एक डाली के तीन फूल- भाग 1: 3 भाईयों ने जब सालो बाद साथ मनाई दीवाली

भाई साहब की चिट्ठी मेरे सामने मेज पर पड़ी थी. मैं उसे 3 बार पढ़ चुका था. वैसे जब औफिस संबंधी डाक के साथ भाई साहब की चिट्ठी भी मिली तो मैं चौंक गया, क्योंकि एक लंबे अरसे से हमारे  बीच एकदूसरे को पत्र लिखने का सिलसिला लगभग खत्म हो गया था. जब कभी भूलेभटके एकदूसरे का हाल पूछना होता तो या तो हम टेलीफोन पर बात कर लिया करते या फिर कंप्यूटर पर 2 पंक्तियों की इलेक्ट्रौनिक मेल भेज देते.

दूसरी तरफ  से तत्काल कंप्यूटर की स्क्रीन पर 2 पंक्तियों का जवाब हाजिर हो जाता, ‘‘रिसीव्ड योर मैसेज. थैंक्स. वी आर फाइन हियर. होप यू…’’ कंप्यूटर की स्क्रीन पर इस संक्षिप्त इलेक्ट्रौनिक चिट्ठी को पढ़ते हुए ऐसा लगता जैसे कि 2 पदाधिकारी अपनी राजकीय भाषा में एकदूसरे को पत्र लिख रहे हों. भाइयों के रिश्तों की गरमाहट तनिक भी महसूस नहीं होती.

हालांकि भाई साहब का यह पत्र भी एकदम संक्षिप्त व बिलकुल प्रासंगिक था, मगर पत्र के एकएक शब्द हृदय को छूने वाले थे. इस छोटे से कागज के टुकड़े पर कलम व स्याही से भाई साहब की उंगलियों ने जो चंद पंक्तियां लिखी थीं वे इतनी प्रभावशाली थीं कि तमाम टेलीफोन कौल व हजार इलेक्ट्रौनिक मेल इन का स्थान कभी भी नहीं ले सकती थीं. मेरे हाथ चिट्ठी की ओर बारबार बढ़ जाते और मैं हाथों में भाई साहब की चिट्ठी थाम कर पढ़ने लग जाता.

प्रिय श्याम,

कई साल बीत गए. शायद मां के गुजरने के बाद हम तीनों भाइयों ने कभी एकसाथ दीवाली नहीं मनाई. तुम्हें याद है जब तक मां जीवित थीं हम तीनों भाई देश के चाहे किसी भी कोने में हों, दीवाली पर इकट्ठे होते थे. क्यों न हम तीनों भाई अपनेअपने परिवारों सहित एक छत के नीचे इकट्ठा हो कर इस बार दीवाली को धूमधाम से मनाएं व अपने रिश्तों को मधुरता दें. आशा है तुम कोई असमर्थता व्यक्त नहीं करोगे और दीवाली से कम से कम एक दिन पूर्व देहरादून, मेरे निवास पर अवश्य पहुंच जाओगे. मैं गोपाल को भी पत्र लिख रहा हूं.

तुम्हारा भाई,

मनमोहन.

दरअसल, मां के गुजरने के बाद, यानी पिछले 25 सालों से हम तीनों भाइयों ने कभी दीवाली एकसाथ नहीं मनाई. जब तक मां जीवित थीं हम तीनों भाई हर साल दीवाली एकसाथ मनाते थे. मां हम तीनों को ही दीवाली पर गांव, अपने घर आने को बाध्य कर देती थीं. और हम चाहे किसी भी शहर में पढ़ाई या नौकरी कर रहे हों दीवाली के मौके पर अवश्य एकसाथ हो जाते थे.

हम तीनों मां के साथ लग कर गांव के अपने उस छोटे से घर को दीयों व मोमबत्तियों से सजाया करते. मां घर के भीतर मिट्टी के बने फर्श पर बैठी दीवाली की तैयारियां कर रही होतीं और हम तीनों भाई बाहर धूमधड़ाका कर रहे होते. मां मिठाई से भरी थाली ले कर बाहर चौक पर आतीं, जमीन पर घूमती चक्कर घिन्नियों व फूटते बम की चिनगारियों में अपने नंगे पैरों को बचाती हुई हमारे पास आतीं व मिठाई एकएक कर के हमारे मुंह में ठूंस दिया करतीं.

फिर वह चौक से रसोईघर में जाती सीढि़यों पर बैठ जाया करतीं और मंत्रमुग्ध हो कर हम तीनों भाइयों को मस्ती करते हुए निहारा करतीं. उस समय मां के चेहरे पर आत्मसंतुष्टि के जो भाव रहते थे, उन से ऐसा प्रतीत होता था जैसे कि दुनिया जहान की खुशियां उन के घर के आंगन में थिरक रही हैं.

हम केवल अपनी मां को ही जानते थे. पिता की हमें धुंधली सी ही याद थी. हमें मां ने ही बताया था कि पूरा गांव जब हैजे की चपेट में आया था तो हमारे पिता भी उस महामारी में चल बसे थे. छोटा यानी गोपाल उस समय डेढ़, मैं साढ़े 3 व भाई साहब 8 वर्ष के थे. मां के परिश्रमों, कुर्बानियों का कायल पूरा गांव रहता था. वस्तुत: हम तीनों भाइयों के शहरों में जा कर उच्च शिक्षा हासिल करने, उस के बाद अच्छे पदों पर आसीन होने में मां के जीवन के घोर संघर्ष व कई बलिदान निहित थे.

मां हम से कहा करतीं, तुम एक डाली के 3 फूल हो. तुम तीनों अलगअलग शहरों में नौकरी करते हो. एक छत के नीचे एकसाथ रहना तुम्हारे लिए संभव नहीं, लेकिन यह प्रण करो कि एकदूसरे के सुखदुख में तुम हमेशा साथ रहोगे और दीवाली हमेशा साथ मनाओगे.’

हम तीनों भाई एक स्वर में हां कर देते, लेकिन मां संतुष्ट न होतीं और फिर बोलतीं, ‘ऐसे नहीं, मेरे सिर पर हाथ रख कर प्रतिज्ञा करो.’

हम तीनों भाई आगे बढ़ कर मां के सिर पर हाथ रख कर प्रतिज्ञा करते, मां आत्मविभोर हो उठतीं. उन की आंखों से खुशी के आंसू छलक जाते.

मां के मरने के बाद गांव छूटा. दीवाली पर इकट्ठा होना छूटा. और फिर धीरेधीरे बहुतकुछ छूटने लगा. आपसी निकटता, रिश्तों की गरमी, त्योहारों का उत्साह सभीकुछ लुप्त हो गया.

कहा जाता है कि खून के रिश्ते इतने गहरे, इतने स्थायी होते हैं कि कभी मिटते नहीं हैं, मगर दूरी हर रिश्ते को मिटा देती है. रिश्ता चाहे दिल का हो, जज्बात का हो या खून का, अगर जीवंत रखना है तो सब से पहले आपस की दूरी को पाट कर एकदूसरे के नजदीक आना होगा.

हम तीनों भाई एकदूसरे से दूर होते गए. हम एक डाली के 3 फूल नहीं रह गए थे. हमारी अपनी टहनियां, अपने स्तंभ व अपनी अलग जड़ बन गई थीं. भाई साहब देहरादून में मकान बना कर बस गए थे. मैं मुंबई में फ्लैट खरीद कर व्यवस्थित हो गया था. गोपाल ने बेंगलुरु में अपना मकान बना लिया था. तीनों के ही अपनेअपने मकान, अपनेअपने व्यवसाय व अपनेअपने परिवार थे.

तुम्हें पाने की जिद में – भाग 1 : रत्ना की क्या जिद थी

ट्रेन में बैठते ही सुकून की सांस ली. धीरज ने सारा सामान बर्थ के नीचे एडजस्ट कर दिया था. टे्रन के चलते ही ठंडी हवा के झोंकों ने मुझे कुछ राहत दी. मैं अपने बड़े नाती गौरव की शादी में शामिल होने इंदौर जा रही हूं.

हर बार की घुटन से अलग इस बार इंदौर जाते हुए लग रहा है कि अब कष्टों का अंधेरा मेरी बेटी की जिंदगी से छंट चुका है. आज जब मैं अपनी बेटी की खुशियों में शामिल होने इंदौर जा रही हूं तो मेरा मन सफर में किसी पत्रिका में सिर छिपा कर बैठने की जगह उस की जिंदगी की किताब को पन्ने दर पन्ने पलटने का कर  रहा है.

कितने खुश थे हम जब अपनी प्यारी बिटिया रत्ना के लिए योग्य वर ढूंढ़ने में अपने सारे अनुभव और प्रयासों के निचोड़ से जीतेंद्र को सर्वथा उपयुक्त वर समझा था. आकर्षक व्यक्तित्व का धनी जीतेंद्र इंदौर के प्रतिष्ठित कालिज में सहायक प्राध्यापक है. अपने मातापिता और भाई हर्ष के साथ रहने वाले जीतेंद्र से ब्याह कर मेरी रत्ना भी परिवार का हिस्सा बन गई. गुजरते वक्त के साथ गौरव और यश भी रत्ना की गोद में आ गए. जीतेंद्र गंभीर और अंतर्मुखी थे. उन की गंभीरता ने उन्हें एकांतप्रिय बना कर नीरसता की ओर ढकेलना शुरू कर दिया था.

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जीतेंद्र के छोटे भाई चपल और हंसमुख हर्ष के मेडिकल कालिज में चयनित होते ही मातापिता का प्यार और झुकाव उस के प्रति अधिक हो गया. यों भी जोशीले हर्ष के सामने अंतर्मुखी जीतेंद्र को वे दब्बू और संकोची मानते आ रहे थे. भावी डाक्टर के आगे कालिज में लेक्चरर बेटे को मातापिता द्वारा नाकाबिल करार देना जीतेंद्र को विचलित कर गया.

बारबार नकारा और दब्बू घोषित किए जाने का नतीजा यह निकला कि जीतेंद्र गहरे अवसाद से ग्रस्त हो गए. संवेदनशील होने के कारण उन्हें जब यह एहसास और बढ़ा तो वह लिहाज की सीमाओं को लांघ कर अपने मातापिता, खासकर मां को अपना सब से बड़ा दुश्मन समझने लगे. वैचारिक असंतुलन की स्थिति में जीतेंद्र के कानों में कुछ आवाजें गूंजती प्रतीत होती थीं जिन से उत्तेजित हो कर वह अपने मातापिता को गालियां देने से भी नहीं चूकते थे.

शांत कराने या विरोध का नतीजा मारपीट और सामान फेंकने तक पहुंच जाता था. वह मां से खुद को खतरा बतला कर उन का परोसा हुआ खाना पहले उन्हें ही चखने को मजबूर करते थे. उन्हें संदेह रहता कि इस में जहर मिला होगा.

जीतेंद्र को रत्ना का अपनी सास से बात करना भी स्वीकार न था. वह हिंसक होने की स्थिति में उन का कोप भाजन नन्हे गौरव और यश को भी बनना पड़ता था.

मेरी रत्ना का सुखी संसार क्लेश का अखाड़ा बन गया था. अपने स्तर पर प्यारदुलार से जीतेंद्र के मातापिता और हर्ष ने सबकुछ सामान्य करने की कोशिश की थी मगर तब तक पानी सिर से ऊपर जा चुका था. यह मानसिक ग्रंथि कुछ पलोें में नहीं शायद बचपन से ही जीतेंद्र के मन में पल रही थी.

