Crime Story: प्यार में जब खेला गया अपहरण का खेल

15 सितंबर, 2016 को अपने दोनों बेटों को स्कूल भेजने के बाद परमजीत कौर घर के  जरूरी काम निपटा कर बाजार चली गई थी. बाजार से लौटने में उसे दोपहर के 2 बज गए. बाजार से लाया सामान रख कर उस ने मां से पूछा, ‘‘बीजी, अभी बच्चे स्कूल से नहीं आए क्या?’’

‘‘थकीमांदी आई हो, आराम से एक गिलास पानी पियो. बच्चे आते ही होंगे, वे कहां जाएंगे, रास्ते में खेलने लग गए होंगे.’’

‘‘बीजी, गांव के सारे बच्चे आ गए हैं, मेरे ही बेटे कहां रह गए?’’ परेशान परमजीत

कौर ने कहा, ‘‘मैं जरा देख कर आती हूं.’’

परमजीत कौर घर से निकल रही थी, तभी घर के बाहर उस के पिता पाला सिंह मिल गए. बच्चों के स्कूल से न आने की बात सुन कर वह भी परेशान हो उठे. बच्चों की तलाश में परमजीत कौर के साथ वह भी चल पड़े. पाला सिंह और परमजीत कौर ने गांव के लगभग सभी बच्चों से अपने बच्चों के बारे में पूछा, पर कोई भी बच्चा उन के बारे में नहीं बता सका.

बच्चों ने सिर्फ यही बताया था कि स्कूल की छुट्टी होने पर उन्होंने उन्हें देखा तो था, लेकिन उस के बाद वे कहां चले गए, यह किसी को पता नहीं था. बच्चों के न मिलने से परमजीत कौर का बुरा हाल था. किसी अनहोनी के बारे में सोच कर वह फूटफूट कर रो रही थी. स्कूल के अध्यापक सतपाल और प्रिंसिपल जगदीश कुमार ने भी बताया था कि छुट्टी होने तक तो दोनों बच्चे साथसाथ दिखाई दिए थे. लेकिन स्कूल से निकलने के बाद वे किधर गए, उन्हें पता नहीं था.

परमजीत कौर के मन में एक ही सवाल बारबार उठ रहा था कि आखिर उस के बच्चे कहां चले गए? रोरो कर वह सब से पूछ भी यही रही थी. शाम करीब 4 बजे गांव के ही हरप्रीत से पता चला कि उस के दोनों बेटों अंकुशदीप और जशनदीप को एक आदमी अपनी मोटरसाइकिल पर बैठा कर ले गया था.

वह मोटरसाइकिल सवार कौन था, हरप्रीत यह नहीं बता सका था. उस ने बताया था कि वह अपने मुंह पर काला कपड़ा बांधे था, इसलिए वह उसे पहचान नहीं सका था. कोई अंजान आदमी अपनी मोटरसाइकिल पर दोनों बच्चों को बिठा कर ले गया था, इस का मतलब था कि उन का अपहरण हुआ था.

इतना जानने के बाद समय बेकार करना ठीक नहीं था, इसलिए पाला सिंह बेटी परमजीत कौर, स्कूल के प्रिंसिपल जगदीश कुमार और गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर पुलिस को सूचना देने जिला फाजिल्का के थाना बहाववालापुरा की पुलिस चौकी वजीदपुर भीमा जा पहुंचे.

चौकीप्रभारी मुंशीराम ने उन लोगों की बातें ध्यान से सुनने के बाद थानाप्रभारी तेजेंद्रपाल सिंह के अलावा उच्चाधिकारियों को भी घटना की सूचना दे दी. इस के बाद उन्हीं के निर्देश पर 8 साल के अंकुशदीप सिंह और 6 साल के जशनदीप सिंह के अपहरण का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर काररवाई शुरू कर दी.

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मुकदमा दर्ज होते ही चौकीप्रभारी मुंशीराम ने शहर से बाहर जाने वाले सभी प्रमुख मार्गों पर नाके लगवा दिए. छोटीबड़ी हर गाड़ी की तलाशी ली जाने लगी. पुलिस अपनी काररवाई कर ही रही थी कि चौकी वजीदपुर भीमा के मुंशी के पास एक फोन आया, जिस में फोन करने वाले ने कहा, ‘‘मैं गुरजंट सिंह बोल रहा हूं. अपने साहब से कह दो कि जिन बच्चों को वे ढूंढ रहे हैं, उन के लिए वे परेशान न हों. बच्चे मेरे पास हैं. यह हमारा आपस के लेनदेन का मामला है, इसलिए आप लोगों को बीच में पड़ने की जरूरत नहीं है.’’

यही बात परमजीत कौर को भी फोन कर के कही गई थी. फोन करने वाले ने उस से कहा था, ‘‘मैं बच्चों का अंकल बोल रहा हूं. तुम ने मुझ से जो 20 हजार रुपए लिए थे, उन्हें दे जाओ और मुझ से शादी कर लो. अगर तुम ने मेरी बात मान ली तो मैं तुम्हारे दोनों बेटों को छोड़ दूंगा. अगर नहीं मानी तो उन के छोटेछोटे टुकड़े कर के कहीं फेंक दूंगा.’’

ये दोनों फोन एक ही नंबर से किए गए थे. पुलिस इस सोच में पड़ गई कि फोन करने वाला सनकी है या फिर बेहद चालाक? कहीं वह पुलिस को अपनी इन बातों में उलझा कर कोई नया खेल तो नहीं खेलना चाहता?

बहरहाल, बच्चों की सुरक्षा बेहद जरूरी थी. इसलिए मुंशीराम ने तुरंत उस नंबर की लोकेशन पता करवाई, जो शहर के बाहरी इलाके सीतोगुन्नो की मिली. सीतोगुन्नो जाने के लिए एक टीम तैयार की गई, जिस में थानाप्रभारी तजेंद्रपाल सिंह ने चौकीप्रभारी मुंशीराम, हैडकांस्टेबल सुखदेव सिंह, रमेश कुमार, दलजीत सिंह, कांस्टेबल सरवन, मक्खन और जगदीप सिंह को शामिल किया.

सीतोगुन्नो गांव के पास एक ऊंची पहाड़ी जैसी जगह थी, जिसे पुलिस टीम ने घेर लिया और गुरजंट की तलाश शुरू कर दी. तलाश करती पुलिस टीम जब एक टीले के पास पहुंची तो वहां झाड़ी के पास दोनों बच्चे जमीन पर अर्द्धबेहोशी की हालत में पड़े दिखाई दिए. दोनों बच्चों के हाथपैर और मुंह को बड़ी बेरहमी के साथ बांधा गया था.

मुंशीराम ने जल्दी से बच्चों के हाथपैर तथा मुंह खोला और उन्हें बहाववालापुरा के अस्पताल पहुंचाया. बाकी पुलिस टीम गुरजंट की तलाश में वहीं जमी रही. लेकिन गुरजंट भाग गया था, क्योंकि काफी तलाश के बाद भी वह वहां नहीं मिला था. इस की वजह यह थी कि वह काफी ऊंचाई पर था, जिस से उस ने पुलिस को आते देख लिया होगा.

बहरहाल, थोड़ी देखभाल के बाद दोनों बच्चे स्वस्थ हो गए थे. मुंशीराम ने अंकुशदीप और जशनदीप को सकुशल परमजीत कौर के हवाले कर दिया. अब उन्हें पता करना था कि गुरजंट कौन था और उस ने परमजीत कौर के बेटों का अपहरण क्यों किया था?

मुंशीराम ने गुरजंट की गिरफ्तारी के प्रयास तेज कर दिए. आखिर उन की मेहनत रंग लाई और पैसों की कमी से परेशान हो कर अपने किसी दोस्त से पैसे लेने बसअड्डे के पास आए गुरजंट को मुखबिर की सूचना पर उन्होंने गिरफ्तार कर लिया. उस से और परमजीत कौर तथा उस के पिता पाला सिंह से की गई पूछताछ के बाद बच्चों के अपहरण की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

पाला सिंह जिला फाजिल्का के थाना बहाववालापुरा के गांव हिम्मतपुरा के रहने वाले थे. खेती कर के गुजरबसर करने वाले पाला सिंह की बेटी परमजीत कौर शादी लायक हुई तो उन्होंने सन 2006 में जिला बठिंडा के थाना भुचोमंडी के गांव खुइयां कोठी के रहने वाले रेशम सिंह से उस का विवाह कर दिया. शादी के बाद परमजीत कौर 2 बेटों अंकुशदीप सिंह और जशनदीप सिंह की मां बनी.

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भले ही परमजीत कौर की शादी हुए 8 साल हो गए थे और वह 2 बच्चों की मां बन गई थी, लेकिन उस की अपने पति रेशम सिंह से कभी नहीं पटी. वह कमाता तो ठीकठाक था, लेकिन न वह बीवी का खयाल रखता था और न बच्चों का. यही नहीं, शराब पी कर वह हैवान बन जाता था. छोटीछोटी बातों पर क्लेश करते हुए वह मारपीट के लिए उतारू हो जाता था.

रोज की इस क्लेशभरी जिंदगी से तंग आ कर परमजीत कौर अपने दोनों बेटों को ले कर करीब 3 साल पहले सन 2013 में पति का घर छोड़ कर पिता पाला सिंह के घर आ कर रहने लगी. मांबाप को बोझ न लगे, इस के लिए वह पास की ही एक फैक्ट्री में नौकरी करने लगी. नौकरी लगने के बाद उस ने सिविल कोर्ट में तलाक का मुकदमा कर दिया था. बच्चों के भविष्य को ध्यान में रख कर उस ने गांव के सरकारी स्कूल में उन का दाखिला करा दिया था.

सुबह नौकरी पर जाने के बाद बच्चे दोपहर को घर आते थे तो उस की अनुपस्थिति में उन का खयाल उस की मां अमरजीत कौर रखती थीं. परमजीत कौर को पिता के घर रहते लगभग 3 साल हो गए थे. पिछले साल उस की मुलाकात गुरजंट सिंह से हुई, जो जल्दी ही जानपहचान में बदल गई. गुरजंट सिंह भी वहीं काम करता था, जहां परमजीत कौर करती थी. एक साथ, एक ही जगह पर काम करते हुए ही दोनों में जानपहचान हुई थी.

इस के आगे परमजीत कौर ने न कभी कुछ सोचा था और न ही कुछ सोचने की स्थिति में थी. पति से तलाक के बाद आगे क्या करना है, यह उस के पिता को सोचना था. जबकि जानपहचान होते ही गुरजंट सिंह ने परमजीत कौर को ले कर बहुत आगे की सोच ली थी. वह उस से शादी करने के बारे में सोचने लगा था. एक दिन उस ने यह बात परमजीत कौर से कह भी दी.

परमजीत कौर नेक, शरीफ और धैर्यवान औरत थी. उस ने गुरजंट सिंह को प्यार से समझाते हुए कहा था, ‘‘हम एक साथ काम करते हैं, उठतेबैठते हैं और खातेपीते हैं, यह तो ठीक है? लेकिन रही शादी की बात तो यह न मुझे अच्छी लगती है और न मैं इस बारे में सोचना चाहती हूं.’’

‘‘तो क्या तुम पूरी जिंदगी बिना पति के गुजार दोगी?’’

‘‘यह मेरी समस्या है और इस का समाधान ढूंढना मेरे मातापिता की जिम्मेदारी है, इसलिए तुम्हें इस की चिंता करने की जरूरत नहीं है.’’ परमजीत कौर ने साफसाफ कह दिया.

कहने को तो परमजीत कौर ने गुरजंट को बड़े सभ्य तरीके से समझा दिया था, लेकिन वह अपनी आदत से बाज नहीं आया. वह जब भी परमजीत कौर से मिलता, शादी की ही बात करता. यही नहीं, अब वह आतेजाते परमजीत कौर से छेड़छाड़ भी करने लगा था.

बात जब हद से आगे बढ़ने लगी तो एक दिन परमजीत कौर ने सारी बातें अपने पिता पाला सिंह को बता कर गांव में पंचायत बुला ली. पंचायत ने गुरजंट और उस के पिता हरपाल सिंह को बुलवा लिया.

गुरजंट सिंह जिला श्रीमुक्तसर साहिब के थाना लंबी के गांव भाटीवाला का रहने वाला था. पंचायत ने जब गुरजंट सिंह को उस के पिता के सामने बहूबेटियों को छेड़ने के आरोप में सजा देने की बात की तो उस के पिता ने हाथ जोड़ कर माफी मांगी और वचन दिया कि भविष्य में गुरजंट कभी इस गांव के आसपास भी दिखाई नहीं देगा. उसी दिन हरपाल सिंह गुरजंट को ले कर गांव चला गया. यह जुलाई, 2016 की बात है.

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उस दिन के बाद गुरजंट सिंह परमजीत कौर को तो क्या, गांव के भी किसी आदमी को दिखाई नहीं दिया. 3 महीने बाद अचानक गांव आ कर उस ने बड़ी होशियारी से परमजीत कौर के दोनों बेटों का अपहरण कर लिया, ताकि उस पर दबाव डाल कर वह उस से शादी कर सके.

पूछताछ के बाद मुंशीराम ने इस मुकदमे में अपहरण के साथ षडयंत्र की धारा को जोड़ कर गुरजंट सिंह को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

इस के बाद गुरजंट के पिता हरपाल सिंह ने गांव में पंचायत बुला कर परमजीत कौर और गांव वालों से माफी मांगते हुए कहा कि वे एक बार फिर गुरजंट को माफ कर दें. लेकिन अब क्या हो सकता था. अब तो मामला पुलिस और न्यायालय तक पहुंच चुका था. उस ने जो किया था, उस की सजा तो उसे भोगनी ही पड़ेगी.

चाची की यारी में कर दिया चाचा का कत्ल

17 अक्तूबर, 2016 की सुबह जिला गोरखपुर के चिलुआताल के महेसरा पुल के नजदीक जंगल में एक पेड़ के सहारे एक साइकिल खड़ी देखी गई, जिस के कैरियर पर एक बोरा बंधा था. बोरा खून से लथपथ था, इसलिए देखने वालों को अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि बोरे में लाश हो सकती है. लाश  होने की संभावना पर ही इस बात की सूचना थाना चिलुआताल पुलिस को दे दी गई थी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर रामबेलास यादव पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर आ पहुंचे थे. बोरे से उस समय भी खून टपक रहा था.

इस का मतलब था कि बोरा कुछ देर पहले ही साइकिल से वहां लाया गया था. उन्होंने बोरा खुलवाया तो उस में से एक आदमी की लाश निकली. मृतक की उम्र 35-36 साल रही होगी. उस के सिर पर किसी वजनदार चीज से वार किया गया था. वह रंगीन सैंडो बनियान और लुंगी पहने था. शायद रात को सोते समय उस की हत्या की गई थी.

पुलिस को लाश की शिनाख्त कराने में जरा भी दिक्कत नहीं हुई. वहां जमा भीड़ ने मृतक की शिनाख्त प्रौपर्टी डीलर सुरेश सिंह के रूप में कर दी थी. वह चिलुआताल गांव का ही रहने वाला था.

शिनाख्त होने के बाद रामबेलास यादव ने मृतक के घर वालों को सूचना देने के लिए 2 सिपाहियों को भेजा. दोनों सिपाही मृतक के घर पहुंचे तो घर पर कोई नहीं मिला. पड़ोसियों से पता चला कि सुरेश सिंह के बिस्तर पर भारी मात्रा में खून मिलने और उस के बिस्तर से गायब होने से घर के सभी लोग उसी की खोज में निकले हुए थे.

घर पर पुलिस के आने की सूचना मिलने पर मृतक सुरेश सिंह के बड़े भाई दिनेश सिंह घर आए तो जंगल में एक लाश मिलने की बात बता कर दोनों सिपाही उन्हें अपने साथ ले आए. लाश देखते ही दिनेश सिंह फफक कर रो पड़े. इस से साफ हो गया कि मृतक उन का भाई सुरेश सिंह ही था.

इस के बाद पुलिस ने घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भिजवा दिया और उस साइकिल को जब्त कर लिया, जिस पर लाश बोरे में भर कर वहां लाई गई थी.

थाने लौट कर रामबेलास यादव ने मृतक के बडे़ भाई दिनेश सिंह की तहरीर पर सुरेश सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर लिया. मृतक सुरेश सिंह प्रौपटी डीलिंग का काम करता था. विवादित जमीनों को खरीदनाबेचना उस का मुख्य धंधा था. पुलिस ने इसी बात को ध्यान में रख कर जांच आगे बढ़ाई, लेकिन उस का ऐसा कोई दुश्मन नजर नहीं आया, जिस से लगे कि हत्या उस ने कराई है.

