Hindi Family Story: सोने की बालियां

Hindi Family Story: ईमानदार संसारचंद मेहनत में यकीन रखने वाला नौजवान था. एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले संसारचंद की 3 बहनें और एक छोटा भाई था. 2 बहनों की शादी पहले ही हो चुकी थी. उन की शादी के बाद संसारचंद के पिता का देहांत हो गया. पिता की मौत के बाद उस ने भी अपने पुरखों का बढ़ईगीरी का काम संभाल लिया.

संसारचंद के हाथों में हुनर था और ईमानदारी के चलते काम की कोई कमी नहीं थी. कड़ी मेहनत से संसारचंद पूरे परिवार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाए हुए था. वह अपनी मां, छोटी बहन और छोटे भाई की रोटी, पढ़ाईलिखाई और भविष्य के लिए दिनरात मेहनत करता था.

अब संसारचंद की छोटी बहन कमला ब्याह लायक हो चुकी थी. अपने ब्याह के बारे में सोचे बिना संसारचंद ने मेहनत से जोड़े पैसों से कमला के ब्याह की तैयारी शुरू कर दी. रिश्ता अच्छा था, लेकिन एक अड़चन आ खड़ी हुई. वह थी सोने की बालियां.

गांव का रिवाज था कि लड़की को ब्याह के समय खाली कानों से विदा नहीं किया जाता था. यह केवल रिवाज ही नहीं था, बल्कि इज्जत की बात भी थी.

संसारचंद की इतनी औकात नहीं थी कि वह महंगी सोने की बालियां खरीद सके. पुराने कर्ज अभी चुकाए नहीं गए थे. यह बात संसारचंद की बड़ी बहन विमला को पता चली. विमला अपने पति के साथ पास के गांव में खुशहाल जिंदगी बिता रही थी.

भाई की परेशानी सोचसोच कर विमला बेचैन हो जाती. वह यह सोचती कि संसारचंद कमला के लिए बालियों का इंतजाम कैसे कर पाएगा? शादी के समय अपने मायके से मिली सोने की बालियां, जो वह पहने हुए थी, कमला को देने के बारे में सोचती, तो ससुराल वालों के सवालों से डर कर वह अपने विचार से पीछे हट जाती, लेकिन फिर उस ने फैसला कर ही लिया.

कमला की शादी का दिन निकट आ रहा था. एक दिन, पति के काम पर चले जाने के बाद, विमला घर में अकेली थी. उस ने अपनी अलमारी खोली और उस पोटली को निकाला, जिस में शादी के समय मायके से मिली हुई सोने की बालियां रखी थीं.

उन्हें बहन को देने के बारे में सोच कर विमला कुछ देर के लिए दुविधा में पड़ गई, लेकिन दूसरी ओर, बहन की खुशी और भाई की मजबूरी उस की सोच पर भारी पड़ गई.

अगले दिन विमला अपने मायके पहुंची. हाथ में बालियों की पोटली थी.

‘‘ले भैया, कमला की शादी के लिए बालियों की जरूरत थी. मेरे पास ये थीं. क्या अपनी कमला को खाली कानों से विदा करेंगे? मैं फिर कभी बनवा लूंगी,’’ कहते हुए विमला ने बालियां संसारचंद की हथेली पर रख दीं.

‘‘नहीं बहन, मैं ऐसा नहीं कर सकता. तुम्हारा भी अपना परिवार है. तुम्हारे पति और ससुराल वाले क्या कहेंगे?’’ संसारचंद बोला.

लेकिन विमला अड़ी रही. बारबार कहने पर संसारचंद ने नम आंखों से बालियों वाली पोटली को मजबूती से पकड़ लिया.

कमला की शादी अच्छे से हो गई, लेकिन संसारचंद को भीतर ही भीतर यह टीस बनी रही कि उस की बहन ने अपनी एक कीमती चीज, अपने घर से चोरी कर के छोटी बहन को दे दी.

संसारचंद ने अपनेआप से वादा किया कि वह यह कर्ज जरूर उतारेगा. उस ने जीतोड़ मेहनत जारी रखी और पैसे इकट्ठा करने लगा.

2 साल बीत गए. एक दिन संसारचंद शहर में सुनार की दुकान पर पहुंचा. उस ने एक सुंदर जोड़ी सोने की बालियां तैयार करवाईं.

बालियां ले कर संसारचंद सुबहसुबह अपनी बहन विमला के घर तब पहुंचा, जब उस का पति अशोक काम पर जा चुका था.

चायपानी के बाद संसारचंद ने एक छोटीसी डब्बी विमला के हाथों में रख दी. विमला ने डब्बी खोली तो अंदर नई, चमचमाती सोने की बालियां थीं.

‘‘यह क्या भैया?’’ विमला ने हैरानी से पूछा.

‘‘जो तू ने कभी बिना मांगें दी थीं, आज मैं वे तुझे लौटाने आया हूं. मन पर बड़ा बोझ था इस कर्ज का,’’ संसारचंद भावुक हो गया.

‘‘पर कमला मेरी भी तो छोटी बहन है,’’ विमला बोली.

‘‘लेकिन बहन, मुझे पता है कि तू ने वे बालियां अपनी ससुराल से चुरा कर दी थीं, जिस के बोझ से मेरा मन भारी था,’’ संसारचंद बोला.

‘‘सच कहूं तो वह बोझ मेरे मन पर भी बहुत था. मुझे खुद भी लगता था जैसे मैं ने चोरी की है. मुझ से रहा नहीं गया और मैं ने पहले ही दिन अपने पति को सब सच बता दिया था,’’ विमला बोलती जा रही थी, ‘‘उस भले इनसान ने कहा कि विमला, तू ने ठीक किया. उस ने तो यह भी कहा कि ऐसी चीजें तो मुश्किल वक्त में ही काम आती हैं.’’

संसारचंद सुनता रहा. उस की आंखें भर आईं. वह बोला, ‘‘अशोक के लौट आने तक मैं यहीं रुकूंगा. उस भले इनसान का शुक्रिया अदा करना तो बनता है.’’

चारों ओर रिश्तों की मिठास से महक उठी थीं हवाएं… Hindi Family Story

Hindi Family Story: बिछोह की सांझ

Hindi Family Story, लेखक – संजीव स्नेही

कालेज का गलियारा, वही कैंटीन के ठहाके और लाइब्रेरी की खामोशी. इन सब में एक कहानी पल रही थी, करण और प्रिया की. दोनों एकदूसरे में इस कदर खोए थे कि कालेज की पढ़ाई भी कभीकभी पीछे छूट जाती थी. उन की हंसी, उन की बहसें, उन का छोटीमोटी बातों पर रूठनामनाना, सब कैंपस की फिजा में घुलमिल गया था.

जब कभी प्रिया उदास होती, करण का एक जोक उस के चेहरे पर मुसकान ले आता और जब करण किसी बात से परेशान होता, तो प्रिया की समझदारी उसे राह दिखाती.

उन के दोस्त उन्हें ‘एकदूजे के लिए’ कहते थे, और सच भी यही था. वे कालेज के हर पल को साथ जीते थे. सुबह की पहली क्लास से ले कर शाम की आखिरी चाय तक, उन की दुनिया एकदूसरे के इर्दगिर्द घूमती थी. कैंपस की हर बैंच, हर पेड़ उन के प्यार का गवाह था.

करण एक शांत स्वभाव का लड़का था, जो अपनी दुनिया में खोया रहता था, लेकिन प्रिया ने उस दुनिया में रंग भर दिए थे. वह चंचल, जीवंत और हमेशा खुश रहने वाली लड़की थी.

करण की गंभीरता को प्रिया की चंचलता ने पूरा किया था और प्रिया की उड़ान को करण के ठहराव ने एक ठोस जमीन दी थी. दोनों का तालमेल ऐसा था, मानो 2 अलगअलग ध्रुव एकसाथ मिल कर एक पूर्ण इकाई बन गए हों.

उन के झगड़े भी प्यारे होते थे. कभी प्रिया करण के देर से आने पर रूठ जाती, तो कभी करण उस के फोन न उठाने पर नाराज हो जाता, लेकिन यह रूठनामनाना केवल कुछ पलों का होता था, जिस के बाद प्यार और भी गहरा हो जाता था. उन के दोस्त अकसर उन से जलते थे कि कैसे वे एकदूसरे को इतनी अच्छी तरह समझते हैं.

कालेज का फैस्टिवल हो या कोई असाइनमैंट, वे हमेशा एक टीम में होते थे. साथ में देर रात तक जाग कर पढ़ाई करना, सुबहसुबह कैंटीन में नाश्ता करना और ऐग्जाम के तनाव में भी एकदूसरे का सहारा बनना, यह सब उन की दिनचर्या का हिस्सा था.

वे भविष्य के सपने बुनते थे, एकसाथ घर बनाने के, एकसाथ नई दुनिया घूमने के और एकसाथ हर चुनौती का सामना करने के. उन के सपने हवा में नहीं, बल्कि एकदूसरे के विश्वास पर टिके थे. उन्हें लगता था कि उन का प्यार अमर है और कोई भी चीज उन्हें अलग नहीं कर सकती.

मगर कालेज के दिन ढलते ही, बिछोह का अंधेरा छाने लगा. ग्रेजुएशन पूरी होते ही, जिंदगी ने उन्हें अलगअलग शहरों में धकेल दिया.

करण लौट आया अपने पहाड़ से घिरे छोटे से शहर में, जहां उस की पुरानी यादें सांस लेती थीं. यह शहर शांत और कुदरत के करीब था, ठीक करण के स्वभाव जैसा. यहां उस का पुश्तैनी कारोबार था, जिसे संभालने की जिम्मेदारी उस के कंधों पर थी.

प्रिया अपने परिवार के साथ महानगर की तेज रफ्तार जिंदगी में लौट गई, जहां हर दिन एक नई चुनौती थी और एक नई दौड़. मुंबई की चकाचौंध उसे अपनी ओर खींच रही थी और वह उस में रमने के लिए तैयार थी.

शुरुआत में सब ठीक था. फोन की घंटियां दिन में जबतब बजती रहतीं. घंटों बातें होतीं, जिस में कालेज के किस्से, भविष्य के सपने और एकदूसरे के शहर की कहानियां शामिल होतीं.

करण प्रिया को अपने पहाड़ की ठंडक और शांत नजारों के बारे में बताता और प्रिया उसे मुंबई की जगमगाती रातों और लोकल ट्रेन की भीड़भाड़ के बारे में बताती.

उन की आवाज में वही पुराना प्यार और अपनापन था, वही जुनून और वही चाहत थी. वे एकदूसरे को हर छोटीबड़ी बात बताते, अपने दिन की हर घटना साझा करते.

प्रिया करण को बताती कि कैसे उस ने आज लोकल ट्रेन में एक अजीबोगरीब वाकिआ देखा, तो करण उसे अपने शहर के शांत तालाब के पास सूर्यास्त का नजारा बताता. वे एकदूसरे की जिंदगी का हिस्सा बने रहने की पूरी कोशिश कर रहे थे, चाहे कितनी भी दूरियां हों.

लेकिन धीरेधीरे दूरियों का एहसास चुभने लगा. फोन पर घंटों बात करना भी अब उस छुअन, उस निकटता की भरपाई नहीं कर पाता था जो पहले उन की जिंदगी का हिस्सा था. रातें करवटें बदलते बीततीं.

करण को प्रिया की हंसी नहीं सुनाई देती थी, न ही प्रिया को करण के कंधे पर सिर रख कर सोने की राहत मिलती थी. वे एकदूसरे को मिस करते थे, इस हद तक कि उन के दिल में एक अजीब सा खालीपन महसूस होता था.

वीडियो काल पर एकदूसरे को देख कर कुछ पल की खुशी मिलती, लेकिन वह कभी उस गरमाहट की जगह नहीं ले पाती थी, जो आमनेसामने मिलने में होती है.

वे स्क्रीन पर एकदूसरे को देखते, मुसकराते, कुछ पल के लिए भूल जाते कि उन के बीच हजारों किलोमीटर की दूरी है, लेकिन जैसे ही वीडियो काल खत्म होती, अकेलापन फिर से घेर लेता.

त्योहार आते, दोस्त मिलते, हर कोई अपनेअपने पार्टनर के साथ होता और करण व प्रिया को दूरियों का दर्द और ज्यादा महसूस होता.

दीवाली पर जब सब अपने परिवार के साथ होते, तो करण को प्रिया की कमी खलती थी, उस के साथ पटाके जलाने की याद आती थी. प्रिया को होली पर करण के साथ रंग खेलने की याद आती थी.

हर उत्सव उन्हें उस खालीपन का एहसास कराता जो उन की जिंदगी में आ गया था. वे एकदूसरे को तसवीरें भेजते, शुभकामनाएं देते, पर उन शुभकामनाओं में एक अनकहा दर्द छिपा होता था.

करण को याद आता वह दिन, जब प्रिया को बुखार हुआ था और वह पूरी रात उस के कमरे के बाहर बैठा रहा था, बस उस की खैरियत जानने के लिए. वह एक पल के लिए भी उस से दूर नहीं हुआ था.

प्रिया को याद आता वह वक्त, जब करण ने उस के जन्मदिन पर आधी रात को गिटार बजा कर गाना सुनाया था और उस की आंखों में चमक भर दी थी.

ये छोटीछोटी बातें, ये छोटेछोटे पल, जो अब सिर्फ यादों में थे, उन्हें और भी तड़पाते थे. फोन पर बात करते हुए भी कभीकभी चुप्पी छा जाती. कहने को बहुतकुछ होता, दिल में हजार बातें उमड़तीं, लेकिन दूरियों का बोझ इतना भारी था कि शब्द गले में अटक जाते.

संवाद की कमी नहीं थी, बल्कि भावनाओं को जाहिर करने की ताकत कमजोर होती जा रही थी. वे जानते थे कि कुछ बदल रहा है, लेकिन उसे रोकने में नाकाम थे.

एक शाम, करण छत पर अकेला बैठा था. चांदनी रात थी और तारे टिमटिमा रहे थे, मानो उस की उदासी को और बढ़ा रहे हों. उस ने प्रिया को फोन किया. प्रिया भी अपने बालकनी में बैठी थी, जहां से शहर की रोशनी दिख रही थी.

‘‘प्रिया…,’’ करण ने धीमी आवाज में कहा, ‘‘कब मिलेंगे हम?’’ उस की आवाज में एक अनकहा दर्द था, एक गहरी चाहत थी.

प्रिया की आंखें भर आईं, ‘मुझे नहीं पता करण,’ उस ने हिचकिचाते हुए, आंसुओं को रोकते हुए कहा, ‘बस, इतना जानती हूं कि मुझे तुम्हारा इंतजार रहेगा.’

प्रिया के शब्दों में एक उम्मीद की किरण छिपी थी, एक भरोसा था कि भले ही राहें अनिश्चित हों, पर दिल में इंतजार कायम है.

उन की प्रेमकहानी अब केवल आवाजों और मीठे शब्दों पर टिकी थी. बिछोह का यह लंबा दौर उन्हें मजबूत बना रहा था या कमजोर, यह उन्हें पता नहीं था. वे एक अनजाने रास्ते पर चल रहे थे, जहां हर कदम के साथ चुनौतियां बढ़ रही थीं. लेकिन एक बात तय थी, उन के दिलों में एकदूसरे के लिए जो गहरा प्यार था, वह इन दूरियों से भी कहीं ज्यादा ताकतवर था.

हर फोन काल, हर मैसेज, हर वीडियो काल इस बात का सुबूत था कि उन का प्यार अभी भी जिंदा है, धड़क रहा है, बस इंतजार था उस दिन का, जब ये दूरियां मिटेंगी और बिछोह की यह दर्दनाक सांझ, मिलन के सुनहरे सूरज में बदल जाएगी.

वे जानते थे कि उन की कहानी अभी अधूरी है और मिलन ही उस का सुखद अंत होगा. वे इस अग्निपरीक्षा से गुजर रहे थे, यह जानते हुए कि उन का प्यार इस दूरी से और भी अटूट हो कर उभरेगा.

समय किसी के लिए नहीं रुकता और करण और प्रिया के लिए भी नहीं रुका. बिछोह की सांझ धीरेधीरे एक लंबी रात में बदल रही थी, एक ऐसी रात जिस की सुबह अनिश्चित थी.

शुरुआती महीनों का वह जोश, वह घंटों की बातचीत, अब यादों का हिस्सा बनने लगी थी. जिंदगी की आपाधापी में दोनों अपनेअपने शहर में अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाने लगे.

जिम्मेदारियां बढ़ीं, कैरियर की दौड़ तेज हुई और इसी के साथ उन के बीच की बातचीत भी कम होती गई. जो फोन की घंटियां दिन में कभी भी बज उठती थीं, वे अब हर 2-3 दिन में एक बार बजने लगीं.

फिर हफ्ते में एक बार और देखते ही देखते यह सिलसिला महीने 2 महीने और यहां तक कि 4 महीने में भी कभीकभार ही बात होने तक सीमित हो गया. और वह भी बस ‘हायहैलो’ या किसी औपचारिक शुभकामना तक.

दिल की बात कहना तो दूर, हालचाल पूछने का भी समय मानो सिमट गया था. उन के बीच की दूरियां केवल भौगोलिक नहीं रह गई थीं, बल्कि भावनात्मक और मानसिक दूरियां भी बढ़ती जा रही थीं.

इस तरह 2 साल बीत गए. ये 2 साल उन की जिंदगी में बहुत बड़े बदलाव ले कर आए थे.

करण ने अपने पिता के साथ मिल कर कारोबार में पूरी तरह से खुद को झोंक दिया था. पहाड़ों की ठंडी हवाओं में उस का कारोबार फलताफूलता रहा और वह व्यापारिक दांवपेंच सीखने में बिजी हो गया था.

उस ने अपनी कंपनी को नए मुकाम पर पहुंचाने के लिए दिनरात एक कर दिया था. उस की जिंदगी में अब केवल व्यापारिक सौदे, बैलेंस शीट और भविष्य की योजनाएं ही रह गई थीं.

वह सुबह जल्दी उठता, देर रात तक काम करता और हर नया प्रोजैक्ट उस के लिए एक चुनौती और एक जुनून बन गया था. उस ने खुद को इतना ज्यादा बिजी कर लिया था कि पुरानी यादों को सोचने का भी उसे समय नहीं मिलता था या शायद वह जानबूझ कर उन्हें दबाना चाहता था.

उस के दोस्तों ने भी देखा कि करण अब पहले जैसा नहीं रहा था. वह थोड़ा शांत और ज्यादा करोबारी हो गया था, लेकिन वे सम?ाते थे कि यह उस के कैरियर की जरूरत है.

वहीं, प्रिया ने फैशन के क्षेत्र में अपना कैरियर बनाना शुरू किया था. मुंबई की चमकदमक से भरी दुनिया उसे अपनी ओर खींच रही थी.

