Caste Discrimination. साल 2016 से पहले टीना डाबी नाम की लड़की को कोई नहीं जानता था. वे एक दलित परिवार से ताल्लुक रखती थीं. पढ़ने में बहुत होशियार थीं. उन्होंने यूपीएससी की तैयारी की और 2015 की अपनी पहली ही कोशिश में आल इंडिया टौप किया और ट्रेनिंग के बाद साल 2016 के बैच की आईएएस अफसर बनीं.
यहां टीना डाबी का जिक्र इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि भारत में आज भी जाति का सांप नौजवान पीढ़ी खासकर लड़कियों को डंसने के लिए हमेशा तैयार रहता है. उन्हें ताना दिया जाता है चूंकि वे निचली जाति की हैं तो उन्हें पढ़लिख कर क्या हासिल होगा? घर वाले ही सवाल खड़ा कर देते हैं कि ‘तेरा क्या कालेज जा कर पढ़ने का काम?’, ‘अगर कमाने लगेगी तो तेरे नखरे बढ़ जाएंगे’, ‘हमारी बिरादरी में शादी नहीं हो पाएगी’. कहने का मतलब है कि उन के सपनों की उड़ान के पर काट दिए जाते हैं.
पर क्या जाति का हमारे दिलोदिमाग पर हावी होना इतना जरूरी है कि हम इस की बुनियाद पर किए गए फर्क को ही हकीकत मान लें और अपनी पूरी जिंदगी को बरबाद कर दें?
बिलकुल नहीं, क्योंकि जाति इनसान की काबिलीयत तय नहीं करती, बल्कि उस का काम और सोच तय करती है. टीना डाबी इस बात का सब से शानदार उदाहरण हैं.
अब सवाल उठता है कि जाति का यह भेद बनावटी क्यों है? जवाब, क्योंकि पैदा होते ही कोई ऊंचानीचा नहीं होता. पढ़ाई, हुनर, मेहनत, बरताव… यही इनसान की असली पहचान है. आज डाक्टर, इंजीनियर, टीचर, बिजनैसमैन हर जाति में हैं, तो फिर भेद का लौजिक ही खत्म हो जाता है.
लेकिन जब हम समाज को खंगालते हैं, तो यही महसूस होता है कि हर समुदाय की लड़कियां जाति के नाम पर दबा दी जाती हैं या फिर उन में बचपन से ही यह भर दिया जाता है कि बाहर जा कर अपनी जाति की लड़कियों में उठबैठ करो, विधर्मी लड़की से तो उचित दूरी बनाए रखो.
यहां उन के वजूद को कुंद किया जाता है, क्योंकि समाज के ठेकेदारों को पता है कि लड़कियां अपने वजूद से जाति का भेद मिटा सकती हैं.
ऐसे दिखाएं अपनी स्मार्टनैस
सब से पहले खुद को इतना काबिल बनाओ कि जाति पूछने की जरूरत ही न पड़े. पढ़ाई के साथसाथ स्किल में टौप करो. जब आप का रिजल्ट बोलेगा तो लोग जाति नहीं पूछेंगे. उदाहरण के लिए कोई लड़की ब्यूटी पार्लर चला रही है. वह अपने काम में माहिर है, तो कोई उस की जाति नहीं पूछेगा, बल्कि ‘मैडम’ कह कर इज्जत देगा.
पढ़ाई कर के शादी करो और बच्चे पैदा कर के उन्हें पालते रहो की सोच से बाहर निकलो. इस के बजाय कोई प्रोफैशन जैसे डाक्टर, इंजीनियर वकील, टीचर आदि को चुनो. अगर बिजनैस की समझ है तो कारोबारी महिला बनो. याद रखिए कि आज का आप का काम ही कल की सब से बड़ी कामयाबी है, जो आप को बराबरी का एहसास कराता है.
दोस्ती और टीमवर्क से दीवार तोड़ो
जाति का बंधन तोड़ने के लिए स्कूलकालेज, कोचिंग में सब के साथ बैठो, प्रोजैक्ट करो, खाना शेयर करो. खुद को किसी से कम मत समझो.
जब लड़कियां साथ में आगे बढ़ेंगी तो ‘तुमहम’ वाली सोच अपनेआप खत्म होगी. इस से उन का दायरा बढ़ेगा और दायरा बढ़ने से उन का आत्मसम्मान भी ऊंचा होगा.
बात और भाषा से दूरी मिटेगी
दिक्कत तब ज्यादा होती है जब कोई कहता है कि वह तो ‘फलां जाति की है’. ऐसा कहने के बजाय ‘वह बहुत स्मार्ट है’, ‘अच्छा गाती है’, ‘कोडिंग जानती है’ जैसी हौसला बढ़ाने वाली बातें बोलो. मजाक में भी जाति वाले ताने मत दो, क्योंकि छोटीछोटी बात से ही सोच बदलती है.
रोल मौडल बनो
जब कोई लड़की अपनी मेहनत से नौकरी या बिजनैस कर के परिवार का नाम रोशन करती है, तो पूरे महल्ले की सोच बदलती है. और जब वह कुछ बन जाती है तो उस का भी फर्ज बनता है कि वह बड़ों की इज्जत करे, पर गलत रीतिरिवाज के नाम पर भेदभाव कभी न सहे.
कानून साथ है
संविधान सब को बराबर मानता है. पढ़ाई, नौकरी, मंदिर, दुकान सब जगह बराबरी का हक है. सब से बड़ी स्मार्टनैस क्या है? यही कि ‘मैं लड़की हूं, मैं काबिल हूं’ सोच के साथ जीना.
जब लड़कियां काबिल बनेंगी तो न उन की जाति पूछी जाएगी, न लिंग. सिर्फ काम देखा जाएगा.
याद रखिए, पैदा सब नंगे होते हैं, बिना किसी भेदभाव के, जाति का टैग तो बाद में लगाया जाता है. पर काबिलीयत अपने दम पर कमाई जाती है, तभी तो एक दलित की बेटी जब आईएएस बनती है, तो वह ‘मैडम’ कहलाती है. Caste Discrimination
Blind Faith Story. साधु की बात सुन कर रंपो परेशानी में पड़ गई. क्या करे वह? पति को अच्छा करना है, तो साधु की बात माननी पड़ेगी. इज्जत चली जाएगी, लेकिन पति तो बच जाएगा.
साधु ने उस का हाथ पकड़ लिया और पूछा, ‘‘क्या सोच रही है?’’
रंपो अपनी कलाई को उस के हाथ से छुड़ाने की कोशिश करते हुए बोली, ‘‘आप की बात मान रही हूं बाबा, पर मेरा पति अच्छा हो जाना चाहिए.’’
साधु ने उस के गले में बांहें डालते हुए कहा, ‘‘हम खुश तो देवता खुश. तू चिंता मत कर. तेरा पति पूरी तरह ठीक हो जाएगा.’’
रंपो को साधु की बात पर पूरी तरह यकीन हो गया. वह मंदिर में ही लेट गई. उस ने अपना जिस्म साधु को सौंप दिया.
अपनी वासना का शिकार बनाने के बाद साधु बोला, ‘‘अब जा. कोई आ गया, तो गड़बड़ हो जाएगी.’’
रंपो खड़ी होते हुए बोली, ‘‘बाबा, देवता से सच्ची प्रार्थना करना.’’
साधु उसे हलका सा बाहर की ओर धकेलते हुए बोला, ‘‘जा, अब जल्दी जा यहां से. तू चिंता मत कर.’’
रंपो मंदिर से बाहर निकल आई. भीतर की तरह बाहर भी वैसा ही अंधेरा था. वह अपने पति के पास आ गई. वह सो रहा था. रंपो भी उस के बगल में जा कर लेट गई. उस का दिल जोरजोर से धड़क रहा था. उसे बारबार अपने किए पर पछतावा हो रहा था. पर फिर सोचा कि कल की सुबह नई रोशनी ले कर आएगी. सालों से बीमार पड़ा उस का पति ठीक हो जाएगा.
रंपो तो अपने पति को यहां ठीक कराने लाई थी. उसे क्या पता था कि देवता भी उस की जाति वालों से फर्क करते हैं. उस की आंखों में एकएक कर वह नजारा साफसाफ घूम रहा था.
उस ने तो साधु के पैरों में पड़ कर मंदिर के देवता के दर्शन की भीख मांगी थी, लेकिन साधु मंदिर की सीढि़यों पर खड़ा हो कर उसे दुत्कारते हुए बोला था, ‘बेहूदा औरत, दूर हट. यह देवता का मंदिर है. सीढि़यां मत चढ़ जाना. तेरा पति बीमार है, तो ठीक हो जाएगा. ले, भभूत ले जा, पर देवता के दर्शन तू नहीं कर पाएगी. देवता तो ऊंची जाति वालों के हैं.’
रंपो और उस का पति दोनों गांव के लोगों के कपड़े धो कर गुजारा करते थे.
रंपो दोनों हाथ जोड़ते हुए बोली थी, ‘देवता तो सभी के हैं. वे किसी जाति से बंधे हुए नहीं होते. मेरे पति दर्द से मरे जा रहे हैं. दर्शन कर लेने दो. हो सकता है, देवता सुन लें. मेरे पति को इस दर्द से छुटकारा मिल जाए, तो मैं आप का एहसान जिंदगीभर नहीं भूलूंगी.’
रंपो का पति भी गुजारिश भरी नजरों से उस साधु की ओर देख रहा था, पर साधु का उस ओर कोई ध्यान नहीं था.
चमकते लंबे काले बाल, गले में रुद्राक्ष की माला, गेरुए रंग का चमकता कुरताधोती, साधु के चेहरे पर अपने बड़े होने का दंभ साफ रूप से नजर आ रहा था.
साधु रंपो से फिर बोला, ‘तू तो विधवा होगी ही, हम को भी खाएगी. तेरे पति की पीठ में कैंसर का फोड़ा है. वह बच नहीं सकता. क्यों मेरी जान के पीछे पड़ी है? मैं ने तुझे मंदिर में आने दिया, तो समाज मुझे नहीं छोड़ेगा.’
‘मुझ पर रहम करो बाबा. मुझे देवता के दर्शन कर लेने दो. मुझे पूरा भरोसा है कि देवता मेरी अर्जी जरूर सुन लेंगे,’ रंपो ने गुजारिश की.
रंपो की बातों से साधु का दिल पिघलता नजर आया. वह बोला, ‘अभी थोड़ी देर रुक जा. दिन डूबने को है. जब सब चले जाएं, तब तू दर्शन कर के जाना, तब तक बाहर बैठ.’
साधु के कहने से रंपो को हिम्मत बंध गई थी. वह अपने पति रामहेत का हाथ पकड़ कर मंदिर से दूर ले गई.
वह साधु को मन ही मन दुआ देने लगी. महंगे इलाज की इस दुनिया में इतना पैसा उस के पास कहां था कि डाक्टरों से औपरेशन करा सके. अब तक छोटेमोटे डाक्टरों से ही उस ने बहुत इलाज कराया था. रुपए लगातेलगाते वह कंगाल हो गई थी, पर कैंसर में कोई फर्क नहीं पड़ा था.
रंपो के बच्चे अभी छोटे थे. लड़का 10 साल का और दोनों लड़कियां 5 साल और 7 साल की थीं. अब वह माली रूप से बुरी तरह टूट चुकी थी. लोगों ने सलाह दी थी कि अगर देवता ने उस की सुन ली, तो वे रामहेत को ठीक कर सकते हैं. इन देवता ने इस से पहले कई लोगों की बीमारी ठीक की है.
रंपो भी यही चाहती थी कि देवता उस की सुन लें, इसीलिए वह यहां उन के दर्शन करने आई थी. मगर यहां उस की जाति आड़े आ गई. निचली जाति में पैदा होने की वजह से साधु उसे मंदिर में घुसने नहीं दे रहा था.
रंपो ने कपड़ों की गठरी में से एक मैली सी चादर निकाली और रामहेत के नीचे बिछा दी.
रामहेत बोला, ‘दर्द से मरा जा रहा हूं रंपो. अब सांस लेना भी दूभर हुआ जा रहा है. या तो आज रात देवता सुन लेंगे, नहीं तो कल सुबह का सूरज मुश्किल से देख पाऊंगा.’
दिन ढल चुका था. मंदिर से लोगों की भीड़ कम होती जा रही थी. धीरेधीरे आसमान में तारे दिखाई देने लग गए थे. चारों ओर सन्नाटा था. मंदिर के बगल वाले कमरे में वह साधु भी कुछ देर बाद सो चुका था.
रंपो से अब नहीं रुका गया. वह वहां से चुपचाप उठी और मंदिर की ओर चल दी. साधु खर्राटे भर रहा था. उस ने सोचा कि यह अच्छा समय है अंदर जाने का. वह बेधड़क मंदिर की सीढि़यां चढ़ गई. मंदिर का दरवाजा खुला था.
रंपो देवता को मन ही मन धन्यवाद देने लगी, ‘हे ऊपर वाले, आज तो ठीक वैसा ही दिन है मेरे लिए, जैसे कृष्ण के जन्म के समय वसुदेव और देवकी के लिए था. वसुदेव के गोकुल जाते समय अपनेआप दरवाजे खुल गए और पहरेदार सो गए थे. उसी तरह तुम ने अपने दर्शन के लिए साधु को गहरी नींद में सुला दिया.
‘तुम्हारे दर्शन पा कर अब तो मेरे पति जल्दी ही ठीक हो जाएंगे,’ यह सोचती हुई वह मंदिर में घुस गई.
मंदिर में घोर सन्नाटे के अलावा कुछ नहीं था. रंपो अंदाज से टटोलती हुई देवता के पास पहुंच गई. मन में डर था, पर उस ने जल्दी से अपने पति के अच्छे होने की प्रार्थना की. फिर धूनी से भभूत ली और सीढि़यों से नीचे उतर गई.
रामहेत अब भी दर्द से कराह रहा था. रंपो ने भभूत उस के फोड़े के चारों ओर डाली और बोली, ‘हे देवता, सारा दर्द तुरंत बंद कर दो. आप के नाम के बताशे बांटूंगी.’
‘तू मंदिर में कैसे घुस गई?’ रामहेत ने हैरानी से पूछा.
‘हां, देवता की हम पर कृपा है. साधु खर्राटे भर रहा है. मंदिर के दरवाजे खुले पड़े हैं,’ रंपो फुसफुसाई.
