आखिर लड़कों से क्यों नहीं पूछी जाती वर्जिनिटी

हर युवक या बौयफ्रैंड अपने लिए वर्जिन युवती या गर्लफ्रैंड ही चाहता है. भले ही वह खुद कितनी ही युवतियों की वर्जिनिटी भंग कर चुका हो. साथ ही यह माना जाता है कि यदि युवती वर्जिन है तो ही वह चरित्रवान है, लेकिन युवक के लिए ऐसी कोई शर्त ही नहीं है. उसे तो हमेशा ही वर्जिन माना गया है. आखिर वर्जिनिटी क्या है? युवक क्यों देते हैं इसे इतनी अहमियत? इस का युवती के चरित्र से क्या संबंध? ऐसे बहुत सारे सवालों के जवाब और गलतफहमियों को समझने की जरूरत है.

पिछले साल की बहुचर्चित फिल्म ‘पिंक’ में जब वकील कोर्ट में खुलेआम तापसी पन्नू के किरदार से सवाल करता है कि उस की वर्जिनिटी कब खोई थी, तो वहां सन्नाटा पसर जाता है. भारत में युवकयुवती का फर्क सिर्फ लिंगभेद तक ही सीमित नहीं रहता  बल्कि वर्जिनिटी के सवाल को ले कर भी है.

सेक्स और वर्जिनिटी

गर्लफ्रैंड जब अपने बौयफ्रैंड से मिलती है तो जाहिर है कि आज की जनरेशन सेक्स से परहेज नहीं करती. इसलिए दोनों में उन्मुक्त सेक्स होता है और पारंपरिक रोमांस भी, जब तक दोनों का अफेयर चलता है, कायदे से दोनों ही अपनी वर्जिनिटी खो चुके होते हैं.

बौयफ्रैंड चाहे कितनी ही बार सेक्स कर ले, कितनी ही युवतियों का दिल तोड़े, उस से कभी उस की वर्जिनिटी को ले कर सवाल नहीं पूछा जाता. युवती की शादी में भी कई सवाल पूछे जाते हैं, लेकिन युवक वर्जिन है या नहीं, इस सवाल को कोई नहीं उठाता. वहीं युवती का हर दूसरा बौयफ्रैंड यही उम्मीद रखता है कि उस की गर्लफ्रैंड वर्जिन हो यानी उस ने किसी के साथ सेक्स न किया हो. भले ही युवक ने अपनी ऐक्स गर्लफ्रैंड के साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए हों पर युवती उसे वर्जिन चाहिए.

युवक भी वर्जिन होते हैं

कालेज और क्लास में अकसर स्टूडैंट्स के बीच आम बहस का टौपिक होता है कि उन की गर्लफ्रैंड या क्लासमेट ने अपनी वर्जिनिटी कब खोई थी. बड़े दिलचस्प अंदाज में युवक अंदाजा लगाते हैं कि फलां युवती वर्जिन है या नहीं. अपनी गर्लफ्रैंड बनाने की पहली प्राथमिकता भी वह एक वर्जिन युवती को ही देते हैं, लेकिन वे खुद के गिरेबान में कभी झांक कर नहीं देखते कि वे वर्जिन कहां हैं?

अमिताभ बच्चन इस विषय पर अपनी राय रखते हुए कहते हैं कि अगर युवतियों से उन की वर्जिनिटी, कौमार्य या कुंआरेपन को ले कर सवाल पूछे जाते हैं तो युवकों से भी ये सवाल पूछे जाने चाहिए. इस में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए. वे आगे कहते हैं कि अगर किसी युवती से कुछ पूछा जाता है तो उस पर सवालिया निशान लगता है जैसे उस ने कोई गलत काम कर दिया है, लेकिन जब युवकों का मामला हो तो सवाल विस्मयादिबोधक चिह्न के साथ आता है जैसे उन्होंने कोई महान काम कर दिया हो.

वर्जिनिटी टैस्ट में फेल तो…

आएदिन अखबारों में इस तरह की खबरें पढ़ने को मिल जाती हैं, जहां वर्जिनिटी टैस्ट करने के नाम पर युवती की शादी टूट जाती है या फिर उसे प्रताडि़त किया जाता है. गर्लफ्रैंड और बौयफ्रैंड के रिश्ते भी इसी बात के आधार पर टूट जाते हैं. पिछले दिनों यह खबर आई थी कि महाराष्ट्र के नासिक में एक पति ने शादी के 2 दिन बाद ही अपनी पत्नी को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि वह वर्जिनिटी टैस्ट में फेल हो गई.

इतना ही नहीं युवती वर्जिन है या नहीं इस का फैसला करने के लिए पंचायत के सदस्यों द्वारा शादीशुदा जोड़े को बिस्तर पर सफेद चादर बिछा कर सेक्स करने के लिए कहा जाता है. सेक्स के बाद अगर चादर पर खून के धब्बे नहीं मिलते, तो युवती को वर्जिन नहीं माना जाता. इस मामले में युवक ने अपनी पत्नी के वर्जिनिटी टैस्ट का प्रमाण पंचायत को सौंपा. युवक ने सुबूत के तौर पर वह चादर पंचायत के सामने पेश की. इस चादर पर खून के धब्बे न होने पर पंचायत के सदस्यों ने पति को शादी खत्म करने की अनुमति दे दी.

वर्जिन टैस्ट और भ्रम

आम धारणा है कि जिस युवती ने पहली बार सेक्स कर लिया उस की फीमेल रिप्रोडक्टिव और्गन में पाई जाने वाली हाइमन झिल्ली फट जाती है और ब्लड निकल जाता है. अगर वह झिल्ली न फटे तो उसे वर्जिन होने की निशानी माना जाता है. बस, इसी बात को ले कर गलतफहमी है कि पहली बार सेक्स करते समय गर्लफ्रैंड को ब्लीडिंग हुई तो वह वर्जिन वरना नहीं, जबकि गाइनोकोलौजिस्ट और सेक्स ऐक्सपर्ट मानते हैं कि हाइमन झिल्ली का सेक्स संबंध और वर्जिनिटी से कोई वास्ता नहीं है. 90त्न युवतियों की यह झिल्ली साइकिलिंग, घुड़सवारी, डांस या अन्य शारीरिक क्रियाओं के दौरान फट जाती है. ऐसे में यह कहना कि युवती ने सेक्स किया है, गलत है.

बौयफ्रैंड की भी वर्जिनिटी जांचें

अगर बौयफ्रैंड बातबात पर वर्जिन होने का सुबूत मांगे तो उस का भी वर्जिनिटी का परीक्षण करना चाहिए. इस से न सिर्फ उसे सबक मिलेगा बल्कि वह वर्जिन जैसी बेमतलब की बातों को दोबारा नहीं पूछेगा. लेकिन यह कैसे पता करें? यदि आप को भी बौयफ्रैंड की वर्जिनिटी चैक करनी है तो उस से सवाल करें और उस के व्यवहार को समझें. मसलन, अगर बौयफ्रैंड वर्जिन है तो आप के साथ सेक्स करने में जल्दबाजी नहीं करेगा. सेक्स के दौरान भी काफी असहज दिखेगा. पहली बार संबंध बनाते समय घबराता है या फिर वह पोजीशन नहीं जमा पाता. वह आप के साथ संबध बनाने से कतराएगा, जबकि पहले से सेक्स संबंध बना चुका बौयफ्रैंड आसानी से सेक्स करेगा. वर्जिन बौयफ्रैंड गर्लफ्रैंड से एक दूरी बना कर बात करेगा और कई बार घबराएगा भी, जबकि वर्जिनिटी खो चुका बौयफ्रैंड खुल कर गर्लफ्रैंड को टच करेगा और जबतब सेक्स करने के मौके खोजेगा.

कुल मिला कर युवकयुवती का संबंध प्रेम पर टिका हो न कि सेक्स और वर्जिनिटी के सवाल पर. वर्जिन कोई नहीं होता. किसी ने सेक्स किया होता है और कोई पोर्न फिल्में देख कर खयाली सेक्स करता है इसलिए गर्लफ्रैंडबौयफ्रैंड का रिश्ता भरोसे पर टिका हो और जो युवक युवती से उस की वर्जिनिटी को ले कर सवाल करे उसे पहले युवती को अपनी वर्जिनिटी का सुबूत देना चाहिए.

साहब : महरू कामवाली बाई

महरू कामवाली बाई थी. बहुत ही ईमानदार. कपड़े इतने सलीके से पहनती थी कि अगर पोंछा या  झाड़ू लगाने के लिए  झुके तो मजाल है शरीर का कोई नाजुक हिस्सा दिख जाए. वह कई घरों में काम करती थी. उम्र होगी तकरीबन 42 साल.

रमेश अकेले रहते थे. उन्होंने शादी नहीं की थी और न करने की इच्छा थी. पिछले 4 सालों में महरू रमेश के बारे में और वे महरू के बारे में बहुतकुछ जान चुके थे.

अनपढ़ महरू ने जाति के बाहर शादी की थी. उस का पति शादी के पहले तो ठीक था, पर बाद में शराब पीने की लत लग गई थी. उस ने काम करना छोड़ दिया था. दिनरात शराब में डूबा रहता.

इस बीच महरू के एक बेटी हो गई. घर चलाने के लिए महरू को काम करना पड़ा. उस ने लोगों के घरों में  झाड़ूपोंछा लगाने और बरतन धोने का काम शुरू कर दिया. उसे जो मजदूरी मिलती थी, पति छीन कर शराब पी जाता था.

शराब के नशे में बहकते कदमों के चलते एक दिन महरू का पति सड़क हादसे में मारा गया. अब महरू को अपनी बेटी के लिए जीना था.

महरू जब रमेश के घर काम मांगने आई तो वे उस की सादगी से प्रभावित हुए थे. उन्होंने उस से साफ शब्दों में कहा था कि वे अकेले रहते हैं. घर पर कोई औरत नहीं है. खाना बाहर खाते हैं तो बरतन तो धोने के लिए निकलते नहीं. अब बचा  झाड़ूपोंछा, चाहो तो कर सकती हो.

पहले महरू को कुछ डर हुआ, फिर पड़ोस की एक औरत ने उसे रमेश के अच्छे चरित्र के बारे में बताया. उसे काम की जरूरत भी थी. लिहाजा, वह काम करने को तैयार हो गई.

शुरूशुरू में जब महरू काम करने आती और रमेश उस के सामने पड़ते तो उस के चेहरे पर डर सा तैर जाता. अकेले होने की वजह से कुछ संकोच रमेश को भी होता और कभीकभार यह खयाल भी आता कि पता नहीं रुपएपैसे ऐंठने के चक्कर में महरू उन पर कौन सा आरोप लगा दे. महरू जिस कमरे में होती, रमेश दूसरे कमरे में चले जाते.

आज होटल के भोजन में न जाने क्या था कि रमेश का सिर चकराने लगा. बुखार आ गया. उलटियां भी होने लगीं. वे रातभर बिस्तर पर पड़े रहे. घर के मैडिकल किट में बुखार और पेटदर्द की जो दवाएं थीं, वे खा चुके थे, लेकिन उन की हालत में कोई फर्क नहीं आया.

सुबह महरू ने जब दरवाजे की डोर बैल बजाई, तब रमेश ने बड़ी मुश्किल से दरवाजा खोला. महरू ने जब उन की हालत देखी तो वह घबरा गई. पूरा घर गंदा पड़ा था.

महरू ने सब से पहले गंदगी साफ की. रमेश के सिर पर हाथ रखा और देखा कि तेज बुखार था. उस ने अपने सस्ते से मोबाइल से फोन लगा कर अपनी बेटी को बुलाया.

जब तक महरू की बेटी वहां नहीं पहुंची, तब तक वह साफसफाई करती रही और रमेश को सुना कर बड़बड़ाती रही, ‘‘अकेले कब तक जिएंगे. कोई तो साथ चाहिए. शादी कर के घर बसा लेते तो एक देखभाल करने वाली होती. मैं नहीं आती तो पड़े रहते, पता भी नहीं चलता किसी को.’’

इस के बाद महरू ने रमेश को सहारा दे कर उठाया. उन के हाथमुंह धुलवाए. कपड़े बदलवाए और डाक्टर के पास ले जाने के लिए तैयार कर लिया.

तभी एक आटोरिकशा आ कर रुका. महरू की बेटी उस में से उतरी. बिलकुल फूल सी. गोरी दूध सी.

उम्र 15-16 साल. महरू ने उस से कहा, ‘‘तू यहीं रहना. मैं आती हूं साहब को डाक्टर से दिखा कर.’’

‘‘क्या हो गया?’’ रमेश की हालत देख कर बेटी ने अपनी मां से पूछा.

‘‘कुछ नहीं. अभी आती हूं. तू घर देखना,’’ महरू ने कुछ तेज आवाज में कहा. फिर बेटी ने कुछ न पूछा.

महरू ने रमेश को सहारा दे कर आटोरिकशा में बिठाया और डाक्टर के पास ले गई. इलाज करवाया. घर वापस लाई. जब तक वे ठीक नहीं हुए तब तक वह उन की देखरेख करती रही. वह अपने घर से दलिया बना कर लाती. समय से दवा देती.

अब महरू रमेश के लिए महज औरत शरीर न रही और न रमेश उस के लिए मर्द शरीर. यह फर्क मिट चुका था. संकोच खत्म हो चुका था. अब वे दोनों एकदूसरे के लिए इनसान थे, मर्दऔरत होने से पहले. भरोसा था एकदूसरे पर.

महरू ने प्रस्ताव रखा कि वह झाड़ूपोंछा करने के साथसाथ खाना भी बना दिया करेगी, ताकि रमेश को अच्छा भोजन मिल सके.

रमेश ने पूछा, ‘‘भोजन बनेगा तो बरतन भी साफ करने होंगे. उन का अलग से कितना देना होगा?’’ हो सकता है, उसे बुरा लगा हो. कुछ पल तक वह कुछ नहीं बोली. शायद यह सोच रही हो कि इतने अपनेपन के बाद भी पैसों की बात कर रहे हैं.

रमेश ने सुधार कर अपनी बात कही, ‘‘पैसों की जरूरत तो सब को होती है. दुनिया का हर काम पैसे से होता है. फिर तुम्हारी अपनी जरूरतें, तुम्हारी बेटी की पढ़ाईलिखाई. इन सब के लिए पैसों की जरूरत तो पड़ेगी ही. मैं मुफ्त में कोई काम कराऊं, यह मु झे खुद भी अच्छा नहीं लगेगा.’’

‘‘जो आप को देना हो, दे देना.’’

‘‘फिर भी कितना…? मु झे साफसाफ पता रहे ताकि मैं अपना बजट उस हिसाब से बना सकूं.’’

रमेश की बजट वाली बात सुन कर महरू ने कहा, ‘‘साहब, ऐसा करते हैं कि एक की जगह 3 लोगों का खाना बना लेंगे. समय और पैसे की भी बचत होगी. मैं अपने और बेटी के लिए खाना यहीं से ले जाऊंगी.’’

रमेश ने कहा, ‘‘जैसा तुम ठीक समझो.’’

इस के बाद जिस दिन महरू न आ पाती, उस की बेटी आ जाती. वह खाना बना कर रमेश को खिलाती और साफसफाई कर के अपने और मां के लिए भोजन ले जाती. रमेश को मांबेटी से लगाव सा हो गया था.

एक दिन महरू की बेटी आई. उस का चेहरा कुछ पीला सा दिख रहा था.

रमेश ने पूछा, ‘‘आज क्या हो गया मां को?’’

‘‘बाहर गई हैं. नानी बीमार हैं.’’

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद रमेश ने पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘दीपाली.’’

दीपाली धीरेधीरे  झाड़ूपोंछा करने लगी. बीचबीच में उस के कराहने की आवाज से रमेश चौंक गए.

‘‘क्या बात है? क्या हुआ?’’

‘‘कुछ नहीं साहब,’’ दीपाली कराहते हुए बोली.

थोड़ी देर में आह के साथ दीपाली के गिरने की आवाज आई. रमेश भाग कर रसोईघर में गए. दीपाली जमीन पर पड़ी थी. वे घबरा गए. उन्होंने उस के माथे पर हाथ रखा. माथा गरम था. वे सम झ गए कि इसे तेज बुखार है.

रमेश ने उसे अपने हाथों से उठा कर अपने ही बिस्तर पर लिटा कर अपनी चादर ओढ़ा दी. तुरंत डाक्टर को बुलाया. डाक्टर ने आ कर दीपाली को एक इंजैक्शन लगाया और कुछ दवाएं दीं.

रमेश के पास डबल बैड का एक ही बैडरूम था. दीपाली तेज बुखार में पड़ी हुई थी. वे दिनभर उस के पास बैठे रहे. उस के माथे पर ठंडे पानी की पट्टी रखते रहे. उस के लिए दलिया बनाया. उस के चेहरे को देखते रहे.

रमेश के मन में मोहमाया के फल खिलने लगे. सालों से बंद दिल के दरवाजे खुलने लगे. रेगिस्तान में बारिश होने लगी. जब उस के प्रति उन का लगाव जयादा होने लगा तो वे वहां से हट गए. लेकिन उस की चिंता उन्हें फिर खींच कर उस के पास ले आती.

रमेश ने अपनेआप को संभाला और डबल बैड के दूसरी ओर चादर ओढ़ कर खुद भी सो गए.

दीपाली तेज बुखार में तपती ‘मांमां’ बड़बड़ाने लगी. उस की आवाज से रमेश की नींद खुल गई. वे उस के पास पहुंचे और उस के माथे पर हाथ रख कर उसे बच्चे की तरह सहलाने लगे.

तभी दीपाली का चेहरा रमेश के सीने में जा धंसा. उस का एक पैर उन के पैर पर था. वह ऐसे निश्चिंत थी, मानो मां से लिपट कर सो रही हो.