वह फैशन डिजाइनिंग के बारीक पहलुओं को सीखने में मगन हो गई थी. नएनए डिजाइन बनाना, फैशन शो में हिस्सा लेना और बड़ेबड़े ब्रांड्स के साथ काम करना, यह सब उस की जिंदगी का हिस्सा बन गया था.

उस के आसपास हमेशा एक ग्लैमरस माहौल रहता था, जहां नए चेहरे, नई कहानियां और नई इच्छाएं थीं.

फैशन की दुनिया की चकाचौंध में वह इस कदर खो गई कि उसे करण की याद ही नहीं रही. उस के नए दोस्त थे, नई पार्टियां थीं और एक नई तेजतर्रार जिंदगी थी, जिस में पुरानी यादों के लिए शायद ही कोई जगह बची थी.

करण की शांत, पहाड़ी जिंदगी उस के लिए एक दूर की याद बन गया था, जिसे उस ने अपनी नई, ग्लैमरस दुनिया के पीछे कहीं छोड़ दिया था. उसे लगता था कि उस ने एक नई पहचान बना ली है और उसे पीछे मुड़ कर देखने की जरूरत नहीं है.

2 साल बाद, जिंदगी ने एक बार फिर अपना खेल खेला. दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल में एक भव्य समारोह का आयोजन हुआ.

यह एक बड़ा औद्योगिक और व्यावसायिक कार्यक्रम था, जहां देशभर के विभिन्न क्षेत्रों के जानेमाने लोग जमा हुए थे. करण अपनी कंपनी का प्रतिनिधित्व करने आया था और प्रिया अपने फैशन ब्रांड की प्रमोशन के लिए.

होटल का बैंक्वैट हाल रोशनी से जगमगा रहा था. हलकी धीमी संगीत की धुन और लोगों की फुसफुसाहट से हाल में एक जीवंत माहौल था.

करण एक कोने में खड़ा अपने बिजनैस सहयोगियों से बात कर रहा था, जब उस की नजर भीड़ में एक जानीपहचानी आकृति पर पड़ी. एक पल के लिए उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ.

वह प्रिया थी. पहले से भी ज्यादा खूबसूरत, आत्मविश्वासी और चमकदार. उस ने एक शानदार, डिजाइनर ड्रैस पहन रखी थी और उस के आसपास लोगों का एक छोटा समूह था, जो उस की बातों पर हंस रहा था और उस की तरफ आकर्षित दिख रहा था. उस के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी, जो उस की कामयाबी और आत्मविश्वास को दिखा रही थी.

करण के दिल की धड़कनें अचानक तेज हो गईं. पिछले 2 सालों में उस की जिंदगी में बहुतकुछ बदल गया था, लेकिन प्रिया के लिए उस के मन में जो भावनाएं थीं, वे कहीं गहरे दबी हुई थीं, एक अनदेखी नदी की तरह जो अब अचानक सतह पर आ गई थीं.

उस ने महसूस किया कि उस की यादें, जो समय की धूल से ढकी थीं, एक ?ाटके में ताजा हो गई हैं. कालेज के दिन, प्रिया की हंसी, उन दोनों के साथ बिताए हर पल की तसवीर उस की आंखों के सामने कौंध गई.

उसे लगा जैसे उस ने इतने समय से कुछ खोया हुआ था और आज वह उस के सामने है. वह तुरंत प्रिया से बात करना चाहता था, उसे गले लगाना चाहता था, उस से पूछना चाहता था कि इतने समय से वह कहां थी, कैसी थी और क्या वह उसे भूली तो नहीं थी.

करण धीरेधीरे भीड़ को चीरता हुआ प्रिया की तरफ बढ़ा. उस के कदम भारी थे और उस का दिल एक अजीब से डर से कांप रहा था.

जैसे ही वह उस के करीब पहुंचा, उस ने देखा कि प्रिया लोगों से घिरी हुई थी. हर कोई उस से बात करना चाहता था, उस की तारीफ कर रहा था और उस के साथ तसवीरें खिंचवा रहा था.

प्रिया भी मुसकराते हुए उन से बातचीत कर रही थी, पूरी तरह अपनी नई दुनिया में लीन, अपनी कामयाबी की चमक में डूबी हुई. उस के चेहरे पर एक अलग ही आत्मविश्वास था, जो करण ने पहले कभी नहीं देखा था.

करण ने कई बार कोशिश की कि प्रिया की नजर उस पर पड़े, लेकिन प्रिया की आंखें उसे अनदेखा करती रहीं. वह इतनी बिजी थी कि शायद उसे अपने आसपास किसी और की परवाह ही नहीं थी या शायद वह उसे पहचान ही नहीं पाई.

करण वहीं खड़ा रहा, उम्मीद करता रहा कि प्रिया उसे पहचान लेगी और उस से बात करने आएगी. उस ने इंतजार किया, हर पल को एक सदी की तरह महसूस करते हुए.

5 मिनट, 10 मिनट, फिर 15 मिनट. लेकिन प्रिया अपनी धुन में मगन रही. वह लगातार लोगों से घिरी हुई थी और कभी भी उसकी तरफ मुड़ी ही नहीं, न ही उस की ओर एक नजर डाली.

करण का दिल भारी होता जा रहा था. उसे लग रहा था जैसे प्रिया उसे जानबूझ कर अनदेखा कर रही हो या शायद वह सच में उसे भूल चुकी हो या फिर शायद उस ने उसे पहचाना ही नहीं. उस के मन में एक अजीब सी टीस उठी, एक दर्द जो उसने सोचा था कि अब शांत हो चुका है, वह फिर से जाग गया था.

करण को कालेज के दिन याद आए, जब प्रिया उस से मिलने के लिए किसी भी भीड़ से निकल आती थी, चाहे कितनी भी रुकावटें क्यों न हों. उसे याद आया कि कैसे प्रिया उस की एक आवाज पर दौड़ी चली आती थी, कैसे उस की हर खुशी और हर दर्द में वह उस के साथ खड़ी होती थी.

और अब, वह उस के सामने खड़ा था, बस कुछ ही कदमों की दूरी पर और प्रिया उसे पहचान भी नहीं पा रही थी या शायद पहचानना नहीं चाहती थी. यह एहसास उसे अंदर से तोड़ रहा था.

उसे लगा जैसे वह इस चमकदमक भरी दुनिया में एक अजनबी है, जिसे प्रिया अब नहीं पहचानती, एक भूला हुआ अध्याय.

काफी देर तक इंतजार करने के बाद, जब करण को यह साफ हो गया कि प्रिया उस से बात करने नहीं आएगी, तो उस का दिल पूरी तरह से टूट गया. एक गहरी निराशा ने उसे घेर लिया. उस के चेहरे पर छाई मुसकान फीकी पड़ गई.

उस के मन में एक भयानक खालीपन छा गया. उसे लगा कि उस ने जिसे इतना प्यार किया था, वह अब उस के लिए बस एक याद बन चुकी है और शायद प्रिया के लिए वह अब कुछ भी नहीं रहा. वह बेमन से, भारी कदमों से समारोह से बाहर निकल गया.

दिल्ली की ठंडी हवा करण के गरम आंसुओं को पोंछने की कोशिश कर रही थी, लेकिन दिल में उठे तूफान को शांत करना आसान नहीं था. उस की उम्मीदें बिखर चुकी थीं और उसे लगा कि शायद उनका रिश्ता सचमुच खत्म हो चुका है या फिर कभी था ही नहीं, बस एक भरम था.

वह अपनी कार में बैठा और चुपचाप होटल से दूर चला गया, अपने टूटे हुए दिल और बिखरी हुई यादों के साथ.

करण को एहसास हुआ कि जिंदगी बदल गई है. लोग बदल गए हैं. और शायद सब से बड़ा बदलाव वह था, जो उन के रिश्ते में आया था.

वह जानता था कि इस घटना के बाद, अब उसे प्रिया के लिए अपनी भावनाओं को हमेशा के लिए दफन करना होगा.

यह बिछोह की सांझ अब एक स्थायी रात में बदल चुकी थी, जिस की कोई सुबह नहीं थी. Hindi Family Story

Story In Hindi: हम तो जिनावर हैं

Story In Hindi: फैक्टरी में दूसरी पाली रात को 1 बजे खत्म होती थी. अजय अपनी कार से कंपनी के मकान में जा रहा था. तरक्की होने के बाद उसे पाली पूरी के बाद भी देर तक रुकना पड़ता था, इसलिए कंपनी की टाउनशिप में जाने के समय रात को ज्यादा भीड़ नहीं मिलती थी.

घर से पहले एक बाजार था, जो बंद हो गया था. उमस भरी गरमी का मौसम था, पर कार की खिड़की में से आते ठंडी हवा के ?ांके अजय को अच्छे लग रहे थे.

तभी बाजार से आगे सुनसान जगह पर किसी शख्स को औंधा पड़े हुए देख कर एक बार तो अजय ने सोचा कि पड़ा रहने दो, मुझे क्या करना है. पर तब तक कार उस के नजदीक पहुंच गई.

कार की हैडलाइट की रोशनी में उस ने देखा, तो वह शख्स कंपनी की यूनिफौर्म पहने हुए था.

अजय कार रोक कर उस शख्स के पास गया, जो नशे में इतना बेहोश था कि उसे कोई भी रात के समय अपनी गाड़ी से कुचल कर जा सकता था.

अजय को वह आदमी कुछ जानापहचाना सा लग रहा था. जा कर उसे सीधा किया तो वह उस का पुराना पड़ोसी बलभद्र सिंह था, जिसे सभी बल्लू सिंह के नाम से बुलाते थे.

अजय ने जैसेतैसे बल्लू सिंह को उठा कर कार में लादा और उस के घर छोड़ने के लिए कार आगे बढ़ाई.

बल्लू सिंह अच्छे घर का था. अजय से उम्र में बड़ा होने के बावजूद वह और उस का परिवार, जिस में उस की पत्नी और 2 बच्चे शामिल थे, उसे बहुत इज्जत देते थे.

अजय ने देखा कि बल्लू सिंह की पत्नी कार की आवाज सुन कर डरते हुए घर का दरवाजा खोल रही थी. उसे लग रहा था कि कोई कर्ज मांगने वाला तो नहीं आ गया है.

अजय को देख कर बल्लू सिंह की पत्नी को राहत महसूस हुई और अजय के साथ बल्लू सिंह को कार से उतार कर घर के अंदर ले जाने में मदद करने लगी.

बल्लू सिंह को अजय बिस्तर पर लिटाने लगा, तब उस की पत्नी ने आंसू बहाते हुए बिना कुछ कहे उस की तरफ हाथ जोड़ कर मूक नजरों से उस का धन्यवाद किया. अजय बिना कुछ कहे चुपचाप चला आया.

बल्लू सिंह ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था, लेकिन बहुत ही अनुभवी और कुशल क्रेन आपरेटर था. इसी वजह से बड़े अफसर कोई भी बहुत जरूरी और रिस्की काम होने पर उसे ही याद करते थे खासकर प्रोडक्शन ईयर पूरा होने की आखिरी तिमाही में जनवरी से मार्च के समय जब रातभर काम चलता था.

रात की पाली के मुलाजिमों को ओवरटाइम करना पड़ता था, जिस की भुगतान की रकम कई बार तनख्वाह से ज्यादा हो जाती थी.

जैसा कि मेहनतकश तबका होता है, बल्लू सिंह को शराब पीने का शौक लग गया था, जो पहले तो कभीकभार पीने तक था, लेकिन ज्यादा पैसे हाथ में आने पर शराब की मात्रा और पीने का दौर बढ़ने लगा था. साथ में 2-4 यार भी मिल जाते थे, क्योंकि पीने का मजा तो यारों के साथ ही आता है.

कभीकभार पीने वाले बल्लू सिंह को अब रोज पीने की आदत हो गई थी. पहले शाम को ही पीता था, पर अब दिन में भी पीने लग गया था. लेकिन उस की क्रेन चलाने की कुशलता में कमी नहीं आई थी, बल्कि कई बार तो काम पूरा होने पर अफसर खुश हो कर अपनी जेब से रुपए दे कर कहते थे, ‘बल्लू सिंह, जाओ ऐश करो.’

ऐसे मौके रात को टैस्टिंग जैसे काम होने पर अकसर आते थे, क्योंकि टैस्टिंग कब होगी इस का निश्चित समय नहीं रहता था, इसलिए बल्लू सिंह को पहले ही रात को रुकने के लिए बोल देते थे कि यह काम तो बल्लू सिंह ही करेगा, साथ ही उसे ताकीद भी करते थे कि काम पूरा होने के बाद ही पीना.

हर समय हंसीमजाक करने वाला बल्लू सिंह धीरेधीरे शराब का आदी होने लगा. अब वह शराब की दुकान खुलते ही वहां पहुंचने लगा. जो दोस्त रात की पाली वाले होते थे, उन के साथ दिन में और दिन की पाली वालों के साथ रात में महफिल जमने लगी.

कहते हैं कि जब बुराई आती है तब अकेली नहीं आती है. वह दूसरे बुराइयों को साथ ले कर आती है.

शराब के साथ जर्दे वाला पान, गुटखा, सिगरेट और कभीकभी शराब पीने के लिए फैक्टरी से बाहर न जाने के चलते फैक्टरी के अंदर ही गांजे की चिलम का सुट्टा मारने वालों की संगति करने लगा. इन सब वजहों से नौकरी से छुट्टी ज्यादा होने लगी. जब छुट्टी नहीं रही, तो विदाउट पे करने लगा.

बल्लू सिंह को तकरीबन सालभर ओवरटाइम करना पड़ता था. इस वजह से तनख्वाह में कमी की भरपाई हो जाती थी, लेकिन कब तक. उसे अपने साथियों से तनख्वाह ज्यादा मिलती थी, पर अब उस के जुआ खेलने वाले नए साथियों का साथ भी मिलने लगा, जो तनख्वाह ज्यादा मिलने के चलते उसे जुआ खेलने के लिए उकसाने लगे.

शराब का नशा जुए की जीतहार के रोमांच से और बढ़ जाता था, जिस में बल्लू सिंह को बहुत मजा आने लगा. इन सब बुराइयों के एकसाथ आने से वह पत्नी के हाथ में जो तनख्वाह रखता था, उस में कमी आने लगी.

पत्नी समझदार, पढ़ीलिखी, अच्छे संस्कार की थी. उस ने घर और बच्चों को कम पैसों में संभाला, लेकिन समुद्र के पानी को बारबार उलीचने लगो तो समुद्र भी खाली होने लगेगा.

एक समय ऐसा आया कि बल्लू सिंह की तनख्वाह उस के शौक और नशे के आगे कम पड़ने लगी. इस वजह से रात को जब वह पी कर आता, तो घर में कलह होने लगती. अपने गुस्से और बेबसी को वह पत्नी की पिटाई कर के उतारता और फिर शराब की दुकान पर चला जाता.

कम तनख्वाह और बड़ते शौक के तनाव के चलते काम से कई दिनों तक गैरहाजिर रहने से बल्लू सिंह सूदखोरों, लोकल दादाओं के चंगुल में फंस गया, जो महीने की पहली तारीख को उस की तनख्वाह छुड़ा लेते थे और फिर उसे ही ब्याज पर रुपए इसी शर्त पर देते थे कि उसे शराब भी पिलानी पड़ेगी.

बल्लू सिंह को फैक्टरी जा कर काम करने में भी डर लगने लगा कि जो पैसा वह कमाएगा वह सूदखोर दादा ले जाएंगे. इसी डर के चलते वह फैक्टरी कभी जाता, तो कभी नहीं जाता. जो तनख्वाह मिलती, उस से अपने पीने का शौक पूरा करता और घर में फाकाकशी की नौबत आने लगी.

बच्चों की पढ़ाई की फीस जमा नहीं होने के चलते स्कूल वालों ने बच्चों का नाम काट दिया. तब बच्चों को उस ने सरकारी स्कूल में डाल दिया, जहां फीस कम लगती थी.

अब समस्या पीने की थी, जिसे उस ने शराब की दुकान पर सफाई कर के हल कर लिया था. दुकान वाला उसे सफाई करने के बदले शराब पिला देता था.

ब्याज वाले घर पर आ कर तगादा करते और बल्लू सिंह की पत्नी को धमकियां देने लगे, क्योंकि वह घर पर मिलता ही नहीं था. हमेशा हंसीमजाक करने वाले बल्लू सिंह का यह हाल हो जाएगा, किसी ने नहीं सोचा था.

एक रात की बात है. बल्लू सिंह की औरत ने अपने बच्चों को अजय के घर भेजा. एक बच्चे ने रोते हुए बताया, ‘‘अंकल, हमारे पापा मम्मी को मार रहे हैं. आप आ कर उन्हें बचा लो.’’

अजय तुरंत बच्चों के साथ गया और बल्लू सिंह पर चिल्लाया, ‘‘यह तुम क्या कर रहे हो बल्लू सिंह… क्या अपनी बीवी को इस तरह मारते हैं… शराब ने तुम्हें बिलकुल जानवर बना दिया है.’’

बल्लू सिंह ने अजय की आवाज सुन कर पानी बीवी को मारना बंद किया और कहने लगा, ‘‘भाई साहब, आप जानते नहीं कि यह औरत मेरी इज्जत खराब कर रही है. पड़ोस से पैसे उधार ले कर आई है. मैं क्या मर गया हूं, कमाता नहीं हूं…’’

बल्लू सिंह की औरत कहने लगी, ‘‘भाई साहब, कल से बच्चे भूखे हैं. घर में कुछ नहीं है. पिछले एक महीने से बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं.’’

यह सुन कर अजय गुस्से से कहने लगा, ‘‘बल्लू सिंह, तुम्हें अपने बीवी और बच्चों का जरा सा भी ध्यान नहीं है.’’

बल्लू सिंह उस के आगे हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘साहब, हम तो जिनावर हैं. हम पढ़ेलिखे नहीं हैं. फिर भी इस औरत को इतना तो सोचना चाहिए कि अपने आदमी की इज्जत को बना कर रखे.’’

बल्लू सिंह अपनी बेबसी को, अपनी कमी को, पति की इज्जत को ढकने के नाम पर पत्नी को मार कर दूर करने की कोशिश कर रहा था.

अजय ने कहा, ‘‘वह इज्जत कैसे बनाएगी, इज्जत तो तुम गिरा रहे हो. अपने बीवीबच्चों को भूखा रख रहे हो, उन्हें स्कूल नहीं भेज पा रहे हो. तुम्हारी पत्नी कब तक सब्र करेगी…’’

बल्लू सिंह बस नशे में एक ही बात कहता रहा, ‘‘साहब, हम तो जिनावर हैं. ये बड़ीबड़ी बातें हमें नहीं आती हैं.’’

अजय ने बल्लू सिंह की औरत को अपनी जेब से रुपए निकाल कर दिए और कहा, ‘‘सब से पहले खाने का कुछ सामान ले कर आओ. बच्चों और बल्लू सिंह को भी खिलाओ. और तुम भी भूखी मत रहना, खाना जरूर खाना.’’

