22वीं सदी की शादी : कुछ ऐसा होगा फिर नजारा

‘‘यह लो जी, हमारा लड़का आ गया,’’ मेरी तरफ इशारा कर के मेरी मां बोलीं. मैं हाथ में चाय की ट्रे थाम कर नपेतुले कदमों से आ रहा था. लड़की वालों ने भरपूर नजरों से मुझे घूरा, तो मेरे हाथपैर कांप उठे.

‘‘बेहद सुशील लड़का लगता है,’’ लड़की की भाभी मुसकराते हुए बोलीं. मैं ने नजाकत से अपनी नजरें नीची कर लीं.

‘‘चलो भाई, लड़के और लड़की को कुछ देर अकेले में बातें कर लेने दो,’’ लड़की की चाची सब को उठाते हुए बोलीं. मेरा दिल धकधक कर रहा था.

सब के वहां से हटते ही लड़की बोली, ‘‘तेरा धंधा क्या है बीड़ू?’’

‘‘देखिए, इस तरह की टपोरी जबान में बातें करते हुए आप अच्छी नहीं लगतीं,’’ मैं नजरें झुकाए अंगूठे से जमीन को कुरेदते हुए बोला.

‘‘ऐ… 19वीं सदी की शरमाती हीरोइन के माफिक नहीं, अपुन से आंख मिला कर बात कर. अपुन 22वीं सदी की लड़की है. तू क्या 20वीं सदी का मौडल ढूंढ़ रहा है?’’ लड़की तो मानो मेरी मिट्टी पलीद करने पर ही तुली थी. मगर मेरे मन में तो लड्डू फूट रहे थे, ‘वह रमेश… अपनी बीवी की बहादुरी के किस्से सुनासुना कर कितना बोर करता था. उस की बीवी उसे शादी के मंडप से उठा कर भागी थी, क्योंकि रमेश का बाप उस की शादी अपने दोस्त की लड़की से करवा रहा था, जो वजन में उस से चौगुनी थी. अगर रमेश की बीवी इतनी हिम्मती थी, तो उस ने रमेश को शादी के मंडप तक पहुंचने ही क्यों दिया?’

अभी मैं कुछ और सोचता कि तभी उस लड़की की तेज आवाज ने मुझे यादों से वर्तमान में ला पटका, ‘‘अरे ओ फ्यूज बल्ब, यह बारबार तेरी लाइट किधर गुल हो जाती है?’’

मैं मन ही मन उस लड़की की इस अदा पर फिदा हुआ जा रहा था. साथ ही, मैं यही सोच रहा था कि अगर मर्द की मर्दानगी हो सकती है, तो औरत की औरतानगी क्यों नहीं हो सकती?

‘‘भाई लोगो, अंदर आ जाओ. अपुन को लड़का बहुत ही पसंद है. अभी अपुन भी ओल्ड मौडल का बड़ाच शौकीन है क्या… एक घंटा हो गया, अभी तक इस बीड़ू ने अपुन से नजर तक नहीं मिलाई. अबे ओए 1856 की मर्सिडीज, अभी भी अपुन कहरेला है कि अपन के थोबड़े पर एक निगाहीच मार. बाद में अपुन को लफड़ा नहीं मांगता,’’ वह लड़की बोली.

मैं ने अदा से नजरें और झुका लीं, मानो ऐसा करने से जो नंबर बाकी रह गए होंगे, वे भी मिल जाएंगे और मेरा स्कोर सौ फीसदी हो जाएगा.

‘‘बधाई हो जी, हमें आप का लड़का बहुत पसंद है. क्या सब्र है इस में, वरना 3 लड़कों ने तो हमारी लड़की की डांट से पैंट गीली कर दी थी. यह लो जी, मुंह मीठा करो,’’ लड़की की मां ने मेरी मां के मुंह में मिठाई का टुकड़ा जबरन ठूंसते हुए कहा.

मैं शरमा कर अपनी कमीज का कौलर दांतों में दबा कर तेजी से कमरे की ओर भागा. फटाफट शादी का मुहूर्त निकला. आखिरकार वह घड़ी भी आ गई, जब मैं बाबुल का घर छोड़ कर अपनी प्रियतमा के घर जाने लगा.

जी हां, यह 22वीं सदी की शादी थी. मुझे सजासंवार कर सेज कर बिठा दिया गया. पहले दुलहन संजीसंवरी घूंघट निकाले अपने प्रियतम का इंतजार करती थी, मगर 22वीं सदी में दूल्हा सजसंजवर कर सेहरा मुंह पर लगाए अपनी दुलहन का इंतजार करता है कि कब वह आए और घूंघट यानी सेहरा उठाए और अपने दूल्हे का दीदार करे.

मेरे इंतजार की घडि़यां खत्म हुईं. आखिरकार मेरी दुलहनिया आ गई. क्या धमाकेदार ऐंट्री थी. दरवाजा ऐसे खोला, मानो तोड़ देने का इरादा हो. साथ में 2 लड़कियां और… मैं तो घबरा ही गया.

‘‘जानेमन…’’ वह पलंग पर बैठते हुए बोली, ‘‘क्या सेहरा लगा कर बैठा है,’’ इतना कह कर उस ने एक हाथ मारा, तो मेरा सेहरा एक फुट दूर जा कर गिरा.

‘‘आई लव यू,’’ उस ने मुझे कहा, मगर उस की नजरें तो अपनी सहेली से बातें कर रही थीं.

‘‘क्या जी…’’ मैं ने अदा से शरमाते हुए कहा, ‘‘आप 2 बौडीगार्ड साथ ले आईं और अब सुहागिन रात पर मेरे बदले अपनी सहेली को ‘आई लव यू’ कह रही हैं. क्या आप फिल्म ‘फायर’ की शबाना…’’

‘‘ऐ ढक्कन, अपुन तेरे को ही ‘आई लव यू’ बोल रही है. तू कहां गलत ट्रैक पर जा रहा है…’’

‘‘मगर, आप तो अभी भी अपनी सहेली को ही देख रही हैं. ‘आई लव यू’ भी तो आप ने उस से ही कहा था.’’

‘‘अरे अक्ल के दुश्मन, तभी तो जिस दिन मैं तुम्हें देखने आई थी, तो मैं ने तुझ से कहा था कि मुझे ठीक से देख ले. तुम्हें अभी तक पता नहीं चला कि मैं ‘लुकिंग लंदन टाकिंग टोक्यो’ हूं.’’

‘‘क्या… नहीं… आप… तुम… ऐसी हो. मैं तो लुट गया… बरबाद हो गया…’’ मैं ने अपना हाथ दीवार पर मारते हुए कहा.

कुछ मत लाना प्रिय: रश्मि की सास ने कौनसी बात बताई थी

अजय ने टूअर पर जाते हुए हमेशा की तरह मुझे किस किया. बंदा आज भी रोमांटिक तो बहुत है पर मैं उस बात से मन ही मन डर रही थी जिस बात से शादी के पिछले 10 सालों से आज भी डरती हूं जब भी वे टूअर पर निकलते हैं. मेरा डर हमेशा की तरह सच साबित हुआ, वे बोले, ”चलता हूं डार्लिंग, 5 दिनों बाद आ जाऊंगा. बोलो, हैदराबाद से तुम्हारे लिए क्या लाऊं?”

मैं बोल पङी, ”नहीं, प्लीज कुछ मत लाना, डिअर.”

पर क्या कभी कह पाई हूं, फिर भी एक कोशिश की और कहा, ‘’अरे नहीं, कुछ मत लाना, अभी बहुत सारे कपड़े पङे हैं जो पहने ही नहीं हैं.’’

‘’ओह, रश्मि, तुम जानती हो न कि जब भी मैं टूअर पर जाता हूं, तुम्हारे लिए कुछ जरूर लाता हूं, मुझे अच्छा लगता है तुम्हारे लिए कुछ लाना.’’

थोङा प्यार और रोमांस के साथ (टूअर पर जाते हुए पति पर प्यार तो बहुत आ रहा होता है ) मैं ने भी अजय को भेज कर अपनी अलमारी खोली. यों ही ऊपरी किनारे में रखे कपड़ों का और बाकी कुछ चीजों का वही ढेर उठा लिया जो अजय पिछले कुछ सालों में टूअर से लाए थे. इस में कोई शक नहीं कि अजय मुझे प्यार करते हैं पर मुश्किल थोड़ी यह है कि अजय और मेरी पसंद थोड़ी अलगअलग है.

अजय हमेशा मेरे लिए कुछ लाते हैं. कोई भी पत्नी इस बात पर मुझ से जल सकती है. सहेलियां जलती भी हैं, साफसाफ आहें भी भरती हैं कि हाय, उन के पति तो कभी नहीं लाते ऐसे गिफ्ट्स. हर बार इस बात पर खुश मैं भी होती हूं पर परेशानी यह है कि अजय जो चीजें लाते हैं, अकसर मेरी पसंद की नहीं होतीं.

अब यह देखिए, यह जो ब्राउन कलर की साड़ी है, इस का बौर्डर देख रहे हैं कि कितना चौड़ा है. यह मुझे पसंद ही नहीं है और सब से बड़ी बात यह कि ब्राउन कलर ही नहीं पसंद है. अजीब सा लगता है यह पीला सूट. इतना पीला? मुझे खुद ही आंखों में चुभता है, औरों की क्या कहूं.