‘फिर तो चमत्कार हो गया.’
‘गरीबों की देवता सुन लेते हैं. उन्होंने खुद यह चमत्कार किया है. तुम आज ही अच्छे हो जाओगे.’
दोनों की देवता के प्रति अटूट श्रद्धा थी, पर बीमारी के लिए देवता भला क्या करता? कुछ देर तक तो दर्द कम रहा, पर फिर बढ़ गया.
रात काफी बीत चुकी थी. रामहेत से जब दर्द नहीं सहा गया, तो वह बोला, ‘तू एक बार और मंदिर से भभूत ले आ.’
‘वह साधु जाग गया तो…’ रंपो ने शक जाहिर किया. ‘वह नहीं जागेगा,’ रामहेत बोला.
रंपो को देवता पर विश्वास तो पक्का था, पर इस बार उस का दिल किसी अनजान डर से कांप रहा था. साधु के खर्राटे इस बार बंद हो गए थे.
रंपो फिर धीरेधीरे मंदिर की ओर गई. मंदिर की सीढ़ी चढ़ कर दरवाजे तक आई ही थी कि कड़क आवाज में किसी ने कहा, ‘कौन है वहां?’
रंपो ठिठक कर वहीं सिमट गई. वह थरथर कांप उठी. सीढि़यों से नीचे उतर कर वह बोली, ‘मैं हूं… रंपो.’
‘मंदिर में घुस रही है कमबख्त. तुझे से मना कर दिया, फिर भी,’ साधु यह कहते हुए उस के पास पहुंच गया.
रंपो ने चालाकी से काम लिया. वह बोली, ‘नहीं महात्माजी, आप ने कह नहीं दिया था कि जब यहां कोई नहीं हो, तब आना, इसलिए आई थी. अब तो यहां कोई नहीं है. मुझ पर कृपा करो. मेरे पति को ठीक कर दो.’
‘ठीक कर देंगे, मगर एक शर्त पर.’ ‘कौन सी शर्त?’ ‘थोड़ी देर के लिए अपनी देह मुझे सौंप दे,’ साधु बेशर्मी से बोला और रंपो का हाथ कस कर पकड़ लिया.
रंपो सुन कर हैरान रह गई और बोली, ‘तुम महात्मा हो महाराज, ऐसी बातें करते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती.’
रंपो ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की, मगर वह नाकाम रही.
साधु बोला, ‘रंपो, अब तू बच नहीं पाएगी. अगर गांव वालों को पता चल गया कि तू मंदिर में आई थी, तो वे मारमार कर तेरी हालत खराब कर देंगे.’ रंपो ने आखिरकार साधु की बात मान ली थी.
रंपो यादों से बाहर निकल आई थी. रामहेत सो चुका था. रंपो को भी नींद आ गई. सुबह 4 बजे रंपो अचानक जागी, तो रामहेत जोरजोर से सांस ले रहा था.
‘‘क्या परेशानी है?’’ रंपो हड़बड़ा कर उठ बैठी. रामहेत घुटनों के बल बैठ गया और बोला, ‘‘लगता है, देवता ने हमारी सुन ली. मेरा जी निकल रहा है.’’
उस की बातें सुन कर रंपो ठगी सी रह गई.
रामहेत बोला, ‘‘रंपो, देवीदेवता सब बेकार की बातें हैं. तू देवता के दर्शन कर आई, पर कुछ हुआ तो नहीं. तू दर्शन नहीं कर पाती, तो तेरे भी मन में कसक रह जाती. अब मैं बच नहीं सकता.’’
रंपो ने उसे अपनी गोद में भर लिया. पर यह क्या, वह तो उस की गोद में ही जड़ हो चुका था.
Hindi Social Story: कैलाश अग्रवाल एक बहुत बड़े कारोबारी का बेटा था. उस ने निर्मला नाम की एक गरीब दलित लड़की को काम पर रखा, फिर उस के प्यार में पड़ गया. उन दोनों ने शादी कर ली, पर क्या निर्मला उस की उम्मीदों पर खरी उतर पाई?
सौम्या ने ड्राइवर को फोन कर गाड़ी निकालने को कहा और ड्रैसिंग रूम से बाहर निकल अपने रूम को लौक करते हुए लिफ्ट की ओर निकल गई.
त्रिवेणी सोसाइटी में सौम्या और उस के पति आकाश अग्रवाल का चारमंजिला मकान था. इस मकान को मकान कहना भी ठीक नहीं. त्रिवेणी सोसाइटी में आलीशान विलाज की कम्युनिटी थी. शानदार पार्क, जिम, स्पोर्ट्स क्लब और कई तरह की सुविधाओं से लैस यह सोसाइटी अमीरों की अलग दुनिया थी.
.आकाश के पिता दिवाकर अग्रवाल ने इस सोसाइटी में 2 मकान लिए हुए थे. एक में आकाश अपनी पत्नी सौम्या और 9 साल की बेटी तृषा के साथ रहता था और दूसरे मकान में उन का दूसरा बेटा कैलाश मांबाप के साथ रहता था. दोनों भाइयों के मकान आसपास ही थे.
आकाश अग्रवाल के छोटे भाई कैलाश अग्रवाल की शादी नहीं हुई थी. कैलाश ने जेएनयू से सोशियोलौजी की पढ़ाई की थी और शायद इसीलिए वह अग्रवाल समाज के दूसरे नौजवानों से बिलकुल अलग था.
जहां दूसरे नौजवान बिजनैस, गलफ्रैंड, पूजापाठ, तीर्थों और लग्जरी लाइफ को प्राथमिकता देते थे, वहीं कैलाश को किताबों का शौक था. हालांकि वह बिजनैस में भी पूरी दिलचस्पी रखता था, लेकिन खाली समय में ज्यादातर वह किताबों में खोया रहता था.
दिल्ली के चांदनी चौक में आकाश और कैलाश के पिता दिवाकर अग्रवाल की मशहूर ज्वैलरी शौप थी. दिवाकर अग्रवाल पिछले 5 साल से अपने बिजनैस का सारा जिम्मा दोनों बेटों के कंधों पर डाल कर लगभग रिटायरमैंट की जिंदगी जी रहे थे. दोनों बेटों ने पिता के बिजनैस को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया था और चांदनी चौक के अलावा करोलबाग में भी ‘दिवाकर ज्वैलर्स’ की ब्रांच खोल ली थी.
दिवाकर अग्रवाल के बिजनैस में अभी तक कोई बंटवारा नहीं हुआ था. मकान अलगअलग जरूर थे, लेकिन बाकी सभी चीजें सा?ा थीं. दोनों भाइयों के पास अलगअलग कारें थीं और मांबाप की जिम्मेदारियां भी बंटी हुई थीं. बूढ़े मांबाप कुंआरे बेटे कैलाश के घर में रहते थे. कैलाश अपने मांबाप का बहुत खयाल रखता था.
दोनों भाइयों में कभी बिजनैस को ले कर कोई मनमुटाव नहीं हुआ था. चांदनी चौक और करोलबाग दोनों जगह अच्छीखासी सेल होती थी. चांदनी चौक वाली शौप पर बड़ा भाई आकाश बैठता था और कैलाश ज्यादातर समय करोलबाग वाली ब्रांच पर रहता था.
हालांकि कभीकभी जब आकाश बिजनैस के काम से बाहर होता तो कैलाश चांदनी चौक वाली शाखा पर भी बैठता था. स्टाफ से मिलता, उन की समस्याओं को सुनता, जरूरी इंस्ट्रक्शन देता और जरूरी होने पर अपने एम्प्लौयी की मदद भी करता.
इसी वजह से दोनों जगह के ज्यादातर वर्कर्स, सेल्स गर्ल्स और टीम के लोग कैलाश को बेहद पसंद करते थे. स्टाफ की नजर में बड़ा भाई आकाश मालिक था, लेकिन कैलाश मालिक से कहीं बढ़ कर था.
आकाश की पत्नी सौम्या बेहद खर्चीली थी. शौपिंग करना तो उस के डेली रूटीन का हिस्सा था. आएदिन घर में पार्टी रखती और अपनी अमीर फीमेल फ्रैंड्स को पार्टी में इनवाइट करती. देर रात तक शोरशराबे के बाद देर रात जा कर घर में शांति कायम हो पाती.
सौम्या की 9 साल की बेटी तृषा तो डिस्टर्ब होती ही आकाश भी रोजरोज के हंगामे से तंग आ चुका था. आकाश सौम्या को सम?ाने की कोशिश करता, लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता.
एक दिन आकाश ने सौम्या से कहा, ‘‘देखो सौम्या, रात को मैं तो जैसेतैसे अपने कमरे में कान पर तकिया रख कर सो जाता हूं, लेकिन तृषा के बारे में तो सोचो. अगर तुम्हें रोज पार्टी कर के घर को नरक बनाना ही है तो तृषा को बोर्डिंग में भेज दो.’’
सौम्या ने आकाश की बात का जवाब देते हुए कहा, ‘‘तृषा मेरी बेटी है, उसे हाई क्लास में रहने की आदत बचपन से ही डालनी जरूरी है, लेकिन अब मैं भी नहीं चाहती कि वह इस घर में रहे, क्योंकि जब मैं घर पर नहीं रहती तो तृषा अपने दादादादी के पास चली जाती है जो कि मु?ो बिलकुल पसंद नहीं. अच्छा रहेगा कि वह बोर्डिंग में ही रहे.’’
सौम्या तो पहले से ही और आजादी चाहती थी. उस की आजादी में तृषा पहले से ही रुकावट बन रही थी. सौम्या को अपने सासससुर बिलकुल पसंद नहीं थे. एक ही सोसाइटी में रहने के कारण वे लोग सौम्या की जिंदगी में दखल डालते थे. घर आनाजाना होता था और कई बार उसे मुफ्त की सलाह दी जाती थी. यह मुफ्त की सलाह सौम्या को फूटी कौड़ी नहीं सुहाती थी.
जल्द ही तृषा एक महंगे बोर्डिंग स्कूल में पढ़ने चली गई. अब सौम्या बिलकुल आजाद थी. अब वह तृषा को स्कूल से लाने ले जाने और उस का खयाल रखने की जिम्मेदारी से छूट गई थी. पूरे दिन शौपिंग, पार्टी और मौजमस्ती के बाद जब शाम को सौम्या घर आती तब उसे खाना तैयार मिलता. घर में 3 नौकर थे जो गार्डन से ले कर किचन तक का सारा काम करते थे, फिर भी सौम्या अपने किसी नौकर से कभी खुश नहीं रहती थी और महीने 2 महीने पर नौकरों को बदलती रहती थी. कैलाश को अपनी भाभी की इन्हीं आदतों से चिढ़ थी, लेकिन वह कहता कुछ नहीं था, बस दूरी बना कर रखता था.
मांबाप और बड़ा भाई आकाश चाहते थे कि जल्द कैलाश को कोई लड़की पसंद आए और वह शादी कर ले. सौम्या ने अपने पति आकाश से कई बार अपनी अमीर सहेली प्रीति की बेटी सोनाक्षी से कैलाश की शादी की बात की, लेकिन हर बार आकाश ने साफ मना कर दिया. एक तो आकाश को सौम्या की कोई भी सहेली पसंद नहीं थी. जितने को वह जानता था सभी घमंडी और संवेदनहीन थीं. दूसरी बात यह कि आकाश अरेंज मैरिज के खिलाफ था. वह चाहता था कि उस का भाई अपनी पसंद से शादी करे.
कैलाश को कोई लड़की भाती ही नहीं थी. वह अमीर होने के बावजूद अमीरों के कल्चर से दूरी बना कर रखता था. अपने औफिस जा कर स्टाफ के साथ बैठ कर लंच कर लेता और वीकएंड पर किसी नाइट क्लब में जाने के बजाय अपने किसी दोस्त के साथ पहाड़ों पर घूमने निकल जाता.
कैलाश के ज्यादातर दोस्त तो उस के अपने वर्कर्स या मैनेजर्स ही थे. उस में ऊंचनीच का भाव बहुत कम था जो उस की सोशियोलौजी की पढ़ाई का नतीजा था.
कुछ दिनों से करोलबाग वाली ब्रांच पर एक लड़की की जरूरत थी. कैलाश ने क्वालिफिकेशन के साथ अखबार में विज्ञापन दिया. शनिवार को उस ने इंटरव्यू की तारीख रखी. काफी लड़कियां आई हुई थीं. खूबसूरत, बिंदास और एजुकेटेड. सभी इंटरव्यू के लिए ऐसे आई थीं जैसे किसी फंक्शन में पहुंची हो.
इन्हीं में से एक थी निर्मला. साधारण से सूटसलवार में वह अलग ही लग रही थी. उस ने नपेतुले शब्दों में हर सवाल का जबाब दिया. उस के 12वीं और बीए में मार्क्स बहुत अच्छे थे. आगे वह और पढ़ना चाहती थी, लेकिन घर के हालात ठीक नहीं थे, इसलिए उसे नौकरी की सख्त जरूरत थी.
कैलाश को निर्मला में न जाने क्या दिखा कि उस ने इंटरव्यू के बाद ही निर्मला को जौइनिंग लैटर थमा दिया और बोला, ‘‘निर्मला, तुम मंडे से जौइन र लेना.’’
निर्मला को तो यकीन ही नहीं हो रहा था. वह हैरान थी कि बीसियों लड़कियों में वह कैसे सिलैक्ट हो गई? उस ने कैलाश को ‘थैंक्स’ कहा और अपनी फाइल टेबल से उठाते हुए औफिस से बाहर निकल गई.
निर्मला के जाने के बाद काफी देर तक कैलाश निर्मला के डौक्यूमैंट्स पर नजरें गड़ाए बैठा रहा. वैसे तो निर्मला एससी परिवार से थी लेकिन कौन्फिडैंस, एजुकेशन और बरताव में काफी ऊपर के क्लास की थी. इंटरव्यू के लिए आई बाकी लड़कियों में नौकरी की जरूरत सब से ज्यादा निर्मला को ही थी, इसलिए कैलाश ने उसे चुना. बाकी लड़कियां तो बस शोरूम में बनठन कर स्मार्ट सेल्स गर्ल की नौकरी करना चाहती थीं.