यह हत्याकांड अखबारों की सुर्खियां बना तो एसएसपी रामलाल वर्मा ने एसपी (सिटी) हेमराज मीणा को आदेश दिया कि वह जल्द से जल्द इस मामले का खुलासा कराएं. उन्होंने सीओ देवेंद्रनाथ शुक्ला और थानाप्रभारी रामबेलास यादव को सुरेश सिंह तथा उस के घरपरिवार के आसपास जांच का घेरा बढ़ाने को कहा.

क्योंकि उन्हें लग रहा था कि यह हत्या दुश्मनी की वजह से नहीं, बल्कि अवैधसंबंधों की वजह से हुई है. क्योंकि मृतक को जिस तरह बेरहमी से मारा गया था, इस तरह लोग अवैध संबंधों में ही नफरत में मारे जाते हैं. इसी बात को ध्यान में रख कर जांच आगे बढ़ाई गई तो जल्दी ही नतीजा निकलता नजर आया.

किसी मुखबिर ने बताया कि पिछले कई सालों से सुरेश सिंह की अपनी पत्नी से पटती नहीं थी. दोनों में अकसर लड़ाईझगड़ा होता रहता था और इस की वजह सुरेश सिंह का सगा भतीजा राहुल चौधरी था. क्योंकि उस के अपनी चाची राधिका से अवैध संबंध थे.

घटना से सप्ताह भर पहले भी इसी बात को ले कर सुरेश और राधिका के बीच काफी झगड़ा हुआ था. तब सुरेश ने पत्नी की पिटाई कर दी थी, जिस से नाराज हो कर वह बच्चे को ले कर मायके चली गई थी. रामबेलास यादव को हत्या की वजह का पता चल गया था. राहुल से पूछताछ करने के लिए वह उस के घर पहुंचा तो उस के पिता दिनेश सिंह ने बताया कि वह तो लखनऊ में है.

लखनऊ में राहुल गोमतीनगर में किराए का कमरा ले कर रहता है और सरकारी नौकरी के लिए तैयारी कर रहा है. पिता का कहना था कि हत्या वाले दिन के एक दिन पहले वह लखनऊ चला गया था. जबकि मुखबिर ने उन्हें बताया था कि घटना वाले दिन सुबह वह चिलुआताल में दिखाई दिया था.

पिता का कहना था कि घटना से एक दिन पहले यानी 16 अक्तूबर, 2016 को राहुल लखनऊ चला गया था, जबकि मुखबिर का कहना था कि घटना वाले दिन वह चिलुआताल में दिखाई दिया था. मुखबिर की बात पर विश्वास कर के रामबेलास यादव ने राहुल को लखनऊ से लाने के लिए 2 सिपाहियों को भेज दिया.

लखनऊ पुलिस की मदद से गोरखपुर पुलिस 22 अक्तूबर, 2016 को लखनऊ के गोमतीनगर से राहुल चौधरी को गिरफ्तार कर गोरखपुर ले आई. थाने ला कर उस से सुरेश सिंह की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बिना किसी हीलाहवाली के चाची से अवैध संबंधों की वजह से चाचा सुरेश सिंह की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. राहुल ने चाची के प्रेम में पड़ कर चाचा की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर के थाना चिलुआताल में सुरेश सिंह पत्नी राधिका सिंह और 6 साल के बेटे के साथ रहता था. उस का बड़ा भाई था दिनेश सिंह. राहुल उसी का बेटा था. दोनों भाइयों के परिवार भले ही अलगअलग रहते थे, लेकिन रहते एक ही मकान में थे. सुखदुख में भी एकदूसरे की मदद भी करते थे.

गांव वाले भाइयों के इस प्रेम को देख मन ही मन जलते थे. सुरेश सिंह चेन्नई में किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था. लेकिन पत्नी राधिका बेटे के साथ गांव में रहती थी. वह साल में एक या 2 बार ही घर आता था. उस के न रहने पर जरूरत पड़ने पर घर के छोटेमोटे काम उस के बड़े भाई का बेटा राहुल कर दिया करता था.

राहुल और राधिका थे तो चाचीभतीजा, लेकिन हमउम्र होने की वजह से दोनों दोस्तों की तरह रहते थे, बातचीत भी वे दोस्तों की ही तरह करते थे. इस का नतीजा यह निकला कि धीरेधीरे उन के बीच मधुर संबंध बन गए. उन के मन में एकदूसरे के लिए चाहत के फूल खिले तो एकदूसरे के स्पर्श मात्र से उन का रोमरोम खिल उठने लगा.

राहुल चाची राधिका से जुनून के हद तक प्यार करने लगा तो राधिका ने भी उस के प्यार पर अपने समर्पण की मोहर लगा दी. एक बार मर्यादा टूटी तो उन्हें जब भी मौका मिलता, जिस्म की भूख मिटाने लगे. दोनों ने अपने इस अनैतिक रिश्ते पर परदा डालने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन पाप के इस रिश्ते को वे छिपा नहीं सके.

लोग राधिका और राहुल को ले कर तरहतरह की चर्चाएं भी करने लगे, पर उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया. जब सुरेश सिंह के किसी शुभचिंतक ने उसे फोन कर के चाचीभतीजे के बीच पक रही खिचड़ी की जानकारी दी तो वह नौकरी छोड़ कर गांव आ गया. यह सन 2014 की बात है.

सुरेश ने खूब पैसे कमाए थे. उन्हीं पैसों से उस ने गांव में रह कर प्रौपर्टी का काम शुरू कर दिया, जो थोड़ी मेहनत के बाद अच्छा चल निकला. कामधंधे की वजह से अकसर उसे दिन भर घर से बाहर रहना पड़ता था, इसलिए राहुल और राधिका को मिलने में कोई परेशानी नहीं होती थी. लेकिन एक दिन अचानक वह दोपहर में घर आ गया तो उस ने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ लिया.

फिर क्या था, सुरेश ने न पत्नी को छोड़ा और न भतीजे को. उस ने इस बात को ले कर भाई से बात की तो बेटे की हरकत से वह काफी शर्मिंदा हुए. समाज और रिश्तों की दुहाई दे कर उन्होंने बेटे को घर से निकाल दिया तो वह लखनऊ आ गया और गोमतीनगर में किराए पर कमरा ले कर रहने लगा.

यहां वह सरकारी नौकरी की परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था. सुरेश की वजह से गांव में राहुल और उस की चाची की काफी बदनामी हुई थी. यही नहीं, उसे घर से भी निकाल दिया गया था. राधिका की खूब थूथू हुई थी. गांव से ले कर नातेरिश्तेदारों तक ने उस की खूब फजीहत की थी.

धीरेधीरे बात थमती गई. मांबाप से मांफी मांग कर राहुल फिर घर लौट आया. मांबाप ने उसे माफ जरूर कर दिया था, लेकिन उस पर कड़ी नजर रखी जा रही थी. राधिका से उसे मिलने की सख्त मनाही थी. जबकि वह चाची से मिलने के लिए तड़प रहा था. लेकिन सख्त पहरेदारी की वजह से दोनों का मिलन संभव नहीं हो पा रहा था.

चाचा सुरेश की वजह से राहुल प्रेमिका चाची से मिल नहीं पा रहा था. उसे लग रहा था कि जब तक चाचा रहेगा, वह चाची से कभी मिल नहीं पाएगा. चाचा प्यार की राह का कांटा लगा तो वह उसे हटाने के बारे में सोचने लगा. आखिर उस ने उसे हटाने का निश्चय कर लिया.

अब वह ऐसी राह खोजने लगा, जिस पर चल कर उस का काम भी हो जाए और वह फंसे भी न. काफी सोचविचार कर उस ने तय किया कि वह अपना मोबाइल फोन औन कर के बाइब्रेशन पर लखनऊ वाले कमरे पर ही छोड़ देगा और रात में गोरखपुर पहुंच कर चाचा की हत्या कर के लखनऊ अपने कमरे पर आ जाएगा.

पुलिस उस पर शक करेगी तो मोबाइल लोकेशन के सहारे वह बच जाएगा. तब वह शायद यह भूल गया था कि कातिल कितना भी चालाक क्यों न हो, कानून के लंबे हाथों से उस का बचना आसान नहीं है.

राहुल जब से घर आ कर रहने लगा था, सुरेश और उस की पत्नी राधिका के बीच उसे ले कर अकसर झगड़ा होता रहता था. जबकि इस बीच राहुल एक बार भी चाची से नहीं मिला था.

रोजरोज के झगड़े से परेशान हो कर राधिका नाराज हो कर बेटे को ले कर मायके चली गई थी. राधिका के चली जाने से राहुल काफी दुखी था. उस का मन घर में नहीं लगा तो 16 अक्तूबर को मांबाप से कह कर वह लखनऊ चला गया.

चाची से न मिल पाने की वजह से राहुल तड़प रहा था. तड़प की वेदना से आहत हो कर उस ने योजना को अमलीजामा पहना दिया. योजना के अनुसार 17 अक्तूबर की शाम 4 बजे इंटरसिटी ट्रेन से वह गोरखपुर के लिए चल पड़ा. रात 11 बजे के करीब वह गोरखुपर पहुंचा. स्टेशन से टैंपो ले कर वह चिलुआताल के बरगदवां चौराहे पर पहुंचा और वहां से पैदल ही घर पहुंच गया.

उसे घर तो जाना नहीं था, इसलिए सब से पहले उस ने पिता के कमरे के दरवाजे की सिटकनी बाहर से बंद कर दी, ताकि शोर होने पर वह बाहर न निकल सकें.

इस के बाद पीछे की दीवार के सहारे वह सुरेश सिंह के कमरे में पहुंचा, जहां वह गहरी नींद सो रहा था. उसे देखते ही नफरत से राहुल का खून खौल उठा. उसे पता था कि चाचा के घर में लोहे की रौड कहां रखी है. उस ने लोहे की रौड उठाई और पूरी ताकत से सुरेश के सिर पर 3 वार कर के उसे मौत के घाट उतर दिया.

राहुल को विश्वास हो गया कि सुरेश की मौत हो चुकी है तो उस ने घर में रखा बोरा उठाया और उसी में उस की लाश भर कर रात के 4 बजे के करीब बाहर झांक कर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा. जब उसे लगा कि कोई नहीं देख रहा है तो उस ने सुरेश की ही साइकिल घर उस की लाश वाले बोरे को कैरियर पर रख कर जंगल की ओर चल पड़ा.

लेकिन जब वह झील की ओर जा रहा था, तभी एक ट्रैक्टर आता दिखाई दिया. उसे देख कर वह घबरा गया और साइकिल को एक पेड़ से टिका कर भागा. ट्रैक्टर पर बैठे एक मजदूर ने उसे भागते देख लिया तो उस ने उस का नाम ले कर पुकारा भी, लेकिन रुकने के बजाए राहुल बरगदवां चौराहे की ओर भाग गया.

वहां से उस ने टैंपो पकड़ी और गोरखपुर रेलवे स्टेशन पहुंचा, जहां से ट्रेन पकड़ कर लखनऊ स्थित अपने कमरे पर चला गया. उस ने चालाकी तो बहुत दिखाई, लेकिन वह काम न आई और पकड़ा गया. राहुल चौधरी की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त लोहे की रौड बरामद कर ली थी.

पूछताछ के बाद राहुल को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. राधिका के पति की हत्या की खबर पा कर ससुराल आ गई थी. राहुल ने जो किया था, उस से उसे काफी दुख पहुंचा. क्योंकि उस ने राहुल से कभी नहीं कहा था कि वह उस के पति की हत्या कर उसे विधवा बना दे.

राहुल के मांबाप भी काफी दुखी हैं. उन्होंने राहुल से अपना नाता तोड़ कर उसे उस के हाल पर छोड़ दिया है.

– कथा में राधिका सिंह बदला नाम है. कथा पुलिस सूत्रों एवं राहुल के बयानों पर आधारित

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बीमारियों की आड़ में खेला गया लूट का खेल

उस का असली नाम नीना नहीं, अंजलि कपलिश था. पढ़लिख कर वह विवाह के लायक हुई तो 24 फरवरी, 1996 को सामाजिक रीतिरिवाज से उस का विवाह कैमिकल इंजीनियर मंगतराम शर्मा से कर दिया गया था. मंगतराम एक निजी संस्था में बढि़या नौकरी करते थे. उन के घर में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी. उन्होंने अंजलि को न केवल हर सुखसुविधा के साथ भरपूर प्यार दिया था, उस का नाम भी बदल कर नीना रख दिया था. समय अपनी गति से गुजरता रहा और इस बीच नीना एक बेटे और एक बेटी की मां बन गई थी. बीए एवं एमलिब (मास्टर औफ लाइब्रेरी साइंस) की डिग्रियां हासिल करने वाली नीना शादी के पहले रोपड़ के एक स्कूल में नौकरी करती थी. शादी के बाद भी वह 2 सालों तक नौकरी करती रही. लेकिन बाद में पति ने उसे घर संभालने की सलाह देते हुए नौकरी करने को मना कर दिया.

नीना नौकरी नहीं छोड़ना चाहती थी, पर पति की वजह से उसे नौकरी से इस्तीफा देना पड़ा. पति से इस फैसले के बारे में वह ज्यादा कुछ कह तो नहीं सकी, पर अच्छीभली नौकरी छोड़ने का उसे काफी अफसोस था. पति का यह फैसला उसे सही नहीं लगा.

वजहें कुछ भी रही हों, शादी के 6 साल बाद उन के वैवाहिक रिश्ते में खटास पैदा होने लगी. इस का नतीजा यह निकला कि सन 2004 में नीना ने पति से तलाक ले लिया. नीना के इस फैसले से मंगतराम काफी आहत हुए. कुछ समय बाद वह इंडिया छोड़ कर आस्ट्रेलिया चले गए.

नीना के मायके वाले भी तलाक के लिए नीना को ही दोषी मान रहे थे, इसलिए उन्होंने भी उस से नाता तोड़ लिया. नीना अब बेसहारा हो चुकी थी. ऐसी हालत में उस ने हिम्मत से काम लिया. किसी की परवाह न कर के उस ने आने वाली संभावित स्थितियों से मुकाबला करने के लिए कमर कस ली.

रोपड़ के दशमेशनगर में किराए का मकान ले कर वह अपने दोनों बच्चों के साथ रहने लगी और फिर से नौकरी हासिल करने की कोशिश करने लगी. पर काफी मेहनत के बाद भी नौकरी हाथ नहीं लगी. इस के बाद उस ने घर से ही ट्रेडिंग का काम करना शुरू कर दिया. थोक में दालें वगैरह खरीद कर लाती और उन के एक किलोग्राम और आधा किलोग्राम के पैकेट तैयार कर के वह उन्हें राशन की दुकानों पर सप्लाई करने लगी.

देखने में काम छोटा था, मगर अच्छा चल निकला. पैसों के लिए नीना अब किसी की मोहताज नहीं रही. इस के बावजूद ज्यादा कमाई वाला काम करने की उथलपुथल उसे बेचैन किए रहती थी. उसी बीच वह कई बीमारियों की चपेट में आ गई, जिन में हाई ब्लडपै्रशर, गौलब्लैडर में ट्यूमर व ब्लडकैंसर सरीखी बीमारियां थीं. वह अपनी इन बीमारियों का लगातार इलाज करवा रही थी.

दुख और बीमारी में जो काम दवा नहीं कर पाती, वह किसी अपने की प्यारभरी हमदर्दी और मीठे बोल कर जाते हैं. नीना भी इसी तरह के प्यार और हमदर्दी को तरस रही थी. इस दुख को वह अपने बच्चों से भी साझा नहीं करती थी. ऐसे में उसे यह बात बारबार कचोटती थी कि मंगतराम को तलाक दे कर उस ने भारी भूल की थी. उसे यह भी भरोसा था कि अगर वह मंगतराम के पास जा कर अपनी गलती मान ले तो वह निश्चित ही उसे माफ कर के फिर से अपना लेगा.

आखिर नीना आस्ट्रेलिया जाने की तैयारी करने लगी. पासपोर्ट उस के पास था ही. वह वीजा हासिल करने की कोशिश में लग गई, पर लाख कोशिशों के बावजूद भी उसे वीजा नहीं मिल सका. ट्रैवल एजेंटों ने उसे खासा परेशान किया. उस का वक्त तो बरबाद हुआ ही, वे लोग उस से पैसा भी खूब वसूलते रहे. यानी वह ठगी गई.

मंगतराम से समझौता करने नीना आस्ट्रेलिया तो नहीं जा पाई, अलबत्ता इन कोशिशों का एक फायदा उसे यह हुआ कि वह ट्रैवल एजेंटों द्वारा झांसा दे कर ठगी करने के कई गुर सीख गई. लिहाजा उस ने खुद भी यही सब कर के पैसा कमाने का निश्चय किया. उस की तमन्ना बच्चों का भविष्य सुरक्षित कर लेने का था.