बल्लू सिंह चाहे कितना भी खराब था, लेकिन अजय की बहुत इज्जत करता था. दूसरे दिन अजय सुबह की पाली होने के चलते फैक्टरी आ गया था. लंच में घर जाने पर उस की पत्नी ने बताया, ‘‘बल्लू भाई साहब आ कर माफी मांग रहे थे. मैं ने उन से कहा कि जब अजय आएंगे तब जो कहना उन से कहना.’’

दिनोंदिन बल्लू सिंह के घर की हालत खराब होती जा रही थी. वह घर की जिम्मेदारियों से बेपरवाह हो गया था. उसे सिर्फ एक ही चीज चाहिए थी, वह थी शराब, जिस के लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहता था.

किसी भी तरह से वह अपने लिए शराब का बंदोबस्त कर लेता था, लेकिन उस के बीवीबच्चों का क्या होगा, नशे के आगे वह कुछ सोचना भी नहीं चाहता था.

बल्लू सिंह, जो कभीकभार फैक्टरी चला जाता था, वह भी उस ने बंद कर दिया था, क्योंकि उसके साथी क्रेन आपरेटर और स्लिंग लगाने वाले सिलिंगर उस को ताना मारने लगते थे कि बल्लू सिंह के बीवीबच्चे भूखे मर रहे हैं, उस के बच्चों का नाम स्कूल वालों ने काट दिया है, पर उसे तो सिर्फ शराब से मतलब है, उसे अपने परिवार की कोई चिंता नहीं है.

यह सब सुन कर बल्लू सिंह को सब के सामने शर्म आने लगती. वह किसी से भी ब्याज पर उधार ले कर तुरंत आउट पास ले कर शराब पीने के लिए फैक्टरी से बाहर चला जाता, जैसे शराब पीना उन के तानों का जवाब हो.

एक दिन की बात है. बल्लू सिंह की दूसरी पाली थी. वह भी आज काम पर आ गया था, लेकिन उस का कोई भरोसा नहीं था कि वह कब शराब पीने के लिए फैक्टरी से बाहर चला जाएगा.

बल्लू सिंह फैक्टरी में टैस्टिंग वाले पार्ट्स को टैस्टिंग एरिया में ले जाने के लिए क्रेन से उठाते हुए देख रहा था कि तभी उसे लगा कि पार्ट्स को उठाने के लिए स्लिंगर ने एक स्लिंग (वायर रोप) ठीक से नहीं लगाई है, क्योंकि वह एक कुशल क्रेन आपरेटर था, जिसे ऊपर क्रेन के केबिन में बैठ कर जल्दी पता चल जाता था कि स्लिंग ठीक से लगी है या नहीं.

बल्लू सिंह ने अपने साथी स्लिंगर को आवाज दे कर चेतावनी दी कि स्लिंग सही नहीं लगी है, पर तब तक पार्ट ऊपर उठ चुका था. कुछ काम की जल्दबाजी, कुछ स्लिंगर का ध्यान न देना, एक पार्ट स्लिंग से तेजी से लहराते हुए नीचे गिरने लगा.

यह सब बल्लू सिंह देख रहा था. उस ने अजय को दौड़ कर धक्का दिया. अजय दूर जा कर गिरा और वह भारी हिस्सा बल्लू सिंह पर गिर गया.

पूरी वर्कशौप में पहले तो सन्नाटा छा गया कि आज तो बल्लू सिंह गया. तब तक अजय खड़ा हो कर बल्लू सिंह के पास पहुंचा. वैसे भी वह शिफ्ट इंचार्ज था. उस ने तुरंत पास खड़े एक मुलाजिम को एंबुलैंस के लिए फोन करने को कहा.

इस बीच बाकी मुलाजिमों ने देखा कि बल्लू सिंह के पैर से खून का फव्वारा निकल रहा था. तभी उस के कराहने की आवाज आई.

अजय भी बल्लू सिंह की हालत देख कर डर गया था और सोच रहा था कि आज बल्लू सिंह नहीं होता, उस का बचना मुश्किल था.

तब तक एंबुलैंस के सायरन की आवाज आने लगी. बल्लू सिंह दर्द और खून बहने के चलते बेहोश हो गया था. मुलाजिमों और अजय ने मिल कर उसे एंबुलैंस तक उठा कर अंदर लिटा दिया.

एंबुलैंस के साथ आए मैडिकल स्टाफ ने प्राथमिक उपचार करना शुरू कर दिया. कंपनी के हौस्पिटल में जाते ही बल्लू सिंह को तुरंत आपरेशन थिएटर में ले जाया गया और उस के आपरेशन की तैयारी शुरू होने लगी.

अजय ने एक मुलाजिम को बल्लू सिंह के घर उस की पत्नी के साथ साथ अपनी पत्नी को भी खबर करने के लिए भेज दिया था. उस समय मोबाइल फोन की सुविधा नहीं थी.

थोड़ी देर बाद अजय की पत्नी बल्लू सिंह की पत्नी और उस के दोनों बच्चों को साथ ले कर आपरेशन थिएटर के बाहर आ गई.

अजय ने अपनी पत्नी को सारी बात बताई और कहा कि बल्लू सिंह ने उस की जान बचाने के लिए अपनी जान को दांव पर लगा दिया. आज बल्लू सिंह को कुछ हो जाता तो अजय अपनेआप को जिंदगीभर माफ नहीं करता.

बल्लू सिंह की पत्नी अपने बच्चों को अपनी छाती से चिपका कर अजय की बात सुनते हुए बस रो रही थी. उस के मुंह से एक शब्द नहीं निकला.

आपरेशन पूरा होने में तकरीबन 2 घंटे से ज्यादा लग गए. डाक्टर ने बाहर आ कर कहा कि आपरेशन ठीक से हो गया है. बल्लू सिंह के पैर में रौड लगा दी है, पर खून ज्यादा बहने के चलते उसे तुरंत खून चढ़ाना होगा.

अजय ने अपना खून के लिए कहा, पर उस का ब्लड ग्रुप मैच नहीं हुआ. तब अजय की पत्नी ने कहा, ‘‘आप मेरा ब्लड टैस्ट करें.’’

अजय की पत्नी का ब्लड ग्रुप मैच हो गया और उस ने अपना खून दे दिया. डाक्टर ने कहा कि और खून की जरूरत पड़ेगी, पर वह कल सुबह तक भी मिल जाएगा, तो कोई चिंता की बात नहीं है.

अजय ने अपने अफसरों को पूरे हालात के बारे में बता दिया था. अफसरों ने तुरंत रात की पाली के कुछ मुलाजिमों को, जिन का ब्लड ग्रुप बल्लू सिंह के ब्लड ग्रुप से मैच हो सकता था, हौस्पिटल भेज दिया.

इस तरह की सामाजिक जिम्मेदारी निभाने में मजदूर तबका हमेशा आगे रहता है. उन मुलाजिमों का ब्लड टैस्ट कर के उन के खून को हौस्पिटल के ब्लड बैंक में रखवा दिया था, जो सुबह काम आता.

उन मुलाजिमों को अजय ने अपने घर जा कर आराम करने के लिए कहा, तो उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि बल्लू सिंह के होश में आने के बाद ही वे घर जाएंगे.

रातभर अजय, उस की पत्नी, बल्लू सिंह का परिवार और साथी मुलाजिम आईसीयू के बाहर बैठे उस के होश में आने का इंतजार करने लगे.

सुबह जब बल्लू सिंह को होश आया, तभी डाक्टर का राउंड शुरू होने लगा. अजय ने डाक्टर से बल्लू सिंह के बारे में जानकारी ली.

डाक्टर ने कहा कि आपरेशन तो हो गया है, लिहाजा चिंता की कोई बात नहीं है, लेकिन इसे अपने पैरों पर खड़े होने में 3 महीने लग जाएंगे. तब भी यह पूरी तरह काम करेगा, ऐसा जरूरी नहीं है, क्योंकि पैर में अब रौड लग गई है, तो वह ओरिजनल जैसा काम नहीं करेगा.

3 दिन बाद बल्लू सिंह बात करने की हालत में आया, क्योंकि उसे दर्द और नींद के इंजैक्शन दिए जा रहे थे.

अजय की पत्नी ने अजय के कहने पर बल्लू सिंह की पत्नी को घरखर्च के लिए पैसे दे दिए थे. वह मना कर रही थी, लेकिन उस ने कहा कि ले लो अभी बहुत जरूरत पड़ेगी.

शाम को अजय अपनी पत्नी को साथ ले कर बल्लू सिंह को देखने हौस्पिटल पहुंचा. वहां बल्लू सिंह की पत्नी उस के पास बैठ कर फल खिला रही थी. अजय को देख कर वह खड़ी हो कर नमस्ते करने लगी. बल्लू सिंह ने भी उसे नमस्ते किया.

अजय ने पूछा, ‘‘अब कैसे हो तुम बल्लू सिंह?’’

‘‘सब आप की मेहरबानी है साहब.’’

अजय ने कहा, ‘‘बल्लू सिंह, तुम ने ठीक नहीं किया. मेरी जान बचाने के लिए अपनी जान की परवाह भी नहीं की. अगर तुम्हें कुछ हो जाता, तो इन बच्चों का क्या होता…’’

बल्लू सिंह कहने लगा, ‘‘साहब, हम मर जाते तो अच्छा होता. अपने बीवीबच्चों की जिनगी हमारे चलते खराब हो रही थी. हमारे मरने पर इन को कंपनी से बहुत रुपया मिल जाता और पैंशन भी मिल जाती, जिस से यह अपना और बच्चों का पेट पाल लेती.

‘‘हमारी जिनगी की कोई कीमत नहीं है. हमारे में और जिनावर में क्या फर्क है साहब, आखिर हम जिनावर…’’

बल्लू सिंह के बात पूरी करने से पहले ही अजय ने उस के मुंह पर हाथ रख दिया और कहने लगा, ‘‘तुम जिनावर नहीं हो बल्लू सिंह. जो किसी की जान बचाने के लिए अपनी जान की परवाह नहीं करता है, वह कभी जिनावर नहीं हो सकता है, वह अच्छा इनसान होता है.’’

अजय ने बल्लू सिंह की भाषा में जानवर को जिनावर कहने लगा. यह सुन कर बल्लू सिंह के चेहरे पर वही पुराने वाले बल्लू सिंह की मासूम मुसकराहट उभरने लगी.

अजय ने कहा, ‘‘बल्लू सिंह, मेरी जान तुम ने बचाई है, इसलिए मेरी कसम खा कर कहो कि आज से शराब, जुआ सब बंद कर दोगे और पुराने वाला माहिर क्रेन औपरेटर बन कर दिखाओगे.’’

बल्लू सिंह ने हाथ जोड़ कर वादा किया. यह सुन कर अजय की पत्नी की आंखों में आंसू आ गए.

उधर, खुशी के मारे बल्लू सिंह की पत्नी के आंसू रुक नहीं रहे थे. अजय की पत्नी उस के आंसू पोंछ कर उसे चुप कराने लगी. Story In Hindi

Romantic Hindi Story: इश्क की उड़ान

Romantic Hindi Story: कहते हैं कि जब कोई इश्क में होता है, तो उसे रंगीन ख्वाबों के नए पंख लग जाते हैं और वह अपनी ही बनाई दुनिया के आसमान में उड़ने लगता है. कल्पना और अजीत के इश्क की यह उड़ान उन्हें दिल्ली से भोपाल ले आई थी.

दिल्ली के लक्ष्मी नगर इलाके में पड़ोसी रहे कल्पना और अजीत के लिए भोपाल जाने की यह राह कहने को आसान थी, पर वहां उन के प्यार का एक अलहदा ही इम्तिहान होना था.

हुआ यों कि भोपाल आने से पहले दिल्ली में एक रात अजीत ने कल्पना को मोबाइल फोन पर बताया, ‘‘कल्पू, अब हमें अपने प्लान को आखिरी अंजाम तक ले जाना होगा. मुझे लगता है कि हम दोनों के घर वालों को हमारे प्यार की भनक लग गई है और इस से पहले कि वे जातपांत का वही पुराना राग अलापें, हमें यहां से कहीं दूर चले जाना होगा.’’

‘पर हम जाएंगे कहां?’ कल्पना ने सीधा सवाल किया.

‘‘देखो, हम इश्क के मारों की तरह सीधा मुंबई तो भागेंगे नहीं,’’ अजीत ने कहा.

‘तो मेरा सपनों का राजकुमार मुझे किस शहर में ले जा कर अपने दिल और घर की रानी बनाएगा?’ कल्पना ने ठिठोली की.

‘‘कल्पू, मैं ने सोच लिया है कि हम दोनों भोपाल चलेंगे. वहां मेरा एक दोस्त संजीव रहता है. वह हम दोनों को कोई काम भी दिला देगा और हमारी कोर्ट मैरिज भी करा देगा,’’ अजीत ने कहा.

‘ठीक है, मैं सारी तैयारी कर के रखूंगी,’ कल्पना ने कहा.

24 साल का अजीत ग्रेजुएशन कर चुका था और पढ़ाई में भी बहुत अच्छा था. वह बहुत सुलझा हुआ नौजवान था. वह हद से ज्यादा मेहनती भी था. रंगरूप से भी वह ठीक था. बस, एक ही कमी थी कि वह दलित समाज से था और ब्राह्मणों की लड़की कल्पना को अपना दिल दे बैठा था.

दूसरी तरफ कल्पना 22 साल की बहुत खूबसूरत लड़की थी. वह अपने मांबाप की एकलौती औलाद थी और उन की लाड़ली भी. पर वह अपने मांबाप को अजीत के बारे में बताने से डरती थी.

बहरहाल, एक दिन तय समय पर अजीत और कल्पना अपने घर में बिना बताए निकले और भोपाल की ट्रेन में बैठ कर दिल्ली के लिए जैसे हमेशा के लिए पराए हो गए.

भोपाल जंक्शन पर अजीत का दोस्त संजीव मिला और उन्हें अपने साथ घर ले गया. संजीव काफी साल से भोपाल में अकेला रह रहा था. उस का घर बड़ा तालाब के पास ही था.

जब अजीत और कल्पना ने पहली बार बड़ा तालाब देखा, तो कल्पना के मुंह से अचानक निकला, ‘‘संजीव, यह तालाब है या कोई समुद्र. मुझे तो लगा कि गांव का कोई तालाब होगा, थोड़ा सा बड़ा होगा, पर यह तो बहुत ज्यादा बड़ा है यार…’’

‘‘यह इनसानों द्वारा बनाई गई एक बहुत बड़ी झोल है और लगता है कि कोई समुद्री छोर है. ऐसा माना जाता है कि बड़ा तालाब को 11वीं शताब्दी में बनवाया गया था. तब इस इलाके में पीने की पानी की बड़ी समस्या थी.

‘‘भोपाल आज भी इसी तालाब का पानी पीता है. यही नहीं, बड़ा तालाब आज भोपाल के लोगों के लिए जीवनरेखा के साथसाथ मनोरंजन और रोजगार का जरीया भी बन गया है,’’ संजीव ने बताया.

‘‘मुझे तो भोपाल शहर बड़ा अच्छा लगा. रास्ते में जब हम आटोरिकशा में आ रहे थे तो ढलान और चढ़ाई वाली बलखाती सड़कें देख कर मैं तो रोमांचित हो गई,’’ कल्पना ने कहा.

‘‘यह शहर जितना खूबसूरत है, उस से भी ज्यादा खूबसूरत यहां के लोग हैं. और अब तो तुम भी यहां आ गई हो, तो हमारे शहर का रुतबा और ज्यादा बढ़ गया है,’’ संजीव कल्पना को देख कर बोला.

‘‘अगर तेरी फ्लर्टिंग खत्म हो गई हो तो हमें वह मकान भी दिखा दे, जहां हमारे रहने का इंतजाम किया गया है,’’ अजीत कल्पना को अपनी तरफ खींच कर बोला.

संजीव ने अपने ही इलाके में एक वन बीएचके फ्लैट दिखाया, जो पहली मंजिल पर बना था. ग्राउंड फ्लोर पर मकान मालिक अपने परिवार के साथ रहता था.

कल्पना और अजीत को वह मकान पसंद आया. उन्होंने अपना सामान वहां रखा. सब से अच्छी बात यह थी कि उस फ्लैट में मकान मालिक ने रोजमर्रा का जरूरी सामान रखा हुआ था, जिस का इस्तेमाल वे दोनों कर सकते थे.

ऊपर से तो कल्पना और अजीत बहुत खुश थे, पर मन ही मन वे डरे हुए थे. कल्पना जानती थी कि उस के पापा ने उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस थाने में लिखवा दी होगी और आज नहीं तो कल उन्हें पता चल जाएगा कि अजीत भी अपने घर से गायब है.

हालांकि, उन दोनों ने अपने मोबाइल फोन में नए सिमकार्ड भी डलवा लिए थे, पर उन की हिम्मत नहीं हो पा रही थी अपनेअपने घर बात करने की.

संजीव अपने मकान पर जा चुका था. उस का अगला काम था कल्पना और अजीत को कहीं कोई काम दिलाना और फिर उन की कोर्ट मैरिज करवाने का इंतजाम करना.

‘‘कल्पू, हम ने सही फैसला लिया है न? अगर तुम चाहो तो हम वापस जा कर अपने बड़ों से माफी मांग सकते हैं,’’ अजीत ने रोटी का कौर कल्पना को खिलाते हुए कहा.

‘‘सही या गलत का तो पता नहीं, पर अब जब हम यहां आ ही गए हैं, तो खुद को तो यह चुनौती दे ही सकते हैं कि चाहे कैसे भी हालात हों, हमें हिम्मत नहीं हारनी है,’’ कल्पना बोली.

कल्पना और अजीत दोनों अच्छे खातेपीते घर के थे. उन के पास इतने पैसे तो थे कि 2 महीने आराम से भोपाल में गुजार दें, पर अगर उन्हें जिंदगीभर साथ रहना था, तो सिर्फ प्यार की किश्ती उन का बेड़ा पार नहीं कर सकती थी. उन्हें कड़ी मेहनत करनी थी और जो भी काम मिलता, उस में अपना सबकुछ झोंक
देना था.

अगले दिन संजीव अजीत को एक अखबार एजेंट करीम मियां के पास ले गया. करीम मियां इस धंधे के पुराने खिलाड़ी थे. उन्होंने अजीत से कहा, ‘‘देखो बरखुरदार, तुम अच्छेखासे पढ़ेलिखे हो, पर फिलहाल मैं तुम्हें सुबह घरघर अखबार डालने का काम दिलवा सकता हूं. सुबह 2 घंटे का काम है. 2,000 रुपए महीना मिल जाएंगे. उस के बाद तुम कोई दूसरा धंधा भी पकड़ सकते हो.’’

‘‘करीम मियां, काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता. मुझे अखबार बांटने में कोई परेशानी नहीं है. पर मेरे पास कोई साइकिल नहीं है और मैं भोपाल में नया हूं,’’ अजीत बोला.