अजय को ब्राइट कलर पसंद है. कहते हैं कि तुम कितनी गोरी हो… तुम पर तो हर रंग अच्छा लगता है. मैं मन ही मन सोचती हूं कि हां, ठीक है, प्रिय, गोरी हूं तो कभी मेरे लिए मेरे फैवरिट ब्लू, व्हाइट, ब्लैक, रैड कलर भी तो लाओ. मुझ पर तो वे रंग भी बहुत अच्छे लगते हैं. और अभी तो अजय ने एक नया काम शुरू किया है. वह अपनेआप को इस आइडिया के लिए शाबाशी देते हैं, अब वह टूअर पर फ्री टाइम मिलते ही जब मेरे लिए शौपिंग के लिए किसी कपड़े की शौप पर जाते हैं, वीडिओ कौल करते हैं, कहते हैं कि मैं तुम्हें कपड़े दिखा रहा हूं तो तुम ही बताओ तुम्हें क्या चाहिए? मैं ने इस बात पर राहत की थोड़ी सांस ली पर यह भी आसान नहीं था.

पिछले टूअर पर अजय जब मेरे लिए रैडीमैड कुरती लेने गए, दुकानदार को ही फोन पकड़ा दिया कि इसे बता दो तुम्हें. मैं ने बताना शुरू किया कि कोई प्लेन ब्लू कलर की कुरती है?

”हां जी, मैडम, बिलकुल है.”

फिर वह कुरतियां दिखाने लगा. साइज समझने में थोड़ी दिक्कत उसे भी हुई और समझाने में मुझे भी. अजय को मैं ने व्हाट्सऐप पर मैसेज भी भेजे कि अभी न लें, साइज समझ नहीं आ रहा है, उन का रिप्लाई आया कि सही करवा लेना. एक कुरती लिया गया, फिर अजय हैदराबाद में वहां के फेमस पर्ल सैट लेने गए. मैं यहां दिल्ली में बैठीबैठी इस बात पर नर्वस थी कि क्या खरीदा जाएगा.

मैं बोली जा रही थी कि पहले वाले भी रखे हैं अभी तो. न खरीदो पर पत्नी प्रेम में पोरपोर डूबे हैं अजय. आप लोग मुझे पति के लाए उपहारों की कद्र न करने वाली पत्नी कतई न समझें. बस, जिस बात से घबराती हूं, वह है पसंद में फर्क.

रास्ते से अजय ने फोन किया, ”किस तरह का सैट लाऊं?”

”बहुत पतला सा, जिस में कोई बड़ा डिजाइन न हो, बस छोटेछोटे व्हाइट मोतियों की पतली सी माला और साथ में छोटी कान की बालियां, जो मैं कभी भी पहन पाऊं.’’

मैं ने काफी अच्छी तरह से अपनी पसंद बता दी थी. अगले दिन सुबह ही अजय को वापस आना था. हमारे दोनों बच्चों के लिए भी वे वहां से करांची बिस्कुट और वहां की मिठाई भी लाने वाले थे. अजय को दरअसल सब के लिए ही कुछ न कुछ लाने का शौक है. यह शौक शायद उन्हें अपने पिताजी से मिला है.

ससुरजी भी जब घर आते, कुछ न कुछ जरूर लाया करते. कभी किसी के लिए, तो कभी किसी के लिए कुछ लाने की उन की प्यारी सी आदत थी. सासूमां हमेशा इस बात को गर्व से बताया करतीं.

उन्होंने मुझे भी एक बार हिंट दिया, ”तुम्हारे ससुरजी को मेरे लिए कुछ लाने की आदत है. यह अलग बात है कि कभी मुझे उन की लाई चीजें कभी पसंद आती हैं, तो कभी नहीं, पर जिस प्यार से लाते हैं, बस उस प्यार की कद्र करते हुए मैं भी उन की लाई चीजें देखदेख कर थोड़ा चहकने की ऐक्टिंग कर लेती हूं जिस से वे खुश हो जाएं. तो बहू, जब भी अजय कुछ लाए, पसंद न भी हो तो खुश हो कर दिखाना,” हम दोनों इस बात पर बहुत देर तक हंसी थीं और इस बात पर जीभर कर हंसने के बाद हमारी बौंडिंग बहुत अच्छी हो गई थी.

सासूमां तो बहुत ही खुश हो गई थीं जब उन्हें समझ आया कि हम दोनों एक ही कश्ती में सवार हैं, कभी मूड में होतीं तो ससुरजी की अनुपस्थिति में अपनी अलमारी खोल कर दिखातीं, ”यह देखो, बहू, यह जितनी भी गुलाबी छटा बिखरी देख रही हो मेरे कपड़ों में, सब गुलाबी कपड़े तुम्हारे ससुरजी के लाए हुए हैं. उन्हें गुलाबी रंग बहुत पसंद हैं. वे जीवनभर मेरे लिए जो भी लाए, सब गुलाबी ही लाए. सहेलियां, रिश्तेदार गुलाबी रंग में ही मुझे देखदेख कर बोर हो गए पर तुम्हारे ससुरजी ने अपनी पसंद न छोड़ी. गुलाबी ढेर लगता रहा एक कोने में.”

मैं बहुत हंसी थी उस दिन, पर मैं ने प्यारी सासूमां की बात जरूर गांठ से बांध ली थी कि अजय जो भी लाते हैं, मैं ऐसी ऐक्टिंग करती हूं कि वे खुद को ही शाबाशी देने लगते हैं कि कितनी अच्छी चीज लाए हैं मेरे लिए. मुझे तो कुछ भी खरीदने की जरूरत ही नहीं पड़ती. ऐक्टिंग का अच्छा आइडिया दे गईं सासूमां. आज अगर वे होतीं तो अपनी चेली को देख खुश होतीं.

यह अलग बात है कि मैं अजय को यह नहीं समझा पाई कभी कि जब इतने नए कपड़े रखे रहते हैं तो मैं बीचबीच में अपनी पसंद का बहुत कुछ क्यों खरीदती रहती हूं. कुछ भी कहें लोग, पति होते तो हैं भोलेभाले और आसानी से आ जाते हैं बातों में. तभी तो आजतक जान नहीं पाए कि मैं खुद भी क्यों खरीदती रहती हूं बहुत कुछ.

दरअसल, मैं वह गलती भी नहीं करना चाहती जो मेरी अजीज दोस्त रीता ने की थी. उस ने शादी के बाद अपने पति की लाई हुई चीजें देख कर उन्हें साफसाफ समझा दिया कि दोनों की पसंद में काफी फर्क है. उसे उन का लाया कुछ पसंद नहीं आएगा तो पैसे बेकार जाएंगे. वह अपनी पसंद की ही चीजें खरीदना पसंद करती है और वे उस के लिए कुछ न लाया करें. वह जो भी खरीदेगी, आखिर होगा तो उन का ही पैसा, तो उन पति पत्नी में यहां बात ही खत्म हो गई.

जीवनभर का टंटा एक बात में साफ. पर मैं ने देखा है कि जब भी उस का फ्रैंड सर्किल उस से पूछता है कि भाई साहब ने क्या गिफ्ट दिया या क्या लाए, तो उस का चेहरा उतरता तो है, क्योंकि उन के पति ने भी उन की बात पर ध्यान दे कर फिर कभी न उन पर अपना पैसा वैस्ट किया, न ही समय. मतलब पति के लाए उपहारों में बात तो है.

खैर, रात को बच्चे खुश थे कि पापा उन के लिए जरूर कुछ लाएंगे. मैं हमेशा की तरह उन के आने पर तो खुश थी पर कुछ लाने पर तो डरी ही हुई थी, जब सुबह बच्चे अपनी चीजों में खुश थे.

अजय ने किसी फिल्मी हीरो की तरह पर्ल सैट का बौक्स मुझे देते हुए रोमांटिक नजरों से देखते हुए कहा, ”अभी पहन कर दिखाओ, रश्मि.”

मैं ने बौक्स खोला, खूब बड़ेबड़े मोतियों की माला, बड़ा सा हरा पेडैंट, कंधे तक लटकने वाली कान खी बालियां, खूब भारीभरकम सा सैट. शायद मेरे चेहरे का रंग उड़ा होगा जो अजय पूछ रहे थे, ”क्या हुआ? पसंद नहीं है?”

”अरे, नहींनहीं, यह तो बहुत ही जबरदस्त है,” मुझे सासूमां की बात सही समय पर याद आई तो मैं ने कहा.

”थैंक यू,’’ कहते हुए मैं मुसकरा दी. मैं ने बौक्स अलमारी में रखा, वे फ्रैश होने चले गए. मैं ने उन के सामने चाय रखते हुए टूअर की बातें पूछीं और साथ में लगे हाथ पूरी चालाकी से यह भी कहा, ”बहुत भारी सैट ले आए. कोई हलकाफुलका ले आते जो कभी भी पहन लेती. यह तो सिर्फ किसी फंक्शन में ही निकलेगा. कोई हलका सा नहीं था क्या?’’

”अरे, था न. बहुत वैराइटी थी. पर मैं ने सोचा कि हलका क्या लेना.’’

मन हुआ कहूं कि प्रिय, इतना मत सोचा करो, बस जो हिंट दूं, ले आया करो. पर चुप ही रही और सामने बैठी कल्पना में हलकेफुलके सैट पहने अपनेआप को देखती रही.

अजय महीने में 15 दिन टूअर पर ही रहते हैं. एक दिन औफिस से आ कर बोले, ”रश्मि, अगले हफ्ते चंडीगढ़ जाना है, बोलो, क्या चाहिए? क्या लाऊं तुम्हारे लिए?’’

मैं ने प्यार से उन के गले में बांहें डाल दीं,”कुछ नहीं, इतना कुछ तो रखा है. हर बार लाना जरूरी नहीं, डिअर.’’