पूरी योजना बना कर नीना ने एक मैटर तैयार किया. ‘आप स्टूडेंट हो, घरपरिवार वाली औरत हो, पढ़ेलिखे हो या फिर मामूली पढ़ाईलिखाई व सीमित अनुभव के साथ छोटीमोटी नौकरी करने को मजबूर हो. विदेशों में मोटी तनख्वाह वाली एक से एक बढि़या नौकरी आप के इंतजार में है. दिशानिर्देशन व वर्क परमिट के लिए संपर्क करें.’

इस के नीचे अपने घर का पता देते हुए नीना ने कई अखबारों में विज्ञापन दे दिए. इस के बाद तो विदेश जाने के इच्छुक लोगों की नीना के यहां लाइनें लगनी शुरू हो गईं. वैसे भी विदेश जा कर पैसा कमाने का पंजाब में कुछ ज्यादा ही क्रेज है. नीना ने खुद को एक विदेशी कंसल्टैंट कंपनी की एजेंट बताया.

जो लोग उस के पास पूछताछ करने आते थे, वह उन्हें बताती कि जो लोग विदेश जाना चाहते हैं, उन का पहले रजिस्ट्रेशन होगा, उस के बाद विदेश से आ कर कंपनी के अधिकारी उन लोगों का इंटरव्यू लेंगे, जो लोग सफल होंगे, उन्हें पौने 2 लाख रुपए महीने की तनख्वाह पर रख लिया जाएगा. उस तनख्वाह से कंपनी 2 सालों तक हर महीने 50 हजार रुपए अपने पास कमीशन के रूप में रखेगी. 2 साल बाद यह समझौता खुद ब खुद खत्म हो जाएगा.

नीना ने यह भी बताया कि रजिस्टे्रशन फीस के रूप में हर आदमी को 25 हजार रुपए जमा करवाने होंगे. सिलैक्ट हुए उम्मीदवारों को वाजिब हवाई किराया व कुछ अन्य खर्चे भी देने होंगे. किसी वजह से जो लोग सिलेक्ट नहीं हो पाएंगे, उन्हें उन की रजिस्ट्रेशन फीस वापस कर दी जाएगी. बाद में नौकरियों की रिक्तियां निकलने पर फिर से रजिस्ट्रेशन करवाना होगा.

रजिस्ट्रेशन फीस 25 हजार तय करते समय नीना को लगा था कि उस ने जल्दबाजी में फीस शायद ज्यादा रख दी है. पर कमाल की बात यह हुई कि पहले ही झटके में 20 लोगों ने 25-25 हजार रुपए दे कर नीना की झोली में 5 लाख रुपए डाल दिए.

इस के बाद तो नीना के जैसे पंख निकल आए. चंडीगढ़ के सेक्टर-35 में उस ने इमीग्रेशन कंसल्टैंट्स का अपना शानदार औफिस खोल कर बडे़ पैमाने पर लोगों को ठगना शुरू कर दिया.

नीना को कमाई का यह नया तरीका सूझ गया था. वह भी मोटी कमाई का. उस की चिकनीचुपड़ी बातों में आ कर कई लोगों ने अपनी जमीनजायदाद तक गिरवी रख कर उसे मुंहमांगी रकम दे दी. पैसा देने वाले का मुंह बंद रहे, इस के लिए वह कभी मैडिकल का तो कभी कोई अन्य फार्म भरवा लेती.

देखतेदेखते नीना ने करीब 500 लोगों से 4 करोड़ रुपए की रकम इकट्ठी कर ली. इन लोगों का काम वह तभी करवा पाती, जब उस के हाथ में कुछ होता. उसे तो इस ठगी से अधिक से अधिक मोटी रकम बटोरनी थी. जिस रफ्तार से उस के पास पैसा आ रहा था, 4 करोड़ की रकम भी उसे छोटी लग रही थी.

उसे उम्मीद थी कि आने वाले कुछ समय में उस के पास इस से कई गुना ज्यादा रकम इकट्ठी हो जाएगी. तब वह यहां से इतनी दूर चली जाएगी कि कोई भी उसे ढूंढ नहीं पाएगा. मगर उसी बीच परिस्थिति बदल गई. फातियाबाद, हरियाणा के 2 भाई कुलविंदर सिंह और हरमिंदर सिंह भी आस्ट्रेलिया व कनाडा में नौकरी लगवाने के लिए नीना से मिले.

नीना ने इन दोनों भाइयों से मोटी रकम ऐंठ ली. काफी दिनों बाद भी जब इन का काम नहीं हुआ तो इन्होंने नीना के खिलाफ चंडीगढ़ पुलिस में शिकायत कर दी. चंडीगढ़ पुलिस ने काररवाई करते हुए 28 नवंबर, 2005 को नीना को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने नीना को कोर्ट में पेश कर के उस का 4 दिनों का पुलिस रिमांड लिया. पुलिस को पता चला कि वह पहले से ही गंभीर बीमारियों से ग्रस्त है. इस वजह से पूछताछ के वक्त उस से ज्यादा सख्ती नहीं की जा सकी. मनोवैज्ञानिक तरीके से की गई पूछताछ मे वह करोडों रुपयों की ठगी करने की बात तो कबूलती रही, पर उस ने पैसा कहां छिपा कर रखा है, यह नहीं बताया.

पुलिस ने उस के बैंक खातों व लौकरों की जांच की तो वहां कुछ हजार रुपए ही मिले. 4 दिनों के कस्टडी रिमांड की समाप्ति पर जब पुलिस नीना को अदालत में पेश करने ले जा रही थी, तभी ठगी का शिकार हुए लोगों  ने उस का रास्ता रोक लिया.

वह उस से अपने पैसों को मांग करने लगे. तब नीना ने उन से सपाट लहजे में कहा, ‘‘हां, मैं कसूरवार हूं, लेकिन मेरी भी अपनी मजबूरियां हैं, मैं गंभीर रूप से बीमार हूं, मुझे अपना इलाज करवाना है. इस के  अलावा मैं मानती हूं कि मैं ने आप लोगों से ठगी की है. मगर मैं यह पैसा लौटा नहीं सकती. आप लोगों से ज्यादा मुझे इस पैसे की जरूरत है. अदालत मुझे मेरे किए की सजा जरूर देगी. शायद मैं सजा भुगतते हुए जेल के भीतर मर ही जाऊं.’’

लेकिन वह न मरी और न ही जमानत पर छूटने के बाद उस ने ठगी का अपना कारोबार बंद किया. उस के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होते रहे, पुलिस उसे गिरफ्तार कर जेल भेजने के अलावा उस के खिलाफ आरोप पत्र तैयार कर अदालत में दाखिल करती रही.

16 दिसंबर, 2006 को नीना ने बलविंदर शर्मा नामक शख्स से दूसरा विवाह रचा लिया. उस के साथ मिल कर उस ने मोहाली में ‘एलीवेशन प्लेसमेंट सर्विस’ के नाम से अपना एक आलीशान औफिस खोला. इसी तरह के कई औफिस उस ने अलगअलग जगहों पर खोले और अपने धंधे को पहले की तरह ही अंजाम देती रही. उस के खिलाफ आपराधिक मामले भी लगातार दर्ज होते रहे. देखते ही देखते उस के ऊपर 50 से अधिक मुकदमे दर्ज हो गए.

विभिन्न केसों में बारबार रिमांड पर ले कर पुलिस उस से सिवाय सौफ्ट इंटेरोगेशन के और कुछ नहीं कर सकती थी. और तो और पुलिस उस से ठगी की रकम का भी पता नहीं लगा पाई कि उस ने कहां छिपा रखी है. वह सीधे कह देती थी कि बीमारी पर खर्च कर दी है.

नीना के खिलाफ भले ही कितने ही केस क्यों न चल रहे थे, पर उन में से तमाम अधर में ही लटके थे. कुछ केसों में वह बरी भी हो गई थी. मैडिकल आधारों पर उसे अदालत से जल्दी जमानत मिल जाती थी. इसी बात का वह फायदा उठा रही थी. ठगे गए लोग तो पुलिस पर भी उस के साथ सांठगांठ का आरोप लगा रहे थे.

अभी हाल ही में नीना को उस के खिलाफ दर्ज एक मामले में पहली बार सजा हुई है. करीब 4 साल पहले हिमाचल प्रदेश के कस्बा बरनी निवासी अशोक कुमार की शिकायत पर नीना के खिलाफ भादंवि की धारा 406 एवं 420 का यह केस मोहाली के थाना मटौर में दर्ज हुआ था.

शिकायतकर्ता का आरोप था कि उसे कनाडा भेजने के नाम पर नीना ने उस से 1 लाख 10 हजार रुपए ठगे थे. इस केस में मटोर थाना के थानाप्रभारी धर्मपाल ने नीना को गिरफ्तार कर के जेल भिजवाते हुए उस के खिलाफ चार्जशीट अदालत में दाखिल की थी.

सुनवाई करते हुए 16 दिसंबर, 2016 को मोहाली के विद्वान प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी हरप्रीत सिंह ने नीना को ठगी की कसूरवार मान कर 2 साल 10 महीने की कैद के अलावा 5 हजार रुपए के जुरमाने की सजा सुनाई थी. जुरमाना अदा न करने पर उसे 6 महीनों की अतिरिक्त सजा भुगतनी होगी.

सजा सुनने के बाद भी नीना मुसकुराती रही. फैसले के खिलाफ अपील करने की बात कह कर उस ने पूरे आत्मविश्वास से कहा,  ‘कोई बात नहीं, मैं इस कदर गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हूं कि जल्दी ही मुझे जमानत मिल जाएगी.’

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सैक्स की भूख ने जूली को बना दिया हत्यारा

वह सैक्स की आग में कई सालों से झुलस रही थी. उस का पति पिछले 2 सालों से दोहरे हत्याकांड के आरोप में जेल में बंद था. पति की गैरहाजिरी में उसे जिस्मानी सुख नहीं मिल पा रहा था. आखिर में उस ने एक रास्ता निकाल ही लिया. वह दोहरी जिंदगी जीने लगी. दिन के उजाले में वह घर वालों के सामने घूंघट ओढ़े आदर्श बहू की तरह रहती और जैसे ही रात का अंधेरा घिरता, वह आदर्श बहू का चोला उतार कर ऐयाशी में रम जाती. यह सिलसिला पिछले एक साल से चल रहा था. बहू की इस दोहरी जिंदगी का राज एक दिन घर वालों के सामने उजागर हो गया. एक रात दादी सास सुशीला राजावत ने बहू को किसी पराए मर्द के साथ सैक्स संबंध बनाते देख लिया. इस के बाद से दादी सास उस पर कड़ी नजर रखने लगीं.

इस से खफा उस औरत ने रची एक खौफनाक साजिश, जो दिल दहला देने वाली थी.

यह मामला मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले के हजारी इलाके के बिरला मंदिर का है. जूली अपनी दादी सास सुशीला राजावत और अपने 6 साल के बेटे के साथ रहती थी.

पुलिस अधीक्षक हरिनारायणचारी मिश्र के मुताबिक, पिछले 3 साल से जूली का पति शिवा राजावत दोहरे हत्याकांड के आरोप में अपने पिता और छोटे भाई के साथ जेल में बंद है. पति के जेल चले जाने के बाद से जूली अकेली हो गई. पति के बिना उस का मन नहीं लगता था. वह अकसर अपनी दादी सास के सामने रोती रहती थी.

शिवा राजावत के कुछ करीबी दोस्त थे, जो जेल से उस की खबर ले कर उस के घर पर आते रहते थे. इसी दौरान जूली उन में से एक दोस्त की ओर आकर्षित हो गई. जल्दी ही दोनों नजदीक आ गए और चोरीछिपे मिलने लगे.

जूली काफी समय से सैक्स की भूखी थी. अपनी भूख मिटाने के लिए वह प्रेमी को रात के समय अपने कमरे पर बुलाने लगी. वह शख्स रात में उस के पास आता और सुबह होने से पहले ही वहां से निकल जाता. रात के अंधेरे में चलने वाले ऐयाशी के इस खेल के बारे में किसी को पता नहीं था.

एक रात दादी सास सुशीला राजावत ने जूली को पराए मर्द के साथ मस्ती करते देख लिया. उस रात जूली कुछ ज्यादा ही उतावली थी. इस चक्कर में कमरे का दरवाजा बंद करना भूल गई.

रात के समय दादी सास सुशीला राजावत की नींद खुल गई. उन्हें बहू के कमरे से सिसकारियों की आवाज सुनाई दी. उन के कान खड़े हो गए. वे दबे कदमों से कमरे के पास पहुंचीं. अंदर का नजारा देख कर उन के होश उड़ गए.

जूली अपने यार के साथ सैक्स में इतनी खोई हुई थी कि उसे कमरे में किसी के आने का एहसास तक न हुआ. दादी सास ने उसी वक्त दोनों को काफी खरीखोटी सुनाई.

वह शख्स बिना कुछ बोले सिर नीचे कर के वहां से भाग गया, लेकिन उस दिन से जूली घर में कैद हो कर रह गई. दादी सास उस पर कड़ी निगाह रखने लगीं. उसे बाहर के किसी शख्स से बात करने, घर के बाहर कहीं जाने, यहां तक कि मोबाइल फोन से बात करने पर भी रोक लगा दी.

जूली अपने प्रेमी से मिलने के लिए तड़पने लगी. उस ने सास की नजरों से बच कर घर से बाहर निकलने की कोशिश की, पर कामयाबी नहीं मिली. नतीजा यह हुआ कि वह गुस्से से बौखला गई. उस ने सास को ही खत्म करने का खतरनाक प्लान बना लिया.

5 अगस्त की सुबह 8 बजे अपने बेटे को स्कूल भेजने के बाद जूली ने इस खौफनाक वारदात को अंजाम दिया. जूली ने चाय में ढेर सारी नींद की गोलियां मिला कर अपनी दादी सास सुशीला को पिला दी.

चाय पीने के कुछ समय बाद ही सुशीला राजावत को नींद आने लगी. वे अपने कमरे में जा कर सो गईं. मौका पा कर जूली ने तौलिया से गला दबा कर उन की हत्या कर दी. सास की हत्या के बाद उस ने कमरे का सारा सामान इस तरह से बिखेर दिया, ताकि मामला लूटपाट का लगे.

तकरीबन 12 बजे जूली ‘मैं लुट गई… बरबाद हो गई’ चिल्लाने लगी. आवाज सुन कर आसपास के लोग जमा हो गए. पुलिस भी वहां पहुंच गई.

जूली ने पुलिस को बताया, ‘‘3 लोग उस के पति शिवा के दोस्त बता कर घर में घुसे. तीनों अंदर कमरे में कुरसी पर बैठ कर सास से बातें करने लगे. मैं उन के लिए अंदर रसोई में चाय बनाने चली गई.

‘‘थोड़ी देर में 2 लोग रसोई में आ गए. उन्होंने मुझे पीछे से पकड़ लिया. एक ने मेरे सिर पर पिस्टल अड़ा दिया. दूसरे ने मेरा पेटीकोट उठा कर रेप करने की कोशिश की.

‘‘वह कुछ करने में कामयाब होता, उस बीच किसी ने दरवाजे पर आवाज दी. आवाज सुन कर तीनों भाग निकले. जाने से पहले वे अलमारी में रखा सोना लूट कर ले गए और उन्होंने सास की हत्या भी कर दी.’’

जूली ने पुलिस को जो कहानी सुनाई थी, पुलिस द्वारा अंदर तहकीकात करने पर झूठी निकली, जिस की वजह से जूली शक के घेरे में आ गई.

जूली ने तीनों लुटेरों को सामने कमरे में रखी कुरसियों पर बैठ कर सास से बातें करने की बात कही थी, जबकि कमरे में कुरसियां एक के ऊपर एक रखी थीं. दूसरी बात, जूली ने हत्यारे द्वारा उस का दुपट्टा ले जाने की बात कही थी, पर वह दुपट्टा अंदर कमरे में लाश के पास मिला.

तीसरी बात, जो सोना लुटेरों द्वारा लूट कर ले जाने की बात की थी, जांच में पता चला कि वह सोना बैंक में गिरवी रखा हुआ है. उस पर लोन लिया गया था. इस के अलावा जूली अपना बयान बारबार बदल रही थी.

पुलिस द्वारा कड़ाई से पूछताछ करने पर जूली ने दादी सास की हत्या करने की बात कबूल ली और सारी असलियत बयान कर दी.

जूली ने पुलिस को बताया कि वह पिछले 5 महीने से अपनी दादी सास की हत्या की साजिश रचने में लगी थी. उस ने टैलीविजन सीरियल देख कर हत्या करने व उस से बचने की प्लानिंग बनाई थी. उस ने सीरियल के द्वारा छोटेबड़े अपराध के बारे में जानकारी हासिल की थी. पहले उस ने बदमाशों द्वारा रेप किए जाने की कहानी पुलिस के सामने सुनाने की सोची थी, लेकिन रेप के मामले में मैडिकल एंगल को देखते हुए उस ने पिस्टल अड़ा कर रेप करने की कोशिश, लूट और हत्या की कहानी सुनाई.

