Best Hindi Story: बचाने वाला महान

Best Hindi Story: दलित गर्लफ्रैंड को बाइक से 500 मीटर घसीटा उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में एक नौजवान ने अपनी प्रेमिका को बाइक से तकरीबन 500 मीटर तक सड़क पर घसीट दिया. इस दौरान वह लड़की चीखतीचिल्लाती रही, लेकिन आरोपी प्रेमी ने उसे नहीं छोड़ा. घसीटने की वजह लड़की के आधे से ज्यादा कपड़े फट गए. हालांकि, लड़की की आवाज सुन कर कुछ गांव वाले मदद के लिए दौड़े, तो हड़बड़ाहट में आरोपियों की बाइक फिसल कर गिर गई. इस के बाद वे दोनों आरोपी पैदल भाग निकले. लड़का ओबीसी समाज का और लड़की दलित समाज की बताई गई. उन दोनों में इश्कबाजी का मामला था और इसी चक्कर में उन के बीच झगड़ा हो गया था. जाति प्यार पर हावी हो गई थी.

पंच मेलाराम की नजरें काफी दिनों से अपने घर के साथ चौराहे पर नुक्कड़ वाली जगह पर लगी हुई थीं. वहां पर गरीब हरिया की विधवा बहू गुलाबो मिट्टी की कच्ची झोंपड़ी में बच्चों के लिए टौफीबिसकुट, पैनपैंसिलों, कौपियों वगैरह की दुकान चलाती थी.

पंच मेलाराम नुक्कड़ वाली वह जगह हरिया से खरीदना चाहता था. दरअसल, उस का म झला बेटा निकम्मा व आवारा था, इसलिए मेलाराम गुलाबो की दुकान की जगह पर अपने उस बेटे को शराब की दुकान खोल कर देना चाहता था.

विधवा गुलाबो के घर में अपाहिज सास व 2 बेटियों के अलावा बूढ़ा शराबी ससुर हरिया भी था, जो दो घूंट शराब पीने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था.

पंच मेलाराम ने हरिया को शीशे में उतार लिया था. उसे हर रोज खूब देशी दारू पिला रहा था, ताकि नुक्कड़ वाली जगह उसे मिल जाए.

वह जगह हरिया के नाम नहीं थी. मकान की मालकिन पहले हरिया की अपाहिज पत्नी संतरा थी. बेटे नरपाल की शादी हो गई, तो बहू गुलाबो आ गई.

गुलाबो बेहद मेहनती, गुणवान, अच्छे चरित्र की औरत थी. वह अपनी सास की प्यारी बहू बन गई थी.

नरपाल भी बाप की तरह शराबी था. कभीकभी जंगल में जंगली जानवरों का शिकार कर के मांस बेच कर वह कुछ पैसे कमाता था.

सास ने मकान बहू गुलाबो के नाम कर दिया था. उसे यकीन था कि मकान बहू के नाम होगा तो बचा रहेगा, नहीं तो बापबेटा शराब के लालच में उसे बेच खाएंगे.

नरपाल एक दिन घने जंगल में जंगली जानवर का शिकार करने गया और वापस नहीं आया. 4 दिन बाद तलाश करने पर नरपाल के कपड़े मिले.

कपड़े मिलने का सब ने यही मतलब लगाया कि कोई जंगली जानवर उसे खा गया है. अब वह दुनिया में नहीं रहा.

बेचारी गुलाबो जवानी में विधवा हो गई. जवान होती बेटियों और अपाहिज सास की जिम्मेदारी उस पर आ गई थी.

एक दिन शाम के समय हरिया ने बहू से कहा कि अगर दुकान वाली जगह मेलाराम को बेच दी जाए, तो अच्छे पैसे मिल जाएंगे. अपने रहने वाले दोनों कच्चे मिट्टी के बने कमरे पक्के हो जाएंगे. खर्चे के लिए पैसा बच जाएगा.

‘‘पिताजी, दुकान वाली जगह बेच दी, तो घर का चूल्हा नहीं जलेगा. कच्चे मकान में रहा जा सकता है, पर भूखे पेट जिंदा रहना मुश्किल है. जगह बेच कर पैसा कितने दिन चलेगा?’’ गुलाबो ने दूर की बात सोचते हुए कहा, तो हरिया कुछ देर के लिए चुप हो गया.

दुकान के बाहर पंच मेलाराम खड़ा ससुरबहू की बातें सुन रहा था. वह भीतर आ गया और गुलाबो की भरीपूरी छाती पर नजरें टिकाते हुए चापलूसी भरे लहजे में बोला, ‘‘देखो हरिया, तुम्हारी बहू विधवा हो गई तो क्या हुआ, हमारे गांव की इज्जत है. शाम होते ही यहां चौक में कितने आवारा किस्म के लोग खड़े हो कर बेहूदा इशारे करते हैं.’’

‘‘यही बात तो मैं इसे सम झा रहा हूं. नुक्कड़ वाली जगह बेच कर जो पैसा मिलेगा, उस से पक्का मकान बनवा लेंगे. कुछ पैसा जरूरत के लिए बच भी जाएगा. आगे की आगे देखी जाएगी. मेरी दोनों पोतियां बड़ी हो रही हैं. सभी मिल कर काम करेंगे, तो हमारे बुरे दिन गुजर जाएंगे,’’ हरिया ने अपनी बात कही.

‘‘पिताजी, जगह बेचने का पैसा तो सालभर का खर्चा नहीं चला पाएगा. दोनों बेटियां जवान हो रही हैं. इन की शादियां भी करनी हैं. सासू मां भी दूसरों की मुहताज हैं,’’ गुलाबो ने कहा.

गुलाबो की बात पर मेलाराम हमदर्दी जताते हुए बोला, ‘‘गुलाबो, तू अपने रोजगार की चिंता मत कर. मैं सरकारी स्टांप पेपर पर लिख कर दूंगा. तुम्हारी दुकान पर मैं शराब की दुकान खोलूंगा. महीनेभर मैं कम से कम 10-12 लाख रुपए की आमदनी होगी. उस कमाई में से 25 फीसदी हिस्सा तुम्हारा होगा. महीने के महीने तुम्हें तुम्हारा हिस्सा मिल जाएगा.’’

‘‘वह तो बाद की बात है काका. काम चलने में सालभर लग जाएगा. इस से पहले हम खाएंगे क्या?’’

‘‘उस की चिंता मत कर गुलाबो. तुम हमारे खेतों में काम करो. 5 हजार रुपए हर महीना दूंगा. जब हमारी शराब की दुकान चल पड़ेगी, तुम काम छोड़ देना. लाखों रुपए तुम्हें तुम्हारा हिस्सा मिला करेगा. देखना मौज करोगी,’’ कहते हुए मेलाराम ने 5 हजार रुपए उस के सामने लहरा दिए.

‘‘रुपए रख लो बहू. 5 हजार रुपए हर महीने मिलेंगे. जब हमारी दुकान में दारू का कारोबार चल निकलेगा, तो तुम्हारा हिस्सा लाखों में मिलेगा. तब खेतों में काम करना छोड़ देना,’’ ससुर हरिया ने हरेहरे नोटों को ललचाई नजरों से देखते हुए कहा.

इधर गुलाबो भी सोच में पड़ गई. वह छोटी सी दुकान में हर महीने मुश्किल से हजारबारह सौ रुपए ही कमा पाती थी. इसी मामूली से काम में उस का सारा दिन खत्म हो जाता था.

अगर मेलाराम के खेतों में काम करने से 5 हजार रुपए महीना मिल जाए, तो 2 हजार रुपए में घर का खर्चा चला कर वह 3 हजार रुपए बचा सकती है. इस तरह 2-3 साल काम करेगी, तो अपनी दुकान की जगह बेचे बगैर ही वह अपने दोनों कमरे पक्के बनवा सकती है.

अभी गुलाबो सोच ही रही थी कि मेलाराम ने 5 हजार रुपए गुलाबो के सामने रख दिए. जब उस ने दूसरे दिन काम पर आने को कहा, तो गुलाबो ने गंभीर लहजे में अपने मन की बात कही, ‘‘ठीक है काका, आप के खेतों में काम जरूर करूंगी, मगर मैं अपनी सास और पति की निशानी अपने मकान का एक कोना तक नहीं बेचूंगी. पहले ही कहे देती हूं.’’

‘‘अरे हरिया, तू अपनी बहू को ठंडे दिमाग से सम झाना. मैं जो भी काम करूंगा, उस में तुम्हारा भी फायदा होगा,’’ कहते हुए मेलाराम चला गया.

‘‘बहू सारे रुपए संभाल ले. कल से काम पर जाना शुरू कर दे. तुम्हारी दुकान पर मैं काम कर लूंगा. बूढ़ा आदमी हूं, बैठा रहूंगा,’’ हरिया ने आगे की योजना बनाते हुए कहा.

रुपए ले कर गुलाबो सास के पास गई और सारी बात बताई, तो सास ने नुक्कड़ वाली दुकान की जगह बेचने से साफ मना कर दिया. वह बहू के मेलाराम के खेतों में काम करने के पक्ष में नहीं थी, मगर उसे अपनी बहू पर यकीन था.

गुलाबो को काम करते हुए महीनेभर से ऊपर हो गया था. दूसरे महीने का पैसा भी मेलाराम ने दिया नहीं था. शाम को जाते समय गुलाबो ने पैसे मांगे, तो मेलाराम ने उसे रुकने को कहा. उस के साथ काम करने वाली दूसरी औरतें जा चुकी थीं.

दरअसल, मेलाराम ने खेत पर भी मकान बना रखा था. वह उस में खेतों की रखवाली करने या फसल में रात को पानी देने के लिए रुकता था.

शाम हो चली थी. दूरदूर तक सन्नाटा पसरा था. गुलाबो को लगा कि अगर ज्यादा देर हो गई, तो अकेले गांव जाना मुश्किल होगा.

मेलाराम अपने कमरे में था. वह काफी समय से बाहर निकल नहीं रहा था. गुलाबो परेशान हो कर कमरे में घुस गई. महीने का पैसा मांगा, तो मेलाराम ने झपट कर उसे अपनी बांहों में कस लिया और उस की साड़ी खोलने लगा.

गुलाबो ने मेलाराम को अपने से दूर कर उसे उस की बूढ़ी उम्र का एहसास कराना चाहा, ‘‘यह क्या पागलपन है? तुम मेरे बाप की उम्र के हो. ऐसी घिनौनी हरकत तुम्हें शोभा नहीं देती.’’

तभी बाहर से गुलाबो की 12 साला बेटी उसे तलाश करती हुई वहां आ गई. उस ने अपनी मां से छेड़छाड़ करते मेलाराम को पीछे से काट खाया, तो वह गाली बकते हुए बुरी तरह बिदक गया.

मेलाराम ने मासूम बच्ची को जोर से धक्का दिया. वह दीवार से जा टकराई. उस के सिर से खून बह निकला. चोट लगने से वह बेहोश हो गई.

गुस्से में मेलाराम दूसरे कमरे से तलवार उठा लाया, जो उस ने पहले से छिपा कर रखी थी. वह दहाड़ते हुए बोला, ‘‘देख गुलाबो, अगर तू अपनी जवानी का खजाना मु झ पर नहीं लुटाएगी, तो मैं तेरी हत्या कर के तेरी जवान होती बेटी की इज्जत लूट लूंगा.’’

‘‘बेटी के साथ मुंह काला मत करना. हम मांबेटी तो पहले ही मुसीबत की मारी हैं,’’ बेचारी गुलाबो अपनी हालत पर सिसक उठी.

मेलाराम के हाथ में चमकती तलवार देख कर वह घबरा उठी थी. अगर उस की हत्या हो गई, तो उस की बेटी को बचाने कौन आएगा?

‘‘ठीक है. अगर अपनी जवान होती बेटी की आबरू बचाना चाहती है, तो तू पहले सफेद कागज पर लिख कि अपनी नुक्कड़ वाली दुकान मु झे बेच रही है. साथ ही, जिस्म से सारे कपड़े उतार दे.

‘‘बूढ़ा आदमी हूं, थोड़ेबहुत मजे लूटूंगा. तेरी बेटी को तेरे साथ हिफाजत से घर छोड़ आऊंगा. तेरा महीने का पैसा इस शर्त पर दूंगा कि हर शाम मेरी इच्छा पूरी कर के जाया करेगी.’’

‘‘कमीने, अपने घर की एक इंच जगह नहीं बेचूंगी. तेरी यह इच्छा कभी पूरी नहीं होगी,’’ गुलाबो नफरत से गरजी.

‘‘ठीक है, तू ऐसे नहीं मानेगी. पहले तेरी बेटी का गला धड़ से अलग करता हूं,’’ गुर्राते हुए उस ने चमकती तलवार उस की बेटी की गरदन पर रख दी.

ऐसा दिल दहला देने वाला नजारा देख कर गुलाबो कांप उठी. वह नीच गांव से दूर खेतों में मांबेटी की हत्या कर के लाशें दबा देगा. कोई पूछेगा नहीं. उन दोनों का खात्मा हो जाएगा. उस का पति जिंदा नहीं है. ससुर शराबी है. अपाहिज सास भीख मांगती फिरेगी.

अभी गुलाबो सोच में उल झी थी कि मेलाराम फिर गरजा, ‘‘अरे, सोच क्या रही है? जल्दी से सादा कागज पर अपना नाम लिख. अपने सुलगतेमचलते जिस्म से कपड़े उतार, नहीं तो तेरी बेटी का खात्मा हो गया, समझ ले.’’

मजबूर गुलाबो ने सामने पड़े कागज पर दस्तखत कर अपना बदन मेलाराम को सौंप दिया.

गुलाबो का मादक बदन मेलाराम के दिलोदिमाग में वासना का तूफान जगाने लगा था.

मेलाराम ने जवानी में ऐसा मचलता हुस्न नहीं देखा था. वह अभी आगे बढ़ता कि बाहर से आती कुछ आवाजें सुन कर चौंक उठा. आवाजें उस के मकान के नजदीक से आ रही थीं.

गुलाबो ने फटाफट अपने कपड़े पहन लिए, तभी उस की छोटी बेटी हांफती हुई आई और मां से लिपटते हुए बोली, ‘‘मां… मां, बाहर देखो, पापा आ रहे हैं. अपने साथ पुलिस को भी ला रहे हैं.’’

‘‘यह तू क्या कह रही है गुडि़या? तेरे पापा को तो जंगली जानवर…’’ गुलाबो इतना कह पाई थी कि आंधीतूफान की तरह गुस्से की आग में सुलगता हुआ उस का पति नरपाल वहां आ पहुंचा.

उस ने मेलाराम को देखते ही दबोच लिया और उसे इतना मारा कि उस के दोनों हाथ टूट गए और एक आंख फूट गई. अगर पुलिस वाले नहीं बचाते, तो नरपाल मेलाराम को मार ही डालता.

हैरानी में डूबी गुलाबो ने नरपाल से पूछा, ‘‘तुम्हें तो जंगली जानवर…’’

‘‘नहीं…नहीं, मु झे जंगली जानवर क्या खाएंगे, मु झे तो मेलाराम और इस के दोनों बेटों ने जंगल में पकड़ लिया था. मैं नशे में था. ये तीनों हमारा मकान हड़पना चाहते थे.

‘‘मना करने पर इन लोगों ने मु झे बुरी तरह मारापीटा और बेहोशी की हालत में नंगा कर के नदी में बहा दिया. इन का अंदाजा था कि लोग सम झेंगे कि मु झे जंगली जानवर खा गए.’’

नरपाल की बात सुन कर तो गुलाबो ने वह कागज फाड़ डाला, जिस पर मेलाराम ने उस से दस्तखत कराए थे.

गुलाबो आगे बढ़ कर नरपाल से लिपट गई.

‘‘ऐसा हादसा तुम्हारे शराब पीने की आदत के चलते हुए था. पंच मेलाराम हमारे मकान की नुक्कड़ वाली जगह पर शराब की दुकान खोलना चाहता था,’’ गुलाबो ने पति की शराब पीने की आदत पर अपना विरोध जताया.

‘‘गुलाबो, नशा समाज के लिए अभिशाप है. मैं इस का बुरा नतीजा भुगत चुका हूं. अगर एक भला आदमी मुझे बेहोशी की हालत में बहती नदी से न बचाता, तो मेरी बेटी और पत्नी के साथ पता नहीं क्या हो जाता.

‘‘अब मैं न शराब पीऊंगा और न ही शराब की दुकान खुलेगी. अब ये शैतान जेल जाएंगे,’’ नरपाल ने इतना कहा, तो गुलाबो पति की बांहों में समा गई. Best Hindi Story

Story In Hindi: पुराना खाता

Story In Hindi: मंथन की एक राशन की दुकान थी. यह दुकान महल्ले में ही थी, जिस से अगलबगल के लोग सामान खरीद कर ले जाते थे.

मंथन की यह दुकान बहुत पुरानी थी. उस के दादापरदादा के समय की, जिस में पुरानी काठ की लकडि़यों का फर्नीचर था. हर साल दीवाली पर पेंट होने से दुकान अच्छी कंडीशन में थी.

जब से मंथन ने दुकान संभाली थी, तब से वह ग्राहकों पर खास ध्यान देने लगा था. वह सब ग्राहकों से मुसकरा कर बातें करता था. उस के बात करने के तरीके में एक तरह का अपनापन था. लिहाजा, सबकुछ ठीकठाक चल रहा था.

मंथन के पिताजी की तबीयत बहुत ज्यादा खराब रहने लगी थी. लिहाजा, ज्यादातर मंथन ही दुकान पर बैठता था. एक दिन की बात है. खुशबू, जो रजत की बहन थी, सामान लेने मंथन की दुकान पर गई.

मंथन की कदकाठी बढि़या और चेहरा बहुत ही खूबसूरत था. गोरा रंग, घुंघराले बाल, लंबी नाक, चौड़ी छाती. टीशर्ट और लोअर में भी वह काफी फब रहा था.

रजत के पिताजी अजय बाबू पहले घर का राशनपानी लेने मंथन के यहां जाते थे, लेकिन इधर अब वे भी बीमार रहने लगे थे. रजत को औफिस के कामों से ही समय नहीं मिल पाता था, तो वह भला राशनपानी कैसे ला पाता.

रजत की नईनई शादी हुई थी, लिहाजा, वे लोग नईनवेली बहू को घर से बाहर भेजना ठीक नहीं सम झते थे. सौदा लाने के लिए अब खुशबू ही मंथन की दुकान पर आनेजाने लगी थी.

उस दिन जब खुशबू ने मंथन को देखा, तो देखती ही रह गई. सामान ले कर वह कब की घर पहुंच चुकी थी, लेकिन उस का मन घर में नहीं लग रहा था. बारबार उस का ध्यान मंथन की पर्सनैलिटी को देख कर री झा जा रहा था.