दौरों की बढ़ती संख्या और विकरालता को देखते हुए हर्ष और उन के मातापिता जीतेंद्र को मानसिक आरोग्यशाला आगरा ले कर गए. मनोचिकित्सक ने मेडिकल हिस्ट्री जानने के बाद कुछ परीक्षणों व सी.टी. स्केन की रिपोर्ट को देख कर उन की बीमारी को सीजोफे्रनिया बताया. उन्होंने यह भी कहा कि इस रोग का उपचार लंबा और धीमा है. रोगी के परिजनों को बहुत धैर्य और संयम से काम लेना होता है. रोगी के आक्रामक होने पर खुद का बचाव और रोगी को शांत कर दवा दे कर सुलाना कोई आसान काम नहीं था. उन्हें लगातार काउंसलिंग की आवश्यकता थी.

हम परिस्थितियों से अनजान ही रहते यदि गौरव और यश को अचंभित करने यों अचानक इंदौर न पहुंचते. हालात बदले हुए थे. जीतेंद्र बरसों के मरीज दिखाई दे रहे थे. रत्ना पति के क्रोध की निशानियों को शरीर पर छिपाती हुई मेरे गले लग गई थी. मेरा कलेजा मुंह को आ रहा था. जिस रत्ना को एक ठोकर लगने पर मैं तड़प जाती थी वही रत्ना इतने मानसिक और शारीरिक कष्टों को खुद में समेटे हुए थी.

जब कोई उपाय नहीं रहता था तो पास के नर्सिंग होम से नर्स को बुला कर हाथपांव पकड़ कर इंजेक्शन लगवाना ही आखिरी उपाय रहता था.

इतने पर भी रत्ना की आशा और  विश्वास कायम था, ‘मां, यह बीमारी लाइलाज नहीं है.’ मेरी बड़ी बहू का प्रसव समय नजदीक आ रहा था सो मैं रत्ना को हौसला दे कर भारी मन से वापस आ गई थी.

रत्ना मुझे चिंतामुक्त रखने के लिए अपनी लड़ाई खुद लड़ कर मुझे तटस्थ रखना चाहती थी. इस दौरान मेरे बेटे मयंक और आकाश जीतेंद्र को दोबारा आगरा मानसिक आरोग्यशाला ले कर गए. जीतेंद्र को वहां एडमिट किया जाना आवश्यक था, लेकिन उसे अकेले वहां छोड़ने को इन का दिल गवारा न करता और उसे काउंसलिंग और परीक्षणों के बाद आवश्यक हिदायतों और दवाओं के साथ वापस ले आते थे.

मैं बेटों के वापस आने पर पलपल की जानकारी चाहती थी. मगर वे ‘डाक्टर का कहना है कि जीतेंद्र जल्दी ही अच्छे हो जाएंगे,’ कह कर दाएंबाएं हो जाते थे.

कहां भूलता है वह दिन जब मेरे नाती यश ने रोते हुए मुझे फोन किया था. यश सुबकते हुए बहुत कुछ कहना चाह रहा था और गौरव फुसफुसा कर रोक रहा था, ‘फोन पर कुछ मत बोलो…नानी परेशान हो जाएंगी.’

लेकिन जब मैं ने उसे सबकुछ बताने का हौसला दिया तो उस ने रोतेरोते बताया, ‘नानी, आज फिर पापा ने सारा घर सिर पर उठाया हुआ है. किसी भी तरह मनाने पर दवा नहीं ले रहे हैं. मम्मी को उन्होंने जोर से जूता मारा जो उन्हें घुटने में लगा और बेचारी लंगड़ा कर चल रही हैं. मम्मी तो आप को कुछ भी बताने से मना करती हैं, मगर हम छिप कर फोन कर रहे हैं. पापा इस हालत में हमें अपने पापा नहीं लगते हैं. हमें उन से डर लगता है. नानी, आप प्लीज, जल्दी आओ,’ आगे रुंधे गले से वह कुछ न कह सका था.

तब मैं और धीरज फोन रखते ही जल्दी से इंदौर के लिए रवाना हो गए थे. उस बार मैं बेटी की जिंदगी तबाह होने से बचाने के लिए उतावलेपन से बहुत ही कड़ा निर्णय ले चुकी थी लेकिन धीरज अपने नाम के अनुरूप धैर्यवान हैं, मेरी तरह उतावले नहीं होते.

इंदौर पहुंच कर मेरे मन में हर बार की तरह जीतेंद्र के लिए कोई सहानुभूति न थी बल्कि वह मेरी बेटी की जिंदगी तबाह करने का दोषी था. तब मेरा ध्येय केवल रत्ना, यश और गौरव को वहां से मुक्त करा कर अपने साथ वापस लाना था. जीतेंद्र की इस दशा के दोषी उस के मातापिता हैं तो वही उस का ध्यान रखें. मेरी बेटी क्यों उस पागल के साथ घुटघुट कर अपना जीवन बरबाद करे.

उफ, मेरी रत्ना को कितनी यंत्रणा और दुर्दशा सहनी पड़ रही थी. जीतेंद्र सो रहे थे. उन्हें बड़ी मुश्किल से दवा दे कर सुलाया गया था.

एकांत देख कर मैं ने अपने मन की बात रत्ना के सामने रख दी थी, ‘बस, बहुत हो गई सेवा. हमारे लिए तुम बोझ नहीं हो जो जीतेंद्र की मार खा कर यहां पड़ी रहो. करने दो इस के मांबाप को इस की सेवा. तुम जरूरी सामान बांधो और बच्चों को ले कर हमारे साथ चलो.’

तब यश और गौरव सहमे हुए मेरी बात से सहमत दिखाई दे रहे थे. आखिरकार उन्होंने ही तो मुझे समस्या से उबरने के लिए यहां बुलाया था. ‘क्या सोच रही हो, रत्ना. चलने की तैयारी करो,’ मैं ने उसे चुप देख कर जोर से कहा था.

‘सोच रही हूं कि मां बेटी के प्यार में कितनी कमजोर हो जाती है. आप को इन हालात से निकलने का सब से सरल उपाय मेरा आप के साथ चलना ही लग रहा है. ‘जीवन एक संघर्ष है’ यह घुट्टी आप ने ही पिलाई है और बेटी के प्यार में यह मंत्र आप ही भूले जा रही हैं… और लोगों की तरह आप भी इन्हें पागल की उपमा दे रही हैं जबकि यह केवल एक बीमार हैं.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

नरपिशाच -भाग 1: ट्यूटर की दरिंदगी

रामपुरा कोटा का सब से चर्चित और हलचल वाला इलाका है. अनेक गलीकूचों से घिरा हुआ रामपुरा सिर्फ
रिहायशी क्षेत्र ही नहीं है, बल्कि शहर का सब से बड़ा व्यावसायिक केंद्र भी है. मशहूर कोटा डोरिया साडि़यों से लकदक दुकानें, सर्राफों की अटूट गद्दियों के अलावा स्कूलों और कोतवाली होेने के कारण यहां हरदम लोगों की रेलपेल बनी रहती है.

सर्राफा व्यवसायी अजय जैन अपनी पत्नी संजना जैन और 15 वर्षीय बेटी परिधि के साथ रामपुरा की शनि मंदिर गली में अपने पुश्तैनी मकान में रह रहे थे. नौंवी कक्षा में पढ़ने वाली परिधि ने कोटा का बड़ा कोचिंग संस्थान जौइन कर रखा था. लेकिन अच्छी तैयारी के लिए बजाजखाने में रहने वाले गौरव जैन के यहां भी ट्यूशन पढ़ने जाती थी.

गौरव तथा परिधि के परिवारों में घनिष्ठता थी. गौरव भी पूरी तरह भरोसेमंद और परिवार के सदस्य की तरह था. ऐसे में किशोरावस्था के नाजुक दौर से गुजर रही बेटी को गौरव के पास ट्यूशन के लिए भेजने में अजय जैन दंपत्ति को कोई आपत्ति नहीं थी.

13 फरवरी, 2022 को रविवार होने के कारण ट्यूशन की छुट्टी थी. लेकिन गौरव जैन ने परिधि की मां को एक्स्ट्रा क्लास का हवाला देते हुए परिधि को ट्यूशन के लिए भेजने का आग्रह किया. किंतु संजना ने कहा, ‘‘परिधि की तबियत ठीक नहीं है, ऐसे में उस का ट्यूशन पर आना संभव नहीं है.’’
लेकिन गौरव ने यह कह कर संजना को निरुत्तर कर दिया कि सोमवार को उस का पेपर है. ऐसे में नुकसान परिधि को ही होगा. हालांकि बेटी की नासाज तबियत के कारण संजना उसे भेजने को तैयार नहीं थी. लेकिन गौरव का फिर फोन आया तो परिधि ने भी जाने का मन बना लिया. गौरव ने कहा कि परिधि 11 बजे तक हर हाल में ट्यूशन पर पहुंच जाए.

बजाजखाना कोई ज्यादा दूर नहीं था. इसलिए परिधि पौने 11 बजे ही घर से निकल गई. साढ़े 12 बजे अजय जैन के पास गौरव का फोन आया, उस ने कहा कि आप आ कर बेटी को ले जाएं.
यह कोई नई बात नहीं थी. ट्यूशन के बाद गौरव जैन परिधि को ले जाने के लिए उस के घर फोन कर दिया करता था.करीब एक बजे अजय जैन जब गौरव के घर पहुंचे तो वहां कोई नहीं था. घर के बाहर कुंडी लगी हुई थी. अजय कुंडी खोल कर भीतर गए तो कमरों पर ताले लगे हुए थे. यह देख कर उन की हैरानी का पारावार नहीं था.

उन्होंने गौरव को फोन लगाया तो उस का मोबाइल आउट औफ रेंज बता रहा था. जिस समय अजय जैन बाहर आ कर हकबकाए हुए इधरउधर ताक रहे थे, उन्हें गौरव का चचेरा भाई हर्षद जैन नजर आ गया.
अजय ने लपक कर उसे थाम लिया और गौरव के पिता का फोन नंबर पूछा. हर्षद ने इस बारे में तो अनभिज्ञता जाहिर की. लेकिन वह उन्हें उन की सर्राफा की दुकान तक ले गया.

रविवार की वजह से दुकान तो बंद थी, अलबत्ता बाहर लगे बोर्ड पर उन का फोन नंबर दर्ज था. अजय को तनिक आस बंधी तो उन्होंने तत्काल गौरव के पिता जितेंद्र जैन को फोन लगाया. फोन गौरव की मां नीरू जैन ने उठाया.

अजय ने गौरव की बाबत पूछा तो उन्होंने कहा, ‘‘गौरव तो गुलाबबाड़ी स्थित अपने दोस्त विपिन के यहां जाने की बात कह रहा था. हम लोग तो साढ़े 10 बजे ही घर से एक शादी में जाने के लिए निकल आए थे. हम ने गौरव को भी साथ चलने को कहा था. लेकिन उस ने कहा था कि उसे एक जरूरी मीटिंग में जाना है.’’यह सुन कर अजय परेशान हो गए. उन्होंने जितेंद्र से कहा कि वह अभी गौरव के दोस्त विपिन को फोन कर गौरव के बारे में पूछें या विपिन का नंबर उन्हें दे दें.

कुछ देर बाद गौरव के पिता जितेंद्र का अजय के पास फोन आया. उन्होंने अजय को बताया कि विपिन ने इस बात से साफ इनकार कर दिया है कि गौरव उस से मिला था या उस के घर आया था.
इस के बाद तो अजय की बेचैनी और बढ़ गई. परेशानहाल अजय जैन पूरी तरह पसीने से नहा गए. कांपते लड़खड़ाते पसीने से तरबतर अजय ने पत्नी संजना को साथ लिया और गौरव को ढूंढने निकल पड़े.
इसी दौरान उन्हें बरतन बाजार में गौरव के मातापिता जितेंद्र और नीरू आते दिखाई दिए. उन्होंने पूरा मामला सुना तो वे भी बुरी तरह हैरान रह गए.