जूली को यकीन था कि उस के द्वारा बताई गई सारी बातें पुलिस मान लेगी और वह साफतौर पर बच जाएगी, पर ऐसा हुआ नहीं. पुलिस ने तहकीकात कर उस की सारी पोल खोल कर रख दी.

जूली ने बताया कि उसे अपनी दादी सास की हत्या करने का कोई मलाल नहीं है, क्योंकि वे उसे प्रेमी से मिलने नहीं दे रही थीं. सैक्स के माहिर डाक्टरों का कहना है कि इनसान के लिए सैक्स की भूख जिस्मानी जरूरत है. इस पर रोक लगाने पर औरत हो या मर्द, हत्या करने जैसा खौफनाक कदम उठा सकते हैं.

बेवफा आशिक को दी मौत की सजा

पीड़ित का नाम-विभाष कुमार कनेरिया. उम्र-35 साल. पिता का नाम-परसराम कनेरिया. पेशा-जमीन की दलाली. निवासी-बैतूल. हालमुकाम 307, 2 सी, साकेत नगर, भोपाल. जुर्म-माशूका से बेवफाई. सजा-सजा ए मौत. कातिल-मोंटी उर्फ योगेश्वरी बरार. यह वाकिआ 5 जून, 2016 का है, जब विभाष कुमार को उस की ही माशूका मोंटी ने चाकू से हमला कर मौत के घाट उतार दिया था. विभाष कुमार उन लाखों नौजवानों में से एक था, जो रोजगार की तलाश में भोपाल आ कर रहने लगा था. कुछ और उसे आता नहीं था, इसलिए वह दिखने में सब से आसान लगने वाला जमीनों की दलाली का काम करने लगा और इमारतें बनाने के धंधे में भी उतरने वाला था.

भोपाल जैसे बड़े शहर में अपनी आमदनी के दम पर 10 साल गुजार देना यह बताता है कि विभाष कुमार अपने धंधे में माहिर हो गया था और उस की कमाई ठीकठाक हो रही थी. लेकिन 35 साल का हो जाने के बाद भी उस ने शादी नहीं की थी, तो वजह उस की 28 साला माशूका मोंटी थी, जिस के साथ वह बीते 9 सालों से लिव इन रिलेशनशिप में था यानी वे दोनों बगैर शादी किए मियांबीवी की तरह रहते थे, जो हर्ज की बात इस लिहाज से थी कि मोंटी रिश्ते में उस की बहन लगती थी.

पहले प्यार और फिर जिस्मानी संबंध बना कर उन दोनों ने कोई समझदारी का काम नहीं किया था. अंदाजा लगाया जा सकता है कि आज की खूबसूरत दिखने वाली मोंटी 9 साल पहले जब जवानी की दहलीज पर दाखिल हुई होगी, तो कितनी खूबसूरत रही होगी.

मोंटी भी लाखों लड़कियों की तरह भोपाल पढ़ने आई थी. पढ़ाई तो उस ने की, पर साथसाथ चचेरे भाई के साथ मुहब्बत की भी डिगरी ले डाली थी.

मोंटी पढ़ेलिखे घर की लड़की है, जिस के पिता टिमरनी, हरदा के एक स्कूल में टीचर और मां होस्टल वार्डन थीं. बेटी भी अच्छे से पढ़लिख कर कुछ बन जाए, इसलिए उन्होंने मोंटी को पढ़ाई के लिए भोपाल भेज दिया था, पर गलती यह की थी कि सहूलियत और हिफाजत के लिए उसे अपने दूर के रिश्ते के भाई विभाष कुमार के पास रहने छोड़ दिया था, जिस के पास उस की बहन भी रहती थी.

विभाष कुमार और मोंटी जवानी के जोश के चलते रिश्ते की हदें ज्यादा दिनों तक निभा नहीं पाए और सबकुछ भूल कर एकदूसरे में ऐसे खोए कि उन्होंने अपने आने वाले कल के बारे में कुछ नहीं सोचा.

गलती आशिक की

 9 साल का अरसा कम नहीं होता. एक कली को फूल बना चुके विभाष कुमार का दिल अपनी माशूका से उचटने लगा था, क्योंकि जैसेजैसे पैसा आता गया, वैसेवैसे उसे नईनई तितलियां भी मिलने लगी थीं.

उधर, मोंटी तो विभाष को ही अपना सबकुछ मान बैठी थी. शादी हो न हो, उसे इस बात से कोई मतलब नहीं था, वह तो बस हर हाल में आशिक का साथ चाहती थी.

ऐसा भी नहीं था कि वह एकदम नादान या देहाती लड़की थी, बल्कि बेहद समझदार और सधी हुई लड़की थी, जिस ने भोपाल की बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी से साइकोलौजी में एमए की डिगरी ली थी. लिहाजा, कुदरती तौर पर वह जाननेसमझने लगी थी कि कौन कब क्या बरताव करेगा.

लेकिन पढ़ाईलिखाई या डिगरियों का जिंदगी की सचाई से कोई लेनादेना नहीं होता. यह बात मोंटी को समझाने वाला कोई नहीं था.

भड़की माशूका

 विभाष कुमार की कम होती दिलचस्पी को मोंटी बखूबी समझ रही थी, पर उसे ज्यादा अफसोस इस बात का रहने लगा था कि उसे छोड़ कर उस का आशिक इधरउधर मुंह मारने लगा था. भले ही वे पतिपत्नी नहीं बने थे, लेकिन मियांबीवी की तरह रह रहे थे, इसलिए मोंटी की बेचैनी या तिलमिलाहट कुदरती बात थी.

मोंटी ने कई बार विभाष कुमार को समझाया था कि दूसरी लड़कियों से प्यार की पींगे मत बढ़ाओ. यह मुझ से बरदाश्त नहीं होता है, लेकिन अब तक विभाष कुमार उस की कमजोरी ताड़ चुका था कि वह यों ही कलपती रहेगी, पर कुछ कर नहीं पाएगी.

अब से तकरीबन 4 साल पहले विभाष कुमार की बहन आभा, जिस का एक नाम रीना भी है, भी भोपाल में उन्हीं के साथ आ कर रहने लगी थी, तो मोंटी ने साकेत नगर में किराए पर अलग मकान ले लिया था, जो इस नाजायज रिश्ते को बनाए रखने में काफी मददगार साबित हुआ था.

हालांकि रीना इन दोनों के मियांबीवी सरीखे रिश्ते को ताड़ चुकी थी. मोंटी का मकान उस के घर से पैदल की दूरी पर था, इसलिए रीना से कुछ छिपा नहीं था.

रीना के जरीए ही इस रिश्ते की बात विभाष कुमार की मां तक पहुंची थी, जो पति की मौत के बाद से ही अपनी औलादों को ले कर परेशान रहने लगी थीं. विभाष कुमार की कमाई से ही उन का बैतूल का खर्च चलता था.

विभाष कुमार और मोंटी के रिश्ते के बारे में सुन कर मां का डरना लाजिम था, इसलिए उन्होंने उसे ऊंचनीच समझाई, तो वह मान गया. वैसे भी विभाष कुमार का जी अब मोंटी से ऊबने लगा था, इसलिए उस ने माशूका से दूरी बनाना शुरू कर दिया. लेकिन मोंटी किसी भी शर्त पर उस का साथ या पीछा छोड़ने को तैयार नहीं थी.

ऐसे लिया बदला

5 जून, 2016 को मोंटी विभाष कुमार के घर पहुंची और रातभर वहीं रही. जब दूसरे कमरे में आभा यानी रीना सो गई, तो उस ने विभाष कुमार को लताड़ना शुरू कर दिया. इसी कहासुनी में विभाष कुमार ने उसे अपनी सगाई के फोटो मोबाइल पर दिखाए, जिन में एक लड़की यानी उस की मंगेतर उसे केक खिला रही थी.

फोटो देख कर मोंटी के तनबदन में आग लग गई. हालांकि वह पहले से काफीकुछ जानती थी, पर नौबत यहां तक आ जाएगी, इस का उसे अंदाजा नहीं था.

रातभर दोनों तूतूमैंमैं करते रहे. मोंटी की दलीलें अपनी जगह ठीक थीं कि जब उस ने अपना सबकुछ उसे सौंप दिया है, तो वह किसी और का कैसे हो सकता है? विभाष कुमार का यह कहना था कि उस की मरजी जिस से चाहे शादी करे.

इस कहासुनी के बाद कोई हल न निकलता देख विभाष कुमार जब गहरी नींद में सो गया, तो नागिन सी तिलमिलाई मोंटी ने चाकू से उस के सीने पर हमला किया और फिर कहीं वह जिंदा न बच जाए, इसलिए ताबड़तोड़ हमले करती रही.

शोर सुन कर रीना जागी और बाहर आई तो नजारा देख कर हैरान रह गई. उस ने मोंटी को पकड़ने की कोशिश की, पर वह मोबाइल और चाकू फेंक कर भाग खड़ी हुई.

रीना कुछ पड़ोसियों की मदद से जैसेतैसे उसे अस्पताल ले गई, पर डाक्टरों ने उसे मरा घोषित कर दिया.

विभाष कुमार की हत्या करने के बाद मोंटी को होश आया, तो उस ने खुद को भी खत्म करने की ठान ली. शायद उस के लिए विभाष के बाद दुनिया में कुछ रह नहीं गया था. उस ने पहले खुद पर चाकू से हमला किया, पर घबरा गई, क्योंकि इस में मरने की गारंटी नहीं थी.

घाव बड़ा नहीं था, इसलिए उस ने उस को ढक लिया और नजदीकी आरआरएल चौराहे पर जा कर पैट्रोल पंप से बोतल में पैट्रोल खरीदा और खुद पर उड़ेल लिया, पर खुद को आग लगाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई.

जाहिर है, मोंटी अपना आपा खो चुकी थी, इसलिए खुदकुशी की तीसरी कोशिश उस ने कुएं में कूद कर की, पर जिस कुएं में वह कूदी, उस में 4 फुट ही पानी था. लिहाजा, वह फिर बच गई.

इधर, पुलिस को कत्ल की वारदात की खबर लग चुकी थी, इसलिए वह तुरंत मोंटी की तलाश में जुट गई थी. राह चलते लोगों से पूछताछ की बिना पर पुलिस वाले कुएं के पास पहुंचे, तो मोंटी अंदर ही थी. पिपलानी के गांधी मार्केट का यह कुआं 20 फुट गहरा है.

मोंटी को बाहर निकालने के लिए डायल 100 के ड्राइवर बलवीर ने हिम्मत दिखाई और कुएं में उतर कर उसे सहीसलामत ऊपर ले आया. थाने जा कर मोंटी फरियाद करती रही कि विभाष को तो उस ने मार दिया है, लेकिन उसे अब कब फांसी दोगे.

पुलिस वालों ने उसे प्यार से पुचकारा और खाने के लिए सैंडविच मंगा कर दिए, तो मोंटी कुछ सामान्य हुई और उस ने बताया कि विभाष की सगाई के फोटो देख कर मैं आपे से बाहर हो गई थी, इसलिए उसे चाकू से गोद कर मार डाला. यह चाकू उस ने कुछ दिन पहले ही औनलाइन शौपिंग कर के मंगाया था.

अगले दिन सुबह के 9 बज चुके थे. सारा शहर जाग उठा था. ‘एक माशूका ने आशिक की बेरहमी से हत्या की’ यह खबर जिस ने भी सुनी, उस ने कलयुग को कोसा, प्यारमुहब्बत और वफा पर उंगलियां उठाईं. अब तक लोगों ने यही सुना था कि बेवफाई के चलते आशिक ने माशूका की हत्या की, पर इस मामले में उलटा हुआ.

कइयों ने रिश्ते की बहन से मुहब्बत करने को ही गलत ठहराया, पर कोई मोंटी का दर्द नहीं समझ पाया, जो बेवफा आशिक को अपने हाथों मौत की सजा देने की बात कहते हुए खुद अपने लिए फांसी का फंदा मांग रही है.

आखिर क्या था बेलगाम ख्वाहिश का अंजाम

हमसफर मनपसंद हो तो गृहस्थी में खुशियों का दायरा बढ़ जाता है. जमाने की नजरों में दीपिका और राजेश भी खुशमिजाज दंपति थे. करीब 8 साल पहले  कालेज के दिनों में दोनों की मुलाकात हुई थी. पहले उन के बीच दोस्ती हुई फिर कब वे एकदूसरे के करीब आ गए, इस का उन्हें पता ही नहीं चला. वे सचमुच खुशनसीब होते हैं जिन्हें प्यार की मंजिल मिल जाती है. प्यार हुआ तो खूबसूरत दीपिका ने राजेश के साथ उम्र भर साथ निभाने की कसमें खाईं. दोनों के लिए जुदाई बरदाश्त से बाहर हुई तो परिवार की रजामंदी से दोनों वैवाहिक बंधन में बंध गए. एक साल बाद दीपिका एक बेटे की मां भी बन गई.

राजेश का परिवार उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के रायपुर थानाक्षेत्र स्थित तपोवन एनक्लेव कालोनी में रहता था. दरअसल राजेश के पिता प्रेम सिंह राणा मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर के गांव सबदलपुर के रहने वाले थे, लेकिन बरसों पहले वह उत्तराखंड आ कर बस गए थे. दरअसल वह देहरादून की आर्डिनेंस फैक्ट्री में नौकरी करते थे. उन के परिवार में पत्नी और राजेश के अलावा 5 बेटियां थीं, जिन में से 2 का विवाह वह कर चुके थे.

सन 2000 में पत्नी की मृत्यु के बाद उन्होंने किसी तरह खुद को संभाला और 3 बेटियों के हाथ पीले किए. राजेश और दीपिका एकदूसरे को चाहते थे इसलिए प्रेम सिंह ने सन 2007 में उन के प्यार को रिश्ते में बदल दिया. आजीविका चलाने के लिए राजेश ने घर के बाहर ही किराने की दुकान कर ली थी. दीपिका का मायका भी देहरादून में ही था. प्रेम सिंह व्यवहारिक व्यक्ति थे. इस तरह बेटाबहू के साथ वह खुश थे.

4 मार्च की दोपहर के समय दीपिका काफी परेशान थी. शाम होतेहोते उस की परेशानी और भी बढ़ गई. जब कोई रास्ता नजर नहीं आया तो वह थाना रायपुर पहुंची. उस ने थानाप्रभारी प्रदीप राणा से मुलाकात कर के बताया कि सुबह से उस के पति और ससुर लापता हैं.’’

थानाप्रभारी के पूछने पर दीपिका ने बताया कि आज सुबह वे दोनों अपनी सैंट्रो कार नंबर यूए07एल 6891 से बुलंदशहर जाने की बात कह कर घर से गए थे, लेकिन न तो अभी तक वापस आए और न ही उन का मोबाइल लग रहा है. दीपिका के अनुसार, 65 वर्षीय प्रेम सिंह शहर में रह जरूर रहे थे लेकिन कभीकभी वह बुलंदशहर स्थित गांव जाते रहते थे.

दीपिका से औपचारिक पूछताछ के बाद थानाप्रभारी ने उस के पति और ससुर की गुमशुदगी दर्ज कर ली. थानाप्रभारी ने भी राजेश और उस के पिता के फोन नंबरों पर बात करने की कोशिश की पर दोनों के फोन स्विच्ड औफ ही आ रहे थे.

उसी रात करीब 2 बजे जब देहरादून के दूसरे थाने डोईवाला की पुलिस इलाके में गश्त पर थी तभी पुलिस को देहरादून-हरिद्वार हाईवे पर कुआंवाला के पास सड़क किनारे एक कार खड़ी दिखी. पुलिस वाले कार के नजदीक पहुंचे तो पता चला कि कार के दरवाजे अनलौक्ड थे.

कार की पिछली सीट पर नजर दौड़ाई तो उस में 2 लोगों की लाशें पड़ी थीं जो कंबल और चादर में लिपटी हुई थीं. कंबल और चादर पर खून लगा हुआ था. गश्ती दल ने फोन द्वारा यह सूचना थानाप्रभारी राजेश शाह को दे दी. 2 लाशों के मिलने की खबर सुन कर थानाप्रभारी उसी समय वहां आ गए.

पुलिस ने जांचपड़ताल शुरू की. दोनों की हत्या बेहद नृशंस तरीके से की गई थी. उन के शवों पर चाकुओं के दरजनों निशान थे. दोनों की गरदन और शरीर के अन्य हिस्सों पर अनेक वार किए गए थे. दोनों के गले में रस्सी कसी हुई थी.

थानाप्रभारी ने दोहरे हत्याकांड की सूचना आला अधिकारियों को दी तो एसएसपी स्वीटी अग्रवाल, एसपी (सिटी) अजय सिंह व एसपी (देहात) श्वेता चौबे मौके पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने जब कार का निरीक्षण किया तो कार पर आग से जले के भी निशान मिले. इस से पता चला कि शवों को कार समेत जलाने की कोशिश की गई थी.

