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कोई नहीं- भाग 2: क्या हुआ था रामगोपाल के साथ

एक दिन बबिता ने उसे बताया कि वह गाड़ी चलाना सीखने के लिए ड्राइविंग स्कूल में एडमिशन ले कर आ रही है. उस ने दिनेश को एडमिशन का फार्म भी दिखाया. हुआ यह कि बबिता के बडे़ भाई नंद कुमार ने उस से कहा कि रोजरोज बस या टैक्सी से आनाजाना न कर के वह अपनी कार से आए और इस के लिए ड्राइविंग सीख ले. आखिर पापा ने दहेज में कार किसलिए दी है.

बबिता को यह बात जंच गई. पर दिनेश इस पर आगबबूला हो गया. अपनी नाराजगी और गुस्से को वह रोक भी नहीं पाया और बोल पड़ा, ‘तुम्हारे पापा ने कार मुझे दी है.’

‘हां, पर वह मेरी कार है, मेरे लिए पापा ने दी है.’

दिनेश बबिता का जवाब सुन कर दंग रह गया. उस ने अपने गुस्से पर काबू करते हुए विवाद को तूल न देने के लिए समझौते का रुख अपनाते हुए कहा, ‘ठीक है पर ड्राइविंग सीखने की क्या जरूरत है. गाड़ी पर ड्राइवर तो है?’

‘मुझे किसी ड्राइवर की जरूरत नहीं. मैं खुद चलाना सीखूंगी और मुझे कोई भी रोक नहीं सकेगा. मैं तुम्हारी खरीदी हुई गुलाम नहीं हूं.’

दिनेश ने इस के बाद एक शब्द भी नहीं कहा. बबिता को कुछ कहने के बजाय उस ने अपने पिता को ये बातें बता दीं. गिरधारी लाल ने तुरंत रामगोपाल को फोन मिलाया और उस से बबिता के व्यवहार की शिकायत की तो उधर से उन की समधिन लक्ष्मी का जवाब आया, ‘भाईसाहब, आप के लड़के से बेटी ब्याही है, कोई बेच नहीं दिया है जो उस पर हजार पाबंदियां लगा रखी हैं आप ने. यह मत करो, वह मत करो, पापामम्मी से बातें मत करो, उन के घर मत जाओ, क्या है यह सब? हम ने तो अपने ही शहर में इसीलिए बेटी की शादी की थी कि वह हमारे पास आतीजाती रहेगी, हमारी नजरों के सामने रहेगी.’

‘पर समधिनजी,’ फोन पर गिरधारी लाल ने जोर दे कर अपनी बात कही, ‘यदि आप की बेटी बराबर आप के घर का ही रुख किए रहेगी तो वह अपना घर कब पहचानेगी? संसार का तो यही नियम है कि बेटी जब तक कुंआरी है अपने बाप की, विवाह के बाद वह ससुराल की हो जाती है.’

‘यह पुरानी पोंगापंथी बातें हैं. मैं इसे नहीं मानती. रही बात बबिता की तो वह जब चाहेगी यहां आ सकती है और वह गाड़ी चलाना सीखना चाहती है तो जरूर सीखे. इस से तो आप लोगों के परिवार को ही फायदा होगा.’

गिरधारी लाल ने इस के बाद फोन रख दिया. उन के चेहरे पर चिंता की गहरी रेखा खिंच आई थीं. परिवार वाले चिंतित थे कि इस स्थिति का परिणाम क्या होगा?

दिनेश ने भी इस घटना के बाद चुप्पी साध ली थी. सास सुलोचना ने सब से पहले बहू से बोलना बंद किया था, उस के बाद गिरधारी लाल भी बबिता से सामना होने से बचने का प्रयत्न करते. राजेश को भाभी से बातें करने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी. उस की जरूरतें मां, नौकर और नौकरानी से पूरी हो जाती थीं.

दिनेश और बबिता के बीच सिर्फ कभीकभार औपचारिक शब्दों का संबंध रह गया था. आफिस से छुट्टी के बाद वह ज्यादा समय बाहर ही गुजारता, देर रात में घर लौटता और खाना खा कर सो जाता.

इस बीच बबिता ने गाड़ी चलाना सीख लिया था. वह सुबह ही गाड़ी ले कर मायके चली जाती और रात में देर से लौटती. कभी उस का फोन आता, ‘आज मैं आ नहीं सकूंगी.’ बाद में इस तरह का फोन आना भी बंद हो गया.

कानूनी और सामाजिक तौर पर बबिता गिरधारी लाल के परिवार की सदस्य होने के बावजूद जैसे उस परिवार की ‘कोई नहीं’ रह गई थी. यह एहसास अंदर ही अंदर गिरधारी लाल और उन की पत्नी सुलोचना को खाए जा रहा था कि उन के बेटे का दांपत्य जीवन बबिता के निरंकुश एवं दायित्वहीन आचरण तथा उस के ससुराल वालों की हठवादिता से नष्ट हो रहा है.

आखिर एक दिन दिनेश ने दृढ़ स्वर में बबिता से कहा, ‘हम दोनों विपरीत दिशाओं में चल रहे हैं. इस से बेहतर है तलाक ले कर अलग हो जाएं.’

दिनेश को तलाक लेने की सलाह उस के पिता गिरधारी लाल ने दी थी. वह अपने बेटे के बिखरते वैवाहिक जीवन से दुखी थे. उन्होंने यह सलाह भी दी थी कि यदि बबिता उस के साथ अलग रह कर अपनी अलग गृहस्थी में सुखी रह सकती है तो वह ऐसा ही करे. पर दिनेश को यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं था कि वह अपने मातापिता को छोड़ कर अलग हो जाए.

दिनेश के मुंह से तलाक की बात सुन कर बबिता सन्न रह गई. उसे जैसे इस प्रकार के किसी प्रस्ताव की अपेक्षा नहीं थी. इस में उसे अपना घोर अपमान महसूस हुआ.

मायके आ कर बबिता ने अपने मम्मीपापा और भाइयों को दिनेश का प्रस्ताव सुनाया तो सभी भड़क उठे. रामगोपाल को जहां इस चिंता ने घेर लिया कि इतना अच्छा घरवर देख कर और काफी दानदहेज दे कर बेटी की शादी की, वहां इतनी जल्दी तलाक की नौबत आ गई. समाज और बिरादरी में उन की क्या इज्जत रहेगी? पर लक्ष्मी काफी उत्तेजित थीं. वह चीखचीख कर बारबार एक ही वाक्य बोल रही थीं, ‘उन की ऐसी हिम्मत…उन्हें इस का मजा चखा कर रहूंगी.’