”मेरी जान, पर मुझे शौक है लाने का.’’

मेरा दिल कह रहा था कि नहीं… जानते हैं न आप, क्यों कह रहा था?

मेरे पति ‘मम्माज बॉय’ हैं, मैं क्या करूं?

सवाल
28 वर्षीय महिला हूं. पिछले साल ही शादी हुई थी. शादी के बाद ससुराल आई तो 2-3 दिन में ही समझ गई कि पति ‘मम्माज बौय’ हैं. वे अपनी मां से पूछ कर ही कोई काम करते हैं और मेरी एक भी बात नहीं मानते. खाने से ले कर परदे के रंग तक का चयन मेरी सास ही करती हैं और मेरी बातों को जरा भी अहमियत नहीं देतीं. इस से मैं काफी तनाव में रहती हूं. सम झ नहीं आ रहा क्या करूं?
जवाब
अभी आप की नईनई शादी हुई है. आप के पति सम झदार हैं और इसीलिए वे नहीं चाहते होंगे कि अचानक मां को नजरअंदाज कर आप की बातों को उन के सामने ज्यादा तवज्जो दें. इस से घर में अनावश्यक ही तनाव भरा माहौल हो जाएगा.
आप को धीरेधीरे समय के साथ घर में अपनी जगह बनानी चाहिए. बेहतर होगा कि आप अपनी सास को सास नहीं मां सम झें. उन के साथ खाली वक्त में साथ बैठें, टीवी देखें, शौपिंग करने जाएं, उन की पसंद की ड्रैस खरीद कर उन्हें दें. घर के कामकाज में उन की सहायता करें.
जब आप की सास को यह यकीन हो जाएगा कि अब आप अच्छी तरह से गृहस्थी संभाल सकती हैं, तो धीरेधीरे वे आप को पूरी जिम्मेदारी सौंप देंगी.

 

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  सरस सलिल- व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

पहली रात का डर, ऐसे कीजिए दूर

बीना के मन में शादी की पहली रात का डर बैठ गया था कि वह रात के दौरान कैसे सहज रहेगी. बड़ी मुश्किल से वह डाक्टर की सलाह और पति के सहयोग से सहज हो पाई. दिल्ली के अमर जैन अस्पताल के डाक्टर अरुण जैन के मुताबिक, ‘‘बहुत सी लड़कियों के मन में डर बैठ जाता है कि पहली बार बहुत पीड़ा होगी. मगर यदि कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो सब कुछ सुगम हो जाता है.’’ नीना के पति ने शादी के 2-3 दिनों तक पत्नी के साथ एक दोस्त का व्यवहार करते हुए नीना को संबंध के लिए तैयार किया.

शादी की पहली रात किसी भी लड़की के लिए नया अनुभव लिए होती है. अत: ऐसे में खुद को तैयार करने के लिए आपस में सैक्स संबंधित बातें करें. एकदूसरे की सैक्स से संबंधित इच्छा जानने का प्रयास करें.

पहली रात को भावनात्मक लगाव की कमी भी मानसिक रूप से तैयार होने से रोकती है. अत: चुंबन, स्पर्श, आलिंगन से पत्नी को तैयार करें यानी पत्नी को तैयार करने के लिए फोरप्ले में समय लगाएं.

सहज व तनावमुक्त

यदि पहली बार संबंध बनाते समय झिल्ली ज्यादा सख्त लगे तो बजाय जोरजबरदस्ती करने के स्त्री सैक्सोलौजिस्ट की सलाह से झिल्ली को हटवाएं. तब न केवल जबरदस्ती संबंध बनाने से होने वाली ब्लीडिंग से बचाव होगा वरन पीड़ा भी नहीं होगी.

ओवरवेट पत्नी को ऐसी समस्या का सामना करना पड़ता है. ऐसे में पहले जैल क्रीम लगाएं. पत्नी को कहें कि वह अपने शरीर को ढीला छोड़ कर संबंध का आनंद ले.

वैजिनिसमस मानसिक कारणों से होता है. स्त्री के अंग के चारों ओर की मांसपेशियां, अनैच्छिक रूप से संकुचित हो जाती हैं. स्त्री अपनी इच्छा से मांसपेशियों को संकुचित नहीं करती, बल्कि ऐसा स्वयं हो जाता है.

वैजिनिसमस के लिए जिम्मेदार हैं सैक्स के बारे में भ्रांतियां, यौन उत्पीड़न, असामान्य सैक्स व्यवहार. अत: इस समस्या को भी मनोवैज्ञानिक ढंग से हल करें.

उत्तेजना का प्रथम बिंदु स्त्री अंग में गीलापन बढ़ना माना जाता है. उत्तेजना के चलते जैसेजैसे चिकनाई बढ़ती है, वैसेवैसे स्तनों का आकार भी बढ़ जाता है. उन के निप्पलों में भी तनाव आ जाता है. हृदय व सांस की गति बढ़ जाती है. ऐसी स्थिति में डरे बिना संबंध को पूर्ण करें. संबंध के लिए स्थान परिवर्तन भी कर सकते हैं. बैडरूम के बजाय ड्राइंगरूम या फिर यदि छत पर कमरा बना हो तो वहां भी यह कार्य किया जा सकता है.

चर्मोत्कर्ष तक पहुंचने के लिए पत्नी की सैक्स इच्छा का सम्मान करें. पहली रात के डर, तनाव, गुस्से आदि को दूर रखें. आपसी सहमति से किया गया प्रथम सहवास प्रथम रात के डर को ही मन से नहीं निकालता, बल्कि पतिपत्नी दोनों को पूर्ण संतुष्टि देने के साथसाथ स्वास्थ्य लाभ भी देता है.

कई बार पहली रात में चरमोत्कर्ष भी संभव नहीं होता, और्गेज्म तो दूर की बात है. दरअसल, उस पहली रात में कई तरह के डर हावी रहते हैं. मिलन के लिए दोनों की मानसिकता एक जैसी हो तभी संबंध संभव है. चरम आनंद से पहले भी आनंद आता है. चरम आनंद के लिए फोरप्ले व आफ्टरप्ले दोनों का महत्त्व होता है. ये भावनात्मक निकटता पैदा करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. अच्छे फोरप्ले से जहां समय पर चरम आनंद पाया जा सकता है, वहीं अच्छा आफ्टरप्ले चरम आनंद को देर तक बनाए रखता है. इस से सैक्स सिर्फ तन की क्रिया ही नहीं बल्कि भावनात्मक, आंतरिक व सम्मानजनक क्रिया बन जाती है.

समझदारी, समरसता से किया गया सैक्स सुख ही सच्चा सुख माना जाता है. यह और्गेज्म यानी चरम आनंद पा कर ही अनुभव किया जा सकता है. स्त्रियों का चरम आनंद पुरुषों के चरम आनंद जैसा मुखर नहीं होता कि बिना बताए कोई जान ले, इसलिए कई बार उस में बाधा होती है. कुछ स्त्रियों को चरम आनंद से पूर्व जल्दी और ज्यादा घर्षण चाहिए तो कुछ को पुरुष अंग गहराई तक चाहिए तो किसी को सिर्फ स्पर्श चाहिए.

एक्शन हीरो होते हुए भी Ajay Devgan को सीरियस मूवी के लिए मिला नेशनल अवार्ड

अजय देवगन ने अपने लंबे समय के करियर में हर तरह की फिल्में की है, जिसमें ज्यादा वे एक्शन फिल्मों के लिए जानें जाते है. उनकी एक्शन, कौमेडी फिल्म अपनी एक छाप छोड़ती है. उनकी फिल्में एक्शन से भरपूर आज की टौप फिल्में है. जिनमें उनकी दमदार एक्टिंग के चर्चे खूब होते रहते है. अजय देवगन की एक्शन फिल्मों ने ताबड़ तोड़ कमाई भी की. आइए जानते है अजय देवगन की टौप क्लास एक्शन मूवी.

 

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सिंघम

इस फिल्म में अजय देवगन पुलिस इंस्पेक्टर बाजीराव का रोल निभाकर छा गए थे. उन्होंने सिल्वर स्क्रीन पर जमकर एक्शन किया था. अजय देवगन की ‘सिंघम’ प्राइम वीडियो पर देख सकते है. इस फिल्म के डायरेक्टर रोहित शेट्टी है.इस फिल्म के तीन पार्ट बन चुके है, पहली साल 2011 में आई थी, फिर सिंघम रिटर्स साल 2014 में आई. दोनों ही फिल्में सुपरहिट रही. जिसके बाद साल 2024 में सिंघम अगेन आई है. सभी में अजय एक्शन और पुलिस वाले के रोल में नजर आए है.

दृश्यम

ये एक सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म है, जिसमें अजय देवगन ने अपनी दमदार एक्टिंग से लोगों का दिल जीत लिया था. ‘दृश्यम’ अजय देवगन की सबसे ज्यादा पसंद की गई फिल्मों में से एक है. साल 2022 में फिल्म ‘दृश्यम 2’ भी काफी चर्चा में रही. ये ‘दृश्यम’ का सीक्वल था. बौक्स औफिस पर इस मू्वी ने छप्परफाड़ कमाई की थी. आप इस मूवी का लुत्फ अमेजन प्राइम वीडियो पर उठा सकते हैं.