अजय और उन की पत्नी संजना को ले कर वे घर की तरफ दौड़े. हड़बड़ाते हुए कमरों के ताले खोले तो वहां गौरव की स्कूटी नदारद थी और उस की मां नीरू की दराज से 9 हजार रुपए गायब थे. ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था. आखिर क्या मतलब था इस का.गौरव का कमरा मकान की दूसरी मंजिल पर था. एकाएक अजय की नजर कमरे के बाहर कोने पर पड़ी तो उन की हैरानी का पारावार नहीं रहा. वहां परिधि की चप्पलें पड़ी थीं.

पहल -भाग 1 : क्या तारेश और सोमल के ‘गे’ होने का सच सब स्वीकार कर पाए?

‘‘तारेश. यह क्या नाम रखा है मां तुम ने मेरा? एक तो नाम ऐसा और ऊपर से सर नेम का पुछल्ला तिवाड़ी… पता है स्कूल में सब मुझे कैसे चिढ़ाते हैं?’’ तारेश ने स्कूल बैग को सोफे पर पटकते हुए शिकायत की.

‘‘क्या कहते हैं?’’

‘‘तारू तिवाड़ी…खोल दे किवाड़ी…’’ तारेश गुस्से में बोला.

मां मुसकरा दीं. बोलीं, ‘‘तुम्हारा यह नाम तुम्हारी दादी ने रखा था, क्योंकि जब तुम पैदा हुए थे उस वक्त भोर होने वाली थी और आसमान में सिर्फ भोर का तारा ही दिखाई दे रहा था.’’

‘‘मगर नाम तो मेरा है न और स्कूल भी मुझे ही जाना पड़ता है दादी को नहीं. मुझे यह नाम बिलकुल पसंद नहीं… आप मेरा नाम बदल दो बस,’’ तारेश जैसे जिद पर अड़ा था.

‘‘तारेश यानी तारों का राजा यानी चांद… तुम तारेश हो तभी तो चांद सी दुलहन आएगी…’’ मां ने प्यार से समझाते हुए कहा.

‘‘नहीं चाहिए मुझे चांद सी दुलहन… मुझे तो तेज धूप और रोशनी वाला सूरज पसंद है,’’ तारेश गुस्से में चीखा. मगर तब तारेश खुद भी कहां जानता था कि उसे सूरज क्यों पसंद है.

‘‘बधाई हो, बेटी हुई है,’’ नर्स ने आ कर कहा तो तारेश जैसे सपने से जागा.

‘‘क्या मैं उसे देख सकता हूं, उसे छू सकता हूं?’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं,’’ तारेश का उतावलापन देख कर नर्स मुसकरा दी.

‘‘नर्ममुलायम… एकदम रुई के फाहे सी… इतनी छोटी कि उस की एक हथेली में ही समा गई. बंद आंखों से भी मानो उसे ही देख रही हो,’’ तारेश ने प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरा.

‘‘तुम्हारी यह निशानी बिलकुल तुम पर गई है सोमल…’’ तारेश बुदबुदाया. फिर उस ने हौले से नवजात को चूमा और उस की सैरोगेट मां की बगल में लिटा दिया.

स्कूल के दिनों से ही तारेश सब से अलग था. हालांकि वह पढ़ने में बहुत तेज था, मगर उसे लड़कियों के प्रति कोई आकर्षण नहीं था. हां, उस के स्पोर्ट्स टीचर अशोक सर उसे बहुत अच्छे लगते थे. खासकर उन का बलिष्ठ शरीर…जब वे ग्राउंड में प्रैक्टिस करवाते थे तो तारेश किनारे बैठ कर उन के चौड़े सीने और लंबी मजबूत भुजाओं को निहारा करता था. वैसे तो उस की स्पोर्ट्स में कोई खास रुचि नहीं थी, फिर भी सिर्फ अशोक सर का सानिध्य पाने के लिए वह गेम्स पीरियड में जिमनास्टिक सीखने जाने लगा. जब अशोक सर प्रैक्टिस करवाते समय उस के शरीर को यहांवहां छूते थे तो तारेश के पूरे बदन में जैसे बिजली सी दौड़ जाती थी. उस की सांसें अनियंत्रित हो जाती थीं. वह आंखें बंद कर अपने शरीर को ढीला छोड़ देता था और अशोक सर की बांहों में झूल जाता था. सब हंसने लगते तब उसे होश आता और वह शरमा कर प्रैक्टिसहौल से बाहर निकल जाता.

कालेज में भी जहां सब लड़के अपनी मनपसंद लड़की को पटाने के चक्कर में रहते, वह बस अपनेआप में ही खोया रहता. लेकिन सोमल में कुछ ऐसा था कि बस उसे देखा तो उस में डूबता ही चला गया. सोमल को भी शायद तारेश का साथ पसंद आया और जल्दी दोनों बहुत अच्छे साथी बन गए. दोनों क्लास में पीछे की सीट पर बैठ कर पूरा पीरियड न जाने क्या खुसरफुसर करते रहते. तारेश तो उस का दीवाना ही हो गया. कालेज में एक दिन की छुट्टी भी उसे नागवार लगती. वह तो शाम से ही अगली सुबह होने का इंतजार करने लगता.

कालेज खत्म कर के दोनों ने ही बिजनैस मैनेजमैंट में मास्टर डिग्री करना तय किया. दोनों साथ ही रहेंगे, सोच कर दोनों के ही घर वालों ने खुशीखुशी जाने की इजाजत दे दी. तारेश को तो जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गई. दिल्ली के एक बड़े कालेज में दोनों को ऐडमिशन मिल गया और 1 कमरे का फ्लैट दोनों ने मिल कर किराए पर ले लिया.

सब कुछ सामान्य चल रहा था. दोनों साथसाथ कालेज जाते, साथसाथ घूमतेफिरते और मजे करते. कभी खाना बाहर खाते, कभी बाहर से मंगवाते, तो कभीकभी दोनों मिल कर रसोई में हाथ आजमाते… दोनों की जोड़ी कालेज में ‘रामलखन’ के नाम से मशहूर थी.

देखते ही देखते लास्ट सैमैस्टर आ गया और कालेज में कैंपस इंटरव्यू शुरू हो गए. लगभग सभी स्टूडैंट्स का अच्छीअच्छी कंपनियों में प्लेसमैंट हो गया. तारेश को बैंगलुरु की कंपनी ने चुना तो सोमल को हैदराबाद की कंपनी ने. पैकेज से तो दोनों ही बेहद खुश थे, मगर एकदूसरे से जुदा होना अब दोनों को ही गवारा नहीं था. घर आ कर दोनों देर तक गुमसुम बैठे रहे. क्या करें क्या न करें की स्थिति थी. मगर एक को तो छोड़ना ही पड़ेगा… चाहे नौकरी चाहे साथी.

 

सपना -भाग 3 : कौनसे सपने में खो गई थी नेहा

‘जी, क्या?’ आकाश अनजान बनते हुए पूछने लगा.

‘वही जो अभीअभी आप ने मेरे साथ किया.’

‘देखिए नेहाजी, प्लीज…’ आकाश वाक्य अधूरा छोड़ थूक सटकने लगा.

‘ओह हो, नेहाजी? अभीअभी तो मैं तुम थी?’ नेहा अब पूरी तरह आकाश पर रोब झाड़ने लगी.

‘नहीं… नहीं, नेहाजी… मैं…’ आकाश को समझ नहीं आ रहा था कि वह अब क्या कहे. उधर नेहा उस की घबराहट पर मन ही मन मुसकरा रही थी. तभी आकाश ने पलटा खाया, ‘प्लीज, नेहा,’ अचानक आकाश ने उस का हाथ थामा और तड़प के साथ इसरार भरे लहजे में कहने लगा, ‘मत सताओ न मुझे,’ आकाश नेहा का हाथ अपने होंठों के पास ले जा रहा था.

‘क्या?’ उस ने चौंकते हुए अपना हाथ पीछे झटका. अब घबराने की बारी नेहा की थी. उस ने सकुचाते हुए आकाश की आंखों में झांका. आकाश की आंखों में अब शरारत ही शरारत महसूस हो रही थी. ऐसी शरारत जो दैहिक नहीं बल्कि आत्मिक प्रेम में नजर आती है. दोनों अब खिलखिला कर हंस पड़े.

बाहर ठंड बढ़ती जा रही थी. बस का कंडक्टर शीशे के साथ की सीट पर पसरा पड़ा था. ड्राइवर बेहद धीमी आवाज में पंजाबी गाने बजा रहा था. पंजाबी गीतों की मस्ती उस पर स्पष्ट झलक रही थी. थोड़ीथोड़ी देर बाद वह अपनी सीट पर नाचने लगता. पहले तो उसे देख कर लगा शायद बस ने झटका खाया, लेकिन एकदम सीधी सड़क पर भी वह सीट पर बारबार उछलता और एक हाथ ऊपर उठा कर भांगड़ा करता, इस से समझ आया कि वह नाच रहा है. पहले तो नेहा ने समझा कि उस के हाथ स्टेयरिंग पकड़ेपकड़े थक गए हैं, तभी वह कभी दायां तो कभी बायां हाथ ऊपर उठा लेता.

उस के और ड्राइवर के बीच कैबिन का शीशा होने के कारण उस तरफ की आवाज नेहा तक नहीं आ रही थी, लेकिन बिना म्यूजिक के ड्राइवर का डांस बहुत मजेदार लग रहा था. आकाश भी ड्राइवर का डांस देख कर नेहा की तरफ देख कर मुसकरा रहा था. शायद 2 प्रेमियों के मिलन की खुशी से उत्सर्जित तरंगें ड्राइवर को भी खुशी से सराबोर कर रही थीं. मन कर रहा था कि वह भी ड्राइवर के कैबिन में जा कर उस के साथ डांस करे. नेहा के सामीप्य और संवाद से बड़ी खुशी क्या हो सकती थी? आकाश को लग रहा था कि शायद ड्राइवर उस के मन की खुशी का ही इजहार कर रहा है.

‘बाहर चलोगी?’ बस एक जगह 20 मिनट के लिए रुकी थी.

‘बाहर… किसलिए… ठंड है बाहर,’ नेहा ने खिड़की से बाहर झांकते हुए कहा.

‘चलो न प्लीज, बस दो मिनट के लिए.’

‘अरे?’ नेहा अचंभित हो कर बोली. लेकिन आकाश नेहा का हाथ थामे सीट से उठने लगा.

‘अरे…रे… रुको तो, क्या करते हो यार?’ नेहा ने बनावटी गुस्से में कहा.

‘बाहर कितनी धुंध है, पता भी है तुम्हें?’ नेहा ने आंखें दिखाते हुए कहा.

‘वही तो…’ आकाश ने लंबी सांस ली और कुछ देर बाद बोला, ‘नेहा तुम जानती हो न… मुझे धुंध की खुशबू बहुत अच्छी लगती है. सोचो, गहरी धुंध में हम दोनों बाइक पर 80-100 की स्पीड में जा रहे होते और तुम ठंड से कांपती हुई मुझ से लिपटतीं…’

‘आकाश…’ नेहा के चेहरे पर लाज, हैरानी की मुसकराहट एकसाथ फैल गई.

‘नेहा…’ आकाश ने पुकारा… ‘मैं आज तुम्हें उस आकाश को दिखाना चाहता हूं… देखो यह… आकाश आज अकेला नहीं है… देखो… उसे जिस की तलाश थी वह आज उस के साथ है.’