निर्मला ने इंटरव्यू में आने से पहले ही न केवल कैलाश के शोरूम की जानकारी ले ली थी, उस ने गोल्ड की कैमिस्ट्री के बारे में भी पढ़ लिया था. कैलाश तभी इंप्रैस हुआ था कि निर्मला को तो कैरेट ही नहीं, गोल्ड में डाले जाने वाले कैमिकल्स के बारे में भी पता था.
कुछ ही दिनों में निर्मला ने करोलबाग ब्रांच में अपनी मेहनत, गोल्ड की समझ और बरताव की बदौलत अच्छी जगह बना ली. वह अकसर कैलाश से इजाजत ले कर कारीगरों की भट्ठी के सामने बैठने भी चली जाती. जब भी कैलाश औफिस आता, वह निर्मला से गोल्ड बिजनैस के साथ दूसरे विषयों पर भी ढेरों बातें करता. लंच के समय अकसर कैलाश का टिफिन पास के रैस्टोरैंट से असलम ले कर आता, जिसे कैलाश अपने केबिन में बैठ कर खाता.
एक दिन असलम टाइम पर लंच ले कर नहीं आया तो कैलाश औफिस से बाहर निकला. उस ने देखा कि निर्मला अपना लंच खोल कर बैठ चुकी थी. उस की मेज पर कैमिस्ट्री औफ गोल्ड और हिस्ट्री औफ गोल्ड की 2 मोटी किताबें भी रखी थीं.
कैलाश उन किताबों को देखने के लिए रुक गया और फिर कैलाश ने निर्मला की इजाजत के बिना ही उस के लंच बौक्स से एक रोटी उठाई और सब्जी के साथ खाना शुरू कर दिया.
असल में कैलाश को भूख तो लग रही थी और सब्जी की खुशबू इतनी जबरदस्त थी कि वह खुद को रोक नहीं पाया. यह निर्मला के लिए बेहद हैरान कर देने वाला पल था. सबकुछ अचानक हुआ था. उस ने कैलाश को आते हुए भी नहीं देखा था. वह अकेले ही खाना खाती थी. बाकी स्टाफ पीछे के कमरे में खाना खाता था.
निर्मला को ऐसा लगा जैसे निवाला उस के हलक में ही अटक गया हो. वह कुछ कह पाती इस से पहले ही कैलाश ने कहा, ‘‘वाह, क्या सब्जी है? तुम ने बनाई?’’
निर्मला ने कहा, ‘‘नहीं सर, मुझे सब्जी बनाने नहीं आती. घर में मेरा छोटा भाई है, फिलहाल खाना तो वही बनाता है.’’
कैलाश ने हैरानी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘आप के भाई तो बेहतरीन शैफ हैं यार. इतनी अच्छी सब्जी बनाना उन्होंने कहां से सीखा?’’
निर्मला ने हलक में अटके हुए निवाले को पानी के गिलास के साथ निगल लिया और फिर गहरी सांस लेते हुए बोली, ‘‘सर, मेरे भाई को बचपन से ही कुकिंग का शौक है, उस ने ग्रेजुएशन कर लिया है, अब वह किसी इंस्टिट्यूट से कुकिंग का कोर्स करना चाहता है.
‘‘उसे शैफ बनना है, लेकिन वह अभी जानता नहीं है कि वह जिस कम्युनिटी से आता है, उस समाज के लोग शैफ नहीं बन सकते.’’
कैलाश ने कहा, ‘‘निर्मला, यह तुम से किस ने कह दिया कि दलित समाज के लोग शैफ नहीं बन सकते? जब एससी का बेटा देश का राष्ट्रपति बन सकता है, तो शैफ क्यों नहीं बन सकता? मैं जानता हूं कि समाज में हर लैवल पर जातिवाद होता है, लेकिन जातिवाद किसी के स्किल को नहीं हरा सकता.’’
कैलाश जाति व्यवस्था के सच को बेहद गहराई से समझता था. उसे पढ़ने का बेहद शौक था और जेएनयू की व्यवस्था ऐसी ही थी जिस के कारण वह समाज की इस कड़वी सच्चाई को बखूबी जानने लगा था. जाति व्यवस्था पर उस ने कई किताबें पढ़ी थीं और जेएनयू जैसे संस्थान में पढ़ने के दौरान कैलाश के करीबी दोस्तों में कई दलित और वामपंथी भी थे.
निर्मला की बात सुन कर कैलाश को समझते देर नहीं लगी. उस ने निर्मला से कहा, ‘‘अपने भाई से कहना कि इस शनिवार को वह मुझ से इसी औफिस में आ कर मिलें.’’
कैलाश ने निर्मला के छोटे भाई नवीन का एडमिशन हयात रैजिडैंसी में करवा दिया. 3 साल के कोर्स का सारा खर्च उस ने पहले ही इंस्टिट्यूट को अदा कर दिया. यह निर्मला और उस के भाई नवीन के लिए किसी सपने के पूरा होने जैसा था.
निर्मला की नजर में अब कैलाश सिर्फ बौस नहीं रह गया था. वह निर्मला के दिल में कहीं गहरी जगह बना चुका था.
धीरेधीरे एक साल बीत गया. इस बीच निर्मला ने जहांगीरपुरी की झुग्गियों को छोड़ कर करोलबाग के नजदीक की एक कालोनी में किराए पर फ्लैट ले लिया था. निर्मला के बूढ़े मांबाप अपनी बेटी की कामयाबी से बेहद खुश थे और निर्मला भी ‘दिवाकर ज्वैलर्स’ को ही अपनी जिंदगी मान बैठी थी.
एक साल में 2 बार निर्मला की सैलरी बढ़ी थी, क्योंकि वह पूरे करोलबाग की शौप पर सब से अच्छा काम कर रही थी. उस ने कारीगरों को नई मशीनें भी ले कर देने के लिए कैलाश को तैयार कर लिया. अब वे 8 कैरेट सोने के आभूषण बनाने लगे थे, जो सस्ते तो थे, मगर चमक असली जैसी ही थी. इस से करोलबाग शोरूम की सेल पहले से दोगुना हो गई थी.
निर्मला के टेबल पर आने वाले ज्यादातर ग्राहक कुछ न कुछ खरीद कर ही जाते थे. यह निर्मला की स्किल थी या उस के बरताव में ही ऐसा कुछ था कि कोई भी उस के आकर्षण से बच नहीं पाता था.
निर्मला के इस आकर्षण से ब्रांच का मालिक कैलाश ही नहीं बच पाया, तो ग्राहकों की बात ही क्या थी. वह हर ग्राहक को सोने की बारीकियों को बताती और ग्राहक सिर्फ जानकारी के कारण सही फैसले लेते.
करोलबाग शौप के मैनेजर समेत बाकी स्टाफ के लोग कही न कही निर्मला से जलन रखते थे, लेकिन वे लोग अपने बौस कैलाश से बेहद प्यार करते थे. स्टाफ को लगता था कि निर्मला जानबूझ कर कैलाश पर डोरे डाल रही है, लेकिन सच तो यह था कि कैलाश खुद ही निर्मला पर मरने लगा था.
रविवार की एक सुबह सौम्या ने अपने पति आकाश से कहा, ‘‘आकाश, आज मेरी सहेली प्रीति अपनी बेटी सोनाक्षी के साथ घर आ रही हैं. मैं चाहती हूं कि तुम मम्मीपापा को बुला लो और कैलाश को भी फोन कर दो, क्योंकि उस का आना ज्यादा जरूरी है.’’
आकाश को सौम्या की बात समझते देर नहीं लगी. वह सौम्या को अचरज से देखते हुए बोला, ‘‘सौम्या, तुम्हें पता है न कि कैलाश पर मैं शादी के लिए किसी तरह का दबाव नहीं बना सकता. तुम्हें प्रीति को इनवाइट करने से पहले एक बार मुझ से सलाह तो लेनी चाहिए थी न?’’
सौम्या ने कहा, ‘‘आकाश, तुम्हारा भाई कही न कहीं तो शादी करेगा ही न, अगर वह एक बार सोनाक्षी को देख लेगा तो झट शादी के लिए राजी हो जाएगा, यह मेरी गारंटी है.’’ न चाहते हुए भी आकाश को वह सब करना पड़ा जो वह कभी नहीं चाहता था.
दोपहर तक सौम्या के घर में कैलाश और उस के मम्मीपापा आ चुके थे. साथ ही प्रीति और उस के पति के साथ उन की बेटी सोनाक्षी भी आ चुकी थी. सभी ने साथ में लंच किया और काफी देर गपशप के बाद आखिरकार प्रीति के घर के लोग चले गए.
इस बीच कैलाश और सोनाक्षी के बीच कोई खास बातचीत नहीं हुई. कैलाश ने ही कोई इंट्रस्ट नहीं दिखाया और सोनाक्षी को देख कर भी ऐसा लगा जैसे वह भी बेमन से ही यहां आई हो.
प्रीति के परिवार के जाते ही सौम्या ने कैलाश से कहा, ‘‘कैलाश, कैसी लगी सोनाक्षी?’’
कैलाश ने अपनी भाभी की ओर मुसकराते हुए देखा और बोला, ‘‘बेहद अच्छी लड़की है वह भाभी. लेकिन शायद मैं सोनाक्षी के लायक नहीं हूं, इसलिए आप अब मेरी टैंशन लेना छोड़ दीजिए, क्योंकि मैं ने अपने लिए लड़की पसंद कर ली है.’’
कैलाश की यह बात सुन कर सौम्या के चेहरे की खुशी गायब हो गई. उस के सपने चकनाचूर हो गए. उस ने कैलाश से पूछा, ‘‘कौन है वह लड़की? क्या वह सोनाक्षी से ज्यादा खूबसूरत है?’’
कैलाश ने जवाब दिया, ‘‘भाभी, दुनिया का हर इनसान अलग होता है. किसी से किसी की तुलना नहीं हो सकती. सोनाक्षी अपनी जगह है. मैं ने जो लड़की पसंद की है, वह मेरी नजर में मेरे लिए सब से खूबसूरत है.’’
कैलाश के मुंह से इतना सुनते ही सौम्या का मूड पूरी तरह औफ हो गया. कैलाश के जाते ही उस ने सारा गुस्सा आकाश पर उतारा और पार्किंग से गाड़ी ले कर घर से निकल गई.
बहुत ज्यादा हंगामे और हफ्तों तक रूठारूठी के बाद दिवाकर अग्रवाल ने बिलकुल सादा माहौल में कैलाश ने निर्मला से शादी कर दी. हर तरफ इस शादी की चर्चा थी. कई लोगों का तो यह कहना था कि कैलाश ने करोड़ों के दहेज पर लात मार दी. किसी ऊंचे घर से लड़की लाया होता, तो वह कैलाश के स्टेटस पर फिट बैठती. ऐसे लोगों में ज्यादातर सौम्या के करीबी लोग थे.
सौम्या ने रिश्तेदारों और जानने वालों में कैलाश और निर्मला की शादी को ले कर तमाम तरह की अफवाहें फैलाई थीं, लेकिन इस से कैलाश को कोई फर्क नहीं पड़ा था.
सौम्या को निर्मला की जाति से दिक्कत थी और उस की जाति को ले कर भी उस ने रिश्तेदारों को भड़काया था, लेकिन असल में कैलाश के मम्मीपापा अपने बेटे के फैसले के साथ थे, चाहे मरे मन से ही, क्योंकि निर्मला अब तक एससी वाला रंगरूप छोड़ चुकी थी. वह इंटरव्यू के बाद से बिलकुल अलग लगती थी, लंबी, मसल्स वाली, सम?ादार, सैल्फ कौन्फिडैंट.
सौम्या की जलन बढ़ती चली गई. आखिरकार नौबत बंटवारे तक पहुंची. वैसे तो दोनों भाइयों के मकान और शौप अलगअलग थे. यह व्यवस्था दोनों के पिता दिवाकर अग्रवाल ने 5 साल पहले ही कर दी थी, लेकिन बिजनैस के बहुत से कामों में अभी भी दोनों की साझेदारी थी.
सौम्या ने इसी साझेदारी को खत्म करने के लिए घर में इतना ड्रामा शुरू किया कि आखिरकार दोनों भाइयों को कोर्ट में हलफनामा दे कर अपने अपने बिजनैस को अलगअलग करना पड़ा. अब चांदनी चौक की शौप पूरी तरह आकाश की थी और करोलबाग का शोरूम कैलाश के हिस्से में था.
इस बंटवारे से सौम्या बेहद खुश थी, क्योंकि चांदनी चौक की शौप दिवाकरजी की पुश्तैनी जमीन पर थी, जिस से उस शौप की कीमत करोड़ों में थी, वहीं करोलबाग का शोरूम किराए पर था. फिर भी इस बंटवारे के खिलाफ कैलाश और उस की पत्नी निर्मला ने कोई एतराज नहीं जताया. दोनों खुश थे और बंटवारे के बाद अपने बिजनैस की ग्रोथ में जीजान से जुट गए थे.
आकाश मन ही मन इस बंटवारे से खुश नहीं था, लेकिन सौम्या की वजह से उसे यह करना पड़ा. बंटवारे के बाद सौम्या के खर्चे भी बढ़ते जा रहे थे. बंटवारे के तुरंत बाद ही सौम्या ने नई गाड़ी खरीद ली, जिस की कीमत 50 लाख थी. हालांकि आकाश का बजट गड़बड़ा गया था, लेकिन वह घर में शांति बनाए रखने के नाम पर सौम्या की हर बात मानने को मजबूर था.
मई, 2026 में अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता से अपील की कि सोनाचांदी न खरीदें. इस अपील के बाद से दोनों भाइयों की सेल पर असर पड़ा. आकाश तो पहले से ही मुश्किलों में घिरा हुआ था, प्रधानमंत्री की इस अपील के बाद उसे गहरा धक्का लगा. चांदनी चौक की शौप से उस ने स्टाफ की छंटनी शुरू कर दी. 9 लोगों को नौकरी से निकाल दिया.
इधर करोलबाग में भी प्रधानमंत्री की अपील का गहरा असर पड़ा. ग्राहकों की तादाद 90 फीसदी तक घट गई. कैलाश को समझ नहीं आ रहा था कि ऐसे हालात का मुकाबला कैसे करें? घर पर कैलाश के पिता कि तबीयत भी बिगड़ने लगी. इस वजह से कैलाश को पूरे दिन हौस्पिटल के चक्कर काटने पड़ते, इसलिए उस ने शोरूम पर जाना कम कर दिया.
