जीजा के प्यार का रस : भाग 2

चंचल और हसीन सोनम को रोकनेटोकने वाला अब कोई नहीं था. पति के जाते ही वह बनसंवर कर घर के बाहर ताकझांक करने लगती. हालांकि वह 2 बेटियों की मां बन चुकी थी. लेकिन उस की उम्र का अंदाजा लगाना मुश्किल था.

सोनम के घर कमलेश का आनाजाना था. वह सोनम की फुफेरी बहन दीपिका का पति था. कमलेश मूलरूप से महाराजगंज (रायबरेली) का रहने वाला था, लेकिन कानपुर शहर में रानीगंज (काकादेव) मोहल्ले में रहता था. वह शटरिंग का काम करता था.

कमलेश और सोनम का रिश्ता जीजासाली का था. इस नाते वह सोनम से हंसीमजाक व छेड़छाड़ भी कर लेता था. सोनम उस की हंसीमजाक का बुरा नहीं मानती थी, बल्कि वह खुद भी उस से छेड़छाड़ व मजाक करती थी.सोनम को कमलेश की लच्छेदार बातें भी बहुत पसंद आती थीं, इसलिए वह भी उस से खूब बतियाती थी. दरअसल, दोनों के दिलों में एकदूसरे के प्रति चाहत पैदा हो गई थी. कमलेश जब भी उस के रूपसौंदर्य की तारीफ करता था तो सोनम के शरीर में अलग तरह की तरंगे उठने लगती थीं.

2 बच्चों की मां बनने के बाद सोनम के रूपलावण्य में और भी निखार आ गया था. उस का गदराया यौवन और भी रसीला हो गया था. झील सी गहरी आंखों में मादकता छलकती थी. संतरे की फांकों जैसे अधरों में ‘शहद जैसा द्रव्य’ समा गया था. सुराहीदार गरदन के नीचे नुकीले शिखर किसी को भी आकर्षित करने के लिए पर्याप्त थे. उस की नागिन सी लहराती काली चोटी सदैव नितंबों को चूमती
रहती थी.

घर आतेजाते कमलेश अकसर सोनम के रूपलावण्य की तारीफ करता था. किसी मर्द के मुंह से अपनी तारीफ सुनना हर औरत की सब से बड़ी कमजोरी होती है. सोनम से भी रहा नहीं गया.
कमलेश ने एक रोज उस के हुस्न और जिस्म की तारीफ की तो वह फूल कर गदगद हो गई. फिर वह बुझे मन से बोली, ‘‘ऐसी खूबसूरती किस काम की, जिस की तरफ पति ध्यान ही न दे.’’
कमलेश को सोनम की किसी ऐसी ही कमजोर नस की तलाश थी. जैसे ही उस ने अपने पति की बेरुखी का बखान किया, कमलेश ने उस का हाथ थाम लिया, ‘‘तुम चिंता क्यों करती हो, हीरे की परख जौहरी ही करता है. आज से तुम्हारे दुख मेरे हैं और मेरी सारी खुशियां तुम्हारी.’’

कमलेश की लच्छेदार बातों ने सोनम का मन मोह लिया. वह उस की बातों और उस के व्यक्तित्व की पूरी तरह कायल हो गई. अंदर ही अंदर उस के दिल की धड़कनें बढ़ गईं. आखिर में मन बेकाबू होने लगा तो सोनम ने कांपते होंठों से कहा, ‘‘अब तुम जाओ, उस के आने का समय हो गया है. कल दोपहर में आना. मैं इंतजार करूंगी.’’

कमलेश ने वह रात करवटें बदलते काटी. सारी रात वह सोनम के खयालों में डूबा रहा. सुबह वह देर से जागा. दोपहर होतेहोते वह सजसंवर कर सोनम के घर जा पहुंचा. सोनम उसी का इंतजार कर रही थी. उस ने उस दिन खुद को कुछ विशेष ढंग से सजायासंवारा था. कमलेश ने पहुंचते ही सोनम को अपनी बांहों में समेट लिया, ‘‘आज तो तुम इंद्र की परी लग रही हो, जी चाहता है नजर न हटाऊं.’’
‘‘थोड़ा सब्र से काम लो जीजाजी. इतनी बेसब्री ठीक नहीं होती,’’ सोनम ने मुसकरा कर कहा, ‘‘कम से कम दरवाजा भीतर से बंद कर लो, वरना किसी आनेजाने वाले की नजर पड़ गई तो हंगामा बरप जाएगा.’’

कमलेश ने फौरन घर का दरवाजा भीतर से बंद कर लिया. फिर बेकरार कमलेश ने सोनम को गोद में उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया. सोनम ने भी कस कर उसे जकड़ लिया. कमलेश की गर्म बांहों में गजब का जोश था. आनंद का मोती पाने के लिए वह सोनम के शबाब के सागर में गहरे उतरता चला गया.

जीजा के जोश से सोनम निहाल हो गई. उस ने भी जीजा का उत्साह बढ़ाते हुए अपना बदन उस से रगड़ना शुरू कर दिया. कमलेश का तूफान जब थमा तो सोनम के चेहरे पर असीम तृप्ति थी. सोनम ने कभी पति से ऐसी संतुष्टि नहीं पाई थी, जैसी जीजा से पाई.

सोनम से नशीला सुख पा कर कमलेश फूला नहीं समा रहा था. सोनम भी सैक्स का साथी पा कर खुश थी. बस, उस रोज से दोनों के बीच वासना का खेल अकसर खेला जाने लगा. अब कमलेश अकसर सोनम से मिलन करने आने लगा. सोनम के लिए अब पति का कोई महत्त्व नहीं
रह गया, क्योंकि सैक्स का साथी जीजा बन गया.

सोनम के पति सर्वेश और कमलेश में खूब पटती थी. रविवार के दिन जब सर्वेश की दुकान बंद रहती तो कमलेश शराब की बोतल ले कर सर्वेश के घर आ जाता फिर दोनों की महफिल जमती. सोनम भी उन का साथ देती.
कमलेश सोनम से खुल कर हंसीमजाक करता. जीजासाली का रिश्ता था, अत: सर्वेश ने कभी आपत्ति नहीं की. मजाकमजाक में कमलेश रिश्ते की हद भी पार कर जाता, लेकिन सर्वेश खुल कर उस का विरोध नहीं कर सका.

साढ़ू के नाजुक रिश्ते की उस ने हमेशा मर्यादा बनाए रखने की कोशिश की थी. लेकिन सोनम थी कि उसे जरा भी इस की परवाह नहीं थी. वह खुल कर कमलेश के उल्टेसीधे मजाकों के जवाब देती और उस से घुलमिल कर तरहतरह की बातें करती.सर्वेश ने कई बार सोनम को उस की हरकतों के लिए आगाह किया, लेकिन वह हर बार सर्वेश को अपनी लागीलिपटी बातों से फुसला लेती.

सुगंध – भाग 2 : क्या राजीव को पता चली रिश्तों की अहमियत

हमारी दोस्ती की नींव मजबूत थी इसलिए दिलों का प्यार तो बना रहा पर मिलनाजुलना काफी कम हो गया. उस का जिन लोगों के साथ उठनाबैठना था, वे सब खानेपीने वाले लोग थे. उस तरह की सोहबत को मैं ठीक नहीं मानता था और इसीलिए हम कम मिलते.

हम दोनों की शादी साथसाथ हुई और इत्तफाक से पहले बेटी और फिर बेटा भी हम दोनों के घर कुछ ही आगेपीछे जन्मे.

चोपड़ा ने 3 साल पहले अपनी बेटी की शादी एक बड़े उद्योगपति खानदान में अपनी दौलत के बल पर की. मेरी बेटी ने अपने सहयोगी डाक्टर के साथ प्रेम विवाह किया. उस की शादी में मैं ने चोपड़ा की बेटी की शादी में आए खर्चे का शायद 10वां हिस्सा ही लगाया होगा.

रुपए को अपना भगवान मानने वाले चोपड़ा का बेटा नवीन कालिज में आने तक एक बिगड़ा हुआ नौजवान बन गया था. उस की मेरे बेटे विवेक से अच्छी दोस्ती थी क्योंकि उस की मां सविता मेरी पत्नी मीनाक्षी की सब से अच्छी सहेली थी. इन दोनों नौजवानों की दोस्ती की मजबूत नींव भी बचपन में ही पड़ गई थी.

‘नवीन गलत राह पर चल रहा है,’ मेरी ऐसी सलाह पर चोपड़ा ने कभी ध्यान नहीं दिया था.

‘बाप की दौलत पर बेटा क्यों न ऐश करे? तू भी विवेक के साथ दिनरात की टोकाटाकी वाला व्यवहार मत किया कर, डाक्टर. अगर वह पढ़ाई में पिछड़ भी गया तो कोई फिक्र नहीं. उसे कोई अच्छा बिजनेस मैं शुरू करा दूंगा,’’ अपनी ऐसी दलीलों से वह मुझे खीज कर चुप हो जाने को मजबूर कर देता.

