‘‘मेरी अम्मी 2 बजे उठ कर लालटेन को रोशनी में चश्मा लगा कर बीड़ी बनाने के लिए पत्ते काटती हैं और पत्ते काटतेकाटते फज्र की नमाज का समय हो जाता है. फिर वह पत्ते काट कर उसे जमने के लिए सुतली वाले बोरे में बांध कर नमाज पढ़ने चली जाती है.’’ मैं ने फिर पूछा था, ‘‘यह जमना क्या होता है?’’ ‘‘जमना मतलब मुलायम होना, ताकि पत्तों को बीड़ी के जैसे लपेटने में आसानी हो,’’ उस ने बताया था. मैं उस की बात नहीं समझ पाया था, यह उस ने मेरे चेहरे से जान लिया तो फिर उस ने मुझे ठीक वैसे ही समझाया जैसे उस के भैया मुझे गणित समझाते थे. ‘‘इसे ऐसे समझो कि पत्ते काटने के बाद उसे और भी मुलायम होने के लिए मतलब एक बीड़ी वाले की जबान में इसे पत्ते का जमना कहते हैं. सुतली वाले बोरे को एक खास तरीके से बस्ता बना कर उसे पानी से हलका भिगो कर बांधा जाता है. पानी भी एक जरूरत के हिसाब से ही देना होता है.
कम पानी देने से पत्ते रूखे रह जाते हैं और ज्यादा पानी देने से पत्ते में चित्ती लग जाती है मतलब फफूंद लग जाती है.’’ उस के इस तरह बताने से पता चल रहा था कि बीड़ी का कारोबार उस के खून में है. मैं ने फिर पूछा था, ‘‘इतनी सवेरे जाग कर तुम क्या करते थे?’’ ‘‘मैं वहीं पर लेट कर कहानियों की किताबें पढ़ कर अपनी अम्मी को सुनाया करता था,’’ यह कहतेकहते वह उदास हो गया था, मानो जैसे अब रो ही देगा. ‘‘तुम तो वापस उसी अंधेरे वाली दुनिया में जा रहे हो और अब आओगे भी नहीं,’’ मैं आज बस उसे ही सुनना चाहता था. ‘‘हां दोस्त…’’ पहली बार उस ने मुझे दोस्त कह कर बुलाया था. फिर एक गहरी सांस ले कर वह कहने लगा था, ‘‘जिस वजह से मैं यहां आया था, वह तकरीबन पूरी तो हो गई है, पर…’’ ‘‘पर क्या…?’’ उस ने फिर बात अधूरी छोड़ दी तो मैं ने पूछा था.
‘‘पर, अम्मी छूट गई यार, मेरी कहानियां सुनने वाला यहां कोई नहीं है,’’ वह अपने आंसू छिपाने की कोशिश करते हुए बोला था, ‘‘पता है, मेरी नींद अब भी 2 बजे खुल जाती है, पर कमरे के बाहर नहीं निकलता, क्योंकि इस चकाचौंध रोशनी के रहते हुए भी मुझे डर लगता है. तब मुझे समझ में आया कि डर तो मेरे अंदर अब भी है, पर यहां मैं बाथरूम जाने के लिए किसी को गहरी नींद से जगा नहीं सकता, साथ नहीं ले जा सकता. ‘‘भला कोई मेरे लिए अपनी नींद क्यों खराब करेगा और किसी को साथ चलने के लिए जगाने में मुझे खुद भी शर्म आती है, क्योंकि उन की नजर में मैं बहुत बड़ा हो गया हूं, पर अपनी अम्मी की नजर में…’’ कहतेकहते वह खामोश हो गया था. ‘‘पर, यहां टैलीविजन देखने को तो मिलता है न…?’’ मैं चाहता था कि किसी बहाने से वह गांव से वापस आ जाए. ‘‘वह तो तुम्हारे यहां ही देखता हूं…’’ इस से ज्यादा उस ने कुछ नहीं कहा था, क्योंकि बाकी बातें मैं खुद समझ गया था. मेरे अब्बू को उस का मेरे यहां आना बिलकुल भी पसंद नहीं था. ‘‘तुम्हें पता है कि मुझे यहां हर चीज पूछ कर करनी पड़ती है. तुम्हारे यहां टैलीविजन देखने जाने के लिए भी कितनी डांट सुननी पड़ती है, तब जा कर इजाजत मिलती है और फिर तुम्हें वहां मेरे लिए दरवाजा खोलने की वजह से डांट सुननी पड़ती है.’’ उस की इस बात से मैं चौंक पड़ा था कि इसे तो सबकुछ पता है.
‘‘ऐसा नहीं है कि मेरे गांव में टैलीविजन नहीं है. वहां भी है, पर वहां इतनी बंदिशें नहीं हैं. अगर किसी ने अपना दरवाजा बंद भी कर लिया तो हम सब बस दीवार फांद कर उस के घर में घुस जाते हैं, कोई कुछ नहीं कहता है, सब को देखने दिया जाता है. ‘‘हमारे यहां बिजली नहीं है, तो हम लोग बैटरी पर देखते हैं… या तो खुद की बैटरी को पास के बाजार से चार्ज करा कर या भाड़े पर ला कर.’’ उस की बातों को सुन कर मैं अंदर से शर्मिंदा हो रहा था. कुछ चीजें ऐसी थीं, जो मेरे बस में नहीं थीं. उन में से एक थी, उसे देख कर मेरे अब्बू का दरवाजा बंद कर लेना. थोड़ी देर सन्नाटा पसरा रहा, फिर उस ने आगे कहना शुरू किया था, ‘‘वहां तो हंसनेरोने के लिए भी कभी सोचना नहीं पड़ता है. झूठमूठ रो कर अपनी जिद मनवा लेता हूं और फिर जिद पूरी होने पर हंस देता हूं. यहां तो हर चीज के लिए वजह ढूंढ़नी पड़ती है. तुम्हें पता है, तुम्हारे साथ जा कर मैं जितनी बार भी दवाएं लाया था, वे मैं ने कभी खाई ही नहीं थीं.’’ मैं फिर हैरान था और झट से पूछ लिया था, ‘‘क्यों?’’ ‘‘क्योंकि मुझे कभी पेट या सिरदर्द हुआ ही नहीं. घर या अम्मी की याद आ जाती थी और रो पड़ता था. आंसू की वजह बताने के लिए यही 2 दर्द ऐसे थे, जिन के लिए किसी सुबूत की जरूरत नहीं पड़ती है. गांव में तो अम्मी बुखार भी छू कर जान जाती थी, यहां तो बस थर्मामीटर…’’ मैं खामोश था. शायद मैं भी अब रो पड़ता. एक 10वीं के लड़के के अंदर कितना कुछ भरा था. ऐसा लगा कि उस के अंदर का बच्चा यहां आ कर मर रहा था. ‘‘मैं ने तो अब सोच लिया है कि बीड़ी की दुनिया से मुझे बाहर निकलना है खासकर अम्मी को तो बिलकुल भी नहीं बनाने दूंगा,’’ उस ने कहा था. ‘‘क्यों?’’ ‘‘बहुत सी बातें हैं, तुम्हें कैसे बताऊं…’’ ‘‘बता भी दो, आज पहली बार तुम ने मुझे दोस्त कहा है.’’ ‘‘इतनी मेहनत है इस काम में, पर उस के एवज में मिलता कुछ भी नहीं है.
बीड़ी, जिसे तुम देशी सिगरेट भी कह सकते हो, उस को बनाने से पहले उस के बहुत से पड़ाव हैं. आसान नहीं है बीड़ी बनाना और उसे आम लोगों तक पहुंचाना. हस्तकला की हर कदम पर जरूरत पड़ती है मानो हम जैसे कोई दुलहन सजा रहे हों. ‘‘इतनी मेहनत करने के बाद अगर पूरे दिन में एक हजार बीड़ी बन गईं, वह भी अगर आप की बनाने की स्पीड ज्यादा है तो मुश्किल से 40 से 50 रुपए मजदूरी मिलेगी. लेडीज हाथ की बीड़ी के लिए तो और भी कम मजदूरी है,’’ उस ने बीड़ी बनाने के तरीके को पूरी तफसील में समझाया था मानो उस ने बीड़ी बनाने की कला में पीएचडी कर रखी हो. ‘‘लेडीज हाथ की बीड़ी की मजदूरी कम क्यों?’’ मैं ने फिर पूछा था और बस मेरे इसी एक सवाल का जवाब उस के पास नहीं था और इस का जवाब शायद आज भी किसी के पास नहीं है, पर इस भेदभाव की वजह से उस के अंदर गुस्सा बहुत था. ‘‘पता नहीं यार, और सब से ताज्जुब वाली बात तो यह है कि दुकानदार यानी मेरे अब्बा दोनों बीड़ी को एक ही दाम पर बेचते हैं. ग्राहक से लेडीज हाथ की बीड़ी बता कर कम पैसे नहीं लिए जाते हैं. पता नहीं यह भेदभाव क्यों है? ‘‘मेरी अम्मी या कोई औरत अलग या किसी आसान तरीके से बीड़ी थोड़े न बनाती हैं. मेहनत तो दोनों की बराबर ही लगती है. ‘‘घर को संभालना औरतों के हाथ में है, बच्चे पैदा कर उन की अच्छी परवरिश करना भी उन्हीं के हाथों में है, उन के हाथ का खाना अच्छा होता है, पर यहां… बस यहां उन के हाथ का कोई मोल नहीं, तभी तो लेडीज के हाथ की बीड़ी बोल कर उन्हें कम मजदूरी दी जाती है…’’ कितनी सचाई थी उस की बातों में. कुछ देर के लिए तो मुझे ऐसा लगा कि हमारे स्कूल के गुप्ता सर महिला सशक्तीकरण पर भाषण दे रहे हैं. ‘‘अब हमें घर चलना चाहिए,’’ मैं ने कहा. हालांकि मैं चाहता तो था कि हमारी बातें यों ही चलती रहें, पर…
‘‘हां, वरना तुम्हें अब्बू से फिर डांट पड़ेगी.’’ वह बचपन की दोस्ती की आखिरी शाम मेरी जिंदगी की सब से हसीन शाम थी, पर मैं ने यह नहीं सोचा था कि इस के बाद मैं उस से कभी मिल नहीं पाऊंगा. समय के साथ उस का चेहरा मेरे जेहन में धुंधला तो हो गया, पर उस की बातें हमेशा रोशन रहीं. उस की वे आखिरी एक दिन की बातें मुझे अपनी जिंदगी में हर दिन दिखाई देती थीं. उस ने कहा था, ‘‘अपना घर छोड़ते ही आप की पहचान में फर्क आ जाता है. अपनी पहचान खो जाती है. अच्छाखासा नाम रहते हुए भी तुम्हें उस नाम से कोई नहीं बुलाएगा.’’ कितनी हकीकत थी उस की इस बात में और यह तब समझ में आया, जब मैं ने घर छोड़ा. घर छोड़ने के बाद मेरी पहचान ‘बंटी का भाई’, ‘जूनियर’, ‘सीनियर’, ‘फ्रैशर’, ‘ऐक्सपीरियंस्ड’, ‘दैट इंडियन गाय’… कुछ ऐसा ही होता चला गया, ठीक उसी तरह जिस तरह उस का भी एक नाम था, पर यहां इस शहर में उस का एक ही नाम था ‘बीड़ी वाले का लड़का’.
16 फरवरी, 2022 की रात साढ़े 9 बजे नीरज घर पर खाना खा कर मोबाइल देख रहा था, तभी राजू की फोन काल देख कर उस का चेहरा खुशी से खिल उठा. राजू ने उसे खुला आमंत्रण देते हुए कहा, ‘‘आज मेरा मन तुम्हारे साथ कुछ करने का हो रहा है. जल्दी से आ जाओ.’’अंधा क्या चाहे 2 आंखें. नीरज ने हामी भरते हुए कहा, ‘‘मैं आता हूं तू चौक पर मिलना.’’