निर्मला अपनी कार से शोरूम जाती और पूरे दिन काम करने के बाद घर आती. यह कार उसे कैलाश ने ही शादी पर गिफ्ट की थी. निर्मला ने जल्द ही इस घाटे से निबटने का हल निकाल लिया.
निर्मला ने अपनी कार बेच दी और इन पैसों से कई तरह की नई स्कीमें निकालीं. पुराने कस्टमर्स से कौन्टैक्ट कर उन्हें नई स्कीमों के बारे में और नई टैक्नोलौजी के इस्तेमाल को समझा ने के लिए स्टाफ की कई लड़कियों को काम पर लगाया.
निर्मला ने अपने बिजनैस के प्रचार के लिए सोशल मीडिया का जम कर इस्तेमाल किया. स्टाफ के बाकी लोगों को भी उस ने शोरूम के प्रचार और नई स्कीमों को समझाने में लगा दिया. वह 16-16 घंटे शोरूम में या कारीगरों के पास रहती.
रिजल्ट सामने था. धीरेधीरे हालात बदलने लगे. ग्राहकों का भरोसा पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुका था. इस में पूरी मेहनत निर्मला की थी. बिजनैस की गाड़ी पटरी पर आना शुरू हो गई. कैलाश बेहद खुश था. उसे निर्मला पर गर्व था और यह गर्व मुसीबत के समय निर्मला के जूनून को देख कर कई गुना बढ़ गया था. निर्मला की यह लगन देख कर वे तमाम रिश्तेदार सदमे में पहुंच गए थे जो कभी निर्मला के बारे में गलत सोच रखते थे.
इधर आकाश का बिजनैस पूरी तरह चौपट हो चुका था. घर में क्लेश बढ़ चुके थे. आकाश अपनी बेटी तृषा के बोर्डिंग की फीस तक नहीं भर पा रहा था. निर्मला को अपने जेठ और जेठानी के हालात का पता था. उस ने तृषा का एडमिशन नजदीक के सब से अच्छे प्राइवेट स्कूल में करवा दिया और उस की फीस की जिम्मेदारी उठा ली.
सौम्या का सारा घमंड टूट चुका था. बिजनैस घाटे में था. कर्ज का भार बढ़ रहा था जिस की वजह से आकाश को अपनी तीनों कारें बेचनी पड़ी थीं. अब सौम्या की शौपिंग के लिए भागदौड़ भी खत्म हो चुकी थी.
यह निर्मला जैसी गरीब घर की लड़की की काबिलीयत थी जो उस ने बुरे समय में भी समझदारी से काम लिया और यह कैलाश की समझदारी थी जो उस ने निर्मला पर भरोसा किया. कैलाश की किताबों से दोस्ती के चलते ही उस ने निर्मला को पहचानने में देर नहीं की और एक निचली जाति की लड़की को अपना लाइफ पार्टनर बनाया जो अब अपने स्किल और हुनर की बदौलत कैलाश की बिजनैस पार्टनर भी बन चुकी थी. Hindi Social Story
Story in Hindi. लक्ष्मी अपने कालेज के सहपाठी राजेश से प्यार करती थी. पर वह दलित था और लक्ष्मी ऊंची जाति की. लक्ष्मी ने जब राजेश के बारे में अपने घर में बताया, तो मानो भूचाल आ गया. आगे क्या हुआ?
लक्ष्मी 3 दिन से भीतर ही भीतर परेशान लग रही थी. उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. वह अपने मातापिता से कुछ कहना चाहती थी, मगर कह नहीं पा रही थी.
लक्ष्मी कालेज में बीए कर रही थी. उसी की क्लास में सेठ धरमदास का बेटा राजेश भी पढ़ रहा था दोनों में कब प्यार हुआ पता नहीं चला. वह राजेश को बहुत चाहती थी. राजेश भी उसे चाहता था.
राजेश के पिता का बीच बाजार में जूतों का बड़ा शोरूम था. खूब आमदनी होती थी. जब भी वे दोनों पार्क में मिलते थे, तब घंटों बतियाते थे.
लक्ष्मी के पिता का नाम दीनदयाल था. वे ऊंची जाति के थे. वे कभी नहीं चाहते थे एक एससी लड़के को अपना दामाद बनाएं. जाति की दीवार उन के सामने थी.
लक्ष्मी राजेश के घर कई बार गई थी. उस के घर वाले उसे बहू बनाने को तैयार थे. मगर राजेश के पिता धरमदास का कहना था, ‘‘जाति की दीवार तुम दोनों के बीच खड़ी है. क्या तुम्हारे मातापिता इस शादी के लिए तैयार हैं? उन्हें इस शादी के लिए राजी करना तुम्हारा काम है. हम तुम्हारे पिता से हाथ मांगने नहीं जाएंगे.’’
पर लक्ष्मी तो लड़की थी. वह कैसे करती अपनी शादी की बात. वैसे भी दूल्हा नहीं मिल रहा था. जैसे ही दूल्हा मिल जाएगा, उस का कालेज छुड़वा दिया जाएगा.
आज लक्ष्मी ने पूरा मन बना लिया था. कि वह बात कर के रहेगी. मां अकेली बैठ कर गेहूं बीन रही थीं. उस के आसपास न पिता थे, न भाईबहन.
लक्ष्मी ने हिम्मत कर के अपनी मां से कहा, ‘‘मां, मुझे तुम से एक बात कहनी है.’’ ‘‘क्या बात है?’’ मां ने पूछा.
‘‘पहले मुझे वचन दो, आप नाराज तो नहीं होंगी…’’ कह कर लक्ष्मी चुप हो गई. ‘‘कह दे क्या कहना चाहती है,’’ मां ने लक्ष्मी को भरोसा दिलाते हुए कहा.
‘‘मां, तुम इनकार नहीं करोगी.’’ ‘‘अरे, पहले बात तो बता. पहले से कह रही है कि नाराज मत होना,’’ मां बोलीं.
‘‘बस मां, मुझे पूरा यकीन है कि आप सुन कर नाराज नहीं होंगी,’’ तब निश्चिंत हो कर लक्ष्मी बोली, ‘‘मां, मैं कालेज में अपने साथ पढ़ रहे राजेश से शादी करना चाहती हूं.’’
‘‘क्या कहा… तू राजेश से शादी करना चाहती है…कौन है राजेश? स जाति का है वह?’’ मां नाराज हो कर बोलीं.
‘‘मां, तुम भी जानती होंगी. बाजार में सेठ धरमदास के जूतेचप्पल की बहुत बड़ी दुकान है. राजेश उन्हीं का बेटा है,’’ जब लक्ष्मी ने यह बात कही तब गुस्से से मां बोलीं, ‘‘तू उस मोची की बात कह रही है?’’
‘‘हां मां…,’’ लक्ष्मी गरदन हिलाती हुई बोली, ‘‘उन्हीं का बेटा राजेश है.’’ ‘‘मगर लक्ष्मी, मैं उस मोची के बेटे से तेरी शादी नहीं करा सकती.’’
मांबेटी की इस बात को पिता दीनदयाल ने आड़ में रह कर सुन लिया था. इस समय उन का आना उसे ऐसा लगा जैसे कोई बीच में विलेन आ गया हो. फिर भी लक्ष्मी हिम्मत कर के बोली, ‘‘पापा, राजेश में क्या बुराई है?’’
‘‘बुराई… वह मोची का बेटा है. जूतों की बहुत बड़ी दुकान है उन की, तो इस का मतलब यह नहीं है कि तुम दलित के यहां ब्याह कर के अपनी जाति पर धब्बा लगा दो.’’
‘‘पर पापा, दलित भी तो इनसान होते हैं,’’ लक्ष्मी ने जब यह बात कही तब दीनदयाल गुस्से में आ कर बोले, ‘‘मैं ने कब कहा कि दलित इनसान नहीं होते हैं.’’ ‘‘फिर आप को एतराज क्यों हो रहा है पापा?’’
‘‘देख लक्ष्मी, कान खोल कर सुन ले…’’ गुस्से से दीनदयाल बोले, ‘‘तेरी शादी वहीं होगी, जहां मैं चाहूंगा. समझ और कल से तेरा कालेज जाना बंद.’’
दीनदयाल का फैसला सुन कर लक्ष्मी की मां बोलीं, ‘‘देखोजी, इस का कालेज जाना बंद मत कीजिए.’’
‘‘तुम इस का पक्ष मत लो. कालेज क्या भेजा, खानदान पर बट्टा लगा रही है,’’ अपनी पत्नी को डांटते हुए दीनदयाल बोले, ‘‘गैरसमाज के लड़के से शादी करने की बोल रही है. समाज में अपने मांबाप की पगड़ी उछालेगी क्या?’’
दीनदयाल का गुस्सा शांत नहीं हो रहा था. उन का भाषण चालू था, जो बंद होने का नाम नहीं ले रहा था. लक्ष्मी पापा की आदत को जानती थी. जब वे चालू हो जाते थे, फिर नहीं रुकते थे.
मां भी उस समय खामोश थीं. वैसे भी लक्ष्मी मांपापा से डर कर ही रहती थी. अगर इसी बीच पापा के दोस्त मदनलाल न आते, तो न जाने कितनी देर तक उन का भाषण चालू रहता.
मदनलाल ने धीरे से पूछा, ‘‘क्या हुआ दीनदयाल, क्यों परिवार पर इतना चिल्ला रहे हो? अरे, लक्ष्मी कैसे तुम्हारी नाक कटवाने पर तुली है? मैं समझा नहीं.’’
‘‘अरे मदनलाल, इसे कालेज में पढ़ने क्या भेजा, यह उस मोची के बेटेसे शादी करना चाहती है.’’ ‘‘किस मोची का बेटा?’’ मदनलाल ने पूछा.
‘‘अरे वही मोची धरमदास, जिस की बाजार में चप्पलजूतों की बहुत बड़ी दुकान है. उसी का लड़का इस के साथ कालेज में पढ़ रहा है. कह रही है शादी करूंगी तो उसी से ही.’’
‘‘क्यों बेटी लक्ष्मी, तुम्हारे पापा जो कह रहे हैं, वह सही है?’’ जब मदनलाल ने लक्ष्मी से यह पूछा, तब लक्ष्मी गरदन हिलाती हुई बोली, ‘‘हां अंकल, यह सही है.’’
‘‘वह भी तुम से शादी करना चाहता है?’’ ‘‘हां अंकल, उस का पूरा परिवार मुझे बहू बनाना चाहता है,’’ लक्ष्मी ने अपनी बात कह कर गेंद मदनलाल के पाले में डाल दी.
तब मदनलाल बोले, ‘‘दीनदयाल, तुम्हें क्यों एतराज हो रहा है?’’ ‘‘अरे, तुम कैसी बात करते हो मदनलाल…’’ जरा नाराज हो कर दीनदयाल बोले, ‘‘एक मोची के घर में मैं अपनी लड़की कैसे ब्याह दूं. वह निचली जाति का मैं ऊंची जाति का.’’
‘‘यह ऊंचनीच को छोेड़ो दीनदयाल…’’ समझाते हुए मदनलाल बोले, ‘‘ये सब तो पुराने ढकोसले हैं. आजकल यह सब खत्म हो रहा है. वह जमाना भी गया, जब मांबाप जहां कराते थे, वहीं शादी होती है. जब दोनों के मन मिल गए, तब इन की शादी कराना ही अच्छा है.’’
‘‘मेरी कितनी बेइज्जती होगी, यह सोचा है.’’ ‘‘थोड़े दिन महल्ले वाले, रिश्तेदार कह लेंगे. फिर सब चुप हो जाएंगे,’’ समझाते हुए मदनलाल बोले.
इस पर दोनों की काफी बहस हुई. न दीनदयाल कमजोर पड़ रहे थे और न ही मदनलाल. आखिर में जातेजाते मदनलाल कह गए, ‘‘इस बात को गांठ बांध कर सुन ले दीनदयाल, अगर इन की शादी नहीं करेगा तो ये भाग कर शादी कर लेंगे, क्योंकि दोनों बालिग हैं. तब तुम्हारी नाक नहीं कटेगी… इसलिए समझदारी इसी में है कि इन दोनों की आपस में शादी करवा दो, ताकि उम्रभर के लिए दोनों परिवार का रिश्ता बना रहे. इस के बावजूद तुम अपनी जिद पर अड़े हो तो अड़े रहो, नुकसान तुम्हारा होना है,’’ कह कर वे चले गए.
दीनदयाल माथा पकड़ कर बहुत देर तक इस पर सोचते रहे. रहरह कर मदनलाल की आखिरी बात उन के कानों में गूंजती रही. काफी देर बाद वे लक्ष्मी को आवाज देते हुए बोले, ‘‘लक्ष्मी, जरा बाहर आना.’’
‘‘क्या पापा?’’ लक्ष्मी के साथ उस की मां भी आईं. ‘‘राजेश के साथ तुम्हारी शादी मुझे मंजूर है…’’ दीनदयाल बोले, ‘‘मुझे धरमदास के पास ले जाना, ताकि उन से मैं शादी की बात कर सकूं.’’
‘‘सच पापा,’’ कहते हुए खुशी से लक्ष्मी का चेहरा खिल उठा.
Caste Discrimination. दलित मंदिर में गया. अगडे़ समाज को यह बात नागवार गुजरी. पंचायत हुई, बीचबचाव किया गया. लेकिन असली सवाल यह है कि मंदिर में जाने से समाज का भला होता है या नहीं?
तमाम कोशिशों के बावजूद राजस्थान राज्य में अभी भी पोंगापंथ और जाति के नाम पर फर्क बरकरार है. इस का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां आएदिन ऐसी घटनाएं हो रही हैं, जो इनसानियत को शर्मसार करती हैं.
कभी डायन के नाम पर औरतों की हत्या कर दी जाती है, तो कभी ऊंचीनीची जाति के नाम पर समूची बस्तियां राख कर दी जाती हैं. सरकार की ओर से किए जाने वाले सारे दावे हवाई साबित हो रहे हैं.
बूंदी जिले के नैनवां थाना इलाके के जजावर गांव में दलित दूल्हे के मंदिर पर चढ़ने के मामले को ले कर हुआ बवाल इस का सुबूत है.