तान्हाजी-द अनसंग वौरियर

साल 2020 में रिलीज हुई ‘तान्हाजी: द अनसंग वौरियर’ आज भी लोगों की पसंदीदा फिल्म है. इसमें अजय देवगन ने मराठा योद्धा तान्हाजी मालुसरे की भूमिका निभाई थी. ये मूवी डिज्नी प्लस हौटस्टार पर मौजूद है. इस फिल्म में अजय एक्शन करते हुए दिखाई दिए थे. इस फिल्म में नेगेटिव रोल में सैफ अली खान थे. फिल्म एक्ट्रेस के तौर पर काजोल भी थी. फिल्म के डायरेक्टर ओम राउत है.

रेड

इस मूवी में अजय देवगन ने सीनियर इनकम टैक्स औफिसर अमय पटनायक का किरदार निभाया था. इलियाना डिक्रूज और सौरभ शुक्ला ‘रेड’ फिल्म में नजर आए थे. ये फिल्म डिज्नी प्लस हौटस्टार पर है. इस फिल्म की कहानी हौसले और ईमानदारी की कहानी है. इसमें भी एक्शन दिखाया गया. इस फिल्म के डायरेक्टर राज कुमार गुप्ता है.

फिल्मों के लिए मिला नेशनल अवार्ड

अजय देवगन अपनी हर फिल्म में बेहतरीन एक्टिंग के लिए जाने जाते है. वे एक एक्शन हीरों होने के साथ साथ कई गंभीर फिल्में भी कर चुके है. अजय को नेशनल अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है. इतना ही नहीं उन्हे फिल्म तान्हाजी के लिए बेस्ट एक्टर का अवार्ड भी मिल चुका है. अजय देवगन अपनी बेहतरीन एक्टिंग से सभी का दिल जीत लेते है. इनकी फिल्म साउथ की एक्शन फिल्मों को टक्कर देती है.

जंगल सफारी और झील जैसी बेस्ट प्लेस घूमने जाएं नेपाल, जानें फेमस फूड्स

नेपाल यानी कि दुनिया की छत. जी हां, नेपाल को इस नाम से भी जाना जाता है. नैचुरल ब्‍यूटी से भरपूर है नेपाल.  यहां कई ऐसे टूरिस्ट प्लेस हैं, जहां हर साल लाखों की संख्या में टूरिस्ट पहुंचते हैं और यहां की खूबसूरती का लुत्फ उठाते हैं. 

 

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अगर आप ट्रैकिंग पसंद करते हैं या आप नैचर लवर हैं तो आपके लिए नेपाल में कई ऐसी जगहें  हैं, जहां आप काफी कम खर्च में जंगलों का मजा उठा सकते हैं. 

चितवन नेशनल पार्क

नेपाल में आप नेशनल पार्क का भी मजा ले सकते हैं, यहां की जंगल सफारी लोगों के बीच काफी चर्चा में रहती है. वाइल्ड एनिमल्स को देखने वाला हर मंजर आपको पूरी लाइफ याद रहेगा.  एशिया के सबसे बेहतरीन वन्यजीव संरक्षण के रूप में नेशनल पार्क की पहचान होती है. इस नेशनल पार्क में एक सींग वाला गैंडा, बंगाल टाइगर समेत कई जानवर देखने का मिल जाते हैं. इसके अलावा आप डोंगा और हाथी की सवारी का आनंद भी उठा सकते हैं. अगर आप वन्य जीव प्रेमी हैं तो आप को अपनी नेपाल यात्रा के दौरान इस पार्क को अपनी लिस्ट में टौप पर रहना चाहिए. वैसे तो आप कभी भी नेपाल का यह पार्क घूम सकते हैं लेकिन बारिश के मौसम में इसकी खूबसूरती कई गुना बढ़ जाती है. 

काठमांडू

नेपाल की राजधानी काठमांडू एक ऐसा शहर है जो 1400 मीटर की ऊंचाई पर है और यहां पूरे साल ठंड रहती है. यहां काफी शांत माहौल है, इस जगह की सैर पूरी तरह से पैसा वसूल है. इसके अलावा काठमांडू के आसपास कई जगहें हैं जैसे दमन, ये कपल्स के लिए बहुत ही शानदार प्लेस है. क्योंकि यहां से हिमालय पर्वत के शानदार नजारे का बहुत ही करीब से  आनंद उठा सकते हैं.  गोदावरी भी फुल चौकी के नीचे स्थित एक छोटा सा शहर है. जिसकी सुंदरता का अंदाजा वहां पहुंच कर ही लगाया जा सकता है. सितंबर से लेकर अक्टूबर तक के सीजन में काठमांडू शहर और भी खूबसूरत दिखने लगता है.  बांदीपुर एक छोटा सा हिल स्टेशन है, जो पृथ्वी हाईवे पर काठमांडू और पोखरा के बीच के रास्ते पर है. 

 पोखरा

पोखरा को नेपाल के सबसे मशहूर टूरिस्ट प्लेस में गिना जाता है. यह हिमालय की तलहटी में फैला हुआ एक मेट्रो शहर है. यहां की खूबसूरती देखने के लिए हर साल बड़ी संख्या में लाखों लोग यहां पहुंचते हैं. बता दें कि पोखरा नेपाल का दूसरा सबसे बड़ा शहर है जो 900 मीटर से ज्यादा की उंचाई पर मौजूद है. यहां कई रोमांचक एक्टिविटीज का आनंद उठा सकते हैं.

यहां फेवा झील, ताल बाराही मंदिर, शांति स्तूप, डेविस फौल्स और घोरपानी हिल्स आदि पोखरा के खास टूरिस्ट प्लेस है. अगर आप नेपाल की यात्रा कर रहे हैं तो पोखरा जाना नहीं भूले. पोखरा घूमने का सही टाइम जून से लेकर अगस्त तक  का महीना होता .

 जनकपुर

जनकपुर नेपाल का ऐतिहासिक शहर है जो की रामायण काल से जुड़ा हुआ है. यह स्थान भगवान राम का विवाह स्थल और मां सीता का जन्म स्थान माना जाता है. ये भारत की सीमा से करीब है. नेपाल आने वाले पर्यटकों के लिए जनकपुर एक खास जगह मानी जाती है.

इस शहर में कई खूबसूरत मंदिर है जहां पर आप अपने परिवार के साथ दर्शन करने जा सकते हैं. इसके अलावा इस शहर में कई तालाब मौजूद है जो घूमने वालो के लिए काफी सुंदर जगह है. तो आप जब भी नेपाल घूमने का प्लान करें तो इन प्लेस पर घूमना मिस न करें.

सागरमाथा नेशनल पार्क

सागरमाथा नेशनल पार्क नेपाल की मनोरंजन करने की खास जगहों में से एक है जो कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर मौजूद है. लगभग 1100 वर्ग किलोमीटर के विशाल भू भाग में फैली हुई ये जगह पर आप को कई प्रकार के जीव जंतु देखने को मिल जाएंगे.

पहाड़ों से घिरे हुए इस जगह की अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता देखने लायक है. ट्रैकिंग जैसी एक्टिविटी के लिए यह जगह टूरिस्टों को बेहद पसंद आती है.

ये भी जानें

नेपाल का फेमस फूड

नेपाल में आप को कई तरह के टेस्टी भोजन आसानी से मिल जाएंगे, लेकिन दाल भात तरकारी नेपाल का सबसे खास फूड माना जाता है जो नेपाली लोगों द्वारा सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है. इसके अलावा मोमोज, हनी और तिब्बती ब्रेड भी नेपाल के काफी फेमस है. तो अगर आप नेपाल आते है तो ये फूड्स खाना न भूलें.

नेपाल जानें का सही समय

नेपाल घूमने का सबसे अच्छा समय नवंबर से मार्च महीने तक का होता है जो कि सर्दियों का मौसम होता है इसी समय ज्यादातर टूरिस्ट नेपाल में घूमने जाते हैं. गर्मियों के मौसम में यहां पर काफी गर्मी पड़ती है जिसकी वजह से आप को थोड़ी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. और मानसून के मौसम में आप यहां पर बारिश की वजह से खूबसूरत सीन सही से देख नही पाएंगे.

नेपाल घूमने का पैकेज कितना?

नेपाल घूमने जा रहे है तो जाहिर सी बात है पैकेज का आपको पता होना जरूरी है. इसलिए आप अपनी जेब देखकर ही खर्च करें. आप नेपाल में रूम 1000 रुपए  से खरीद सकते है. इसके अलावा आप अपने कंफर्ट के हिसाब से इससे उपर के रेट के भी रूम खरीद सकते है. रूम के अलावा आप किस ट्रांसपोर्ट से ट्रेवल कर रहे है उस हिसाब से उसके रेट होंगे. तो उसका एक्सपेंस अलग होगा. आप अगर 3-4 दिन का पैकेज बुक कराते है. तो आपका खर्चा 10000 तक या उससे ज्यादा भी आ सकता है. यानी की 10,000 से आप 30,000 तक नेपाल घूम कर आ सकते है. 

कांवड़ यात्रा : राहुल की मुहब्बत की दुकान, योगी के फैसले पर सवाल

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्य नाथ सरकार पर संकट के बादल गहरे काले होते जा रहे हैं. एक तरफ नरेंद्र मोदी की चाह है कि योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री पद से मुक्त हो जाएं, तो दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ और उन के खास लोग ऐसा नहीं चाहते हैं.

बहुचर्चित कांवड़ यात्रा के संबंध में कहा जा सकता है कि सावन का महीना हो और बादल घने और पानी लिए न हों, भला यह कैसे मुमकिन है. कोई योगी हो तो भला वह आधुनिक विचारों से संपन्न कैसे हो सकता है. हालांकि, अपवाद हो सकते हैं, होते हैं, मगर उत्तर प्रदेश की बदहाली देखिए कि गोरखनाथ मठ के प्रमुख योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बन गए हैं. इस के बाद से मुख्यमंत्री पद का जो पतन हुआ है, वह सारा देश और दुनिया जानती है. सच तो यह है कि हिंदू आज आधुनिक सोच के साथ दुनियाभर में देश की कामयाबी का परचम लहरा रहे हैं, मगर योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठ कर जिस तरह के फैसले ले रहे हैं, उन से हंसी भी आती है और रोना भी आता है.