‘‘मुझे पता है बेटा. संजीव ने मु?ो सब बता दिया है. साइकिल तो मैं तुम्हें दे दूंगा और जहां तक अखबार बांटने के इलाके का सवाल है, तो मेरा एक छोकरा तुम्हें वे सारे घर दिखा देगा, जहां तुम्हें अखबार डालना है,’’ करीम मियां ने कहा.

अजीत को साइकिल मिल गई और उसे अगली सुबह से अपनी नई नौकरी पर लग जाना था. कल्पना खुश हुई कि चलो एक को तो नौकरी मिली.

‘‘यार, मैं सोच रहा हूं कि सुबह अखबार बांटने के बाद किसी दुकान पर कोई छोटीमोटी नौकरी भी पकड़ लूंगा. इस से हम दोनों अंटी से और ज्यादा मजबूत हो जाएंगे,’’ अजीत बोला.

‘‘सुनो अजीत, मैं ने कल्पना के लिए एक जगह बात की है. वह इलैक्ट्रोनिक्स आइटम का बड़ा शोरूम है, जहां लड़कियां पैकिंग करती हैं. उस शोरूम का मालिक बड़ा ही शरीफ है.

‘‘सब से अच्छी बात तो यह है कि वह शोरूम मेरे औफिस के ही नजदीक है. मैं ही सुबह कल्पना को अपनी बाइक से ले जाऊंगा और फिर शाम को वापस ले आऊंगा. महीने के 10,000 रुपए मिलेंगे,’’ संजीव बोला.

‘‘यह तो बहुत अच्छी खबर है. मैं घर पर अकेले क्या करती… कुछ पैसा और जुड़ेगा तो हम जल्दी सैटल हो कर शादी भी कर लेंगे,’’ कल्पना ने खुश हो कर कहा.

अगले दिन अजीत सुबह 5 बजे अपनी साइकिल ले कर करीम मियां के पास निकल गया. इधर, 8 बजे के आसपास संजीव कल्पना को ले कर इलैक्ट्रोनिक्स सामान के शोरूम में ले गया.

कल्पना को उसी दिन से काम मिल गया. सुबह 9 बजे से शाम के 6 बजे तक ड्यूटी थी. शाम को 6 बजे संजीव उसे अपनी बाइक से घर वापस ले आया.

घर पर अजीत मौजूद था. वह बोला, ‘‘कल्पू, कैसा रहा आज का दिन?’’

‘‘एकदम बढि़या. पैकिंग करने में ज्यादा दिक्कत नहीं है. मैं सोच रही हूं कि अगर मालिक मुझे ओवरटाइम भी करने दे तो मैं पैकिंग के अलावा वहां के और भी तमाम काम सीखना चाहूंगी, जैसे सेल्स वाले क्या करते हैं, टैलीविजन वगैरह सामान बेचने की कला कैसे आती है,’’ कल्पना ने अपने मन की बात रखी.

‘‘मुझे भी एक दुकान के बाहर मोबाइल फोन के कवर बेचने वाले अंकल ने नौकरी पर रख लिया है. 8,000 रुपए महीना देंगे. सुबह 8 बजे तक अखबार का काम खत्म, उस के बाद मोबाइल कवर बेचने का धंधा.

‘‘मुझे मोबाइल फोन की सारी सैटिंग्स पता हैं, किसी को कोई दिक्कत आएगी, तो उस की समस्या भी सुलझा दूंगा,’’ अजीत बोला.

‘‘फिर तो मेरी पार्टी बनती है. अभी बड़ा तालाब के सामने बने रैस्टोरैंट में चलते हैं और चाइनीज खाते हैं,’’ संजीव बोला.

वे तीनों बाहर खाना खाने चले गए. जब कल्पना और अजीत वापस घर आए, तो कल्पना बोली, ‘‘यार, वैसे तो सब सही जा रहा है, पर अभी भी एक अनजाना डर मन में है कि अगर हमारे घर वालों को पता चल गया, तो क्या होगा…’’

‘‘तुम सही कह रही हो. सारा दिन मुझे बस यही खयाल रहता है कि अगर उन्होंने तुम्हें ढूंढ़ लिया और जबरदस्ती अपने साथ ले गए, तो मेरा क्या होगा…’’ अजीत बोला.

‘‘क्यों न हम यहां के थाने में शिकायत लिखवा दें कि हम दोनों बालिग हैं और अपनी मरजी से यहां रहते हैं. अगर हमें कुछ खतरा महसूस होता है, तो पुलिस को हमारी हिफाजत करनी होगी,’’ कल्पना ने सु?ाव दिया.

‘‘इस सब का एक ही हल है और वह है हमारी कोर्ट मैरिज. हम कल ही अर्जी दाखिल कर देते हैं और मंजूरी मिलते ही शादी कर लेंगे,’’ अजीत बोला.

हुआ भी यही. तकरीबन 2 महीने बाद अजीत और कल्पना ने शादी कर ली. संजीव ने सारा इंतजाम किया था. इसी तरह देखतेदेखते 6 महीने गुजर गए.

अजीत और कल्पना अपनी नौकरी में जैसे खो गए थे. वे दोनों बहुत मेहनती थे और रोजाना 15 घंटे अपने काम को देते थे.

घर वापस आते तो बहुत ज्यादा थके होते थे. खाना खाया और बिस्तर पकड़ लिया. इस से उन दोनों की शादीशुदा जिंदगी नीरस होने लगी थी.

शायद यही वजह थी कि कल्पना अब संजीव के करीब हो रही थी या संजीव को ऐसा महसूस हो रहा था. वह शुरू से ही कल्पना की खूबसूरती का कायल था और उसे घर से शोरूम और शोरूम से घर लाने ले जाने में और ज्यादा जुड़ने लगा था.

कभीकभार जब कल्पना बहुत ज्यादा थकी होती थी, तब वह बाइक पर संजीव के कंधे से लग कर ऊंघने लगती थी. ऐसा कई बार अजीत ने भी देखा था, पर उसे कल्पना पर यकीन था. पर उसे कोई रिस्क भी नहीं लेना था.

एक दिन रविवार को अजीत और कल्पना बड़ा तालाब के सामने बैठे सुहानी शाम का मजा ले रहे थे.

अजीत ने कल्पना का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘क्या तुम इस शादी से खुश हो? मैं जानता हूं कि यह अनजाना शहर है और मेरे सिवा तुम्हारा यहां कोई नहीं है.

‘‘हम दोनों मजबूरी में ऐसा काम कर रहे हैं, जो हमारी पढ़ाई से कमतर है. जो खुशियां मुझे तुम्हें देनी चाहिए, वे मैं फिलहाल नहीं दे पा रहा हूं. कल्पू, तुम मुझे छोड़ कर तो नहीं चली जाओगी न?’’

अजीत के मुंह से अचानक यह सब सुन कर कल्पना एकदम हैरान रह गई. उस की आंखों में आंसू आ गए.

वह बोली, ‘‘अजीत, यह ठीक है कि हमारे दिन अच्छे नहीं चल रहे हैं और जो ख्वाब हम ने देखे थे, वे शायद इस हकीकत से ज्यादा हसीन थे, पर प्यार करने का मतलब यह नहीं होता कि दुख के समय में साथ छोड़ दो.

‘‘मैं इसलिए ज्यादा काम नहीं कर रही हूं कि मुझे घर काटने को दौड़ता है या मुझे ज्यादा पैसे चाहिए, बल्कि मैं चाहती हूं कि काम और मेहनत के मामले में मैं किसी भी तरह तुम से उन्नीस न रहूं. मैं हर हाल में तुम्हारे साथ खुश हूं और हमेशा रहूंगी.’’

अजीत के मन से शक के बादल छंट गए. इसी बीच एक दिन अजीत ने संजीव से कहा, ‘‘यार, तुम एक बार मेरे घर फोन कर के वहां के हालात के बारे में जानो. उन्हें यह जताना कि जैसे तुम्हें पता ही नहीं है कि मैं यहां तुम्हारे पास हूं.’’

‘‘पर अगर उन्हें भनक लग गई तो?’’ संजीव ने कहा.

‘‘आज नहीं तो कल उन्हें पता चल ही जाएगा. हम कब तक यों छिप कर रहेंगे. कल्पना कहती नहीं है, पर उसे अपने मम्मीपापा की बहुत याद सताती है,’’ अजीत बोला.

अगले दिन संजीव ने अजीत के घर फोन लगाया और बोला, ‘‘अंकल, मैं भोपाल से अजीत का दोस्त संजीव बोल रहा हूं. बड़े दिन से अजीत से बात नहीं हो पाई है. सब ठीक तो है न?’’

‘‘बेटा, अजीत तो कई महीने से गायब है. हमारे पड़ोसी ने उन की बेटी को अगवा करने के इलजाम में अजीत का नाम पुलिस थाने में लिखवा दिया है. पता नहीं वे दोनों कहां होंगे… साथ हैं भी या नहीं…’’

यह सुनते ही संजीव के मन में एक बार आया कि वह सब सचसच बता दे, पर कल्पना के बारे में सोच कर वह चुप रह गया.

जब अजीत के पापा ने अपनी पत्नी को संजीव के फोन के बारे में बताया, तो उन्हें शक हुआ कि कहीं अजीत और कल्पना भोपाल में तो नहीं हैं. वे तभी कड़ा मन कर के कल्पना के घर गईं और फोन वाली बात बता दी.

अगले ही दिन अजीत और कल्पना के मांबाप भोपाल जा पहुंचे और संजीव पर दबाव डालने और पुलिस की धमकी देने के बाद अजीत और कल्पना के मकान का पता उगलवा लिया.

घर की डोरबैल बजी. कल्पना को लगा कि संजीव आया होगा. उस ने दरवाजा खोला और सामने मम्मीपापा को देख कर उस का रंग सफेद पड़ गया.

तब तक अजीत भी दरवाजे पर आ गया था. उन्हें देख कर पहले तो वह सकपकाया, पर बाद में धीरे से बोला, ‘‘अंदर आइए.’’

उन सब के साथ संजीव भी था. वह इस सब के लिए खुद को अपराधी सा महसूस कर रहा था.

पहले तो कल्पना के पापा को बड़ा गुस्सा आया, पर जब उन्हें पता चला कि अपनी गृहस्थी को बेहतर करने के लिए वे दोनों इतनी ज्यादा कड़ी मेहनत कर रहे हैं, तो वे मन ही मन खुश भी हुए.

‘‘मैं न तो इस शादी से खुश हूं और न ही तुम दोनों से नाराज हूं. किसी मांबाप को गुस्सा तब आता है, जब उन की औलाद भाग कर शादी तो कर लेती है, पर दुनिया के थपेड़े खा कर उन का प्यार चार दिन में ही हवाहवाई हो जाता है.

‘‘तुम दोनों खुश रहो और हमेशा यहीं भोपाल में रहना, मैं सिर्फ इतना ही चाहता हूं, क्योंकि इस बुढ़ापे में मैं अपने खानदान और चार लोगों से यह नहीं सुनना चाहता कि मेरी बेटी ने छोटी जाति के लड़के से शादी कर के हमारी नाक कटवा दी.

‘‘मैं कुछ पैसे तुम्हें दे दूंगा और वहां पुलिस में दर्ज कराई गई अपनी शिकायत रद्द करवा दूंगा. मुझे लगता है कि अजीत के मांबाप को भी मेरा यह आइडिया सही लगेगा.’’

यह सुन कर अजीत के पापा की तो मानो जान में जान आई. उन के बोलने से पहले ही कल्पना ने कहा, ‘‘हमारा मकसद आप लोगों की बेइज्जती कराना नहीं था. यहां संजीव ने हमें सहारा दे कर हमारा हौसला बढ़ाया था. यह हमारा सच्चा दोस्त है.

‘‘और हां, हम दोनों ने शादी कर के कोई गुनाह नहीं किया है और अगर आप को लगता है कि हम यहीं भोपाल में रहें, तो हमें कोई दिक्कत नहीं है. हम यहीं अपनी गृहस्थी बसाएंगे.’’

‘‘अजीत बेटा, मैं जानता हूं कि तुम एक समझदार बच्चे हो. मैं और तुम्हारी मां भी यही चाहते हैं कि तुम यहां अपनी नई जिंदगी की शुरुआत करो,’’ अजीत के पापा ने कहा. वे सब एक रात वहां रहे और फिर अगले दिन वहां से चले गए. उन्होंने कुछ पैसे भी अपने बच्चों के अकाउंट में डलवा दिए थे.

इस घटना को 6 साल बीत गए थे. एक दिन अजीत और कल्पना के पापा के पास एक ह्वाट्सएप आया, जिस में एक इनविटेशन था. अजीत और कल्पना ने अपनी कड़ी मेहनत से इलैक्ट्रोनिक्स के सामान का अपना शोरूम खोला था. अगले रविवार को उस की ओपनिंग थी.

वे चारों दोबारा भोपाल गए. अजीत और कल्पना बहुत खुश हुए. उन दोनों की मम्मियों ने उस शोरूम का उद्घाटन किया, जिस का नाम था ‘कल्पना इलैक्ट्रोनिक्स’. अजीत और कल्पना की कड़ी मेहनत का सुखद नतीजा. Romantic Hindi Story

Short Hindi Story: छोटी जात

Short Hindi Story: गांव पिपलिया खुर्द, जिला सतना. मिट्टी के घर, टूटी पगडंडी और रात के अंधेरे में अब भी लोग सड़कों पर नहीं निकलते. वहीं रहती थी सीमा, एक कोरी जात की लड़की. पिता रामभरोसे दलित टोले में जूते बनाने का काम करते थे. मां की बचपन में ही मौत हो गई थी.

‘बेटी हो कर पढ़ाई करेगी? तू तो हाथ का काम सीख, यही तेरा भविष्य है,’ बस्ती के लोग अकसर कहते.

मगर सीमा ने यह मान लिया था कि उस की जात उस की नियति नहीं है. गांव के सरकारी स्कूल से उस ने 10वीं जमात पास की, लेकिन असली लड़ाई तो उस के बाद शुरू हुई.

जब इंटर के लिए शहर जाना चाहा, तो पंचायत ने विरोध किया, ‘लड़की है, अकेली जाएगी शहर? और पढ़लिख कर करेगी क्या?’

पिता ने भी हाथ खड़े कर दिए, ‘‘बिटिया, हम गरीब हैं, छोटी जात वाले हैं, ये बड़े सपने हमें शोभा नहीं देते.’’

सीमा ने तब पहली बार सीधे आंखों में आंख डाल कर कहा, ‘‘बाबूजी, मैं पढूंगी. चाहे भूखी रहूं, लेकिन पढ़ाई नहीं छोडूंगी.’’

वह खेतों में मजदूरी करने लगी. दिन में स्कूल, रात में चूल्हा. शहर की गलियों में झाड़ू भी लगाई, लेकिन किताबों का साथ नहीं छोड़ा. धीरेधीरे, वह बीए, फिर एमए तक पहुंच गई.

कालेज में अकसर टीचर भी ताना मारते, ‘तुम जैसी जात की लड़कियां यहां क्यों आती हैं? टीचर बनोगी क्या?’

सीमा मुसकरा कर कहती, ‘‘नहीं सर, अफसर बनूंगी.’’

आईएएस की कोचिंग करनी थी, मगर पैसे नहीं थे. उस ने सरकारी लाइब्रेरी में बैठ कर नोट्स बनाना शुरू किया. दिनभर न पढ़ पाने पर रात को शौचालय की सफाई के बाद बल्ब की रोशनी में पढ़ती थी.

और एक दिन जब उस का नाम अखबार में आया, ‘सीमा बंसोड़, अनुसूचित जाति वर्ग से, टौपर’ तो उसी गांव की पंचायत, जो कभी विरोध करती थी, अब मिठाई बांट रही थी.

सीमा ने अपना पहला भाषण उसी स्कूल में दिया, जहां उस के नाम से कभी टीचर मुंह चिढ़ाते थे.

‘‘जात वह दीवार है, जिसे मैं गिरा नहीं सकी, लेकिन उस पर चढ़ कर मैं ने उड़ना जरूर सीख लिया.’’

अब वही लोग, जिन की बेटियां कभी स्कूल नहीं जाती थीं, सीमा को देख कर पूछते, ‘हमारी बेटी भी अफसर बन सकती है न?’

सीमा मुसकरा कर कहती, ‘‘अगर जात, गरीबी और लड़कपन एकसाथ हो सकते हैं, तो जीत भी साथ हो
सकती है.’’ Short Hindi Story

Best Hindi Story: खुशी के आंसू

Best Hindi Story, लेखक – डा. राजेंद्र यादव आजाद

राधा पेट से थी. इस खबर से घर में खुशियां छा गईं, क्योंकि सालों बाद भवानी देवी की हवेली में किसी बच्चे की किलकारियां गूंजने वाली थीं.

भवानी देवी ने अपने बेटे विजय की शादी बड़ी धूमधाम से की थी. विजय वैसे तो पढ़ाई के साथसाथ खेलकूद में भी अव्वल आता था और अगर वह चाहता तो सिविल सेवा की नौकरी भी कर सकता था, लेकिन भवानी देवी की इच्छा थी कि उन का बेटा सेना का अफसर बने, क्योंकि भवानी देवी के पति कर्नल सूबे सिंह भी भारतीय सेना के जांबाज थे, जो 1971 के युद्ध में शहीद हो गए थे.

कर्नल सूबे सिंह के शहीद होने के समय भवानी देवी 6 महीने के पेट से थीं. पति के शहीद होने के 3 महीने बाद हवेली में किलकारियां गूंजी थीं. गमगीन परिवार में खुशियां छा गई थीं. भवानी देवी ने बड़े चाव से अपने बेटे का नाम विजय रखा था.

विजय धीरेधीरे बड़ा होता गया और भवानी देवी की उम्र ढलती गई. शहर से ग्रेजुएशन करने के बाद विजय भारतीय थल सेना में भरती हो गया था. इस के बाद उस की शादी एक अमीर परिवार की लड़की राधा से कर दी गई.

आज पोते के जन्म की खुशी में भवानी देवी फूली नहीं समा रही थीं. महल्ले में मिठाई बांटी गई.

समय का पहिया अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता जा रहा था तो भवानी देवी की हवेली में भी समय अपना रूप दिखा रहा था.

आज एक बार फिर हवेली में संकट के बादल मंडरा रहे हैं. भवानी देवी के पोते संदीप को भयंकर बुखार हो जाने के चलते शहर के बड़े अस्पताल में भरती कराया गया, लेकिन दाएं अंग को हवा लग जाने के चलते वह अपाहिज हो गया. घर का माहौल गमगीन हो गया.

संदीप जब अपाहिज हुआ था, तब उस की उम्र थी 4 साल थी. इसी दौरान राधा ने एक बेटी को भी जन्म दे दिया था.

विजय सेना में था, इसलिए वह अपनी बेटी और पत्नी राधा को शहर ले गया, लेकिन संदीप को दादी भवानी देवी ने उन के साथ शहर नहीं भेजा.

