नारायणपुर गांव में हुई थी. शादी कराने वाली अनवर की चाची थीं, जिन्होंने उसे शादी से एक हफ्ता पहले आगाह किया था कि यह लड़की सही नहीं है.

दरअसल, शादी से एक हफ्ता पहले लड़की के मामा, जो अनवर की चाची के दूर के रिश्तेदार थे, ने आ कर चाची को बताया था कि यह लड़की जेबा शादी से पहले भी अपने दूर के एक रिश्तेदार के साथ भाग चुकी है और एक महीना उस के साथ रह कर आई है.

चाची की इस बात को सुन कर अनवर का शादी से मना करने के लिए दिल नहीं माना, इसलिए उस ने सही जानकारी हासिल करने और जेबा की इस शादी के लिए रजामंदी है या नहीं, यह जानने के लिए उस से फोन पर बात की, ‘‘जेबा, तुम मुझ से शादी करने के लिए तैयार तो हो न? तुम्हारे अम्मीअब्बा ने तुम पर कोई दबाव तो नहीं डाला है न?’’

जेबा ने कहा, ‘तुम ऐसा सवाल क्यों कर रहे हो? मैं बहुत खुश हूं. मुझ पर किसी ने कोई दबाव नहीं डाला है.’

‘‘तुम्हारे मामा मेरी चाची के पास आए थे और बोल रहे थे कि तुम अपने किसी रिश्तेदार से प्यार करती हो और उस के साथ घर से भाग गई थी.’’

‘मेरे मामा झूठ बोल रहे हैं. वे मेरे सगे मामा नहीं हैं, बल्कि मेरी अम्मी के दूर के भाई हैं. दरअसल, वे अपने साले के बेटे से मेरी शादी कराना चाहते थे. मैं ने और मेरे घर वालों ने मना कर दिया तो वे मुझे बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं.’

जेबा की यह बात सुन कर अनवर के दिल को ठंडक पहुंची. इस के बाद उस ने जेबा के घर के दूसरे लोगों से बात की. सब ने यही बताया कि जेबा अपनी मरजी से शादी के लिए तैयार हुई है.

शादी से पहले अनवर और जेबा चाची के घर मिले थे और इस रिश्ते से खुश थे. अनवर ने जेबा को बताया, ‘‘मैं मुंबई में रहता हूं और मेरा बेकरी का कारोबार है, जिस में अच्छीखासी कमाई है. वैसे, हमारी काफी जमीनजायदाद है. घर में किसी बात की कोई कमी नहीं है.

‘‘मैं ने एमकौम तक पढ़ाई की है. घर में 4 भाई और 2 बहनें हैं. मेरी मां बचपन में ही इस दुनिया से रुखसत हो गई थीं. बड़े 2 भाई डाक्टर हैं. उन की शादी हो गई है. एक बहन की भी शादी हो गई है. मेरी उम्र 30 साल है.’’

जेबा ने भी अपने घर की जानकारी इस तरह दी, ‘‘मेरे अब्बा खेती करते हैं. 3 भाई हैं. एक भाई की शादी हो गई है, जो देहरादून में रहते हैं और वहां एक दुकान चलाते हैं. 2 भाई छोटे हैं. वे अभी पढ़ाई कर रहे हैं.

‘‘मैं और मेरी एक बड़ी बहन दोनों ने पिछले साल ही इंटर पास किया है और उस का रिश्ता नेहटोर शहर में तय हो गया है. हम दोनों बहनों की शादी एकसाथ ही होगी.’’

फिर वह समय भी आ गया और 19 मई, 2010 को जेबा और अनवर की शादी हो गई. अनवर के मुकाबले जेबा बहुत खूबसूरत थी. शादी के सुर्ख जोड़े में वह किसी हूर से कम नहीं लग रही थी. गुलाबी होंठ, सुर्ख गाल, बड़ीबड़ी आंखें, गदराया बदन, जिसे देख कर वह अपने होश ही खो बैठा था.

उन दोनों ने रातभर एकदूसरे से खूब प्यार किया. प्यार में रात कब गुजर गई, पता ही नहीं चला. सुबह के 8 बज चुके थे. जेबा के फोन की घंटी बजी. अनवर ने स्पीकर औन कर के जेबा को फोन दिया.

जैसे ही जेबा ने ‘हैलो’ बोला, उधर से किसी लड़के की आवाज आई, ‘जानू, हमें छोड़ कर चली गई. शादी मुबारक हो. हम तो तुम्हारी याद में सो ही नहीं पाए.’

जेबा ने तुरंत फोन काट दिया. अनवर का खिलता हुआ चेहरा अचानक मुरझा गया. उस ने दबी आवाज में पूछा, ‘‘कौन था?’’

जेबा ने अनवर का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, ‘‘यह लड़का मुझे काफी समय से ऐसे ही फोन करता है. मैं नहीं जानती इसे.’’

जेबा के इस जवाब से अनवर की जान में जान आई कि जेबा उस से प्यार नहीं करती है और वह कोई बदतमीज लड़का है, जो जेबा को परेशान करता है.

शादी को 2 महीने ही गुजरे थे. अनवर को वापस मुंबई जा कर अपना काम संभालना था. जेबा उदास हो गई.

अनवर ने उस से कहा, ‘‘मैं तुम्हें जल्दी ही वहां बुला लूंगा.’’

अगले दिन अनवर मुंबई के लिए रवाना हो गया. 10 दिन बाद ही उस ने जेबा को अपने भाई के साथ मुंबई आने के लिए कह दिया.

जेबा के मुंबई आते ही उन दोनों की जिंदगी की गाड़ी पटरी पर आ गई. समय गुजरता रहा. जेबा 2 बेटियों की मां बन गई थी. बड़ी बेटी का नाम अजमी और छोटी बेटी का नाम अमरीन रखा गया.

समय गुजरता गया. अनवर काम में इतना बिजी रहा कि उसे गांव जाने का मौका ही नहीं मिला.

एक दिन जेबा ने अनवर से कहा, ‘‘मैं दिल्ली में अपनी बहन से मिलने जाना चाहती हूं.’’

अनवर ने कहा, ‘‘तुम अकेले कैसे जाओगी?’’

जेबा बोली, ‘‘अम्मी आ जाएंगी. उन के साथ बहन से भी मिल लूंगी और दिल्ली भी घूम लूंगी. बस, तुम मेरा और अम्मी के जाने का टिकट निकलवा दो.’’

2 दिन के बाद जेबा की अम्मी उसे लेने आ गईं और अनवर ने उन के दिल्ली जाने के 2 टिकट ट्रेन के निकलवा दिए. जेबा को घूमने और खर्च के लिए 20,000 रुपए दे दिए. वे दोनों दिल्ली चली गईं.

अगले ही दिन जेबा के अब्बू का फोन अनवर के पास आया और वे बोले, ‘जेबा की अम्मी वहां आई हैं क्या?’

यह सुन कर अनवर हैरान रह गया और बोला, ‘‘क्यों, आप को नहीं पता कि वे जेबा को लेने यहां आई हैं? जेबा अपनी बहन से मिलने के लिए अम्मी के साथ दिल्ली के लिए चली गई है.’’