कांवड़ यात्रा को ले कर आज देशभर में उत्तर प्रदेश चर्चा का केंद्र बन गया है और सरकार योगी आदित्यनाथ की छीछालेदर हो रही है. यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी के सहयोगी दल भी मुखर हो चुके हैं और विरोध कर रहे हैं. अब सवाल यह है कि क्या योगी आदित्यनाथ पीछे हटेंगे? क्या वे यह कहेंगे कि यह फैसला उन का नहीं है, बल्कि प्रशासनिक लैवल पर लिया गया था और अपनी छवि बचाएंगे या फिर पूरे मामले में नया ट्विस्ट आएगा? सचमुच यह सब देखना दिलचस्प होगा.

भाजपा में खतरे की घंटी

कांवड़ यात्रा मार्ग पर बने ढाबों पर अपने नाम लिखने के उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश की आम आदमी भी आलोचना कर रहा है. यह सचमुच हमारे देश की गंगाजमुना संस्कृति पर एक बड़ी चोट है. यही वजह है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सहयोगी दलों ने सवाल उठाए हैं.

जनता दल (यूनाइटेड) के नेता नीतीश कुमार, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता चिराग पासवान के बाद राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष और केंद्रीय राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने भी सवाल उठाए हैं, जो यह बताते हैं कि जल्द ही योगी आदित्यनाथ की विदाई मुमकिन है या फिर वे राजनीति में एक पिटा हुआ चेहरा बन कर रह जाएंगे.

अपने पिता चौधरी चरण सिंह को ‘भारत रत्न’ मिलने से गदगद हुए जयंत चौधरी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से जुड़ गए हैं, मगर योगी आदित्यनाथ के इस फैसले पर उन्होंने सरकार के फैसले की आलोचना करते हुए कहा, ‘ऐसा लगता है कि यह आदेश बिना सोचेसमझे लिया गया है और सरकार इस पर इसलिए अड़ी हुई है, क्योंकि फैसला हो चुका है. कभीकभी सरकार में ऐसी चीजें हो जाती हैं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘अब भी समय है कि इसे वापस लिया जाए या सरकार को इसे लागू करने पर ज्यादा जोर नहीं देना चाहिए. कांवड़ की सेवा सभी करते हैं. कांवड़ की पहचान कोई जाति से नहीं की जाती है. इस मामले को धर्म और जाति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए. कहांकहां नाम लिखें, क्या अब कुरते पर भी नाम लिखना शुरू कर दें, ताकि देख कर यह तय किया जा सके कि हाथ मिलाना है या गले लगाना है?’

इस से पहले नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) के प्रवक्ता केसी त्यागी ने फैसले की समीक्षा करने की मांग की. उन्होंने कहा कि ऐसा कोई भी आदेश जारी नहीं किया जाना चाहिए, जिस से समाज में सांप्रदायिक विभाजन पैदा हो. कई मौके पर मुजफ्फरनगर के मुसलमान कांवड़ यात्रियों की मदद करते देखे गए हैं.

राजग केंद्र सरकार में शामिल केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के फैसले पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा, ‘मेरी लड़ाई जातिवाद और सांप्रदायिकता के खिलाफ है, इसलिए जहां कहीं भी जाति और धर्म के विभाजन की बात होगी, मैं उस का कभी भी समर्थन नहीं करूंगा.’

दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने पहले तो योगी सरकार के फैसले पर सवाल उठाए और इसे छुआछूत को बढ़ावा देने वाला बताया, पर बाद में कहा कि राज्य सरकार के आदेश से साफ है कि कांवड़ियों की आस्था को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया गया है, लेकिन कुछ लोग सांप्रदायिकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं.

इस तरह भारतीय जनता पार्टी का चरित्र आज देश के चौराहे पर खड़ा है. दूसरी तरफ मजेदार बात किया है कि कांवड़ यात्रा के रास्ते पर कांग्रेस के नेता राहुल गांधी की मुहब्बत की दुकान के पोस्टर दिखाई देने लगे हैं, जो बताता है कि उन की लोकप्रियता और विचार अब देश की जनता स्वीकार करने लगी है. यह सीधेसीधे नरेंद्र मोदी सरकार के लिए खतरे की घंटी है.

मेरा दोस्त एक आंटी के चक्कर में पड़ गया है, उसे निकालने के लिए मैं क्या करूं?

सवाल-

मेरा एक दोस्त है जो एक आंटी के चक्कर में पड़ गया है. वह 23 साल का और आंटी 42 साल की हैं. मुझे नहीं पता कि लड़कियों से हट कर उस का इंटरैस्ट आंटी में कैसे आ गया. मुझे उस की बहुत चिंता हो रही है, कहीं वह किसी प्रौब्लम में न पड़ जाए. जब से वह उन आंटी के साथ रिलेशन में है, तब से न तो उस का पढ़ाई में ध्यान है और न वह किसी और दोस्त से मिलना ही चाहता है. वे आंटी शादीशुदा हैं पर उन्हें कोई बच्चा नहीं है. वे काफी मौडर्न किस्म की औरत हैं. मेरे दोस्त की मम्मी और वे आंटी अच्छी दोस्त हैं, और इसी के चलते मेरा दोस्त उन के चक्कर में पड़ा है. सैक्स तो इन दोनों के लिए नौर्मल हो चुका है. मुझे डर है कि इन संबंधों की वजह से उस की जिंदगी पर कोई गहरा असर न पड़ जाए.

जवाब-

यह तो लोगों की अपनी-अपनी प्रेफ्रैंस है कि उन्हें लड़की पसंद आती है या आंटी. आप का दोस्त उस कैटेगरी में है जिन्हें आंटी पसंद आती हैं. आप की फिक्र सही है क्योंकि ऐसे केसेस में जब औरत के पति को उस के अफेयर के बारे में पता चलता है तो उस के आशिक को भी आड़ेहाथों लिया जाता है. अपने दोस्त को समझाने की कोशिश करें कि इन चक्करों में शुरुआत में बड़ा मजा आता है लेकिन यदि वे आंटी उस के पीछे पड़ गईं तो उसे लेने के देने पड़ जाएंगे. एक तो वे उस की खुद की मम्मी की दोस्त हैं, ऊपर से शादीशुदा हैं और उम्र में दोगुनी भी हैं. इस रिश्ते में सैक्स के अलावा कुछ है ही नहीं. अपने दोस्त को कैसे भी कर के समझाएं. अगर वह न समझे तो उसे उस के घरवालों को सब बताने की धमकी दें. तब तो शायद वह समझ ही जाएगा. उसे यह बात भी समझा दें कि चुपचाप इस रिश्ते को खत्म करना कितना बेहतर है बजाय सब की नजरों में गिर कर अलग होने के.

डेटिंग टिप्स: सेक्स को लें गंभीरता से

कालेज में पढ़ने वाले युवाओं को सेक्स संबंध बनाना हो या फिर लिव इन रिलेशनशिप में रहना हो, उन्हें इस बारे में अधिक सोचविचार की आवश्यकता नहीं होती. एक समय था जब विवाहपूर्व सेक्स के बारे में सोचना गलत माना जाता था, लेकिन आज तमाम सर्वे पर नजर डालें तो न सिर्फ युवा बल्कि किशोरकिशोरियों को भी सेक्स से कोई परहेज नहीं है. यह बात सही हो सकती है, लेकिन बिना सोचेसमझे सेक्स और इसे गंभीरता से लिए बिना कोई कदम उठाना सही नहीं है. इस से खुद को ही नुकसान हो सकता है. इसलिए सेक्स को मजाक न समझें, बल्कि गंभीरता से लें.

यह मजाक नहीं है

कई बार युवा अपने दोस्तों की देखा देखी या फिर दोस्तों में लगी शर्त को पूरा करने के चक्कर में सेक्स संबंध स्थापित करते हैं, ताकि वे अपने दोस्तों के बीच दबदबा बना सकें. लेकिन उन्हें इस बात का पता ही नहीं रहता कि कुछ पलों के हंसीमजाक के चलते उन्होंने अपनी जिंदगी का कितना अहम कदम बिना सोचेसमझे उठा लिया है. इसलिए सेक्स को गंभीरता से लें.

शादी के बाद होगी मुश्किल

शादी के बाद पति को भी इस का पता चल सकता है. यदि अपनी किशोरावस्था में आप ने सेक्स को गंभीरता से नहीं लिया और अपने फ्रैंड से कई बार सेक्स संबंध बनाए तो हो सकता है शादी के बाद पति को इस बात की किसी तरह भनक लग जाए और अगर ऐसा हुआ तो आप की खुशहाल जिंदगी क्या करवट लेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता.

यौन संबंधी बीमारियों का डर

आमतौर पर विवाहपूर्व सेक्स संबंध शारीरिक और भावनात्मक स्तर पर सुरक्षित नहीं माने जाते. असुरक्षित सेक्स से कई यौन रोग भी गले पड़ सकते हैं, जो जानलेवा होते हैं. यदि कम उम्र में ऐसे संबंध स्थापित किए जाते हैं तो इस का असर शारीरिक विकास पर पड़ता है. इस के साथ ही सामाजिक संबंधों पर भी इस का गहरा असर पड़ता है.

