पैसा बना देता है अपनों का दुश्मन: जब खूनी बनी शादीशुदा प्रेमिका

उस रात वह मेरा इंतजार करती रही. मन में चल रही उल  झन व सवालों ने बेचैनी को और भी बढ़ा दिया था. मन में एक ही सवाल था कि क्या हुआ होगा. आखिरकार चैन आ गया, जब प्रेमी का फोन ही आ गया. उस की बातों को सुन कर यही लगा कि अपने पति की यादों से बाहर निकल जाएगी और वह  अपने प्रेमी के साथ एक प्यार भरी जिंदगी बिताने का सपना देख कर सो गई. लेकिन यह सपना एक चुटकी में ही ढेर हो जाएगा, इस बात का अंदाजा नहीं था. एक ऐसा प्यार, जिस ने सिर्फ इनसानियत का खून नहीं किया, बल्कि एक परिवार को भी तबाह कर दिया.

पहली मुलाकात

बात साल 2013 की है. मोहनदास की 34 वर्षीय पत्नी सीमा केरल के मुख्य शहर कोच्चि में एक कंपनी में काम करती थी. वहीं उसी औफिस टौवर में गिरीश एक गारमेंट शौप में अकाउंटैंट की जौब करता था.

एक ही बिल्डिंग में काम करने की वजह से सीमा और गिरीश की मुलाकात हो गई और यह सिलसिला चलता रहा. उन की दोस्ती प्यार का रूप ले चुकी थी. वे दोनों आपस में एकदूसरे से अपने सुखदुख बांटने लगे.

सीमा ने गिरीश को अपने कर्ज के बारे में बताया. सीमा ने पैसे की मदद करने के लिए ही गिरीश से दोस्ती की थी. गिरीश ने कई बार सीमा की मांग के मुताबिक उस की मद्द करने के लिए पैसा भी दिया और कभी भी यह दी गई रकम वापस नहीं मांगी.

इस तरह सीमा की कई जरूरतें पूरी होने लगीं. गिरीश के बारे में सीमा ने मोहनदास को बताया तो था, लेकिन वह असलियत से फिर भी अनजान ही था. मोहनदास को इन रिश्ते में कोई छिपी बात महसूस नहीं हुई.

दोस्त बन कर गिरीश वैकेम से एर्नाकुलम तक  हर दिन बाइक से आताजाता था. सीमा से रिश्ता बनाए रखने के लिए गिरीश और पैसा कमाने में लगा रहता और इस के लिए उस ने अपने दफ्तर में हेराफेरी भी शुरू कर दी.

अकाउंटैंट होने की वजह से गिरीश बहुत जल्दी लाखों रुपए की हेरफेर करने में सफल भी हुआ और उस ने वह सारे पैसे सीमा के अकाउंट में ट्रांसफर कर दिए.

शुरुआत में सीमा इस बात से अनजान थी कि गिरीश के पास यह पैसे कहां से आ रहे हैं. मोहनदास ने भी कभी नहीं पूछा. इन लोगों ने 17 लाख रुपए की गाड़ी भी खरीद ली थी.

अचानक से जिंदगी में आया इतना बदलाव देख कर जब रिश्तेदारों को भी शक हुआ, तब सीमा और मोहनदास ने अपने रिएल ऐस्टेट के धंधे में मुनाफा बताया.

कभी न बिछुड़ने वाले प्रेमी

गिरीश का सीमा को पैसे देने का सिलसिला जारी रहा. एक बार मोहदनदास अपने दोस्तों व परिवार के सदस्यों के साथ घूमने चले गए. इसी बीच सीमा और गिरीश के बीच निकटता ज्यादा बढ़ गई. एकसाथ बाहर जाना, खाना खाना और वह सीमा के घर भी जाने लगा.

गिरीश का सीमा के प्रति पागलपन का सा प्यार था. 6 साल तक का लंबा परिचय कभी न टूटने वाले रिश्ते में बदल गया था. इतने सालों तक गिरीश सीमा को तकरीबन 1 करोड़ रुपए तक दे चुका था, जो उस ने कंपनी के अकाउंट से चुराए थे.

गिरीश के औफिस वालों को भी उस की बेईमानी का पता चलने लगा. कंपनी उस से अपने सारे पैसे वापस मांगने लगी.

हत्या की योजना

सीमा गिरीश की असलियत से वाकिफ हो गई थी, लेकिन वह गिरीश को सारे पैसे वापस न करने की हालत में थी. पति के सामने कोई भी माली हेराफेरी मुमकिन नहीं थी. वे दोनों गुरुवायूर में कमरा ले कर समस्याओं के समाधान सोचते रहे.

इसी बीच सीमा ने बताया कि मोहनदास के तमिलनाडु में ट्रांसफर होने की योजना बन रही है. अब हम सब वहीं चले जाएंगे.

सीमा की यह बात सुन कर गिरीश को लगा कि भविष्य में वह फिर सीमा से कभी भी नहीं मिल पाएगा. सीमा को दिया हुआ सारा पैसा व रिश्ता खत्म होते सोच गिरीश डर गया. फिर इन दोनों ने मिल कर मोहनदास की हत्या की योजना बनाई.

रची साजिश

सीमा और गिरीश दोनों ने मिल कर मोहनदास की हत्या का दिन 2 दिसंबर तय किया. जिस दिन सीमा के भाई के बच्चों का जन्मदिन होता है. मोहनदास भी वहीं पार्टी में गया हुआ था और दोपहर तक वापस लौट आया. शाम को साढ़े 7 बजे वह कहीं जाने की तैयारी में था. इस मौके का उन दोनों ने भरपूर फायदा उठाया.

7 बज कर 40 मिनट पर सीमा ने मोहनदास से यह कहा कि गिरीश अमृत अस्पताल में एक दोस्त से मिलने गया है. वापस लौटते समय पालम जंक्शन पर वह आप का इंतजार करेगा. उसे बाइक में लिफ्ट दे कर किसी सुविधाजनक जगह पर उतार देना.

मोहनदास के घर से निकलते ही सीमा ने गिरीश को फोन कर दिया. मोहनदास पालम जंक्शन पर पहुंच गया, तो उस ने वहां गिरीश को खड़े देखा. वह बाइक पर सवार हो गया और उस ने मोहनदास को फाक्ट आनवातिल जंक्शन जैसी वीरान जगह पर गाड़ी रोकने को कहा.

फिर गिरीश ने एक तौलए पर क्लोरोफोम डाल कर उस की नाक पर लगाने की कोशिश की. मोहनदास ने भागने की कोशिश की, तो गिरीश ने उसे पीछे से पकड़ कर चाकू मार दिया. गहरे घाव और लगातार खून बहने की वजह से मोहनदास की मौके पर ही मौत हो गई. चाकू मारने के बाद गिरीश कमलेश्वरी की ओर चला गया, जहां उस की बाइक थी.

पुलिस की जांचपड़ताल

8 बजे के करीब मौका ए वारदात पर लोगों की भीड़ जमा हो गई थी. मोहनदास की हत्या जहां उस की बाइक खड़ी थी वहां से कुछ ही दूरी पर की गई थी. मौका ए वारदात पर एक चश्मा पाया गया. उस के गले की चेन के 2 टुकड़े हो चुके थे. 40,000 रुपए का कीमती मोबाइल फोन व पर्स से 30,000 रुपए गायब थे, जिसे गिरीश ने निकाल लिया था, क्योंकि वह यह साबित करना चाहता था कि हत्या सामान की लूट व मार से हुई है. लेकिन पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि मोहनदास की हत्या की गई है.

हत्या के बाद गिरीश ने सीमा को बताने के लिए फोन किया था. मोहनदास के सभी परिचितों के नंबर पर जांच विभाग द्वारा जांच की गई. जब पुलिस द्वारा सीमा जहां नौकरी करती थी, वहां से जांचपड़ताल की गई तो पता चला कि वह काम पर 17 नवंबर से ही नहीं गई थी. सीमा ने वहां तबीयत खराब होने व अस्पताल जाने का कारण बताया था.

सीमा के मोबाइल पर ज्यादातर गिरीश के ही फोन देख पुलिस ने उस के औफिस में जा कर पूछताछ की, तो वहां पता चला कि पैसे की हेराफेरी करने की वजह से वह यहां पर नहीं आ रहा है, तभी दोनों के संबंध सामने आए.

कोच्चि टाउन नौर्थ पुलिस सबइंस्पैक्टर एस. जयशंकर का कहना है, ‘‘ये दोनों जहां काम कर रहे थे, वहां के लोग इन के रिश्ते से अनजान थे. पुलिस ने गिरीश के घर के आसपास जांच की. पुलिस ने जब सीमा से पूछताछ की, तो उस के जवाब व बरताव में घबराहट महसूस हुई. इतना ही नहीं, मोहनदास के रिश्तेदारों को भी सीमा पर शक होने लगा था. सख्ती से पूछताछ करने पर गिरीश का हत्या में हाथ सामने आया. घटना के 10 दिनों के अंदर ही मुजरिम सामने आ गए.’’

पछतावा नहीं

पकड़े जाने के बाद भी बिना किसी शर्म व डर के दोनों सामने खड़े थे. दोनों को घटनास्थल पर ले जाया गया, तो गिरीश ने फेंके हुए विदेशी चाकू, जिस से मोहनदास की हत्या की थी, को   झुरमुट से ढूंढ़ निकाला. फोरैंसिक विभाग द्वारा की गई जांच में बाइक पर खून के धब्बे भी पाए गए.

सीमा और गिरीश ने सोचा था कि इस हत्या के बारे में कभी भी किसी को पता नहीं चलेगा, पर दोनों के फोन की काल हिस्ट्री ने इन का जुर्म उजागर कर दिया. मोहनदास व सीमा के बच्चे अब रिश्तेदारों के सहारे ही पलने लगे.

प्यार और पैसे का चोलीदामन का साथ है. हर प्रेमिका चाहती है कि उस का प्रेमी उस पर खर्च करे, चाहे कहीं से भी पैसा आए. अगर प्रेमिका शादीशुदा है तो वह बहुत लालची भी हो जाती है और अपनी कामुक अदाओं का भी इस्तेमाल करती है. आमतौर पर पति चुप ही रहते हैं, क्योंकि पत्नी के साथ पैसे का फायदा उसे भी मिलता है. सोने के अंडे देने वाली पत्नी किसे नहीं भाती?

जयादेवन आर.      

अपारदर्शी सच- भाग 2: किस रास्ते पर चलने लगी तनुजा

करीब सालभर पहले तक सब सामान्य था. मनीष और तनुजा जिंदगी के उस मुकाम पर थे जहां हर तरह से इतमीनान था. अपनी जिंदगी में एकदूसरे की अहमियत समझतेमहसूस करते एकदूसरे के प्यार में खोए रहते.

इस निश्चितता में प्यार का उछाह भी अपने चरम पर था. लगता, जैसे दूसरा हनीमून मना रहे हों जिस में अब उत्सुकता की जगह एकदूसरे को संपूर्ण जान लेने की तसल्ली थी. मनीष अपने दम भर उसे प्यार करते और वह पूरी शिद्दत से उन का साथ देती. फिर अचानक यों ही मनीष जल्दी थकने लगे तो उसी ने पूरा चैकअप करवाने पर जोर दिया.

सबकुछ सामान्य था पर कुछ तो असामान्य था जो पकड़ में नहीं आया था. वह उन का और ध्यान रखने लगी. खाना, फल, दूध, मेवे के साथ ही उन की मेहनत तक का. उस की इच्छाएं उफान पर थीं पर मनीष के मूड के अनुसार वह अपने पर काबू रखती. उस की इच्छा देखते मनीष भी अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते लेकिन वह अतृप्त ही रह जाती.

हालांकि उस ने कभी शब्दों में शिकायत दर्ज नहीं की, लेकिन उस की झुंझलाहट, मुंह फेर कर सो जाना, तकिए में मुंह दबा कर ली गई सिसकियां मनीष को आहत और शर्मिंदा करती गईं. धीरेधीरे वे उन अंतरंग पलों को टालने लगे. तनुजा कमरे में आती तो मनीष कभी तबीयत खराब होने का बहाना बनाते, कभी बिजी होने की बात कर लैपटौप ले कर बैठ जाते.

कुछकुछ समझते हुए भी उसे शक हुआ कि कहीं मनीष का किसी और से कोई चक्कर तो नहीं है? ऐसा कैसे हो सकता है जो व्यक्ति शाम होते ही उस के आसपास मंडराने लगता था वह अचानक उस से दूर कैसे होने लगा? लेकिन उस ने यह भी महसूस किया कि मनीष

अब भी उस से प्यार करते हैं. उस की छोटीछोटी खुशियां जैसे सप्ताहांत में सिनेमा, शौपिंग, आउटिंग सबकुछ वैसा ही तो था. किसी और से चक्कर होता तो उसे और बच्चों को इतना समय वे कैसे देते? औफिस से सीधे घर आते हैं, कहीं टूर पर जाते नहीं.