‘जेबा की अम्मी ने हमें कुछ नहीं बताया. वह बोली थी कि मैं नजीबाबाद जा रही हूं, पर वह मुंबई पहुंच गई और जेबा की बहन अभी दिल्ली में नहीं है, वह अपनी सुसराल नेहटोर आई हुई है.’

अनवर ने जेबा को फोन लगाया और उस से पूछा, ‘‘क्या तुम दिल्ली पहुंच गई हो?’’

जेबा बोली, ‘हां, मैं तो सुबह ही पहुंच गई थी.’

अनवर ने पूछा, ‘‘इस समय कहां हो? तुम्हारी बहन तो अपनी सुसराल में गई हुई है.’’

जेबा बोली, ‘मेरे दूर के मामा हैं. मैं उन्हीं के घर पर हूं.’’

यह सुन कर अनवर को सुकून मिला. 2-3 दिन दिल्ली घूम कर जेबा मुंबई के लिए रवाना हो गई. उसे छोड़ने उस की अम्मी भी आई थीं और 2 दिन बाद ही वे वापस चली गई थीं.

एक दिन अनवर अपनी पासबुक की ऐंट्री कराने बैंक गया, तो अपने खाते में से निकले एक लाख रुपए देख कर दंग रह गया. उस ने बैंक मैनेजर से इस की शिकायत की, तो वे बोले, ‘‘तुम्हारे पैसे एटीएम से निकाले गए हैं.’’

अनवर बोला, ‘‘एटीएम के पिन नंबर की जानकारी मुझे और मेरी बीवी के अलावा किसी और को नहीं है. मैं ने निकाले नहीं और बीवी भी मुझे बिना बताए निकालेगी नहीं.’’

मैनेजर बोले, ‘‘तुम अपनी बीवी से मालूम करो.’’

अनवर ने उसी समय जेबा को फोन लगाया, तो वह मना करने लगी. अनवर ने हैरान होते हुए कहा, ‘‘फिर तो पुलिस को बताना पड़ेगा.’’

यह सुन कर जेबा घबरा कर रोते हुए बोली, ‘‘मैं ने निकाले हैं. मेरी एक सहेली को 50,000 रुपए की जरूरत थी और 50,000 रुपए मैं ने अपनी बड़ी बहन को दिए हैं.’’

जेबा का रोना देख कर अनवर को उस पर तरस आ गया और उस ने इस बात को यहीं खत्म कर दिया.

एक शाम को अनवर अपने घर जा रहा था कि एक औरत ने रास्ते में उसे रोक लिया और बोली, ‘‘मुझे और मेरे बच्चों को मार दो.’’

यह सुन कर अनवर ने हैरान हो कर पूछा, ‘‘क्यों? क्या हुआ?’’

वह औरत बोली, ‘‘मैं आदिल इलैक्ट्रिशियन की बीवी हूं. ये मेरे बच्चे हैं. तुम्हारी बीवी खूबसूरत है, इस का यह मतलब नहीं है कि वह किसी और के शौहर को अपने प्यार के जाल में फंसा कर उस के बीवीबच्चों की जिंदगी बरबाद करेगी.’’

अनवर ने उस से कहा, ‘‘साफसाफ बताओ कि बात क्या है?’’

वह औरत बोली, ‘‘तुम्हारी बीवी का मेरे शौहर से नाजायज रिश्ता है. अगर तुम उसे रोक नहीं सकते हो, तो हम सब को मार दो.’’

उस औरत की यह बात सुन कर अनवर को गुस्सा आया. उस ने घर जा कर जेबा से इस बारे में पूछा, तो उस ने अपनी पोल खुलते देख हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘मुझे माफ कर दो. मैं बहक गई थी.’’

अनवर जेबा से बहुत ज्यादा मुहब्बत करता था, इसलिए उस की इतनी बड़ी गलती को भी उस ने माफ कर दिया.

इसी बीच जेबा और उस की अम्मी अनवर की जायदाद में से हिस्सा मांगने की बात करने लगी थीं. वे गांव का बाग बेचने पर जोर दे रही थीं. बाद में बाग बेचने के बाद जो फ्लैट खरीदा था, उस के बाद भी 20 लाख रुपए घर पर बच गए थे.

दिन गुजरते गए. एक दिन अनवर दूध पी कर घर से निकला और अपनी बेकरी पर आ कर बैठा ही था कि उस की आंखें बंद होने लगीं. हाथपैर कांपने लगे. कुछ ही पलों में वह बेहोश हो कर गिर गया. रात के 8 बजे जब उसे होश आया, तो अपनेआप को बेकरी के एक कमरे में पाया.

अनवर के पार्टनर ने उस से पूछा, ‘‘क्या हुआ? क्या खाया था?’’

अनवर ने कहा, ‘‘मैं तो सिर्फ घर से दूध पी कर निकला था. बेकरी पर आ कर बैठा तो मेरी आंखें खुद ब खुद बंद होने लगीं, हाथपैर कांपने लगे.’’

‘‘क्या तुम्हारे घर पर कोई टैंशन चल रही है?’’

अनवर ने पूरी बात बता दी. पार्टनर ने कहा, ‘‘अपनी बीवी के कुछ नाम नहीं करना. अगर कर दिया तो तुम्हारा खेल खत्म. ध्यान रखो कि घर पर कुछ मत खाना. तुम्हें दूध में नशा मिला कर दिया गया है और काफी दिनों से दिया जा रहा है. तुम पुलिस में शिकायत दर्ज कर दो.’’

अनवर जेबा को खोना नहीं चाहता था. वह जानता था कि अगर पुलिस के पास गया तो जेबा और भड़क जाएगी.

अगले दिन जब अनवर सो कर उठा, तो उस के 20 लाख रुपए अलमारी से गायब हो चुके थे.

अनवर ने जब जेबा की अलमारी की तलाशी ली, तो उस में रखे जेवर भी नहीं थे. यह देख कर वह सदमे से वहीं गिर गया. जब उस की आंखें खुलीं, तो उस की दोनों बेटियां उस के पास बैठी थीं. जेबा और उस की अम्मी भी वहीं थीं.

अनवर ने जेबा और उस की अम्मी के हाथ जोड़े, पैर पकड़े कि उस का पैसा दे दो, जेवर दे दो, पर उन्होंने साफ कह दिया कि इस बारे में उन्हें कुछ नहीं मालूम है. अगले ही दिन अनवर ने जेबा की अम्मी को वहां से उन के घर भेज दिया.

गाड़ी में बिठाने के बाद अनवर अपने काम पर चला गया और शाम को घर आया, तो जेबा ने उस से बात नहीं की और अपने कमरे में घुसने भी नहीं दिया. वह कई दिनों तक ऐसा ही करती रही.

अब जेबा जिम से 1-2 नहीं, बल्कि 3-4 घंटे में वापस आती थी. न बच्चों को खाना मिलता और न घर का कोई काम होता था. उन की पढ़ाईलिखाई भी नहीं हो पाती थी.

इसी बीच डाक्टर ने अनवर को आराम करने की सलाह दी. वजह, उसे हलका सा दिल का दौरा पड़ा था. पर जेबा को इस बात की कोई चिंता नहीं थी.