रमेश की हालत कुछ खराब थी. आखिर उन की इतनी उम्र भी नहीं हुई थी कि 16 साल की लड़की उन की देह में दौड़ते खून का दौरा न बढ़ाए.

रमेश के शरीर में हवस की चींटियां रेंगने लगीं. अच्छी तो वह उन्हें पहले भी लगती थी, लेकिन प्यार की नजर से कभी नहीं देखा था. लेकिन आज जब इस तनहाई में एक कमरे में एक बिस्तर पर एक 16 साल की सुंदरी रमेश से लिपट कर सो रही थी, तो मन में बुरे विचार आना लाजिमी था.

रमेश उसे लिपटाए नींद की गोद में समा गए. सुबह जब उन की नींद खुली तो दीपाली बिस्तर पर नहीं थी. रमेश ने आवाज दी तो वह हाथ में  झाड़ू लिए सामने आ गई.

‘‘क्या कर रही हो?’’

‘‘ झाड़ू लगा रही हूं.’’

‘‘तुम्हें आराम की जरूरत है.’’

‘‘मैं अब ठीक हूं.’’

रमेश ने उसे पास बुला कर उस के माथे पर हाथ रखा. बुखार उतर चुका था.

‘‘अभी 2 दिन की दवा लेनी और बाकी है. अगर दवा पूरी नहीं ली, तो बुखार फिर से आ सकता है.’’

‘‘जी,’’ कह कर दीपाली काम में लग गई.

कभी ऐसा होता है कि मरीज पहली खुराक में ही ठीक हो जाता है, फिर इस में स्नेह भी काम करता है.

‘‘साहब, खाना लगा दिया है,’’ जब दीपाली ने यह कहा तो रमेश खाने की टेबल पर पहुंच गए. उन्होंने कहा, ‘‘तुम्हारी मां तो है नहीं. तुम भी यहीं खाना खा लो.’’

‘‘मैं बाद में खा लूंगी,’’ दीपाली ने शरमाते हुए कहा.

‘‘क्यों… कल तो मु झ से लिपटी थी. अब साथ में खाना खाने में शर्म आ रही है…’’

यह सुन कर दीपाली शरमा गई, पर कुछ नहीं बोली. फिर ज्यादा जोर देने पर वह साथ खाने बैठ गई.

‘‘दवा पूरी खाना,’’ रमेश ने खाना खाते हुए कहा.

‘‘जी.’’

‘‘कौन सी क्लास में पढ़ती हो?’’

‘‘12वीं क्लास में.’’

‘‘पढ़ाई कैसी चल रही है?’’

‘‘जी, ठीक चल रही है.’’

‘‘क्या बनने का इरादा है?’’

‘‘साहब, आगे तो अभी कालेज की पढ़ाई है. आगे क्या पता? मां पढ़ा पाएंगी या नहीं… हो सकता है, मां मेरी शादी करा दें.’’

‘‘हां, यह भी हो सकता है.’’

दीपाली ने रमेश से कहा, ‘‘साहब, मैं आप से कुछ पूछ सकती हूं… बुरा तो नहीं मानेंगे आप?’’

‘‘पूछो, क्या पूछना चाहती हो?’’

‘‘आप ने शादी क्यों नहीं की?’’

‘‘सब वक्त की बात है. किसी को मैं पसंद नहीं आया, कोई मु झे पसंद नहीं आई. फिर शादी के लिए मैं किसे आगे करता. न मातापिता, न भाईबहन. लोग अकेले लड़के को अपनी लड़की देने में कतराते हैं.’’

‘‘आप बहुत अच्छे हैं साहब.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘कल रात मु झे आप में अपनी मां और पिता दोनों दिखाई दिए.’’

‘‘क्या मेरी उम्र भी है मातापिता की उम्र जैसी?’’

‘‘उम्र नहीं, गुण हैं आप में ऐसे. पहले मैं आप को केवल साहब की नजर से देखती थी…’’

‘‘और अब?’’

‘‘अब मैं आप को आदर की नजर से देखती हूं.’’

रमेश ने दीपाली से कहा तो नहीं, लेकिन मन ही मन सोचा, ‘प्यार की नजर से तो कोई नहीं देखता. प्यार भी कहा होता तो अच्छा लगता. दिल को तसल्ली मिलती.’

अब दीपाली रोज काम करने आती.

एक दिन रमेश ने पूछा, ‘‘तुम्हारी मां अभी तक नहीं आई?’’

‘‘वे तो कब की आ चुकी हैं, लेकिन बीमार हैं.’’

रमेश ने कई बार सोचा कि महरू को देखने जाएं, लेकिन वे कभी भूल जाते, तो कभी कोई और काम आ जाता.

एक दिन घबराई हुई दीपाली रमेश के पास आई और बोली, ‘‘साहब, मां की तबीयत बहुत ज्यादा खराब है. वे आप को बुला रही हैं.’’

दीपाली की घबराहट से रमेश सम झ गए कि बात गंभीर है. उन्होंने तुरंत तैयार हो कर उसे अपनी मोटरसाइकिल पर बिठाया और जैसे वह बताती गई, वे उसी रास्ते पर मोटरसाइकिल घुमा देते.

रमेश ने दीपाली के कहने पर एक छोटी सी गंदी बस्ती में एक कच्चे मकान के सामने मोटरसाइकिल रोकी.

दीपाली ने उतरते हुए कहा, ‘‘अंदर आइए साहब.’’

रमेश ने अंदर जा कर देखा. महरू का शरीर बिलकुल सूख चुका था. रमेश को देख कर उस के चेहरे पर खुशी

तैर गई. उस ने उठने की कोशिश की, लेकिन उठ न सकी.

‘‘लेटी रहो,’’ रमेश ने कहा. दीपाली अपनी मां के पास बैठ गई.

‘‘क्या हो गया है तुम को? तुम तो मायके गई थीं?’’

‘‘साहब…’’ महरू ने उखड़ती सांसों के साथ कहा, ‘‘डाक्टर ने मु झे 1-2 दिन का मेहमान बताया है. मु झे अपनी बेटी की चिंता है. मेरे अलावा इस का कोई नहीं है. न कोई सगेसंबंधी, न रिश्तेदार. इस घर में इस का अकेले रहने का मतलब है कि कभी भी…’’ आगे वह चुप रही, फिर थोड़ी देर बाद बोली, ‘‘साहब, आप से एक गुजारिश है. आप भले आदमी हैं. आप मेरी बेटी को अपना लीजिए. चाहे नौकरानी सम झ कर, चाहे…’’ फिर वह रुक गई, ‘‘आप भी अकेले हैं. यह आप का घर संभाल लेगी. अपनी औकात से बड़ी बात कर रही हूं, लेकिन मैं किसी और पर भरोसा भी नहीं कर सकती.

‘‘आप को इस के भविष्य के लिए जो अच्छा लगे, करना. मैं इसे आप के सहारे छोड़ कर जा रही हूं…’’ और एक हिचकी के साथ महरू ने दम तोड़ दिया.

दीपाली जोरजोर से रोने लगी. बस्ती के बहुत से लोग जमा हो गए. रमेश ने दीपाली को हौसला दिया. महरू का अंतिम संस्कार कराने के बाद वे उसे अपने साथ ले आए.

महरू रमेश पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी सौंप कर चली गई थी. इस लड़की से वे क्या रिश्ता बनाएं? उम्र का भी इतना बड़ा फासला है. कैसे इस से शादी कर लें. बिना शादी किए किस रिश्ते से रखें? लोग क्या कहेंगे? कामवाली बाई की इतनी कम उम्र की लड़की की गरीबी का फायदा उठा कर शादी कर ली. फिर कानूनन वह नाबालिग थी.

बहुत सोचविचार के बाद रमेश ने दीपाली को गर्ल्स होस्टल में दाखिला दिला दिया. वह न केवल उन पर आश्रित थी, बल्कि उसे उन से लगाव भी था. मना करने के बाद भी वह खाना बनाने आ जाती थी. उन के और दीपाली के बीच बहुत सी बातें होतीं. एक तरह से रमेश उस के गार्जियन बन चुके थे.

दीपाली अब 18 साल से ऊपर की हो चुकी थी. अपनी पढ़ाई में बिजी होने के चलते वह आ नहीं पाती थी. अब तो  छुट्टी के दिन भी वह नहीं आ पाती थी.

रमेश को लगा कि दीपाली अब उन से कतराने लगी है.

एक दिन एक अनजान नंबर से फोन आया, ‘साहब, आप कैसे हैं?’

‘‘अरे, कौन…? दीपाली? मैं ठीक हूं. तुम कैसी हो?’’ रमेश ने पूछा.

‘साहब, मैं ठीक हूं. क्या आप को मैं पसंद नहीं?’

‘‘ऐसा क्यों पूछ रही हो तुम?’’

‘तो फिर आप ने शादी के लिए क्यों नहीं कहा?’

‘‘देखो दीपाली, मैं तुम से प्यार करता हूं. शादी जिंदगीभर का बंधन होता है और मैं तुम से उम्र में भी बहुत बड़ा हूं. तुम्हें बाद में परेशानी होगी. फिर क्या करोगी?’’

‘मैं मैनेज कर लूंगी. आप के साथ मैं हमेशा खुश रहूंगी. एक लड़की को इस से ज्यादा क्या चाहिए. जो समस्या होगी, वह हम दोनों की होगी.

‘साहब, आप मन से सारे संकोच निकाल कर मुझे अपना लीजिए.’

‘‘तुम बालिग हो गई हो दीपाली. मेरी जिंदगी में तुम्हारा स्वागत है.’’

रमेश की मुर झाती जिंदगी में फिर से बहार आ गई. शादी के इतने साल बाद भी दीपाली रमेश को साहब ही कहती है.

गूंगी : लालाजी की कंपनी के सभी चालक थे

महेंद्र सिंह को थाने का काम संभाले हुए अभी 3 दिन ही हुए थे कि तभी कत्ल की वारदात हो गई. मरने वाला शहर का मशहूर गुंडा राणा था, जो एक ढाबा चलाता था.

उस ढाबे की ओट में राणा और भी कई गैरकानूनी धंधे करता था. रात में ढाबा बंद कर के वहीं सामने ही चारपाई डाल कर वह सोया करता था. रात में भी लेनदेन करने वाले लोग आते रहते थे. उन से माल ले कर अंदर रखना या अंदर रखा हुआ माल निकाल कर देना और रकम वसूल करना, ये काम वह रात में भी करता रहता था.

उस रात भी राणा अपनी चारपाई पर सोया हुआ था. तभी न जाने कौन आदमी उस पर ट्रक चढ़ा कर चला गया. ट्रक के अगले पहिए के नीचे राणा और उस की चारपाई का कचूमर निकला पड़ा था. रुपएपैसे को किसी ने छुआ भी नहीं था. इस से यह बात साफ थी कि हत्यारे का मकसद केवल राणा की हत्या करना ही था.

दिन निकल आया था. राणा की लाश को देखने के लिए भीड़ बढ़ती जा रही थी. राणा को मरा देख कर सभी खुश थे. उसी भीड़ में एक आदमी ऐसा भी था, जो डर से थरथर कांप रहा था. वह था उस ट्रक का चालक, जिस से राणा को कुचला गया था.

राणा के ढाबे के सामने काफी बड़ा खुला मैदान था. ट्रक चालक रात में खाना खा कर अपनेअपने ट्रक वहीं खड़े कर के खुद ट्रक चालक संघ के दफ्तर में सोने के लिए चले जाते थे. रात में राणा तकरीबन जागता ही रहता था. उस के रहते कोई भी आदमी किसी ट्रक को चुराने की हिम्मत नहीं कर सकता था.

उस ट्रक चालक के बयान के मुताबिक, रात में राणा के ढाबे में खाना खा कर अपना ट्रक वहीं खड़ा कर के वह सोने चला गया था. सवेरे नहाधो कर जब वह आगे का सफर तय करने के लिए वहां पहुंचा, तो ट्रक को राणा पर चढ़ा हुआ पाया. उस के साथ रात में सोए दूसरे ट्रक चालकों ने उस के बयान को सही बताया.

एक बात साफ मालूम पड़ रही थी कि उस ट्रक चालक के बयान में रत्तीभर भी झूठ नहीं था. यह बात भी साफ थी कि राणा को मारने वाला आदमी ट्रक चलाने के तरीके का पूरा जानकार था. तभी तो चाबी न रहने पर भी तारें जोड़ कर उस ने ट्रक चालू कर लिया था.

आसपास की दुकानों में लोगों से पूछताछ करने से भी कोई फायदा नहीं हुआ, क्योंकि रात में सभी लोग घर चले जाते थे. वहां केवल राणा ही सोता था.

भीड़ बढ़ती जा रही थी. अचानक भीड़ को चीर कर एक अधपगली गूंगी लड़की बारबार लाश तक पहुंचने की कोशिश कर रही थी. सिपाही उसे पीछे धकेलते, लेकिन वह फिर आगे पहुंच जाती.

कहीं वह राणा की कोई दूरदराज की रिश्तेदार तो नहीं या कातिल के बारे में कुछ जानती तो नहीं, अपना यह शक दूर करने के लिए महेंद्र सिंह ने उसे अपने पास बुलाया, पर उस से नजरें मिलते ही वह अधपगली सिपाहियों के हाथ से छूट कर ऐसी दूर भागी कि वापस आने का नाम नहीं लिया.

आसपास के ढाबे वालों ने बताया कि वह कोई पागल गूंगी लड़की है. वह यहीं घूमती रहती है. ढाबे वाले उसे रोटी दे देते हैं. पिछले 3 दिनों से राणा के ढाबे की ओर इशारे करकर के वह लगातार रोए जा रही थी. आज वह बिलकुल चुप है. जितने मुंह उतनी बातें.

भीड़ में से कुछ लोगों ने यह भी कहा कि वह गूंगी लड़की कोई पहुंची हुई लड़की है. उसे राणा की मौत का अंदाजा 3 दिन पहले ही लग गया था. तभी तो वह उस की ओर इशारे करकर के रो रही थी. यह बात अलग थी कि उस बेजबान की बात कोई आदमी नहीं समझ सका.

महेंद्र सिंह का वह दिन कागजात तैयार करने में ही बीत गया. रात में बिस्तर पर लेटते ही गूंगी का चेहरा उस की आंखों के सामने घूमने लगा. सूरत जानीपहचानी लग रही थी. पहले शायद कभी सफर के दौरान किसी रेलवे प्लेटफार्म पर देखा होगा. उसे देख कर वह भागी क्यों?

शायद महेंद्र सिंह की वरदी से वह डर गई, लेकिन वरदी पहने तो और भी सिपाही वहां मौजूद थे. वह उन से क्यों नहीं डरी? कहीं उस ने कातिल को देखा या कत्ल की योजना बनाने वालों की 3 दिन पहले बातचीत सुनी तो नहीं है? ऐसे ही अनेक सवालों के जवाब सोचतेसोचते न जाने कब महेंद्र सिंह को नींद आ गई.

सवेरे देर से महेंद्र सिंह की नींद उस समय टूटी, जब खिड़की के शीशों में से सूरज की किरणें मुंह पर पड़ने लगीं. आंखें खुलते ही खिड़की के पीछे किसी की मौजूदगी का एहसास हुआ. महेंद्र सिंह ने तुरंत खिड़की का दरवाजा खोला, तो गूंगी को दौड़ कर भागते पाया.

क्या वह उसे कुछ बताना चाहती थी? अगर हां, तो फिर भाग क्यों गई? महेंद्र सिंह उसे दूर तक दौड़ते हुए देखता रहा.

इस के बाद भी कई बार महेंद्र सिंह को एहसास हुआ कि वह गूंगी लड़की उस की खिड़की के पीछे है, लेकिन धीरेधीरे उस ने इस ओर ध्यान देना कम कर दिया. उस ने सोचा कि एक गूंगी अधपगली लड़की अगर इस कत्ल के बारे में कुछ जानती भी होगी, तो अपनी मरजी से ही बताएगी. मानमनौव्वल या जोरजबरदस्ती करने से कोई फायदा तो है नहीं. उधर राणा का भी कोई अपना आदमी कातिल को सजा दिलवाने में दिलचस्पी नहीं ले रहा था.

उस इलाके में राणा जैसे अनेक अपराधी थे. रोज किसी न किसी की धरपकड़ चलती ही रहती थी. सब की पहुंच बहुत ऊपर तक थी. जमानत पर छूट कर वे फिर अपने धंधे में लग जाते थे. ऐसे ही एक अपराधी को एक दिन हथकड़ी पहनानी पड़ गई. जमानत पर छूट कर जाते समय वह धमकी भी दे गया.

महेंद्र सिंह रात में अपने क्वार्टर में सोया हुआ था, तभी किसी ने जोरजोर से दरवाजा खटखटाना शुरू कर दिया. बारबार पूछने पर भी कोई जवाब नहीं दे रहा था. कहीं गूंगी तो कुछ बताने नहीं चली आई?

तंग आ कर महेंद्र सिंह को दरवाजा खोलना ही पड़ा. दरवाजा खोलते ही 4 गुंडों ने उसे जकड़ लिया. उन का सरगना वही अपराधी था, जो सवेरे जमानत पर छूट कर जाते समय उसे धमकी दे गया था.

सरगना के इशारे पर वे लोग महेंद्र सिंह को रस्सी से बांध कर एक ट्रक, जो कुछ दूरी पर सड़क पर खड़ा था, तक घसीटते हुए ले जाने लगे. उस की कुहनी और घुटने छिलने लगे, सहने की ताकत जवाब देने लगी.

तभी एक अनसोची घटना घटी. उन के ट्रक की रोशनी उन पर पड़ने लगी, जिसे देख कर वे हैरान रह गए, यह सोच कर कि वे सब तो यहां हैं, फिर ट्रक चला कर उन के पास कौन ला रहा है?