 

प्यार का रिश्ता: कौनसा था वह अनाम रिश्ता – भाग 1

‘‘लक्ष्मी, एक अच्छी खबर है.’’ ‘‘क्या…?’’ लक्ष्मी ने पूछा. ‘‘मैं ने अपनी रीना का रिश्ता पक्का कर दिया है.’’ ‘‘अभी वह 14 साल की ही तो है.’’ ‘‘चुप रह. ज्यादा जबान न चलाया कर. 1-1 कर के 4-4 बेटियां पैदा कर दीं और अब मुझे कानून पढ़ा रही है. ‘‘बैजनाथ अपने भतीजे रमेश के लिए अपनी रीना का हाथ मांग रहे थे. मैं ने हां कर दी. शाम को 4-5 लोग रिश्ता पक्का करने के लिए आएंगे. रीना  को तैयार कर देना. यह पकड़ मिठाई  का डब्बा.’’ ‘‘कैसी बात कह रहे हैं रीना के बापू. कहां हमारी नाजुक सी बेटी और कहां तुम्हारी उमर का दुहाजू रमेश.’’ ‘‘बस, अब आगे जबान मत खोलना. आदमी की उम्र नहीं देखी जाती है, उस की कमाई देखी जाती है. मुंबई में तुम्हारी बेटी राज करेगी.

‘‘पूरीसब्जी बना लेना. खाना अच्छी तरह बनाना, कुछ गड़बड़ मत करना. रमेश वहां टैक्सी चलाता है. 1,000 रुपए तो रोज के आसानी से कहीं गए नहीं हैं. वह बता रहा था.’’ शाम को रमेश अपने काकाकाकी को ले कर आया. लाल चमकीली कढ़ी हुई साड़ी, पायलचूड़ी और सोने की अंगूठी पहना कर रीना की शादी पक्की कर दी. ढोलक पर गीत गाए गए, खानापीना और रात में शराब का पीनापिलाना भी हुआ. रीना के लिए शादी का मतलब केवल सजनासंवरना, बढि़या साड़ी, चूड़ी, पायल, महावर, सिंदूर, पाउडर और लिपिस्टिक था. उस की निगाहें तो उस सामान से हट कर रमेश की तरफ गई ही नहीं. अम्मां आंसुओं से रोई जा रही थीं.

बापू गाली दे कर बोल रहे थे, ‘‘असगुन मना रही है रोरो कर.’’ रीना तो अपनी शादी के बाद मुंबई जाने की खुशी में फूली नहीं समा रही थी. उस ने जल्दीजल्दी चूडि़यां पहन लीं, पाउडर और लिपिस्टिक लगा कर वह खुद को बारबार आईने में देख रही थी.  तभी रीना की सहेलियां सोनाली और गौरी आ गईं और उस की साड़ी, पायल और अंगूठी को लालची निगाहों से छूछू कर देखने लगीं. उन लोगों की निगाहों में उस के लिए जलन थी. ‘‘क्या री रीना, अब तू मुंबई में रहेगी?’’  ‘‘और नहीं तो क्या. मैं वहां फिल्म देखने जाऊंगी.’’ रीना दिनरात मुंबई नगरी के ख्वाबों में खोई रहती. कैसा होगा मुंबई शहर? वह तो कभी रेलगाड़ी में भी नहीं बैठी थी. कभी गांव से बाहर ही नहीं गई थी.

यहां तो उसे हर 2-4 दिन के बाद भूखे पेट सोना पड़ता था. बापू को मजदूरी न मिलती तो रोटी कैसे पकती या वह शराब पी कर आते तो अम्मां को मारते और गाली देते थे. रोतेरोते वह डर के मारे कोने में दुबक कर सो जाती. रीना रंगबिरंगे सपनों की दुनिया में खोई हुई थी, तभी उस के मन में खयाल यह आया कि कहीं रमेश भी नशा कर के उसे पीटेगा तो नहीं? लेकिन सुखद भविष्य के बारे में सोच कर उस का मन बोला, ‘नहींनहीं…’ एक दिन शाम को रीना अपनी सहेली गौरी के पास जा रही थी, तभी पीछे से किसी ने उसे बांहों में भर लिया. वह घबरा कर चिल्ला पड़ी, तो उस ने उस के मुंह पर अपनी हथेली रख दी. रमेश को पहचान कर रीना शरमा गई थी. गोराचिट्टा रमेश उसे अच्छा लगा था. टीशर्ट और पैंट पहना हुआ, हाथ में घड़ी बांधे हुए वह किसी फिल्मी हीरो से कम नहीं लग रहा था.

8-10 दिन के अंदर ही रीना ब्याह कर के रमेश के साथ मुंबई आ गई थी. वह आंखें फाड़फाड़ कर ऊंचीऊंची इमारतों पर सजी हुई रंगबिरंगी रोशनियों को देख कर हैरानी से भर उठी थी. अपनी आंखों में सुनहरे भविष्य के अनगिनत सपने संजोए हुए रीना अपने घर पहुंची थी. वहां सासू मां ने उस का आरती कर के स्वागत किया था. ‘‘रमेश की बहू तो सुंदर है, लेकिन उम्र में अभी छोटी है,’’ किसी ने कहा. आसपास की औरतें, बच्चे रीना को झांकझांक कर देखने की कोशिश कर रहे थे. सासू मां ने उसे खाने के लिए पूरीसब्जी और खीर दी थी.

रीना को तो शादी बड़ा फायदे का सौदा समझ में आ रहा था. बढि़या खाना, बढि़या कपड़े, सजनासंवरना, उस की खुशी का ठिकाना नहीं था. लेकिन रात में जब रमेश ने उस के तन को घायल किया तो उस का मन भी घायल हो  उठा था. वह तड़प कर चीख उठी थी और सासू मां के आंचल में आ कर दुबक गई थी.  अगली सुबह रीना देर तक सोती रही थी. जब उस की आंखें खुली थीं, तो दिन चढ़ आया था. सासू मां रमेश को धीरेधीरे कुछ समझा रही थीं. रमेश को देखते ही रीना डर के मारे कांप उठी थी. रात की बातों को याद कर के वह घबरा उठी थी. रमेश अपने काम पर चला गया था. सासू मां ने उस के लिए आलू का परांठा बनाया था, फिर उसे प्यार से समझाने लगीं कि शादी का मतलब ही यही होता है, इसलिए रमेश से डरो नहीं, अब वह तुम्हारा पति है.

रमेश शाम को घर लौट कर आया, तो रीना के लिए रसगुल्ले ले कर आया. उस ने आहिस्ता से रीना की हथेली को चूम लिया था. फिर उस ने उसे अपनी बांहों में भर लिया था.  धीरेधीरे रीना को रमेश अच्छा लगने लगा था. उस की प्यार भरी छेड़छाड़ से उस के मन में गुदगुदी हो उठती थी. वह रोज ही उस के लिए कुछ न कुछ खाने के लिए ले आता था. सासू मां भी काम पर चली जाती थीं. वे घर का काम करती थीं. झाड़ूबुहार, बरतन, कपड़ा, सब काम उन के लिए नया नहीं था.  एक दिन सुबह ही रमेश ने रीना को कह दिया कि शाम को तैयार रहना, आज तुझे घुमाने ले जाऊंगा. रीना सुबह से ही बहुत खुश थी. रमेश उसे अपनी आटोरिकशा में बिठा कर जुहूचौपाटी ले कर गया. वहां लोगों की भीड़ देख ऐसा लग रहा था कि जैसे मेला लगा हो. वहां रीना ‘बर्फ का गोला’ खा कर बहुत खुश हुई थी. सब तरफ लोग कुछकुछ खापी रहे थे. उस ने तो कभी नदी भी नहीं देखी थी, इतना  बड़ा समुद्र देख कर वह हैरानी से भर उठी थी.  रमेश ने उसे ठंडी बोतल पिलाई, गोलगप्पे खिलाए. वे दोनों घंटों समुद्र के किनारे बैठे रहे थे.