शक का कीड़ा जब कुलबुलाता है तब मन जितना उस के न होने की दलीलें देता है उतना उस के होने की तलाश करता. कभी नजर बचा कर डायरी में लिखे नंबर, तो कभी मोबाइल के मैसेज भी तनुजा ने खंगाल डाले पर शक करने जैसा कुछ नहीं मिला.

उस ने कईकई बार खुद को आईने में निहारा, अंगों की कसावट को जांचा, बातोंबातों में अपनी सहेलियों से खुद के बारे में पड़ताल की और पार्टियों, सोशल गैदरिंग में दूसरे पुरुषों की नजर से भी खुद को परखा. कहीं कोई बदलाव, कोई कमी नजर नहीं आई. आज भी जब पूरी तरह से तैयार होती है तो देखने वालों की नजर एक बार उस की ओर उठती जरूरी है.

हर ऐसे मौकों पर कसौटी पर खरा उतरने का दर्प उसे कुछ और उत्तेजित कर गया. उस की आकांक्षाएं कसमसाने लगीं. वह मनीष से अंतरंगता को बेचैन होने लगी और मनीष उन पलों को टालने के लिए कभी काम में, कभी बच्चों और टीवी में व्यस्त होने लगे.

अधूरेपन की बेचैनी दिनोंदिन घनी होती जा रही थी. उस दिन एक कलीग को अपनी ओर देखता पा कर तनुजा के अंदर कुछ कुलबुलाने लगा, फुरफुरी सी उठने लगी. एक विचार उस के दिलोदिमाग में दौड़ कर उसे कंपकंपा गया. छी, यह क्या सोचने लगी हूं मैं? मैं ऐसा कभी नहीं कर सकती. मेरे मन में यह विचार आया भी कैसे? मनीष और मैं एकदूसरे से प्यार करते हैं, प्यार का मतलब सिर्फ यही तो नहीं है. कितना धिक्कारा था तनुजा ने खुद को लेकिन वह विचार बारबार कौंध जाता, काम करते हाथ ठिठक जाते, मन में उठती हिलोरें पूरे शरीर को उत्तेजित करती रहीं.

अतृप्त इच्छाएं, हर निगाह में खुद के प्रति आकर्षण और उस आकर्षण को किस अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है, वह यह सोचने लगी. संस्कारों के अंकुश और नैसर्गिक प्यास की कशमकश में उलझी वह खोईखोई सी रहने लगी.

उस दिन दोपहर तक बादल घिर आए थे. खाना खा कर वह गुदगुदे कंबल में मनीष के साथ एकदूसरे की बांहों में लिपटे हुए कोई रोमांटिक फिल्म देखना चाहती थी. उस ने मनीष को इशारा भी किया जिसे अनदेखा कर मनीष ने बच्चों के साथ बाहर जाने का प्रोग्राम बना लिया. वे नासमझ बन तनुजा से नजरें चुराते रहे, उस के घुटते दिल को नजरअंदाज करते रहे. वह चिढ़ गई. उस ने जाने से मना कर दिया, खुद को कमरे में बंद कर लिया और सारा दिन अकेले कमरे में रोती रही.

तनुजा ने पत्रपत्रिकाएं, इंटरनैट सब खंगाल डाले. पुरुषों से जुड़ी सैक्स समस्याओं की तमाम जानकारियां पढ़ डालीं. परेशानी कहां है, यह तो समझ आ गया लेकिन समाधान? समाधान निकालने के लिए मनीष से बात करना जरूरी था. बिना उन के सहयोग के कोई समाधान संभव ही नहीं था. बात करना इतना आसान तो नहीं था.

शब्दों को तोलमोल कर बात करना, एक कड़वे सच को प्रकट करना इस तरह कि वह कड़वा न लगे, एक ऐसी सचाई के बारे में बात करना जिसे मनीष पहले से जानते हैं कि तनुजा इसे नहीं जानती और अब उन्हें बताना कि वह भी इसे जानती है, यह सब बताते हुए भी कोई आक्षेप, कोई इलजाम न लगे, दिल तोड़ने वाली बात पर दिल न टूटे, अतिरिक्त प्यारदेखभाल के रैपर में लिपटी शर्मिंदगी को यों सामने रखना कि वह शर्मिंदा न करे, बेहद कठिन काम था.

दिन निकलते गए. कसमसाहटें बढ़ती गईं. अतृप्त प्यास बुझाने के लिए वह रोज नए मौकेरास्ते तलाशती रही. समाज, परिवार और बच्चे उस पर अंकुश लगाते रहे. तनुजा खुद ही सोचती कि क्या इस एक कमी को इस कदर खुद पर हावी होने देना चाहिए? तो कभी खुद ही इस जरूरी जरूरत के बारे में सोचती जिस के पूरा न होने पर बेचैन होना गलत भी तो नहीं. अगर मनीष अतृप्त रहते तो क्या ऐसा संयम रख पाते? नहीं, मनीष उसे कभी धोखा नहीं देते या शायद उसे कभी पता ही नहीं चलने देते.

पहचान – भाग 1 : मां की मौत के बाद क्या था अजीम का हाल

बाढ़ राहत शिविर के बाहर सांप सी लहराती लंबी लाइन के आखिरी छोर पर खड़ी वह बारबार लाइन से बाहर झांक कर पहले नंबर पर खड़े उस व्यक्ति को देख लेती थी कि कब वह जंग जीत कर लाइन से बाहर निकले और उसे एक कदम आगे आने का मौका मिले.

असम के गोलाघाट में धनसिरी नदी का उफान ताडंव करता सबकुछ लील गया है. तिनकातिनका जुटाए सामान के साथ पसीनों की लंबी फेहरिस्त बह गई है. बह गए हैं झोंपड़े और उन के साथ खड़ेभर होने तक की जमीन भी. ऐसे हालात में राबिया के भाई 8 साल के अजीम के टूटेफूटे मिट्टी के खिलौनों की क्या बिसात थी.

खिलौनों को झोंपड़ी में भर आए बाढ़ के पानी से बचाने के लिए अजीम ने न जाने क्याक्या जुगतें की, और जब झोंपड़ी ही जड़ से उखड़ गई तब उसे जिंदगी की असली लड़ाई का पता मालूम हुआ.

राबिया ने 20 साल की उम्र तक क्याक्या न देखा. वह शरणार्थी शिविर के बाहर लाइन में खड़ीखड़ी अपनी जिंदगी के पिछले सालों के ब्योरे में कहीं गुम सी हो गई थी.

राबिया अपनी मां और छोटे भाई अजीम को पास ही शरणार्थी शिविर में छोड़ यहां सरकारी राहत कैंप में खाना व कपड़ा लेने के लिए खड़ी है. परिवार के सदस्यों के हिसाब से कंबल, चादर, ब्रैड, बिस्कुट आदि दिए जा रहे थे.

2 साल का ही तो था अजीम जब उस के अब्बा की मौत हो गई थी. उन्होंने कितनी लड़ाइयां देखीं, लड़ीं, कब से वे भी शांति से दो वक्त की रोटी को दरबदर होते रहे. एक टुकड़ा जमीन में चार सांसें जैसे सब पर भारी थीं. कौन सी राजनीति, कैसेकैसे नेता, कितने छल, कितने ही झूठ, सूखी जमीन तो कभी बाढ़ में बहती जिंदगियां. कहां जाएं वे अब? कैसे जिएं? लाखों जानेअनजाने लोगों की भीड़ में तो बस वही चेहरा पहचाना लगता है जो जरा सी संवेदना और इंसानियत दिखा दे.

पैदा होने के बाद से ही देख रही थी राबिया एक अंतहीन जिहाद. क्यों? क्यों इतना फसाद था, इतनी बगावत और शोर था?

अब्बा के पास एक छोटी सी जमीन थी. धान की रोपाई, कटाई और फसल होने के बाद 2 मुट्ठी अनाज के दाने घर तक लाने के लिए उन्हें कितने ही पापड़ बेलने पड़ते. और फिर भूख और अनाज के बीच अम्मी की ढेरों जुगतें, ताकि नई फसल होने तक भूख का निवाला खुद ही न बन जाएं वे.

इस संघर्ष में भी अम्मी व अब्बा को कभी किसी से शिकायत नहीं रही. न तो सरकार से, न ग्राम पंचायती व्यवस्था से और न जमाने से. जैसा कि अकसर सोनेहीरों में खेलने वाले लोगों को रहती है. शिकायत भी क्या करें? मुसलिम होने की वजह से हर वक्त वे इस कैफियत में ही पड़े रहते कि कहीं वे बंगलादेशी घुसपैठिए न करार दे दिए जाएं. अब्बा न चाहते हुए भी इस खूनी आग की लपटों में घिर गए.

वह 2012 के जुलाई माह का एक दिन था. अब्बा अपने खेत गए हुए थे. खेत हो या घर, हमेशा कई मुद्दे सवाल बन कर उन के सिर पर सवार रहते. ‘कौन हो?’ ‘क्या हो?’ ‘कहां से हो?’ ‘क्यों हो?’ ‘कब से हो?’ ‘कब तक हो?’

इतने सारे सवालों के चक्रव्यूह में घिरे अब्बा तब भी अमन की दुआ मांगते रहते. बोडो, असमिया लोगों की आपत्ति थी कि असम में कोई बाहरी व्यक्ति न रहे. उन का आंतरिक मसला जो भी हो लेकिन आम लोग जिंदगी के लिए जिंदगी की जंग में झोंके जा चुके थे.अब्बा खेत से न लौटे. बस, तब से भूख ने मौत के खौफ की शक्ल ले ली थी. भूख, भय, जमीन से बेदखल हो जाने का संकट, रोजीरोटी की समस्या, बच्चों की बीमारी, देशनिकाला, अंतहीन अंधेरा. घर में ही अब्बा से या कभी किसी पहचान वाले से राबिया ने थोड़ाबहुत पढ़ा था.

पागलों की तरह अम्मी को कागज का एक टुकड़ा ढूंढ़ते देखती. कभी संदूकों में, कभी बिस्तर के नीचे, कभी अब्बा के सामान में. वह सुबूत जो सिद्ध कर दे कि उन के पूर्वज 1972 के पहले से ही असम में हैं. नहीं मिल पाया कोई सुबूत. बस, जो था वह वक्त के पंजर में दफन था. अब्बा के जाने के बाद अम्मी जैसे पथरा गईर् थीं. आखिरकार 14 साल की राबिया को मां और भाई के लिए काम की खोज में जाना ही पड़ा.

कभी कहीं मकान, कभी दुकान में जब जहां काम मिलता, वह करती. बेटी की तकलीफों ने अम्मी को फिर से जिंदा होने को मजबूर कर दिया. इधरउधर काम कर के किसी तरह वे बच्चों को संभालती रहीं.

जिंदगी जैसी भी हो, चलने लगी थी. लेकिन आएदिन असमिया और अन्य लोगों के बीच पहचान व स्थायित्व का विवाद बढ़ता ही रहा. प्राकृतिक आपदा असम जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए नई बात नहीं थी, तो बाढ़ भी जैसे उनकी जिंदगी की लड़ाई का एक जरूरी हिस्सा ही था. राबिया अब तक लाइन के पहले नंबर पर पहुंच गई थी.

सामने टेबल बिछा कर कुरसी पर जो बाबू बैठे थे, राबिया उन्हें ही देख रही थी.

‘‘कार्ड निकालो जो एनआरसी पहचान के लिए दिए गए हैं.’’

‘‘कौन सा?’’ राबिया घबरा गई थी.

बाबू ने थोड़ा झल्लाते हुए कहा, ‘‘एनआरसी यानी नैशनल रजिस्टर औफ सिटिजन्स का पहचानपत्र, वह दिखाओ, वरना सामान अभी नहीं दिया जा सकेगा. जिन का नाम है, पहले उन्हें मिलेगा.’’

‘‘जी, दूसरी अर्जी दाखिल की हुई है, पर अभी बहुतों का नाम शामिल नहीं है. मेहरबानी कर के सामान दे दीजिए. मैं कई घंटे से लाइन में लगी हूं. उधर अम्मी और छोटा भाई इंतजार में होंगे.’’

मिलने, न मिलने की दुविधा में पड़ी लड़की को देख मुहरवाले कार्डधारी पीछे से चिल्लाने लगे और किसी डकैत पर टूट पड़ने जैसा राबिया पर पिल पड़ते हुए उसे धकिया कर निकालने की कोशिश में जुट गए. राबिया के लिए जैसे ‘करो या मरो’ की बात हो गई थी. 2 जिंदगियां उस की राह देख रही थीं. ऐसे में राबिया समझ चुकी थी कि कई कानूनी बातें लोगों के लिए होते हुए भी लोगों के लिए ही तकलीफदेह हो जाती हैं.

