सबको साथ चाहिए- भाग 1: क्या सही था माधुरी का फैसला

सुधीर के औफिस के एक सहकर्मी   रवि के विवाह की 25वीं वर्षगांठ थी. उस ने एक होटल में भव्य पार्टी का आयोजन किया था तथा बड़े आग्रह से सभी को सपरिवार आमंत्रित किया था. सुधीर भी अपनी पत्नी माधुरी और बच्चों के साथ ठीक समय पर पार्टी में पहुंच गए. सुधीर और माधुरी ने मेजबान दंपती को बधाई और उपहार दिया. रविजी ने अपनी पत्नी विमला से माधुरी का और उन के चारों बच्चों का परिचय करवाया, ‘‘विमला, इन से मिलो. ये हैं सुधीरजी, इन की पत्नी माधुरी और चारों बच्चे सुकेश, मधुर, प्रिया और स्नेहा.’’  ‘‘नमस्ते,’’ कह कर विमला आश्चर्य से चारों को देखने लगी. आजकल तो हम दो हमारे दो का जमाना है. भला, आज के दौर में 4-4 बच्चे कौन करता है? माधुरी विमला के चेहरे से उन के मन के भावों को समझ गई पर क्या कहती.

तभी प्रिया ने सुकेश की बांह पकड़ी और मचल कर बोली, ‘‘भैया, मुझे पानीपूरी खानी है. भूख लगी है. चलो न.’’

‘‘नहीं भैया, कुछ और खाते हैं, यह चटोरी तो हमेशा पहले पानीपूरी खिलाने ही ले जाती है. वहां दहीबड़े का स्टौल है. पहले उधर चलो,’’ स्नेहा और मधुर ने जिद की.

‘‘भई, पहले तो वहीं चला जाएगा जहां हमारी गुडि़या रानी कह रही है. उस के बाद ही किसी दूसरे स्टौल पर चलेंगे,’’ कह कर सुकेश प्रिया का हाथ थाम कर पानीपूरी के स्टौल की तरफ बढ़ गया. मधुर और स्नेहा भी पीछेपीछे बढ़ गए.

‘‘यह अच्छा है, छोटी होने के कारण हमेशा इसी के हिसाब से चलते हैं भैया,’’ मधुर ने कहा तो स्नेहा मुसकरा दी. चाहे ऊपर से कुछ भी कह लें पर अंदर से सभी प्रिया को बेहद प्यार करते थे और सुकेश की बहुत इज्जत करते थे. क्यों न हो वह चारों में सब से बड़ा जो था. चारों जहां भी जाते एकसाथ जाते. मजाल है कि स्नेहा या मधुर अपनी मरजी से अलग कहीं चले जाएं. थोड़ी ही देर में चारों अलगअलग स्टौल पर जा कर खानेपीने की चीजों का आनंद लेने लगे और मस्ती करने लगे.

सुधीर और माधुरी भी अपनेअपने परिचितों से बात करने लगे. किसी काम से माधुरी महिलाओं के एक समूह के पास से गुजरी तो उस के कानों में विमला की आवाज सुनाई दी. वह किसी से कह रही थी, ‘‘पता है, सुधीरजी और माधुरीजी के 4 बच्चे हैं. मुझे तो जान कर बड़ा आश्चर्य हुआ. आजकल के जमाने में तो लोग 2 बच्चे बड़ी मुश्किल से पाल सकते हैं तो इन्होंने 4 कैसे कर लिए.’’

‘‘और नहीं तो क्या, मैं भी आज ही उन लोगों से मिली तो मुझे भी आश्चर्य हुआ. भई, मैं तो 2 बच्चे पालने में ही पस्त हो गई. उन की जरूरतें, पढ़ाई- लिखाई सबकुछ. पता नहीं माधुरीजी 4 बच्चों की परवरिश किस तरह से मैनेज कर पाती होंगी?’’ दूसरी महिला ने जवाब दिया.

माधुरी चुपचाप वहां से आगे बढ़ गई. यह तो उन्हें हर जगह सुनने को मिलता कि उन के 4 बच्चे हैं. यह जान कर हर कोई आश्चर्य प्रकट करता है. अब वह उन्हें क्या बताए? घर आ कर चारों बच्चे सोने चले गए. सुधीर भी जल्दी ही नींद के आगोश में समा गए. मगर माधुरी की आंखों में नींद नहीं थी. वह तो 6 साल पहले के उस दिन को याद कर रही थी जब माधुरी के लिए सुधीर का रिश्ता आया था. हां, 6 साल ही तो हुए हैं माधुरी और सुधीर की शादी को. 6 साल पहले वह दौर कितना कठिन था. माधुरी को बड़ी घबराहट हो रही थी. पिछले कई दिनों से वह अपने निर्णय को ले कर असमंजस की स्थिति में जी रही थी.

माधुरी का निर्णय अर्थात विवाह का निर्णय. अपने विवाह को ले कर ही वह ऊहापोह में पड़ी हुई थी. घबरा रही थी. क्या होगा? नए घर में सब उसे स्वीकारेंगे या नहीं.

विवाह को ले कर हर लड़की के मन में न जाने कितनी तरह की चिंताएं और घबराहट होती है. स्वाभाविक भी है, जन्म के चिरपरिचित परिवेश और लोगों के बीच से अचानक ही वह सर्वथा अपरिचित परिवेश और लोगों के बीच एक नई ही जमीन पर रोप दी जाती है. अब इस नई जमीन की मिट्टी से परिचय बढ़ा कर इस से अपने रिश्ते को प्रगाढ़ कर यहां अपनी जड़ें जमा कर फलनाफूलना मानो नाजुक सी बेल को अचानक ही रेतीली कठोर भूमि पर उगा दिया जाए.

लेकिन माधुरी की घबराहट अन्य लड़कियों से अलग थी. नई जमीन पर रोपे जाने का अनुभव वह पहले भी देख चुकी थी. उस जमीन पर अपनी जड़ें जमा कर खूब पल्लवित हो कर नाजुक बेल से एक परिपक्व लताकुंज में परिवर्तित भी हो चुकी थी, लेकिन अचानक ही एक आंधी ने उसे वहां से उखाड़ दिया और उस की जड़ों को क्षतविक्षत कर के उस की जमीन ही उस से छीन ली.

2 वर्ष पहले मात्र 43 वर्ष की आयु में ही माधुरी के पति की हृदयगति रुक जाने से आकस्मिक मृत्यु हो गई. कौन सोच सकता था कि रात में पत्नी और बच्चों के साथ खुल कर हंसीमजाक कर के सोने वाला व्यक्ति फिर कभी उठ ही नहीं पाएगा. इतना खुशमिजाज, जिंदादिल इंसान था प्रशांत कि सब के दिलों को मोह लेता था, लेकिन क्या पता था कि उस का खुद का ही दिल इतनी कम उम्र में उस का साथ छोड़ देगा.

माधुरी तो बुरी तरह टूट गई थी. 18 सालों का साथ था उन का. 2 प्यारे बच्चे हैं, प्रशांत की निशानी, प्रिया और मधुर. मधुर तो तब मात्र 16 साल का हुआ ही था और प्रिया अपने पिता की अत्यंत लाडली बस 12 साल की ही थी. सब से बुरा हाल तो प्रिया का ही हुआ था.

एक खुशहाल परिवार एक ही झटके में तहसनहस हो गया. महीनों लगे थे माधुरी को इस सदमे से बाहर आ कर संभलने में. उम्र ही क्या थी उस की. मात्र 37 साल. वह तो उस के मातापिता ने अपना कलेजा मजबूत कर के उसे सांत्वना दे कर इतने बड़े दुख से उबरने में उस की मदद की. प्रिया और मधुर के कुम्हलाए चेहरे देख कर माधुरी ने सोचा था कि अब ये दोनों ही उस का जीवन हैं. अब इन के लिए उसे मजबूत छत बनानी है.