इतना कहते ही फोन डिसकनेक्ट कर उस ने घर से जूट के 2 बोरे स्कूटी की डिक्की में रखे और पत्नी से कुछ देर में आने की बोल कर घर से निकल पड़ा. करीब पौने 10 बजे राजू उसे चौक पर ही मिल गया.
नीरज उसे स्कूटी पर बिठा कर शगुन वाटिका मैरिज गार्डन के पीछे रेलवे स्टेशन के नजदीक सुनसान जगह पर ले गया. स्कूटी खड़ी कर अंधेरे का फायदा उठा कर झाडि़यों के बीच घुस कर अपने साथ लाए जूट के बोरे बिछा कर दोनों पास में बैठ गए.
अमावस्या की रात के स्याह अंधेरे का पूरा लुत्फ नीरज उठाना चाहता था, इसलिए अपने कपड़े घुटने के नीचे सरका कर वह राजू के साथ प्रेमालाप करने लगा. मगर उसे पता नहीं था कि आज वह राजू को नहीं, अपनी मौत को सुनसान जगह ले कर आया है.नीरज और राजू का सैक्स गेम चल ही रहा था कि मनोज उन का पीछा करते हुए दबेपांव वहां पहुंच गया. मनोज ने देखा कि नीरज राजू के ऊपर था, तभी उस ने पीछे से नीरज का गला पकड़ लिया.
नीरज कुछ समझ पाता, इस के पहले राजू भी मनोज का साथ देने लगा. दोनों पूरी ताकत से नीरज का गला दबाने लगे. कुछ ही देर में नीरज छटपटा कर ढेर हो गया. इस के बाद दोनों ने उस के हाथ की नस काट कर और गले को चाकूनुमा कटर से गोद कर इस बात की पूरी तसदीक कर ली कि नीरज जिंदा तो नहीं है.नीरज की हत्या करने के बाद मनोज और राजू ने उस के शव को उठा कर घनी झाडि़यों के बीच फेंक दिया और नीरज का मोबाइल ले कर उसी की स्कूटी पर सवार हो कर दोनों भाग खड़े हुए.
रात में ही दोनों होशंगाबाद पहुंचे, जहां वे मनोज की बहनबहनोई के घर पर रुके. सुबह होते ही मनोज अपनी बहन से बोला, ‘‘दीदी, हम लोग जरूरी काम से भोपाल जा रहे हैं.’’
स्कूटी वहीं छोड़ कर दोनों बस में सवार हो भोपाल पहुंच गए. दोनों भोपाल के नादिरा बस स्टैंड से कहीं दूर भागने की फिराक में थे, तभी औबेदुल्लागंज थाने के टीआई संदीप चौरसिया की टीम ने उन्हें दबोच लिया.पकड़े जाने पर उन के पास नीरज की हत्या कुबूल करने के अलावा कोई चारा नहीं था. दोनों ने नीरज की हत्या के पीछे यही कारण बताया कि नीरज उन के सैक्स संबंधों का वीडियो वायरल करने की धमकी दे कर राजू को ब्लैकमेल कर बारबार संबंध बनाने का दबाव डाल रहा था. यह बात मनोज को नागवार गुजरी.
दोनों की निशानदेही पर नीरज की स्कूटी, मोबाइल और हत्या में इस्तेमाल किया गया चाकूनुमा कटर भी बरामद कर लिया. पुलिस ने दोनों को भादंवि धारा 302,120बी के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से मनोज को जेल और राजू को बाल सुधार गृह भेज दिया गया.गे सैक्स के शौक ने एक शादीशुदा रईस कारोबारी नीरज को मौत की नींद सुला दिया तो मनोज और राजू जैसे नौजवानों को अपराध करने पर मजबूर
कर दिया. द्य
—कथा मीडिया रिपोर्ट और पुलिस सूत्रों पर आधारित
‘‘अच्छा… मोबाइल स्विच औफ है? मैं ने देखा नहीं… शायद चार्ज करना भूल गई,’’ विनीता साफ झूठ बोल गई.
‘‘सुनो, मुझे दोपहर बाद टूअर पर निकलना है. ड्राइवर को भेज रहा हूं, मेरा बैग पैक कर के दे देना. घर नहीं आ पाऊंगा, जरूरी मीटिंग है,’’ जतिन ने जल्दबाजी में कहा.
जतिन के टूअर अकसर ऐसे ही बनते. मगर हर बार की तरह इस बार विनीता परेशान नहीं हुई, बल्कि उस ने राहत की सांस ली, क्योंकि वह इस समय सचमुच एकांत चाहती थी ताकि शालिनी से आने से बनी इस परिस्थिति पर कुछ सोचविचार कर सके.
‘क्या होगा अगर उस ने घर आने और मेरे पति से मिलने की जिद की तो? क्या कहूंगी मैं शालू से? क्या जतिन से शादी कर के मैं ने कोई अपराध किया है?’ इन्हीं सवालों के जवाब वह एकांत में अपनेआप से पाना चाहती थी. पूरा दिन वह मंथन करती रही. उस की आशंका के अनुरूप अगले ही दिन दोपहर में शालिनी का फोन आ गया. अब तक विनीता अपनेआप को इस स्थिति के लिए मानसिक रूप से तैयार कर चुकी थी.
‘‘यार विन्नी, तुम तो बड़ी छिपी रुस्तम निकली… मेरी ही थाली पर हाथ साफ कर लिया… मेरे आशिक को अपना पति बना लिया… मैं ने कल ही जतिन की फेसबुक आईडी देखी तो पता चला… क्या तुम्हारी पहले से ही प्लानिंग थी?’’ शालू का व्यंग्य सुन कर विन्नी गुस्से और अपमान से तिलमिला उठी.
‘‘नहीं शालू… थाली पर हाथ साफ नहीं किया, बल्कि जिस पौध को तुम कुचल कर खत्म होने के लिए फेंक गई थी मैं ने उसे सहेज कर फिर से गमले में लगा दिया… अब उस के फूल या फल, जो भी हों, वे मेरी ही झोली में आएंगे न… चल छोड़ ये बातें… तू बता क्या चल रहा है तेरी लाइफ में? कितने दिन के लिए इंडिया आई हो? अकेली आई हो या नितेश भी साथ है?’’ विन्नी ने संयत स्वर में पूछा.
‘‘अकेली आई हूं, हमेशा के लिए… हमारा तलाक हो गया.’’
‘‘क्यों? कैसे? वह तो तुम्हारे हिसाब से बिलकुल परफैक्ट मैच था न?’’
‘‘अरे यार, दूर के ढोल सुहावने होते हैं… नितेश भी बाहर से तो इतना मौडर्न… और भीतर से वही… टिपिकल इंडियन हस्बैंड… यहां मत जाओ… इस से मत मिलो… उस से दूर रहो… परेशान हो गई थी मैं उस से… खुद तो चाहे जिस से लिपट कर डांस करे… और कोई मेरी कमर में हाथ डाल दे तो जनाब को आग लग जाती थी… रोज हमारा झगड़ा होने लगा… बस, फिर हम आपसी सहमति से अलग हो गए. अब मैं हमेशा के लिए इंडिया आ गई हूं,’’ शालू ने बड़ी ही सहजता से अपनी कहानी बता दी जैसे यह कोई खास बात नहीं थी, मगर विनीता के मन में एक अनजाने डर ने कुंडली मार ली.
‘‘अगर यह हमेशा के लिए इंडिया आ गई है, तो जतिन से मिलने की कोशिश भी जरूर करेगी… कहीं इन दोनों का पुराना प्यार फिर से जाग उठा तो? कहते हैं कि व्यक्ति अपना पहला प्यार कभी नहीं भूलता… फिर? उस का क्या होगा?’’ विनीता ने डर के मारे फोन काट दिया.
विनीता के दिल में शक के बादलों ने डेरा जमाना शुरू कर दिया. उस का शक विश्वास में बदलने लगा जब एक दिन उस ने फेसबुक पर नोटिफिकेशन देखा, ‘‘जतिन बिकम्स फ्रैंड विद शालिनी.’’
‘‘जतिन ने मुझे बताना भी जरूरी नहीं समझा? हो सकता है शालिनी इन से मिली भी हो…’’ विनीता के दिल में शक के नाग ने फुफकार भरी. विनीता अपने दिल की बात किसी से भी शेयर नहीं कर पा रही थी. धीरेधीरे उस की मनोस्थिति उस पर हावी होने लगी. नतीजतन उस के व्यवहार में एक अजीब सा रूखापन आ गया. जतिन जब भी उसे हंसाने की कोशिश करता वह बिफर उठती.
‘‘तुम्हें पता है शालिनी वापस लौट आई है?’’ एक दिन औफिस से आते ही जतिन ने विस्फोट किया.
‘‘हां, उस ने एक दिन मुझे फोन किया था. मगर तुम्हें किस ने बताया?’’ विनीता ने उस की आंखों में आंखें डाल कर पूछा. जतिन की आंखों में उसे जरा भी चोरी नजर नहीं आई, बल्कि उन में तो विश्वास भरी चमक थी.
‘‘अरे, उसी ने आज मुझे भी फोन किया था. उसे टाइम पास करने के लिए कोई जौब चाहिए. मुझ से मदद मांग रही थी.’’
‘‘फिर तुम ने क्या कहा?’’
‘‘1-2 लोगों से कहा है… देखो, कहां बात बनती है.’’
‘‘मगर तुम्हें क्या जरूरत है किसी पचड़े में पड़ने की?’’
‘‘अरे यार, इंसानियत नाम की भी कोई चीज होती है या नहीं… चलो छोड़ो, तुम बढि़या सी चाय पिलाओ,’’ कहते हुए जतिन ने बात खत्म कर दी.
मगर यह बात इतनी आसानी से कहां खत्म होने वाली थी. विनीता के कानों में रहरह कर शालिनी की चैलेंज देती आवाज गूंज रही थी. अब उस के पास शालिनी के फोन आने बंद हो गए थे. इस बात ने भी विनीता की रातों की नींद उड़ा दी थी.
‘‘अब तो सीधे जतिन को ही कौल करती होगी… मैं तो शायद कबाब में हड्डी हो चुकी हूं,’’ विनीता अपनेआप से ही बातें करती परेशान होती रहती. इन सब के फलस्वरूप वह कुछ बीमार भी रहने लगी थी.
‘‘मेरे कहने पर एक होटल में शालिनी को एचआर की जौब मिल गई. इस खुशी में वह आज मुझे इसी होटल में ट्रीट देना चाहती है… तुम चलोगी?’’ एक शाम जतिन ने घर आते ही कहा.
‘‘पूछ रहे हो या चलने को कह रहे हो?’’ विनीता भीतर ही भीतर सुलग रही थी.
‘‘आजकल तुम्हें बाहर का खाना सूट नहीं करता न, इसलिए पूछ रहा हूं,’’ जतिन ने सहजता से कहा.
विनीता कुछ नहीं बोली. चुपचाप हारे हुए खिलाड़ी की तरह जतिन को अपने से दूर जाते देखती रही.
धीरेधीरे उस ने चुप्पी ही साथ ली. उस ने जतिन से दूरी बढ़ानी शुरू करदी. उन के रिश्ते में ठंडापन आने लगा. वह मन ही मन अपनेआप को जतिन से तलाक के लिए तैयार करने लगी. वहीं जतिन इसे उस की बीमारी के लक्षण समझ कर बहुत ही सामान्य रूप से ले रहा था. हमेशा की तरह वह उसे घर आते ही औफिस से जुड़ी मजेदार बातें बताता था. इन दिनों उस की बातों में शालिनी का जिक्र भी होने लगा था. हालांकि शालू कभी उन के घर नहीं आई, मगर जतिन के अनुसार वह कभीकभार उस से मिलने औफिस आ जाती. वह भी 1-2 बार उस के बुलावे पर होटल गया था.