आज इस करोड़पति इनसान का इकलौता बेटा 2 कमरों के एक साधारण से किराए वाले फ्लैट में अपनी पत्नी शिखा के साथ रह रहा था. नर्सिंग होम से सीधे घर न जा कर मैं उसी के फ्लैट पर पहुंचा.

नवीन और शिखा दोनों मेरी बहुत इज्जत करते थे. इन दोनों ने प्रेम विवाह किया था. साधारण से घर की बेटी को चोपड़ा ने अपनी बहू बनाने से साफ मना कर दिया, तो इन्होंने कोर्ट मैरिज कर ली थी.

चोपड़ा की नाराजगी को नजरअंदाज करते हुए मैं ने इन दोनों का साथ दिया था. इसी कारण ये दोनों मुझे भरपूर सम्मान देते थे.

चोपड़ा को दिल का दौरा पड़ने की चर्चा शुरू हुई, तो नवीन उत्तेजित लहजे में बोला, ‘‘चाचाजी, यह तो होना ही था.’’ रोजरोज की शराब और दौलत कमाने के जनून के चलते उन्हें दिल का दौरा कैसे न पड़ता?

‘‘और इस बीमार हालत में भी उन का घमंडी व्यवहार जरा भी नहीं बदला है. शिखा उन से मिलने पहुंची तो उसे डांट कर कमरे से बाहर निकाल दिया. उन के जैसा खुंदकी और अकड़ू इनसान शायद ही दूसरा हो.’’

‘‘बेटे, बड़ों की बातों का बुरा नहीं मानते और ऐसे कठिन समय में तो उन्हें अकेलापन मत महसूस होने दो. वह दिल का बुरा नहीं है,’’ मैं उन्हें देर तक ऐसी बातें समझाने के बाद जब वहां से उठा तो मन बड़ा भारी सा हो रहा था.

चोपड़ा ने यों तो नवीन को पूरी स्वतंत्रता से ऐश करने की छूट हमेशा दी, पर जब दोनों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हुई तो बाप ने बेटे को दबा कर अपनी चलानी चाही थी.

जिस घटना ने नवीन के जीवन की दिशा को बदला, वह लगभग 3 साल पहले घटी थी.

उस दिन मेरे बेटे विवेक का जन्मदिन था. नवीन उसे नए मोबाइल फोन का उपहार देने के लिए अपने साथ बाजार ले गया.

वहां दौलत की अकड़ से बिगडे़ नवीन की 1 फोन पर नीयत खराब हो गई. विवेक के लिए फोन खरीदने के बाद जब दोनों बाहर निकलने के लिए आए तो शोरूम के सुरक्षा अधिकारी ने उसे रंगेहाथों पकड़ जेब से चोरी का मोबाइल बरामद कर लिया.

‘गलती से फोन जेब में रह गया है. मैं ऐसे 10 फोन खरीद सकता हूं. मुझे चोर कहने की तुम सब हिम्मत कैसे कर रहे हो,’ गुस्से से भरे नवीन ने ऐसा आक्रामक रुख अपनाया, पर वे लोग डरे नहीं.

मामला तब ज्यादा गंभीर हो गया जब नवीन ने सुरक्षा अधिकारी पर तैश में आ कर हाथ छोड़ दिया.

उन लोगों ने पहले जम कर नवीन की पिटाई की और फिर पुलिस बुला ली. बीचबचाव करने का प्रयास कर रहे विवेक की कमीज भी इस हाथापाई में फट गई थी.

पुलिस दोनों को थाने ले आई. वहीं पर चोपड़ा और मैं भी पहुंचे. मैं सारा मामला रफादफा करना चाहता था क्योंकि विवेक ने सारी सचाई मुझ से अकेले में बता दी थी, लेकिन चोपड़ा गुस्से से पागल हो रहा था. उस के मुंह से निकल रही गालियों व धमकियों के चलते मामला बिगड़ता जा रहा था.

उस शोरूम का मालिक भी रुतबेदार आदमी था. वह चोपड़ा की अमीरी से प्रभावित हुए बिना पुलिस केस बनाने पर तुल गया.

एक अच्छी बात यह थी कि थाने का इंचार्ज मुझे जानता था. उस के परिवार के लोग मेरे दवाखाने पर छोटीबड़ी बीमारियों का इलाज कराने आते थे.

उस की आंखों में मेरे लिए शर्मलिहाज के भाव न होते तो उस दिन बात बिगड़ती ही चली जाती. वह चोपड़ा जैसे घमंडी और बदतमीज इनसान को सही सबक सिखाने के लिए शोरूम के मालिक का साथ जरूर देता, पर मेरे कारण उस ने दोनों पक्षों को समझौता करने के लिए मजबूर कर दिया.

हां, इतना उस ने जरूर किया कि उस के इशारे पर 2 सिपाहियों ने अकेले में नवीन की पिटाई जरूर की.

‘बाप की दौलत का तुझे ऐसा घमंड है कि पुलिस का खौफ भी तेरे मन से उठ गया है. आज चोरी की है, कल रेप और मर्डर करेगा. कम से कम इतना तो पुलिस की आवभगत का स्वाद इस बार चख जा कि कल को ज्यादा बड़ा अपराध करने से पहले तू दो बार जरूर सोचे.’

मेरे बेटे की मौजूदगी में उन 2 पुलिस वालों ने नवीन के मन में पुलिस का डर पैदा करने के लिए उस की अच्छीखासी धुनाई की थी.

गे संबंधों का लव ट्रायएंगल

बीड़ी वाले का लड़का : भाग 1

दोस्ती क्या है? दोस्ती किसी कहानी के उन खयालों की तरह है, जिस के एकएक पैराग्राफ एकदूसरे से जुड़े रहते हैं. एक भी पैराग्राफ छूटा, तो आगे की कहानी समझना बहुत मुश्किल है. उस दोस्ती में से कुछ दोस्त पैराग्राफ के उन मुश्किल पर्यायवाची शब्दों की तरह होते हैं, जिन्हें याद रखने की कोशिश करतेकरते हम भूलते चले जाते हैं. जिंदगी हमें इतना परेशान करती है कि उन की यादें धुंधली हो जाती हैं. फिर कभी कहीं किसी रोज उन का जिक्र आ जाने से या किसी के द्वारा उन की बात छेड़ देने से उन की यादें उन पर्यायवाची शब्दों की तरह ताजा हो जाती हैं.

ऐसा ही एक दोस्त था. कहां से शुरू करूं उस के बारे में… धुंधलीधुंधली सी यादें हैं उस की… एक साधारण सा दुबलापतला हाफ पैंट में लड़का, जिस के लंबे घने बाल, जिन में सरसों का तेल लगा रहता था और पूरे चिपकू के जैसे अपने बालों को चिपका कर रखता था. उस के घर वाले कहते थे कि पढ़ने में बहुत ही होशियार है, इसलिए गांव से शहर ले आए हैं. यहां अच्छी पढ़ाई मिलेगी, तो शायद कुछ कर ले. एकदम गुमसुम और खामोश… शायद कुछ छूट गया हो या खो गया हो.

गांव से शहर आने की वजह से उसे बगैर किसी काम के घर से बाहर निकलने की इजाजत नहीं थी, पर धीरेधीरे उस का बाहर निकलना शुरू हुआ. कभी मसजिद में नमाज पढ़ने जाने, तो कभी कुछ राशन लाने या फिर दुकान पर बीड़ी पहुंचाने के बहाने से. कुछ दिनों के बाद वह हाफ पैंट छोड़ लुंगी पहनने लगा, जिसे देख कर महल्ले के सारे हमउम्र लड़के उस का मजाक उड़ाने लगे. इतनी कम उम्र में लुंगी पहनने की वजह से पूरे महल्ले के लोग उसे पहचानने लगे थे.

उस की उम्र का कोई भी लड़का लुंगी नहीं पहनता था. इस लुंगी की वजह से मसजिद में उस के हमउम्र बच्चे उसे परेशान भी करने लगे थे. सब उसे ‘देहाती’ कह कर चिढ़ाते थे. मसजिदों में बच्चों की शफ में नमाज कम शैतानियां ज्यादा होती हैं और इसी वजह से एक दिन मामला मारपीट तक आ पहुंचा, तब से वह नमाज के लिए बड़ों की शफ में खड़ा होने लगा. इन्हीं सब वजहों से महल्ले में उस की न किसी से कोई बातचीत होती थी और न ही किसी से दोस्ती हो पाई थी सिवा मेरे. मैं उसे अपना दोस्त मानता तो था, पर शायद वह नहीं. वजह आज तक मेरी समझ से परे है.

 

Hindi Story: कर्ज – संजय किस बात को लेकर खुश था

Hindi Story: होस्टल में आज जश्न का माहौल था. आखिर मैडिकल की पढ़ाई पूरी कर के सब डाक्टर जो बन गए थे. संजय तो बहुत ज्यादा खुश था. डाक्टर की डिगरी पाना उस के लिए सपने से कम नहीं था. गांव के जिस छोटी सोच से भरे माहौल में वह पलाबढ़ा थावहां डाक्टरी की पढ़ाई करना ही अपनेआप में बड़ी कामयाबी थी.