एक दलित दूल्हे ने मंदिर में जा कर दर्शनपूजन क्या कर लिया, उस पर तो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. यह मामला सिर्फ मंदिर में दर्शनपूजन करने तक ही नहीं सिमटा है, बल्कि यह इस बात का सुबूत है कि अभी भी भारत में किस तरह से किसी खास जाति को एक दायरे में बांधने की कोशिश की जा रही है.
यह मामला इस बात की भी गवाही दे रहा है कि अभी भी जाति के नाम पर किस तरह से दलितों पर जोरजुल्म हो रहा है.
मामला कुछ यों है कि लक्ष्मीनारायण खटीक के बेटे सुरेश की शादी थी. शादी के दिन सुरेश गांव के बीच बने लक्ष्मीनाथ मंदिर जा पहुंचा. वह मंदिर में पूजा भी नहीं कर पाया था कि किसी ने उसे देख लिया.
इस के अगले ही दिन शुरू हो गया इस परिवार को सताने का खेल. दूसरे दिन पंचपटेलों की बैठक बुलाई गई. इस बैठक में इस बात पर एतराज जताया गया कि एक दलित गांव के मंदिर में कैसे घुस गया. इस से न केवल मंदिर का अपमान हुआ है, बल्कि पूरे गांव की परंपरा टूटी है.
पंचों ने दूल्हे के पिता को पंचायत में बुलाया. पहले तो उसे लताड़ा, उस पर जुर्माना भी लगाया गया. लक्ष्मीनारायण यह दुहाई देता रहा कि गांव का मंदिर है, फिर वह उस में क्यों नहीं जा सकता है?
पंचपटेल अपनी दादागीरी पर उतारू थे. उन्होंने इस मुद्दे को नाक का सवाल बना लिया. उन का गुस्सा इतना बढ़ गया कि बाजार बंद का ऐलान कर दिया गया.
अगले दिन कुंड के चौक में महापंचायत जुटी. इस महापंचायत ने दलित होने के बाद भी मंदिर की चौखट पर कदम रखना अपराध बताया. पहले तो जुर्माना लगाया गया, लेकिन जब लक्ष्मीनारायण ने जुर्माना चुकाने में मजबूरी जाहिर की, तो यह फरमान सुनाया गया कि वे महापंचायत में पूरे गांव के सामने सार्वजनिक रूप से माफी मांगें या गांव छोड़ दें.
इस धमकी से दलित बस्ती के लोग इतना डर गए कि वे गांव छोड़ने का मन बनाने लगे. कुछ लोगों ने दूल्हे और उस के पिता पर माफी मांगने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया. रिश्तेदारों ने भी सम?ाया कि गांव में रहना है, तो गलती मान लेनी चाहिए.
इस दौरान महापंचायत के फरमान की बात किसी तरह पुलिस तक पहुंची. लोगों की नजरें बचा कर दूल्हे के पिता लक्ष्मीनारायण ने नैनवां थाने में पनाह ली.
पूरा मामला सुनने के बाद पुलिस गांव में गई, लेकिन गांव में तनाव को देखते हुए वापस आ गई. इस के बाद उपखंड अधिकारी प्रकाश चंद भटनागर, पुलिस उपाधीक्षक प्रेमचंद कुर्डिया, तहसीलदार रमेश चंद्र, नैनवां व देई के थानाधिकारी पूरे लावलश्कर के साथ जजावर गांव पहुंचे.
गांव में भारी फोर्स के बीच एक बार फिर महापंचायत हुई. इस दौरान पुलिस व अफसरों के खिलाफ नारेबाजी करते हुए उन पर दबाव बनाने की कोशिश की गई, लेकिन अफसरों ने दिलेरी दिखाई. उन्होंने पंचपटेलों को कानून का डर दिखाया और साफ तौर पर कहा कि अगर पंचपटेलों ने अपना फरमान वापस न लिया, तो उन्हें जेल भेज दिया जाएगा.
अफसरों की मौजूदगी में एक बार फिर ग्राम पंचायत भवन में पंचायत हुई. इस में गांव के कुछ लोगों ने बीचबचाव किया और दोनों पक्ष सामने बैठे.
इस पंचायत में पुलिस व अफसर मौजूद रहे, फिर भी कुछ लोगों ने लक्ष्मीनारायण पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगने का दबाव बनाया.
इस बार भी पुलिस ने सख्ती दिखाई. अफसरों ने ऐलान किया कि दलितों को भी मंदिरों में जाने का हक है. पुलिस उपाधीक्षक ने ऐलान किया कि वे लोग भी गिरफ्तार होंगे, जिन्होंने नारेबाजी की है. अगर इस परिवार को किसी तरह का नुकसान होता है, तो भी सख्त कानूनी कार्यवाही की जाएगी.
पुलिस व प्रशासनिक अफसरों के सख्त रुख को देखते हुए पढ़ेलिखे कुछ लोग आगे आए और दोनों पक्षों में लिखित में सम?ौता कराया. इस के बाद पूरे गांव को सम?ौते का मजमून पढ़ कर सुनाया गया.
साथ ही, इस बात के लिए ताकीद की गई कि दोबारा इस तरह की हरकत हुई और किसी दलित परिवार को मंदिर में जाने से मना किया गया या उसे किसी तरह का नुकसान पहुंचाया गया, तो संबंधित शख्स के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाएगी.
समझौते के तहत लक्ष्मीनारायण ने अपनी रिपोर्ट वापस ले ली.
असल में दलितों को तो क्या किसी को भी मंदिरों में जाने की जरूरत नहीं. मंदिरों और दूसरे धर्मों की पूजने की जगहों ने भक्तों से लिया ही है, उन्हें कुछ दिया नहीं. लेते समय हर तरह की चालबाजी की गई, ऊंचनीच सिखाई गई, औरतों के साथ फर्क किया गया, हिंदुओं में जाति का बंटवारा किया गया और दान के नाम पर मोटा पैसा वसूला गया.
दलितों या पिछड़ों को ही नहीं, ऊंचों को भी अपना आज या कल सुधारना है, तो ?ागड़ों की जड़ों इन मंदिरों के पीछे भागना बंद करना चाहिए. असली सुख तो कारखानों, खेतों या दुकानों में काम कर के पैसा कमा कर मिलेगा. इन में ऊंचनीच की जगह है क्या?
Society. चिंथदा आनंद आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के कोठापालेम गांव का रहने वाला है, जिस ने अब से कोई 12 साल पहले ईसाई धर्म अपना लिया था. अब वह हिंदू नहीं रह गया था, लेकिन जाति उस ने नहीं बदली थी. वह खुद को मंडिगा (जिसे मदीगा भी कहा जाता है) समुदाय का ही मान कर चल रहा था, जिस की गिनती एससी यानी अनुसूचित जाति में होती है. दूसरे दलितों की तरह इस समुदाय के लोगों की बेइज्जती भी धर्म के चलते कम जाति की वजह से ज्यादा होती है
धर्म और जाति पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले उन हालात और इतिहास को देख लें जो यह साबित करते हैं कि दलित दलित ही रहेगा. वह किसी और धर्म में जा कर सवर्ण नहीं हो जाता.
मडिगा या मदीगा जाति के लोग परंपरागत रूप से चमड़े का काम करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे हिंदीभाषी राज्यों में जाटव, अहिरवार समुदाय के लोग करते हैं. उन्हीं की तरह यह समुदाय भी कई उपजातियों में बंटा हुआ है, लेकिन है पिछड़ा ही और सवर्णों के लिए अछूत और मुख्यधारा से कोसों दूर है, जिस के स्वाभिमान की कोई कीमत नहीं होती.
अविभाजित आंध्र प्रदेश में दलितों की कुल आबादी का आधा हिस्सा रहा मदीगा समुदाय हमेशा से ही अनदेखी का शिकार रहा है. इस समुदाय के एकलौते नामचीन इनसान बंगारू लक्ष्मण हैं, जिन्हें भारतीय जनता पार्टी ने साल 2000 में राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया था. लेकिन बनिएब्राह्मणों की इस पार्टी में कोई बंगारू लक्ष्मण के पैर नहीं छूता था, क्योंकि वे दलित थे. नहीं तो भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष के पैर छूना एक संस्कार के तौर पर मौजूद है.
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बंगारू लक्ष्मण 7 महीने ही यह पद संभाल पाए थे, क्योंकि तहलका डौट कौम के साल 2001 के सनसनी मचा देने वाले स्टिंग आपरेशन में वे एक लाख रुपए की घूस लेते पकड़े गए थे. अपना नाम आने से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था तब पूरी पार्टी ने उन से पल्ला ?ाड़ लिया था. बाद में बंगारू लक्ष्मण को दोषी पाते हुए सीबीआई कोर्ट ने उन्हें एक लाख रुपए के जुर्माने सहित 4 साल की सजा दी थी.
एक शोषित और बदहाल समुदाय
मदीगा समुदाय की सामाजिक बदहाली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आएदिन इन की मारकुटाई ऊंची जाति वाले करते रहते हैं जिसे मीडिया ‘?ाड़प’ करार देता है. असल में अब मदीगा लोग छुटपुट ही सही अपने ऊपर होने वाले अत्याचार का विरोध करने लगे हैं, जो दबंगों से बरदाश्त नहीं होता.
आंध्र प्रदेश के ही रेड्डी समुदाय से मदीगा समुदाय की यह ‘?ाड़प’ हर कभी होती रहती है जिस की बड़े पैमाने पर शुरुआत साल 1991 में गुंटूर जिले के त्सुंदूर गांव में देखने में आई थी, जब रेड्डी समाज के कुछ लोगों ने इस समुदाय के 8 लोगों की हत्या कर दी थी. वजह थी एक मदीगा युवक का सिनेमाघर में कथित रूप से एक रेड्डी महिला को छू लेना. यह हत्याकांड बेहद सुनियोजित था जिस में पुलिस ने खुलेतौर पर रेड्डी समाज का साथ दिया था.
एक ऊंची जाति वाली औरत को नीची जाति वाले ने धोखे से छू क्या दिया पूरा रेड्डी समुदाय इस गुस्ताखी पर तिलमिला उठा था और मदीगाओं को सबक सिखाने पर उतारू हो गया था. 6 अगस्त, 1991 की अल सुबह कुछ पुलिस वाले त्सुंदूर गांव पहुंचे और मदीगाओं से फिल्मो स्टाइल में कहा कि ‘भागो, तुम लोगों पर हमला होने वाला है’.
इस से घबराए मदीगा और दूसरे दलित समुदाय माला के लोग खेतों की तरफ भागे तो वहां पहले से ही लगभग 300 हथियारबंद रेड्डी घात लगाए उन का इंतजार कर रहे थे. उन्होंने हड़बड़ाए उनींदे मदीगाओं पर धारदार हथियारों से जानलेवा हमला कर दिया, जिस में 8 मदीगा मारे गए. हालांकि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मरने वालों की तादाद ज्यादा थी, क्योंकि कुछ लाशों को बोरो में भर कर नहर में बहा दिया गया था. बचे हुए लोग मारे डर के भाग गए थे जिन्हें एक चर्च ने शरण दी थी.
तब से मदीगाओं का ?ाकाव ईसाईयत की तरफ और बढ़ा और वे ईसाई धर्म अपनाने लगे, क्योंकि इस में हिफाजत थी और हिंदू धर्म सरीखी घुटन नहीं थी ल. ऐसा भी नहीं है कि वे थोक में ईसाई बने हों बल्कि अभी तक 2 फीसदी के लगभग ही मदीगा ईसाई बने हैं जो बहुत बड़ी तादाद नहीं है. इस के बाद भी ऊंची जाति वाले इन पर और ज्यादा खार खाए रहने लगे थे.
मुकदमा चला और साल 2007 में स्पैशल कोर्ट ने 21 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई, 35 को एक एक साल की सजा दी. लेकिन हाईकोर्ट ने साल 2014 में सुबूतों और गवाहों की कमी का हवाला देते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा. इस पर कई दलित संगठनों और एक्टिविस्टों से ने इसे इंसाफ की हत्या बताया था.
खुद को ‘रामायण’ के एक पात्र जामवंत का वशंज मानने वाले मदीगा समुदाय के लोग अछूत के साथसाथ अशुद्ध और अपवित्र भी माने जाते हैं. कुछ किस्सेकहानियों में इन्हें चांडाल भी कहा गया है, क्योंकि इन्हें गौमांस खाने वाला भी माना जाता है.
इन्हें मंदिरों में नहीं घुसने दिया जाता, पानी नहीं भरने दिया जाता, पूरी मजदूरी नहीं दी जाती, इन के रास्ते रोके जाते हैं और तमाम वे जातिगत जुल्मोसितम ढाए जाते हैं जो उत्तर भारत में दिखते हैं यानी ऊंची और नीची जातियों के नाम भर बदलते हैं अत्याचार करने की सोच और तौरतरीके उत्तरदक्षिण में एकसमान हैं.
रेड्डी लोगों से आज से 35 साल पहले पनपा बैर इस से पहले भी कभी किसी सुबूत का मुहताज नहीं रहा था. दरअसल, रेड्डी समुदाय की गिनती एक दबंग समुदाय के तौर पर होती है जो मदीगाओ से अपने खेतों में दबंगई के दम पर मेहनतमजदूरी करवाता रहा है. जो दबदबा और हैसियत बिहार में भूमिहारों की है वही आंध्र प्रदेश में रेड्डियों की है.
इस लिहाज से पादरी बन गए चिंथदा
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आनंद पर रेड्डियों का हमला कोई नई बात नहीं थी जिसे ईसाई समुदाय ने पादरी बनाते हुए धार्मिक काम करने की जिम्मेदारी सौंप दी थी. यह नया काम पा कर चिंथदा आनंद खुश और रोमांचित था, क्योंकि उस की इज्जत होने लगी थी. वह ईसाई धर्म की बड़ीबड़ी ज्ञानभरी बातें लोगों को बताने लगा था.
हिंदू रहते हुए मंदिर में पैर रखने की सोचने से भी कांप जाने वाले चिंथदा आनंद में विकट का आत्मविश्वास आ गया था. वह बेखौफ हो कर चर्च जाता था उसे अपने कुछ होने का एहसास होने लगा था. अब वह जामवंत के बजाय जीसस यानी ईसा मसीह के गुण गाने लगा था.