खुशबू की एक सहेली थी, जो उस के घर के बगल में ही रहती थी. उस का नाम सलोनी था. सलोनी और खुशबू हमउम्र होने के साथसाथ पक्की सहेलियां भी थीं.

खुशबू अपने दिल की सारी बातें सलोनी को और सलोनी अपने दिल की सारी बातें खुशबू को बताती थी. दोनों का दिल एकदूसरे के बिना नहीं लगता था.

उसी दिन शाम को खुशबू ने अपने दिल की बात सलोनी को बताई, ‘‘सलोनी, मैं तु झे एक बात बताना चाहती हूं. पता नहीं यह कहना ठीक रहेगा भी या नहीं. कैसे कहूं, मु झे बहुत शर्म आती है.’’

‘‘अरे, दोस्तों से कैसी शर्म. दोस्ती ही एक ऐसा रिश्ता है, जिस में लोग अपने दिल की हर बात बता देते हैं. अब बोल भी दे…’’ सलोनी ढलते सूरज को देखते हुए बोली.

‘‘तुम मंथन को जानती हो…’’

‘‘हां, हमारे महल्ले में राशन की दुकान वाला…’’

‘‘हां, वही,’’ खुशबू बोली.

‘‘अरे यार, उसे कौन नहीं जानता… महल्ले की सब लड़कियां उस पर मरती हैं. वे रीता भाभी हैं न… उन का चक्कर मंथन से सालभर पहले से चल रहा था.

‘‘रीता भाभी के पति को जब रीता और मंथन के अफेयर की खबर सुनाई पड़ी, तो उन्होंने रीता भाभी की जम कर पिटाई कर दी थी और राशन लेने के लिए खुद जाने लगे थे.

‘‘और वह गुडि़या, जो मंथन के किराएदार की बेटी थी, के साथ भी मंथन का चक्कर चल रहा था. मंथन है ही इतना खूबसूरत कि उस पर किसी का भी दिल आ जाए.

‘‘हमारे महल्ले की सब औरतों में चर्चा है कि मंथन को जो भी औरत या लड़की देखती है, तो वह उस की हो कर रह जाती है. सब को लगता है कि मंथन का किसी न किसी से चक्कर चल रहा है.

‘‘मंथन का तो पड़ोस की शालू से भी अफेयर था. पता नहीं क्या हुआ होगा. शालू और मंथन के बारे में तो महल्ले की लड़कियां 2 साल पहले चर्चा कर रही थीं.’’

‘‘यानी मंथन मु झे नहीं मिलेगा,’’ कहते हुए खुशबू का चेहरा उतर गया.

‘‘ऐसा कैसे कह सकती हो,’’ सलोनी ने चुटकी ली.

‘‘अब जब इतने सारे गुण हैं, तो वह मु झ बेशक्ल लड़की को क्यों प्यार करेगा? वह इतना हैंडसम है कि उस को कहने भर की देर है, कोई भी लड़की उस के लिए मरने को तैयार हो जाएगी… मेरी तो किस्मत ही खराब है,’’ खुशबू बोली.

‘‘तू किसी से कमतर क्यों रहने लगी… आज भी जब तू महल्ले से गुजरती है, तो लोगों की आंखें तु झ पर से हट नहीं पातीं. तू कम थोड़ी है. महल्ले के लड़के तो तु झ पर जान छिड़कते हैं. तू एक बार कह कर तो देख, वे तेरे लिए कुछ भी कर सकते हैं,’’ सलोनी ने कहा.

‘‘देख, मु झ से फालतू की बात मत कर. मैं ऐसीवैसी लड़की नहीं हूं, जो हर किसी को अपना दिल देती फिरूं. मैं केवल और केवल मंथन की हूं…’’ खुशबू ने कहा.

शाम कब की रात में ढल चुकी थी. खाना खा कर बिस्तर पर लेटी खुशबू छत को ताकती रही. वह लगातार करवटें बदलती रही, लेकिन नींद आंखों से गायब रही. उसे बारबार सलोनी के बताए लड़कियों के नाम याद आ रहे थे. रीता भाभी, गुडि़या, शालू… उन के पासंग में भी नहीं ठहरती थी वह. सांवला रंग, औसत देह, लेकिन उस की छातियां भरीभरी थीं और उस के कूल्हे भारी थे, जो उस के सांवलेपन में भी चार चांद लगाते थे. फिर पता नहीं कब उसे नींद आ गई.

सुबह खुशबू की नींद देर से खुली. सलोनी कब से आ कर उस के घर पर बैठी थी. कितनी बार आवाज लगाई थी, ‘‘सलोनी, जल्दी करो. जल्दी से तैयार हो जाओ. हम लोग कालेज के लिए लेट हो रहे हैं…’’

खुशबू नहाधो कर कालेज के लिए निकली, लेकिन उस का मन कालेज में भी नहीं लगा. किसी तरह कालेज खत्म कर के वह घर लौटी.

अब खुशबू मंथन की दुकान पर किसी न किसी बहाने जाने लगी. जब उसे सामान की लिस्ट थमाई जाती, तो वह जानबू झ कर कुछ सामान लाती और कुछ सामान छोड़ देती.

मंथन भी खुशबू की आंखों की भाषा को बखूबी सम झ रहा था. एक दिन मौका पा कर वह खुशबू से बोला, ‘‘अच्छा, एक बात बताओ. तुम मु झे देख कर इतना मुसकराती क्यों हो?’’

खुशबू हंसते हुए बोली, ‘‘आप को देख कर कहां मुसकराती हूं. मेरी सूरत ही ऐसी है कि लोगों को मेरा चेहरा मुसकराता हुआ दिखता है. इस में मैं क्या करूं?’’

यह सुन कर मंथन मुसकरा कर रह गया.

एक दिन खुशबू ने 500 रुपए के नोट में छिपा कर एक कागज पर अपना मोबाइल नंबर लिख दिया और घर आ गई, लेकिन उस के दिल में खलबली सी मची हुई थी.

रात को वह सोने के लिए छत पर चली गई और मंथन के फोन का इंतजार करने लगी. रात के तकरीबन 1 बजे उस का मोबाइल वाईब्रेट करने लगा. नया नंबर था. खुशबू का दिल बल्लियों उछलने लगा.

खुशबू ने फोन रिसीव किया. दूसरी तरफ की आवाज को सुनने की गरज से वह धीरे से बोली, ‘‘हैलो…’’

दूसरी तरफ से मंथन की आवाज आई, ‘अभी तक जाग रही हो?’

‘‘हां,’’ वह धीरे से बोली.

‘अब तो चांदतारे सब सो गए और तुम जाग रही हो. भला किस के इंतजार में?’

‘‘कौन सो गया है और कौन जाग रहा है. मैं तो सदियों से नहीं सोई… तुम्हारा इंतजार कर रही हूं इस छत पर,’’ खुशबू बोली.

‘अच्छा, तो तुम भी छत पर सो रही हो, ताकि मु झ से बातें कर सको. कहो तो आ जाऊं तुम्हारे पास? 2-4 छतों का ही तो फासला है,’ मंथन बोला.

‘‘नहीं, मत आना,’’ खुशबू बोली.

‘वैसे, मैं भी आज छत पर सोया हूं,’ मंथन ने बताया.

इस के बाद मंथन और खुशबू में ढेर सारी बातें हुईं. अब तो यह रोज की बात थी. खुशबू और मंथन छत पर ही सोते थे. सोते क्या थे, सोने का बहाना करते थे और प्रेम की पेंगे भरते थे.

सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. एक साल पलक झपकते ही बीत गया. अगले साल खुशबू की रिश्ते की बात चलने लगी, पर वह शादी की बात को टालती रहती थी.

इधर शहर में एक बहुत बड़ा शौपिंग मौल खुल गया था. मंथन से कम दाम पर सामान बेचने वाला. शहर के लोग उधर ही भाग रहे थे.

मंथन के पिता अब चल फिर नहीं पाते थे. परिवार की जिम्मेदारी का सारा बो झ अब मंथन के कंधों पर आ गया था. वह ज्यादा तनाव में रहने लगा था.

एक दिन जब मंथन ने सुबह दुकान खोली थी, तब उस की दुकान में बहुत से ग्राहक सामान लेने आए हुए थे. तभी रजत अपने पापा अजय बाबू के साथ मंथन की दुकान पर पहुंचा और उस ने इशारे से मंथन को बताया, ‘‘जैम की शीशी, होरलिक्स का डब्बा और चौकलेट का पैकेट दे दो.’’

मंथन ने चौकलेट का पैकेट, जैम की शीशी और होरलिक्स का पैसा जोड़ कर बिल बनाया.

परची थमाते हुए मंथन बोला, ‘‘रजत बाबू, 700 रुपए हो गए.’’

रजत ने एमआरपी और चीजों के दाम को मिलाया. दाम ठीकठाक ही लगाए गए थे, लेकिन 1-2 सामान में एमआरपी से 2-3 रुपए ही कम निकले.

रजत ने आंखें तरेरते हुए कहा, ‘‘मंथन, तुम ने तो एमआरपी पर ही सब सामान के दाम लगा दिए हैं… जबकि मौल में अभी भारी डिस्काउंट चल रहा है. हम वहीं से सब सामान लेंगे. चलिए पापा…’’

रजत के पापा ये सब बातें बहुत ध्यान से सुन रहे थे. वे बोले, ‘‘मौल तो आज खुला है बेटा, इस से पहले मैं और तुम्हारे दादाजी भी इसी दुकान से सामान खरीदते रहे हैं. तब मंथन के दादाजी दुकान चलाते थे. इन लोगों ने खूब साथ दिया है हमारा. यह रिश्ता एक दिन में नहीं बना है, बल्कि इस को बनने में सालोंसाल लगे हैं.’’

‘‘आप की तरह मैं बेवकूफ नहीं हूं पापा, जो इन से महंगे दाम पर सामान खरीदूं. आखिर हम भी पैसा बहुत मेहनत से कमाते हैं. जब और लोग कंपीटिशन कर रहे हैं, तो इन को भी तो दाम कम करना चाहिए. ये लोग पहले की तरह अब ज्यादा पैसे नहीं ले सकते. अब जमाना बदल गया है,’’ रजत ने कहा.

‘‘रजत बेटा, तुम शायद कोरोना के समय को भूल गए हो. उस समय तुम इसी मंथन के यहां से सामान ले जाते थे. और तुम्हें यह भी पता होना चाहिए कि उस समय तुम्हारे बैंक से तुम्हारी सैलरी नहीं आ रही थी. तब भी हम लोगों को घर बैठे सामान आसानी से मिल जाता था.

‘‘और इसी मंथन की दुकान से तुम ने दसियों हजार रुपए का राशन खाया है. उस समय यही मंथन पीछे के दरवाजे से हमें चीजें मुहैया करवाता था.

‘‘उस समय ये बड़ेबड़े मौल न जाने किस बिल में समा गए थे. तब पुलिस के न जाने कितने लाठीडंडे खा कर मंथन सामान इधरउधर से जुगाड़ कर के पूरे महल्ले को देता था.

‘‘फिर भी मैं वहीं से सामान लूंगा. मौल बैस्ट है मेरे लिए,’’ इतना कह कर रजत वहां से चला गया.

बात आईगई हो गई. अजय बाबू और रजत दोनों खुशबू पर शादी के लिए जोर दे रहे थे. 6 महीने और बीत गए. जो अजय बाबू मंथन के परिवार को इतना अच्छा कहते थे, जब उन को पता चला कि मंथन और खुशबू एकदूसरे से प्यार करते हैं, तो उन के जातिवाद ने सिर उठा लिया.

एक दिन अजय बाबू मंथन की दुकान पर तमतमाए हुए पहुंचे और मंथन को कई झापड़ रसीद कर दिए.
अजय बाबू का शरीर गुस्से से कांप रहा था. वे तमतमाए हुए लहजे में बोले, ‘‘हम ने तुम लोगों को जरा सा मुंह क्या लगा लिया, तुम अपनी औकात से बाहर आ कर हमारे सिर पर चढ़ गए. कहां हम कुलीन ब्राह्मण और कहां तुम बनिया. तुम लोगों को हमेशा अपनी औकात में रहना चाहिए. हमारी बहनबेटियों से खिलवाड़ करते हो… हद में रहा करो, नहीं तो होश ठिकाने लगा दूंगा.’’

दिन बीतते चले गए. कई साल गुजर गए. उम्र निकल जाने के चलते खुशबू के लिए रिश्ते भी अब आने बंद हो गए थे. इधर परिवार और 2 बहनों की शादी की जिम्मेदारी मंथन के कंधों पर थी. वह जैसे बलिदान की वेदी पर झूल गया.

एक दिन अचानक अजय बाबू को लकवा मार गया. अब वे बिस्तर से उठ भी नहीं पाते थे. खुशबू ने पूरे मन से अपने पापा की सेवा की, पर जल्दी ही वे चल बसे.

इतना ही नहीं, एक दिन रजत अपनी कार से औफिस जा रहा था कि तभी उस की कार सामने से आ रही दूसरी कार से टकरा गई और रजत के कार के परखच्चे उड़ गए.

रजत को अस्पताल में भरती करवाया गया. रजत अब महीनों तक बिस्तर से उठ नहीं सकता था. डाक्टर कह रहे थे कि इतने बड़े हादसे में अगर वह बच गया है, तो यही बहुत बड़ी बात है.

रजत की बैंक की प्राइवेट नौकरी थी, जो छूट गई. उस की पत्नी सविता के घर वालों ने कुछ महीनों तक मदद की, उस के बाद उन्होंने भी हाथ खींच लिए.

पूरे 2 साल तक रजत बिस्तर पर रहा. बच्चों की फीस जमा नहीं करवा पाने के चलते स्कूल ने बच्चों के नाम काट दिए. अब रजत के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ने जाते थे.

एक दिन की बात है. घर में राशन खत्म हो गया था और बच्चे भूख से बिलबिला रहे थे. रजत के पापा अगर जिंदा होते, तो जरूर मंथन से कह कर राशन ले आते.

कुछ सोच कर सविता ने सारी बात जा कर मौल वाले दुकानदार को बताई, पर उस दिन सविता के पैरों तले की जमीन खिसक गई, जब मौल वाले ने सामान उधार देने से साफ मना कर दिया. उस ने बहुत सारे ग्राहकों के सामने ही सविता की बेइज्जती भी कर दी. सविता बेइज्जती का घूंट पी कर वहां से चली आई.

घर आ कर सविता ने सारी घटना रजत को बताई. रजत अपनी बेबसी पर दांत पीस कर रह गया था. उस के पैर अभी पूरी तरह से ठीक नहीं हुए थे. कमर की हड्डी भी टूट गई थी. वह लाचार था.

खैर, उड़तेउड़ते यह बात मंथन को पता चली. उस का और अजय बाबू का पुराना संबंध था. इस नाते वह घर का पूरा राशन रजत के यहां देने चला आया.

रजत और सविता दोनों हैरान से मंथन को ताक रहे थे.

मंथन ने रजत को नमस्ते किया और पूछा, ‘‘आप कैसे हैं?’’

रजत को जवाब देते न बना, फिर भी वह मंथन से बोला, ‘‘ठीक हूं. धीरेधीरे रिकवरी हो रही है.’’

‘‘आप के ऐक्सीडैंट के बारे में सुना था, लेकिन दुकान में भीड़भाड़ रहने के चलते आप से मिलने नहीं आ सका. कुछ झिझक भी थी. पता नहीं आप क्या सोचेंगे? वैसे, कुछ दिनों से बच्चों को स्कूल जाते नहीं देखा. वे स्कूल जाते हैं न?’’

‘‘स्कूल तो जाते हैं, लेकिन अब प्राइवेट स्कूल में नहीं, बल्कि सरकारी स्कूल में जाते हैं, लेकिन इधर उन की स्टेशनरी खत्म हो गई है, इसलिए हफ्तेभर से वे स्कूल नहीं जा रहे हैं.’’

‘‘हां, इधर मैं भाभी को भी देखता हूं, वे सुबहसुबह शायद बच्चों को पढ़ाने जाती हैं.’’

‘‘हां, बगल में प्राइमरी स्कूल है. वहीं 6-7 हजार रुपए की प्राइवेट नौकरी कर रही है. वहीं बच्चों को पढ़ाने जाती है. बेचारी को मेरे ऐक्सीडैंट के बाद बाहर निकलना पड़ गया. अब क्या करूं… सविता की कमाई तो मेरी दवादारू में ही खर्च हो जाती है.’’

‘‘पढ़ाने या काम करने में कोई बुराई थोड़ी ही है. सविता भाभी तो ज्ञान का दीपक जला रही हैं… आप के परिवार के लिए कुछ राशन ले कर आया हूं. आप मेरे पुराने खाते को फिर से चालू कर दीजिए.’’

‘‘मंथन, मु झे शर्मिंदा मत करो. मैं पहले ही अपनी नजरों में गिर चुका हूं. मैं अपने बरताव पर शर्मिंदा हूं.’’

‘‘मुसीबत के समय ही तो अपने लोग काम आते हैं. अगर कल को मेरे ऊपर कोई मुसीबत आन पड़ी तो आप लोग मेरी मदद करने आएंगे न? आप बच्चों को स्कूल भेजिए. आप स्टेशनरी का सामान मेरी दुकान से मंगवा लीजिएगा. सब्जीभाजी भी भिजवा दूंगा. जब आप ठीक हो जाएंगे, तब मेरा हिसाब कर दीजिएगा.’’

‘‘सब्जी तो आप नहीं बेचते हैं, फिर सब्जी कैसे देंगे?’’ सविता ने पूछा.

‘‘मेरा एक दोस्त आजकल सब्जी बेच रहा है. उस के यहां से खरीद कर मैं आप को भिजवा दूंगा और पैसे हिसाब में लिख दूंगा.

‘‘अच्छा, अब मैं चलता हूं. दुकान पर लड़का अकेला है,’’ कह कर मंथन चलने को हुआ.

‘‘दुकान पर चले जाना, लेकिन पहले मेरी बहन खुशबू के हाथ की चाय तो पी लो,’’ रजत बोला.

इस के बाद रजत ने खुशबू को इशारा किया, तो वह किचन में चाय बनाने चली गई. थोड़ी देर बाद गरमागरम चाय आ गई.

चाय खत्म कर मंथन बाहर जाने लगा कि तभी रजत ने टोका, ‘‘बहुत दिनों से मेरे मन में एक बात चल रही थी. इतना उपकार तो तुम ने मु झ पर दिया है, लेकिन अभी मैं चलनेफिरने में नाकाम हूं. मेरी खुशबू के प्रति भी कुछ जिम्मेदारी है. मु झे यह भी मालूम है कि तुम दोनों एकदूसरे से बहुत प्यार करते हो. मेरे पिताजी पुराने खयालात के थे, लेकिन अब दुनिया बदल रही है. मु झे भी नए ढंग से सोचना होगा.