इस से पहले कि वे किसी फैसले पर पहुंचते, तेजी से आते हुए ट्रक से उन में से एक आदमी कुचला गया. अब बाकी चारों आदमी भागने लगे, लेकिन ट्रक भी उस ऊबड़खाबड़ रास्ते पर उन के पीछे लगा हुआ था.

इसी बीच महेंद्र सिंह ने खुद को रस्सी की जकड़ से आजाद किया और उस ट्रक के पीछे भागने लगा. उस के चारों दुश्मन भागतेभागते सड़क पर चढ़ गए. ट्रक चालक ने उन के पीछे ही ट्रक को सड़क पर चढ़ा लिया. अब उन्हें अपनी जान बचाने का एक ही उपाय नजर आया.

सड़क के अगले मोड़ पर बाईं ओर एक गहरा गड्ढा था, जिस में ट्रक उतारना ट्रक चालक के लिए अपनी मौत को बुलाना था. वे चारों अपराधी उस गड्ढे में उतर गए. लेकिन अगले ही पल उन की भयंकर चीखें सुनाई देने लगीं.

दरअसल, चालक ट्रक को उसी गड्ढे में उतारने लगा था. वे लुढ़कते हुए गड्ढे के धरातल तक पहुंच गए. अब बचने का कोई रास्ता नहीं था. चारों की लंबी चीख सुनाई पड़ी और फिर शांति छा गई. वे चारों ट्रक के नीचे कुचले जा चुके थे.

अपने जीवनदाता उस कुशल ट्रक चालक को देखने के लिए महेंद्र सिंह गड्ढे में उतर गया. चालक की सीट पर नजर पड़ते ही महेंद्र सिंह की आंखें खुली की खुली रह गईं. चालक और कोई नहीं, वही गूंगी लड़की थी.

दरवाजा खोल कर ज्यों ही महेंद्र सिंह ने उस गूंगी को सीट से नीचे उतार कर नजदीक से ध्यान से देखा, तो अचानक उस के मुंह से ‘कल्लो’ निकल गया. यह सुन कर वह फूटफूट कर रोने लगी.

कमला ट्रांसपोर्ट कंपनी के मालिक लाला केदारनाथ की एकलौती बेटी थी. कमला को इस हालत में देख कर महेंद्र सिंह रो पड़ा. गड्ढे से बाहर ला कर महेंद्र सिंह उसे उस की झोंपड़ी तक छोड़ आया.

कुछ दिनों बाद महेंद्र सिंह अपना परिवार दिल्ली में छोड़ आया. राणा के साथसाथ उन 5 गुंडों का ट्रक के नीचे कुचले जाने का मामला धीरेधीरे ठंडा पड़ गया.

इस बीच महेंद्र सिंह की बदली दिल्ली हो गई. तब तक कल्लो अपने परिवार के हंसीखुशी भरे माहौल में रह कर सामान्य हो गई थी. अच्छे डाक्टरों से उस का इलाज करवाया, जिस से वह फिर बोलने लगी.

बाद में उसी की जबान से उस की जो कहानी सुनने को मिली, तब महेंद्र सिंह रोने लगा था. करोड़पति बाप की एकलौती बेटी कमला की परवरिश राजकुमारियों की तरह हुई थी. पढ़ने के साथसाथ वह खेलकूद में भी तेज थी. कालेज के दिनों में उस ने नैशनल लैवल की कई दौड़ प्रतियोगिताओं में पहला मैडल जीता था, इसीलिए वह कालेज में ‘उड़नपरी’ के नाम से जानी जाती थी.

पढ़ाई, खेलकूद के साथसाथ कमला को गाडि़यां चलाने का भी बहुत शौक था. लालाजी के लाख मना करने पर भी वह स्कूटर, कार, ट्रक वगैरह अच्छी तरह चला लेती थी.

लालाजी की कंपनी के सभी चालक, क्लीनर वगैरह उसे अपनी बहन या बेटी मानते थे. वह भी उन के साथ ट्रक की मरम्मत करने में मदद किए बिना नहीं मानती थी. उन के साथ हाथ बंटातेबंटाते वह खुद भी कुशल मिस्त्री बन गई थी.

इतने गुणों के बावजूद कमला में एक कमी भी थी. उस का रंग सांवला था, इसलिए बचपन में मैं उसे ‘कल्लो’ कह कर चिढ़ाया करता था.

महेंद्र सिंह के पिताजी भी उसी कंपनी में चालक थे. उन की मौत के बाद लालाजी ने महेंद्र सिंह को अपने बेटे की तरह पालापोसा और पढ़ायालिखाया था.

कमला को मां का प्यार महेंद्र सिंह की मां से मिला था, क्योंकि उस की मां की मौत तभी हो गई थी, जब वह 4 महीने की थी. वे दोनों सगे भाईबहन की ही तरह थे.

लालाजी को ‘कल्लो’ के लिए गरीब घर का एक होनहार लड़का राकेश मिल गया. ‘कल्लो’ ब्याह कर अपनी ससुराल चली गई और महेंद्र सिंह रोजीरोटी के चक्कर में दिल्ली आ कर बस गया.

कमला की शादी के कुछ दिनों बाद लालाजी की मौत हो गई. महेंद्र सिंह फिर कभी उधर गया नहीं. इस तरह ‘कल्लो’ से उस का नाता कई साल तक टूटा रहा.

लालाजी के मरते ही लाखों की दौलत देख कर कमला के पति राकेश के तेवर बदलने लगे. अब कमला उसे बदसूरत लगने लगी. वह अपनी रातें पैसे से खरीदी जाने वाली सुंदरियों के साथ गुजारने लगा. शराब के नशे में चूर हो कर वह कमला को तरहतरह के कष्ट देता.

एक रात तो सताने की हद ही पार हो गई. कमला अपनी जान बचा कर दौड़ी, लेकिन अपने बोलने की ताकत खो बैठी. दौड़तेदौड़ते वह रेलवे स्टेशन पर पहुंची और एक रेंगती गाड़ी में चढ़ गई.

दुनिया में लेदे कर महेंद्र सिंह ही उस का एक भाई था, जिस का कुछ पताठिकाना उसे मालूम नहीं था. न ही महेंद्र सिंह को कुछ पता चला कि ‘कल्लो’ के साथ क्या गुजर रही थी. धक्के खातीखाती वह किसी तरह राणा के ढाबे तक पहुंच गई, जहां और भी ढाबे थे. दो वक्त की रोटी उसे वहां मिल जाती और रात किसी झुग्गी में या बैंच पर गुजार लेती.

एक रात ठंड से बचने के लिए वह ढाबे की भट्ठी से चिपकी हुई सो रही थी, तभी राणा उस पर टूट पड़ा. वह बहुत चीखीचिल्लाई, लेकिन वहां उसे बचाने वाला कोई नहीं था.

वह लगातार 3 दिनों तक रोरो कर राणा की तरफ इशारे कर के अपनी फरियाद सुनाती रही, लेकिन किसी ने नहीं समझा. रोतेरोते उस के आंसू सूख गए.

एक दिन वह फटीफटी आंखों से रात के अंधेरे को निहार रही थी. उसे चारों ओर ट्रक ही ट्रक खड़े दिखाई दे रहे थे. वह एक ट्रक में चालक की सीट पर बैठ गई. चूंकि वहां चाबी नहीं थी, इसलिए उस ने 2 तारों को जोड़ कर ट्रक चालू कर लिया. ट्रक के अगले पहिए के नीचे राणा को चारपाई समेत कुचल दिया.

News Kahani: चुनावी दंगल में इश्क का मंगल

हरियाणा में विधानसभा चुनाव का प्रचार जोर पकड़ चुका था. कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में सीधी टक्कर थी और कहीं न कहीं कांग्रेस इस बार बाजी मारती दिख रही थी. गांवदेहात में भी चुनावी चर्चाएं गरम थीं.

जींद जिले के एक गांव में चौपाल पर बैठक जमा थी. हुक्के की गुड़गुड़ाहट के साथसाथ सियासी दलों की बखिया भी उधेड़ी जा रही थी.

‘‘भाई, इस बार कांग्रेस ने विनेश फोगाट पर सही दांव खेल दिया है. कमल के फूल पर भारी पड़ेगा हाथ,’’ एक ताऊ ने अपनी बात रखी.

‘‘ताऊ, ओलिंपिक में मैडल जीतना एक बात है, पर राजनीति के अखाड़े में पैर जमाना इतना आसान नहीं. नेता अपने सगे के नहीं होते, फिर विनेश तो नईनई इस खेल में उतरी है,’’ सतीश नाम के एक नौजवान ने अपनी बात रखी.

23 साल का सतीश भारतीय जनता पार्टी का कार्यकर्ता था और पार्टी के प्रचार से जुड़ा था. उस के चाचा इस बार भाजपा के झंडे तले चुनाव लड़ रहे थे. आज भी उसे पास के गांव में पोस्टर और स्टीकर चिपकाने जाना था.

सतीश के चाचा चौधरी प्रताप सिंह इलाके के दबंग आदमी थे और पिछली बार भी भाजपा से विधायक रह चुके थे. पर इस बार मामला थोड़ा डांवांडोल था, क्योंकि 3 कृषि कानून से उपजे किसान आंदोलन के बाद दिल्ली में पहलवानों के धरने ने भाजपा का नुकसान किया था, तभी तो मनोहर लाल को समय से पहले मुख्यमंत्री पद से हटा दिया था और नायब सिंह सैनी को कमान सौंप दी गई थी, ताकि गैर जाट समुदाय के वोटों को साधा जा सके.

सतीश घर से तैयार हो कर दूसरे कार्यकर्ताओं के साथ प्रचार के लिए तय किए गए एक गांव में जा पहुंचा था. वहां उन्हें हर घर पर चौधरी प्रताप सिंह के स्टीकर चिपकाने थे और घरों में पंपलेट बांटने थे. पर आज माहौल थोड़ा गरम था, क्योंकि कांग्रेस पार्टी की उम्मीदवार सुशीला देवी के कार्यकर्ता भी वहां प्रचार कर रहे थे.

सतीश देखने में ठीकठाक था, पर बोलने में बड़ा माहिर था. उस ने देखा कि कांग्रेस पार्टी की एक कार्यकर्ता कुछ बेमन से वहां आई थी. वह लड़की तकरीबन 21 साल की होगी और धूप और उमस से उस का चेहरा लाल हो रखा था. शायद उसे प्यास भी लगी थी.

सतीश ने अपने एक साथी से पानी की बोतल मांगी और उस लड़की के पास जा कर बोला, ‘‘स्टीकर तो कोई और भी चिपका देगा, तुम पहले पानी पी लो.’’

सतीश के गले में भगवाई गमछा देख कर वह लड़की बोली, ‘‘दुश्मन के हाथ से पानी पी लूं… यह तो हमारे ‘हाथ’ के निशान के साथ गद्दारी होगी. सुशीला देवी मेरी दूर की मौसी हैं. जब वे जीत जाएंगी, तब तुम शौक से मुझे पानी पिला देना. मैं मना नहीं करूंगी.’’

‘‘तुम तो इस चुनाव प्रचार को बड़ा सीरियसली ले रही हो… ठीक है, हम अलगअलग पार्टी से हैं, पर इस में पानी का क्या कुसूर है. पी लो, अपनी मौसी के जीतने के बाद तुम मुझे चाय पिला देना,’’ सतीश ने पानी की बोतल उस लड़की की तरफ बढ़ाते हुए कहा.

वह लड़की अब मना नहीं कर सकी और बोतल मुंह से लगा कर गटागट पानी पी गई.

‘‘मांबाप ने कुछ नाम भी रखा है या नहीं?’’ सतीश ने पूछा.

‘‘पूनम… और यह नाम मेरे दादा ने रखा है, क्योंकि मैं पूनम की रात को पैदा हुई थी,’’ उस लड़की ने बताया.

इसी बीच सतीश का एक साथी वहां आया और बोला, ‘‘पानी ही पिलाता रहेगा या लोगों से भी मिलेगा? शाम को चाचाजी पूरे दिन का हिसाब लेंगे.’’

सतीश का ध्यान उस लड़की से हटा और वह अपने साथी से बोला, ‘‘ठीक है, समझ गया. तू चल, मैं अभी आया.’’

‘‘तुम्हारा क्या नाम है?’’ पूनम ने पूछा.

सतीश बोला, ‘‘इतनी भी क्या जल्दी है. 2 घंटे के बाद गांव के बाहर बसस्टैंड के पास ‘चौधरी टी स्टौल’ पर मिलते हैं, वहीं नाम भी बता दूंगा.’’

यह सुन कर पूनम हंस पड़ी. उस ने इशारे में हां की और अपने कार्यकर्ताओं में जा मिली.

ठीक 2 घंटे बाद सतीश और पूनम ‘चौधरी टी स्टौल’ पर बैठे चाय की चुसकियां ले रहे थे.

‘‘मेरा नाम सतीश है. मैं ने बीए किया है और अब अपने चाचा प्रताप सिंह का चुनाव प्रचार कर रहा हूं.’’

‘‘मैं बीए के फाइनल ईयर में हूं. राजनीति से मेरा कोई खास लगाव नहीं है, पर मौसी को टिकट मिला है, तो यह काम कर रही हूं.’’

‘‘क्या सुशीला देवी तुम्हारी सगी मौसी हैं?’’ सतीश ने पूछा.

‘‘नहीं, मेरी मां के गांव की हैं, इसलिए रिश्ते में मेरी मौसी हो गईं,’’ पूनम बोली.

‘‘ओह, तो तुम भी रिश्ता निभा रही हो. वैसे, राजनीति में कोई दिलचस्पी है भी या नहीं?’’ सतीश ने पूछा.

‘‘5 अक्तूबर को प्रदेश में चुनाव है और 8 अक्तूबर को नतीजे आएंगे. इस बार कांग्रेस जीत रही है और भाजपा हार रही है,’’ पूनम ने कहा.

‘‘बड़ा यकीन है तुम्हें… इस की वजह?’’ सतीश ने चाय की चुसकी लेते हुए पूछा.

‘‘भाजपा में तो गुटबाजी बहुत है. अखबारों में सब छप रहा है. केंद्रीय राज्यमंत्री राव इंद्रजीत सिंह कैबिनेट मंत्री न बनाए जाने से नाराज हैं. उन के समर्थक भी इस बात का खूब प्रचार कर रहे हैं. मीडिया के सामने अपने समर्थकों की नाराजगी की बात राव इंद्रजीत सिंह भी कह चुके हैं. ऐसे में भाजपा के लिए दक्षिण हरियाणा में उन की नाराजगी भारी पड़ सकती है.

‘‘भाजपाई और हरियाणा के गृह मंत्री रह चुके अनिल विज भी काफी लंबे समय से मुख्यधारा से अलग चल रहे हैं. हालांकि, वे पार्टी के खिलाफ कुछ नहीं कहते, लेकिन उन की पार्टी से नाराजगी की बात सभी को पता है. अनिल विज की नाराजगी सिर्फ पंजाबी समाज में भाजपा की पकड़ पर असर नहीं डालती, बल्कि जीटी रोड बैल्ट पर भी खासा असर करती है.

‘‘लोकसभा चुनावों के बाद देश के कई राज्यों में भाजपा के नेताओं की नाराजगी देखने को मिल रही है. ऐसे में इन नेताओं की नाराजगी को पार्टी ने समय रहते अगर दूर नहीं किया, तो उस का फायदा कांग्रेस पार्टी उठाने की पूरी कोशिश करेगी.’’

‘‘वाह भई वाह, अपने खेत में घुटनों तक पानी भरा है, वह नहीं दिख रहा तुम्हें…’’ सतीश हंसते हुए बोला.

‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’ पूनम ने नाराजगी जताते हुए पूछा.

‘‘अपनी कांग्रेस की फूट नहीं दिखती तुम्हें… हुड्डा गुट, कुमारी शैलजा गुट और रणदीप सुरजेवाला गुट… तीनों अपनीअपनी डफली अपनाअपना राग अलाप रहे हैं. किसी के बैनर से भूपेंद्र सिंह हुड्डा गायब हैं, तो कोई अपनी ही पदयात्रा कर रहा है. इस बार तो कोई सीएम का चेहरा भी नहीं है.

‘‘एक तरफ दीपेंद्र हुड्डा ‘हरियाणा मांगे हिसाब’ यात्रा को लीड करने की बात करते हैं, तो वहीं दूसरी तरफ कुमारी शैलजा अपनी अलग पदयात्रा निकालने पर अड़ जाती हैं. रणदीप सुरजेवाला ने भी प्रदेश की सियासत से लंबे समय से दूरी बनाए हुई है. उन की सक्रियता प्रदेश में उस तरह की दिखाई नहीं देती है, जैसी उन के राज्यसभा सांसद बनने से पहले हुआ करती थी.’’

‘‘चाय खत्म हो गई है. अब चलें…?’’ पूनम को ये राजनीतिक बातें अब बोर करने लगी थीं या फिर वह कांग्रेस की बुराई नहीं सुन सकती थी.

‘‘अपना मोबाइल नंबर तो दे दो… फोन कर के तुम्हें राजनीति की बातों से पकाऊंगा,’’ सतीश ने जब यह कहा, तो पूनम हंस पड़ी.

दोनों ने एकदूसरे को अपना मोबाइल नंबर दिया और वहां से चले गए.

एक दिन दोपहर को पूनम अपनी मौसी सुशीला देवी के औफिस में बैठी थी. कार्यकर्ताओं की मीटिंग चल रही थी. किसी ने शिकायत कर दी थी कि पूनम अब काम पर ध्यान नहीं दे रही है.

‘‘क्यों पूनम, कोई दिक्कत है क्या प्रचार करने में?’’ सुशीला देवी ने पूछा.

‘‘नहीं मौसीजी, ऐसा कुछ नहीं है,’’ पूनम ने कहा.