इश्कइश्क की अठखेलियां खेलती हुई कनिका पिता के दोस्त के साथ प्यार के अनोखे रिश्ते का जो धागा बुन रही थी, वह निहायत ही घटिया और बदबूदार रिश्तों का धागा था, जिस की कोई उम्र नहीं थी. उस में दोष कनिका का नहीं बल्कि उस की उम्र का था, जिस उम्र के दौर से वह गुजर रही थी.
पिता का दोस्त पिता जैसा ही होता है. कनिका ने इस रिश्ते की मर्यादा को तो भुला ही दिया था, इस से कमतर गुनहगार कनिका के पिता का दोस्त वेदप्रकाश आंतिल भी नहीं था. जो सामाजिक मानमर्यादा को ताख पर रख बेटी समान कनिका से इश्क की गोटियां खेल रहा था.
भ्रष्ट मानसिकता के उस कमबख्त इंसान ने यह भी नहीं सोचा कि जब उन के इश्क के परदे उठेंगे तो उन की समाज में कितनी बदनामी हो सकती है. लोग उन के बारे में कैसीकैसी धारणाएं रखेंगे. क्या सामाजिक तिरस्कार और बहिष्कार की मार से वे जिंदा रह सकेंगे. दोनों ने इस बारे में कभी नहीं सोचा, बस नीले आसमान के तले अपने प्यार की पींगें भरते रहे.बहरहाल, कनिका और वेदप्रकाश का रिश्तों की आड़ वाला यह खेल ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रहा. आखिरकार, एक दिन विजयपाल के सामने यह भेद खुल ही गया. जब उस के सामने बेटी और वेदप्रकाश के बीच चल रहे नाजायज रिश्तों से परदा उठा तो उसे ऐसा लगा जैसे उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई हो.
वेदप्रकाश की हरकतों से उस के तनबदन में आग लग गई थी. वह इस सोच में डूब गया था कि माना बेटी नादान थी, नादानी में उस के पांव बहक गए लेकिन वह तो नादान नहीं था. बेटी को समझाने या ऊंचनीच का आईना दिखाने जैसा काम कर सकता था. फिर भी वह न मानती तो मुझ से आ कर कहता, मुझे बताता. मैं उस का सही तरीके से इलाज करता.बजाय इस के वह खुद उस पर लट्टू हो गया और उस से नाजायज रिश्ता जोड़ लिया. वेदप्रकाश ने ऐसी गिरी और घिनौनी हरकत कर के अच्छा नहीं किया. विजयपाल ने तय कर लिया कि वह उसे कभी माफ नहीं करेगा.
उस दिन के बाद से वेदप्रकाश का विजयपाल के घर आनाजाना बंद हो गया. कनिका पर विजयपाल और उस की पत्नी की चारों पहर नजर कड़ी हो गई थी. कनिका की मां ने सामाजिक मानसम्मान और नैतिकता की दुहाई दी लेकिन बेटी के दिलोदिमाग में वेदप्रकाश के प्यार का ऐसा रंग चढ़ गया था कि मां की सीख का रंग एकदम फीका पड़ गया था.भले ही मांबाप ने अपनी नजरों का पहरा बेटी पर बिठा दिया था, लेकिन वह छिप कर प्रेमी वेदप्रकाश से फोन पर बात कर लेती थी.
बात दिसंबर 2020 के पहले सप्ताह की है. जिस बात का डर मांबाप को सता रहा था, आखिरकार वह सच हो गया. घर वालों के मुंह पर कालिख पोत कर कनिका वेदप्रकाश के साथ घर से
भाग गई.बेटी की करतूतों से घर वालों का सिर शर्म से झुक गया. वे किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहे. जवान बेटी का किसी पुरुष के साथ भाग जाना कितनी जगहंसाई वाली बात होती है, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता.
बहरहाल, वेदप्रकाश और कनिका भाग कर मेरठ पहुंचे. वहां वेदप्रकाश का एक जानने वाला रहता था, वहीं उस के घर में दोनों ने शरण ली और 20 दिसंबर, 2020 को दोनों ने कोर्टमैरिज कर ली. कोर्टमैरिज करने के बाद वेदप्रकाश और कनिका अपने घर मुकीमपुर लौट आए.वेदप्रकाश और कनिका घर लौट तो आए लेकिन लेकिन गांव वालों ने उन्हें गांव में घुसने नहीं दिया. गांव में पंचायत बिठा कर पंचों ने कनिका को वेदप्रकाश से छीन कर उस के घर वालों के हवाले कर दिया और उस की शादी को अमान्य घोषित कर दिया.
यही नहीं, वेदप्रकाश को अपमानित कर के गांव से निकाल बाहर कर दिया था. गांव से निष्कासित किए जाने के बाद वेदप्रकाश अपना गांव छोड़ कर रोहतक जिले में किराए का कमरा ले कर रहने लगा.
पंचों के हुक्म से प्रेमी से पतिपत्नी बने दंपति को अलग तो कर दिया था, लेकिन एकदूसरे के दिलों में उन्होंने जो जगह बनाई थी, न तो उसे मिटा सके और न ही हटा सके. सामाजिकता के कड़े चाबुक की चोट से भले ही दोनों अलग हो गए थे, लेकिन उन के सीने में धड़कने वाला दिल एक था. दोनों अलग हो कर भी एक थे, उन्हें कोई जुदा नहीं कर सका था. उन के दिलों से और खयालों से भी.
कनिका वेदप्रकाश से ज्यादा दिनों तक दूर नहीं रह सकी. 3 जून, 2021 को वह फिर वेदप्रकाश के साथ घर से भाग गई. दोबारा घर से भाग कर कनिका ने मांबाप का नाम खाक में मिला दिया था.
बेटी के इस दुस्साहस से विजयपाल गुस्से से एकदम पागल हो गया. आलम तो यह था कि यदि सामने बेटी पड़ जाती तो उस के इतने टुकडे़ कर डालता, वह खुद नहीं जानता था. लेकिन करता भी क्या, वह तो अपनों से हारा था.
वक्त के सामने विजयपाल कुछ देर के लिए रुक गया था लेकिन वह टूट कर बिखरा नहीं था. सामाजिक रुसवाई का जो जख्म कनिका ने अपने बाप को दिया था, वह सूद समेत उसे लौटाने की योजना बना रहा था. इस योजना में उस ने इस बार अपनी बुआ के पोते वीरेंद्र को शामिल कर लिया था और दोनों सावधानी से आगे बढ़ रहे थे.विजयपाल की योजना बेटी कनिका को मौत के घाट उतार कर मानसम्मान बचाने और हत्या का सारा दोष नीच दोस्त वेदप्रकाश के सिर मढ़ उसे जेल भिजवाने की थी.
योजना के अनुसार, 5 जुलाई 2021 को विजयपाल ने बेटी कनिका को फोन किया, ‘‘हैलो बेटी कनिका, मैं तुम्हारा बदनसीब बाप बोल रहा हूं.’’ कराहते हुए विजयपाल बोला.
‘‘नमस्ते पापा,’’ कनिका असमंजस में डूबी आगे बोली, ‘‘आप कैसे हैं?’’‘‘और कैसा हो सकता हूं, जब से तुम घर से गई हो तब से मैं सदमे में पड़ा रहता हूं. तुम्हारे ऐसे चले जाने से घर काटने को दौड़ता है.’’ विजयपाल की बात सुन कर कनिका कोई उत्तर नहीं देती तो विजयपाल ने आगे कहा, ‘‘अच्छा, जो होना था सो हो गया. हम सब ने सोचा है कि अब हम तुम्हारी शादी को सामाजिक मान्यता दिला दें ताकि अपने पति के साथ सिर ऊंचा कर के तुम भी जी सको.’’
‘‘सच पापा?’’ पिता के मुंह से यह सुन कर कनिका खुशी से झूम उठी, ‘‘अभीअभी मेरे कानों ने जो सुना, क्या वह सच है पापा?’’‘‘हां बेटा, वो सब सच है. इसीलिए तो में ने 7 जुलाई, 2022 को अपने जन्मदिन पर एक शानदार पार्टी देने का फैसला किया है. दामादजी को साथ ले कर तुम घर आओगी तो मुझे और घर वालों को बड़ी खुशी होगी.’’
‘‘हां पापा, मैं उन्हें साथ ले कर आप के जन्मदिन पर घर जरूर आऊंगी.’’
‘‘अच्छा, अब मैं फोन रखता हूं.’’‘‘नमस्ते पापा.’’‘‘खुश रहो बेटा, घर जरूर आना मेरे जन्मदिन पर.’’
कह कर विजयपाल ने काल डिसकनेक्ट कर दी. विजयपाल ने अपनी भावनाओं का जाल फेंक कर बेटी को चंगुल में फांसने की कोशिश की थी और वह अपने खतरनाक इरादों में कामयाब भी हो गया.
कनिका ने जब ये सारी बातें पति वेदप्रकाश आंतिल से कही तो वह चौंक गया कि विजयपाल उन की शादी को सामाजिक मान्यता दिलाना चाहता है. तुरंत उस की छठी इंद्री जाग गई और उसे दोस्त से ससुर बने विजयपाल की बातों से साजिश की बू महसूस होने लगी थी.
कनिका की रगों में विजयपाल का खून दौड़ रहा था तो वह पिता की बात क्यों नहीं सुनती. वेदप्रकाश ने कनिका को बहुत समझाया कि वह अपने घर मुकीमपुर न जाए, उसे विजयपाल की नीयत पर भरोसा नहीं है. वह जहरीले सांप की तरह पलट कर कभी भी वार कर सकता है.
पति की बात सुन कर कनिका ने उसे विश्वास दिलाया कि वह हर घड़ी चौकस रहेगी. क्या पता मेरे वहां जाने से रिश्तों में फिर से बदलाव आ जाए, मांबाप का आशीर्वाद मिल जाए और हमारे जीवन की गाड़ी सुखमय चलने लगे.वेदप्रकाश का मन पत्नी को मायके भेजने का नहीं हो रहा था, लेकिन पत्नी की जिद के आगे उसे झुकना ही पड़ा. 7 जुलाई को जन्मदिन वाले दिन सुबह के समय कनिका ने अपने पिता विजयपाल को फोन कर के बताया कि वह अकेले घर आ रही है. राई थाने के पास आ कर वह उसे रिसीव कर लें.
अंधे को क्या चाहिए दो आंखें. जैसा उस ने सोचा था, ठीक वैसा ही हो रहा था. इधर जब वेदप्रकाश कनिका को गाड़ी में बैठा कर छोड़ने जा रहा था तो कनिका ने चालाकी करते हुए पति के मोबाइल फोन में अपना बयान रिकौर्ड कर लिया था. बयान में उस ने यह कहा था कि अगर मुझे कुछ होता है तो उस के लिए मेरे पिताजी विजयपाल और उन के 4 साथी दोषी होंगे जो बराबर उन के साथ मंडराते रहते हैं.
कनिका ने अपना बयान रिकौर्ड करने के बाद फोन वेदप्रकाश को दे दिया ताकि किसी अनहोनी पर भविष्य में काम आ सके. दोपहर एक बजे के करीब वेदप्रकाश राई थाने पहुंचा. थाने से थोड़ी दूर आगे विजयपाल कार लिए खड़ा था. वेदप्रकाश ने कनिका को वहीं उतार दिया तो कनिका बाप के पास पहुंच गई.