गरम गोश्त के सौदागर: भाग 2

‘‘मेरे पास उन की तसवीर है, देख कर यहां ही पसंद कर लीजिए.’’ एजेंट ने कहने के बाद अपने कीमती मोबाइल पर एक निजी साइट खोल कर हरीश शर्मा के सामने कर दी. उस ने करीब 10 विदेशी युवतियों के फोटो दिखाए. सभी कयामत बरपा देने वाली हसीन गोरी चमड़ी वाली हसीनाएं. एक से बढ़ कर एक थीं.

हरीश शर्मा के साथ रविकांत भी अपनी जगह बेचैनी से पहलू बदलते रहे, गजब की सुंदर, कोमल, चिकनी मलमली देह वाली विदेशी युवतियां थीं वे. देख कर ही दोनों को नशा होने लगा.

हरीश शर्मा ने एक तसवीर पर अंगुली रख दी, ‘‘इस की कीमत बोलिए.’’

‘‘हरेक की कीमत एक बार बैठने की 15 हजार होगी. कहिए तो मैं आप को इस के आशियाने पर छोड़ने चलूं?’’

 

हरीश शर्मा ने जेब टटोलने का अभिनय किया. अपना पर्स निकाल कर जोश में बोला, ‘‘मैं 15 हजार ही दूंगा.’’

हरीश ने बटुआ खोला और उस में झांक कर निराशा भरी सांस ली, ‘‘ओह! रुपए तो मैं अपनी टेबल पर ही छोड़ आया. सौरी यार… कल आ जाऊंगा.’’

‘‘तुम सात जन्म लोगे तब भी यहां लौट कर नहीं आओगे. यहां कोहिनूर हीरे मिलते हैं, तुम्हारे बाजारों की सड़ी बदबूदार मछलियां नहीं, जो पूरी रात के लिए 2-3 सौ में प्लेट में सजने को तैयार रहती हैं.’’ इस बार एजेंट भड़क कर तूतड़ाक पर उतर आया, ‘‘अबे जब जेब में दमड़ी नहीं थी तो मेरा टाइम खराब करने क्यों आ गए? जाओ, दफा हो जाओ यहां से.’’

हरीश शर्मा ने पर्स जेब में रखा और रविकांत का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘चल यहां से, कहीं और मूड बनाएंगे.’’

दोनों मोटरसाइकिल की तरफ बढ़े तो एजेंट ने उन्हें फाड़ खाने वाली नजरों से देख कर भद्दी गाली दी. हरीश शर्मा एक बार ठिठका लेकिन रविकांत ने उसे अपनी तरफ खींच कर धीमे से कहा, ‘‘ये इस का इलाका है, यहां यह अकेला नहीं होगा. इस के एक इशारे पर कई साथी आ टपकेंगे. यहां से चुपचाप निकल चलने में ही भलाई है.’’

‘‘यह हरामी हमें भद्दी गालियां दे रहा है. बेशक हम इतना रुपया एक बार के लिए खर्च नहीं कर सकते, लेकिन इसे हमारी बेइज्जती करने का हक नहीं बनता.’’ हरीश शर्मा झुंझलाए स्वर में बोला.

‘‘हमें अपनी औकात देख कर ही यहां आना चाहिए था. वैसे भी विदेशी माल 4-5 सौ में नहीं मिलता.’’ रविकांत ने गहरी सांस भर कर कहा.

‘‘मैं भी जानता हूं, मुझे उन लड़कियों की झलक देखनी थी, वह मैं ने उसे बेवकूफ बना कर देख ली.’’ शर्मा मुसकरा कर बोला.

‘‘चलो, आज की रात किसी बाजार के कोठे पर गुजारते हैं. मूड ठीक हो जाएगा.’’ रवि ने शर्मा का हाथ दबा कर कहा.

‘‘चलेंगे, लेकिन इस भड़वे का दिमाग ठिकाने जरूर लगाऊंगा मैं. इस की बहन की… इस साले ने हमें गाली दी है.’’

‘‘क्या करोगे यार, कहा न यह इन का इलाका है.’’

‘‘इस इलाके में आग लगाऊंगा मैं.’’ हरीश शर्मा गंभीर स्वर में बोला और मोबाइल पर किसी का नंबर डायल करने लगा. नंबर मिल गया. अब वह धीरेधीरे से किसी से बात कर रहा था और इस इलाके मालवीय नगर में देह व्यापार होने की जानकारी दे रहा था.

 

क्राइम ब्रांच थाना पुष्प विहार में इंसपेक्टर प्रमोद कुमार अपने कक्ष में बैठे सुबह का अखबार देख रहे थे तभी कांस्टेबल सोहनवीर ने आ कर उन्हें सैल्यूट किया.

‘‘कैसे हो सोहनवीर?’’ एक नजर सोहनवीर पर डालते हुए इंसपेक्टर प्रमोद कुमार ने पूछा.

‘‘ठीक हूं सर.’’ सोहनवीर ने गंभीरता से कहा, ‘‘मैं एक खास मकसद से आप से मिलने आया हूं.’’

इंसपेक्टर प्रमोद ने तुरंत अखबार एक ओर रख दिया और सोहनवीर की ओर मुखातिब हो गए, ‘‘गंभीर हो और खास मकसद से आए हो तो पहले मैं आप की बात सुनूंगा. कहिए?’’

‘‘जी, मालवीय नगर में देह व्यापार चल रहा है, जिस में कई विदेशी लड़कियों को देह धंधे में उतारा गया है.’’

‘‘क्या कह रहे हैं आप?’’ इंसपेक्टर प्रमोद चौंक कर बोले, ‘‘यह खबर आप को कैसे लगी?’’

‘‘मेरे खास मुखबिर ने यह खबर दी है, वह दरवाजे पर मौजूद है सर.’’

‘‘उसे अंदर बुलवाइए.’’

कांस्टेबल सोहनवीर बाहर गए और अपने साथ एक दुबलेपतले व्यक्ति को ले कर अंदर आ गए. उस व्यक्ति ने इंसपेक्टर प्रमोद को हाथ जोड़ कर नमस्ते की.

‘‘तुम्हें मालवीय नगर में देह व्यापार होने की खबर कैसे लगी?’’ बगैर कोई भूमिका बांधे इंसपेक्टर प्रमोद ने सवाल किया.

‘‘सर, मेरे एक दोस्त ने रात को मुझे फोन से यह जानकारी दी थी. वह दोस्त कौन है, कहां रहता है, मैं यह नहीं बताऊंगा लेकिन यह खबर सोलह आना सच्ची है सर.’’

‘‘कैसे कह सकते हो कि तुम्हारे दोस्त ने तुम्हें जो बताया है वह सच होगा?’’ इंसपेक्टर प्रमोद ने मुखबिर को पैनी नजरों से देखते हुए पूछा.