बाबू के पीछे खड़े 27-28 साल के हट्टेकट्टे असमिया नौजवान नीरद ने राबिया को मुश्किल में देख उस से कहा, ‘‘आप इधर अंदर आइए. आप बड़े बाबू से बात कर लीजिए, शायद कुछ हो सके.’’

राबिया भीड़ के पंजों से छूट कर अंदर आ गई थी. लोग खासे चिढ़े थे. कुछ तो अश्लील फब्तियां कसने से भी बाज नहीं आ रहे थे. राबिया दरवाजे के अंदर आ कर उसी कोने में दुबक कर खड़ी हो गई.

नीरद पास आया और एक मददगार की हैसियत से उस ने उस पर नजर डाली. दुबलीपतली, गोरी, सुंदर, कजरारी आंखों वाली राबिया मायूसी और चिंता से डूबी जा रही थी. उस ने हया छोड़ मिन्नतभरी नजरों से नीरद को देखा.

नीरद ने आहिस्ते से कहा, ‘‘सामान की जिम्मेदारी मेरी ही है, मैं राहत कार्य निबटा कर शाम को शिविर आ कर तुम्हें सामान दे जाऊंगा. तुम अपना नाम बता दो.’’

राबिया ने नाम तो बता दिया लेकिन खुद की इस जिल्लत के लिए खुद को ही मन ही मन कोसती रही.

नीरद भोलाभाला, धानी रंग का असमिया युवक था. वह गुवाहाटी में आपदा नियंत्रण और सहायता विभाग में सरकारी नौकर था. नौकरी, पैसा, नियम, रजिस्टर, सरकारी सुबूतों के बीच भी उस का अपना एक मानवीय तंत्र हमेशा काम करता था. और इसलिए ही वह मुश्किल में पड़े लोगों को अपनी तरफ से वह अतिरिक्त मदद कर देता जो कायदेकानूनों के आड़े आने से अटक जाते थे.

मैं सिर्फ बार्बी डौल नहीं हूं: क्या थी परी की कहानी

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सत्यकथा: सविता के जिस्म की आग ने ही ले ली जान

27 फरवरी, 2022 की सुबह करीब 9 बजे ग्वालियर के थाना जनकगंज के थानाप्रभारी संतोष यादव अपने कक्ष में बैठे थे. तभी एक युवक उन के पास आया. उस के चेहरे पर परेशानी के भाव और आंखों में चिंता झलक रही थी. वह बेहद घबराया हुआ लग रहा था. उस युवक की शक्ल देख कर ही लगा कि वह किसी भारी मुसीबत में है.

उन्होंने उसे बैठा कर उस की परेशानी पूछी तो उस ने रोते हुए बताया, ‘‘साहब, बीती रात किसी ने मेरी बहन सविता की गुप्तेश्वर पहाड़ी के जंगल में गला रेत कर हत्या कर दी.’’

‘‘क्या नाम है तुम्हारा? तुम कहां रहते हो और क्या काम करते हो?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

युवक ने रोते हुए बताया, ‘‘साहब, मेरा नाम परमाल बंजारा है और मैं काली माता मंदिर के सामने गोल पहाडि़या इलाके में बंजारों की बस्ती में रहता हूं. मैं लक्ष्मीगंज सब्जीमंडी में पल्लेदारी का काम करता हूं.’’

‘‘अपनी बहन के बारे में पूरी बात विस्तार से बताओ, वह घर से बाहर गुप्तेश्वर पहाड़ी के जंगल में कब गई थी और वह करती क्या थी?’’

‘‘साहब, उस का नाम सविता बंजारा था. उस के पति प्रकाश बंजारा की 10 साल पहले बिलौआ में स्थित महाकालेश्वर स्टोन क्रैशर वालों की खदान में काम करते समय हुए ब्लास्ट में मौत हो गई थी. पति की अचानक हुई मौत का सविता को काफी सदमा लगा था. पति की मौत के बाद उस के देवर ने उसे रख लिया था.

‘‘लेकिन वह आपराधिक प्रवृत्ति का है. एक केस में उसे जेल जाना पड़ा. उस के जेल जाते ही ससुराल वाले उसे ताने देने लगे थे कि वह डायन है, उस ने पति को डंस लिया. ससुराल में दिए जाने वाले तानों से जब वह बहुत ज्यादा दुखी रहने लगी तो फिर एक दिन अपनी ससुराल को हमेशा के लिए छोड़ बेटे रवि और बेटी खुशी को साथ ले कर मायके में ग्वालियर आ गई और अपना मकान बनवा कर रहने लगी थी.

‘‘साहब, धीरेधीरे उस का जीवन सामान्य होता जा रहा था. हालांकि उस की माली हालत कोई खास नहीं थी, किसी तरह मेहनतमजदूरी कर के अपने बच्चों को पाल रही थी. वह मेरे साथ लक्ष्मीगंज सब्जी मंडी में भी काम पर जाने लगी थी.

‘‘हम लोगों को इस बात की चिंता सताने लगी कि विधवा होने के कारण बहन का पहाड़ सा जीवन कैसे कटेगा. हम उस के लिए बिरादरी में ही लड़का तलाशने में लगे हुए थे. इसी बीच यह घटना घट गई.’’

थानाप्रभारी ने परमाल से पूछा, ‘‘तुम्हें सविता की हत्या की जानकारी कैसे मिली?’’

‘‘साहब, मैं वहां पर नहीं गया था. सुबह होते ही मेरी भतीजी सपना नित्यक्रिया के लिए जंगल में गई थी. उस ने ही सुबहसुबह यह खबर दी. हत्या की खबर सुन कर घर में रोनाधोना शुरू हो गया तो पड़ोसी भी हमारे घर पर जमा हो गए. इस के बाद जब पहाड़ी पर पहुंचे तो वहां सविता की खून में सनी लाश झाडि़यों में पड़ी मिली.’’

कत्ल की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी संतोष यादव तुरंत सविता के भाई परमाल बंजारा को साथ ले कर घटनास्थल की तरफ निकल गए.

पुलिस के पहुंचने तक घटनास्थल पर काफी भीड़ जमा हो चुकी थी. पुलिस ने लाश का निरीक्षण किया. मृतका की उम्र 35 साल के आसपास थी और वह सलवारसूट पहने हुए थी.

उस का गला किसी धारदार हथियार से रेता हुआ था. थानाप्रभारी की सूचना पर फोरैंसिक और डौग स्क्वायड  की टीमें भी घटनास्थल पर पहुंच गईं.

फोरैंसिक टीम का काम खत्म हो गया तो खबर पा कर एसपी अमित सांघी, एएसपी (सिटी पश्चिम) सत्येंद्र सिंह तोमर, एसपी (सिटी लश्कर) आत्माराम शर्मा भी मौकाएवारदात पर पहुंच गए थे.

इन पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल एवं लाश का निरीक्षण किया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल और मृतका की लाश का अवलोकन करने के बाद अनुमान लगाया कि हत्यारा मृतका का कोई करीबी हो सकता है. इस की कुछ खास वजह भी थी जैसे कि सुनसान जगह पर रात के वक्त कोई क्यों जाएगा.

आसपड़ोस के किसी भी व्यक्ति को इस हत्या के बारे में सुबह होने तक भी बिलकुल पता नहीं चल सका था. घटनास्थल पर किसी को आतेजाते भी नहीं देखा गया था.

पुलिस अधिकारियों ने परमाल बंजारा से पूछा, ‘‘तुम्हें किसी पर संदेह है?’’

कुछ पल के लिए खामोश रहने के बाद उस ने शून्य में ताकते हुए कहा, ‘‘नहीं साहब.’’

‘‘तुम आखिरी बार सविता से उस के घर पर कब मिले थे?’’

‘‘साहब, 26 फरवरी की  रात 10 बजे,’’ परमाल ने बिलखते हुए कहा.

घटनास्थल की जरूरी काररवाई निपटा कर थानाप्रभारी ने सविता की लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

प्राथमिक काररवाई के बाद थानाप्रभारी ने मोहल्ले के कुछ लोगों से बात की तो पता चला कि शफीकुल से सविता के गहरे ताल्लुकात थे. दोनों के बीच प्रेम प्रसंग था, वह सविता के परिवार का खर्च भी उठाता था.

इस महत्त्वपूर्ण जानकारी से थानाप्रभारी को पक्का यकीन हो गया कि सविता की हत्या अवैध संबंधों के कारण ही हुई होगी. हकीकत जानने के लिए थानाप्रभारी ने उसी दिन सविता और शफीकुल  के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स देख कर पुलिस हैरान रह गई. उस से पता चला कि उन दोनों की एकदूसरे से अकसर बातें होती रहती थीं. इस घटना से पहले भी दोनों की बातें हुई थीं. पुलिस उस वक्त और ज्यादा चौंकी, जब शफीकुल के मोबाइल की लोकेशन रात के 11 बजे गुप्तेश्वर पहाड़ी के जंगल की मिली.

इस का मतलब हत्या वाली रात वह गुप्तेश्वर पहाड़ी के जंगल में ही था. पुलिस के शक की सुई उसी पर जा कर ठहर गई. पुलिस टीम ने आरोपी के बिलौआ, ग्वालियर में स्थित घर पर दबिश डाली तो वह अपने  घर से नदारद मिला, जिस से पुलिस का शक और बढ़ गया. उस की तलाश के लिए पुलिस ने अपने मुखबिरों को अलर्ट कर दिया. तब एक मुखबिर ने आरोपी शफीकुल के बारे में एक महत्त्वपूर्ण जानकारी थानाप्रभारी को दी.

इस के बाद थानाप्रभारी अपनी टीम के साथ मुखबिर द्वारा बताए स्थान बिजली घर रोड गोल पहाडि़या पर पहुंच गए. वहां से उन्होंने शफीकुल को हिरासत में ले लिया.

पुलिस को देखते ही शफीकुल की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई थी. उस ने बिना किसी हीलहुज्जत के अपना अपराध स्वीकार करते हुए सविता की हत्या के पीछे की सारी सच्चाई बयां कर दी.

पुलिस ने शफीकुल की निशानदेही पर खून से सने कपड़े और हत्या में प्रयुक्त उस्तरा भी बरामद कर लिया.

शफीकुल पश्चिम बंगाल का रहने वाला था और 14 साल पहले वहां से भाग कर ग्वालियर के कस्बा बिलौआ आया था. वह सविता के पति प्रकाश के साथ महाकालेश्वर स्टोन क्रेशर की खदान में काम करता था, इसलिए प्रकाश का अच्छा दोस्त बन गया था.

प्रकाश की मौत के बाद शफीकुल ने प्रकाश के बच्चों और पत्नी सविता की खैरखबर लेने के बहाने नजदीकी बढ़ा ली और काफी देर तक सविता के बच्चों से बतियाता रहता था. उस की बातचीत का यह सिलसिला तभी टूटता, जब सविता उस के लिए चाय बना कर ले आती.

एक दिन सविता ने चाय की प्याली उस के हाथ में थमाते हुए मुसकरा कर कहा, ‘‘शफीकुल भाई, क्या आप सिर्फ बच्चों से ही बतियाते रहोगे? हम से बात नहीं करोगे?’’

‘‘क्यों मजाक कर रही हो भाभी, अगर आप को सच में मुझ से बात करनी होती तो इतनी दूरदूर न रहती,’’ शफीकुल ने सविता को ऊपर से नीचे तक गहरी नजरों से देखते हुए जवाब दिया.

शफीकुल का जवाब सुन सविता के चेहरे पर दिलकश मुसकान दौड़ गई. उस की निगाहें शफीकुल की चौड़ी छाती और बलिष्ठ भुजाओं का मुआयना करने लगीं, क्योंकि पति की मौत के बाद तन्हा जिंदगी उसे उबाऊ लगने लगी थी. दिन तो मंडी में काम में कट जाता था पर रातें कटनी मुश्किल थीं.

महीनों से अतृप्त सविता की देह समुद्री ज्वार की तरह ठाठे मारमार कर शफीकुल से संसर्ग करने को उकसाने लगी. सविता सोचने लगी कि शफीकुल सचमुच कुंवारा और एकदम जिंदादिल मर्द है. उस की बाहों में अलग ही आनंद आएगा.

अभी सविता यह सब सोच ही रही थी कि शफीकुल ने चारपाई से उठते हुए कहा, ‘‘अच्छा भाभी, अब मैं चलता हूं.’’

सविता तुरंत बोल पड़ी, ‘‘शफीकुल, कल कुछ जल्दी आना, तुम्हारे देर से आने की वजह से बच्चों के सामने मुझे तुम से बात करने का मौका ही नहीं मिलता.’’

सविता ने जिस अदा और अंदाज से यह बात कही, उस से शफीकुल के दिल में कुछकुछ होने लगा. वह मुसकराते हुए अपनी मोटरसाइकिल पर सवार हो कर अपने घर चला गया.