बेटी को देख कर विजयपाल के चेहरे पर कुटिल मुसकान फैल गई. उस ने कनिका को कार में पीछे वाली सीट पर बिठाया और खुद भी उसी के बगल में बैठ गया. गाड़ी वीरेंद्र चला रहा था. वेदप्रकाश ने पत्नी कनिका को विजयपाल के साथ कार में बैठते हुए देखा. कार जब वहां से चली गई तो वह निश्चिंत हो कर घर लौट आया था.सब कुछ योजना के मुताबिक चल रहा था. कनिका डरीसहमी बैठी मन ही मन प्रार्थना कर रही थी कि सब कुछ ठीक रहे और वह कुशल से मां के पास पहुंच जाए. कार के भीतर उसे खतरा महसूस हो रहा था.
राई थाने से 2-3 किलोमीटर कार आगे बढ़ी थी कि सुनसान जगह देख कर खेड़ी दमकन के पास विजयपाल ने वीरेंद्र से गाड़ी रोकने को कहा तो उस ने कार एक किनारे ले जा कर रोक दी. की अठखेलियां खेलती हुई कनिका पिता के दोस्त के साथ प्यार के अनोखे रिश्ते का जो धागा बुन रही थी, वह निहायत ही घटिया और बदबूदार रिश्तों का धागा था, जिस की कोई उम्र नहीं थी. उस में दोष कनिका का नहीं बल्कि उस की उम्र का था, जिस उम्र के दौर से वह गुजर रही थी.
पिता का दोस्त पिता जैसा ही होता है. कनिका ने इस रिश्ते की मर्यादा को तो भुला ही दिया था, इस से कमतर गुनहगार कनिका के पिता का दोस्त वेदप्रकाश आंतिल भी नहीं था. जो सामाजिक मानमर्यादा को ताख पर रख बेटी समान कनिका से इश्क की गोटियां खेल रहा था.भ्रष्ट मानसिकता के उस कमबख्त इंसान ने यह भी नहीं सोचा कि जब उन के इश्क के परदे उठेंगे तो उन की समाज में कितनी बदनामी हो सकती है. लोग उन के बारे में कैसीकैसी धारणाएं रखेंगे. क्या सामाजिक तिरस्कार और बहिष्कार की मार से वे जिंदा रह सकेंगे. दोनों ने इस बारे में कभी नहीं सोचा, बस नीले आसमान के तले अपने प्यार की पींगें भरते रहे.
बहरहाल, कनिका और वेदप्रकाश का रिश्तों की आड़ वाला यह खेल ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रहा. आखिरकार, एक दिन विजयपाल के सामने यह भेद खुल ही गया. जब उस के सामने बेटी और वेदप्रकाश के बीच चल रहे नाजायज रिश्तों से परदा उठा तो उसे ऐसा लगा जैसे उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई हो.
वेदप्रकाश की हरकतों से उस के तनबदन में आग लग गई थी. वह इस सोच में डूब गया था कि माना बेटी नादान थी, नादानी में उस के पांव बहक गए लेकिन वह तो नादान नहीं था. बेटी को समझाने या ऊंचनीच का आईना दिखाने जैसा काम कर सकता था. फिर भी वह न मानती तो मुझ से आ कर कहता, मुझे बताता. मैं उस का सही तरीके से इलाज करता.बजाय इस के वह खुद उस पर लट्टू हो गया और उस से नाजायज रिश्ता जोड़ लिया. वेदप्रकाश ने ऐसी गिरी और घिनौनी हरकत कर के अच्छा नहीं किया. विजयपाल ने तय कर लिया कि वह उसे कभी माफ नहीं करेगा.
उस दिन के बाद से वेदप्रकाश का विजयपाल के घर आनाजाना बंद हो गया. कनिका पर विजयपाल और उस की पत्नी की चारों पहर नजर कड़ी हो गई थी. कनिका की मां ने सामाजिक मानसम्मान और नैतिकता की दुहाई दी लेकिन बेटी के दिलोदिमाग में वेदप्रकाश के प्यार का ऐसा रंग चढ़ गया था कि मां की सीख का रंग एकदम फीका पड़ गया था.भले ही मांबाप ने अपनी नजरों का पहरा बेटी पर बिठा दिया था, लेकिन वह छिप कर प्रेमी वेदप्रकाश से फोन पर बात कर लेती थी.
बात दिसंबर 2020 के पहले सप्ताह की है. जिस बात का डर मांबाप को सता रहा था, आखिरकार वह सच हो गया. घर वालों के मुंह पर कालिख पोत कर कनिका वेदप्रकाश के साथ घर से
भाग गई.बेटी की करतूतों से घर वालों का सिर शर्म से झुक गया. वे किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहे. जवान बेटी का किसी पुरुष के साथ भाग जाना कितनी जगहंसाई वाली बात होती है, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता.
बहरहाल, वेदप्रकाश और कनिका भाग कर मेरठ पहुंचे. वहां वेदप्रकाश का एक जानने वाला रहता था, वहीं उस के घर में दोनों ने शरण ली और 20 दिसंबर, 2020 को दोनों ने कोर्टमैरिज कर ली. कोर्टमैरिज करने के बाद वेदप्रकाश और कनिका अपने घर मुकीमपुर लौट आए.वेदप्रकाश और कनिका घर लौट तो आए लेकिन लेकिन गांव वालों ने उन्हें गांव में घुसने नहीं दिया. गांव में पंचायत बिठा कर पंचों ने कनिका को वेदप्रकाश से छीन कर उस के घर वालों के हवाले कर दिया और उस की शादी को अमान्य घोषित कर दिया.
यही नहीं, वेदप्रकाश को अपमानित कर के गांव से निकाल बाहर कर दिया था. गांव से निष्कासित किए जाने के बाद वेदप्रकाश अपना गांव छोड़ कर रोहतक जिले में किराए का कमरा ले कर रहने लगा.
पंचों के हुक्म से प्रेमी से पतिपत्नी बने दंपति को अलग तो कर दिया था, लेकिन एकदूसरे के दिलों में उन्होंने जो जगह बनाई थी, न तो उसे मिटा सके और न ही हटा सके. सामाजिकता के कड़े चाबुक की चोट से भले ही दोनों अलग हो गए थे, लेकिन उन के सीने में धड़कने वाला दिल एक था. दोनों अलग हो कर भी एक थे, उन्हें कोई जुदा नहीं कर सका था. उन के दिलों से और खयालों से भी.
कनिका वेदप्रकाश से ज्यादा दिनों तक दूर नहीं रह सकी. 3 जून, 2021 को वह फिर वेदप्रकाश के साथ घर से भाग गई. दोबारा घर से भाग कर कनिका ने मांबाप का नाम खाक में मिला दिया था.
बेटी के इस दुस्साहस से विजयपाल गुस्से से एकदम पागल हो गया. आलम तो यह था कि यदि सामने बेटी पड़ जाती तो उस के इतने टुकडे़ कर डालता, वह खुद नहीं जानता था. लेकिन करता भी क्या, वह तो अपनों से हारा था.वक्त के सामने विजयपाल कुछ देर के लिए रुक गया था लेकिन वह टूट कर बिखरा नहीं था. सामाजिक रुसवाई का जो जख्म कनिका ने अपने बाप को दिया था, वह सूद समेत उसे लौटाने की योजना बना रहा था. इस योजना में उस ने इस बार अपनी बुआ के पोते वीरेंद्र को शामिल कर लिया था और दोनों सावधानी से आगे बढ़ रहे थे.
विजयपाल की योजना बेटी कनिका को मौत के घाट उतार कर मानसम्मान बचाने और हत्या का सारा दोष नीच दोस्त वेदप्रकाश के सिर मढ़ उसे जेल भिजवाने की थी.
योजना के अनुसार, 5 जुलाई 2021 को विजयपाल ने बेटी कनिका को फोन किया, ‘‘हैलो बेटी कनिका, मैं तुम्हारा बदनसीब बाप बोल रहा हूं.’’ कराहते हुए विजयपाल बोला.
‘‘नमस्ते पापा,’’ कनिका असमंजस में डूबी आगे बोली, ‘‘आप कैसे हैं?’’
‘‘और कैसा हो सकता हूं, जब से तुम घर से गई हो तब से मैं सदमे में पड़ा रहता हूं. तुम्हारे ऐसे चले जाने से घर काटने को दौड़ता है.’’ विजयपाल की बात सुन कर कनिका कोई उत्तर नहीं देती तो विजयपाल ने आगे कहा, ‘‘अच्छा, जो होना था सो हो गया. हम सब ने सोचा है कि अब हम तुम्हारी शादी को सामाजिक मान्यता दिला दें ताकि अपने पति के साथ सिर ऊंचा कर के तुम भी जी सको.’’
‘‘सच पापा?’’ पिता के मुंह से यह सुन कर कनिका खुशी से झूम उठी, ‘‘अभीअभी मेरे कानों ने जो सुना, क्या वह सच है पापा?’’
‘‘हां बेटा, वो सब सच है. इसीलिए तो में ने 7 जुलाई, 2022 को अपने जन्मदिन पर एक शानदार पार्टी देने का फैसला किया है. दामादजी को साथ ले कर तुम घर आओगी तो मुझे और घर वालों को बड़ी खुशी होगी.’’‘‘हां पापा, मैं उन्हें साथ ले कर आप के जन्मदिन पर घर जरूर आऊंगी.’’
‘‘अच्छा, अब मैं फोन रखता हूं.’’‘‘नमस्ते पापा.’’‘‘खुश रहो बेटा, घर जरूर आना मेरे जन्मदिन पर.’’
कह कर विजयपाल ने काल डिसकनेक्ट कर दी. विजयपाल ने अपनी भावनाओं का जाल फेंक कर बेटी को चंगुल में फांसने की कोशिश की थी और वह अपने खतरनाक इरादों में कामयाब भी हो गया.
कनिका ने जब ये सारी बातें पति वेदप्रकाश आंतिल से कही तो वह चौंक गया कि विजयपाल उन की शादी को सामाजिक मान्यता दिलाना चाहता है. तुरंत उस की छठी इंद्री जाग गई और उसे दोस्त से ससुर बने विजयपाल की बातों से साजिश की बू महसूस होने लगी थी.
कनिका की रगों में विजयपाल का खून दौड़ रहा था तो वह पिता की बात क्यों नहीं सुनती. वेदप्रकाश ने कनिका को बहुत समझाया कि वह अपने घर मुकीमपुर न जाए, उसे विजयपाल की नीयत पर भरोसा नहीं है. वह जहरीले सांप की तरह पलट कर कभी भी वार कर सकता है.पति की बात सुन कर कनिका ने उसे विश्वास दिलाया कि वह हर घड़ी चौकस रहेगी. क्या पता मेरे वहां जाने से रिश्तों में फिर से बदलाव आ जाए, मांबाप का आशीर्वाद मिल जाए और हमारे जीवन की गाड़ी सुखमय चलने लगे.
वेदप्रकाश का मन पत्नी को मायके भेजने का नहीं हो रहा था, लेकिन पत्नी की जिद के आगे उसे झुकना ही पड़ा. 7 जुलाई को जन्मदिन वाले दिन सुबह के समय कनिका ने अपने पिता विजयपाल को फोन कर के बताया कि वह अकेले घर आ रही है. राई थाने के पास आ कर वह उसे रिसीव कर लें.
अंधे को क्या चाहिए दो आंखें. जैसा उस ने सोचा था, ठीक वैसा ही हो रहा था. इधर जब वेदप्रकाश कनिका को गाड़ी में बैठा कर छोड़ने जा रहा था तो कनिका ने चालाकी करते हुए पति के मोबाइल फोन में अपना बयान रिकौर्ड कर लिया था. बयान में उस ने यह कहा था कि अगर मुझे कुछ होता है तो उस के लिए मेरे पिताजी विजयपाल और उन के 4 साथी दोषी होंगे जो बराबर उन के साथ मंडराते रहते हैं.