अनवर ने जेबा से गांव चलने को कहा, पर उस ने साफ मना कर दिया. अनवर अकेला ही गांव चला गया. घर वाले उस की हालत देख कर हैरान थे.

अभी अनवर को गांव आए हुए 3 दिन ही हुए थे कि एक दिन उस के फोन की घंटी बजी. उस ने फोन उठाया, तो दूसरी तरफ से कोई नहीं बोला.

फोन स्पीकर पर था. साफ आवाज आ रही थी, जो अनवर की सास, जेबा और बच्चों की थी. अनवर ने वहां से आ रही है हर आवाज को रिकौर्ड कर लिया. अनवर की सास और जेबा की हर करतूत और प्लानिंग फोन रिकौर्ड हो गई थी.

अगले दिन अनवर ने फोन कर के जेबा को गांव आने को कहा और साथ ही यह भी कह दिया कि अगर तुम गांव वापस नहीं आओगी, तो मैं यहीं बिजनौर में तुम्हारी पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दूंगा. पुलिस तुम दोनों मांबेटी को खुद पकड़ कर लाएगी.

यह सुन कर जेबा घबरा गई और जल्दी ही आने की बोल दी. अनवर खुश था. जोकुछ हो गया था, वह उसे भूलना चाह कर अपने गांव में ही एक नई जिंदगी शुरू करना चाहता था.

कुछ दिन तक तो सब ठीक रहा, फिर अचानक जेबा की बूआ की बेटी अनवर के घर पर आने लगी और हर समय घर पर ही पड़ी रहती. अनवर सोने के इंतजार में इधरउधर भटकता रहता था. फिर उस ने कड़े मन से उसे घर न आने को कहा. पर अब जेबा हर समय उन के घर जाने लगी.

अनवर एक दिन बाजार से घर लौटा तो देखा कि जेबा घर में नहीं थी. उस ने अपने अब्बा से मालूम किया तो वे बोले कि शायद अपनी बूआ के घर गई है.

वह वहां गया और दरवाजे पर खड़ा हो कर उन की बातें सुनने लगा.

जेबा का फुफेरा भाई बोल रहा था, ‘‘जेबा, तुम दिल्ली में शिफ्ट हो जाओ, पर रूम लेने के लिए तुम्हारा आधारकार्ड चाहिए.’’

अनवर ने जब यह बात सुनी, तो उसे गुस्सा आ गया और वह जेबा को वहां से ले आया और उसे हिदायत दी कि अब उन के घर नहीं जाना.

कुछ दिन बाद जेबा फिर उन के घर गई. अनवर उसे फिर बुला लाया और अपनी बड़ी बेटी को बाजार घुमाने के बहाने ले गया और उस से पूछा, ‘‘बेटा, तुम्हारी अम्मी वहां क्या बात कर रही थीं?’’

बेटी ने बताया, ‘‘अब्बा, वहां पर दादू को कुछ दे कर मारने की बात चल रही थी. वे लोग अम्मी से कह रहे थे कि अपने ससुर को मार डालो, फिर सारी जायदाद तुम्हारे शौहर के नाम आ जाएगी. उस के बाद इसे बहलाफुसला कर मुंबई ले जाना, फिर इसे भी मार देना और ऐश करना.’’

इतना सुन कर अनवर को गुस्सा आ गया. वह जेबा की बूआ के घर गया और उन्हें बोला, ‘‘जेबा को उलटीसीधी पट्टी पढ़ाने की कोई जरूरत नहीं है.’’ अनवर घर लौट आया. अभी कुछ ही देर हुई थी कि उस की सास काफोन आया और वे उसे उलटासीधा बोलने लगीं.

इधर जेबा ने भी घर सिर पर उठा लिया. अनवर ने पुलिस बुला ली, पर जेबा ने उन की एक न सुनी और बोली, ‘‘मुझे मेरे मामा के घर छोड़ दो. मेरी अम्मी भी वहीं हैं, वरना मैं खुदखुशी कर लूंगी.’’

पुलिस वाले अनवर और जेबा को थाने ले गए. कुछ देर में जेबा की अम्मी भी वहां आ गईं और जेबा को अपने साथ ले गईं.

कुछ ही देर में अनवर के भाई वहां आ गए और वे उसे भी वहां से ले आए. कई दिन गुजर गए. एक दिन जेबा के मामा अनवर से मिलने उस की चाची के घर आए, पर वह उन से नहीं मिल पाया तो वे उस की बड़ी बेटी से बात करने लगे. बेटी ने उन्हें वह बताया, जो अनवर भी नहीं जानता था.

बेटी बोली, ‘‘अम्मी गंदी हैं. एक अंकल के साथ गंदे कपड़े पहन कर लेटती हैं और जब कहीं बाहर खाने जाती थीं तो मुझे भी अपने साथ ले जाती थीं और अंकल से खूब गले मिलती थीं और दोनों गंदीगंदी बातें करते थे. अम्मी अब्बा को मारना चाहती थीं. वे उन के दूध में कुछ मिलाती थीं.’’

अनवर ने जब अपनी बेटी से जेबा की करतूतों के बारे में पूछा, तो उस ने सारी बातें उसे बता दीं. जेबा और उस की मां अब कहां थीं, किसी को कुछ नहीं मालूम था. अब बात कोर्ट तक पहुंच गई थी.

कई महीने ऐसे ही गुजर गए, पर अनवर के पास कोई नोटिस नहीं आया. बाद में जेबा केस की तारीख पर भी हाजिर नहीं हुई, तो वह केस भी खारिज हो गया. अनवर अपनी बेटियों के साथ खुश था और अब जेबा को भूलने लगा था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी : काशी की ली सुध या साधा सियासी निशाना

अपने समय के दिग्गज समाजवादी नेता डाक्टर राममनोहर लोहिया का धर्म की राजनीति के बारे में कहना था कि राजनीति अल्पकालिक धर्म है और धर्म दीर्घकालिक राजनीति है. समाजवादियों ने तो इस गहरी बात के माने कभी समझे नहीं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 18 जून, 2024 को एक बार फिर से काशी में देख कर लगा कि डाक्टर राममनोहर लोहिया गलत नहीं कह गए थे. वैसे, उन के सच्चे अनुयायी तो अब दक्षिणपंथी हो चले हैं, जिन्होंने धर्म और राजनीति में फर्क ही खत्म कर रखा है.

4 जून, 2024 को आम लोकसभा चुनाव के नतीजे देख कर सकपका तो नरेंद्र मोदी भी गए थे कि हे राम, यह क्या हो गया. इसी सदमे में उन्होंने बेखयाली में शपथ वाले दिन संविधान को माथे से लगा भी लिया था, जो अल्पकालिक धर्म था. फिर 13 दिनों के मंथन के बाद वे दीर्घकालिक राजनीति वाले फार्मूले पर आ गए.

इसी बीच गम कम करने की गरज से उन्होंने एक चक्कर विदेश का भी लगा लिया, जिस के बारे में एक दक्षिण भारतीय वामपंथी ऐक्टर प्रकाश राज के नाम से किसी शरारती तत्त्व ने सटीक टिप्पणी यह वायरल कर दी कि 70 सालों में पहली बार कोई प्रधानमंत्री महज एक सैल्फी लेने के लिए विदेश गया.