मौत का कारण- भाग 1: क्यों दम तोड़ रहा था वरुण का बचपन

मेरा 5 वर्षीय बेटा वरुण उन दिनों बहुत गुमसुम रहने लगा था. जब से उस की दादी की मृत्यु हुई तभी से उस का यह हाल था. मांजी की अचानक मृत्यु ने हमें भी हतप्रभ कर दिया था, पर वरुण पर तो यह दुख मानो पहाड़ बन कर टूट पड़ा था. मुझे आज भी याद है, हमें रोते देख कर किस तरह वरुण भी अपनी दादी की मृतदेह पर गिर कर पछाड़ें खाखा कर रो रहा था. उस की हालत देख कर मैं ने अपनेआप को संभाला और उसे वहां से उठा कर भीतर वाले कमरे में ले गई थी. मेरे साथ मेरा देवर प्रवीर भी भीतर आ गया था.

‘दादी हिलडुल क्यों नहीं रहीं?’ उस ने सिसकियों के बीच पूछा.

‘वे अब इस दुनिया में नहीं हैं,’ प्रवीर बोला.

‘पर वे तो यहीं हैं. बाहर लेटी हैं. आप लोगों ने उन्हें जमीन पर क्यों लिटा रखा है?’

‘उन की मृत्यु हो चुकी है,’ प्रवीर दुखी स्वर में बोला.

‘मृत्यु, क्या मतलब?’

उस ने पूछा तो मैं एक क्षण के लिए चुप हो गई फिर उसे डांटते हुए कहा, ‘बेकार सवाल नहीं पूछते.’ मगर वह मेरी डांट से अप्रभावित फिर अपना सवाल दोहराने लगा. इस बार प्रवीर ने शांत स्वर में उसे समझाया कि उस की दादी अब उसे कभी नजर नहीं आएंगी. न वे उसे कहानियां सुनाएंगी, न उस से स्कूल की बातें सुनेंगी.

‘ये सब तुम क्यों बता रहे हो उस नन्ही जान को?’ मैं ने भर्राए कंठ से पूछा.

‘बताना जरूरी है भाभी, आजकल के बच्चों को बहलाया नहीं जा सकता. सचसच बता देना ही ठीक रहता है,’ प्रवीर की आवाज नम हो आई थी.

इधर वरुण यह सुन कर जोर से रो पड़ा. उस का करुण रुदन सन्नाटे को चीर कर हर एक के हृदय में उतर गया. वरुण अपनी दादी से बेहद प्यार करता था और वे भी अपने इस इकलौते पोते पर अपना सर्वस्व लुटाती थीं. सुबह जैसे ही वरुण की नींद खुलती, वे उस समय बिस्तर पर बैठी माला फेर रही होती थीं. वरुण धम से उन की गोद में बैठ जाता और दादीपोत का वार्त्तालाप शुरू हो जाता.

‘दादी, आप कितने साल की हैं?’

‘65 साल की.’

‘यानी मेरे पिताजी से भी बड़ीं,’ वरुण अपनी दोनों बांहें फैला कर आश्चर्य प्रकट करता.

‘हां, तेरे पिताजी से भी बड़ी,’ मांजी उस के भोलेपन पर हंस पड़तीं.

‘पर आप तो पिताजी से छोटी हैं?’ वरुण का इशारा उन के लंबे कद की ओर होता.

कद से छोटे होने पर भी उम्र में बड़ा हुआ जा सकता है, यह बात मांजी उसे उदाहरण सहित समझातीं कि उस की बूआ उस के पिताजी से उम्र में बड़ी हैं इसलिए उस के पिताजी उन्हें दीदी कहते हैं लेकिन कद में वे उन से छोटी हैं. इस बात को सुन कर वरुण कुछ क्षण सोच में डूब जाता, फिर कुछ समझने की मुद्रा में आंखें झपका कर कहता, ‘इस का मतलब यह हुआ कि मां भी पिताजी से बड़ी हैं.’ उस की नादानी पर मांजी हंसतेहंसते दोहरी हो जातीं. हर 2-3 दिन बाद इस तरह के संवाद दोनों दादीपोते के बीच अवश्य होते. फिर उस की अविराम चलती बातों पर रोक लगाती हुई वे कहतीं, ‘अब बस भी कर. मैं तुझे गरमागरम हलवा बना कर खिलाती हूं.’ ‘सुबह का नाश्ता ताकत देने वाला होना चाहिए, हलवा या मक्खन व परांठा, फुसफुसी डबलरोटी नहीं,’ वे कहतीं. लेकिन अपने मतों को वे हम पर कभी थोपती नहीं थीं. मेरी समझ से यही गुण उन्हें उन की उम्र के अन्य बुजुर्गों से अलग करता था. मनुष्य की दूसरों पर शासन करने की इच्छा सदा से रही है. रिश्तों के दायरे में बड़ों द्वारा छोटों पर शासन करने की छूट ने ही हमारे पारिवारिक संबंधों में कड़वाहट घोल दी है. वरुण की दादी में यह बात नहीं थी. सास होने के नाते वे मुझ पर अधिकार जताने के बजाय स्नेह लुटाती थीं. यह उन्हीं के व्यवहार की विशेषता थी कि वे मुझे सदा मां से भी अधिक अपनी लगीं.

उन की मृत्यु को 15 दिन हो गए थे. एकएक कर के सभी रिश्तेदार विदा हो गए. प्रवीर भी कलकत्ता लौट गया. उस की नईनई नौकरी थी, ज्यादा छुट्टी लेना संभव नहीं था. जब व्यस्तता से उबरने का मौका मिला तब मेरा ध्यान अचानक वरुण की

अस्वाभाविक गंभीरता पर गया. निरंतर बोलते रहने वाला वरुण एकदम गुमसुम  हो गया था. उस का जबतब मांजी की तसवीर को एकटक देखते रहना, उन की अलमारी खोल कर  उन की साडि़यों पर हाथ फेरना, सब कुछ बड़ा अजीब लग रहा था. ‘‘कल से तुम्हें स्कूल जाना है, पुस्तकें बैग में ठीक से रख लो,’’ मैं ने वरुण को  याद दिलाते हुए कहा मगर वह वैसे ही भावमुद्रा लिए बैठा रहा, जैसे मैं ने  उस से नहीं, किसी और से कहा हो.

‘‘कल स्केचपैन भी ले जाना बैग में रख कर,’’ मुझे उम्मीद थी कि स्केचपैन  स्कूल में ले जाने के मेरे प्रस्ताव से वह अवश्य खुश होगा, मगर इस बार भी वह उसी तरह निर्लिप्त बैठा रहा. मुझे उस की चुप्पी से अब भय लगने लगा. मगर कुछ क्षण बाद वह स्वयं ही अपनी चुप्पी तोड़ कर बोला, ‘‘मां, दादी की मौत कैसे हुई? उन्हें किस ने मारा?’’ उस का यह सवाल मुझे उस की चुप्पी से भी डरावना लगा. मैं अवाक् रह गई.

सबको साथ चाहिए- भाग 2: क्या सही था माधुरी का फैसला

साल भर में ही वह काफी कुछ स्थिर हो गई थी. जीवन आगे बढ़ रहा था. मधुर मैडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा था. प्रिया भी पढ़ने में तेज थी. स्कूल में अव्वल आती, लेकिन माधुरी की सूनी मांग और माथा देख कर उस की मां के कलेजे में मरोड़ उठती, इतना लंबा जीवन अकेले वह कैसे काट पाएगी?

‘अकेली कहां हूं मां, आप दोनों हो, बच्चे हैं,’ माधुरी जवाब देती.

‘हम कहां सारी उम्र तुम्हारा साथ दे पाएंगे बेटा. बेटी शादी कर के अपने घर चली जाएगी और मधुर पढ़ाई और फिर नौकरी के सिलसिले में न जाने कौन से शहर में रहेगा. फिर उस की भी अपनी दुनिया बस जाएगी. तब तुम्हें किसी के साथ की सब से ज्यादा जरूरत पड़ेगी. यह बात तो मैं अपने अनुभव से कह रही हूं. अपने निजी सुखदुख बांटनेसमझने वाला एक हमउम्र साथी तो सब को चाहिए होता है, बेटी,’ मां उदास आवाज में कहतीं.  माधुरी उस से भी गहरी उदास आवाज में कहती, ‘मेरी जिंदगी में वह साथ लिखा ही नहीं है, मां.’