उस दिन के बाद शफीकुल नियमित रूप से बच्चों से मिलने के बहाने सविता के घर आने लगा. शफीकुल की जाति ही नहीं धर्म भी अलग था, इस के बावजूद सविता ने उस में ऐसा न जाने क्या देखा कि उस का मन उस पर रीझ गया.

नियमित रूप से सविता के घर इस आवाजाही से जहां सविता के दोनों बच्चे उस से काफी घुलमिल गए थे, वहीं उसे सविता पर डोरे डालने का भरपूर मौका मिल गया.

2 बच्चों की मां होने के बाद भी सविता के शरीर में कसाव था, ऊपर से वह बनसंवर कर रहती  थी.

शफीकुल ने पहले सविता से हंसीमजाक शुरू की, फिर थोड़ीबहुत शारीरिक छेड़खानी भी करने लगा. लेकिन सविता को इतने से संतोष नहीं हुआ. वह चाहती थी कि शफीकुल और आगे बढ़े.

संकोच और डर की वजह से शफीकुल ज्यादा आगे नहीं बढ़ पा रहा था तो सविता ने खुद ही पहल करने का फैसला ले लिया. एक दिन ऐसा भी आया, जब दोपहर को शफीकुल सविता के  घर जा पहुंचा. दरवाजे पर पहुंच कर हलकी सी दस्तक दी और हौले से दरवाजा धकेला. दरवाजा खुद ही अंदर की तरफ खुल गया.

उस वक्त दोनों बच्चे स्कूल गए हुए थे. दरवाजे से ही उस ने आवाज दी, ‘‘भाभी, कहां हो?’’

सविता भीतर चारपाई पर लेटी हुई थी. शफीकुल की आवाज सुन कर वह बोली, ‘‘मैं भीतर वाले कमरे में हूं. दरवाजे की कुंडी बंद कर के यहीं चले आओ. दरवाजा ठीक से बंद कर देना, वरना बिल्ली चौके में घुस जाएगी और सारा दूध पी जाएगी. आज मेरी तबीयत कुछ खराब है.’’

शफीकुल ने दरवाजा बंद कर के कुंडी लगा दी और सीधे भीतर वाले कमरे में जा पहुंचा. उस ने देखा सविता अस्तव्यस्त लेटी हुई थी. उस की साड़ी, पेटीकोट जांघ तक सरका हुआ था. ब्लाउज के ऊपरी हुक भी खुले हुए थे. बेताब हुस्न अपने जलवे दिखा रहा था.

सविता का उघड़ा बदन देख कर उत्तेजना से शफीकुल का हलक सूखने लगा. बड़ी मुश्किल से थूक निगल कर वह बोला, ‘‘भाभी, कल तो तुम बिलकुल ठीक थी, फिर अचानक तुम्हारी तबीयत कैसे खराब हो गई?’’

कह कर शफीकुल चारपाई के सिरहाने बैठ कर सविता के माथे पर हाथ रख बोला, ‘‘भाभी तुम्हें बुखार तो नहीं है, फिर क्या तकलीफ है?’’

‘‘बुखार तो बदन में चढ़ा हुआ है, पर तुम्हें एहसास नहीं हो रहा,’’ कहते हुए सविता ने शफीकुल का हाथ थाम लिया. फिर उसे हौलेहौले सहलाने लगी.

अब उस का इरादा शफीकुल की समझ में आने लगा. सविता उस का हाथ अपने वक्ष के ऊपर रखते हुए बोली, ‘‘अंदर हाथ डाल कर तो देखो, तब तुम्हें पता चलेगा कितना बुखार चढ़ा हुआ है.’’

‘‘भाभी, अभी सारा बुखार उतार देता हूं, क्यों परेशान हो रही हो.’’ कहते हुए उस ने सविता के ब्लाउज के बाकी हुक भी खोल दिए.

सविता के सुडौल वक्ष अब पूरी तरह आजाद हो चुके थे. शफीकुल ने उन्हें हाथों में भर कर आहिस्ताआहिस्ता दबाना शुरू किया तो सविता को भी मजा आने लगा.

जिस्म की आग ने सविता को इतना झुलसा रखा था कि वह सारी लोकलाज, मानमर्यादा भूल गई थी.

सविता से चारपाई पर लिपटा शफीकुल धीरेधीरे मदहोश हो रहा था, उत्तेजना से उस का भी जिस्म आग सा तप रहा था. सविता के वक्ष का मर्दन करतेकरते उस ने फुसफुसा कर पूछा, ‘‘भाभी, बुखार कुछ कम हुआ?’’

‘‘हां,’’ सविता ने स्वीकारते हुए कहा, ‘‘मुआ छाती से नीचे उतर गया है.’’

‘‘चिंता मत करो भाभी,’’ शफीकुल उस की साड़ी पलटते हुए बोला, ‘‘मुझे मालूम है कि छाती का ताप जब नीचे उतर जाए तो उसे कैसे कम किया जाता है.’’

कुंवारेपन से उस ने ऐसे ही ठोस जवाब की तमन्ना की थी. शफीकुल उस की कसौटी पर एकदम खरा उतरा.

शफीकुल सविता से 10 साल छोटा था, लेकिन उस का गठीला बदन सविता को भा गया, उस ने अपनी मर्दानगी के ऐसेऐसे जौहर दिखाए कि सविता की कलीकली खिल गई.

अवैध संबंधों की राह एक मर्तबा खुली तो शफीकुल और सविता अकसर वासना के कुंड में गोते लगाने लगे. सविता अब हरदम खिलीखिली रहने लगी थी.

इसी तरह महीनों बीत गए, उन दोनों के अवैध संबंधों की किसी को भनक तक नहीं लगी. शफीकुल सविता के सान्निध्य में मस्त था. उधर शफीकुल ने सविता के दिल में अपने लिए जगह बना ली, सविता शफीकुल की ऐसी दीवानी हुई कि सुबह से शाम तक उसी के खयालों में खोई रहने लगी.

सविता अपने घर में एक बेटी और एक बेटे के साथ रहती थी. उसे रोकनेटोकने वाला कोई न होने की वजह से वह पूरी तरह से स्वच्छंद हो गई थी.

उसे अपने प्रेमी को घर में बुलाने के लिए किसी मौके की जरूरत नहीं रहती थी. जब भी दोनों का जिस्म वासना की आग मे दहकने लगता तो दोनों अपनी हसरतें पूरी कर लेते थे.

वक्त गुजरता रहा, प्रेमी के साथ मौजमस्ती करते 9 साल बीत गए. इन 9 सालों में सविता और शफीकुल खूब खुल कर खेले. अवैध संबंध छिपते कहां हैं सविता और शफीकुल के साथ भी ऐसा ही हुआ.

बंजारा बस्ती वालों को ही नहीं, रिश्तेदारों को भी सविता और शफीकुल के नाजायज रिश्तों की जानकारी हो गई, इस के बावजूद भी दोनों ने किसी की परवाह नहीं की और पापलीला करते रहे.

सविता के बेटे के जन्मदिन के मौके पर शफीकुल ने सविता को बाजार ले जा कर जम कर खरीदारी भी कराई थी.

बाजार से सामान खरीद कर दोनों जैसे ही घर वापस आए, सविता का कोई जानपहचान वाला उस से मिलने आ गया. उसे देख कर शफीकुल का माथा ठनका.

उसे सविता के साथ बातचीत में मशगूल होते देख शफीकुल उस के घर से अपने घर बिलौआ वापस लौट गया था. उसे शक हो गया कि यह जरूर सविता का कोई यार ही होगा. अपने घर पहुंच कर उस ने धोखेबाज सविता को ठिकाने लगाने की योजना बना ली थी.

दरअसल, शफीकुल के दिमाग में शक का कीड़ा घर कर गया था. वह अपनी प्रेमिका सविता के चरित्र पर शक करने लगा था. उसे शक हो गया कि सविता के किसी और युवक के साथ भी संबंध हैं. शफीकुल के शक्की स्वभाव ने उसे शैतान बना दिया था.

26 फरवरी, 2022 को जब उसे लगा कि सविता के दोनों बच्चे सोने चले गए होंगे तो उस ने अपनी योजनानुसार रात 11 बजे सविता को फोन कर उसे बात करने के बहाने गुप्तेश्वर पहाड़ी के जंगल में बुलाया.

जैसे ही सविता अपने घर से शौच के बहाने शफीकुल की बताई जगह पर पहुंची, हैवान बने शफीकुल ने अपनी प्रेमिका पर जरा भी दया न दिखाते हुए उस का उस्तरे से गला रेत कर उसे मौत के घाट उतार दिया.

इस के बाद जब शफीकुल को पूरी तरह इत्मीनान हो गया कि सविता मर चुकी है तो उस ने खून से सने हाथ और मुंह पर लगे खून के दागों को रास्ते में एक नल पर साफ किया और अपने घर जा कर बिस्तर पर लेट गया.

सवा 4 बजे उस ने उस्तरा और खून लगे अपने कपड़ों को साथ लिया और घर से ग्वालियर के लिए निकल पड़ा. यह संयोग ही था कि उसे आते हुए किसी ने नहीं देखा था. फिर ग्वालियर आ कर उस ने उस्तरा और कपड़े छिपा दिए. इस के बाद दिन निकलने का इंतजार करने लगा.

सुबह का उजाला होने पर वह सविता के घर से अपनी प्रेमिका की हत्या होने की सूचना मिलने का इंतजार करने लगा था. सूचना मिलते ही वह सविता के घर पहुंच कर दुखी होने का नाटक करने लगा.

वहां मौजूद शोकग्रस्त लोगों में से किसी को अंदाजा नहीं था कि शफीकुल इतना जघन्य अपराध भी कर सकता है. उस ने नाटक तो बहुत बढि़या किया था, लेकिन पुलिस के शिकंजे से बच नहीं सका.

जनकगंज थाने के प्रभारी संतोष यादव ने इस अंधे कत्ल को पहली तफ्तीश में ही 6 घंटे के भीतर कातिल के गिरेबान पर हाथ डाल कर सुलझा दिया.

सविता की हत्या का जुर्म शफीकुल कुबूल कर चुका था और पुलिस ने उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त उस्तरा और खून से सने कपड़े भी बरामद कर लिए थे.

थानाप्रभारी ने सविता के भाई परमाल बंजारा की तरफ से शफीकुल के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर अभियुक्त शफीकुल को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

सविता के 10 और 14 वर्षीय दोनों बच्चों को उन के मामा परमाल बंजारा अपने घर ले गए थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

एक तरफा प्यार में जिंदा जल गई अंकिता: भाग 1

शाहरुख के खौफ से बेहद डरीसहमी अंकिता महीनों से तनाव में थी. गलीमोहल्ले से ले कर घर तक पीछा करने वाले शाहरुख के कड़वे, तीखे बोल मोबाइल फोन तक से जबतब कानों में गूंजने लगते थे. रात के अंतिम पहर में शाहरुख ने जो कदम उठाया, वह अमानवीय और रूह कंपा देने वाला अपराध था. पैट्रोल से जिंदा जलाई गई अंकिता ने अंतिम सांस लेते हुए कहा था, ‘‘जैसे मैं मर रही हूं, वैसी ही मौत उसे दी जाए.’’

झारखंड के दुमका में सोमवार 22 अगस्त, 2022 की सुबह अंकिता की आंखें सूर्योदय के बाद तब खुली थीं, जब बंद खिड़की की टूटी किवाड़ से सूर्य की किरणें सीधे उस के चेहरे पर पड़ने लगी थीं. बिस्तर छोड़ते ही उस की नजर खिड़की की टूटी किवाड़ पर गई, जिसे उस ने रात को सोने से पहले सहारा दे कर लगा दिया था.

कुछ सोच कर खिड़की के पास जा कर उसे देखते हुई बुदबुदाने लगी, ‘‘इसे आज ही बनवाने के लिए पापा से बोलना होगा. लेकिन पापा टूटने का कारण पूछेंगे, तब वह उन से क्या बोलेगी?’’

और फिर वह उस के टूटने के कारण को याद कर सिहर गई.

दरअसल, घर के पिछवाड़े की ओर आनेजाने की आम रास्ते की गली में खुलने वाली खिड़की की किवाड़ टूटी नहीं, बल्कि तोड़ी गई थी. उसे एक दिन पहले ही मोहल्ले के शाहरुख नाम के युवक ने ही तोड़ डाला था.

शाहरुख के रहनसहन, उद्दंड बातव्यवहार और मिजाज के साथ पढ़ाकू अंकिता के शांत सौम्य स्वभाव का कोई मेल नहीं था. वह झारखंड के मिश्रित समुदाय की आबादी वाले एक चर्चित शहर दुमका के जरुआडीह मोहल्ले में रहती थी. वहां हिंदू और मुसलमानों की मिलीजुली आबादी है.