बड़ा बेटा संदीप अपाहिज होने के चलते विजय को अपने घर के वारिस की चिंता सताने लगी, तो उस ने तीसरी औलाद करने की सोची और बेटा पैदा हुआ.

इधर गांव में संदीप अपनी दादी के साथ ही रहता था. वह हवेली जो कभी लोगों से भरी रहती थी, अब सुनसान थी.

भवानी देवी ने संदीप का दाखिला गांव के ही सरकारी स्कूल में करा दिया. संदीप पढ़ाई में होशियार था.

उस ने कभी अपनी विकलांगता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया. वह अपाहिज होते हुए भी अपने सभी काम कर लेता था.

दादी भवानी देवी संदीप को स्कूल छोड़ती और लाती थीं, लेकिन गांव के कुछ दबंग छात्र संदीप की विकलांगता के चलते उस का मजाक उड़ाते थे. संदीप खून का घूंट पी कर रह जाता था.

संदीप ने अपनी 12वीं जमात बहुत अच्छे नंबरों से पास की और आगे की पढ़ाई के लिए शहर में जाने इच्छा जाहिर की, तो विजय ने मना कर दिया, ‘‘आगे पढ़ कर क्या करोगे? तुम अपाहिज हो तो कौन तुम्हारा खयाल रखेगा?’’

लेकिन संदीप की जिद के चलते विजय को ?ाकना पड़ा, क्योंकि दादी भवानी देवी जो उस के साथ खड़ी थीं. उन्होंने विजय से कहा, ‘‘संदीप को आगे पढ़ने से कोई नहीं रोक सकता. मैं इस के साथ रहूंगी.’’

संदीप ने शहर के कालेज में दाखिला ले लिया, लेकिन यहां भी उस की विकलांगता के चलते उस के सहपाठी उस का मजाक उड़ाने लगे, तो उसे निराशा ने घेर लिया.

आज जब संदीप कालेज से आया, तो वह अपनी दादी से कुछ नहीं बोला और अपने कमरे में जा कर बंद हो गया.

भवानी देवी ने सोचा कि दिनभर का थकाहारा होगा, इसलिए आराम कर रहा है, लेकिन जब रात को खाने के समय दादी ने संदीप का दरवाजा खटखटाया, तो भी उस ने कमरा नहीं खोला, तो वे चिंतित हो कर बोलीं, ‘‘संदीप, कमरा खोलो अपनी दादी के लिए.’’

थोड़ी देर के बाद जब संदीप ने दरवाजा खोला, तो वह अपनी दादी से लिपट कर रोने लगा.

‘‘क्या बात है बेटा? मुझे बताओ,’’ दादी बोलीं.

‘‘दादी, आप अभी गांव चलो. मैं अब नहीं पढ़ूंगा. पापा सही कहते थे कि तुम विकलांग हो, अब आगे नहीं पढ़ना चाहिए. मैं पढ़ाई छोड़ रहा हूं,’’ संदीप ने कहा.

‘‘यह क्या बेटा, अभी से हार मान ली… तुम्हें तो मेरा सपना पूरा करना है. तुम्हें पढ़ाई कर के आईएएस जो बनना है. तुम्हारी विकलांगता तुम्हारी पढ़ाई में बाधा नहीं बननी चाहिए. मैं हर पल तुम्हारे साथ खड़ी हूं. मैं जब तक तुम्हें आईएएस नहीं देख लूंगी, तब तक मरूंगी नहीं.

‘‘तुम्हें अपनी दादी के लिए पढ़ना होगा. तुम ऐसे लोगों के लिए मिसाल बनोगे, जो अपनी विकलांगता को बोझ समझ कर अपना रास्ता बदल लेते हैं.’’

‘‘ठीक है दादी, मैं आज के बाद कभी आप को शिकायत का मौका नहीं दूंगा.’’

अगली सुबह जब संदीप सो कर उठा तो उस में एक नई ऊर्जा का संचार हो रहा था. वह फैसला कर चुका था कि अब चाहे उस की विकलांगता का कितना भी मजाक उड़ाया जाए, वह दुखी नहीं होगा. उसे तो केवल अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना है.

कालेज में संदीप अपनी जगह बैठ कर क्लास लेने लगा. राजनीति विज्ञान के प्रोफैसर उम्मेद सिंह आए और अपना विषय पढ़ाने लगे.

इस के बाद संदीप दिनभर गुमसुम बैठा रहा था. लंच में नेहा ने उस के पास आ कर पूछा, ‘‘क्या बात है संदीप, आप कल उन आवारा लोगों की बातें दिल से क्यों लगा बैठे? चलो, चाय पी कर आते हैं. मुझे उम्मीद है आप उन की बातों को जरूर भूल जाओगे.

‘‘एक बात कहूं संदीप, जब मदमस्त हाथी चलता है तो उस के पीछे न जाने कितने कुत्ते भौंकते हैं. तुम हाथी हो मेरे दोस्त.’’

फिर वे दोनों कालेज की कैंटीन की तरफ चल दिए. थोड़ी देर के बाद वे कैंटीन में चाय पी कर वापस क्लास रूम में आ गए.

नेहा भी गांव से शहर पढ़ने आई थी. वह भी संदीप की ही क्लास में थी. वह मन ही मन संदीप को चाहने लगी थी, लेकिन उस ने कभी अपने प्यार का इजहार नहीं किया था. वे दोनों अब अच्छे दोस्त बन चुके थे.

संदीप हर बाधा को पार करता हुआ अपनी पढ़ाई कर रहा था. उस ने बीए भी अच्छे अंकों से पास की थी.

नेहा और संदीप ने राजनीति विज्ञान से एमए करने का विचार बनाया और दोनों का दाखिला जेएनयू में हो गया.

संदीप का केवल एक ही मकसद था कि उसे आईएएस बनने है, क्योंकि यह सपना संदीप का नहीं, बल्कि उस की दादी का भी था. वह अब होस्टल में रहते हुए अपनी एमए की पढ़ाई के साथसाथ आईएएस की तैयारी भी करने लगा था.

एक दिन नेहा ने कहा, ‘‘संदीप, आज गंगा ढाबे पर खाना खाने चलते हैं.’’

‘‘अरे नेहा, मैस में ही खा लेंगे न,’’ संदीप बोला.

‘‘नहीं, आज तो आप को मेरी बात माननी ही पड़ेगी,’’ नेहा बोली.

‘‘अरे बाबा, आप बड़ी जिद्दी हो,’’ संदीप ने कहा और दोनों हंस पड़े. जेएनयू में घूमते हुए वे गंगा ढाबा की तरफ चल पड़े.

‘‘संदीप, एक बात बोलूं… अगर आप सुनो तो,’’ नेहा बोली.

‘‘बोलो नेहा, क्या कहना चाह रही हो?’’ संदीप ने कहा.

‘‘संदीप, आई लव यू. मैं आप से बहुत प्यार करती हूं,’’ नेहा ने कहा, तो संदीप बोला, ‘‘नेहा, मुझ विकलांग के लिए यह आप की हमदर्दी है प्यार नहीं.’’

‘‘नहीं संदीप, मैं सच में आप से प्यार करती हूं. आप दुनिया के एक बेहतरीन इनसान हैं,’’ नेहा ने कहा.

‘‘तो क्या आज यह कहने के लिए ही आप ने मुझे बुलाया था?’’ संदीप ने पूछा.

‘‘कुछ ऐसा ही समझ लो,’’ नेहा ने कहा.

इस के बाद उन दोनों ने गंगा ढाबे पर खाना खाया. वैसे, संदीप भी मन ही मन नेहा को बहुत चाहता था, लेकिन कभी अपने प्यार का इजहार नहीं कर पाया था. आज जब नेहा ने संदीप को आई लव यू कहा तो संदीप की भावनाओं का ज्वार टूट पड़ा और उस ने भी नेहा को आई लव यू बोल दिया.

संदीप और नेहा ने आईएएस का फार्म भर दिया था. अपनी एमए की पढ़ाई के साथसाथ वे दोनों आईएएस की भी कोचिंग ले रहे थे.

यूपीएससी ने प्रीलिमिनरी ऐग्जाम की तारीख तय कर दी, तो संदीप और नेहा के दिल की धड़कन बढ़ने लगी. तय समय पर प्रीलिमनरी का ऐग्जाम हो गया और नेहा और संदीप का रिजल्ट भी अच्छा रहा. वे दोनों प्रीलिमनरी पास कर चुके थे और अब मेन ऐग्जाम की तैयारी में जुट गए थे.

कहते हैं कि मेहनत रंग लाती है और संदीप व नेहा की मेहनत भी रंग ला रही थी. दोनों ने ही पहले चांस में ही मेन ऐग्जाम भी क्लियर कर लिया. अब बारी थी इंटरव्यू की. उन दोनों को यकीन था कि उन का इंटरव्यू भी अच्छा ही हो जाएगा.

नेहा बोली, ‘‘सुनो संदीप, मुझे उम्मीद है कि हमारा इंटरव्यू भी अच्छा हो जाएगा. मैं चाहती हूं कि आप अपने मम्मीपापा से हमारी शादी की बात कर लें.’’

नेहा की बातें सुनकर संदीप एकदम से चौंक गया और बोला, ‘‘क्या हम अभी शादी की बात करें? देखो नेहा, हम अच्छे दोस्त तो हैं लेकिन क्या आप के मम्मीपापा एक अपाहिज से अपनी आईएएस बेटी की शादी करा देंगे? शायद नहीं.

‘‘नेहा, आप का भविष्य बहुत उज्ज्वल है. आप ऐसा करो कि किसी अच्छे से लड़के से शादी कर लो. मैं अपाहिज हूं. मैं आप के लायक नहीं हूं.’’

‘‘क्या बात कर रहे हो संदीप… मैं ने आप से प्यार किया है. मैं आप के सिवा किसी की भी पत्नी नहीं हो सकती. अगर मेरी शादी आप से नहीं हुई, तो मैं जिंदगीभर शादी नहीं करूंगी.’’

संदीप बोला, ‘‘ठीक है तो फिर आप अपने मम्मीपापा से बात करो और मैं भी घर में बात करता हूं. लेकिन हम यह बात इस इंटरव्यू के बाद ही करेंगे.’’

‘‘ठीक है,’’ नेहा ने कहा.

इंटरव्यू में नेहा और संदीप पास हो गए. वे अब आईएएस बन चुके थे. दोनों को ही ट्रेनिंग के लिए मसूरी भेज दिया गया. ट्रेनिंग के बाद दोनों को ही राजस्थान कैडर मिला, तो वे बहुत खुश हुए.

नेहा ने तो अपने मम्मीपापा को इस शादी के लिए तैयार कर लिया, लेकिन संदीप के पापा और मम्मी इस शादी के लिए तैयार नहीं हुए, क्योंकि नेहा अनुसूचित जाति की लड़की थी और संदीप राजपूत था.

संदीप एक बार फिर टूट गया. उस ने नेहा को अपने मांबाप का फैसला सुना दिया.

नेहा बोली, ‘‘संदीप, मैं आप को अपना पति मान चुकी हूं और मैं आप के सिवा किसी दूसरे की पत्नी नहीं बन सकती. हम अच्छे दोस्त थे, हैं और आगे भी रहेंगे.’’

जब भवानी देवी की पता चला कि नेहा और संदीप शादी करना चाहते हैं, लेकिन विजय और राधा इस शादी से खुश नहीं हैं तो उन्होंने तय किया कि वे अपने पोते को उस का सच्चा प्यार दिला कर ही रहेंगी.

भवानी देवी तत्काल गांव से जयपुर आईं और संदीप व नेहा से बात की और कहा कि चाहे कुछ भी हो जाए, वे यह शादी करा कर ही रहेंगी.

संदीप बोला, ‘‘दादी, पापा चाहते हैं कि मेरी शादी अपनी जाति में ही हो.’’

यह सुन कर भवानी देवी ने विजय को फोन किया और कहा, ‘‘तुम किस जमाने में जी रहे हो… आज 21वीं सदी में भी तुम जातिवाद की बातें कर रहे हो. क्या हो गया है तुम्हारी सोच को. देखो, मैं इन दोनों बच्चों की कोर्ट मैरिज करा रही हूं. तुम्हें आना है तो आ जाना.’’

अपनी मां की बातें सुन कर विजय गुस्से में आ गया और बोला, ‘‘मां, तुम जैसा चाहे वैसा करो. हमारा तुम से कोई वास्ता नहीं है और फोन काट दिया.’’

भवानी देवी ने संदीप और नेहा की कोर्ट मैरिज करवा दी. वे दोनों जयपुर में अपनी दादी के साथ रहने लगे. उन की जिंदगी की नैया हंसीखुशी चल रही थी.

नेहा ने एक बेटे को जन्म दे दिया था, लेकिन संदीप को दुख था कि वह अपने मांबाप का प्यार नहीं पा सका. लेकिन आज जब अखबारों में देश के टौप 10 आईएएस की लिस्ट में पहले व दूसरे नंबर पर संदीप और नेहा का नाम छपा तो विजय का सीना गर्व से चौड़ा हो गया.

विजय राधा से बोला, ‘‘देखो राधा, हमारा बेटा और बहू देश के टौप 10 आईएएस की लिस्ट में हैं. चलो, हम उन से मिलने जयपुर चलते हैं.’’

राधा और विजय जयपुर संदीप के घर आए और सारे गिलेशिकवे भूल कर बेटे और बहू को गले लगा लिया.

आज एक बार फिर भवानी देवी की आंखों में आंसू आ गए, लेकिन ये आंसू गम के नहीं, बल्कि खुशी के थे. Best Hindi Story

Hindi Story: ठोकर – आखिर सरला ने गौरिका के विश्वास को क्यों तोड़ दिया?

Hindi Story: विश्वास आईने की तरह होता है. हलकी सी दरार पड़ जाए तो उसे जोड़ा नहीं जा सकता. ऐसा ही विश्वास किया था गौरिका ने सरला पर. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस पर वह अपनों से ज्यादा भरोसा करने लगी है वह उस के विश्वास को इस तरह चकनाचूर कर देगी.

गौरिका ने आंखें खोलीं तो सिर दर्द से फटा जा रहा था. एक क्षण के लिए तो सबकुछ धुंधला सा लगा, मानो कोई डरावना सपना देख रही हो. उस ने कराहते हुए इधरउधर देखने की कोशिश की थी.

‘सरला, ओ सरला,’ उस ने बेहद कमजोर स्वर में अपनी सेविका को पुकारा. लेकिन उस की पुकार छत और दरवाजों से टकरा कर लौट आई.

‘कहां मर गई?’ कहते हुए गौरिका ने सारी शक्ति जुटा कर उठने का यत्न किया. तभी खून में लथपथ अपने हाथ को देख कर उसे झटका सा लगा और वह सिरदर्द भूल कर ‘खूनखून…’ चिल्लाती हुई दरवाजे की ओर भागी थी.

गौरिका की चीख सुन कर पड़ोस के दरवाजे खुलने लगे और पड़ोसिनें निशा और शिखा दौड़ी आई थीं.

‘क्या हुआ, गौरिका?’ दोनों ने समवेत स्वर में पूछा. खून में लथपथ गौरिका को देखते ही उन के रोंगटे खड़े हो गए थे. गौरिका अधिक देर खड़ी न रह सकी. वह दरवाजे के पास ही बेसुध हो कर गिर पड़ी.

तब तक वहां अच्छीखासी भीड़ जमा हो गई थी. निशा और शिखा बड़ी कठिनाई से गौरिका को उठा कर अंदर ले गईं. वहां का दृश्य देख कर वे भय से कांप उठीं. दीवान पूरी तरह खून से लथपथ था.

गौरिका के सिर पर गहरा घाव था. किसी भारी वस्तु से उस के सिर पर प्रहार किया गया था. शिखा ने भी सरला को पुकारा था पर कोई जवाब न पा कर वह स्वयं ही रसोईघर से थोड़ा जल ले आई थी और उसे होश में लाने का यत्न करने लगी थी.

निशा ने तुरंत गौरिका के पति कौशल को फोन कर सूचित किया था. अन्य पड़ोसियों ने पुलिस को सूचना दे दी थी. सभी इस घटना पर आश्चर्य जाहिर कर रहे थे. बड़े से पांचमंजिला भवन में 30 से अधिक फ्लैट थे. मुख्यद्वार पर 2 चौकीदार दिनरात उस अपार्टमेंट की रखवाली करते थे. नीचे ही उन के रहने का प्रबंध भी था.

इस साईं रेजिडेंसी के ज्यादातर निवासी वहां लंबे समय से रह रहे थे और भवन को पूरी तरह सुरक्षित समझते थे. अत: इस प्रकार की घटना से सभी का भयभीत होना स्वाभाविक ही था.

आननफानन में कौशल आ गया. उस का आफिस अधिक दूर नहीं था. पर आज आफिस से फ्लैट तक पहुंचने का 15 मिनट का समय उसे एक युग से भी लंबा प्रतीत हुआ था. अपने घर का दृश्य देखते ही कौशल के हाथों के तोते उड़ गए. घर का सामान बुरी तरह बिखरा हुआ था. लोहे की अलमारी का सेफ खुला पड़ा था और सामान गायब था.

‘सरला…सरला,’ कौशल ने भी घर में घुसते ही उसे पुकारा था पर उसे न पा कर एक झटका सा लगा उस भरोसे को जो उन्होंने सरला को ले कर बना रखा था.

सरला को गौरिका और कौशल ने सेविका समझा ही नहीं था. वह घर का काम करने के साथ ही गौरिका की सहेली भी बन बैठी थी. कौशल का पूरा दिन तो दफ्तर में बीतता था. घर लौटने में रात के 9-10 भी बज जाते थे.

कौशल एक साफ्टवेयर कंपनी में ऊंचे पद पर था. वैसे भी काम में जुटे होने पर उसे समय का होश कहां रहता था.

गौरिका से कौशल का विवाह हुए मात्र 10 माह हुए थे. गौरिका एक संपन्न परिवार की 2 बेटियों में सब से छोटी थी. पिता बड़े व्यापारी थे, अत: जीवन सुख- सुविधाओं में बीता था. मातापिता ने भी गौरिका और उस की बहन चारुल पर जी भर कर प्यार लुटाया था. ‘अभाव’ किस चिडि़या का नाम है यह तो उन्होंने जाना ही नहीं था.

कौशल का परिवार अधिक संपन्न नहीं था पर उस के पिता ने बच्चों की शिक्षा में कोई कोरकसर नहीं उठा रखी थी. विवाह में गौरिका के परिवार द्वारा किए गए खर्च को देख कर कौशल हैरान रह गया था. 4-5 दिनों तक विवाह का उत्सव चला था. 3 अलगअलग स्थानों पर रस्में निभाई गई थीं. उस शानो- शौकत को देख कर मित्र व संबंधी दंग रह गए थे. पर सब से अधिक प्रभावित हुआ था कौशल. उस ने अपने परिवार में धन का अपव्यय कभी नहीं देखा था. जहां जितना आवश्यक हो उतना ही व्यय किया जाता था, वह भी मोलतोल के बाद.