कनिका ने अपना बयान रिकौर्ड करने के बाद फोन वेदप्रकाश को दे दिया ताकि किसी अनहोनी पर भविष्य में काम आ सके. दोपहर एक बजे के करीब वेदप्रकाश राई थाने पहुंचा. थाने से थोड़ी दूर आगे विजयपाल कार लिए खड़ा था. वेदप्रकाश ने कनिका को वहीं उतार दिया तो कनिका बाप के पास पहुंच गई.
बेटी को देख कर विजयपाल के चेहरे पर कुटिल मुसकान फैल गई. उस ने कनिका को कार में पीछे वाली सीट पर बिठाया और खुद भी उसी के बगल में बैठ गया. गाड़ी वीरेंद्र चला रहा था. वेदप्रकाश ने पत्नी कनिका को विजयपाल के साथ कार में बैठते हुए देखा. कार जब वहां से चली गई तो वह निश्चिंत हो कर घर लौट आया था.
सब कुछ योजना के मुताबिक चल रहा था. कनिका डरीसहमी बैठी मन ही मन प्रार्थना कर रही थी कि सब कुछ ठीक रहे और वह कुशल से मां के पास पहुंच जाए. कार के भीतर उसे खतरा महसूस हो रहा था.
राई थाने से 2-3 किलोमीटर कार आगे बढ़ी थी कि सुनसान जगह देख कर खेड़ी दमकन के पास विजयपाल ने वीरेंद्र से गाड़ी रोकने को कहा तो उस ने कार एक किनारे ले जा कर रोक दी.
23 साल का मनोज कटारे बरखेड़ा पुलिस चौकी क्षेत्र के पिपलिया गांव का रहने वाला है. वह रेलवे स्टेशन रोड पर स्थित एक नमकीन की दुकान पर काम करता है. इसी दुकान पर 17 साल का राजू भी काम करता था. राजू देखने में गोरा, चिकना और लड़कियों की तरह शरमीला था.दुकान पर काम के दौरान खाली समय में मनोज राजू को पकड़ कर उस के शरीर के नाजुक अंगों को छूने की काशिश करता तो राजू को अजीब सा लगता. राजू किशोरावस्था की दहलीज पर था, उसे अच्छेबुरे का ज्यादा इल्म नहीं था.
मनोज के इस तरह छूने से उसे अच्छा लगता. मनोज तो राजू का दीवाना हो गया था, उसे छूते ही मनोज को कुछ इस तरह का अहसास होता था जैसे वह किसी लड़की के बदन को छू रहा हो. जब दोनों के बीच दोस्ती हो गई तो मनोज राजू को अपने घर ले जाने लगा.
एक दिन काम से छुट्टी मिलने पर अपने ही घर में दोपहर के समय एकांत पा कर मनोज ने राजू से कहा, ‘‘राजू, तू बहुत खूबसूरत है. यदि तू लड़की होता तो मैं तुझ से ही शादी कर लेता.’’
इतना कह कर मनोज ने राजू को चूमना शुरू कर दिया. मनोज के हाथ कभी उस के गालों पर, कभी उस की छाती पर तो कभी उस के प्राइवेट पार्ट को टच करने लगे. राजू के पूरे शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई.
उसे मनोज का इस तरह छूना अच्छा लग रहा था. लिहाजा राजू ने भी मनोज पर प्यार जताते हुए कहा, ‘‘मनोज, तुम भी मुझे बहुत अच्छे लगते हो. जी चाहता है जिंदगी भर तुम्हारे साथ रहूं.’’
मनोज ने धीरेधीरे राजू के बदन से कपड़े उतारने शुरू कर दिए और राजू का हाथ अपने निजी अंग पर ले जा कर रख दिया. और राजू से बोला, ‘‘राजू, तू हमेशा इसी तरह मेरे साथ रहे तो मैं किसी लड़की से कभी शादी नहीं करूंगा.’’
मनोज की बात सुन कर राजू ने भी मनोज से वादा किया कि वह हमेशा जीवनसाथी बन कर उसी के साथ रहेगा.
धीरेधीरे राजू ने भी मनोज के कपड़े उस के शरीर से हटाना शुरू कर दिया. देखते ही देखते दोनों निर्वस्त्र हो कर अप्राकृतिक सैक्स का आनंद लेने लगे. दोनों के संबंध इतने मजबूत हो गए थे कि एक दिन भी दोनों का एकदूसरे के बिना रहना मुश्किल हो गया था.
दोनों के बीच गे रिलेशनशिप अब रोज की बात हो गई थी. दुकान से छूटते ही जब भी उन्हें मौका मिलता, वे आनंद के सागर में डूब कर गोता लगाते.
दोनों गे सैक्स का भरपूर आनंद लेने के लिए बदलबदल कर प्रेमीप्रेमिका की भूमिका निभाते थे. कभी राजू मनोज की प्रेमिका का रोल निभाता तो कभी मनोज राजू की प्रेमिका बन कर उस से संबंध बना कर उसे भी खुश कर देता.
एक दिन नीरज कोठारी शाम के वक्त नमकीन लेने उन की दुकान पर आया था, तभी राजू और मनोज के बीच हंसीमजाक देख कर उस का ध्यान राजू की तरफ गया. राजू लड़कियों की शक्लसूरत जैसा खूबसूरत लड़का था.
कुछ ही दिनों में नीरज को इस बात का पता चल गया कि मनोज और राजू के बीच समलैंगिक संबंध हैं. इस के बाद तो नीरज राजू से मिलने को बेताब हो उठा.
दरअसल, नीरज भी गे सैक्स का शौकीन था. नीरज इसी फिराक में रह कर किसी भी तरह वह राजू से नजदीकियां बढ़ाना चाहता था, मगर राजू मनोज के प्रेम में इस तरह पागल था कि वह नीरज को भाव नहीं दे रहा था.
एक दिन नीरज ने राजू और मनोज को संबंध बनाते देख लिया और अपने मोबाइल फोन से वीडियो बना ली. इस के बाद वह राजू को वीडियो दिखा कर धमकाने लगा.
राजू डर के मारे नीरज के फैलाए जाल में फंस गया. नीरज अकसर ही नमकीन की दुकान पर आने लगा. वह राजू को स्कूटी पर घुमाने के बहाने अपने साथ ले जाने लगा. राजू को मनोज के साथ रहते गलत कामों की लत पड़ चुकी थी, ऐसे में नीरज की संगत पा कर उसे भी वही मजा मिलने लगा.
धीरेधीरे राजू और नीरज रोजरोज ही मिलने लगे. वे आपस में एकदूसरे को चूमते तो कभी मोबाइल से फोटो लेते. नीरज राजू से उम्र में काफी बड़ा था. राजू को मनोज के साथ संबंध बनाने में जो मजा आता था, वह नीरज के साथ नहीं आता था. यही वजह थी कि वह नीरज से दूरियां बनाने लगा था.
मगर नीरज वीडियो वायरल करने की धमकी दे कर उस से बारबार संबंध बनाने की जिद करता था. किसी लव ट्रायंगल फिल्मी स्टोरी की तरह राजू के नीरज के साथ घूमनेफिरने से मनोज के अंदर शक का कीड़ा कुलबुलाने लगा.
मनोज ने जब एक दिन राजू से नीरज के साथ नजदीकियों के बारे में पूछा तो नीरज की हरकतों की सच्चाई राजू ने मनोज को बता दी, ‘‘नीरज मुझे खेत पर बुला कर जबरन संबंध बनाता है और मना करने पर हम दोनों का वीडियो वायरल करने की धमकी देता है.’’
यह सुन कर मनोज का खून खौल उठा. जैसे एक प्रेमी अपनी प्रेमिका का किसी गैर से संबंध बरदाश्त नहीं कर पाता, वैसे ही मनोज के दिल में नीरज के प्रति नफरत की आग जलने लगी.
मनोज को जब पता चला कि नीरज उस के दोस्त राजू को ब्लैकमेल कर रहा है और जबरदस्ती संबंध बना रहा है तो उस ने नीरज को रास्ते से हटाने की सोची.
नीरज के पास उन का अश्लील वीडियो था, इस वजह से मनोज को डर था कि उस की दोस्तों में बदनामी हो जाएगी. चारों तरफ से निराश हो कर मनोज ने नीरज की हत्या करने की योजना बनाई. मनोज की बनाई योजना के मुताबिक, राजू ने 16 फरवरी की रात साढ़े 9 बजे नीरज को फोन कर के मिलने को बुलाया.
नीरज यूं तो करोड़पति बाप का इकलौता बेटा था, मगर अपने हमउम्र लड़कों के साथ अवैध संबंध रखने के शौक की वजह से वह किशोरास्था में ही बदनाम हो गया था.
नीरज के जवान होते ही उस के पिता ने उस की शादी कर दी. वक्त गुजरने के साथ नीरज का बेटा भी 15 साल का हो गया था, मगर नीरज का लड़कों से सैक्स संबंध बनाने का शौक खत्म नहीं हुआ था.
6जून, 2022 का वाकया है. रात के तकरीबन 3 बजे थे. थाटीपुर के अत्यंत पौश इलाके रामनगर में सन्नाटा पसरा हुआ था. गरमी के चलते लोग घरों के भीतर एसी, कूलर चला कर गहरी नींद में सोए हुए थे. इन्हीं में एक परिवार कृष्णकांत भदौरिया का भी था, जो एक आलीशान कोठी में रहता था. इसी कोठी में उन का बेटा ऋषभ, पुत्रवधू भावना अपने 2 मासूम बच्चों के साथ रहती थी.
परिवार संपन्न और खुशहाल था, घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. कोई बड़ी डिग्री न होने के कारण ऋषभ को कोई अच्छी नौकरी नहीं मिल सकी थी, अत: वह कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ले कर नेतागिरी करने लगा था. इस के साथ ही जोड़जुगत बैठा कर पार्टी का प्रदेश प्रवक्ता तक बन बैठा था.
इस के अलावा वह वक्त गुजारने और पैसा कमाने के मकसद से प्रौपर्टी की खरीदफरोख्त का काम भी करने लगा था, इसलिए दिन में उस का वक्त घर के बाहर ही गुजरता था. ऐसी स्थिति में घर की सारी जिम्मेदारियां उस की पत्नी भावना निभाती थी. दोनों बच्चों को स्कूल भेजने के बाद घर पर भावना दिन भर अकेली रहती थी, जिस से उसे बोरियत सी होने लगी थी.
टाइम पास करने के लिए उस की सहेली ने उसे मोबाइल पर रिश्तेदारों और सहेलियों से बातचीत कर वक्त बिताने की सलाह दी. यह सलाह भावना को बेहद पसंद आई.अब भावना का ज्यादातर समय मोबाइल फोन पर बातचीत में बीतने लगा. कभीकभी वह मोबाइल फोन पर बातचीत में इतना खो जाती कि उसे पति ऋषभ की भी चिंता नहीं रहती. पति का फोन आता तो कई बार वह उठाती ही नहीं.
उधर बारबार फोन करने पर भी जब भावना काल रिसीव नहीं करती तो ऋषभ के दिल की धड़कनें बढ़ जातीं. उसे लगता कि कहीं भावना कौशलेंद्र से तो बात नहीं कर रही. यही सोच कर वह परेशान हो उठता. शहर के हर्षनगर में रहने वाला कौशलेंद्र ऋषभ के बचपन का दोस्त था.
काफी देर बाद जब वह पति को फोन लगा कर बताती कि मैं अपने पिताजी से बात कर रही थी, इसलिए आप का फोन नहीं उठा सकी तब कहीं जा कर ऋषभ को तसल्ली मिलती. ऋषभ ने भावना से स्पष्ट तौर पर कह रखा था कि 1-2 घंटी बजने के बाद वह उस का फोन जरूर उठा लिया करे, क्योंकि फोन नहीं उठने पर उसे घबराहट होने लगती है.लेकिन भावना ने ऋषभ की इस बात पर कतई ध्यान नहीं दिया. वह अपनी सहेलियों और नातेदारों से मोबाइल पर घंटों बातें करने में मशगूल रहती. इस बीच जब कभी ऋषभ का फोन आता, वह उसे कबाब में हड्डी सा लगता.