उस के पिता संजीव सिंह एक बिसकुट कंपनी में सेल्समैन थे. मां की एक साल पहले मौत हो गई थी. घर में पिता, दादा और 12 साल के छोटे भाई हैं और बड़ी बहन की शादी हो चुकी है.

अंकिता सुंदर और अपने पारिवारिक संस्कारों में बंधी एक आज्ञाकारी क्षत्रिय समाज की लड़की थी. वह घर से बाहर ट्यूशन पढ़ने या किसी जरूरी काम के लिए ही निकलती थी. बाकी समय में घर में दादादादी और भाई के साथ समय बिताती थी. वह अपने करियर को ले कर भी चिंतित रहती थी. उस की तमन्ना आईपीएस बनने की थी.

शाहरुख उसी मोहल्ले में रहता था. उस की छवि एकदम से फिल्मी और मटरगश्ती करने वाले नवयुवक जैसी थी. वह खुद को बौलीवुड स्टार शाहरुख खान का हमशक्ल समझता था और उस जैसा पोज दे कर दोस्तों का मनोरंजन करता था.

वह दोस्तों के साथ ही सड़कोंगलियों में आतीजाती लड़कियों पर फब्तियां भी कसता रहता था. उन्हें टकटकी निगाह से निहारते हुए भद्दे कमेंट करने से भी बाज नहीं आता था.

वह लड़कियों के मोबाइल नंबर लेने की कोशिश में रहता था. सोशल साइटों पर दोस्ती करने और फोटो, वीडियो आदि शेयर किया करता था. तरहतरह के मजाकिया मीम्स बनाने में माहिर था.

उस ने अंकिता का भी मोबाइल नंबर हासिल कर लिया था. किसी भी लड़की को अकेली देख कर वह रोक लेता था और उस से बातें करने की कोशिश करना उस की बुरी आदतों में से एक थी.

कुछ महीने पहले उस ने एक बार ट्यूशन पढ़ने जा रही अंकिता को भी रास्ते में रोक लिया था. रोकते ही बोला, ‘‘तुम्हें अपनी सुंदरता पर बहुत घमंड है क्या? मैं क्या कम हैंडसम हूं?’’

अंकिता जवाब में कुछ नहीं बोली, लेकिन पीछे से स्कूटी पर आ रही सहेली ने उसे अपने साथ बैठा लिया था. उस के जाते ही पीछे से शाहरुख चिल्लाया, ‘‘देख लेना, तुम्हारा घमंड मैं एक दिन तोड़ दूंगा. प्यार करता हूं तुम से… कोई ऐरागैरा नहीं हूं मैं.’’

‘‘तू उस के बारे में अपने पापा से शिकायत क्यों नहीं करती? बड़ा बदतमीज है. मोहल्ले में रहता है इस का मतलब यह तो नहीं कि वह राह चलती लड़कियों को छेड़ेगा?’’ स्कूटी चला रही अंकिता की सहेली ने उस से कहा.

अंकिता जवाब में कुछ नहीं बोली. वह चुप रही. वह जानती थी कि शाहरुख उस के पीछे कई हफ्ते से पड़ा हुआ है. जब भी मिलता है, उस से प्यार करने का दावा करता है. अंकिता किसी न किसी बहाने से उस से बच कर निकल जाती थी.

उस रोज एकदम से उस का सामना हो गया था. हालांकि सहेली की बदौलत वह उस रोज भी बच गई थी.

उसी दिन जब अंकिता घर आई तब उस के मोबाइल पर वीडियो काल आया. उस ने रिसीव नहीं किया, कारण काल अनजाना था. फिर उस के वाट्सऐप मैसेज पर वायस मैसेज आया, ‘काल भले ही नहीं रिसीव करो, लेकिन वायस मैसेज सुन लो. मैं तुम्हें चाहता हूं तो चाहता हूं. मुझे तुम से प्यार करने से कोई नहीं रोक सकता. तुम भी नहीं.’ मुश्किल से 7 सेकेंडके शाहरुख के इस वायस मैसेज ने अंकिता को भीतर से झकझोर दिया था.

उस के दिमाग में खलबली मच गई थी, ‘शाहरुख मोहल्ले का आवारा किस्म का लड़का और मुसलिम. कोई क्या सोचेगा, उस के साथ संबंध के बारे में. बदनामी उस की ही होगी. लोग उसे ही मां के नहीं होने पर बदचलन लड़की बोलेंगे. और मोहल्ले वाले तो ऐसे ही हैं दूसरे की मजबूरियों और मुसीबतों में टांग अड़ाने की ताक में रहते हैं. बगैर सच जाने हुए टीकाटिप्पणी करने से पीछे नहीं हटते. बात का बतंगड़ बना देते हैं…’

मैं सिर्फ बार्बी डौल नहीं हूं- भाग 3: क्या थी परी की कहानी

इसी बीच एक सुबह उस ने अपनी ठोड़ी के आसपास काले बालों को देखा. बाल काफी सख्त भी थे. उस की आंखों से झरझर आंसू बहने लगे. नहाते हुए ऐसे ही बाल उस ने नाभि के आसपास भी देखे. वह घंटों बाथरूम में बैठी रही.

बाहर मनीष उस का इंतजार कर रहा था. जब आधा घंटा हो गया तो उस ने दरवाजा खटखटाया. परी बाहर तो आ गई पर ऐसा लगा जैसे वह बहुत थकी हुई हो.

मनीष उसे इस हालत में देख कर घबरा उठा. बोला, ‘‘क्या हुआ परी? ठीक नहीं लग रही. क्या घर की याद आ रही है?’’

परी फफक उठी. वह अपने ऊपर रो रही थी. उस की समझ में कुछ नहीं आ रहा था.

कवींद्रजी भी वहीं आ गए और मनीष को डांटते हुए बोले, ‘‘नालायक, तुम ने ही कुछ किया होगा,’’ फिर परी से बोले, ‘‘बेटा, तुम इस की बात का बुरा मत मानो. मैं तुम्हें आज ही तुम्हारे मम्मीपापा के पास भेजने का इंतजाम करता हूं.’’

अचानक से परी का मूड बदल गया. उसे लगा वहां वह खुल कर सांस ले पाएगी.

शाम को फ्लाइट में बैठते हुए उसे ऐसा लग रहा था मानो वह एकदम फूल की तरह हलकी हो गई है.

घर पहुंचते ही मम्मी ने उसे गले से लगा लिया. पापा भी उसे देखते ही खिल गए.

मम्मी ने रात के खाने में सबकुछ उस की पसंद का बनाया. परी का बुझाबुझा चेहरा उन से छिपा न रहा. रात को परी के कमरे में जा कर परी की मम्मी ने प्यार से पूछा, ‘‘परी क्या बात है, मनीष की याद आ रही है?’’

जवाब में परी फूटफूट कर रोने लगी और सारी बातें बता दीं.

कुछ देर रोने के बाद संयत हो कर परी बोली, ‘‘मम्मी, मैं अपने अंदर होने वाले बदलावों से परेशान हूं. मेरी ससुराल में हर वक्त सुंदर और परफैक्ट दिखने की तलवार लटकी रहती है. परेशान हो चुकी हूं मैं.’’

मम्मी उस के सिर पर तब तक प्यार से हाथ फेरती रहीं जब तक वह गहरी नींद में सो न गई. अगले दिन तक परी काफी हद तक संभल गई थी.

मम्मी उस से बोलीं, ‘‘परी, मुझे पता है तुम जिंदगी के बदलावों से परेशान हो, पर अगर समस्या है तो समाधान भी होगा. तुम चिंता मत करो हम आज ही किसी महिला विशेषज्ञा के पास चलेंगे.’’

डाक्टर ने सारी बातें बहुत ध्यान से सुनीं और फिर कुछ टैस्ट लिखे. अगले दिन रिपोर्ट भी आ गई. रिपोर्ट में पता चला परी को ओवरी की समस्या है, जिस में ओवरी के अंदर छोटेछोटे सिस्ट हो जाते हैं. डाक्टर ने रिपोर्ट देखने के बाद बताया कि परी को पौलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम है, जो हारमोनल बदलाव की वजह से हो जाता है.

इस के प्रमुख लक्षण हैं- चेहरे पर अत्यधिक मुंहासे, माहवारी का अनियमित होना, शरीर और चेहरे के किसी भी भाग पर अनचाहे बाल होना बगैरा.

ये सब बातें सुनने के बाद परी को ध्यान आया कि पिछले कुछ महीनों से उसे माहवारी में भी बहुत अधिक स्राब हो रहा था. डिप्रैशन, वजन का बढ़ना और बिना किसी ठोस वजह के छोटीछोटी बातों पर रोना भी पौलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम के दूसरे लक्षण हैं.

जब परी ने इस सिंड्रोम के बारे में गूगल पर सर्च किया तो उस ने देखा कि इस सिंड्रोम के कारण महिलाओं को मां बनने में भी समस्या हो जाती है. ये सब पढ़ कर वह चिंतित हो उठी. जब परी की मम्मी ने देखा कि परी 2 दिन से गुमसुम बैठी है तो उन्होंने मनीष को कौल किया और सारी बात बताई.

अगले दिन ही मनीष परी के घर आ गया. मनीष को देख कर परी फूटफूट कर रोने लगी और बोली, ‘‘मनीष, मैं तुम्हारे लायक नहीं हूं.

मैं अब खूबसूरत नहीं हूं और शायद मां भी नहीं बन पाऊंगी.’’

मनीष बिना कुछ बोले प्यार से उस का सिर सहलाता रहा.

अगले दिन वह परी को साथ ले कर उसी डाक्टर के पास गया और डाक्टर के साथ बैठ कर ध्यानपूर्वक हर चीज को समझने की कोशिश की.

रात को खाने के समय मनीष ने परी के मम्मीपापा से कहा, ‘‘मैं बहुत शर्मिंदा हूं कि परी इस दौर से गुजर रही थी और मैं समझ नहीं पाया उलटे उस पर रातदिन एक खूबसूरत और जिम्मेदार बहू होने का दबाव डालता रहा.’’

‘‘कल मैं अपनी परी को ले कर जा रहा हूं पर इस वादे के साथ कि अगली बार वह हंसतीखिलखिलाती नजर आएगी.’’

रातभर परी मनीष से चिपकी रही और पूछती रही कि वह उस से बेजार तो नहीं हो जाएगा? पीसीओएस के कारण परी की त्वचा

के साथसाथ बाल भी खराब होते जा रहे थे.

उस का वजन भी पहले से अधिक हो गया था और 2 ही माह में वह अपने खोल में चली गई थी.

मनीष ने परी के किसी सवाल का कोई जवाब नहीं दिया. अगले रोज घर पहुंच कर उस ने अपने मातापिता को भी बताया. शकुंतला जहां इस बात को सुन कर नाखुश लगीं, वहीं कवींद्र चिंतित थे. परी दुविधा में बैठी थी.

मनीष बोला, ‘‘परी, यह सच है तुम्हारी खूबसूरती के कारण ही मैं तुम्हारी तरफ आकर्षित हुआ था पर यह भी झूठ नहीं होगा कि प्यार मुझे तुम्हारी ईमानदारी और भोलेपन के कारण ही हुआ. तुम जैसी भी हो मेरी नजरों में तुम से अधिक खूबसूरत कोई नहीं है.

‘‘अगर कल को मैं किसी दुर्घटना के कारण अपने हाथपैर खो बैठूं या कुरूप हो जाऊं तो क्या तुम्हारा प्यार मेरे लिए कम हो जाएगा?’’

परी की आंखों से झरझर आंसू बहने लगे. वह कितनी गलत थी मनीष को ले कर? वह क्यों अंदर ही अंदर घुटती रही.

मनीष परी को गले लगाते हुए बोला, ‘‘यह कोई बीमारी नहीं. थोड़ी सी मेहनत और ध्यान रखना पड़ेगा. तुम एकदम ठीक हो जाओगी.’’

परी यह सुन कर हलका महसूस कर रही थी.

5 महीने तक परी डाक्टर की देखरेख में रही, जीवनशैली में बदलाव कर और मनीष के हौसले ने उस में नई ऊर्जा भर दी थी. इस दौरान परी का वजन भी घट गया और त्वचा व बाल फिर से चमकने लगे.

शकुंतला की बातों पर परी अब अधिक ध्यान नहीं देती थी, क्योंकि उसे पता था कि उस का और मनीष का रिश्ता दैहिक स्तर से परे है. संबल मिलते ही उस के हारमोंस धीरेधीरे सामान्य हो गए और 1 साल के बाद परी और मनीष के संसार में ऐंजेल आ गई.