यह सब तो उस के पिता की मेहनत का नतीजा था. वे चाहते थे कि उन के बीच से ही कोई डाक्टर हो कर समाज के गरीब लोगों को अच्छा इलाज मुहैया करा सके.

‘‘अरे डाक्टर संजयतुम यहां अकेले और उदास क्यों बैठे होआज तो तुम्हारे और हम सब के लिए सब से बड़ी खुशी का दिन है. हमारे सपने जो पूरे होने जा रहे हैं,’’ पढ़ाई के दौरान उस की सब से अच्छी दोस्त रही भूमिका ने कहा.

संजय भूमिका के सवाल पर मुसकरा दिया. वह उस हाल के बाहर गलियारे में अकेला बैठा थाताकि कोई उसे न देख पाए. वह खुशी उस अकेले की नहीं थीबल्कि उस में उस के परिवारगांव के सब दोस्तआसपड़ोस में रहने वाले उन सब लोगों का हिस्सा थीजिन्होंने उस के दाखिले में अपना योगदान दिया था.

‘‘अब चलो भी. पार्टी खत्म होने वाली है. इस के बाद सब लोग बैठ कर अपनी आने वाली जिंदगी पर चर्चा करेंगे. आज इकट्ठा बैठने का आखिरी दिन जो है,’’ संजय को चुप देख कर भूमिका ने फिर कहा.

संजय आटोमैटिक मशीन सा उठ कर भूमिका के साथ हो लिया.

सब लोग हाल में एक जगह कुरसियां डाल कर बैठे थे. पार्टी शायद खत्म हो गई थी. सब को घर जाने की जल्दी जो थी. संजय को उन से भी ज्यादा जल्दी थी.

‘‘अरे आओ डाक्टर संजय…’’ क्लास में हमेशा कोई न कोई परेशानी का सबब रहे विकी ने कुरसी से उठा कर स्वागत के अंदाज में कहा, ‘‘आप ने पार्टी में शिरकत नहीं कीइस का हमें दुख है. क्या यह क्लास में की गई हमारी सब गलत हरकतों की सजा थीजो हमारी क्लास के टौपर ने हमें अपनी कंपनी के काबिल नहीं समझा?’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तो बस इस खुशी के पल पर यकीन लाने की कोशिश कर रहा था,’’ संजय ने यह बात बड़ी गंभीरता के साथ कही.

‘‘आज से हम सब के रास्ते अलग होंगे. मैं सब लोगों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूं और एक आग्रह करता हूं कि हम जहां रहेंसाथ गुजारे

इन 4 सालों को न भूलें. कोई भी मौका मिले तो सैलिब्रेट करें,’’ विकी ने कहाजिस पर सब ने तालियां बजा कर उस की बात का समर्थन कियाफिर सब

उठ कर अपनेअपने कमरे की तरफ चल दिए अपना सामान समेट कर घर जाने

के लिए.

संजय अपना बैग उठा कर कमरे से बाहर आयातो अर्जुन उस के साथ

हो लिया.

‘‘तुम तो बाहर किसी अच्छे देश में सैटल हो जाओगे. भूल मत जाना. फोन करूंगा तो उठा लिया करना,’’ अर्जुन ने संजय से कहा. वह क्लास का सब से कमजोर स्टूडैंट थामगर बेहद सज्जन और मिलनसार भी था.

‘‘तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि तुम्हें ही फोन करने की जरूरत पड़ेगी. मैं ही फोन कर के तुम्हारा हालचाल पूछता रहूंगा,’’ कह कर संजय हंस दिया.

संजय बाहर आया. भूमिका गर्ल्स होस्टल से अपना सामान उठाए उस का इंतजार कर रही थी.

भूमिका के लिए आज का दिन दोगुनी खुशी ले कर आया था. एक तो वह खुद डाक्टर होने जा रही थीऊपर से उस के बैच का सब से अव्वल रहा लड़का उस का मंगेतर था. दोपहर को जब उस ने ये दोनों बातें फोन पर अपने पापा को बताई थींतो उन्होंने संजय

को घर चाय पर ले कर आने को कह दिया था.

भूमिका और संजय एकसाथ मैट्रो स्टेशन पहुंचे. संजय दिल्ली रेलवे स्टेशन जाने वाली साइड के प्लेटफार्म पर जाने लगातो भूमिका ने उसे रोक दिया और बोली, ‘‘पापातुम से मिलना चाहते हैं.’’

‘‘मैं घर के लिए लेट हो जाऊंगा. बहुत दूर जाना है,’’ संजय ने मजबूरी जाहिर की.

‘‘बस थोड़ी देर की ही तो बात है,’’ भूमिका ने कहा.

‘‘ठीक है,’’ कुछ सोच कर संजय ने कहाफिर वे दोनों मैट्रो में सवार हो कर फरीदाबाद पहुंच गए.

भूमिका के पिता सैशन कोर्ट में रजिस्ट्रार थे. उन का घर बेहद आलीशान था. वे घर पहुंचे तो भूमिका की फैमिली ने उन दोनों का गर्मजोशी के साथ

स्वागत किया.

‘‘भूमिका तुम्हारी बहुत तारीफ किया करती हैखासतौर से तुम्हारे अच्छे बरताव और पढ़ने के जुनून के बारे में,’’ चाय पीते हुए भूमिका के पापा ने कहा.

‘‘तुम क्लास में अव्वल आए हो. तुम कहां जा कर काम करना चाहोगेयह पसंद करने के लिए आजाद हो.

‘‘भूमिका हमेशा से अमेरिका में बसना चाहती थी. हालांकि यह इतने अच्छे नंबर नहीं ला पाईफिर भी मैं ने अपने लैवल पर इंतजाम किया है. वहां के एक अच्छे लैवल के हौस्पिटल में

30 लाख के पैकेज पर इसे रख लिया जाएगा. तुम चाहोगे तो वे तुम्हारी शर्तों पर रखने को तैयार हो जाएंगे,’’ उन्होंने गंभीरता से कहा.

संजय ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘मैं खुश हूं कि मेरी सारी चिंताएं खत्म हो गईं. वैसेकब जाने का इरादा है तुम्हारा?’’ भूमिका के पापा ने पूछा.

‘‘मैं पहले अपने गांव जाना चाहता हूं?’’ संजय ने धीरे से कहा.

‘‘ओह कम औन संजयगांव में क्या रखा है. क्यों नहीं मम्मीपापा को यहीं बुला लो. अब तो तुम कहीं भी रहना अफोर्ड कर सकते हो. भूल जाओ उस गंदगी से भरी गांव की जिंदगी को,’’ भूमिका की आवाज में हिकारत का

भाव था.

‘‘कैसे भूल जाऊं…’’ संजय ने जैसे अपनेआप से कहा, ‘‘जिस दिन मैं दिल्ली डाक्टर बनने के लिए आया थातब पूरे गांव में उत्सव का माहौल था. लोगों ने उम्मीद की थी कि अब कोई बीमार होगातो इलाज के लिए बहुत दूर शहर न जाना पड़ेगा. कोई बीमार होगा तो यह डर न रहेगा कि उस का बच जाना नामुमकिन है.

‘‘आज पापा का फोन आयातो उन्होंने यह सुन कर कि मैं ने डाक्टर की पढ़ाई पूरी कर ली हैसरपंच से पैसे उधार लिए हैंताकि मेरे लिए क्लिनिक का इंतजाम हो सके. मैं उन की उम्मीद हूंक्या फिर भी गांव न जाऊं?’’

‘‘तो क्या विदेश जाने का इरादा नहीं है?’’ भूमिका के पापा ने सवाल किया.

‘‘जब मेरे पास दाखिले के पैसे नहीं थेतब गांव के सब लोगों ने मिल कर जमा किए थे. दिल्ली आने का भाड़ा नहीं था तो बिरजू चाचा ने टिकट का इंतजाम कियाक्योंकि एक महामारी में बिना इलाज के उन्होंने अपना एकलौता जवान बेटा खो दिया था. मेरी पढ़ाई और कामयाबी में विदेश की जरा सी भूमिका नहीं है.’’

‘‘गांव में रहोगे तो न अच्छा

घर खरीद पाओगे और न ही गाड़ी. जिंदगी बरबाद हो जाएगी,’’ भूमिका के पापा बोले.

चाय खत्म हो गई थी. संजय उठा और अपना बैग कंधे पर रख लिया.

‘‘सोच लोमैं एक ऐसे आदमी के हाथ में अपनी बेटी का हाथ नहीं दूंगा

जो इतना भी न कमा सके कि घर

और गाड़ी ही खरीद पाए,’’ भूमिका के पापा बोले.

‘‘पढ़ाई शुरू करते समय मेरी ख्वाहिशों मे बंगलागाड़ी नहींबल्कि गांव के वे गरीब लोग थेजो हमेशा से अच्छे इलाज से दूर रहे हैं और भूमिका से प्यार करने के पीछे तो किसी वजह का कोई वजूद ही नहीं था,’’ संजय ने दोटूक कहा और चल दिया. किसी ने उसे रुकने के लिए भी नहीं कहा.