नेहा की मुसकराहट गायब हो चुकी थी. उस ने आकाश में चांद को देखा. न जाने उस ने कितनी रातें चांद से यह कहते हुए बिताई थीं कि तुम देखना चांद, वह रात भी आएगी जब वह अकेली नहीं होगी. इन तमाम सूनी रातों की कसम… वह रात जरूर आएगी जब उस का चांद उस के साथ होगा. तुम देखना चांद, वह आएगा… जरूर आएगा…

‘अरे, कहां खो गई? बस चली जाएगी,’ आकाश उस के कानों के पास फुसफुसाते हुए बोला. वह चुपचाप बस के भीतर चली आई. आकाश बहुत खुश था. इन चंद घंटों में वह नेहा को न जाने क्याक्या बता चुका था. पढ़ाई के लिए अमेरिका जाना और जाने से पहले पिता की जिद पूरी करने के लिए शादी करना उस की विवशता थी. अचानक मातापिता की एक कार ऐक्सिडैंट में मृत्यु हो गई. उसे वापस इंडिया लौटना पड़ा, लेकिन अपनी पत्नी को किसी और के साथ प्रेमालाप करते देख उस ने उसे तलाक दे दिया और मुक्त हो गया.

रात्रि धीरेधीरे खत्म हो रही थी. सुबह के साढ़े 3 बज रहे थे. नेहा ने समय देखा और दोबारा अपनी अमूर्त दुनिया में खो गई. जिंदगी भी कितनी अजीब है. पलपल खत्म होती जाती है. न हम समय को रोक पाते हैं और न ही जिंदगी को, खासकर तब जब सब निरर्थक सा हो जाए. बस, अब अपने गंतव्य पर पहुंचने के लिए आधे घंटे का सफर और था. बस की सवारियां अपनी मंजिल तक पहुंचेंगी या नहीं यह तो कहना आसान नहीं था, लेकिन आकाश की फ्लाइट है, वह वापस अमेरिका चला जाएगा और वह अपनी सहेली के घर शादी अटैंड कर 2 दिन बाद लौट जाएगी, अपने घर. फिर से वही… पुरानी एकाकी जिंदगी.

‘‘क्यों सोच रही हो?’’ आकाश ने ‘क्या’ के बजाय ‘क्यों’ कहा तो उस ने सिर उठा कर आकाश की तरफ देखा. उस की आंखों में प्रकाश की नई उम्मीद बिखरी नजर आ रही थी.

‘तुम जानते हो आकाश, दिल्ली बाईपास पर राधाकृष्ण की बड़ी सी मूर्ति हाल ही में स्थापित हुई है, रजत के कृष्ण और ताम्र की राधा.’

‘क्या कहना चाहती हो?’ आकाश ने असमंजस भाव से पूछा.

‘बस, यही कि कई बार कुछ चीजें दूर से कितनी सुंदर लगती हैं, पर करीब से… आकाश छूने की इच्छा धरती के हर कण की होती है लेकिन हवा के सहारे ताम्र रंजित धूल आकाश की तरफ उड़ती हुई प्रतीत तो होती है, पर कभी आकाश तक पहुंच नहीं पाती. उस की नियति यथार्थ की धरा पर गिरना और वहीं दम तोड़ना है वह कभी…’

‘राधा और कृष्ण कभी अलग नहीं हुए,’ आकाश ने भारी स्वर में कहा.

‘हां, लेकिन मरने के बाद,’ नेहा की आवाज में निराशा झलक रही थी.

‘ऐसा नहीं है नेहा, असल में राधा और कृष्ण के दिव्य प्रेम को समझना सहज नहीं,’ आकाश गंभीर स्वर में बोला.

‘क्या?’ नेहा पूछने लगी, ‘राधा और कान्हा को देख कर तुम यह सोचती हो?’ आकाश की आवाज की खनक शायद नेहा को समझ नहीं आ रही थी. वह मौन बैठी रही. आकाश पुन: बोला, ‘ऐसा नहीं है नेहा, प्रेम की अनुभूति यथार्थ है, प्रेम की तार्किकता नहीं.’

‘क्या कह रहे हो आकाश? मुझे सिर्फ प्रेम चाहिए, शाब्दिक जाल नहीं,’ नेहा जैसे अपनी नियति प्रकट कर उठी.

‘वही तो नेहा, मेरा प्यार सिर्फ नेहा के लिए है, शाश्वत प्रेम जो जन्मजन्मांतरों से है, न तुम मुझ से कभी दूर थीं और न कभी होंगी.’

‘आकाश प्लीज, मुझे बहलाओ मत, मैं इंसान हूं, मुझे इंसानी प्यार की जरूरत है तुम्हारे सहारे की, जिस में खो कर मैं अपूर्ण से पूर्ण हो जाऊं.’’

‘‘तुम्हें पता है नेहा, एक बार राधा ने कृष्ण से पूछा मैं कहां हूं? कृष्ण ने मुसकरा कर कहा, ‘सब जगह, मेरे मनमस्तिष्क, तन के रोमरोम में,’ फिर राधा ने दूसरा प्रश्न किया, ‘मैं कहां नहीं हूं?’ कृष्ण ने फिर से मुसकरा कर कहा, ‘मेरी नियति में,’ राधा पुन: बोली, ‘प्रेम मुझ से करते हो और विवाह रुक्मिणी से?’

कृष्ण ने फिर कहा, ‘राधा, विवाह 2 में होता है जो पृथकपृथक हों, तुम और मैं तो एक हैं. हम कभी अलग हुए ही नहीं, फिर विवाह की क्या आवश्यकता है?’

‘आकाश, तुम मुझे क्या समझते हो? मैं अमूर्त हूं, मेरी कामनाएं निष्ठुर हैं.’

‘तुम रुको, मैं बताता हूं तुम्हें, रुको तुम,’ आकाश उठा, इस से पहले कि नेहा कुछ समझ पाती वह जोर से पुकारने लगा. ‘खड़ी हो जाओ तुम,’ आकाश ने जैसे आदेश दिया.

‘अरे, लेकिन तुम कर क्या रहे हो?’ नेहा ने अचरज भरे स्वर में पूछा.

‘खड़ी हो जाओ, आज के बाद तुम कृष्णराधा की तरह केवल प्रेम के प्रतीक के रूप में याद रखी जाओगी, जो कभी अलग नहीं होते, जो सिर्फ नाम से अलग हैं, लेकिन वे यथार्थ में एक हैं, शाश्वत रूप से एक…’

नेहा ने देखा आकाश के हाथ में एक लिपस्टिक थी जो शायद उस ने उसी के हैंडबैग से निकाली थी, उस से आकाश ने अपनी उंगलियां लाल कर ली थीं.

‘अब सब गवाह रहना,’ आकाश ने बुलंद आवाज में कहा.

नेहा ने देखा बस का सन्नाटा टूट चुका था. सभी यात्री खड़े हो कर इस अद्भुत नजारे को देख रहे थे. इस से पहले कि वह कुछ समझ पाती आकाश की उंगलियां उस के माथे पर लाल रंग सजा चुकी थीं. लोगों ने तालियां बजा कर उन्हें आशीर्वाद दिया. उन के चेहरों पर दिव्य संतुष्टि प्रसन्नता बिखेर रही थी और मुबारकबाद, शुभकामनाओं और करतल ध्वनि के बीच अलौकिक नजारा बन गया था.

आकाश नतमस्तक हुआ और उस ने सब का आशीर्वाद लिया.

बाहर खिड़की से राधाकृष्ण की मूर्ति दिख रही थी जो अब लगातार उन के नजदीक आ रही थी… पास… और पास… जैसे आकाश और नेहा उस में समा रहे हों.

‘‘नेहा… नेहा… उठो… दिल्ली आ गया. कब तक सोई रहोगी?’’ नेहा की सहेली बेसुध पड़ी नेहा को झिंझोड़ कर उठाने का प्रयास करने लगी. कुछ देर बाद नेहा आंखें मलती हुई उठने का प्रयास करने लगी.

सफर खत्म हो गया था… मंजिल आ चुकी थी. लेकिन नेहा अब भी शायद जागना नहीं चाह रही थी. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था… वे सब क्या था? काश, जिंदगी का सफर भी कुछ इसी तरह चलता रहे… वह पुन: सपने में खो जाना चाहती थी.

दोस्ती के जरिए प्यार में सेंध: भाग 3

सरस्वती की बात सुनते ही संजय का पारा हाई हो गया, ‘‘क्या यही तुम्हारा प्यार था? मैं तुम पर इतने समय से पैसे लुटाता आ रहा हूं, क्या तुम ने मुझे पागल समझ रखा था? अगर तुमने मेरे साथ भाग कर शादी नहीं की तो मैं तुम्हें कहीं का नहीं छोड़ूंगा. मेरे पास तुम्हारी सारी मौजमस्ती की वीडियो हैं. अगर तुम ने शादी करने से जरा सी भी आनाकानी की तो उन वीडियो को जगजाहिर करने में जरा सी भी देर नहीं लगेगी.’’

संजय की बात सुन कर सरस्वती को पहली बार अफसोस हुआ. उसे उम्मीद नहीं थी कि संजय भविष्य में ऐसी ओछी हरकत भी कर सकता है. संजय की धमकी भरे शब्द सुन कर सरस्वती कुछ सहम गई. उसे लगा कि यह बात अगर उस की ससुराल वालों के सामने आ गई तो उस का जीना ही मुश्किल हो जाएगा.

सरस्वती पूरी तरह से संजय के बिछाए जाल में फंस चुकी थी. उस के बाद उसे कोई रास्ता नहीं सूझा तो उस ने संजय के साथ शादी करने की हामी भर ली.

दोनों के बीच काफी समय से अवैध संबंध बनते आ रहे थे, जिस के कारण वह भी उसे दिलोजान से चाहने लगी थी. संजय की जिद के आगे उस ने उस से कह दिया कि ठीक है वह उस के साथ शादी करने के लिए तैयार है. लेकिन उस की भी एक शर्त है कि वह शादी के बाद अपने बच्चों को अपने साथ ही रखेगी. क्योंकि वह अपने बच्चों को बहुत ही प्यार करती है.

लेकिन उस की यह शर्त संजय को मंजूर नहीं थी. संजय का कहना था कि वह उस के बच्चों के कारण अपने परिवार वालों को मुंह दिखाने लायक भी

नहीं रहेगा.

इसी बात को ले कर दोनों के बीच मनमुटाव हो गया. उस के बाद सरस्वती ने काफी समय तक संजय से बात नहीं की. लेकिन संजय बारबार उस से बात करने की कोशिश करता रहा.

 

दोनों के बीच मनमुटाव वाली बात महेश को भी पता चल गई. लेकिन महेश को उन दोनों के बीच बने अवैध संबंधों की कानोकान खबर नहीं हुई थी. उसे दोनों पर शक हुआ तो वह दोनों की सच्चाई जानने के लिए अंजान बन कर उन के पीछे ही पड़ गया.

एक दिन ऐसा भी आया कि महेश ने छिपते हुए सरस्वती को संजय से बात करते देख लिया. सरस्वती की बात सुनते ही उसे बहुत ही दुख हुआ. उसे पहली बार इस बात का आघात पहुंचा कि जिसे वह अपना दोस्त समझ कर उस पर विश्वास कर रहा था, वही उस की पीठ में छुरा घोंप रहा था.

उसी शाम को महेश ने सरस्वती से सच्चाई जानने की कोशिश की तो वह उस से लड़ बैठी. उस के बाद दोनों के बीच काफी कहासुनी हुई. महेश को अपनी पत्नी से ऐसी उम्मीद नहीं थी. इस के बावजूद भी वह न तो संजय से ही लड़ा और न ही सरस्वती के साथ मारपीट की.