सुंदर, चुस्तदुरुस्त गौरिका गजब की मिलनसार थी. 10 माह में ही उस ने इतने मित्र बना लिए थे जितने कौशल पिछले 5 सालों में नहीं बना सका था.

अब दिनरात मित्रों का आनाजाना लगा रहता. मातापिता ने उपहार में गौरिका को घरेलू साजोसामान के साथ एक बड़ी सी कार भी दी थी. कौशल कार्यालय आनेजाने के लिए अपनी पुरानी कार का ही इस्तेमाल करता था. गौरिका अपनी मित्रमंडली के साथ घूमनेफिरने के लिए अपनी नई कार का प्रयोग करती थी.

मायके में कभी तिनका उठा कर इधरउधर न करने वाली गौरिका ने मित्रों के स्वागतसत्कार के लिए इस फ्लैट में आते ही 3 सेविकाओं का प्रबंध किया था. घर की सफाई और बरतन मांजने वाली अधेड़ उम्र की दमयंती साईं रेजिडेंसी से कुछ दूरी पर झोंपड़ी में रहती थी. कपड़े धोने और प्रेस करने वाली सईदा सड़क पार बने नए उपनगर में रहती थी.

सरला को गौरिका ने रहने के लिए निचली मंजिल पर कमरा दे रखा था. वह भोजन बनाने, मित्रों का स्वागतसत्कार करने के साथ ही उस के साथ खरीदारी करने, सिनेमा देखने जाती थी. 4-5 माह में ही सरला कुछ इस तरह गौरिका की विश्वासपात्र बन बैठी थी कि उस के गहने संभालने, दूध, समाचारपत्र आदि का हिसाबकिताब करने जैसे काम भी वह करने लगी थी.

कुछ दिनों के लिए कौशल के मातापिता बेटे की गृहस्थी को करीब से देखने की आकांक्षा लिए आए थे और नौकरों का एकछत्र साम्राज्य देख कर दंग रह गए थे. उस की मां ने दबी जबान में कौशल को समझाया भी था, ‘बेटा, 2 लोगों के लिए 3 सेवक? तुम्हारी पत्नी तो तुम्हारा सारा वेतन इसी तरह उड़ा देगी. अभी से बचत करने की सोचो, नहीं तो बाद में कुछ भी हाथ नहीं लगेगा.’

‘मां, गौरिका हम जैसे मध्यम परिवार से नहीं है. उस के यहां तो नौकरों की फौज रखना साधारण सी बात है. हम उस से यह आशा तो नहीं कर सकते कि वह बरतन मांजने और घर की सफाई करने जैसे कार्य भी अपने हाथों से करेगी,’ कौशल ने उत्तर दिया था.

‘कपड़े धोने के लिए मशीन है, बेटे,’ मां बोलीं, ‘साफसफाई के लिए आने वाली दमयंती भी ठीक है, पर दिन भर घर में रहने वाली सरला मुझे फूटी आंखों नहीं भाती. कपडे़, गहने, रुपएपैसे आदि की जानकारी उसे भी है. किसी तीसरे को इस तरह अपने घर के भेद देना ठीक नहीं है. उस की आंखें मैं ने देखी हैं… घूर कर देखती है सबकुछ. काम रसोईघर में करती है, पर उस की नजरें पूरे घर पर रहती हैं. मुझे तो तुम्हारी और गौरिका की सुरक्षा को ले कर चिंता होने लगी है.’

‘मां, यह चिंता करनी छोड़ो. चलो, कहीं घूमने चलते हैं. सरला 6 माह से यहां काम कर रही है पर कभी एक पैसे का नुकसान नहीं हुआ. गौरिका को तो उस पर अपनों से भी अधिक विश्वास है,’ कौशल ने बोझिल हो आए वातावरण को हलका करने का प्रयत्न किया था.

‘रहने भी दो, अब बच्चे बड़े हो गए हैं. अपना भलाबुरा समझते हैं. हम 2-4 दिनों के लिए घूमने आए हैं. तुम क्यों व्यर्थ ही अपना मन खराब करती हो,’ कौशल के पिताजी ने बात का रुख मोड़ने का प्रयत्न किया था.

‘क्या हुआ? सब ऐसे गुमसुम क्यों बैठे हैं,’ तभी गौरिका वहां आ गई थी.

‘कुछ नहीं, मां को कुछ पुरानी बातें याद आ गई थीं,’ कौशल हंसा था.

‘बातें बाद में होती रहेंगी, हम लोग तो पिकनिक पर जाने वाले थे, चलिए न, देर हो जाएगी,’ गौरिका ने कुछ ऐसे स्वर में अनुनय की थी कि सब हंस पड़े थे.

सरला ने चटपट भोजन तैयार कर दिया था. थर्मस में चाय भर दी थी. पर जब गौरिका ने सरला से भी साथ चलने को कहा तो कौशल ने मना कर दिया था.

‘मांपापा को अच्छा नहीं लगेगा, उन्हें परिवार के सदस्यों के बीच गैरों की उपस्थिति रास नहीं आती,’ कौशल ने समझाया था.

‘मैं ने सोचा था कि वहां कुछ काम करना होगा तो सरला कर देगी.’

‘ऐसा क्या काम पड़ेगा. फिर मैं हूं ना, सब संभाल लूंगा,’ सच तो यह था कि खुद कौशल को भी परिवार में सरला की उपस्थिति हर समय खटकती थी पर कुछ कह कर गौरिका को आहत नहीं करना चाहता था.

कौशल के मातापिता कुछ दिन रह कर चले गए थे पर कौशल की रेनू बूआ, जो उसी शहर के एक कालिज में व्याख्याता थीं, दशहरे की छुट्टियों में अचानक आ धमकी थीं. चूंकि  कौशल घर में सब से छोटा था इसकारण वह बूआ का विशेष लाड़ला था.

गौरिका से बूआ की खूब पटती थी. पर सरला को कर्ताधर्ता बनी देख वह एक दिन चाय पीते ही बोल पड़ी थीं, ‘गौरिका, नौकरों से इतना घुलनामिलना ठीक नहीं है. तुम्हें शायद यह पता नहीं है कि तुम अपनी सुरक्षा को किस तरह खतरे में डाल रही हो. आजकल का समय बड़ा ही कठिन है. हम किसी पर विश्वास कर ही नहीं सकते.’

‘मैं जानती हूं बूआजी, इसीलिए तो मैं ने किसी पुरुष को काम पर नहीं रखा. मैं अपनी कार के लिए एक चालक रखना चाहती थी. अधिक भीड़भाड़ में कार चलाने से बड़ी थकान हो जाती है. पर देखिए, हम दोनों स्वयं ही अपनी कार चलाते हैं.’

रेनू बूआ चुप रह गई थीं. वह शायद बताना चाहती थीं कि पुरुष हो या स्त्री कोई भी विश्वास के योग्य नहीं है. फिर भी उन्होंने गौरिका से यह आश्वासन जरूर ले लिया कि भविष्य में वह रुपएपैसे, गहनों से सरला को दूर ही रखेगी.

गौरिका ने रेनू बूआ का मन रखने के लिए उन्हें आश्वस्त कर दिया पर उसे सरला पर अविश्वास करने का कारण समझ में नहीं आता था. उस के अधिकतर पड़ोसी एक झाड़ ूबरतन वाली से काम चलाते थे लेकिन वह सोचती थी कि उस का स्तर उन सब से ऊंचा है.

कौशल ने सब से पहले गौरिका को पास के नर्सिंग होम में भरती कराया था. सिर पर घाव होने के कारण वहां टांके लगाए गए थे. निशा और शिखा ने गौरिका के पास रहने का आश्वासन दिया तो कौशल घर आ गया और आते ही उस ने अपने और गौरिका के मातापिता को सूचित कर दिया. कौशल ने रेनू बूआ को भी सूचित कर दिया. बूआ नजदीक थीं और वह अच्छी तरह से जानता था कि उस पर आई इस आफत को सुनते ही बूआ दौड़ी चली आएंगी.

प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखा कर कौशल दोबारा नर्सिंग होम चला गया था. सिर में टांके लगाने के लिए गौरिका के एक ओर के बाल साफ कर दिए गए थे. हाथ में पट्टी बंधी थी, पर वह पहले से ठीक लग रही थी.

‘कौशल, मेरे कपड़े बदलवा दो. सरला से कहना अलमारी से धुले कपडे़ निकाल देगी,’ गौरिका थके स्वर में बोली थी.

‘नाम मत लेना उस नमकहराम का. कहीं पता नहीं उस का. तुम्हें अब भी यह समझ में नहीं आया कि तुम्हारी यह दशा सरला ने ही की है,’ कौशल क्रोधित हो उठा था.

‘क्या कह रहे हो? सरला ऐसा नहीं कर सकती.’

‘याद करने की कोशिश करो, हुआ क्या था तुम्हारे साथ? पुलिस तुम्हारा बयान लेने आने वाली है.’

गौरिका ने आंखें मूंद ली थीं. देर तक आंसू बहते रहे थे. फिर वह अचानक उठ बैठी थी.

‘मुझे कुछ याद आ रहा है. मैं आज सरला के साथ बैंक गई थी. 50 हजार रुपए निकलवाए थे. घर आ कर सरला खाना बनाने लगी थी. मैं ने उस से एक प्याली चाय बनाने के लिए कहा था. चाय पीने के बाद क्या हुआ मुझे कुछ पता नहीं,’ गौरिका सुबकने लगी थी, ‘2 दिन बाद तुम्हारे जन्मदिन पर मैं तुम्हें उपहार देना चाहती थी.’

तभी रेनू बूआ आ पहुंची थीं. उन के गले लग कर गौरिका फूटफूट कर रोई थी.

‘देखो बूआजी, क्या हो गया? मैं ने सरला पर अपनों से भी अधिक विश्वास किया. सभी सुखसुविधाएं दीं. उस ने मुझे उस का यह प्रतिदान दिया है,’ गौरिका बिलख रही थी.

रेनू बूआ चुप रह गई थीं. वह जानती थीं कि कभीकभी मौन शब्दों से भी अधिक मुखर हो उठता है. वह यह भी जानती थीं कि बहुत कम लोग दूसरों को ठोकर खाते देख कर संभलते हैं, अधिकतर को तो खुद ठोकर खा कर ही अक्ल आती है.

सरला 50 हजार रुपए के साथ ही घर में रखे गौरिका के गहनेकपड़े भी ले गई थी. लगभग 5 माह बाद वह अपने 2 साथियों के साथ पकड़ी गई थी और तभी गौरिका को पता चला कि वह पहले भी ऐसे अपराधों के लिए सजा काट चुकी थी. सुन कर गौरिका की रूह कांप गई थी. कौशल, मांबाप तथा घर के अन्य सभी सदस्यों ने उसे समझाया था कि भाग्यशाली हो जो तुम्हारी जान बच गई. नहीं तो ऐसे अपराधियों का क्या भरोसा.

इस घटना को 5 वर्ष बीत चुके हैं. फैशन डिजाइनर गौरिका का अपना बुटीक है. पर पति, 3 वर्षीय बंटी और बुटीक सबकुछ गौरिका स्वयं संभालती है. दमयंती अब भी उस का हाथ बंटाती है पर सब पर अविश्वास करना और अपना कार्य स्वयं करना सीख लिया है गौरिका ने. Hindi Story

Hindi Story: संकट की घड़ी – क्यों डर गया था नीरज

Hindi Story: उस ने घड़ी देखी. 7 बजने को थे. मतलब, वह पूरे 12 घंटों से यहां लगा हुआ था. परिस्थिति ही कुछ ऐसी बन गई थी कि उसे कुछ सोचनेसमझने का अवसर ही नहीं मिला था.

जब से वह यहां इस अस्पताल में है, मरीज और उस के परिजनों से घिरा शोरगुल सुनता रहा है. किसी को बेड नहीं मिल रहा, तो किसी को दवा नहीं मिल रही. औक्सीजन का अलग अकाल है. बात तो सही है. जिस के परिजन यहां हैं या जिस मरीज को जो तकलीफ होगी, यहां नहीं बोलेगा, तो कहां बोलेगा. मगर वह भी किस को देखे, किस को न देखे. यहां किसी को अनदेखा भी तो नहीं किया जा सकता. बस किसी तरह अपनी झल्लाहट को दबा सभी को आश्वासन देना होता है. किसी को यह समझने की फुरसत नहीं कि यहां पीपीई किट पहने किस नरक से गुजरना होता है. इसे पहने पंखे के नीचे खड़े रहो, तो पता ही नहीं चलता कि पंखा चल भी रहा है या नहीं. और यहां सभी को अपनीअपनी ही पड़ी है.

ठीक है कि सरकारी अस्पताल है और यहां मुसीबत में हारीबीमारी के वक्त ही लोग आते हैं. मगर इस कोरोना के चक्कर में तो जैसे मरीजों की बाढ़ आई है. और यहां न फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर है और न ह्यूमन रिसोर्सेज हैं. सप्लाई चेन औफ मेडिसिन का कहना ही क्या! किसी को कहो कि मरीज के लिए दवा बाहर से खरीदनी होगी या औक्सीजन का इंतजाम करना होगा, तो वह पहली नजर में ऐसे देखता है, मानो उसी ने अस्पताल से दवाएं या औक्सीजन गायब करवा दिया हो या वही उस की ब्लैक मार्केटिंग करवा रहा हो.

ऐसी खबरें अखबारों और सोशल मीडिया में तैर भी रही हैं. मगर फिर भी ऐसे में एक डाक्टर करे तो क्या. उस का काम मरीजों का इलाज करना है, न कि ब्लैक मार्केटियरों को पकड़ना या सुव्यवस्था कायम करना है. आखिर किस समाज में अच्छेबुरे लोग नहीं होते. फिर भी दवाएंऔक्सीजन आदि की व्यवस्था करा भी दें, तो ऐसे देखेंगे, मानो उसी पर अहसान कर रहा हो.

सैकंड शिफ्ट में आई नर्स मीना के साथ वह वार्ड का एक चक्कर लगा वापस लौटा. थोड़ी देर बाद उस ने उस से पूछा, “डाक्टर भानु आए कि नहीं?” “सर, उन्होंने फोन किया था कि थोड़ी देर में बस पहुंचने ही वाले हैं.”

“देखो, मैं अभी निकल रहा हूं. 10 घंटे से यहां लगा हुआ हूं. अगर और रुका, तो मैं कहीं बेहोश ना हो जाऊं, ऐसा मुझे लग रहा है.”

“ठीक है सर, मैं आप की हालत देख रही हूं. आप घर जाइए.” उस ने सावधानी से पहले पीपीई किट्स को और उस के बाद अपने गाउन और दस्ताने को खोला. इन्हें खोलते हुए उसे ऐसा लगा जैसे वह किसी दूसरी दुनिया से बाहर निकला हो. इस के बाद उस ने स्वयं को सैनिटाइज करना शुरू किया. वहां से बाहर निकल कर अपनी कार के पास आया. वहां थोड़ी भीड़ कम थी. फिर भी उस ने मास्क हटा जोर से सांस खींच फेफड़ों में हवा भरी.

विगत समय के डाक्टर यही तो गलती करते थे कि अपने कमरे में जा कर गाउन, दस्ताने के साथ मास्क को भी हटा लेते थे. जबकि वहां के वातावरण में वायरस तो होता ही था, जो उन्हें अपनी चपेट में ले लेता था.

कार को सावधानी के साथ चलाते हुए वह मुख्य मार्ग पर आया. हालांकि शाम 7 बजे से लौकडाउन है. फिर भी कुछ दुकानें खुली हैं और लोग चहलकदमी करते नजर आ रहे हैं. ‘कब समझेंगे ये लोग कि वे किस खतरनाक दौर से गुजर रहे हैं ’ वह बुदबुदाया, ‘भयावह हो रहे हालात, प्रशासन की चेतावनी और सख्ती के बावजूद परिस्थितियों को समझ नहीं रहे हैं ये लोग.’

अपने घर के पास पहुंच कर उस ने चैन की सांस ली. उस ने हार्न बजा कर ही अपने आने की सूचना दी.  घर का दरवाजा खुला था और ढाई वर्ष का बेटा नीरज बरामदे में ही खेल रहा था. “पापा आ गए मम्मी,” कहते हुए वह दौड़ कर गेट तक आ गया था. मीरा घर से बाहर निकली और गेट को पूरी तरह से खोल दिया था. उस ने सावधानी से कार को घर के सामने पार्क किया. तब तक नीरज कार के चारों ओर चक्कर लगाता रहा. उस के कार के उतरते ही वह उस से चिपट पड़ा, तो उस ने उसे जोर से ढकेला और चिल्लाने लगा, “मीरा, तुम्हें अक्ल नहीं है, जो बच्चे को इस तरह खुले में छोड़ दिया.

“मैं अस्पताल से आ रहा हूं और यह मुझ से चिपक रहा है. दिनभर घर में टैलीविजन पर सीरियल देखती रहती हो. तुम्हें क्या पता कि वहां क्या चल रहा है. हमेशा जान जोखिम में डाल कर काम करना होता है वहां. संभालो नीरज को. और बाथरूम में गीजर औन किया है कि नहीं. कि मुझे ही वहां जा कर उसे औन करना होगा.”

“कहां का गुस्सा कहां उतारते हो,” धक्का खा कर गिरे बेटे को उठाते हुए मीरा बोली, “यह बच्चा क्या समझेगा कि बाहर क्या चल रहा है. प्ले स्कूल भी बंद है. घर में बंदबंद बच्चा आखिर करे क्या?” बाथरूम में जा कर उस ने अपने सारे कपड़े उतार कर एक टब में छोड़ दिए. फिर इस गरमी में भी पानी के गरम फव्वारे से साबुन लगा स्नान करने लगा.

नहाधो कर जब वह बाहर आया, तो उसे कुछ चैन मिला. एक कोने में उस की नजर पड़ी तो देखा कि नीरज अभी तक सुबक रहा था. वह उस की उपेक्षा कर अपने कमरे में चला तो गया, मगर उसे ग्लानि सी महसूस हो रही थी. बच्चे को उसे इस तरह ढकेलना नहीं चाहिए था.

मगर, क्या उस ने गलत किया. अस्पताल के परिसर में दिनभर कार खड़ी थी. वह खुद कोरोना पेशेंटों से जूझ कर आया था. कितनी भी सावधानी रख लो, इस वायरस का क्या ठिकाना कि कहां छुप कर चिपका बैठा हो. वह तो उस ने उसी के भले के लिए उसे किनारे किया था. नहींनहीं, किनारे नहीं किया था, बल्कि उसे ढकेल दिया था.