‘‘वह कल रात को मौजमस्ती के लिए मालवीय नगर गया था सर, सौदा महंगा था वह पे नहीं कर सका तो दलाल ने उसे भद्दीभद्दी गालियां दीं. इस से खफा हो कर उस ने मुझे यह बात बता दी. सर, वह जानता है कि मैं पुलिस के लिए मुखबिरी करता हूं.’’

‘‘हूं. कई दिनों से मुझे भी उड़तीउड़ती जानकारी मिल रही थी कि मालवीय नगर में देह का धंधा किया जा रहा है. आज तुम ने इस की पुष्टि कर दी है, फिर भी मैं पूरी सच्चाई और ठोस प्रमाण पाने के बाद ही कोई कड़ा कदम उठाऊंगा.’’

‘‘मैं इस की सच्चाई पता लगाने में पूरी मेहनत करूंगा सर.’’ मुखबिर ने गंभीर स्वर में कहा.

‘‘सोहनवीर, आप भी मुखबिर के साथ इस के कथन की पुष्टि करने के लिए जुट जाइए. यह काम बहुत सावधानी से और सादे कपड़ों में होना चाहिए. देह व्यापार चलाने वाले बहुत शातिर दिमाग होते हैं और खतरनाक भी.’’

‘‘आप बेफिक्र रहिए सर, एकदो दिन में मैं मुखबिर के साथ मिल कर ठोस जानकारी हासिल कर लूंगा.’’ कांस्टेबल सोहनवीर ने कहा और इंसपेक्टर से इजाजत ले कर मुखबिर के साथ निकल गया.

कांस्टेबल सोहनवीर और मुखबिर (काल्पनिक नाम विनोद) ने मिल कर मालवीय नगर में वह फ्लैट ढूंढ निकाला, जहां विदेशी लड़कियों से देह व्यापार करवाया जा रहा था.

एक कस्टमर को लालच दे कर उन्होंने यह भी मालूम कर लिया कि इस धंधे का दलाल कौन है और उसे कहां और कैसे संपर्क किया जा सकता है. यह पुख्ता जानकारी कांस्टेबल सोहनवीर ने क्राइम ब्रांच पुष्प विहार के सीनियर इंसपेक्टर प्रमोद कुमार को दे दी.

इंसपेक्टर प्रमोद कुमार ने इस की रिपोर्ट तुरंत डीसीपी (क्राइम ब्रांच) विचित्रवीर को दी. उन्होंने इस मामले को बड़ी गंभीरता से लिया और एसीपी एस.के. गुलिया के सुपरविजन में एक जांच दल का गठन कर दिया.

इंसपेक्टर प्रमोद कुमार, प्रदीप कुमार के साथ कांस्टेबल सोहनवीर और एएसआई राजेश तथा अन्य एसआई बहादुर शर्मा, सुमन बजाज, गुंजन सिंह, एएसआई सुनीता, जसबीर, रामचंद्र, नवीन पांडेय और सतीश को शामिल किया गया.

इंसपेक्टर प्रमोद कुमार ने कांस्टेबल सोहनवीर और एएसआई राजेश को नकली ग्राहक बना कर पंचशील विहार भेजा. सोहनवीर को हस्ताक्षरयुक्त 5 सौ रुपए के 30 नोट दिए गए, जिन के नंबर पहले ही डायरी में दर्ज कर लिए गए.

कांस्टेबल सोहनवीर को नकली ग्राहक बना कर एजेंट मोहम्मद अरूप और चंदे साहनी उर्फ राजू से मिल कर सौदा तय करना था. एएसआई को कांस्टेबल सोहनवीर पर नजर रखनी थी और सौदा होने पर सिर पर हाथ घुमा कर रेड करने का संकेत देना था.

कांस्टेबल सोहनवीर ने अपना हुलिया बदल लिया. वह स्मार्ट और मनचले युवक के हुलिए में तैयार हुआ तथा प्राइवेट वाहन से एएसआई राजेश के साथ पंचशील विहार, मालवीय नगर पहुंच गया. इस वक्त राजेश सादे कपड़ों में थे.

दोनों उस पार्क के पास पहुंच कर रुक गए. सोहनवीर ने अपने मोबाइल में दूसरी सिम डाल ली थी. उस ने एजेंट मोहम्मद अरूप का नंबर डायल किया.

‘‘हैलो, आप को किस से बात करनी है?’’ दूसरी ओर से पूछा गया.

‘‘मुझे मोहम्मद अरूप से बात करनी है. मैं अभिषेक बोल रहा हूं.’’

‘‘मैं मोहम्मद अरूप ही बोल रहा हूं. कहिए, आप को मुझ से क्यों मिलना है?’’

‘‘मुझे एक पार्टनर चाहिए, ऐसा पार्टनर जो मेरी तबीयत को मस्त कर दे.’’

‘‘आप को गलतफहमी हुई है जनाब, मैं लड़कियों का दलाल नहीं हूं.’’

कोई नहीं- भाग 1: क्या हुआ था रामगोपाल के साथ

दूसरी ओर से दिनेश की घबराहट भरी आवाज आई, ‘‘पापा, आप लोग जल्द चले आइए. बबिता ने शरीर पर मिट्टी का तेल उडे़ल कर आग लगा ली है.’’

‘‘क्या?’’ रामगोपाल को काठ मार गया. शंका और अविश्वास से वह चीख पडे़, ‘‘वह ठीक तो है?’’ और इसी के साथ उन की आंखों के सामने वे घटनाएं उभरने लगीं जिन की वजह से आज यह स्थिति बनी है.

रामगोपाल ने अपनी बेटी बबिता का विवाह 6 साल पहले अपने ही शहर में एक मध्यमवर्गीय परिवार में किया था. उन के समधी गिरधारी लाल भी व्यवसायी थे और मुख्य बाजार में उन की कपडे़ की दुकान थी, जिस पर वह और उन का छोटा बेटा राजेश बैठते थे.

बड़ा बेटा दिनेश एक फर्म में चार्टर्ड एकाउंटेंट था और अच्छी तनख्वाह पाता था. रामगोपाल की बेटी, बबिता भी कामर्स से गे्रजुएट थी अत: दोनों परिवारों में देखसुन कर शादी हुई थी.

रामगोपाल ने अपनी बेटी बबिता का धूमधाम से विवाह किया. 2 बेटों के बीच वही एकमात्र बेटी थी इसलिए अपनी सामर्थ्य से बढ़ कर दानदहेज भी दिया जबकि समधी गिरधारी लाल की कोई मांग नहीं थी. दिनेश की सिर्फ एक मांग फोरव्हीलर की थी, सो रामगोपाल ने उन की वह मांग भी पूरी कर दी थी.

शादी के कुछ दिनों बाद ही ससुराल में बबिता के आचरण और व्यवहार पर आपत्तियां उठनी शुरू हो गईं. इसे ले कर दोनों परिवारों में तनाव बढ़ने लगा. गिरधारी लाल के परिवार में बबिता समेत कुल 5 लोग थे. गिरधारी लाल, उन की पत्नी सुलोचना, दिनेश और राजेश तथा नई बहू बबिता.

