बीवी की शतरंजी चाल : भाग 2

वीरेंद्र की पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार हमलावरों द्वारा उस पर नजदीक से 3 गोलियां दागी गई थीं, जिस में 2 सिर में फंसी हुई थीं, जबकि एक गोली सिर को भेदती हुई पार निकल गई थी.

वारदात में जुड़ा एक गैंगस्टर का नाम लखनऊ के पुलिस कमिश्नर डी.के. ठाकुर ने इस वारदात को गंभीरता से ले कर मामले की गहन तहकीकात के सख्त आदेश दिए. कारण मामले में बिहार के मोस्टवांटेड अपराधी और रेलवे के ठेकेदार वीरेंद्र ठाकुर उर्फ गोरख ठाकुर की हत्या के साथ एक गैंगस्टर का नाम भी जुड़ गया था. वह गैंग बिहार के पूर्व दिवंगत सांसद शहाबुद्दीन का था.

जांचपड़ताल आगे बढ़ाने के लिए लखनऊ पुलिस ने एसटीएफ और क्राइम ब्रांच की टीम को बिहार भेज दिया. जांच टीम ने प्रारंभिक जांच में पाया कि वीरेंद्र ठाकुर को लोग गोरख ठाकुर के नाम से जानते थे. वह मूलत: पश्चिमी चंपारण में बेतिया जिले के नरकटियागंज का रहने वाला था.

लखनऊ आने से पहले वह पीडब्ल्यूडी विभाग की ठेकेदारी के धंधे में ही था. इस पेशे में उस ने अगर अच्छा पैसा कमा कर रुतबा कायम कर लिया था, तो रंजिश के चलते कई विरोधी बना लिए थे, जो दुश्मन बन चुके थे.दुश्मनी इस कदर बढ़ गई थी कि गोरख ठाकुर उर्फ वीरेंद्र ठाकुर ने साल 2012 में बिहार छोड़ दिया था. वह सपरिवार लखनऊ आ कर बस गया था. परिवार में उस की पत्नी प्रियंका ठाकुर और उन के बच्चे थे. बिहार छोड़ने के पीछे ठेके में हुए विवाद को कारण बताया जाता है.

लखनऊ में उसे बिहार के ही इकरामुद्दीन खां का सहयोग मिला. वह उस का पूर्व परिचित था. उस की मदद से पीडब्लूडी और दूसरे सरकारी विभागों का ठेका ले कर लखनऊ में काम करने लगा, किंतु नाम बदल कर वीरेंद्र ठाकुर कर लिया. इकरामुद्दीन की ही बेटी खुशबून तारा है.दरअसल, पत्नी प्रियंका के रहते हुए वीरेंद्र ने खुशबून तारा से प्रेम संबंध कायम कर लिए थे. इस की जानकारी खुशबून के पिता को भी थी.
वीरेंद्र के साथ ठेकेदरी में सहयोगी संबंध होने के कारण भी इकरामुद्दीन ने अपनी बेटी का अधिक विरोध नहीं जता पाया और न ही वीरेंद्र की मुखालफत की.

वीरेंद्र ने खुशबून तारा से विवाह रचा लिया था. इस तरह एक म्यान में 2 तलवारों जैसी स्थिति में प्रियंका और खुशबून रहने को मजबूर थीं. नतीजा आए दिन उन के बीच कलह होने लगी थी. एक तरफ पति और उस की संपत्ति पर हक जताने को ले कर घरेलू लड़ाईझगड़े आम बात थी तो दूसरी तरफ वीरेंद्र के दुश्मन भी बाहर से आक्रामक बने हुए थे.

आरोपियों की धरपकड़ के लिए एसटीएफ के एडीजी अभिताश यश ने नरकटियागंज में डेरा डाल दिया था. उन्हें जांच में पता चला कि घटना के कुछ रोज पहले वीरेंद्र और खुशबून तारा के साथ लड़ाईझगड़े से ऊब कर प्रियंका अपने बच्चों को छोड़ कर मायके (बिहार) आ गई थी. प्रियंका का पूर्व प्रेमी आया सामने

प्रियंका की जिंदगी भी कुछ कम उलझी हुई और जिल्लत भरी नहीं थी. उस का भी एक प्रेमी कमलेश उर्फ बिट्टू जायसवाल है. वह उसी के शहर का रहने वाला है. वीरेंद्र से झगड़े का दुखड़ा प्रियंका ने पूर्व प्रेमी को सुनाया और मदद मांगी.बिट्टू ने प्रियंका की समस्या का समाधान करने के लिए फिरदौस से मुलाकात करवाई, जो उन दिनों एक हत्या के मामले में फरार चल रहा था. वीरेंद्र के द्वारा आए दिन उत्पीड़न करने की जानकारी उसे पहले से थी.

फिरदौस के सिर पर शहाबुद्दीन का हाथ था. यही नहीं, वह ऐसा व्यक्ति था, जिसे वीरेंद्र की अधिकतर आदतों और गतिविधियों की जानकारी थी. यहां तक कि वीरेंद्र के मकान का मेन डोर खोलने और भीतर के पूरे लोकेशन को वह जानता था. 27 जून, 2022 की सुबह जांच टीम बिहार पहुंचने के बाद हत्या में नामजद आरोपियों की तलाश में जुट गई थी. आरोपियों की काल डिटेल्स के आधार पर सर्विलांस टीम को महत्त्वपूर्ण जानकारी मिली. यह जानकारी बिहार में डेरा डाले एसटीएफ के एडीजी को भेज दी.

उस जानकारी के आधार पर बिहार में मौजूद लखनऊ पुलिस की टीम ने मंजर इकबाल, सरफराज अहमद, कासिफ और अली हसन को गिरफ्तार कर लिया. वे सभी फिरदौस के संपर्क में रहने वाले लोग थे. हालांकि कई बार प्रियंका के घर पर दबिश के बावजूद वह पकड़ में नहीं आ पाई थी.पकड़े गए लोगों से पूछताछ में प्रियंका का भी चौंकाने वाला राज खुला. उन से ही प्रियंका से विवाह रचाने और फिर खुशबून तारा से संपर्क में आने की कहानी सामने आई. इस के अलावा फिरदौस से उस की दुश्मनी के बारे में भी कई राज खुले.

वीरेंद्र उर्फ गोरख ठाकुर के साथ प्रियंका, फिरदौस और बिट्टू की कहानी काफी घुलीमिली थी, जिस में दोस्ती और प्रेम कम कड़वाहटें, झांसेबाजी और अदावतें भरी थीं.पूछताछ में सब से बड़ा खुलासा प्रियंका को ले कर हुआ, जिस ने अपने पति वीरेंद्र की हत्या की सुपारी दी थी. तफ्तीश और अभियुक्तों से की गई पूछताछ के बाद वीरेंद्र ठाकुर की हत्या की जो कहानी सामने आई, बड़ी दिलचस्प निकली—

वीरेंद्र ठाकुर उर्फ गोरख ठाकुर की पहचान पूर्वी चंपारण इलाके में एक अच्छे ठेकेदार की थी. वह साल 2008 से ही पीडब्लूडी के करोड़ों रुपयों के ठेके लिया करता था. उस की पहली पत्नी प्रियंका और बिट्टू जायसवाल भी नरकटियांगंज के ही रहने वाले हैं.
वीरेंद्र की फिरदौस के साथ भी दोस्ती थी. उस के साथ बरौली बिरवा में खुशबून तारा के पिता इकरामुद्दीन के यहां ठेकेदारी के सिलसिले में आताजाता रहता था. वहीं खुशबून से भी उस की मुलाकात हो जाती थी. फिरदौस दूर के रिश्ते में खुशबून का भाई लगता था.

खुद वीरेंद्र एक वांटेड अपराधी था. बिहार के विभिन्न थानों में उस के खिलाफ 23 मुकदमे दर्ज थे. यही वजह थी कि वीरेंद्र के कई सारे दुश्मन भी थे, जिस में से एक उस की पत्नी प्रियंका की शादी से भी जुड़ा था. वीरेंद्र ठाकुर ने प्रियंका से शादी भी उस के प्रेमी कमलेश जायसवाल उर्फ बिट्टू को धोखा दे कर जबरन की थी.दरअसल, प्रियंका कमलेश जायसवाल उर्फ बिट्टू से प्यार करती थी. वे दोनों साथ रहने के लिए घर से भाग कर वीरेंद्र की शरण में आए थे. यह बात साल 2011 की है.

कांटों भरी राह पर नंगे पैर : भाग 3

लखनऊ शहर की इस गंदी बस्ती में आज जश्न था, क्योंकि आज उन के महल्ले के एक लड़के की शादी एक अमीर और सवर्ण लड़की से जो हो गई थी. अगले दिन से ही अंजलि घर पर मेहंदी रचा कर नहीं बैठी, बल्कि चुनाव प्रचार में बिजी हो गई. पूरे शहर में अंजलि ने अपनेआप को ‘दलित समाज की बहू’ कह कर चुनाव प्रचार करवाया और अजीत कुमार के साथ दलित बस्तियों का दौरा भी किया और दोपहर का खाना भी लखनऊ शहर के ही राजाजीपुरम इलाके में रह रहे एक दलित परिवार के यहां खाया.

लोकल न्यूज चैनल पर इस खबर का खूब प्रचारप्रसार भी करवाया. चुनाव नतीजा तो आया, पर अंजलि की सोच के मुताबिक नहीं. वह अपने विरोधी से बुरी तरह चुनाव हार चुकी थी. पूरे 2 दिन तक वह घर से बाहर रही. अजीत कुमार ने उस का मोबाइल भी मिलाया, पर मोबाइल ‘नौट रीचेबल’ ही बताता रहा. फिर एक दिन अंजलि अचानक नाटकीय रूप से प्रकट हो गई. उस ने घर के किसी शख्स से बात तक नहीं की और न ही किसी की तरफ देखा भी. वह सीधा अपने कमरे में चली गई. अजीत कुमार उस के पीछेपीछे गया, तो अंजलि उस से कहने लगी, ‘‘देखो अजीत, मैं ने तुम से इसलिए शादी की थी, क्योंकि सोशल मीडिया पर तुम्हारे दलित फैंस को देख कर मुझे ऐसा लगा कि अगर मैं तुम से शादी कर के दलितों के वोट अपनी ओर कर लूंगी,

तो इलैक्शन जीत जाऊंगी, पर अफसोस, यह नहीं हो सका और मैं चुनाव हार गई…’’ सांस लेने के लिए अंजलि रुकी और फिर आगे कहना शुरू किया, ‘‘पर, अब मेरा इस गंदी बस्ती और तुम्हारे साथ दम घुट रहा है, इसलिए मैं यहां से जा रही हूं और अपने आदमियों से तलाक के कागज भी भिजवा दूंगी… साइन कर देना.’’ अजीत कुमार अवाक रह गया. अपनी जिंदगी में इतना बड़ा धोखा उस ने कभी नहीं खाया था. अंजलि जा चुकी थी और कुछ घंटे बाद ही उस के आदमी तलाक के कागज ले कर आए और अजीत कुमार से दस्तखत लेने लगे.