साथी के साथ ही करें सेक्स

सेक्स हमेशा उसी के साथ करें जिसे आप ने जीवनसाथी बनाना है. कोशिश करें कि शादी से पहले अपने बौयफ्रैंड से सेक्स संबंध न बनाएं, क्योंकि उस के मन में यह विचार आ सकता है कि जो लड़की मेरे साथ सेक्स कर सकती है उस ने औरों के साथ भी संबंध बनाए होंगे. किसी अजनबी के साथ सेक्स संबंध बनाना न तो ठीक है और न ही सुरक्षित. सेक्स संबंधों में जल्दबाजी न करें बल्कि जिस के साथ सेक्स करना है उस के बारे में अच्छी तरह जान कर व सोचसमझ कर ही आगे बढ़ें. यह भी ध्यान रहे कि वह संबंध बनाने की बात दूसरों को न बता दे.

जगह का चुनाव करें

सेक्स कहां कर रहे हैं, यह भी काफी माने रखता है. वह जगह सेफ न हुई या किसी ने होटल के कमरे में वीडियो क्लिपिंग बना ली तो क्या होगा, इसलिए जहां मन हुआ सेक्स कर लिया ऐसा नहीं होना चाहिए. सेक्स करने से पहले गंभीरता से सोचें कि इसे कहां किया जाए.

ब्लैकमेलिंग से बचें

बौयफ्रैंड के पास आप के कुछ पर्सनल फोटो हो सकते हैं, जिन से आगे चल कर वह आप को ब्लैकमेल भी कर सकता है, इस बात का भी ध्यान रखें, फिर चाहे वह बौयफ्रैंड हो या कोई और. सेक्स  से पहले यह बात जरूर सोच लें कि इस वजह से कहीं आप ब्लैकमेलिंग का शिकार न हो जाएं, इसलिए इन बातों का विशेष खयाल रखें.

प्रैग्नैंसी का खतरा

इस बात पर भी विचार करना जरूरी है कि अगर आप ने बिना सोचेविचारे जल्दबाजी में सेक्स संबंध बनाने का फैसला किया और उस दौरान कोई सावधानी नहीं बरती तो गर्भ ठहरने का खतरा भी बना रहता है. यदि ऐसा होता है तो आप मानसिक तनाव से घिर जाएंगी, क्योंकि इस का दुष्प्रभाव आप की पूरी जिंदगी पर पड़ेगा.

डिप्रैशन न हो जाए

जब कई बार इन संबंधों में दरार पड़ती है तो दोनों पक्षों को ही गहरा मानसिक आघात पहुंचता है. ऐसे में सामाजिक और नैतिक बंधनों के चलते विवाहपूर्व सेक्स संबंध बनाने की शर्म, ग्लानि, अविश्वास, तनाव तथा एकदूसरे के प्रति सम्मान की कमी जैसे कारक मुख्य भूमिका निभाते हैं.

डेटिंग को डेटिंग ही रहने दें

कई बार डेटिंग के दौरान भी सेक्स संबंध बन जाते हैं. जहां डेटिंग का मकसद एकदूसरे को भलीभांति जानना होता है वहीं वे उस मकसद को भूल सेक्स संबंध स्थापित कर लेते हैं. सेक्स के लिए तो पूरी जिंदगी पड़ी है, लेकिन अभी समय एकदूसरे को जाननेसमझने का है. यह वक्त दोबारा नहीं आएगा, इसलिए पहले दोनों एकदूसरे को भलीभांति समझ लें और अपने रिश्ते को कुछ समय दें. उस के बाद इस पायदान पर आएं.

अच्छा नहीं उतावलापन

सेक्स के लिए उतावलापन अच्छा नहीं है इसलिए आप को प्रोफैशनल या बाजारू महिला या पुरुष के साथ सेक्स संबंध बनाने से बचना चाहिए. यह पूरी तरह गलत है. इस से आप गलत लोगों के चंगुल में भी फंस सकते हैं.

जबरदस्ती सेक्स न करें

सेक्स जबरन नहीं करना चाहिए. आप को किसी के दबाव या किसी अन्य कारण से सेक्स करने से बचना चाहिए. साथ ही किसी डर की वजह से भी सेक्स नहीं करना चाहिए. मन के सारे भ्रम और आशंकाएं निकालने के बाद ही सेक्स संबंध बनाएं.

सही कदम

  • हर चीज समय पर ही अच्छी लगती है और सही भी रहती है. माना कि दिल किशोरावस्था में प्रेम की पींगें बढ़ाने को बेताब रहता है. प्रेम करना गलत नहीं है अवश्य करें, लेकिन सेक्स के लिए सही वक्त का इंतजार भी जरूरी है. तभी उस का असली मजा और आनंद ले पाएंगे वरना वह कुछ पलों का आनंद तो देगा लेकिन बाद में मन का सुकून भी छीन लेगा.
  • अगर फिर भी आप ने सेक्स का मन बना ही लिया है तो समय और स्थान का ऐसा चुनाव करें जो आप के लिए पूरी तरह सुरक्षित हो और बाद में किसी मुसीबत में फंसाने वाला न हो, इसलिए किसी भी कमजोर पल में सेक्स करने का फैसला न लें बल्कि यदि सेक्स करना भी है तो सोचीसमझी योजना के तहत करें.
  • सेक्स के बाद यदि प्रैग्नैंसी आदि का वहम हो रहा है तो बिना डाक्टर को दिखाए खुद ही किसी नतीजे पर न पहुंचें, बल्कि सब से पहले इस बारे में अपने घर पर बड़ी बहन, मां आदि को बताएं. यह सच है कि आप को बताने में हिचकिचाहट होगी, डर भी लगेगा और शायद शर्मिंदगी भी होगी, लेकिन यह शर्मिंदगी उस मुसीबत से कम होगी जो न बताने पर आप को झेलनी पड़ सकती है. वह आप के घर वाले हैं, इस बात को सुन कर चाहे लाख नाराज हों, आप को डांटें, लेकिन इस मुसीबत से निकालने की जिम्मेदारी लेने में उन्हें देर नहीं लगेगी. उस समय वह वही करेंगे जो आप के लिए उचित होगा. इसलिए उन पर विश्वास कर हिम्मत कर के एक बार उन से सच कह डालिए, फिर देखिए कैसे आप की परेशानी हल होती है.
  • अगर आप का कोई बौयफ्रैंड है जिस पर आप बहुत विश्वास करती हैं तो भी उसे अपना कोई वीडियो आदि न बनाने दें चाहे कुछ भी हो जाए. वह रिश्ता तोड़ने की धमकी देता है तो न डरें, क्योंकि जो युवक आप से ऐसी बात कह रहा है वह किसी भी तरह का रिश्ता रखने के लायक नहीं है.
  • अगर सेक्स करना भी है तो इस बात का खयाल रखें कि उस की वजह से आप की पढ़ाई में कोई बाधा न आए. यह समय आप के भविष्य बनाने का है. इस में किसी भी तरह का कोई व्यवधान नहीं आना चाहिए. सेक्स कर के कहीं हर वक्त उसी में खोए रह कर पढ़ाई करना न भूलें. पढ़ाई आप की पहली जरूरत है, बाकी सब बाद में.

तुम्हें पाने की जिद में : रत्ना की क्या जिद थी

ट्रेन में बैठते ही सुकून की सांस ली. धीरज ने सारा सामान बर्थ के नीचे एडजस्ट कर दिया था. टे्रन के चलते ही ठंडी हवा के झोंकों ने मुझे कुछ राहत दी. मैं अपने बड़े नाती गौरव की शादी में शामिल होने इंदौर जा रही हूं.

हर बार की घुटन से अलग इस बार इंदौर जाते हुए लग रहा है कि अब कष्टों का अंधेरा मेरी बेटी की जिंदगी से छंट चुका है. आज जब मैं अपनी बेटी की खुशियों में शामिल होने इंदौर जा रही हूं तो मेरा मन सफर में किसी पत्रिका में सिर छिपा कर बैठने की जगह उस की जिंदगी की किताब को पन्ने दर पन्ने पलटने का कर  रहा है.

कितने खुश थे हम जब अपनी प्यारी बिटिया रत्ना के लिए योग्य वर ढूंढ़ने में अपने सारे अनुभव और प्रयासों के निचोड़ से जीतेंद्र को सर्वथा उपयुक्त वर समझा था. आकर्षक व्यक्तित्व का धनी जीतेंद्र इंदौर के प्रतिष्ठित कालिज में सहायक प्राध्यापक है. अपने मातापिता और भाई हर्ष के साथ रहने वाले जीतेंद्र से ब्याह कर मेरी रत्ना भी परिवार का हिस्सा बन गई. गुजरते वक्त के साथ गौरव और यश भी रत्ना की गोद में आ गए. जीतेंद्र गंभीर और अंतर्मुखी थे. उन की गंभीरता ने उन्हें एकांतप्रिय बना कर नीरसता की ओर ढकेलना शुरू कर दिया था.

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जीतेंद्र के छोटे भाई चपल और हंसमुख हर्ष के मेडिकल कालिज में चयनित होते ही मातापिता का प्यार और झुकाव उस के प्रति अधिक हो गया. यों भी जोशीले हर्ष के सामने अंतर्मुखी जीतेंद्र को वे दब्बू और संकोची मानते आ रहे थे. भावी डाक्टर के आगे कालिज में लेक्चरर बेटे को मातापिता द्वारा नाकाबिल करार देना जीतेंद्र को विचलित कर गया.