तकरीबन 10 साल तक पादरीगीरी करने वाले इस शख्स को यह बताने वाला कोई नहीं था कि इस में इतराने जैसी कोई बात नहीं और वह एक नरक से निकल कर दूसरे नरक में दाखिल हो गया है. स्वर्ग न हिंदू धर्म में था, न ईसाई धर्म में है. आदमियों खासतौर से दलितों का शोषण करने और इस्तेमाल करने के दोनों के तौरतरीके ही अलग हैं. एक दबा कर काम निकालता है तो दूसरा बहलाफुसला कर. हैं तो दोनों ही धर्म की दुकानें जिन के एजेंट पंडेपुजारी और पादरी हुआ करते हैं.
हमला और फैसला
यह 25 जनवरी, 2021 की बात है, जब चिंथदा ने गुंटूर जिले के चंदोले पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट लिखाई कि उस पर कुछ लोगों ने जानलेवा हमला किया और जातिगत गालियां दीं. पुलिस ने एससी एसटी एक्ट की धाराओं 3 ( 1 ) (एस ), 3 ( 1 ) ( आर ), 3 ( 2 ) ( वीए ) और आईपीसी की धाराओं 341, 323 और 34 के तहत मामला दर्ज कर लिया. इस मामले में रेड्डी समुदाय के अक्काला रामी रेड्डी समेत 5 दूसरे लोगों को आरोपी बनाया गया.
गुंटूर की विशेष अदालत में कार्यवाही चल ही रही थी कि अक्काला रामी रेड्डी और उस के साथियों ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में सीआरपीसी की धारा 482 के तहत याचिका दायर कर दी, जिस में कहा गया था कि चिंथदा आनंद पिछले 10 सालों से ज्यादा से ईसाई धर्म का पालन कर रहे हैं, इसलिए वे एससी समुदाय के नहीं रह गए हैं, क्योंकि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश 1950 क्लौज 3 के मुताबिक केवल हिंदू, सिख और बौद्ध ही इस के हकदार हैं.
आरोपियों ने यह दलील भी दी कि इस नाते उन के खिलाफ एससीएसटी एक्ट 1989 के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती. चिंथदा आनंद के पास मदीगा जाति के होने का जो प्रमाणपत्र है, ईसाई बनने के बाद उस के कोई माने नहीं हैं क्योंकि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं है. इस के अलावा याचिका में यह भी कहा गया था कि वे ईसाई धर्म का प्रचार करते हैं और लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए उकसाते और बढ़ावा भी देते हैं. इस से सामाजिक तानाबाना बिगड़ रहा है.
हाईकोर्ट ने अक्काला व अन्य की दलीलों से इत्तिफाक रखते हुए 30 अप्रैल, 2025 को फैसला सुनाया और एफआईआर व पूरी कार्रवाई रद्द कर दी, जिस से आरोपी बरी हो गए. आईपीसी की धाराओ के बाबत कोई ठोस गवाह कोर्ट को नहीं मिले जो दावे से कह सकें कि वाकई में हमला हुआ था.
इस पर चिंथदा आनंद सुप्रीम कोर्ट गया जहां जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बैंच ने 24 मार्च, 2026 को हाईकोर्ट के फैसले को बरक़रार रखते कहा कि चिंथदा आनंद शैड्यूल कास्ट का दर्जा नहीं रख सकते, क्योंकि वे पिछले एक दशक से खुल कर ईसाई धर्म का पालन कर रहे हैं और पादरी के रूप में सक्त्रिय हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जो व्यक्ति एससी की सूची में नहीं है उसे एससीएसटी एक्ट यानी अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 का संरक्षण नहीं मिल सकता. यह कानून हिंदू, सिख बौद्ध धर्म के अनुसूचित जाति के लोगों पर लागू होता है, उन लोगों पर नहीं जो ईसाई या इसलाम धर्म में शामिल हो गए हैं. इन धर्मो में जाति व्यवस्था नहीं है यानी जाति जन्म से नहीं होती. जाहिर है तो फिर धर्म से होती है, यह अदालतों ने माना.
न तो हाईकोर्ट ने और न ही सुप्रीम कोर्ट ने चिंथदा की इस दलील से इत्तिफाक रखा कि वह जन्म से दलित है इसलिए आज भी समाज उसे उसी जाति के रूप में देखता और व्यवहार करता है. कानून का मकसद जातिगत अत्याचार रोकना है, इसलिए एससीएसटी एक्ट लागू होना चाहिए. 1950 का संवैधानिक आदेश जो एससी को धर्म से जोड़ता है, वह वास्तविक सामाजिक हालात को नहीं देखता.
धर्म और जाति हैं जंजाल
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से बहस मूल रूप से इस सनातन विषय पर आ कर टिक गई है कि जाति अहम है या धर्म अहम है? इस पर विभिन्न बुद्धिजीवी और संगठनों की अपनी अलग राय है, लेकिन खुल कर यह कोई नहीं कह पा रहा कि सवर्णों के लिए धर्म अहम है और गैरसवर्णों के लिए जाति अहम है. दलित, पिछड़े और आदिवासी जातिगत प्रताड़ना से त्रस्त और ग्रस्त रहते हैं.
दरअसल, इन्हें धर्म से कोई खास लेनादेना नहीं है, इसलिए धर्म बदलने में इन्हें कोई हिचक नहीं होती न ही ये इसे वर पाप सम?ाते हैं. उलट इस के सवर्ण धर्म की चादर से चिपके रहते हैं.
मुगल काल में जम कर तो नहीं लेकिन जितना भी धर्मांतरण हुआ वह दलितों ने ही किया था. अपवादों को छोड़ दें तो सवर्ण न तो कभी मुसलमान बनता है और न ही ईसाई बनता है. ब्रिटिश हुकूमत के दौर में भी ज्यादातर दलित आदिवासी ही ईसाई बने.
आज भी यह सिलसिला जारी है, लेकिन बेहद कम है. उतना तो बिलकुल भी नहीं है जितना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे कट्टरवादी हिंदू संगठन गागा कर बताते और डराते रहते हैं कि वक्त रहते संभल जाओ नहीं तो जल्द ही देश इसलामिक हो जाएगा, फिर तुम्हारे मंदिर, संस्कृति, धर्म, जमीनजायदाद और औरतों की इज्जतआबरू वगैरह सब लुट जाएंगे.
किसी भी एजेंसी ने अभी तक भारत में धर्मंतारण के आंकड़े पेश नहीं किए हैं. हालांकि हिंदूवादी संगठन कहते जरूर रहते हैं कि हर साल 8 लाख हिंदू ईसाई और मुसलमान बन जाते हैं, लेकिन हकीकत में ऐसे 8,000 भी नहीं निकलेंगे. ये 8,000 भी दलित या आदिवासी ही क्यों होते हैं, इस पर कोई अदालत कभी गंभीरता से विचार करे तो वह किसी चिंथदा आनंद की दलील से असहमत नहीं हो सकती.
हिंदुत्व की दुकान के सेलेबल आइटम
दरअसल दौर खुलेतौर पर हिंदुत्व और हिंदूवादियों का है जिसका असर अदालतों पर भी पड़ता दिख रहा है. चिंथदा आनंद मामले के फैसले से जाहिर तो यही हुआ है कि अब कम तादाद में दलित या आदिवासी मुसलमान या ईसाई बनेंगे, क्योंकि वे आरक्षण और अपने जानमाल की सुरक्षा की सहूलियतें खोना नहीं चाहेंगे, फिर भले ही इस के लिए उन्हें अपना स्वाभिमान गिरवी रखना पड़े. यह उन के लिए घाटे का सौदा नहीं है. यह और बात है कि हिंदू धर्म में बने रहना भी उन के लिए कभी फायदे का सौदा नहीं रहा जिस में वे लतियाए ही जाते रहे हैं.
इस फैसले से बिलाशक हिंदूवादी संगठन और भाजपाई खुश होंगे क्योंकि केंद्र में 12 साल से अपनी सरकार होने के बाद भी वे धर्मांतरण को अपराध घोषित नहीं कर पा रहे हैं. इस की वजह संविधान का अनुच्छेद 25 है जो हर नागरिक को अपने धर्म को अपनाने, मानने, प्रचार करने और अभ्यास करने का हक देता है यानी स्वेच्छा से किसी भी धर्म को अपनाने का अधिकार संविधान देता है. केवल जबरन धोखे या लालच के चलते धर्मांतरण करवाना ही कानूनन अपराध है. अब इस में विवाह भी शामिल हो गया है जिसे बोलचाल की भाषा में हिंदूवादी लव जिहाद कहते हैं.
धर्म चूंकि केंद्र और राज्य दोनों का विषय है, इसलिए भाजपा शासित तमाम राज्यों ने धर्मांतरण को ले कर सख्त कानून बनाए हैं, लेकिन स्वेच्छा से धर्म बदलने वालो पर उस का जोर नहीं चलता. धर्मांतरण, लव जिहाद और घर वापसी के नाम पर हल्ला हिंदूवादियों के प्रिय विषय है, लेकिन विपक्ष और अंतर्राष्ट्रीय दबाब के चलते भगवा गैंग की हिम्मत अनुच्छेद 25 से छेड़छाड़ की नहीं हो रही.
हालांकि सच यह भी है कि यह गैंग खुद भी दिल से और न ही दिमाग से चाहता कि धर्मांतरण पूरी तरह रुके, क्योंकि इस से उस की न केवल आर्थिक बल्कि धार्मिक और राजनितिक दुकानदारी भी खत्म हो जाएगी. अपने कोर वोट बेंक सवर्णों को डरा कर अपने पाले में बनाए रखने के लिए उस के पास कुछ खास नहीं बचेगा, इसलिए इस डर को वह जिंदा ही रखना चाहती है.
बात जहां तक धर्म बदलने से जाति बदलने न बदलने की है तो यह विवाद आजादी के बाद से ही चला आ रहा है, लेकिन यह दिलचस्प भी इस लिहाज से है कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश 1950 खंड 3 में कहा यह गया था कि कोई भी व्यक्ति जो हिंदू धर्म के अलावा किसी दूसरे धर्म को मानता है वह अनुसूचित जाति का नहीं रह जाएगा.
जाहिर है कि 10 अगस्त, 1950 के इस मूल आदेश में किसी और धर्म का उल्लेख नहीं था. बाद में इस मे संशोधनों के जरीए 1956 में सिख और 1990 में बौद्ध धर्म को जोड़ा गया. वह केवल इसलिए नहीं कि इन धर्मों में जाति व्यवस्था है बल्कि इसलिए भी कि ये दोनों ही धर्म हिंदू धर्म से टूट कर बने हैं.
अक्तूबर, 1956 में जब डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने लाखों दलितों सहित बौद्ध धर्म अपनाया था तब उन्होंने धर्म से ज्यादा जाति पर जोर दिया था. उन की लिखी लोकप्रिय और चर्चित किताब जाति का विनाश में इस का इफरात से जिक्र भी है.
धर्म बदलने से जाति बदलती है या नहीं इस पर दर्जनों मामले अदालतों में चल रहे हैं, कई कमेटियां भी बनी हैं, जिन में से उल्लेखनीय जस्टिस रंगनाथ मिश्रा कमेटी है, जिस का गठन डाक्टर मनमोहन सिंह की अगुआई वाली संप्रग सरकार ने साल 2004 में किया था, जिस ने अपनी रिपोर्ट 21 मई, 2007 को सरकार को सौंपी थी.
इस कमेटी का मकसद भारत में धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों की स्थिति का आकलन करना था. इस की एक प्रमुख सिफारिश यह थी कि आरक्षण को धर्म से न जोड़ा जाए और 1950 के संवैधानिक आदेश में बदलाव हो. बदलाव यह कि दलित चाहे हिंदू हो सिख हो ईसाई हो या फिर मुसलिम हो, उसे एससी का दर्जा देते हुए आरक्षण व दूसरे लाभ मिलने चाहिए.
रंगनाथ मिश्रा कमेटी ने यह दलील भी दी थी कि धर्म बदलने से जातिगत भेदभाव खत्म नहीं हो जाते. ईसाई और मुसलिम समाज में भी दलित सरीखी हैसियत बनी रहती है. और भी कई सु?ाव इस कमेटी ने दिए थे, लेकिन जब संसद में इस पर बहस हुई तो मामला ठंडे बस्ते में चला गया. संसद में सत्तारूढ़ कांग्रेस इस से सहमत होते हुए भी इसे लागू करने के मसले पर हिचकिचाती दिखाई दी थी.
कुछ क्षेत्रीय दलों राजद और द्रमुक समेत वामदलों ने इसे समर्थन दिया था, लेकिन भाजपा ने जम कर विरोध किया था. तब उस का तर्क वही था जो चिंथदा आनंद के मामले में मुलजिमों का, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का था कि एससी आरक्षण का आधार हिंदू समाज की जाति व्यवस्था है, जो धर्म बदलने पर खत्म हो जाता है.
यह ठीक है कि चिंथदा आनंद के मामले में आया फैसला कोई कानून या अंतिम सत्य नहीं है, लेकिन उस से भी बड़ा सच दलितों की गैरत है जो किसी भी धर्म और जाति से ऊपर है. न केवल उस का बल्कि देश के हरेक नागरिक का स्वाभिमान अदालतों को प्राथमिकता में ऐसे मामलों में रखना चाहिए, जिस से अक्काला रामी रेड्डी जैसों की मंशा पर पानी फिरे. Society
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सवाल –
मेरी उम्र 16 साल है और मैं भरतपुर के एक गांव की रहने वाली हूं. हमारे गांव में एक ही स्कूल है और हमारे आसपड़ोस के सभी बच्चे उसी स्कूल में पढ़ते हैं. मैं जब भी स्कूल जाती हूं तो वहां सभी बच्चे मुझे एससी/एसटी कह कर चिढ़ाते हैं. मैं और मेरा परिवार दलित हैं तो हमें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. आसपड़ोस वाले भी हम से ज्यादा मतलब नहीं रखते, लेकिन मुझे ज्यादा दिक्कत अपने स्कूल में होती है. हर समय बच्चों का मुझे चिढ़ाना मेरे दिमाग में घूमता रहता है जिस की वजह से मैं पढ़ाई पर ध्यान भी नहीं दे पाती. मैं ने कई बार उन बच्चों की शिकायत अपनी क्लास टीचर से भी की, लेकिन उन्होंने इस बात कोई ऐक्शन नहीं लिया. आप ही बताइए कि मुझे क्या करना चाहिए?