कुछ लोग अंजलि के कमरे का सामान ले जाने लगे, जिस में उस कमरे में लगा हुआ एसीकूलर वगैरह भी शामिल था. अजीत कुमार काफी बेइज्जती महसूस कर रहा था, पर करता भी क्या? एक दलित की जिंदगी कितनी कड़वी हो सकती है, यह सब उस की झांकी भर ही था. कुछ दिन तो अजीत कुमार भी सदमे में रहा. उसे लगा कि उसे मर जाना चाहिए, क्योंकि वह एक सवर्ण महिला द्वारा बेइज्जत किया जा चुका है. लोग सही कहते हैं… हम दलित लोगों की ‘ब्रेन वाशिंग’ इस तरह से कर दी गई है कि लगता है कि हमारे सोचनेसमझने की ताकत ही चली गई है.

तभी तो शायद हम समाज में सब से आखिरी पायदान पर हैं… तो क्या मर जाना ही इस का समाधान है, बिलकुल, जब जिंदगी ही नहीं रहेगी, तो कैसा दुख और कैसा दर्द. अपने मोबाइल को अजीत कुमार ने आखिरी बार निहारा. उस ने पाया कि उस के फेसबुक मैसेंजर पर बहुत से दलित भाइयों और जरूरतमंद लोगों के संदेश भरे हुए थे, जो उस से मदद मांग रहे थे… ‘तो फिर इन का क्या होगा? क्या मेरे मर जाने से इन की उम्मीदभरी नजरों को ठोकर नहीं लगेगी?’ एक बार ऐसा खयाल अजीत कुमार के जेहन में आया, तो उस ने मरने का विचार छोड़ दिया. ठंडे पानी का एक गिलास हलक के नीचे उतारा और अपने कमरे में वापस आया…

एक लंबे सफर की तैयारी जो करनी थी उसे. उस दिन के बाद से अजीत कुमार ने सोशल मीडिया को अपना हथियार बनाया और उस ने ‘फेसबुक लाइव’ के द्वारा लोगों को संबोधित किया और दलितों को जगाने और उन की सदियों से चली आ रही ‘ब्रेन वाशिंग’ को ही खत्म करने के कोशिश की. खुद के साथ हुए धोखे के बारे में लोगों को बताया कि लोग किस तरह से उन के भोलेपन का फायदा उठाते हैं. भोलेभाले लोग यह जानते ही नहीं कि सालों से उन्हें कमतर होने का एहसास कराया जाता रहा है, जिस से वे अपनेआप को नीचा समझने लगे हैं. दलित गरीब होता है,

इसलिए उन के उत्थान में सब से पहले पैसे की जरूरत थी. अजीत कुमार ने अपने महल्ले के बीचोंबीच एक डब्बा रखवाया और उस पर लिखवा दिया कि इस डब्बे में वे लोग हर रोज महज एकएक रुपया डाला करेंगे और इस से जो पैसे इकट्ठे होंगे, वे गरीब दलितों के काम आएंगे, मसलन बच्चों की पढ़ाईलिखाई और लड़कियों की शादी में. अजीत कुमार ने ऊंची नौकरी कर रहे कुछ दलित लोगों से भी बात की और उन से भी सहयोग करने को कहा. लोग सामने आए और अजीत कुमार के कंधे से कंधा भी मिलाया. अजीत कुमार ने अपनी पूरी जिंदगी ही दलित समाज के जागरण को समर्पित कर दी थी. यह सब इतना आसान नहीं था,

पर दृढ़ संकल्प से कुछ भी मुमकिन था. तकरीबन 15 साल की समाजसेवा के बाद अजीत कुमार एक जानामाना नाम बन गया था, जिस का एहसास उस चालाक राजपूतानी अंजलि को भी हो चुका था, तभी वह एक दिन अजीत कुमार के पास आई और अपने द्वारा दिए गए धोखे पर माफी मांगते हुए उस से दोबारा शादी करने की इजाजत मांगी, पर अजीत कुमार इतना भी बेवकूफ नहीं था कि अंजलि से दोबारा शादी करता. दलित उत्थान में अजीत कुमार अकेला चला तो था, पर उसे इस राह में कई लोग मिलते गए, जिन्होंने हर तरीके से उस की मदद की.

अजीत कुमार ने अपनी जिंदगी के कड़वे अनुभवों को ले कर आत्मकथा भी लिखी, जिस का नाम रखा गया ‘कांटों भरी राह पर नंगे पैर’. अजीत कुमार की आत्मकथा को पहले तो कोई प्रकाशक नहीं मिल रहा था, क्योंकि एक दलित की आत्मकथा को प्रकाशित करना उन्हें फायदे का सौदा नहीं लग रहा था, इसलिए अजीत कुमार ने अपनी आत्मकथा को ‘अमेजन किंडल’ पर प्रकाशित करने का फैसला लिया और यह आत्मकथा एक बैस्ट सैलर साबित हुई. अजीत कुमार के पास बधाइयों का तांता लग गया था. आज अपना 50वां जन्मदिन मनाने के लिए समाजसेवी अजीत कुमार एक दलित बस्ती में आया था. उसे चारों तरफ से लोगों ने घेर रखा था. अजीत कुमार के चेहरे पर एक मधुर मुसकराहट थी कि तभी भीड़ को चीरते हुए एक 25-26 साल की लड़की अजीत कुमार के पास आई और बोली, ‘‘मैं सुबोही…

आप की बहुत बड़ी फैन हूं. आप के बारे में सबकुछ आत्मकथा से जान चुकी हूं और आप के काम से प्रभावित हूं… आप से शादी करना चाहती हूं… और हां… मैं जाति से ठकुराइन हूं.’’ अजीत कुमार उस लड़की को बड़ी देर तक देखता रहा, फिर बोला, ‘‘पर, हमारी उम्र के बीच जो फासला है…?’’ ‘‘प्रेम कोई फासला नहीं जानता,’’ सुबोही ने मुसकराते हुए कहा. ‘‘पर, तुम्हें विधायकी का चुनाव तो नहीं लड़ना है न?’’ अजीत ने चुटकी ली और दोनों एकदूसरे की तरफ देख कर मुसकरा उठे. ‘‘बस करिए, अपनी आत्मकथा को कब तक निहारते रहेंगे…’’ सुबोही ने पूछा. ‘‘यह तो एक बहाना है… तुम से हुई पहली मुलाकात को याद करने का…’’ अजीत कुमार ने सुबोही से कहा.

चांद पर धब्बे – भाग 3 : नीटू को किसकी चीख सुनाई दी

शराब और दूसरे नशों की वजह से वह नामर्द हो गया था. मेरे सारे जेवर उस ने जुए में हार दिए थे, मैं फिर भी चुप रही. एक दिन कहने लगा, ‘तू बड़े भैया के साथ सो जा. हमारे घरों में तू जानती है कि यह सब आम है. अगर बच्चा हो गया तो कोई मुझे नामर्द नहीं कहेगा.’ ‘‘बस, मेरा खून खौल उठा. भैया को तो मैं ने कभी मुंह नहीं लगाया था. वे जब आते मुझे मुसकरा कर देखते. पर मेरे आदमी को कभी इस पर एतराज न हुआ. वह मेरे जिस्म की प्यास खुद बुझा नहीं पाया.

मैं खामोशी से यह दर्द भी पी रही थी. पर उस ने मुझे वेश्या बना दिया, यह सब मुझ से सहन न हुआ. ‘‘2-4 बार के बाद बड़े भैया बारबार मुझे बुलाने लगे, तो मैं तिलमिला उठी. मेरे मना करने पर मेरे पति ने उसी गुस्से में मुझे जान से मारना चाहा. मुझ पर झूठा इलजाम लगा दिया कि मैं कुलटा हूं. तब भी मैं चुप रही, इस कारण कि उस की कमजोरी के बारे में दूसरा कोई न जाने. आखिर वह मेरा मर्द था. ‘‘यह बेटी बड़े भैया की देन है, पर न तो बेटी जानती है और न भैया. उन्होंने न जाने कितनों से खेला है. कितनों से बच्चे किए हैं. बड़ी भाभी जानती हैं, पर चुप रहती हैं. मैं ने एक दिन बड़े भैया को मना किया, तो उन्होंने उबलता दूध मुझ पर डाल दिया.

‘‘उस के बाद मेरे मर्द ने खुदकुशी कर ली. मैं घर छोड़ कर निकल आई और यहां सब से यही कहा कि सोमी मेरे मर्द की बेटी है.’’ ‘‘ओह माया,’’ पद्मा के मुंह से सिर्फ एक गहरी सांस निकल गई. इस औरत की कुरबानी ने तो उसे हिला कर रख दिया था. माया आगे बोली, ‘‘मैं ने सोमी के साथ जीने का रास्ता तलाश लिया है. फिर छोटी बहू, उस के साथ उस पुरानी राह पर लौटना मुझे मंजूर न था. सोमी पढ़ रही है. पढ़ कर कोई ट्रेनिंग करा दूंगी तो अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी. वह कुछ बन जाए तो समझूंगी कि मेरी कुरबानी बेकार नहीं गई.’’ ‘‘चाय बन गई है मां. यहीं ले आऊं?’’

सोमी ने पुकारा, तो माया और पद्मा दोनों चौंक गईं. पद्मा ने सोमी की तरफ देखा. उस का मुसकराता चमकता चेहरा सूरज की पहली लाली जैसा लुभावना लग रहा था. बादलों से सूरज भी बाहर निकल आया था. घर लौटते समय माया और उस की बेटी भी नाव तक छोड़ने आईं. कई बार इच्छा हुई कि पर्स खोल कर उस की लड़की के हाथ पर कुछ रखने की, पर बारबार मांबेटी के चेहरे पर छाई खुशी पद्मा को रोक देती. पद्मा उन की राह का रोड़ा नहीं बनना चाहती थी. उस के पास एक दौलत थी,

अपनी इज्जत और हौसले की. और उस के साथ थी उस की बेटी, पद्मा की जेठ की बेटी. झील में काफी दूर आने पर भी सोमी का हिलता हाथ और माया के दुपट्टे का उड़ता हिस्सा पद्मा को देर तक नजर आता रहा. उस के बाद पद्मा न जाने कितनी ही बार माया के गांव गई और न जाने क्या लगता था कि सोमी को उस ने अपनी बेटी की तरह पालना शुरू कर दिया. पद्मा ने यह बात उसे नहीं बताई, क्योंकि कोई फायदा नहीं था.