इटली में आयोजित जी-7 सम्मेलन में भारत की मौजूदगी औफिशियल नहीं थी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शायद देश में ‘प्रधान सेवक’ होने जैसी फीलिंग पूरी तरह नहीं आ रही थी, इसलिए इटली जा कर उन्होंने अपना खोया हुआ आत्मविश्वास हासिल किया.

वहां नरेंद्र मोदी कई बड़े नेताओं से मिले और उन्हें बताया कि दुनिया के सब से बड़े लोकतांत्रिक चुनाव में हिस्सा लेने के बाद इस सम्मेलन का हिस्सा बनना बहुत संतुष्टि की बात है. मेरा सौभाग्य है कि जनता ने मुझे तीसरी बार देश की सेवा करने का अवसर दिया है.

यह पक्का करने के बाद कि दुनिया के इन राष्ट्र प्रमुखों और पूरी दुनिया को उन के तीसरी बार भारत का प्रधानमंत्री बनने की तसल्ली हो गई है, तो वे दिल्ली होते हुए सीधे गंगा किनारे काशी जा पहुंचे.

वहां नरेंद्र मोदी पहले के मुकाबले थोड़ा सहज दिखे, फिर भी यह कसक छिपाए न छिपी कि बस, डेढ़ लाख वोटों से ही जीते, वरना बात तो 8-10 लाख की हो रही थी.

धर्म की कई खूबियों में से एक यह भी होती है कि वह दुख भुलाने में लोगों की मदद करता है. भगवान की शरण में जा कर महसूस होता है कि अच्छा हो या बुरा, सबकुछ इसी का कियाधरा होता है. वह जो करता है, भले के लिए करता है, उस की मरजी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता और लाख टके की बात, गीता का यह सार याद आ जाता है कि, ‘तू क्या ले कर आया था और क्या ले कर जाएगा. तेरा क्या है जो तू शोक करता है. हानिलाभ, जीवनमरण, यशअपयश विधि के हाथ… इस ज्ञान के आगे घोर नास्तिकों की नास्तिकता भी विसर्जित होने लगती है,

तो आस्तिकों की बिसात क्या जो एकदम झूम उठते हैं. ये धार्मिक बातें भरम मिटाती हैं या बढ़ाती हैं, इस का जवाब दोनों में से कुछ दिया जाए तो नतीजा यही निकलता है कि भरम न तो मिटता है, न बढ़ता है, बल्कि वैसा का वैसा रहता है. हां, उस के होने का एहसास नहीं होता.

यह ज्ञान पेनकिलर दवा जैसा होता है, जिन के असर से दर्द खत्म नहीं होता, उस का महसूस होना खत्म हो जाता है. बकौल कार्ल मार्क्स, धर्म अफीम का नशा.

तो शिव की नगरी आ कर नरेंद्र मोदी ने 13 दिनों बाद ज्ञान की गंगा, गंगा किनारे बहाई, औफलाइन भी और औनलाइन भी बहाई, जहां ज्ञान समुद्र के पानी की तरह दिनरात बहता रहता है और कभीकभी तो ज्ञान का तूफान भी आता है. मोदीजी ने हिंदी और इंगलिश दोनों भाषाओं में ज्ञान सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर भी दिया.

जैसे ही उन्होंने धार्मिक गेटअप धारण किया, वैसे ही वे 4 जून से पहले के प्रधानमंत्री लगने लगे. उन्हें इस नवकंज लोचन कंजमुख कर… टाइप मनभावन, मनमोहक रूप में देख ‘टाइगर जिंदा है’ की तर्ज पर भक्तों में भी खुशी की लहर दौड़ गई. थोड़ी देर में ही ‘हरहर गंगे’ और ‘भोलेनाथ’ के नारे लगने लगे.

एक बार फिर घंटेघडि़याल बजने लगे, भजनआरतीपूजन होने लगे, जिस से देश, देश जैसा लगने लगा. सब से पहले उन्होंने गरीब किसानों को पैसा बांटा, ठीक वैसे ही जैसे जीत के बाद चक्रवर्ती सम्राट टाइप के राजा जनता से इकट्ठा किए खजाने का थोड़ा सा मुंह जनता पर ही एहसान थोपते हुए खोल देते थे, ताकि वह ओवरफ्लो न हो.

फिर शुरू हुईं मुद्दे की बातें, मसलन मुझे मां गंगा ने गोद ले लिया है, अब मैं यहीं का हो गया हूं. यहीं का दिखने की जरूरी शर्तें पूरी करने के लिए उन्होंने गंगा आरती भी की, फिर दशाश्वमेघ घाट भी गए और विश्वनाथ मंदिर भी गए. वहां उन्होंने न मालूम वजहों के चलते इस बार षोडशोपचार पूजा की, जो सनातन धर्म का एक कठिन पूजन है. इस में 16 चरणों में पूजन संपन्न होता है. इस तरह भगवान और काशी के लोगों का धन्यवाद उन्होंने एकसाथ कर दिया.

काशीवासियों को भी यह यकीन हो गया कि ये वही मोदीजी हैं, जो सारी समस्याओं का हल भगवान पर डाल कर चलते बनते हैं. डेढ़ लाख से जिताओ या 10 लाख से, इन्हें इस से कोई सबक नहीं मिलता. 370 दे दो या 241 सीटें दे दो, ये देश और जनता की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने की भूल नहीं करते. हां, राज करने के लिए जरूर सैक्युलरों का एहसान ले लेते हैं, जिस से कम्युनलों का भरोसा कायम रहे.

140 करोड़ लोगों को यह मैसेज दे कर कि अब तुम्हारा भगवान ही मालिक है, वापस दिल्ली उड़ गए. धर्म की असल खूबी यही है कि यह जिम्मेदारियों से बच निकलने के लिए तंग और संकरी गलियां ही नहीं, बल्कि लंबेचौड़े हाईवे मुहैया करा देता है. उन के जाने के बाद जब धरमकरम की धूल छंटी तो लोगों को सम?ा आया कि मोदीजी इसी दफा उन के हुए हैं, 10 साल से गैर थे. इस के पहले काशी के लोग महान नहीं थे और न ही लोकतंत्र इतना मजबूत था जितना कि 4 जून को हुआ.

यही बात जो वाकई बड़ा सच है, उन्होंने इटली में विदेशी शासकों को भी बताई थी, बल्कि गए शायद यही बताने के लिए थे कि इस बार भारतीय लोकतंत्र मजबूत हुआ है. बात सच इस लिहाज से है कि 234 सीटों के जरीए जनता ने विपक्ष को मजबूती दे दी है, जो किसी भी लोकतंत्र को मजबूत बनाती है.

अब क्या होगा, इस का किसी को अंदाजा नहीं, क्योंकि सरकार एक बेमेल गठबंधन की है. इस के सहयोगी मां गंगा की गोद और पूजापाठ में भरोसा नहीं करते. लिहाजा, धरमकरम एक हद तक ही वे बरदाश्त कर पाएंगे. लगता नहीं कि वे देश और जनता को भगवान भरोसे छोड़ने के रिस्क पर राजी होंगे, लेकिन मोदीजी ने अपनी तरफ से वतन ऊपर वाले के हवाले कर दिया है.