भावना की इस हरकत से ऋषभ को शक हो गया कि भावना उस से छिपा कर किसी और से बतियाती है. ऋषभ को भावना का इस तरह मोबाइल पर बतियाना जरा भी अच्छा नहीं लगता था, लेकिन भावना पति की नसीहत को जरा भी अहमियत नहीं देती थी.वह पति की बात को एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देती थी. वैसे भी शक की फांस बहुत खतरनाक होती है, इसे जल्द ही दूर न किया जाए तो वह मजबूत से मजबूत दांपत्य जीवन में भी दरार पैदा कर देती है.
भावना अपने दांपत्य में लगी इस फांस को गंभीरता से नहीं ले रही थी, जिस का नतीजा यह निकला कि इस बात को ले कर उस की पति से अकसर नोकझोंक होने लगी. इस की वजह यह थी कि ऋषभ घर से बाहर होने पर जब कभी भी पत्नी के मोबाइल पर फोन लगाता, हर बार उस का फोन व्यस्त ही मिलता था.
ऐसा अनेक बार होने पर ऋषभ के मन में शक बैठ गया कि वह जरूर उस के बचपन के जिगरी दोस्त कौशलेंद्र से बतियाती होगी. बाद में जब घर लौट कर ऋषभ भावना से मोबाइल फोन के बिजी होने की वजह पूछता तो वह कह देती कि सहेली से बात कर रही थी. इस तरह ऋषभ के मन में शक की जो फांस लगी थी, वह नासूर बनती जा रही थी.
धीरेधीरे भावना और ऋषभ के बीच दूरियां बढ़ती चली जा रही थीं, जिस की वजह से ऋषभ उखड़ाउखड़ा सा रहता था. इस तनाव की वजह से पतिपत्नी के बीच शारीरिक संबंध नाममात्र के थे. दूरियां बढ़ने की अहम वजह सिर्फ इतनी थी कि ऋषभ अपनी पत्नी पर शक करने लगा था कि उस का झुकाव कहीं उस के बचपन के मित्र कौशलेंद्र की ओर है.इसी शक के चलते उसे जब भी मौका मिलता, वह पत्नी के मोबाइल की काल हिस्ट्री चैक करता रहता था. कोई भी नंबर उसे अनजान लगता तो वह उसे ले
कर भावना के साथ झगड़ा और मारपीट करता था.
इन सब के पीछे एक खास वजह यह भी थी कि वह यह भी समझ चुका था कि उस की हकीकत पत्नी के सामने खुल चुकी है. यानी वह उस की आपराधिक छवि को भी जान चुकी है.भावना को जैसे ही पता चला कि उस का पति आपराधिक छवि का है तो उस के दिल को काफी ठेस पहुंची. उस ने पति को समझाने की भरसक कोशिश की कि वह गुनाह के रास्ते छोड़ कर अच्छे रास्ते पर चले, पर वह भावना की बात को महत्त्व नहीं देता था. जब भावना यही बात बारबार कहती तो वह उस की पिटाई कर देता.
भावना पति के तुनकमिजाज और शक्की स्वभाव से आजिज आ कर अकसर गुस्से में दोनों बच्चों को ले कर मायके चली जाती थी और अपने पिता महेश सिंह को सारी बात बता देती थी.
बेटी की बात सुन कर महेश सिंह को काफी आघात पहुंचता था, तब महेश सिंह नाराज होते हुए दामाद ऋषभ को कड़ी फटकार लगाते थे. ऐसा कई बार हुआ था. हालांकि इस के बाद भी महेश सिंह 10-15 दिन बाद ही बेटी को समझाबुझा कर ससुराल भेज देते थे.6 जून, 2022 की रात को भी ऋषभ और भावना के बीच कहासुनी हुई. भावना ने पति को समझाने की भरसक कोशिश की, लेकिन ऋषभ उस पर कुछ ज्यादा ही भड़क गया. उन दोनों के बीच तकरार इतनी ज्यादा बढ़ गई कि उसी दौरान ऋषभ ने पत्नी पर पिस्टल तान दी.
भावना समझ गई कि पति के सिर पर खून सवार है, वह बचने के लिए बैडरूम से बाहर निकल कर लान की तरफ भागी. वह चीखती, उस के पहले ही ऋषभ ने उस के सिर को निशाना बना कर फायर कर दिया. वह इतना ज्यादा गुस्से में था कि रिश्तों की गहराई और परिवार की मर्यादा को भूल कर एक के बाद एक 3 गोलियां पत्नी के सिर में मार दीं.गोलियां लगने से भावना लान में ही ढेर हो गई. इस के बाद वह हथियार और अपनी जरूरत का सामान ले कर वहां से फरार हो गया. ऋषभ ने अनायास ही एक ऐसी घटना को अंजाम दे डाला, जिसे देख कर हर किसी का कलेजा कांप उठा.
रात 3 बजे जब इलाके के सभी लोग सो रहे थे, तभी चीखनेचिल्लाने के शोर से लोगों की आंखें खुल गईं. शोरगुल सुन कर घबराए लोग अपनेअपने घरों से बाहर आए तो कृष्णकांत भदौरिया को बदहवास हाल में रोतेबिलखते देख कर हैरान रह गए.वह ऋषभ के दोनों मासूम बच्चों की अंगुली पकड़े हुए जोरजोर से रोते हुए कह रहे थे, ‘‘मेरी मदद करो, मेरे बेटे ऋषभ ने अपनी पत्नी भावना की गोली मार कर हत्या कर दी है.’’
कृष्णकांत भदौरिया जो कुछ कह रहे थे, उसे सुन कर लोगों के होश उड़ गए.इसी दौरान किसी ने पुलिस को इस घटना की सूचना दे दी. कुछ देर में वहां थाना थाटीपुर पुलिस भी आ गई. पुलिस के आने पर कुछ लोग हिम्मत कर के उन की आलीशान कोठी में दाखिल हुए तो वहां की स्थिति देख कर उन सभी की आंखें हैरत से फटी रह गईं. भावना की लाश कोठी में कमरे के बाहर लान में खून से लथपथ पड़ी हुई थी.
हत्या का मामला था, अब तक पूरी रामनगर सोसाइटी के लोग घटनास्थल पर एकत्रित हो चुके थे. इस बीच ऋषभ के पिता कृष्णकांत भदौरिया ने घटना की सूचना अपने समधी महेश सिंह को दे दी.
मामला शहर के पौश इलाके रामनगर के रहने वाले बहुचर्चित कांग्रेसी नेता से जुड़ा हुआ था, जिस में उस ने अपनी पत्नी भावना की गोली मार कर निर्मम हत्या कर दी थी. हत्या कर के वह फरार हो गया था. सीएसपी ऋषिकेश मीणा और टीआई पंकज त्यागी घटनास्थल पर जांच कर रहे थे.
थोड़ी देर बाद ही एडिशनल एसपी (क्राइम) राजेश दंडोतिया फोरैंसिक एक्सपर्ट व डौग स्क्वायड की टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे.
पुलिस अधिकारियों ने भी घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया और क्राइम सीन को समझा. पुलिस टीम के पहुंचने तक रामनगर के बाशिंदे काफी बड़ी संख्या में भदौरिया के घर के सामने जुट गए थे. सभी लोग भावना के मासूम बच्चों के बारे में सोचसोच कर परेशान थे.
इधर हत्यारे के पिता कृष्णकांत भदौरिया की हालत सदमे के कारण कुछ ज्यादा ही खराब हो रही थी. पड़ोसी उन्हें सांत्वना दे कर जैसेतैसे संभाल रहे थे.
पुलिस ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटाने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.
पुलिस को यह तो पता लग ही चुका था कि भावना की हत्या उस के पति ऋषभ ने की है. इसलिए ऋषभ के खिलाफ उस के सुसर महेश सिंह की तहरीर पर थाना थाटीपुर में धारा 302 भादंवि के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली.मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने हत्यारोपी कांग्रेसी नेता ऋषभ पर 10 हजार रुपए का ईनाम घोषित कर दिया. इस के बाद पुलिस ने उस की तलाश शुरू कर दी थी.
इसी बीच एसपी अमित सांघी को मुखबिर के जरिए सूचना मिली कि पत्नी की हत्या के मामले में फरार चल रहे ऋषभ भदौरिया को उत्तर प्रदेश के जिला मैनपुरी के बेवर कस्बे में देखा गया है.यह सूचना मिलने के बाद एसपी ने बिना देर किए एडिशनल एसपी (क्राइम) राजेश दंडोतिया के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में क्राइम ब्रांच इंसपेक्टर संतोष यादव व थाटीपुर टीआई पंकज त्यागी को शामिल किया गया. उन्होंने टीम मैनपुरी रवाना कर दी.
आखिर पुलिस टीम द्वारा ऋषभ भदौरिया को हत्या के 21 दिन बाद उस के ही रिश्तेदार के घर से हिरासत में ले लिया गया. वह अपने रिश्तेदार के घर पर रह कर फरारी काट रहा था.उस ने बताया कि पुलिस द्वारा उस की गिरफ्तारी पर 10 हजार का ईनाम घोषित किए जाने के बाद से उसे एनकाउंटर का भय सता रहा था. पुलिस टीम उसे बेवर से ग्वालियर ले आई. उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त पिस्टल व खून से सने कपड़े भी बरामद कर लिए.
इस के अलावा पुलिस ने उस के पास से वह क्रेटा कार भी बरामद कर ली, जिस में बैठ कर वह पत्नी की हत्या के बाद फरार हुआ था.प्रारंभिक जांच में ही पुलिस को पता चला कि 10 मई, 2022 की रात को भी ऋषभ ने अपने बचपन के जिगरी दोस्त कौशलेंद्र कुशवाहा पर 5 राउंड फायर किए थे. ऋषभ के खौफ के चलते वह थाने में रिपोर्ट लिखवाने का साहस नहीं जुटा सका था. लेकिन जैसे ही ऋषभ अपनी पत्नी को मार कर फरार हुआ और उस पर ईनाम घोषित हुआ तो हर्ष नगर निवासी कौशलेंद्र कुशवाहा थाने में रिपोर्ट लिखवाने पहुंच गया था.
हत्या के आरोपी कांग्रेसी नेता ऋषभ भदौरिया पर पहले से हत्या व हत्या के प्रयास सहित 14 मामले दर्ज हैं.उस के खिलाफ 2 बार जिला बदर की काररवाई भी की गई थी. अब पुलिस उस पर एनएसए लगाने की तैयारी में लगी हुई थी.ऋषभ को सुंदर और सुशील पत्नी मिली थी. सुसराल भी अच्छी थी. 2 सुंदर बच्चे भी थे. लेकिन शक के नासूर ने उस की बसीबसाई गृहस्थी को उजाड़ कर रख दिया. पत्नी को मार कर वह जेल चला गया, जिस से उस के मासूम बच्चे अनाथ हो गए.
ऋषभ के अपराध स्वीकार करने के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक ऋषभ भदौरिया के
दोनों बच्चे अपने नाना महेश सिंह के
पास थे.
उस दिन 22 अप्रैल, 2022 की तारीख थी और सुबह के 10 बज रहे थे. जिला न्यायालय, सोनीपत (हरियाणा) केअधिकांश वकील अपनेअपने चैंबर में आ चुके थे और उस दिन की मुकदमे की समरी अपनी डायरी खोल कर पढ़ रहे थे. उन वकीलों में एक नाम अमरीश कुमार का भी शुमार था.