तांती – भाग 1 : क्या अपनी हवस पूरी कर पाया बाबा

चलतेचलते रामदीन के पैर ठिठक गए. उस का ध्यान कानफोड़ू म्यूजिक के साथ तेज आवाज में बजते डीजे की तरफ चला गया. फिल्मी धुनों से सजे ये भजन उस के मन में किसी भी तरह से श्रद्धा का भाव नहीं जगा पा रहे थे. बस्ती के चौक में लगे भव्य पंडाल में नौजवानों और बच्चों का जोश देखते ही बनता था. रामदीन ने सुना कि लोक गायक बहुत ही लुभावने अंदाज में नौलखा बाबा की महिमा गाता हुआ उन के चमत्कारों का बखान कर रहा था.

रामदीन खीज उठा और सोचने लगा, ‘बस्ती के बच्चों को तो बस जरा सा मौका मिलना चाहिए आवारागर्दी करने का… पढ़ाईलिखाई छोड़ कर बाबा की महिमा गा रहे हैं… मानो इम्तिहान में यही उन की नैया पार लगाएंगे…’ तभी पीछे से रामदीन के दोस्त सुखिया ने आ कर उस की पीठ पर हाथ रखा, ‘‘भजन सुन रहे हो रामदीन. बाबा की लीला ही कुछ ऐसी है कि जो भी सुनता है बस खो जाता है. अरे, जिस के सिर पर बाबा ने हाथ रख दिया समझो उस का बेड़ा पार है.’’

रामदीन मजाकिया लहजे में मुसकरा दिया, ‘‘तुम्हारे बाबा की कृपा तुम्हें ही मुबारक हो. मुझे तो अपने हाथों पर ज्यादा भरोसा है. बस, ये सलामत रहें,’’ रामदीन ने अपने मजबूत हाथों को मुट्ठी बना कर हवा में लहराया. सुखिया को रामदीन का यों नौलखा बाबा की अहमियत को मानने से इनकार करना बुरा तो बहुत लगा मगर आज कुछ कड़वा सा बोल कर वह अपना मूड खराब नहीं करना चाहता था इसलिए चुप रहा और दोनों बस्ती की तरफ चल दिए.

विनोबा बस्ती में चहलपहल होनी शुरू हो गई थी. नौलखा बाबा का सालाना मेला जो आने वाला है. शहर से तकरीबन 250 किलोमीटर दूर देहाती अंचल में बनी बाबा की टेकरी पर हर साल यह मेला लगता है. 10 दिन तक चलने वाले इस मेले की रौनक देखते ही बनती है. रामदीन को यह सब बिलकुल भी नहीं सुहाता था. पता नहीं क्यों मगर उस का मन यह बात मानने को कतई तैयार नहीं होता कि किसी तथाकथित बाबा के चमत्कारों से लोगों की सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं. अरे, जिंदगी में अगर कुछ पाना है तो अपने काम का सहारा लो न. यह चमत्कारवमत्कार जैसा कुछ भी नहीं होता…

रामदीन बस्ती में सभी को समझाने की कोशिश किया करता था मगर लोगों की आंखों पर नौलखा बाबा के नाम की ऐसी पट्टी बंधी थी कि उस की सारी दलीलें वे हवा में उड़ा देते थे. बाबा के सालाना मेले के दिनों में तो रामदीन से लोग दूरदूर ही रहते थे. कौन जाने, कहीं उस की रोकाटोकी से कोई अपशकुन ही न हो जाए…

विनोबा बस्ती से हर साल बाल्मीकि मित्र मंडल अपने 25-30 सदस्यों का दल ले कर इस मेले में जाता है. सुखिया की अगुआई में रवानगी से पहली रात बस्ती में बाबा के नाम का भव्य जागरण होता है जिस में संघ को अपने सफर पर खर्च करने के लिए भारी मात्रा में चढ़ावे के रूप में चंदा मिल जाता है. अलसुबह नाचतेगाते भक्त अपने सफर पर निकल पड़ते हैं. इस साल सुखिया ने रामदीन को अपनी दोस्ती का वास्ता दे कर मेले में चलने के लिए राजी कर ही लिया… वह भी इस शर्त पर कि अगर रामदीन की मनोकामना पूरी नहीं हुई तो फिर सुखिया कभी भी उसे अपने साथ मेले में चलने की जिद नहीं करेगा…

अपने दोस्त का दिल रखने और उस की आंखों पर पड़ी अंधश्रद्धा की पट्टी हटाने की खातिर रामदीन ने सुखिया के साथ चलने का तय कर ही लिया, मगर शायद वक्त को कुछ और ही मंजूर था. इन्हीं दिनों ही छुटकी को डैंगू हो गया और रामदीन के लिए मेले में जाने से ज्यादा जरूरी था छुटकी का बेहतर इलाज कराना… सुखिया ने उसे बहुत टोका कि क्यों डाक्टर के चक्कर में पड़ता है, बाबा के दरबार में माथा टेकने से ही छुटकी ठीक हो जाएगी मगर रामदीन ने उस की एक न सुनी और छुट्की का इलाज सरकारी डाक्टर से ही कराया.

रामदीन की इस हरकत पर तो सुखिया ने उसे खुल्लमखुल्ला अभागा ऐलान करते हुए कह ही दिया, ‘‘बाबा का हुक्म होगा तो ही दर्शन होंगे उन के… यह हर किसी के भाग्य में नहीं होता… बाबा खुद ही ऐसे नास्तिकों को अपने दरबार में बुलाना नहीं चाहते जो उन पर भरोसा नहीं करते…’’ रामदीन ने दोस्त की बात को बचपना समझते हुए टाल दिया.

सुखिया और रामदीन दोनों ही नगरनिगम में सफाई मुलाजिम हैं. रामदीन ज्यादा तो नहीं मगर 10वीं जमात तक स्कूल में पढ़ा है. उसे पढ़ने का बहुत शौक था मगर पिता की हुई अचानक मौत के बाद उसे स्कूल बीच में ही छोड़ना पड़ा और वह परिवार चलाने के लिए नगरनिगम में नौकरी करने लगा. रामदीन ने केवल स्कूल छोड़ा था, पढ़ाई नहीं… उसे जब भी वक्त मिलता था, वह कुछ न कुछ पढ़ता ही रहता था. खुद का स्कूल छूटा तो क्या, वह अपने बच्चों को खूब पढ़ाना चाहता था.

सुखिया और रामदीन में इस नौलखा बाबा के मसले को छोड़ दिया जाए तो खूब छनती है. दोनों की पत्नियां भी आपस में सहेलियां हैं और आसपास के फ्लैटों में साफसफाई का काम कर के परिवार चलाने में अपना सहयोग देती हैं. एक दिन रामदीन की पत्नी लक्ष्मी को अपने माथे पर बिंदी लगाने वाली जगह पर एक सफेद दाग सा दिखाई दिया. उस ने इसे हलके में लिया और बिंदी थोड़ी बड़ी साइज की लगाने लगी.

 

इश्क की बिसात पर खतरनाक साजिश : भाग 3

सबूत मिलने पर मनीषा ने कुबूला जुर्म

अधिकारियों के निर्देश पर सेना के हवलदार प्रवीण के कातिलों को रंगेहाथ पकड़ने की योजना उन्होंने बनाई थी. योजना के मुताबिक, टारगेट पर उन्होंने मृतक की पत्नी मनीषा को ले रखा था. शक के दायरे में मनीषा तो पहले से ही आ चुकी थी लेकिन पुलिस के पास उस के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं था, इसलिए उस की गिरफ्तारी नहीं हो पा रही थी.
मनीषा के खिलाफ सबूत इकट्ठा करने के लिए पुलिस ने उस के मोबाइल फोन नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया. यही एक आधार बचा था मनीषा की नाक में नकेल कसने
के लिए.
18 फरवरी, 2022 को पुलिस को बड़ी सफलता हाथ लगी. दीपक ने मनीषा को उस के नंबर पर फोन कर के अपने प्यार का इजहार किया और मनीषा ने भी प्रेमी को विश किया था. बस, यही चूक पुलिस की कामयाबी की सीढ़ी बनी.

इसी आधार पर पुलिस ने 18 फरवरी को मनीषा और उस के प्रेमी दीपक को उन के घर से गिरफ्तार कर लिया और थाने ले आई. थाने में दोनों से अलग तरीके से कड़ाई से पूछताछ की गई, जहां पुलिस के सामने दोनों ही टूट गए और अपना गुनाह कुबूल कर लिया.

घटना से परदा उठाती हुई मनीषा ने बताया, ‘‘साहब, उसे मैं नहीं मारती तो वह हम दोनों को मार डालता. पति को हमारे प्यार के बारे में पता चल चुका था. उस ने साफ कह दिया था कि अब उसे हमारी जरूरी नहीं है. तुम ने समाज, बिरादरी में हमारी इज्जत उछाल दी है, इसलिए मैं तुम्हें छोड़ रहा हूं. पति की धमकी से मैं बुरी तरह डर गई थी साहब, इसलिए योजना बना कर मैं ने उसे हमेशा के लिए रास्ते से हटा दिया.’’बहरहाल, हवलदार प्रवीण कुमार हत्याकांड की कहानी पुलिस पूछताछ में कुछ इस तरह से सामने आई—
35 वर्षीय प्रवीण कुमार हरियाणा के चरखी दादरी जिले के बाढड़ा थानाक्षेत्र के गांव डूडीवाला किशनपुरा का मूल निवासी था. वह मेरठ में भारतीय सेना में हवलदार था. उस का अपना भरापूरा परिवार था. अपने परिवार से वह बेहद खुश था. परिवार में 12 साल की एक बेटी और 10 साल का एक बेटा था.
वैसे मनीषा और प्रवीण की शादी करीब 15 साल पहले हुई थी. मनीषा बेहद खूबसूरत थी. गोरीचिट्टी, इकहरे बदन की करीब साढ़े 5 फीट लंबी. लंबे काले बाल, झील सी
गहरी आंखें.