संजय देर रात अपने गांव लौटा था. तब सब सो रहे थे. सुबह उठा तो उस ने देखा कि पूरा गांव घर के बाहर जमा था. बड़ों ने उसे अपना आशीर्वाद दिया और नौजवानों ने कंधे पर उठा कर पूरे गांव का चक्कर लगाया.

अगले 10 दिन गांव में खाली पड़े पंचायतघर को अस्पताल की शक्ल देने में लगे. गांव के बड़ेबूढ़ेबच्चेऔरतें सब ने अपना योगदान दिया.

उस दिन अस्पताल का उद्घाटन था. गांव के सरपंच ने इस का जिम्मा खुद संभाला था. आसपास के गांवों के प्रधान बुलाए गए थे और मुख्य अतिथि थे इलाके के विधायक.

तकरीबन सभी मेहमान आ चुके थेबस विधायकजी का इंतजार था कि एक लग्जरी गाड़ी सभा स्थल के सामने आ कर रुकी. सब लोग उधर देखने लगे. सब से पहले गाड़ी से भूमिका और उस के पापा उतरे और उन के पीछे अर्जुन.

तीनों स्टेज के करीब पहुंचेतो संजय ने आगे बढ़ कर उन का स्वागत किया और उन्हें स्टेज पर ले गया.

उसी समय विधायकजी भी पहुंचे,

जिन्हें सरपंच ने सम्मान सहित स्टेज पर बैठा दिया.

कार्यक्रम शुरू हुआ और लोग 1-1 कर अपने विचार रखने लगे. फिर संजय के आग्रह पर भूमिका के पिता उठे और माइक के सामने जा खड़े हुए.

‘‘मैं यहां खुद आया हूंलेकिन खुश हूं कि समय रहते आप के बीच पहुंच पाया. संजय जितना पढ़ाई में अव्वल हैउस से ज्यादा दुनियादारी में होशियार है.

‘‘मेरी बेटी ने इस के साथ रह कर पढ़ाई की और अपनी बेटी के भविष्य को ले कर मैं ने बहुत सारे सपने देखे. उन सपनों में संजय भी था. फिर जब एक दिन मैं इस से मिला तो मैं ने पाया कि स्वार्थी हो कर सपने देखना बहुत आसान होता है. उन में बस गिनेचुने अपने लोग होते हैंइसलिए ऐसे सपने आमतौर पर पूरे हो ही जाते हैं.

‘‘जब से हम ने स्वार्थी होना शुरू किया हैहम उन लोगों को नजरंदाज करने लगे हैंजो हमारे सपनों को पूरा करने में साधन बने. पहले समाजफिर दोस्तरिश्तेदार और मांबाप. सब को छोड़ कर सपने पूरे करने की ऐसी परंपरा चल निकली है कि अपने देश में पढ़ कर कोई यहां सेवा देना ही नहीं चाहताक्योंकि यहां पैसे कम मिलते हैंलेकिन संजय अलग है.

‘‘जब संजय ने बताया कि वह अपने घरपरिवारदोस्तरिश्तेदारसमाज और देश का कर्ज उतारने के लिए यहीं मरीजों का इलाज करना चाहता हैतो मेरे मन में इस के प्रति सम्मान का वही भाव पैदा हुआ जो एक महान इनसान के लिए होता है.

‘‘आज मैं यहां बिन बुलाए 2 वजह से हाजिर हुआ हूं. एक तो बेटी का बाप हूं और संजय से अच्छा लड़का मैं कहीं दूसरी जगह तलाश नहीं कर पाऊंगा. दूसरी बात यह कि बेटी के अलावा मेरा कोई नहीं है. धनदौलत के नाम पर जोकुछ हैसब इस का है. इस की इच्छा है कि यहां गांव में एक अच्छा सा अस्पताल खोला जाए और इस के लिए मैं 50 लाख रुपए का दान करता हूं,’’ कह कर उन्होंने एक चैक स्टेज के कोने में खड़े संजय को पास बुला कर उसे थमा दिया.

इस बात पर भीड़ ने देर तक ताली बजा कर खुशी जाहिर की. आखिर में विधायकजी के समापन भाषण के साथ सभा खत्म हो गई.

‘‘बेटाआप दोनों मिल कर अच्छे से लोगों की सेवा करना,’’ गाड़ी में बैठने को तैयार भूमिका के पापा ने कहा.

‘‘दोनों नहीं तीनों,’’ पीछे से अर्जुन बोला.

‘‘क्या तुम भी…?’’ भूमिका ने हंसते हुए पूछा.

‘‘और नहीं तो क्या. मैं क्लास में फिसड्डी रहा. कोई अच्छी सी नौकरी क्या मिलेगी. इस से तो अच्छा है कि अपने सीनियर की छत्रछाया में रहूं,’’ अर्जुन ने कहातो सब ठहाका लगा कर हंस दिए. Hindi Story

सुगंध – भाग 3 : क्या राजीव को पता चली रिश्तों की अहमियत

उस घटना के बाद नवीन एकाएक उदास और सुस्त सा हो गया था. हम सब उसे खूब समझाते, पर वह अपने पुराने रूप में नहीं लौट पाया था.

फिर एक दिन उस ने घोषणा की, ‘मैं एम.बी.ए. करने जा रहा हूं. मुझे प्रापर्टी डीलर नहीं बनना है.’

यह सुन कर चोपड़ा आगबबूला हो उठा और बोला, ‘क्या करेगा एम.बी.ए. कर के? 10-20 हजार की नौकरी?’

‘इज्जत से कमाए गए इतने रुपए भी जिंदगी चलाने को बहुत होते हैं.’

‘क्या मतलब है तेरा? क्या मैं डाका डालता हूं? धोखाधड़ी कर के दौलत कमा रहा हूं?’

‘मुझे आप के साथ काम नहीं करना है,’ यों जिद पकड़ कर नवीन ने अपने पिता की कोई दलील नहीं सुनी थी.

बाद में मुझ से अकेले में उस ने अपने दिल के भावों को बताया था, ‘चाचाजी, उस दिन थाने में पुलिस वालों के हाथों बेइज्जत होने से मुझे मेरे पिताजी की दौलत नहीं बचा पाई थी. एक प्रापर्टी डीलर का बेटा होने के कारण उलटे वे मुझे बदमाश ही मान बैठे थे और मुझ पर हाथ उठाने में उन्हें जरा भी हिचक नहीं हो रही थी.

‘दूसरी तरफ आप के बेटे विवेक के साथ उन्होंने न गालीगलौज की, न मारपीट. क्यों उस के साथ भिन्न व्यवहार किया गया? सिर्फ आप के अच्छे नाम और इज्जत ने उस की रक्षा की थी.

‘मैं जब भी उस दिन अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को याद करता हूं, तो मन शर्म व आत्मग्लानि से भर जाता है. मैं आगे इज्जत से जीना चाहता हूं…बिलकुल आप की तरह, चाचाजी.’

अब मैं उस से क्या कहता? उस के मन को बदलने की मैं ने कोशिश नहीं की. चोपड़ा ने उसे काफी डराया- धमकाया, पर नवीन ने एम.बी.ए. में प्रवेश ले ही लिया.

इन बापबेटे के बीच टकराव की स्थिति आगे भी बनी रही. नवीन बिलकुल बदल गया था. अपने पिता के नक्शेकदम पर चलने में उसे बिलकुल रुचि नहीं रही थी. किसी भी तरह से बस, दौलत कमाना उस के जीवन का लक्ष्य नहीं रहा था.

फिर उसे अपने साथ पढ़ने वाली शिखा से प्यार हो गया. वह शिखा से शादी करना चाहता है, यह बात सुन कर चोपड़ा बेहद नाराज हुआ था.

‘अगर इस लड़के ने मेरी इच्छा के खिलाफ जा कर शादी की तो मैं इस से कोई संबंध नहीं रखूंगा. फूटी कौड़ी नहीं मिलेगी इसे मेरी दौलत की,’ ऐसी धमकियां सुन कर मैं काफी चिंतित हो उठा था.

दूसरी तरफ नवीन शिखा का ही जीवनसाथी बनना चाहता था. उस ने प्रेमविवाह करने का फैसला किया और पिता की दौलत को ठुकरा दिया.

नवीन और शिखा ने कोर्ट मैरिज की तो मेरी पत्नी और मैं उन की शादी के गवाह बने थे. इस बात से चोपड़ा हम दोनों से नाराज हो गया पर मैं क्या करता? जिस नवीन को मैं ने गोद में खिलाया था, उसे कठिन समय में बिलकुल अकेला छोड़ देने को मेरा दिल राजी नहीं हुआ था.

नवीन और शिखा दोनों नौकरी कर रहे थे. शिखा एक सुघड़ गृहिणी निकली. अपनी गृहस्थी वह बड़े सुचारु ढंग से चलाने लगी. चोपड़ा ने अपनी नाराजगी छोड़ कर उसे अपना लिया होता तो यह लड़की उस की कोठी में हंसीखुशी की बहार निश्चित ले आती.