माधुरी का जवाब सुन कर मां सोच में पड़ जातीं. माधुरी को तो पता ही नहीं था कि उस के मातापिता इस उम्र में उस की शादी फिर से करवाने की सोच रहे हैं. 3 महीने पहले ही उन्हें सुधीर के बारे में पता चला था. सुधीर की उम्र 45 वर्ष थी. 2 वर्ष पूर्व ही ब्रेन ट्यूमर की वजह से उन की पत्नी की मृत्यु हो गई थी. 2 बच्चे 19 वर्ष का बेटा और 15 वर्ष की बेटी है. घर में सुधीर की वृद्ध मां भी है. नौकरचाकरों की मदद से पिछले 2 वर्षों से वह 68 साल की उम्र में जैसेतैसे बेटे की गृहस्थी चला रही थीं.

माधुरी की मां ने सुधीर की मां को माधुरी के बारे में बता कर विवाह का प्रस्ताव रखा. सुधीर की मां ने सहर्ष उसे स्वीकार कर लिया. वयस्क होती बेटी को मां की जरूरत का हवाला दे कर और अपने बुढ़ापे का खयाल करने को उन्होंने सुधीर को विवाह के लिए मना लिया.

‘मैं बूढ़ी आखिर कब तक तेरी गृहस्थी की गाड़ी खींच पाऊंगी. और फिर कुछ सालों बाद तेरे बच्चों का ब्याह होगा. कौन करेगा वह सब भागदौड़ और उन के जाने के बाद तेरा ध्यान रखने को और सुखदुख बांटने को भी तो कोई चाहिए न. अपनी मां की इस बात पर सुधीर निरुत्तर हो गए और वही सब बातें दोहरा कर माधुरी की मां ने जैसेतैसे उसे विवाह के लिए तैयार करवा लिया.

‘बेटी अकेलापन बांटने कोई नहीं आता. यह मत सोच कि लोग क्या कहेंगे? लोग तो अच्छेबुरे समय में बस बोलने आते हैं. साथ देने के लिए आगे कोई नहीं आता. अपना बोझ आदमी को खुद ही ढोना पड़ता है. सुधीर अच्छा इंसान है. वह भी अपने जीवन में एक त्रासदी सह चुका है. मुझे पूरा विश्वास है कि वह तेरा दुख समझ कर तुझे संभाल लेगा. तुम दोनों एकदूसरे का सहारा बन सकोगे.’

माधुरी ने भी मां के तर्कों के आगे निरुत्तर हो कर पुनर्विवाह के लिए मौन स्वीकृति दे दी. वैसे भी वह अब अपनी वजह से मांपिताजी को और अधिक दुख नहीं देना चाहती थी.

लेकिन तब से वह मन ही मन ऊहापोह में जी रही थी. सवाल उस के या सुधीर के आपस में सामंजस्य निभाने का नहीं था. सवाल उन 4 वयस्क होते बच्चों के आपस में तालमेल बिठाने का है. वे आपस में एकदूसरे को अपने परिवार का अंश मान कर एक घर में मिलजुल कर रह पाएंगे? सुधीर और माधुरी को अपना मान पाएंगे?

यही सारे सवाल कई दिनों से माधुरी के मन में चौबीसों घंटे उमड़तेघुमड़ते रहते. जैसेजैसे विवाह के लिए नियत दिन पास आता जा रहा था ये सवाल उस के मन में विकराल रूप धारण करते जा रहे थे.

माधुरी अभी इन सवालों में उलझी बैठी थी कि मां ने उस के कमरे में आ कर सुधीर की मां के आने की खबर दी. माधुरी पलंग से उठ कर बाहर जाने के लिए खड़ी ही हुई थी कि सुधीर की मां स्वयं ही उस के कमरे में चली आईं. उन के साथ 14-15 साल की एक प्यारी सी लड़की भी थी. माधुरी को समझते देर नहीं लगी कि यह सुधीर की बेटी स्नेहा है. माधुरी ने उठ कर सुधीर की मां को प्रणाम किया. उन्होंने प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरा और कहा, ‘मैं समझती हूं माधुरी बेटा, इस समय तुम्हारी मनोस्थिति कैसी होगी? मन में अनेक सवाल घुमड़ रहे होंगे. स्वाभाविक भी है.

‘मैं बस इतना ही कहना चाहूंगी कि अपने मन से सारे संशय दूर कर के नए विश्वास और पूर्ण सहजता से नए जीवन में प्रवेश करो. हम सब अपनीअपनी जगह परिस्थिति और नियति के हाथों मजबूर हो कर अधूरे रह गए हैं. अब हमें एकदसूरे को पूरा कर के एक संपूर्ण परिवार का गठन करना है. इस के लिए हम सब को ही प्रयत्न करना है. मेरा विश्वास है कि इस में हम सफल जरूर होंगे. आज मैं अपनी ओर से पहली कड़ी जोड़ने आई हूं. एक बेटी को उस की मां से मिलाने लाई हूं. आओ स्नेहा, मिलो अपनी मां से,’ कह कर उन्होंने स्नेहा का हाथ माधुरी के हाथ में दे दिया.

स्नेहा सकुचा कर सहमी हुई सी माधुरी की बगल में बैठ गई तो माधुरी ने खींच कर उसे गले से लगा लिया. मां के स्नेह को तरस रही स्नेहा ने माधुरी के सीने में मुंह छिपा लिया. दोनों के प्रेम की ऊष्मा ने संशय और सवालों को बहुत कुछ धोपोंछ दिया.

‘बस, अब आगे की कडि़यां हम मां- बेटी मिल कर जोड़ लेंगी,’ सुधीर की मां ने कहा तो पहली बार माधुरी को लगा कि उस के मन पर पड़े हुए बोझ को मांजी ने कितनी आसानी से उतार दिया.

जल्द ही एक सादे समारोह में माधुरी और सुधीर का विवाह हो गया. माधुरी के मन का बचाखुचा भय और संशय तब पूरी तरह से दूर हो गया, जब सुधीर से मिलने वाले पितृवत स्नेह की छत्रछाया में उस ने प्रिया को प्रशांत के जाने के बाद पहली बार खुल कर हंसते देखा. अपने बच्चों को ले कर माधुरी थोड़ी असहज रहती, मगर सुधीर ने पहले दिन से ही मधुर और प्रिया के साथ एकदम सहज पितृवत व स्नेहपूर्ण व्यवहार किया. सुधीर बहुत परिपक्व और सुलझे हुए इंसान थे और मांजी भी. घर में उन दोनों ने इतना सहज और अनौपचारिक अपनेपन का वातावरण बनाए रखा कि माधुरी को लगा ही नहीं कि वह बाहर से आई है. सुधीर का बेटा सुकेश और मधुर भी जल्दी ही आपस में घुलमिल गए. कुछ ही महीनों में माधुरी को लगने लगा कि जैसे यह उस का जन्मजन्मांतर का परिवार है.

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सबको साथ चाहिए- भाग 3: क्या सही था माधुरी का फैसला

माधुरी के मातापिता भी उसे अपने नए परिवार में खुशी से रचाबसा देख कर संतुष्ट थे. दिन पंख लगा कर उड़ते गए. सुधीर का साथ पा कर माधुरी के मन की मुरझाई लताफिर हरी हो गई. ऐसा नहीं कि माधुरी को प्रशांत की और सुधीर को अपनी पत्नी की याद नहीं आती थी, लेकिन उन दोनों की याद को वे लोग सुखद रूप में लेते थे. उस दुख को उन्होंने वर्तमान पर कभी हावी नहीं होने दिया. उन की याद में रोने के बजाय वे उन के साथ बिताए सुखद पलों को एकदूसरे के साथ बांटते थे.  सोचतेसोचते माधुरी गहरी नींद में खो गई. इस घटना के 10-12 दिन बाद ही सुधीर ने माधुरी को बताया कि रविजी और उन की पत्नी उन के घर आने के इच्छुक हैं. माधुरी उन के आने के पीछे की मंशा समझ गई. उस ने सुधीर से कह दिया कि वे उन्हें रात के खाने पर सपरिवार निमंत्रित कर लें. 2 दिन बाद ही रविजी अपनी पत्नी और दोनों बच्चों को ले कर डिनर के लिए आ गए. विमला माधुरी की हैल्प करवाने के बहाने किचन में आ गई और माधुरी से बातें करने लगी. माधुरी ने स्नेहा से कहा कि प्रिया को बोल दे, डायनिंग टेबल पर प्लेट्स लगा कर रख देगी.