ऐसी सुंदर पत्नी पा कर प्रवीण बेहद खुश था. यही नहीं, मनीषा को भी पति पर नाज था कि वह देश की सरहद की रक्षा करने वाले जवान की पत्नी है.

चचेरे देवर दीपक से हो गया प्यार

बहरहाल, समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा. इस दौरान मनीषा 2 बच्चों की मां बन गई. प्रवीण का पारिवारिक जीवन बेहद सुखमय बीत रहा था. कब सफल जीवन के 15 साल यूं ही बीत गए, न तो प्रवीण को पता चला और न ही मनीषा को.इसी बीच दोनों के दांपत्य जीवन में दीपक नाम का नाग कुंडली मार कर बैठ गया, जो प्रवीण का जीवन लील गया.दीपक प्रवीण का चचेरा भाई था, जो पड़ोस में रहता था. ग्रैजुएशन कर चुका दीपक अभी कुंवारा था. कोई अच्छी नौकरी पा लेने के बाद उस ने शादी का मन बनाया था. सरकारी नौकरी पाने के लिए वह कंपीटिशन की तैयारी में जुटा हुआ था.दीपक की प्रवीण के साथ खूब निभती थी. चूंकि दीपक उस का चचेरा भाई था, इस रिश्ते से दीपक का प्रवीण के घर में आनाजाना था. जब चाहता, वह बेधड़क घर में चला जाता था. पूरा घर घूम कर चला आता था.

जब भी वह घर में दाखिल होता था, भतीजी और भतीजे को अपने शब्दों से गुदगुदाया करता था. बच्चों के पास बैठी मनीषा भी देवर की बातें सुनसुन कर लुत्फ उठाती थी.

भाभी का खिलखिला कर हंसना दीपक के कोरे मन पर गहरा असर डालता था. पता नहीं क्यों वह अपनी भाभी को हंसते देखता तो वह मुग्ध हो जाता था और उस के जिस्म में एक झुरझुरी सी दौड़ पड़ती थी.
मनीषा को भी देवर दीपक का उसे आशिकी की नजरों से देखना पता नहीं क्यों अच्छा लगने लगा था.
एक दिन मनीषा दीपक से सवाल कर बैठी थी, ‘‘क्या बात है देवरजी, आजकल देख रही हूं मैं कि आप मेरी जवानी को बड़ी आशिकी नजरों से देखते हैं.’’

‘‘नहीं तो भाभीजी, ऐसी कोई बात नहीं है, जैसा आप समझती हैं.’’ सकपकाते हुए दीपक ने उत्तर दिया.
‘‘क्यों झूठ बोलते हो देवरजी, पुरुषों के हावभाव से औरत पहचान जाती है कि सामने वाले के मन में क्या चल रहा है. मैं सब जानती हूं कि आप के मन में क्या चल रहा है.’’ शरारत भरे शब्दों से दीपक के मन को मनीषा ने टटोलने की कोशिश की.

‘‘मैं ने कहा न भाभी, आप जैसा सोच रही हैं, ऐसी कोई बात नहीं है. फिर आप मेरी अच्छी दोस्त भी हैं तो भला आप से क्या छिपाना? अगर कोई बात मेरे मन में चल रही होगी तो मैं सब से पहले आप से ही शेयर करूंगा.’’ दीपक बोला.‘‘पक्का न,बात जरूर शेयर करेंगे मेरे से.’’ मनीषा ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘हां..हां..हां…मैं जरूर शेयर करूंगा आप से.’’दीपक मनीषा से था 10 साल छोटा

दीपक बात कहने को कह तो गया था लेकिन हकीकत में अपने से 10 साल बड़ी भाभी मनीषा से वह दिल लगा बैठा था. दीपक ने अपने मन के सौफ्ट कोने में मनीषा के लिए प्यार का घर बना लिया था. वह अपनी भाभी से प्यार करने लगा था. मनीषा ने दीपक के मन की बात अपनी आंखों से पढ़ ली थी.
वह जान चुकी थी कि दीपक उस से प्यार करने लगा है तो मनीषा भी खुद को ना नहीं कर सकी. वह भी दीपक के प्यार में पतंग बनी डोर के समान लिपट गई.

15 साल पहले फेरे लेते समय उस ने अग्नि के समक्ष जो कसमें खाई थीं, 3 महीने के प्यार के सामने भूल गई. पति को दिया वचन याद नहीं रहा. उसे याद रहा तो बस अपने से 10 साल छोटे प्रेमी का प्यार. मनीषा यह भी भूल गई कि वह 2 बच्चों की मां है. कहीं इस प्यार वाले रिश्ते की सच्चाई समाज में जाहिर हुई तो उन का क्या होगा.

कहते हैं, प्यार अंधा होता है. मनीषा भी दीपक के प्यार में अंधी हो चुकी थी. उस के सिर पर दीपक के प्यार का भूत इस कदर सवार था कि उसे दीपक के सिवाय कुछ नहीं दिख रहा था. दीपक का भी हाल कुछ ऐसा ही था.

मोहब्बत की आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई थी. पति नौकरी पर घर से दूर था. उन्हें मिलने से भी कोई रोक नहीं सकता था. दीपक का घर में आनाजाना तो बराबर था ही. वे देवरभाभी के रिश्तों की आड़ में घिनौना खेल खेल रहे थे.

बात इसी साल जनवरी की है. दोपहर का वक्त था. मनीषा घर में अकेली थी. उस के दोनों बच्चे स्कूल गए हुए थे. ठंड से कांपती मनीषा बैड पर बैठी रजाई में दुबकी हुई थी. तभी दीपक वहां आ पहुंचा. दीपक को देख कर उस का चेहरा खिल उठा. यही हाल दीपक का भी था.
मनीषा ने दीपक को इशारा कर के अपने पास रजाई में बैठने के लिए बुलाया तो दीपक का दिल धड़कने लगा. फिर उसे निहारते हुए उस के करीब रजाई में बैठ गया.अनुभवी मनीषा ने दीपक को पढ़ा दिया कामकला का पाठ

मनीषा के गरम जिस्म से जब दीपक का बदन स्पर्श हुआ तो उसे असीम आनंद की अनुभूति हुई. उधर मनीषा का रोमरोम खिल उठा था. फिर दीपक आहिस्ताआहिस्ता मनीषा की ओर बढ़ता चला गया और मनीषा उस के प्यार में डूबती हुई बिछती चली गई. पलभर में एक तूफान उठा और रिश्तों की मर्यादा को कलंकित कर गया.

दीपक और मनीषा को जब होश आया तब तक बहुत देर हो चुकी थी. पहली बार औरत के जिस्म का स्वाद चख कर दीपक का रोमरोम खिल उठा था. उस दिन के बाद से दोनों को जब भी मौका मिलता था, जिस्मानी रिश्ता बना लेते थे.लेकिन दोनों का यह खेल ज्यादा दिनों तक टिक नहीं सका. किसी स्रोत से यह जानकारी मेरठ में नौकरी कर रहे हवलदार प्रवीण को हो गई थी. पत्नी की अनैतिकता और चरित्रहीनता की कहानी सुन कर प्रवीण को बहुत गुस्सा आया.

पत्नी को सबक सिखाने के लिए नौकरी से कुछ दिनों की छुट्टी ले कर प्रवीण जनवरी 2022 के आखिरी सप्ताह में अपने घर आया. घर आया तो जरूर लेकिन वह पत्नी को उस के प्रेमी के साथ रंगेहाथ पकड़ना चाहता था, इसलिए प्रवीण ने पत्नी को कुछ नहीं बताया कि उस के अनैतिक रिश्तों की जानकारी उसे मिल चुकी है, नहीं तो वह सतर्क हो जाती.

प्रवीण ने पत्नी को पकड़ लिया रंगेहाथ

आखिरकार 3 फरवरी, 2022 की रात उस समय प्रवीण ने पत्नी को उस के प्रेमी के साथ रंगेहाथ पकड़ लिया था, जब वह किचन में आटा गूंथ रही थी और उस का प्रेमी दीपक उस से लिपटा हुआ था.
यह देख कर प्रवीण के तनबदन में आग सी लग गई. प्रवीण ने दोनों को जम कर लताड़ा. माहौल गरम देख कर दीपक दबेपांव वहां से अपने घर लौट गया तो प्रवीण ने पत्नी को डांटा, फटकार लगाई और जम कर मारा भी. प्रवीण ने उसे अपने साथ रखने से इंकार कर दिया. पति के इस फैसले से मनीषा बुरी तरह डर गई.

चूंकि मनीषा जानती थी कि उस ने जो किया था, वह गलत था. अगर पति ने उसे छोड़ दिया तो वह कहां जाएगी. समाज में किसे मुंह दिखाएगी. उसी वक्त उस के दिमाग में एक खतरनाक योजना ने जन्म लिया. उस ने तय कर लिया कि इस राज को राज रखना है तो पति को मारना होगा, वरना वह मुझे मार डालेगा.

फिर क्या था, उस ने नारी रूप का जाल फैलाया और आंखों में घडि़याली आंसू भर पति को मनाने में सफल हो गई. उस ने अपने किए की पति से माफी मांगी और उसे भरोसा दिलाने में कामयाब हो गई कि अब दीपक से उस का कोई वास्ता नहीं होगा. पत्नी के माफी मांगने पर प्रवीण का दिल पसीज गया और उस ने सच्चे दिल से उसे माफ कर दिया.
मनीषा यही चाहती भी थी. मामला जब पूरी तरह शांत हो गया तो उस ने पति से कहा, ‘‘आप हाथमुंह धो लीजिए, मैं आप के लिए खाना परोस कर लाती हूं.’’

प्रवीण क्या जानता था कि यह निवाला उस के जीवन का आखिरी निवाला होगा. उस ने जिसे अपने शरीर का आधा अंग समझ कर माफ कर दिया था, वही उस के जीवन को लील लेगी.खैर, पति को मना कर कमरे में भेज दिया. दोनों बच्चे खाना खा कर पहले ही दूसरे कमरे में सो चुके थे. मनीषा कमरे में गई और चुपके से अलमारी से नींद की गोली का पूरा पत्ता निकाल कर रसोई में पहुंची. फिर सभी गोलियों का चूर्ण बना कर आधीआधी कर के दाल और सब्जी की कटोरी में डाल कर अच्छी तरह मिला दिया ताकि दवा पूरी तरह मिक्स हो जाए और अपना असर तुरंत दिखाए.