चोपड़ा ने मेरे घर आना बंद कर दिया. कभी किसी समारोह में हमारा आमनासामना हो जाता तो वह बड़ा खिंचाखिंचा सा हो जाता. मैं संबंधों को सामान्य व सहज बनाने का प्रयास शुरू करता, तो वह कोई भी बहाना बना कर मेरे पास से हट जाता.

अब उसे दिल का दौरा पड़ गया था. शराब, सिगरेट, मानसिक तनाव व बेटेबहू के साथ मनमुटाव के चलते ऐसा हो जाना आश्चर्य की बात नहीं थी.

उसे अपने व्यवहार व मानसिकता को बदलना चाहिए, कुछ ऐसा ही समझाने के लिए मैं अगले दिन दोपहर के वक्त उस से मिलने पहुंचा था.

उस दिन चोपड़ा मुझे थकाटूटा सा नजर आया, ‘‘यार अशोक, मुझे अपनी जिंदगी बेकार सी लगने लगी है. आज किसी चीज की कमी नहीं है मेरे पास, फिर भी जीने का उत्साह क्यों नहीं महसूस करता हूं मैं अपने अंदर?’’

उस का बोलने का अंदाज ऐसा था मानो मुझ से सहानुभूति प्राप्त करने का इच्छुक हो.

‘‘इस का कारण जानना चाहता है तो मेरी बात ध्यान से सुन, दोस्त. तेरी दौलत सुखसुविधाएं तो पैदा कर सकती है, पर उस से अकेलापन दूर नहीं हो सकता.

‘‘अपनों के साथ प्रेमपूर्वक रहने से अकेलापन दूर होता है, यार. अपने बहूबेटे के साथ प्रेमपूर्ण संबंध कायम कर लेगा तो जीने का उत्साह जरूर लौट आएगा. यही तेरी उदासी और अकेलेपन का टौनिक है,’’ मैं ने भावुक हो कर उसे समझाया.

कुछ देर खामोश रहने के बाद उस ने उदास लहजे में जवाब दिया, ‘‘दिलों पर लगे कुछ जख्म आसानी से नहीं भरते हैं, डाक्टर. शिखा के साथ मेरे संबंध शुरू से ही बिगड़ गए. अपने बेटे की आंखों में झांकता हूं तो वहां अपने लिए आदर या प्यार नजर नहीं आता. अपने किए की माफी मांगने को मेरा मन तैयार नहीं. हम बापबेटे में से कोई झुकने को तैयार नहीं तो संबंध सुधरेंगे कैसे?’’

उस रात उस के इस सवाल का जवाब मुझे सूझ गया था. वह समाधान मेरी पत्नी को भी पसंद आया था.

सप्ताह भर बाद चोपड़ा को नर्सिंग होम से छुट्टी मिली तो मैं उसे अपने घर ले आया. सविता भाभी भी साथ में थीं.

‘‘तेरे भतीजे विवेक की शादी हफ्ते भर बाद है. मेरे साथ रह कर हमारा मार्गदर्शन कर, यार,’’ ऐसी इच्छा जाहिर कर मैं उसे अपने घर लाया था.

‘‘अरे, अपने बेटे की शादी का मेरे पास कोई अनुभव होता तो मार्गदर्शन करने वाली बात समझ में आती. अपने घर में दम घुटेगा, यह सोच कर शादीब्याह वाले घर में चल रहा हूं,’’ उस का निराश, उदास सा स्वर मेरे दिल को चीरता चला गया था.

नवीन और शिखा रोज ही हमारे घर आते. मेरी सलाह पर शिखा अपने ससुर के साथ संबंध सुधारने का प्रयास करने लगी. वह उन्हें खाना खिलाती. उन के कमरे की साफसफाई कर देती. दवा देने की जिम्मेदारी भी उसी को दे दी गई थी

चोपड़ा मुंह से तो कुछ नहीं कहता, पर अपनी बहू की ऐसी देखभाल से वह खुश था लेकिन नवीन और उस के बीच खिंचाव बरकरार रहा. दोनों औपचारिक बातों के अलावा कोई अन्य बात कर ही नहीं पाते थे.

शादी के दिन तक चोपड़ा का स्वास्थ्य काफी सुधर गया था. चेहरे पर चिंता, नाराजगी व बीमारी के बजाय खुशी और मुसकराहट के भाव झलकते.

वह बरात में भी शामिल हुआ. मेरे समधी ने उस के आराम के लिए अलग से एक कमरे में इंतजाम कर दिया था. फेरों के वक्त वह पंडाल में फिर आ गया था.

हम दोनों की नजरें जब भी मिलतीं, तो एक उदास सी मुसकान चोपड़ा के चेहरे पर उभर आती. मैं उस के मनोभावों को समझ रहा था. अपने बेटे की शादी को इन सब रीतिरिवाजों के साथ न कर पाने का अफसोस उस का दिल इस वक्त जरूर महसूस कर रहा होगा.

बहू को विदा करा कर जब हम चले, तब चोपड़ा और मैं साथसाथ अगली कार में बैठे हुए थे. सविता भाभी, मेरी पत्नी, शिखा और नवीन पहले ही चले गए थे नई बहू का स्वागत करने के लिए.

हमारी कार जब चोपड़ा की कोठी के सामने रुकी तो वह बहुत जोर से चौंका था.

सारी कोठी रंगबिरंगे बल्बों की रोशनी में जगमगा रही थी. जब चोपड़ा मेरी तरफ घूमा तो उस की आंखों में एक सवाल साफ चमक रहा था, ‘यह सब क्या है, डाक्टर?’

मैं ने उस का हाथ थाम कर उस के अनबुझे सवाल का जवाब मुसकराते हुए दिया, ‘‘तेरी कोठी में भी एक नई बहू का स्वागत होना चाहिए. अब उतर कर अपनी बहू का स्वागत कर और आशीर्वाद दे. रोनेधोने का काम हम दोनों यार बाद में अकेले में कर लेंगे.’’

चोपड़ा की आंखों में सचमुच आंसू झलक रहे थे. वह भरे गले से इतना ही कह सका, ‘‘डाक्टर, बहू को यहां ला कर तू ने मुझे हमेशा के लिए अपना कर्जदार बना लिया… थैंक यू… थैंक यू वेरी मच, मेरे भाई.’’

चोपड़ा में अचानक नई जान पड़ गई थी. उसे अपनी अधूरी इच्छाएं पूरी करने का मौका जो मिल गया था. बडे़ उत्साह से उस ने सारी काररवाई में हिस्सा लिया.

विवेक और नई दुलहन को आशीर्वाद देने के बाद अचानक ही चोपड़ा ने नवीन और शिखा को भी एक साथ अपनी छाती से लगाया और फिर किसी छोटे बच्चे की तरह बिलख कर रो पड़ा था.

ऐसे भावुक अवसर पर हर किसी की आंखों से आंसू बह निकले और इन के साथ हर तरह की शिकायतें, नाराजगी, दुख, तनाव और मनमुटाव का कूड़ा बह गया.

‘‘तू ने सच कहा था डाक्टर कि रिश्तों के रंगबिरंगे फूल ही जिंदगी में हंसीखुशी और सुखशांति की सुगंध पैदा करते हैं, न कि रंगीन हीरों की जगमगाहट. आज मैं बहुत खुश हूं क्योंकि मुझे एकसाथ 2 बहुओं का ससुर बनने का सुअवसर मिला है. थैंक यू, भाई,’’ चोपड़ा ने हाथ फैलाए तो मैं आगे बढ़ कर उस के गले लग गया.

मेरे दोस्त के इस हृदय परिवर्तन का वहां उपस्थित हर व्यक्ति ने तालियां बजा कर स्वागत किया.

बीड़ी वाले का लड़का : भाग 2

शायद उस का स्वभाव ही ऐसा था कि वह जल्दी किसी से घुलतामिलता नहीं था. मुझ से दोस्ती होना या तो इत्तिफाक था या सिर्फ मेरी जरूरत. इत्तिफाक इसलिए कि उस का दाखिला मेरे ही स्कूल में करवा दिया गया था और मुझे जिम्मेदारी दी गई उसे साथ में स्कूल ले जाने और लाने की. शहर में नया होने की वजह से खो जाने का डर था और जरूरत इसलिए कि मेरा उस के घर आनाजाना था. उस के भैया से मैं गणित के सवाल हल करवाने जाता था. उस के भैया और मेरे भैया दोस्त थे और साथ में ही पढ़ते थे. उसी स्कूल में, जिस में हम दोनों पढ़ रहे थे.

मेरे भैया पढ़ाई की वजह से इस शहर से दूसरे शहर चले गए और उस के भैया तो गांव से शहर आए थे, फिर वे और कौन से शहर जाते, इसलिए वे इसी शहर में पढ़ाई के साथसाथ अपनी दुकान भी संभालने लगे थे. मेरे भैया के दूसरे शहर चले जाने के बाद मेरे अब्बू ने मुझे सख्त हिदायत दी थी उस के यहां न जाने की, पर गणित की वजह से मुझे वहां जाने का बहाना मिल ही जाया करता था. मैं उस से बातें करना चाहता था. मैं ने कभी गांव नहीं देखा था, इसलिए मैं उस की नजरों से गांव घूमना चाहता था, गांव के दोस्तों के बारे में जानना चाहता था, पर वह कभी मुझ से खुल कर बात ही नहीं करता था. मेरे अब्बू को उस के घर का माहौल बिलकुल पसंद नहीं था. उस के यहां तकरीबन 20 लोग हमेशा ऐसे रहते थे, जैसे कारखानों में रहते हैं. उसी तरह खानाबदोश जिंदगी.