‘‘उसे आज बहुत सारा होमवर्क मिला है मां. उसे पढ़ने दीजिए. मैं आप की हैल्प करवा देती हूं,’’ स्नेहा ने जवाब दिया.

‘‘पर बेटा, तुम्हारे तो टैस्ट चल रहे हैं. तुम जा कर पढ़ाई करो. मैं मैनेज कर लूंगी,’’ माधुरी ने स्नेहा से कहा.

‘‘कोई बात नहीं मां. कल अंगरेजी का टैस्ट है और मुझे सब आता है,’’ स्नेहा प्लेट पोंछ कर टेबल पर सजाने लगी. तभी सुकेश और मधुर बाजार से आइसक्रीम और सलाद के लिए गाजर और खीरे वगैरह ले आए. सुकेश ने तुरंत आइसक्रीम फ्रीजर में रखी और मां से बोला, ‘‘मां, और कुछ काम है क्या?’’

‘‘नहीं, बेटा. अब तुम आनंद और अमृता को अपने रूम में ले जाओ. वे लोग बाहर अकेले बोर हो रहे हैं,’’ माधुरी ने कहा तो सुकेश बाहर चला गया.

‘‘ठीक है मां, कुछ काम पड़े तो बुला लेना,’’ स्नेहा भी अपना काम खत्म कर के चली गई. अब किचन में सिर्फ मधुरी और विमला ही रह गईं. अब विमला ज्यादा देर तक अपनी उत्सुकता को रोक नहीं पाई और उस ने माधुरी से सवाल किया, ‘‘हम तो 2 ही बच्चों को बड़ी मुश्किल से संभाल पा रहे हैं. आप ने 4-4 बच्चों को कैसे संभाला होगा? चारों में अंतर भी ज्यादा नहीं लगता. स्नेहा और मधुर तो बिलकुल एक ही उम्र के लगते हैं.’’  माधुरी इस सवाल के लिए तैयार ही थी. वह अत्यंत सहज स्वर में बोली, ‘‘हां, स्नेहा और मधुर की उम्र में बस 8 महीनों का ही फर्क है.’’

‘‘क्या?’’ विमला बुरी तरह से चौंक गई, ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’

तब माधुरी ने बड़ी सहजता से मुसकराते हुए संक्षेप में अपनी और सुधीर की कहानी सुना दी.  अब तो विमला के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा.

‘‘तब भी आप के चारों बच्चों में इतना प्यार है जबकि वे आपस में सगे भी नहीं हैं. मेरे तो दोनों बच्चे सगे भाईबहन होने के बाद भी आपस में इतना झगड़ते हैं कि बस पूछो मत. एक मिनट भी नहीं पटती है उन में. मैं तो इतनी तंग आ गई हूं कि लगता है इन्हें पैदा ही क्यों किया? लेकिन आप के चारों बच्चों में तो बहुत प्यार और सौहार्द दिखता है. चारों आपस में एकदूसरे पर और आप पर तो मानो जान छिड़कते हैं,’’ विमला बोली.

तभी सुधीर की मां किचन में आईं और विमला से बोलीं, ‘‘बात सगेसौतेले की नहीं, प्यार होता है आपसी सामंजस्य से. दरअसल, हम सब अपने जीवन में कुछ अपनों को खोने का दर्द झेल चुके हैं इसलिए हम सभी अपनों की कीमत समझते हैं. इस दर्द और समझ ने ही मेरे परिवार को प्यार से एकसाथ बांध कर रखा है. चारों बच्चे अपनी मां या पिता को खोने के बाद अकेलेपन का दंश झेल चुके थे, इसलिए जब चारों मिले तो उन्होंने जाना कि घर में जितने ज्यादा भाईबहन हों उतना ही मजा आता है. यही राज है हमारे परिवार की खुशियों का. हम दिल से मानते हैं कि सब को साथ चाहिए.’’

विमला उन की बातें सुन कर मुग्ध हो गई, ‘‘सचमुच मांजी, आप के परिवार के विचार और सौहार्द तो अनुकरणीय हैं.’

समय बीतता गया. सुकेश पढ़लिख कर इंजीनियर बना तो मधुर डाक्टर बन गया. मधुर ने एमडी किया और सुकेश ने बैंगलुरु से एमटेक. प्रिया और स्नेहा ने भी अपनेअपने पसंदीदा क्षेत्र में कैरियर बना लिया और फिर उन चारों के विवाह, फिर नातीपातों का जन्म, नामकरण मुंडन आदि की भागदौड़ में बरसों बीत गए. फिर एकएक कर सब पखेरू अपनेअपने नीड़ों में बस गए. सुकेश और प्रिया दोनों इंगलैंड चले गए. जहां दोनों भाईबहन पासपास ही रहते थे. मधुर बेंगलुरु में सैटल हो गया और स्नेहा मुंबई में. मांजी और माधुरी के मातापिता का निधन हो गया.

अब इतने बड़े घर में सुधीर और माधुरी अकेले रह गए. जब बच्चे और नातीपोते आते तो घर भर जाता. कभी ये लोग बारीबारी से सारे बच्चों के पास रह आते, लेकिन अधिकांश समय दोनों अपने घर में ही रहते. अपनी दिनचर्या को उन्होंने इस तरह से ढाला कि सुबह की चाय बगीचे की ताजी हवा में साथ बैठ कर पीते, साथ बागबानी करते. साथसाथ घर के सारे काम करने में दिन कब गुजर जाता, पता ही नहीं चलता. दोनों पल भर कभी एकदूसरे से अलग नहीं रह पाते. अब जा कर माधुरी और सुधीर को एहसास होता कि अगर उन्होंने उस समय अपने मातापिता की बात न मान कर विवाह नहीं किया होता तो आज जीवन की इस संध्याबेला में दोनों इतने माधुर्यपूर्ण साथ से वंचित हो कर बिलकुल अकेले रह जाते. जीवन की सुबह मातापिता की छत्रछाया में गुजर जाती है, दोपहर भागदौड़ में बीत जाती है मगर संध्याबेला की इस घड़ी में जब जीवन में अचानक ठहराव आ जाता है तब किसी के साथ की सब से अधिक आवश्यकता होती है. सुधीर के कंधे पर सिर टिकाए हुए माधुरी यही सोच रही थी. सचमुच, बिना साथी के जीवन अत्यंत कठिन और दुखदायक है. साथ सब को चाहिए.

वारिस- भाग 2: कौन-सी मुक्ति का इंतजार कर रही थी ममता

नरेंद्र ने जब से होश संभाला था उस का भी अमली चाचा से वास्ता पड़ता रहा था. जब भी उस के पांव की चप्पल कहीं से टूटती थी तो उस की मरम्मत अमली चाचा ही करता था. चप्पल की मरम्मत और पालिश कर के एकदम उस को नया जैसा बना देता था अमली चाचा.

काम करते हुए बातें करने की अमली चाचा की आदत थी. बातों की झोंक में कई बार बड़ी काम की बातें भी कह जाता था अमली चाचा.

‘कुदेसन’ के बारे में अमली चाचा से वह पूछेगा, ऐसा मन बनाया था नरेंद्र ने.