महेश सीधासादा था. उस के बाद भी उस ने सरस्वती को समझाने की कोशिश की. लेकिन सरस्वती कहीं से कहीं तक भी अपनी गलती मानने को तैयार न थी. वह अपने दोनों बच्चों को पति के पास छोड़ कर अपने मायके चली गई.

उस के मायके जाने के बाद संजय फिर से उस पर शादी करने के लिए दबाव बनाने लगा. लेकिन सरस्वती उस के सामने अपने बच्चों को साथ रखने वाली बात दोहराती रही. इस के साथ ही उस ने संजय से कहा, ‘‘पहले तो तुम हमारी वो वीडियो अपने मोबाइल से डिलीट करो. उस के बाद ही मैं आगे बात करूंगी.’’

इतना कहते ही उस ने काल डिसकनेक्ट कर दी. उस के बाद कई बार संजय ने उस से मोबाइल पर संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उस ने उस की काल रिसीव नहीं की.

संजय उस के प्यार में पूरी तरह से पागल हो चुका था. वह किसी भी कीमत पर उसे छोड़ने को तैयार नहीं था. जब सरस्वती ने उस की काल रिसीव नहीं की तो उस के तनबदन में आग लग गई. उस ने तभी प्रण किया कि अगर सरस्वती ने उस की बात नहीं मानी तो वह उस की जीवन लीला ही खत्म कर डालेगा.

यही कारण है कि प्यार के आगे इंसान लाचार हो जाता है. लेकिन कभीकभी प्यार खूंखार भी हो उठता है. संजय कई बार उस के मायके जा चुका था. वह उस के घर की लोकेशन से वाकिफ था. उस दौरान भी उस ने उस से कई बार मिलने की कोशिश की, लेकिन सरस्वती ने उस से मिलने से इंकार कर दिया था. सरस्वती की हरकतें देख उस के सब्र का बांध टूटने लगा.

 

2॒अगस्त, 2022 की शाम को संजय ने जम कर दारू पी. दारू गले से उतरी तो उसे सरस्वती के साथ बिताए दिन काट खाने को दौड़ने लगे थे. उस दिन हर वक्त खातेपीते वह उस की आंखों के सामने आ कर घूमने लगी थी.

जब वह सरस्वती की याद में परेशान हो उठा तो उस ने बाइक उठाई और सीधा उस के मायके खाता चिंतामन जा पहुंचा. उस समय रात काफी हो चुकी थी. वह पूरी तरह से नशे में था.

गांव जाते ही उस ने बाइक गांव के बाहर ही लौक कर के खड़ी कर दी, ताकि गांव में उस के आने का किसी को पता ही न चले. नत्थूलाल का घर भी गांव के बाहरी छोर पर था. उस वक्त गांव के सभी लोग गहरी नींद में सोए हुए थे.

नत्थूलाल के घर पहुंच कर उस ने दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह अंदर से बंद था. उस के बाद वह घर की चारदीवारी लांघ कर उस के घर में घुस गया. उसी समय उस की नजर दरवाजे के पास सो रही सरस्वती पर पड़ी. वह उस चारपाई पर अकेली ही सोई हुई थी.

सरस्वती को अकेला देखते ही उस ने उसे उठाया. इतनी रात गए अपने सामने संजय को देख कर उस की चीख निकल गई. तभी संजय ने झट से अपने हाथ से उस का मुंह बंद कर दिया. फिर वह उस से उस के साथ चलने की जिद करने लगा. तब सरस्वती ने कहा कि वह किसी भी कीमत पर उस के साथ नहीं जाएगी. उल्टे ही उस ने उसे वहां से तुरंत भाग जाने को कहा. उस ने धमकी दी कि अगर वह नहीं गया तो वह शोर मचा देगी.

सरस्वती की धमकी से उस का पारा चढ़ गया. इस से पहले कि सरस्वती कुछ समझ पाती, उस ने गुस्से के आवेग में आ कर एक हाथ से उस का मुंह बंद करने के बाद अपने साथ लाए चाकू से उस की गरदन पर कई वार कर डाले.

चाकू के वार होते ही सरस्वती की जोरदार चीख निकली. जिस को सुन कर उस के मायके वाले बाहर आ गए. परिवार वालों के आते ही संजय ने चाकू एक तरफ फेंक दिया और दरवाजा खोल कर भागने की कोशिश करने लगा. तभी चारों ओर से घेराबंदी करते हुए सरस्वती के घर वालों ने संजय को पकड़ लिया था.

संजय से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

प्रेम की इबारत : भाग 2

‘‘हां बहन, मैं ने भी देखा है,’’ दूसरी दीवार बोली, ‘‘इस हवा के पागलपन को महसूस किया है. यह रात में भी कभीकभी यहीं घूमती है. सवेरे जब सूरज की किरणों की लालिमा पहाडि़यों पर बिखरने लगती है तो यह छत पर उसी स्थान पर अपनी मंदमंद खुशबू बिखेरती है, जहां कभीकभी रूपमती जा कर खड़ी हो जाती थीं. कैसी दीवानगी है इस हवा की जो हर उस स्थान को चूमती है जहांजहां रूपमती के कदम पडे़ थे.’’

पहली दीवार कहां खामोश रहने वाली थी. झट बोली, ‘‘हां, इन सीढि़यों पर रानी की पायलों की झंकार आज भी मैं महसूस करती हूं. मुझे लगता है कि पायलों की रुनझुन सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर आ रही है.’’

दीवारों की बातें सुन कर अब तक खामोश झरोखा बोल पड़ा, ‘‘आप दोनों ठीक कह रही हैं. वह अनोखा संगीत और रागों का मिलन मैं ने भी देखा है. क्या उसे कलम के ये मतवाले देख पाएंगे? नहीं…बिलकुल नहीं.

‘‘पहाडि़यों से उतरती हुई संगीत की वह मधुर तान, बाजबहादुर के होने का आज भी मुझे एहसास करा देती है कि बाजबहादुर का संगीत प्रेम यहां के चप्पेचप्पे पर बिखरा हुआ है.’’

उपरोक्त बातचीत के 2 दिन बाद :

रात की कालिमा फिर धीरेधीरे गहराने लगी. ताड़ के पेड़ों को वही पागल हवाएं सहलाने लगीं. झरोखों से गुजर कर रूपमती के महल में अपने अंदाज दिखाने लगीं.

झरोखों से रात की यह खामोशी सहन नहीं हो रही थी. आखिरकार दीवारों की ओर देख कर एक झरोखा बोला, ‘‘बहन, चुप क्यों हो. आज भी कुछ कहो न.’’

दीवारों की तरफ से कोई हलचल न होते देख झरोखे अधीर हो गए फिर दूसरा बोला, ‘‘बहन, मुझ से तुम्हारी यह चुप्पी सहन नहीं हो रही है. बोलो न.’’

तभी झरोखों के कानों में धीमे से हवा की सरगोशियां पड़ीं तो झरोखों को लगा कि वह भी बेचैन थीं.

‘‘तुम दोनों आज सो गई हो क्या?’’ हवा ने पूरे वेग से अपने आने का एहसास दीवारों को कराया.

‘‘नहीं, नहीं,’’ दीवारें बोलीं.

‘‘देखो, आज अंधेरा कुछ कम है. शायद पूर्णिमा है. चांद कितना सुंदर है,’’ हवा फिर अपनी दीवानगी पर उतरी.

‘‘मैं आज फिर नीलकंठ गई तो वहां मुझे फूलों की खुशबू अधिक महसूस हुई. मैं ने फूलों को देखा और उन के पराग को स्पर्श भी किया. साथ में उन की कोमल पंखडि़यों और पत्तियों को भी….’’

‘‘क्या कहा तुम ने, जरा फिर से तो कहो,’’ एक दीवार की खामोशी भंग हुई.

हवा आश्चर्य से बोली, ‘‘मैं ने तो यही कहा कि फूलों की पंखडि़यों को…’’

‘‘अरे, नहीं, उस से पहले कहा कुछ?’’ दीवार ने फिर प्रश्न दोहराया.

‘‘मैं ने कहा फूलों के पराग को… पर क्या हुआ, कुछ गलत कहा?’’ हवा के चेहरे पर अपराधबोध झलक रहा था. मानो वह कुछ गलत कह गई हो. वह थम सी गई.

‘‘अरे, तुम को थम जाने की जरूरत नहीं… तुम बहो न,’’ दीवार ने उस की शंका दूर की.

हवा फिर अपनी गति में लौटने लगी.

‘‘वह जो लंबा लड़का आता है न और उस के साथ वह सांवली सी सुंदर लड़की होती है…’’

‘‘हां…हां… होती है,’’ झरोखा बोल पड़ा.

‘‘उस लड़के का नाम पराग है और आज ही उस लड़की ने उसे इस नाम से पुकारा था,’’ दीवार का बारीक मधुर स्वर उभरा.

‘‘अच्छा, इस में आश्चर्य की क्या बात है? हजारों लोग  मांडव की शान देखने आतेजाते हैं,’’ हवा ने चंचलता बिखेरी.

‘‘किस की बात हो रही है,’’ चांदनी भी आ कर अब अपनी शीतल किरणों को बिखेरने लगी थी.

‘‘वह लड़का, जो कभीकभी छत पर आ कर संगीत का रियाज करता है और वह सांवलीसलोनी लड़की उसे प्यार भरी नजरों से निहारती रहती है,’’ दीवार ने अपनी बात आगे बढ़ाई.

‘‘अरे, हां, उसे तो मैं भी देखती हूं जो घंटों रियाज में डूबा रहता है,’’ हवा ने मधुर शब्दों में कहा, ‘‘और लड़की बावली सी उसे देखती है. लड़का बेसुध हो जाता है रियाज करतेकरते, फिर भी उस की लंबीलंबी उंगलियां थकती नहीं… सितार की मधुर ध्वनि पहाडि़यों में गूंजती रहती है .’’

‘‘उस लड़की का क्या नाम है?’’ झरोखा, जो खामोश था, बोला.

‘‘नहीं पता, देखना कहीं मेरे दामन पर उस लड़की का तो नाम नहीं,’’ दीवार ने झरोखे से कहा.

‘‘नहीं, तुम्हारे दामन में पराग नाम कहीं भी उकेरा हुआ नहीं है,’’ एक झरोखा अपनी नजरों को दीवार पर डालते हुए बोला.

‘‘हां, यहां आने वाले प्रेमी जोड़ों की यह सब से गंदी आदत है कि मेरे ऊपर खुरचखुरच कर अपना नाम लिख जाते हैं, जिन की खुद की कोई पहचान नहीं. भला यों ही दीवारों पर नाम लिख देने से कोई अमर हुआ है क्या?’’ दीवार का स्वर दर्द भरा था.

‘‘कहती तो तुम सच हो,’’ शीतल चांदनी बोली, ‘‘मांडव की लगभग हर किले की दीवारों का यही हाल है.’’

‘‘हां, बहन, तुम सच कह रही हो,’’ नर्मदा की पवित्रता बोली, जो अब तक खामोशी से उन की यह बातचीत सुन रही थी.

‘‘तुम,’’ झरोखा, दीवार, हवा और शीतल चांदनी के अधरों से एकसाथ निकला.

‘‘हर जगह नाम लिखे हैं, ‘सविता- राजेश’, ‘नैना-सुनीला’, ‘रमेश, नीता को नहीं भूलेगा’, ‘रीतू, दीपक की है’, ‘हम दोनों साथ मरेंगे’, ‘हमारा प्रेम अमर है’, ‘हम दोनों एकदूसरे के लिए बने हैं.’ यही सब लिखते हैं ये प्रेमी जोडे़,’’ नर्मदा की पवित्रता ने कहा.