उस दिन की तारीख में अमरीश कुमार के खास मुवक्किल वेदप्रकाश आंतिल की गवाही होनी थी. अदालत में उस की पत्नी कनिका की हत्या के मुकदमे की तारीख पड़ी थी. अदालत परिसर में मुकदमे से संबंधित गवाहों के नाम पुकार का समय होने वाला था, इसलिए अमरीश कुमार मुकदमे की फाइल पर सरसरी निगाह डाल अपने मुवक्किल वेदप्रकाश आंतिल को साथ ले कर कोर्ट की ओर निकले. परिसर मुवक्किलों और प्राइवेट गाडि़यों से भरा हुआ था.
एडवोकेट अमरीश कुमार तेज कदमों से आगे बढ़ रहे थे. उन के पीछेपीछे वेदप्रकाश भी चल रहा था. जैसे ही वह चैंबर से निकल कर कुछ दूर आगे बढ़ा था, अचानक से गोली चलने की आवाज आई. उसे ही निशाना साध कर किसी ने गोली चलाई थी. गोली उस के बहुत पास से हो कर एक कार के पिछले शीशे में जा धंसी थी.अभी वेदप्रकाश कुछ समझ पाता, तब तक देखा 2 युवक सामने पिस्टल ताने खड़े थे. उन्होंने उस पर गोलियां दाग दीं. 2 गोलियां उस के सीने में जा धंसीं और वह घायल हो कर जमीन पर गिर कर तड़पने लगा.
गोलियों की आवाज सुन कर वकील अमरीश कुमार पलटे तो देखा उस के मुवक्किल को 2 युवक गोली मार कर बाइक से भाग रहे थे. उन्होंने हमलावरों की बाइक रोकने की कोशिश की, लेकिन वह रोक नहीं पाए. हमलावर उन पर भी पिस्टल ताने भीड़ को चीरते हुए वहां से निकल गए.गोली चलते ही अदालत परिसर में अफरातफरी मच गई थी. लोग एकदूसरे से धक्कामुक्की करते हुए भाग रहे थे. फिलहाल गोली से घायल वेदप्रकाश को लादफांद कर जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने देखते ही उसे मृत घोषित कर दिया था.
घटना की सूचना मिलते ही नवागत एसपी हिमांशु गर्ग, एएसपी निकिता खट्टर, डीएसपी विपिन कादियान और सिटी थाने के इंसपेक्टर वजीर सिंह घटनास्थल पर पहुंच कर मौके का जायजा लेने में व्यस्त हो गए थे.घटनास्थल से फायरशुदा 3 खोखे बरामद किए गए. पुलिस ने उन्हें साक्ष्य के तौर पर अपने कब्जे में ले लिया. पते की बात यह रही कि जिला मुख्यालय परिसर के मुख्यद्वार पर एसएलआर हथियार लिए पुलिसकर्मी खड़ा मूकदर्शक बना रहा, उस ने बदमाशों से टक्कर लेने की कोशिश तनिक भी नहीं की थी.
सुरक्षाकर्मी ने तनिक भी सक्रियता दिखाई होती तो बदमाश पकड़े जा सकते थे, लेकिन वे अपना टारगेट पूरा कर के मौके से फरार हो गए थे.उधर वेदप्रकाश की हत्या की खबर जैसे ही घर वालों को मिली, घर में रोनापीटना शुरू हो गया था. छोटा भाई विनय प्रकाश सरकारी अस्पताल पहुंचा, जहां वेदप्रकाश की लाश रखी हुई थी. पुलिस ने लाश अपने कब्जे में ले कर जरूरी काररवाई पूरी की. फिर वह पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.
कागजी खानापूर्ति के बाद इंसपेक्टर वजीर सिंह सिटी थाना पहुंचे. मृतक के छोटे भाई विनय से लिखित तहरीर ले कर अज्ञात हमलावरों के खिलाफ भादंवि की धारा 302 एवं आर्म्स एक्ट के तहत मुकदमा पंजीकृत कर के जांच शुरू कर दी.
पुलिस की जांचपड़ताल में शक के दायरे में सोनीपत जेल में सलाखों के पीछे कैद दोस्त से ससुर बने विजयपाल का नाम आया. विजयपाल उसे कनिका की हत्या में गवाही देने से रोक रहा था.
उस ने वेदप्रकाश को धमकी दी थी कि तेरी वजह से मुझे जेल जाना पड़ा. तेरी वजह से बेटी की हत्या करनी पड़ी थी और तेरी ही वजह से मेरा घरपरिवार बरबाद हुआ था. अगर तू बेटी की हत्या की गवाही देना बंद कर दे तो हम तेरी जान बख्श देंगे, नहीं तो तेरी जान लेने में तनिक भी संकोच नहीं होगा.
वेदप्रकाश ने भी विजयपाल को दोटूक जवाब दिया था, ‘‘आप से जो बन पड़े, कर लें. मैं गवाही देने आऊंगा और पत्नी को इंसाफ दिलाने के लिए अगर मुझे सूली पर चढ़ना भी पड़े तो वह भी करने के लिए तैयार हूं. मगर गवाही देने से पीछे नहीं हटूंगा.’’
पुलिस को जब यह बात पता चली तो केस का इतिहास भूगोल समझने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी थी. वेदप्रकाश आंतिल हत्याकांड बिलकुल साफ हो चुका था. पत्नी की हत्या
की गवाही देने से रोकने के लिए हीहत्या करवाई गई थी कि न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी.
पुलिस ने जेल में बंद विजयपाल को प्रोडक्शन वारंट पर ले कर हत्या की पूछताछ करने की योजना बनाई ताकि तसवीर का रुख साफ हो सके कि घटना को अंजाम देने वाले शूटर कौन थे. उन के पास असलहे कहां से आए.वैसे, वेदप्रकाश आंतिल हत्याकांड की कहानी 24 नवंबर, 2020 को ही लिख दी गई थी, जब उस ने दोस्त की इज्जत की धज्जियां उड़ाते हुए बेटी समान कनिका के गले में फूलों का हार डाल मंदिर में सात फेरे लिए थे.
कनिका भी पिता की जगहंसाई में बराबर की हिस्सेदार थी. बाप की उम्र के व्यक्ति को जीवनसाथी चुनने में उस ने जरा भी संकोच नहीं किया. घर वालों की इज्जत की परवाह किए बिना उस ने वेदप्रकाश आंतिल के साथ घर बसा लिया.19 वर्षीया कनिका विजयपाल की बेटी थी. सोनीपत के मुकीमपुर गांव में विजयपाल अपने परिवार के साथ रहता था. यह गांव थाना राई के अंतर्गत पड़ता है.कुल 5 सदस्यों का विजयपाल का परिवार था, जिन में पतिपत्नी और 3 बच्चे थे. उस की बेटी कनिका बच्चों में सब से बड़ी और समझदार थी, जबकि 2 बेटे कनिका से छोटे थे. अपनी छोटी सी दुनिया में वह बेहद खुश था. विजयपाल के घर में सभी आधुनिक सुखसुविधाएं थीं. उस के घर में किसी चीज की कमी नहीं थी.
परिवार की जीविका चलाने के लिए उस के पास खेती की जमीन थी. उन खेतों में इतनी फसल पैदा हो जाती थी कि अपने खाने के लिए रखने के बाद बचे हुए अनाज को बाजार में बेच कर आमदनी कर लेता था. उसी आमदनी से मजे से घर का खर्च चलता था और बच्चों की अच्छी शिक्षा भी उन्हीं पैसों से पूरी होती थी.
विजयपाल के मकान से 2-4 मकान आगे वेदप्रकाश आंतिल रहता था. वह विजयपाल का लंगोटिया यार था. लंगोटिया यार के साथ वह उस का सगा पट्टीदार था.लेकिन दोनों के बीच पट्टीदार कम दोस्ताना रिश्ता ज्यादा चलता था, इसलिए उन दोनों की एकदूसरे के घरों के भीतर तक पहुंच थी. विजयपाल वेदप्रकाश के वहां चायपानी पीता था तो वेदप्रकाश विजयपाल के वहां उठताबैठता, खातापीता और सो जाया करता था.
तब विजयपाल की बेटी कनिका बहुत छोटी थी. अकसर वह वेदप्रकाश की गोद में जा कर बैठ जाया करती थी. बड़े लाड़प्यार से वह कभी उस के सिर पर हाथ फेरता था तो कभी उस के गालों पर थपकियां दे कर उस पर अपना प्यार लुटाता था.उसे कनिका चाचाचाचा कह कर पुकारती थी. वेदप्रकाश को देख कर कनिका खुश हो जाया करती थी. वह भी तो पिता के समान दोस्त के बच्चों पर अपना प्यार बरसाता था.
तब कौन जानता था कि पिता के समान कनिका पर प्यार लुटाने वाला वह शख्स अपना चरित्र पापी शैतान के हाथों गिरवी रख, एक दिन पति बन कर उस पर अपना अधिकार जमा लेगा. वह कनिका की और अपनी मौत का कारण बनेगा. यही नहीं विजयपाल का हंसताखेलता परिवार उजड़ जाएगा और उस की जिंदगी नरक से भी ज्यादा बदतर बन जाएगी.विजयपाल की बेटी का जहां 15वां वसंत लगा तो उस के अंगअंग का विकास हो चुका था. उस के अंगअंग से जवानी की खुशबू महक रही थी. सुंदर और गोरीचिट्टी तो वह थी ही. गांव के आशिकों की नजर जब उस पर पड़ती तो वो आहें भरने से नहीं रोक पाते थे.
किंतु एक ऐसा भी भौंरा था, जो इस के इर्दगिर्द मंडरा रहा था, बरसों से कालीकाली जुल्फों के बीच कैद जिस ने उस के दिल में अपना घर बना लिया था. वह कोई और नहीं बल्कि वेदप्रकाश आंतिल था, कनिका के पिता विजयपाल के बचपन का लंगोटिया दोस्त, जो उम्र में कनिका से ढाई गुना बड़ा था.
वेदप्रकाश की गिरफ्त में कनिका पूरी तरह से आ चुकी थी. उस के दिल के बगीचे में वेदप्रकाश नामक आशिक बैठ चुका था.
मुकम्मल तौर पर वेदप्रकाश ने कनिका को अपने दिल के शीशे में उतार लिया था तो कनिका भी अपने दिल के कोरे कागज पर प्यार की रोशनाई से वेदप्रकाश का नाम लिख चुकी थी. टूट कर प्यार करती थी वह उस से. वेदप्रकाश भी महासागर की गहराइयों से भी ज्यादा गहरा प्यार करता था. मोहब्बत की आग दोनों के दिलों में बराबर लगी हुई थी.
मैं अवाक् रह गई. अनजाने में वह कितना बड़ा सत्य कह गई थी, वह नहीं जानती थी. सचमुच इन के कोई दोस्त नहीं वरन दफ्तर के साथी रमाशंकर की बहन और बहनोई आ रहे थे रश्मि को देखने.
लेकिन बेटे वालों के जितने नाजनखरे होते हैं, उस के हिसाब से कितनी बार यह नाटक दोहराना पड़ेगा, कौन जानता है. और लाड़दुलार में पली, पढ़ीलिखी लड़कियों का मन हर इनकार के साथ विद्रोह की जिस आग से भड़क उठता है, मैं नहीं चाहती थी, मेरी सीधीसादी सांवली सी बिटिया उस आग में झुलस कर अभी से किसी हीनभावना से ग्रस्त हो जाए.
इसी वजह से वह जितनी सहज थी, मैं उतनी ही घबरा रही थी. कहीं उसे संदेह हो गया तो…
भारतीय परंपरा के अनुरूप हमारे माननीय अतिथि पूरे डेढ़ घंटे देर से आए. प्रतीक्षा से ऊबे रश्मि और आशु अपने पिता पर अपनी खीज निकाल रहे थे, ‘‘रमाशंकर चाचाजी ने जरूर आप का अप्रैल फूल बनाया है. आप हैं भी तो भोले बाबा, कोई भी आप को आसानी से बुद्धू बना लेता है.’’