एक दिन जब स्कूल से वापस आ कर सब लड़के अपनेअपने घर की तरफ रुख कर गए तो नरेंद्र घर जाने के बजाय चौपाल के करीब पीपल के नीचे जूतों की मरम्मत में जुटे अमली चाचा के पास पहुंच गया.

नरेंद्र को देख अमली चाचा ने कहा, ‘‘क्यों रे, फिर टूट गई तेरी चप्पल? तेरी चप्पल में अब जान नहीं रही. अपने कंजूस बाप से कह अब नई ले दें.’’

‘‘मैं चप्पल बनवाने नहीं आया, चाचा.’’

‘‘तब इस चाचा से और क्या काम पड़ गया, बोल?’’ अमली ने पूछा.

नरेंद्र अमली चाचा के पास बैठ गया. फिर थोड़ी सी ऊहापोह के बाद उस ने पूछा, ‘‘एक बात बतलाओ चाचा, यह ‘कुदेसन’ क्या होती है?’’

नरेंद्र के सवाल पर जूता गांठ रहे अमली चाचा का हाथ अचानक रुक गया. चेहरे पर हैरानी का भाव लिए वह बोले, ‘‘ तू यह सब क्यों पूछ रहा है?’’

‘‘मैं ने सुरजीत के घर में एक औरत को देखा था चाचा, सुरजीत कहता है कि वह औरत ‘कुदेसन’ है जिस को उस का बापू बाहर से लाया है. बतलाओ न चाचा कौन होती है ‘कुदेसन’?’’

‘‘क्या करेगा जान कर? अभी तेरी उम्र नहीं है ऐसी बातों को जानने की. थोड़ा बड़ा होगा तो सब अपनेआप मालूम हो जाएगा. जा, घर जा.’’ नरेंद्र को टालने की कोशिश करते हुए अमली चाचा ने कहा.

लेकिन नरेंद्र जिद पर अड़ गया.

तब अमली चाचा ने कहा,

‘‘ ‘कुदेसन’ वह होती है बेटा, जिस को मर्द लोग बिना शादी के घर में ले आते हैं और उस को बीवी की तरह रखते हैं.’’

‘‘मैं कुछ समझा नहीं चाचा.’’

‘‘थोड़े और बड़े हो जाओ बेटा तो सब समझ जाओगे. कुदेसनें तो इस गांव में आती ही रही हैं. आज सुरजीत का बाप ‘कुदेसन’ लाया है. एक दिन तेरा बाप भी तो ‘कुदेसन’ लाया था. पर उस ने यह सब तेरी मां की रजामंदी से किया था. तभी तो वह वर्षों बाद भी तेरे घर में टिकी हुई है. बातें तो बहुत सी हैं पर मेरी जबानी उन को सुनना शायद तुम को अच्छा नहीं लगेगा, बेहतर होगा तुम खुद ही उन को जानो,’’ अमली चाचा ने कहा.

अमली चाचा की बातों से नरेंद्र हक्काबक्का था. उस ने सोचा नहीं था कि उस का एक सवाल कई दूसरे सवालों को जन्म दे देगा.

सवाल भी ऐसे जो उस की अपनी जिंदगी से जुडे़ थे. अमली चाचा की बातों से यह भी लगता था कि वह बहुत कुछ उस से छिपा भी गया था.

अब नरेंद्र की समझ में आने लगा था कि होश संभालने के बाद वह जिस खामोश औरत को अपने घर में देखता आ रहा है वह कौन है?

वह भी ‘कुदेसन’ है, लेकिन सवाल तो कई थे.

यदि मेरा बापू कभी मां की रजामंदी से ‘कुदेसन’ लाया था तो आज मां उस से इतना बुरा सलूक क्यों करती है? अगर वह ‘कुदेसन’ है तो मुझ को देख कर रोती क्यों है? जरा सा मौका मिलते ही मुझ को अपने सीने से चिपका कर चूमनेचाटने क्यों लगती थी वह? मां की मौजूदगी में वह ऐसा क्यों नहीं करती थी? क्यों डरीडरी और सहमी सी रहती थी वह मां के वजूद से?

फिर अमली चाचा की इस बात का क्या मतलब था कि अपने घर की कुछ बातें खुद ही जानो तो बेहतर होगा?

ऐसी कौन सी बात थी जो अमली चाचा जानता तो था किंतु अपने मुंह से उस को नहीं बतलाना चाहता?

एक सवाल को सुलझाने निकला नरेंद्र का किशोर मन कई सवालों में उलझ गया.

उस को लगने लगा कि उस के अपने जीवन से जुड़ी हुई ऐसी बहुत सी बातें हैं जिन के बारे में वह कुछ नहीं जानता.

अमली चाचा से नई जानकारियां मिलने के बाद नरेंद्र ने मन में इतना जरूर ठान लिया कि वह एक बार मां से घर में रह रही ‘कुदेसन’ के बारे में जरूर पूछेगा.

‘कुदेसन’ के कारण अब सुरजीत के घर में बवाल बढ़ गया था. सुरजीत की मां ‘कुदेसन’ को घर से निकालना चाहती थी मगर उस का बाप इस के लिए तैयार नहीं था.

इस झगड़े में सुरजीत की मां के दबंग भाइयों के कूदने से बात और भी बिगड़ गई थी. किसी वक्त भी तलवारें खिंच सकती थीं. सारा गांव इस तमाशे को देख रहा था.

वैसे भी यह गांव में इस तरह की कोई नई या पहली घटना नहीं थी.

जब सारे गांव में सुरजीत के घर आई ‘कुदेसन’ की चर्चा थी तो नरेंद्र का घर इस चर्चा से अछूता कैसे रह सकता था?

नरेंद्र ने भी मां और सिमरन बूआ को इस की चर्चा करते सुना था लेकिन काफी दबी और संतुलित जबान में.

इस चर्चा को सुन कर नरेंद्र को लगा था कि उस के मां से कु छ पूछने का वक्त आ गया है.

एक दिन जब नरेंद्र स्कूल से वापस घर लौटा तो मां अपने कमरे में अकेली थीं. सिमरन बूआ किसी रिश्तेदार के यहां गई हुई थीं और बापू खेतों में था.

नरेंद्र ने अपना स्कूल का बस्ता एक तरफ रखा और मां से बोला, ‘‘एक बात बतला मां, गायभैंस बांधने वाली जगह के पास बनी कोठरी में जो औरत रहती है वह कौन है?’’

Mother’s Day Special: स्वीकृति- कैसे जागी डिंपल की सोई हुई ममता

आशीष के जाते ही डिंपल दरवाजा बंद कर रसोईघर की ओर भागी. जल्दी से टिफिन अपने बैग में रख शृंगार मेज के समक्ष तैयार होते हुए वह बड़बड़ाती जा रही थी, ‘आज फिर औफिस के लिए देर होगी. एक तो घर का काम, फिर नौकरी और सब से ऊपर वही बहस का मुद्दा…’

5 वर्ष के गृहस्थ जीवन में पतिपत्नी के बीच पहली बार इतनी गंभीरता से मनमुटाव हुआ था. हर बार कोई न कोई पक्ष हथियार डाल देता था, पर इस बार बात ही कुछ ऐसी थी जिसे यों ही छोड़ना संभव न था.

‘उफ, आशीष, तुम फिर वही बात ले बैठे. मेरा निर्णय तो तुम जानते ही हो, मैं यह नहीं कर पाऊंगी,’ डिंपल आपे से बाहर हो, हाथ मेज पर पटकते हुए बोली थी.

‘अच्छाअच्छा, ठीक है, मैं तो यों ही कह रहा था,’ आखिर आशीष ने आत्मसमर्पण कर ही दिया. फिर कंधे उचकाते हुए बोला, ‘प्रिया मेरी बहन थी और बच्चे भी उसी के हैं, तो क्या उन्हें…’

बीच में ही बात काटती डिंपल बोल पड़ी, ‘मैं यह मानती हूं, पर हमें बच्चे चाहिए ही नहीं. मैं यह झंझट पालना ही नहीं चाहती. हमारी दिनचर्या में बच्चों के लिए वक्त ही कहां है? क्या तुम अपना वादा भूल गए कि मेरे कैरियर के लिए हमेशा साथ दोगे, बच्चे जरूरी नहीं?’ आखिरी शब्दों पर उस की आवाज धीमी पड़ गई थी.