निरीक्षण से यह बात भी साफ हो गई थी कि दोनों की हत्या कार में नहीं की गई थी. हत्या किसी अन्य स्थान पर कर के शव वहां लाए गए थे. सुबह होने पर आसपास के लोगों को कार में लाशें मिलने की जानकारी मिली तो तमाम लोग वहां जमा हो गए. पर कोई भी लाशों की शिनाख्त नहीं कर सका. आखिर पुलिस ने शवों का पंचनामा भर कर उन्हें पोस्टमार्टम हेतु भेज दिया. पुलिस ने कार के बारे में जानकारी की तो वह दीपिका राणा के नाम पर पंजीकृत निकली जो तपोवन कालोनी में रहती थी.

तपोवन कालोनी शहर के ही रायपुर थाने के अंतर्गत आती थी. इसलिए थानाप्रभारी राजेश शाह ने रायपुर थाने से संपर्क किया. वहां से पता चला कि दीपिका ने अपने पति और ससुर के लापता होने की गुमशुदगी दर्ज कराई थी. यह भी बताया था कि वे दोनों कार से ही बुलंदशहर के लिए निकले थे.

कार में 2 लाशें मिलने की सूचना पर थानाप्रभारी प्रदीप राणा को शक हो गया कि कहीं वे लाशें उन्हीं बापबेटों की तो नहीं हैं. उन्होंने खबर भेज कर दीपिका को थाने बुला लिया. थानाप्रभारी प्रदीप राणा दीपिका को पोस्टमार्टम हाउस पर ले गए, जहां लाशें पोस्टमार्टम के लिए भेजी थीं. दीपिका लाशें देखते ही दहाड़ें मार कर रोने लगी. कुछ देर बाद दीपिका के नातेरिश्तेदार भी एकत्र हो गए.

दोनों शवों की शिनाख्त हो गई. दीपिका इस स्थिति में नहीं थी कि उस से उस समय पूछताछ की जाती, लेकिन हलकी पूछताछ में उस ने किसी से भी अपने परिवार की रंजिश होने से इनकार कर दिया. बड़ा सवाल यह था कि जब उन की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी तो उन की हत्या क्यों और किस ने कर दी.

एसएसपी स्वीटी अग्रवाल ने इस मामले की जांच में एसपी (क्राइम) तृप्ति भट्ट व एसओजी प्रभारी अशोक राठौड़ को भी लगा दिया. पुलिस की संयुक्त टीम हत्याकांड की वजह तलाशने में जुट गई. जहां कार मिली, वहां आसपास के लोगों से पूछताछ करने पर पता चला कि कार वहां पूरे दिन खड़ी रही थी लेकिन किसी ने उस तरफ ध्यान नहीं दिया था. इस से साफ था कि हत्याएं पहले ही की गई थीं और कार सुबह किसी समय वहां छोड़ दी गई थी.

दोहरे हत्याकांड से पूरे शहर में सनसनी फैल चुकी थी. राजेश की बहन गीता की तहरीर के आधार पर पुलिस ने भादंवि की धारा 302, 201, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

पुलिस ने मृतक राजेश व उस की पत्नी दीपिका के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स का अध्ययन किया तो राजेश के मोबाइल की आखिरी लोकेशन 4 मार्च, 2017 की तड़के लाडपुर क्षेत्र में मिली जोकि कुंआवाला के नजदीक था. इस से पुलिस चौंकी, क्योंकि दीपिका ने उन के जाने का समय सुबह करीब 9 बजे बताया था.

काल डिटेल्स से यह स्पष्ट हो गया कि दीपिका ने पुलिस से झूठ बोला था. इस से वह शक के दायरे में आ गई. पुलिस ने दीपिका से पूछताछ की तो वह अपने बयान पर अडिग रही. इतना ही नहीं, उस ने अपने 8 साल के बेटे नोनू को भी आगे कर दिया. उस ने भी पुलिस को बताया कि पापा को जाते समय उस ने बाय किया था.

पुलिस ने नोनू से अकेले में घुमाफिरा कर चौकलेट का लालच दे कर पूछताछ की तब भी वह अपनी बात दोहराता रहा. ऐसा लगता था कि जैसे उसे बयान रटाया गया हो. शक की बिनाह पर पुलिस ने दीपिका के घर की गहराई से जांचपड़ताल की लेकिन वहां भी कोई ऐसा सबूत या असामान्य बात नहीं मिली जिस से यह पता चलता कि हत्याएं वहां की गई हों. लेकिन पुलिस इतना समझ गई थी कि दीपिका शातिर अंदाज वाली महिला थी.

पुलिस ने दीपिका के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स की फिर से जांच की तो उस में एक नंबर ऐसा मिला जिस पर उस की अकसर बातें होती थीं. 3 मार्च की रात व 4 को तड़के साढ़े 5 बजे भी उस ने इसी नंबर पर बात की थी. पुलिस ने उस फोन नंबर की जांच की तो वह योगेश का निकला. योगेश शहर के ही गांधी रोड पर एक रेस्टोरेंट चलाता था.

योगेश के फोन की काल डिटेल्स जांची तो उस की लोकेशन भी उसी स्थान पर पाई गई, जहां शव बरामद हुए थे. माथापच्ची के बाद पुलिस ने कडि़यों को जोड़ लिया. इस बीच पुलिस को यह भी पता चला कि दीपिका और योगेश के बीच प्रेमिल रिश्ते थे जिस को ले कर घर में अकसर झगड़ा होता था.

इतने सबूत मिलने के बाद पुलिस अधिकारियों ने एक बार फिर से पूछताछ की तो वह सवालों के आगे ज्यादा नहीं टिक सकी. वह वारदात की ऐसी षडयंत्रकारी निकली, जिस की किसी को उम्मीद नहीं थी. अपने अवैध प्यार को परवान चढ़ाने और प्रेमी के साथ दुनिया बसाने की ख्वाहिश में उस ने पूरा जाल बुना था. इस के बाद पुलिस ने उस के प्रेमी योगेश को भी गिरफ्तार कर लिया. दोनों से पूछताछ की गई तो चौंकाने वाली कहानी निकल कर सामने आई.

दरअसल, राजेश से शादी के बाद दीपिका की जिंदगी आराम से बीत रही थी. दोनों के बीच प्यार भरे विश्वास का मजबूत रिश्ता था. राजेश सीधासादा युवक था जबकि दीपिका ठीक इस के उलट तेजतर्रार व फैशनपरस्त युवती थी. 2 साल पहले योगेश ने रायपुर स्थित स्पोर्ट्स स्टेडियम में ठेके पर कुछ काम किया था. इस दौरान वह एक गेस्टहाउस में रहा. वह गेस्टहाउस राजेश के घर के ठीक पीछे था.

योगेश मूलरूप से हरियाणा के करनाल शहर का रहने वाला था और देहरादून में छोटेमोटे ठेकेदारी के काम करता था. वह राजेश की दुकान पर भी आता था. इस नाते दोनों के बीच जानपहचान हो गई थी. दीपिका जब भी छत पर कपड़े सुखाने जाती तो योगेश उसे अपलक निहारा करता था. पहली ही नजर में उस ने दीपिका को हासिल करने की ठान ली थी. दीपिका को पाने की चाहत में योगेश ने धीरेधीरे राजेश से दोस्ती गांठ ली. दोस्ती मजबूत होने पर वह उस के घर भी जाने लगा.

इस दौरान उस की मुलाकात दीपिका से भी हुई. कुछ दिनों में ही दीपिका ने योगेश की आंखों में अपने लिए चाहत देख ली. दोनों के बीच दोस्ती हो गई और वे मोबाइल पर बातें करने लगे. राजेश को पता नहीं था कि जिस दोस्त पर वह आंख मूंद कर विश्वास करता है, वह आस्तीन का सांप बन कर उस के घर की इज्जत तारतार करने की शुरुआत कर रहा है.

जब दीपिका योगेश के आकर्षण में बंध गई तो दोनों ने अपने रिश्ते को प्यार का नाम दे दिया. अब दीपिका बहाने से घर से बाहर जाती और योगेश के साथ घूमती. इस बीच योगेश ने तहसील चौक के पास अपना रेस्टोरेंट खोल लिया और खुद गोविंदगढ़ में रहने लगा.

दीपिका पति को धोखा दे कर योगेश के सपने देखने लगी. एक वक्त ऐसा भी आया जब उन के बीच मर्यादा की दीवार गिर गई. इस के बाद तो जब कभी राजेश व प्रेम सिंह बाहर होते तो वह योगेश के साथ अपना समय बिताती. राजेश को पता ही नहीं था कि उस की पत्नी उस से बेवफाई कर के क्या गुल खिला रही है.

अपने नाजायज रिश्ते को प्यार का नाम दे कर योगेश व दीपिका साथ जीनेमरने की कसमें खाने लगे. दोनों के रिश्ते भला कब तक छिपते. आखिर एक दिन राजेश के सामने यह राज उजागर हो ही गया. उस ने अपने ही घर में दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया.

पत्नी की बेवफाई पर राजेश को गुस्सा आ गया. उस ने दीपिका की पिटाई कर दी और योगेश को भी खरीखोटी सुना कर अपनी पत्नी से दूर रहने की हिदायत दी.

कुछ दिन तो सब ठीक रहा लेकिन बाद में दोनों ने फिर से गुपचुप ढंग से मिलना शुरू कर दिया. पर राजेश से कोई बात छिपी नहीं रही. नतीजतन इन बातों को ले कर घर में आए दिन झगड़ा होने लगा.

दीपिका चाहती थी कि उस पर किसी तरह की बंदिश न हो और वह प्रेमी के साथ खुल कर जिंदगी जिए. वह ढीठ हो चुकी थी. अपनी गलती मानने के बजाए वह पति से बहस करती. राजेश अपना घर बरबाद होते नहीं देखना चाहता था. लिहाजा वह समयसमय पर परिवार और बच्चे का वास्ता दे कर दीपिका को समझाने की कोशिश करता. पर उस के दिमाग में पति की बात नहीं धंसती बल्कि एक दिन तो बेशरमी दिखाते हुए उस ने पति से कह दिया, ‘‘मेरे पास एक रास्ता है कि तुम मुझे तलाक दे कर आजाद कर दो. फिर तुम्हें कोई दिक्कत नहीं होगी.’’

राजेश को पत्नी से ऐसी उम्मीद नहीं थी. वह सारी हदों को लांघ गई थी. उस की बात सुन कर उसे गुस्सा आ गया तो उस ने दीपिका की पिटाई कर दी. दीपिका राह से इतना भटक चुकी थी कि वह राजेश को भूल कर योगेश से जुनून की हद तक प्यार करती थी. कई दौर ऐसे आए जब उस ने योगेश को नकद रुपए भी दिए. यह रकम ढाई लाख तक पहुंच चुकी थी.

राजेश मानसिक तनाव से गुजर रहा था. वह इस कदर परेशान हो गया कि उस ने तलाक की बात मान लेने में ही भलाई समझी. दोनों तैयार हुए, लेकिन बेटे को ले कर बात अटक गई. राजेश बेटे को अपने साथ रखना चाहता था जबकि दीपिका उसे देने को भी तैयार नहीं थी. कभीकभी राजेश गुस्से में उस की पिटाई भी कर देता था.

अपनी पिटाई की बात दीपिका जब योगेश को बताती तो योगेश गुस्से में तिलमिला कर रह जाता था. उसे यह कतई पसंद नहीं था कि राजेश उस की प्रेमिका पर हाथ उठाए. रिश्तों की कड़वाहट इस हद तक बढ़ गई कि दीपिका अपने बेटे के साथ बैडरूम में सोती थी, जबकि राजेश ड्राइंगरूम में सोता था.

दीपिका अपना आचरण बदलने को तैयार नहीं थी और राजेश उस की शर्तों पर तलाक नहीं देना चहता था. रिश्तों में नफरत भर चुकी थी. दीपिका तो विवेकहीन हो चुकी थी. वह अब हर सूरत में हमेशा के लिए योगेश की होना चाहती थी. योगेश भी इन बातों से परेशान हो गया था.

राजेश के रहते यह संभव नहीं था इसलिए दोनों ने राजेश को रास्ते से हटाने का खतरनाक फैसला कर लिया. यह काम राजेश के अकेले के वश का नहीं था. उस के रेस्टोरेंट पर पप्पू व डब्बू नामक 2 युवक अकसर आते रहते थे. वे दोनों दबंग प्रवृत्ति के थे और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे. उन के बारे में वह ज्यादा नहीं जानता था. उसे वे काम के मोहरे नजर आए. योजना के अनुसार योगेश ने बहुत जल्द उन से दोस्ताना रिश्ते बना लिए. एक दिन बातोंबातों में योगेश ने कहा, ‘‘तुम दोनों को लखपति बनाने का एक प्लान है मेरे पास.’’

‘‘क्या?’’ पप्पू ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘मेरे लिए तुम्हें एक काम करना होगा जिस के बदले में तुम्हें 5 लाख रुपए मिलेंगे.’’ कहने के साथ ही योगेश ने उन्हें अपने मन की बात बता दी.

पैसों के लालच में दोनों हत्या में उस का साथ देने को तैयार हो गए. अगले दिन उस ने दीपिका से बात की और उस से 50 हजार रुपए ले कर बतौर पेशगी दोनों को दे दिए. इस के बाद दीपिका व योगेश उचित मौके की तलाश में रहने लगे.

उन्होंने 3 मार्च, 2017 की रात हत्या करना तय कर लिया. उस रात प्रेम सिंह अपने कमरे में और राजेश ड्राइंगरूम में नींद के आगोश में थे. लेकिन दीपिका की आंखों से नींद कोसों दूर थी. योगेश ने दीपिका को फोन किया तो उस ने अपने घर का पिछला दरवाजा खोल दिया. फिर रात तकरीबन 12 बजे के बाद घर के पिछले दरवाजे से पप्पू व डब्बू के साथ योगेश घर में दाखिल हुआ. दीपिका तीनों को ड्राइंगरूम तक ले गई. वे अपने साथ गला दबाने के लिए रस्सी भी लाए थे. राजेश उस वक्त गहरी नींद में था.

पप्पू व डब्बू राजेश के गले में रस्सी डाल रहे थे कि उस की आंख खुल गई. मौत का अहसास होते ही वह बचाव के लिए उन से उलझ गया. लेकिन उन सभी ने उसे दबोच लिया. इस बीच दीपिका ने रसोई में से 2 चाकू ला कर उन्हें दे दिए. उन्होंने पहले रस्सी से उस का गला दबाया इस के बाद चाकुओं से ताबड़तोड़ वार किए. दीपिका ने उस के पैर पकड़ लिए थे. योगेश के मन में राजेश के प्रति इसलिए नफरत थी क्योंकि वह दीपिका को पीटता था इसलिए उस ने उस के शरीर पर सब से ज्यादा वार किए.

इस बीच आवाज सुन कर दूसरे कमरे में सो रहे राजेश के पिता प्रेम सिंह वहां आ गए. अपनी आंखों से मौत का नजारा देख कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. प्रेम सिंह को देख कर सभी के चेहरों पर हवाइयां उड़ गईं. उन का इरादा प्रेम सिंह की हत्या का नहीं था. चूंकि उन्होंने राजेश की हत्या करते देख लिया था, इसलिए उन की भी हत्या का फैसला कर लिया.

उन्होंने मिल कर प्रेम सिंह को दबोच लिया और चाकुओं से ताबड़तोड़ प्रहार कर के उन की भी हत्या कर दी. पति व ससुर की सांसों की डोर टूटने से दीपिका खुश हुई. इस के बाद पप्पू व डब्बू वहां से चले गए. फिर दीपिका व योगेश ने मिल कर खून साफ किया और दोनों लाशों को चादर व कंबल में बांध कर कार में रख दिया. योगेश ने चाकू और राजेश का मोबाइल भी रख लिया.

तड़के वह कार ले कर वहां से चला गया. रास्ते में लाडपुर के जंगल में उस ने सारा सामान फेंक दिया. इस से पहले उस ने मोबाइल स्विच्ड औफ कर दिया था. कार उस ने कुंआवाला में सड़क किनारे छोड़ दी. उस ने कपड़े से कार में आग लगाने की कोशिश भी की थी. लेकिन कामयाब नहीं हो सका और इस प्रयास में वह खुद भी जल गया था. इस के बाद उस ने फोन कर के दीपिका को लाशों को ठिकाने लगाने की जानकारी दे दी और अपने घर चला गया.