10-15 लोग तो बीड़ी के कारीगर हुआ करते थे, जो उस की दुकान के लिए बीड़ी बनाया करते थे. वहां दिनभर गानाबजाना चलता था, उलटीसीधी बातें होती रहती थीं, कोई बीड़ी पी रहा होता था, तो कोई खैनी खा रहा होता था. इन्हीं सब वजहों से मेरे अब्बू खफा होते थे. उन्हें लगता था कि मेरी आदत भी खराब हो जाएगी. हालांकि मेरे अब्बू खुद सिगरेट पीते थे, जो कि उसी की दुकान से आती थी. महल्ले में सिर्फ उस के घर में ही चापाकल था. अगर कभी किसी दिन नगरनिगम की सप्लाई वाला पानी नहीं आता था, तो लोग उस के ही घर से पानी लाते थे. वह मुझे अब भी इसलिए याद है, क्योंकि हम दोनों की जिंदगी एकजैसी थी. मेरे अब्बू मुझे महल्ले वाले बच्चों से अलग रखना चाहते थे, क्योंकि उन की नजर में महल्ले में कोई भी हम लोगों के लायक नहीं था. सब अनपढ़, जाहिल या कम पढ़ेलिखे थे और उस की जिंदगी ऐसी हो गई थी कि महल्ले के बच्चे उस से दोस्ती नहीं करना चाहते थे, क्योंकि वह बीड़ी वाले का लड़का और देहाती था. जब भी हम स्कूल के लिए निकलते,

तो उस के साथ स्कूल बैग के अलावा दुकान पर देने के लिए बीड़ी या राशन लाने के लिए थैला जरूर रहता था, क्योंकि रास्ते में ही उस की दुकान पड़ती थी. हम लोग बीड़ी देते हुए स्कूल चले जाते थे. इसी बहाने उस के साथसाथ मुझे भी कुछ चौकलेट मिल जाती थीं. रास्तेभर वह कोई न कोई कविता गुनगुनाता रहता था. उस के इतने काम करने और कविता गुनगुनाने की वजह से मैं ने उस का नाम ‘कामधारी सिंह दिनकर’ रख दिया था. समय के साथ हमारी 10वीं जमात हो गई और फिर वहां से आगे का सफर. जैसे वह गांव से पढ़ने शहर आया था, वैसे ही मुझे आगे की अच्छी पढ़ाई करने के लिए इस शहर से किसी बड़े शहर या तो मेरे भैया के पास या फिर कहीं और, पर जाना तो तय था. 10वीं जमात के आखिरी इम्तिहान के बाद वह बहुत खुश था. जिस गांव से वह खुशीखुशी शहर आया था, इम्तिहान के बाद वह उसी शहर से अपने गांव रौकेट की रफ्तार से लौट जाना चाहता था.

जब तक इम्तिहान के नतीजे नहीं आ जाते, तब तक वह वहीं रहेगा या किसी बहाने से आएगा ही नहीं. मैं ने पूछा भी था, ‘‘क्यों…?’’ उस ने हमेशा की तरह छोटा सा जवाब दिया था, ‘‘ऐसे ही?’’ उस के 2 लफ्ज ‘ऐसे ही’ बोलने के अंदाज में लाखों राज छिपे थे. नतीजे आ गए, पर वह नहीं आया और मुझे मेरे भैया के पास भेजने की तैयारी जोरों पर थी. जाने से पहले मैं उस से एक बार मिलना चाहता था, जो बिलकुल भी मुमकिन नहीं था. यह उस जमाने की बात है, जब मोबाइल फोन या इंटरनैट नहीं हुआ करते थे. तब लोगों से जुड़ाव कायम करने का एक ही जरीया था खत. मैं ने उस के भैया से पूछा था, ‘‘कब आएगा वह?’’ जवाब में उन्होंने न जाने कितनी लानतें भेजी थीं उस पर… ‘बेवकूफ’, ‘बदकिस्मत’ और न जाने क्याक्या कहा था उसे. वे अपनी मिसाल देने लगे थे कि वे तो आगे पढ़ना चाहते थे, पर अब्बा की ख्वाहिश की वजह से दुकान को संभालना पड़ा और एक वह है, जिसे सब यहां शहर में पढ़ाना चाहते हैं, पर उसे गांव में ही रह कर पढ़ना है. उस के भैया के जवाब के बाद मैं ‘बदकिस्मत’ की परिभाषा ढूंढ़ने लगा कि आखिर ‘बदकिस्मत’ कहते किस को हैं? मेरा मानना था कि अगर किसी की कोई दिली तमन्ना, ख्वाहिश पूरी न हो, तो वह ‘बदकिस्मत’ हुआ,

पर उस की दिली ख्वाहिश जो कि यह थी कि वह वापस शहर नहीं आएगा, पूरी हो गई थी. मेरी नजर में तो वह ‘खुशकिस्मत’ था. इस की एक वजह यह भी थी कि उस ने 10वीं जमात में ही खुद से एक फैसला लिया था और चाहे वजहें जो भी हों, सब ने वह फैसला मान भी लिया. फिर मैं खुद की किस्मत को कोसने लगा… शायद ‘बदकिस्मत’ तो मैं था. मैं भी दूसरे शहर जा कर पढ़ाई नहीं करना चाहता था, पर यह बात मैं अपने घर में फुसफुसाहट में भी नहीं कह सकता था, क्योंकि अब्बू तक यह खबर पहुंच गई, तो वे मेरा कीमा बना देते. यहीं पर मुझे लगा कि हम दोनों की जिंदगी एक सी नहीं है, क्योंकि मैं खुद से फैसला नहीं ले सकता था. वह शहर क्यों नहीं आना चाहता था? यह सिर्फ मैं जानता था. वह भी उस ने इम्तिहान के आखिरी दिन एक शर्त पर बताया था कि मैं किसी को नहीं बताऊं. उस दिन उस ने दिल खोल कर मुझ से बातें की थीं. घर वालों के फैसले पर जब वह शहर पढ़ने आया था, तो उस की खुद की एक खामोश वजह थी और वह वजह थी बिजली और टैलीविजन.

यहां शहर की रात की बिजली की चकाचौंध उसे बहुत भाती थी और किसी न किसी के घर में टैलीविजन देखने को तो मिल ही जाता था, जहां वह फिल्में और ‘शक्तिमान’ देख पाता था. गांव की लालटेन की धीमी रोशनी कुछ हद तक ही रोशन कर पाती थी. उस हद के बाद आसपास अंधेरा ही रहता था और अंधेरे उसे बहुत डराते थे. रात में उसे बाथरूम भी जाना होता था, तो वह अपनी अम्मी को साथ ले कर जाता था. गांव में वह अपनी अम्मी के साथ रात के 2 बजे ही जग जाया करता था, पर सूरज की रोशनी होने तक बिस्तर में ही दुबका रहता था. मैं ने पूछा था, ‘‘2 बजे ही क्यों?’’ वह बताना नहीं चाहता था, पर मेरे जोर देने पर उस ने बड़े फख्र से बताया था,

 

भाई ही बने जोरू और जमीन के प्यासे- भाग 1

15जुलाई, 2022 को दिन के 11 बजे उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के थाना सुबेहा पुलिस को
112 नंबर द्वारा सूचना मिली कि शुकुलपुर गांव में एक युवक तमंचा ले कर अपनी छत पर खड़ा हुआ है.
इस सूचना के मिलते ही थानाप्रभारी शिवनारायण सिंह आननफानन में अपनी टीम के साथ गांव पहुंचे. जिस समय पुलिस गांव पहुंची, वह युवक हाथ में तमंचा लिए छत पर इधरउधर घूम रहा था. वह शुकुलपुर के राजनारायण शुक्ला का मंझला बेटा अखिलेश था.

घर के आसपास खड़े गांव के लोग उसे समझाने में लगे हुए थे. लेकिन अखिलेश का कहना था कि वह अब जीना नहीं चाहता, इसलिए वह अपनी जीवनलीला समाप्त करने वाला है.
पुलिस ने भी अखिलेश को समझाने की काफी कोशिश की. लेकिन वह किसी की भी सुनने को तैयार नहीं था. पुलिस ने अखिलेश से ऐसा करने की वजह पूछी तो उस ने पुलिस को जो बताया, वह चौंका देने वाला था.

अखिलेश ने अपनी दर्दनाक दास्तां सुनाते हुए बताया कि उस की जिंदगी में अब कुछ नहीं बचा. पत्नी ही उस का एकमात्र सहारा थी. 2 दिन पहले ही उस ने उस की भी हत्या कर दी. वह उसे बहुत प्यार करता था. वह उस के बिना जिंदा नहीं रह सकता.युवक की बात सुनते ही गांव में सनसनी फैल गई. इस का कारण था कि गांव में इतना बड़ा हादसा हो गया, लेकिन किसी को भी कानोंकान खबर तक नहीं लगी, न उस के घर वालों को और न ही किसी रिश्तेदार को.