मेरे ससुराल वाले लालची है वो हमेशा पैसा खर्च की बात करते है, इस समस्या का हल बताएं?

सवाल

मैं 22 साल की हूं और जल्दी ही मेरी शादी होने वाली है. लड़का सरकारी नौकरी करता है और अच्छे स्वभाव का भी है. पर मुझे उस लड़के के मांबाप थोड़े लालची किस्म के इनसान लगे. वे हर बात में यह कहने की कोशिश करते हैं कि मेरे मातापिता को शादी में कहां और कितना पैसा खर्च करना चाहिए.

मुझे यह बात बहुत ज्यादा अखर रही है. क्या हमें आंखों देखी मक्खी निगलनी चाहिए? मुझे समझ नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूं? इस बात से मुझे तनाव रहने लगा है. मेरी इस समस्या का हल कैसे निकलेगा?

जवाब

यह इतनी बड़ी समस्या नहीं है कि आप तनाव पालें. अगर लड़के वाले कुछ मांग नहीं रहे हैं, तो वे लालची किस बिना पर हुए? शादीब्याह की बातों में दोनों पक्ष एकदूसरे के खर्चे की बाबत सलाह देते और लेते हैं. अपने घर के बड़ों पर भरोसा रखें. वे सब मैनेज कर लेंगे. जब आप को ऐसा लगे कि अलग से कुछ मांग की जा रही है, तभी कोई कदम उठाएं.

वैसे, लगता ऐसा है कि आप अपने मांबाप को बहुत चाहती हैं, इसलिए यह आप को पसंद नहीं आ रहा है कि कोई उन्हें इस तरह सलाह दे. इसे आंखोंदेखी मक्खी निगलना न सम?ों. मुमकिन है कि लड़के के मांबाप सही बात कह रहे हों. हर शादी में थोड़ीबहुत ऐसी चिकचिक होती है, इसलिए इतमीनान से शादी की तैयारियां करें और कुछ गड़बड़ लगे तो अपने होने वाले पति से बात करें.

 

सनी लियोनी का एडल्ट स्टार से लेकर एक अच्छी मां बनने का सफर है बहुत खूबसूरत

एडल्ट स्टार सनी लियोनी एक खूबसूरत एक्ट्रेस और भारत के गूगल में ज्यादा सर्च करें जानें वाली फिल्म स्टार है. सनी लियोनी जिस तरह अपना करियर शुरु किया उसने सभी को चौंका कर रख दिया. उसके बाद शादी का निर्णय लेकर भी उन्होंने सबको हैरान कर दिया. ऐसा ही सनी ने सबकों मां बनकर भी चौंकाया. कि उन्होंने एक बच्ची को अडौप्ट किया. जिसे अपना नाम भी दिया.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sarassalil (@sarassalil_magazine)


सनी लियोनी लातूर में रहने वाली निशा से मिलीं तो उन्हें लगा कि यही है वो बच्ची है जिसका उन्हें सालों से इंतजार था. निशा उनकी जिंदगी में आई और बन गई निशा कौर वेबर. जिसके बाद सनी एक बच्चे की मां बन गई. इस कदम के चलते सनी को एक तरफ तो बहुत सी तारीफें मिलीं, वहीं ट्रोल करने वालों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा.

एडल्ट फिल्म स्टार की जो छवी सनी बहुत पीछे छोड़ आईं थीं, लोगों ने उसे सोशल मीडिया पर ट्रोल करने के लिए बारबार इस्तेमाल किया. लेकिन कहते हैं ना, मां का दिल जितना कोमल होता है, उतना ही मजबूत भी होता है.  सनी ने इन ट्रोलर्स का मुकाबला करते हुए, कुछ ही दिनों में अपने घर दो और बच्चों का स्वागत किया.

ये दोनों बच्चे नोआ सिंह वेबर और अशर सिंह वेबर सेरोगेसी से जन्मे हैं.जब इनका जन्म हुआ, सनी ने सोशल मीडिया पर अपने तीनों बच्चों समेत एक फोटो के साथ पूरी दुनिया को इस खबर के बारे में बताया. सनी अपने बच्चों को शुरू से ही मीडिया फ्रेंडली बनाएं हुए हैं.

सनी की लाइफ में तीन बच्चों के आने के बाज उनकी करियर चौइसेज भी काफी बदल गईं. अब वो अच्छे रोल्स और अच्छी स्क्रिप्ट्स पर फोकस करने लगी हैं. इस बीच वो अपने बच्चों के साथ भी भरपूर समय बिताती हैं, जिससे वो उन्हें सही परवरिश दे सकें.

सनी लियोनी अपने बच्चों को एक अच्छी परवरिश के साथ अच्छे तौर-तरीके भी सिखा रही हैं. सिर्फ हिंदुस्तानी ही नहीं, पूरी दुनिया से बच्चों की परवरिश के अच्छे तरीके सनी और डेनियल आजमाते हैं. जिन लोगों को आज भी सनी लियोनी के अच्छी मां होने पर शक है और जो उन्हें आज भी उनकी लाइफ चौइसेज के लिए ट्रोल करते हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि उनकी सोच से सनी को कोई फर्क नहीं पड़ता. वो अपने परिवार , करियर और बच्चों के साथ अपनी लाइफ एन्जौय कर रही हैं.

बिग बौस OTT 3 को मिला नया ट्विस्ट : आ रही है ये सैक्सी वाइल्ड कार्ड कंटेस्टेंट

विवादित शो बिग बौस ओटीटी 3 धमाकेदार चल रहा है शो में अबतक कई एविक्शन हो चुके हैं, वहीं शो में सबके नएनए राज खुलकर सामने आ रहे है. सभी कंटेस्टेंट अच्छा खेलते दिख रहे हैं . शो में ओर तड़का लगाने के लिए मेकर्स ने वाइल्ड कार्ड एंट्री कराने की सोची है. जो शो को और मजेदार बना देगी. बता दें वाइल्ड कार्ड एंट्री में फीमेल कंटेस्टेंट आने वाली है.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sarassalil (@sarassalil_magazine)


इस बार शो में सोशल इन्फ्लुएंसर ज्यादा नजर आ रहे है. इसी को देखते हुए वाइल्ड कार्ड एंट्री भी एक मौडल के साथ साथ सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर है. जो कि अपनी बोल्ड फोटोज को लेकर ज्यादा पौपुलर है नाम है ब्रिष्टि समद्दार.

ब्रिष्टि समद्दार सोशल मीडिया पर हमेशा सैक्सी फोटोज और वीडियोज शेयर करती है. फैंस उनकी इसी अदा पर फिदा है. ब्रिष्टि समद्दार वेस्ट बंगाल की रहने वाली हैं. ब्रिष्टि रीजनल सिनेमा का हिस्सा रह चुकी है. मगर उन्हें पॉपुलैरिटी बोल्ड तस्वीरों से मिली.