प्रवीण ने खाना खाया और अपने कमरे में सोने चला गया. बिस्तर पर लेटते ही वह गहरी नींद के आगोश में चला गया. पति के गहरी नींद में आने के बाद मनीषा ने उसे हिलाडुला कर देखा कि कहीं वह अपने मकसद में अधूरी तो नहीं रह गई है. लेकिन वह अपनी चाल में सफल हो चुकी थी.

पति के नींद में जाने के बाद मनीषा ने दीपक को फोन कर के बुलाया. जब दीपक मनीषा के घर पहुंचा तो उस ने सारी योजना उसे बता दी. योजना के मुताबिक, दीपक ने सो रहे प्रवीण के पैर दबोचे तो मनीषा ने अपने हाथों से पति का गला घोट दिया.

पलभर के लिए फौजी प्रवीण के मुर्दे जिस्म ने हरकत की, फिर वह शांत हो गया. मनीषा को अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि उस का पति मर चुका है. फिर उस ने तौलिया पति के मुंह पर रख कर उसे तब तक दबाए रखा जब उसे यकीन हो गया कि प्रवीण सचमुच मर चुका है.उस के बाद दोनों ने सबूत मिटाने के लिए तौलिया और नींद वाली दवा की रैपर उसी रात जला दिए ताकि कोई भी सबूत पुलिस के हाथ न लगे और उन्हें जेल जाना पड़े.

लेकिन दोनों की छोटी सी गलती ने उन्हें सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. इश्क की बिसात पर बिछाई खतरनाक साजिश की पुलिस ने बखिया उधेड़ दी.मनीषा की गलतियों से उस के दोनों बच्चों के सिर से मातापिता का साया उठ गया. कथा लिखे जाने तक पुलिस ने दोनों आरोपियों मनीषा और दीपक के खिलाफ हत्या और साक्ष्य मिटाने की धारा में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था और उन के खिलाफ अप्रैल 2022 में आरोपपत्र भी अदालत में दाखिल कर दिया.

तांती – भाग 3 : क्या अपनी हवस पूरी कर पाया बाबा

मंदिर पहुंचतेपहुंचते दोपहर हो चली थी. पुजारीजी अपने कमरे में एयरकंडीशनर चला कर आराम फरमा रहे थे. उन्हें अपने आराम में खलल अच्छा नहीं लगा. पहले तो उन्होंने रामदीन को पहचाना ही नहीं, फिर लक्ष्मी को देख कर खिल उठे.

अपने बिलकुल पास बिठा कर तांती को छूने के बहाने उस का हाथ पकड़ते हुए बोले, ‘‘अरे तुम… क्या, तुम्हारा दाग तो बढ़ रहा है.’’ ‘‘वही तो मैं भी जानना चाहता हूं. आप ने तो कितने भरोसे के साथ कहा था कि यह ठीक हो जाएगा,’’ रामदीन जरा तेज आवाज में बोला.

‘‘लगता है कि तुम ने तांती के नियमों की पालना नहीं की,’’ पुजारीजी ने अब भी लक्ष्मी का हाथ थाम रखा था. ‘‘अब इस में भी नियमकायदे होते हैं क्या?’’ इस बार लक्ष्मी अपना हाथ छुड़ाते हुए धीरे से बोली. ‘‘और नहीं तो क्या. क्या जो दक्षिणा तुम ने बाबा के चरणों में चढ़ाई थी वह दान का पैसा नहीं था?’’ पुजारी ने पूछा.

‘‘दान का पैसा… क्या मतलब?’’ रामदीन ने पूछा. ‘‘मतलब यह कि तांती दान के पैसे से ही बांधी जाती है, वरना उस का असर नहीं होता. तुम एक काम करो, अपने पासपड़ोसियों और रिश्तेदारों से कुछ दान मांगो और वह रकम दक्षिणा के रूप में यहां भेंट करो… तब तांती सफल होगी,’’ पुजारीजी ने समझाया.

‘‘यानी हाथ पर बंधी यह तांती बेकार हो गई,’’ कहते हुए लक्ष्मी परेशान हो गई. ‘‘हां, अब इस का कोई मोल नहीं रहा. अब तुम जाओ और जब दक्षिणा लायक दान जमा हो जाए तब आ जाना… नई तांती बांधेंगे. और हां, नास्तिक लोगों को जरा इस से दूर ही रखना,’’ पुजारी ने कहा तो रामदीन उस का मतलब समझ गया कि उस का इशारा किस की तरफ है.

दोनों अपना सा मुंह ले कर लौट आए. सुखिया को जब पता चला तो वह बोला, ‘‘ठीक ही तो कह रहे हैं पुजारीजी… तांती भी कोई जेब के पैसों से बांधता है क्या, तुम्हें इतना भी नहीं पता?’’

तांती के लिए दान जमा करतेकरते फिर से बाबा के सालाना मेले के दिन आ गए. इस बार सुखिया के रामदीन से कह दिया कि चाहे नगरनिगम से लोन लेना पड़े मगर उसे और भाभी को पैदल संघ के साथ चलना ही होगा. रामदीन जाना तो नहीं चाहता था, उस ने एक बार फिर से लक्ष्मी को समझाने की कोशिश की कि चल कर डाक्टर को दिखा आए मगर लक्ष्मी को तांती की ताकत पर पूरा भरोसा था. वह इस बार पूरे विधिविधान के साथ इसे बांधना चाहती थी ताकि नाकाम होने की कोई गुंजाइश ही न रहे.

रामदीन को एक बार फिर अपनों के आगे हारना पड़ा. हमेशा की तरह रातभर के जागरण के बाद तड़के ही नाचतेगाते संघ रवाना हो गया. बस्ती पार करते ही मेन सड़क पर आस्था का सैलाब देख कर लक्ष्मी की आंखें हैरानी से फैल गईं. उस ने रामदीन की तरफ कुछ इस तरह से देखा मानो उसे अहसास दिला रही हो कि इतने सालों से वह क्या खोता आ रहा है. दूर निगाहों की सीमा तक भक्त ही भक्त… भक्ति की ऐसी हद उस ने पहली बार ही देखी थी.

अगले ही चौराहे पर सेवा शिविर लगा था. संघ को देखते ही सेवादार उन की ओर लपके और चायकौफी की मनुहार करने लगे. सब ने चाय पी और आगे चले. कुछ ही दूरी पर फ्रूट जूस और चाट की सेवा लगी थी. सब ने जीभर कर खाया और कुछ ने महंगे फल अपने साथ लाए झोले के हवाले किए. पानी का टैंकर तो पूरे रास्ते चक्कर ही लगा रहा था. दिनभर तरहतरह की सेवा का मजा लेते हुए शाम ढलने पर संघ ने वहीं सड़क के किनारे अपना तंबू लगाया और सभी आराम करने लगे.

तभी अचानक कुछ सेवादार आ कर उन के पैर दबाने लगे. लक्ष्मी के लिए यह सब अद्भुत था. उसे वीआईपी होने जैसा गुमान हो रहा था. उधर रामदीन सोच रहा था, ‘लक्ष्मी की मनोकामना पूरी होगी या नहीं पता नहीं मगर बच्चों की कई अधूरी कामनाएं जरूर पूरी हो जाएंगी. ऐसेऐसे फल, मिठाइयां, शरबत और मेवे खाने को मिल रहे हैं जिन के उन्होंने केवल नाम ही सुने थे.’ 10 दिन मौजमस्ती करते, सेवा करवाते आखिर पहुंच ही गए बाबा के धाम… 3 किलोमीटर लंबी कतार देख कर रामदीन के होश उड़ गए. दर्शन होंगे या नहीं… वह अभी सोच ही रहा था कि सुखिया ने कहा, ‘‘वह देख. ऊपर बाबा के मंदिर की सफेद ध्वजा के दर्शन कर ले… और अपनी यात्रा को सफल मान.’’

‘‘मगर दर्शन?’’ ‘‘मेले में ऐसे ही दर्शन होते हैं… चल पुजारीजी के पास भाभी को ले कर चलते हैं,’’ सुखिया ने समझाया.

पुजारीजी बड़े बिजी थे मगर लक्ष्मी को देखते ही खिल उठे. वे बोले, ‘‘अरे तुम. आओआओ… इस बार विधिवत तरीके से तुम्हें तांती बांधी जाएगी…’’ फिर अपने सहायक को इशारा कर के लक्ष्मी को भीतर आने को कहा. रामदीन और सुखिया को बाहर ही इंतजार करने को कहा गया. काफी देर हो गई मगर लक्ष्मी अभी तक बाहर नहीं आई थी. सुखिया शांति और बच्चों को मेला घुमाने ले गया.

रामदीन परेशान सा वहीं बाबा के कमरे में चहलकदमी कर रहा था. एकदो बार उस ने भीतर कोठरी में झांकने की कोशिश भी की मगर बाबा के सहायकों ने उसे कामयाब नहीं होने दिया. अब तो उस का सब्र जवाब देने लगा था. मन अनजाने डर से घबरा रहा था. रामदीन हिम्मत कर के कोठरी के दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाए. सहायकों ने उसे रोकने की कोशिश की मगर रामदीन उन्हें धक्का देते हुए कोठरी में घुस गया.

कोठरी के भीतर नीम अंधेरा था. एक बार तो उसे कुछ भी दिखाई नहीं दिया. धीरेधीरे नजर साफ होने पर उसे जो सीन दिखाई दिया वह उस के होश उड़ाने के लिए काफी था. लक्ष्मी अचेत सी एक तख्त पर लेटी थी. वहीं बाबा अंधनगा सा उस के ऊपर तकरीबन झुका हुआ था. रामदीन ने बाबा को जोर से धक्का दिया. बाबा को इस हमले की उम्मीद नहीं थी, वह धक्के के साथ ही एक तरफ लुढ़क गया.

रामदीन के शोर मचाने पर बहुत से लोग इकट्ठा हो गए और गुस्साए लोगों ने बाबा और उस के चेलों की जम कर धुनाई कर दी. खबर लगते ही मेले का इंतजाम देख रही पुलिस आ गई और रामदीन की लिखित शिकायत पर बाबा को गिरफ्तार कर के ले गई.

तब तक लक्ष्मी को भी होश आ चुका था. घबराई हुई लक्ष्मी को जब पूरी घटना का पता चला तो वह शर्म और बेबसी से फूटफूट कर रो पड़ी. रामदीन ने उसे समझाया, ‘‘तू क्यों रोती है पगली. रोना तो अब उस पाखंडी को है जो धर्म और आस्था की आड़ ले कर भोलीभाली औरतों की अस्मत से खेलता आया है.’’