योजना के अनुसार दीपिका ने अपने मासूम बेटे को अच्छे से रटवा दिया था कि कोई भी पूछे तो बताना है कि उस ने पापा को जाते हुए बाय किया था. शाम ढले दीपिका ने पति व ससुर के बुलंदशहर जाने की झूठी कहानी गढ़ कर उन की गुमशुदगी दर्ज करा दी. अपने घर को भी उस ने पूरी तरह दुरुस्त कर दिया था. यह काम इतनी सफाई से किया था कि घर की तलाशी लेने पर पुलिस भी वहां से कोई सबूत नहीं जुटा पाई.

योगेश की निशानदेही पर पुलिस ने खून से सने चाकू और सोफा के कवर बरामद कर लिए. विस्तृत पूछताछ के बाद अगले दिन यानी 6 मार्च, 2017 को पुलिस ने दोनों आरोपियों को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रैट (द्वितीय) विनोद कुमार की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानत नहीं हो सकी थी.

दीपिका ने बेलगाम ख्वाहिश के चलते प्रेमी के साथ अलग दुनिया बसाने का ख्वाब पूरा करने के लिए जो रास्ता चुना, वह सरासर गलत था. उस ने अपनी ख्वाहिशों को काबू रखा होता और विवेक से काम लिया होता तो एक हंसताखेलता परिवार बरबादी के कगार पर कभी नहीं पहुंचता.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

प्यार में रवि को मिला जहर का इंजेक्शन

26 वर्षीय रवि कुमार दिल्ली के सदर बाजार स्थित कोटक महिंद्रा बैंक में कैशियर थे. रोज की तरह 7 जनवरी, 2017 को ड्यूटी खत्म कर के वह घर जाने के लिए निकले. वह उत्तरी दिल्ली के शास्त्रीनगर में रहते थे. वह बैंक से निकले थे तो उन के साथ साथ काम करने वाले शतरुद्र भी थे. सदर दिल्ली का थोक बाजार है, जिस से वहां दिन भर भीड़ लगी रहती है. माल लाने और ले जाने वाले रिक्शों की वजह से सड़कों पर जाम सा लगा रहता है. इसी वजह से रवि कुमार शतरुद्र के साथ पैदल ही जा रहे थे.

दोनों बैंक से कुछ दूर स्थित वेस्ट एंड सिनेमा के नजदीक पहुंचे, तभी उन के बीच एक ठेले वाला आ गया, जिस से दोनों अलगअलग हो गए. उसी बीच रवि कुमार की गरदन में किसी ने सुई जैसी कोई चीज चुभो दी. गरदन में जिस जगह सुई सी चुभी थी, रवि कुमार का हाथ तुरंत उस जगह पर तो गया ही, उन्होंने पलट कर भी देखा. एक युवक उन्हें भागता दिखाई दिया तो उन्हें लगा कि उसी ने उन की गरदन में कुछ चुभाया है.

रवि कुमार ने गरदन से हाथ हटा कर देखा तो उस में खून लगा था. उन्होंने उस युवक की ओर इशारा कर के शोर मचाया कि ‘पकड़ो पकड़ो’ तो उन के साथी शतरुद्र उस युवक के पीछे भागे. सदर और खारी बावली बाजार में अकसर छिनैती की घटनाएं होती रहती हैं, इसलिए लोगों ने यही समझा कि युवक पैसे वगैरह छीन कर भागा है. कुछ अन्य लोग भी उसे पकड़ने के लिए उस के पीछे दौड़ पड़े.

बाराटूटी के पास भाग रहे उस युवक का पैर फिसल गया तो पीछे दौड़ रहे लोगों ने उसे पकड़ लिया और उस की पिटाई करने लगे. तभी किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर के उस के पकड़े जाने की सूचना दे दी. रवि अभी अपनी जगह पर ही खडे़ थे. उन का हाथ गरदन पर उसी जगह था, जहां कोई चीज चुभी थी. अब तक उन्हें चक्कर से आने लगे थे. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर गरदन पर क्या चीज चुभाई गई है. लेकिन यह साफ हो गया था कि उसी नुकीली चीज के चुभन से उन की तबीयत बिगड़ रही है. इस का मतलब वह कोई जहरीली चीज थी.

बाजार के तमाम लोग रवि को जानते थे. हमदर्दी में वे उन के पास आ कर खडे़ हो गए थे. उन्हीं लोगों में अजय साहू का बेटा इंद्रजीत भी था. अजय साहू सदर बाजार में ही कोटक महिंद्रा बैंक के पास गत्ते के डिब्बे बेचते हैं. इस में उन का बेटा इंद्रजीत हाथ बंटाता था. उस का कोटक महिंद्रा बैंक में एकाउंट था, जिस की वजह से कैशियर रवि कुमार से उस की दोस्ती थी.

रवि की बिगड़ती हालत देख कर लोग ऐंबुलैंस बुलाने की बात कर रहे थे. उस भीड़भाड़ वाली जगह में ऐंबुलैंस का जल्दी पहुंचना आसान नहीं था. इसलिए इंद्रजीत उन्हें मोटरसाइकिल से सेंट स्टीफंस अस्पताल ले गया. जांच के बाद डाक्टरों ने बताया कि जिस ने इन्हें जो भी चीज चुभोई है, उसी की वजह से इन की हालत बिगड़ रही है.

रवि की हालत देख कर साफ लग रहा था कि उन पर जहरीली दवा का असर हो रहा है. चूंकि यह पुलिस केस था, इसलिए डाक्टरों ने थाना सदर पुलिस को फोन द्वारा सूचना दे कर उन का इलाज शुरू कर दिया. शाम साढ़े 7 बजे के करीब पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना मिली थी कि सदर बाजार में बाराटूटी के पास कुछ लोगों ने एक चोर को पकड़ रखा है.

इस सूचना को थाना सदर के ड्यूटी अफसर ने एएसआई निक्काराम के नाम कर इस की जानकारी थानाप्रभारी रमेश दहिया को दे दी थी. इसी के कुछ देर बाद थाना सदर पुलिस को सेंट स्टीफंस अस्पताल से भी सूचना मिली कि कोटक महिंद्रा बैंक के कैशियर रवि कुमार को किसी ने जहरीला इंजेक्शन लगा दिया है, उन का इलाज वहां चल रहा है.

बाराटूटी थाने से लगभग 5-6 सौ मीटर ही दूर है, इसलिए एएसआई निक्काराम हैडकांस्टेबल विजय को ले कर तुरंत वहां पहुंच गए. कुछ लोग 24-25 साल के एक युवक को पकड़े थे. पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले कर पूछा तो उस ने अपना नाम डा. प्रेम सिंह बताया. थाने ला कर उस से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि वह चोर नहीं है.

‘‘तू चोर नहीं है तो लोगों ने तुझे क्यों पकड़ा?’’ थानाप्रभारी रमेश दहिया ने पूछा.

‘‘सर, मैं चोरी कर के नहीं, कोटक महिंद्रा बैंक के कैशियर रवि कुमार की गरदन पर जहर का इंजेक्शन लगा कर भाग रहा था, तभी लोगों ने मुझे पकड़ लिया था.’’ प्रेम सिंह ने कहा.

चाकू, गोली मार कर किसी की जान लेने की वारदातें तो अकसर होती रहती हैं, लेकिन राह चलते किसी को जहर का इंजेक्शन लगा कर जान लेने की कोशिश करने का यह अपनी तरह का अलग ही मामला था. इसलिए मामले की सूचना एसीपी आर.पी. गौतम और डीसीपी जतिन नरवाल को देने के बाद रमेश दहिया अतिरिक्त थानाप्रभारी इंसपेक्टर मनमोहन कुमार को साथ ले कर सेंट स्टीफंस अस्पताल पहुंच गए.

रवि कुमार के उपचार में जुटे डाक्टरों को रमेश दहिया ने बता दिया कि इन्हें जहर का इंजेक्शन लगाया गया है. डाक्टर चाहते थे कि यह पता लग जाता कि इंजेक्शन में कौन सा जहर इस्तेमाल किया गया था, जिस से उपचार में उन्हें आसानी हो जाती.

बहरहाल, डाक्टर रवि कुमार के शरीर में फैले जहर का असर कम करने की कोशिश कर रहे थे. अब तक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी आ गए थे. डीसीपी और एसीपी के सामने प्रेम सिंह से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि रवि कुमार को जो इंजेक्शन लगाया गया था, उस में कोबरा सांप के जहर के अलावा मिडाजोलम और फोर्टविन नाम के कैमिकल भी मिले थे.

पुलिस ने प्रेम कुमार के खिलाफ धारा 328 (जहर देने) का मामला दर्ज कर के जहर के बारे में मिली जानकारी रवि कुमार के इलाज में जुटे डाक्टरों को दे दी. चूंकि अब तक जहर पूरे शरीर में फैल चुका  था, इसलिए रवि कुमार की हालत चिंताजनक होती जा रही थी.

पूछताछ में पता चला कि प्रेम कुमार से यह वारदात रवि कुमार के साले बौबी ने कराई थी. रवि कुमार अपनी पत्नी सविता के साथ मारपीट कर के उसे परेशान करते थे. उन की इस हरकत से बौबी बहुत परेशान रहता था, इसीलिए उस ने अपने बहनोई की हत्या की जिम्मेदारी उसे सौंपी थी.

डीसीपी जतिन नरवाल उस समय थाने में ही मौजूद थे. बौबी की गिरफ्तारी के लिए उन्होंने एसीपी आर.पी. गौतम के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी रमेश दहिया, अतिरिक्त थानाप्रभारी मनमोहन कुमार, एसआई प्रकाश, आशीष, एएसआई निक्काराम, हैडकांस्टेबल विजय आदि को शामिल किया.

रवि कुमार का साला बौबी द्वारका की पालम कालोनी के राजनगर एक्सटेंशन पार्ट-2 में रहता था. पुलिस टीम उस के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. पुलिस उसे पकड़ कर थाने ले आई. बौबी से पूछताछ की गई तो उस ने कहा, ‘‘सर, मेरी बहन सविता तो अपनी ससुराल में खुश है. उस के पति रवि कुमार बेहद सज्जन व्यक्ति हैं, भला मैं उन के बारे में इस तरह क्यों सोचूंगा? यह जो हमला करने वाला आदमी है, इसे तो मैं जानता तक नहीं.’’

बौबी को जब पता चला कि उस के बहनोई अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं तो वह बेचैन हो उठा. उस ने फोन द्वारा यह जानकारी बहन सविता को दी. बौबी की बातों से पुलिस को लगा कि प्रेम सिंह उसे झूठा फंसाने की कोशिश कर रहा है तो पुलिस ने उसे घर जाने की इजाजत दे दी.

बौबी घर न जा कर सीधे सेंट स्टीफंस अस्पताल पहुंचा. लेकिन उस के अस्पताल पहुंचने से पहले ही रात करीब ढाई बजे उस के बहनोई रवि कुमार की मौत हो गई थी. रवि की मौत की खबर पा कर पुलिस भी अस्पताल पहुंच गई और शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

पुलिस ने मामले में हत्या की धारा जोड़ कर अगले दिन यानी 8 जनवरी, 2017 को प्रेम सिंह को तीस हजारी कोर्ट में ड्यूटी एमएम के समक्ष पेश कर सबूत जुटाने के लिए एक दिन के रिमांड पर ले लिया. चूंकि डा. प्रेम सिंह बौबी को इस मामले में झूठा फंसाना चाहता था, इस से पुलिस समझ गई कि यह आदमी बेहद शातिर है.

रिमांड अवधि के दौरान उस से की गई पूछताछ में उस ने जो सच्चाई बताई, उस के अनुसार, उस ने यह काम जिम ट्रेनर अनीश यादव के कहने पर किया था. अनीश ने इस के एवज में उसे डेढ़ लाख रुपए दिए थे.

‘‘यह अनीश यादव कौन है और वह कहां रहता है?’’ मनमोहन कुमार ने पूछा.

‘‘सर, अनीश रवि कुमार की पत्नी सविता का प्रेमी है और वह पालम कालोनी की राजनगर एक्सटेंशन पार्ट-2 में रहता है.’’ प्रेम सिंह ने बताया.

प्रेम सिंह को ले कर पुलिस टीम जिम ट्रेनर अनीश यादव के घर पहुंची तो वह भी घर पर ही मिल गया. उसे थाने ला कर पूछताछ की गई तो रवि कुमार को अनूठे तरीके से मारने की जो कहानी सामने आई, वह प्रेमप्रसंग की चाशनी में सराबोर थी—

सविता दक्षिणीपश्चिमी दिल्ली की पालम कालोनी के राजनगर एक्सटेंशन पार्ट-2 में रहने वाले सुरेशचंद की बेटी थी. सुरेशचंद उत्तर प्रदेश के जिला प्रतापगढ़ के रहने वाले थे. 15-20 साल पहले वह दिल्ली आ गए थे और औटो चलाने लगे थे. बेटी सविता के अलावा उन का एक ही बेटा था, जिस का नाम था बौबी.

छोटा परिवार था. औटो चलाने से जो कमाई होती थी, उस से परिवार का गुजरबसर बड़े आराम से हो जाता था. इसलिए उन्होंने अपने दोनों बच्चों को ठीक से पढ़ायालिखाया. पालम कालोनी में ही नवीन रहता था, जो कालेज में सविता के साथ पढ़ता था. साथ पढ़ने की वजह से दोनों में दोस्ती हो गई थी, जो बाद में प्यार में बदल गई.

राजनगर एक्सटेंशन पार्ट-2 में ही नवीन का दोस्त अनीश रहता था. पढ़ाई के साथसाथ उसे बौडी बनाने का शौक था. इस के लिए वह घंटों जिम में एक्सरसाइज करता था. नवीन ने उसे अपनी प्रेमिका सविता के बारे में सब कुछ बता दिया था. यही नहीं, उस ने सविता से उसे मिलवा भी दिया था. पहली मुलाकात में ही सविता अनीश यादव से प्रभावित हो उठी थी. किसी तरह सविता को अनीश का फोन नंबर मिल गया तो वह उस से फोन पर बातें करने लगी.

अनीश सविता के बात करने का आशय समझ गया. दरअसल सविता का झुकाव नवीन के बजाए अनीश की तरफ हो गया था. दोनों एकदूसरे को प्यार करने लगे थे. नवीन को जब इस बात का पता चला तो उसे दोस्त की बेवफाई का बड़ा दुख हुआ.

अनीश ने एक तरह से नवीन की पीठ में छुरा घोंपा था. इसलिए नवीन ने उस से हमेशा के लिए संबंध खत्म कर लिए. उधर अनीश और सविता एकदूसरे को जीजान से चाहने लगे थे. वे प्यार के उस मुकाम पर पहुंच गए थे, जहां से वापस आना आसान नहीं होता. उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया था. लेकिन वे शादी कोर्ट में करने के बजाए घर वालों की सहमति से सामाजिक रीतिरिवाज से करना चाहते थे.

दोनों ने ही यह बात अपनेअपने घर वालों को कही तो अनीश ने तो किसी तरह अपने घर वालों को राजी कर लिया, पर सविता के घर वाले राजी नहीं हुए. उस की मां तो राजी हो गई थी, पर पिता किसी भी तरह तैयार नहीं हुए. इस की वजह यह थी कि दोनों अलगअलग जाति के थे. सुरेश बेटी सविता की शादी अपनी ही जाति के लड़के से करना चाहते थे.

पिता का यह फरमान सविता को बहुत अखरा. सुरेशचंद्र कैंसर पीडि़त थे. डाक्टरों ने कह दिया था कि वह कुछ ही दिनों के मेहमान हैं. इसलिए सविता जिद कर के पिता के दिल को दुखाना नहीं चाहती थी. यह बात उस ने प्रेमी अनीश को बताई तो अरमानों पर पानी फिरने का उसे भी दुख हुआ. सविता ने घर वालों की मरजी के खिलाफ शादी करने से इनकार कर दिया.

सविता का मानना था कि उस के पिता ज्यादा दिनों के मेहमान तो हैं नहीं, इसलिए उन के गुजर जाने के बाद वह अनीश से शादी कर लेगी. लेकिन अनीश इंतजार करने को तैयार नहीं था. लिहाजा उस ने 29 फरवरी, 2016 को दिल्ली के संगम विहार की एक लड़की से शादी कर ली.

सविता को जब पता चला कि अनीश ने शादी कर ली है तो उसे बड़ा दुख हुआ. उस ने इस बात की शिकायत अनीश से की तो उस ने  कह दिया कि यह शादी घर वालों ने जबरदस्ती की है. इस पर सविता ने मन ही मन ठान लिया कि वह अनीश को किसी और लड़की का नहीं होने देगी.

सविता अनीश की बीवी से मिली और उसे अपने और अनीश के प्रेमसंबंधों के बारे में बता दिया. यही नहीं, उस ने अनीश के साथ के अपने कुछ फोटो भी उसे दिखा दिए. फोटो देख कर अनीश की पत्नी को बहुत गुस्सा आया. शाम को उस ने अनीश से पूछा तो उस ने झूठ बोल दिया.