हालांकि जब से सोशल मीडिया पर लोगों को पता चला है कि बिग बौस ओटीटी 3 में ब्रिष्टि समद्दार आ रही है तो लोगों ने उन्हें ट्रोल करना शुरु कर दिया है. लोग उन्हें तरहतरह के कमेंट्स कर रहे है और भड़क रहे है. एक ने कहा- नहीं प्लीज, इनका प्रोफाइल देखो, बिग बॉस को कोई पोटेंशियल कंटेस्टेंट लेकर आना चाहिए, ऐसे छपरी को नहीं लेकर आना चाहिए.

एक ने कहा- इससे अच्छा तो राखी को ले आते. एक अन्य यूजर ने कहा- लो, एक और छपरी. एक और यूजर ने कहा- लोग बीबी फैन से बीबी हेटर में बदल जाएंगे, भूलकर भी मत करो. एक यूजर ने लिखा- प्लीज बिग बौस, प्लीज ऐसी घटिया स्टफ मत लेकर आओ, मैं हमेशा से बिग बौस की फैन रही हूं और हर साल देखती हूं लेकिन जो क्वॉलिटी ये ओटीटी पर लेकर लोग आए हैं वो सचमुच बेहद घटिया है.

इनके अलावा शो में चंद्रिका दीक्षित, रणवीर शौरी, नैजी, सना मकबूल, सना सुल्तान, विशाल पांडे, लव कटारिया , पौलमी दास, साई केतन, मुनीषा खटवानी, शिवानी कुमारी और नीरज गोयत कंटेस्टेंट शामिल हैं.

नहीं चाहते हैं जल्दी बुढापा, तो आज से ही डाइट में कम करें शुगर

बौडी को फिट रखने के लिए ये जरूरी है कि अपनी डाइट को सही रखें, क्योंकि इससे आप लंबे समय तक जवान दिखेंगे. कई लोग ज्यादा मीठा खाना पसंद करते हैं इसलिए अपने खाने में शुगर का लेवल ज्यादा रखते हैं, लेकिन ऐसा करने से आपके शरीर को कई नुकसान हो सकते हैं.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sarassalil (@sarassalil_magazine)


लो शुगर लेने से आपको कई फायदे हो सकते हैं, आप स्किन की केयर भी अच्छी तरह से कर सकते हैं. जो आपको जवां रखने के लिए काफी फायदेमंद है. इसलिए आज से ही खाने में या चाय में चीनी की मात्रा कम कर दें, आपकी सेहत हो जाएगी फिट.

कम चीनी खाना लड़को के लिए ज्यादा फायदेमंद माना गया है. उनको ड्रिंक्स का सेवन नहीं करना चाहिए जिनमे शुगर ज्यादा मात्रा में हो.

– खाने में चीनी कम डालने से होगा वेट लौस

चीनी में कैलोरीज की मात्रा बहुत ज्यादा होती है. अगर आप शुगर कम लेंगे, तो आपका वेट जल्दी लौस होने लगेगा. इससे आप मोटापे का शिकार नहीं होंगे.

– बौडी में एनर्जी लेवल को बढ़ाएगा

ज्यादा शुगर आपके शरीर के एनर्जी लेवल को घटाने का काम करता है अगर आप शुगर का इंटेक कम कर देते है तो बौडी का एनर्जी का लेवल बढ़ जाएगा. जिससे आप फुर्ती से कोई भी काम कर सकते है.

– चीनी कम खाने से स्किन रहती है ज्यादा हेल्दी

ज्यादा चीनी खाने से चेहरे पर बुढ़ापे के निशान जल्दी नजर आ सकते हैं. इसका कारण ग्लाइकेशन है. इसमे आपके फेस पर एक्ने, प्रीमैच्योर एजिंग, रिंकल्स और फाइन लाइंस जैसे स्किन से जुड़ी परेशानियां हो जाती है. इसलिए अगर खाने से शुगर कम कर देंगे तो स्किन की इन प्रौब्लम्स से बच सकेंगे.

– कम चीनी, शुगर लेवल रखेगा कंट्रोल

बहुत ज्यादा चीनी आपके टाइप 2 डायबिटीज का खतरा बढ़ा देती है. इसलिए चीनी कम करने से या बिलकुल कम करने से आपका इंसुलिन का लेवल कंट्रोल में रहता है.

– ब्लड प्रेशर रहता है बैलेंस

खाने से चीनी कम करने का सबसे ज्यादा फायदा ब्लड प्रेशर का लेवल इंप्रूव करता है. जिससे ने आपका ब्लड प्रेशर ज्यादा होगा, न कम होगा.

– लेजी नहीं महसूस होने देगा

डेली ज्यादा शुगर खाने से आपके शरीर में आलस और सुस्ती बढ़ जाती है. अगर आलस से दूर रहना चाहते हैं, तो खाने से चीनी की मात्रा को कम कर दें.

– डेंटल हेल्थ का रखता है ख्याल

चीनी का सबसे ज्यादा असर डेंटल पर पड़ता है ज्यादा चीनी का इंटेक दांतों को खराब कर देता है. दातों में कैविटी होने का कारण ज्यादा चीनी ही है. तो आज से चीनी कम खाना शुरु कर दें.

राहुल गांधी का संसद में बयान, क्यों बौखलाई भाजपा

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल गांधी का पहला भाषण ऐसा लगता है मानो भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर बिजली की तरह गिरा. राहुल गांधी के भाषण की जैसी प्रतिक्रिया देशभर में आई है, वह बताती है कि राहुल गांधी का एकएक शब्द लोगों ने ध्यान से सुना और भाजपा तो मानो चारों खाने चित हो गई. यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उठ खड़े हुए और उन्होंने सफाई दी.

अब भाजपा नेताओं, नरेंद्र मोदी सहित संघ ने मोरचा संभाला और कहा कि राहुल गांधी हिंदुओं को ऐसावैसा कह रहे हैं….देखिए… जबकि हकीकत यह है कि जिस ने भी राहुल गांधी का भाषण सुना है, वह जानता है कि राहुल गांधी ने भाजपा और संघ पर टिप्पणी की है और कहा कि हिंदू समाज ऐसा नहीं है मगर भरम यह फैलाया जा रहा है कि राहुल गांधी ने संपूर्ण हिंदू समाज को हिंसक कहा है जो सीधेसीधे गलत है.

दरअसल, भाजपा के काम करने का ढंग यही है कि वह बातों को तोड़मरोड़ देती है. इस का सब से बड़ा उदाहरण है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसद में खड़े हो कर के कहना कि राहुल गांधी हिंदुओं को हिंसक कर रहे हैं, जबकि राहुल ने क्या कहा, यह साफ है.

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोमवार, 1 जुलाई, 2024 को भाजपा पर देश में हिंसा, नफरत और डर फैलाने का आरोप लगाया और दावा किया, ‘ये लोग हिंदू नहीं हैं, क्योंकि 24 घंटे की हिंसा की बात करते हैं.’

राहुल गांधी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लाए गए धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा में भाग लेते हुए कहा, ‘हिंदू कभी हिंसा नहीं कर सकता, कभी नफरत और डर नहीं फैला सकता.’

राहुल गांधी ने जब भाजपा पर यह आरोप लगाया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की बौखलाहट साफ दिखाई दी. दोनों ने आपत्ति जताते हुए कहा कि कांग्रेस नेता ने पूरे हिंदू समाज को हिंसक कहा है.