जवाब –
मुझे यह सुन कर काफी हैरानी हुई कि आज भी लोग जातपांत को ले कर अपनी सोच बनाए बैठे हैं. एससी/एसटी या फिर दलित होना कोई शर्मिंदगी की बात बिलकुल नहीं है. जब तक आप खुद अपनेआप को कमजोर दिखाती रहेंगी, तब तक सभी आप को परेशान करते रहेंगे और साथ ही चिढ़ाते भी रहेंगे.
आप अगर उन की बात को ले कर परेशान होती रहोगी तो ऐसे लोग आप को और भी ज्यादा परेशान करेंगे. आप को सिर्फ और सिर्फ अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए और साथ ही अगर आप उन लोगों को जवाब देना चाहती हैं तो अपने काम से दीजिए. पढ़लिख कर जब आप कुछ अच्छा कर रही होंगी, तब सब के मुंह अपनेआप बंद हो जाएंगे.
एक और बात, अगर आप को कोई एससी/एसटी कह कर चिढ़ाता भी है तो गर्व महसूस कीजिए. अगर आप अपनी जात को खुद ही नीचा दिखाएंगी तो लोगों का तो काम ही है कुछ न कुछ कहना. अगर आप शर्मिंदा होना बंद कर देंगी, तो वे सब आप को चिढ़ाना भी छोड़ देंगे.
व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर पर 8588843415 भेजें. Caste Problem
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सवाल –
मेरी उम्र 17 साल है और मैं 11वीं कक्षा का छात्र हूं. मेरे स्कूल में कई दलित छात्र हैं और उन में से 4-5 तो मेरी ही क्लास में हैं. जब भी खाने का या खेलने का वक्त होता तब उन में से एक बच्चा हमारे ग्रुप के साथ आ कर बैठ जाता है. हम सब उसे इग्नोर करने की कोशिश करते हैं, लेकिन फिर भी वह हमारे साथ आ कर खाना खाने लगता है. हमें काफी अजीब लगता है कि एक दलित लड़का हमारे साथ कैसे खाना खा सकता है. हम में से कोई उसे कुछ कह नहीं पाता लेकिन उसे खुद सोचना चाहिए कि उसे अपने जैसे बच्चों के साथ रहना चाहिए. आप ही बताइए हम ऐसा क्या करें कि वह हमारे पास न आए?
जवाब –
मझे समझ नहीं आ रहा कि आज के समय में भी आप ऐसी सोच रखते हैं और मुझे पूरी उम्मीद है कि आप के अंदर यह सोच या तो अपने घर वालों से या आसपड़ोस से आई होगी. हमारे देश में जातपांत जैसी समस्याएं बहुत समय पहले हुआ करती थीं, लेकिन आज भी कुछ लोग इसे मान रहे हैं, यह हैरानी की बात है.
आप खुद सोचिए कि अगर वह लड़का आप से दोस्ती करना चाहता है या आप के ग्रुप के साथ बैठना चाहता है तो इस से आप सब को क्या दिक्कत है. माना वह लड़का दलित है लेकिन अछूत तो नहीं है न. ऐसा आप से किस ने कहा कि दलित लोग सिर्फ दलित के साथ ही बैठेंगे. हो सकता है वह लड़का अच्छे दिल का हो और आप का अच्छा दोस्त बन जाए.
ऊंची जात और नीची जात जैसी धारणाएं अपने दिल और दिमाग से निकाल दीजिए. अगर आप का स्कूल ऐसी सोच रखता तो स्कूल ही उस बच्चे को एडमिशन न देता और अगर देता भी तो ऐसे बच्चों की अलग क्लास बनाता. स्कूल प्रशासन ने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वह सब को एक समान देखता है तो आप क्यों नहीं.
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एससी तबके को सताने की खबरें आएदिन अखबारों में छपती रहती हैं. कहीं दूल्हे को घोड़ी पर नहीं चढ़ने दिया जाता है, तो कहीं किसी एससी को बेरहमी से पीटा जाता है. यह आम एससी समाज के हालात हैं.
कहते हैं कि आम और खास में फर्क होता है, लेकिन दुख तो इस बात का है कि इस तबके को सताने के मामले में आम और खास में कोई फर्क नहीं दिखता. एससी अगर आईपीएस अफसर भी बन जाए, तो वहां भी उस का शोषण होता है. एससी अगर राष्ट्रपति भी हो तो भी दबाया जाता है. सेना, पुलिस, यूनिवर्सिटी या देश का कोई भी इंस्टिट्यूटशन हो, हर जगह एससी तबके के साथ भेदभाव और शोषण होता ही है. बस, सताने के तरीके बदल जाते हैं.
7 अक्तूबर, 2025 को हरियाणा के सीनियर आईपीएस अफसर वाई. पूरन कुमार ने चंडीगढ़ के सैक्टर 11 के अपने सरकारी आवास के बेसमैंट में अपनी सर्विस रिवौल्वर से खुद को गोली मार कर खुदकुशी कर ली थी.
वाई. पूरन कुमार 2001 बैच के एडीजीपी रैंक के अफसर थे. 8 पन्नों के सुसाइड नोट में उन्होंने 8 आईपीएस और 2 आईएएस अफसरों के नाम लिए थे. इस नोट के मुताबिक इन तमाम बड़े अफसरों ने उन्हें लगातार सताया था.
सुसाइड नोट में वाई. पूरन कुमार ने कैरियर में भेदभाव और अपने सीनियरों के द्वारा जातिवादी बरताव का जिक्र किया था. उन की पत्नी आईएएस अमनीत पी. कुमार ने भी अपनी शिकायत में कहा था कि उन के पति की खुदकुशी ‘सिस्टमैटिक उत्पीड़न’ का नतीजा है.
वाई. पूरन कुमार की खुदकुशी से 24 घंटे पहले उन के गनमैन हैड कांस्टेबल सुशील कुमार को रोहतक में शराब कारोबारी से ढाई लाख रुपए रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. पूछताछ में गनमैन ने
वाई. पूरन कुमार का नाम लिया था.
गनमैन सुशील कुमार के इसी बयान के आधार पर एफआईआर दर्ज हुई.
वाई. पूरन कुमार की पत्नी अमनीत पी. कुमार ने इस एफआईआर को एक साजिश बताया और उन्होंने कहा, ‘पूरन कुमार पहले से ही सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाते रहे थे. उन्होंने कोर्ट में कई याचिकाएं और शिकायतें लगाई हुई थीं, जिस से वे बड़े अफसरों के लिए मुसीबत बने हुए थे, इसलिए उन्हें रिश्वतखोरी की झूठी साजिश में फंसाया गया.’
वाई. पूरन कुमार ने अपने सुसाइड नोट में आला अफसरों पर जो गंभीर आरोप लगाए हैं, वे बेहद चिंताजनक हैं. एससी समाज के अफसरों को प्रशासनिक तौर पर किस तरह का उत्पीड़न झेलना पड़ता है, वाई. पूरन कुमार इस बात का उदाहरण हैं.
वाई. पूरन कुमार की खुदकुशी के कुछ ही दिनों के अंदर रोहतक में हरियाणा पुलिस के एएसआई संदीप कुमार लाठर ने सर्विस रिवौल्वर से खुद को गोली मार कर खुदकुशी कर ली. संदीप कुमार ने 6 मिनट का वीडियो और 4 पन्नों का सुसाइड नोट छोड़ा. इन में उन्होंने वाई. पूरन कुमार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए. इस घटना से एडीजीपी वाई. पूरन कुमार की खुदकुशी का मामला और पेचीदा हो गया है.
एससी समाज से निकले आईपीएस वाई. पूरन कुमार भ्रष्टाचार में शामिल थे या नहीं यह तो जांच के बाद ही पता चल पाएगा, पर अगर वे भ्रष्ट अफसर थे तो भी उन के साथ हुए जातीय भेदभाव से इनकार नहीं किया जा सकता.
अगर वाई. पूरन कुमार जैसे बड़े सरकारी अफसर ही जातिवाद की सोच का शिकार हो सकते हैं, तो निचले लैवल पर एससी मुलाजिमों के हालात का अंदाजा लगाना भी मुश्किल है. एससी तबके को कार्पोरेट सैक्टर में भी कोई राहत नहीं है. वहां भी हर लैवल पर भेदभाव होता है.
विवेक राज जो बैंगलुरु में एक कार्पोरेट अफसर थे. वे लाइफस्टाइल इंटरनैशनल प्राइवेट लिमिटेड में पोस्टेड थे. विवेक राज को उन के अपर कास्ट सीनियरों द्वारा इतना उत्पीड़न झेलना पड़ा कि उन्होंने साल 2023 में खुदकुशी कर ली थी. पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज की गई थी, लेकिन कोई गिरफ्तारी नहीं हुई.
पिछले 10 सालों में आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों में 20 से ज्यादा एससी छात्रों ने जातिवाद के चलते खुदखुशी की. वैसे भी एससी छात्रों के साथ जाति आधारित भेदभाव तो प्राथमिक कक्षाओं से शुरू हो जाता है. यही वजह है कि देश की बड़ी यूनिवर्सिटियों तक एससी तबके के छात्रों का पहुंचना भी मुश्किल होता है.
एससी तबके के छात्रों का प्राइमरी लैवल से ऊंची पढ़ाई तक पहुंचने का फीसदी काफी कम है. ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 2023-24 में एससी छात्रों का ग्रौस इनरोलमैंट रेशियो प्राइमरी लैवल (कक्षा 1-5) पर 96.8 फीसदी, सैकंडरी लैवल (कक्षा 9-10) पर 80.6 फीसदी और हायर सैकंडरी लैवल (कक्षा
11-12) पर 57.9 फीसदी है. इस के बाद ऊंची पढ़ाईलिखाई (18-23 साल) में एससी छात्रों का ग्रौस इनरोलमैंट रेशियो महज 25.9 फीसदी है.
इस का मतलब है कि प्राइमरी लैवल से शुरू करने वाले एससी छात्रों में से तकरीबन 26 फीसदी ही देश की बड़ी यूनिवर्सिटियों या उच्च शिक्षा संस्थानों तक पहुंच पाते हैं, जबकि बाकी स्टूडैंट्स इस से आगे नहीं बढ़ पाते.
देश के टौप संस्थानों जैसे आईआईटी या आईआईएम में पहुंचने वाले स्टूडैंट्स का फीसदी तो 0.1 फीसदी से भी कम है, क्योंकि इन टौप की यूनिवर्सिटियों में सीटें सीमित होती हैं और रिजर्वेशन के बावजूद कंपीटिशन ज्यादा होता है.
इतनी जद्दोजेहद के बाद कुछ छात्र इन यूनिवर्सिटियों तक पहुंच भी गए तो उन्हें हर कदम पर जातिवाद झेलना पड़ता है या उन की संस्थागत हत्याएं कर दी जाती हैं. साल 2016 में रोहित वेमुला और साल 2023 में दर्शन सोलंकी इस बात के उदाहरण हैं.
घोड़ी चढ़ने का हक नहीं
गुजरात के सांदीपाडा गांव में आकाश कोटडिया नाम के एससी नौजवान की शादी थी. गांव के ही कुछ ऊंची जाति के लोगों ने आकाश को शादी के दौरान घोड़ी पर चढ़ने से मना कर दिया. मामला इतना बढ़ा कि पुलिस को अतिरिक्त बल बुलाना पड़ा.
हालांकि, यह मामला फरवरी, 2020 का है, लेकिन इस मामले में खास बात यह है कि आकाश आर्मी का जवान था और जम्मूकश्मीर में तैनात था. वह कुछ दिन पहले छुट्टी ले कर शादी के लिए गांव आया था.
16 दिसंबर, 2024 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक दलित पुलिस कांस्टेबल के बेटे नंदराम सिंह की बरात के दौरान ऊपरी जाति के तकरीबन 40 लोगों ने हमला किया. उन्होंने दूल्हे को घोड़ी से जबरन उतार दिया. जातिवादी गालियां दीं. डीजे सिस्टम तोड़ा. औरतों से छेड़छाड़ की और बरातियों पर पथराव किया. इस मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और 5 लोगों को गिरफ्तार किया.
फरवरी, 2022 को मध्य प्रदेश के छतरपुर में 24 साल के दलित पुलिस कांस्टेबल दयाचंद अहिरवार की बरात में ऊपरी जातियों ने जम कर हंगामा किया और दूल्हे को घोड़ी से उतार दिया. अगले दिन प्रशासन ने भारी पुलिस सुरक्षा में उन्हें घोड़ी पर चढ़ाया.
इन तीनों मामलों में दूल्हे आर्मी या पुलिस में थे, इसलिए इन तीनों मामलों में पुलिस ने सक्रिय भूमिका निभाई और मामला सुर्खियों में आया. आम एससी तबके के ऐसे अनेक मामले तो खबरों में ही नहीं आ पाते या इन मामलों में कोई मुकदमा ही दर्ज नहीं होता.
इन वारदात को रोकने के लिए कई जिलों में ‘समानता समितियां’ बनाई गई हैं और एससी दूल्हों को पुलिस सुरक्षा दी जाती है फिर भी हर साल दर्जनों ऐसे मामले दर्ज किए जाते हैं.
संविधान के अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता को गैरकानूनी घोषित किया गया है, लेकिन एनसीआरबी डाटा के मुताबिक हर 20 मिनट में एससी तबके के खिलाफ ऐसे अपराध दर्ज होते हैं.
राष्ट्रपति होते हुए जातीय भेदभाव
रामनाथ कोविंद, जो 2017 से साल 2022 तक भारत के 14वें राष्ट्रपति रहे, केआर नारायणन के बाद वे भारत के दूसरे ऐसे राष्ट्रपति थे जो एससी तबके से आते थे. वे भाजपा द्वारा समर्थित राष्ट्रपति थे. यही वजह थी कि रामनाथ कोविंद की नियुक्ति को भाजपा ने ‘दलित उत्थान’ के प्रतीक के रूप में पेश किया था.
साल 2018 में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जगन्नाथ पुरी मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करना चाहते थे, लेकिन मंदिर के पुजारियों ने उन्हें रोक दिया था. मंदिर के परंपरागत नियमों के अनुसार गैरहिंदू या निचली जाति के लोगों को गर्भगृह में जाने की इजाजत नहीं है.
इसी तरह वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, जो संथाल जनजाति से आती हैं, भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति हैं, जो 2022 में राष्ट्रपति चुनी गईं.