पुलिस ने अखिलेश से पूछा कि उस ने अपनी पत्नी को क्यों मार डाला, तब उस ने बताया कि उस की पत्नी अंजलि का उस के छोटे भाई के साथ काफी समय से चक्कर चल रहा था.
उस ने उसे और अपने भाई दोनों को समझाने की कोशिश की, लेकिन दोनों ने उस की एक न मानी. उन की इसी हरकत से तंग आ कर उस ने पत्नी को मौत के घाट उतार दिया. उस की लाश घर में पड़ी है.
अखिलेश के इस खुलासे के बाद गांव वालों के साथसाथ पुलिस भी हैरत में पड़ गई थी.
अखिलेश के हाथ में तमंचा था. पुलिस को डर था कि कहीं वह गोली मार कर सुसाइड न कर ले. पुलिस उसे बातों में उलझाना चाहती थी.
पुलिस ने इधरउधर के मकानों पर चढ़ने का रास्ता देखा, लेकिन उस छत का जीना घर के अंदर से ही था. छत पर जाने का रास्ता न होने के कारण लगभग 45 मिनट तक पुलिस उसे समझाती रही.
अखिलेश की हरकतें देख पुलिस ने मकान के दरवाजे को तोड़ने की कोशिश की. जब अखिलेश को लगा कि पुलिस उस के घर का दरवाजा तोड़ कर अंदर आने की कोशिश कर रही है तो उस ने अपने गले पर तमंचा सटा कर चेतावनी दी, ‘‘अगर किसी ने दरवाजा तोड़ कर मेरे पास आने की कोशिश की तो मैं गोली चला कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर लूंगा.’’

उसी दौरान अखिलेश ने 3 बार गोली चलाने की कोशिश की. लेकिन तीनों बार ही फायर मिस हो गया. चौथी बार में गोली चल गई. इस से पहले कि घर का दरवाजा टूटता, अखिलेश ने अपनी गरदन के पास गोली मार ली. गोली लगते ही वह बुरी तरह से घायल हो गया.अखिलेश के गोली चलाते ही घटनास्थल पर हाहाकार मच गया. वहां पर खड़े लोगों में खलबली मच गई. घर का दरवाजा टूटते ही पुलिस तेजी से घर के अंदर दाखिल हुई. लेकिन अंदर का जो दृश्य था, दिल को दहला देने वाला था. अंदर के दृश्य को देख कर पुलिस सन्न रह गई.

घर के अंदर अखिलेश के भाई अजय का रक्तरंजित शव पड़ा हुआ था. उस के पास बुरी तरह से घायल अवस्था में उस के पिता राजनारायण पड़े हुए थे. पुलिस ने दोनों की हालत बिगड़ती देख तुरंत हैदरगढ़ के ट्रामा सेंटर भेज दिया. घटना की जानकारी मिलते ही एसपी अनुराग वत्स, एएसपी मनोज पांडेय भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे.अखिलेश और उस के पिता राजनारायण को ट्रामा सेंटर में भरती कराने के बाद पुलिस ने उस की पत्नी की तलाश शुरू की तो उस का शव घर के बगल वाली झोपड़ी में पौलीथिन व बोरी में छिपा मिला. अखिलेश ने अपनी बीवी अंजलि की हत्या 2 दिन पहले ही कर दी थी. इसी कारण उस के शव से बदबू भी आने लगी थी.

अंजलि की हत्या की पुष्टि होते ही पुलिस ने मृतका के मायके वालों को भी इस की खबर दे दी थी. बेटी की हत्या की खबर सुनते ही उस के मायके वाले तुरंत शुकुलपुर पहुंच गए.
अंजलि के मायके वालों से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने अपनी काररवाई पूरी कर दोनों शवों (अंजलि और अखिलेश के भाई अजय) का पंचनामा कर पोस्टमार्टम हेतु भिजवा दिया.

पोस्टमार्टम के बाद अंजलि का अंतिम संस्कार उस के मायके वालों ने शहर के ही श्मशान घाट पर कर दिया था. जबकि अजय का शव देर रात शुकुलपुर गांव में ही लाया गया था. जबकि अजय के पिता राजनारायण शुक्ला की बिगड़ती हालत के कारण वह उस के दाह संस्कार में शामिल नहीं हो पाए थे.
इस मामले को ले कर पुलिस ने घायल राजनारायण शुक्ला की हालत में सुधार होने पर उन से गहन जानकारी ली. पुलिस पूछताछ में पता चला कि उस के 4 बेटे राघव शरण, अजय, अखिलेश और अनिल सभी अलगअलग रहते थे. राजनारायण शुक्ला बेटे अखिलेश के साथ ही रहते थे.

कुछ समय पहले ही अखिलेश ने अपने घर के सामने ही अपने पैसों से कुछ जमीन खरीदी थी. उस के तीनों बेटे उस पर भी अपना अधिकार मान रहे थे. जिसे ले कर चारों भाइयों में मनमुटाव चल रहा था.
अखिलेश ने 15 जुलाई की सुबह अपने बड़े भाई अजय व छोटे भाई अनिल को अपने घर बुलाया. तीनों राजनारायण के सामने ही जमीन बंटवारे की बात करने लगे. उसी दौरान अखिलेश ने अपने छोटे भाई अनिल को कोल्डड्रिंक लाने दुकान पर भेज दिया.

अनिल के जाते ही अखिलेश अजय से मारपीट पर उतर आया और घर में रखे बांके से उस ने अजय पर हमला बोल दिया. बांके के ताबड़तोड़ प्रहार से अजय की मौके पर ही मौत हो गई. अजय के बचाव में पिता राजनारायण सामने आए तो अखिलेश ने उन्हें भी घायल कर दिया.अखिलेश ने अपने बड़े भाई अजय की हत्या जमीन विवाद के कारण ही की होगी. लेकिन इस मामले में एक अहम सवाल उठ रहा था कि अखिलेश ने आत्महत्या करने की कोशिश के दौरान बताया था कि उस की पत्नी का उस के भाई के साथ चक्कर चल रहा था, जिस के कारण उस ने उसे मौत के घाट उतार दिया था. उस का सब से बड़ा दुश्मन तो उस का छोटा भाई अनिल ही था, जिस के कारण उस ने सुसाइड करने की कोशिश की थी.
अनिल भी जमीन में बंटवारे को ले कर विवाद कर रहा था. फिर उस ने अनिल को छोड़ कर अजय को ही मौत के घाट क्यों उतारा. यह बात पुलिस के गले नहीं उतर रही थी.

भाई ही बने जोरू और जमीन के प्यासे

बीड़ी वाले का लड़का : भाग 3

‘‘मेरी अम्मी 2 बजे उठ कर लालटेन को रोशनी में चश्मा लगा कर बीड़ी बनाने के लिए पत्ते काटती हैं और पत्ते काटतेकाटते फज्र की नमाज का समय हो जाता है. फिर वह पत्ते काट कर उसे जमने के लिए सुतली वाले बोरे में बांध कर नमाज पढ़ने चली जाती है.’’ मैं ने फिर पूछा था, ‘‘यह जमना क्या होता है?’’ ‘‘जमना मतलब मुलायम होना, ताकि पत्तों को बीड़ी के जैसे लपेटने में आसानी हो,’’ उस ने बताया था. मैं उस की बात नहीं समझ पाया था, यह उस ने मेरे चेहरे से जान लिया तो फिर उस ने मुझे ठीक वैसे ही समझाया जैसे उस के भैया मुझे गणित समझाते थे. ‘‘इसे ऐसे समझो कि पत्ते काटने के बाद उसे और भी मुलायम होने के लिए मतलब एक बीड़ी वाले की जबान में इसे पत्ते का जमना कहते हैं. सुतली वाले बोरे को एक खास तरीके से बस्ता बना कर उसे पानी से हलका भिगो कर बांधा जाता है. पानी भी एक जरूरत के हिसाब से ही देना होता है.

कम पानी देने से पत्ते रूखे रह जाते हैं और ज्यादा पानी देने से पत्ते में चित्ती लग जाती है मतलब फफूंद लग जाती है.’’ उस के इस तरह बताने से पता चल रहा था कि बीड़ी का कारोबार उस के खून में है. मैं ने फिर पूछा था, ‘‘इतनी सवेरे जाग कर तुम क्या करते थे?’’ ‘‘मैं वहीं पर लेट कर कहानियों की किताबें पढ़ कर अपनी अम्मी को सुनाया करता था,’’ यह कहतेकहते वह उदास हो गया था, मानो जैसे अब रो ही देगा. ‘‘तुम तो वापस उसी अंधेरे वाली दुनिया में जा रहे हो और अब आओगे भी नहीं,’’ मैं आज बस उसे ही सुनना चाहता था. ‘‘हां दोस्त…’’ पहली बार उस ने मुझे दोस्त कह कर बुलाया था. फिर एक गहरी सांस ले कर वह कहने लगा था, ‘‘जिस वजह से मैं यहां आया था, वह तकरीबन पूरी तो हो गई है, पर…’’ ‘‘पर क्या…?’’ उस ने फिर बात अधूरी छोड़ दी तो मैं ने पूछा था.