राहुल गांधी ने भाजपा पर युवाओं, छात्रों, किसानों, मजदूरों, दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों में डर पैदा करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि भाजपा के लोग अल्पसंख्यकों, मुसलमानों, सिखों एवं ईसाइयों को डराते हैं, उन पर हमला करते हैं और उन के खिलाफ नफरत फैलाते हैं, लेकिन अल्पसंख्यक इस देश के साथ हैं.

नरेंद्र मोदी सामने आए

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा कि खुद को हिंदू कहने वाले हर समय ‘हिंसा और नफरत फैलाने’ में लगे हैं, जिस पर सत्ता पक्ष के सदस्यों ने जोरदार तरीके से विरोध जताया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सामने आए और कहा, “पूरे हिंदू समाज को हिंसक कहना बहुत गंभीर बात है.” हालांकि राहुल गांधी ने प्रतिक्रिया में कहा कि वे भाजपा की बात कर रहे हैं और भाजपा, नरेंद्र मोदी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूरा हिंदू समाज नहीं हैं.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सदन में कई बार भगवान शिव की एक तसवीर दिखाते हुए कहा कि वे अहिंसा और निडरता का संदेश देते हैं. सदन में राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा में भाग लेते हुए राहुल गांधी ने कहा, ‘सभी धर्मों और हमारे सभी महापुरुषों ने अहिंसा और निडरता की बात की है. वे कहते थे कि डरो मत, डराओ मत.’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सामने आया

संघ ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बयान पर आपत्ति जाहिर की. संघ की ओर से कहा गया कि हिंदुत्व को हिंसा से जोड़ना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है. विश्व हिंदू परिषद ने भी राहुल के भाषण की भर्त्सना की है. हिंदुत्व चाहे विवेकानंद का हो या गांधी का, वह सौहार्द्र व बंधुत्व का परिचायक है. हिंदुत्व के बारे में ऐसी प्रतिक्रिया ठीक नहीं है.

विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि लोकसभा में राहुल गांधी ने बहुत ही नाटकीय आक्रामकता से भरा भाषण दिया है. नेता प्रतिपक्ष के नाते शायद उन के पहले भाषण में अपनेआप को साबित करने का जोश होगा. इस दौरान वे बोल गए कि हिंदू समाज हिंसक होता है.

संघ के सुनील आंबेकर ने कहा कि संसद में जिम्मेदार लोगों द्वारा हिंदुत्व को हिंसा से जोड़ना दुर्भाग्यजनक है.
उन्होंने कहा कि जिस हिंदू समाज के भिक्षुक पैदल ही दुनिया का भ्रमण करते थे, अपने प्रेम से, तर्क से, करुणा से लोगों को हिंदू बनाते थे, उस समाज पर ऐसा आरोप लगाने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी.

कुलमिला कर राहुल गांधी के कथन से भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दोनों के हाथों के तोते उड़े हुए हैं.

कोठे से वापसी: शमा की उम्मीद

उस कोठे पर जो भी आता, शमा उस से यही उम्मीद लगाए रखती कि वह उस की मदद करेगा और उसे वहां से निकाल कर ले जाएगा. मगर कोई उस की फिक्र नहीं करता था और अपना मतलब निकाल कर चला जाता था. एक दिन शमा की कोठेदारनी चंद्रा को उस के भाग निकलने की योजना का पता चल गया.

‘‘अगर तू ने यहां से निकल भागने की कोशिश की, तो मैं तुझे काट डालूंगी. अरी, एक बार जो धंधे वाली बन जाती है, उसे तो उस के घर वाले भी वापस नहीं लेते हैं,’’ चंद्रा ने गुस्से में उबलते हुए कहा. शमा के कमरे से थोड़ी दूरी पर एक पान की दुकान थी. वह उस दुकान पर अकसर जाती थी.

एक दिन शमा ने पान वाले से कहा, ‘‘भैया, आप ही मुझे यहां से निकलवा दीजिए. मैं तवायफ नहीं हूं, मजबूरी में फंस कर यह सब…’’ पान वाले ने कहा, ‘‘मेरी इतनी ताकत नहीं है कि मैं तुम्हें यहां से निकलवा सकूं. हां, मेरे पास कमल और आरिफ आते हैं, वे तुम्हारी मदद जरूर कर सकते हैं.’’

शमा ने जब आरिफ और कमल का नाम सुना, तो उसे कुछ उम्मीद नजर आई. अब उस की आंखें हर पल आरिफ और कमल का इंतजार करने लगीं. एक शाम को आरिफ और कमल पान की दुकान पर आए, तो शमा भी दुकान पर पहुंच गई.

शमा बगैर किसी हिचक के उन से फरियाद करने लगी, ‘‘भैया, मैं तवायफ नहीं हूं. मैं यहां से निकलना चाहती हूं. आप ही मुझ बेसहारा, मजबूर लड़की की मदद कर सकते हैं. मैं आप के पास बहुत उम्मीद ले कर आई हूं.’’ ‘‘हम इस बारे में सोच कर बताएंगे,’’ कमल ने शमा को तसल्ली देते हुए कहा.

वहां से लौट कर उन दोनों ने आपस में बातचीत की और एक योजना बनाई. फिर कमल ने कोठे के एक दलाल से शमा को एक रात के लिए अपने पास रखने की बात की. दलाल ने जितनी रकम बताई, कमल ने फौरन अदा कर दी और उसे जगह बता दी.

वह आदमी उस महल्ले का काफी पुराना और भरोसेमंद दलाल था. हर कोठेदारनी उस पर भरोसा कर के उस के साथ लड़कियों को महल्ले से बाहर भेज देती थी. चंद्रा भी इनकार न कर सकी और रकम रखते हुए बोली, ‘‘तड़के ही शमा को वापस ले आना.’’

‘‘ठीक है,’’ दलाल ने अपनी मोटी गरदन हिलाते हुए कहा. रात को वादे के मुताबिक वह दलाल शमा को ले कर कमल के बताए पते पर पहुंच गया.

शमा ने जब वहां आरिफ और कमल को देखा, तो वह अपने बुलाए जाने का मकसद समझ गई और मन ही मन खुश हो गई. शमा को वहां छोड़ कर जब वह दलाल चला गया, तब आरिफ और कमल ने उस से अपने बारे में सबकुछ बताने को कहा.

शमा ने आराम से बैठते हुए बोलना शुरू किया, ‘‘साहब, मैं पश्चिम बंगाल की रहने वाली हूं. वहां मेरे पिता का अच्छा कारोबार है. मेरे 3 भाई और एक बहन है. भाइयों के भी अच्छे कारोबार हैं. बहन की शादी हो चुकी है. ‘‘कुछ महीने पहले हमारे घर में शीला नाम की एक औरत किराए पर रहने आई थी. कुछ ही दिनों में वह हमारे परिवार से घुलमिल गई थी. हम सब बच्चे उसे आंटी कह कर बुलाते थे.

‘‘एक शाम को मैं स्कूल से आ रही थी. एक सुनसान जगह पर एक गाड़ी आ कर मेरे पास रुकी. कुछ गुंडों ने मुझे उस गाड़ी के अंदर खींच लिया. इस से पहले कि मैं कुछ बोल पाती, मेरे मुंह पर कपड़ा बांध दिया गया. इस के बाद मैं बेहोश हो गई. ‘‘जब मुझे होश आया, तो मैं ने वहां शीला आंटी को देखा. उसे देख कर मैं हैरान रह गई.