सुलोचना पारंपरिक संस्कारयुक्त और धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं. वह सुबह उठतीं, स्नान करतीं और घरेलू कामों में जुट जातीं. वह चाहती थीं कि उन की बहू भी उन्हीं संस्कारों को ग्रहण करे पर बबिता के लिए यह कठिन ही नहीं, दुष्कर काम था. वास्तविकता यह थी कि वह ऐसे संस्कारों को पोंगापंथी और ढोंग समझती थी और इस के खिलाफ थी.

बबिता आधुनिक विचारों की थी तथा स्वाधीन रहना चाहती थी. रात में देर तक टेलीविजन के कार्यक्रम देखती, तो सुबह साढे़ 9 बजे से पहले उठ नहीं पाती. और जब तक वह उठती थी गिरधारी लाल और राजेश नाश्ता कर के दुकान पर जा चुके होते थे. दिनेश भी या तो आफिस जाने के लिए तैयार हो रहा होता या जा चुका होता.

सास सुलोचना को अपनी बहू के इस आचरण से बहुत तकलीफ होती. शुरू में तो उन्होंने बहू को घर के रीतिरिवाजों को अपनाने के लिए बहुत समझाया, पर बाद में उस की हठवादिता देख कर उस से बोलना ही छोड़ दिया. इस तरह एक घर में रहते हुए भी सासबहू के बीच बोलचाल बंद हो गई.

घर में काम के लिए नौकर थे, खाना नौकरानी बनाती थी. वही जूठे बरतनों को मांजती थी और कपडे़ भी धो देती. बबिता के लिए टेलीविजन देखने और समय बिताने के सिवा कोई दूसरा काम नहीं था. उस की सास सुलोचना कुछ न कुछ करती ही रहती थीं. कोई काम नहीं होने पर पुस्तकें ले कर पढ़ने बैठ जातीं. वह इस स्थिति की अभ्यस्त थीं पर बबिता को यह भार लगने लगा. एक दिन हालात से ऊब कर बबिता अपने मायके फोन मिला कर अपनी मम्मी से बोली, ‘मम्मी, आप ने कहां, कैसे घर में मेरा विवाह कर दिया? यह घर है या जेलखाना? मर्द तो काम पर चले जाते हैं, यहां दिन भर बुढि़या गिद्ध जैसी आंखें गड़ाए मेरी पहरेदारी करती रहती है. न कोई बोलने के लिए है न कुछ करने के लिए. ऐसे में तो मेरा दम घुट जाएगा, मैं खुदकुशी कर लूंगी.’

‘अरे नहीं, ऐसी बातें नहीं बोलते बेटी,’ उस तरफ से बबिता की मम्मी लक्ष्मी ने कहा, ‘यदि तुम्हारी सास तुम से बातें नहीं करती हैं तो अपने पति के आफिस जाने के बाद तुम यहां चली आया करो. दिन भर रह कर शाम को पति के लौटने के समय वापस चली जाना. ससुराल से मायका कौन सा दूर है. बस या टैक्सी से चली आओ. वे लोग कुछ कहेंगे तो हम उन्हें समझा लेंगे.’

यह सुनते ही बबिता की बाछें खिल गईं. उस ने झटपट कपडे़ बदले, पर्स लिया और अपनी सास से कहा, ‘मम्मी का फोन आया था, मैं मायके जा रही हूं. शाम को आ जाऊंगी,’ और सास के कुछ कहने का भी इंतजार नहीं किया, कदम बढ़ाती वह घर से निकल पड़ी.

इस के बाद तो यह उस की रोज की दिनचर्या हो गई. शुरू में दिनेश ने यह सोच कर इस की अनदेखी की कि घर में अकेली बोर होने से बेहतर है वह अपनी मां के घर घूम आया करे पर बाद में मां और पिताजी की टोकाटाकी से उसे भी कोफ्त होने लगी.

क्यों दूर चले गए: भाग 2

‘‘यही खुशखबरी देने के लिए तुम मुझ से मिलना चाहते थे,’’ खुशी एकदम असंयत हो उठी, ‘‘तुम ने जरा भी नहीं सोचा कि मुझ पर क्या बीतेगी. क्या सोचेंगे वे लोग जो हमें हमेशा एकसाथ देखते थे. यही है तुम्हारा प्यार. तुम्हारे कहने पर ही मैं ने मम्मीपापा को अपने रिश्ते के बारे में बताया था. आज क्या कहूंगी कि सब झूठ है,’’ इतना कहतेकहते खुशी रो पड़ी और फोन काट दिया.

इस के बाद मैं ने कितनी ही बार उसे फोन किया पर हर बार वह काट देती और अंत में उस ने फोन ही बंद कर दिया.

मैं एकदम परेशान हो गया. कहता भी तो किस से.

खुशी का मुझ से गुस्सा होना स्वाभाविक था. मैं ने ही उस से झूठेसच्चे वादे किए थे. मैं ने उस को एक सुनहरे भविष्य का सपना दिखाया था. अपना सुखदुख उस से बांटा था. उस ने हर समय मुझे एक रास्ता दिखाया था. मेरे बीमार होने पर वह बुरी तरह परेशान हो जाती थी और बिना कहे कई दवाइयां सीधे मेरे आफिस भिजवा देती और मेरे चपरासी को फोन कर के ढेर सारी हिदायतें भी देती. वह जानती थी कि मैं अपने प्रति बेहद लापरवाह हूं. आज मैं ने उस के सारे सपने पल भर में ही तोड़ दिए.

‘‘हां, ठीक है,’’ कहते हुए मैं रोंआसा सा हो गया. मुझे लगा कि वहां कुछ देर और खड़ा रहा तो आंसू न आ जाएं, इसलिए खुद को संभालता हुआ चुपचाप अपने कमरे में चला गया. बिस्तर पर गिरते ही मेरा सारा अवसाद आंखों के रास्ते बह निकला. रोतेरोते आंसू तो सूख गए पर भीतर का मन शांत न हो सका. थोड़ी देर में भाभी ने खाने के लिए पूछा. मैं ने कह दिया कि खा कर आ रहा हूं, भूख नहीं है पर खाया कब था, मैं अपने विचारों से जितना बचना चाहता था वे मुझे उतना ही सताने लगे.

खुशी से मेरी मुलाकात 4 साल पहले आफिस के बाहर वाले बस स्टैंड पर हुई थी. उजला वर्ण, तीखी नाक, लंबा कद और सधी हुई देहयष्टि. ऊपर से कपडे़ पहनने का ढंग इतना निराला था कि मैं उसे देखे बिना नहीं रह सका और पहली ही नजर में वह आंखों के रास्ते दिल में उतर गई. हमारी चार्टर्ड बस और आफिस के छूटने का लगभग एक ही समय था. मैं 5 मिनट पहले ही बस स्टैंड पर पहुंच जाता. पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता था कि उस की आंखें निरंतर मुझे ही तलाशती रहती हैं. धीरेधीरे वह भी आतेजाते मुझे देख कर हंस देती. इस तरह हम एकदूसरे के करीब आ गए. उस के पिता नेवी में उच्च पद पर थे तथा मेरे पिता मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर थे.