 

2 सगे भाइयों की साझा प्रेमिका की नफरत का सैलाब : भाग 1

घटनास्थल का दृश्य बड़ा ही भयावह था. कमरे के अंदर 2 लाशें खून से तरबतर पड़ी थीं. बड़ी निर्दयता से किसी धारदार हथियार से उन का गला काटा गया था. मृतकों में घर का मुखिया मुन्नालाल उत्तम (61वर्ष) तथा उन की पत्नी राजदेवी (55 वर्ष) थी.
शवों के पास अनूप और कोमल बिलख रहे थे. अनूप मृतक दंपति का बेटा था, जबकि कोमल उन की गोद ली हुई बेटी थी. दिल को झकझोर देने वाली यह घटना 4 जुलाई, 2022 की रात बर्रा-2, कानपुर स्थित ईडब्लूएस कालोनी यादव मार्केट के पास घटी थी.

5 जुलाई की सुबह डबल मर्डर की सूचना पुलिस महकमे को लगी तो अफरातफरी मच गई. आननफानन में पुलिस कमिश्नर विजय सिंह मीणा, एडिशनल कमिश्नर आनंद कुलकर्णी, डीसीपी (क्राइम) सलमान ताज पाटिल, एसीपी (गोविंद नगर) विकास पांडेय तथा बर्रा थानाप्रभारी दीनानाथ मिश्रा घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने मौकाएवारदात पर डौग स्क्वायड तथा फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया.

अब तक डबल मर्डर की खबर जंगल की आग की तरह पूरे बर्रा क्षेत्र में फैल गई थी. भारी भीड़ घटनास्थल पर जुट गई. इस भीड़ को नियंत्रित करने में पुलिस को पसीना छूट रहा था. उपद्रवी तत्त्व इस भीड़ का गलत उपयोग न कर लें, इस के लिए पुलिस कमिश्नर विजय सिंह मीणा ने कई थानों की फोर्स वहां बुला ली और क्षेत्र को छावनी में तब्दील कर दिया.

सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने के बाद पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. कमरे में पड़ी लाशें देख कर वह दहल उठे. बड़ी ही क्रूरता के साथ दंपति की हत्या की गई थी. देखने से ऐसा लग रहा था कि किसी भारी नफरत के चलते घटना को अंजाम दिया गया था.नफरत से भरे कातिल ने बेरहमी से दंपति का गला रेता था. कमरे में खून फैला था और बिस्तर भी खून से तरबतर था. घर का सारा सामान सुरक्षित था, जिस से लूट की संभावना नहीं थी.

निरीक्षण के बाद पुलिस अधिकारियों ने रोतीबिलखती मृतक दंपति की बेटी कोमल से पूछताछ की. कोमल ने बताया कि पापा बाहर वाले कमरे में सो रहे थे और मैं बीच वाले कमरे में मां के साथ सो रही थी. भाई अनूप पहली मंजिल पर बने कमरे में सो रहा था. हत्या कब हुई पता ही नहीं चला. लेकिन आवाज सुन कर जब आंखें खुलीं तो 3 नकाबपोशों को घर से भागते देखा. उन में से एक अनूप भाई का साला मयंक था. मैं घबरा गई और अनूप भैया को जगा कर मम्मीपापा की हत्या की जानकारी दी. फिर भैया ने डायल 112 पर पुलिस को सूचना दी.

अनूप ने नहीं पिया था जूस पुलिस अधिकारियों ने मृतक दंपति के बेटे अनूप से पूछताछ की तो उस ने बताया कि बीती रात 9 बजे कोमल ने जूसर से अनार और चुकंदर का जूस बनाया फिर एकएक गिलास मम्मीपापा और मुझे दिया. मैं ने 2-3 घूंट जूस पिया तो मुझे कड़वा लगा और स्वाद भी अजीब था. फिर मैं ने जूस नहीं पिया और पूछा, ‘‘कोमल, जूस कड़वा और कसैला क्यों है. तुम ने इस में क्या मिलाया है?’’
इतना सुनते ही कोमल तुनक कर बोली, ‘‘मम्मीपापा ने जूस पी लिया, उन्हें तो कड़वा नहीं लगा. तुम्हें कड़वा लग रहा है, तो मत पियो.’’

अनूप ने आगे बताया कि मैं ने 2-3 घूंट ही जूस पिया था. फिर भी मुझे चक्कर सा आने लगा था और उल्टी भी हो गई थी. इस के बाद मैं अपने कमरे में जा कर सो गया. रात लगभग 3 बजे कोमल ने दरवाजा खटखटा कर मुझे जगाया और बताया कि मम्मीपापा मर गए हैं. यह सुन कर मैं घबराया हुआ नीचे कमरे में आया तो देखा मम्मीपापा मृत पड़े थे. कोमल ने बताया कि उस ने 3 नकाबपोशों को घर से भागते देखा था, जिस में मेरा साला मयंक भी था.

‘‘तो क्या तुम्हें भी अपने साले मयंक पर हत्या का शक है?’’ डीसीपी सलमान ताज पाटिल ने पूछा. ‘‘हां सर, मुझे भी उन पर हत्या का शक है.’’ अनूप बोला.
‘‘वह कैसे?’’

2 पत्नियों ने दी पति की सुपारी : भाग 3

शादी के बाद उस ने नजमा का नाम गीता रख दिया. दरअसल, इस के पीछे उस की एक रणनीति काम कर रही थी. सरकारी दस्तावेजों में हर जगह पहली पत्नी के नाम की जगह गीता दर्ज था. अपनी सरकारी नौकरी को संजीव दांव पर नहीं लगाना चाहता था, लिहाजा उस ने दूसरी पत्नी का नाम भी गीता रख दिया.

दफ्तर के कुछ कागजों में उस ने गीता उर्फ नजमा की फोटो भी लगाई थी. इस के अलावा उस ने कुछ प्रौपर्टी अपनी पहली पत्नी गीता के नाम पर खरीदी थी. वह प्रौपर्टी उस के हाथ से न निकल जाए.नजमा उर्फ गीता के साथ संजीव मजे में रहने लगा. कुछ दिन तो नजमा के बहुत अच्छे बीते. इतनी धनदौलत और जमीनें देख कर वह बड़ी खुश हुई, मगर जल्दी ही उस की खुशियां काफूर हो गईं. संजीव का असली रूप उस के सामने आने लगा.

वह गीता की तरह नजमा पर भी जुल्म ढाने लगा. उसे बातबात पर मारनेपीटने लगा. गंदीगंदी गालियां देता. नजमा उर्फ गीता उस का यह रूप देख कर घबरा गई. एक तो वह उस से उम्र में दोगुना था, दूसरे उस ने उसे शादी के नाम पर ठगा भी था.नजमा को भी करने लगा प्रताडि़त

इन सभी अत्याचारों के बीच नजमा उर्फ गीता प्रेग्नेंट हो गई और तय समय पर उस ने एक बेटे को जन्म दिया. बेटे को पा कर संजीव खुश था मगर नजमा पर उस का अत्याचार कम नहीं हुआ था. वहीं उसे यह शक भी होने लगा था कि नजमा का किसी और से नैनमटक्का चल रहा है.इस शक के कारण उस की हिंसा और बढ़ गई. यहां तक कि उस ने अपने घर के बाहर और अंदर कमरों में सीसीटीवी कैमरे लगवा दिए ताकि उसे पता चल सके कि उस की गैरमौजूदगी में उस के पास कौनकौन आताजाता है.

इसी बीच एक दिन मौका पा कर नजमा उर्फ गीता अपने दुधमुंहे बच्चे और संजीव के पैसे ले कर एक आदमी के साथ अपने गांव भाग गई. वहां उस ने एक अन्य आदमी से निकाह कर लिया. कुछ दिन बाद संजीव भी झारखंड स्थित उस के घर पर आ धमका.
उस ने कुछ राजनीतिक पहुंच लगा कर नजमा के परिजनों के खिलाफ स्थानीय थाने में मुकदमा दर्ज करवाया और पुलिस के साथ मिलीभगत कर के उस के भाइयों और पिता को हवालात में बंद करवा दिया.

नजमा के परिजन अनपढ़ और गरीब थे. इस आफत के आगे वे रो पड़े और नजमा से कहा कि संजीव जैसा कहता है वैसा करे. संजीव ने नजमा को धमकी दी कि अगर वह बच्चे के साथ वापस दिल्ली नहीं चली तो वह उस के भाइयों और पिता को कभी जेल से बाहर नहीं आने देगा. नजमा मजबूर हो गई और उस आदमी को छोड़ कर संजीव के साथ वापस दिल्ली आ गई.

नजमा जब अपने गांव में थी, उसी दौरान संजीव की पहली पत्नी गीता की बेटी कोमल को टीबी की बीमारी हो गई. गीता ने संजीव से इस बारे में बताया और बेटी का इलाज करवाने को कहा.संजीव ने उस से कहा कि वह इलाज तो करा देगा लेकिन एक शर्त यह है कि वह उस से मिलने उस के दूसरे घर में आया करेगी और उसे नजमा के साथ उस के रिश्ते पर कोई ऐतराज नहीं होगा. बेटी की खातिर गीता ने संजीव की सारी शर्तें मान लीं.

दोनों पत्नियों ने साझा किए अपने दुखदर्द संजीव ने अपनी बेटी कोमल को इलाज के लिए अस्पताल में भरती करवा दिया. कोमल के इलाज के बहाने उस ने अपने दफ्तर से 7 लाख रुपए भी लिए. अब जब गीता संजीव से मिलने आने लगी तो नतीजा यह हुआ कि वह एक बार फिर गर्भवती हो गई.

इस बीच संजीव नजमा के गांव जा कर उसे और अपने बेटे गौरव को भी वापस ले आया. इस तरह अब संजीव के दोनों हाथों में लड्डू थे. समय के साथ गीता तीसरे बच्चे की मां बनी. उसे एक बेटी पैदा हुई, जिस की उम्र फिलहाल 11 साल है.नजमा अकसर संजीव के साथ अस्पताल में कोमल को देखने जाती थी. वहां उस की मुलाकात गीता से होती थी. दोनों वहां काफी देर अकेले भी रहती थीं तो दोनों के बीच बातचीत भी होने लगी.

एक दिन नजमा ने अपना दुख गीता के आगे कह दिया. गीता उस का दुख सुन कर हंसी और बोली, ‘‘तुम ने तो अभी कुछ नहीं सहा, जो मैं ने उस दरिंदे के हाथों सहा है.’’
2 पत्नियों के होते हुए भी अन्य महिलाओं से थे संबंध

धीरेधीरे गीता और नजमा अपने अपने दुखदर्द आपस में बांटने लगीं और उन की मंडली में संजीव की बेटी कोमल भी शामिल हो गई. कोमल अब धीरेधीरे स्वस्थ हो रही थी. इसी बीच कोरोना काल शुरू हो गया जिस से संजीव का काम लगभग बंद हो गया और वह ज्यादा समय घर में ही रहने लगा.

बीते 3 साल तो नजमा उर्फ गीता के लिए नरक बन गए, क्योंकि घर में रहने के दौरान संजीव का अत्याचार बहुत बढ़ गया. नजमा उस के सामने डर के मारे भीगी बिल्ली बनी रहती थी.यही नहीं, संजीव दूसरी औरतों के साथ भी शारीरिक संबंध रखता है, यह बातें भी नजमा को पता चलीं तो वह डरने लगी कि कहीं संजीव किसी तीसरी से शादी कर के उसे घर पर न ले आए.