‘‘तुम दोनों बेकुसूर होते हुए भी सजा काट रहे हो, इसलिए मेरी तुम से एक गुजारिश है कि तुम मेरी बहन को स्वीकार कर लो. बहुत दुख दिया है मैं ने तुम दोनों को. आज से मु झे तुम मेरी जिम्मेदारियों से मुक्त करो.

‘‘मेरी बहन जहां और जिस के साथ खुश रहेगी, वहीं उस की शादी होनी चाहिए. लेकिन मेरी माली हालत बहुत खराब है. मैं दहेज नहीं दे सकता.’’

‘‘दहेज नहीं दे सकते… मतलब मु झे मुफ्त में आप की बहन से शादी करनी पड़ेगी?’’ मंथन बोला.

खुशबू ने कनखियों से मंथन को ताका. उस को लगा कि अब फिर से वह कुंआरी रह जाएगी. मंथन तो दहेज ले कर ही मानेगा.

तभी मंथन खिलखिला कर हंस पड़ा, ‘‘भाई साहब, आप की बहन को मैं एक जोड़े में विदा करवा कर ले जाऊंगा. अभी मेरी दुकान बहुत बढि़या चल रही है. मैं अपनी दोनों बहनों की शादी कर चुका हूं. हर तरह की जिम्मेदारी का बो झ खत्म हो गया है.

‘‘खुशबू जैसी सम झदार जीवनसाथी पा कर मेरा काम और भी आसान हो गया है. अच्छा, अब मैं चलता हूं. आप लोग शादी की तारीख तय कीजिए.’’

अब रजत, सविता और खुशबू के चेहरे पर खुशी नजर आ रही थी. Story In Hindi

Hindi Family Story: पति-पत्नी और वो

Hindi Family Story: मैं एक मल्टीनैशनल कंपनी में नौकरी कर रही थी. अभी मुझे 2 साल भी नहीं हुए थे. कंपनी का एक बड़ा प्रोजैक्ट पूरा होने की खुशी में शनिवार को फाइव स्टार होटल में एक पार्टी थी. मुझे भी वहां जाना था. मेरे मैनेजर ने मुझे बुला कर खासतौर पर कहा, ‘‘प्रीति, तुम इस प्रोजैक्ट में शुरू से जुड़ी थीं, तुम्हारे काम से मैं बहुत खुश हूं. पार्टी में जरूर आना… वहां और सीनियर लोगों से भी तुम्हें इंट्रोड्यूज कराऊंगा जो तुम्हारे फ्यूचर के लिए अच्छा होगा.’’

‘‘थैंक्यू,’’ मैं ने कहा.

सागर मेरा मैनेजर है. लंबा कद, गोरा, क्लीन शेव्ड, बहुत हैंडसम ऐंड सौफ्ट स्पोकन. उस का व्यक्तित्व हर किसी को उस की ओर देखने को मजबूर करता. सुना है वाइस प्रैसिडैंट का दाहिना हाथ है… वे कंपनी के लिए नए प्रोजैक्ट लाने के लिए कस्टमर्स के पास सागर को ही भेजते. सागर अभी तक इस में सफल रहा था, इसलिए मैनेजमैंट उस से बहुत खुश है.

मैं ने अपनी एक कुलीग से पूछा कि वह भी पार्टी में आ रही है या नहीं तो उस ने कहा, ‘‘अरे वह हैंडसम बुलाए और हम न जाएं, ऐसा कैसे हो सकता है. बड़ा रंगीन और मस्तमौला लड़का है सागर.’’

‘‘वह शादीशुदा नहीं है क्या?’’ मैं ने पूछा.

‘‘एचआर वाली मैम तो बोल रही थीं शादीशुदा है, पर बीवी कहीं और जौब करती है. सुना है अकसर यहां किसी न किसी फ्रैशर के साथ उस का कुछ चक्कर रहा है. यों समझ लो मियांबीवी के बीच कोई तीसरी वो. पर बंदे की पर्सनैलिटी में दम है. उस के साथ के लिए औफिस की दर्जनों लड़कियां तरसती हैं. मेरी शादी के पहले मुझ पर भी डोरे डाल रहा था. मेरी तो अभी शादी भी नहीं हुई है, सिर्फ सगाई ही हुई है… एक शाम उस के नाम सही.’’

‘‘मतलब तेरा भी चक्कर रहा है सागर के साथ… पगली शादीशुदा हो कर ऐसी बातें करती है. खैर ये सब बातें छोड़ और बता तू आ रही है न पार्टी में?’’

‘‘हंड्रेड परसैंट आ रही हूं?’’

मैं शनिवार रात पार्टी में गई. मैं ने पार्टी के लिए अलग से मेकअप नहीं किया था. बस वही जो नौर्मल करती थी औपिस जाने के लिए. सिंपल नेवी ब्लू कलर के लौंग फ्रौक में जरा देर से पहुंची. देखा कि सागर के आसपास 4-5 लड़कियां पहले से बैठी थीं.

मुझे देख कर वह फौरन मेरे पास आ कर बोला, ‘‘वाऊ प्रीति, यू आर लुकिंग गौर्जियस. कम जौइन अस.’’

पहले सागर ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे वाइस प्रैसिडैंट के पास ले जा कर उन से मिलवाया.

उन्होंने कहा, ‘‘यू आर लुकिंग ग्रेट. सागर तुम्हारी बहुत तारीफ करता है. तुम्हारे रिपोर्ट्स भी ऐक्सीलैंट हैं.’’

मैंने उन्हें थैंक्स कहा. फिर अपनी कुलिग्स की टेबल पर आ गई. सागर भी वहीं आ गया. हाल में हलकी रंगीन रोशनी थी और सौफ्ट म्यूजिक चल रहा था. कुछ स्नैक्स और ड्रिंक्स का दौर चल रहा था.

सागर ने मुझ से भी पूछा, ‘‘तुम क्या लोगी?’’

‘‘मैं… मैं… कोल्डड्रिंक लूंगी.’’

सागर के साथ कुछ अन्य लड़कियां भी हंस पड़ीं.

‘‘ओह, कम औन, कम से कम बीयर तो ले लो. देखो तुम्हारे सभी कुलीग्स कुछ न कुछ ले ही रहे हैं. कह कर उस ने मेरे गिलास में बीयर डाली और फिर मेरे और अन्य लड़कियों के साथ गिलास टकरा कर चीयर्स कहा.

पहले तो मैं ने 1-2 घूंट ही लिए. फिर धीरेधीरे आधा गिलास पी लिया. डांस के लिए फास्ट म्यूजिक शुरू हुआ. सागर मुझ से रिक्वैस्ट कर मेरा हाथ पकड़ कर डांसिंग फ्लोर पर ले गया. पहले तो सिर्फ दोनों यों ही आमने-सामने खड़े शेक कर रहे थे, फिर सागर ने मेरी कमर को एक हाथ से पकड़ कर कहा, ‘‘लैट अस डांस प्रीति,’’ और फिर दूसर हाथ मेरे कंधे पर रख कर मुझ से भी मेरा हाथ पकड़ ऐसा ही करने को कहा.

म्यूजिक तो फास्ट था, फिर भी उस ने मेरी आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘मुझे स्लो स्टैप्स ही अच्छे लगते हैं. ज्यादा देर तक सामीप्य बना रहता है, कुछ मीठी बातें करने का मौका भी मिल जाता है और थकावट भी नहीं होती है.’’ मैं सिर्फ मुसकरा कर रह गई. वह मेरे बहुत करीब था. उस की सांसें मैं महसूस कर रही थी और शायद वह भी मेरी सांसें महसूस कर रहा था. उस ने धीरे से कहा, ‘‘अभी तुम्हारी शादी नहीं हुई है न?’’

‘‘नहीं, शादी अभी नहीं हुई है, पर 6 महीने बाद होनी है. समरेश मेरा बौयफ्रैंड ऐंड वुड बी हब्बी फौरन असाइनमैंट पर अमेरिका में है.’’

‘‘वैरी गुड,’’ कह उस ने मेरे कंधे और गाल पर झूलते बालों को अपने हाथ से पीछे हटा दिया, ‘‘अरे यह सुंदर चेहरा छिपाने की चीज नहीं है.’’

फिर उस ने अपनी उंगली से मेरे गालों को छू कर होंठों को छूना चाहा तो मैं ‘नो’ कह कर उस से अलग हो गई. मुझे अपनी सहेली का कहा याद आ गया था. उसके बाद हम दोनों 2 महीने तक औफिस में नौर्मल अपना काम करते रहे.

एक दिन सागर ने कहा, हमें एक प्रोजैक्ट के लिए हौंगकौंग जाना होगा.’’

‘‘हमें मतलब मुझे भी?’’

‘‘औफकोर्स, तुम्हें भी.’’

‘‘नहीं सागर, किसी और को साथ ले लो इस प्रोजैक्ट में.’’

‘‘तुम यह न समझना कि यह मेरा फैसला है… बौस का और्डर है यह. तुम चाहो तो उन से बात कर सकती हो.’’

मैं ने वाइस प्रैसिडैंट से भी रिक्वैस्ट की पर उन्होंने कहा, ‘‘प्रीति, बाकी सभी अपनेअपने प्रोजैक्ट में व्यस्त हैं. 2 और मेरी नजर में थीं, उन से पूछा भी था, पर दोनों अपनी प्रैगनैंसी के चलते दूर नहीं जाना चाहती हैं… मेरे पास तुम्हारे सिवा और कोई औप्शन नहीं है.’’

मैं सागर के साथ हौंगकौंग गई. वहां 1 सप्ताह का प्रोग्राम था. काफी भागदौड़ भरा सप्ताह रहा. मगर 1 सप्ताह में हमारा काम पूरा न हो सका. अपना स्टे और 3 दिन के लिए बढ़ाना पड़ा. हम दोनों थक कर चूर हो गए थे. बीच में 2 दिन वीकैंड में छुट्टी थी.

हौंगकौंग के क्लाइंट ने कहा, ‘‘इसी होटल में स्पा, मसाज की सुविधा है. मसाज करा लें तो थकावट दूर हो जाएगी और अगर ऐंजौय करना है तो कोव्लून चले जाएं.’’

‘‘मैं तो वहां जा चुका हूं. तुम कहो तो चलते हैं. थोड़ा चेंज हो जाएगा,’’ सागर ने कहा.

हम दोनों हौंगकौंग के उत्तर में कोव्लून द्वीप गए. थोड़े सैरसपाटे के बाद सागर बोला, ‘‘तुम होटल के मसाज पार्लर में जा कर फुल बौडी मसाज ले लो. पूरी थकावट दूर हो जाएगी.’’

मै स्पा गई. स्पा मैनेजर ने पूछा, ‘‘आप ने अपौइंटमैंट में थेरैपिस्ट की चौइस नहीं बताई है. अभी पुरुष और महिला दोनों थेरैपिस्ट हैं मेरे पास. अगर डीप प्रैशर मसाज चाहिए तो मेरे खयाल से पुरुष थेरैपिस्ट बेहतर होगा. वैसे आप की मरजी?’’

मैंने महिला थेरैपिस्ट के लिए कहा और अंदर मसाजरूम में चली गई.

बहुत खुशनुमा माहौल था. पहले तो मुझे ग्रीन टी पीने को मिली. कैंडल लाइट की धीमी रोशनी थी, जिस से लैवेंडर की भीनीभीनी खुशबू आ रही थी. लाइट म्यूजिक बज रहा था. थेरैपिस्ट ने मुझे कपड़े खोलने को कहा. फिर मेरे बदन को एक हरे सौफ्ट लिनेन से कवर कर पैरों से मसाज शुरू की. वह बीचबीच में धीरेधीरे मधुर बातें कर रही थी. फिर थेरैपिस्ट ने पूछा, ‘‘आप को सिर्फ मसाज करानी है या कुछ ऐक्स्ट्रा सर्विस विद ऐक्स्ट्रा कौस्ट… पर इस टेबल पर नो सैक्स?’’

‘‘मुझे आश्चर्य हुआ कि उसे ऐसा कहने की क्या जरूरत थी. मैं ने महसूस किया कि मेरी बगल में भी एक मसाज चैंबर था. दोनों के बीच एक अस्थायी पार्टीशन वाल थी. जैसेजैसे मसाज ऊपर की ओर होती गई मैं बहुत रिलैक्स्ड फील कर रही थी. करीब 90 मिनट तक वह मेरी मसाज करती रही. महिला थेरैपिस्ट होने से मैं भी सहज थी और उसे भी मेरे अंगों को छूने में संकोच नहीं था. उस के हाथों खासकर उंगलियों के स्पर्श में एक जादू था और एक अजीब सा एहसास भी. पर धीरेधीरे उस के नो सैक्स कहने का अर्थ मुझे समझ में आने लगा था. मैं अराउज्ड यानी उत्तेजना फील करने लगी. मुझे लगा. मेरे अंदर कामवासना जाग्रत हो रही है.’’

तभी थेरैपिस्ट ने ‘‘मसाज हो गई,’’ कहा और बीच की अस्थायी पार्टीशन वाल हटा दी. अभी मैं ने पूरी ड्रैस भी नहीं पहनी थी कि देखा दूसरे चैंबर में सागर की भी मसाज पूरी हो चुकी थी. वह भी अभी पूरे कपड़े नहीं पहन पाया था. दूसरी थेरैपिस्ट गर्ल ने मुसकराते हुए कहा ‘‘देखने से आप दोनों का एक ही हाल लगता है, अब आप दोनों चाहें तो ऐंजौय कर सकते हैं.’’

मुझे सुन कर कुछ अजीब लगा, पर बुरा नहीं लगा. हम दोनों पार्लर से निकले. मुझे अभी तक बिना पीए मदहोशी लग रही थी. सागर मेरा हाथ पकड़ कर अपने रूम में ले गया. मैं भी मदहोश सी उस के साथ चल पड़ी. उस ने रूम में घुसते ही लाइट औफ कर दी.

सागर मुझ से सट कर खड़ा था. मेरी कमर में हाथ डाल कर अपनी ओर खींच रहा था और मैं उसे रोकना भी नहीं चाहती थी. वह अपनी उंगली से मेरे होंठों को सहला रहा था. मैं भी उस के सीने से लग गई थी. फिर उस ने मुझे किस किया तो ऐसा लगा सारे बदन में करंट दौड़ गया. उस ने मुझे बैड पर लिटा दिया और कहा, ‘‘जस्ट टू मिनट्स, मैं वाशरूम से अभी आया.’’

सागर ने अपनी पैंट खोल बैड के पास सोफे पर रख दी और टौवेल लपेट वह बाथरूम में गया. मैं ने देखा कि पैंट की बैक पौकेट से उस का पर्स निकल कर गिर पड़ा और खुल गया. मैं ने लाइट औन कर उस का पर्स उठाया. पर्स में एक औरत और एक बच्चे की तसवीर लगी थी.

मैं ने उस फोटो को नजदीक ला कर गौर से देखा. उसे पहचानने में कोई दिक्कत नहीं हुई. मैं ने मन में सोचा यह तो मेरी नीरू दी हैं. कालेज के दिनों में मैं जब फ्रैशर थी सीनियर लड़के और लड़कियां दोनों मुझे रैगिंग कर परेशान कर रहे थे. मैं रोने लगी थी. तभी नीरू दी ने आ कर उन सभी को डांट लगाई थी और उन्हें सस्पैंड करा देने की वार्निंग दी थी. नीरू दी बीएससी फाइनल में थीं. इस के बाद मेरी पढ़ाई में भी उन्होंने मेरी मदद की थी. तभी से उन के प्रति मेरे दिल में श्रद्धा है. आज एक बार फिर नीरू दी स्वयं तो यहां न थीं, पर उन के फोटो ने मुझे गलत रास्ते पर जाने से बचा लिया. मेरी मदहोशी अब फुर्र हो चली थी.

सागर बाथरूम से निकल कर बैड पर आया तो मैं उठ खड़ी हुई. उस ने मुझे बैड पर बैठने को कहा, ‘‘लाइट क्यों औन कर दी? अभी तो कुछ ऐंजौय किया ही नहीं.’’

‘‘ये आप की पत्नी और साथ में आप का बेटा है?’’

‘‘हां, तो क्या हुआ? वह दूसरे शहर में नौकरी कर रही है?’’

‘‘नहीं, वे मेरी नीरू दीदी भी हैं… मैं गलती करने से बच गई,’’ इतना बोल कर मैं उस के कमरे से निकल गई.

जहां एक ओर मुझे कुछ आत्मग्लानि हुई तो वहीं दूसरी ओर साफ बच निकलने का सुकून भी था. वरना तो मैं जिंदगीभर नीरू दी से आंख नहीं मिला पाती. हालांकि सागर ने कभी मेरे साथ कोई जबरदस्ती करने की कोशिश नहीं की.

इस के बाद 3 दिन और हौंगकौंग में हम दोनों साथ रहे… बिलकुल प्रोफैशनल की तरह

अपनेअपने काम से मतलब. चौथे दिन मैं और सागर इंडिया लौट आए. मैं ने नीरू दी का पता लगाया और उन्हें फोन किया. मैं बोली, ‘‘मैं प्रीति बोल रही हूं नीरू दी, आप ने मुझे पहचाना? कालेज में आप ने मुझे रैगिंग…’’

‘‘ओ प्रीति तुम? कहां हो आजकल और कैसी हो? कालेज के बाद तो हमारा संपर्क ही टूट गया था.’’

‘‘मैं यहीं सागर की जूनियर हूं. आप यहीं क्यों नहीं जौब कर रही हैं?’’

‘‘मैं भी इस के लिए कोशिश कर रही हूं. उम्मीद है जल्द ही वहां ट्रांसफर हो जाएगा.’’

‘‘हां दी, जल्दी आ जाइए, मेरा भी मन लग जाएगा,’’ और मैं ने फोन बंद कर दिया. हौंगकौंग के उस कमजोर पल की याद फिर आ गई, जिस से मैं बालबाल बच गई थी और वह भी सिर्फ एक तसवीर के चलते वरना अनजाने में ही पति-पत्नी के बीच मैं ‘वो’ बन गई होती. Hindi Family Story

Best Hindi Kahani: बचपना – सुधा की बेचैनी

Best Hindi Kahani: आज फिर वही चिट्ठी मनीआर्डर के साथ देखी, तो सुधा मन ही मन कसमसा कर रह गई. अपने पिया की चिट्ठी देख उसे जरा भी खुशी नहीं हुई. सुधा ने दुखी मन से फार्म पर दस्तखत कर के डाकिए से रुपए ले लिए और अपनी सास के पास चली आई और बोली ‘‘यह लीजिए अम्मां पैसा.’’ ‘‘मुझे क्या करना है. अंदर रख दे जा कर,’’ कहते हुए सासू मां दरवाजे की चौखट से टिक कर खड़ी हो गईं. देखते ही देखते उन के चेहरे की उदासी गहरी होती चली गई.