बारबार नकारा और दब्बू घोषित किए जाने का नतीजा यह निकला कि जीतेंद्र गहरे अवसाद से ग्रस्त हो गए. संवेदनशील होने के कारण उन्हें जब यह एहसास और बढ़ा तो वह लिहाज की सीमाओं को लांघ कर अपने मातापिता, खासकर मां को अपना सब से बड़ा दुश्मन समझने लगे. वैचारिक असंतुलन की स्थिति में जीतेंद्र के कानों में कुछ आवाजें गूंजती प्रतीत होती थीं जिन से उत्तेजित हो कर वह अपने मातापिता को गालियां देने से भी नहीं चूकते थे.

शांत कराने या विरोध का नतीजा मारपीट और सामान फेंकने तक पहुंच जाता था. वह मां से खुद को खतरा बतला कर उन का परोसा हुआ खाना पहले उन्हें ही चखने को मजबूर करते थे. उन्हें संदेह रहता कि इस में जहर मिला होगा.

जीतेंद्र को रत्ना का अपनी सास से बात करना भी स्वीकार न था. वह हिंसक होने की स्थिति में उन का कोप भाजन नन्हे गौरव और यश को भी बनना पड़ता था.

मेरी रत्ना का सुखी संसार क्लेश का अखाड़ा बन गया था. अपने स्तर पर प्यारदुलार से जीतेंद्र के मातापिता और हर्ष ने सबकुछ सामान्य करने की कोशिश की थी मगर तब तक पानी सिर से ऊपर जा चुका था. यह मानसिक ग्रंथि कुछ पलोें में नहीं शायद बचपन से ही जीतेंद्र के मन में पल रही थी.

दौरों की बढ़ती संख्या और विकरालता को देखते हुए हर्ष और उन के मातापिता जीतेंद्र को मानसिक आरोग्यशाला आगरा ले कर गए. मनोचिकित्सक ने मेडिकल हिस्ट्री जानने के बाद कुछ परीक्षणों व सी.टी. स्केन की रिपोर्ट को देख कर उन की बीमारी को सीजोफे्रनिया बताया. उन्होंने यह भी कहा कि इस रोग का उपचार लंबा और धीमा है. रोगी के परिजनों को बहुत धैर्य और संयम से काम लेना होता है. रोगी के आक्रामक होने पर खुद का बचाव और रोगी को शांत कर दवा दे कर सुलाना कोई आसान काम नहीं था. उन्हें लगातार काउंसलिंग की आवश्यकता थी.

हम परिस्थितियों से अनजान ही रहते यदि गौरव और यश को अचंभित करने यों अचानक इंदौर न पहुंचते. हालात बदले हुए थे. जीतेंद्र बरसों के मरीज दिखाई दे रहे थे. रत्ना पति के क्रोध की निशानियों को शरीर पर छिपाती हुई मेरे गले लग गई थी. मेरा कलेजा मुंह को आ रहा था. जिस रत्ना को एक ठोकर लगने पर मैं तड़प जाती थी वही रत्ना इतने मानसिक और शारीरिक कष्टों को खुद में समेटे हुए थी.

जब कोई उपाय नहीं रहता था तो पास के नर्सिंग होम से नर्स को बुला कर हाथपांव पकड़ कर इंजेक्शन लगवाना ही आखिरी उपाय रहता था.

इतने पर भी रत्ना की आशा और  विश्वास कायम था, ‘मां, यह बीमारी लाइलाज नहीं है.’ मेरी बड़ी बहू का प्रसव समय नजदीक आ रहा था सो मैं रत्ना को हौसला दे कर भारी मन से वापस आ गई थी.

रत्ना मुझे चिंतामुक्त रखने के लिए अपनी लड़ाई खुद लड़ कर मुझे तटस्थ रखना चाहती थी. इस दौरान मेरे बेटे मयंक और आकाश जीतेंद्र को दोबारा आगरा मानसिक आरोग्यशाला ले कर गए. जीतेंद्र को वहां एडमिट किया जाना आवश्यक था, लेकिन उसे अकेले वहां छोड़ने को इन का दिल गवारा न करता और उसे काउंसलिंग और परीक्षणों के बाद आवश्यक हिदायतों और दवाओं के साथ वापस ले आते थे.

मैं बेटों के वापस आने पर पलपल की जानकारी चाहती थी. मगर वे ‘डाक्टर का कहना है कि जीतेंद्र जल्दी ही अच्छे हो जाएंगे,’ कह कर दाएंबाएं हो जाते थे.

कहां भूलता है वह दिन जब मेरे नाती यश ने रोते हुए मुझे फोन किया था. यश सुबकते हुए बहुत कुछ कहना चाह रहा था और गौरव फुसफुसा कर रोक रहा था, ‘फोन पर कुछ मत बोलो…नानी परेशान हो जाएंगी.’

लेकिन जब मैं ने उसे सबकुछ बताने का हौसला दिया तो उस ने रोतेरोते बताया, ‘नानी, आज फिर पापा ने सारा घर सिर पर उठाया हुआ है. किसी भी तरह मनाने पर दवा नहीं ले रहे हैं. मम्मी को उन्होंने जोर से जूता मारा जो उन्हें घुटने में लगा और बेचारी लंगड़ा कर चल रही हैं. मम्मी तो आप को कुछ भी बताने से मना करती हैं, मगर हम छिप कर फोन कर रहे हैं. पापा इस हालत में हमें अपने पापा नहीं लगते हैं. हमें उन से डर लगता है. नानी, आप प्लीज, जल्दी आओ,’ आगे रुंधे गले से वह कुछ न कह सका था.

तब मैं और धीरज फोन रखते ही जल्दी से इंदौर के लिए रवाना हो गए थे. उस बार मैं बेटी की जिंदगी तबाह होने से बचाने के लिए उतावलेपन से बहुत ही कड़ा निर्णय ले चुकी थी लेकिन धीरज अपने नाम के अनुरूप धैर्यवान हैं, मेरी तरह उतावले नहीं होते.

इंदौर पहुंच कर मेरे मन में हर बार की तरह जीतेंद्र के लिए कोई सहानुभूति न थी बल्कि वह मेरी बेटी की जिंदगी तबाह करने का दोषी था. तब मेरा ध्येय केवल रत्ना, यश और गौरव को वहां से मुक्त करा कर अपने साथ वापस लाना था. जीतेंद्र की इस दशा के दोषी उस के मातापिता हैं तो वही उस का ध्यान रखें. मेरी बेटी क्यों उस पागल के साथ घुटघुट कर अपना जीवन बरबाद करे.

उफ, मेरी रत्ना को कितनी यंत्रणा और दुर्दशा सहनी पड़ रही थी. जीतेंद्र सो रहे थे. उन्हें बड़ी मुश्किल से दवा दे कर सुलाया गया था.

एकांत देख कर मैं ने अपने मन की बात रत्ना के सामने रख दी थी, ‘बस, बहुत हो गई सेवा. हमारे लिए तुम बोझ नहीं हो जो जीतेंद्र की मार खा कर यहां पड़ी रहो. करने दो इस के मांबाप को इस की सेवा. तुम जरूरी सामान बांधो और बच्चों को ले कर हमारे साथ चलो.’

तब यश और गौरव सहमे हुए मेरी बात से सहमत दिखाई दे रहे थे. आखिरकार उन्होंने ही तो मुझे समस्या से उबरने के लिए यहां बुलाया था. ‘क्या सोच रही हो, रत्ना. चलने की तैयारी करो,’ मैं ने उसे चुप देख कर जोर से कहा था.

‘सोच रही हूं कि मां बेटी के प्यार में कितनी कमजोर हो जाती है. आप को इन हालात से निकलने का सब से सरल उपाय मेरा आप के साथ चलना ही लग रहा है. ‘जीवन एक संघर्ष है’ यह घुट्टी आप ने ही पिलाई है और बेटी के प्यार में यह मंत्र आप ही भूले जा रही हैं… और लोगों की तरह आप भी इन्हें पागल की उपमा दे रही हैं जबकि यह केवल एक बीमार हैं.

‘आप ने तो पूर्ण स्वस्थ और सुयोग्य जीतेंद्र से मेरा विवाह किया था न? मैं ने जिंदगी की हर खुशी इन से पाई है. स्वस्थ व्यक्ति कभी बीमार भी हो सकता है तो क्या बीमार को छोड़ दिया जाता है. इन की इस बीमारी को मैं ने एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया है. दुनिया में संघर्षशील व्यक्ति न जाने कितने असंभव कार्यों को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हैं, तो क्या मैं मानव सेवा परम धर्म के संस्कार वाले समाज में अपने पति की सेवा का प्रण नहीं ले सकती.

‘जीतेंद्र को इस हाल में छोड़ कर आप अपने दिल से पूछिए, क्या वाकई मैं आप के पास खुश रह पाऊंगी. यह मातापिता की अवहेलना से आहत हैं… पत्नी के भी साथ छोड़ देने से इन का क्या हाल होगा जरा सोचिए.

‘मम्मी, आप पुत्री मोह में आसक्त हो कर ऐसा सोच रही हैं लेकिन मैं ऐसा करना तो दूर ऐसा सोच भी नहीं सकती. हां, आप कुछ दिन यहां रुक जाइए… यश और गौरव को नानानानी का साथ अच्छा लगेगा. इन दिनों मैं उन पर ध्यान भी कम ही दे पाती हूं.’

रत्ना धीरेधीरे अपनी बात स्पष्ट कर रही थी. वह कुछ और कहती इस से पहले रत्ना के पापा, जो चुपचाप हमारी बात सुन रहे थे, उठ कर रत्ना को गले लगा कर बोले, ‘बेटी, मुझे तुम से यही उम्मीद थी. इसी तरह हौसला बनाए रहो, बेटी.’