चूंकि वह सविता के साथ उस के फोटो देख चुकी थी, इसलिए वह उस पर भड़क उठी. दोनों के बीच जम कर नोकझोंक हुई. इस का नतीजा यह निकला कि अनीश की नवविवाहिता उसे छोड़ कर मायके चली गई. वह आज तक लौट कर ससुराल नहीं आई है.

अनीश की पत्नी के चली जाने से सविता बहुत खुश हुई, क्योंकि उस के और अनीश के बीच जो दीवार खड़ी हो गई थी, वह गिर चुकी थी. लिहाजा दोनों के बीच फिर पहले की तरह संबंध हो गए. पर ये संबंध ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सके. सविता के पिता की हालत दिनबदिन बिगड़ती जा रही थी. उन की इच्छा थी कि अपने जीतेजी वह सविता के हाथ पीले कर दें.

किसी रिश्तेदार से उन्हें रवि कुमार के बारे में पता चला. रवि कुमार उत्तर प्रदेश के जिला मैनपुरी के कुआंगई गांव के रहने वाले प्रमोद कुमार का बेटा था. प्रमोद कुमार सेना से रिटायर होने के बाद कानपुर की किसी कंपनी में नौकरी कर रहे थे. रवि कुमार दिल्ली के सदर बाजार स्थित कोटक महिंद्रा बैंक में कैशियर था.

लड़की लड़का पसंद आने के बाद सुरेशचंद्र और प्रमोद कुमार ने बातचीत कर के 13 जुलाई, 2016 को सामाजिक रीतिरिवाज से उन की शादी कर दी. हालांकि सविता अनीश से ही शादी करना चाहती थी, लेकिन रिश्ता तय होने के बाद पिता की भावनाओं को ठेस पहुंचाना उस ने उचित नहीं समझा. शादी के बाद वह मैनपुरी स्थित अपनी ससुराल चली गई.

शादी के बाद सविता ने अनीश से संबंध खत्म कर लिए और पूरी तरह से ससुराल में रम गई. उस की शादी हो जाने से अनीश जल बिन मछली की तरह तड़पने लगा. सविता की वजह से ही उस की बसीबसाई गृहस्थी उजड़ी थी और अब वही उसे धोखा दे कर चली गई थी. इस का उसे बड़ा दुख हुआ.

अनीश ने सविता से बात की तो उस ने उसे अपनी मजबूरी बता दी. उस ने पति के बारे में सब कुछ बता कर वाट्सएप से उस का फोटो भी भेज दिया. जबकि वह उस की एक भी बात सुनने को तैयार नहीं था. उस ने सविता पर पति से तलाक लेने का दबाव बनाया, लेकिन वह तैयार नहीं हुई. कुल मिला कर किसी भी तरह से वह पति को छोड़ने को तैयार नहीं थी.

अनीश तो सविता के प्यार में जैसे पागल था. उस के बिना हर चीज उसे बेकार लगती थी. उस ने सदर बाजार जा कर एक बार रवि कुमार से मुलाकात भी की. उस ने उसे अपने और सविता के प्यार के बारे में बता भी दिया. इस पर रवि ने उस से कहा कि सविता शादी से पहले क्या करती थी, इस से उसे कोई मतलब नहीं है. वह उस के अतीत को नहीं जानना चाहता, अब वह उस की पत्नी है और अपनी जिम्मेदारियां ठीक से निभा रही है.

अनीश को रवि कुमार की बातों पर हैरानी हुई. वह सोचने लगा कि यह कैसा आदमी है, जो पत्नी की सच्चाई जान कर भी चुप है. बहरहाल निराश हो कर वह घर लौट आया. कहते हैं, जिम करने से ब्रेकअप का दर्द कम हो जाता है, पर अनीश तो खुद जिम टे्रनर था. इस के बावजूद वह सविता से बिछुड़ने की पीड़ा नहीं भुला पा रहा था. वह सविता को पाने के उपाय खोजने लगा.

ऐसे में ही उस के दिमाग में आइडिया आया कि अगर वह रवि की हत्या करा दे तो सविता उसे मिल सकती है. यही उसे उचित लगा. वह रवि को ठिकाने लगाने का ऐसा उपाय खोजने लगा, जिस से उस पर कोई आंच न आए. वह तरीका कौन सा हो सकता है, इस के लिए वह इंटरनेट पर सर्च करने लगा. उस ने तमाम तरीके देखे, पर हर तरीके में बाद में कातिल पकड़ा गया था.

वह ऐसे तरीके की तलाश में था, जिस में कातिल पकड़ा न गया हो. इंटरनेट पर महीनों की सर्च के बाद आखिर उसे वह तरीका मिल गया. लंदन और जर्मनी में 2 हत्याएं हुई थीं, जो पिन चुभो कर की गई थीं. पिन द्वारा जहर उन के शरीर में पहुंचाया गया था और वे मर गए थे. ठीक इसी तरह शीतयुद्ध के दौरान बुल्गारिया के रहने वाले बीबीसी के पत्रकार जर्जेई मर्कोव की हत्या की गई थी.

मर्कोव कम्युनिस्टों की निगाह में था. उन्होंने उसे मारने का फतवा भी जारी किया था. मर्कोव बस में जा रहा था, तभी एक हट्टेकट्टे आदमी ने एक छाता उस के ऊपर गिरा दिया था. इस के लिए उस आदमी ने मर्कोव से सौरी भी कहा था. मर्कोव ने भी सोचा कि छाता गलती से गिर गया होगा. लिहाजा उस ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया.

मर्कोव की जांघ में कुछ चुभा था, जहां उस ने हाथ से मसला भी था. 3 दिनों बाद उसे बहुत तेज बुखार आया और वह मर गया. यह बात सन 1978 की थी. जेम्स बौंड स्टाइल में उस छाते के पिन में रिसिन जहर लगाया गया था. रूस की खुफिया एजेंसी केजीबी ने इसे ईजाद किया था.

इस मामले में कोई पकड़ा नहीं जा सका था. इटली के जासूस पिकोडिली पर आरोप लगा था, पर कुछ साबित नहीं हो पाया था. मर्कोव खुद भी एक कैमिकल इंजीनियर था. अनीश को यह तरीका सब से अच्छा लगा.

इस के बाद वह ऐसे व्यक्ति को खोजने लगा, जो उस का यह काम कर सके. वह जहर कहां से लाए, यह भी उस के लिए समस्या थी. इस के लिए वह किसी डाक्टर की तलाश करने लगा, क्योंकि पढ़ाई के दौरान डाक्टरों को जहर के बारे में भी पढ़ाया जाता है. कोई डाक्टर उस का यह काम करने को तैयार हो जाएगा, इस बात का शंशय उस के मन में था. अनीश का एक दोस्त था डा. प्रेम सिंह. वह फिजियोथैरेपिस्ट था. प्रेम सिंह जालौन का रहने वाला था. करीब 4 साल पहले वह दिल्ली आया था. गाजियाबाद के एक इंस्टीट्यूट से फिजियोथैरेपिस्ट का कोर्स करने के बाद द्वारका के पालम विहार में उस ने अपना क्लीनिक खोला था, पर उस का काम ज्यादा अच्छा नहीं चल रहा था.

अनीश के घर के पास डा. प्रेम सिंह किसी के यहां फिजियोथैरेपी करने आता था. तभी उस की मुलाकात अनीश से हुई. अनीश भी जिम ट्रेनर था, इसलिए दोनों में दोस्ती हो गई. अपना काम कराने के लिए अनीश को प्रेम सिंह ही उचित लगा. एक दिन उस ने अपने प्रेम विरह की पीड़ा प्रेम सिंह से बता कर बीबीसी पत्रकार जर्जेई मर्कोव की तरह रवि कुमार की हत्या करने को कहा.

पढ़ाई और क्लीनिक खोलने के लिए प्रेम सिंह पर कुछ लोगों का कर्ज हो गया था. उसे पैसों की सख्त जरूरत थी. हत्या करने का जो प्लान अनीश ने उसे बताया था, उस में उस के फंसने की संभावना काफी कम थी. इसी बात को ध्यान में रख कर उस ने कहा कि इस काम को वह खुद तो नहीं करेगा, पर किसी से करवा जरूर देगा. आखिर 3 लाख रुपए में बात तय हो गई. अनीश ने डेढ़ लाख रुपए उसे एडवांस दे भी दिए.

पैसे लेने के बाद प्रेम सिंह सितंबर, 2016 में अपने गांव गया. उस के गांव के बाहर सपेरों के डेरे थे. उस ने एक सपेरे से कोबरा सांप का जहर मांगा तो उस ने उसे 7 सौ रुपए में एक, सवा एमएल जहर उसे एक सिरिंज में निकाल कर दे दिया. प्रेम सिंह जानता था कि कभीकभी सांप के जहर से भी इंसान बच जाता है.

इसलिए सांप के जहर में वह दूसरे जहर मिलाना चाहता था. उस में क्या मिलाया जाए, इस के लिए वह गूगल पर सर्च करने लगा. सर्च कर के उसे मिडाजोलम और फोर्टविन नाम की 2 दवाओं की जानकारी मिली. इन की अधिक मात्रा आदमी के लिए जानलेवा साबित होती है. इन में से फोर्टविन तो केमिस्ट के पास मिल जाती है, पर मिडाजोलम बडे़ अस्पतालों में ही मिलती है.

अनीश से पैसे ले कर प्रेम सिंह गांव में ही रुका था. जबकि अनीश फोन कर के काम जल्द करने को कह रहा था. वह कह रहा था कि अगर उस से काम नहीं हो रहा तो वह उस के पैसे लौटा दे. दबाव बढ़ने पर वह दिल्ली आ गया.

प्रेम सिंह का एक रिश्तेदार एम्स में भरती था. वह उसे देखने एम्स गया तो वहां टेबल पर उसे मिडाजोलम की शीशी दिखाई दी. 5 एमएल दवा का इंजेक्शन मरीज को लगा दिया गया था. उस में एक एमएल दवा बाकी थी. प्रेम सिंह ने उस शीशी को जेब में रख लिया. फोर्टविन उस ने एक केमिस्ट से खरीद ली. इस के बाद उस ने एक सिरिंज में कोबरा सांप का जहर, फोर्टविन और मिडाजोलम को मिला कर रख दिया.

इस के बाद वह अनीश के साथ रवि कुमार की रैकी करने लगा. 25 अक्तूबर, 2016 को दोनों ने उस का पीछा किया. उस दिन वह बिंदापुर में अपने चचिया ससुर से मिल कर लौट रहा था. जैसे ही वह औटो में बैठा, प्रेम सिंह ने इंजेक्शन लगाने के लिए सुई उस के हाथ में घुसेड़ी. सुई चुभते ही उस ने अपना हाथ घुमाया तो सुई हाथ से निकल गई. इस तरह वह उसे इंजेक्शन नहीं लगा सका.

रवि कुमार ने शोर मचाया तो प्रेम सिंह भीड़ का फायदा उठा कर जहर की सिरिंज ले कर भाग खड़ा हुआ. इस के बाद प्रेम सिंह चौकन्ना हो गया. लेकिन वह समझ नहीं पाया था कि उसे सुई लगाने वाला आखिर कौन था? उस की उस ने पुलिस में शिकायत भी नहीं की थी.

वारदात को कैसे अंजाम दिया जाए, इस बारे में प्रेम सिंह और अनीश की बात होती रहती थी. दोनों ने तय किया कि रवि कुमार ड्यूटी खत्म करने के बाद बाहर निकले तो उसे ऐसी जगह इंजेक्शन लगाया जाए कि वह जीवित न बचे. दोनों मौके की तलाश में लगे रहे. उन्हें लगा कि यह काम सदर बाजार में करना आसान रहेगा, क्योंकि वह भीड़भाड़ इलाका है.

वारदात को अंजाम देने के मकसद से 7 जनवरी, 2017 को अनीश और प्रेम सिंह द्वारका से मैट्रो पकड़ कर आर.के. आश्रम स्टेशन पर पहुंचे. वहां से ई-रिक्शा द्वारा वे सदर बाजार में बाराटूटी चौक पर पहुंचे. अनीश ने वहीं पर प्रेम सिंह को एक बोतल बीयर पिलाई. इस के बाद वे कोटक महिंद्रा बैंक की उस शाखा के नजदीक पहुंच गए, जहां रवि कुमार नौकरी करता था.

शाम सवा 7 बजे के करीब रवि कुमार अपने सहकर्मी शतरुद्र के साथ बैंक से निकला तो प्रेम सिंह उस के पीछे लग गया. जबकि अनीश वहीं खड़ा रहा. प्रेम सिंह को वेस्ट एंड सिनेमा के नजदीक जैसे ही मौका मिला, उस ने रवि की गरदन में फुरती से जहर का इंजेक्शन लगा दिया. इस बार उस ने इंजेक्शन का सारा जहर रवि के शरीर में पहुंचा दिया था.

इस के पहले अप्रैल, 2016 में चैन्नै में एक बिजनैसमैन पकड़ा गया था, जिस ने सन 2015 में इसी अंदाज में 3 लोगों को इंजेक्शन लगा कर मारा था. पहले उस ने इंजेक्शन कुत्तों पर ट्राई किए थे. इंजेक्शन को वह छाते में छिपा कर रखता था. छाते को वह जांघ में छुआ देता था. मरने वाले उन 3 लोगों में एक उस का साला भी था.

अनीश ने इंटरनेट पर महीनों तक सर्च करने के बाद रवि कुमार को मारने का जो उपाय खोजा, आखिर उस से उसे क्या हासिल हुआ? अपने किए अपराध में वह जेल तो पहुंच ही गया, साथ ही उस ने सविता की हंसतीखेलती गृहस्थी भी उजाड़ दी. प्रेम सिंह ने डाक्टर होने के बावजूद अपने पेशे को बदनाम कर के जो कृत्य किया, वह निंदनीय है. पैसे के लालच में वह अपना फर्ज भी भूल गया.

बहरहाल, थाना सदर बाजार पुलिस ने डा. प्रेम सिंह और जिम ट्रेनर अनीश यादव को गिरफ्तार कर के तीसहजारी न्यायालय में महानगर दंडाधिकारी सचिन सांगवान की कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. केस की तफ्तीश इंसपेक्टर मनमोहन कुमार कर रहे हैं.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, सविता परिवर्तित नाम है.

परपुरुष की बांहों में सुख की तलाश

कुलदीप सिंह को गायब हुए पूरे 2 हफ्ते गुजर चुके थे. उस का फोन भी बंद बता रहा था. उस की पत्नी कमलजीत कौर से जब कोई उस के बारे में पूछता तो वह यही कह देती कि वह नौकरी के लिए नोएडा गया है. कुलदीप नौकरी के लिए गया है तो उस का फोन क्यों बंद है? यह बात उस की बहन सुखमिंदर की समझ में नहीं आ रही थी.

उस ने भाई को हर संभावित जगह पर तलाशा, पर उस का कुछ पता नहीं चला. जब वह हर जगह कोशिश कर के थक गई तो पति देविंदर सिंह को साथ ले कर थाना दोराहा पहुंच गई. यह 22 मई, 2017 की बात है.

सुखमिंदर ने थानप्रभारी अश्वनी कुमार को बताया कि 7 मई, 2017 को उस का भाई कुलदीप यह कह कर घर से गया था कि वह अपने दोस्त हरप्रीत के साथ नौकरी के लिए नोएडा जा रहा है. हरप्रीत तो लौट आया, पर कुलदीप का कुछ पता नहीं है. हरप्रीत का कहना है कि नौकरी की बात कर के कुलदीप उसे छोड़ कर न जाने कहां चला गया था. कुलदीप का फोन भी बंद है.

पुलिस ने सुखमिंदर की शिकायत पर कुलदीप की गुमशुदगी दर्ज कर के उस की तलाश शुरू कर दी.

पंजाब के जिला लुधियाना की तहसील दोराहा के गांव बिलासपुर के रहने वाले सज्जन सिंह के 2 बच्चे थे, बेटा कुलदीप सिंह और बेटी सुखमिंदर कौर. सीधेसादे और साधारण आर्थिक स्थिति वाले सज्जन सिंह बच्चों को अधिक पढ़ा नहीं पाए. बच्चे बड़े हुए तो उन्होंने दोनों की शादियां कर दी.

बेटी सुखमिंदर की शादी जिला संगरूर के गांव बादशाहपुर मंडियाला के रहने वाले देविंदर सिंह से की थी. वह अपने पति के साथ खुश थी. इस के बाद 30 सितंबर, 2007 को बेटे कुलदीप की शादी मलहोद के लिहल गांव के रहने वाले दर्शन सिंह की बेटी कमलजीत कौर के साथ कर दी थी.