डिंपल जानती थी कि आशीष को बच्चों से बहुत लगाव है. जब वह कोई संतान न दे सकी तो उन दोनों ने एक बच्चा गोद लेने का निश्चय भी किया था, पर…

‘ठीक है डिंपी?’ आशीष ने उस की विचारशृंखला भंग करते हुए अखबार को अपने ब्रीफकेस में रख कर कहा, ‘मैं और मां कुछ न कुछ कर लेंगे. तुम इस की चिंता न करना. फिलहाल तो बच्चे पड़ोसी के यहां हैं, कुछ प्रबंध तो करना ही होगा.’

‘क्या मांजी बच्चों को अपने साथ नहीं रख सकतीं?’ जूठे प्याले उठाते हुए डिंपल ने पूछा.

‘तुम जानती तो हो कि वे कितनी कमजोर हो गई हैं. उन्हें ही सेवा की आवश्यकता है. यहां वे रहना नहीं चाहतीं, उन को अपना गांव ही भाता है. फिर 2 छोटे बच्चे पालना…खैर, मैं चलता हूं. औफिस से फोन कर तुम्हें अपना प्रोग्राम बता दूंगा.’

तैयार होते हुए डिंपल की आंखें भर आईं, ‘ओह प्रिया और रवि, यह क्या हो गया…बेचारे बच्चे…पर मैं भी अब क्या करूं, उन्हें भूल भी नहीं पाती,’ बहते आंसुओं को पोंछ, मेकअप कर वह साड़ी पहनने लगी.

2 दिनों पहले ही कार दुर्घटना में प्रिया तो घटनास्थल पर ही चल बसी थी, जबकि रवि गंभीर हालत में अस्पताल में था. दोनों बच्चे अपने मातापिता की प्रतीक्षा करते डिंपल के विचारों में घूम रहे थे. हालांकि एक लंबे अरसे से उस ने उन्हें देखा नहीं था. 3 वर्ष पूर्व जब वह उन से मिली थी, तब वे बहुत छोटे थे.

वह घर, वह माहौल याद कर डिंपल को कुछ होने लगता. हर जगह अजीब सी गंध, दूध की बोतलें, तारों पर लटकती छोटीछोटी गद्दियां, जिन से अजीब सी गंध आ रही थी. पर वे दोनों तो अपनी उसी दुनिया में डूबे थे. रवि को तो चांद सा बेटा और फूल जैसी बिटिया पा कर और किसी चीज की चाह ही नहीं थी. प्रिया हर समय, बस, उन दोनों को बांहों में लिए मगन रहती.

परंतु घर के उस बिखरे वातावरण ने दोनों को हिला दिया. तभी डिंपल बच्चा गोद लेने के विचार मात्र से ही डरती थी और उन्होंने एक निर्णय ले लिया था. ‘तुम ठीक कहती हो डिंपी, मेरे लिए भी यह हड़बड़ी और उलझन असहाय होगी. फिर तुम्हारा कैरियर…’ आशीष ने उस का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा था.

दोनों अपने इस निर्णय पर प्रसन्न थे, जबकि वह जानती थी कि बच्चे पालने का अर्थ घर का बिखरापन ही हो, ऐसी बात नहीं है. यह तो व्यक्तिगत प्रक्रिया है. पर वह अपना भविष्य दांव पर लगाने के पक्ष में कतई न थी. वह अच्छी तरह समझती थी कि यह निर्णय आशीष ने उसे प्रसन्न रखने के लिए ही लिया है. लेकिन इस के विपरीत डिंपल बच्चों के नाम से ही कतराती थी.

डिंपल ने भाग कर आटो पकड़ा  और दफ्तर पहुंची. आधे घंटे बाद ही फोन की घंटी घनघना उठी, ‘‘मैं अभी मुरादाबाद जा रहा हूं. मां को भी रास्ते से गांव लेता जाऊंगा,’’ उधर से आशीष की आवाज आई.

‘‘क्या वाकई, मेरा साथ चलना जरूरी न होगा?’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं, मांजी तो जाएंगी ही. और कुछ दिनों पहले ही बच्चे नानी से मिले थे. उन्हें वे पहचानते भी हैं. तुम्हें तो वे पहचानेंगे ही नहीं. वैसे तो मैं ही उन से कहां मिला हूं. खैर, तुम चिंता न करना. अच्छा, फोन रखता हूं…’’

2 दिनों बाद थकाटूटा आशीष वहां से लौटा और बोला, ‘‘रवि अभी भी बेहोश है, दोनों बच्चे पड़ोसी के यहां हैं. वे उन्हें बहुत चाहते हैं. पर वे वहां कब तक रहेंगे? बच्चे बारबार मातापिता के बारे में पूछते हैं,’’ अपना मुंह हाथों से ढकते हुए आशीष ने बताया. उस का गला भर आया था.

‘‘मां बच्चों को संभालने गई थीं, पर वे तो रवि की हालत देख अस्पताल में ही गिर पड़ीं,’’ आशीष ने एक लंबी सांस छोड़ी.

‘‘मैं ने आज किशोर साहब से बात की थी, वे एक हफ्ते के अंदर ही डबलबैड भिजवा देंगे.’’

‘‘एक और डबलबैड क्यों?’’ आशीष की नजरों में अचरजभरे भाव तैर गए.

‘‘उन दोनों के लिए एक और डबलबैड तो चाहिए न. हम उन्हें ऐसे ही तो नहीं छोड़ सकते, उन्हें देखभाल की बहुत आवश्यकता होगी. वे पेड़ से गिरे पत्ते नहीं, जिन्हें वक्त की आंधी में उड़ने के लिए छोड़ दिया जाए,’’ डिंपल की आंखों में पहली बार ममता छलकी थी.

उस की इस बात पर आशीष का रोमरोम पुलकित हो उठा और वह कूद कर उस के पास जा पहुंचा, ‘‘सच, डिंपी, क्या तुम उन्हें रखने को तैयार हो? अरे, डिंपी, तुम ने मुझे कितने बड़े मानसिक तनाव से उबारा है, शायद तुम नहीं समझोगी. मैं आजीवन तुम्हारे प्रति कृतज्ञ रहूंगा.’’ पत्नी के कंधों पर हाथ रख उस ने अपनी कृतज्ञता प्रकट की.

डिंपल चुपचाप आशीष को देख रही थी. वह स्वयं भी नहीं जानती थी कि भावावेश में लिया गया यह निर्णय कहां तक निभ पाएगा.

डिंपल सारी तैयारी कर बच्चों के आने की प्रतीक्षा कर रही थी. 10 बजे घंटी बजी. दरवाजे पर आशीष खड़ा था और नीचे सामान रखा था. उस की एक उंगली एक ने तो दूसरी दूसरे बच्चे ने पकड़ रखी थी. उन्हें सामने देख डिंपल खामोश सी हो गई. बच्चों के बारे में उसे कुछ भी तो ज्ञान और अनुभव नहीं था. एक तरफ अपना कैरियर, दूसरी तरफ बच्चे, वह कुछ असमंजस में थी.

आशीष और बच्चे उस के बोलने का इंतजार कर रहे थे. ऊपरी हंसी और सूखे मुंह से डिंपल ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ‘‘हैलो, कैसा रहा सफर?’’

‘‘बहुत अच्छा, बच्चों ने तंग भी नहीं किया. यह है प्रार्थना और यह प्रांजल. बच्चो, ये हैं, तुम्हारी मामी,’’ आशीष ने हंसते हुए कहा.

परंतु चारों आंखें नए वातावरण को चुपचाप निहारती रहीं, कोई कुछ भी न बोला.