‘‘तो फिर वह लड़का कौन है, जो भाजपा के प्रचार से ज्यादा तुम में दिलचस्पी ले रहा है. ऐसे लोगों से बच कर रहो. ये कब अंदर की बात उगलवा लेंगे तुम्हें पता भी नहीं चलेगा,’’ सुशीला देवी ने चिंता जाहिर की.

‘‘सतीश से मेरी ज्यादा जानपहचान नहीं है. हम कभीकभार ही मिले हैं,’’ पूनम ने कहा.

‘‘ठीक है, पर तुम अब से अपने काम पर ज्यादा फोकस करो. कुछ दिन में चुनाव प्रचार बंद हो जाएगा, फिर उस के बाद देखेंगे कि आगे क्या करना है,’’ सुशीला देवी ने अपना फैसला सुना दिया.

इस के बाद पूनम और सतीश दोनों में मोबाइल फोन पर खूब बातचीत और चैटिंग होने लगी. जवान खून था, जो एकदूसरे के करीब आ रहा था. चुनाव प्रचार के साथसाथ उन दोनों का मिलनाजुलना भी बढ़ रहा था.

इतने में पूनम के मोबाइल पर एक मैसेज आया. सतीश ने उस से आज का प्रोग्राम पूछा था. पूनम ने पार्टी औफिस से बाहर निकल कर सतीश को फोन किया और बोली, ‘‘एक घंटे के बाद कसबे की ‘रामदीन हलवाई’ की दुकान पर मिलते हैं. इन लोगों ने मेरा दिमाग खराब कर दिया है.’’

सतीश ने कोई सवाल नहीं किया. एक घंटे के बाद वे दोनों ‘रामदीन हलवाई’ की दुकान पर बैठे थे और ‘रामदीन हलवाई’ के यहां के समोसे खा रहे थे. चाय भी अच्छी बनी थी.

‘‘चुनाव प्रचार के बाद तुम्हारा आगे क्या करने का इरादा है?’’ पूनम ने सतीश से पूछा.

‘‘तुम पहले चाय पी लो, बड़ी अच्छी बनी है,’’ सतीश ने कहा.

‘‘?कभी मेरे हाथ की चाय पीना. जिंदगी में ऐसी चाय नहीं पी होगी,’’ पूनम बोली.

‘‘फोन पर तुम्हारा मूड क्यों खराब था?’’ सतीश ने पूछा.

‘‘अरे, वही प्रचार वाली बात. किसी ने मेरी चुगली कर दी कि मैं काम से ज्यादा तुम पर ध्यान दे रही हूं. भला, किसी को क्या मतलब कि मैं तुम से बात करती हूं… यह मेरा निजी मामला है,’’ पूनम ने भड़ास निकालते हुए कहा.

‘‘तुम्हारी बात एकदम सही है पूनम, पर हमें अपने काम पर ज्यादा फोकस करना होगा. मेरे चाचाजी को मु?ा से काफी उम्मीद है. भाजपा अब पूरे जोरशोर से चुनाव प्रचार में लग गई है. वह प्रदेश में लोकल मुद्दों के साथसाथ कांग्रेस के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाएगी और भ्रष्टाचार के चलते जेल में बंद विधायकों को टिकट दिए जाने को भी बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है. चुनावी रणनीति के तहत भाजपा का फोकस गैर जाट जातियों पर भी रहेगा,’’ सतीश बोला.

‘‘देखो, हम दोनों एकदूसरे के काफी नजदीक आ रहे हैं और इस में कोई बुराई भी नहीं है. किसी को पसंद करना हमारा निजी फैसला होता है और उस से हमारे काम पर कोई असर नहीं पड़ता. मु?ो दुख इस बात का है कि मेरी मौसी भी यही सोचती हैं कि मैं चुनाव प्रचार पर ध्यान नहीं दे पा रही हूं,’’ पूनम बोली.

‘‘लेकिन, तुम इस बार कांग्रेस को कम मत समझना. मेरी मौसीजी तुम्हारे चाचाजी को कड़ी टक्कर देंगीं,’’ पूनम ने अपनी बात रखी.

‘‘देखो, चुनाव में हारजीत तो लगी रहती है. इस का हमारी दोस्ती पर असर नहीं पड़ना चाहिए,’’ सतीश बोला.

इस के बाद वे दोनों बेमन से ही सही, चुनाव प्रचार में जुट गए. वोटिंग की तारीख नजदीक आती जा रही थी.

3 दिन के बाद चुनाव होने थे. पूनम और कुछ खास कार्यकर्ताओं को अब दिनरात काम करना था. सुशीला देवी ने कसबे के एक सस्ते होटल में उन सब के रहने का इंतजाम करा दिया था.

पूनम ने यह बात सतीश को बताई, ‘‘तुम्हारा क्या प्रोग्राम है? रहोगे मेरे साथ होटल में?’’

‘‘मैं ऐसा करता हूं कि तुम्हारे होटल के नजदीक ही दूसरे होटल में एक कमरा ले लेता हूं. वह मेरे दोस्त का होटल है. जब तुम काम से फ्री हो जाओगी, तो हम एकसाथ डिनर कर लेंगे.’’

‘‘मैं थोड़ा जल्दी आ जाऊंगी. मेरे पास एक स्पैशल चाय है. मैं अपने हाथ का बना चूरमा भी ले आऊंगी. चाय के साथ चूरमा भी खाएंगे, तो बड़ा मजा आएगा.’’

‘‘मजा तो तब आता, जब तुम मेरे पैर भी दबा देती. इतना चलचल कर थकान के मारे पूरे शरीर में दर्द रहता है. और हां, मैं भी तुम्हारे पैर दबा सकता हूं, अगर तुम्हें कोई दिक्कत न हो तो,’’ सतीश धीरे से बोला.

‘‘तब की तब देखी जाएगी. हम दोनों कल शाम को होटल में मिलते हैं. तुम अपने दोस्त को बोल कर इलैक्ट्रिक कैटल कमरे में मंगवा लेना. मैं कमरे में ही चाय बनाऊंगी. दूधचीनी वगैरह भी मांग लेना,’’ पूनम ने कहा.

अगले दिन सुबह जब पूनम तैयार हो रही थी, तब उस की मां सरला देवी ने कहा, ‘‘मैं तुझे तेरी मौसी के भरोसे एक रात के लिए होटल में भेज रही हूं. तू अपना काम लगन से करना. हो सकता है कि इस बार कांग्रेस की सरकार बन जाए और तेरी मौसी को कोई बड़ा पद मिल जाए, तो वह तेरे भाई को कोई रोजगार दिला देगी.’’

‘‘तू चिंता मत कर मां. मैं अपना अच्छाबुरा सब समझती हूं. मैं बालिग हूं और कोई भी काम अपने होशहवास में ही करूंगी,’’ पूनम बोली.

सतीश का होटल पूनम के होटल से ज्यादा दूर नहीं था. दिनभर पार्टी का काम करतेकरते कब शाम के 6 बज गए, पूनम को पता ही नहीं चला. वह तैयार हो कर सतीश से मिलने चल दी. उस ने मुंह पर चुन्नी लपेट रखी थी.

सतीश होटल के कमरे में पूनम का इंतजार कर रहा था. इलैक्ट्रिक कैटल और दूधचीनी वगैरह वह पहले ही कमरे में ला चुका था.

बाहर किसी की आहट हुई, तो सतीश ने दरवाजा खोल दिया. सामने पूनम खड़ी थी. उस ने एक टाइट जींस और पतली सी टीशर्ट पहनी हुई थी.

यह देखते ही सतीश के दिल की धड़कन बढ़ गई.

‘‘अब देखते ही रहोगे या बैठने को भी कहोगे…’’ पूनम ने मुंह से चुन्नी उतारते हुए कहा. फिर वह बाथरूम में मुंह धोने चली गई.

फ्रैश होने के बाद पूनम ने अपने पर्स से एक खास किस्म की चाय की पत्ती निकाली और सतीश से बोली, ‘‘अब देखना मेरे हाथ का कमाल.’’

इलैक्ट्रिक कैटल में चाय बन रही थी. सतीश बोला, ‘‘चूरमा लाई हो न? मैं गरम करा देता हूं.’’

पूनम ने पर्स से चूरमा निकाला. सतीश ने एक नौकर को बुलाया और कहा, ‘‘थोड़ी देर में यह चूरमा गरम करा कर ले आना.’’

नौकर डब्बा ले गया.

‘‘इतने में चाय बनती है, मैं जल्दी से एक काम निबटा कर आता हूं,’’ सतीश ने पूनम से कहा और बाहर चला गया.

अभी 3-4 मिनट ही हुए थे कि सतीश लौट आया.

‘‘बड़ी जल्दी काम कर के लौट आए. कहां गए थे?’’ पूनम ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं, बस ऐसे ही,’’ सतीश शरमा कर बोला.

‘‘जब तक नहीं बताओगे, तब तक चाय और चूरमा नहीं मिलेगा,’’ पूनम ने अपनी शर्त रख दी.

‘‘कैमिस्ट तक गया था,’’ यह कह कर सतीश मुसकरा दिया.

‘‘बदमाश कहीं के…’’ पूनम ने इतना कहा और चाय छानने लगी.

जब गांव की लड़की को हुई पहली माहवारी, फिर हुआ ये

पहली माहवारी हर लड़की के लिए बड़ी उलझन और मुश्किल भरी होती है. किसी के लिए दर्द बरदाश्त से बाहर होता है तो कोई इस से पूरी तरह से अनजान इस बात से डरी होती है कि कहीं उसे किसी तरह की चोट या बीमारी तो नहीं हो गई जो उस के साथ यह सब हो रहा है.

यह वह सोच है, जो माहवारी से जुड़ी हुई है और जो अकसर स्कूल की किताबों में बच्चे कैसे पैदा होते हैं वाले पाठ में लिखी मिलती है. गैरसरकारी संस्था वाले जब कोई जानकारी देने आते हैं, तो वे कुछ इसी तरह से बच्चों को माहवारी के बारे में समझाते हैं.

लेकिन, माहवारी की यह परिभाषा असल में जगह और संसाधनों या कहें सुखसुविधाओं की तर्ज पर दी जाए तो बेहतर रहेगा. पर क्यों? क्योंकि जिन लड़कियों को सैनेटरी पैड या एक साफ कपड़ा भी नहीं मिल पाता, उन के लिए महीने के वे 5 दिन किसी बुरे सपने से कम नहीं होते.

लेकिन अगर सुविधाएं हों और तब भी बहुत सी लड़कियों का मुंह बंद रख कर परेशानियों को झेलते रहना भी यह सोचने पर मजबूर करता है.

84 फीसदी लड़कियों को पहली माहवारी होती है तो पता नहीं होता कि क्या हो रहा है. 15 फीसदी लड़कियां ही सैनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं.

माहवारी को धर्म से भी जोड़ा जा चुका है. कहा जाता है कि जब इंद्र देवता ने ब्राह्मणों को मारा था और इंद्र का पाप औरतों ने अपने सिर ले लिया जो हर महीने आता है.

इस बेसिरपैर की कहानी की वजह से औरतों को माहवारी के दिनों में अछूत मान लिया जाता है.

पंडेपुजारी यह भी बता देते हैं कि गलत सोच के चलते हर महीने खून की शक्ल में निकलती है. इस तरह की बातें सुनसुन कर लड़कियां अपनेआप को पापिन समझती हैं.

माहवारी, जिसे अकसर लोग पीरियड्स, महीना या डेट कह कर पुकारते हैं, असल में वह मुद्दा है, जिस पर बात तो की जाने लगी है, लेकिन बात असल में किस तरह की और क्या बात होनी चाहिए, इस पर शायद ही कोई ध्यान देता है.

गांव और कसबों की लड़कियां शहरी लड़कियों से इस मामले में बहुत अलग हैं. हर लड़की ही इस मामले में बहुत अलग है, यह कहना ज्यादा बेहतर रहेगा. पहली माहवारी का दर्द, घबराहट, चिंता जैसी परेशानियां भी सब की एकजैसी नहीं होती हैं.

नाम दिया ‘लीच’ अलीगढ़ की रहने वाली खुशबू

16 साल की है. उस से यह सवाल पूछने पर कि जब उसे पहली बार माहवारी आई थी, तो उस ने क्या किया था, तो वह हंसते हुए कहती है, ‘‘इस में बताने वाला क्या है. सब के साथ एकजैसा ही होता है.’’

खुशबू पर थोड़ा जोर डाल कर पूछने पर उस ने आगे बताया, ‘‘दीदी, मुझे तो स्कूल में बता दिया गया था कि कैसे क्या होता है, तो मुझे तो सब पता था. मम्मी ने भी कहा था कि यह दिक्कत होती है लड़कियों को.

‘‘दिक्कत…?’’ मैं ने पूछा.

खुशबू फिर जोर से हंस कर कहने लगी और बोली, ‘‘हां, मतलब वही.

‘‘तुम पीरियड्स को क्या कहती हो?’’

‘‘दीदी, मैं अपनी सहेली को बुलाती हूं. वह आप को बता देगी अच्छे से,’’ कह कर खुशबू बगल के घर से अपनी सहेली रोली को बुला लाई.

‘‘हां, क्या बताना है?’’ रोली ने खुशबू की ही तरह हंसते हुए पूछा.

‘‘पहली माहवारी आई थी, तो क्या हुआ था?’’

यह सुनते ही रोली खिलखिला कर हंसने लगी, ‘‘मुझे तो मेरी चाची ने बताया था कि यह हो तो क्या होता है.’’

‘‘यह मतलब?’’ मैं ने एक बार फिर सवाल किया.

‘‘हां, मतलब यही,’’ कह कर वह हंस पड़ी.

‘‘तुम माहवारी को क्या कहती हो?’’

‘‘कहते तो हम लीच यानी जोंक हैं,’’ रोली ने कहा और यह बताए बिना कि असल में पहली बार माहवारी आई थी तो क्या हुआ था, खुशबू को देख हंसने दी.

इस के बाद वे सिर्फ हंस रही थीं और माहवारी के बारे में बात करने से कतरा रही थीं. यह कतराना, हंसना, मजाक बनाना वह समस्या है, जिस पर बात करने की जरूरत है. क्यों? क्योंकि इस हंसी के पीछे माहवारी लड़कियों के लिए माहमारी बन जाती है और इसी हंसी के पीछे दब कर रह जाती है.

चुप रहना पड़ा महंगा 8 महीने पहले इसी गांव की रहने वाली सुनीता को अनियमित माहवारी की समस्या हुई थी. उसे 2 महीने तक 13 दिन माहवारी हुई. उस ने अपनी मां को बताया तो उन्होंने समझाया कि शुरूशुरू में ऐसा होता है. पर कोई दिक्कत नहीं.

13 दिन पीरियड्स होने पर सुनीता ने सैनेटरी पैड का इस्तेमाल किया था, लेकिन बारबार ले कर कौन आता, इस उलझन में वह एक ही पैड पूरा दिन इस्तेमाल करती. इस वजह से उस की जांघों पर दाने निकल आए. उस ने मां से दानों का जिक्र किया तो उन्होंने उसे क्रीम लगा लेने के लिए कहा.

माहवारी तो नियमित हो गई, लेकिन दाने बढ़ते गए. एक जांघ से शुरू हुए दाने अब दोनों पर फैलने लगे. सुनीता और उस की मां दोनों को ही समझ नहीं आया कि जांघें दिखा कर तो दवा ले नहीं सकते और बोलने में भी उन्हें शर्म आ रही थी, तो सुनीता की मां ने अपने पति से कह कर फैल रहे दानों की दवा मंगाई. जांघ पर हुए ये दाने अब बड़ेबड़े निशान बनने लगे और सुनीता की जांघों की चमड़ी ढीली पड़ने लगी.

अगले महीने जब पीरियड आया, तो पैड या कपड़ा कुछ भी लगाने पर वह जांघों पर बुरी तरह चुभने लगा. इस के चलते ढीली पड़ी जांघ की चमड़ी पर गहरा कट लग गया. अब न सुनीता उठ पा रही थी, न चल पा रही थी. आखिरकार सुनीता ने भाई से फोन मांग कर जांघों का फोटो खींचा और डाक्टर के पास गई.

डाक्टर ने देखते ही बताया कि सुनीता की जांघों पर दाद हुआ है और जांघों की ढीली हुई चमड़ी जिस पर खिंचाव के निशान आ गए हैं, अब कभी ठीक नहीं होगी, ये निशान कभी नहीं जाएंगे.

जाहिर तौर पर दाद की वजह से सुनीता का माहवारी के समय सफाई न रखने पर इंफैक्शन की चपेट में आना था, जिस ने बाद में दाद का रूप ले लिया.

साफतौर पर लड़कियों के लिए बहुत जरूरी है कि वे इस बात को समझें कि पहली माहवारी के बारे में सीख लेना या जान लेना ही काफी नहीं है, बल्कि तीसरी, चौथी, 5वीं और हर एक माहवारी में यह ध्यान रखना जरूरी है कि साफसफाई जरूरी है.

पैड हो या कपड़ा समय पर बदलना जरूरी है. जिस तरह से खीखी और हंसीठिठोली में इस बारे में बात होती है, उसी तरह माहवारी से हो रही तमाम बीमारियों के बारे में खुल कर बोलना भी जरूरी है.

देवर बना भाभी की जान का दुश्मन, सीना काट कर की हत्या

दूरदराज से रोजीरोटी के लिए महानगरों में आ कर रहने वाले लोग जरूरत पड़ने पर अपने रिश्तेदार, करीबी और अपने गांव के लोगों की यह सोच कर मदद कर देते हैं कि उन की भी रोजीरोटी का साधन बन जाएगा. लेकिन कई बार उन्हीं में कोई आस्तीन का सांप भी निकल आता है. हितेश कर्तकपांडी ऐसा ही सांप था…  

54 वर्षीय धनंजय नारायण तांडेल दक्षिण मुंबई के समुद्र किनारे बसी पौश कालोनी कोलाबा की सुंदर नगर बस्ती में अपने परिवार के साथ रहते थे. परिवार में उन के अलावा 2 बेटे और एक सुंदर सी बहू थी. उन की पत्नी का काफी समय पहले देहांत हो चुका था. उन का छोटा सा परिवार था, जहां सभी लोग सुखचैन से रह रहे थेधनंजय नारायण सुंदर नगर में करीब 30 सालों से रहते रहे थे. उन के प्रेमिल स्वभाव की वजह से बस्ती के सारे लोग उन के परिवार को खूब मानसम्मान देते थे.