रत्ना के निर्णय ने मेरे अंतर्मन को झकझोर दिया था. ऐसा लगा कि मेरी शिक्षा अधूरी थी. मैं ने रत्ना को जीवन संघर्ष मानने का मंत्र तो दिया मगर सहजता से जिम्मेदारियों का वहन करते हुए कर्तव्य पथ पर अग्रसर होने का पाठ मुझे रत्ना ने पढ़ाया. मैं उस के सिर पर हाथ फेर कर भरे गले से सिर्फ इतना ही कह पाई थी, ‘बेटी, मैं तुम्हारे प्यार में हार गई लेकिन तुम अपने कर्तव्यों की निष्ठा में जरूर जीतोगी.’

कुछ दिन रत्ना और बच्चों के साथ गुजार कर मैं धीरज के साथ वापस आ गई थी. हम रहते तो ग्वालियर में थे मगर मन रत्ना के आसपास ही रहता था. दोनों बेटे अपने बच्चों और पत्नी के परिवार में खुश थे. मैं उन की तरफ से निश्चिंत थी. हम सभी चिंतित थे तो बस, रत्ना पर आई मुसीबत से. धीरज छुट्टियां ले कर मेरे साथ हरसंभव कोशिश करते जबतब इंदौर पहुंचने की.

रत्ना के ससुर इस मुश्किल समय में रत्ना को सहारा दे रहे थे. उन्होंने बडे़ संघर्षों के साथ अपने दोनों बेटों को लायक बनाया था. जीतेंद्र ही आर्थिक रूप से घर को सुदृढ़ कर रहे थे. हर्ष तब मेडिकल कालिज में पढ़ रहा था. इसलिए घर की आर्थिक स्थिति डांवांडोल होने लगी थी. बीमारी की वजह से जीतेंद्र को महीनों अवकाश पर रहना पड़ता था. अनेक बार छुट्टियां अवैतनिक हो जाती थीं. दवाइयों का खर्च तो था ही. काफी समय आगरा में अस्पताल में भी रहना पड़ता था.

जब कभी जीतेंद्र कालिज जाते तो रत्ना भी साथ जाती थी. रत्ना के कालिज  में उन के सहयोगियों से सहानुभूति और सहयोग की प्रार्थना की थी कि वे लोग जीतेंद्र की मानसिक स्थिति को देखते हुए उन के साथ बहस या तर्क न करें. जीतेंद्र को संतुलित रखने के लिए रत्ना साए की तरह उन के साथ रहती.

जीतेंद्र को बच्चों के भरोसे छोड़ कर रत्ना बाहर कहीं नौकरी करने भी नहीं जा सकती थी. इसलिए घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था. जिस दिन जीतेंद्र कुछ विचलित दिखते थे रत्ना को ट्यूशन वाले बच्चों को वापस भेजना पड़ता था, क्योंकि एक तो वह उन बच्चों को जीतेंद्र का कोपभाजन नहीं बनाना चाहती थी और दूसरे, वह नहीं चाहती थी कि आसपड़ोस के बच्चे जीतेंद्र की असंतुलित मनोदशा को नमकमिर्च लगा कर अपने परिजनों में प्रचारित करें. इस कारण सामान्य दिनों में उसे अधिक समय ट्यूशन में देना पड़ता था.

गृहस्थी की दो पहियों की गाड़ी में एक पहिए के असंतुलन से दूसरे पहिए पर सारा दारोमदार आ टिका था. सभी साजोसामान से भरा घर घोर आर्थिक संकट में धीरेधीरे खाली हो रहा था. यश और गौरव को शहर के प्रतिष्ठित पब्लिक स्कूल से निकाल कर पास के ही एक स्कूल में दाखिला दिला दिया था ताकि आनेजाने के खर्च और आर्थिक बोझ को कुछ कम किया जा सके. मासूम बच्चे भी इस संघर्ष के दौर में मां के साथ थे. वे कक्षा में अव्वल आ कर मां की आंखों में आशा के दीप जलाए हुए थे.

रत्ना जाने किस मिट्टी की बनी थी जो पल भर भी बिना आराम किए घर, बच्चों, ट्यूशन और पति सेवा में कहीं भी कोई कसर न रखना चाहती थी.

मेरे बेटे मयंक और आकाश अपनी लाड़ली बहन रत्ना की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते पर स्वाभिमानी रत्ना ने आर्थिक सहायता लेने से विनम्र इनकार कर दिया था. उस का कहना था कि अपने परिवार के खर्चों के बाद एक गृहस्थी की गाड़ी खींचने के लिए आप को अपने परिवार की इच्छाओं का गला घोंटना पडे़गा. भाई, आप का यह अपनापन और सहारा ही काफी है कि आप मुश्किल वक्त में मेरे साथ खडे़ हैं.

इन हालात की जिम्मेदार जीतेंद्र की मां खुद को निरपराधी साबित करने के लिए चोट खाई नागिन की तरह रत्ना के खिलाफ नईनई साजिशें रचती रहतीं. छोटे बेटे हर्ष और पति की असहमति के बावजूद जीतेंद्र को दूरदराज के ओझास्यानों के पास ले जा कर तंत्र साधना और झाड़फूंक करातीं जिस से जीतेंद्र की तबीयत और बिगड़ जाती थी. जीतेंद्र के विचलित होने पर उसे रत्ना के खिलाफ भड़का कर उस के क्रोध का रुख रत्ना  की ओर मोड़ देती थीं. केवल रत्ना ही उन्हें प्यारदुलार से दवा खिला पाती थी. लेकिन तब नफरत की आंधी बने जीतेंद्र को दवा देना भी मुश्किल हो जाता था.

जीतेंद्र को स्वयं पर भरोसा मजबूत कर अपने भरोसे में लेना, उन्हें उत्साहित करते हुए जिंदादिली कायम करना उन की काउंसलिंग का मूलमंत्र था.

सहनशक्ति की प्रतिमा बनी मेरी रत्ना सारे कलंक, प्रताड़ना को सहती चुपचाप अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करती रही. यश और गौरव को हमारे साथ रखने का प्रस्ताव वह बहुत शालीनता से ठुकरा चुकी थी. ‘मम्मी, इन्हें हालात से लड़ना सीखने दो, बचना नहीं.’ वाकई बच्चे मां की मेहनत को सफल करने में जी जान से जुटे थे. गौरव इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर पूणे में नौकरी कर रहा है. यश इंदौर में ही एम.बी.ए. कर रहा है.

हर्ष के डाक्टर बनते ही घर के हालात कुछ पटरी पर आ गए थे. रत्ना की सेवा, काउंसलिंग और व्यायाम से जीतेंद्र लगभग सामान्य रहने लगे थे. हां, दवा का सेवन लगातार चलते रहना है. अपने बेटों की प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार मिल रही सफलता से वे गौरवान्वित थे.

रत्ना की सास अपने इरादों में कामयाब न हो पाने से निराश हो कर चुप बैठ गई थीं. भाभी को अकारण बदनाम करने की कोशिशों के कारण हर्ष की नजरों में भी अपनी मां के प्रति सम्मान कम हुआ था. हमेशा झूठे दंभ को ओढे़ रहने वाली हर्ष की मां अब हारी हुई औरत सी जान पड़ती थीं.

ट्रेन खुली हवा में दौड़ने के बाद धीमेधीमे शहर में प्रवेश कर रही थी. मैं अतीत से वर्तमान में लौट आई. इत्मिनान से रत्ना की जिंदगी की किताब के सुख भरे पन्नों तक पहुंचतेपहुंचते मेरी ट्रेन भी इंदौर पहुंच गई.

स्टेशन पर रत्ना और जीतेंद्र हमें लेने आए थे. कितना सुखद एहसास था यह जब हम जीतेंद्र और रत्ना को स्वस्थ और प्रसन्न देख रहे थे. शादी में सभी रस्मों में भागदौड़ में जीतेंद्र पूरी सक्रियता से शामिल थे. उन्हें देख कर लग ही नहीं रहा था कि यह व्यक्ति ‘सीजोफेनिया’ जैसे जजबाती रोग की जकड़न में है.

गौरव की शादी धूमधाम से हुई. शादी के बाद गौरव और नववधू बड़ों का आशीर्वाद ले कर हनीमून के लिए रवाना हो गए. शाम को मैं, धीरज, रत्ना और जीतेंद्र में चाय पीते हुए हलकीफुलकी गपशप में मशगूल थे. तब जीतेंद्र ने झिझकते हुए मुझ से कहा, ‘‘मम्मीजी, आप ने रत्ना के रूप में एक अमूल्य रत्न मुझे सौंपा है जिस की दमक से मेरा घर आलोकित है. मुझे सही मानों में सच्चा जीवनसाथी मिला है, जिस ने हर मुश्किल में मेरा साथ दिया है.’’

बेटी की गृहस्थी चलाने की सूझबूझ और सहनशक्ति की तारीफ सुन कर मेरा सिर गर्व से ऊंचा हो गया. ‘‘रत्ना, मेरा दुर्व्यवहार, इतनी आर्थिक तंगी, सास के दंश, मेरा इलाज… कैसे सह पाईं तुम इतना कुछ?’’ अनायास ही रत्ना से मुसकरा कर पूछ बैठे थे जीतेंद्र. रत्ना शरमा कर सिर्फ इतना ही कह सकी, ‘‘बस, तुम्हें पाने की जिद में.’’-

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