सुधा उन के दिल का हाल अच्छी तरह समझ रही थी. वह जानती थी कि उस से कहीं ज्यादा दुख अम्मां को है. उस का तो सिर्फ पति ही उस से दूर है, पर अम्मां का तो बेटा दूर होने के साथसाथ उन की प्यारी बहू का पति भी उस से दूर है. यह पहला मौका है, जब सुधा का पति सालभर से घर नहीं आया. इस से पहले 4 नहीं, तो 6 महीने में एक बार तो वह जरूर चला आता था.

इस बार आखिर क्या बात हो गई, जो उस ने इतने दिनों तक खबर नहीं ली? अम्मां के मन में तरहतरह के खयाल आ रहे थे. कभी वे सोचतीं कि किसी लड़की के चक्कर में तो नहीं फंस गया वह? पर उन्हें भरोसा नहीं होता था. हो न हो, पिछली बार की बहू की हरकत पर वह नाराज हो गया होगा. है भी तो नासमझ. अपने सिवा किसी और का लाड़ उस से देखा ही नहीं जाता.

नालायक यह नहीं समझाता, बहू भी तो उस के ही सहारे इस घर में आई है. उस बेचारी का कौन है यहां? सोचतेसोचते उन्हें वह सीन याद आ गया, जब बहू उन के प्यार पर अपना हक जता कर सूरज को चिढ़ा रही थी और वह मुंह फुलाए बैठा था. अगली बार डाकिए की आवाज सुन कर सुधा कमरे में से ही कहने लगी, ‘‘अम्मां, डाकिया आया है.

पैसे और फार्म ले कर अंदर आ जाइए, दस्तखत कर दूंगी.’’ सुधा की बात सुन कर अम्मां चौंक पड़ीं. पहली बार ऐसा हुआ था कि डाकिए की आवाज सुन कर सुधा दौड़ीदौड़ी दरवाजे तक नहीं गई… तो क्या इतनी दुखी हो गई उन की बहू? अम्मां डाकिए के पास गईं. इस बार उस ने चिट्ठी भी नहीं लिखी थी. पैसा बहू की तरफ बढ़ा कर अम्मां रोंआसी आवाज में कहने लगीं, ‘‘ले बहू, पैसा अंदर रख दे जा कर.’’ अम्मां की आवाज कानों में पड़ते ही सुधा बेचैन निगाहों से उन के हाथों को देखने लगी.

वह अम्मां से चिट्ठी मांगने को हुई कि अम्मां कहने लगीं, ‘‘क्या देख रही है? अब की बार चिट्ठी भी नहीं डाली है उस ने.’’ सुधा मन ही मन तिलमिला कर रह गई. अगले ही पल उस ने मर जाने के लिए हिम्मत जुटा ली, पर पिया से मिलने की एक ख्वाहिश ने आज फिर उस के अरमानों पर पानी फेर दिया. अगले महीने भी सिर्फ मनीआर्डर आया, तो सुधा की रहीसही उम्मीद भी टूट गई.

उसे अब न तो चिट्ठी आने का भरोसा रहा और न ही इंतजार. एक दिन अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई. पहली बार तो सुधा को लगा, जैसे वह सपना देख रही हो, पर जब दोबारा किसी ने दरवाजा खटखटाया, तो वह दरवाजा खोलने चल दी. दरवाजा खुलते ही जो खुशी मिली, उस ने सुधा को दीवाना बना दिया. वह चुपचाप खड़ी हो कर अपने साजन को ऐसे ताकती रह गई, मानो सपना समझ कर हमेशा के लिए उसे अपनी निगाहों में कैद कर लेना चाहती हो.

सूरज घर के अंदर चला आया और सुधा आने वाले दिनों के लिए ढेर सारी खुशियां सहेजने को संभल भी न पाई थी कि अम्मां की चीखों ने उस के दिलोदिमाग में हलचल मचा दी. अम्मां गुस्सा होते हुए अपने बेटे पर चिल्लाए जा रही थीं, ‘‘क्यों आया है? तेरे बिना हम मर नहीं जाते.’’ ‘‘क्या बात है अम्मां?’’ सुधा को अपने पिया की आवाज सुनाई दी.

‘‘पैसा भेज कर एहसान कर रहा था हम पर? क्या हम पैसों के भूखे हैं?’’ अम्मां की आवाज में गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा था. ‘‘क्या बात हो गई?’’ आखिर सूरज गंभीर हो कर पूछ ही बैठा. ‘‘बहू, तेरा पति पूछ रहा है कि बात क्या हो गई. 2 महीने से बराबर खाली पैसा भेजता रहता है, अपनी खैरखबर की छोटी सी एक चिट्ठी भी लिखना इस के लिए सिर का बोझ बन गया और पूछता है कि क्या बात हो गई?’’ सूरज बिगड़ कर कहने लगा, ‘‘नहीं भेजी चिट्ठी तो कौन सी आफत आ गई?

तुम्हारी लाड़ली तो तुम्हारे पास है, फिर मेरी फिक्र करने की क्या जरूरत पड़ी?’’ सुधा अपने पति के ये शब्द सुन कर चौंक गई. शब्द नए नहीं थे, नई थी उन के सहारे उस पर बरस पड़ी नफरत. वह नफरत, जिस के बारे में उस ने सपने में भी नहीं सोचा था. सुधा अच्छी तरह समझ गई कि यह सब उन अठखेलियों का ही नतीजा है, जिन में वह इन्हें अम्मां के प्यार पर अपना ज्यादा हक जता कर चिढ़ाती रही है, अपने पिया को सताती रही है.

इस में कुसूर सिर्फ सुधा का ही नहीं है, अम्मां का भी तो है, जिन्होंने उसे इतना प्यार किया. जब वे जानती थीं अपने बेटे को, तो क्यों किया उस से इतना प्यार? क्यों उसे इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि वह इस घर की बेटी नहीं बहू है? अम्मां सुधा का पक्ष ले रही हैं, यह भी गनीमत ही है, वरना वे भी उस का साथ न दें, तो वह क्या कर लेगी.

इस समय तो अम्मां का साथ देना ही बहुत जरूरी है. अम्मां अभी भी अपने बेटे से लड़े जा रही थीं, ‘‘तेरा दिमाग बहुत ज्यादा खराब हो गया है.’’ अम्मां की बात का जवाब सूरज की जबान पर आया ही था कि सुधा बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘यह सब अच्छा लगता है क्या आप को? अम्मां के मुंह लगे चले जा रहे हैं. बड़े अच्छे लग रहे हैं न?’’ ‘‘चुप, यह सब तेरा ही कियाधरा है. तुझे तो चैन मिल गया होगा, यह सब देख कर.

न जाने कितने कान भर दिए कि अम्मां आते ही मुझ पर बरस पड़ीं,’’ थोड़ी देर रुक कर सूरज ने खुद पर काबू करना चाहा, फिर कहने लगा, ‘‘यह किसी ने पूछा कि मैं ने चिट्ठी क्यों नहीं भेजी? इस की फिक्र किसे है? अम्मां पर तो बस तेरा ही जादू चढ़ा है.’’ ‘‘हां, मेरा जादू चढ़ा तो है, पर मैं क्या करूं? मुझे मार डालो, तब ठीक रहेगा.

मुझ से तुम्हें छुटकारा मिल जाएगा और मुझे तुम्हारे बिना जीने से.’’ अब जा कर अम्मां का माथा ठनका. आज उन के बच्चों की लड़ाई बच्चों का खेल नहीं थी. आज तो उन के बच्चों के बीच नफरत की बुनियाद पड़ती नजर आ रही थी. बहू का इस तरह बीच में बोल पड़ना उन्हें अच्छा नहीं लगा. वे अपनी बहू की सोच पर चौंकी थीं.

वे तो सोच रही थीं कि उन के बेटे की सूरत देख कर बहू सारे गिलेशिकवे भूल गई होगी. अम्मां की आवाज से गुस्सा अचानक काफूर गया. वे सूरज को बच्चे की तरह समझने लगीं, ‘‘इस को पागल कुत्ते ने काटा है, जो तेरी खुशियां छीनेगी? तेरी हर खुशी पर तो तुझ से पहले खुश होने का हक इस का है. फिर क्यों करेगी वह ऐसा, बता? र

ही बात मेरी, तो बता कौन सा ऐसा दिन गुजरा, जब मैं ने तुझे लाड़ नहीं किया?’’ ‘‘आज ही देखो न, यह तो किसी ने पूछा नहीं कि हालचाल कैसा है? इतना कमजोर कैसे हो गया तू? तुम को इस की फिक्र ही कहां है. फिक्र तो इस बात की है कि मैं ने चिट्ठी क्यों नहीं?डाली?’’ सूरज बोला.

अम्मां पर मानो आसमान फट पड़ा. आज उन की सारी ममता अपराधी बन कर उन के सामने खड़ी हो गई. आज यह हुआ क्या? उन की समझ में कुछ न आया. अम्मां चुपचाप सूरज का चेहरा निहारने लगीं, कुछ कह ही न सकीं, पर सुधा चुप न रही.

उस ने दौड़ कर अपने सूरज का हाथ पकड़ लिया और पूछने लगी, ‘‘बोलो न, क्या हुआ? तुम बताते क्यों नहीं हो?’’ ‘‘मैं 2 महीने से बीमार था. लोगों से कह कर जैसेतैसे मनीआर्डर तो करा दिया, पर चिट्ठी नहीं भेज सका. बस, यही एक गुनाह हो गया.’’ सुधा की आंखों से निकले आंसू होंठों तक आ गए और मन में पागलपन का फुतूर भर उठा, ‘‘देखो अम्मां, सुना कैसे रहे हैं? इन से तो अच्छा दुश्मन भी होगा, मैं बच्ची नहीं हूं, अच्छी तरह जानती हूं कि भेजना चाहते, तो एक नहीं 10 चिट्ठियां भेज सकते थे.

‘‘नहीं भेजते तो किसी से बीमारी की खबर ही करा देते, पर क्यों करते ऐसा? तुम कितना ही पीछा छुड़ाओ, मैं तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ने वाली.’’ अम्मां चौंक कर अपनी बहू की बौखलाहट देखती रह गईं, फिर बोलीं, ‘‘क्या पागल हो गई है बहू?’’ ‘‘पागल ही हो जाऊं अम्मां, तब भी तो ठीक है,’’ कहते हुए बिलख कर रो पड़ी सुधा और फिर कहने लगी, ‘‘पागल हो कर तो इन्हें अपने प्यार का एहसास कराना आसान होगा.

किसी तरह से रो कर, गा कर और नाचनाच कर इन्हें अपने जाल में फंसा ही लूंगी. कम से कम मेरा समझदार होना तो आड़े नहीं आएगा,’’ कहतेकहते सुधा का गला भर आया. सूरज आज अपनी बीवी का नया रूप देख रहा था. अब गिलेशिकवे मिटाने की फुरसत किसे थी? सुधा पति के आने की खुशियां मनाने में जुट गई. अम्मां भी अपना सारा दर्द समेट कर फिर अपने बच्चों से प्यार करने के सपने संजोने लगी थीं. Best Hindi Kahani

Hindi Family Story: सच्चा रिश्ता – साहिल ने कैसे दिखाई हिम्मत

Hindi Family Story: साहिल आज काफी मसरूफ था. सुबह से उठ कर वह जयपुर जाने की तैयारी में लगा था. उस की अम्मी उस के काम में हाथ बंटा रही थीं और समझा रही थीं, ‘‘बेटे, दूर का मामला है, अपना खयाल रखना और खाना ठीक समय पर खा लिया करना.’’ साहिल अपनी अम्मी की बातें सुन कर मुसकराता और कहता, ‘‘हां अम्मी, मैं अपना पूरा खयाल रखूंगा और खाना भी ठीक समय पर खा लिया करूंगा. वैसे भी अम्मी अब मैं बड़ा हो गया हूं और मुझे अपना खयाल रखना आता है.’’

साहिल को इंटरव्यू देने जयपुर जाना था. उस के दिल में जयपुर घूमने की चाहत थी, इसलिए वह 10-15 दिन जयपुर में रहना चाहता था. सारा सामान पैक कर के साहिल अपनी अम्मी से विदा ले कर चल पड़ा.

अम्मी ने साहिल को ले कर बहुत सारे ख्वाब देखे थे. जब साहिल 8 साल का था, तब उस के अब्बा बब्बन मियां का इंतकाल हो गया था. साहिल की अम्मी पर तो जैसे बिजली गिर गई थी. उन के दिल में जीने की कोई तमन्ना ही नहीं थी, लेकिन साहिल को देख कर वे ऐसा न कर सकीं. अम्मी ने साहिल की अच्छी परवरिश को ही अपना मकसद बना लिया था. इसी वजह से साहिल को कभी अपने अब्बा की कमी महसूस नहीं हुई थी. तभी तो साहिल ने अपनी अम्मी की इच्छाओं को पूरा करने के लिए एमए कर लिया था और अब वह नौकरी के सिलसिले में इंटरव्यू देने जयपुर जा रहा था.

साहिल को विदा कर के उस की अम्मी घर का दरवाजा बंद कर घर के कामों में मसरूफ हो गईं. उधर साहिल भी अपने शहर के बस स्टैंड पर पहुंच गया. जयपुर जाने वाली बस आई, तो साहिल ने बस में चढ़ कर टिकट लिया और एक सीट पर बैठ गया.

साहिल की आंखों से उस का शहर ओझल हो रहा था, पर उस की आंखों में अम्मी का चेहरा रहरह कर सामने

आ रहा था. अम्मी ने साहिल को काफी मेहनत से पढ़ायालिखाया था, इसलिए साहिल ने भी इंटरव्यू के लिए बहुत अच्छी तैयारी की थी. बस के चलतेचलते रात हो गई थी. ज्यादातर सवारियां सो रही थीं. जो मुसाफिर बचे थे, वे ऊंघ रहे थे.

रात के अंधेरे को रोशनी से चीरती हुई बस आगे बढ़ी जा रही थी. एक जगह जंगल में रास्ता बंद था. सड़क पर पत्थर रखे थे. ड्राइवर ने बस रोक दी. तभी 2-3 बार फायरिंग हुई और बस में कुछ लुटेरे घुस आए. इस अचानक हुए हमले से सभी मुसाफिर घबरा गए और जान बचाते हुए अपना सारा पैसा उन्हें देने लगे.

एक लड़की रोरो कर उन से दया की भीख मांगने लगी. वह बारबार कह रही थी, ‘‘मेरे पास थोड़े से रुपयों के अलावा कुछ नहीं है.’’ मगर उन जालिमों पर उस की मासूम आवाज का कुछ असर नहीं हुआ. उन में से एक लुटेरा, जो दूसरे सभी लुटेरों का सरदार लग रहा था, एक लुटेरे से बोला, ‘‘अरे ओ कृष्ण, बहुत बतिया रही है यह लड़की. अरे, इस के पास देने को कुछ नहीं है, तो उठा ले ससुरी को और ले चलो अड्डे पर.’’

इतना सुनते ही एक लुटेरे ने उस लड़की को उठा लिया और जबरदस्ती उसे अपने साथ ले जाने लगा. वह डरी हुई लड़की ‘बचाओबचाओ’ चिल्ला रही थी, पर किसी मुसाफिर में उसे बचाने की हिम्मत न हुई.

साहिल भी चुप बैठा था, पर उस के दिल के अंदर से आवाज आई, ‘साहिल, तुम्हें इस लड़की को उन लुटेरों से छुड़ाना है.’ यही सोच कर साहिल अपनी सीट से उठा और लुटेरों को ललकारते हुए बोला, ‘‘अरे बदमाशो, लड़की को छोड़ दो, वरना अच्छा नहीं होगा.’’

इतना सुनते ही उन में से 2-3 लुटेरे साहिल पर टूट पड़े. वह भी उन से भिड़ गया और लड़की को जैसे ही छुड़ाने लगा, तो दूसरे लुटेरे ने गोली चला दी. गोली साहिल की बाईं टांग में लगी. साहिल की हिम्मत देख कर दूसरे कई मुसाफिर भी लुटेरों को मारने दौड़े. कई लोगों को एकसाथ आता देख लुटेरे भाग खड़े हुए, पर तब तक साहिल की टांग से काफी खून बह चुका था. लिहाजा, वह बेहोश हो गया.

ड्राइवर ने बस तेजी से चला कर जल्दी से साहिल को एक अस्पताल में पहुंचा दिया. सभी मुसाफिर तो साहिल को भरती करा कर चले गए, पर वह लड़की वहीं रुक गई. डाक्टर ने जल्दी ही साहिल की मरहमपट्टी कर दी.

कुछ देर बाद जब साहिल को होश आया, तो सामने वही लड़की खड़ी थी. साहिल को होश में आता देख कर वह लड़की बहुत खुश हुई.

साहिल ने उसे देख राहत की सांस ली कि लड़की बच गई. पर अचानक इंटरव्यू का ध्यान आते ही उस के मुंह से निकला, ‘‘अब मैं जयपुर नहीं पहुंच सकता. मेरे इंटरव्यू का क्या होगा?’’ लड़की उस की बात सुन कर बोली, ‘‘क्या आप जयपुर में इंटरव्यू देने जा रहे थे? मेरी वजह से आप की ये हालत हो गई. मैं आप से माफी चाहती हूं. मुझे माफ कर दीजिए.’’

‘‘अरे नहीं, यह आप क्या कह रही हैं? आप ने मेरी बात का गलत मतलब निकाल लिया. अगर मैं आप को बचाने न आता, तो पता नहीं मैं अपनेआप को माफ कर भी पाता या नहीं. खैर, छोडि़ए यह सब. अच्छा, यह बताइए कि आप यहां क्यों रुक गईं? मुझे लगता है कि सभी मुसाफिर चले गए हैं.’’ लड़की ने कहा, ‘‘जी हां, सभी मुसाफिर रात को ही चले गए थे. आप के पास भी तो किसी को होना चाहिए था. अपनी जान की परवाह किए बिना आप ने मेरी जान बचाई. ऐसे में मेरा फर्ज बनता था कि मैं आप के पास रुकूं. मैं आप की हमेशा एहसानमंद रहूंगी.’’

‘‘यह तो मेरा फर्ज था, जो मैं ने पूरा किया. अच्छा, यह बताइए कि आप कल जयपुर जा रही थीं या कहीं और…?’’

इतना सुनते ही लड़की की आंखों में आंसू आ गए. वह बोली, ‘‘आप ने मेरी जान बचाई है, इसलिए मैं आप से कुछ नहीं छिपाऊंगी. मेरा नाम आरती?है. मेरे पैदा होने के कुछ साल बाद ही पिताजी चल बसे थे. मां ने ही मुझे पाला है. ‘‘मेरे ताऊजी मां को तंग करते थे. हमारे हिस्से की जमीन पर उन्होंने कब्जा कर लिया. उन्होंने मेरी मां से धोखे में कोरे कागज पर अंगूठा लगवा लिया और हमारी जमीन उन के नाम हो गई.