परी ने मां बनने के बाद अब खुद का ब्लौग आरंभ कर दिया है. ‘मैं कौन हूं,’ जिस में वह अपने अनुभव तमाम उन महिलाओं के साथ साझा करती है, जो इस स्थिति से जूझ रही हैं. पौलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम से जुड़ी हर छोटीबड़ी बात को परी इस ब्लौग में साझा करती है. चेहरे और शरीर पर अनचाहे बाल, ऐक्ने और वजन से परे भी एक महिला की पहचान है, यह परी के ब्लौग का उद्देश्य है. परी का यह ब्लौग ‘मैं कौन हूं’ तमाम उन महिलाओं को समर्पित है जिन का सौंदर्य शरीर और चेहरे तक सीमित नहीं है. उन की पहचान उन के विचारों और जुझारू किरदारों से है.

मैं सिर्फ बार्बी डौल नहीं हूं- भाग 2: क्या थी परी की कहानी

उषा की किरणों ने जैसे ही कमरे के अंदर प्रवेश किया, मनीष प्यार से अपनी बार्बी डौल के गाल थपथपाने लगा. पर यह क्या, मनीष एकदम बोल उठा, ‘‘परी, तुम्हारे गाल पर यह क्या हो रहा है?’’

परी घबरा कर उठ बैठी और बोली, ‘‘मनीष सौरी वह कल से पता नहीं क्यों ये दाने हो गए हैं.’’

दरअसल, वे दाने भयावह रूप से मुखर हो उठे थे और रहीसही कसर तनाव ने पूरी कर दी थी.

मनीष बिना किसी हिचकिचाहट के परी के करीब आया और बोला, ‘‘ये तो ठोड़ी पर भी हैं. आज डाक्टर को दिखा कर आना.’’

परी बहुत ज्यादा चिंतित हो उठी थी. उसे अपनी बेदाग त्वचा पर बहुत गुमान था. अब ये दाने…

रात में प्रेम क्रीड़ा के दौरान भी परी के मन में अनकहा तनाव ही व्याप्त रहा. सुबहसवेरे ही उठ कर वह नहा ली. हलकी गुलाबी रंग की साड़ी उस के रंग में मिलजुल गई थी. साथ में उस ने मोतियों की माला और जड़ाऊ झुमके पहने. फिर आईने के आगे खड़ा हो कर गहरे फाउंडेशन की परतों में अपने दानों को छिपा लिया. अब पूरी तरह से अपनेआप से संतुष्ट थी.

बाहर आ कर देखा तो शकुंतला गाउन में घूम रही थीं. अपनी बहू का खिला चेहरा देख कर वे प्रसन्न हो गईं.

शकुंतला ने परी का माथा चूम लिया. परी रसोई की तरफ चली गई और नाश्ते की तैयारी करने लगी.

तभी शकुंतला आईं और अभिमान से बोलीं, ‘‘परी, तुम आराम करो. हमारे यहां बहू बस रसोई में हाथ ही लगाती है. सारे काम के लिए ये नौकरचाकर हैं ही.’’

परी ने चाय का पानी चढ़ाया और बाहर आ कर बैठ गई. शकुंतला भी उस के सामने आ कर बैठ गईं और उसे पैनी नजरों से दखते हुए बोलीं, ‘‘परी, तुम्हें बस सुंदर लगना है. इसी कारण से तुम इस घर की बहू बनी हो.’’

परी असमंजस में बैठी रही. उस का मन बहुत उदास हो चला था. यों 24 साल की परी आत्मविश्वास से भरपूर युवती थी. मनीष से पहले भी उस की जिंदगी में कई युवक आए और गए, पर मनीष के आने के बाद उस के जीवन में स्थिरता आ गई थी.

दोनों के परिवार वालों को इस रिश्ते से कोई परेशानी नहीं थी. कम से कम परी को तो पता था. पर यह तो उसे विवाह के बाद ही पता चला कि मनीष के मातापिता ने उसे पूरे दिल से स्वीकार नहीं किया था.

वह बुझे मन से अंदर चली गई. एक अनकहा भय उसे घेरे हुए था. इतना डर तो उसे किसी ऐग्जाम में भी नहीं लगा था.

तभी जिया अंदर आ गई. वह मनीष की मौसी की बेटी थी और रिश्ते में उस की ननद. जिया बेहद खूबसूरत थी और कालेज के सैकंड ईयर में पढ़ रही थी. चिडि़या की तरह चहकते हुए वह बोली, ‘‘भाभी, चलो आज मूवी देखने चलते हैं. आप की बात भैया कभी नहीं टालेंगे.’’

मनीष उस को चपत लगाते हुए बोला, ‘‘मुझ से नहीं बोल सकती? चलो फिर भाभी ही ले जाएगी तुम्हें…’’

दोनों पूरे कमरे में धमाल मचा रहे थे. न जाने क्यों ये सब देख कर परी की आंखों में आंसू आ गए. सबकुछ अच्छा है फिर भी बंधाबंधा महसूस हो रहा था.

जिया एकाएक सकपका सी गई. मनीष भी परी के करीब आ कर प्यार से उस का सिर सहलाने लगा और बोला, ‘‘परी घर जाना है तो आज ले कर चलता हूं.’’

परी बोली, ‘‘मनीष न जाने क्यों थकावट सी महसूस हो रही है. लगता है पीरियड्स शुरू होने वाले हैं.’’

जिया तब तक अपनी प्यारी भाभी के लिए एक गिलास जूस ले कर आ गई थी. परी का मन भीग गया और उस ने जिया को गले से लगा लिया. उसे लगा जैसे जिया के रूप में उस ने अपनी छोटी बहन को पा लिया हो.

शाम को मनीष के कहने पर परी जींस और कुरती पहन रही थी पर यह क्या जींस तो कमर में फिट ही नहीं हो रही थी. अभी 3 महीने पहले तक तो ठीक थी. झुंझला कर वह कुछ और निकालने लगी.

तभी मनीष बोला, ‘‘परी यह करवाचौथ टाइप की ड्रैस मत पहनो. जींस थोड़ी टाइट है तो क्या हुआ. पहन लो न.’’

परी ने मुश्किल से जींस पहन तो ली पर अपने शरीर पर आई अनावश्यक चरबी उस से छिपी न रही. वह जब तैयार हो कर बाहर निकली, तो मनीष मजाक में बोल ही पड़ा, ‘‘यार, तुम तो शादी के तुरंत बाद आंटी बन गई हो.’’

परी को यह सुन कर अच्छा नहीं लगा. तभी शकुंतला भी बाहर आ गईं और बोलीं, ‘‘परी खुद पर ध्यान दो और कल से ऐक्सरसाइज शुरू करो.’’

उस दिन परी फिल्म का आनंद न ले पाई. एक तो जरूरत से ज्यादा टाइट कपड़ों के कारण वह असहज महसूस कर रही थी, दूसरे बारबार परफैक्ट दिखने का प्रैशर उसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा था.

अपने शरीर में आए बदलावों से वह परेशान थी. ऐसे में उसे दुलार और प्यार की आवश्यकता थी. पर उस के नए घर में उसे ये सब नहीं मिल पा रहा था.

रात को उस ने मनीष को अपने करीब न आने दिया. मनीष रातभर उसे हौलेहौले दुलारता रहा. सुबह परी की बहुत देर से आंखें खुलीं. वह जल्दीजल्दी नहा कर जब बाहर निकली तो देखा, नाश्ता लग चुका था.

वह भी डाइनिंगटेबल पर बैठ गई. कवींद्र ने परी की तरफ देख कर चिंतित स्वर में कहा, ‘‘परी बेटा, यह क्या हो रहा तुम्हारे चेहरे पर?’’

एकाएक परी को याद आया कि वह आज मेकअप करना भूल गई.

शकुंतला भी बोलीं, ‘‘मनीष आज परी को डाक्टर के पास ले जाओ. चेहरे पर तिल के अलावा किसी भी तरह के निशान अच्छे नहीं लगते हैं.’’

मनीष भी परी को ध्यान से देख रहा था. परी को एकदम से ऐसा महसूस हुआ जैसे वह एक स्त्री नहीं एक वस्तु है.

शाम को जब मनीष और परी डाक्टर के पास गए, तो डाक्टर ने सबकुछ जानने के बाद दवाएं और क्रीम लिख दी.

1 महीना बीत गया पर दानों ने धीरेधीरे परी के पूरे चेहरे को घेर लिया था. परी आईने के सामने जाने से कतराने लगी. उस का आत्मविश्वास कम होने लगा था. वह सब से नजरें चुराने लगी थी. ऊपर से रातदिन शकुंतला की टोकाटाकी और मनीष का कुछ न बोल कर अपनी मां का समर्थन करना उसे जरा भी नहीं भाता था.

औफिस में भी लोग उसे देखते ही सब से पहले यही बोलते, ‘‘अरे, यह क्या हुआ तुम्हारे  चेहरे पर?’’

परी मन ही मन कह उठती, ‘‘शुक्रिया बताने का… आप न होते तो मुझे पता ही नहीं चलता…’’

परी के विवाह को 2 महीने बीत गए थे.

इस बीच घर, नए रिश्ते और औफिस की जिम्मेदारी के बीच बस वह एक ही बार अपने मायके जा पाई थी. परी का जब से विवाह हुआ था वह एक तनाव में जी रही थी. यह तनाव था हर समय खूबसूरत दिखने का, हर समय मुसकराते रहने का, हर किसी को खुश रखने का और इन सब के बीच परी कहीं खो सी गई थी. वह जितनी कोशिश करती कहीं न कहीं कमी रह ही जाती.

सेक्स की सनक: क्या था सोफे में छिपाई लाश का राज

सत्यकथा

मुंबई से सटे ठाणे स्थित चर्चित कालोनी डोंबीवली में ओम साईं रेजीडेंसी की एक बिल्डिंग में किशोर शिंदे का परिवार 14 फरवरी की सुबह तक काफी खुशहाल जिंदगी गुजार रहा था.

सुबहसुबह शिंदे अपने औफिस जाने की तैयारी कर रहे थे. पत्नी सुप्रिया उन के लिए नाश्ता लगा चुकी थी.

नाश्ता कर निकलते समय जब सुप्रिया ने अपने पति शिंदे को लंच का टिफिन पकड़ाया, तब उन की नजर पत्नी के उतरे हुए चेहरे पर ठहर गई. उन्होंने पूछा, ‘‘क्या बात है सुप्रिया, तुम सुस्त दिख रही हो?’’

‘‘हां, आज मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही है.’’ सुप्रिया धीमी आवाज में बोली.

‘‘घर का काम ज्यादा करने की आज जरूरत नहीं है. तुम आराम कर लो, कपड़े मशीन में डाल कर छोड़ देना, ड्यूटी से आ कर चला दूंगा… रात को कपडे़ धुल जाएंगे,’’ शिंदे ने कहा.

‘‘लेकिन श्लोक स्कूल जा चुका है, दोपहर को उसे लाना होगा.’’ सुप्रिया बोली.

‘‘कोई बात नहीं, स्वाति को बोल देना वह उसे अपने बच्चों के साथ ही लेती आएगी.’’

‘‘ठीक है, वैसे एकडेढ़ घंटे की नींद ले लूंगी, तब ठीक हो जाएगा. सिर दर्द ही तो है,’’ सुप्रिया बोली.

‘‘ठीक है. कुछ खाना खा कर सिरदर्द की दवा ले लेना. मैं निकलता हूं,’’ कहते हुए शिंदे अपना बैग और टिफिन ले कर मुंबई के लिए निकल पड़े. पहले वह लोकल ट्रेन पकड़ कर चर्चगेट जाते, फिर उन्हें बस ले कर औफिस तक जाना होता था.

परिवार में सदस्य के नाम पर सुप्रिया और उन का 10 साल का बेटा श्लोक था. बेटे का स्कूल हाल में ही खुला था. उसे लाने के लिए दोपहर में सुप्रिया उस के स्कूल तक जाती थी.

शाम के करीब साढ़े 4 बजे स्वाति ने शिंदे को फोन कर पूछा कि सुप्रिया श्लोक को लेने स्कूल क्यों नहीं आई? इस पर शिंदे अनमने भाव से बोले, ‘‘हां, सुबह उस ने बताया था कि उस की तबीयत थोड़ी ठीक नहीं है, इसलिए नहीं गई होगी. श्लोक घर आ गया न?’’

‘‘हां श्लोक तो मेरे साथ आ गया है, लेकिन घर पर मां को नहीं पा कर मुझ से ही उस के बारे में पूछने आया था. मेरे घर पर ही नाश्ता किया और अभी श्लोक दोस्तों के साथ ग्राउंड में खेलने गया हुआ है,’’ स्वाति बोली.

‘‘सुप्रिया घर पर नहीं है? वह कहां गई होगी?’’ शिंदे चिंतित हो कर बोले.

‘‘यही पूछने के लिए तो मैं ने आप को फोन किया है. उस का फोन भी नहीं मिल रहा है, मैं घर जा कर भी देख चुकी हूं. घर का दरवाजा भी बंद है. श्लोक का स्कूल बैग भी बाहर बरामदे में पड़ा है. भाईसाहब, मुझे तो डर लग रहा है, आप जल्द आ जाइए.’’ स्वाति घबराहट भरी आवाज में बोली.