धनंजय नारायण का बड़ा बेटा महेंद्र तांडेल मुंबई की एक प्रतिष्ठित कंपनी में काम करता था, जबकि छोटा बेटा चेतन कोलाबा के एक शोरूम में नौकरी करता था. तांडेल भी एक शोरूम में चपरासी थे. सभी लोग सुबह को अपनेअपने काम पर निकल जाने के बाद सब शाम को ही घर लौटते थे. महेंद्र की पत्नी श्वेता सुबह जल्दी उठ कर सब के लिए टिफिन और चायनाश्ता तैयार करती और उन के जाने के बाद घर के रोजमर्रा के कामों में जुट जाया करती थी.

घटना 10 मई, 2017 की है. हमेशा की तरह घर के सभी लोग अपनेअपने काम पर निकल गए थे. दोपहर लंच के बाद महेंद्र तांडेल ने अपनी आदत के अनुसार पत्नी श्वेता को फोन किया. यह उन का रोजाना का नियम था. काफी देर तक घंटी बजती रही. लेकिन श्वेता ने उस की काल रिसीव नहीं की. बारबार नंबर मिलाने के बाद भी जब श्वेता ने फोन रिसीव नहीं किया तो महेंद्र के दिल की धड़कनें तेज हो गईं, क्योंकि इस से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था.

वह हमेशा महेंद्र के फोन की राह देखा करती थी. श्वेता कहां है और क्या कर रही है, यह जानने के लिए महेंद्र ने अपने पड़ोसी को फोन कर के श्वेता के बारे में पूछा. कुछ समय बाद पड़ोसी ने महेंद्र को जो खबर दी, उस से वह चौंक गया. पड़ोसी ने बताया कि श्वेता ने घर का मुख्य दरवाजा बंद कर रखा है और घर के अंदर तेज आवाज में टीवी चल रहा है. दरवाजा थपथपाने और आवाज देने पर भी वह दरवाजा नहीं खोल रही. ऐसी क्या बात हो गई जो श्वेता दरवाजा बंद कर के तेज आवाज में टीवी देख रही है.

महेंद्र ने बिना देर किए अपने पिता धनंजय को सारी बातें बता कर उन्हें घर पहुंचने को कहा. बेटे की बात सुन कर धनंजय घर की तरफ निकल गए. किसी अनहोनी के खयाल से वह रास्ते भर परेशान रहे. घर पहुंचने के बाद उन्होंने जैसेतैसे कर के दरवाजा खोला तो अंदर का जो नजारा था,उसे देख कर उन के होश उड़ गए. बहू श्वेता की बाथरूम में लहूलुहान लाश पड़ी थी. उन्होंने यह जानकारी अपने दोनों बेटों को दी तो वे भी थोड़ी देर में रोतेपीटते घर पहुंच गए.

पड़ोसियों ने पूरे परिवार को धीरज बंधाते हुए मामले की खबर पुलिस कंट्रोलरूम को दे दी. कोलाबा के थानाप्रभारी विजय धोपावकर को जब पुलिस कंट्रोल रूम से यह जानकारी मिली तो वह पीआई इमाम शिंदे, सुभाष दुधगांवकर, एपीआई विजय जाधव, सुदर्शन चव्हाण, अमोल ढोले, महिला एसआई प्रियंका देवकर, कांस्टेबल प्रवीण भालेराव, निकम पाटिल के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. उन्होंने इस की सूचना अपने उच्चाधिकारियों को भी दे दी थी.

घटनास्थल कोलाबा थाने से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर था, इसलिए पुलिस टीम करीब 10 मिनट में वहां पहुंच गई. तब तक धनंजय के मकान के पास मोहल्ले के तमाम लोग जमा हो चुके थे. पुलिस जब मकान में पहुंची तो घर का सारा सामान बिखरा पड़ा था. कांच के कई बरतन टूटे हुए थे. श्वेता का शव बाथरूम के अंदर पड़ा हुआ था. उस के गले और छाती पर चाकू के कई गहरे घाव थे. उस के बदन पर सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज था, जो कई जगह से फटा हुआ था, जिस से यह संभावना लग रही थी कि अभियुक्त उस के साथ मनमानी करना चाहता था. कमरे की स्थिति देख कर ऐसा लग रहा था जैसे मृतका और अभियुक्त के बीच काफी हाथापाई वगैरह हुई थी.

थानाप्रभारी अभी घटनास्थल का निरीक्षण और पूछताछ कर ही रहे थे कि डीसीपी मनोज कुमार शर्मा, एसीपी राजेंद्र चव्हाण भी वहां पहुंच गए. मौकामुआयना करने के बाद अधिकारियों ने वहां मौजूद लोगों से बात की. इस के बाद थानाप्रभारी ने घटनास्थल की काररवाई पूरी कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए जे.जे. अस्पताल भेज दी. डीसीपी के दिशानिर्देश के बाद थानाप्रभारी विजय धोपावकर ने जांच की एक रूपरेखा तैयार की, जिस की जिम्मेदारी उन्होंने पीआई इमाम शिंदे और सुभाष दुधगांवकर को सौंप दी थी

घटनास्थल कोलाबा जैसे पौश इलाके में था, जहां सेना के तीनों अंगों के अधिकारियों की कालोनियां हैं. मामला कहीं तूल पकड़ ले, इसलिए डीसीपी ने कोलाबा पुलिस की सहायता के लिए माता रमाबाई अंबेडकर पुलिस थाने के तेजतर्रार थानाप्रभारी सुखलाल बर्पे को भी लगा दिया. थानाप्रभारी सुखलाल बर्पे ने मामले की समानांतर रूप से जांच शुरू कर दी. कोलाबा थाने की पुलिस टीम मृतक के ससुराल वालों से बातचीत कर परिजनों के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स का अध्ययन कर ही रही थी कि समानांतर जांच कर रहे पीआई सुखलाल बर्पे ने एक गुप्त सूचना के आधार पर श्वेता के कातिल का पता लगा कर उसे हिरासत में ले लिया

पीआई सुखलाल बर्पे ने अपने सहायकों के साथ अपनी जांच का मुख्य केंद्र मृतक श्वेता के परिवार को ही बनाया था, क्योंकि वह यह जानते थे कि इस तरह की घटना अधिकतर अपनी जानपहचान वालों के बीच ही घटती है. इसलिए उन्होंने घटनास्थल का बारीकी से अध्ययन किया थाइस विषय में उन्हें अधिक से अधिक जानकारी मृतका के परिवार वालों से ही मिल सकती थी. उन्होंने श्वेता के साथ रहने वालों की जन्मकुंडली को खंगाला. उन्हें अपनी इस मुहिम में कामयाबी भी मिली. तांडेल परिवार का करीबी और चेतन तांडेल का जिगरी दोस्त हितेश कर्तकपांडी उन के रडार पर गया.

14 मई, 2017 को पीआई सुखलाल बर्पे की जांच टीम ने उसे फोर्ट इलाके के एक शोरूम से हिरासत में ले लिया. पुलिस टीम के अनुसार, जिस दिन यह घटना घटी थी, उस दिन वह सब के साथ काम पर गया जरूर था लेकिन कुछ ही समय बाद वापस घर लौट आया. इस के अलावा वह पुलिस के एक भी सवाल का जवाब सही ढंग से नहीं दे पाया थाकोलाबा पुलिस और माता रमाबाई अंबेडकर थाने की संयुक्त टीम ने हितेश से पूछताछ शुरू की तो उस ने अपना गुनाह कबूल कर लिया. उस ने श्वेता की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

23 वर्षीय हितेश कर्तकपांडी महाराष्ट्र के जिला पालघर के उसी गांव का रहने वाला था, जिस गांव के धनंजय नारायण तांडेल मूल निवासी थे. पारिवारिक स्थिति ठीक होने के कारण धनंजय तांडेल रोजीरोटी की तलाश में महानगर मुंबई गए थेवह कोई ज्यादा पढ़ेलिखे नहीं थे, इसलिए उन्हें कोई ढंग की नौकरी नहीं मिली तो उन्होंने एक शोरूम में चपरासी की नौकरी कर ली. फिर वह सुंदर नगर बस्ती में किराए पर रहने लगे. बाद में वह अपने बीवीबच्चों को भी ले आए

उन के बीवीबच्चों को मुंबई आए अभी कुछ ही साल हुए थे कि अचानक उन की पत्नी की मृत्यु हो गई. पत्नी की मौत के बाद वह टूट से गए थे, लेकिन उन्होंने अपने बच्चों को नहीं टूटने दिया. दोनों बेटों को उन्होंने पढ़ालिखा कर इस काबिल बना दिया कि उन की नौकरी लग गई. परिवार में आमदनी बढ़ी तो उन्होंने सुंदरनगर में ही खुद का एक मकान खरीद लिया. धनंजय तांडेल की पत्नी के गुजर जाने के बाद घर सूनासूना सा हो गया था. ऐसे में उन्होंने अपने बड़े बेटे महेंद्र तांडेल का विवाह श्वेता से कर दिया. श्वेता देखने में जितनी सुंदर थी, उतनी ही पढ़ीलिखी और घर के काम में होशियार थी. 

श्वेता और महेंद्र के विचार आपस में खूब मिलते थे, इसलिए दोनों ही एकदूसरे को बहुत चाहते थे. औफिस पहुंचने के बाद भी महेंद्र को जब भी समय मिलता, वह श्वेता को फोन कर लेता था. उन की शादी के 2 साल कैसे बीत गए, पता ही नहीं चलाधनंजय अपने दोनों बेटों के साथ कभीकभी अपने पैतृक गांव भी जाते रहते थे. उन के छोटे बेटे चेतन की गांव के ही हितेश कर्तकपांडी से दोस्ती हो गई थी. दोनों ही हमउम्र थे. चेतन जब कभी अपने गांव जाता तो हितेश के साथ सैरसपाटा करता था.

जब हितेश कामधंधे की तलाश में मुंबई आया तो तांडेल परिवार ने उस की काफी मदद की. इतना ही नहीं, महेंद्र ने कोशिश कर के उस की कोलाबा के प्यूमा शोरूम में नौकरी भी लगवा दी. उस के घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, उस के रहने का बंदोबस्त भी उस ने अपने घर में ही कर दिया था. पहली मंजिल पर धनंजय, उन का बेटा चेतन और चेतन का दोस्त हितेश रहता था, जबकि नीचे के भाग में महेंद्र अपनी पत्नी श्वेता के साथ रहता था.

कुछ दिनों तक तो हितेश कर्तकपांडी ठीक रहा, लेकिन जैसेजैसे वह महेंद्र के परिवार में घुलता गया, उस की झिझक भी दूर हो गई. वह श्वेता से कुछ ज्यादा ही घुलनेमिलने लगा. देवर का रिश्ता होने की वजह से दोनों के बीच हंसीमजाक भी चलती रहती थी. हितेश श्वेता को अपने रंग में रंगने की कोशिश करने लगा. यानी वह श्वेता को मन ही मन चाहने लगा था, जबकि श्वेता केवल चेतन की तरह हितेश को अपना देवर ही मानती थी. इस से आगे और कुछ नहीं. पति और देवर की तरह वह हितेश का भी टिफिन तैयार कर देती थी.

घटना के दिन हितेश काम पर तो सब के साथ गया, लेकिन कुछ देर बाद वह घर वापस आ गया. श्वेता के पूछने पर उस ने सिरदर्द का बहाना बनाया. श्वेता ने उसे चाय के साथ सिरदर्द की गोली दे कर उसे ऊपर के कमरे में जा कर आराम करने को कहा और फिर वह घर के कामों में लग गई. उसे क्या मालूम था कि उस की मौत का वारंट निकल चुका था. हितेश ऊपर के कमरे में न जा कर कुछ देर तक श्वेता के सौंदर्य को निहारता रहा. इस के बाद जब श्वेता बाथरूम में चली गई तो उठ कर हितेश ने अपनी योजना के अनुसार टीवी की आवाज तेज कर दी, साथ ही एसी का टेंपरेचर भी हाई कर दिया. फिर वह श्वेता के साथ मनमानी करने के उद्देश्य से बाथरूम की तरफ गया.  

बाथरूम का दरवाजा खुलते ही वह श्वेता से मनमानी करने पर उतर आया. उस ने श्वेता को दबोच लिया और बोला, ‘‘भाभी, आज मुझे अपने मन की मुराद पूरी कर लेने दो. मैं ने जब से तुम्हें देखा है, तब से तड़प रहा हूं. दिन का चैन और रातों की नींद हराम हो गई है.’’

हितेश की यह बात सुन कर श्वेता बुरी तरह घबरा गई थी. अपने आप को उस से बचाने के लिए वह पूरे कमरे में इधरउधर भागने लगी. वह अपने बचाव के लिए चीखचिल्ला भी रही थी लेकिन टीवी की तेज आवाज में उस की आवाज दब गई थी. हितेश के सिर पर वासना का भूत कुछ इस तरह सवार था कि उस के सोचनेसमझने की सारी शक्ति खत्म हो गई थी. वह श्वेता के जिस्म के लिए पागल सा हो गया था. हितेश की इस हरकत से श्वेता भी अपना आपा खो बैठी थी. वह कमरे में रखा सामान तोड़ने लगी ताकि आवाज सुन कर पड़ोसी जाएं.   

मुख्य दरवाजे पर आधुनिक लौक लगा था,जिसे वह जल्दबाजी में खोल नहीं सकी. उस समय श्वेता की ऐसी स्थिति थी, जैसे एक पिंजरे में बाघ के सामने बकरी की होती है. इस दौरान उस के कपड़े भी फट गए थे. अपने मकसद में कामयाब न होते देख हितेश को श्वेता पर गुस्सा आ गया. वह किचन में गया और वहां से सब्जी काटने वाला चाकू उठा लाया. उस चाकू से उस ने श्वेता के गले और सीने पर कई वार कर के उसे मौत के घाट उतार दिया और उस की लाश को बाथरूम के पास डाल दिया.

श्वेता की हत्या के बाद वह बुरी तरह डर गया था. कुछ समय तक वह वहीं बैठा रहा. इस के बाद उस ने बाथरूम में जा कर अपने हाथमुंह साफ किए, कपड़े बदले और कमरे को उसी स्थिति में छोड़ कर अपने काम पर चला गया. दरवाजा भिड़ते ही आधुनिक लौक फिर से बंद हो गया था. पुलिस टीम ने हितेश कर्तकपांडी से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उस के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 452 के तहत मुकदमा दर्ज कर उसे पुलिस हिरासत में आर्थर रोड जेल भेज दिया.

जांच अधिकारी पीआई इमाम शिंदे और सुभाष दुधगांवकर ने अपनी जांच पूरी कर मामले का आरोपपत्र अदालत में दाखिल कर दिया. कथा लिखने तक मामला अदालत में विचाराधीन था.

—- फोटो काल्पनिक है, इसका घटना से कोई संबंध नहीं है

पहली गर्लफ्रेंड के साथ मिलकर की दूसरी गर्लफ्रेंड की हत्या

बी.फार्मा की पढ़ाई करने वाला 23 वर्षीय गौरव सरकार अपनी सहपाठी 19 वर्षीया सैयद सारा अली से एकतरफा प्यार करता था. जबकि उस की गर्लफ्रेंड 18 वर्षीय स्निग्धा मिश्रा नहीं चाहती थी कि गौरव सारा के करीब जाए. प्यार के इस मकडज़ाल में इन तीनों में से एक की हत्या हो गई. आप भी जानें कि किस ने रची हत्या की साजिश?

अप्रैल महीने के आखिरी सप्ताह की 25 तारीख थी. गरमी चरम पर थी, जबकि शाम ढलने को हो आई थी. सैयद साबिर अली अपने घर लौटे आए थे. आते ही उन्होंने अपनी बेगम शबाना से पसीना पोंछने के लिए तौलिया मांगा. बेगम जब तौलिया और एक गिलास पानी ले कर आई तब उन्होंने देखा कि बेगम के चेहरे पर चुहचुहा आई पसीने की बूंदें चमक रही हैं. चेहरे पर परेशानी के भाव साफ नजर आ रहे थे और चिंता झलक रही थी. 

साबिर अली तपाक से पूछ बैठे, ”क्या हुआ शबाना, काफी परेशान दिखाई दे रही हो? बाहर से आया मैं हूं और पसीना तुम्हारे चेहरे पर?’’

बात ही कुछ ऐसी है,’’ शबाना उदासी के साथ बोली.

सब खैरियत तो है न!’’ साबिर अली चिंतित आवाज में बोले.

खाक खैरियत होगी. आप की लाडली सारा अभी तक कालेज से लौट कर नहीं आई है?’’ शबाना बोली.

अरे आ जाएगी, इस में इतना परेशान होने की क्या जरूरत है?’’ साबिर अली सहजता के साथ शांत भाव से बोले.

”…लेकिन उस का मोबाइल बंद आ रहा है. रोज तो छुट्टी होते ही दोपहर बाद वह घर आ जाती थी. इस से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ कि वह इतनी देर तक घर से बाहर रही हो?’’ परेशान लहजे में शबाना बोली.

अरे आ जाएगी, रास्ते में ट्रैफिक भी तो कम नहीं होता है…और फिर उस के साथ गौरव भी तो होगा. सारा का मोबाइल बंद है तो उस से पता कर लेती.’’ साबिर चेहरा पोंछते हुए तसल्ली के साथ बोले.

हां, उसी के संग घूम रही होगी कहीं. फिर भी पता नहीं क्यों मेरा दिल घबरा रहा है.’’ शबाना चिंता जताती हुई बोली.

तुम बिलकुल भी घबराओ नहीं, थोड़ी देर और इंतजार कर लो, सारा आ जाएगी.’’ साबिर बोले और इत्मीनान से पानी पीने लगे.

चिंतित शबाना कमरे में चहलकदमी करने लगी. वह बारबार दीवार पर टंगी घड़ी पर नजर दौड़ाने के साथ ही खिड़की से सड़क की तरफ टकटकी लगा कर देखने लगी. शबाना को अपनी बेटी सारा के लौटने का बेसब्री से इंतजार था. कुछ समय में अंधेरा भी घिर आया…

रात हो गई… और देर रात तक जब सारा घर नहीं लौटी, तब साबिर अली समेत परिवार के सभी सदस्य बेहद चिंतित हो गए. सभी की चिंता बढ़ती जा रही थी. वे समझ नहीं पा रहे थे कि क्या किया जाए? रात में सारा की तलाश कहां की जाए? इंदौर के चंदन नगर में रहने वाले सैयद साबिर अली इसी उधेड़बुन में पहले बेटी के एक्रोपोलिस कालेज गए, जहां से वह बी.फार्मा की पढ़ाई कर रही थी. कालेज में सिर्फ चौकीदार मिला. उस से सारा के बारे में कोई खास जानकारी नहीं मिल पाई. ऐसी स्थिति में वह निराश हो कर घर लौट आए. 

घर आ कर साबिर ने बीवी से उस के साथ पढऩे वाली लड़कियों के बारे में मालूम किया. बीवी को ही उन से बात करने को कहा. सारा की सहेलियों से ही सारा के उस दिन की गतिविधियों के बारे में थोड़ी जानकारी मालूम हुई. उन से मालूम हुआ कि सारा दोपहर में 3 बजे ही कालेज से चली गई थी. फिर तो उसे ज्यादा से ज्यादा 4 बजे तक घर पर पहुंच जाना चाहिए था. इस जानकारी से सारा को तलाशने में कोई खास मदद नहीं मिली, जबकि वह अगले दिन सुबह होने तक घर नहीं पहुंची थी.

शबाना अपने बेटे के साथ आसपास के घरों से ले कर बेटी की सहेलियों और गौरव के घर तक गई, लेकिन सारा का कहीं पता नहीं चल पाया. दिन गुजरने के साथसाथ सारा के लापता होने की खबर इंदौर के चंदन नगर में उस के जानने वाले तमाम लोगों के बीच फैल गई. सैयद सारा अली के परिवार से सहानुभूति रखने वाले लोग भी उसे ढूंढने में जुट गए. वह कालेज से कहां चली गई, इस बात को कोई नहीं जानता था. किसी को अंदाजा नहीं लग पा रहा था कि आखिरकार उस के साथ हुआ क्या है.

आखिर सारा गई तो गई कहां

जवान बेटी के रहस्यमय परिस्थितियों में गायब होने से साबिर का परिवार बहुत परेशान था, शबाना का बेटी के इंतजार में रोरो कर बुरा हाल था. हर आहट पर वह दरवाजे की तरफ देखने लगती थी. पूरी रात और दिन परेशानी में गुजरी थी. चारों ओर पता कर जब साबिर और उन का परिवार थक गया, तब वे 26 अप्रैल की सुबह 10 बजे के करीब शिप्रा थाने गए. एसएचओ बृजेंद्र सिंह को सारी बात बता कर उन्होंने बेटी की गुमशुदगी की तहरीर सौंप दी.

सैयद सारा अली की गुमशुदगी दर्ज कर के पुलिस अपनी काररवाई में जुट गई थी. पुलिस ने अनुमान लगाया कि सारा अपने परिचित या रिश्तेदार के घर चली गई होगी, लेकिन पुलिस का यह अनुमान गलत साबित हुआ. उस के बाद मामला रंजिश का होने की आशंका जताई गई. पुलिस ने साबिर और उस की पत्नी शबाना से इस बारे में पूछताछ की. उन्होंने किसी से भी दुश्मनी या रंजिश होने की बात से इनकार कर दिया. उन्होंने बताया कि उन की कभी भी किसी से तूतूमैंमैं तक नहीं हुई.

इस जानकारी से पुलिस उलझन में पड़ गई. अंत में पुलिस ने सारा का किसी के साथ प्रेम संबंध के बारे में पूछा. इस बारे में भी साबिर और शबाना ने सिरे से इनकार कर दिया. उन्होंने यहां तक कहा कि उन की बेटी निहायत ही शरीफ है. उसे पढ़ाई के अलावा और बातों में जरा भी दिलचस्पी नहीं है. सैयद सारा अली के बारे में घर वालों से मिले संतोषजनक जवाब के बाद पुलिस ने अपने स्तर से उस की तलाशी की योजना बनाई. घर वालों से उस का फोटो ले कर सभी थानों में भिजवा दिया. सारा के बारे में कोई सूचना कहीं से भी नहीं मिली, जबकि उस की गुमशुदगी के 20 दिन गुजर चुके थे. 

पुलिस सारा के बारे कुछ भी पता लगाने में असफल थी. पुलिस से ले कर परिवार के लोगों के सामने सब से बड़ा सवाल था कि सारा आखिर गई तो कहां गई. ऐसी स्थिति में सारा के घर वालों की निराशा बढ़ती जा रही थी और वे पुलिस पर नाराजगी भी जताने लगे थे. आखिरकार उन्होंने 15 मई, 2024 को एडवोकेट मुजाहिद मंसूरी के माध्यम से माननीय हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर दी. तब तक गुमशुदगी का यह मामला बहुचर्चित हो चुका था. कोर्ट में इस मामले की 28 मई को पहली सुनवाई हुई. 

हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए पुलिस को विधिवत नोटिस जारी कर सारा गुमशुदगी मामले में प्रगति रिपोर्ट मांगी. एसएचओ प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर पाए. इस स्थिति में मामले की सुनवाई की अगली तारीख 3 जुलाई तय कर दी गई. इस तारीख को जब सुनवाई हुई, तब हाईकोर्ट ने शिप्रा थाने के एसएचओ को कड़ी फटकार लगाई. साथ ही यह मामला वरिष्ठ अधिकारी को ट्रांसफर करने की बात कहते हुए सारा को ढूंढने के लिए पुलिस को 2 सप्ताह की मोहलत दी.

पुलिस के लिए मामला पेचीदा होने के साथसाथ चुनौती भरा बन चुका था. सारा के लापता हुए करीब 2 माह से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी सैयद सारा अली का कहीं भी कोई सुराग का नहीं मिलना, चिंता का एक बड़ा कारण बन चुका था. पुलिस अब इस संशय में थी कि सारा जिंदा भी है, या नहीं? पुलिस अब इसी नजरिए से उस की जांचपड़ताल में जुट गई थी. एसपी (देहात) सुश्री हितिका वासल इस मामले को ले कर काफी गंभीर हो गई थीं. 

उन्होंने अपने अधीनस्थ अधिकारियों को बुला कर जल्द से जल्द इस मामले को निपटाने के सख्त निर्देश दिए. यह मामला सिर्फ हाईकोर्ट ही नहीं, बल्कि स्थानीय अखबारों और न्यूज चैनलों में आने के कारण काफी चर्चा में आ गया था. इस से पुलिस की काफी छीछालेदर होने लगी थी. इस बाबत रूपेश द्विवेदी एडीशनल एसपी (ग्रामीण) ने शिप्रा थाना पुलिस को सारा की सुरागसी में लगा दिया था. एसपी (ग्रामीण) और एडीशनल एसपी (ग्रामीण) ने नए सिरे से जांच के तमाम बिंदुओं पर विचारविमर्श किया. 

ऐसे लोगों की फेहरिस्त तैयार करवाई, जिन का सारा के घर थोड़ा भी आनाजाना था. इस में एक नाम गौरव सरकार का सामने आया. पुलिस को पता चला कि वह भी सारा के साथ एक्रोपोलिस कालेज से बी.फार्मा की पढ़ाई कर रहा था. वह अकसर सारा के पास आता रहता था. वह सारा के अलावा परिवार के सभी सदस्यों से घुलामिला था. उस के बाद से जांच गौरव को लक्ष्य बना कर की जाने लगी. पुलिस उस के घर गई. उस के बारे में घर वालों से पूछताछ की. उन्होंने बताया कि वह नौकरी के सिलसिले में शहर से बाहर गया है. 

पुलिस ने घर वालों से गौरव का मोबाइल नंबर लिया, लेकिन उसे काल कर बात करना जरूरी नहीं समझा. पुलिस ने पहले उस के फोन नंबर की काल डिटेल्स के साथसाथ पिछले 2 महीनों की लोकेशन रिपोर्ट निकलवाई. इस आंकड़े का विश्लेषण करने के बाद पता चला कि सैयद सारा अली के लापता होने वाले दिन गौरव की सारा और स्निग्धा मिश्रा से कई बार बातें हुई थीं. इस जांच में यह भी पता चला कि सारा के लापता होने वाले दिन सारा, गौरव और स्निग्धा के फोन की लोकेशन एक साथ ही थी, जो शाम 4 बजे तक उन तीनों की लोकेशन महू के हरसोला फाटा के जंगल में पाई गई. इस के बाद सारा का मोबाइल फोन स्विच्ड औफ हो गया था.

सहपाठी क्यों आए शक के घेरे में

पुलिस समझ गई कि सारा के लापता होने का राज गौरव और स्निग्धा से मालूम हो सकता है.  उन से पूछताछ के लिए हिरासत में लेने की तैयारी की गई. गौरव के बारे में उस के घर वालों से कोई ठोस जानकारी नहीं मिल पाई थी. पुलिस ने 10 जुलाई, 2024 को गौरव को तब गिरफ्तार कर लिया, जब वह नासिक के एक रेस्टोरेंट में वेटर का काम कर रहा था. इसी तरह से स्निग्धा को पिपल्याहान स्थित उस के घर से हिरासत में ले लिया. पुलिस ने उन दोनों से कई घंटों तक पूछताछ की. उन से सारा के बारे में घुमाफिरा कर कई सवाल किए गए. उन्होंने भी हर सवाल का जवाब घुमाफिरा कर दिया. 

उन की बातों से पुलिस ने महसूस किया कि ये दोनों सारा के बारे में कुछ अधिक बताने से कतरा रहे हैं. जबकि कई बातों से पुलिस ने अनुमान लगा लिया था कि उन की सारा से अच्छी और गहरी जानपहचान थी. पुलिस इतना जरूर समझ गई कि दोनों बेहद ही शातिर हैं. फिर क्या था, पुलिस ने सीधेसीधे गौरव और स्निग्धा पर सारा की गुमशुदगी में उन का हाथ होने का आरोप लगा दिया. जब उन पर कानूनी धाराएं लगा कर उन के खिलाफ काररवाई करने की बात कही गई, तब वे घबरा गए. उन की जुबान खुलवाने का तरीका काम कर गया. 

दोनों समझ गए अब पुलिस से ज्यादा देर तक सच छिपाया नहीं जा सकता. दोनों ने पुलिस के सामने घुटने टेक दिए और सच उगल दिया. उन्होंने जो बताया वह बेहद चौंकाने वाला था. उन्होंने कहा, ”सैयद सारा अली अब इस दुनिया में नहीं है.’’ यह सुन कर पुलिस अधिकारी चौंक गए, उन्हें अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था. उन्होंने दोनों से पूछा, ”क्या हुआ उस के साथ? कब हुई घटना? उस में किसकिस की क्या भागीदारी थी? क्यों ऐसा किया गया सारा के साथ? उस की लाश कहां है?’’ 

पुलिस ने इस तरह के कई सवालों के जवाब जानने के लिए दोनों से लंबी पूछताछ की. गौरव ने बताया कि उस ने स्निग्धा के साथ मिल कर सारा की हत्या कर दी थी. स्निग्धा उस की गर्लफ्रेंड है. एक समय में सारा उस की प्रेमिका हुआ करती थी और उस की सहपाठी थी. सारा को मार कर उन्होंने ही उस की लाश महू क्षेत्र के हरसोला के जंगल में फेंक दी थी. अपना अपराध कुबूल करने के बाद गौरव ने परतदरपरत सारा की हत्या का राज खोल दिया कि उस ने कैसे उसे मौत के घाट उतारा. कैसे उस की गर्लफ्रेंड स्निग्धा ने इस काम में उस का सहयोग किया. गौरव के इस बयान के आधार पर एसएचओ ने सारा सैयद (19) की गुमशुदगी के प्रकरण को हत्या में तब्दील कर गौरव सरकार और स्निग्धा मिश्रा को नामजद कर हत्या कर लाश छिपाने के आरोप में रिपोर्ट दर्ज कर ली.

पुलिस को सारा का शव तो नहीं मिला लेकिन दोनों आरोपियों गौरव सरकार ( 23) और उस की गर्लफ्रेंड स्निग्धा मिश्रा (18) की निशानदेही पर महू क्षेत्र के हरसोला के जंगल में सघन तलाशी अभियान चला कर सारा के शव की हड्ïिडयां, बाल, कपड़ों के कुछ टुकड़े और ब्रेसलेट के अलावा हत्या में इस्तेमाल किए गए चाकू को बरामद करने में सफलता हासिल कर ली. गौरव द्वारा अपनी सहपाठी से मोहब्बत की बुनियाद पर रची गई उस की हत्या की खतरनाक साजिश की पूरी कहानी इस प्रकार सामने आई

सैयद साबिर अली मध्य प्रदेश के शहर इंदौर के चंदन नगर में अपनी बीवी शबाना बी और 2 बच्चों के साथ रहते थे. बच्चों में बड़ी बेटी का नाम सैयद सारा अली और बेटा सैयद जावेद अली (बदला नाम) थे. साबिर छोटे से परिवार के साथ वह हंसीखुशी से रह रहे थे. साबिर अपने बच्चों को अच्छी तालीम देना चाहते थे. वह चाहते थे कि उन के दोनों बच्चे पढ़लिख कर लायक बन जाएं. यही कारण था कि उन्होंने बेटी सारा को उस की मरजी के मुताबिक आजादी दी थी. उस के पसंद की पढ़ाई फार्मासिस्ट करवाने के लिए कालेज में नाम लिखवा दिया था. वह इंदौर-देवास बाईपास स्थित एक्रोपोलिस कालेज से बी. फार्मा की पढ़ाई कर रही थी. इसी कालेज से गौरव सरकार भी बी. फार्मा कर रहा था.

गौरव दोस्ती को प्यार समझने की कर बैठा भूल

दोनों की मुलाकात और जानपहचान की शुरुआत कालेज की कैंटीन से हुई थी. गौरव ने सैयद सारा अली को एक बार क्या देखा, उस पर रीझ गया था. उस की खूबसूरती उसे भा गई थी. उस के बात करने के लहजे में उर्दू जुबान का वह कायल हो गया था. जब वह बातें करती थी, तब गौरव को ऐसा महसूस होता था, जैसे पुराने जमाने की कोई फिल्म की हीरोइन हो. हर बात नपेतुले अंदाज में अदाकारी के साथ करती थी. साधारण कपड़ों में भी उस का ग्लैमर निखर कर सामने आ जाता था. जल्द ही दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई और वह सारा से प्रेम करने लगा. सारा उस से प्रेम करती थी या नहीं, इस का गौरव को पता नहीं था. सारा एक बिंदास स्वभाव की लड़की थी. उस पर पढ़ाई का भूत सवार रहता था. इस बारे में किसी से भी बातें करने से नहीं हिचकती थी. यही कारण था कि कालेज के सीनियर छात्रों से भी उस ने जानपहचान कर ली थी. उसे लोगों से संपर्क बनाना बहुत अच्छा लगता था.

गौरव मन ही मन में सारा से मोहब्बत करने लगा था, जबकि सारा प्यारमोहब्बत की बातों से बेखबर थी. हां, गौरव की हर बात का जवाब हंस कर जरूर देती थी. उस के चेहरे पर मुसकान फैली रहती थी. एक बार उस ने गौरव को अपनी अम्मी और अब्बू से मिलवा दिया था. सारा के अब्बूअम्मी ने गौरव और सारा की दोस्ती को प्रोफेशनल पढ़ाई के लिए जरूरी समझा और उन की जानपहचान पर जरा भी ऐतराज नहीं किया. उलटे उन्होंने गौरव से कहा कि कालेज में वह सारा का ध्यान रखा करे.

गौरव को क्यों चुभी सारा की तल्खी

इस के बाद तो गौरव सारा पर अपना अधिकार कुछ अधिक ही जताने लगा. बातबात पर उसे टोकने लगा और अच्छेबुरे का सबक देने लगा. एक बार तो गौरव ने हद ही कर दी. उस ने कैंटीन में सारा को कोने की एक टेबल पर अजीम नाम के स्टूडेंट के साथ बैठे देख लिया था. वह उस के साथसाथ हंसहंस कर बातें कर रही थी. गौरव ने महसूस किया कि सारा उसे देख कर भी उसे अनदेखा कर रही है. गौरव उस वक्त चुपचाप वहां से चला आया. रोज सभी क्लास खत्म होने के बाद जब सारा घर जाने को हुई, तब गौरव ने उस का क्लास रूम के बाहर लंबे बरामदे में रास्ता रोक लिया और सीधा सवाल दाग दिया, ”क्यों, अब तुम ने यह नया बौयफ्रेंड बना लिया है?’’

