Society. चिंथदा आनंद आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के कोठापालेम गांव का रहने वाला है, जिस ने अब से कोई 12 साल पहले ईसाई धर्म अपना लिया था. अब वह हिंदू नहीं रह गया था, लेकिन जाति उस ने नहीं बदली थी. वह खुद को मंडिगा (जिसे मदीगा भी कहा जाता है) समुदाय का ही मान कर चल रहा था, जिस की गिनती एससी यानी अनुसूचित जाति में होती है. दूसरे दलितों की तरह इस समुदाय के लोगों की बेइज्जती भी धर्म के चलते कम जाति की वजह से ज्यादा होती है
धर्म और जाति पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले उन हालात और इतिहास को देख लें जो यह साबित करते हैं कि दलित दलित ही रहेगा. वह किसी और धर्म में जा कर सवर्ण नहीं हो जाता.
मडिगा या मदीगा जाति के लोग परंपरागत रूप से चमड़े का काम करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे हिंदीभाषी राज्यों में जाटव, अहिरवार समुदाय के लोग करते हैं. उन्हीं की तरह यह समुदाय भी कई उपजातियों में बंटा हुआ है, लेकिन है पिछड़ा ही और सवर्णों के लिए अछूत और मुख्यधारा से कोसों दूर है, जिस के स्वाभिमान की कोई कीमत नहीं होती.
अविभाजित आंध्र प्रदेश में दलितों की कुल आबादी का आधा हिस्सा रहा मदीगा समुदाय हमेशा से ही अनदेखी का शिकार रहा है. इस समुदाय के एकलौते नामचीन इनसान बंगारू लक्ष्मण हैं, जिन्हें भारतीय जनता पार्टी ने साल 2000 में राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया था. लेकिन बनिएब्राह्मणों की इस पार्टी में कोई बंगारू लक्ष्मण के पैर नहीं छूता था, क्योंकि वे दलित थे. नहीं तो भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष के पैर छूना एक संस्कार के तौर पर मौजूद है.
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