‘‘पर, अम्मी छूट गई यार, मेरी कहानियां सुनने वाला यहां कोई नहीं है,’’ वह अपने आंसू छिपाने की कोशिश करते हुए बोला था, ‘‘पता है, मेरी नींद अब भी 2 बजे खुल जाती है, पर कमरे के बाहर नहीं निकलता, क्योंकि इस चकाचौंध रोशनी के रहते हुए भी मुझे डर लगता है. तब मुझे समझ में आया कि डर तो मेरे अंदर अब भी है, पर यहां मैं बाथरूम जाने के लिए किसी को गहरी नींद से जगा नहीं सकता, साथ नहीं ले जा सकता. ‘‘भला कोई मेरे लिए अपनी नींद क्यों खराब करेगा और किसी को साथ चलने के लिए जगाने में मुझे खुद भी शर्म आती है, क्योंकि उन की नजर में मैं बहुत बड़ा हो गया हूं, पर अपनी अम्मी की नजर में…’’ कहतेकहते वह खामोश हो गया था. ‘‘पर, यहां टैलीविजन देखने को तो मिलता है न…?’’ मैं चाहता था कि किसी बहाने से वह गांव से वापस आ जाए. ‘‘वह तो तुम्हारे यहां ही देखता हूं…’’ इस से ज्यादा उस ने कुछ नहीं कहा था, क्योंकि बाकी बातें मैं खुद समझ गया था. मेरे अब्बू को उस का मेरे यहां आना बिलकुल भी पसंद नहीं था. ‘‘तुम्हें पता है कि मुझे यहां हर चीज पूछ कर करनी पड़ती है. तुम्हारे यहां टैलीविजन देखने जाने के लिए भी कितनी डांट सुननी पड़ती है, तब जा कर इजाजत मिलती है और फिर तुम्हें वहां मेरे लिए दरवाजा खोलने की वजह से डांट सुननी पड़ती है.’’ उस की इस बात से मैं चौंक पड़ा था कि इसे तो सबकुछ पता है.

‘‘ऐसा नहीं है कि मेरे गांव में टैलीविजन नहीं है. वहां भी है, पर वहां इतनी बंदिशें नहीं हैं. अगर किसी ने अपना दरवाजा बंद भी कर लिया तो हम सब बस दीवार फांद कर उस के घर में घुस जाते हैं, कोई कुछ नहीं कहता है, सब को देखने दिया जाता है. ‘‘हमारे यहां बिजली नहीं है, तो हम लोग बैटरी पर देखते हैं… या तो खुद की बैटरी को पास के बाजार से चार्ज करा कर या भाड़े पर ला कर.’’ उस की बातों को सुन कर मैं अंदर से शर्मिंदा हो रहा था. कुछ चीजें ऐसी थीं, जो मेरे बस में नहीं थीं. उन में से एक थी, उसे देख कर मेरे अब्बू का दरवाजा बंद कर लेना. थोड़ी देर सन्नाटा पसरा रहा, फिर उस ने आगे कहना शुरू किया था, ‘‘वहां तो हंसनेरोने के लिए भी कभी सोचना नहीं पड़ता है. झूठमूठ रो कर अपनी जिद मनवा लेता हूं और फिर जिद पूरी होने पर हंस देता हूं. यहां तो हर चीज के लिए वजह ढूंढ़नी पड़ती है. तुम्हें पता है, तुम्हारे साथ जा कर मैं जितनी बार भी दवाएं लाया था, वे मैं ने कभी खाई ही नहीं थीं.’’ मैं फिर हैरान था और झट से पूछ लिया था, ‘‘क्यों?’’ ‘‘क्योंकि मुझे कभी पेट या सिरदर्द हुआ ही नहीं. घर या अम्मी की याद आ जाती थी और रो पड़ता था. आंसू की वजह बताने के लिए यही 2 दर्द ऐसे थे, जिन के लिए किसी सुबूत की जरूरत नहीं पड़ती है. गांव में तो अम्मी बुखार भी छू कर जान जाती थी, यहां तो बस थर्मामीटर…’’ मैं खामोश था. शायद मैं भी अब रो पड़ता. एक 10वीं के लड़के के अंदर कितना कुछ भरा था. ऐसा लगा कि उस के अंदर का बच्चा यहां आ कर मर रहा था. ‘‘मैं ने तो अब सोच लिया है कि बीड़ी की दुनिया से मुझे बाहर निकलना है खासकर अम्मी को तो बिलकुल भी नहीं बनाने दूंगा,’’ उस ने कहा था. ‘‘क्यों?’’ ‘‘बहुत सी बातें हैं, तुम्हें कैसे बताऊं…’’ ‘‘बता भी दो, आज पहली बार तुम ने मुझे दोस्त कहा है.’’ ‘‘इतनी मेहनत है इस काम में, पर उस के एवज में मिलता कुछ भी नहीं है.

बीड़ी, जिसे तुम देशी सिगरेट भी कह सकते हो, उस को बनाने से पहले उस के बहुत से पड़ाव हैं. आसान नहीं है बीड़ी बनाना और उसे आम लोगों तक पहुंचाना. हस्तकला की हर कदम पर जरूरत पड़ती है मानो हम जैसे कोई दुलहन सजा रहे हों. ‘‘इतनी मेहनत करने के बाद अगर पूरे दिन में एक हजार बीड़ी बन गईं, वह भी अगर आप की बनाने की स्पीड ज्यादा है तो मुश्किल से 40 से 50 रुपए मजदूरी मिलेगी. लेडीज हाथ की बीड़ी के लिए तो और भी कम मजदूरी है,’’ उस ने बीड़ी बनाने के तरीके को पूरी तफसील में समझाया था मानो उस ने बीड़ी बनाने की कला में पीएचडी कर रखी हो. ‘‘लेडीज हाथ की बीड़ी की मजदूरी कम क्यों?’’ मैं ने फिर पूछा था और बस मेरे इसी एक सवाल का जवाब उस के पास नहीं था और इस का जवाब शायद आज भी किसी के पास नहीं है, पर इस भेदभाव की वजह से उस के अंदर गुस्सा बहुत था. ‘‘पता नहीं यार, और सब से ताज्जुब वाली बात तो यह है कि दुकानदार यानी मेरे अब्बा दोनों बीड़ी को एक ही दाम पर बेचते हैं. ग्राहक से लेडीज हाथ की बीड़ी बता कर कम पैसे नहीं लिए जाते हैं. पता नहीं यह भेदभाव क्यों है? ‘‘मेरी अम्मी या कोई औरत अलग या किसी आसान तरीके से बीड़ी थोड़े न बनाती हैं. मेहनत तो दोनों की बराबर ही लगती है. ‘‘घर को संभालना औरतों के हाथ में है, बच्चे पैदा कर उन की अच्छी परवरिश करना भी उन्हीं के हाथों में है, उन के हाथ का खाना अच्छा होता है, पर यहां… बस यहां उन के हाथ का कोई मोल नहीं, तभी तो लेडीज के हाथ की बीड़ी बोल कर उन्हें कम मजदूरी दी जाती है…’’ कितनी सचाई थी उस की बातों में. कुछ देर के लिए तो मुझे ऐसा लगा कि हमारे स्कूल के गुप्ता सर महिला सशक्तीकरण पर भाषण दे रहे हैं. ‘‘अब हमें घर चलना चाहिए,’’ मैं ने कहा. हालांकि मैं चाहता तो था कि हमारी बातें यों ही चलती रहें, पर…

‘‘हां, वरना तुम्हें अब्बू से फिर डांट पड़ेगी.’’ वह बचपन की दोस्ती की आखिरी शाम मेरी जिंदगी की सब से हसीन शाम थी, पर मैं ने यह नहीं सोचा था कि इस के बाद मैं उस से कभी मिल नहीं पाऊंगा. समय के साथ उस का चेहरा मेरे जेहन में धुंधला तो हो गया, पर उस की बातें हमेशा रोशन रहीं. उस की वे आखिरी एक दिन की बातें मुझे अपनी जिंदगी में हर दिन दिखाई देती थीं. उस ने कहा था, ‘‘अपना घर छोड़ते ही आप की पहचान में फर्क आ जाता है. अपनी पहचान खो जाती है. अच्छाखासा नाम रहते हुए भी तुम्हें उस नाम से कोई नहीं बुलाएगा.’’ कितनी हकीकत थी उस की इस बात में और यह तब समझ में आया, जब मैं ने घर छोड़ा. घर छोड़ने के बाद मेरी पहचान ‘बंटी का भाई’, ‘जूनियर’, ‘सीनियर’, ‘फ्रैशर’, ‘ऐक्सपीरियंस्ड’, ‘दैट इंडियन गाय’… कुछ ऐसा ही होता चला गया, ठीक उसी तरह जिस तरह उस का भी एक नाम था, पर यहां इस शहर में उस का एक ही नाम था ‘बीड़ी वाले का लड़का’.

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