बीतते दिनों के साथ खुशी से मेरा प्रेम भी परवान चढ़ता गया. हमारी मुलाकातों की संख्या और समय दोनों बढ़ते रहे. इस दौरान मुझे सौंदर्य प्रसाधन बनाने वाली एक बड़़ी कंपनी में बहुत अच्छा औफर मिला और मैं ने उसे स्वीकार कर लिया. अब दोनों के दफ्तरों में कई किलोमीटर का फासला हो गया था. इस के बावजूद भी हम कोई न कोई बहाना ढूंढ़ कर मिलते रहे. हम दोनों कभी फिल्में देखते तो कभी बिना मकसद बांहों में बांहें डाल कर इधरउधर घूमते.

एक दिन खुशी ने मेरे कंधे पर अपना सिर रख कर कहा, ‘अब बहुत हो चुकी है चुहलमस्ती. सीधीसीधी बात बताओ, कब मिला रहे हो मुझे अपनी मम्मी से.’

‘अरे, तुम तो दिल के रास्ते सीधा घर पर कब्जा करने की सोच रही हो,’ मैं ने मजाक के लहजे में कहा.

‘मेरे पापा अब रिटायर होने वाले हैं. वह चाहते हैं कि मेरी जल्दी से शादी हो जाए ताकि नौकरी में रहते हुए वह अपनी तमाम सुविधाओं का उपयोग कर सकें. रिटायरमेंट के बाद तो हम सिविलियन हो जाएंगे. फिर कहां ये सुविधाएं मिलेंगी.’

‘तो कोर्ट मैरिज कर लेंगे,’ मैं ने चुटकी लेते हुए कहा और उस के माथे पर घिर आई लटों को पीछे करने के बहाने उसे अपने अंक में भींच लिया. उस ने बिना कोई प्रतिवाद किए अपना सिर मेरे कंधों पर टिका दिया.

‘सच कहूं तो मुझे इन मजबूत कंधों की बहुत जरूरत है. प्लीज, मेरी बात को सीरियसली लेना, नहीं तो तुम्हारी खुशी तुम्हारे हाथ से निकल जाएगी,’ कहतेकहते वह रोंआसी हो गई.

मैं ने उस की भर आई आंखों के कोरों से बहने वाले आंसू के कतरे को अपनी उंगलियों से पोंछा, ‘तुम तो बेहद संजीदा हो गई हो.’

‘हां, बात ही कुछ ऐसी है. इन दिनों मेरे रिश्ते की बातें चल रही हैं. तुम एक बार अपने घर पर बात कर लेते तो मैं भी कम से कम उन्हें बता देती.’

‘कौन सी बात? मैं ने उस की आंखों में झांकते हुए पूछा, ‘क्या कहोगी मेरे बारे में?’

‘यही कि तुम बेवकूफ हो, बुद्धू हो, एकदम बेकार और गुस्से वाले हो, पर तुम मेरे हो,’ कह कर पुन: खुशी ने मेरी गोद में सिर रख दिया. देर तक हम यों ही भविष्य के सपने संजोते रहे. मैं ने उस का हाथ अपने हाथों में रखा और उसे जल्दी ही बात करने का आश्वासन दिया. हम दोनों ही वहां से विदा हो गए.

घर पर मैं अपनी बात को इस ढंग से पेश करना चाहता था कि इनकार की कोई गुंजाइश ही न रहे और इस के लिए उचित अवसर तलाशता रहा.

भैया की शादी को 2 वर्ष हो चुके थे और उन का 8 माह का एक बेटा भी था. हमारे घर का माहौल बेहद सौहार्दपूर्ण था पर घर के सभी लोग एकसाथ नहीं मिल पाते थे.

मैं सपनों में जीने लगा था. एक दिन मैं आफिस में बैठा कोई काम कर रहा था कि तभी मेरे मोबाइल पर पापा का फोन आया. पता चला कि भैया का एक्सीडेंट हो गया और उन्हें काफी गंभीर चोटें आई हैं. वह जीवन नर्सिंगहोम में हैं. इस से पहले कि मैं वहां पहुंचता, भैया की निर्जीव देह को लोग एंबुलेंस में डाल कर घर ले जा रहे थे.

घर पर मरघट का सा सन्नाटा पसरा था. सभी एकदम स्तब्ध रह गए थे. भाभी तो जैसे पत्थर ही बन गईं और मम्मीपापा का रोरो कर बुरा हाल था. 2-3 दिनों तक घर का माहौल बेहद गमगीन रहा.

समय अपनी गति से चलता रहा. घर का माहौल धीरेधीरे संभलने लगा. खुशी मेरी विवशता समझती थी और दिल का हाल भी. जितनी बार भी समय निकाल कर मैं ने उस से संपर्क किया, बेहद नरम आवाज में वह संवेदना व्यक्त करती और मेरे घर पर आने की जिद करती. वह चाहती थी कि मैं अपने और उस के बारे में घर पर सबकुछ बता दूं मगर मैं ऐसा कर नहीं पा रहा था.

मम्मी भाभी को ले कर बेहद चिंतित और दुखी थीं. एक तो उन का बड़ा बेटा गुजर गया था, दूसरा जवान बहू का गम. उन्हें इस बात की बेहद चिंता थी कि बहू बाकी की तमाम उम्र इस घर में कैसे बिताएगी.

एक दिन खुशी और मैं पार्क में बैठे थे. वह भरे स्वर

में कहने लगी, ‘देखो, अब तक मैं पापा को जैसेतैसे टालती रही हूं पर अब और उन्हें टाल नहीं पाऊंगी. आज भी उन्होंने मुझे कई लड़कों के फोटो दिखाए हैं. तुम ने यदि अब तक अपने घर पर बात की होती तो मैं कम से कम तुम्हारे बारे में कुछ तो कह सकती. उन का इस तरह रोजरोज बात करना तो रुक जाता. मम्मी अकेले में कई बार मुझ से मेरी पसंद की तरफ भी इशारा करती हैं.’

‘तो फिर इंतजार किस बात का है,’ मैं ने खुशी से कहा, ‘तुम मेरे बारे में सबकुछ बता दो और मेरी मजबूरी भी उन्हें बता दो कि जैसे ही मुझे मौका मिला, मैं उन से मिलने आऊंगा.’

‘सच,’ उस ने अविश्वास भरे स्वर में ऐसे पूछा जैसे उसे मुझ पर शक हो.

‘तुम ऐसे अविश्वास से मुझे क्यों देख रही हो. तुम तो जानती हो कि मैं घर पर बात करने जा ही रहा था कि ऐसा हादसा हो गया,’ मैं ने कहा.

‘ओह डार्लिंग, पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लग रहा था कि तुम इस बात को संजीदगी से नहीं ले रहे हो.’

‘मैं भी तुम्हारे बिना रह सकता हूं क्या?’ कह कर मैं ने उस के गालों पर एक प्यारा सा चुंबन जड़ दिया तो शर्म से खुशी ने अपनी पलकें झुका लीं और कस कर मुझ से लिपट गई.