‘‘घर पर भी नहीं है. फिर कहां गई होगी? दवा वगैरह लाने या डाक्टर के पास तो नहीं गई? कहीं तबीयत ज्यादा तो नहीं बिगड़ गई उस की? अभी मैं उसे फोन करता हूं.’’ शिंदे बोले और तुरंत सुप्रिया को मोबाइल पर फोन करने के लिए स्वाति का काल डिसकनेक्ट कर दिया.

शिंदे ने सुप्रिया को फोन मिलाया. लेकिन उस का फोन बंद आ रहा था. शिंदे चिंतित हो गए. तब उन्होंने पड़ोसी दोस्त को घर जा कर सुप्रिया का पता करने को कहा.

दोस्त ने भी 5 मिनट में आ कर वही सब बताया जो स्वाति ने कहा था. शिंदे ने फटाफट औफिस का बचा काम निपटाया और शाम के 7 बजे तक घर आ गए.

घर का दरवाजा भीतर से बंद था. बेटा श्लोक ग्राउंड से खेल कर घर आ चुका था. बरामदे में कुछ पड़ोसी भी जमा थे. सुप्रिया बाहर जाने पर अकसर घर की चाबी अपने पड़ोसी के पास छोड़ जाती थी. लेकिन उस रोज सुप्रिया ने ऐसा नहीं किया था.

इसे ले कर एक सवाल सभी के मन में कुलबुला रहा था कि आखिर सुप्रिया कहां है? खैर, शिंदे ने अपने बैग से घर के इंटरलौक की एक्सट्रा चाबी से मेन दरवाजा खोला. अंदर कमरे में उन के साथ कई लोग दाखिल हुए. भीतर का माहौल सामान्य था. कमरे में लाइटें जल रही थीं.

कुछ पल वे कमरे में रुके. उन की आंखें सुप्रिया को तलाश रही थीं. उन्होंने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से उस के बारे में पूछा. किसी ने भी सुप्रिया के बारे में कुछ भी बताने से इनकार कर दिया. यहां तक कि सभी ने कहा कि उन की उस रोज सुप्रिया से मुलाकात ही नहीं हुई थी.

शिंदे को मामला कुछ संदिग्ध लगा. वह अधिक समय गंवाए बगैर अपने खास दोस्तों के साथ डोंबीवली मानपाड़ा पुलिस थाने गए. थानाप्रभारी के पास जा कर उन्होंने सुप्रिया की गुमशुदगी की सूचना लिखवा दी.

इधर शिंदे के घर पर कुछ पड़ोसियों की नजर एक सोफे पर टिक गई, जो खिसका कर दोबारा उसी जगह पर सेट किए जाने जैसा दिख रहा था. ऐसा जमीन पर बने ताजा निशान से पता चल रहा था. लोगों को वह निशान कुछ संदिग्ध लगा.

वे यह नहीं समझ पाए कि सोफे को दीवार से सटा कर क्यों लगाया गया है, जबकि सुप्रिया इस के खिलाफ रहती थी. वह हमेशा दीवार पर निशान पड़ने से बचाने के लिए दीवार से थोड़ी दूरी बना कर रखती थी. जमीन पर भी कुछ निशान ऐसे बने हुए थे, जो अधूरी सफाई लगते थे.

पड़ोसियों में से एक ने सोफे को खींचने का प्रयास किया. वह भारी महसूस हुआ, खिसक नहीं पाया. जबकि वह बैड कम सोफा आसानी से खिसकाया जाने वाला था. सोफा ऊपर से गीला भी दिख रहा था. उसे 2 लोगों ने ताकत से जैसे ही खिसकाया, उस के नीचे का हिस्सा एक झटके में अपने आप बाहर की ओर निकल आया.

उसे देख कर सभी की आंखें फटी रह गईं. उस में सुप्रिया बेजान पड़ी थी. उसे सोफे में ठूंस कर डाला गया था. पैर मुड़े हुए थे. सिर आगे की ओर झुका और गरदन टेढ़ी थी. चेहरा आधा ही दिख रहा था.

इस की सूचना तुरंत पुलिस को दी गई. संयोग से शिंदे भी वहीं थे. पुलिस जिसे गुमशुदा के रूप में तलाश कर रही थी, उस के घर में ही मिलने की सूचना मिल गई थी. पुलिस टीम 10 मिनट में ही शिंदे को साथ ले कर आ गई.

पुलिस टीम में सीनियर इंसपेक्टर शेखर बागड़े, इंसपेक्टर अनिल पडवल, एपीआई मनीषा जोशी और अविनाश वनवे शामिल थे.

पुलिस के आला अधिकारियों की टीम के सामने सुप्रिया की लाश को सोफे से बाहर निकाला गया. उस के सिर पर चोट के निशान थे. मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया गया. मौके की प्रारंभिक काररवाई पूरी करने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई.

इस मामले की जानकारी एडिशनल पुलिस कमिश्नर (पूर्वी क्षेत्रीय संभाग) कल्याण के दत्तात्रेय कराले, डीसीपी सचिन गंजाल, और डोंबीवली डिवीजन के एसीपी जे.डी. मोरे को भी दे दी गई.

शिंदे और सभी पड़ोसियों समेत पुलिस के सामने कई सवाल खड़े हो चुके थे. उन में मुख्य थे कि सुप्रिया की हत्या किस ने की? उन की हत्या के पीछे कारण क्या हो सकता है? हत्यारा घर में घुस कर वारदत में सफल कैसे हो गया? क्या वह पहले से सुप्रिया को जानता था?

सुप्रिया की लाश को पोस्स्मार्टम के लिए भेजने से पहले की गई शुरुआती जांच में पुलिस ने हत्या के कुछ बिंदुओं को भी नोट किया.

प्राथमिक जांच रिपोर्ट के अनुसार पुलिस के सामने अनगिनत सवाल थे. सुप्रिया के सिर पर चोट के निशान थे. वहां खून फैला नजर आया था. गरदन नायलोन की रस्सी और केबल से टाइट बंधी हुई थी. गरदन पर छिलने जैसे जख्म के निशान थे.

इसी तरह पुलिस ने कमरे की जांच में पाया कि सोफे को अपनी जगह से हटाया गया था. सिर पर लगे चोट से निकले खून के निशान को फर्श से साफ कर दिया गया था. अपराधी ने वैसा एक भी निशान नहीं छोड़ा था, जिस से उस की पहचान हो सके.

घर का दरवाजा बंद होने का मतलब था कि अपराधी वारदात के बाद आराम से घर को बंद कर चला गया होगा. यानी अपराधी घर की बहुत सी जानकारियों से वाकिफ रहा होगा.

पुलिस ने जांच के सिलसिले में 37 वर्षीय किशोर शिंदे से भी पूछताछ की. उन्होंने बताया कि वे महाराष्ट्र में सतारा जिले के रहने वाले हैं. उन का पैतृक गांव सतारा जिले के कराड तहसील में है. उन की उसी जिले की सुप्रिया से 12 साल पहले शादी हुई थी.

वे पिछले साल ही इस रेजीडेंसी के फ्लैट में रहने आए थे. उन्होंने हाल में ही इसे खरीदा था. इस से पहले भी किशोर इसी इलाके में एक कमरे के मकान में किराए पर रहते थे.

इसी के साथ किशोर ने यह भी बताया कि उन का इलाके में किसी के साथ कभी कोई मतभेद नहीं हुआ था. उन की पत्नी शिक्षित महिला थी. उन का स्वभाव काफी मिलनसार था.

पासपड़ोस के लोगों के साथ अच्छे मधुर संबंध थे. किशोर को ड्यूटी से घर लौटते हुए अकसर देर हो जाती थी. घर का अधिकतर काम सुप्रिया ही संभालती थी.

पुलिस का ध्यान अपराधी के घर में घुसने की दिशा में जांच की ओर भी गया. कालोनी के परिसर में बिल्डिंग के पास लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज निकलवाई गई.

इसी दरम्यान बिल्डिंग के ही एक व्यक्ति ने पुलिस को सुप्रिया के घर के बाहर एक जोड़ी चप्पलें देखने की बात भी बताई. उस का कहना था कि शिंदे परिवार के लोग अपनी चप्पलें हमेशा स्टैंड पर रखते रहे हैं. स्टैंड भी बरामदे में एक कोने में था. बरामदे के बाहर चप्पल होने का मतलब किसी बाहरी व्यक्ति का घर में आना था.

पुलिस के लिए यह जानकारी महत्त्वपूर्ण थी कि शिंदे के घर के बाहर एक से डेढ़ बजे के बीच जो चप्पलें देखी गई थीं, उस की पहचान की जाए. इस की जानकारी देने वाले व्यक्ति को तरहतरह के चप्पलों की तसवीरें दिखाई गईं.

उस ने कुछ तसवीरें देख कर शिंदे के घर के बाहर पाए गई चप्पलों की पहचान कर ली. यह भी बताया कि ऐसी चप्पलें इस इलाके में एक व्यक्ति पहनता है.

इसी के साथ जांच कर रही पुलिस को ध्यान आया कि थाने में किशोर शिंदे के साथ सुप्रिया की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाने आया युवक भी इसी तरह की चप्पलें पहने हुए था.

शिंदे से उस युवक के बारे में जानकारी ली गई. वह शिंदे की बिल्डिंग से कुछ दूरी पर रहने वाला विशाल था. उस का शिंदे के घर पहले भी 2-3 बार आना हुआ था.

उसे उसी वक्त पूछताछ के लिए थाने लाया गया. युवक ने अपना नाम बताने से पहले बताया कि उसी ने तो शिंदे को पत्नी के लापता होने की शिकायत लिखवाने के लिए कहा था.

पुलिस ने जब पूछा कि उसे कैसे पता था कि सुप्रिया लापता ही है? इस सवाल पर वह सकपका गया. उस के चेहरे के उड़ते रंग को देख कर पुलिस ने जबरदस्त डांट लगाई. उस का पूरा नामपता पूछा.

तब युवक ने अपना नाम विशाल भाऊ भाट बताया. उस के बाद सुप्रिया हत्याकांड के बारे में उस ने जो चौंकाने वाली कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

दरअसल, 27 वर्षीय विशाल ठाणे जिले में मुरवाड़ी तहसील के घावसड़ी गांव का रहने वाला था. उस के मातापिता और भाईबहन गांव में ही रहते थे. ओम रेजीडेंसी के इलाके में ही वह किराए का कमरा ले कर रहता था. उस की नवी मुंबई में प्राइवेट नौकरी थी.

उस की कई बुरी आदतों में मोहल्ले की लड़कियों और औरतों पर नजर गड़ाए रखना भी था. वह उन्हें कामुक निगाहों से निहारता रहता था. उन से संपर्क बनाने के मौके भी ढूंढने की कोशिश करता था.

उस ने पुलिस को बताया कि उस की नवी मुंबई में ही एक प्रेमिका भी थी, जो किसी दूसरे शहर की रहने वाली थी.

बीते 3 माह से वह अपने घर चली गई थी, उस के बाद से वह नहीं लौटी थी. उसे याद कर विशाल की रातें तन्हाई में गुजरती थीं. उस की कल्पनाओं में खोया रहता था.

इन्हीं दिनों उस की निगाह सुप्रिया पर पड़ी थी. वह कई दिनों से उस की दैनिक गतिविधियों पर नजर गड़ाए हुए था. विशाल सुप्रिया से अकेले में मिलने को व्याकुल हो गया था. एक दिन विशाल को तब मौका मिल गया, जब वह एक मैगजीन की दुकान पर पुरानी सरिता और गृहशोभा पत्रिकाओं की मांग कर रही थी.

दुकानदार के पास उस समय वे पत्रिकाएं नहीं थीं. संयोग से विशाल भी वहीं था. विशाल ने झट कहा कि पुरानी मैगजीन की दुकान के बारे में वह जानता है. नवी मुंबई में जहां वह काम करता है, उस के पास ही है. सुप्रिया ने उस की बात पर विश्वास कर के सरिता और गृहशोभा के उन अंकों की लिस्ट उसे दे दी, जिन की उसे जरूरत थी. और कहा कि इन में से जो भी मिल जाएं, वह ले आए. यह बात घटना के ठीक 2 दिन पहले की है.

विशाल 14 फरवरी, 2022 की दोपहर को किताबों का एक पैकेट ले कर सुप्रिया के घर आ गया. कालबेल की 3-4 आवाज सुन कर सुप्रिया ने दरवाजा खोला. वह अलसाई हुई थी. अपना दुपट्टा संभालती हुई उस ने पूछा, ‘‘आप?’’

बरामदे से बाहर विशाल खड़ा था. सुप्रिया चार कदम चलती हुई उस के पास आ गई.