जो भी हो, उस ने उस के भले के लिए ही तो ऐसा किया था. अस्पताल से आने के बाद उस का दिमाग कहां सही रहता है. कोई बात नहीं, वह उसे मना लेगा. बच्चा है, मान जाएगा.  इसी प्रकार के तर्कवितर्क उस के दिमाग में चलते रहे .वह ड्राइंगरूम में आया. मीरा उस के लिए ड्राइंगरूम में चायनाश्ता रख गई.

12 साला बेटी मीनू उसे आ कर बस देख कर चली गई. और वह वहां अकेला ही बैठा रहा. फिर वह उठा और नीरज को गोद में उठा लाया.  पहले तो वह रोयामचला और उस की गिरफ्त से भाग छूटने की कोशिश करने लगा. अंततः वह उस की बांहों में मुंह छुपा कर रोने लगा. मीरा उसे चुपचाप देखती रही. उस का मुंह सूजा हुआ था. रोज की तो यही हालत है. वह क्या करे, कहां जाए. उस की इसी तुनकमिजाजी की वजह से उस ने अपनी स्कूल की लगीलगाई नौकरी छोड़ दी थी. और इन्हें लगता है कि मैं घर में बैठी मटरगश्ती करती हूं.

उस ने मीरा को आवाज दी, तो वह आ कर दूसरे कोने में बैठ गई.“तुम मुझे समझने की कोशिश करो,” उसी ने चुप्पी तोड़ी, “बाहर का वातावरण इतना जहरीला है, तो अस्पताल का कैसा होगा, इस पर विचार करो. वहां से कब बुलावा आ जाए, कौन जानता है.” “दूसरे लोग भी नौकरी करते हैं, बिजनेस करते हैं,” मीरा बोली, “मगर, वे अपने बच्चों को नहीं मारते… और न ही घर में उलटीसीधी बातें करते हैं.”

“अब मुझे माफ भी कर दो बाबा,” वह बोला, “अभी अस्पताल की क्या स्थिति है, तुम क्या जानो. रोज लोगों को अपने सामने दवा या औक्सीजन की कमी में मरते देखता हूं. मैं भी इनसान हूं. उन रोतेबिलखते, छटपटाते परिजनों को देख मेरी क्या हालत होती है, इसे समझने का प्रयास करो. और ऐसे में जब तुम लोगों का ध्यान आता है, तो घबरा जाता हूं.”

“मैं ने कब कहा कि आप परेशान नहीं हैं. तभी तो इस घर को संभाले यहां पड़ी रहती हूं. फिर भी आप को खुद पर नियंत्रण रखना चाहिए. ऐसा क्या कि नन्हे बच्चे पर गुस्सा उतारने लगे.” मीरा वहां से उठी और एक बड़ा सा चौकलेट ला कर उसे छिपा कर देती हुई बोली, “ये लीजिए और नीरज को यह कहते हुए दीजिए कि आप खास उस के लिए ही लाए हैं. बच्चा है, खुश हो जाएगा.”

मीरा की तरकीब काम कर गई थी. उस के हाथ से चौकलेट ले कर नीरज बहल गया था. पहले उस ने चौकलेट के टुकड़े किए. एकएक टुकड़ा पापामम्मी के मुंह में डाला. फिर एक टुकड़ा बहन को देने चला गया.  फिर पापा के पास आ कर उस की बालसुलभ बातें शुरू हो गईं. वह उसे ‘हांहूं’ में जवाब देता रहा. उस ने घड़ी देखी, 9 बज रहे थे. और उस पर थकान और नींद हावी हो रही थी. अचानक नीरज ने उसे हिलाया और कहने लगा, “अरे, आप तो सो रहे हैं. मम्मीमम्मी, पापा सो रहे हैं.”

मीरा किचन से निकल कर उस के पास आई और बोली, “आप बुरी तरह थके हैं शायद. इसीलिए आप को नींद आ रही है. मैं खाना निकालती हूं. आप खाना खा कर सो जाइए.” डाइनिंग टेबल तक वह किसी प्रकार गया. मीरा ने खाना निकाल दिया था. किसी प्रकार उस ने खाना खत्म किया और वापस कमरे में आ कर अपने बेड पर पड़ रहा. नीरज उस के पीछेपीछे आ गया था. उसे मीरा यह कहते हुए अपने साथ ले गई कि पापा काफी थके हैं. उन्हें सोने दो.

सचमुच थकान तो थी ही, मगर अब चारों तरफ शांति है, तो उसे नींद क्यों नहीं आ रही. वह उसी अस्पताल में क्यों घूम रहा है, जहां हाहाकार मचा है. कोई दवा मांग रहा है, तो किसी को औक्सीजन की कमी हो रही है. बाहर किसी जरूरतमंद मरीज के लिए उस के परिवार वाले एक अदद बेड के लिए गुहार लगा रहे हैं, घिघिया रहे हैं. और वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो विवश सा खड़ा है.

दृश्य बदलता है, तो बाहर कोई सरकार को, तो कोई व्यवस्था को कोस रहा है. कैसेकैसे बोल हैं इन के, ‘ये लालची डाक्टर, इन का कभी भला नहीं होगा… इस अस्पताल के बेड के लिए भी पैसा मांगते हैं… सारी दवाएं बाजार में बेच कर कहते हैं कि बाजार से खरीद लाओ… और औक्सीजन सिलिंडर के लिए भी बाजार में दौड़ो… क्या करेंगे, इतना पैसा कमा कर? मरने के बाद ऊपर ले जाएंगे क्या? इन के बच्चे कैसे अच्छे होंगे, जब ये कुकर्म कर रहे हैं?’

“नीरज… नीरज, मीनू कहां हो… कहां हो तुम,” वह चिल्लाया, तो मीरा भागीभागी आई, “क्या हुआ जी…? क्यों घबराए हुए हो…? कोई बुरा सपना देखा क्या…?”वह बुरी तरह पसीने से भीगा थरथर कांप रहा था. मीनू और नीरज भयभीत नजरों से उसे देख रहे थे. वह नीरज को गोद में भींच कर रोने लगा था. बेटी मीनू का हाथ उस के हाथ में था. मीरा उसे सांत्वना दे रही थी, “चिंता मत कीजिए. यह संकट की घड़ी भी टल जाएगी. सब ठीक हो जाएगा.” Hindi Story

Story In Hindi: रुदन – रूसी नताशा के दिल की बात

Story In Hindi: नतालिया इग्नातोवा या संक्षेप में नताशा मास्को विश्वविद्यालय में हिंदी की रीडर थी. उस के पति वहीं भारत विद्या विभाग के अध्यक्ष थे. पतिपत्नी दोनों मिलनसार, मेहनती और खुशमिजाज थे.

नताशा से अकसर फोन पर मेरी बात हो जाती थी. कभीकभी हमारी मुलाकात भी होती थी. वह हमेशा हिंदी की कोई न कोई दूभर समस्या मेरे पास ले कर आती जो विदेशी होने के कारण उसे पहाड़ जैसी लगती और मेरी मातृभाषा होने के कारण मुझे स्वाभाविक सी बात लगती. जैसे एक दिन उस ने पूछा कि रेलवे स्टेशन पर मैं उस से मिला या उस को मिला, क्या ठीक है और क्यों? आप बताइए जरा.

उस ने मुझे अपने संस्थान में 2-3 बार अतिथि प्रवक्ता के रूप में भी बुलाया था. मैं गया, उस के विद्यार्थियों से बात की. उसे अच्छा लगा और मुझे भी. मैं भी दूतावास के हिंदी से संबंधित कार्यक्रमों में उसे बुला लेता था.

नताशा मुझे दूतावास की दावतों में भी मिल जाती थी. जब भी दूतावास हिंदी से संबंधित कोई कार्यक्रम रखता, तो समय होने पर वह जरूर आती. कार्यक्रम के बाद जलपान की भी व्यवस्था रहती, जिस में वह भारतीय पकवानों का भरपूर आनंद लेती.

2-3 बार भारत हो आई नताशा को हिंदी से भी ज्यादा पंजाबी का ज्ञान था और वह बहुत फर्राटे से पंजाबी बोलती थी. दरअसल, शुरू में वह पंजाबी की ही प्रवक्ता थी, लेकिन बाद में जब विश्व- विद्यालय ने पंजाबी का पाठ्यक्रम बंद कर दिया तो वह हिंदी में चली आई.

रूस में अध्ययन व्यवस्था की यह एक खास विशेषता है कि व्यक्ति को कम से कम 2 कामों में प्रशिक्षण दिया जाता है. यदि एक काम में असफल हो गए तो दूसरा सही. इसलिए वहां आप को ऐसे डाक्टर मिल जाएंगे जो लेखापाल के कार्य में भी निपुण हैं.

हम दोनों की मित्रता हो गई थी. वह फोन पर घंटों बातें करती रहती. एक दिन फोन आया, तो वह बहुत उदास थी. बोली, ‘‘हमें अपना घर खाली करना होगा.’’

‘‘क्यों?’’ मैं ने पूछा, ‘‘क्या बेच दिया?’’

‘‘नहीं, किसी ने खरीद लिया,’’ उस ने बताया.

‘‘क्या मतलब? क्या दोनों ही अलगअलग बातें हैं?’’ मैं ने अपने मन की शंका जाहिर की.

‘‘हां,’’ उस ने हंस कर कहा, ‘‘वरना भाषा 2 अलगअलग अभि- व्यक्तियां क्यों रखती?’’

‘‘पहेलियां मत बुझाओ. वस्तुस्थिति को साफसाफ बताओ,’’ मैं ने नताशा से कहा था.

‘‘पहले यह बताइए कि पहेलियां कैसे बुझाई जाती हैं?’’ उस ने प्रश्न जड़ दिया, ‘‘मुझे आज तक समझ नहीं आया कि पहेलियां क्या जलती हैं जो बुझाई जाती हैं.’’

‘‘यहां बुझाने का मतलब मिटाना, खत्म करना नहीं है बल्कि हल करना, सुलझाना है,’’ मैं ने जल्दी से उस की शंका का समाधान किया और जिज्ञासा जाहिर की, ‘‘अब आप बताइए कि मकान का क्या चक्कर है?’’

‘‘यह बड़े दुख का विषय है,’’ उस ने दुखी स्वर में कहा, ‘‘मैं ने तो आप को पहले ही बताया था कि मेरा मकान बहुत अच्छे इलाके में है और यहां मकानों के दाम बहुत ज्यादा हैं.’’

‘‘जी हां, मुझे याद है,’’ मैं ने कहा, ‘‘वही तो पूछ रहा हूं कि क्या अच्छे दाम ले कर बेच दिया.’’

‘‘नहीं, असल में एक आदमी ने मेरे मकान के बहुत कम दाम भिजवाए हैं और कहा है कि आप का मकान मैं ने खरीद लिया है,’’ उस ने रहस्य का परदाफाश किया.

‘‘अरे, क्या कोई जबरदस्ती है,’’ मैं ने उत्तेजित होते हुए कहा, ‘‘आप कह दीजिए कि मुझे मकान नहीं बेचना है.’’

‘‘बेचने का प्रश्न कहां है,’’ नताशा बुझे हुए स्वर में बोली, ‘‘यहां तो मकान जबरन खरीदा गया है.’’

‘‘लेकिन आप मकान खाली ही मत कीजिए,’’ मैं ने राह सुझाई.

‘‘आप तो दूतावास में हैं, इसलिए आप को यहां के माफिया से वास्ता नहीं पड़ता,’’ उस ने दर्द भरे स्वर में बताया, ‘‘हम आनाकानी करेंगे तो वे गुंडे भिजवा देंगे, मुझे या मेरे पति को तंग करेंगे. हमारा आनाजाना मुहाल कर देंगे, हमें पीट भी सकते हैं. मतलब यह कि या तो हम अपनी छीछालेदर करवा कर मकान छोड़ें या दिल पर पत्थर रख कर शांति से चले जाएं.’’

‘‘और अगर आप पुलिस में रिपोर्ट कर दें तो,’’ मुझे भय लगने लगा था, ‘‘क्या पुलिस मदद के लिए नहीं आएगी?’’

‘‘मकान का दाम पुलिस वाला ही ले कर आया था,’’ उस ने राज खोला, ‘‘बहुत मुश्किल है, प्रकाशजी, माफिया ने यहां पूरी जड़ें जमा रखी हैं. यह सरकार माफिया के लोगों की ही तो है. मास्को का जो मेयर है, वह भी तो माफिया डौन है. आप क्या समझते हैं कि रूस तरक्की क्यों नहीं करता? सरकार के पास पैसे पहुंचते ही नहीं. जनता और सरकार के बीच माफिया का समानांतर शासन चल रहा है. ऐसे में देश तरक्की करे, तो कैसे करे.’’

‘‘यह न केवल दुख का विषय है बल्कि बहुत डरावना भी है,’’ मुझे झुरझुरी सी हो आई.

‘‘देखिए, हम कितने बहादुर हैं जो इस वातावरण में भी जी रहे हैं,’’ नताशा ने फीकी सी हंसी हंसते हुए कहा था.

मैं 1997 में जब मास्को पहुंचा था, तो एक डालर के बदले करीब 500 रूबल मिलते थे. साल भर बाद अचानक उन की मुद्रा तेजी से गिरने लगी. 7, 8, 11, 22 हजार तक यह 4-5 दिनों में पहुंच गई थी. देश भर में हायतौबा मच गई. दुकानों पर लोगों के हुजूम उमड़ पड़े, क्योंकि दामों में मुद्रा हृस के मुताबिक बढ़ोतरी नहीं हो पाई थी. सारे स्टोर खाली हो गए और आम रूसी का क्या हाल हुआ, वह तब पता चला जब नताशा से मुलाकात हुई.

नताशा ने मुझे बताया था कि अपने मकान से मिली राशि और अपनी जमापूंजी से वह एक मकान खरीद लेगी जो बहुत अच्छी जगह तो नहीं होगा पर सिर छिपाने के लिए जगह तो हो

ही जाएगी.

‘‘क्यों नया मकान खरीदा?’’ उस के दोबारा मिलने पर मैं ने पूछा.

मेरा सवाल सुन कर नताशा विद्रूप हंसी हंसने लगी. फिर अचानक रुक कर बोली, ‘‘जानते हैं यह मेरी जो हंसी है वह असल में मेरा रोना है. आप के सामने रो नहीं सकती, इसलिए हंस रही हूं. वरना जी तो चाहता है कि जोरजोर से बुक्का फाड़ कर रोऊं,’’ वह रुकी और ठंडी आह भर कर फिर बोली, ‘‘और रोए भी कोई कितना. अब तो आंसू भी सूख चुके हैं.’’

मैं समझ गया कि मामला कुछ रूबल की घटती कीमत से ही जुड़ा होगा. मकानों के दाम बढ़ गए होंगे और नताशा के पैसे कम पड़ गए होंगे. मैं कुछ कहने की स्थिति में नहीं था, चुप रहा.

‘‘आप जानते हैं, राज्य का क्या मतलब होता है? हमें बताया जाता है कि राज्य लोगों की मदद के लिए है, समाज में व्यवस्था के लिए है, समाज के कल्याण के लिए है. यह हमारा, हमारे लिए, हमारे द्वारा बनाया गया राज्य है. लेकिन अगर आप ने इतिहास पढ़ा हो तो आप को पता चलेगा कि राज्य व्यवस्था का निर्माण दरअसल, लोगों के शोषण और उन पर शासन के लिए हुआ था? इसलिए हम जो यह खुशीखुशी वोट देने चल देते हैं, उस का मतलब सिर्फ इतना भर है कि हम अपनी इच्छा से अपना शोषण चुन रहे हैं.’’

नताशा बोलती रही, मैं ने उसे बोलने दिया क्योंकि मेरे टोकने का कोई औचित्य नहीं था और मुझे लगा कि बोल लेने से संभवत: उस का दुख कम होगा.

‘‘आप शायद नहीं जानते कि कल तक हमारे पास 80 हजार रूबल थे, जो हम ने अतिरिक्त काम कर के पेट काटकाट कर, पैदल चल कर, खुद सामान ढो कर और इसी तरह कष्ट उठा कर जमा किए थे. सोचा था कि एक कार खरीदेंगे पर जब उन हरामजादों ने हमारा मकान छीन लिया, तो सोचा कि चलो अभी मकान ही खरीदा जाए,’’ नताशा बातचीत के दौरान निस्संकोच गालियां देती थी जो उस के मुंह से अच्छी भी लगती थीं और उस के दुख की गहराई को भी जाहिर करती थीं, ‘‘पर हमें 2 दिन की देर हो गई और अब पता चला कि देर नहीं हुई, बल्कि देर की गई. हम तो सब पैसा तैयार कर चुके थे. लेकिन मकानमालिक को वह सब पता था, जो हमारे लिए आश्चर्य बन कर आया, इसलिए उस ने पैसा नहीं लिया.’’

नताशा ने रुक कर लंबी सांस ली और आगे कहा, ‘‘आप जानते हैं, यह मुद्रा हृस कब हुआ? यह अचानक नहीं हुआ, उन कुत्तों ने अपने सब रूबल डालर में बदल लिए या संपत्ति खरीद ली और फिर करवा दिया मुद्रा हृस. भुगतें लोग. रोएं अपनी किस्मत को,’’ इतना कह कर वह सचमुच रोने को हो आई, फिर अचानक हंसने लगी. बोली, ‘‘जाने क्यों, मैं, आप को यह सब सुना कर दुखी कर रही हूं,’’ उस ने फिर कहा, ‘‘शायद सहकर्मी होने का फायदा उठा रही हूं. जानते हैं न कि जिन रूबलों से मकान लिया जा सकता था वे अब एक महीने के किराए के लिए भी काफी नहीं हैं.’’

उस ने फीकी हंसी हंस कर फिर कहा, ‘‘और व्यवस्था पूरी थी. बैंक बंद कर दिए गए. लोग बैंकों के सामने लंबी कतारों में घंटों खड़े रहे. किसी को थोड़े रूबल दे दिए गए और फिर बैंकों को दिवालिया घोषित कर दिया गया. लोग सड़कों पर ही बाल नोचते, कपड़े फाड़ते देखे गए. लेकिन किसी का नुकसान ही तो दूसरे का फायदा होगा. यह दुनिया का नियम है.’’ Story In Hindi

Story In Hindi: सूखा पत्ता – क्या संगदिल थी संगीता

Story In Hindi: 6 महीने पहले ही रवि की शादी पड़ोस के एक गांव में रहने वाले रघुवर की बेटी संगीता से हुई थी. उस के पिता मास्टर दयाराम ने खुशी के इस मौके पर पूरे गांव को भोज दिया था. अब से पहले गांव में इतनी धूमधाम से किसी की शादी नहीं हुई थी. मास्टर दयाराम दहेज के लोभी नहीं थे, तभी तो उन्होंने रघुवर जैसे रोज कमानेखाने वाले की बेटी से अपने एकलौते बेटे की शादी की थी. उन्हें तो लड़की से मतलब था और संगीता में वे सारे गुण थे, जो मास्टरजी चाहते थे.