‘‘एक महीने पहले मां भी मुझे छोड़ कर चल बसीं. मेरे ताऊजी मुझे बहुत तंग करते थे. उन के इस रवैए से तंग आ कर मैं भाग निकली और उसी बस में आ कर बैठ गई, जो बस जयपुर जा रही थी. ‘‘मैं ने 12वीं तक की पढ़ाई की है. सोचा था कि कहीं जा कर नौकरी कर लूंगी,’’ यह कह कर आरती चुप हो गई.

साहिल को आरती की कहानी सुन कर अफसोस हुआ. कुछ देर बाद आरती बोली, ‘‘अब आप को होश आ गया है, 2-4 दिन में आप बिलकुल ठीक हो जाएंगे. अच्छा तो अब मैं चलती हूं.’’

साहिल ने कहा, ‘‘पर कहां जाएंगी आप? अभी तो आप ने बताया कि अब आप का न कोई घर है, न ठिकाना. ऐसे में आप अकेली लड़की. बड़े शहर में नौकरी मिलना इतना आसान नहीं होता. ‘‘वैसे, मेरा नाम साहिल है. मजहब से मैं मुसलमान हूं, पर अगर आप हमारे घर मेरी छोटी बहन बन कर रहें, तो मुझे बहुत खुशी होगी.’’

‘‘लेकिन, आप तो मुसलमान हैं?’’ आरती ने कहा. साहिल ने कहा, ‘‘मुसलमान होने के नाते ही मेरा यह फर्ज बनता है कि मैं किसी बेसहारा लड़की की मदद करूं. मुझे हिंदू बहन बनाने में कोई परहेज नहीं, अगर आप तैयार हों, तो…’’

आरती ने साहिल के पैर पकड़ लिए, ‘‘भैया, आप सचमुच महान हैं.’’ ‘‘अरे आरती, यह सब छोड़ो, अब हम अपने घर चलेंगे. अम्मी तो तुम्हें देख कर बहुत खुश होंगी.’’

एक हफ्ते बाद साहिल ठीक हो गया. डाक्टर ने उसे छुट्टी दे दी. साहिल आरती को ले कर अपने घर पहुंचा. दरवाजा खटखटाते हुए उस ने आवाज लगाई, तो उस की अम्मी ने दरवाजा खोला.

साहिल को देख कर वे चौंकीं, ‘‘अरे साहिल, सब खैरियत तो है न? तू इतनी जल्दी कैसे आ गया? तू तो 15 दिन के लिए जयपुर गया था. क्या बात है?’’ ‘‘अरे अम्मी, अंदर तो आने दो.’’

‘‘हांहां, अंदर आ.’’ साहिल जैसे ही लंगड़ाते हुए अंदर आया, तो उस की अम्मी को और धक्का लगा, ‘‘अरे साहिल, तू लंगड़ा क्यों रहा है? जल्दी बता.’’

साहिल ने कहा, ‘‘सब बताता हूं, अम्मी. पहले मैं तुम्हें एक मेहमान से मिलवाता हूं,’’ कह कर साहिल ने आरती को आवाज दी. आरती दबीसहमी सी अंदर आई.

खूबसूरत लड़की को देख कर साहिल की अम्मी का दिल खुश हो गया, पर अगले ही पल अपने को संभालते हुए वे बोलीं, ‘‘साहिल, ये कौन है? कहीं तू ने… ‘‘अरे नहीं, अम्मी. आप गलत समझ रही हैं.’’

अपनी अम्मी से साहिल ने जयपुर सफर की सारी बातें बता दीं. सबकुछ सुन कर साहिल की अम्मी बोलीं, ‘‘बेटा, तू ने यह अच्छा किया. अरे, नौकरी तो फिर कहीं न कहीं मिल ही जाएगी, पर इतनी खूबसूरत बहन तुझे फिर न मिलती. बेटी आरती, आज से यह घर तुम्हारा ही है.’’

इतना सुनते ही आरती साहिल की अम्मी के पैरों में गिर पड़ी. ‘‘अरे बेटी, यह क्या कर रही हो. तुम्हारी जगह मेरे दिल में बन गई. अब तुम मेरी बेटी हो,’’ इतना कह कर अम्मी ने आरती को गले से लगा लिया.

साहिल एक ओर खड़ा मुसकरा रहा था. अब साहिल के घर में बहन की कमी पूरी हो गई थी. आरती को भी अपना घर मिल गया था. उस की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए थे. Hindi Family Story

Best Family Story: समाधान – मातृत्व को तरसती बेचारी ममता

Best Family Story: भारत में औरतों का बांझ होना सब से बड़ा शाप है और बांझ औरत का पिता होना उस से भी बड़ा शाप है. ममता के पिता राकेश मोहन किसान मंडी में एक आढ़त पर मुनीम हैं. 10,000 रुपए महीना पगार है और हर महीने 4,000-5,000 रुपए यहांवहां से कमा लेते हैं. सरकारी स्कूल, सरकारी अस्पताल और सरकारी राशन के भरोसे किसी तरह बच्चों को पालपोस कर बड़ा किया.

राकेश मोहन ने अपनी पूरी जमापूंजी से किसी तरह से बड़ी बेटी ममता की शादी रेलवे के ड्राइवर से करा दी थी. सरकारी नौकरी वाले दामाद के लालच में इस शादी पर 5 लाख रुपए खर्च हो गए थे. अब कोई बचत नहीं थी, क्योंकि परिवार में दामाद के आने से दिखावे पर खर्च बढ़ गया था.

राकेश मोहन अपनी छोटी बेटी शिखा को बीएड कराने के बाद नौकरी मिलने का इंतजार कर रहे थे. उन्हें पूरी उम्मीद थी कि शिखा की सरकारी नौकरी लग जाएगी और उन्हें उस की शादी पर एक पाई भी नहीं खर्च करनी होगी.

फिलहाल तो उन के माली हालात डांवांडोल थे. शिखा की पढ़ाई और मोबाइल का खर्च भी दीदी और जीजाजी से मिलने वाले उपहार पर निर्भर था.

दामाद बड़ी बेटी का पूरा खयाल रखता था. उस तरफ से कोई चिंता नहीं थी. शिखा की शादी में दामादजी पैसे लगा देंगे, एक उम्मीद इस बात की भी थी.

असली मुसीबत या कहना चाहिए कि मुसीबतों का पहाड़ तब टूटा जब शादी के 2 साल तक ममता मां नहीं बन सकी और इस मुसीबत ने पूरे परिवार को झकझोर दिया.

गनीमत थी कि ममता अपने पति के साथ शहर में रेलवे क्वार्टर में रहती थी. सास के ताने मोबाइल फोन पर उसे बराबर सुनने पड़ते थे. राकेश मोहन का ममता से भी बुरा हाल था. ममता की सास तलाक की धमकी दे कर उन का खून सुखा देती थी.

ममता की सास के ताने शादी में मनचाहा दहेज न मिलने से शुरू हो कर बच्चा न होने पर खत्म होते थे. ममता के पूरे मायके को अभागा, मनहूस कहा जाने लगा था.

ममता की छोटी बहन शिखा को भी इस झगड़े में लपेट लिया गया. ममता की सास शिखा से कहती थी कि जरूर ममता की परवरिश ठीक से नहीं की गई, बचपन की गलत आदतों के चलते वह बांझ हो गई है.

ममता की सास ने कानूनी सलाह भी ले ली थी. ममता की मां को एक दिन कह रही थीं कि कोर्ट में साबित हो जाएगा कि ममता उन के बेटे को शारीरिक सुख और संतान सुख नहीं दे सकती है. इस वजह से उसे आसानी से तलाक मिल जाएगा. उन्हें हर्जाखर्चा नहीं देना होगा.

ममता की मां इन बातों को सुन कर कई दिन तक कुछ भी नहीं खा सकीं. वे यह सोच कर मरी जा रही थीं कि दामादजी ने अगर ममता को छोड़ दिया तो उस का क्या होगा. ममता की दूसरी शादी करने के लिए पैसे तो बचे नहीं हैं और फिर दूसरा आदमी शादी करेगा क्यों?

ममता और उस के पति राजीव को डाक्टर ने बताया कि राजीव के वीर्य में शुक्राणुओं की कमी है और उन्हें डोनर शुक्राणुओं से ‘इन विट्रो फर्टिलाईजेशन’ या ‘इंट्रा यूटेराइन इंसेमिनेशन’ कराना चाहिए, पर दकियानूस राजीव तैयार नहीं हुआ. जब अपना खून या अपना वंश नहीं है तो संतान से क्या फायदा?

राजीव के शुक्राणुओं को बढ़ाने के लिए डाक्टर ने 2 महीने तक हर हफ्ते अमोनिया एन 13 इंजैक्शन लगाया, उस के बाद डाक्टर ने उन्हें वीटा कवर और विटामिन डी की गोली खाने को दी और परहेज में एंटीऔक्सिडैंट फूड लेने के लिए कहा.

पर जब इस उपाय का असर नहीं हुआ तो एक महीना आयुर्वेदिक ट्रीटमैंट चलाया. डाक्टर ने राजीव को अश्वगंधा और जिनसैंग की औषधि दी. पर जब किसी भी डाक्टरी इलाज से काम नहीं बना तो मां के बताए हुए उपाय देशी  नुसखे को अपनाया गया.

ममता ने मुलहठी, देवदारू और सिरस के बीज को बराबर मात्रा में ले कर काली गाय के दूध के साथ पीस लिया और इस मिश्रण को 5 दिन तक सेवन किया और 5 दिनों के बाद पति के साथ मिलन किया. मिलन के समय कूल्हे के नीचे तकिया लगा लिया, ताकि ज्यादा से ज्यादा शुक्राणु गर्भाशय तक पहुंच सकें. कामसूत्र से पढ़ कर कई तरह के आसन आजमाए, पर इन सारे उपाय से भी कोई फर्क नहीं पड़ा.

पति की पगार समय पर आए या न आए, ममता की माहवारी ठीक 28वें दिन आ जाती थी. पतिपत्नी एकदूसरे को बेहद प्यार करते थे और एकदूसरे की कमी बताते नहीं थे. असलियत यह थी कि ममता के पति राजीव की सैक्स में दिलचस्पी नहीं थी.

ममता पति को रिझाने की पूरी कोशिश करती थी. सहेलियों की सीख के मुताबिक ममता ने पति को बहुत मेहनत से कुकुर आसन में सैक्स करना सिखाया. सहेलियों ने बताया था कि इस आसन में वीर्य गर्भाशय के बेहद नजदीक पहुंच जाता है और शुक्राणुओं के अंडाणु से मिलने की उम्मीद बढ़ जाती है. राजीव को इस खेल में मजा तो आता था, पर वह ममता को मां नहीं बना सका.

इस के बाद राजीव के दोस्तों के सुझाव के मुताबिक मिशनरी आसन किया गया. इस में राजीव ने ममता को बिस्तर पर सीधा लिटाने के बाद ऊपर से अपने अंग को प्रवेश कराया. तर्क यह था कि इस से अंग को योनि में गहराई तक प्रवेश करा सकेंगे, पर यह कोशिश भी बेकार गई.

इस के बाद टोटके का सहारा लिया गया. मंगलवार के दिन पतिपत्नी ने कुम्हार के घर जा कर पुत्र प्राप्ति के लिए प्रार्थना की और एक डोरी, जिस से वह मिट्टी के बरतन बनाता है, मांग लाए. घर आने के बाद एक गिलास में पानी भर कर वह डोरी उस में डाल दी. एक हफ्ते तक वह डोरी उस पानी में भिगो कर रखी. अगले मंगलवार को गिलास में से डोरी निकाल कर पतिपत्नी ने वह पानी पी लिया और इस के बाद वह डोरी हनुमान मंदिर जा कर हनुमान जी के चरणों में समर्पित कर दी.

उस रात उन्होंने बहुत देर तक सैक्स किया. ममता पसीने से लथपथ थी और राजीव किसी घोड़े की तरह हांफ रहा था. उस रात उन्हें जिंदगी में पहली बार इतना मजा आया था. ममता बहुत देर उसी तरह बिना कपड़ों के बिस्तर पर पड़ी रही, क्योंकि वह कोई जोखिम लेना नहीं चाहती थी. शुक्राणुओं और अंडाणुओं को मिलने में कोई परेशानी न हो, इस बात का पूरा खयाल रखा गया.

28वें दिन जब ममता को पीरियड नहीं आया तो राजीव दौड़ कर प्रैग्नैंसी टैस्ट किट ले आया. पर यह कोशिश भी नाकाम रही. 29वें दिन खाना बनाते समय ममता को पीरियड हो गया. उसे पैड लगाने का भी समय नहीं मिला और सूती साड़ी पर निशान आ गया.

राजीव की बहन ने एक टोटके को आजमाया. अपने बच्चे का पहला टूटा हुआ दूध का दांत एक काले कपड़े में बांध कर काले धागे की मदद से भाभी की कमर पर बांध दिया. जब तक वे गर्भधारण न कर लें, इस धागे को किसी भी कीमत पर न उतारने की कठोर हिदायत दी गई.

दूध के दांत को कमर पर बांधे हुए भी 3 महीने का समय हो चुका था. सैक्स के लिए चूहा आसन से हाथी आसन तक सैकड़ों आसनों को आजमाया जा चुका था और अभी भी ममता की कोख सूनी थी.

राजीव भी अब ममता को ही बच्चा न होने के लिए कुसूरवार मानने लगा था. ससुराल पक्ष की मौसी, नानी, बूआ, ताई सभी ममता को ताने देने लगे थे. ममता के पास खुदकुशी करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था. मरने की सोचना आसान है, पर मरना आसान नहीं.

कहते हैं कि मुसीबतें इनसान को बहुत ही शातिर और धोखेबाज बना देती हैं. ममता का देवर मैथली 2 साल इलाहाबाद में कोचिंग के बाद राजीव और ममता के साथ रहने आया था. शहर में उस के सरकारी नौकरियों के एग्जाम थे. इस हफ्ते दारोगा अगले महीने रेलवे, उस के बाद पीसीएस, फिर पीजीटी.

ममता को मैथली के आने से बहुत राहत हो गई. राजीव और उस की मां को अब ममता पर चिल्लाने का मौका नहीं मिलता था.

देवर और भाभी की खूब बनती थी. ऐसा लगता था जैसे दोनों जन्मजन्मांतर के दोस्त थे. मैथली के हर काम का समय तय था. 4 बजे जागना, योगासन, कसरत, बादाम का दूध, 4 किलोमीटर की दौड़ फिर दोपहर घंटों तक सोना और रात 12 बजे तक पढ़ाई. भाभी पीछे असिस्टैंट की तरह खड़ी रहती और देवर की हर फरमाइश को मुंह से निकलने से पहले पूरा कर देती.

भैया के घर आने के बाद उन की मोटरसाइकिल से दोनों खरीदारी के बहाने निकल जाते थे. ममता को शादी के 2 साल बाद पता चल रहा था कि वह किस गली और किस महल्ले में रह रही थी, शहर में कौनकौन सी घूमने की जगह थी. शहर में आइसक्रीम की दुकान कहां है और शहर में कितने पार्क हैं.

प्रेम को पनपने के लिए इतनी जगह बहुत है. दोपहर को मैथली के उठने का समय हो गया था. ममता उस के लिए चाय बना लाई, लेकिन उठाया नहीं बल्कि उस के हाथपैरों को सहलाने लगी उस के बालों में उंगलियां फिराने लगी.

मैथली ने एक झटके में ममता को खींच कर सीने से सटा लिया और फिर वे एकदूसरे में खो गए. अगले दिन भाभी और देवर नजर नहीं मिला पा रहे थे, पर उन के बरताव से साफ समझ आ रहा था कि दोनों बहुत खुश थे.

मैथली ने रसोईघर में जा कर भाभी की कमर में पीछे से हाथ डाला और कूल्हों को सहलाया तो ममता ने गुस्से में उस के पीठ पर हलके से चिमटे से मार दिया. उसे लिमिट में रहने की हिदायत दी और जब मैथली बुरा मान गया तो तुरंत ही ममता ने कान पकड़ कर माफी मांग ली.

ममता का खुराफाती दिमाग पूरी कुशलता से काम कर रहा था. उस रात ममता ने राजीव को बताया कि इन दिनों वह शिवलिंगी बीज एक भाग तथा पुत्रजीवक बीज 2 भाग को मिश्री के साथ खा रही है. ननद का दिया टोटका बंधा ही है तो आज अच्छी उम्मीद है. फिर रात में देर तक उस ने राजीव के साथ भी संबंध बनाया.

यह कई दिनों तक चलता रहा. दोपहर में मैथली और रात में राजीव के साथ प्यार. माहवारी आने के 5 दिन पहले उस ने दोनों से दूरी बना ली. इस बार उन की कोशिश रंग लाई. शाम को ममता ने राजीव की पसंदीदा कौफी और पकोड़े बनाए और उसे यह खुशखबरी सुनाते हुए उस की गोद में बैठ गई, तो राजीव ने उसे ढेर सारा प्यार किया.

ममता के सारे दुख दूर हो चुके थे. वह परिवार की लाड़ली बहू बन चुकी थी. ममता की सास को अब कोई शिकायत नहीं थी. ममता की हर फरमाइश को सब से पहले पूरा किया जाने लगा.

मैथली, जो अपने एग्जाम दे कर वापस इलाहाबाद चला गया था, ममता ने प्रैग्नैंसी के आखिरी दिनों में वापस बुला लिया. अब दिनभर बेरोकटोक मैथली अपनी प्यारी भाभी के साथ रह सकता था और एग्जाम की तैयारी भी कर सकता था.

ठीक ममता के डिलीवरी के दिन मैथली का पीसीएस का रिजल्ट आ गया. मैथली को सरकारी नौकरी मिल गई. ममता के बच्चे की आंखें ममता से मिलती थीं. कान, नाक, ठुड्डी ससुराल के किसी न किसी सदस्य से मिलते थे.

मैथली के लिए एक से एक अमीर घरों के रिश्ते आ रहे थे, बहुत सारा दहेज भी मिल रहा था, लेकिन मैथली ने लड़की देखने से साफ मना कर दिया. ममता ने मैथली को अपनी बहन शिखा से शादी के लिए मना लिया.

मैथली को भी इसी शहर में नौकरी मिल गई है. दोनों परिवार एकसाथ बहुत प्यार से रहते हैं. ममता दोबारा मां बनने वाली है और इस महीने शिखा की माहवारी भी नहीं हुई है. Best Family Story

Hindi Story: मन – खून के रिश्तों से जुड़ी एक कहानी

Hindi Story: मेरे हाथों में मेहंदी लगी देख सुदेश ने सवाल उछाल दिया, ‘‘यह मेहंदी किस खुशी में लगाई है? कोई शादीब्याह, तीजत्योहार या व्रतउपवास है क्या?’’