एक दिन नजमा ने अपना यह डर गीता के सामने रखा. गीता ने कहा, ‘‘ये हो सकता है कि जैसे वह मुझे हटा कर तुझे ले आया तो आगे तुझे हटा कर किसी तीसरी को ले आएगा. उस के पास न पैसे की कमी है और न घर की.’’संजीव की हरकतों और प्रताड़नाओं से तंग आ कर लगभग 3 साल पहले गीता और नजमा ने संजीव की हत्या का प्लान बनाया, जिस में गीता की बेटी कोमल भी शामिल थी. गीता और कोमल का सहारा पा कर नजमा में कुछ हिम्मत आई.

गीता ने नजमा से कहा, ‘‘अगर दोनों की जिंदगी से संजीव नाम का कांटा निकल जाए तो कानूनन उस की बीवी होने के नाते उस की सारी चलअचल संपत्ति पर मेरा हक हो जाएगा. फिर उस में से मैं आधी संपत्ति तुम्हारे नाम कर दूंगी.’’नजमा इस आश्वासन पर खुश हो गई. अब तीनों मिल कर संजीव की हत्या की साजिश रचने लगीं. हत्या करवाने का जिम्मा नजमा ने अपने सिर लिया. उस ने कोमल के फोन से अपने घर के लोगों से बातचीत शुरू की और उन्हें अपनी आपबीती सुनाई.

दोनों पत्नियों ने दी 15 लाख की सुपारी संजीव की हत्या की सुपारी नजमा ने अपनी बुआ के लड़के इकबाल को दी.42 वर्षीय इकबाल झारखंड के गोड्डा में रहता था. नजमा ने उस से कहा कि संजीव की हत्या के बदले में वह उसे पूरे 15 लाख रुपए देगी.
15 लाख का लालच बहुत बड़ा था, मगर इकबाल खुद यह काम नहीं करना चाहता था. वह इस के लिए किसी सुपारी किलर की तलाश में जुट गया. जल्दी ही उस ने अपने दोस्त और शूटर नयूम अंसारी को इस काम के लिए राजी कर लिया.

नयूम गुजरात के वासी में टेलर था और इकबाल भी उस की दुकान पर टेलरिंग का काम कर चुका था. इकबाल ने शूटर नयूम अंसारी का फोन नंबर नजमा को दे कर कहा कि बाकी की सारी बातें अब वह नयूम से ही करे.कुछ दिन बाद नयूम झारखंड से दिल्ली नजमा से मिलने आया. संजीव की गैरमौजूदगी में नजमा नयूम से पास के एक पार्क में मिली और आगे की सारी प्लानिंग वहीं हुई. नयूम ने नजमा से संजीव की बाइक का नंबर ले लिया.

यही नहीं, नजमा के कहने पर कोमल ने 20 हजार रुपए भी नयूम के खाते में ट्रांसफर कर दिए और बाकी के 15 लाख काम हो जाने के बाद संजीव की एक प्रौपर्टी बेच कर देने का वादा किया.अब नजमा ने कोमल के फोन से नयूम को घर की एकएक बात बतानी शुरू कर दी. संजीव कब घर में रहता है, कब बाहर जाता है, वह कहांकहां जाता है इस की पूरी जानकारी नजमा नयूम को देने लगी.

शूटर ने बाइक चलाते हुए मारी गोली नयूम ने इस काम के लिए अपने एक अन्य दोस्त मनीष को भी गुजरात से बुला लिया. मनीष का एक चचेरा भाई दिल्ली के लाजपत नगर में रहता है, जिस से उस ने काम के बहाने बाइक मांग ली.
प्लानिंग पक्की थी. 6 जुलाई की रात साढ़े 8 बजे जब संजीव नजमा और अपने 10 साल के बेटे को साथ ले कर बाइक से चक्की पर गेहूं पिसवाने के लिए निकला तो नजमा ने निकलने से पहले अपने पास छिपा कर रखे गए कोमल के फोन से यह जानकारी तुरंत नयूम को दी.

जैसे ही नजमा का इशारा मिला, दोनों हत्यारे तमंचा लोड कर के शिकार का पीछा करने निकल पड़े. चक्की पर गेहूं रखवा कर दीपालय स्कूल के पास जैसे ही थोड़े सन्नाटे में संजीव की बाइक पहुंची, हत्यारों ने उसे ओवरटेक करते हुए रोका और उस के सीने में दनादन कई गोलियां उतार दीं.

गोली लगते ही संजीव बाइक लिए गिर पड़ा. साथ ही पीछे बैठी नजमा भी बेटे के साथ गिरी. वह सचमुच बेहोश हुई या उस ने नाटक किया, इस का पता नहीं चल पाया. मगर घटना के बाद गोलियों की आवाज सुन कर आसपास के लोग वहां जमा हो गए.
लोगों ने संजीव को पास के मजीदिया अस्पताल पहुंचाया.

थानाप्रभारी ने जब गीता से सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गई. महिला पुलिस ने नजमा की तलाशी में वह फोन भी बरामद कर लिया, जिस के जरिए उस ने कई बार नयूम से बातचीत की थी. अलगअलग राज्यों से पकड़े गए आरोपी

हत्या का मामला उजागर होने के बाद दक्षिणपूर्वी दिल्ली क्षेत्र की डीसीपी ईशा पांडेय ने क्षेत्र के एसीपी प्रदीप कुमार के नेतृत्व में एक टीम का गठन किया.
इस टीम में थानाप्रभारी (गोविंदपुरी) जगदीश यादव, इंसपेक्टर सुनील कुमार, एसआई विवेक, रवि कुमार, स्पैशल सेल से इंसपेक्टर असवीर सिंह, हैडकांस्टेबल नरसी मीणा और ऋषि दास को शामिल किया.

गीता उर्फ नजमा को हत्या के शक में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. उस ने हत्या की साजिश में संजीव की पहली पत्नी गीता, उस की 21 वर्षीय बेटी कोमल, अपने बुआ के बेटे इकबाल, शार्प शूटर नयूम और मनीष के नाम उजागर कर दिए.

पुलिस ने सब से पहले इकबाल को ट्रैप लगा कर झारखंड से पकड़ा. उस ने नयूम के साथ हत्या में शामिल मनीष मिश्रा का नाम बताया और यह भी कि मनीष वलसाड भाग गया है.

पुलिस की एक टीम तब गुजरात गई और वहां से मनीष को गिरफ्तार किया गया.
पुलिस ने शूटर नयूम अंसारी को झारखंड के गोड्डा गांव से गिरफ्तार कर लिया. नयूम को झारखंड की अदालत से ट्रांजिट रिमांड पर ले कर दिल्ली लाया गया. आरोपियों के पास से 3 जिंदा कारतूस के साथ .315 बोर का तमंचा और बाइक बरामद की गई.

कोमल के पास से हत्या के लिए इस्तेमाल किए गए 3 मोबाइल भी पुलिस ने बरामद कर लिए हैं. कोमल सहित सभी आरोपियों को पुलिस ने हत्या के आरोप में जेल भेज दिया है.

गीता और गीता उर्फ नजमा के 3 बच्चे अब अपने चाचा विमल कुमार के साथ रह रहे हैं. गौरतलब है कि प्राइवेट नौकरी करने वाले विमल के पास खुद के 2 बच्चे हैं, जिन की परवरिश और पढ़ाई का भारी बोझ उन पर है.

मुस्कान की मुस्कुराह के दुश्मन : भाग 3

थाने पर उस की जामातलाशी ली गई तो उस के पास से सोने की 28 ज्वैलरी बरामद की गईं, जिन की कीमत 14 लाख रुपए आंकी गई. इस के अलावा 16 हजार रुपए नकद, एक तमंचा .315 बोर तथा डिजिटिल वीडियो रिकौर्डर का ऐडाप्टर बरामद हुआ. उस से मुसकान की हत्या के संबंध में पूछा गया तो वह मुकर गई. लेकिन सख्ती करने पर सलोनी टूट गई और उस ने हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया.
इंसपेक्टर अवनीश कुमार सिंह ने किन्नर मुसकान की हत्या का परदाफाश करने और एक आरोपी को गिरफ्तार करने की जानकारी एसपी दिनेश त्रिपाठी को दी तो उन्होंने पुलिस सभागार में प्रैसवार्ता की. मीडियाकर्मियों के समक्ष किन्नर मुसकान की हत्या का खुलासा किया. खुलासा करने वाली टीम को उन्होंने पुरस्कृत करने की भी घोषणा की.

जयसिंह आखिर क्यों बना मुसकान मुसकान कौन थी? वह किन्नर कैसे बनी? उस ने अकूत संपत्ति कैसे कमाई? फिर वह अपनों का शिकार कैसे बनी? यह सब जानने के लिए हम पाठकों को उस के अतीत की ओर ले चल रहे हैं. उत्तर प्रदेश के कानपुर महानगर से करीब 20 किलोमीटर दूर एक धार्मिक व ऐतिहासिक कस्बा बिठूर है. इसी कस्बे से 4 किलोमीटर दूर अरैर गांव में ज्ञान सिंह अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी लौंग श्री के अलावा 2 बेटे मान सिंह व जय सिंह थे. ज्ञान सिंह के पास कटरी में कुछ खेत तथा 2 बीघा में अमरूद का बाग था. खेत व अमरूद के बाग से ज्ञान सिंह की गुजरबसर हो जाती थी.

ज्ञान सिंह का बड़ा बेटा मान सिंह तो तेजतर्रार था. लेकिन छोटे बेटे जयसिंह से वह परेशान रहते थे. जयसिंह की चालढाल भी ठीक न थी. वह मटकमटक कर चलता था. वह लड़कों के बजाय लड़कियों में ज्यादा रुचि लेता था. एक रोज कल्याणपुर का एक किन्नर गांव में किसी बच्चे के जन्म पर बधाई देने आया. नाचने के दौरान उस की नजर 12 वर्षीय जयसिंह पर पड़ी. उस किन्नर को समझते देर न लगी कि वह उसी के समुदाय का है.

इस के बाद वह किन्नर अकसर गांव आने लगा और जयसिंह से मिलने लगा. वह किन्नर सजधज कर सोने के आभूषण पहन कर आता था, जिस से जयसिंह उस से प्रभावित हो गया था. एक रोज उस किन्नर ने जयसिंह की आंखों में लालच देखा तो उस ने कहा, ‘‘तुम भी यह सब हासिल कर सकते हो बशर्ते कि तुम मेरे साथ चलो और हमारे समुदाय में शामिल हो जाओ.’’ जिज्ञासा और लालचवश जयसिंह ने बात मान ली और एक रोज घर वालों को बिना बताए उस किन्नर के साथ चला गया. उस किन्नर ने जयसिंह की मुलाकात अपने गुरु संजू से कराई और उसे अपने समुदाय में शामिल करने का अनुरोध किया.

संजू कल्याणपुर की किन्नर बस्ती में रहती थी. उस ने जयसिंह को अपने यहां रख लिया. अब जयसिंह को सुबहशाम नाचगाना व ताली बजाने की ट्रेनिंग दी जाने लगी. कुछ माह की ट्रेनिंग के बाद ही वह इन सभी कलाओं में पारंगत हो गया. संजू गुरु ने अब जयसिंह का नाम मुसकान रख दिया. शुरू हआ मुसकान का नया सफर

मुसकान अब अन्य किन्नरों के साथ सजधज कर नेग मांगने व बधाइयां गाने जाने लगी. किन्नरों का क्षेत्र बड़ा होता है. हर क्षेत्र का एक किन्नर गुरु होता है. क्षेत्र से किन्नर जो कमाते हैं, वह गुरु के चरणों में अर्पित करते है. गुरु आधा हिस्सा अपना निकाल कर बाकी का बंटवारा शिष्यों में कर देते हैं. मुसकान की भी अब कमाई होने लगी थी और वह धन जुटाने लगी थी. इस के बाद उस का रहनसहन भी बदल गया था. इस तरह धीरेधीरे 5 साल बीत गए. इस बीच न तो घर वालों को उस की याद आई और न ही मुसकान ने अपने मांबाप के घर की तरफ कदम रखा.