‘‘मुझे यह समझते देर न लगी कि इसी औरत ने मुझे अगवा कराया है. रात को शीला और उस के एक साथी ने मुझे जिस्मफरोशी के लिए मजबूर किया. ‘‘अगर मैं उन की किसी बात से इनकार करती थी, तो वे चाकू से मेरे जिस्म को हलका सा काट कर उस में मिर्च भर देते थे, ताकि मैं इस धंधे में उतर आऊं.

‘‘साहब, वहां मेरी चीखें सुनने वाला भी कोई नहीं था. वे मुझे बहुत मारते थे,’’ कहतेकहते शमा रो पड़ी. शमा की दर्दभरी कहानी सुन कर कमल और आरिफ ने उस की हिम्मत की दाद दी.

‘‘शमा, हम तुम्हारी पूरी मदद करेंगे, लेकिन तुम इस राज को अपने तक ही रखना,’’ आरिफ ने कहा. सुबह होते ही वह दलाल वहां आ गया और शमा को ले गया.

कमल और आरिफ कुछ लोगों की मदद से एक पुलिस अफसर से मिले और उन को शमा के बारे में पूरी जानकारी दी. उन की बातें सुन कर पुलिस अफसर ने कहा, ‘‘ठीक है, हम छापा मार कर लड़की को वहां से निकालते हैं.’’

पुलिस कोठे पर छापा मार कर शमा के साथ चंद्रा और कई दलालों को पकड़ लाई. थाने में आ कर पुलिस अफसर ने शमा से पूछताछ शुरू की. इस पर शमा ने पुलिस अफसर को जो बताया, उसे सुन कर आरिफ और कमल के होश उड़ गए. उस ने बयान दिया, ‘‘साहब, मैं एक तवायफ हूं और अपने मरजी से यह धंधा करती हूं.’’

शमा का बयान सुनने के बाद पुलिस अफसर ने कमल और आरिफ को डांटते हुए कहा कि दोबारा इस तरह पुलिस को परेशान करने की कोशिश की, तो बहुत बुरा होगा. उन्होंने शमा को चंद्रा के साथ भेज दिया. कई दिन बाद कमल जब उसी गली से गुजर रहा था, तब शमा उसे रोक कर रोने लगी. वह बोली, ‘‘चंद्रा को हमारी योजना पता लग गई थी. उस ने अपने कुछ आदमियों से मुझे बहुत पिटवाया था, इसलिए मैं डर गई थी. लेकिन साहब, मैं अब भी यहां से किसी भी तरह निकलना चाहती हूं.’’

‘‘मैं तुम्हें एक मौका और दूंगा. अगर निकल सकती हो, तो निकल जाना, वरना जिंदगीभर यहीं जिस्मफरोशी करती रहना,’’ कमल ने गुस्से में कहा. ‘‘इस बार आप जैसा कहेंगे, मैं वैसा ही करूंगी,’’ शमा ने हाथ जोड़ते हुए कहा. जब कमल ने आरिफ से कहा, तो वह बोला, ‘‘कमल, हमें यह काम अब अकेले नहीं करना चाहिए. हमें अपने कुछ और दोस्तों की मदद लेनी चाहिए. मामला कुछ पेचीदा नजर आ रहा है.’’

कमल और आरिफ अपने एक दोस्त असद खां से मिले. असद खां का उस इलाके में काफी दबदबा था. वह जब उस गली से गुजरता था, तो सारी तवायफें उस के खौफ से अपने दरवाजे बंद कर लेती थीं. कमल ने असद खां को शमा के बारे में बताया. उस की सारी बातें सुन कर वह भी संजीदा हो गया और बोला, ‘‘पहले मैं उस लड़की से बात करूंगा, उस के बाद कोई फैसला लूंगा.’’

अगले दिन असद खां अपने कुछ साथियों के साथ उस कोठे पर पहुंच गया. असद खां को देखते ही महल्ले में भगदड़ सी मच गई. सारी तवायफें अपनेअपने कोठे के दरवाजे बंद करने लगीं.

असद खां ने शमा का कमरा खुलवाया. शमा ने उसे बैठने को कहा, लेकिन असद खां ने रोबीली आवाज में कहा, ‘‘मैं यहां बैठने नहीं आया हूं. मुझे कमल ने भेजा है.’’ असद खां के मुंह से कमल का नाम सुनते ही शमा सबकुछ समझ गई.

‘‘क्या तुम यहां से जाना चाहती हो?’’ असद खां ने उस से पूछा. ‘‘हां, मैं यहां से निकलना चाहती हूं, लेकिन आप लोगों ने देर कर दी, तो मुझे 1-2 दिन में कहीं दूर भेज दिया जाएगा,’’ शमा ने रोते हुए कहा.

‘‘मैं तुम्हें यहां से निकाल दूंगा, मगर याद रखना कि इस बार तुम पुलिस के सामने अपना बयान मत बदलना. अगर तुम ने ऐसा किया, तो मैं तुम्हें पुलिस थाने में ही गोली मार दूंगा,’’ असद खां ने कहा. ‘‘मैं थाने नहीं जाऊंगी. मुझे पुलिस से डर लगता है,’’ शमा ने सिसकते हुए कहा.

‘‘अच्छा, मैं तुम्हें थाने नहीं ले जाऊंगा. लेकिन तुम्हें अदालत में बयान देना होगा.’’ शमा ने ‘हां’ में अपना सिर हिला दिया.

‘‘देखो लड़की, मैं तुम्हें इस कोठे से खुलेआम निकाल कर ले जाऊंगा. किसी माई के लाल में इतनी हिम्मत नहीं, जो मुझे रोक सके,’’ असद खां ने आंखें फाड़ते हुए कहा. असद खां की बातों से शमा को यकीन हो गया कि वह उसे यहां से जरूर निकाल ले जाएगा.

असद खां जब शमा का हाथ पकड़ कर कमरे से बाहर ले आया, तो पूरे कोठे में सन्नाटा छा गया. किसी बदमाश या दलाल की उस से बात करने की हिम्मत न हो सकी. असद खां शमा को एक वकील के साथ अदालत में ले गया.

शमा मजिस्ट्रेट के सामने फूटफूट कर रोने लगी. उस ने उन्हें अपनी सारी कहानी सुना दी और अपने जिस्म के जख्मों के निशान भी दिखाए. शमा की दर्दभरी कहानी सुन कर मजिस्ट्रेट ने फौरन पुलिस को हुक्म दिया कि चंद्रा और उन लोगों को गिरफ्तार किया जाए, जिन्होंने इस लड़की पर जुल्म किया है.

मजिस्ट्रेट के हुक्म पर पुलिस ने फौरन गिरफ्तारी शुरू कर दी. बाद मैं मजिस्ट्रेट ने हुक्म दिया कि पुलिस की निगरानी में शमा को उस के घर भेज दिया जाए. कुछ दिनों के बाद शमा को हिफाजत के साथ उस के घर भेज दिया गया.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें