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2 पत्नियों ने दी पति की सुपारी : भाग 3

शादी के बाद उस ने नजमा का नाम गीता रख दिया. दरअसल, इस के पीछे उस की एक रणनीति काम कर रही थी. सरकारी दस्तावेजों में हर जगह पहली पत्नी के नाम की जगह गीता दर्ज था. अपनी सरकारी नौकरी को संजीव दांव पर नहीं लगाना चाहता था, लिहाजा उस ने दूसरी पत्नी का नाम भी गीता रख दिया.

दफ्तर के कुछ कागजों में उस ने गीता उर्फ नजमा की फोटो भी लगाई थी. इस के अलावा उस ने कुछ प्रौपर्टी अपनी पहली पत्नी गीता के नाम पर खरीदी थी. वह प्रौपर्टी उस के हाथ से न निकल जाए.नजमा उर्फ गीता के साथ संजीव मजे में रहने लगा. कुछ दिन तो नजमा के बहुत अच्छे बीते. इतनी धनदौलत और जमीनें देख कर वह बड़ी खुश हुई, मगर जल्दी ही उस की खुशियां काफूर हो गईं. संजीव का असली रूप उस के सामने आने लगा.

वह गीता की तरह नजमा पर भी जुल्म ढाने लगा. उसे बातबात पर मारनेपीटने लगा. गंदीगंदी गालियां देता. नजमा उर्फ गीता उस का यह रूप देख कर घबरा गई. एक तो वह उस से उम्र में दोगुना था, दूसरे उस ने उसे शादी के नाम पर ठगा भी था.नजमा को भी करने लगा प्रताडि़त

इन सभी अत्याचारों के बीच नजमा उर्फ गीता प्रेग्नेंट हो गई और तय समय पर उस ने एक बेटे को जन्म दिया. बेटे को पा कर संजीव खुश था मगर नजमा पर उस का अत्याचार कम नहीं हुआ था. वहीं उसे यह शक भी होने लगा था कि नजमा का किसी और से नैनमटक्का चल रहा है.इस शक के कारण उस की हिंसा और बढ़ गई. यहां तक कि उस ने अपने घर के बाहर और अंदर कमरों में सीसीटीवी कैमरे लगवा दिए ताकि उसे पता चल सके कि उस की गैरमौजूदगी में उस के पास कौनकौन आताजाता है.

इसी बीच एक दिन मौका पा कर नजमा उर्फ गीता अपने दुधमुंहे बच्चे और संजीव के पैसे ले कर एक आदमी के साथ अपने गांव भाग गई. वहां उस ने एक अन्य आदमी से निकाह कर लिया. कुछ दिन बाद संजीव भी झारखंड स्थित उस के घर पर आ धमका.
उस ने कुछ राजनीतिक पहुंच लगा कर नजमा के परिजनों के खिलाफ स्थानीय थाने में मुकदमा दर्ज करवाया और पुलिस के साथ मिलीभगत कर के उस के भाइयों और पिता को हवालात में बंद करवा दिया.

नजमा के परिजन अनपढ़ और गरीब थे. इस आफत के आगे वे रो पड़े और नजमा से कहा कि संजीव जैसा कहता है वैसा करे. संजीव ने नजमा को धमकी दी कि अगर वह बच्चे के साथ वापस दिल्ली नहीं चली तो वह उस के भाइयों और पिता को कभी जेल से बाहर नहीं आने देगा. नजमा मजबूर हो गई और उस आदमी को छोड़ कर संजीव के साथ वापस दिल्ली आ गई.

नजमा जब अपने गांव में थी, उसी दौरान संजीव की पहली पत्नी गीता की बेटी कोमल को टीबी की बीमारी हो गई. गीता ने संजीव से इस बारे में बताया और बेटी का इलाज करवाने को कहा.संजीव ने उस से कहा कि वह इलाज तो करा देगा लेकिन एक शर्त यह है कि वह उस से मिलने उस के दूसरे घर में आया करेगी और उसे नजमा के साथ उस के रिश्ते पर कोई ऐतराज नहीं होगा. बेटी की खातिर गीता ने संजीव की सारी शर्तें मान लीं.

दोनों पत्नियों ने साझा किए अपने दुखदर्द संजीव ने अपनी बेटी कोमल को इलाज के लिए अस्पताल में भरती करवा दिया. कोमल के इलाज के बहाने उस ने अपने दफ्तर से 7 लाख रुपए भी लिए. अब जब गीता संजीव से मिलने आने लगी तो नतीजा यह हुआ कि वह एक बार फिर गर्भवती हो गई.

इस बीच संजीव नजमा के गांव जा कर उसे और अपने बेटे गौरव को भी वापस ले आया. इस तरह अब संजीव के दोनों हाथों में लड्डू थे. समय के साथ गीता तीसरे बच्चे की मां बनी. उसे एक बेटी पैदा हुई, जिस की उम्र फिलहाल 11 साल है.नजमा अकसर संजीव के साथ अस्पताल में कोमल को देखने जाती थी. वहां उस की मुलाकात गीता से होती थी. दोनों वहां काफी देर अकेले भी रहती थीं तो दोनों के बीच बातचीत भी होने लगी.

एक दिन नजमा ने अपना दुख गीता के आगे कह दिया. गीता उस का दुख सुन कर हंसी और बोली, ‘‘तुम ने तो अभी कुछ नहीं सहा, जो मैं ने उस दरिंदे के हाथों सहा है.’’
2 पत्नियों के होते हुए भी अन्य महिलाओं से थे संबंध

धीरेधीरे गीता और नजमा अपने अपने दुखदर्द आपस में बांटने लगीं और उन की मंडली में संजीव की बेटी कोमल भी शामिल हो गई. कोमल अब धीरेधीरे स्वस्थ हो रही थी. इसी बीच कोरोना काल शुरू हो गया जिस से संजीव का काम लगभग बंद हो गया और वह ज्यादा समय घर में ही रहने लगा.

बीते 3 साल तो नजमा उर्फ गीता के लिए नरक बन गए, क्योंकि घर में रहने के दौरान संजीव का अत्याचार बहुत बढ़ गया. नजमा उस के सामने डर के मारे भीगी बिल्ली बनी रहती थी.यही नहीं, संजीव दूसरी औरतों के साथ भी शारीरिक संबंध रखता है, यह बातें भी नजमा को पता चलीं तो वह डरने लगी कि कहीं संजीव किसी तीसरी से शादी कर के उसे घर पर न ले आए.

एक दिन नजमा ने अपना यह डर गीता के सामने रखा. गीता ने कहा, ‘‘ये हो सकता है कि जैसे वह मुझे हटा कर तुझे ले आया तो आगे तुझे हटा कर किसी तीसरी को ले आएगा. उस के पास न पैसे की कमी है और न घर की.’’संजीव की हरकतों और प्रताड़नाओं से तंग आ कर लगभग 3 साल पहले गीता और नजमा ने संजीव की हत्या का प्लान बनाया, जिस में गीता की बेटी कोमल भी शामिल थी. गीता और कोमल का सहारा पा कर नजमा में कुछ हिम्मत आई.

गीता ने नजमा से कहा, ‘‘अगर दोनों की जिंदगी से संजीव नाम का कांटा निकल जाए तो कानूनन उस की बीवी होने के नाते उस की सारी चलअचल संपत्ति पर मेरा हक हो जाएगा. फिर उस में से मैं आधी संपत्ति तुम्हारे नाम कर दूंगी.’’नजमा इस आश्वासन पर खुश हो गई. अब तीनों मिल कर संजीव की हत्या की साजिश रचने लगीं. हत्या करवाने का जिम्मा नजमा ने अपने सिर लिया. उस ने कोमल के फोन से अपने घर के लोगों से बातचीत शुरू की और उन्हें अपनी आपबीती सुनाई.

दोनों पत्नियों ने दी 15 लाख की सुपारी संजीव की हत्या की सुपारी नजमा ने अपनी बुआ के लड़के इकबाल को दी.42 वर्षीय इकबाल झारखंड के गोड्डा में रहता था. नजमा ने उस से कहा कि संजीव की हत्या के बदले में वह उसे पूरे 15 लाख रुपए देगी.
15 लाख का लालच बहुत बड़ा था, मगर इकबाल खुद यह काम नहीं करना चाहता था. वह इस के लिए किसी सुपारी किलर की तलाश में जुट गया. जल्दी ही उस ने अपने दोस्त और शूटर नयूम अंसारी को इस काम के लिए राजी कर लिया.

नयूम गुजरात के वासी में टेलर था और इकबाल भी उस की दुकान पर टेलरिंग का काम कर चुका था. इकबाल ने शूटर नयूम अंसारी का फोन नंबर नजमा को दे कर कहा कि बाकी की सारी बातें अब वह नयूम से ही करे.कुछ दिन बाद नयूम झारखंड से दिल्ली नजमा से मिलने आया. संजीव की गैरमौजूदगी में नजमा नयूम से पास के एक पार्क में मिली और आगे की सारी प्लानिंग वहीं हुई. नयूम ने नजमा से संजीव की बाइक का नंबर ले लिया.

यही नहीं, नजमा के कहने पर कोमल ने 20 हजार रुपए भी नयूम के खाते में ट्रांसफर कर दिए और बाकी के 15 लाख काम हो जाने के बाद संजीव की एक प्रौपर्टी बेच कर देने का वादा किया.अब नजमा ने कोमल के फोन से नयूम को घर की एकएक बात बतानी शुरू कर दी. संजीव कब घर में रहता है, कब बाहर जाता है, वह कहांकहां जाता है इस की पूरी जानकारी नजमा नयूम को देने लगी.

शूटर ने बाइक चलाते हुए मारी गोली नयूम ने इस काम के लिए अपने एक अन्य दोस्त मनीष को भी गुजरात से बुला लिया. मनीष का एक चचेरा भाई दिल्ली के लाजपत नगर में रहता है, जिस से उस ने काम के बहाने बाइक मांग ली.
प्लानिंग पक्की थी. 6 जुलाई की रात साढ़े 8 बजे जब संजीव नजमा और अपने 10 साल के बेटे को साथ ले कर बाइक से चक्की पर गेहूं पिसवाने के लिए निकला तो नजमा ने निकलने से पहले अपने पास छिपा कर रखे गए कोमल के फोन से यह जानकारी तुरंत नयूम को दी.

जैसे ही नजमा का इशारा मिला, दोनों हत्यारे तमंचा लोड कर के शिकार का पीछा करने निकल पड़े. चक्की पर गेहूं रखवा कर दीपालय स्कूल के पास जैसे ही थोड़े सन्नाटे में संजीव की बाइक पहुंची, हत्यारों ने उसे ओवरटेक करते हुए रोका और उस के सीने में दनादन कई गोलियां उतार दीं.

गोली लगते ही संजीव बाइक लिए गिर पड़ा. साथ ही पीछे बैठी नजमा भी बेटे के साथ गिरी. वह सचमुच बेहोश हुई या उस ने नाटक किया, इस का पता नहीं चल पाया. मगर घटना के बाद गोलियों की आवाज सुन कर आसपास के लोग वहां जमा हो गए.
लोगों ने संजीव को पास के मजीदिया अस्पताल पहुंचाया.

थानाप्रभारी ने जब गीता से सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गई. महिला पुलिस ने नजमा की तलाशी में वह फोन भी बरामद कर लिया, जिस के जरिए उस ने कई बार नयूम से बातचीत की थी. अलगअलग राज्यों से पकड़े गए आरोपी

हत्या का मामला उजागर होने के बाद दक्षिणपूर्वी दिल्ली क्षेत्र की डीसीपी ईशा पांडेय ने क्षेत्र के एसीपी प्रदीप कुमार के नेतृत्व में एक टीम का गठन किया.
इस टीम में थानाप्रभारी (गोविंदपुरी) जगदीश यादव, इंसपेक्टर सुनील कुमार, एसआई विवेक, रवि कुमार, स्पैशल सेल से इंसपेक्टर असवीर सिंह, हैडकांस्टेबल नरसी मीणा और ऋषि दास को शामिल किया.

गीता उर्फ नजमा को हत्या के शक में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. उस ने हत्या की साजिश में संजीव की पहली पत्नी गीता, उस की 21 वर्षीय बेटी कोमल, अपने बुआ के बेटे इकबाल, शार्प शूटर नयूम और मनीष के नाम उजागर कर दिए.

पुलिस ने सब से पहले इकबाल को ट्रैप लगा कर झारखंड से पकड़ा. उस ने नयूम के साथ हत्या में शामिल मनीष मिश्रा का नाम बताया और यह भी कि मनीष वलसाड भाग गया है.

पुलिस की एक टीम तब गुजरात गई और वहां से मनीष को गिरफ्तार किया गया.
पुलिस ने शूटर नयूम अंसारी को झारखंड के गोड्डा गांव से गिरफ्तार कर लिया. नयूम को झारखंड की अदालत से ट्रांजिट रिमांड पर ले कर दिल्ली लाया गया. आरोपियों के पास से 3 जिंदा कारतूस के साथ .315 बोर का तमंचा और बाइक बरामद की गई.

कोमल के पास से हत्या के लिए इस्तेमाल किए गए 3 मोबाइल भी पुलिस ने बरामद कर लिए हैं. कोमल सहित सभी आरोपियों को पुलिस ने हत्या के आरोप में जेल भेज दिया है.

गीता और गीता उर्फ नजमा के 3 बच्चे अब अपने चाचा विमल कुमार के साथ रह रहे हैं. गौरतलब है कि प्राइवेट नौकरी करने वाले विमल के पास खुद के 2 बच्चे हैं, जिन की परवरिश और पढ़ाई का भारी बोझ उन पर है.

मुस्कान की मुस्कुराह के दुश्मन : भाग 3

थाने पर उस की जामातलाशी ली गई तो उस के पास से सोने की 28 ज्वैलरी बरामद की गईं, जिन की कीमत 14 लाख रुपए आंकी गई. इस के अलावा 16 हजार रुपए नकद, एक तमंचा .315 बोर तथा डिजिटिल वीडियो रिकौर्डर का ऐडाप्टर बरामद हुआ. उस से मुसकान की हत्या के संबंध में पूछा गया तो वह मुकर गई. लेकिन सख्ती करने पर सलोनी टूट गई और उस ने हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया.
इंसपेक्टर अवनीश कुमार सिंह ने किन्नर मुसकान की हत्या का परदाफाश करने और एक आरोपी को गिरफ्तार करने की जानकारी एसपी दिनेश त्रिपाठी को दी तो उन्होंने पुलिस सभागार में प्रैसवार्ता की. मीडियाकर्मियों के समक्ष किन्नर मुसकान की हत्या का खुलासा किया. खुलासा करने वाली टीम को उन्होंने पुरस्कृत करने की भी घोषणा की.

जयसिंह आखिर क्यों बना मुसकान मुसकान कौन थी? वह किन्नर कैसे बनी? उस ने अकूत संपत्ति कैसे कमाई? फिर वह अपनों का शिकार कैसे बनी? यह सब जानने के लिए हम पाठकों को उस के अतीत की ओर ले चल रहे हैं. उत्तर प्रदेश के कानपुर महानगर से करीब 20 किलोमीटर दूर एक धार्मिक व ऐतिहासिक कस्बा बिठूर है. इसी कस्बे से 4 किलोमीटर दूर अरैर गांव में ज्ञान सिंह अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी लौंग श्री के अलावा 2 बेटे मान सिंह व जय सिंह थे. ज्ञान सिंह के पास कटरी में कुछ खेत तथा 2 बीघा में अमरूद का बाग था. खेत व अमरूद के बाग से ज्ञान सिंह की गुजरबसर हो जाती थी.

ज्ञान सिंह का बड़ा बेटा मान सिंह तो तेजतर्रार था. लेकिन छोटे बेटे जयसिंह से वह परेशान रहते थे. जयसिंह की चालढाल भी ठीक न थी. वह मटकमटक कर चलता था. वह लड़कों के बजाय लड़कियों में ज्यादा रुचि लेता था. एक रोज कल्याणपुर का एक किन्नर गांव में किसी बच्चे के जन्म पर बधाई देने आया. नाचने के दौरान उस की नजर 12 वर्षीय जयसिंह पर पड़ी. उस किन्नर को समझते देर न लगी कि वह उसी के समुदाय का है.

इस के बाद वह किन्नर अकसर गांव आने लगा और जयसिंह से मिलने लगा. वह किन्नर सजधज कर सोने के आभूषण पहन कर आता था, जिस से जयसिंह उस से प्रभावित हो गया था. एक रोज उस किन्नर ने जयसिंह की आंखों में लालच देखा तो उस ने कहा, ‘‘तुम भी यह सब हासिल कर सकते हो बशर्ते कि तुम मेरे साथ चलो और हमारे समुदाय में शामिल हो जाओ.’’ जिज्ञासा और लालचवश जयसिंह ने बात मान ली और एक रोज घर वालों को बिना बताए उस किन्नर के साथ चला गया. उस किन्नर ने जयसिंह की मुलाकात अपने गुरु संजू से कराई और उसे अपने समुदाय में शामिल करने का अनुरोध किया.

संजू कल्याणपुर की किन्नर बस्ती में रहती थी. उस ने जयसिंह को अपने यहां रख लिया. अब जयसिंह को सुबहशाम नाचगाना व ताली बजाने की ट्रेनिंग दी जाने लगी. कुछ माह की ट्रेनिंग के बाद ही वह इन सभी कलाओं में पारंगत हो गया. संजू गुरु ने अब जयसिंह का नाम मुसकान रख दिया. शुरू हआ मुसकान का नया सफर

मुसकान अब अन्य किन्नरों के साथ सजधज कर नेग मांगने व बधाइयां गाने जाने लगी. किन्नरों का क्षेत्र बड़ा होता है. हर क्षेत्र का एक किन्नर गुरु होता है. क्षेत्र से किन्नर जो कमाते हैं, वह गुरु के चरणों में अर्पित करते है. गुरु आधा हिस्सा अपना निकाल कर बाकी का बंटवारा शिष्यों में कर देते हैं. मुसकान की भी अब कमाई होने लगी थी और वह धन जुटाने लगी थी. इस के बाद उस का रहनसहन भी बदल गया था. इस तरह धीरेधीरे 5 साल बीत गए. इस बीच न तो घर वालों को उस की याद आई और न ही मुसकान ने अपने मांबाप के घर की तरफ कदम रखा.

मुसकान पढ़ीलिखी तो थी नहीं, लेकिन महत्त्वाकांक्षी थी. वह किन्नर बन कर अकूत धन कमाना चाहती थी. इस के लिए उस ने लाखों रुपए खर्च कर प्लास्टिक सर्जरी के जरिए लिंग परिवर्तन करा लिया और सर्जरी के जरिए ही सुंदर स्त्री का रूप धारण कर लिया. अब वह सजधज कर जहां भी शादी समारोह में जाती तो लोगों की निगाह उस पर टिक जाती. उस के ठुमकों पर लोग वाहवाह करने लगते. मुसकान अब लाखों रुपए कमाने लगी थी.

किन्नर मुसकान ने कुछ सालों तक कानपुर परिक्षेत्र में कमाई की, उस के बाद वह उन्नाव शहर आ गई. इस बीच मुसकान ने कई किन्नर गुरुओं से अच्छे संबंध बना लिए थे. उन्नाव शहर के सफीपुर कस्बे में उस की मुलाकात जानकी कुंड में रहने वाली किन्नर गुरु मंजू से हुई. मंजू गुरु ने मुसकान को अपने ग्रुप में शामिल कर लिया और क्षेत्र में घूमने की इजाजत दे दी. कम समय में ही मुसकान ने अपने काम तथा अच्छे व्यवहार से मंजू का दिल जीत लिया और वह उस की चहेती शिष्या बन गई. मंजू ने उसे किन्नर नायक बना दिया. मंजू गुरु की मौत के बाद मुसकान नायक (गुरु) बन गई.

मुसकान ने वसीम से की लव मैरिज वर्ष 2010 में फतेहपुर शहर में हुए किन्नर सम्मेलन के दौरान मुसकान की मुलाकात वसीम से हुई. मुलाकातें बढ़ीं तो दोनों को एकदूसरे से प्यार हो गया. इस के बाद किन्नर मुसकान ने वसीम से प्रेम विवाह कर लिया. मुसकान कुछ माह तक उन्नाव में रही, उस के बाद वह वापस सफीपुर आ गई.

इन्हीं दिनों मुसकान ने सफीपुर कस्बे के बब्बर अली खेड़ा में एक मकान खरीद लिया और उसे आधुनिक रूप से सुसज्जित कर उस मकान में रहने लगी.वसीम और मुसकान के बीच 3 साल तक सब ठीक रहा. उस के बाद तनाव बढ़ने लगा. तनाव की वजह थी वसीम की शारीरिक मानसिक प्रताड़ना. वसीम नेग में मिलने वाले रुपए व जेवर उस से छीनने लगा था. मुसकान विरोध करती तो वह उसे मारतापीटता था.
मुसकान जब आजिज आ गई तो उस ने किन्नर समुदाय की मदद ली और वसीम से नाता तोड़ लिया. नाता तोड़ने के बाद भी वह उसे परेशान करता रहता था. वसीम से रिश्ता तोड़ने के बाद मुसकान ने जनवरी, 2019 में सोनू के साथ कोर्ट मैरिज कर ली. सोनू कश्यप मथुरा शहर के थाना चंद्रावली के यमुना पल्ली लक्ष्मी नगर मोहल्ले में रहता था. सोनू हृष्टपुष्ट आकर्षक युवक था. इसलिए मुसकान उस पर फिदा हो गई थी.

संदीप राजपूत उर्फ सलोनी मजबूरी में बना किन्नर शादी के बाद सोनू मुसकान के साथ सफीपुर में रहने लगा. वह कुछ माह मुसकान के साथ रहता तो कुछ माह मातापिता के साथ. इस तरह सोनू का आनाजाना सफीपुर बना रहता था. वसीम को जब मुसकान द्वारा दूसरी शादी करने की जानकारी हुई तो वह जलभुन उठा. उस ने मुसकान से कहा कि दूसरी शादी रचा कर उस ने अच्छा नहीं किया. तब उस ने मुसकान को जान से मारने की धमकी भी दी. उस के बाद वसीम उसे आए दिन धमकियां देने लगा. वसीम की धमकियों से आजिज आ कर मुसकान ने सुरक्षा के तौर पर अपने घर पर 2 सीसीटीवी कैमरे भी लगवा लिए.

मुसकान के साथ उस की 3 किन्नर साथी अन्नू, रूबी व सलोनी रहती थीं. सलोनी युवक किन्नर था. उस का नाम संदीप राजपूत था. संदीप का विवाह रिंकी से हुआ था. रिंकी ने सुहागरात को ही जान लिया था कि उस का पति संदीप नपुंसक (किन्नर) है. रिंकी का इस बाबत संदीप की मां मीना से झगड़ा हुआ.

लड़झगड़ कर रिंकी मायके चली गई और ससुराल वालों के खिलाफ कोर्ट में दहेज व धोखाधड़ी का मामला दर्ज करा दिया. कोर्टकचहरी के चक्कर से बचने के लिए संदीप किन्नर बन गया. उस ने अपना नाम सलोनी रख लिया और मुसकान के घर सफीपुर आ कर रहने लगा.

मुसकान सफीपुर कस्बे की चर्चित किन्नर थी. वह अपनी चेलियों अन्नू, रूबी, सलोनी व ढोलकिया मनोज बाबा के साथ क्षेत्र में निकलती थी और खूब कमाई करती थी. कमाई का आधा भाग वह स्वयं लेती थी और शेष भाग का बंटवारा सहयोगियों में करती थी. एक किलो सोने की ज्वैलरी थी मुसकान के पास

मुसकान ने अब तक कार भी खरीद ली थी. मनोज गोस्वामी को उस ने बतौर ड्राइवर रखा था. उस का रहनसहन अब रईसों जैसा था. उसे सोने के आभूषण खरीदने तथा पहनने का बेहद शौक था. कस्बे के एक ज्वैलर से उस ने एक किलोग्राम सोने के आभूषण खरीदे थे. वह पैसा बैंक में जमा करने के बजाय उस से ज्वैलरी खरीदना ज्यादा पसंद करती थी.

मुसकान के इस रहनसहन से अन्नू, रूबी व सलोनी ईर्ष्या करती थीं. वे सोचती थीं कि जो मुसकान के पास है, वह सब उन के पास भी होता.इसी सोच में अन्नू और रूबी की नीयत डोल गई. अन्नू ने एक रोज मुसकान के एटीएम से 40 हजार रुपए निकाल लिएइस की जानकारी मुसकान को हुई तो उस ने अन्नू को भलाबुरा कहा और पिटाई भी की. यही नहीं, उस ने वाट्सऐप के जरिए अन्नू को समुदाय में बदनाम भी कर दिया.

इस अपमान से अन्नू तिलमिला उठी और मुसकान से बदला लेने की सोचने लगी. रूबी ने भी उस की ज्वैलरी चुराई थी, सो उसे भी मुसकान ने बेइज्जत किया था. इसलिए रूबी भी मुसकान से नाराज रहने लगी थी.मुसकान के घर पर पुष्पा और संतोषा खाना बनाने का काम करती थीं. अन्नू व रूबी की करतूत से दोनों वाकिफ थीं, सो वे दोनों उन पर नजर रखती थीं. मुसकान को किन्नर सम्मेलन में जाने का बड़ा शौक था. वह आसपास के जिलों में होने वाले किन्नर सम्मेलनों में अकसर जाती रहती थी.

सम्मेलनों के अलावा मुसकान को पशुपक्षी से भी प्रेम था. उस ने दरजनों सफेद कबूतर व सफेद खरगोश पाल रखे थे, जिन का मकान की छत पर डेरा रहता था. मुसकान का एक वफादार कुत्ता चीकू भी था. वह उस से बेहद प्यार करती थी.अन्नू व रूबी दोनों मुसकान से अपमान का बदला लेना चाहती थीं. उन की निगाह मुसकान के आभूषणों तथा नकदी पर भी थी. आखिर में उन दोनों ने मुसकान की हत्या व लूट करने की योजना बनाई.

इस में उन दोनों ने संदीप उर्फ सलोनी को भी शामिल कर लिया. संदीप इसलिए राजी हो गया कि लूटे गए पैसों से वह पत्नी रिंकी से समझौता कर लेगा और कोर्टकचहरी से निजात पा जाएगा. योजना बनाने के बाद तीनों समय का इंतजार करने लगे.29 जुलाई, 2022 की सुबह मुसकान का ड्राइवर मनोज गोस्वामी बाइक की चाबी सोनू को देने मथुरा चला गया. दरअसल, 8 दिन पहले सोनू जब सफीपुर आया था तो अपनी बाइक की चाबी घर पर ही भूल गया था. शाम को रसोइया पुष्पा व संतोषा आईं और रात 8 बजे खाना बना कर अपने घर चली गई थीं.

उचित मौका देख कर रूबी, अन्नू तथा सलोनी ने गुफ्तगू की फिर काम तमाम करने की ठान ली. तीनों ने मिल कर शराब पी तथा मुसकान को भी पिलाई. शराब पीने के बाद मुसकान कमरे में जा कर लेट गई. चारों में से खाना किसी ने नहीं खाया.रात साढ़े 10 बजे किन्नर मुसकान जब सो गई, तब रूबी, अन्नू व सलोनी मुसकान के कमरे में पहुंचीं. रूबी व सलोनी ने मुसकान के हाथपैर पकड़ लिए और अन्नू ने तमंचा माथे पर सटा कर फायर कर दिया. गोली लगने से मुसकान का भेजा उड़ गया और उस की मौत हो गई.
फिर तीनों ने मिल कर शव फर्श पर रखा. इस के बाद कमरे का सामान बिखेर कर अलमारी से ज्वैलरी व नकदी लूट ली. अन्नू ने मुसकान का आईफोन भी अपने कब्जे में ले लिया. घर में 2 सीसीटीवी कैमरे लगे थे. पकड़े जाने के डर से उन्होंने उखाड़ कर सुरक्षित कर लिए. फिर कमरे को बाहर से बंद कर तीनों फरार हो गईं. मुसकान का आईफोन भी अन्नू ने रख लिया था.

सफीपुर से तीनों एक ट्रक ड्राइवर से लिफ्ट ले कर रात में ही बरेली आ गईं. यहां वे एक होटल में ठहरीं. होटल में ही अन्नू, रूबी व सलोनी ने आभूषण व नकदी का आपस में बंटवारा किया.बंटवारे में तीनों के हिस्से में 26-26 हजार रुपए नकद तथा सोने की ज्वैलरी के 28-28 नग आए. बंटवारे के बाद तीनों अलगअलग रास्ते से फरार हो गईं.

इधर घटना की जानकारी तब हुई, जब मुसकान का कुत्ता चीकू पुष्पा के घर गया और उस की साड़ी खींच कर घर लाया. पुष्पा ने ढोलकिया मनोज बाबा की मार्फत पुलिस को सूचना दी.4 अगस्त, 2022 को पुलिस ने आरोपी संदीप उर्फ सलोनी को उन्नाव कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. 2 अन्य आरोपी रूबी व अन्नू फरार थीं. पुलिस उन की तलाश में जुटी थी.

तुम्हें पाने की जिद में – भाग 3 : रत्ना की क्या जिद थी

जब कभी जीतेंद्र कालिज जाते तो रत्ना भी साथ जाती थी. रत्ना के कालिज  में उन के सहयोगियों से सहानुभूति और सहयोग की प्रार्थना की थी कि वे लोग जीतेंद्र की मानसिक स्थिति को देखते हुए उन के साथ बहस या तर्क न करें. जीतेंद्र को संतुलित रखने के लिए रत्ना साए की तरह उन के साथ रहती.

जीतेंद्र को बच्चों के भरोसे छोड़ कर रत्ना बाहर कहीं नौकरी करने भी नहीं जा सकती थी. इसलिए घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था. जिस दिन जीतेंद्र कुछ विचलित दिखते थे रत्ना को ट्यूशन वाले बच्चों को वापस भेजना पड़ता था, क्योंकि एक तो वह उन बच्चों को जीतेंद्र का कोपभाजन नहीं बनाना चाहती थी और दूसरे, वह नहीं चाहती थी कि आसपड़ोस के बच्चे जीतेंद्र की असंतुलित मनोदशा को नमकमिर्च लगा कर अपने परिजनों में प्रचारित करें. इस कारण सामान्य दिनों में उसे अधिक समय ट्यूशन में देना पड़ता था.

गृहस्थी की दो पहियों की गाड़ी में एक पहिए के असंतुलन से दूसरे पहिए पर सारा दारोमदार आ टिका था. सभी साजोसामान से भरा घर घोर आर्थिक संकट में धीरेधीरे खाली हो रहा था. यश और गौरव को शहर के प्रतिष्ठित पब्लिक स्कूल से निकाल कर पास के ही एक स्कूल में दाखिला दिला दिया था ताकि आनेजाने के खर्च और आर्थिक बोझ को कुछ कम किया जा सके. मासूम बच्चे भी इस संघर्ष के दौर में मां के साथ थे. वे कक्षा में अव्वल आ कर मां की आंखों में आशा के दीप जलाए हुए थे.

रत्ना जाने किस मिट्टी की बनी थी जो पल भर भी बिना आराम किए घर, बच्चों, ट्यूशन और पति सेवा में कहीं भी कोई कसर न रखना चाहती थी.

मेरे बेटे मयंक और आकाश अपनी लाड़ली बहन रत्ना की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते पर स्वाभिमानी रत्ना ने आर्थिक सहायता लेने से विनम्र इनकार कर दिया था. उस का कहना था कि अपने परिवार के खर्चों के बाद एक गृहस्थी की गाड़ी खींचने के लिए आप को अपने परिवार की इच्छाओं का गला घोंटना पडे़गा. भाई, आप का यह अपनापन और सहारा ही काफी है कि आप मुश्किल वक्त में मेरे साथ खडे़ हैं.

इन हालात की जिम्मेदार जीतेंद्र की मां खुद को निरपराधी साबित करने के लिए चोट खाई नागिन की तरह रत्ना के खिलाफ नईनई साजिशें रचती रहतीं. छोटे बेटे हर्ष और पति की असहमति के बावजूद जीतेंद्र को दूरदराज के ओझास्यानों के पास ले जा कर तंत्र साधना और झाड़फूंक करातीं जिस से जीतेंद्र की तबीयत और बिगड़ जाती थी. जीतेंद्र के विचलित होने पर उसे रत्ना के खिलाफ भड़का कर उस के क्रोध का रुख रत्ना  की ओर मोड़ देती थीं. केवल रत्ना ही उन्हें प्यारदुलार से दवा खिला पाती थी. लेकिन तब नफरत की आंधी बने जीतेंद्र को दवा देना भी मुश्किल हो जाता था.

जीतेंद्र को स्वयं पर भरोसा मजबूत कर अपने भरोसे में लेना, उन्हें उत्साहित करते हुए जिंदादिली कायम करना उन की काउंसलिंग का मूलमंत्र था.

सहनशक्ति की प्रतिमा बनी मेरी रत्ना सारे कलंक, प्रताड़ना को सहती चुपचाप अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करती रही. यश और गौरव को हमारे साथ रखने का प्रस्ताव वह बहुत शालीनता से ठुकरा चुकी थी. ‘मम्मी, इन्हें हालात से लड़ना सीखने दो, बचना नहीं.’ वाकई बच्चे मां की मेहनत को सफल करने में जी जान से जुटे थे. गौरव इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर पूणे में नौकरी कर रहा है. यश इंदौर में ही एम.बी.ए. कर रहा है.

हर्ष के डाक्टर बनते ही घर के हालात कुछ पटरी पर आ गए थे. रत्ना की सेवा, काउंसलिंग और व्यायाम से जीतेंद्र लगभग सामान्य रहने लगे थे. हां, दवा का सेवन लगातार चलते रहना है. अपने बेटों की प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार मिल रही सफलता से वे गौरवान्वित थे.

रत्ना की सास अपने इरादों में कामयाब न हो पाने से निराश हो कर चुप बैठ गई थीं. भाभी को अकारण बदनाम करने की कोशिशों के कारण हर्ष की नजरों में भी अपनी मां के प्रति सम्मान कम हुआ था. हमेशा झूठे दंभ को ओढे़ रहने वाली हर्ष की मां अब हारी हुई औरत सी जान पड़ती थीं.

ट्रेन खुली हवा में दौड़ने के बाद धीमेधीमे शहर में प्रवेश कर रही थी. मैं अतीत से वर्तमान में लौट आई. इत्मिनान से रत्ना की जिंदगी की किताब के सुख भरे पन्नों तक पहुंचतेपहुंचते मेरी ट्रेन भी इंदौर पहुंच गई.

स्टेशन पर रत्ना और जीतेंद्र हमें लेने आए थे. कितना सुखद एहसास था यह जब हम जीतेंद्र और रत्ना को स्वस्थ और प्रसन्न देख रहे थे. शादी में सभी रस्मों में भागदौड़ में जीतेंद्र पूरी सक्रियता से शामिल थे. उन्हें देख कर लग ही नहीं रहा था कि यह व्यक्ति ‘सीजोफेनिया’ जैसे जजबाती रोग की जकड़न में है.

गौरव की शादी धूमधाम से हुई. शादी के बाद गौरव और नववधू बड़ों का आशीर्वाद ले कर हनीमून के लिए रवाना हो गए. शाम को मैं, धीरज, रत्ना और जीतेंद्र में चाय पीते हुए हलकीफुलकी गपशप में मशगूल थे. तब जीतेंद्र ने झिझकते हुए मुझ से कहा, ‘‘मम्मीजी, आप ने रत्ना के रूप में एक अमूल्य रत्न मुझे सौंपा है जिस की दमक से मेरा घर आलोकित है. मुझे सही मानों में सच्चा जीवनसाथी मिला है, जिस ने हर मुश्किल में मेरा साथ दिया है.’’

बेटी की गृहस्थी चलाने की सूझबूझ और सहनशक्ति की तारीफ सुन कर मेरा सिर गर्व से ऊंचा हो गया. ‘‘रत्ना, मेरा दुर्व्यवहार, इतनी आर्थिक तंगी, सास के दंश, मेरा इलाज… कैसे सह पाईं तुम इतना कुछ?’’ अनायास ही रत्ना से मुसकरा कर पूछ बैठे थे जीतेंद्र. रत्ना शरमा कर सिर्फ इतना ही कह सकी, ‘‘बस, तुम्हें पाने की जिद में.’’-

बीवी की शतरंजी चाल : भाग 3

एक समय में वीरेंद्र का नरकटियागंज सहित पूरे बेतिया में दबदबा था. इसलिए कमलेश उर्फ बिट्टू जायसवाल ने वीरेंद्र से शरण मांगी थी. उसे उम्मीद थी कि वीरेंद्र उसे पुलिस और प्रियंका के घर वालों से बचाने में मदद करेगा.
बताया जाता है कि जब बिट्टू और प्रियंका भाग कर उस के पास आए थे, तब कुछ दिन बाद वीरेंद्र ने बिट्टू को अपने घर से भगा दिया और प्रियंका से जबरन शादी कर ली.
प्रियंका से उस के 3 बच्चे भी हुए. लेकिन जब वीरेंद्र प्रियंका के साथ लखनऊ रहने आ गया, तब वहीं खुशबून तारा उस की जिंदगी में आ गई, जिसे वह नरकटियागंज से ही जानता था.

वीरेंद्र दिल में बसा चुका था प्रियंका को प्रियंका को वीरेंद्र ने पहली बार बिट्टू की नरकटियागंज के चौराहे पर स्थित पान की दुकान पर देखा था. उसे देखते ही वह उस पर फिदा हो गया था. दुकान पर प्रियंका बिट्टू की वजह से नियमित आती थी.
एक दिन आधी रात को वीरेंद्र ने बिट्टू और प्रियंका को साथ अपने घर आया देखा तो वह चौंक गया. वह अभी कुछ सवाल करता, इस से पहले ही कमलेश ने उसे कुछ दिनों तक प्रियंका के साथ रहने के लिए शरण मांगी.

उन्होंने बताया कि दोनों मंदिर में शादी कर चुके हैं, जिस का दोनों के परिवार में विरोध होगा. प्रियंका ठाकुर खानदान की है और वह वैश्य समाज से आता है. उन की शादी को प्रियंका के घर वाले कभी नहीं स्वीकारेंगे.वीरेंद्र को भी यह बात अच्छी नहीं लगी कि ऊंची जाति की कोई लड़की अपने नीचे की जाति वाले से अंतरजातीय विवाह करे. वह खुद ठाकुर था, लेकिन प्रियंका की वजह से उस ने अपने बड़े घर के एक हिस्से में उन दोनों को रहने की इजाजत दे दी.

प्रियंका को शादी के लिए कर लिया राजी अगले रोज ही वीरेंद्र ने प्रियंका को हिफाजत से रखने के बहाने से कमलेश उर्फ बिट्टू को चले जाने के लिए कहा. उस ने वादा किया कि उस की अमानत के तौर पर प्रियंका सुरक्षित रहेगी. बिट्टू उस की बातों में आ गया.
बिट्टू के जाने के बाद वीरेंद्र ने प्रियंका से न केवल अपने दिल की बात कही, बल्कि उसे समाज से बाहर किसी से शादी करने को ले कर डरायाधमकाया भी. वीरेंद्र ने इलाके में अपनी हैसियत और पैसा का हवाला देते हुए उस के साथ शादी करने का दबाव बनाया.
प्यार में अंधी प्रियंका घर से भाग चुकी थी.

उस के लिए दोबारा घर लौटना असंभव दिखा. उसे संरक्षण देने वाला व्यक्ति प्रेमी से कहीं ज्यादा वफादार लगा और वह वीरेंद्र से शादी करने को तैयार हो गई.उन्हीं दिनों वीरेंद्र के सामने बिहार छोड़ने की मजबूरी आ गई. वह प्रियंका के साथ लखनऊ आ गया. बिट्टू को जब पता चला कि उस की प्रेमिका प्रियंका पर वीरेंद्र ने कब्जा कर लिया है तो वह ठगा से महसूस करने लगा और भीतर ही भीतर वीरेंद्र से दुश्मनी भी पाल ली.
प्रियंका अभी अपनी शादी की 2 वर्षगांठ भी नहीं मना पाई थी कि उस का सामना सौतन खुशबून तारा से हो गया.

वीरेंद्र से शादी करने के बाद खुशबून ने अपना धर्म भी बदल लिया. इस का जम कर विरोध करते हुए प्रियंका बातबात में वीरेंद्र को जलील करने लगी.
फिरदौस गैंगस्टर का शूटर होने के चलते अभिमान में रहता था. वह अपना ठेका लेने या दूसरे के ठेके में से हिस्सा लेने की ताक में लगा रहता है. नहीं मिलने पर उस से दुश्मनी कर बैठता था. इस का शिकार वीरेंद्र भी हो चुका था.

वीरेंद्र को छोटेमोटे विवाद तो आपस में लेनदेन के बाद निपट जाते थे, लेकिन 2011 में हुआ विवाद थाना और अदालत तक जा पहुंचा. एक ठेके को ले कर वीरेंद्र के खिलाफ स्थानीय थाने में मामला दर्ज हो गया. जब उस ने महसूस किया कि बिहार में रहते हुए ठेकेदारी में काफी अड़चनें आ रही हैं, तब उस ने राज्य छोड़ने की योजना बना ली.

वीरेंद्र लखनऊ तो आ गया, लेकिन वह पिछली जिंदगी की परेशानियों से उबर नहीं पाया. पेशागत दुश्मनी बनी रही और दुश्मन पीछे लगे रहे. उन्हीं दिनों खुशबून तारा भी वीरेंद्र के संपर्क में आ गई थी और साथ रहने लगी. पहले से दुश्मन बना बैठा फिरदौस वीरेंद्र के साथ एक बार फिर रेलवे की ठेकेदारी हासिल करने को ले कर टकरा गया.

एक घटना सन 2014 की है, जो वीरेंद्र के लिए काफी नुसानदायक साबित हुई. एक काम के सिलसिले में उस का नरकटियागंज आना हुआ था. वहां घात लगाए दुश्मनों ने उस पर हमला कर दिया था.उस हमले में वह बच गया था, लेकिन शंभु राम नामक व्यक्ति की हत्या हो गई थी. हत्या का आरोप वीरेंद्र पर ही लगा जरूर, लेकिन उस का दबदबा भी बढ़ गया.

कुछ समय बाद ही बेतिया में 1 करोड़ 19 लाख के ठेके के विवाद में वीरेंद्र पर फायरिंग हो गई, जिस में एक महिला समेत 5 अन्य व्यक्तियों को जेल भेज दिया गया. उन में एक को छोड़ कर बाकी की जमानत हो गई थी.ठेके के विवाद में ही 2 जुलाई, 2019 को वीरेंद्र पर जानलेवा हमला लखनऊ के चारबाग जीआरपी स्टेशन के पास हुआ. उसे 2 युवतियों से मिलने के बहाने से बुलाया गया था. उस हमले में वह बच गया था, लेकिन कुछ गोलियां उस के पैरों में जा लगी थीं. रीढ़ की हड्डी को नुकसान हुआ था, जिस से वह दिव्यांग हो गया था.

तब दर्ज मुकदमे में प्रियंका और बिट्टू के अलावा अलावा 3 अन्य आरोपी शादाब अख्तर, फिरदौस और मिराज खातून बनाए गए थे. उस के बाद से वीरेंद्र और उन की दुश्मनी की जड़ें और गहरी हो गई थीं. हालांकि वीरेंद्र सतर्क हो गया था और सुरक्षा के लिए उस ने 3 गार्ड रख लिए थे.

वीरेंद्र की निगाह में बिट्टू के साथ प्रियंका भी खटकने लगी थी. हालांकि तब तक प्रियंका 3 बच्चों की मां भी बन चुकी थी. बात प्रियंका के तलाक तक की पहुंच गई थी, किंतु कोरोना प्रकोप के चलते मार्च 2020 में लौकडाउन लग गया और उन के तलाक की अरजी अदालती फाइलों में ही दबी रही.

घर में रहते हुए वीरेंद्र का घर कलह का अखाड़ा बन चुका था. वीरेंद्र का कामधंघा भी रुका हुआ था. वीरेंद्र उन दिनों काफी मानसिक तनाव में आ चुका था. किसकिस को संभाले, यह तय नहीं कर पा रहा था.

लौकडाउन खत्म होने के बाद साल 2021 के मध्य से वीरेंद्र कामकाज में जुट गया था, लेकिन उस का कभी इलाज के सिलसिले में दिल्ली जाना होता तो कभी कोर्ट की सुनवाई के सिलसिले में बिहार जाना पड़ता था. उन सब समस्याओं से निपट कर जब घर लौटता तब प्रियंका और खुशबून तारा की जलीभुनी बातें सुनने को मिलती थीं.
आखिरकार, एक दिन उस ने प्रियंका को कह दिया कि जहां जाना चाहे जाए, तलाक की अरजी मंजूर होते ही वह उसे उस का हक दे देगा.

प्रियंका ने पूर्व प्रेमी के साथ रची साजिश फिर एक दिन प्रियंका अपने एक बच्चे को ले कर मायके चली आई. उस के कुछ दिनों बाद उस ने पुराने प्रेमी कमलेश जायसवाल उर्फ बिट्टू से मिल क र खतरनाक योजना बना डाली. वारदात में कोई चूक न होने पाए, इस के लिए फिरदौस ने प्रियंका के साथ वीरेंद्र के घर के आसपास जा कर मुआयना तब किया था, जब वीरेंद्र इलाज के सिलसिले में खुशबून तारा के साथ दिल्ली गया हुआ था.

इस हत्याकांड के बाद 3 जुलाई, 2022 को बिहार के सीवान जिले के बड़हरिया कस्बे से क्राइम ब्रांच और एसटीएफ की टीम ने भाड़े के शूटरों को गिरफ्तार कर लिया था, किंतु तीनों मुख्य आरोपी पकड़ में नहीं आ पाए थे. उन्हें बड़े ही नाटकीय ढंग से पकड़ा गया था. इस बारे में डीसीपी (ईस्ट) प्राची सिंह ने जांच टीम को कुछ अहम सुराग दिए थे.

प्राची सिंह के अनुसार घटना को अंजाम देने के बाद फरार आरोपियों ने जियामऊ होटल में रात गुजारी थी. उन्हें फिरदौस ने रात में जश्न की एक पार्टी दी थी. पुलिस को वहीं पास में ही स्थित बक्शी का तालाब के निकट झाड़ी से मोबाइल फोन मिला था. उस से मिले नंबरों को सर्विलांस में लगा कर काल डिटेल्स निकाली गई थी. उसी आधार पर हमलावर पकड़े गए थे.

11 जुलाई, 2022 को एसटीएफ की टीम ने उसी काल डिटेल्स के आधार पर शाहजहांपुर जा कर वीरेंद्र के सुरक्षा गार्ड सतीश और देवेंद्र को भी पकड़ लिया था. पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर लखनऊ ले आई. उन्होंने पूछताछ में बताया कि 25 जून की घटना से वे काफी डर गए थे. इस कारण वे फरार हो गए थे कि कहीं उन का नाम भी ठेकेदार की हत्या में न आ जाए.

बहरहाल, इस मामले में हत्या का मास्टरमाइंड कमलेश जायसवाल उर्फ बिट्टू जायसवाल की 25 जुलाई को पुलिस से मुठभेड़ हो गई, जिस से कमलेश के दाहिने पैर में गोली लगी और उसे सिविल अस्पताल में भरती करवा दिया गया. इस दौरान उस का एक साथी भाग गया था, संभवत: वह फिरदौस हो.

पुलिस ने कमलेश उर्फ बिट्टू जायसवाल पर 25 हजार रुपए का ईनाम घोषित कर रखा था. उस के पास से एक तमंचा, कारतूस व बाइक बरामद हुई. इस के खिलाफ बिहार के कई थानों में मुकदमे दर्ज हैं.

कथा लिखे जाने तक इस हत्याकांड के 2 आरोपी प्रियंका और फिरदौस फरार चल रहे थे. आरोपियों से पूछताछ के बाद उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया

सोने का घाव- भाग 2 : मलीहा और अलीना बाजी के बीच क्या थी गलतफहमी

मगर एक दिन तो हद कर दी उन्होंने. मुझे मेरे बौस के साथ एक मीटिंग में जाते देख लिया था. शाम को घर आने पर जबरदस्त हंगामा खड़ा कर दिया. मुझ पर बेवफाई व बदकिरदारी का इलजाम लगाया. कई लोगों के साथ मेरे ताल्लुक जोड़ दिए.

ऐसे वाहियात इलजाम सुन कर मैं गुस्से से पागल हो उठी और फैसला कर लिया कि यहां जिऊंगी तो इज्जत के साथ, वरना जुदाई बेहतर है. मैं ने सख्त लहजे में कहा, ‘नादिर, अगर आप का रवैया ऐसा ही रहा तो मेरा आप के साथ रहना मुश्किल होगा. आप को अपने लगाए इलजामों के सुबूत देने पड़ेंगे. मुझ पर आप ऐसे फालतू इलजाम नहीं लगा सकते.’

सासससुर ने अपने बेटे को समझाने की कोशिश की. लेकिन वे गुस्से से उफनते हुए बोले, ‘मुझे कुछ साबित करने की जरूरत नहीं. मुझे सब पता है. तुम जैसी आवारा औरतों को घर में नहीं रखा जा सकता. मुझे बदलचन औरतों से नफरत है. मैं ऐसी औरत के साथ नहीं रह सकता. मैं तुम्हें तलाक देता हूं, तलाक देता हूं, तलाक देता हूं.’

और सबकुछ पलभर में खत्म हो गया. मैं मम्मी के पास आ गई. उन पर तो जैसे आसमान टूट पड़ा. मेरे अहं, मेरे चरित्र पर चोट पड़ी थी. मेरे चरित्र पर लांछन लगाए गए थे. मैं ने धीरेधीरे खुद को संभाल लिया क्योंकि मैं कुसूरवार न थी. यह मेरी इज्जत और अस्मिता की लड़ाई थी. 20-25 दिनों की छुट्टी करने के बाद मैं ने जौब पर जाना शुरू कर दिया.

संभल तो गई मैं, पर खामोशी व उदासी मेरे साथी बन गए. मम्मी मेरा बेहद खयाल रखती थीं. बड़ी बहन अलीना भी आ गईं. वे हर तरह से मुझे ढाढ़स बंधातीं. काफी दिन रुकीं. जिंदगी अपने रूटीन पर आ गई. अलीना बाजी ने इस संकट से निकलने में बड़ी मदद दी. मैं काफी हद तक सामान्य हो गई थी.

उस दिन छुट्टी थी. अम्मी ने 2 पुराने गावतकिए (दीवान के गोल तकिए) निकाले और कहा, ‘ये तकिए काफी सख्त हो गए हैं, इन में नई रुई भर देते हैं.’

मैं ने पुरानी रुई निकाल कर नीचे डाल दी. मैं और अलीना बाजी तख्त पर रखी नई रुई साफ कर रहे थे. मम्मी उसी वक्त कमरे से आ कर हमारे पास ही बैठ गईं. उन के हाथ में एक प्यारी सी चांदी की डब्बी थी. मम्मी ने खोल कर दिखाई. उस में बेपनाह खूबसूरत एक जोड़ी जड़ाऊ कर्णफूल थे. जिस पर पन्ना और रूबी की बड़ी खूबसूरत जड़न थी. इतनी चमक और महीन कारीगरी थी कि हम देखते ही रह गए.

अलीना बाजी की आंखें कर्णफूलों की तरह जगमगाने लगीं. उन्होंने बेचैनी से पूछा, ‘मम्मी ये किस के हैं?’ मम्मी बोलीं, बेटा, ये तुम्हारी दादी के हैं. उन्होंने ये कर्णफूल और माथे का जड़ाऊ झूमर मुझे दिया था. माथे का झूमर मैं ने शादी में तुम्हें दे दिया. अब ये कर्णफूल हैं, इन्हें मैं मलीहा को देना चाहती हूं. दादी की यादगार निशानियां तुम दोनों बहनों के पास रहेगीं, ठीक है न.’

अलीना बाजी के चेहरे का रंग फीका पड़ गया. उन्हें जेवरों का जनून की हद तक शौक था, खासकर एंटीक ज्वैलरी की तो जैसे वे दीवानी थीं. जरा सा गुस्से से वे बोलीं, ‘मम्मी, आप ने ज्यादती की, खूबसूरत और बेमिसाल चीज आप ने मलीहा के लिए रख दी. मैं बड़ी हूं, आप को कर्णफूल मुझे देने चाहिए थे.’

मम्मी ने समझाया, ‘बेटी, तुम बड़ी हो, इसलिए कुंदन का सैट तुम्हें अलग से दिया था, साथ में, दादी का झूमर और एक सोने का सैट दिया था. मलीहा को एक सोने का ही सैट दिया था, उसे मैं ने कर्णफूल (टौप्स) भी उस वक्त नहीं दिए थे. अब दे रही हूं. तुम खुद सोच कर बताओ, क्या गलत किया मैं ने.’

अलीना बाजी अपनी ही बात कहती रहीं. मम्मी के बहुत समझाने पर कहने लगीं, ‘अच्छा, मैं दादी वाला झूमर मलीहा को दे दूंगी, तब आप ये कर्णफूल मुझे दे दीजिएगा. अगली बार मैं आऊंगी, तो झूमर ले कर आऊंगी और कर्णफूल ले जाऊंगी.’

मम्मी ने बेबसी से मेरी तरफ देखा. मेरे सामने अजीब दोराहा था. बहन की मोहब्ब्त या कर्णफूल, मैं ने दिल की बात मानी और कहा, ‘ठीक है बाजी, अगली बार झूमर मुझे दे देना और आप ये कर्णफूल ले कर जाना.’

मम्मी को यह बात पसंद नहीं आई. पर क्या करतीं, चुप रहीं. अभी ये सब बातें चल ही रही थीं कि घंटी बजी. मम्मी ने जल्दी से कर्णफूल और डब्बी तकिए के नीचे रख दी. पड़ोस की आंटी कश्मीरी सूट वाले को ले कर आईर् थीं. हम सब सूट व शौल वगैरह देखने लगे. काफी अच्छे थे, कीमतें भी सही थीं. हम ने 2-3 सूट लिए. उन के जाने के बाद मम्मी ने वह चांदी की डब्बी निकाल कर दी और कहा, ‘मलीहा, इसे संभाल कर अलमारी में रखे दो.’ मैं डब्बी रख कर आई. फिर हम ने जल्दीजल्दी तकिए के खोलों में रुई भर दी. उन्हें सी कर तैयार कर कवर चढ़ा दिए और दीवान पर रख दिए. 3-4 दिनों बाद अलीना बाजी चली गईं. जातेजाते मुझे याद करा गईं, ‘मलीहा, अगली बार मैं कर्णफूल ले कर जाऊंगी, भूलना मत.’

 

सपना -भाग 2 : कौनसे सपने में खो गई थी नेहा

नेहा को कोई चोट नहीं लगी, लेकिन एक हाथ पीछे से उस के सिर और गरदन से होता हुआ उस के चेहरे और खिड़की के बीच सट गया था. नेहा ने अपने सिर को हिलाडुला कर उस हाथ को अपने गालों तक आने दिया. कोई सर्द सी चीज उस के होंठों को छू रही थी, शायद यह वही हाथ था जो नेहा को सुखद स्पर्श प्रदान कर रहा  था. उंगलियां बड़ी कोमलता से कभी उस के गालों पर तो कभी उस के होंठों पर महसूस हो रही थीं. उंगलियों के पोरों का स्पर्श उसे अपने बालों पर भी महसूस हो रहा था. ऐसा स्पर्श जो सिर्फ प्रेमानुभूति प्रदान करता है. नेहा इस सुकून को अपने मनमस्तिष्क में कैद कर लेना चाहती थी. इस स्पर्श के प्रति वह सम्मोहित सी खिंची चली जा रही थी.

नेहा को पता नहीं था कि यह सपना था या हकीकत, लेकिन यह उस का अभीष्ट सपना था, वही सपना… उस का अपना स्वप्न… हां, वही सपनों का राजकुमार… पता नहीं क्यों उस को अकेला देख कर बरबस चला आता था. उस के गालों को छू लेता, उस की नींद से बोझिल पलकों को हौले से सहलाता, उस के चेहरे को थाम कर धीरे से अपने चेहरे के करीब ले आता. उस की सांसों की गर्माहट उसे जैसे सपने में महसूस होती. उस का सिर उस के कंधे पर टिक जाता, उस के दिल की धड़कन को वह बड़ी शिद्दत से महसूस करती, दिल की धड़कन की गूंज उसे सपने की हकीकत का स्पष्ट एहसास कराती. एक हाथ उस के चेहरे को ठुड्डी से ऊपर उठाता… वह सुकून से मुसकराने लगती.

नींद से ज्यादा वह कोई और सुखद नशा सा महसूस करने लगती. उस का बदन लरजने लगता. वह लहरा कर उस की बांहों में समा जाती. उस के होंठ भी अपने राजकुमार के होंठों से स्पर्श करने लगते. बदन में होती सनसनाहट उसे इस दुनिया से दूर ले जाती, जहां न तनहाई होती न एकाकीपन, बस एक संबल, एक पूर्णता का एहसास होता, जिस की तलाश उसे हमेशा रहती.

बस ने एक झटका लिया. उस की तंद्रा उसे मदहोशी में घेरे हुए थी. उसे अपने आसपास तूफानी सांसों की आवाज सुनाई दी. वह फिर से मुसकराने लगी, तभी पता नहीं कैसे 2 अंगारे उसी के होंठों से हट गए. वह झटके से उठी… आसपास अब भी अंधियारा फैला था. बस की खिड़की का परदा पूरी तरह तना था. उस की सीट ड्राइवर की तरफ पहले वाली थी, इसलिए जब भी सामने वाला परदा हवा से हिलता तो ड्राइवर के सामने वाले शीशे से बाहर सड़क का ट्रैफिक और बाहरी नजारा उसे वास्तविकता की दुनिया से रूबरू कराता. वह धीरे से अपनी रुकी सांस छोड़ती व प्यास से सूखे होंठों को अपनी जबान से तर करती. उस ने उड़ती नजर अपनी सहेली पर डाली, लेकिन वह अभी भी गहन निद्रा में अलमस्त और सपनों में खोई सी बेसुध दिखी.

उस की नजर अचानक अपनी साथ वाली सीट पर पड़ी. वहां एक पुरुष साया बैठा था. उस ने घबरा कर सामने हिल रहे परदे को देखा. उस की हथेलियां पसीने से लथपथ हो उठीं. डर और घबराहट में नेहा ने अपनी जैकेट को कस कर पकड़ लिया. थोड़ी हिम्मत जुटा कर, थूक सटकते हुए उस ने अपनी साथ वाली सीट को फिर देखा. वह साया अभी तक वहीं बैठा नजर आ रहा था. उसे अपनी सांस गले में अटकी महसूस हुई. अब चौकन्नी हो कर वह सीधी बैठ गई और कनखियों से उस साए को दोबारा घूरने लगी. साया अब साफ दिखाई पड़ने लगा था. बंद आंखों के बावजूद जैसे वह नेहा को ही देख रहा था. सुंदरसजीले, नौजवान के चेहरे की कशिश सामान्य नहीं थी. नेहा को यह कुछ जानापहचाना सा चेहरा लगा. नेहा भ्रमित हो गई. अभी जो स्वप्न देखा वह हकीकत था या… कहीं सच में यह हकीकत तो नहीं? क्या इसी ने उसे सोया हुआ समझ कर चुंबन किया था? उस के चेहरे की हवाइयां उड़ने लगीं.

‘क्या हुआ तुम्हें?’ यह उस साए की आवाज थी. वह फिर से अपने करीब बैठे युवक को घूरने लगी. युवक उस की ओर देखता हुआ मुसकरा रहा था.

‘क्या हुआ? तुम ठीक तो हो?’ युवक पूछने लगा, लेकिन इस बार उस के चेहरे पर हलकी सी घबराहट नजर आ रही थी. नेहा के चेहरे की उड़ी हवाइयों को देख वह युवक और घबरा गया. ‘लीजिए, पानी पी लीजिए…’ युवक ने जल्दी से अपनी पानी की बोतल नेहा को थमाते हुए कहा. नेहा मौननिस्तब्ध उसे घूरे जा रही थी. ‘पी लीजिए न प्लीज,’ युवक जिद करने लगा.

नेहा ने एक अजीब सा सम्मोहन महसूस किया और वह पानी के 2-3 घूंट पी गई.

‘अब ठीक हो न तुम?’ उस ने कहा.

नेहा के मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला. पता नहीं क्यों युवक की बेचैनी देख कर उसे हंसी आने लगी. नेहा को हंसते देख वह युवक सकपकाने लगा. तनाव से कसे उस के कंधे अब रिलैक्स की मुद्रा में थे. अब वह आराम से बैठा था और नेहा की आंखों में आंखें डाल उसे निहारने लगा था. उस युवक की तीक्ष्ण नजरें नेहा को बेचैन करने लगीं, लेकिन युवक की कशिश नेहा को असीम सुख देती महसूस हुई.

‘आप का नाम पूछ सकती हूं?’ नेहा ने बात शुरू करते हुए पूछा.

‘आकाश,’ युवक अभी भी कुछ सकपकाया सा था.

‘मेरा नाम नहीं पूछोगे?’ नेहा खनकते स्वर में बोली.

‘जी, बताइए न, आप का नाम क्या है?’ आकाश ने व्यग्र हो कर पूछा.

‘नेहा,’ वह मुसकरा कर बोली.

‘नेहा,’ आकाश उस का नाम दोहराने लगा. नेहा को लगा जैसे आकाश कुछ खोज रहा है.

‘वैसे अभी ये सब क्या था मिस्टर?’ अचानक नेहा की आवाज में सख्ती दिखी. नेहा के ऐसे सवाल से आकाश का दिल बैठने लगा.

 

एक तीर से कई निशाने : भाग 3

मिताली को अपने पिता के मुंह से दिनेश के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल अच्छा नहीं लगा था, क्योंकि यह दिनेश ही तो था जिस ने मिताली की जान बचाई थी और वह यह भी जानती थी कि गोबर से बायोगैस बनाने का प्लांट उस के चालाक पिता इसलिए लगवाना चाहते हैं, ताकि अगले चुनाव में वे गांव वालों के सामने इसे एक उपलब्धि के तौर पर गिनाना और भुनाना चाहेंगे.

कुछ दिन तक दिनेश लगातार ठाकुर साहब से मिलने आता रहा और बात करता रहा. ठाकुर साहब आराम से बैठे रहते, जबकि दिनेश को कभी बैठने तक को नहीं कहते. वह हमेशा अदब के साथ ही खड़ा रहता. मिताली जानती थी कि उस के ठाकुर पिता दिनेश को कभी बैठने को नहीं कहेंगे, क्योंकि वे सिर्फ अपनी ऊंची जाति वालों के साथ ही उठनाबैठना पसंद करते हैं. ठाकुर साहब की हवेली के सामने वाले बाग के पास ही बायोगैस प्लांट लगने की तैयारी शुरू हो गई थी.

दिनेश देर शाम तक काम करता था. उस के साथ काम करने वालों की 6-7 लोगों की एक टीम भी थी. मिताली अकसर ही उन लोगों के पास आ जाती और उन्हें लगन के साथ काम करते देखती. कभीकभी कुछ तकनीकी बातों के बारे में दिनेश से सवालजवाब भी करती. दिनेश का ज्ञान और काम के प्रति लगन ये सब बातें मिताली को बहुत पसंद आईं और वह उस की तरफ कब खिंचती चली गई, यह मिताली को भी पता नहीं चला. मिताली ने अपना प्रेम दिनेश से छिपाया भी नहीं. दिनेश मिताली की बात सुन कर हक्काबक्का रह गया. हालांकि अंदर ही अंदर उस के मन में में भी मिताली के प्रति प्रेम पनप चुका था, पर वह जानता था कि एक दलित और ठकुराइन का प्रेम ऊंची जाति वालों को कभी रास नहीं आएगा,

इसलिए उस ने मिताली से यह सब ज्यादा गंभीरता से लेने को मना किया. ठाकुर साहब ने भी गाहेबगाहे मिताली को दिनेश से बात करते हुए देख लिया था और उन्हें यह मेलजोल पसंद नहीं आ रहा था. उन्होंने शाम को मिताली को इस तरह से दिनेश से बात करने से मना कर दिया, पर मिताली ने अपने पिता से कह ही दिया कि आखिर दिनेश में बुराई ही क्या है? वह आत्मनिर्भर है और पढ़ालिखा है. ‘‘यह सब तुझे शहर भेजने का नतीजा है… तू हमारी नाक कटवा कर रहेगी…

सुनती हो ठकुराइन, अब तुम्हारी लड़की एक नीच जाति के लड़के से इश्कबाजी करने लगी है और कहती है कि शादी भी रचाएगी… जी में आता है कि इस की गरदन ही काट दूं…’’ ठाकुर साहब का गुस्सा अपनी हद पर था. पर ठकुराइन ने बीचबचाव कर के ठाकुर साहब को शांत किया, पर अपनी आनबानशान और ऊंची जाति के मद में भरे ठाकुर साहब ने मिताली को एक कमरे में बंद कर दिया. ठाकुर साहब ने अपने गुरगों को दिनेश की हड्डीपसली तोड़ कर गांव के बाहर जाती हुई सड़क पर फेंक देने को कहा, पर इस से पहले कि वे सब दिनेश तक पहुंचते,

मिताली ने दिनेश को अपने मोबाइल से फोन कर के उस से यहां से भाग जाने को कह दिया था और यह भी बता दिया था कि अगर वह नहीं गया तो ठाकुर साहब के गुंडे उसे मार डालेंगे. यह खबर पाते ही दिनेश फौरन शहर की ओर भाग निकला. ठाकुर साहब के गुरगे दिनेश को पा न सके और हाथ मलते रह गए. हालांकि, दिनेश के इस तरह भाग जाने से ठाकुर साहब भी बहुत तिलमिलाए, पर मन ही मन उन्हें अपनी जीत का भान हो रहा था कि कम से कम उन की बेटी का एक दलित के साथ प्रेमप्रसंग तो खत्म हो गया और वे निश्चिंत भाव से मिताली के लिए एक अच्छे वर की तलाश में जुट गए. एक दिन मंदिर के पंडितजी ने ठाकुर साहब को बताया कि इस बार किसानों के खेत में आलू की फसल अच्छी नहीं हुई है और सरकार द्वारा भी

किसानों को कोई राहत नहीं दी जा रही है. कुछ किसान तो अपनी फसल सड़कों पर फेंक कर सरकार के खिलाफ गुस्सा जाहिर कर रहे हैं. पंडितजी की बात सुन कर ठाकुर साहब ने थोड़ा सोच कर कहा, ‘‘अरे तो पंडितजी, यही तो समय है जब तुम गांव वालों को ईश्वर का डर दिखा कर दान की उगाही कर सकते हो.’’ जब इस बात को पंडितजी समझ नहीं पाए तो ठाकुर साहब ने उन्हें बताया कि किसी भी कुदरती कहर को वे ईश्वर का क्रोध बताएं या मूर्तियों से नकली आंसू निकलवाएं, जिस से डर कर गांव वाले पूजापाठ और दान करेंगे, जिस से ज्यादा चढ़ावा आएगा. यह बात पंडितजी की समझ में आ गई थी. 2-3 दिन के बाद पंडितजी फिर ठाकुर साहब के पास आए. इस बार उन के साथ पैंटशर्ट पहने हुए एक आदमी भी था.

उस आदमी के हाथ में एक नक्शा था. उस ने ठाकुर साहब को बताया कि गांव के शुरुआती छोर पर बना हुआ मंदिर अब तोड़ना पड़ेगा, क्योंकि वहां से एक हाईवे निकाला जा रहा है, जिस के बदले में मंदिर के मालिक को अच्छाखासा मुआवजा भी दिया जाएगा. ‘‘पर, वह तो हमारे पुरखों का मंदिर है. उसे कोई कैसे तोड़ सकता है?’’ ठाकुर साहब थोड़ा तैश में आए, पर उन की तैश का कोई फायदा नहीं हुआ, क्योंकि उस आदमी ने मुसकराते हुए कहा कि यह तो सरकारी काम है… इस में बाधा भला कौन डाल सकता है. ठाकुर विक्रम सिंह का शातिर दिमाग समझ गया था कि सरकार ने भी आगामी चुनाव के तहत अपनी तैयारियां शुरू कर दी थीं और अब उन के पुरखों का मंदिर तोड़ा जाना तय ही था.

ठाकुर साहब ने शांत भाव से उस सरकारी आदमी को चायनाश्ता करा कर विदा कर दिया और तेजी से हुक्का गुड़गुड़ाने लगे. इस समय उन के दिमाग में एकसाथ कई चीजें चल रही थीं. शाम को ठाकुर साहब अपनी पत्नी के साथ मिताली के कमरे में गए, जहां पर वह गुमसुम बैठी हुई थी. ‘‘मिताली, तुम हमारी एकलौती बेटी हो. हम तुम्हें दुखी नहीं देख सकते, पर क्या करें… हम इस गांव के ठाकुर जो ठहरे, सब आगापीछा भी तो हमें ही देखना है न.’’ ठाकुर मिताली से प्यार जता रहे थे और उन्होंने मिताली से यह भी कहा कि उन्हें मिताली और दिनेश की शादी से एतराज नहीं है,

पर अगर उस ने इस शादी के लिए हां कर दी तो गांव वालों के सामने उस की और ठाकुर खानदान की किरकिरी हो जाएगी, इसलिए वह दिनेश को वापस बुला ले और पुरखों के मंदिर में रात के अंधेरे में चुपचाप शादी कर ले और शहर जा कर अपनी आगे की जिंदगी गुजारे. ठाकुर साहब ने अपने इस बदलाव की वजह यह बताई कि ठाकुर खानदान की सभी लड़कियों की शादी उसी मंदिर में होती आई हैं और अब उसे तोड़ने का फरमान आ गया है, इसलिए वे चाहते हैं कि मिताली भी जल्दी से जल्दी उसी मंदिर में शादी कर ले. अचानक अपने पिता के इस बरताव से मिताली हैरान तो थी, पर ठाकुर साहब की बातों में उसे सचाई भी नजर आ रही थी, इसलिए उस ने दिनेश को फोन कर के वापस आने को कहा और अपने पिता में आए इस बदलाव की वजह मिताली के प्रति ठाकुर के प्यार को बताया. दिनेश को एकदम से यकीन नहीं हुआ, पर जब उस ने इंटरनैट खंगाला तो गांव के सामने से हाईवे बनाए जाने की बात सच निकली. उसे लगा कि मिताली की बातें ठीक हैं और गांव लौटने में कोई बुराई नहीं है.

अगले दिन दिनेश ने मिताली को बताया कि वह सुबह ठीक 9 बजे कुलदेवी के मंदिर में उस का इंतजार करेगा. मिताली ने लाल जोड़ा पहना हुआ था, क्योंकि भले ही वह चोरीछिपे शादी कर रही थी, पर उसे अपने पिता की रजामंदी मिली हुई थी. ठाकुर साहब ने बड़े आराम से गाड़ी में मिताली और ठकुराइन को बिठाया और खुद भी बैठ गए. मंदिर के बाहर दिनेश मिताली का इंतजार कर रहा था. उस ने ठाकुर और ठकुराइन के पैर छूने चाहे, पर ठाकुर साहब ने यह कह कर रोक दिया कि वे लोग घर के दामाद से पैर नहीं छुआते. ठाकुर साहब ने दिनेश से कहा कि चूंकि मिताली मांगलिक है, इसलिए उस की शादी पहले एक नीम के पेड़ के साथ करनी होगी, ताकि मंगल के सब दोष खत्म हो जाएं.

इस सब में कुलमिला कर एक घंटा लगेगा और इस पूजा को दुलहन का परिवार ही देखता है, इसलिए दिनेश को मंदिर में ही रुकना होगा. दिनेश को इस बात पर यकीन नहीं हो रहा था. अभी तक तो उस ने ठाकुरों के जोरजुल्म के किस्से ही सुने थे, पर यह कैसा ठाकुर था जो अपनी बेटी का ब्याह एक दलित के साथ कर रहा था. ‘‘आओ भाई, अंदर आ जाओ,’’ पंडितजी ने दिनेश को मंदिर में बुलाया. दिनेश के पैर मंदिर में घुसते समय कांप रहे थे… ‘शायद ज्यादा खुशी के चलते ऐसा हो रहा होगा,’ दिनेश ने सोचा. पुजारी ने खुद एक स्टील की प्लेट में कुछ मिठाइयां और फल रख कर दिनेश की ओर बढ़ाए और कहा, ‘‘प्रसाद है… सारा खा लो… ऐसी रीति है.’’ दिनेश ने सिर झुका कर पंडितजी की आज्ञा का पालन किया और प्रसाद खाने लगा. बीचबीच में उस की नजरें मंदिर परिसर के बाहर दरवाजे की तरफ घूम जाती थीं.

उसे मिताली का इंतजार था. अचानक दिनेश को पेट में जलन और मरोड़ सी महसूस हुई. उस ने अपना गला पकड़ा और बाहर की ओर भागा. दिनेश को लगा कि उस का दम घुट रहा है और उस के शरीर का सारा खून बाहर की ओर आने पर आमादा है. दिनेश कुछ समझ नहीं पाया. एक अजीब सी अकड़न उस के जिस्म में फैल रही थी और उस का गला भी सूख रहा था. वह पानी तलाश रहा था. उस के गले से आवाज नहीं निकल पा रही थी. दिनेश मंदिर के बाहर लगे नल के पास पहुंच तो गया, पर उस का पानी नहीं पी सका और वहीं धड़ाम से गिर गया. उस के मुंह से झाग निकल रहा था. मिठाई में मिले जहर ने अपना काम पूरी ईमानदारी से कर दिया था. पंडितजी ने ठाकुर साहब को इस बात की जानकारी मोबाइल फोन पर दी. ठाकुर साहब मिताली के साथ लौट आए थे.

मिताली को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अभी तो दिनेश ठीक था, इतनी देर में उसे क्या हो गया. ‘‘कुलदेवी के मंदिर में कोई दलित घुस कर उन की मूर्ति को हाथ लगाए, यह कुलदेवी को मंजूर नहीं हुआ… आखिरकार उन्होंने इस पापी को खुद ही सजा दे दी,’’ पंडितजी जोरजोर से चीख रहे थे मानो वे यह बात सब को बताना चाह रहे हों. सुबह होने तक गांव में यह खबर फैल चुकी थी और डरेसहमे हुए लोग मंदिर से कुछ दूरी पर रह कर सारा घटनाक्रम देख रहे थे. पुलिस को खबर न लगे, इसलिए ठाकुर साहब ने फौरन ही दिनेश का क्रियाकर्म करवा दिया. ‘‘कुलदेवी की मूर्ति को दलित ने छू दिया है… मूर्ति और मंदिर अपवित्र हो गए हैं, इसलिए इस मूर्ति को गंगा में प्रवाहित करना होगा और एक नई मूर्ति हवेली के ठीक सामने एक नया मंदिर बनवा कर उस में रखनी होगी,’’

ठाकुर साहब ने सब गांव वालों के सामने कहा और यह भी बता दिया कि पुराने मंदिर की जगह को वे गांव वालों की भलाई के लिए सरकार को दान दे रहे हैं, ताकि वहां से शहर आसानी से आनेजाने के लिए हाईवे बनाया जा सके. गांव वाले ठाकुर साहब की दरियादिली और दानशीलता से बहुत खुश थे. दिनेश के मर जाने से मिताली कई महीनों तक सदमे में रही और जब वह दिनेश का गम नहीं सह पाई तो उसी नदी में डूब कर उस ने अपनी जान दे दी, जहां पर दिनेश ने उसे डूबने से बचाया था. ठाकुर को बेटी के मरने का गम तो हुआ,

पर मंदिर के पुजारी ने उन्हें ज्ञान दिया कि जो हुआ वह अच्छा है. अब कम से कम ठाकुर की बेटी एक दलित से तो नहीं ब्याही जाएगी. कुलदेवी ने एक दलित को खुद सजा दी है, इस डर से नए मंदिर में गांव वालों ने जम कर दान करना शुरू कर दिया था. पंडितजी की तनख्वाह ठाकुर साहब ने अब दोगुनी कर दी थी. इस तरह ठाकुर साहब ने एक तीर से कई निशाने साध लिए थे. द्य

2 पत्नियों ने दी पति की सुपारी : भाग 2

इसी बीच घर वालों ने बुलंदशहर में अपने गांव के पास के एक परिवार की लड़की से उस का रिश्ता तय कर दिया. लड़की का नाम था गीता. गीता की मां अपने पति को छोड़ कर अपने बच्चों के साथ दिल्ली में आ बसी थी.यहां उसे एनडीएमसी में सफाईकर्मी के रूप में काम मिल गया तो गृहस्थी की गाड़ी आराम से चलने लगी. गीता की शादी संजीव से तय हुई तो दोनों के ही परिजन खुश थे. मगर इस रिश्ते में खुशी ज्यादा दिन नहीं टिक पाई.

दरअसल, संजीव शुरू से ही इधरउधर मुंह मारने का आदी था. मतलब एक औरत से उस की हवस शांत नहीं होती थी. शादी के बाद भी उस ने पत्नी के अलावा कई औरतों से शारीरिक संबंध बना रखे थे, जिसे ले कर गीता और संजीव में आए दिन झगड़े होने लगे.इस बीच संजीव से गीता को 2 बच्चे हुए. बेटा ललित जो अब 27 साल का है और बेटी कोमल जिस की उम्र इस समय 21 साल है, घर में आए दिन मांबाप के बीच होने वाली मारपीट गालीगलौज के बीच दोनों बच्चे बड़े होने लगे.

उस की रासलीलाओं को देख कर गीता अंदर ही अंदर घुली जाती थी. पति के अत्याचार से तंग आ कर गीता कभीकभी बच्चों को ले कर अपनी मां के पास चली जाती थी.संजीव ने सरकारी नौकरी करते हुए गोविंदपुरी इलाके में 200 गज का एक प्लौट, 2 मकान, डीडीए का एक मकान, नोएडा के परी चौक जैसे एरिया में एक प्लौट और एक अन्य मकान छोटी सी अवधि में बना लिए थे. उस के पास इतना पैसा कहां से आ रहा था, यह कोई नहीं जानता.

भाइयों की जमीन करा ली थी अपने नाम यही नहीं, संजीव ने गांव में अपने बूढ़े और कम पढ़ेलिखे पिता पर दबाव डाल कर और झूठ बोल कर फरजी तरीके से भाइयों के हिस्से की जमीन भी अपने नाम लिखवा ली थी. जिस का पता चलने पर पिता ने उसे अपनी सभी संपत्तियों से बेदखल कर दिया था. जिस के बाद मातापिता से संजीव के रिश्ते पूरी तरह खत्म हो गए थे.

बस, यहां उस की पत्नी गीता थी, जो तमाम उत्पीड़न और हिंसा सहते हुए भी संजीव के भाइयों के परिवार से नातारिश्ता जोड़े हुए थी. मगर एक दिन जब संजीव अपने से आधी उम्र की लड़की नजमा को अपनी दूसरी पत्नी बना कर घर ले आया तो गीता की बरदाश्त करने की हद समाप्त हो गई. वह अपने दोनों बच्चों को ले कर हमेशा के लिए अपनी मां के घर चली गई.

उस की मां ने जोड़जुगाड़ लगा कर बेटी की नौकरी बतौर सफाई कर्मचारी एनडीएमसी में लगवा दी तो गीता के लिए जीवन के रास्ते कुछ आसान हो गए. वह अकेली ही अपने दोनों बच्चों को पालने लगी. जब चार पैसे आने लगे तो उस ने दक्षिणपुरी इलाके में एक मकान किराए पर ले लिया और बच्चों के साथ उस में शिफ्ट हो गई.इधर नजमा से संजीव की शादी की कहानी भी गजब की थी. नजमा झारखंड के गोड््डा की रहने वाली थी. नजमा के भाई काम की आस में कभीकभी दिल्ली आया करते थे और यहां वे संजीव के मकान में किराएदार के रूप में ठहरते थे. एकाध बार नजमा भी अपने भाइयों के साथ दिल्ली आई.

जब संजीव की नजर कमसिन नजमा पर पड़ी तो उस की कामुक चाहतें पंख फड़फड़ाने लगीं. योजना के अनुसार, उस ने नजमा के भाइयों से नजदीकियां बढ़ाईं. फिर उस की नजमा से भी बातचीत शुरू हो गई. संजीव ने नजमा के भाइयों से कहा कि वह उन की बहन के लिए एक अच्छा रिश्ता देखेगा और उस की शादी करवा देगा. इस तरह संजीव ने उन के दिल में अपनी जगह बना ली.

मौका मिलने पर संजीव एक दिन एक लड़के को साथ ले कर नजमा के गांव पहुंचा और उस लड़के से नजमा के निकाह की बात कह कर वह नजमा को अपने साथ दिल्ली ले आया. नजमा से कर ली दूसरी शादी

यहां आ कर उस ने नजमा को अपने घर में रख लिया और अपनी लच्छेदार मीठीमीठी बातों में फंसा कर उसे अपने साथ शादी करने के लिए राजी कर लिया और एक मंदिर में शादी कर ली. उधर संजीव की अपनी पत्नी गीता ने तूफान खड़ा कर दिया. दोनों के बीच जम कर लड़ाईझगड़ा और जूतमपैजार हुई.

सोने का घाव- भाग 3 : मलीहा और अलीना बाजी के बीच क्या थी गलतफहमी

दिन अपने अंदाज में गुजर रहे थे. एक शादी में शामिल होने चाचाचाची, उन के बच्चे आए. 5-6 दिन रहे. घर में खूब रौनक रही. खूब घूमेफिरे. चाची मेरी मम्मी को कम ही पसंद करती थीं क्योंकि मेरी मम्मी दादी की चहेती बहू थीं. दादी ने अपनी खास चीजें भी मम्मी को दी थीं. चाची की दोनों बेटियों से मेरी खूब बनती थी, हम ने खूब एंजौय किया.

नादिर की मम्मी 2-3 बार आईं. बहुत माफी मांगी, बहुत कोशिश की कि इस मसले का कोई हल निकल जाए, पर जब अहं और चरित्र पर चोट पड़ती है तो औरत बरदाश्त नहीं कर पाती. मैं ने किसी भी तरह के समझौते से साफ इनकार कर दिया.

अलीना बाजी के बेटे की सालगिरह फरवरी में थी. उन्होंने फोन कर के कहा कि वे अपने बेटे अशर की सालगिरह नानी के घर में मनाएंगी. मैं और मम्मी बहुत खुश हुए. बड़े उत्साह से पूरे घर को ब्राइट कलर से पेंट करवाया. कुछ नया फर्नीचर भी लिया. एक हफ्ते बाद अलीना बाजी अपने शौहर समर के साथ आ गईं. घर की डैकोरेशन देख कर बहुत खुश हुईं.

सालगिरह के दिन सुबह से ही सारे काम शुरू हो गए. दोस्तोंरिश्तेदारों सब को बुलाया था. मैं और मम्मी नाश्ते के बाद अरेंजमैंट के बारे में बातें करने लगे. खाना और केक बाहर से और्डर पर बनवाया था. उसी वक्त अलीना बाजी आईं, मम्मी से कहने लगीं, ‘मम्मी, लीजिए, आप यह झूमर संभाल कर रख लीजिए और मुझे कर्णफूल दे दीजिए. आज मैं अशर की सालगिरह में पहनूंगी.’ अम्मी ने मुझ से कहा, ‘जाओ मलीहा, वह डब्बी निकाल कर ले आओ.’ मैं ने डब्बी ला कर मम्मी के हाथ पर रख दी. बाजी ने बेसब्री से डब्बी उठा कर खोली. डब्बी खोलते ही वे चीख पड़ीं, ‘मम्मी, कर्णफूल तो इस में नहीं हैं.’

मम्मी ने झपट कर डब्बी उन के हाथ से ली. सच ही, डब्बी खाली पड़ी थी. मम्मी एकदम सन्न रह गईं. मेरे तो जैसे हाथपैरों की जान निकल गई. अलीना बाजी की आंखों में आंसू थे. उन्होंने ऐसी शकभरी नजरों से मुझे देखा कि मुझे लगा, काश, जमीन फट जाए और मैं उस में समा जाऊं. बाजी गुस्से में जा कर अपने कमरे में लेट गईं.

मैं ने और मम्मी ने अलमारी का कोनाकोना छान मारा, पर कहीं कर्णफूल न मिलें. अजब पहेली थी. मैं ने अपने हाथ से डब्बी अलमारी में रखी थी. उस के बाद कभी निकाली ही नहीं. फिर कर्णफूल गए कहां?

एक बार खयाल आया, ‘अभी चाचाचाची आए थे. और चाची दादी के जेवर की वजह से मम्मी से बहुत जलती थीं कि सब कीमती चीजें उन्होंने मम्मी को दी थीं. कहीं उन्होंने तो मौका देख कर, हक समझ कर निकाल लिए.’ मैं ने मम्मी से अपने मन की बात कही तो वे कहने लगीं, ‘मैं ऐसा नहीं सोचती कि वे ऐसा कर सकती हैं.’

फिर मेरा ध्यान घर पेंट करने वालों की तरफ गया. उन लोगों ने 3-4 दिनों काम किया था. भूल से कभी अलमारी खुली रह गई हो और उन्हें हाथ साफ करने का मौका मिल गया हो. मम्मी कहने लगीं, ‘नहीं बेटा, बिना देखे, बिना सुबूत के किसी पर इलजाम लगाना गलत है. जो चीज जानी थी वह चली गई. बेवजह किसी पर इलजाम क्यों लगाएं.’

सालगिरह का दिन बेरंग हो गया. किसी का दिलदिमाग ठिकाने न था. अलीना बाजी के हस्बैंड समर भाई ने परिस्थिति संभाली. सब काम ठीकठाक हो गए. दूसरे दिन अलीना बाजी ने जाने की तैयारी शुरू कर दी. मम्मी ने हर तरह से समझाया, कई तरह की दलीलें दीं. समरभाई ने भी समझाया, पर वे रुकने को तैयार न हुईं. मैं ने उन्हें कसम खा कर यकीन दिलाना चाहा, ‘मैं बेकुसूर हूं. कर्णफूल गायब होने में मेरा कोई हाथ नहीं है.’

उन्हें किसी बात पर यकीन न आया. उन के चेहरे पर छले जाने के भाव देखे जा सकते थे. शाम को वे चली गईं. पूरे घर में एक बेबस सी उदासी पसर गई. मेरे दिल पर अजब सा बोझ था. मैं अलीना बाजी से शर्मिंदा थी कि अपना वादा निभा न सकी.

पिछले 2 सालों में अलीना बाजी सिर्फ 2 बार मम्मी से मिलने आईं वह भी 2-3 दिनों के लिए. आने पर मुझ से तो बात ही न करतीं. मैं ने बहन के साथसाथ एक अच्छी दोस्त भी खो दी. बारबार सफाई देना फुजूल था. मैं ने चुप्पी साध ली. मेरी खामोशी ही शायद मेरी बेगुनाही की जबां बन जाए. वक्त बड़े से बड़ा जख्म भर देता है. शायद यह गम भी मंद पड़ जाए. हलकी सी आहट हुई और मैं अतीत से वर्तमान में आ गई. सिर उठा कर देखा, नर्स खड़ी थी, कहने लगी, ‘‘पेशेंट आप से मिलना चाहती हैं.’’

मुंह धो कर मैं मम्मी के पास आईसीयू में गई. मम्मी काफी बेहतर थीं. मुझे देख कर उन के चेहरे पर हलकी सी मुसकराहट आ गई. वे मुझे समझाने लगीं, ‘‘बेटी, तुम परेशान न हो. उतारचढ़ाव तो जिंदगी में आते रहते हैं. उन का हिम्मत से मुकाबला कर के ही हराया जा सकता है.’’

मैं ने उन्हें हलका सा नाश्ता कराया. डाक्टर ने कहा, ‘‘उन की हालत काफी ठीक है. आज रूम में शिफ्ट कर देंगे.

2-4 दिनों में छुट्टी कर देगें. पर दवा और परहेज का बहुत खयाल रखना पड़ेगा. ऐसी कोई बात न हो जिस से उन्हें स्ट्रैस पहुंचे.’’

शाम तक अलीना बाजी आ गईं. मुझ से सिर्फ सलामदुआ हुई. वे मम्मी के पास रुकीं, मैं घर आ गई. 3 दिनों बाद मम्मी भी घर आ गईं. अब उन की तबीयत अच्छी थी. हम उन्हें खुश रखने की ही कोशिश करते. एक हफ्ता तो मम्मी को देखने आने वालों में गुजर गया. मैं ने भी औफिस जौइन कर लिया. मम्मी के बहुत कहने पर बाजी ज्यादा रुकने को राजी हो गईं. जिंदगी सुकून से गुजरने लगी. अब मम्मी भी हलकेफुलके काम कर लेती थीं.

अलीना बाजी और उन के बेटे की वजह से घर में अच्छी रौनक रहती. उस दिन छुट्टी थी, मैं घर की सफाई में जुट गई. मम्मी कहने लगीं, ‘‘बेटा, गावतकिए फिर बहुत सख्त हो गए हैं, एक बार खोल कर रुई तोड़ कर भर दो.’’ अन्नामां तकिए उठा लाईं. उन्हें खोलने लगी. फिर मैं और अन्नामां रुई तोड़ने लगीं. कुछ सख्त सी चीज हाथ को लगी, मैं ने झुक कर नीचे देखा. मेरी सांस जैसे थम गई. दोनों कर्णफूल रुई के ढेर में पड़े थे. होश जरा ठिकाने आए तो मैं ने कहा, ‘देखिए मम्मी, ये रहे कर्णफूल.’’

बाजी ने कर्णफूल उठा लिए और मम्मी के हाथ पर रख दिए. मम्मी का चेहरा खुशी से चमक उठा. जब दिल को यकीन आ गया कि कर्णफूल मिल गए और खुशी थोड़ी कंट्रोल में आई तो बाजी बोलीं, ‘‘ये कर्णफूल यहां कैसे?’’

मम्मी सोच में पड़ गईं, फिर रुक कर कहने लगीं, ‘‘मुझे याद आता है अलीना, उस दिन भी तुम लोग तकिए की रुई तोड़ रही थीं. तभी मैं कर्णफूल निकाल कर लाई थी. हम उन्हें देख रहे थे जब ही घंटी बजी थी. मैं जल्दी से कर्णफूल डब्बी में रखने गई, पर हड़बड़ी में घबरा कर डब्बी के बजाय रुई में रख दिए और डब्बी तकिए के पीछे रख दी थी. कर्णफूल रुई में दब कर छिप गए. कश्मीरी शौल वाले के जाने के बाद डब्बी मैं ने अलमारी में रखवा दी, लेकिन कर्णफूल रुई में दब कर रुई के साथ तकिए के अंदर चले गए और मलीहा ने तकिए सिल कर कवर चढ़ा कर रख दिए. हम समझते रहे, कर्णफूल डब्बी में अलमारी में सेफ रखे हैं.

‘‘जब अशर की सालगिरह के दिन अलीना ने तुम से कर्णफूल मांगे तो पता चला कि उस में कर्णफूल नहीं हैं और अलीना तुम ने सारा इलजाम मलीहा पर लगा दिया.’’ मम्मी ने अपनी बात खत्म कर के एक दुखभरी सांस छोड़ी.

अलीना के चेहरे पर पछतावा था. दुख और शर्मिंदगी से उस की आंखें भर आईं. वे दोनों हाथ जोड़ कर मेरे सामने खड़ी हो गईं. रूंधे गले से कहने लगीं, ‘‘मेरी बहन, मुझे माफ कर दो. बिना सोचेसमझे तुम पर दोष लगा दिया. पूरे 2 साल तुम से नाराजगी में बिता दिए. मेरी गुडि़या मेरी गलती माफ कर दो.’’

मैं तो वैसे भी प्यारमोहब्बत को तरसी हुई थी. जिंदगी के मरूस्थल में खड़ी हुई थी. मेरे लिए चाहत की एक बूंद अमृत के समान थी. मैं बाजी से लिपट कर रो पड़ी. आंसुओं में दिल में फैली नफरत व जलन की गर्द धुल गई. अम्मी कहने लगीं, ‘‘अलीना, मैं ने तुम्हें पहले भी समझाया था कि मलीहा पर शक न करो. वह कभी भी तुम से छीन कर कर्णफूल नहीं लेगी. उस का दिल तुम्हारी चाहत से भरा है. वह कभी तुम से छल नहीं करेगी.’’

बाजी शर्मिंदगी से बोलीं, ‘‘मम्मी, आप की बात सही है, पर एक मिनट मेरी जगह खुद को रख कर सोचिए, मुझे एंटीक ज्वैलरी का दीवानगी की हद तक शौक है. ये कर्णफूल बेशकीमत एंटीक पीस हैं. मुझे मिलना चाहिए थे पर आप ने मलीहा को दे दिया. मुझे लगा, मेरी इल्तजा सुन कर वह मान गई, फिर उस की नीयत बदल गई. उस की चीज थी, उस ने गायब कर दी. यह माना कि  ऐसा सोचना मेरी खुदगर्जी थी, गलती थी. इस की सजा के तौर पर मैं इन कर्णफूल को मलीहा को ही देती हूं. इन पर मलीहा का ही हक है.’’

मैं जल्दी से बाजी से लिपट गईर् और बोली, ‘‘ये कर्णफूल आप के पहनने से जो खुशी मुझे होगी वह खुद के पहनने से नहीं होगी. ये आप के हैं, आप ही लेंगी.’’

मम्मी ने भी समझाया, ‘‘बेटा, जब मलीहा इतनी मिन्नत कर रही है तो मान जाओ. मोहब्बत के रिश्तों के बीच दीवार नहीं आनी चाहिए.’’

‘‘रिश्ते फूलों की तरह नाजुक होते हैं, नफरत व शक की धूप उन्हें झुलसा देती है. फिर ये टूट कर बिखर जाते हैं,’’ यह कहते हुए मैं ने बाजी के कानों में कर्णफूल पहना दिए.

बीवी की शतरंजी चाल : भाग 1

लखनऊ में थाना कैंट के प्रभारी शिवचरण लाल यादव 25 जून, 2022 को नीलमथा इलाके में एक दिव्यांग व्यक्ति वीरेंद्र ठाकुर की हत्या की सूचना पा कर चौंक गए थे. उन के चौंकने का कारण भी स्वाभाविक था, क्योंकि 42 वर्षीय वीरेंद्र और उस के परिवार की सुरक्षा में 3-3 गार्डों की तैनाती के बावजूद उस की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी. हत्यारों ने गार्ड समेत परिवार के सभी सदस्यों को बंधक बना दिया था.

थानाप्रभारी यादव ने इस घटना की सूचना तुरंत एसीपी अर्चना सिंह को दी और अपने सहयोगी एसआई इरशाद आलम, अख्तर अहमद, उमेश यादव और एक महिला सिपाही पूजा सिंह को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. कुछ समय में ही अर्चना सिंह, डीसीपी (ईस्ट) प्राची सिंह और एडिशनल डीसीपी कासिम आबिदी भी घटनास्थल पर आ गए.

जांचपड़ताल के दौरान पुलिस ने पाया कि हमलावर पुलिस जैसी वरदी पहन कर आए थे. वे हरे रंग की कैप लगाए हुए थे, जबकि चेहरे पर नकाब था.इन अधिकारियों को निरीक्षण में पता चला कि हमलावर घटना को अंजाम देने के बाद घर के अंदर लगे सीसीटीवी कैमरों की डिजिटल वीडियो रिकौर्डर (डीवीआर) को खोल कर ले गए थे.
सभी पुलिस अधिकारियों ने आपसी विचारविमर्श के बाद हत्याकांड संबंधी कुछ बिंदुओं पर गहन तहकीकात करने का निर्णय लिया. साथ ही यह अनुमान लगाया गया कि दिव्यांग ठेकेदार की हत्या निश्चित तौर पर आपसी दुश्मनी का नतीजा है.
घटना में पुलिस का शक वीरेंद्र की पहली पत्नी पर गया,

जो उस समय वहां नहीं थी. जबकि बंधक बनाए गए परिवार के सदस्यों में उन के 3 बच्चे और वीरेंद्र की दूसरी बीवी खुशबून तारा मौजूद थी. उस ने घटना के बारे में बताया कि दोपहर साढ़े 12 बजे के करीब की जब वह किचन में आई, तब किसी ने दरवाजा खटखटाया. उस वक्त घर के हाल में सोफे पर बैठे 3 में एक गार्ड ने पूछा, ‘‘कौन है?’’

‘‘पुलिस!’’ बाहर से आवाज आई, जो एक कमरे में बैठे वीरेंद्र ठाकुर ने भी सुनी. उन्होंने गार्ड से कहा, ‘‘देखो कोई पुलिस वाला है? पूछो, क्या बात है.’’‘‘जी, अभी देखता हूं.’’ कहता हुआ गार्ड दरवाजे तक जाने के लिए आगे बढ़ा और दरवाजे की कुंडी खोलने से पहले पूछा, ‘‘कहां की पुलिस हो?’’

‘‘लोकल, दरवाजा खोलो. वीरेंद्र ठाकुर से कुछ पूछताछ करनी है,’’ बाहर से
आवाज आई.गार्ड ने दरवाजा खोल दिया. दरवाजा खुलते ही हथियारों से लैस पुलिस की वरदी पहने 3 व्यक्ति घर में दनदनाते हुए घुस आए. वे चौड़ा मास्क लगाए और टोपी पहने हुए थे. चेहरा पहचानना मुश्किल था.

पुलिस वरदी में आए थे हत्यारे पुलिस वालों को आया देख खुशबून तारा तब तक किचन से बाहर बड़े हाल में आ गई थी, एक ने उन्हें दबोच कर मुंह दबा दिया. बाकी ने तुरंत असलहा निकाल कर गार्डों पर तान दिए. उन के मोबाइल छीन लिए और खुशबून तारा समेत सभी गार्डों को साथ लगे एक कमरे में बंद कर दिया.

वहां पहले से ही 2 बच्चे हर्ष व ऋषि पढ़ाई कर रहे थे. उस के बाद वे सीधे वीरेंद्र के कमरे में घुस गए. खुशबून तारा ने पुलिस को यह भी बताया कि उन के तीनों सुरक्षागार्ड भी वरदीधारी हमलावरों के सामने कुछ नहीं कर पाए.

वीरेंद्र की हत्या की खबर पा कर लल्लन ठाकुर भागेभागे घटनास्थल पर पहुंचे. इस से पहले खुशबून तारा की तहरीर पर थानाप्रभारी कैंट शिवचरन लाल यादव ने प्राथमिकी दर्ज कर ली. उस में वीरेंद्र की हत्या का आरोप उस की पहली पत्नी प्रियंका और उस के प्रेमी कमलेश उर्फ बिट्टू जायसवाल समेत बिहार के पूर्व सांसद मरहूम शहाबुद्दीन के शूटर फिरदौस पर लगाया. उन के खिलाफ भादंवि की धारा 342, 452, 302 के अंतर्गत 25 जून, 2022 को मुकदमा दर्ज किया गया.

गोलीकांड के बाद वीरेंद्र के घर में लगे 4 सीसीटीवी कैमरों की डीवीआर गायब होने के कारण हमलावरों के चेहरे की पहचान नहीं हो पाई. पुलिस को सिर्फ हमले से पहले वीरेंद्र के घर के बाहर गली में 12 बजे के करीब एक कार खड़ी दिखी. कार में सवार 4 लोग गली में जाते हुए दिखे, जो कुछ देर बाद वापस लौट आए थे. उस के कुछ समय बाद ही वारदात को अंजाम दिए जाने का अनुमान लगाया गया.

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