डिंपल ने बच्चों का कमरा अपनी पसंद से सजाया था. अलमारी में प्यारा सा कार्टून पिं्रट का कागज बिछा बिस्कुट और टाफियों के डब्बे सजा दिए थे. बिस्तर पर नए खिलौने रखे थे.

प्रांजल खिलौनों से खेलने में मशगूल हो, वातावरण में ढल गया, किंतु प्रार्थना बिस्तर पर तकिए को गोद में रख, मुंह में अंगूठा ले कर गुमसुम बैठी हुई थी. वह मासूम अपनी खोईखोई आंखों में इस नए माहौल को बसा नहीं पा रही थी.

पहले 4-5 दिन तो इतनी कठिनाई नहीं हुई क्योंकि आशीष ने दफ्तर से छुट्टी ले रखी थी. दोनों बच्चे आपस में खेलते और खाना खा कर चुपचाप सो जाते. फिर भी डिंपल डरती रहती कि कहीं वे उखड़ न जाएं. शाम को आशीष उन्हें पार्क में घुमाने ले जाता. वहां दोनों झूले झूलते, आइसक्रीम खाते और कभीकभी अपने मामा से कहानियां भी सुनते.

आशीष, बच्चों से स्वाभाविकरूप से घुलमिल गया था और बच्चे भी सारी हिचकिचाहट व संकोच छोड़ चुके थे, जिसे वे डिंपल के समक्ष त्याग न पाते थे. शायद यह डिंपल के अपने स्वभाव की प्रतिक्रिया थी.

एक हफ्ते बाद डिंपल ने औफिस से छुट्टी ले ली थी ताकि वह भी बच्चों से घुलमिल सके. यह एक परीक्षा थी, जिस में आशीष उत्तीर्ण हो चुका था. अब डिंपल को अपनी योग्यता दर्शानी थी. हमेशा की भांति आशीष तैयार हो कर 9 बजे दफ्तर चल दिया. दोनों बच्चों ने नाश्ता किया. डिंपल ने उन की पसंद का नाश्ता बनाया था.

‘‘अच्छा बच्चो, तुम जा कर खेलो, मैं कुछ साफसफाई करती हूं,’’ नाश्ते के बाद बच्चों से कहते समय हमेशा की भांति वह अपनी आवाज में प्यार न उड़ेल पाई, बल्कि उस की आवाज में सख्ती और आदेश के भाव उभर आए थे. थालियों को सिंक में रखते समय डिंपल उन मासूम चेहरों को नजरअंदाज कर गई, जो वहां खड़े उसे ही देख रहे थे.

‘‘जाओ, अपने खिलौनों से खेलो. अभी मुझे बहुत काम करना है,’’ और वह दोनों को वहीं छोड़ अपने कमरे की ओर बढ़ गई.

कमरा ठीक कर, किताबों और फाइलों के ढेर में से उस ने कुछ फाइलें निकालीं और उन में डूब गई. कुछ देर बाद उसे महसूस हुआ, जैसे कमरे में कोई आया है. बिना पीछे मुड़े ही वह बोल पड़ी, ‘‘हां, क्या बात है?’’

परंतु कोई उत्तर न पा, पीछे देखा कि प्रार्थना और प्रांजल खड़े हैं.

प्रांजल धीरे से बोला, ‘‘प्रार्थना को गाना सुनना है.’’

डिंपल ने एक ठंडी सांस भर कमरे के कोने में रखे स्टीरियो को देखा, फिर अपनी फाइलों को. उसे एक हफ्ते बाद ही नए प्रोजैक्ट की फाइलें तैयार कर के देनी थीं. सोचतेसोचते उस के मुंह से शब्द फिसला, ‘‘नहीं,’’ फिर स्वयं को संभाल उन्हें समझाते हुए बोली, ‘‘अभी मुझे बहुत काम है, कुछ देर बाद सुन लेना.’’

दोनों बच्चे एकदूसरे का मुंह देखने लगे. वे सोचने लगे कि मां तो कभी मना नहीं करती थीं. किंतु यह बात वे कह न पाए और चुपचाप अपने कमरे में चले गए.

डिंपल फिर फाइल में डूब गई. बारबार पढ़ने पर भी जैसे मस्तिष्क में कुछ घुस ही न रहा था. पैन पटक कर डिंपल खड़ी हो गई. बच्चों के कमरे में झांका, वहां एकदम शांति थी. प्रार्थना तकिया गोद में लिए, मुंह में अंगूठा दबाए बैठी थी. प्रांजल अपने सूटकेस में खिलौने जमाने में व्यस्त था.

‘‘यह क्या हो रहा है?’’

‘‘अब हम यहां नहीं रहेंगे,’’ प्रांजल ने फैसला सुना दिया.

उस रात डिंपल दुखी स्वर में पति से बोली, ‘‘मैं और क्या कर सकती हूं, आशीष? ये मुझे गहरी आंखों से टुकुरटुकुर देखा करते हैं. मुझ से वह दृष्टि सहन नहीं होती. मैं उन्हें प्रसन्न देखना चाहती हूं, उन्हें समझाया कि अब यही उन का घर है, पर वे नहीं मानते,’’ डिंपल का सारा गुबार आंखों से फूट कर बह गया.

प्रांजल और प्रार्थना के मौन ने उसे हिला दिया था, जिसे वह स्वयं की अस्वीकृति समझ रही थी. उस ने उन्हें अपनाना तो चाहा लेकिन उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया.

‘‘मैं जानता हूं, यह कठिन कार्य है, पर असंभव तो नहीं. मांजी ने भी उन्हें समझाया था कि उन की मां बहुत दूर चली गई है, अब वापस नहीं आएगी और पिता भी बहुत बीमार हैं. पर उन का नन्हा मस्तिष्क यह बात स्वीकार नहीं पाता. लेकिन धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.’’

‘‘शायद उन्हें यहां नहीं लाना चाहिए था. कहीं अच्छाई के बदले कुछ बुरा न हो जाए.’’

‘‘नहीं, डिंपी, हमें ऐसा नहीं सोचना चाहिए. इस समय उन्हें भरपूर लाड़प्यार और ध्यान की आवश्यकता है. हम जितना स्नेह उन्हें देंगे, वे उतने ही समीप आएंगे. वे प्यार दें या न दें, हमें उन्हें प्यार देते रहना होगा.’’

‘‘मेरे लिए शायद ऐसा कर पाना कठिन होगा. मैं उन्हें अपनाना चाहती हूं, पर फिर भी अजीब सा एहसास, अजीब सी दूरी महसूस करती हूं. इन बच्चों के कारण मैं अपना औफिस का कार्य भी नहीं कर पाती जब वे पास होते हैं तब भी और जब दूर होते हैं तब भी. मेरा मन बड़ी दुविधा में फंसा है.’’

‘‘मैं ने तो इतना सोचा ही नहीं. अगर तुम को इतनी परेशानी है तो कहीं होस्टल की सोचूंगा. बच्चे अभी तुम से घुलेमिले भी नहीं हैं,’’ आशीष ने डिंपल को आश्वासन देते हुए कहा.

‘‘नहीं नहीं, मैं उन्हें वापस नहीं भेजना चाहती, स्वीकारना चाहती हूं, सच. मेरी इच्छा है कि वे हमारे बन जाएं, हमें उन्हें जीतना होगा, आशू, मैं फिर प्रयत्न करूंगी.’’

अगले दिन सुबह से ही डिंपल ने गाने लगा दिए थे. रसोई में काम करते हुए बच्चों को भी आवाज दी, ‘‘मेरी थोड़ी मदद करोगे, बच्चो?’’

प्रांजल उत्साह से भर मामी को सामान उठाउठा कर देने लगा, किंतु प्रार्थना, बस, जमीन पर बैठी चम्मच मारती रही. उस के भोले और उदास चेहरे पर कोई परिवर्तन नहीं था आंखों के नीचे कालापन छाया था जैसे रातभर सोई न हो. पर डिंपल ने जब भी उन के कमरे में झांका था, वे सोऐ ही नजर आए थे.