सुखिया को जब पता चला तो वह दौड़ादौड़ा पुजारी के कमरे की तरफ आया. वह भी इस सारे मामले के लिए अपने आप को कुसूरवार ठहरा रहा था क्योंकि उसी की जिद के चलते रामदीन न चाहते हुए भी यहां आया था और लक्ष्मी इस वारदात का शिकार हुई थी. सुखिया ने रामदीन से माफी मांगी तो रामदीन ने उसे गले से लगा कर कहा, ‘‘तुम क्यों उदास होते हो? अगर आज हम यहां न आते तो यह हवस का पुजारी पुलिस के हत्थे कैसे चढ़ता? इसलिए खुश रहो… जो हुआ अच्छा हुआ…’’

‘‘हम घर जाते ही किसी अच्छे डाक्टर को यह सफेद दाग दिखाएंगे,’’ लक्ष्मी ने अपने हाथ पर बंधी तांती तोड़ कर फेंकते हुए कहा और सब घर जाने के लिए बसस्टैंड की तरफ बढ़ गए. शांति अपने बेटे हरिया की शक्ल के पीछे झांकती पुजारी की परछाईं को पहचानने की कोशिश कर रही थी.

क्यों का प्रश्न नहीं : भाग 3

‘17 साल की उम्र में फौज में गया तो वहां भी इस क्यों ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा. सही होता तो भी क्यों का प्रश्न किया जाता और सही न होता तो भी. 11 साल तक तन, मन, धन से घर वालों की सेवा की. परिवार छूटते समय मेरे समक्ष फिर यह क्यों का प्रश्न था कि मैं ने अपने लिए क्यों कुछ बचा कर नहीं रखा. तुम से शादी हुई, पहली रात तुम्हें कुछ दे नहीं पाया, मुझे पता ही नहीं था कि कुछ देना होता है. पता होता भी तो दे नहीं पाता. मेरे पास कुछ था ही नहीं. 2 महीने की छुट्टी में मिले पैसे से मैं ने शादी की थी. मैं तुम्हें सब कैसे बताता और तुम क्यों सुनतीं? बताने पर शायद कहतीं, ऐसा था तो शादी क्यों की?

‘‘तुम्हारे समक्ष मेरी इमेज क्या थी? मैं बड़ी अच्छी तरह जानता हूं. तुम ने इस इमेज को कभी सुधरने का मौका नहीं दिया, अफसर बनने पर भी. उलटे मुझे ही दोष देती रहीं. तुम्हारे रिश्तेदार मेरे मुंह पर मुझे आहत कर के जाते रहे, कभी तुम ने इस का विरोध नहीं किया. मुझे याद है, तुम्हारी बहन रचना की नईनई शादी हुई थी. रचना और उस के पति को अपने यहां बुलाना था. तुम चाहती थीं, शायद रचना भी चाहती थी कि इस के लिए मैं उस के ससुर को लिखूं.

‘‘मैं ने साफ कहा था, मेरा लिखना केवल उस के पति को बनता है, उस के ससुर को नहीं. जैसे मैं साहनी परिवार का दामाद हूं, वैसे वह है. मैं उस का ससुर नहीं हूं. बात बड़ी व्यावहारिक थी परंतु तुम ने इस को अपनी इज्जत का सवाल बना लिया था. मन के भीतर अनेक क्यों के प्रश्न होते हुए भी मैं तुम्हारे सामने झुक गया था. मैं ने इस के लिए उस के ससुर को लिखा था.

‘‘जीवन में तुम ने कभी मेरे साथ समझौता नहीं किया. हमेशा मैं ने वह किया जो तुम चाहती थीं. रचना और उस का पति आए तो मिलन के लिए वे रात तक इंतजार नहीं कर सके थे. हमें दिन में ही उन के लिए एकांत का प्रबंध करना पड़ा. मुझे बहुत बुरा लगा था.

‘‘मैं समझ नहीं पाया था कि ऐसा कर के वे हमें क्या बताना चाहते थे? यदि हम उन के यहां जाते तो क्या वे ऐसा कह और कर सकते थे?

‘‘तुम्हें याद होगा, अपनी सीमा से अधिक हम ने उन को दिया था. रचना ने क्या कहा था, वह अपने ससुराल में अपनी ओर से इतना और कह देगी कि यह दीदीजीजाजी ने दिया है. जिस का साफ मतलब था कि जो कुछ दिया गया है, वह कम था. मैं मन से बड़ा आहत हुआ था.

‘‘रचना को इस प्रकार आहत करने, बेइज्जत करने और इस कमी का एहसास दिलाने का कोई हक नहीं था. मैं ने तुम्हारी ओर देखा था, शायद तुम इस प्रकार उत्तर दो पर तुम्हें अपने रिश्तेदारों के सामने मेरे इस प्रकार आहत और बेइज्जत होने का कभी एहसास नहीं हुआ.

‘‘क्यों, मैं इस का उत्तर कभी ढूंढ़ नहीं पाया. रचना को मैं ने उत्तर दिया था, ‘तुम्हें कमी लगी थी तो कह देतीं, जहां इतना दिया था, वहां उसे भी पूरा कर देते पर तुम्हें इस कमी का एहसास दिलाने का कोई अधिकार नहीं था. तुम अपने ससुराल में अपनी और हमारी इज्जत बनाना चाहती थीं न? मजा तब था कि बिना एहसास दिलाए इस कमी को पूरा कर देतीं. पर इस झूठ की जरूरत क्या है? क्या इस प्रकार तुम हमारी इज्जत बना पातीं? मुझे नहीं लगता, क्योंकि झूठ, झूठ ही होता है. कभी न कभी खुल जाता. उस समय तुम्हारी स्थिति क्या होती, तुम ने कभी सोचा है?’

‘‘रचना मेरे इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाई थी. जो बात तुम्हें कहनी चाहिए थी, उसे मैं ने कहा था. उन के जाने के बाद कई दिनों तक तुम ने मेरे साथ बात नहीं की थी. उस रोज तो हद हो गई थी जब मैं अपने एक रिश्तेदार की मृत्यु पर गया था. वे केवल मेरे रिश्तेदार नहीं थे बल्कि उन के साथ तुम्हारा भी संबंध था. उन्होंने किस तरह मुझ से तुम्हारे ब्याह के लिए प्रयत्न किया था, तुम भूल गईं. उसी परिवार ने बाऊजी के मरने पर भी सहयोग किया था.

‘‘वहां मुझ से 500 रुपए खर्च हो गए थे. उस के लिए तुम ने किस प्रकार झगड़ा किया था, कहने की जरूरत नहीं है. तुम ने तो यहां तक कह दिया था कि तुम मेरे पैसे को सौ जूते मारती हो. मेरे पैसे को सौ जूते मारने का मतलब मुझे भी सौ जूते मारना.

‘‘मैं तुम्हारे किन रिश्तेदारों की मौत के सियापे करने नहीं गया. उन्हीं रिश्तेदारों ने माताजी के मरने पर आना तो दूर, किसी ने फोन तक नहीं किया. किसी को डिप्रैशन था, किसी के घुटनों में दर्द था. तुम्हारी भाषा की कड़वाहट आज भी भीतर तक कड़वाहट से भर देती है. पर अब इन सब बातों का क्या फायदा? मैं तो केवल इतना जानता हूं कि आप लोगों के सामने मैं हमेशा गरीब बना रहा. किसी बाप को गरीब नहीं होना चाहिए. गरीब हो तो उस में ताने सुनने की ताकत होनी चाहिए. अगर सुनने की ताकत न हो तो उस की हालत घर के कुत्ते से भी बदतर होती है.

‘‘घर के कुत्ते को जितना मरजी दुत्कारो, वह घर की ओर ही आता है. घर को छोड़ कर न जाना उस की मजबूरी होती है. यह मजबूरी जीवनभर चलती है. काश, मैं पहले ही घर को छोड़ कर चला आया होता. मैं खुद ही अपने आत्मसम्मान को रख नहीं पाया था. यदि ऐसा करता तो मेरे उन कर्मों का क्या होता जो मुझे हर हाल में भुगतने थे.’’

‘‘गलतियां हुई हैं, मैं मानती हूं. क्या इन सब को भूल कर आगे की जिंदगी अच्छी तरह से नहीं जी जा सकती,’’ इतनी देर से चुप मेरी पत्नी ने कहा.

‘‘हर रोज यही कोशिश करता हूं कि सब भूल जाऊं. भूल जाऊं कि जिंदगी के हर मोड़ पर मुझे लताड़ा गया है. हर कदम पर मैं ने आत्मसम्मान को खोया है. भूल जाऊं कि हर गलती के लिए मुझे ही दोषी ठहराया जाता रहा है. चाहे वह सोफे के खराब होने की बात हो या कुरसियों के टूटने की. मैं कैसे कहता कि ये बच्चों की उछलकूद से हुआ है. अगर कहता भी तो इसे कौन मानता.

‘‘मैं ने बड़ी मुश्किल से अपनेआप को संभाला है, अपने ढंग से जिंदगी को सैट किया है. चाहे पहले की यादें मुझे हर रोज पीडि़त करती हैं तो भी मुझे यहां राजी के साथ से कोई एतराज नहीं है परंतु इसे अपनी जिंदगी के दिन दूसरे कमरे में गुजारने होंगे. इस की पूरी सेवा होगी. इस की सारी जरूरतों का ध्यान रखा जाएगा. इस की तकलीफों के बारे में हर रोज पूछा जाएगा और इलाज करवाया जाएगा. इस ने चाहे मुझे हजार रुपया महीना देना स्वीकार न किया हो पर मैं इसे 5 हजार रुपए महीना दूंगा.

‘‘24 घंटे टैलीफोन इस के सिरहाने रहेगा, चाहे जिस से बात करे. पर मेरे जीवन में इस का कोई दखल नहीं होगा. मैं कहां जाता हूं, क्या करता हूं, इस पर कोई क्यों का प्रश्न नहीं होगा. मुझे कोई भी फौरमैलिटी बरदाश्त नहीं होगी. बस, इतना ही.’’

वे दोनों चुप रहे. शायद उन को मेरी बातें मंजूर थीं. मैं ने बेबे से कह कर राजी का सामान दूसरे कमरे में रखवा दिया.

 

ASI के फरेेबी प्यार में बुरे फंसे थाना प्रभारी : भाग 2

इसी सिलसिले में यह भी बात सामने आई कि रंजना टीआई को ब्लैकमेल कर 50 लाख रुपए वसूल चुकी थी. वह उस का इकलौता शिकार नहीं थे, बल्कि पहले भी 3 पुलिसकर्मियों पर दुष्कर्म का आरोप लगा कर उन से लाखों रुपए वसूल चुकी थी. रंजना खांडे मूलरूप से खरगोन के धामनोद की रहने वाली थी.