‘‘यह लीजिए मैडम, आप की मैगजीन. सारी की सारी मिल गईं, जिन की आप को जरूरत थी,’’ विशाल ने हाथ में पकड़ा पैकेट सुप्रिया की ओर बढ़ा दिया.

‘‘थैंक्यू, आप मेरी वजह से कितने परेशान हुए.’’ विशाल के हाथ से पैकेट लेते हुए सुप्रिया बोली.

पैकेट ले कर अंदर जाने के लिए मुड़ते हुए विशाल से उस ने कहा, ‘‘आइए न, इस का पैसा भी तो देना होगा न.’’

विशाल बरामदे की सीढि़यां चढ़ कर अपनी चप्पलें उतार कर सुप्रिया के पीछे हो लिया. कुछ सेकेंड में सुप्रिया और विशाल हाल में थे. उन के हाल के गेट में आटोमेटिक लौक लगा हुआ था.

सुप्रिया ने विशाल को सोफे पर बैठने को कहा और उस के लिए पानी लाने चली गई. तुरंत ही पानी का गिलास भी ले आई. विशाल धीरेधीरे पानी पीने लगा और सुप्रिया मैगजीन का पैकेट खोलने लगी.

पैकेट के खुलते ही सुप्रिया चौंक पड़ी. उस के हाथ से कुछ पत्रिकाएं नीचे जमीन पर गिर गईं. विशाल कुटिलता से बोला, ‘‘क्यों पसंद नहीं आईं? इस से भी अच्छी किताबें वहां मिलती हैं.’’

‘‘बदतमीज, निकल जा यहां से. तूने क्या समझ लिया, मैं यह लाने को बोली थी?’’ सुप्रिया चीखती हुई बोली.

विशाल सरिता और गृहशोभा के बजाय अश्लील मैगजींस लाया था. उसे देखते ही सुप्रिया नाराज हो गई थी.

‘‘ज्यादा सतीसावित्री मत बनो. मैं सब जानता हूं, तुम जैसी सैक्स की भूखी औरतों के बारे में. नाटक करती हैं हरामजादी.’’ यह कहते हुए विशाल ने सुप्रिया का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया.

इस तरह विशाल के बदले हुए तेवर और अचानक हुए हमले से सुप्रिया अनजान थी. वह उस के ऊपर गिर पड़ी. पास रखा कांच का गिलास जमीन पर गिर कर टूट गया. कुछ पानी भी फैल गया.

सुप्रिया विशाल को धकेलती हुई उठ खड़ी हुई. जमीन पर बिखरा कांच उस के पैर में चुभ गया. जिस से खून निकल आया. वह वहां से भाग कर दूसरे कमरे में जाने लगी. तब तक विशाल और भी सैक्स का उन्मादी बन  चुका था.

वह सुप्रिया को फिर से दबोचने की कोशिश करने लगा, लेकिन वह उस की पकड़ से बचती रही. अंतत: उस की गरदन विशाल की पकड़ में आ गई.

विशाल ने सुप्रिया को काबू में लाने के लिए नायलोन की रस्सी उस के गले में फंसा दी. वह रस्सी अपनी जेब में रख कर लाया था. गले में फंसी रस्सी दोनों हाथों से कस दी, जिस से जल्द ही सुप्रिया बेजान हो गई और गिर पड़ी. उसी अवस्था में उस ने उस के शरीर के साथ छेड़छाड़ की. तब तक सुप्रिया की सांसें थम चुकी थीं. यह देख कर विशाल घबरा गया और आननफानन में अपने बचाव का रास्ता निकालने लगा.

उस ने पाया कि उस की सुप्रिया के साथ हाथापाई बैड कम सोफे पर हो रही थी. उस के दिमाग में आइडिया कौंध गया. उस ने तुरंत सोफे को खोला और सुप्रिया की लाश उस के अंदर ठूंस दी.

सोफे को करीने से पहले की तरह लगा दिया, लेकिन वह भूल गया कि सोफा पहले दीवार से थोड़ा अलग था. जमीन पर गिरे पानी और सुप्रिया के कुछ खून को साफ करने के बाद गेट की चाबी ढूंढी. चाबी उसे किचन में फ्रिज के ऊपर रखी मिल गई.

इस तरह वारदात को अंजाम देने के बाद विशाल बड़े आराम से अपने कमरे पर चला आया. खुद को बचाने के लिए डोंबीवली थाने भी गया और किशोर शिंदे का हितैषी होने का ढोंग किया. लेकिन उस की ही चप्पलों ने उस के अपराध की चुगली कर दी.

आरोपी विशाल भाऊ भाट से विस्तार से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से जेल भेज दिया गया.

रविंद्र शिवाजी दुपारगुडे

मैं सिर्फ बार्बी डौल नहीं हूं- भाग 1: क्या थी परी की कहानी

खुद को आईने में निहारते हुए परी को अपने दाहिने गाल पर एक दाना दिखा. वह परेशान हो गई. क्या करे? क्या डाक्टर के पास जाए? फिर उस ने जल्दीजल्दी फाउंडेशन और कंसीलर की मदद से उस दाने को छिपाया और होंठों पर लिपस्टिक का फाइनल टच दिया. सिर पर थोड़ा सा पल्लू कर, पायल और चूडि़यां खनकाती वह बाहर निकली.

परी की सास और ननद उसे प्रशंसा से देख रही थीं, वहीं जेठानियों की आंखों में उस ने ईर्ष्या का भाव देखा तो परी को लगा कि उस का शृंगार सार्थक हुआ.

पासपड़ोस की आंटी और दूर के रिश्ते की चाची, ताई सब शकुंतला को इतनी सुंदर बहू लाने के लिए बधाई दे रही थीं. शकुंतला अभिमान से मंदमंद मुसकरा रही थीं. वे बड़े सधे स्वर में बोलीं, ‘‘यह तो हमारे मनु की पसंद है. पर हां, शायद इतनी खूबसूरत बहू मैं भी नहीं ढूंढ़ पाती.’’

नारंगी शिफौन साड़ी पर नीले रंग का बौर्डर था और नीले रंग का ही खुला ब्लाउज, जो उस की पीठ की खूबसूरती को उभार रहा था. पीठ पर ही परी ने एक टैटू बनवा रखा था जो मछली और एक परी के चित्र का मिलाजुला स्वरूप था.

परी को अपने इस टैटू पर बहुत गुमान था. इसी टैटू के कारण कितने ही लड़कों का दिल उस ने अपनी मुट्ठी में कर रखा था. परी की पारदर्शी त्वचा, दूध जैसा रंग, गहरी कत्थई आंखें सबकुछ किसी को भी बांधने के लिए पर्याप्त था. मनीष से उस की मुलाकात बैंगलुरु के नौलेज पार्क में हुई थी. दोनों का औफिस उसी बिल्डिंग में था. कभीकभी दोनों की मुलाकात कौफीहाउस में भी हो जाती थी.

मनीष अपने मातापिता की इकलौती संतान था. शकुंतला और कवींद्र दोनों ने ही अपनी पूरी ताकत अपनी संतान के पालनपोषण में लगा दी थी. बचपन से ही मनीष के दिमाग में यह बात घर कर गई थी कि उसे हर चीज में अव्वल आना है. कोई भी दोयम दरजे की चीज या व्यक्ति उसे मान्य नहीं था. पढ़ाई में अव्वल, खेलकूद में शीर्ष स्थान.

12वीं के तुरंत बाद ही उस का दाखिला देश के सब से अच्छे इंजीनियरिंग कालेज में हो गया था. उस के तुरंत बाद मुंबई के सब से प्रतिष्ठित कालेज से उस ने मैनेजमैंट की डिग्री हासिल की और बैंगलुरु में 60 लाख की सालाना आय पर उस ने एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में मैनेजर के रूप में जौइन कर लिया था जहां पर उस की मुलाकात परी से हुई और परी हर मामले में उस की जिंदगी के सांचे में फिट बैठती थी.

परी के मातापिता के पास अपनी बेटी के सौंदर्य और पढ़ाई के अलावा कुछ और दहेज में देने के लिए नहीं था. शकुंतला और कवींद्र ने मनीष की शादी के लिए बहुत बड़े सपने संजोए थे पर परी की खूबसूरती, काबिलीयत और मनीष की इच्छा के कारण चुप लगा गए. सादे से विवाह समारोह के बाद शकुंतला और कविंद्र ने बहुत ही शानदार रिसैप्शन दे कर मन के सारे अरमान पूरे कर लिए थे.

शाम को मनीष के दोस्त के यहां खाने पर जाना था. परी थक गई थी. उस का कपड़े बदलने का मन नहीं था. जब वह उसी साड़ी में बाहर आई तो शकुंतला ने टोका, ‘‘परी तुम नईनवेली दुलहन हो. ऐसे बासी कपड़ों में कैसे जाओगी?’’

परी बुझे स्वर में बोली, ‘‘मम्मी, मुझे बहुत थकान हो रही है. यह साड़ी भी तो अच्छी है.’’

शकुंतला ने बिना कुछ कहे उसे मैरून रंग का कुरता और शरारा पकड़ा दिया. परी ने मदद के लिए मनीष की तरफ देखा तो वह भी मंदमंद मुसकान के साथ अपनी मां का समर्थन ही करता नजर आया.

फिर से उस ने पूरा शृंगार किया. आईने में उस ने देखा, अब वह दाना और स्पष्ट हो गया था. तभी पीछे से शकुंतला की आवाज सुन कर घबरा कर उस ने उस दाने के ऊपर फाउंडेशन लगा लिया और फाउंडेशन का धब्बा अलग से उभर कर चुगली कर रहा था.

बाहर ड्राइंगरूम की रोशनी में शकुंतला बोलीं, ‘‘परी फाउंडेशन तो ठीक से लगाया करो. यह क्या फूहड़ की तरह मेकअप किया है तुम ने?’’

परी घबरा गई. जैसे ही शकुंतला उस के करीब आईं तभी मनीष की कार का हौर्न सुनाई दिया. परी बाहर की तरफ भागी.

पीछे से शकुंतला की आवाज आई, ‘‘परी रास्ते में ठीक कर लेना.’’

कार में बैठते ही मनीष ने परी को अपने करीब खींच लिया और चुंबनों की बरसात कर दी. फिर धीरे से उस के कान में फुसफुसाया, ‘‘मन नहीं है मयंक के घर जाने का. कहीं उस की नीयत न बिगड़ जाए. जान, बला की खूबसूरत लग रही हो तुम.’’

मनीष की बात पर परी धीरे से मुसकरा दी. करीब 15 मिनट बाद कार एक नए आबादी क्षेत्र में बनी सोसाइटी के आगे रुक गई. मनीष ने घंटी बजाई और एक अधेड़ उम्र की महिला ने दरवाजा खोला. चेहरे पर मुसकान और मधुरता लिए हुए उन्हें देख कर ऐसा आभास हुआ परी को कि वह उन के साथ बैठ कर थोड़ा सुस्ता ले.

तभी अंदर से ‘‘हैलो… हैलो…’’ बोलता हुआ एक नौजवान आया. गहरी काली आंखें, तीखी नाक और खुल कर हंसने वाला. उस के व्यक्तित्व में सबकुछ खुलाखुला था. परी बिना परिचय के ही समझ गई थी कि यह मयंक है और वह महिला उस की मां है.’’

परी और मनीष 4 घंटे तक वहां बैठे रहे. परी को लगा ही नहीं कि वह यहां पहली बार आई है. जहां मनीष के घर उसे हर समय डर सा लगा रहता था कि कहीं कुछ गलत न हो जाए. हर समय अपने रंगरूप को ले कर सजग रहना पड़ता था, वहीं यहां वह एकदम सहज थी.

तभी परी के मोबाइल की घंटी बजी. शकुंतलाजी दूसरी तरफ थीं, ‘‘परी तुम्हें कुछ होश है या नहीं, क्या समय हुआ है? मनीष का तो वह दोस्त है पर तुम्हें तो खयाल रखना चाहिए न…’’

जब वे लोग वहां से बिदा हो कर चले तब रात के 11 बज चुके थे. घर पहुंच कर परी जब चेहरा धो रही थी तब उस ने करीब से देखा, उस दाने के साथ एक और दाना बगल में उग चुका था. वह गहरी चिंता में डूब गई. वह मन ही मन सोच में डूब गई कि अब कैसे सामना करूंगी? उस ने तो मुझे पसंद ही मेरी खूबसूरत पारदर्शी त्वचा की वजह से किया है.

मनीष अधीरता से बाथरूम का दरवाजा पीट रहा था, ‘‘डौल, मेरी बार्बी डौल जल्दी आओ.’’

उस की कोमल व बेदाग साफ त्वचा के कारण ही तो वह उसे बार्बी डौल कहता था. फिर से उस ने फाउंडेशन लगाया और बाहर आ गई. मनीष ने उसे बांहों में उठाया और फिर दोनों प्यार में डूब गए.

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