एक दिन शाम को मैं घर आया. भाभी के मम्मीपापा आए हुए थे. मैं ने उन के चरण स्पर्श किए और बाथरूम में फ्रेश होने चला गया. मेरे आने पर भाभी चाय बना कर ले आईं. घर का माहौल बेहद गमगीन और घुटा हुआ था. खामोशी तोड़ने के लिए मम्मी ने पहल की थी.

‘बहनजी, अब तो मेरे बेटे को गुजरे हुए 3 महीने हो चुके हैं. किंतु बहू की ऐसी हालत मुझ से देखी नहीं जाती. मैं जब भी इसे देखती हूं कलेजा मुंह को आता है. क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आता. आप ही कुछ बताइए न.’

भाभी: क्यों बरसों से अपना दर्द छिपाए बैठी थी वह- भाग 1

अपनी सहेली के बेटे के विवाह में शामिल हो कर पटना से पुणे लौट रही थी कि रास्ते में बनारस में रहने वाली भाभी, चाची की बहू से मिलने का लोभ संवरण नहीं कर पाई. बचपन की कुछ यादों से वे इतनी जुड़ी थीं जो कि भुलाए नहीं भूल सकती. सो, बिना किसी पूर्वयोजना के, पूर्वसूचना के रास्ते में ही उतर गई. पटना में ट्रेन में बैठने के बाद ही भाभी से मिलने का मन बनाया था. घर का पता तो मुझे मालूम ही था, आखिर जन्म के बाद 19 साल मैं ने वहीं गुजारे थे. हमारा संयुक्त परिवार था. पिताजी की नौकरी के कारण बाद में हम दिल्ली आ गए थे. उस के बाद, इधर उधर से उन के बारे में सूचना मिलती रही, लेकिन मेरा कभी उन से मिलना नहीं हुआ था. आज 25 साल बाद उसी घर में जाते हुए अजीब सा लग रहा था, इतने सालों में भाभी में बहुत परिवर्तन आ गया होगा, पता नहीं हम एकदूसरे को पहचानेंगे भी या नहीं, यही सोच कर उन से मिलने की उत्सुकता बढ़ती जा  रही थी. अचानक पहुंच कर मैं उन को हैरान कर देना चाह रही थी.

स्टेशन से जब आटो ले कर घर की ओर चली तो बनारस का पूरा नक्शा ही बदला हुआ था. जो सड़कें उस जमाने में सूनी रहती थीं, उन में पैदल चलना तो संभव ही नहीं दिख रहा था. बड़ीबड़ी अट्टालिकाओं से शहर पटा पड़ा था. पहले जहां कारों की संख्या सीमित दिखाई पड़ती थी, अब उन की संख्या अनगिनत हो गई थी. घर को पहचानने में भी दिक्कत हुई. आसपास की खाली जमीन पर अस्पताल और मौल ने कब्जा कर रखा था. आखिर घूमतेघुमाते घर पहुंच ही गई.

घर के बाहर के नक्शे में कोई परिवर्तन नहीं था, इसलिए तुरंत पहचान गई. आगे क्या होगा, उस की अनुभूति से ही धड़कनें तेज होने लगीं. डोरबैल बजाई. दरवाजा खुला, सामने भाभी खड़ी थीं. बालों में बहुत सफेदी आ गई थी. लेकिन मुझे पहचानने में दिक्कत नहीं हुई. उन को देख कर मेरे चेहरे पर मुसकान तैर गई. लेकिन उन की प्रतिक्रिया से लग रहा था कि वे मुझे पहचानने की असफल कोशिश कर रही थीं. उन्हें अधिक समय दुविधा की स्थिति में न रख कर मैं ने कहा, ‘‘भाभी, मैं गीता.’’ थोड़ी देर वे सोच में पड़ गईं, फिर खुशी से बोलीं, ‘‘अरे, दीदी आप, अचानक कैसे? खबर क्यों नहीं की, मैं स्टेशन लेने आ जाती. कितने सालों बाद मिले हैं.’’

उन्होंने मुझे गले से लगा लिया और हाथ पकड़ कर घर के अंदर ले गईं. अंदर का नक्शा पूरी तरह से बदला हुआ था. चाचा चाची तो कब के कालकवलित हो गए थे. 2 ननदें थीं, उन का विवाह हो चुका था. भाभी की बेटी की भी शादी हो गई थी. एक बेटा था, जो औफिस गया हुआ था. मेरे बैठते ही वे चाय बना कर ले आईं. चाय पीतेपीते मैं ने उन को भरपूर नजरों से देखा, मक्खन की तरह गोरा चेहरा अपनी चिकनाई खो कर पाषाण जैसा कठोर और भावहीन हो गया था. पथराई हुई आंखें, जैसे उन की चमक को ग्रहण लगे वर्षों बीत चुके हों. सलवटें पड़ी हुई सूती सफेद साड़ी, जैसे कभी उस ने कलफ के दर्शन ही न किए हों. कुल मिला कर उन की स्थिति उस समय से बिलकुल विपरीत थी जब वे ब्याह कर इस घर में आई थीं.

मैं उन्हें देखने में इतनी खो गई थी कि उन की क्या प्रतिक्रिया होगी, इस का ध्यान ही नहीं रहा. उन की आवाज से चौंकी, ‘‘दीदी, किस सोच में पड़ गई हैं, पहले मुझे देखा नहीं है क्या? नहा कर थोड़ा आराम कर लीजिए, ताकि रास्ते की थकान उतर जाए. फिर जी भर के बातें करेंगे.’’ चाय खत्म हो गई थी, मैं झेंप कर उठी और कपड़े निकाल कर बाथरूम में घुस गई.

शादी और सफर की थकान से सच में बदन बिलकुल निढाल हो रहा था. लेट तो गई लेकिन आंखों में नींद के स्थान पर 25 साल पुराने अतीत के पन्ने एकएक कर के आंखों के सामने तैरने लगे…

मेरे चचेरे भाई का विवाह इन्हीं भाभी से हुआ था. चाचा की पहली पत्नी से मेरा इकलौता भाई हुआ था. वह अन्य दोनों सौतेली बहनों से भिन्न था. देखने और स्वभाव दोनों में उस का अपनी बहनों से अधिक मुझ से स्नेह था क्योंकि उस की सौतेली बहनें उस से सौतेला व्यवहार करती थीं. उस की मां के गुण उन में कूटकूट कर भरे थे. मेरी मां की भी उस की सगी मां से बहुत आत्मीयता थी, इसलिए वे उस को अपने बड़े बेटे का दरजा देती थीं. उस जमाने में अधिकतर जैसे ही लड़का व्यवसाय में लगा कि उस के विवाह के लिए रिश्ते आने लगते थे. भाई एक तो बहुत मनमोहक व्यक्तित्व का मालिक था, दूसरा उस ने चाचा के व्यवसाय को भी संभाल लिया था. इसलिए जब भाभी के परिवार की ओर से विवाह का प्रस्ताव आया तो चाचा मना नहीं कर पाए. उन दिनों घर के पुरुष ही लड़की देखने जाते थे, इसलिए भाई के साथ चाचा और मेरे पापा लड़की देखने गए. उन को सब ठीक लगा और भाई ने भी अपने चेहरे के हावभाव से हां की मुहर लगा दी तो वे नेग कर के, शगुन के फल, मिठाई और उपहारों से लदे घर लौटे तो हमारी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. भाई जब हम से मिलने आया तो बहुत शरमा रहा था. हमारे पूछने पर कि कैसी हैं भाभी, तो उस के मुंह से निकल गया, ‘बहुत सुंदर है.’ उस के चेहरे की लजीली खुशी देखते ही बन रही थी.