मुसकान पढ़ीलिखी तो थी नहीं, लेकिन महत्त्वाकांक्षी थी. वह किन्नर बन कर अकूत धन कमाना चाहती थी. इस के लिए उस ने लाखों रुपए खर्च कर प्लास्टिक सर्जरी के जरिए लिंग परिवर्तन करा लिया और सर्जरी के जरिए ही सुंदर स्त्री का रूप धारण कर लिया. अब वह सजधज कर जहां भी शादी समारोह में जाती तो लोगों की निगाह उस पर टिक जाती. उस के ठुमकों पर लोग वाहवाह करने लगते. मुसकान अब लाखों रुपए कमाने लगी थी.

किन्नर मुसकान ने कुछ सालों तक कानपुर परिक्षेत्र में कमाई की, उस के बाद वह उन्नाव शहर आ गई. इस बीच मुसकान ने कई किन्नर गुरुओं से अच्छे संबंध बना लिए थे. उन्नाव शहर के सफीपुर कस्बे में उस की मुलाकात जानकी कुंड में रहने वाली किन्नर गुरु मंजू से हुई. मंजू गुरु ने मुसकान को अपने ग्रुप में शामिल कर लिया और क्षेत्र में घूमने की इजाजत दे दी. कम समय में ही मुसकान ने अपने काम तथा अच्छे व्यवहार से मंजू का दिल जीत लिया और वह उस की चहेती शिष्या बन गई. मंजू ने उसे किन्नर नायक बना दिया. मंजू गुरु की मौत के बाद मुसकान नायक (गुरु) बन गई.

मुसकान ने वसीम से की लव मैरिज वर्ष 2010 में फतेहपुर शहर में हुए किन्नर सम्मेलन के दौरान मुसकान की मुलाकात वसीम से हुई. मुलाकातें बढ़ीं तो दोनों को एकदूसरे से प्यार हो गया. इस के बाद किन्नर मुसकान ने वसीम से प्रेम विवाह कर लिया. मुसकान कुछ माह तक उन्नाव में रही, उस के बाद वह वापस सफीपुर आ गई.

इन्हीं दिनों मुसकान ने सफीपुर कस्बे के बब्बर अली खेड़ा में एक मकान खरीद लिया और उसे आधुनिक रूप से सुसज्जित कर उस मकान में रहने लगी.वसीम और मुसकान के बीच 3 साल तक सब ठीक रहा. उस के बाद तनाव बढ़ने लगा. तनाव की वजह थी वसीम की शारीरिक मानसिक प्रताड़ना. वसीम नेग में मिलने वाले रुपए व जेवर उस से छीनने लगा था. मुसकान विरोध करती तो वह उसे मारतापीटता था.
मुसकान जब आजिज आ गई तो उस ने किन्नर समुदाय की मदद ली और वसीम से नाता तोड़ लिया. नाता तोड़ने के बाद भी वह उसे परेशान करता रहता था. वसीम से रिश्ता तोड़ने के बाद मुसकान ने जनवरी, 2019 में सोनू के साथ कोर्ट मैरिज कर ली. सोनू कश्यप मथुरा शहर के थाना चंद्रावली के यमुना पल्ली लक्ष्मी नगर मोहल्ले में रहता था. सोनू हृष्टपुष्ट आकर्षक युवक था. इसलिए मुसकान उस पर फिदा हो गई थी.

संदीप राजपूत उर्फ सलोनी मजबूरी में बना किन्नर शादी के बाद सोनू मुसकान के साथ सफीपुर में रहने लगा. वह कुछ माह मुसकान के साथ रहता तो कुछ माह मातापिता के साथ. इस तरह सोनू का आनाजाना सफीपुर बना रहता था. वसीम को जब मुसकान द्वारा दूसरी शादी करने की जानकारी हुई तो वह जलभुन उठा. उस ने मुसकान से कहा कि दूसरी शादी रचा कर उस ने अच्छा नहीं किया. तब उस ने मुसकान को जान से मारने की धमकी भी दी. उस के बाद वसीम उसे आए दिन धमकियां देने लगा. वसीम की धमकियों से आजिज आ कर मुसकान ने सुरक्षा के तौर पर अपने घर पर 2 सीसीटीवी कैमरे भी लगवा लिए.

मुसकान के साथ उस की 3 किन्नर साथी अन्नू, रूबी व सलोनी रहती थीं. सलोनी युवक किन्नर था. उस का नाम संदीप राजपूत था. संदीप का विवाह रिंकी से हुआ था. रिंकी ने सुहागरात को ही जान लिया था कि उस का पति संदीप नपुंसक (किन्नर) है. रिंकी का इस बाबत संदीप की मां मीना से झगड़ा हुआ.

लड़झगड़ कर रिंकी मायके चली गई और ससुराल वालों के खिलाफ कोर्ट में दहेज व धोखाधड़ी का मामला दर्ज करा दिया. कोर्टकचहरी के चक्कर से बचने के लिए संदीप किन्नर बन गया. उस ने अपना नाम सलोनी रख लिया और मुसकान के घर सफीपुर आ कर रहने लगा.

मुसकान सफीपुर कस्बे की चर्चित किन्नर थी. वह अपनी चेलियों अन्नू, रूबी, सलोनी व ढोलकिया मनोज बाबा के साथ क्षेत्र में निकलती थी और खूब कमाई करती थी. कमाई का आधा भाग वह स्वयं लेती थी और शेष भाग का बंटवारा सहयोगियों में करती थी. एक किलो सोने की ज्वैलरी थी मुसकान के पास

मुसकान ने अब तक कार भी खरीद ली थी. मनोज गोस्वामी को उस ने बतौर ड्राइवर रखा था. उस का रहनसहन अब रईसों जैसा था. उसे सोने के आभूषण खरीदने तथा पहनने का बेहद शौक था. कस्बे के एक ज्वैलर से उस ने एक किलोग्राम सोने के आभूषण खरीदे थे. वह पैसा बैंक में जमा करने के बजाय उस से ज्वैलरी खरीदना ज्यादा पसंद करती थी.

मुसकान के इस रहनसहन से अन्नू, रूबी व सलोनी ईर्ष्या करती थीं. वे सोचती थीं कि जो मुसकान के पास है, वह सब उन के पास भी होता.इसी सोच में अन्नू और रूबी की नीयत डोल गई. अन्नू ने एक रोज मुसकान के एटीएम से 40 हजार रुपए निकाल लिएइस की जानकारी मुसकान को हुई तो उस ने अन्नू को भलाबुरा कहा और पिटाई भी की. यही नहीं, उस ने वाट्सऐप के जरिए अन्नू को समुदाय में बदनाम भी कर दिया.

इस अपमान से अन्नू तिलमिला उठी और मुसकान से बदला लेने की सोचने लगी. रूबी ने भी उस की ज्वैलरी चुराई थी, सो उसे भी मुसकान ने बेइज्जत किया था. इसलिए रूबी भी मुसकान से नाराज रहने लगी थी.मुसकान के घर पर पुष्पा और संतोषा खाना बनाने का काम करती थीं. अन्नू व रूबी की करतूत से दोनों वाकिफ थीं, सो वे दोनों उन पर नजर रखती थीं. मुसकान को किन्नर सम्मेलन में जाने का बड़ा शौक था. वह आसपास के जिलों में होने वाले किन्नर सम्मेलनों में अकसर जाती रहती थी.

सम्मेलनों के अलावा मुसकान को पशुपक्षी से भी प्रेम था. उस ने दरजनों सफेद कबूतर व सफेद खरगोश पाल रखे थे, जिन का मकान की छत पर डेरा रहता था. मुसकान का एक वफादार कुत्ता चीकू भी था. वह उस से बेहद प्यार करती थी.अन्नू व रूबी दोनों मुसकान से अपमान का बदला लेना चाहती थीं. उन की निगाह मुसकान के आभूषणों तथा नकदी पर भी थी. आखिर में उन दोनों ने मुसकान की हत्या व लूट करने की योजना बनाई.

इस में उन दोनों ने संदीप उर्फ सलोनी को भी शामिल कर लिया. संदीप इसलिए राजी हो गया कि लूटे गए पैसों से वह पत्नी रिंकी से समझौता कर लेगा और कोर्टकचहरी से निजात पा जाएगा. योजना बनाने के बाद तीनों समय का इंतजार करने लगे.29 जुलाई, 2022 की सुबह मुसकान का ड्राइवर मनोज गोस्वामी बाइक की चाबी सोनू को देने मथुरा चला गया. दरअसल, 8 दिन पहले सोनू जब सफीपुर आया था तो अपनी बाइक की चाबी घर पर ही भूल गया था. शाम को रसोइया पुष्पा व संतोषा आईं और रात 8 बजे खाना बना कर अपने घर चली गई थीं.

उचित मौका देख कर रूबी, अन्नू तथा सलोनी ने गुफ्तगू की फिर काम तमाम करने की ठान ली. तीनों ने मिल कर शराब पी तथा मुसकान को भी पिलाई. शराब पीने के बाद मुसकान कमरे में जा कर लेट गई. चारों में से खाना किसी ने नहीं खाया.रात साढ़े 10 बजे किन्नर मुसकान जब सो गई, तब रूबी, अन्नू व सलोनी मुसकान के कमरे में पहुंचीं. रूबी व सलोनी ने मुसकान के हाथपैर पकड़ लिए और अन्नू ने तमंचा माथे पर सटा कर फायर कर दिया. गोली लगने से मुसकान का भेजा उड़ गया और उस की मौत हो गई.
फिर तीनों ने मिल कर शव फर्श पर रखा. इस के बाद कमरे का सामान बिखेर कर अलमारी से ज्वैलरी व नकदी लूट ली. अन्नू ने मुसकान का आईफोन भी अपने कब्जे में ले लिया. घर में 2 सीसीटीवी कैमरे लगे थे. पकड़े जाने के डर से उन्होंने उखाड़ कर सुरक्षित कर लिए. फिर कमरे को बाहर से बंद कर तीनों फरार हो गईं. मुसकान का आईफोन भी अन्नू ने रख लिया था.

सफीपुर से तीनों एक ट्रक ड्राइवर से लिफ्ट ले कर रात में ही बरेली आ गईं. यहां वे एक होटल में ठहरीं. होटल में ही अन्नू, रूबी व सलोनी ने आभूषण व नकदी का आपस में बंटवारा किया.बंटवारे में तीनों के हिस्से में 26-26 हजार रुपए नकद तथा सोने की ज्वैलरी के 28-28 नग आए. बंटवारे के बाद तीनों अलगअलग रास्ते से फरार हो गईं.

इधर घटना की जानकारी तब हुई, जब मुसकान का कुत्ता चीकू पुष्पा के घर गया और उस की साड़ी खींच कर घर लाया. पुष्पा ने ढोलकिया मनोज बाबा की मार्फत पुलिस को सूचना दी.4 अगस्त, 2022 को पुलिस ने आरोपी संदीप उर्फ सलोनी को उन्नाव कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. 2 अन्य आरोपी रूबी व अन्नू फरार थीं. पुलिस उन की तलाश में जुटी थी.

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