क्या फिजूल की बातें कर रहे हो?’’ सारा ने भी तपाक से उल्टा सवाल कर दिया. बोलने लगी, ”बिना कुछ जानेसमझे तुम कुछ भी बोलोगे? आखिर तुम होते कौन हो मुझ यह पूछने वालेï?’’ गौरव को जरा भी उम्मीद नहीं थी कि सारा उस के साथ इतनी तल्खी से बात करेगी और उसी से सवाल कर बैठेगी. वह सन्न रह गया. आगे कुछ नहीं बोल पाया और पैर पटकता हुआ चला गया. सारा भी चुपचाप अपने घर आ गई. घर आते ही उस ने अम्मी से खाना लगाने को कहा. शबाना ने भी कह दिया, ”बेटा, आ गई! जाओ, हाथमुंह धो लो, खाना लगा देती हूं. आज मैं ने तुम्हारे पसंद की सब्जी पकाई है.’’

सारा चुपचाप अपने कमरे में चली गई. पीछेपीछे अम्मी भी आ गई, ”सारा, क्या बात है, तुम्हारा गौरव से झगड़ा हुआ है क्या? वह फोन पर तुम्हारे अब्बू को कुछ बता रहा था, तुम्हारे बारे में!’’ अरे कुछ नहीं अम्मी, वह नहीं चाहता है कि मैं अपने सीनियर से जानपहचान रखूं. आज उस ने मुझे एक सीनियर के साथ देख लिया था. उसी के बारे में अब्बू से मेरी शिकायत की होगी.’’ अरे, शिकायत नहीं की है. उस का कहना था कि उसे जो भी जरूरत हो उसे बताए वह पूरी कर देगा.’’ अम्मी बोली. वह क्यों करेगा? वह कौन है मेरा? कोई रिश्तेदार है क्या? उस से दोस्ती को ले कर सहेलियां मुझे ही उस के हिंदू होने का ताना मारती हैं और वह भी नहीं चाहता है कि मैं किसी अपने धर्म के लड़के से जानपहचान बनाऊं.’’ सारा बिफर गई.

”कोई बात नहीं बेटा, होता है यह सब! मैं गौरव को समझा दूंगी. चलो, हाथमुंह धो कर खाना खा लो.’’ शबाना बोली. उस दिन सारा का मूड बिगड़ा रहा. वह अगले दिन कालेज नहीं गई. 2 दिनों बाद कालेज गई. उस रोज गौरव कालेज नहीं आया था, लेकिन उस की दूसरी दोस्त स्निग्धा मिश्रा ने उसे गौरव के कालेज नहीं आने की जानकारी दी. यह भी बताया कि गौरव उस से नाराज चल रहा है. गौरव की बात आते ही सारा नाराज हो गई. उस ने नाराजगी दिखाते हुए कह दिया, ”वह कौन होता है मुझ से नाराज होने वाला? मुझ पर धौंस दिखाने वाला? …और तुम कौन हो, जो मुझ से उस की तरफदारी कर रही हो?’’

सारा के इस रूप को देख कर स्निग्धा सकपका गई. दरअसल, गौरव अगर सारा को चाहता था और उन के बीच एकतरफा प्रेम पनप चुका था तो स्निग्धा भी गौरव से प्यार करने लगी थी. वह इंदौर के ही एक कालेज के प्रोफेसर की बेटी थी और गौरव की सहपाठी हुआ करती थी. दोनों राउ के कालेज में साथ पढ़ते थे.  किसी कारणवश गौरव को उस कालेज से निकाल दिया गया था. इस के बाद उस ने बाईपास स्थित इस कालेज में दाखिला लिया था, जहां उस की मुलाकात सारा से हुई थी. स्निग्धा को जब सारा के प्रति गौरव का झुकाव दिखा, तब भीतर ही भीतर जलभुन गई थी.

सारा को पसंद नहीं थी गौरव की दखलअंदाजी

दूसरी तरफ गौरव को सैयद सारा अली के दूसरे लड़कों से मिलनाजुलाना पसंद नहीं था. इस का विरोध जताने लगा और उसे एहसास दिलाने की कोशिश भी करने लगा कि वही उस का सच्चा प्रेमी है. इस पर सारा ने एक बार साफ लहजे में कह दिया था कि उन के धर्म अलगअलग हैं. उन के बीच दोस्ती हो सकती है, प्रेम संबंध कतई नहीं हो सकते. उनके प्रेम को दोनों के समाज और परिवार वाले पसंद नहीं करेंगे. यह सच भी था. दोनों के सामाजिक स्तर में जमीनआसमान का अंतर था, इस के अलावा वे अलगअलग धर्मों से भी थे. कहने को तो सारा की अम्मी शबाना खुल कर सारा की गौरव से दोस्ती का विरोध नहीं करती थी, लेकिन गौरव की हरकतों को देख कर वह उस पर नजर रखने लगी थी. उस ने यह बात अपने भाई करामत अली और बहन अफसाना को भी बता दी थी. वे सारा पर नजर रखने लगे थे. 

उन्होंने सारा से सीधे तौर पर तो कुछ नहीं कहा, लेकिन इशारों से जरूर समझा दिया था कि उस का गौरव से अधिक मिलना ठीक नहीं है. सारा मां का इशारा समझ भी गई थी. यही वजह थी कि उस ने गौरव से मिलनाजुलना कम कर दिया था. वह जब भी गौरव से मिलती तो काफी सावधानी बरतती थी. सारा के मामा ने भी सारा को समझाया और गौरव को मर्यादा में रहने की नसीहत दे दी. गौरव सारा के मामा की नसीहत से और भी तिलमिला गया. गौरव पर इश्क का भूत सवार हो चुका था. ऐसे में सारा की बेरुखी ने उसे भीतर से जख्मी कर दिया था. उसे सारा का कालेज के किसी लड़के से बातचीत करना एकदम अच्छा नहीं लगता था. एक वक्त आया जब गौरव और सारा के बीच बातचीत भी बंद हो गई. इस के बाद जब गौरव ने सारा को कालेज के लड़कों के साथ सिर्फ बातचीत करते ही नहीं, बल्कि पार्क में घूमते हुए देखा, इस से उस का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा.

स्निग्धा क्यों हुई खूनी योजना में शामिल

23 अप्रैल, 2024 को तो इस बात को ले कर गौरव कई घंटों तक बेचैन रहा. दिमाग में अजीब तरह की खलबली मची हुई थी. आखिरकार अपने मन की बात उस ने स्निग्धा को बताई कि उस ने सारा को ले कर क्या योजना है? स्निग्धा पहले से ही सारा को मन ही मन गौरव के दिलोदिमाग से निकालना चाहती थी. वह गौरव की योजना सुन कर खुश हो गई. इतना ही नहीं, वह उस का साथ देने को तैयार हो गई. अपनी योजना को अंजाम देने के लिए गौरव ने 25 अप्रैल की सुबह सारा के मोबाइल पर काल किया. उस वक्त सारा अपने कमरे में गहरी नींद में थी. सारा ने आधी नींद में ही फोन का डिसप्ले देखे बगैर काल रिसीव कर ली.

सारा, में गौरव बोल रहा हूं.’’  गौरव की आवाज सुनते ही सारा झल्ला गई. नाराजगी के साथ बोल पड़ी, ”इतनी सुबहसुबह तुम ने मुझे फोन क्यों किया? कान खोल कर सुन लो, मैं तुम से अब किसी तरह के ताल्लुकात नहीं रखना चाहती.’’ गौरव उस की बातों को नजरंदाज करते हुए बोलने लगा, ”सारा, आज के बाद तुम पर किसी तरह का शक नहीं करूंगा… किसी से भी बातचीत करने पर डांटफटकार नहीं लगाऊंगा… और कोई धमकी नहीं दूंगा…’’ यह सुन कर सारा थोड़ी शांत हुई. सामान्य आवाज में बोली, ”चलो अच्छा है, तुम क ो अक्ल आ गई. तुम में इतनी तो समझ आ गई कि दूसरों की जिंदगी में दखल नहीं देनी चाहिए.’’ 

इसी के साथ गौरव ने सारा से माफी मांग ली. नरमी दिखाते हुए सारा ने गौरव को माफ कर दिया. फिर उन के बीच कालेज, पढ़ाई, दोस्तों आदि की बातें होने लगीं. काफी समय तक बातें होती रहीं. बातचीत के सिलसिले में गौरव ने महू घूमने का प्रस्ताव रख दिया. न जाने क्या सूझी सारा ने भी हामी भर दी. उस रोज वह बहुत खुश थी. तय प्रोग्राम के मुताबिक 25 अप्रैल, 2024 की दोपहर 3 बजे भाड़े की कार ले कर गौरव सारा को लेने एक्रोपोलिस कालेज पहुंच गया था. सारा उस की राह देख रही थी. सारा चहकती हुई कार में बैठ गई. इस के बाद गौरव तय कार्यक्रम के मुताबिक अपनी गर्लफ्रेंड स्निग्धा मिश्रा को लेने पिपल्याहान स्थित उस के घर गया. उसे भी कार में अपने साथ बैठा कर महू में जंगल की तरफ निकल पड़े. अपनी योजना को कामयाब बनाने के लिए गौरव ने सारा का मोबाइल स्विच्ड औफ करवा दिया.

सुनसान इलाके में कार खड़ी की और मौका देख कर गौरव की गर्लफ्रेंड स्निग्धा ने सैयद सारा अली के हाथ पीछे से पकड़ लिए. तभी गौरव ने उस का गला दबा दिया. जब उसे लगा कि वो ऐसे नहीं मरने वाली है तो गौरव ने साथ लाए चाकू से उस का गला भी रेत दिया. उस के बाद सारा के शव को एक बोरी में भरकर महू क्षेत्र के हरसौला के जंगल में झाडिय़ां में फेंक दिया. हत्या के 78 दिनों बाद पुलिस को अहम सुराग मिला. पुलिस दोनों आरोपियों गौरव सरकार और स्निग्धा मिश्रा को ले कर हरसौला फाटा के जंगल इलाके में गई. उन की निशानदेही पर पुलिस ने उस स्थान की छानबीन की, जहां उन्होंने शव फेंका था. करीब 18 घंटे तक चले सर्च औपरेशन के बाद पुलिस को मानव हड्डियाँ, बाल और एक ब्रेसलेट बरामद हुआ. 

कथा लिखे जाने तक हड्ïिडयों की डीएनए जांच होनी बाकी थी, लेकिन दूसरे बरामद अवशेष सारा के ही थे. आगे की जांच के लिए पुलिस ने दोनों आरोपियों को पुलिस रिमांड पर लिया. उन से कुछ और सबूत हासिल किए. विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने दोनों आरोपियों गौरव सरकार और उस की प्रेमिका स्निग्धा मिश्रा को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

—- फोटो काल्पनिक है, इसका घटना से कोई संबंध नहीं है

मेरी बीवी हमेशा नाराज रहती है, मैं क्या करुं?

सवाल

मेरी शादी को 3 साल हो गए हैं. मैं अपनी बीवी से बहुत प्यार करता हूं. लेकिन पता नहीं क्यों वह हर समय मुझ से नाराज रहती है और कुछ बताती भी नहीं है. मैं ने कई बार पूछा भी लेकिन वह चुप्पी साध लेती?है. मैं क्या करूं?

जवाब

मुमकिन है कि आप की पत्नी ने अपनी पसंद से शादी न की हो लेकिन 3 साल में उस की नाराजगी की वजह कुछ भी हो, दूर हो जानी चाहिए थी. हालांकि, यह भी जरूरी नहीं है कि इस की कोई वजह हो. कई लोगों का?स्वभाव ही ऐसा होता है कि वे हर किसी से खिंचेखिंचे से रहते हैं. बेहतर होगा कि आप अपनी पत्नी से खुल कर बात करें.

आखिर कैसे सेक्स लाइफ को प्रभावित करती है शराब, पढ़े खबर

मशहूर नाटककार शेक्सपियर ने कहा है कि शराब कामेच्छा तो जगाती है, पर काम को बिगाड़ती भी है. यह बात सौ फीसदी सच है. अगर लंबे समय तक शराब का सेवन किया जाए तो उत्तेजना में कमी आ जाती है. यही नहीं और भी कई तरह की परेशानियां शराब के कारण हो जाती हैं.

इस बारे में सेक्सोलौजिस्ट डाक्टर बीर सिंह का कहना है, ‘‘शराब सेक्स के लिए जहर है. यह बात और है कि शराब पी लेने के बाद चिंता थोड़ी कम हो जाती है और शराब पीने वाला ज्यादा आत्मविश्वास से सहवास कर पाता है. लेकिन कोई व्यक्ति लंबे समय तक शराब का सेवन करता रहे तो वह नामर्दी तक का शिकार हो सकता है.’’

आइए, जानें कि शराब किस तरह से सेक्स के लिए हानिकारक है:

छवि का खराब होना

सुहागरात से पहले शराब का सेवन करने से जीवनसाथी की नजर में छवि खराब होती है. ऐसे में यह भी संभव है कि वह अपने जीवनसाथी का विश्वास पहली ही रात को खो दें. सुहागरात नए रिश्ते की शुरुआत की रात होती है. इस मौके पर अपने जीवनसाथी के साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करें. उसे समझें और खुद को भी उसे समझने का मौका दें. आप के शराब पी कर आने पर वह आप के बारे में अच्छा नहीं सोच पाएगी.

स्पर्म काउंट कम होने की संभावना

शराब के अधिक सेवन और जरूरत से ज्यादा तनाव लेने से पुरुषों के स्पर्म काउंट कम होने की संभावना भी रहती है. हाल ही में एक रिसर्च से पता चला है कि लगातार शराब के सेवन से शुक्राणुओं पर बुरा असर पड़ता है. जितनी अधिक शराब का सेवन उतनी ही खराब क्वालिटी का वीर्य. शराब के दुष्प्रभाव से हारमोन का संतुलन भी बिगड़ता है, जिस से शुक्राणुओं पर बुरा असर पड़ता है.

नशा उतरने पर अफसोस होता है

शराब के सेवन के बाद आप अपने होश में नहीं रहते हैं और कुछ ऐसा कर जाते हैं, जिस के बारे में आप ने सोचा नहीं होता. नशे में आप को वह महिला भी आकर्षक नजर आती है जिसे आप होश में होने पर पसंद नहीं करते. नशे में आप उस के साथ काफी आगे तक बढ़ जाते हैं. लेकिन जब नशा उतरता है तो पता चलता है कि आप से क्या हो गया, क्योंकि तब आप को वह उतनी आकर्षक नहीं लगती जितनी कि नशे में लग रही थी. तब आप को अफसोस होता है कि आप ने ऐसा क्यों किया.

परफौर्मैंस गिराती है

शराब के नशे में नियंत्रण खो देना आम बात है. खासकर जब 1 या 2 पैग ज्यादा ले लिए जाएं. लेकिन जब आप बिस्तर में पहुंचते हैं तो आप को लगता है कि काश कम पी होती, क्योंकि आप होश में नहीं होते और खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाते. इस का असर आप की परफौर्मैंस पर पड़ता है. शायद इसी वजह के चलते शैक्सपीयर ने कहा है कि शराब डिजायर बढ़ाती है पर परफौर्मैंस गिराती है.

खतरे से भरी सेक्स लाइफ

शराब के असर से लोग अकसर अविवेकपूर्ण सेक्स में लिप्त हो जाते हैं. इस का परिणाम सेक्स संक्रमित रोग होना, गर्भ ठहरना और पुराने रिश्तों के टूटने में हो सकता है. इस के अलावा और भी कई तरह की बीमारियां हो जाती हैं. महिलाओं में शराब की वजह से मासिकधर्म की दिक्कतें शुरू हो जाती हैं. हारमोन संतुलन भी बिगड़ जाता है, जिस का असर सेक्स लाइफ पर पड़ता है. शराब के सेवन से लिवर खराब हो जाता है, पाचनतंत्र पर असर पड़ता है, कैंसर की संभावना बढ़ जाती है. अधिक मात्रा में शराब का सेवन दिल को कमजोर करता है, क्योंकि शराब पीने के बाद रक्तसंचार बढ़ जाता है जिस कारण दिल ज्यादा तेजी से धड़कता है.

नशे की हालत में भूल

नशे की हालत में अकसर गर्भनिरोधक का इस्तेमाल करना भूल जाना आम बात है, क्योंकि आप अपने होश में नहीं होते. आप में सही और गलत के बीच फर्क करने की क्षमता नहीं होती. फिर जब सुबह आंख खुलती है और नशा उतर गया होता है तब एहसास होता है कि हम गलती कर बैठे. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और उस गलती का खमियाजा भुगतना पड़ता है.

गर्भावस्था के लिए हानिकारक

जब आप गर्भवती हो जाएं तो आप का शराब से दूर रहना आवश्यक है, क्योंकि यह एक कटु सत्य है कि अगर मां शराब पी रही है तो बच्चा भी शराब पी रहा है. मां के द्वारा पी गई शराब बच्चे के रक्तप्रवाह का हिस्सा बन जाती है. इस का प्रभाव शिशु के मानसिक विकास पर भी पड़ता है. अधिक शराब के सेवन से शिशु के शरीर का आकार कम हो सकता है.

उत्तेजना में कमी आती है

अधिक शराब पीने से लिंग की उत्तेजना में कमी आ जाती है. इसी तरह यदि महिला ने भी शराब पी हो, तो उस के लिए भी चरम सुख तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है.

सेक्स का मजा किरकिरा हो जाता है

सेक्स क्रिया को ऐंजौय करने और मिलन का समय बढ़ाने के लिए जरूरी है कि आप शराब या अन्य नशीले पदार्थ का सेवन न करें, क्योंकि नशे में आप को जल्दी नींद आ सकती है, जिस से सेक्स का मजा किरकिरा हो सकता है.

कुछ भी करने को मजबूर कर देती है

नशे की लत लोगों को कुछ भी करने को मजबूर कर देती है. नशे के लिए लोग अच्छे और बुरे में फर्क को भूल जाते हैं. जब शराब की लत लगती है तो वे इस के लिए कुछ भी करने से गुरेज नहीं करते. महिलाएं पैसे के लिए अपना शरीर बेचने तक को तैयार हो जाती हैं.