जवाब में मैं ने भी प्रश्न ही उछाल दिया, ‘‘आप को मालूम है…मधु की शादी तय हो गई है?’’

‘‘कौन मधु?’’

‘‘आप भी न कमाल करते हैं. अरे, हमारे पड़ोसी विपिनजी की बेटी, जिसे आप बचपन से देखते आ रहे हैं. सुंदर, सुशील, प्रतिभाशाली और काम में निपुण…’’ मेरी बात अधूरी ही रह गई जब सुदेश ने बात काटते हुए प्रश्न किया, ‘‘वही मधु न जिसे विपुल ने रिजेक्ट कर दिया था?’’

‘‘रिजेक्ट नहीं किया था,’’ मैं तमतमा उठी. मानो मेरा अपना अपमान हुआ हो. ‘‘उसे सौम्या पसंद थी. उस से प्यार करता था वह. खैर, वे सब पुरानी बातें हो गईं. मुझे तो खुशी है मधु को भी अच्छा घरवर मिल गया. शादी अच्छे से संपन्न हो जाए.’’

‘‘हुंह…बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना. तुम्हें हमेशा दूसरों के सुखचैन की पड़ी रहती है,’’ कहते हुए उन्होंने फाइलों में मुंह छिपा लिया. मैं सोच में डूब गई. शायद बेटा विपुल और ये ठीक ही कहते हैं. न जाने क्यों मुझ से किसी का बुरा सोचा ही नहीं जाता. चाहे वह आत्मीय हो या अजनबी, हमेशा हर एक के लिए दुआ ही निकलती है.

सुदेश तो कई बार समझाने भी लग जाते हैं कि तुम्हें थोड़ा व्यावहारिक होना चाहिए. सांसारिक दृष्टिकोण रखना कोई बुरी बात नहीं है. पर मैं चाह कर भी अपनेआप को बदल नहीं पाती.

विपुल हंसते हुए कहता है, ‘पापा, हमारी मम्मी इस ग्रह की नहीं हैं, किसी दूसरे ग्रह की प्राणी लगती हैं.’ मैं भी उन के मजाक में शामिल हो जाती. पर मुझे हमेशा यही लगता कोई इनसान इतना आत्मकेंद्रित कैसे हो सकता है? आखिर इनसानियत भी तो कोई चीज है.  मधु के साथ अनजाने में मुझ से जो अपराध हुआ था, वह मुझे हमेशा सालता रहता था. दरअसल सुंदर, गुणी मधु से मैं हमेशा से प्रभावित थी और उसे अपनी बहू बनाने का सपना भी देखती थी. जाने- अनजाने अपना यह सपना मैं मधु और उस के घर वालों पर भी प्रकट कर चुकी थी और वे भी इस रिश्ते से मन ही मन बेहद खुश थे. सुदर्शन, इंजीनियर दामाद उन्हें घर बैठे जो मिल रहा था.

विपुल दूसरे शहर में नौकरी करने लगा था. इस बार जब वह छुट्टी ले कर आया तो मैं ने अपना मंतव्य उस पर प्रकट कर दिया. हालांकि पहले भी मैं उसे मधु को ले कर छेड़ती रहती थी, लेकिन इस बार जब उस ने मुझे गंभीर और शादी की तिथि निश्चित करने के लिए जोर डालते देखा तो वह भी गंभीर हो उठा.‘मम्मी, मैं अपनी सहकर्मी सौम्या से प्यार करता हूं और उसी से शादी करूंगा.’

मुझे झटका सा लगा था, ‘पर बेटे…’

‘प्लीज मम्मी, शादी मेरा निहायत व्यक्तिगत मामला है. मैं इस में आप की पसंद को अपनी पसंद नहीं मान सकता. मुझे उस के साथ पूरी जिंदगी गुजारनी है.’

‘मधु हर तरह से तुम्हारे लिए उपयुक्त है, बेटा. निहायत शरीफ…’ मैं ने अपना पक्ष रखना चाहा.  ‘आई एम सौरी, जिस लड़की से मैं प्यार नहीं करता उस से शादी नहीं कर सकता,’ विपुल इतना कह चला गया. मैं बिलकुल टूट सी गई थी. लेकिन सुदेश ने भी मुझे ही दोषी ठहराया था, ‘गलती तुम्हारी है इंदु. तुम्हें मधु या उस के घर वालों से कोई भी वादा करने से पहले विपुल से पूछ लेना चाहिए था.’

मैं ने अपनी गलती मान ली थी. मधु और उस के घर वालों के सम्मुख वस्तुस्थिति स्पष्ट करते हुए मैं ने क्षमा भी मांग ली थी. मधु ने तो मेरी मजबूरी समझ ली थी. हालांकि उस के चेहरे से लग रहा था कि उसे गहरा धक्का लगा है पर उस के घरवाले काफी उत्तेजित हो गए थे. खूब खरीखोटी सुनाई उन्होंने मुझे. मैं ने गरदन झुका कर सबकुछ सुन लिया था. आखिर गलती मेरी थी. ऊपर से संबंध भले ही फिर से सामान्य हो गए थे पर कहीं कोई गांठ पड़ गई थी. पहले वाली बेतकल्लुफी और अपनापन कहीं खो सा गया था.

विपुल की शादी में वे शामिल नहीं हुए. पूरा परिवार ही शहर से बाहर चला गया था. इरादतन या संयोगवश, मैं आज तक नहीं जान पाई. स्वभाववश मैं ने हमेशा की तरह यही कामना की थी कि मधु को भी जल्दी ही अच्छा घरवर मिल जाए. और एक दिन मधु की मां खुशीखुशी शादी का कार्ड पकड़ा गई थीं. मैं ने उन्हें गले से लगा लिया था.

‘‘सच कहूं बहन, आप से भी ज्यादा आज मैं खुश हूं,’’ और इसी खुशी में मैं ने अपने हाथों में मेहंदी रचा ली थी. ‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना’ जैसा पति का व्यंग्य भी मेरी खुशी को कम नहीं कर सका था. बहुत उत्साह से मैं ने शादी की सभी रस्मों में भाग लिया और फिर भारी मन से बेटी की तरह मधु को विदा किया.

मधु की शादी के बाद विपुल और सौम्या घर आए तो मैं मधु की विदाई का गम भूल उन के सत्कार में लग गई. सौम्या भी बहुत अच्छी लड़की थी. मुझे उस पर भी बेटी सा स्नेह उमड़ आता था. बापबेटे हमेशा की तरह मुझ पर हंसते थे. ‘मम्मी को सब में अच्छाइयां ही नजर आती हैं. परायों से भी रिश्ता जोड़ लेती हैं. फिर तुम तो उन की इकलौती बहू हो. तुम पर तो जितना प्यार उमड़े कम है.’  सच, उन के साथ पूरा सप्ताह कैसे गुजर गया, पता ही नहीं चला. उन के जाने के बाद एक दिन बाजार में मुझे मधु मिल गई. उसे देखते ही मेरा चेहरा एकदम खिल उठा, लेकिन गौर से उसे देखा तो जी धक से रह गया. सूनी मांग, सूनी कलाइयां, सूना माथा और भावनाशून्य चेहरा… मुझे चक्कर सा आने लगा. पास के खंभे को पकड़ अपने को संभाला.

‘‘कब आईं तुम? और यह क्या है?’’ वह फफक उठी. देर तक फूटफूट कर रोती रही, ‘‘सब खत्म हो गया आंटी, एक दुर्घटना में वे चल बसे. ससुराल वालों ने अशुभ कह कर दुर्व्यवहार आरंभ कर दिया. मैं यहां आ गई. दोचार दिन तो सब ने हाथोंहाथ लिया. पर अब भाभीभैया अवहेलना करने लगे हैं. आखिर हूं तो मैं बोझ ही. मां सबकुछ देखतीसमझती हैं पर कर कुछ नहीं पातीं. जीवन बोझ लगने लगा है. मरने का मन करता है.’’

‘‘पागल हो गई हो? ऐसा कभी सोचना भी मत. चलो, मेरे साथ घर चलो,’’ उस का मुंह धुला कर मैं ने उसे चाय पिलाई. जब उस का मूड कुछ ठीक हो गया तो मैं ने बात आगे बढ़ाई.

‘‘तुम तो काफी पढ़ीलिखी हो. पति की जगह नौकरी पर क्यों नहीं लग जातीं?’’

‘‘सोचा था. पता चला, उस जगह देवर लगने का प्रयास कर रहे हैं.’’

‘‘लेकिन पहला हक तुम्हारा है. यदि तुम आत्मसम्मान की जिंदगी जीना चाहती हो तो तुम्हें अपने हक के लिए लड़ना होगा.’’

‘‘लेकिन मुझे तो कुछ भी नहीं मालूम…कैसे क्या करना है?’’

‘‘हूं… एक आइडिया है. विपुल उसी शहर में है. मैं उस से कहती हूं, वह तुम्हारी मदद करेगा.’’

विपुल पहले तो एकदम बिदक गया, ‘‘क्या मां, आप हर किसी के फटे में टांग डालती रहती हो.’’ पर जवाब में मेरी ओर से कोई आवाज सुनाई नहीं दी तो तुरंत मेरी मनोस्थिति ताड़ गया, ‘‘ठीक है मम्मी, मैं प्रयास करता हूं.’’  विपुल के प्रयास रंग लाए और मधु को नौकरी मिल गई. वह बेहद खुश थी. उस की मुसकान देख कर मुझे लगा कि मेरी गलती का आंशिक पश्चात्ताप हो गया है. उस के जाने के बाद एक दिन उस की मां मिल गईं. उन्होंने  यह कहते हुए मेरा बड़ा एहसान माना कि मैं ने मधु को नई जिंदगी दी है.

‘‘मैं तो चाहती हूं उस का फिर से घर भी बस जाए. अभी उस की उम्र ही क्या है?’’ मेरी जबान फलीभूत हुई. मधु की मां ने ही एक दिन बताया कि मधु ने अपने एक सहकर्मी से आर्यसमाज में शादी कर ली है. उस के भाईभाभी ऊपर से तो रोष जता रहे हैं, लेकिन मन ही मन खुश हैं कि चलो, बला टली.

‘‘यह दुनिया ऐसी ही है बहन. आप के बेटेबहू कोई अपवाद नहीं हैं.’’

‘‘लेकिन आप तो अपवाद हैं. अपनों की तो हर कोई सोचता है लेकिन आप तो परायों के लिए भी…’’

‘‘अपनापराया कुछ नहीं होता. रिश्ते तो मन के होते हैं. जिस से मन जुड़ जाए वही अपना लगने लगता है. मधु को मैं ने हमेशा अपनी बेटी की तरह चाहा है. उस के लिए कुछ करने से मुझे कभी रोकना मत.’’

वैसे प्यार तो मुझे सौम्या से भी बहुत हो गया था. सच कहूं, मुझे हर वक्त उस की चिंता लगी रहती थी. पतली, नाजुक, छुईमुई सी लड़की कैसे आफिस और घर दोनों जिम्मेदारियां संभालती होगी? विपुल से जब भी बात होती मैं उसे सौम्या की मदद करने की सीख देना नहीं भूलती.  और जब से मुझे पता चला कि वह गर्भवती है तो एक ओर तो मैं हर्ष से फूली नहीं समाई, लेकिन दूसरी ओर उस की चिंता मुझे दिनरात सताने लगी. मैं ने डरतेडरते सुदेश से अपने मन की बात कही, ‘‘मैं चली जाती हूं दोनों के पास उन्हें संभालने. सौम्या बेचारी, कैसे मैनेज कर रही होगी?’’

‘‘इंदु, तुम्हारा इतना संवेदनशील और लचीला होना मुझे बहुत अखरता है. अभी उसे मात्र 2 महीने हुए हैं. उसे 9 महीने इसी अवस्था में गुजारने हैं. तुम कब तक उन की देखभाल करोगी? वे बच्चे नहीं हैं. अपनेआप को और अपने घर को संभाल सकते हैं. उन्हें तुम्हारे हस्तक्षेप, जिसे तुम सहयोग कहती हो, की जरूरत नहीं है. जरूरत होगी, तब वे अपनेआप तुम्हें बुला लेंगे और तभी तुम्हारा जाना सार्थक और सम्मानजनक होगा.’’

मैं कहना चाहती थी, भला अपनों के काम आने में क्या सम्मान और सार्थकता देखना, पर जानती थी ऐसा कहना एक बार फिर मेरी व्यावहारिक नासमझी को ही दर्शाएगा. इसलिए चुप्पी लगा गई. पर गुपचुप छिटपुट तैयारियां करना मैं ने आरंभ कर दिया था. बहू के लिए खूब सारे सूखे मेवे खरीद लाई थी. कोई जाएगा तो साथ भिजवा दूंगी. फोन पर हिदायतों का दौर तो जारी था ही.  इसी बीच खबर लगी कि मधु भी गर्भवती है. मैं ने मधु की मां से मिल कर उन्हें बधाई दी. पता चला कि वे मधु के पास ही जा रही थीं.  मैं तुरंत घर लौटी. मेवे का पैकेट खोल कर उस के 2 पैकेट बनाए और तुरंत मधु की मां को ला कर थमा दिए, ‘‘यह एक पैकेट विपुल आ कर ले जाएगा और दूसरा मधु के लिए है.’’  डबडबाई आंखों से उन्होंने दोनों पैकेट थाम लिए. समय के साथसाथ सौम्या की तबीयत संभलने लगी थी. मैं विपुल से फोन पर हमेशा यही कहती, ‘‘जरा सी भी दिक्कत हो तो मुझे निसंकोच फोन कर देना. मैं तुरंत पहुंच जाऊंगी.’’

‘‘बिलकुल मां, यह भी भला कोई कहने की बात है?’’

सौम्या की डिलीवरी का समय पास आ गया था. उस ने अब आफिस से छुट्टियां ले ली थीं. आपस में सलाह- मशविरा कर उन्होंने हमें सूचित किया कि डिलीवरी के समय मैं सौम्या के पास रहूं इसलिए सुदेश के खाने का प्रबंध कर मैं उन के पास रहने चली गई. तय हुआ कि डिलीवरी के बाद कुछ वक्त गुजार कर मैं लौट आऊंगी और तब सौम्या की मां आ कर सब संभाल लेंगी.

सौम्या का समय पूरा हो चुका था पर उसे अभी तक लेबरपेन आरंभ नहीं हुआ था. डाक्टर की सलाह पर हम ने उसे अस्पताल में भरती करवा दिया. अभी हम पूरी तरह व्यवस्थित भी नहीं हो पाए थे कि पास लाई गई दूसरी प्रसूता को देख मैं चौंक उठी. यह तो मधु थी. वह दर्द से कराह रही थी. उसे आसपास का जरा भी होश न था. उस की मां उसे संभालने का असफल प्रयास कर रही थीं. मैं ने उन्हें धीरज बंधाया. जल्दी ही मधु को लेबर रूम में ले जाया गया और कुछ समय बाद ही उस ने एक बेटे को जन्म दे दिया. भावातिरेक में उस की मां मेरे गले लग गईं. अब बस सौम्या की चिंता थी. डाक्टर ने चेकअप किया. सामान्य प्रसव के कोई आसार न देख आपरेशन से बच्चा पैदा करने का निर्णय लिया गया. मैं बारबार सौम्या के सुरक्षित प्रसव की कामना कर रही थी. मधु और उस की मां ने मेरी बेचैनी देखी तो मुझे धीरज बंधाया.

‘‘सब अच्छा ही होगा. आप जैसे भले लोगों के साथ कुदरत हमेशा भला ही करेगी.’’

जब तक सौम्या आपरेशन थिएटर में बंद रही और विपुल बाहर चक्कर काटता रहा उस दौरान मधु की मां ने बातों से मेरा दिल बहलाए रखा. साथ ही मधु और अपने नवासे को भी संभालती रहीं. लेडीडाक्टर ने जब जच्चाबच्चा दोनों के सुरक्षित होने की सूचना दी तब ही मुझे चैन पड़ा. घर में पोती आई थी. मैं बहुत खुश थी, लेकिन यह जान कर मेरी चिंता बढ़ गई कि नवजात बच्ची बहुत कमजोर है. सौम्या की हालत भी ज्यादा अच्छी नहीं थी. फिर उसे दूध भी नहीं उतर रहा था. अस्पताल में नर्सरी आदि की सुविधा नहीं थी. डाक्टर के अनुसार बच्ची को यदि कुछ समय तक किसी नवप्रसूता का दूध मिल जाए तो उस की स्थिति संभल सकती थी.

‘‘आप को एतराज न हो तो मैं इसे दूध पिला देती हूं,’’ मधु ने स्वयं को प्रस्तुत किया तो हम एकबारगी तो चौंक गए.

‘‘नेकी और पूछपूछ,’’ कहते हुए उस की मां ने बच्ची को तुरंत मधु की गोद में डाल दिया. मधु ने उसे प्यार से आंचल में ढांप लिया और दूध पिलाने लगी. मैं उस के इस ममतामयी रूप पर निछावर हो गई.

2 दिन हो गए थे. सुदेश भी आ गए थे. मधु जितनी बार अपने बेटे को दूध पिलाती, याद से गुडि़या को भी पिला देती. तीसरे दिन डाक्टर ने चेकअप किया. मधु की अस्पताल से छुट्टी हो चुकी थी. गुडि़या की तबीयत संभल गई थी, लेकिन सौम्या को अभी कुछ दिन और अस्पताल में रहना था. उस के घाव अभी भरे नहीं थे. बड़ी असमंजस की स्थिति थी. गुडि़या को मां से दूर भी नहीं किया जा सकता था और अभी कुछ दिन उसे और ऊपर के दूध के साथ मां के दूध की जरूरत थी. हम सोच ही रहे थे कि क्या किया जाए कि मधु बोल पड़ी, ‘‘हमारा घर पास में ही है. मैं इसे दूध पिलाने आती रहूंगी. साथ ही ऊपर का दूध भी बना कर लाती रहूंगी.’’

‘‘हां हां, आप चिंता मत कीजिए. हम सब संभाल लेंगे,’’ मधु की मां भी तुरंत बोल पड़ीं.

3-4 दिन तक मांबेटी का यही क्रम चलता रहा. मधु न केवल गुडि़या को दूध पिला जाती बल्कि ताजा गुनगुना दूध बना कर भी ले आती. कभी सौम्या के लिए खिचड़ी, दलिया आ जाता.  मधु की मां जो दवा मधु के लिए बनातीं उस की एक खुराक आ कर सौम्या को भी खिला जातीं. विपुल और उस के पापा ये सब देख कर अचंभित रह जाते. अपनी अब तक की सोच पर शर्मिंदगी के भाव उन के चेहरे पर स्पष्ट परिलक्षित होते थे. मैं मधु को बारबार कहती, ‘‘तुम्हें इतना श्रम अभी नहीं करना चाहिए. तुम्हें आराम की जरूरत है.’’