जून, 2023 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दिल्ली के श्री जगन्नाथ मंदिर में पूजा की. एक तसवीर वायरल हुई, जिस में वे मंदिर के गर्भगृह के बाहर पूजा करती दिखीं, जबकि केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव और धर्मेंद्र प्रधान गर्भगृह के अंदर पूजा करते दिखे. आदिवासी होने के कारण उन्हें गर्भगृह में प्रवेश नहीं दिया गया.
हालांकि, विवाद बढ़ने पर मंदिर के पुजारियों ने साफ किया कि राष्ट्रपति के साथ कोई भेदभाव नहीं हुआ, बल्कि उन्होंने ऐसा करते हुए सामान्य प्रोटोकौल का पालन किया.
सितंबर, 2023 में नए संसद भवन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया. इस दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को न्योता ही नहीं दिया गया, जबकि देश का राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों का सर्वोच्च प्रतिनिधि होता है. इस हिसाब से नए बने संसद का उद्घाटन राष्ट्रपति को ही करना चाहिए.
तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ हुए इस भेदभाव को ‘सनातन धर्म आधारित जातीय भेदभाव’ कहा और दावा किया कि आदिवासी महिला होने के चलते उन्हें इस समारोह से दूर रखा गया.
इस राष्ट्रपति के साथ जातीय भेदभाव
केआर नारायणन भारत के 10वें राष्ट्रपति (1997से 2002) थे, जो एससी बैकग्राउंड से आए थे. वे केरल के उ झावूर गांव में एक अछूत परिवार में जनमे थे. उन की पूरी जिंदगी भारत की जाति व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष की मिसाल है. उन्होंने प्राइमरी ऐजूकेशन से ले कर हायर ऐजूकेशन और फिर लैक्चरर की नौकरी तक में सताया जाना और भेदभाव झेला और राष्ट्रपति बनने के बाद भी वे जातीय तानों का शिकार बने रहे.
साल 1943 में ट्रावणकोर यूनिवर्सिटी (अब केरल यूनिवर्सिटी) से एमए करने के बाद केआर नारायणन को उन की जाति के चलते लैक्चरर की नौकरी से निकाल दिया गया था. डिगरी समारोह में भी उन्हें बेइज्जत किया गया था. अपने आत्मसम्मान के लिए उन्होंने डिगरी लेने से ही इनकार कर दिया था.
बाद में, राष्ट्रपति बनने पर केआर नारारणयन उसी यूनिवर्सिटी में लौटे और अपने भाषण में उन्होंने कहा था, ‘‘मैं उन जातिवादियों को यहां नहीं देख पा रहा हूं, जिन्होंने मु झे अछूत होने के चलते नौकरी से निकाल दिया था.’’
साल 1948 में लंदन स्कूल औफ इकोनौमिक्स से अपनी पढ़ाई पूरी कर के केआर नारायणन आईएफएस के लिए चुने गए थे, लेकिन यहां भी वे सताए जाने का शिकार हुए थे. भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) में प्रवेश के लिए उन्हें ऊपरी जातियों के अफसरों का विरोध झेलना पड़ा था. तब डाक्टर बीआर अंबेडकर की मदद से वे आईएफएस में शामिल हुए.
साल 1997 में भारत के 10वें राष्ट्रपति के चुनाव में केआर नारायणन को 95 फीसदी वोट मिले थे, लेकिन तब उन पर आरोप लगे थे कि उन का चुनाव एससी कोटे के चलते हुआ न कि उन की काबिलीयत से. एक विदेशी यात्रा के दौरान उन्हें जहर देने की साजिश रची गई थी. इस साजिश के लिए दक्षिणपंथी ताकतों की भूमिका नजर आई थी.
गुजरात दंगों को रोकने के लिए राष्ट्रपति केआर नारायणन ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से सेना भेजने की मांग की थी, लेकिन उन की बात पर कोई कार्रवाई नहीं हुई थी. यही वजह थी कि साल 2002 में दूसरे कार्यकाल के लिए उन का नाम प्रस्तावित हुआ, लेकिन भाजपा ने उन्हें दोबारा राष्ट्रपति नहीं बनने दिया था. केआर नारायणन ने बाद में इसे साजिश बताया था.
ओहदे पर जाति भारी
एससीएसटी तबका सदियों से अछूत रहा है. भारत के गांव अछूतों के लिए यातना केंद्र रहे हैं. यही वजह थी कि डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने अछूतों को शहरों में बस जाने पर जोर दिया. शहरों में बस जाने से अछूतपन खत्म नहीं होता, लेकिन गांवों की बजाय रोजगार के मौके ज्यादा थे.
आजादी के बाद एससी तबके ने बड़ी तादात में शहरों की ओर पलायन किया. राहत जरूर मिली, लेकिन शहरों में भी सताया जाना खत्म नहीं हुआ.
लोकतांत्रिक नियमों के मुताबिक पढ़ाईलिखाई के दरवाजे सब के लिए खुले थे, लेकिन अछूतों के लिए सामाजिक नियम इतने कठोर थे कि उन के लिए स्कूल तक पहुंचना आसान नहीं था. गांव हो या शहर एससी तबके की पढ़ाईलिखाई के मामले में दोनों जगह जातिवादी सोच कायम रही.
इस सब के बावजूद एससी तबके के लोग ऊंची तालीम की दहलीज तक पहुंचे और सिस्टम का हिस्सा बने, लेकिन उन्हें सताए जाने का दर्द भी झेलना पड़ा.
आज भी एससीएसटी तबके के लिए मुश्किलें कम नहीं हुई हैं. शुरुआती पढ़ाईलिखाई तक पहुंच आसान हुई है, लेकिन इस से आगे का रास्ता बेहद मुश्किल है. इन मुश्किल रास्तों पर चलते हुए कुछ लोग सिस्टम का हिस्सा बन भी रहे हैं, तो वहां भी जातिवाद उन का पीछा नहीं छोड़ रहा है. सब से बड़ा सवाल यह है कि क्या इस जातिवाद को खत्म करने का कोई समाधान है?
समाधान यही है की एससीएसटी तबके को पढ़ाईलिखाई की अहमियत को सम झना होगा. प्राइमरी लैवल की पढ़ाईलिखाई में 97 फीसदी एससी बच्चे पहुंच रहे हैं, लेकिन ऊंची पढ़ाईलिखाई में यही रेशियो महज 26 फीसदी रह जाता है.
एससी तबके को सब से पहले प्राइमरी से ऊंची पढ़ाईलिखाई के बीच के इस ड्रौपआउट रेशियो को कम करना होगा. जो समाज जितना कमजोर होता है, उस के लिए संघर्ष उतना ही बड़ा होता है.
यूनिवर्सिटी की पढ़ाई तक जितने ज्यादा एससी छात्र पहुंचेंगे, उन को सताया जाना उतना ही कम होगा. नौकरियों में भी ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी हासिल करनी होगी. हर लैवल पर संगठन को मजबूत करना होगा, ताकि भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई जा सके.
एससी तबके के सांसदों और विधायकों पर लगातार दबाव बनाए रखना होगा, ताकि वे सिर्फ सत्ता सुख न भोगें, बल्कि समाज के हित में काम करें. समय लगेगा, लेकिन हालात जरूर बदलेंगे.
रहनसहन में बदलाव जरूरी
एससीएसटी और मुसलिम तबके मुख्यधारा से कटे हुए नजर आते हैं, तो इस में किस का दोष है? भारत के कल्चर का हिस्सा होते हुए भी कल्चर से अलग दिखने की नौटंकी क्यों? यहीं से समस्याएं शुरू होती हैं.
एससीएसटी और मुसलिम तबका खुलेपन और नएपन से परहेज करता है. मुसलिम अपने अकीदों के आगे किसी तरह का सम झौता नहीं कर पाते तो एससी तबका भी इसी रास्ते पर निकल पड़ा है.
एससीएसटी और मुसलिम तबके को शहरों में घर किराए पर लेना मुश्किल होता है, तो इस की वजह सिर्फ मकान मालिकों के अंदर भेदभाव भरी सोच ही नहीं है. ये लोग खुद ही मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाते.
खानपान, पहनावा और रहनसहन की आदतें नहीं बदल पाते. साफसफाई के तौरतरीके नहीं सीख पाते. घर में लड़ाई झगड़े, घर की औरतों को पीटना, घर में हमेशा शोरशराबा होना और ज्यादा बच्चे होना यह आम बात होती है, इसीलिए इन्हें कोई किराए पर नहीं रखता.
वर्ग संघर्ष कितना जरूरी
दुनिया के किसी भी समाज में इनसानों की कीमत उस की प्रोडक्टिविटी से तय होती है. परिवार भी ऐसे ही चलते हैं. आज के समय परिवार में जो जितना प्रोडक्टिव होता है उस की इज्जत भी उसी हिसाब से होती है.
परिवार का जो सदस्य प्रोडक्टिव नहीं तो वह अपने परिवार में ही हाशिए पर चला जाएगा. कोई समाज अगर प्रोडक्टिव नहीं है, तो वह भी बाकी समाजों के बीच हाशिए पर चला जाएगा.
जो जाति या समाज टौप पर है, तो उस ने अपनी जायज या नाजायज प्रोडक्टिविटी को साबित किया है और जो जाति या समाज हाशिए पर है, वह अपनी प्रोडक्टिविटी को साबित नहीं कर पाया. यही लोग वर्ग संघर्ष की बात करते हैं. किसी भी संघर्ष की कीमत होती है. जिन के पास बहुतकुछ है वे आसानी से अपना दबदबा नहीं छोड़ेंगे और जिन के पास कुछ नहीं वे किसी भी संघर्ष के लायक भी नहीं हैं, इसलिए वर्ग संघर्ष की बात ही बेमानी है.
इज्जत और सा झेदारी के लिए अपने भीतर का संघर्ष जरूरी है. प्रोडक्टिविटी में भागीदार बनना जरूरी है. इस के लिए प्रोडक्टिव होना जरूरी है. आज जमाना बदल गया है. क्रांतियां किताबों में ही अच्छी लगती हैं. धरातल पर तो जू झना होता है. एससीएसटी और मुसलिम समाज को यह बात सम झनी होगी. बराबरी के हकदार बराबरी के लोग ही होते हैं. यह कड़वी हकीकत है.
‘घेटो’ की घुटन से बाहर निकलना जरूरी
16वीं सदी में इटली के वेनिस शहर में यहूदियों को अलगथलग इलाकों, जिन्हें ‘घेटो नुओवो’ (यहूदियों की नई बस्ती) कहा जाता था, में रहने के लिए मजबूर किया गया था. ये इलाके दूर से पहचाने जा सकते थे.
इटली से ही ‘घेटो शब्द इतना मशहूर हुआ कि यह अमेरिका के नीग्रो गुलामों की अलगथलग बस्तियों के लिए भी इस्तेमाल होने लगा. ब्रिटिश, डच और फ्रांसीसी उपनिवेशों में किसी कबीलाई समुदाय या धार्मिक अल्पसंख्यक को जबरन साथ रहने के लिए मजबूर किया जाता, तो यही इलाके घेटो बन जाते थे.
घेटो की घुटनभरी गलियों में कोई भी बाहरी नहीं घुसना चाहता था. अमेरिका में घेटो गुलामों की फैक्टरियां थीं, तो यूरोप के घेटो यहूदियों को अलगथलग रखने के डिटैंशन कैंप थे. यहां केवल एकजैसे लोग रहते थे, जो घेटो में पैदा होते और यहीं मर जाते थे.
आज भी शहरोंकसबों के आसपास ऐसे इलाके मौजूद होते हैं, जो अनपढ़ता, गरीबी और अपराध के लिए बदनाम होते हैं. ये इलाके आज के घेटो हैं. अमेरिका में अफ्रीकीअमेरिकी या हिस्पैनिक समुदाय के लोग जिन इलाकों में रहते हैं, उन्हें आज भी घेटो कहा जाता है.
भारत में भी ऐसे ‘घेटो’ की कमी नहीं है. यहां तो सदियों से घेटो मौजूद रहे हैं. गांव हो या शहर एससी तबके के लिए हर लैवल पर घेटो बनाए गए थे. शहरों के घेटो आगे चल कर झुग्गी झोंपडि़यों में बदल गए. हर गांव में एक घेटो नजर आ जाएगा.
शहरों में मुसलिम बहुल इलाकों को ही देख लीजिए. ये भी घेटो ही हैं. कई दलित बहुल महल्ले भी ऐसे ही हैं, जहां घुसने में भी घुटन होती है, जबकि वहां ये लोग आराम से जीते हैं. आज के इन घेटो की पहचान खराब बुनियादी ढांचे, अनपढ़ता, सेहत से जुड़ी सेवाओं की कमी और अपराध दर में बढ़ोतरी से होती है.
भारत के घेटो एससीएसटी और मुसलिमों के लिए किसी डिटैंशन कैंप से कम नहीं हैं. आखिर मजबूरी क्या है? घेटो की दीवारों को तोड़ कर मुख्यधारा तक पहुंचना मुश्किल तो नहीं है, लेकिन घेटो में जीने की आदत पड़ गई है. यहां से निकलने का एकमात्र जरीया पढ़ाईलिखाई है, लेकिन इन समाजों को तालीम की सम झ ही नहीं है.
समस्या आप की, हल भी आप ही निकालें
एससीएसटी तबके के साथ इतिहास में गलत हुआ या आज भी गलत हो रहा है, इस बात का रोना रोते रहने से कुछ नहीं बदलेगा. मुसलिम बादशाहों ने हजार साल तक इस देश पर हुकूमत की, इस बात पर इतराने से मुसलिमों के आज के हालात नहीं बदल जाएंगे. एससीएसटी तबके और मुसलिमों को यह तय करना होगा कि वर्तमान में उन के समाज की परफौर्मैंस और प्रोडक्टिविटी क्या है?
यह इस बात से तय होगा कि आप के समाज में पढ़ाईलिखाई और सम झदारी का लैवल क्या है?
पढ़ाईलिखाई और सम झदारी का रास्ता मुश्किल है, लेकिन इस के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं है. हालात का रोना रोते रहने से हालात नहीं बदलते. नेता आते हैं और अपना उल्लू सीधा कर गायब हो जाते हैं. समाज इन नेताओं का पिछलग्गू बना रहता है. समस्या आप की है, तो बदलाव भी खुद से शुरू करना होगा. Social Inequality