पढ़ाई के बाद जब रवि की कहीं नौकरी नहीं लगी, तो मास्टर दयाराम ने उस के लिए शहर में मोबाइल फोन की दुकान खुलवा दी. शहर गांव से ज्यादा दूर नहीं था. रवि मोटरसाइकिल से शहर आनाजाना करता था. शादी से पहले संगीता का अपने गांव के एक लड़के मनोज के साथ जिस्मानी रिश्ता था. गांव वालों ने उन दोनों को एक बार रात के समय रामदयाल के खलिहान में सैक्स संबंध बनाते हुए रंगे हाथों पकड़ा था.

गांव में बैठक हुई थी. दोनों को आइंदा ऐसी गलती न करने की सलाह दे कर छोड़ दिया गया था. संगीता के मांबाप गरीब थे. 2 बड़ी लड़कियों की शादी कर के उन की कमर पहले ही टूट हुई थी. उन की जिंदगी की गाड़ी किसी तरह चल रही थी.

ऐसे में जब मास्टर दयाराम के बेटे रवि का संगीता के लिए रिश्ता आया, तो उन्हें अपनी बेटी की किस्मत पर यकीन ही नहीं हुआ था. उन्हें डर था कि कहीं गांव वाले मनोज वाली बात मास्टर दयाराम को न बता दें, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ था. वही बहू अब मनोज के साथ घर से भाग गई थी. रवि को फोन कर के बुलाया गया. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उस की बीवी किसी गैर मर्द के साथ भाग सकती है, उस की नाक कटवा सकती है.

‘‘थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई जाए,’’ बिरादरी के मुखिया ने सलाह दी. ‘‘नहीं मुखियाजी…’’ मास्टर दयाराम ने कहा, ‘‘मैं रिपोर्ट दर्ज कराने के हक में नहीं हूं. रिपोर्ट दर्ज कराने से क्या होगा? अगर पुलिस उसे ढूंढ़ कर ले भी आई, तो मैं उसे स्वीकार कैसे कर पाऊंगा.

‘‘गलती शायद हमारी भी रही होगी. मेरे घर में उसे किसी चीज की कमी रही होगी, तभी तो वह सबकुछ ठुकरा कर चली गई. वह जिस के साथ भागी है, उसी के साथ रहे. मुझे अब उस से कोई मतलब नहीं है.’’ ‘‘रवि से एक बार पूछ लो.’’

‘‘नहीं मुखियाजी, मेरा फैसला ही रवि का फैसला है.’’ शहर आ कर संगीता और मनोज किराए का मकान ले कर पतिपत्नी की तरह रहने लगे. संगीता पैसे और गहने ले कर भागी थी, इसलिए उन्हें खर्चे की चिंता न थी. वे खूब घूमते, खूब खाते और रातभर खूब मस्ती करते.

सुबह के तकरीबन 9 बज रहे थे. मनोज खाट पर लेटा हुआ था… तभी संगीता नहा कर लौटी. उस के बाल खुले हुए थे. उस ने छाती तक लहंगा बांध रखा था.

मनोज उसे ध्यान से देख रहा था. साड़ी पहनने के लिए संगीता ने जैसे ही नाड़ा खोला, लहंगा हाथ से फिसल कर नीचे गिर गया. संगीता का बदन मनोज को बेचैन कर गया. उस ने तुरंत संगीता को अपनी बांहों में भर लिया और चुंबनों की बौछार कर दी. वह उसे खाट पर ले आया.

‘‘अरे… छोड़ो न. क्या करते हो? रातभर मस्ती की है, फिर भी मन नहीं भरा तुम्हारा,’’ संगीता कसमसाई. ‘‘तुम चीज ही ऐसी हो जानेमन कि जितना प्यार करो, उतना ही कम लगता है,’’ मनोज ने लाड़ में कहा.

संगीता समझ गई कि विरोध करना बेकार है, खुद को सौंपने में ही समझदारी है. वह बोली, ‘‘अरे, दरवाजा तो बंद कर लो. कोई आ जाएगा.’’ ‘‘इस वक्त कोई नहीं आएगा जानेमन. मकान मालकिन लक्ष्मी सेठजी के घर बरतन मांजने गई है. रही बात उस के पति कुंदन की, तो वह 10 बजे से पहले कभी घर आता नहीं. बैठा होगा किसी पान के ठेले पर. अब बेकार में वक्त बरबाद मत कर,’’ कह कर मनोज ने फिर एक सैकंड की देर नहीं की.

वे प्रेमलीला में इतने मगन थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि बाहर आंगन से कुंदन की प्यासी निगाहें उन्हें देख रही थीं.

दूसरे दिन कुंदन समय से पहले ही घर आ गया. जब से उस ने संगीता को मनोज के साथ बिस्तर पर मस्ती करते देखा था, तभी से उस की लार टपक रही थी. उस की बीवी लक्ष्मी मोटी और बदसूरत औरत थी. ‘‘मनोज नहीं है क्या भाभीजी?’’ मौका देख कर कुंदन संगीता के पास आ कर बोला.

‘‘नहीं, वह काम ढूंढ़ने गया है.’’ ‘‘एक बात बोलूं भाभीजी… तुम बड़ी खूबसूरत हो.’’

संगीता कुछ नहीं बोली. ‘‘तुम जितनी खूबसूरत हो, तुम्हारी प्यार करने की अदा भी उतनी ही खूबसूरत है. कल मैं ने तुम्हें देखा, जब तुम खुल कर मनोज भैया को प्यार दे रही थीं…’’ कह कर उस ने संगीता का हाथ पकड़ लिया, ‘‘मुझे भी एक बार खुश कर दो. कसम तुम्हारी जवानी की, किराए का एक पैसा नहीं लूंगा.’’

‘‘पागल हो गए हो क्या?’’ संगीता ने अपना हाथ छुड़ाया, पर पूरी तरह नहीं. ‘‘पागल तो नहीं हुआ हूं, लेकिन अगर तुम ने खुश नहीं किया तो पागल जरूर हो जाऊंगा,’’ कह कर उस ने संगीता को अपनी बांहों में भर लिया.

‘‘छोड़ो मुझे, नहीं तो शोर मचा दूंगी,’’ संगीता ने नकली विरोध किया. ‘‘शोर मचाओगी, तो तुम्हारा ही नुकसान होगा. शादीशुदा हो कर पराए मर्द के साथ भागी हो. पुलिस तुम्हें ढूंढ़ रही है. बस, खबर देने की देर है.’’

संगीता तैयार होने वाली ही थी कि अचानक किसी के आने की आहट हुई. शायद मनोज था. कुंदन बौखला कर चला गया. मनोज को शक हुआ, पर कुंदन को कुछ कहने के बजाय उस ने उस का मकान ही खाली कर दिया.

उन के पैसे खत्म हो रहे थे. महंगा मकान लेना अब उन के बस में नहीं था. इस बार उन्हें छोटी सी खोली मिली. वह गंगाबाई की खोली थी. गंगाबाई चावल की मिल में काम करने जाती थी. उस का पति एक नंबर का शराबी था. उस के कोई बच्चा नहीं था.

मनोज और संगीता जवानी के खूब मजे तो ले रहे थे, पर इस बीच मनोज ने यह खयाल जरूर रखा कि संगीता पेट से न होने पाए. पैसे खत्म हो गए थे. अब गहने बेचने की जरूरत थी. सुनार ने औनेपौने भाव में उस के गहने खरीद लिए. मनोज को कपड़े की दुकान में काम मिला था, पर किसी बात को ले कर सेठजी के साथ उस का झगड़ा हो गया और उन्होंने उसे दुकान से निकाल दिया.

उस के बाद तो जैसे उस ने काम पर न जाने की कसम ही खा ली थी. संगीता काम करने को कहती, तो वह भड़क जाता था. संगीता गंगाबाई के कहने पर उस के साथ चावल की मिल में जाने लगी. सेठजी संगीता से खूब काम लेते, पर गंगाबाई को आराम ही आराम था.

वजह पूछने पर गंगाबाई ने बताया कि उस का सेठ एक नंबर का औरतखोर है. जो भी नई औरत काम पर आती है, वह उसे परेशान करता है. अगर तुम्हें भी आराम चाहिए, तो तुम भी सेठजी को खुश कर दो. ‘‘इस का मतलब गंगाबाई तुम भी…’’ संगीता ने हैरानी से कहा.

‘‘पैसों के लिए इनसान को समझौता करना पड़ता है. वैसे भी मेरा पति ठहरा एक नंबर का शराबी. उसे तो खुद का होश नहीं रहता, मेरा क्या खयाल करेगा. उस से न सही, सेठ से सही…’’ संगीता को गंगाबाई की बात में दम नजर आया. वह पराए मर्द के प्यार के चक्कर में भागी थी, तो किसी के भी साथ सोने में क्या हर्ज?

अब सेठ किसी भी बहाने से संगीता को अपने कमरे में बुलाता और अपनी बांहों में भर कर उस के गालों को चूम लेता. संगीता को यह सब अच्छा न लगता. उस के दिलोदिमाग पर मनोज का नशा छाया हुआ था. वह सोचती कि काश, सेठ की जगह मनोज होता. पर अब तो वह लाचार थी. उस ने समझौता कर लिया था. कई बार वह और गंगाबाई दोनों सेठ को मिल कर खुश करती थीं. फिर भी उन्हें पैसे थोड़े ही मिलते. सेठ ऐयाश था, पर कंजूस भी.

एक दिन मनोज बिना बताए कहीं चला गया. संगीता उस का इंतजार करती रही, पर वह नहीं आया. जिस के लिए उस ने ऐशोआराम की दुनिया ठुकराई, जिस के लिए उस ने बदनामी झेली, वही मनोज उसे छोड़ कर चला गया था. संगीता पुरानी यादों में खो गई. मनोज संगीता के भैया नोहर का जिगरी दोस्त था. उस का ज्यादातर समय नोहर के घर पर ही बीतता था. वे दोनों राजमिस्त्री का काम करते थे. छुट्टी के दिन जीभर कर शराब पीते और संगीता के घर मुरगे की दावत चलती.

मनोज की बातबात में खिलखिला कर हंसने की आदत थी. उस की इसी हंसी ने संगीता पर जादू कर दिया था. दोनों के दिल में कब प्यार पनपा, पता ही नहीं चला. संगीता 12वीं जमात तक पढ़ चुकी थी. उस के मांबाप तो उस की पढ़ाई 8वीं जमात के बाद छुड़ाना चाहते थे, पर संगीता के मामा ने जोर दे कर कहा था कि भांजी बड़ी खूबसूरत है. 12वीं जमात तक पढ़ लेगी, तो किसी अच्छे घर से रिश्ता आ जाएगा.

पढ़ाई के बाद संगीता दिनभर घर में रहती थी. उस का काम घर का खाना बनाना, साफसफाई करना और बरतन मांजना था. मांबाप और भैया काम पर चले जाते थे. नोहर से बड़ी 2 और बहनें थीं, जो ब्याह कर ससुराल चली गई थीं. एक दिन मनोज नशे की हालत में नोहर के घर पहुंच गया. दोपहर का समय था. संगीता घर पर अकेली थी. मनोज को इस तरह घर में आया देख संगीता के दिल की धड़कन तेज हो गई.

उन्होंने इस मौके को गंवाना ठीक नहीं समझा और एकदूसरे के हो गए. इस के बाद उन्हें जब भी समय मिलता, एक हो जाते. एक दिन नोहर ने उन दोनों को रंगे हाथों पकड़ लिया. घर में खूब हंगामा हुआ, लेकिन इज्जत जाने के डर से संगीता के मांबाप ने चुप रहने में ही भलाई समझी, पर मनोज और नोहर की दोस्ती टूट गई.

संगीता और मनोज मिलने के बहाने ढूंढ़ने लगे, पर मिलना इतना आसान नहीं था. एक दिन उन्हें मौका मिल ही गया और वे दोनों रामदयाल के खलिहान में पहुंच गए. वे दोनों अभी दीनदुनिया से बेखबर हो कर एकदूसरे में समाए हुए थे कि गांव के कुछ लड़कों ने उन्हें पकड़ लिया.

समय गुजरा और एक दिन मास्टर दयाराम ने अपने बेटे रवि के लिए संगीता का हाथ मांग लिया. दोनों की शादी बड़ी धूमधाम से हो गई.

संगीता ससुराल आ गई, पर उस का मन अभी भी मनोज के लिए बेचैन था. पति के घर की सुखसुविधाएं उसे रास नहीं आती थीं. दोनों के बीच मोबाइल फोन से बातचीत होने लगी. संगीता की सास जब अपने गांव गईं, तो उस ने मनोज को फोन कर के बुला लिया और वे दोनों चुपके से निकल भागे.

अब संगीता पछतावे की आग में झुलस रही थी. उसे अपनी करनी पर गुस्सा आ रहा था. गरमी का मौसम था. रात के तकरीबन 10 बज रहे थे. उसे ससुराल की याद आ गई. ससुराल में होती, तो वह कूलर की हवा में चैन की नींद सो रही होती. पर उस ने तो अपने लिए गड्ढा खोद लिया था.

उसे रवि की याद आ गई. कितना अच्छा था उस का पति. किसी चीज की कमी नहीं होने दी उसे. पर बदले में क्या दिया… दुखदर्द, बेवफाई. संगीता सोचने लगी कि क्या रवि उसे माफ कर देगा? हांहां, जरूर माफ कर देगा. उस का दिल बहुत बड़ा है. वह पैर पकड़ कर माफी मांग लेगी. बहुत दयालु है वह. संगीता ने अपनी पुरानी दुनिया में लौटने का मन बना लिया.

‘‘गंगाबाई, मैं अपने घर वापस जा रही हूं. किराए का कितना पैसा हुआ है, बता दो?’’ संगीता ने कहा. ‘‘संगीता, मैं ने तुम्हें हमेशा छोटी बहन की तरह माना है. मैं तेरी परेशानी जानती हूं. ऐसे में मैं तुम से पैसे कैसे ले सकती हूं. मैं भी चाहती हूं कि तू अपनी पुरानी दुनिया में लौट जा. मेरा आशीर्वाद है कि तू हमेशा सुखी रहे.’’

मन में विश्वास और दिल के एक कोने में डर ले कर जब संगीता बस से उतरी, तो उस का दिल जोर से धड़क रहा था. वह नहीं चाहती थी कि कोई उसे पहचाने, इसलिए उस ने साड़ी के पल्लू से अपना सिर ढक लिया था. जैसे ही वह घर के पास पहुंची, उस के पांव ठिठक गए. रवि ने उसे अपनाने से इनकार कर दिया तो… उस ने उस दोमंजिला पक्के मकान पर एक नजर डाली. लगा जैसे अभीअभी रंगरोगन किया गया हो. जरूर कोई मांगलिक कार्यक्रम वगैरह हुआ होगा.

‘‘बहू…’’ तभी संगीता के कान में किसी औरत की आवाज गूंजी. वह आवाज उस की सास की थी. उस का दिल उछला. सासू मां ने उसे घूंघट में भी पहचान लिया था. वह दौड़ कर सासू मां के पैरों में गिरने को हुई, लेकिन इस से पहले ही उस की सारी खुशियां पलभर में गम में बदल गईं. ‘‘बहू, रवि को ठीक से पकड़ कर बैठो, नहीं तो गिर जाओगी.’’

संगीता ने देखा, रवि मोटरसाइकिल पर सवार था और पीछे एक औरत बैठी हुई थी. संगीता को यह देख कर धक्का लगा. इस का मतलब रवि ने दूसरी शादी कर ली. उस का इंतजार भी नहीं किया.

इस से पहले कि वह कुछ सोच पाती, मोटरसाइकिल फर्राटे से उस के बगल से हो कर निकल गई. संगीता ने उन्हें देखा. वे दोनों बहुत खुश नजर आ रहे थे.

तभी वहां एक साइकिल सवार गुजरा. संगीता ने उसे रोका, ‘‘चाचा, अभी रवि के साथ मोटरसाइकिल पर बैठ कर गई वह औरत कौन है?’’ ‘‘अरे, उसे नहीं जानती बेटी? लगता है कि इस गांव में पहली बार आई हो. वह तो रवि बाबू की नईनवेली दुलहन है.’’

‘‘नईनवेली दुलहन?’’ ‘‘हां बेटी, वह रवि बाबू की दूसरी पत्नी है. पहली पत्नी बड़ी चरित्रहीन निकली. अपने पुराने प्रेमी के साथ भाग गई. वह बड़ी बेहया थी. इतने अच्छे परिवार को ठोकर मार कर भागी है. कभी सुखी नहीं रह पाएगी,’’ इतना कह कर वह साइकिल सवार आगे बढ़ गया.

संगीता को लगा, उस के पैर तले की जमीन खिसक रही है और वह उस में धंसती चली जा रही है. अब उस से एक पल भी वहां रहा नहीं गया. जिस दुनिया में लौटी थी, वहां का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो चुका था. उसे चारों तरफ अंधेरा नजर आने लगा था. तभी संगीता को अंधेरे में उम्मीद की किरण नजर आने लगी… अपना मायका. सारी दुनिया भले ही उसे ठुकरा दे, पर मायका कभी नहीं ठुकरा सकता. भारी मन लिए वह मायके के लिए निकल पड़ी.

किवाड़ बंद था. संगीता ने दस्तक दी. मां ने किवाड़ खोला. ‘‘मां…’’ वह जैसे ही दौड़ कर मां से लिपटने को हुई, पर मां के इन शब्दों ने उसे रोक दिया, ‘‘अब यहां क्या लेने आई है?’’

‘‘मां, मैं यहां हमेशा के लिए रहने आई हूं.’’ ‘‘हमारी नाक कटा कर भी तुझे चैन नहीं मिला, जो बची इज्जत भी नीलाम करने आई है. यह दरवाजा अब तेरे लिए हमेशा के लिए बंद हो चुका है.’’

‘‘नहीं मां….’’ वह रोने लगी, ‘‘ऐसा मत कहो.’’ ‘‘तू हम सब के लिए मर चुकी है. अच्छा यह है कि तू कहीं और चली जा,’’ कह कर मां ने तुरंत किवाड़ बंद कर दिया.

संगीता किवाड़ पीटने लगी और बोली, ‘‘दरवाजा खोलो मां… दरवाजा खोलो मां…’’ पर मां ने दरवाजा नहीं खोला. भीतर मां रो रही थी और बाहर बेटी.

संगीता को लगा, जैसे उस का वजूद ही खत्म हो चुका है. उस की हालत पेड़ से गिरे सूखे पत्ते जैसी हो गई है, जिसे बरबादी की तेज हवा उड़ा ले जा रही है. दूर, बहुत दूर. इस सब के लिए वह खुद ही जिम्मेदार थी. उस से अब और आगे बढ़ा नहीं गया. वह दरवाजे के सामने सिर पकड़ कर बैठ गई और सिसकने लगी. अब गंगाबाई के पास लौटने और सेठ को खुश रखने के अलावा कोई चारा नहीं था… पर कब तक? Story In Hindi

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