‘‘मुझे ये सब करने से इतना आराम मिल रहा है कि मैं आप को बता नहीं सकती,’’ वह मुसकरा कर कहती. एक नर्स ने तो मुझ से पूछ भी लिया था, ‘‘क्या रिश्ता है आप का इस लड़की से?’’

‘‘इनसानियत का रिश्ता, जिस के तार मन से जुड़े होते हैं,’’ यह कहते हुए मेरे चेहरे पर असीम तृप्ति के भाव थे. Hindi Story

News Story: हाथ न मिलाने की सियासत – 19 साल की छात्रा के साथ गैंगरेप

News Story: ओडिशा के पुरी जिले में 19 साल की एक कालेज छात्रा के साथ गैंगरेप किया गया. छात्रा अपने बौयफ्रैंड के साथ कैसुरीना के जंगली इलाके में घूमने गई थी. वहां कुछ लड़कों ने उस के बौयफ्रैंड को बंधक बनाया और उस के सामने ही लड़की का गैंगरेप किया. पुलिस ने घटना में 3 लोगों को गिरफ्तार किया. पुलिस ने बताया कि शुरुआत में सदमे के चलते छात्रा अपराध की रिपोर्ट करने में हिचकिचा रही थी.

‘‘अरे मम्मी, आज मैं मैच खेलने जाऊंगा. बड़े दिनों से मेरे दोस्त बुला रहे हैं. आज संडे है तो सोच रहा हूं कि दोस्तों को भी थोड़ा टाइम दे देता हूं,’’ नाश्ते की टेबल पर बैठे विजय ने चिल्ला कर रसोईघर में आलू के परांठे बना रही अपनी मम्मी से कहा.

विजय के इस तरह चिल्लाने की एक वजह यह भी थी कि उस के पापा ने बाइक का पौल्यूशन चैक कराने को कहा था, पर अभी तक हुआ नहीं था. अगर पापा को याद आ जाता तो वे उसे टोक देते, पर शायद पापा के दिमाग से यह बात निकल गई थी.

हालांकि, मम्मी आलू के परांठे बना रही थीं, फिर भी किसी भी तरह के लालच को छोड़ते हुए विजय ने चाय के साथ एक परांठा ही खाया. हां, 4-5 परांठे पैक जरूर करा लिए कि मैच खत्म होने के बाद भूख लगेगी, तो कुछ तो होगा पेट में जाने के लिए.

मैदान ज्यादा दूर नहीं था तो विजय पैदल ही निकल गया. चूंकि मैच टैनिस गेंद से खेला जाने वाला था, तो विजय ने सिर्फ अपना ट्रैक सूट पहना हुआ था. उस के हाथ में था वही बैट जो कभी अनामिका ने उसे गिफ्ट में दिया था.

विजय ने अनामिका को फोन लगाया और बोला, ‘‘सुनो बेबी, मैं यहीं के पास के मैदान पर क्रिकेट खेलने जा रहा हूं. दोपहर के 1 बजे तक फ्री हो जाऊंगा. तुम वहीं आ जाना, फिर मैं तुम्हें अपने घर ले चलूंगा. मम्मी बोल रही थीं कि बड़े दिन से अनामिका नहीं दिखी.’’

‘ठीक है. मैं आ जाऊंगी. मुझे भी अंकलआंटी से मिलना है,’ उधर से अनामिका की आवाज आई.

विजय जब मैदान पर पहुंचा, तो उस के दोस्त आ चुके थे. दूसरी टीम वाले भी जानपहचान के ही थे. विजय की टीम ने टौस जीत कर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला लिया… मैच शुरू हो गया.

विजय की टीम अच्छा खेल रही थी कि इसी बीच विरोधी टीम के एक गेंदबाज ने अंपायर द्वारा आउट न दिए जाने पर गुस्से में बल्लेबाज को गाली दे दी.

इस बात से खेल का माहौल बिगड़ गया और क्रिकेट का मैच लड़ाई के घमासान में बदल गया. वह तो अच्छा था कि ज्यादातर लड़के एकदूसरे को जानते थे, तो थोड़ी सी ?ाड़प के बाद मामला शांत करा दिया गया.

लेकिन इस के बाद दोनों टीमें ऐसे खेलने लगीं, जैसे भारत और पाकिस्तान खेलते हैं. शब्दों के बाण चलने लगे.

विजय ने अपने बल्लेबाज से चीख कर कहा, ‘‘भाई, यह गेंदबाज शाहिद अफरीदी की तरह बड़ा उछल रहा है. इसे इतना बुरी तरह पेल कि खेल और सियासत दोनों भूल जाए. सोशल मीडिया पर भारत के खिलाफ बड़ा गंदा बोलता है. इसे शाहिद अफरीदी समझ कर छक्केचौके की बरसात कर दे.’’

दूसरी टीम वाले कहां कम थे. एक फील्डर बोला, ‘‘देखो, अब पाकिस्तानी खुद को हिंदुस्तानी समझ रहे हैं. हर बार तो हम से हारते हैं और अब हमें ही पाकिस्तानी कह रहे हैं. हमारा जसप्रीत बुमराह अभी तुम्हारे बाबर आजम का बैंड बजाता है.’’

इन्हीं चुटीली बातों के बीच मैच चलता रहा और विजय की टीम हार गई. अब तो विजय का मूड एकदम खराब. संडे खराब हुआ सो अलग, बाइक का पौल्यूशन भी नहीं कराया. पापा को याद गया तो झाड़ पड़ेगी.

गुस्साए विजय ने आलू के परांठे भी नहीं खाए और अनामिका के आने पर भी मुंह फुला कर बैठा रहा.

‘‘अरे यार, एक मैच ही तो हारे हो. इस में इतना बिगड़ने वाली कौन सी बात है,’’ अनामिका बोली.

‘‘बात मैच हारने की नहीं है, बल्कि सामने वाली टीम ने हमें पाकिस्तानी कह कर चिढ़ाया और कहा कि अगले संडे को भी हमारा यही हाल करेंगे. बोल रहे थे कि हम ने ‘आपरेशन सिंदूर’ का बदला क्रिकेट के मैदान पर भी ले लिया,’’ विजय ने कहा.

‘‘इस में ‘आपरेशन सिंदूर’ कहां से बीच में आ गया. वैसे, एक बात तो है कि जब पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों में खटास आई थी, तो भारत को एशिया कप में पाकिस्तान के साथ मैच नहीं खेलना चाहिए था,’’ अनामिका बोली.

‘‘पहले घर चलें, फिर तुम्हारे इस टौपिक पर बात करेंगे. तुम ने यह मुद्दा छेड़ कर मेरा मूड और भी खराब कर दिया है,’’ विजय ने कहा.

‘‘मैं क्या तुम से डरती हूं. घर पर ही बात करते हैं अब,’’ अनामिका बोली और तेज कदमों से आगे बढ़ गई. उसे विजय का घर वहां से मालूम था.

घर पर अनामिका सब से मिली और विजय के पापा से बोली, ‘‘अंकल, आप को क्या लगता है, भारत को एशिया कप में भारत के साथ खेलना चाहिए था या नहीं?’’

‘‘पापा क्या बताएंगे. मैं कह रहा हूं कि भारत ने सही किया और पाकिस्तान को उस की औकात दिखा दी,’’ विजय बीच में बोला.

अनामिका ने एशिया कप में भारत और पाकिस्तान के मैच खेलने और इन दोनों देशों के बीच चल रहे तनाव को ले कर विजय को आईना दिखाते हुए कहा, ‘‘तुम भूल रहे हो कि पहलगाम आतंकी हमले और ‘आपरेशन सिंदूर’ के बाद दुबई में हो रहे एशिया कप 2025 क्रिकेट टूर्नामैंट में भारत और पाकिस्तान के बीच मुकाबले को ले कर जम कर सियासत हुई थी. साथ ही, देश में कई जगह धरने और प्रदर्शन भी हुए थे.

‘‘तुम कितना जल्दी भूल गए कि इस हाई वोल्टेज मुकाबले के विरोध में विपक्षी दलों ने 14 सितंबर को पूरे देश में विरोध प्रदर्शन किया था और आम लोगों से आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले देश के साथ इस मुकाबले का बहिष्कार करने की अपील की थी. शिव सेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और जम्मू में विरोध प्रदर्शन किए थे, जबकि आम आदमी पार्टी के सदस्यों ने दिल्ली में प्रदर्शन किया था.

‘‘भाजपा और केंद्र पर निशाना साधते हुए शिव सेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नेता संजय राउत ने सत्तारूढ़ पार्टी के राष्ट्रवाद और देशप्रेम का मखौल उड़ाते हुए कहा था कि भाजपा का हिंदुत्व एक तमाशा है. इस मैच को ले कर देश की सामान्य जनता में रोष है, इसलिए प्रधानमंत्री ने इस मैच से जनता का ध्यान भटकाने के लिए मणिपुर जाने का फैसला किया.

‘‘इस पार्टी के कार्यकर्ताओं ने प्रवक्ता आनंद दुबे की अगुआई में विरोध प्रदर्शन किया, टीवी तोड़े और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड और केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी की. मुंबई में महिला कार्यकर्ताओं ने हाथ में सिंदूर ले कर प्रदर्शन किया.’’

‘‘विपक्ष का तो काम ही जनता को भड़काना है,’’ विजय बोला.

यह सुन कर अनामिका ने कहा, ‘‘बात विपक्ष की नहीं है, बल्कि जनता के सामने हकीकत रखने की है.

‘‘कांग्रेस नेता उदित राज ने भी तीखा हमला बोलते हुए कहा था कि मैच की अनुमति देने के पीछे व्यावसायिक हित हैं. उधर, बैंगलुरु में शिव सेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तान का झंडा फूंका.

‘‘इतना ही नहीं, एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने पाकिस्तान के साथ क्रिकेट मैच खेलने के फैसले पर सवाल उठाया और भाजपा से पूछा कि क्या मैच से कमाया गया पैसा पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए 26 नागरिकों की जान से ज्यादा कीमती है?

‘‘यहां बात सिर्फ विपक्ष की नहीं है, बल्कि भारतीय फिल्म और टैलीविजन निर्देशक संघ के अध्यक्ष अशोक पंडित ने भी मैच का विरोध करते हुए इसे देश के लिए काला दिन बताया और कहा कि क्रिकेटरों को शर्म आनी चाहिए, पैसा ही सबकुछ नहीं है.’’

‘‘पर हमें इस के दूसरे पहलू पर भी गौर करना चाहिए…’’ विजय ने कहा, ‘‘इस मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल ने कहा कि दुनियाभर में खेल का अपना एक अनुशासन होता है और कोरम होता है. ये मैच पाकिस्तान में नहीं, बल्कि दुबई में हो रहे हैं.

‘‘पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में ‘आपरेशन सिंदूर’ चलाया गया, जो बड़ा काम था. इस की चारों ओर तारीफ हुई है. आज भी हम ने दुश्मनों को चेतावनी दी हुई है कि नापाक हरकत करने पर कड़ा जवाब दिया जाएगा.

‘‘पाकिस्तान से दुश्मनी स्थायी बनाए रखनी है, ऐसा नहीं है. हां, हमारी कुछ शर्तें हैं. पाकिस्तान को आतंकवाद को खत्म करना होगा और गुलाम जम्मूकश्मीर को वापस भारत को देना होगा. पाकिस्तान ये शर्तें माने तो अच्छे संबंध बनाने में कोई अड़चन नहीं है.

‘‘इतना ही नहीं, शिव सेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) पर पलटवार करते हुए महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा था कि कुछ लोग देश के प्रति नकली देशभक्ति और अवसरवादी प्रेम का दिखावा करते हैं. सशस्त्र बल और प्रधानमंत्री मोदी सिंदूर की देखभाल के लिए हैं.’’

अनामिका बोली, ‘‘पर तुम पहलगाम हमले के पीडि़तों का दर्द भूल रहे हो. पीडि़तों के परिवार के सदस्यों ने मैच के लिए सरकार की आलोचना की. हमले में अपने पिता और भाई को खोने वाले सावन परमार ने इस मैच पर अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए कहा कि ‘आपरेशन सिंदूर’ अब बेकार लगता है. पाकिस्तान से किसी भी तरह का संबंध नहीं रहना चाहिए. अगर आप मैच खेलना चाहते हैं, तो मेरे 16 साल के भाई को वापस ले आइए.

‘‘उन की मां किरण यतीश परमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल किया कि अगर ‘आपरेशन सिंदूर’ अभी पूरा नहीं हुआ है, तो यह मैच क्यों कराया जा रहा है? पीडि़त परिवारों के जख्म अभी भरे नहीं हैं.

‘‘हमले के पीडि़त संतोष जगदाले की बेटी असावरी जगदाले ने कहा कि यह बहुत शर्मनाक है. पहलगाम की घटना को अभी 6 महीने भी नहीं हुए हैं. उस के बाद ‘आपरेशन सिंदूर’ हुआ था. मुझे बुरा लगता है कि इतना कुछ होने के बावजूद बीसीसीआई को मैच के आयोजन में कोई शर्म नहीं है.

‘‘उन्होंने क्रिकेटरों पर भी सवाल उठाए और कहा कि उन्हें इस आतंकी हमले में जान गंवाने वालों की कोई परवाह नहीं है.

‘‘कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने तंज कसते हुए कहा कि जब खून और पानी एकसाथ नहीं बह सकते, तो एशिया कप में भारतपाकिस्तान के साथ क्रिकेट मैच कैसे खेल सकता है?

‘‘है कोई जवाब इस का तुम्हारे पास?’’ अनामिका ने तिलमिलाते हुए कहा, ‘‘मोदी सरकार ने मजाक बना कर रख दिया है देशभक्ति को.’’

यह सुन कर विजय का भी पारा हाई हो गया और वह बोला, ‘‘पर भारत ने पाकिस्तान को हरा कर करारा जवाब तो दिया न… हमारे कप्तान सूर्यकुमार यादव की अगुआई में टीम इंडिया ने पाकिस्तान को नानी याद दिला दी. छक्का मार कर 7 विकेट से मैच जिता दिया.

‘‘तुम शायद भूल गई हो कि भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान सूर्यकुमार यादव जब दुबई इंटरनैशनल क्रिकेट स्टेडियम में वे टौस के लिए मैदान पर आए तब उन्होंने पाकिस्तान के कप्तान सलमान आगा को उस की औकात याद दिला दी और पारंपरिक तरीके से हाथ मिलाने से इनकार कर दिया.

‘‘मैच खत्म होने के बाद भारतीय टीम के किसी भी खिलाड़ी ने पाकिस्तानी टीम के साथ हाथ नहीं मिलाया था. पोस्ट मैच प्रैजेंटेशन सैरेमनी में कप्तान सूर्यकुमार यादव ने जीत भारतीय सेना को समर्पित कर दिया.

‘‘मैच के बाद हुई मैच कौन्फ्रैंस में सूर्यकुमार यादव ने साफ किया कि हम सरकार और बीसीसीआई के साथ पूरी तरह से एकजुट थे. हम यहां सिर्फ मैच खेलने आए थे और हम ने सही जवाब दिया.

‘‘कुछ चीजें खेल भावना से भी ऊपर होती हैं. हम पहलगाम आतंकी हमले के सभी पीडि़तों और उन के परिवारों के साथ खड़े हैं और अपनी एकजुटता जाहिर करते हैं.’’

‘‘यह सही है. मैच खेल लो, पर हाथ मत मिलाओ. जब मैच हो ही गया था, तो हाथ मिला लेने में क्या घिस जाता?’’ अनामिका ने सवाल किया.

‘‘यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है. पाकिस्तानी बेकार में हल्ला मचा रहे थे कि यूएई के साथ अगला मैच नहीं खेलेंगे, टूर्नामैंट बीच में छोड़ देंगे, पर ऐसा करते तो वे ही नुकसान में रहते. अकेले इस एशिया कप से पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड को तकरीबन 140 करोड़ रुपए की कमाई होने वाली थी. ऐसे में अगर पाकिस्तान टूर्नामैंट से हटता है तो उस के लिए यह बड़ा ?ाटका साबित हो सकता है.

‘‘वैसे भी इंटरनैशनल क्रिकेट काउंसिल का ऐसा कोई नियम नहीं है कि मैच पूरा होने के बाद दोनों टीमों के खिलाडि़यों का हाथ मिलाना जरूरी है. यह सिर्फ एक परंपरा है और खेल भावना की निशानी है,’’ विजय ने समझाया.

‘‘जो भी हो, पर पहलगाम पीडि़तों के नजरिए यह मैच खेलने की नौटंकी नहीं होनी चाहिए थी. अगर पाकिस्तान हमारा दुश्मन देश है और अभी दोनों देशों के बीच हालात सही नहीं हैं, तो केंद्र सरकार को कड़े कदम उठाने चाहिए थे. दुबई में इस मैच के दौरान स्टेडियम का हाउसफुल न होना इस बात का सुबूत है कि आम जनता भी अभी पाकिस्तान के साथ क्रिकेट मैच होने को ले कर खफा दिख रही थी.

‘‘भले ही 14 सितंबर का मैच भारत ने आसानी से जीत लिया था, पर कूटनीति में भारत सरकार नाकाम दिखी,’’ अनामिका ने इतना कहा और ड्राइंगरूम से उठ कर किचन में चली गई. विजय हैरान सा उसे देखता रह गया. News Story

Hindi Funny Story: कुत्ता कह लें, पर आवारा नहीं

Hindi Funny Story, लेखक – मुकेश विग

कुत्तों के मुखिया ने सभी कुत्तों को शाम को एक आपात बैठक में मैदान में पहुंचने को कहा. शाम के समय बड़ी तादाद में बहुत सारे कुत्ते पूंछ हिलाते हुए मैदान में पहुंचने लगे.

कुछ देर बाद एक कुत्ता कहने लगा, ‘‘दोस्तो, क्या आप जानते हैं कि हमें सड़कों से हटाने की तैयारियां चल रही हैं? हमारा कुसूर क्या है? क्या हम इस देश के नागरिक नहीं हैं? आदमी में और हम में सिर्फ पूंछ का ही तो फर्क है. वे बोलते हैं, तो हम भौंकते हैं.

‘‘हमें आवारा भी कहा जा रहा है, जिस से दिल को बड़ी चोट पहुंचती है. पर हम तो गलियों के राजा हैं, आवारा नहीं. हमें देख कर तो बड़ेबड़े चोर भी भाग जाते हैं.’’

दूसरा कुत्ता बोला, ‘‘इस ‘आवारा’ शब्द को सुन कर खुदकुशी करने का मन करता है, लेकिन हमें तो सुसाइड करना भी नहीं आता. हमारे ही कुछ साथी बड़ेबड़े घरों में शान से रहते हैं, खाते हैं, बिस्तर पर सोते हैं, महंगी गाडि़यों में घूमते हैं. क्या वे भी आवारा हैं?