उस के बाद ही करीब 3 बजे पुलिस कमिश्नर के औफिस के बाहर गोलियां चली थीं. टीआई पंवार इस वारदात को ले कर घर से ही पूरा मन बना कर आए थे. यहां तक कि वह अपनी पत्नी तक से आक्रोश जता चुके थे. उन्होंने कहा था कि गोविंद जायसवाल से पैसे ले कर ही लौटेंगे.
कपड़ा व्यापारी गोविंद को उन्होंने 25 लाख रुपए दिए थे, जो लौटाने में आनाकानी कर रहा था. उन्होंने पत्नी लीलावती उर्फ वंदना से यह भी कहा था कि यदि उस ने पैसे नहीं दिए तो वह उसे मार डालेंगे. बात नहीं बनी तो अपनी जान भी दांव पर लगा देंगे.

58 साल के हाकम सिंह पंवार की नियुक्ति इसी साल 6 फरवरी को भोपाल के श्यामला हिल्स थाने में हुई थी. इस से पहले वह गौतमपुर, खुडेल, सर्राफा थाना, इंदौर कोतवाली, खरगोन, भिकमगांव महेश्वर, राजगढ़ में पदस्थापित रह चुके थे.उन का निवास स्थान वटलापुर इलाके में था. वहां उन्होंने एक फ्लैट किराए पर ले रखा था, लेकिन रहने वाले मूलत: उज्जैन जिले के तराना कस्बे के थे. वह भोपाल में अकेले रहते थे. मध्य प्रदेश पुलिस में वह सन 1988 में कांस्टेबल के पद पर भरती हुए थे. बताया जाता है कि उन्होंने 5 शादियां कर रखी थीं.

पहली शादी उन्होंने लीलावती उर्फ वंदना से की थी. बताया जाता है कि दूसरी शादी उन्होंने सीहोर की रहने वाली सरस्वती से की. गौतमपुरा में पोस्टिंग के दौरान उन की मुलाकात रेशमा उर्फ जागृति से हुई जो मूलरूप से इंदौर की पुरामत कालोनी की रहने वाली थी. वह उन की तीसरी पत्नी बनी.
मजीद शेख की बेटी रेशमा ने टीआई हाकिमसिंह पंवार पर अपना इस तरह प्रभाव जमा लिया था कि वह उन से जब चाहे तब पैसे ऐंठती रहती थी. चौथी प्रेमिका के रूप में रंजना खांडे उन के जीवन में आई. हाकमसिंह की सर्विस बुक में लता पंवार का नाम है. चर्चा यह भी है कि भोपाल में तैनाती के दौरान उन्होंने माया नाम की महिला से शादी की थी. पुलिस इन सब की जांच कर रही है.

रंजना 3 पुलिस वालों से ऐंठ चुकी थी ,70 लाख रुपए जांच में पता चला कि सन 2012 में मध्य प्रदेश पुलिस में भरती हुई रंजना धार जिले के कस्बा धामनोद की रहने वाली थी और मौजूदा समय में इंदौर की सिलिकान सिटी में रह रही थी. उस की पंवार से अकसर मुलाकात महेश्वर थाने में होती थी.
वह महेश्वर थाने पर पंवार से मिलने के लिए 12 किलोमीटर की दूरी तय कर आती थी. रंजना के साथ उस का भाई कमलेश खांडे भी पंवार से मिलता रहता था.

रजंना और कमलेश ने मिल कर ब्लैकमेलिंग का तानाबाना बुना था. 28 वर्षीय कमलेश रंजना का भाई था. उस के बारे में मालूम हुआ कि वह एक आवारा किस्म का व्यक्ति था.3 पुलिसकर्मियों को ब्लैकमेल करने में उस की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी. तीनों से दोनों बहनभाई ने करीब 70 लाख रुपए की वसूली की थी. उन का तरीका एक औरत के लिए शर्मसार करने वाला था, लेकिन रंजना को इस से कोई फर्क नहीं पड़ता था. वह पैसे की इस कदर भूखी थी कि उस ने अपनी इज्जत, शर्म और मानमर्यादा को ताक पर रख दिया था.

एएसआई रंजना की दिलफेंक अदाओं पर पंवार तभी फिदा हो गए थे, जब वह पहली बार महेश्वर थाने में मिली थी. दरअसल, रंजना 2018 में थाने के काम से महेश्वर आई थी, वहां उस की मुलाकात टीआई पंवार से हुई थी.पंवार ने उस की मदद की थी, जिस से रंजना ने उसे साथ कौफी पीने का औफर दे दिया था. पंवार उस के औफर को ठुकरा नहीं पाए थे. उन के बीच दोस्ती की पहली शुरुआत कौफी टेबल पर हुई, जो जल्द ही गहरी हो गई.

साथ में पैग छलका कर टीआई से बनाए थे शारीरिक संबंध फिर एक दिन अपने भाई के साथ पंवार के कमरे पर आ धमकी. उस ने बताया कि उस के भाई का बिजनैस में किसी के साथ झगड़ा हो गया है. मामला उन्हीं के थाने का है. वह चाहें तो मामले को निपटा सकते हैं. इस संबंध में पंवार ने रंजना को मदद करने का वादा किया. इस खुशी में रंजना ने उन्हें एक छोटी सी पार्टी देने का औफर दिया और भाई से शराब की बोतलें मंगवा लीं. कमलेश विदेशी शराब की बोतलें और खाने का सामान रख कर चला गया.

पंवार के सामने शराब और शबाब दोनों थे. वह उस रोज बेहद खुश थे. उन की खुशी को बढ़ाने में रंजना ने भी खुले मन से साथ दिया था. देर रात तक शराब का दौर पैग दर पैग चलता रहा. इस दरम्यान रंजना ने टीआई हाकम सिंह पंवार के लिए न केवल अपने दिल के दरवाजे खोल दिए, बल्कि पंवार के सामने कपडे़ खोलने से भी परहेज नहीं किया.

बैडरूम में शराब की गंध के साथ दोनों के शरीर की गंध कब घुलमिल गई, उन्हें इस का पता ही नहीं चला. बिस्तर पर अधनंगे लेटे हुए जब उन की सुबह में नींद खुली, तब उन्होंने एकदूसरे को प्यार भरी निगाह से देखा. आंखों- आखों में बात हुई और एकदूसरे को चूम लिया. कुछ दिनों बाद रंजना पंवार से मिलने एक बार फिर अपने भाई के साथ आई. उस ने पंवार को धन्यवाद दिया और कहा कि उस की बदौलत ही उस का मामला निपट पाया. इसी के साथ रंजना ने एक दूसरी घरेलू समस्या भी बता दी. वह समस्या नहीं, बल्कि पैसे से मदद करने की थी.

रंजना ने बताया कि उस के परिवार को तत्काल 5 लाख रुपए की जरूरत है. पंवार पहले तो इस बड़ी रकम को ले कर सोच में पड़ गए, किंतु जब उस ने शराब की बोतल दिखाई तब वह पैसे देने के लिए राजी हो गए. टीआई पंवार ने उसी रोज कुछ पैसे अपने घर से मंगवाए और कुछ दोस्तों से ले कर रंजना को दे दिए.बदले में रंजना को पहले की तरह ही रात रंगीन करने में जरा भी हिचक नहीं हुई. इस तरह पंवार को रंजना से जहां यौनसुख मिलने लगा, वहीं रंजना के लिए पंवार सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन चुके थे. धीरेधीरे रंजना उन से लगातार पैसे की मांग करने लगी. पंवार भी उस की पूर्ति करते रहे. लेकिन आए दिन की जाने वाली इन मांगों से पंवार काफी तंग आ चुके थे.

हद तो तब हो गई जब रंजना ने एक बार पूरे 25 लाख रुपए की मांग कर दी. उस ने न केवल रुपए मांगे, बल्कि भाई के लिए एक कार तक मांग ली. इस मांग के बाद पंवार का पारा बढ़ गया. वह गुस्से में आ गए. फोन पर ही धमकी दे डाली. किंतु रंजना ने बड़ी शालीनता से उन की धमकी का जवाब एक वीडियो क्लिपिंग के साथ दे दिया.

क्यों का प्रश्न नहीं : भाग 2

‘अब इस का क्या फायदा. तब तो मैं कहता ही रह गया था कि मैं ने ऐसा कुछ नहीं किया. मैं ऐसा कर ही नहीं सकता था, पर किसी ने मेरी एक न सुनी. किस प्रकार आप सब ने मुझे धक्के दे कर घर से बाहर निकाला, मुझे कहने की जरूरत नहीं है. मैं आज भी उन धक्कों की, उन दुहत्थड़ों की पीड़ा अपनी पीठ पर महसूस करता हूं. मैं इस पीड़ा को कभी भूल नहीं पाया. भूल पाऊंगा भी नहीं.

‘‘मुझे आज भी सर्दी की वह उफनती रात याद है. बड़ी मुश्किल से कुछ कपड़े, फौज के डौक्यूमैंट, एक डैबिट कार्ड, जिस में कुछ रुपए पड़े थे, घर से ले कर निकला था. बाहर निकलते ही सर्दी के जबरदस्त झोंके ने मेरे बूढ़े शरीर को घेर लिया था. धुंध इतनी थी कि हाथ को हाथ दिखाई नहीं देता था. सड़क भी सुनसान थी. दूरदूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा था. रात, मेरे जीवन की तरह सुनसान पसरी पड़ी थी. रिश्तों के टूटन की कड़वाहट से मैं निराश था.फिर मैं ने स्वयं को संभाला और पास के

एटीएम से कुछ रुपए निकाले. अभी सोच ही रहा था कि मुख्य सड़क तक कैसे पहुंचा जाए कि पुलिस की जिप्सी बे्रक की भयानक आवाज के साथ मेरे पास आ कर रुकी. उस में बैठे एक इंस्पैक्टर ने कहा, ‘क्यों भई, इतनी सर्द रात में एटीएम के पास क्या कर रहे हो? कोई चोरवोर तो नहीं हो?’ मैं पुलिस की ऐसी भाषा से वाकिफ था.

‘‘‘नहीं, इंस्पैक्टर साहब, मैं सेना का रिटायर्ड कर्नल हूं. यह रहा मेरा आई कार्ड. इमरजैंसी में मुझे कहीं जाना पड़ रहा है. एटीएम से पैसे निकालने आया था. मुख्य सड़क तक जाने के लिए कोई सवारी ढूंढ़ रहा था कि आप आ गए.’