देखते ही देखते विवाह का दिन भी आ गया. उन दिनों औरतें बरात में नहीं जाया करती थीं. हम बेसब्री से भाभी के आने की प्रतीक्षा करने लगे. आखिर इंतजार की घडि़यां समाप्त हुईं और लंबा घूंघट काढ़े भाभी भाई के पीछेपीछे आ गईं. चाची ने  उन्हें औरतों के झुंड के बीचोंबीच बैठा दिया.

मुंहदिखाई की रस्मअदायगी शुरू हो गई. पहली बार ही जब उन का घूंघट उठाया गया तो मैं उन का चेहरा देखने का मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी और जब मैं ने उन्हें देखा तो मैं देखती ही रह गई उस अद्भुत सौंदर्य की स्वामिनी को. मक्खन सा झक सफेद रंग, बेदाग और लावण्यपूर्ण चेहरा, आंखों में हजार सपने लिए सपनीली आंखें, चौड़ा माथा, कालेघने बालों का बड़ा सा जूड़ा तथा खुशी से उन का चेहरा और भी दपदपा रहा था.

वे कुल मिला कर किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थीं. सभी औरतें आपस में उन की सुंदरता की चर्चा करने लगीं. भाई विजयी मुसकान के साथ इधरउधर घूम रहा था. इस से पहले उसे कभी इतना खुश नहीं देखा था. उस को देख कर हम ने सोचा, मां तो जन्म देते ही दुनिया से विदा हो गई थीं, चलो कम से कम अपनी पत्नी का तो वह सुख देखेगा.

विवाह के समय भाभी मात्र 16 साल की थीं. मेरी हमउम्र. चाची को उन का रूप फूटी आंखों नहीं सुहाया क्योंकि अपनी बदसूरती को ले कर वे हमेशा कुंठित रहती थीं. अपना आक्रोश जबतब भाभी के क्रियाकलापों में मीनमेख निकाल कर शांत करती थीं. कभी कोई उन के रूप की प्रशंसा करता तो छूटते ही बोले बिना नहीं रहती थीं, ‘रूप के साथ थोड़े गुण भी तो होने चाहिए थे, किसी काम के योग्य नहीं है.’

दोनों ननदें भी कटाक्ष करने में नहीं चूकती थीं. बेचारी चुपचाप सब सुन लेती थीं. लेकिन उस की भरपाई भाई से हो जाती थी. हम भी मूकदर्शक बने सब देखते रहते थे.

कभीकभी भाभी मेरे व मां के पास आ कर अपना मन हलका कर लेती थीं. लेकिन मां भी असहाय थीं क्योंकि चाची के सामने बोलने की किसी की हिम्मत नहीं थी.

क्यों दूर चले गए: भाग 1

परिस्थितियां कभीकभी इनसान को इतना विवश कर देती हैं कि वह चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता. सामाजिक मान्यताएं, संस्कार और परंपराएं व्यक्ति को अपने मकड़जाल में उलझाए रखती हैं. ऐसे में या तो वह विद्रोह कर के सब का कोपभाजन बने या फिर परिस्थितियों से समझौता कर के खुद को नियति के हाल पर छोड़ दे. किंतु यह जरूरी नहीं कि वह सुखी रह सके.

मैं भी जीवन के एक ऐसे दोराहे पर उस मकड़जाल में फंस गया कि जिस से निकलना शायद मेरे लिए संभव नहीं था. कोई मेरी मजबूरी नहीं समझना चाहता था. बस, अपनाअपना स्वार्थ भरा आदेश और निर्णय वे थोपते रहे और मैं अपने ही दिल के हाथों मजबूरी का पर्याय बन चुका था.

मैं जानता हूं कि पिछले कई दिनों से खुशी मेरे फोन का इंतजार कर रही थी. उस ने कई बार मेरा फैसला सुनने के लिए फोन भी किया था मगर मेरे पास वह साहस नहीं था कि उस का फोन उठा सकूं. वैसे हमारे बीच कोई अनबन नहीं थी और न ही कोई मतभेद था फिर भी मैं उस का फोन सुनने का साहस नहीं जुटा सका.

मैं ने कई बार यह कोशिश की कि खुशी को फोन पर सबकुछ साफसाफ बता दूं पर मेरा फोन पर हाथ जातेजाते रुक जाता और दिल तेजी से धड़कने लगता. मैं घबरा कर फोन रख देता.

खुशी मेरी प्रेमिका थी, मेरी जान थी, मेरी मंजिल थी. थोडे़ में कहूं तो वह मेरी सबकुछ थी. पिछले 4 सालों में हमारे बीच संबंध इतने गहरे बनते चले गए कि हम ने एकदूसरे की जिंदगी में आने का फैसला कर लिया था और आज जो समाचार मैं उसे देने जा रहा था वह किसी भी तरह से मनोनुकूल नहीं था. न मेरे लिए, न उस के लिए. फिर भी उसे बताना तो था ही.

मैं आफिस में बैठा घड़ी की तरफ देख रहा था. जैसे ही 2 बजेंगे वह फिर फोन करेगी क्योंकि इसी समय हम दोनों बातें किया करते थे. मैं भी अपने काम से फ्री हो जाता और वह भी. बाकी आफिस के लोग लंच में व्यस्त हो जाते.

मैं ने हिम्मत जुटा कर फोन किया, ‘‘खुशी.’’

‘‘अरे, कहां हो तुम? इतने दिन हो गए, न कोई फोन न कोई एसएमएस. मैं ने तुम्हें कितने फोेन किए, क्या बात है सब ठीक तो है न?’’

‘‘हां, ठीक ही है. बस, तुम से मिलना चाहता हूं,’’ मैं ने बडे़ अनमने मन से कहा.

‘‘क्या बात है, तुम ऐसे क्यों बोल रहे हो? न डार्लिंग कहा, न जानू बोले. बस, सीधेसीधे औपचारिकता निभाने लग गए. घर पर कोई बात हुई है क्या?’’

‘‘हां, हुई तो थी पर फोन पर नहीं बता सकता. तुम मिलो तो सारी बात बताऊंगा.’’

‘‘देखो, कुछ ऐसीवैसी बात मत बताना. मैं सह नहीं पाऊंगी,’’ वह एकदम घबरा कर बोली, ‘‘डार्लिंग, आई लव यू. मैं तुम्हारे बिना नहीं रह पाऊंगी.’’

‘‘आई लव यू टू, पर खुशी, लगता है हम इस जन्म में नहीं मिल पाएंगे.’’

 

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