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शादी के बाद कुछ सालों तक तो कुलदीप और कमलजीत कौर ठीकठाक से रहे. उन के 2 बेटे भी हुए, गुरचरण सिंह और हर्षवीर सिंह. लेकिन बाद ही में दोनों के बीच तूतूमैंमैं होने लगी. इस की वजह यह थी कि कुलदीप के पास कोई स्थाई काम नहीं था. उस के पिता के पास जो थोड़ी जमीन थी, उसे उन्होंने बच्चों के पालनपोषण और उन की शादीब्याह के समय बेच दी थी. इसीलिए कुलदीप छोटामोटा काम कर के किसी तरह घर चला रहा था.

थानाप्रभारी अश्वनी कुमार ने एएसआई जसविंदर सिंह, तेजा सिंह, हवलदार लखवीर सिंह, सुरजीत सिंह, सिपाही गुरप्रीत सिंह और नवजीत सिंह की एक टीम बनाई और लापता कुलदीप सिंह और घर से गायब हरप्रीत की तलाश में लगा दी. कुछ मुखबिरों को भी उन्होंने कमलजीत कौर के चालचलन के बारे में पता लगाने के लिए लगा दिया था, क्योंकि सुखमिंदर कौर ने पुलिस को यह भी बताया था कि उस की भाभी कमलजीत कौर का चालचलन ठीक नहीं है.

इसीलिए अश्वनी कुमार कुलदीप की पत्नी कमलजीत कौर के चरित्र के बारे में जानना चाहते थे. पुलिस की जांच और मुखबिरों द्वारा दी गई सूचना से कमलजीत कौर के बारे में काफी चौंकाने वाली जानकारियां मिलीं. इस के बाद थानाप्रभारी ने कमलजीत कौर को पूछताछ के लिए सिपाही भेज कर थाने बुलवा लिया.

सिपाही जिस समय कमलजीत कौर के घर पहुंचे थे, वह कपड़े वगैरह बांध कर कहीं भागने की तैयारी में थी. सिपाही कमलजीत कौर को जिस समय थाने ले कर पहुंचे, इत्तफाक से उस समय एसपी नवजोत सिंह माहल भी थाना दोराहा आए हुए थे. अश्वनी कुमार ने महिला हवलदार सतजीत कौर की मदद से एसपी के सामने कमलजीत कौर से पूछताछ शुरू की. सख्ती से की गई पूछताछ में कमलजीत कौर ने स्वीकार कर लिया कि हरप्रीत से उस के नाजायज संबंध हैं.

कुलदीप सिंह के बारे में पूछने पर कमलजीत कौर ने बताया कि 7 मई को रात करीब 10 बजे हरप्रीत उसे यह कह कर अपने साथ ले गया था कि वह उस की नोएडा में नौकरी लगवा देगा. उस के बाद वे दोनों कहां गए, यह उसे पता नहीं है.

‘‘तुम्हारा पति 7 मई से लापता है और तुम ने न तो उसे ढूंढने की कोशिश की और न ही पुलिस को सूचना दी. तुम झूठ बोल रही हो. सचसच बताओ कि वह कहां है?’’ अश्वनी कुमार ने पूछा.

कमलजीत कौर पर सख्ती की गई तो उस ने कुलदीप के बारे में तो कुछ नहीं बताया, पर हरप्रीत के बारे में बता दिया कि वह कहां मिलेगा. पुलिस टीम तुरंत उस के बताए पते पर पहुंची, जहां वह एक दोस्त के घर छिपा बैठा था. पुलिस उसे हिरासत में ले कर थाने आ गई. थाने में कमलजीत कौर को बैठी देख कर उस की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई.

इस के बाद उस ने बिना किसी हीलहुज्जत के अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि उस ने अपने एक दोस्त रोशन के साथ मिल कर कुलदीप की हत्या 7 मई की रात कर दी थी. हत्या की योजना में कमलजीत कौर भी शामिल थी. इस के बाद पुलिस ने कमलजीत कौर से भी पूछताछ की. तो उस ने सारी सच्चाई बता दी.

पुलिस ने दोनों को उसी दिन लुधियाना की सक्षम अदालत में पेश कर 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड में की गई पूछताछ में कुलदीप सिंह के लापता होने से ले कर उस की हत्या तक की जो कहानी प्रकाश में आई, वह इस प्रकार थी—

2 बच्चों की मां होने के बावजूद कमलजीत कौर की सुंदरता में कोई कमी नहीं आई थी, बल्कि शरीर भर जाने से वह और ज्यादा सुंदर लगने लगी थी. उसे देख कर बिलकुल नहीं लगता था कि वह 2 बच्चों की मां है. वह हंसमुख स्वभाव की ऐसी खूबसूरत युवती थी, जिस की सूरत और शरीर से ही कामुकता झलकती थी.

गांव में शादी के एक समारोह में कमलजीत कौर की आंखें गांव के ही नौजवान हरप्रीत सिंह से लड़ गईं. हरप्रीत कमलजीत की सहेली का भाई था. हालांकि वह हरप्रीत को पहले से जानती थी, लेकिन उस दिन उन की जो आंखें लड़ी थीं, उन में चाहत थी.

समारोह के बाद जब हरप्रीत घर पहुंचा तो कमलजीत की याद में उसे नींद नहीं आई. अगले दिन वह मिठाई देने के बहाने कमलजीत के घर जा पहुंचा. कमलजीत भी जैसे पलकें बिछाए उसी का इंतजार कर रही थी. खुले दिल से अपनी बांहें फैला कर उस ने हरप्रीत का स्वागत किया. उस समय घर पर कोई नहीं था. कुलदीप अपने काम पर गया था और दोनों बच्चे स्कूल गए थे. घर पर अकेली कमलजीत कौर ही थी.

दुनिया भर के जितने भी नाजायज काम या अपराध होते हैं, वे एकांत मिलते ही अंगड़ाइयां लेने लगते हैं. कमलजीत और हरप्रीत के साथ भी उस दिन ऐसा ही हुआ. चाहत की आग दोनों ओर से बराबर लगी थी, जो एकांत मिलते ही भड़क उठी. दोनों ही दुनियाजहान से बेखबर एकदूजे की बांहों में समा गए. जब अलग हुए तो दोनों मर्यादा लांघ चुके थे.

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समय के साथ कमलजीत कौर और हरप्रीत के नाजायज संबंध गहराते गए. स्थिति यह आ गई कि दोनों साथ जीनेमरने की कसमें खाने लगे. दूसरी ओर कुलदीप को पता नहीं था कि उस की पीठ पीछे घर में पत्नी क्या गुल खिला रही है. बाद में जब कुलदीप को इस बात की खबर लगी, तब तक पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका था.

पत्नी की बेवफाई सुन कर कुलदीप का दिल टूट गया. वह समझ नहीं पा रहा था कि आखिर उस के प्यार में ऐसी क्या कमी रह गई, जो दोदो बच्चे होने के बावजूद कमलजीत को यह कदम उठाना पड़ा.

हरप्रीत अच्छी तरह जानता था कि कमलजीत कौर शादीशुदा औरत है. इस के बावजूद वह उसे जीजान से चाहता था. हरप्रीत दूसरी जाति का था, इस के बावजूद कमलजीत कौर एक दिन के लिए भी उस से जुदा नहीं होना चाहती थी. एक दिन उस ने रुआंसी हो कर कहा, ‘‘हरप्रीत, इस समय मेरी स्थिति 2 नावों पर सवारी करने जैसी है. इस स्थिति से अच्छा है मैं मर जाऊं.’’

हरप्रीत उस की बात समझ गया. उस ने उसे प्यार से समझाते हुए कहा, ‘‘तुम चिंता मत करो, जल्दी ही मैं कोई रास्ता निकालता हूं.’’

‘‘तुम हमेशा यही कहते हो. आज साफसाफ बता दो कि तुम मुझे अपनाओगे या फिर मैं कोई और रास्ता देखूं?’’

‘‘इस का मतलब तो यह हुआ कि कुलदीप को रास्ते से हटाना पड़ेगा.’’

‘‘जो करना है, जल्दी करो.’’ कमलजीत कौर ने कहा.

फिर उसी दिन कुलदीप की हत्या की योजना बन गई. 7 मई, 2017 की शाम को जब कुलदीप घर लौटा तो कमलजीत कौर ने कहा, ‘‘हरप्रीत, तुम्हें दिल्ली के पास स्थि त नोएडा में 15 हजार रुपए महीने की नौकरी दिलवा रहा है. वह कह रहा था कि 10 हजार रुपए महीने ऊपर से भी बन जाया करेंगे.’’

‘‘अरे ऊपर की गोली मारो, हमारे लिए तनख्वाह ही बहुत है.’’ पत्नी की भावनाओं से अंजान कुलदीप उस की बातों में आ गया. कुछ देर बाद ही हरप्रीत आया और कुलदीप को अपने साथ ले कर चला गया.

हरप्रीत पहले उसे अपने घर ले गया. घर से उस ने अपनी काले रंग की पल्सर मोटरसाइकिल नंबर पीबी10जी ई6790 उठाई और उस पर कुलदीप को बैठा कर अपने दोस्त रोशन के घर पहुंचा. रोशन को साथ ले कर तीनों दोराहा अड्डे पर पहुंचे, जहां उन्होंने शराब पी.

योजना के अनुसार, उन्होंने कुलदीप को अधिक शराब पिलाई. उसी बीच कुलदीप ने हरप्रीत का मोबाइल फोन ले कर अपनी बहन सुखमिंदर कौर को फोन कर के बताया कि वह हरप्रीत के साथ नौकरी के लिए नोएडा जा रहा है. यह सुन कर सुखमिंदर कौर ने उसे हरप्रीत सिंह के साथ कहीं भी जाने से मना किया. उस समय कुलदीप नशे में था, इसलिए बहन की बातों पर उस ने ध्यान नहीं दिया.

कुलदीप को नशा चढ़ गया तो रोशन और हरप्रीत ने उसे मोटरसाइकिल पर बीच में बैठाया और सरहिंद नहर के ऊपर बने फिलोटिंग रेस्टोरेंट के किनारे नहर के साथसाथ काफी दूर तक ले गए. रात होने की वजह से वहां सन्नाटा पसरा था.

एक जगह मोटरसाइकिल रोक कर दोनों उतरे और नशे में धुत कुलदीप को भी उतार कर उस के गले में साथ लाई रस्सी लपेट कर कस दी. कुछ ही देर में कुलदीप की मौत हो गई. वह गिर गया तो उन्होंने उस की लाश उठा कर सरहिंद नहर में फेंक दी. इस के बाद रोशन अपने घर चला गया तो हरप्रीत कमलजीत कौर के पास.

6 दिनों बाद 13 मई को पटियाला की थाना पसियाना पुलिस ने कुलदीप की लाश नहर से बरामद कर की थी, पर शिनाख्त न होने की वजह से लावारिस मान कर उस का अंतिम संस्कार कर दिया था. दोराहा पुलिस कुलदीप की लाश खोजते हुए थाना पसियाना पहुंची तो उस ने 13 मई को एक लाश मिलने की जानकारी दी. जब उस लाश के फोटो सुखमिंदर कौर को दिखाए गए तो उस ने उस की पुष्टि अपने भाई कुलदीप के रूप में की.

हरप्रीत और कमलजीत से पूछताछ के बाद पुलिस ने तीसरे आरोपी रोशन को भी गिरफ्तार कर लिया था. पुलिस ने उन की निशानदेही पर पल्सर मोटरसाइकिल, हत्या में प्रयुक्त रस्सी और 2 मोबाइल फोन बरामद कर लिए थे. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद पुलिस ने भादंवि की धारा 302, 201, 34 के तहत गिरफ्तार कमलजीत कौर, हरप्रीत और रोशन को 24 मई, 2017 को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीनों आरोपी जेल में थे. उन की जमानतें नहीं हो सकी थीं.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

दिल्ली के पंचशील पार्क में एक्ट्रेस के घर हुई चोरी

बौलीवुड की मशहूर मौडल व टीवी अभिनेत्री अपर्णा कुमार के दिल्ली स्थित घर से लाखों की हीरे जड़ित जूलरी, कैश समेट कर नर्स फरार हो गई. मालवीय नगर के पंचशील पार्क में अभिनेत्री के बुजुर्ग माता पिता अकेले रहते हैं. इतना ही नहीं, बुजुर्ग के अकाउंट से भी लाखों का कैश ट्रांजेक्शन कर लिया गया.

अपर्णा मुंबई में रहती हैं. उनकी देखभाल के लिए अपर्णा ने घर में नर्स रखी हुई थी जो कि मेड के तौर पर भी जौब करती थी. घटना की जानकारी मिलते ही अपर्णा मुंबई से फौरन दिल्ली पहुंची और मालवीय नगर थाने में इस बाबत केस दर्ज कराया.

फिलहाल एक टीम गायब मेड की तलाश में वेस्ट बंगाल भेजी है. मामले में सभी पहलुओं से जांच चल रही है.

पुलिस के मुताबिक, 74 साल के अरुण कुमार व मां सावित्री गुप्ता एस ब्लॉक में रहते हैं. अंजलि नाम की युवती घर में मेड व नर्स के तौर पर जौब पर रखी हुई थी. अपर्णा मुंबई में रहते हुए इन दिनों शूटिंग में बिजी हैं. कुछ दिनों से तबियत ठीक नहीं रहने की वजह से अपर्णा मुंबई से दिल्ली पैरंट्स को देखने आईं. लेकिन घर पहुंचने पर देखा कि मेड गायब है.

अगली सुबह सावित्री नगर स्थित मेड के घर पर अपर्णा पहुंची. जहां मालूम चला कि वह परिवार के साथ कमरा खाली करके कोलकाता जाने की बात कहकर निकली है. बिना बताए इस तरह गायब होने पर शक हुआ.

घर आकर देखा अलमारी से हीरे जड़ित 4 सोने के कड़े, ईयर रिंग, गोल्ड चैन व तमाम जूलरी समेत 5 लाख कैश गायब है. इसके बाद पता चला कि मां के बैंक अकाउंट से भी 4 लाख की ट्रांजेक्शन हुई है.

अपर्णा ने पुलिस को बताया कि उनके पैरंट्स कभी भी औनलाइन बैंकिंग नहीं करते. वहीं पुलिस ने जांच पड़ताल की तो मालूम चला कि मेड को कोई वेरिफिकेशन भी नहीं कराया गया था. इस बारे में मालवीय नगर पुलिस सीसीटीवी कैमरों की मदद भी ले रही है.

अनजान फेसबुक फ्रेंड रिक्वेस्ट से रहें सावधान..!

चंडीगढ़ की एक युवती को फेसबुक पर विदेशी ‘हैंडसम’ की फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करना भारी पड़ गया. पहले कीमती गिफ्ट भेजने, फिर विदेश से भारत आकर पैरंट्स से मुलाकात करने का झांसा देकर करीब साढ़े छह लाख रुपये ऐंठ लिए गए. न गिफ्ट मिला, न परदेसी से मुलाकात हुई. युवती ने स्पेशल सेल की साइबर सेल में पूरे घटनाक्रम का ब्योरा देते हुए कंप्लेंट दी.

पुलिस के मुताबिक, 26 साल की युवती मूलरूप से हरियाणा के सिरसा की रहने वाली है. वह चंडीगढ़ में जौब करती है. कुछ महीने पहले युवती की फेसबुक पर जौहन हैरी से दोस्ती हुई. फेसबुक से चैट वौट्सऐप पर पहुंच गई. युवक शादी की बात कहने लगा. इसके बाद उसने युवती से कहा कि वह गिफ्ट लाया है, जो उसे भेजना चाहता है. जौहन ने युवती को जूलरी और विदेशी मुद्रा से भरा पैकेट भेजने का झांसा दिया.

युवती के मोबाइल पर कौल आई. कौलर ने कहा कि वह मुंबई एयरपोर्ट कस्टम विभाग से बोल रहा है. गिफ्ट के लिए 35 हजार रुपये टैक्स भरना होगा. युवती ने बताए गए बैंक अकाउंट में कैश जमा करा दिया. फिर कौल आई कि और डेढ़ लाख रुपये देने होंगे. युवती ने वह भी दे दिए.

जौहन ने कहा कि वह कुछ दिनों में आ रहा है. उसने टिकट की फोटोकौपी भी दिखाई. तय तारीख पर युवती के पास एक मैडम की कौल आई. उन्होंने कहा कि वह मुंबई एयरपोर्ट से बोल रही हैं. मैडम ने बताया कि जौहन 50 हजार पाउंड लेकर आया है. एक्सचेंज कराने के लिए 2.10 लाख जमा करने होंगे. युवती ने रकम जमा करा दी.

कुछ घंटे बाद जौहन की कौल आई. उसने कहा कि दिल्ली एयरपोर्ट आ चुका है, लेकिन इमीग्रेशन वाले निकलने नहीं दे रहे हैं. पाउंड के बदले ढाई लाख रुपये की डिमांड कर रहे हैं. युवती ने फिर पैसे जमा करा दिए. इसके बाद जौहन भाग गया. उसका नंबर भी बंद हो गया.

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