‘‘2-4 कुत्तों की वजह से हमारी पूरी कौम को बदनाम करना सही नहीं. हम कोई नशा नहीं करते, सिर्फ हड्डी का चसका है.

‘‘पुलिस में भी कई हमारे साथी ट्रेनिंग ले कर चोरों और अपराधियों को पकड़वा रहे हैं. हमारे एहसानों को भी भुला दिया गया है. कोई अगर छेड़खानी करे तो उसे जरूर हम काट लेते हैं, फिर बिना वजह किसी को भी क्यों काटेंगे?

‘‘कई फिल्मों में भी हमारे साथियों ने अच्छा काम किया है. धर्मराज युधिष्ठर ने भी एक कुत्ते को ही इतनी इज्जत और प्यार दिया था, फिर यह अचानक हमें बेदखल व बेघर क्यों किया जा रहा है? हमें मिलवार भौंकते हुए इस के खिलाफ हर हाल में आवाज उठानी होगी.

‘‘अपने हक के लिए लड़ना होगा, लेकिन यह सब शांत तरीके से करना होगा, तभी हम सब इस संकट से निकल सकते हैं.’’

सभी कुत्ते पूंछ हिला कर उस कुत्ते का समर्थन कर रहे थे.

एक कुत्ता बोला, ‘‘भैरवजी भी कुत्ते के साथ ही चलते हैं. जापान में हमारे एक साथी कुत्ते की मूर्ति प्लेटफार्म पर लगाई गई है. हमारे 2 साथी अंतरिक्ष में भी जा चुके हैं फिर हम आवारा कैसे हो गए?’’ इतना कहतेकहते वह कुत्ता भावुक हो गया, तो 2 कुत्ते उस का मुंह चाटने लगे.

एक कुत्ता बोला, ‘‘सुना है कि हमें हटाने वाले कानून में कुछ सुधार किया गया है. हमें फर्स्ट एड दे कर वापस हमारे ठिकाने पर छोड़ दिया जाएगा.

‘‘लेकिन दोस्तो, टीका तो लगवाना पड़ेगा. डरें मत. पर जिन का चालचलन सही नहीं, जो खतरनाक लगते हैं, वे अब हमारे साथ नहीं रह पाएंगे. थोड़ी जुदाई तो सहन करनी पड़ेगी.’’

तभी एक शरारती कुत्ते ने यह गीत बजा दिया, ‘तेरी गलियों में न रखेंगे कदम आज के बाद…’ तो सभी कुत्ते हंसने लगे.

तभी अचानक एक कुत्ता हांफता हुआ वहां पहुंचा, जिस ने एक अखबार पकड़ा हुआ था.

प्रधान कुत्ता उसे देख कर बोला, ‘‘यह सब क्या है? तुम क्या खबर लाए हो?’’

वह कुत्ता बोला, ‘‘सरदार, हमारे लिए एक बड़ी खुशखबरी है. अभी हमारा मामला अमल में आने में कुछ समय लेगा, क्योंकि कई लोग, नेता और हीरो भी हमारे समर्थन में आ रहे हैं. वे इस फैसले को गलत बता रहे हैं. यही खुशखबरी देने मैं यहां दौड़ादौड़ा आ रहा हूं.’’

सभी कुत्ते अखबार देखने लगे. कुछ कुत्ते तो अखबार के पहले पन्ने पर छपी कुत्ते का फोटो देख कर ही मुसकरा रहे थे कि चलो मुफ्त में फोटो तो छप गया.

कुत्तों का सरदार बोला, ‘‘हमारा समर्थन करने वालों का हम धन्यवाद करते हैं. आज लग रहा है कि हम अकेले नहीं हैं.

‘‘कुछ लोग हमें सड़कों और गलियों से भगाना चाहते हैं, तो कुछ लोग हमारे पक्ष में खड़े हैं. समझ नहीं आ रहा हम इन का धन्यवाद कैसे करें, जो मुश्किल घड़ी में हमारा पूरा साथ दे रहे हैं.

‘‘इन कुत्तों के सामने मत नाचना… फिल्म ‘शोले’ के इस डायलौग पर भी हमें गहरा दुख हुआ था, जबकि हमारी वफादारी की तो मिसाल भी दी जाती है. हम नाली का पानी पी लेते हैं, कूड़े से खाना ढूंढ़ कर खा लेते हैं, लेकिन कभी भी शिकवा नहीं करते.

‘‘आज हमारा मामला सुर्खियों में है. जो शैल्टर होम में जाना चाहते हैं, उन्हें वहां आप भेज दें, लेकिन जो सड़कों पर ही खुश हैं, उन्हें वहीं पर रहने दें. उन पर कोई जोरजबरदस्ती न करें.

‘‘अब सभी दोस्त खड़े हो कर अपनीअपनी पूंछ उठा कर जोर से भौंक कर हमारा समर्थन करने वालों का धन्यवाद करेंगे और इस के बाद अपनीअपनी गली और सड़क पर लौट जाएंगे.’’ Hindi Funny Story

Best Hindi Kahani: सही सजा

Best Hindi Kahani: पुरेनवा गांव में एक पुराना मठ था. जब उस मठ के महंत की मौत हुई, तो एक बहुत बड़ी उलझन खड़ी हो गई. महंत ने ऐसा कोई वारिस नहीं चुना था, जो उन के मरने के बाद मठ की गद्दी संभालता.

मठ के पास खूब जायदाद थी. कहते हैं कि यह जायदाद मठ को पूजापाठ के लिए तब के रजवाड़े द्वारा मिली थी.

मठ के मैनेजर श्रद्धानंद की नजर बहुत दिनों से मठ की जायदाद पर लगी हुई थी, पर महंत की सूझबूझ के चलते उन की दाल नहीं गल रही थी.

महंत की मौत से श्रद्धानंद का चेहरा खिल उठा. वे महंत की गद्दी संभालने के लिए ऐसे आदमी की तलाश में जुट गए, जो उन का कहा माने. नया महंत जितना बेअक्ल होता, भविष्य में उन्हें उतना ही फायदा मिलने वाला था.

उन दिनों महंत के एक दूर के रिश्तेदारी का एक लड़का रामाया गिरि मठ की गायभैंस चराया करता था. वह पढ़ालिखा था, लेकिन घनघोर गरीबी ने उसे मजदूर बना दिया था.

मठ की गद्दी संभालने के लिए श्रद्धानंद को रामाया गिरि सब से सही आदमी लगा. उसे आसानी से उंगलियों पर नचाया जा सकता था. यह सोच कर श्रद्धानंद शतरंज की बिसात बिछाने लगे.

मैनेजर श्रद्धानंद ने गांव के लोगों की मीटिंग बुलाई और नए महंत के लिए रामाया गिरि का नाम सुझाया. वह महंत का रिश्तेदार था, इसलिए गांव वाले आसानी से मान गए.

रामाया गिरि के महंत बनने से श्रद्धानंद के मन की मुराद पूरी हो गई. उन्होंने धीरेधीरे मठ की बाहरी जमीन बेचनी शुरू कर दी. कुछ जमीन उन्होंने तिकड़म लगा कर अपने बेटेबेटियों के नाम करा ली. पहले मठ के खर्च का हिसाब बही पर लिखा जाता था, अब वे मुंहजबानी निबटाने लगे. इस तरह थोड़े दिनों में उन्होंने अपने नाम काफी जायदाद बना ली.

रामाया गिरि सबकुछ जानते हुए भी अनजान बना रहा. वह शुरू में श्रद्धानंद के एहसान तले दबा रहा, पर यह हालत ज्यादा दिन तक नहीं रही.

जब रामाया गिरि को उम्दा भोजन और तन को आराम मिला, तो उस के दिमाग पर छाई धुंध हटने लगी.
उस के गाल निकल आए, पेट पर चरबी चढ़ने लगी. वह केसरिया रंग के सिल्क के कपड़े पहनने लगा. जब वह माथे और दोनों बाजुओं पर भारीभरकम त्रिपुंड चंदन लगा कर कहीं बाहर निकलता, तो बिलकुल शंकराचार्य सा दिखता.

गरीबगुरबे लोग रामाया गिरि के पैर छू कर आदर जताने लगे. इज्जत और पैसा पा कर उसे अपनी हैसियत समझ में आने लगी.

रामाया गिरि ने श्रद्धानंद को आदर के साथ बहुत सम?ाया, लेकिन उलटे वे उसी को धौंस दिखाने लगे. श्रद्धानंद मठ के मैनेजर थे. उन्हें मठ की बहुत सारी गुप्त बातों की जानकारी थी. उन बातों का खुलासा कर देने की धमकी दे कर वे रामाया गिरि को चुप रहने पर मजबूर कर देते थे. इस से रामाया गिरि परेशान रहने लगा.

एक दिन श्रद्धानंद मठ के बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे. चाय खत्म हुई कि वे कुरसी से लुढ़क गए. किसी ने पुलिस को खबर कर दी. पुलिस श्रद्धानंद की लाश को पोस्टमार्टम के लिए ले जाना चाहती थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भेद खुलने का डर था, इसलिए रामाया गिरि थानेदार को मठ के अंदर ले गया और लेदे कर मामले को रफादफा करा दिया.

श्रद्धानंद को रास्ते से हटा कर रामाया गिरि बहुत खुश हुआ. यह उस की जिंदगी की पहली जीत थी. उस में हौसला आ चुका था. अब उसे किसी सहारे की जरूरत नहीं थी.

रामाया गिरि नौजवान था. उस के दिल में भी आम नौजवानों की तरह तमाम तरह की हसरतें भरी पड़ी थीं. खूबसूरत औरतें उसे पसंद थीं. सो, वह पूजापाठ का दिखावा करते हुए औरत पाने का सपना संजोने लगा.

उन दिनों मठ की रसोई बनाने के लिए रामप्यारी नईनई आई थी. उस की एक जवान बेटी कमली भी थी. इस के बावजूद उस की खूबसूरती देखते ही बनती थी. गालों को चूमती जुल्फें, कंटीली आंखें और गदराया बदन.

एक रात रामप्यारी को घर लौटने में देर हो गई. मठ के दूसरे नौकर छुट्टी पर थे, इसलिए कई दिनों से बरतन भी उसे ही साफ करने पड़ रहे थे.

रामाया गिरि खाना खा कर अपने कमरे में सोने चला गया था, लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी. चारों ओर खामोशी थी. आंगन में बरतन मांजने की आवाज के साथ चूडि़यों की खनक साफसाफ सुनाई दे रही थी.

रामाया गिरि की आंखों में रामप्यारी की मस्त जवानी तैरने लगी. शायद उसे पाने का इस से अच्छा मौका नहीं मिलने वाला था. उस ने आवाज दी, ‘‘रामप्यारी, जरा इधर आना.’’

रामाया गिरि की आवाज सुन कर रामप्यारी सिहर उठी. वह अनसुनी करते हुए फिर से बरतन मांजने लगी.

रामाया गिरि खीज उठा. उस ने बहाना बनाते हुए फिर उसे पुकारा, ‘‘रामप्यारी, जरा जल्दी आना. दर्द से सिर फटा जा रहा है.’’

अब की बार रामप्यारी अनसुनी नहीं कर पाई. वह हाथ धो कर सकुचाती हुई रामाया गिरि के कमरे में पहुंच गई.

रामाया गिरि बिछावन पर लेटा हुआ था. उस ने रामप्यारी को देख कर अपने सूखे होंठों पर जीभ फिराई, फिर टेबिल पर रखी बाम की शीशी की ओर इशारा करते हुए बोला, ‘‘जरा, मेरे माथे पर बाम लगा दो…’’

मजबूरन रामप्यारी बाम ले कर रामाया गिरि के माथे पर मलने लगी. कोमल हाथों की छुअन से रामाया गिरि का पूरा बदन झनझना गया. उस ने सुख से अपनी आंखें बंद कर लीं.

रामाया गिरि को इस तरह पड़ा देख कर रामप्यारी का डर कुछ कम हो चला था. रामाया गिरि उसी का हमउम्र था, सो रामप्यारी को मजाक सूझने लगा.

वह हंसती हुई बोली, ‘‘जब तुम्हें औरत के हाथों ही बाम लगवानी थी, तो कंठीमाला के झमेले में क्यों फंस गए? डंका बजा कर अपना ब्याह रचाते. अपनी घरवाली लाते, फिर उस से जी भर कर बाम लगवाते रहते…’’

वह उठ बैठा और हंसते हुए कहने लगा, ‘‘रामप्यारी, तू मुझ से मजाक करने लगी? वैसे, सुना है कि तुम्हारे पति को सिक्किम गए 10 साल से ऊपर हो गए. वह आज तक नहीं लौटा. मुझे नहीं समझ आ रहा कि उस के बिना तुम अपनी जवान बेटी की शादी कैसे करोगी?’’

रामाया गिरि की बातों ने रामप्यारी के जख्म हरे कर दिए. उस की आंखें भर उठीं. वह आंचल से आंसू पोंछने लगी.

रामाया गिरि हमदर्दी जताते हुए बोला, ‘‘रामप्यारी, रोने से कुछ नहीं होगा. मेरे पास एक रास्ता है. अगर तुम मान गई, तो हम दोनों की परेशानी हल हो सकती है.’’

‘‘सो कैसे?’’ रामप्यारी पूछ बैठी.

‘‘अगर तुम चाहो, तो मैं तेरे लिए पक्का मकान बनवा दूंगा. तेरी बेटी की शादी मेरे पैसों से होगी. तुझे इतना पैसा दूंगा कि तू राज करेगी…’’

रामप्यारी उतावली हो कर बोली, ‘‘उस के बदले में मुझे क्या करना होगा?’’

रामाया गिरि उस की बांह को थामते हुए बोला, ‘‘रामप्यारी, सचमुच तुम बहुत भोली हो. अरी, तुम्हारे पास अनमोल जवानी है. वह मुझे दे दो. मैं किसी को खबर नहीं लगने दूंगा.’’

रामाया गिरि का इरादा जान कर रामप्यारी का चेहरा फीका पड़ गया. वह उस से अपना हाथ छुड़ाते हुए बोली, ‘‘मुझ से भारी भूल हो गई. मैं समझती थी कि तुम गरीबी में पले हो, इसलिए गरीबों का दुखदर्द समझते होगे. लेकिन तुम तो जिस्म के सौदागर निकले…’’

इन बातों का रामाया गिरि पर कोई असर नहीं पड़ा. वासना से उस का बदन ऐंठ रहा था. इस समय उसे उपदेश के बदले देह की जरूरत थी.

रामप्यारी कमरे से बाहर निकलने वाली थी कि रामाया गिरि ने झपट कर उस का आंचल पकड़ लिया.
रामप्यारी धक से रह गई. वह गुस्से से पलटी और रामाया गिरि के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया. रात के सन्नाटे में तमाचे की आवाज गूंज उठी. रामाया गिरि हक्काबक्का हो कर अपना गाल सहलाने लगा.

रामप्यारी बिफरती हुई बोली, ‘‘रामाया, ऐसी गलती फिर कभी किसी गरीब औरत के साथ नहीं करना. वैसे मैं पहले से मठमंदिरों के अंदरूनी किस्से जानती हूं. बेचारी कुसुमी तुम्हारे गुरु महाराज की सेवा करते हुए अचानक गायब हो गई. उस का आज तक पता नहीं चल पाया.

‘‘मैं थूकती हूं तुम्हारी महंती और तुम्हारे पैसों पर. मैं गरीब हूं तो क्या हुआ, मुझे इज्जत के साथ सिर उठा कर जीना आता है.’’

इस घटना को कई महीने बीत गए, लेकिन रामाया गिरि रामप्यारी के चांटे को भूल नहीं पाया.

एक रात उस ने अपने खास आदमी खड्ग सिंह के हाथों रामप्यारी की बेटी कमली को उठवा लिया.
कमली नीबू की तरह निचुड़ी हुई लस्तपस्त हालत में सुबह घर पहुंची. कमली से सारा हाल जान कर रामप्यारी ने माथा पीट लिया.

समय के साथ रामाया गिरि की मनमानी बढ़ती गई. उस ने अपने विरोधियों को दबाने के लिए कचहरी में दर्जनों मुकदमे दायर कर दिए. मठ के घंटेघडि़याल बजने बंद हो गए. अब मठ पर थानाकचहरी के लोग जुटने लगे.

रामाया गिरि ने अपनी हिफाजत के लिए बंदूक खरीद ली. उस की दबंगई के चलते इलाके के लोगों से उस का रिश्ता टूटता चला गया.

रामाया गिरि कमली वाली घटना भूल सा गया. लेकिन रामप्यारी और कमली के लिए अपनी इज्जत बहुत माने रखती थी.

एक दिन रामप्यारी और कमली धान की कटाई कर रही थीं, तभी रामप्यारी ने सड़क से रामाया गिरि को मोटरसाइकिल से आते देखा.

बदला चुकाने की आग में जल रही दोनों मांबेटी ने एकदूसरे को इशारा किया. फिर दोनों मांबेटी हाथ में हंसिया लिए रामाया गिरि को पकड़ने के लिए दौड़ पड़ीं.

रामाया गिरि सारा माजरा समझ गया. उस ने मोटरसाइकिल को और तेज चला कर निकल जाना चाहा, पर हड़बड़ी में मोटरसाइकिल उलट गई.

रामाया गिरि चारों खाने चित गिरा. रामप्यारी के लिए मौका अच्छा था. वह फुरती से रामाया गिरि के सीने पर चढ़ गई. इधर कमली ने उस के पैरों को मजबूती से जकड़ लिया.

रामप्यारी रामाया गिरि के गले पर हंसिया रखती हुई चिल्ला कर बोली, ‘‘बोल रामाया, तू ने मेरी बेटी की इज्जत क्यों लूटी?’’

इतने में वहां भारी भीड़ जमा हो गई. रामाया गिरि लोगों की हमदर्दी खो चुका था, सो किसी ने उसे बचाने की कोशिश नहीं की.

रामाया गिरि का चेहरा पीला पड़ चुका था. जान जाने के खौफ से वह हकलाता हुआ बोला, ‘‘रामप्यारी… ओ रामप्यारी, मेरा गला मत रेतना. मुझे माफ कर दो.’’

‘‘नहीं, मैं तुम्हारा गला नहीं रेतूंगी. गला रेत दिया तो तुम झटके से आजाद हो जाओगे. मैं सिर्फ तुम्हारी गंदी आंखों को निकालूंगी. दूसरों की जिंदगी में अंधेरा फैलाने वालों के लिए यही सही सजा है.’’

रामप्यारी बिलकुल चंडी बन चुकी थी. रामाया गिरि के लाख छटपटाने के बाद भी उस ने नहीं छोड़ा. हंसिया के वार से रामाया गिरि की आंखों से खून का फव्वारा उछल पड़ा. Best Hindi Kahani

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