‘‘‘घर में सड़क तक छोड़ने के लिए कोई नहीं है?’ इंस्पैक्टर की भाषा बदल गई थी. वह सेना के रिटायर्ड कर्नल से ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं कर सकता था.

‘‘‘नहीं, यहां मैं अकेले ही रहता हूं,’ मैं कैसे कहता, घर से मैं धक्के दे कर निकाला गया हूं.

‘‘इंस्पैक्टर ने कहा, ‘आओ साहब, मैं आप को सड़क तक छोड़ देता हूं.’ उन्होंने न केवल सड़क तक छोड़ा बल्कि स्टेशन जाने वाली बस को रोक कर मुझे बैठाया भी. ‘जयहिंद’ कह कर सैल्यूट भी किया, कहा, ‘सर, पुलिस आप की सेवा में हमेशा हाजिर है.’ कैसी विडंबना थी, घर में धक्के और बाहर सैल्यूट. जीवन की इस पहेली को मैं समझ नहीं पाया था.

‘‘स्टेशन पहुंच कर मैं सैनिक आरामगृह में गया. वहां न केवल मुझे कमरा मिला बल्कि नरमगरम बिस्तर भी मिला. तुम्हारे जैसे हृदयहीन लोग इस बात का अनुमान ही नहीं लगा सकते कि उस ठिठुरती रात में बेगाने यदि मदद नहीं करते तो मेरी क्या हालत होती. मैं खुद के जीवन से त्रस्त था. मन के भीतर यह विचार दृढ़ हो रहा था कि ऐसी स्थिति में मैं कैसे जी पाऊंगा. मन में यह विचार भी था, मैं एक सैनिक हूं. मैं अप्राकृतिक मौत मर ही नहीं सकता. मैं डेरे में पनाह मिलने के प्रति भी अनिश्चित था. पर डेरे ने मुझे दोनों हाथों से लिया. पैसे की तंगी ने मुझे बहुत तंग किया. डेरे के लंगर में खाते समय मुझे जो आत्मग्लानि होती थी, उस से उबरने के लिए मुझे दूरदूर तक कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. आप ने मुझे मेरी पैंशन में से हजार रुपया महीना देना भी स्वीकार नहीं किया तो मेरे पास इस के अलावा और कोई चारा नहीं था कि पहले का पैंशन डेबिट कार्ड कैंसिल करवा कर नया कार्ड इश्यू करवाऊं. मेरे जीतेजी पैंशन पर केवल मेरा अधिकार था.

‘‘मैं जीवनभर ‘क्यों’ के प्रश्नों का उत्तर देतेदेते थक गया हूं. बचपन में, ‘खोता हो गया है, अभी तक बिस्तर में शूशू क्यों करता हूं? अच्छा, अब फैशन करने लगा है. पैंट में बटन के बजाय जिप क्यों लगवा ली? अरे, तुम ने नई पैंट क्यों पहन ली? मौडल टाउन में मौसी के यहां दरियां देने ही तो जाना है. नई पैंट आनेजाने के लिए क्यों नहीं रख लेता? चल, नेकर पहन कर जा.’

‘‘काश, उस रोज मैं नेकर पहन कर न गया होता. मैं अभी भंडारी ब्रिज चढ़ ही रहा था कि साइकिल पर आ रहे लड़के ने मुझे रोका. ‘काम करोगे?’ मुझे उस की बात समझ नहीं आई, इसलिए मैं ने पूछा था, ‘कैसा काम?’ ‘घर का काम, मुंडू वाला.’ उस ने मेरे हुलिए, बिना प्रैस किए पहनी कमीज, बिना कंघी के बेतरतीब बाल, ढीली नेकर, कैंची चप्पल, बगल में दरियां उठाए किसी घर में काम करने वाला मुंडू समझ लिया था.

‘‘मैं ने उसे कहा था, ‘नहीं, मैं ने नहीं करना है, मैं 7वीं में पढ़ता हूं.’ फिर उस ने कहा था, ‘अरे, अच्छे पैसे मिलेंगे. खाना, कपड़ा, रहने की जगह मिलेगी. तुम्हारी जिंदगी बन जाएगी.’ जब मैं ने उसे सख्ती से झिड़क कर कहा कि मैं पढ़ रहा हूं और मुझे मुंडू नहीं बनना है तब जा कर उस ने मेरा पीछा छोड़ा था. बाद में शीशे में अपना हुलिया देखा तो वह किसी मुंडू से भी गयागुजरा था. मेरे कपड़े ऐसे क्यों थे? मेरे पास इस का भी उत्तर नहीं था. बाऊजी के अतिरिक्त सभी मेरा मजाक उड़ाते रहे.

‘‘मेरे दूसरे उपनामों के साथ ‘मुंडू’ उपनाम भी जुड़ गया था. उस भाई से कभी ‘क्यों’ का प्रश्न नहीं पूछा गया जो गली की एक लड़की के लिए पागल हुआ था. अफीम खा कर उस की चौखट पर मरने का नाटक करता रहा. गली में उसे दूसरी चौखट मिलती ही नहीं थी. उस बहन से भी कभी क्यों का प्रश्न नहीं पूछा गया जो संगीत के शौक के विपरीत लेडी हैल्थविजिटर के कोर्स में दाखिला ले कर कोर्स पूरा नहीं कर सकी, पैसा और समय बरबाद किया और परिवार को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया. उस भाई से भी क्यों का प्रश्न नहीं किया गया जो पहले नेवी में गया. छोड़ कर आया पढ़ने लगा, किसी बात पर झगड़ा किया तो फौज में चला गया. वहां बीमार हुआ, फौज से छुट्टी हुई, फिर पढ़ने लगा. पढ़ाई फिर भी पूरी नहीं की. सब से छोटे ने तो परिवार की लुटिया ही डुबो दी. मैं ने बाऊजी को चुपकेचुपके रोते देखा था. मैं पढ़ने में इतना तेज नहीं था. मुझ पर प्रश्नों की बौछार लगा दी जाती. पढ़ना नहीं आता तो इस में पैसा क्यों बरबाद कर रहे हो? इस क्यों का उत्तर उस समय भी मेरे पास नहीं था और आज भी नहीं है.

2 पत्नियों ने दी पति की सुपारी : भाग 1

6जुलाई की रात कोई 8-सवा 8 बजे का वक्त था, जब दक्षिणपूर्वी दिल्ली के गोविंदपुरी इलाके में एक डीटीसी बस के ड्राइवर संजीव कुमार की गोली मार कर हत्या कर दी गई. जिस समय हत्या हुई, उस समय 55 वर्षीय संजीव अपनी 28 वर्षीय पत्नी गीता उर्फ नजमा और अपने 10 साल के बेटे गौरव के साथ मोटरसाइकिल से कहीं जा रहा था.

दीपालय स्कूल के पास संजीव पहुंचा ही था कि उस की चलती बाइक के बगल से एक अन्य बाइक पर 2 सवार निकले और उन्होंने संजीव की बाइक ओवरटेक करते हुए उसे गोली मार दी. गोली लगते ही संजीव एक ओर को गिर पड़ा और उसी के साथ बाइक पर बैठी उस की पत्नी और बेटा भी गिर गए.

गीता बाइक से गिरते बेहोश हो गई थी. जब उसे होश आया तो उस ने देखा कि उस का पति घायल अवस्था में एक ओर पड़ा है और उन के चारों तरफ भारी भीड़ जुटी है.
लोगों की मदद से वह अपने पति को ले कर पास के मजीदिया अस्पताल गई, जहां उस ने डाक्टरों को बताया कि उन का एक्सीडेंट हो गया है. डाक्टरों ने संजीव का चैकअप किया और उसे मृत घोषित करते हुए पुलिस को फोन कर दिया. क्योंकि मामला एक्सीडेंट का नहीं, बल्कि गोली लगने का था.

सूचना मिलने के बाद गोविंदपुरी के थानाप्रभारी जगदीश यादव टीम के साथ मजीदिया अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने जब गीता से घटना की जानकारी लेनी चाही तो वह पुलिस को अलगअलग बयान दे कर गुमराह करने लगी. कभी कहती कि एक्सीडेंट हुआ है, तो कभी कहती कि उसे कुछ पता नहीं, वह तो बेहोश हो गई थी और कभी कहती कि कालकाजी बस डिपो के कुछ लोगों से संजीव की दुश्मनी थी, उन्होंने उसे गोली मारी है.

इस दौरान गीता के चेहरे पर पति को खोने का वैसा गम किसी को नजर नहीं आया जो अकसर ऐसे मौकों पर दिखता है. जब उस से सख्ती से पूछताछ हुई तो उस का झूठ ज्यादा देर पुलिस के सामने टिक नहीं पाया.गीता से पूछताछ और उस के मोबाइल फोन को खंगालने के बाद जो सनसनीखेज कहानी सामने आई. उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के पास सिकंदराबाद अंतर्गत आने वाले एक गांव बिलसुरी निवासी संजीव कुमार के मातापिता अपने 3 बेटों और एक बेटी के साथ दिल्ली के गोविंदपुरी इलाके में आ कर रहने लगे थे.

उन्होंने अपने बच्चों को यहीं के सरकारी स्कूल में पढ़ायालिखाया. बीचबीच में वह गांव भी चले जाते थे. बच्चों के जवान होने पर उन्होंने सभी की शादियां कर दीं और सभी ने इसी इलाके में अलगअलग अपनी गृहस्थी बना ली. इस के बाद मातापिता गांव लौट गए और वह खेतीकिसानी देखने लगे.

संजीव कुमार शुरू से ही परिवार से अलग रहा करता था. दबंग टाइप के संजीव की अपने भाइयों से और मातापिता से ज्यादा बनती नहीं थी. संजीव ने जब अपने दम पर डीटीसी बस ड्राइवर की सरकारी नौकरी पा ली तो उस के हौसले और बुलंद हो गए.
कुछ ही साल में वह अपनी दादागिरी और नेतागिरी की बदौलत डीटीसी कर्मचारी यूनियन का नेता भी बन गया. सरकारी तनख्वाह के अलावा वह कई अन्य गैरकानूनी तरीकों से पैसे कमाने लगा और कई जमीनों पर उस ने अवैध कब्जे कर लिए, जिन्हें बाद में सरकारी कर्मचारियों के साथ मिलीभगत और रिश्वत के दम पर उस ने अपने नाम लिखवा लिया.

 

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