आस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में अस्मत के एक ऐसे लुटेरे का मामला सामने आया, जो शराब और सिगरेट देने के एवज में लड़कियों की इज्जत लूटता था. यह व्यक्ति फ्री में शराब और सिगरेट देने के एवज में लड़कियों से शारीरिक संबंध बनाता था. मन भर जाने पर उन से किनारा कर लेता था. पर उधर लड़कियों को नशा करने की लत लग गई होती थी. तब वे अपनी इस लत को पूरा करने के लिए अपनी मरजी से उस के साथ सेक्स करने के लिए तैयार हो जाती थीं. सिडनी की एक जिला अदालत में उस व्यक्ति पर सेक्स, बलात्कार और नशे का लालच देने जैसे कई मामलों में केस चल रहे हैं.

अमेरिकन बेटा : कुछ ऐसा ही था डेविड

रीता एक दिन अपनी अमेरिकन दोस्त ईवा से मिलने उस के घर गई थी. रीता भारतीय मूल की अमेरिकन नागरिक थी. वह अमेरिका के टैक्सास राज्य के ह्यूस्टन शहर में रहती थी. रीता का जन्म अमेरिका में ही हुआ था. जब वह कालेज में थी, उस की मां का देहांत हो गया था. उस के पिता कुछ दिनों के लिए भारत आए थे, उसी बीच हार्ट अटैक से उन की मौत हो गई थी.

रीता और ईवा दोनों बचपन की सहेलियां थीं. दोनों की स्कूल और कालेज की पढ़ाई साथ हुई थी. रीता की शादी अभी तक नहीं हुई थी जबकि ईवा शादीशुदा थी. उस का 3 साल का एक बेटा था डेविड. ईवा का पति रिचर्ड अमेरिकन आर्मी में था और उस समय अफगानिस्तान युद्ध में गया था.

शाम का समय था. ईवा ने ही फोन कर रीता को बुलाया था. शनिवार छुट्टी का दिन था. रीता भी अकेले बोर ही हो रही थी. दोनों सखियां गप मार रही थीं. तभी दरवाजे पर बूटों की आवाज हुई और कौलबैल बजी.

अमेरिकन आर्मी के 2 औफिसर्स उस के घर आए थे. ईवा उन को देखते ही भयभीत हो गई थी, क्योंकि घर पर फुल यूनिफौर्म में आर्मी वालों का आना अकसर वीरगति प्राप्त सैनिकों की सूचना ही लाता है. वे रिचर्ड की मृत्यु का संदेश ले कर आए थे और यह भी कि शहीद रिचर्ड का शव कल दोपहर तक ईवा के घर पहुंच जाएगा.

ईवा को काटो तो खून नहीं. उस का रोतेरोते बुरा हाल था. अचानक ऐसी घटना की कल्पना उस ने नहीं की थी. रीता ने ईवा को काफी देर तक गले से लगाए रखा. उसे ढांढ़स बंधाया, उस के आंसू पोंछे.

इस बीच ईवा का बेटा डेविड, जो कुछ देर पहले कार्टून देख रहा था, भी पास आ गया. रीता ने उसे भी अपनी गोद में ले लिया. ईवा और रिचर्ड दोनों के मातापिता नहीं थे. उन के भाईबहन थे. समाचार सुन कर वे भी आए थे, पर अंतिम क्रिया निबटा कर चले गए. उन्होंने जाते समय ईवा से कहा कि किसी तरह की मदद की जरूरत हो तो बताओ, पर उस ने फिलहाल मना कर दिया था.

ईवा जौब में थी. वह औफिस जाते समय बेटे को डे केयर में छोड़ जाती और दोपहर बाद उसे वापस लौटते वक्त पिक कर लेती थी. इधर, रीता ईवा के यहां अब ज्यादा समय बिताती थी, अकसर रात में उसी के यहां रुक जाती. डेविड को वह बहुत प्यार करती थी, वह भी ईवा से काफी घुलमिल गया था. इस तरह 2 साल बीत गए.

इस बीच रीता की जिंदगी में प्रदीप आया, दोनों ने कुछ महीने डेटिंग पर बिताए, फिर शादी का फैसला किया. प्रदीप भी भारतीय मूल का अमेरिकन था और एक आईटी कंपनी में काम करता था. रीता और प्रदीप दोनों ही ईवा के घर अकसर जाते थे.

कुछ महीनों बाद ईवा बीमार रहने लगी थी. उसे अकसर सिर में जोर का दर्द, चक्कर, कमजोरी और उलटी होती थी. डाक्टर्स को ब्रेन ट्यूमर का शक था. कुछ टैस्ट किए गए. टैस्ट रिपोर्ट लेने के लिए ईवा के साथ रीता और प्रदीप दोनों गए थे. डाक्टर ने बताया कि ईवा का ब्रेन ट्यूमर लास्ट स्टेज पर है और वह अब चंद महीनों की मेहमान है. यह सुन कर ईवा टूट चुकी थी, उस ने रीता से कहा, ‘‘मेरी मृत्यु के बाद मेरा बेटा डेविड अनाथ हो जाएगा. मुझे अपने किसी रिश्तेदार पर भरोसा नहीं है. क्या तुम डेविड के बड़ा होने तक उस की जिम्मेदारी ले सकती हो?’’

रीता और प्रदीप दोनों एकदूसरे का मुंह देखने लगे. उन्होंने ऐसी परिस्थिति की कल्पना भी नहीं की थी. तभी ईवा बोली, ‘‘देखो रीता, वैसे कोई हक तो नहीं है तुम पर कि डेविड की देखभाल की जिम्मेदारी तुम्हें दूं पर 25 वर्षों से हम एकदूसरे को भलीभांति जानते हैं. एकदूसरे के सुखदुख में साथ रहे हैं, इसीलिए तुम से रिक्वैस्ट की.’’

दरअसल, रीता प्रदीप से डेटिंग के बाद प्रैग्नैंट हो गई थी और दोनों जल्दी ही शादी करने जा रहे थे. इसलिए इस जिम्मेदारी को लेने में वे थोड़ा झिझक रहे थे.

तभी प्रदीप बोला, ‘‘ईवा, डोंट वरी. हम लोग मैनेज कर लेंगे.’’

ईवा ने आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘थैंक्स डियर. रीता, क्या तुम एक प्रौमिस करोगी?’’

रीता ने स्वीकृति में सिर हिलाया और ईवा से गले लगते हुए कहा, ‘‘तुम अब डेविड की चिंता छोड़ दो. अब वह मेरी और प्रदीप की जिम्मेदारी है.’’

ईवा बोली, ‘‘थैंक्स, बोथ औफ यू. मैं अपनी प्रौपर्टी और बैंक डिपौजिट्स की पावर औफ अटौर्नी तुम दोनों के नाम कर दूंगी. डेविड के एडल्ट होने तक इस की देखभाल तुम लोग करोगे. तुम्हें डेविड के लिए पैसों की चिंता नहीं करनी होगी, प्रौमिस?’’

रीता और प्रदीप ने प्रौमिस किया. और फिर रीता ने अपनी प्रैग्नैंसी की बात बताते हुए कहा, ‘‘हम लोग इसीलिए थोड़ा चिंतित थे. शादी, प्रैग्नैंसी और डेविड सब एकसाथ.’’

ईवा बोली, ‘‘मुबारक हो तुम दोनों को. यह अच्छा ही है डेविड को एक भाई या बहन मिल जाएगी.’’

2 सप्ताह बाद रीता और प्रदीप ने शादी कर ली. डेविड तो पहले से ही रीता से काफी घुलमिल चुका था. अब प्रदीप भी उसे काफी प्यार करने लगा था. ईवा ने छोटे से डेविड को समझाना शुरू कर दिया था कि वह अगर बहुत दूर चली जाए, जहां से वह लौट कर न आ सके, तो रीता और प्रदीप के साथ रहना और उन्हें परेशान मत करना.

पता नहीं डेविड ईवा की बातों को कितना समझ रहा था, पर अपना सिर बारबार हिला कर हां करता और मां के सीने से चिपक जाता था.

3 महीने के अंदर ही ईवा का निधन हो गया. रीता ने ईवा के घर को रैंट पर दे कर डेविड को अपने घर में शिफ्ट करा लिया. शुरू के कुछ दिनों तक तो डेविड उदास रहता था, पर रीता और प्रदीप दोनों का प्यार पा कर धीरेधीरे नौर्मल हो गया.

रीता ने एक बच्चे को जन्म दिया. उस का नाम अनुज रखा गया. अनुज के जन्म के कुछ दिनों बाद तक ईवा उसी के साथ व्यस्त रही थी. डेविड कुछ अकेला और उदास दिखता था.

रीता ने उसे अपने पास बुला कर प्यार किया और कहा, ‘‘तुम्हारे लिए छोटा भाई लाई हूं. कुछ ही महीनों में तुम इस के साथ बात कर सकोगे और फिर बाद में इस के साथ खेल भी सकते हो.’’

रीता और प्रदीप ने डेविड की देखभाल में कोई कमी नहीं की थी. अनुज भी अब चलने लगा था. घर में वह डेविड के पीछेपीछे लगा रहता था. डेविड के खानपान व रहनसहन पर भारतीय संस्कृति की स्पष्ट छाप थी. शुरू में तो वह रीता को रीता आंटी कहता था, पर बाद में अनुज को मम्मी कहते देख वह भी मम्मी ही कहने लगा था. शुरू के कुछ महीनों तक डेविड की मामी और चाचा उस से मिलने आते थे, पर बाद में उन्होंने आना बंद कर दिया था.

डेविड अब बड़ा हो गया था और कालेज में पढ़ रहा था. रीता ने उस से कहा कि वह अपना बैंक अकाउंट खुद औपरेट किया करे, लेकिन डेविड ने मना कर दिया और कहा कि आप की बहू आने तक आप को ही सबकुछ देखना होगा. रीता भी डेविड के जवाब से खुश हुई थी. अनुज कालेज के फाइनल ईयर में था. 3 वर्षों बाद डेविड को वैस्टकोस्ट, कैलिफोर्निया में नौकरी मिली. वह रीता से बोला, ‘‘मम्मी, कैलिफोर्निया तो दूसरे छोर पर है. 5 घंटे तो प्लेन से जाने में लग जाते हैं. आप से बहुत दूर चला जाऊंगा. आप कहें तो यह नौकरी जौइन ही न करूं. इधर टैक्सास में ही ट्राई करता हूं.’’

रीता ने कहा, ‘‘बेटे, अगर यह नौकरी तुम्हें पसंद है तो जरूर जाओ.’’

प्रदीप ने भी उसे यही सलाह दी. डेविड के जाते समय रीता बोली, ‘‘तुम अब अपना बैंक अकाउंट संभालो.’’

डेविड बोला ‘‘क्या मम्मी, कुछ दिन और तुम्हीं देखो यह सब. कम से कम मेरी शादी तक. वैसे भी आप का दिया क्रैडिट कार्ड तो है ही मेरे पास. मैं जानता हूं मुझे पैसों की कमी नहीं होगी.’’

रीता ने पूछा कि शादी कब करोगे तो वह बोला, ‘‘मेरी गर्लफ्रैंड भी कैलिफोर्निया की ही है. यहां ह्यूस्टन में राइस यूनिवर्सिटी में पढ़ने आई थी. वह भी अब कैलिफोर्निया जा रही है.’’

रीता बोली, ‘‘अच्छा बच्चू, तो यह राज है तेरे कैलिफोर्निया जाने का?’’

डेविड बोला, ‘‘नो मम्मी, नौट ऐट औल. तुम ऐसा बोलोगी तो मैं नहीं जाऊंगा. वैसे, मैं तुम्हें सरप्राइज देने वाला था.’’

‘‘नहीं, तुम कैलिफोर्निया जाओ, मैं ने यों ही कहा था. वैसे, तुम क्या सरप्राइज देने वाले हो.’’

‘‘मेरी गर्लफ्रैंड भी इंडियन अमेरिकन है. मगर तुम उसे पसंद करोगी, तभी शादी की बात होगी.’’

रीता बोली, ‘‘तुम ने नापतोल कर ही पसंद किया होगा, मुझे पूरा भरोसा है.’’

इसी बीच अनुज भी वहां आया. वह बोला, ‘‘मैं ने देखा है भैया की गर्लफ्रैंड को. उस का नाम प्रिया है. डेविड और प्रिया दोनों को लाइब्रेरी में अनेक बार देर तक साथ देखा है. देखनेसुनने में बहुत अच्छी लगती है.’’

डेविड कैलिफोर्निया चला गया. उस के जाने के कुछ महीनों बाद ही प्रदीप का सीरियस रोड ऐक्सिडैंट हो गया था. उस की लोअर बौडी को लकवा मार गया था. वह अब बिस्तर पर ही था.

डेविड खबर मिलते ही तुरंत आया. एक सप्ताह रुक कर प्रदीप के लिए घर पर ही नर्स रख दी. नर्स दिनभर घर पर देखभाल करती थी और शाम के बाद रीता देखती थीं.

रीता को पहले से ही ब्लडप्रैशर की शिकायत थी. प्रदीप के अपंग होने के कारण वह अंदर ही अंदर बहुत दुखी और चिंतित रहती थी. उसे एक माइल्ड अटैक भी पड़ गया, तब डेविड और प्रिया दोनों मिलने आए थे. रीता और प्रदीप दोनों ने उन्हें जल्द ही शादी करने की सलाह दी. वे दोनों तो इस के लिए तैयार हो कर ही आए थे.

शादी के बाद रीता ने डेविड को उस की प्रौपर्टी और बैंक डिपौजिट्स के पेपर सौंप दिए. डेविड और प्रिया कुछ दिनों बाद लौट गए थे. इधर अनुज भी कालेज के फाइनल ईयर में था. पर रीता और प्रदीप दोनों ने महसूस किया कि डेविड उतनी दूर रह कर भी उन का हमेशा खयाल रखता है, जबकि उन का अपना बेटा, बस, औपचारिकता भर निभाता है.

इसी बीच रीता को दूसरा हार्ट अटैक पड़ा, डेविड इस बार अकेले मिलने आया था. प्रिया प्रैग्नैंसी के कारण नहीं आ सकी थी. रीता को 2 स्टेंट हार्ट के आर्टरी में लगाने पड़े थे, पर डाक्टर ने बताया था कि उस के हार्ट की मसल्स बहुत कमजोर हो गई हैं. सावधानी बरतनी होगी. किसी प्रकार की चिंता जानलेवा हो सकती है.

रीता ने डेविड से कहा, ‘‘मुझे तो प्रदीप की चिंता हो रही है. रातरात भर नींद नहीं आती है. मेरे बाद इन का क्या होगा? अनुज तो उतना ध्यान नहीं देता हमारी ओर.’’

डेविड बोला, ‘‘मम्मी, अनुज की तुम बिलकुल चिंता न करो. तुम को भी कुछ नहीं होगा, बस, चिंता छोड़ दो. चिंता करना तुम्हारे लिए खतरनाक है. आप, आराम करो.’’

कुछ महीने बाद थैंक्सगिविंग की छुट्टियों में डेविड और प्रिया रीता के पास आए. साथ में उन का 4 महीने का बेटा भी आया. रीता और प्रदीप दोनों ही बहुत खुश थे.

इसी बीच रीता को मैसिव हार्ट अटैक हुआ. आईसीयू में भरती थी. डेविड, प्रिया और अनुज तीनों उस के पास थे. डाक्टर बोल गया कि रीता की हालत नाजुक है. डाक्टर ने मरीज से बातचीत न करने को भी कहा.

रीता ने डाक्टर से कहा, ‘‘अब अंतिम समय में तो अपने बच्चों से थोड़ी देर बात करने दो डाक्टर, प्लीज.’’

फिर रीता किसी तरह डेविड से बोल पाई, ‘‘मुझे अपनी चिंता नहीं है. पर प्रदीप का क्या होगा?’’

डेविड बोला, ‘‘मम्मी, तुम चुप रहो. परेशान मत हो.’’

वहीं अनुज बोला, ‘‘मम्मा, यहां अच्छे ओल्डएज होम्स हैं. हम पापा को वहां शिफ्ट कर देंगे. हम लोग पापा से बीचबीच में मिलते रहेंगे.’’

ओल्डएज होम्स का नाम सुनते ही रीता की आंखों से आंसू गिरने लगे. उसे अपने बेटे से बाप के लिए ऐसी सोच की कतई उम्मीद नहीं थी. उस की सांसें और धड़कन काफी तेज हो गईं.

डेविड अनुज को डांट रहा था, प्रिया ने कहा, ‘‘मम्मी, जब से आप की तबीयत बिगड़ी है, हम लोग भी पापा को ले कर चिंतित हैं. हम लोगों ने आप को और पापा को कैलिफोर्निया में अपने साथ रखने का फैसला किया है. वहां आप लोगों की जरूरतों के लिए खास इंतजाम कर रखा है. बस, आप यहां से ठीक हो कर निकलें, बाकी आगे सब डेविड और मैं संभाल लेंगे.’’

रीता ने डेविड और प्रिया दोनों को अपने पास बुलाया, उन के हाथ पकड़ कर कुछ कहने की कोशिश कर रही थी, उस की सांसें बहुत तेज हो गईं. अनुज दौड़ कर डाक्टर को बुलाने गया. इस बीच रीता किसी तरह टूटतीफूटती बोली में बोली, ‘‘अब मुझे कोई चिंता नहीं है. चैन से मर सकूंगी. मेरा प्यारा अमेरिकन बेटा.’’

इस के आगे वह कुछ नहीं बोल सकी. जब तक अनुज डाक्टर के साथ आया, रीता की सांसें रुक चुकी थीं. डाक्टर ने चैक कर रहा, ‘‘शी इज नो मोर.’’

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