‘‘नहीं, बेटा, रमाशंकरजी अकेले होते तो ऐसा संभव था, क्योंकि वह अकसर ऐसी हरकतें किया करते हैं. पर उन के साथ जो मेहमान आ रहे हैं न, वे ऐसा नहीं करेंगे. नए शहर में पहली बार आए हैं इसलिए घूमनेघामने में देर हो गई होगी. पर वे आएंगे जरूर…’’
‘‘मान लीजिए, पिताजी, वे लोग न आए तो इतनी सारी खानेपीने की चीजों का क्या होगा?’’ रश्मि को मिठाई और मेहनत से बनाई कचौरियों की चिंता सता रही थी.
‘‘अरे बेटा, होना क्या है. इसी बहाने हमतुम बैठ कर खाएंगे और रमाशंकरजी और अपने दोस्त को दुआ देंगे.’’
बच्चों को आश्वस्त कर इन्होंने खिड़की का परदा सरका कर बाहर झांका तो एकदम हड़बड़ा गए.
‘‘अरे, रमाशंकरजी की गाड़ी तो खड़ी है बाहर. लगता है, आ गए हैं वे लोग.’’
‘‘माफ कीजिए, राजकिशोरजी, आप लोगों को इतनी देर प्रतीक्षा करनी पड़ी, जिस के लिए हम बेहद शर्मिंदा हैं,’’ क्षमायाचना के साथसाथ रमाशंकरजी ने घर में प्रवेश किया, ‘‘पर यह औरतों का मामला जहां होता है, आप तो जानते ही हैं, हमें इंडियन स्टैंडर्ड टाइम पर उतरना पड़ता है.’’
वह अपनी बहन की ओर कनखियों से देख मुसकरा रहे थे, ‘‘हां, तो मिलिए मेरी बहन नलिनीजी और इन के पति नरेशजी से, और यह इन के सुपुत्र अनुपम तथा अनुराग. और नलिनी बहन, यह हैं राजकिशोरजी और इन का हम 2, हमारे 2 वाला छोटा सा परिवार, रश्मि बिटिया और इन के युवराज आशीष.’’
‘‘रमाशंकरजी, हमारे बच्चों को यह गलतफहमी होने लगी थी कि कहीं आप भूल तो नहीं गए आज का कार्यक्रम,’’ सब को बिठा कर यह बैठते हुए बोले.
रमाशंकरजी ने गोलगोल आंख मटकाते हुए आशु की तरफ देखा, ‘‘वाह, मेरे प्यारे बच्चो, ऐसी शानदार पार्टी भी कोई भूलने की चीज होती है भला? अरे, आशु बेटा, दरवाजा बंद कर लो. कहीं ऐसा न हो कि इतनी अच्छी महक से बहक कर कोई राह चलता अपना घर भूल इधर ही घुस आए,’’ अपने चिरपरिचित हास्यमिश्रित अभिनय के साथ जिस नाटकीय अदा से रमाशंकरजी ने ये शब्द कहे उस से पूरा कमरा ठहाकों से गूंज गया.
प्रतीक्षा से बोझिल वातावरण एकाएक हलका हो गया था. बातचीत आरंभ हुई तो इतनी सहज और अनौपचारिक ढंग से कि देखतेदेखते अपरिचय और दूरियों की दीवारें ढह गईं. रमाशंकरजी का परिवार जितना सभ्य और सुशिक्षित था, उन के बहनबहनोई का परिवार उतना ही सुसंस्कृत और शालीन लगा.
चाय पी कर नलिनीजी ने पास रखी अटैची खोल कर सामान मेज पर सजा दिया. मिठाई के डब्बे, साड़ी का पैकेट, सिंदूर रखने की छोटी सी चांदी की डिबिया. फिर रश्मि को बुला कर अपने पास बिठा कर उस के हाथों में चमचमाती लाल चूडि़यां पहनाते हुए बोलीं, ‘‘यही सब खरीदने में देर हो गई. हमारे नरेशजी का क्या है, यह तो सिर्फ बातें बनाना जानते हैं. पर हम लोगों को तो सब सोचसमझ कर चलना पड़ता है न? पहलीपहली बार अपनी बहू को देखने आ रही थी तो क्या खाली हाथ झुलाती हुई चली आती?’’
‘‘बहू,’’ मैं ने सहसा चौंक कर खाने के कमरे से झांका तो देखती ही रह गई. रश्मि के गले में सोने की चेन पहनाते हुए वह कह रही थीं, ‘‘लो, बेटी, यह साड़ी पहन कर आओ तो देखें, तुम पर कैसी लगती है. तुम्हारे ससुरजी की पसंद है.’’
रश्मि के हाथों में झिलमिलाती हुई चूडि़यां, माथे पर लाल बिंदी, गले में सोने की चेन…यह सब क्या हो रहा है? हम स्वप्न देख रहे हैं अथवा सिनेमा का कोई अवास्तविक दृश्य. घोर अचरज में डूबी रश्मि भी अलग परेशान लग रही थी. उसे तो यह भी नहीं मालूम था कि उसे कोई देखने आ रहा है.
हाथ की प्लेटें जहां की तहां धर मैं सामने आ कर खड़ी हो गई, ‘‘क्षमा कीजिए, नलिनीजी, हमें भाईसाहब ने इतना ही कहा था कि आप लोग रश्मि को देखने आएंगे, पर आप का निर्णय क्या होगा, उस का तो जरा सा भी आभास नहीं था, सो हम ने कोई तैयारी भी नहीं की.’’
‘‘तो इस में इतना परेशान होने की क्या बात है, सरला बहन? बेटी तो आप की है ही, अब हम ने बेटा भी आप को दे दिया. जी भर के खातिर कर लीजिएगा शादी के मौके पर,’’ उन का चेहरा खुशी के मारे दमक रहा था, ‘‘अरे, आ गई रश्मि बिटिया. लो, रमाशंकर, देख लो साड़ी पहन कर कैसी लगती है तुम्हारी बहूरानी.’’
‘‘हम क्या बताएंगे, दीदी, आप और जीजाजी बताइए, हमारी पसंद कैसी लगी आप को? हम ने हीरा छांट कर रख दिया है आप के सामने. अरे भई, अनुपम, ऐसे गुमसुम से क्यों बैठे हो तुम? वह जेब में अंगूठी क्या वापस ले जाने के इरादे से लाए हो?’’ रमाशंकरजी चहके तो अनुपम झेंप गया.
‘‘हमारी अंगूठी के अनुपात से काफी दुबलीपतली है यह. खैर, कोई बात नहीं. अपने घर आएगी तो अपने जैसा बना लेंगे हम इसे भी,’’ नलिनीजी हंस दीं.
पर मैं अपना आश्चर्य और अविश्वास अब भी नियंत्रित नहीं कर पा रही थी, ‘‘वो…वो…नलिनीजी, ऐसा है कि आजकल लड़के वाले बीसियों लड़कियां देखते हैं…और इनकार कर देते हैं…और आप…?
‘‘हां, सरला बहन, बड़े दुख की बात है कि संसार में सब से महान संस्कृति और सभ्यता का दंभ भरने वाला हमारा देश आज बहुत नीचे गिर गया है. लोग बातें बहुत बड़ीबड़ी करते हैं, आदर्श ऊंचेऊंचे बघारते हैं, पर आचरण ठीक उस के विपरीत करते हैं.
अखिलेश पहले ही अपनी पत्नी की बेवफाई से टूटा हुआ था. उस के बाद आए दिन भाइयों से मनमुटाव रहने लगा. इतना होने के बावजूद भी उसे पता चला कि उस की पत्नी अभी भी उस के छोटे भाई से फोन पर बात करती है.
उस के बाद उस की दिमागी स्थिति खराब हो गई. उस ने कई बार पत्नी को भाई से बात करने से मना किया, लेकिन वह उस की एक सुनने को तैयार न थी.
घटना से 2 दिन पहले ही अखिलेश देर रात घर पहुंचा. उस के घर का दरवाजा अंदर से बंद था. उस ने कई बार आवाज लगाई, लेकिन दरवाजा नहीं खुला. तभी उस ने दरवाजे के झरोखे से झांक कर देखा तो अंजलि मोबाइल पर किसी से बात कर रही थी.
अखिलेश दरवाजा पीटता रहा, लेकिन मोबाइल पर बात करने के कारण अंजलि ने उस की आवाज नहीं सुनी. कुछ देर बाद दरवाजा खुला तो अखिलेश आगबबूला हो गया, ‘‘कर ली अपने यार से बात. लगता है तू इतनी जल्दी सुधरने वाली नहीं.’’
उस दिन अंजलि घर में अकेली थी. उस की चीखपुकार सुनने वाला भी कोई नहीं था. अखिलेश ने अंजलि को बुरी तरह से मारापीटा. उस के बाद भी वह हैवान बन बैठा. वह घर में रखा बांका निकाल लाया. गुस्से में उस ने बांके से काट कर पत्नी की हत्या कर दी.
पत्नी की हत्या करने के बाद उस की लाश पौलीथिन में लपेट कर बोरों के बीच छिपा दी. पत्नी को मौत की नींद सुलाने के बाद भी वह 2 दिनों तक पागलों की तरह ही इधरउधर भटकता रहा.
पत्नी की हत्या के बाद उस ने सोचा कि अब इस दुनिया में कुछ नहीं बचा. एक पत्नी ही जीने का सहारा थी. जब वही दगा दे गई तो भाई उस का क्या साथ देंगे. उस के भाई उस की खरीदी जमीन में से भी हिस्सा मांग रहे थे. जबकि वह उस में से उन्हें कुछ भी हिस्सा देने को तैयार न था.
उस ने कई बार उस जमीन पर अपना घर बनाने की कोशिश की. लेकिन उस के भाई बारबार पुलिस को बुला कर उसे रुकवा देते थे. जिस के कारण वह अपने भाइयों से नफरत करने लगा था. उसी नफरत के चलते उस ने प्लान बनाया कि वह एकएक कर अपने भाइयों को भी मौत की नींद सुला देगा.
उसी योजना के तहत उस ने 15 जुलाई, 2022 को भूमि विवाद को हल करने वाली बात कहते हुए भाई अजय, अनिल और पिता को घर बुला लिया.
जब तीनों इकट्ठा हो गए तो उस ने छोटे भाई अनिल को कोल्डड्रिंक लाने दुकान पर भेज दिया.
हालांकि उस का सब से पहला दुश्मन उस का छोटा भाई अनिल ही था. लेकिन अजय शुक्ला जमीन के मामले में ज्यादा ही टांग अड़ा रहा था. अजय को सामने देखते ही उस के तनबदन में आग लग गई. उस ने मौका पाते ही अजय पर बांके से हमला बोल दिया.
इस से पहले कि अजय कुछ समझ पाता, उस ने उसे बुरी तरह से बांके से लहूलुहान कर दिया था. उस के पिता बचाव में आगे आए तो उन्हें भी बुरी तरह से घायल कर दिया था.
अजय की मौके पर ही मौत हो गई थी. जब तक अनिल कोल्डड्रिंक ले कर वापस आया, वह घर का दरवाजा अंदर से बंद कर तमंचा ले कर छत पर चढ़ चुका था.
कथा लिखे जाने तक अखिलेश और उस के पिता राजनारायण शुक्ला की हालत स्थिर बनी हुई थी. दोनों का एक साथ इलाज चल रहा था. पुलिस अखिलेश की पत्नी अंजलि और उस के भाई अनिल के संबंधों के साथसाथ जमीन बंटवारे को ले कर विस्तृत जांच में लगी हुई थी.
अजय की मौत हो जाने के बाद से पत्नी आरती गहरे सदमे में थी. क्योंकि पति की हत्या के बाद उस के 4 बच्चे बेसहारा हो गए थे. जबकि अखिलेश के अभी तक कोई संतान नहीं थी.