‘‘अच्छा, तो प्रार्थना, तुम यह अंडा फेंटो, तब तक प्रांजल ब्रैड के कोने काटेगा और फिर हम बनाएंगे फ्रैंच टोस्ट,’’ डिंपल ने कनखियों से उसे देखा. पहली बार प्रार्थना के चेहरे पर बिजली सी चमकी थी. दोनों तत्परता से अपनेअपने काम में लग गए थे.

उस रात जब डिंपल उन्हें कमरे में देखने गई तो भाईबहन शांत चेहरे लिए एकदूसरे से लिपटे सो रहे थे. एक मिनट चुपचाप उन्हें निहार, वह दबेपांव अपने कमरे में लौट आई थी.

अगला दिन वाकई बहुत अच्छा बीता. दोनों बच्चों को डिंपल ने एकसाथ नहलाया. बाथटब में वे पानी से खूब खेले. फिर सब ने साथ ही नाश्ता किया. खरीदारी के लिए वह उन्हें बाजार साथ ले गई और फिर उन की पसंद से नूडल्स का पैकेट ले कर आई. हालांकि डिंपल को नूडल्स कतई पसंद न थे लेकिन उस दोपहर उस ने नूडल्स ही बनाए.

आशीष टूर पर गया हुआ था. बच्चों को बिस्तर पर सुलाने से पूर्व वह उन्हें गले लगा, प्यार करना चाहती थी, पर सोचने लगी, ‘मैं ऐसा क्यों नहीं कर पाती? कौन है जो मुझे पीछे धकेलता है? मैं उन्हें प्यार करूंगी, जरूर करूंगी,’ और जल्दी से एक झटके में दोनों के गालों पर प्यार कर बिस्तर पर लिटा आई.

अपने कमरे में आ कर बिस्तर देख डिंपल का मन किया कि अब चुपचाप सो जाए, पर अभी तो फाइल पूरी करनी थी. मुश्किल से खड़ी हो, पैरों को घसीटती हुई, मेज तक पहुंच वह फाइल के पन्नों में उलझ गई.

बाहर वातावरण एकदम शांत था, सिर्फ चौकीदार की सीटी और उस के डंडे की ठकठक गूंज रही थी. डिंपल ने सोचा, कौफी पी जाए. लेकिन जैसे ही मुड़ी तो देखा कि दरवाजे पर एक छोटी सी काया खड़ी है.

‘‘अरे, प्रार्थना तुम? क्या बात है बेटे, सोई नहीं?’’ डिंपल ने पैन मेज पर रखते हुए पूछा.

पर प्रार्थना मौन उसे देखती रही. उस की आंखों में कुछ ऐसा था कि डिंपल स्वयं को रोक न सकी और घुटनों के बल जमीन पर बैठ प्रार्थना को गले से लिपटा लिया. बच्ची ने भी स्वयं को उस की गोद में गिरा दिया और फूटफूट कर रोने लगी. डिंपल वहीं बैठ गई और प्रार्थना को सीने से लगा, प्यार करने लगी.

काफी देर तक डिंपल प्रार्थना को यों ही सीने से लगाए बैठी रही और उस के बालों में हाथ फेरती रही. प्रार्थना ने उस के कंधे से सिर लगा दिया, ‘‘क्या सचमुच मां अब नहीं आएंगी?’’

अब डिंपल की बारी थी. अत्यंत कठिनाई से अपने आंसू रोक भारी आवाज में बोली, ‘‘नहीं, बेटा, अब वे कभी नहीं आएंगी. तभी तो हम लोगों को तुम दोनों की देखभाल करने के लिए कहा गया है.

‘‘चलो, अब ऐसा करते हैं कि कुछ खाते हैं. मुझे तो भई भूख लग आई है और तुम्हें भी लग रही होगी. चलो, नूडल्स बना लें. हां, एक बात और, यह मजेदार बात हम किसी को बताएंगे नहीं, मामा को भी नहीं,’’ प्रार्थना के सिर पर हाथ फेरते हुए डिंपल बोली.

‘‘मामी, प्रांजल को भी नहीं बताना,’’ प्रार्थना ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘ठीक है, प्रांजल को भी नहीं. तुम और हम जाग रहे हैं, तो हम ही खाएंगे मजेदार नूडल्स,’’ डिंपल के उत्तर ने प्रार्थना को संतुष्ट कर दिया.

डिंपल नूडल्स खाती प्रार्थना के चेहरे को निहारे जा रही थी. अब उसे स्वीकृति मिल गई थी. उस ने इन नन्हे दिलों पर विजय पा ली थी. इतने दिनों उपरांत प्रार्थना ने उस का प्यार स्वीकार कर उस के नारीत्व को शांति दे दी थी. अब न डिंपल को थकान महसूस हो रही थी और न नींद ही आ रही थी.

अचानक उस का ध्यान अपनी फाइलों की ओर गया कि अगर ये अधूरी रहीं तो उस के स्वप्न भी…परंतु डिंपल ने एक ही झटके से इस विचार को अपने दिमाग से बाहर निकाल फेंका. उसे बच्ची का लिपटना, रोना तथा प्यारभरा स्पर्श याद हो आया. वह सोचने लगी, ‘हर वस्तु का अपना स्थान होता है, अपनी आवश्यकता होती है. इस समय फाइलें इतनी आवश्यक नहीं हैं, वे अपनी बारी की प्रतीक्षा कर सकती हैं, पर बच्चे…’

डिंपल ने प्रार्थना को प्यारभरी दृष्टि से निहारते देखा तो वह पूछ बैठी, ‘‘अच्छा, यह बताओ, अब कल की रात क्या करेंगे?’’

‘‘मामी, फिर नूडल्स खाएंगे,’’ प्रार्थना ने नींद से बोझिल आंखें झपकाते हुए कहा.

‘‘मामी नहीं बेटे, मां कहो, मां,’’ कहते हुए डिंपल ने उसे गोद में उठा लिया.

देशद्रोही आफरीन- भाग 3: क्या थी उसकी कहानी

‘‘उस का नाम बलवंत राय?है और वह भी अपने बाप की तरह राजनीति में कदम रखना चाहता है. उस ने अपनी छवि एक हिंदूवादी नेता के रूप में बनानी शुरू कर दी है, क्योंकि हमारे देश में लोग जातिवाद पर ही सब से ज्यादा आंदोलित होते हैं, इसलिए धर्म की राजनीति कर के वह अपने पिता की राह पर चलना चाहता है और फिलहाल उस ने कुछ गायों को खरीद कर अपने फार्महाउस पर रखवा दिया है, जिन का इस्तेमाल वह आने वाले समय में दंगे फैलाने में कर सकता है… मेरा मतलब समझ रही हैं न आप?’’

‘‘क्या तुम इसी समय मुझे बलवंत राय के बंगले पर ले जा सकते हो? हमें सुबूत इकट्ठे करने होंगे,’’ आफरीन ने कहा.

‘‘ले जा तो सकता हूं, पर जाने से पहले मैं अपने दिल की बात आप से कहना चाहता हूं,’’ अनुभव ने कहा.

‘‘कहिए,’’ आफरीन ने कहा.

‘‘दरअसल, आप जैसी इनसानियत से प्यार करने वाली लड़की मैं ने आज तक नहीं देखी. आप एक अनजान लड़की को इंसाफ दिलाने के लिए अपनी जान खतरे में डाल रही हो और आप का यह जज्बा देख कर मुझे बहुत अच्छा लगा है.

‘‘मैं ने हमेशा से अपने लिए आप जैसी लड़की ही चाही है और मैं आप से यह कहना चाहता हूं कि मुझे आप से प्यार है और मैं आप से शादी करना चाहता हूं,’’ एक ही सांस में कह गया था अनुभव.

अनुभव की बात सुन कर एक पल के लिए रुखसार के गाल लाल हो उठे, पर उस की जबान खामोश हो गई थी. उस के होंठों पर मुसकराहट दौड़ गई थी. आफरीन के होंठ खामोश थे, पर अनुभव को उस का जवाब मिल गया था.

वे दोनों बलवंत राय के फार्महाउस के बाहर थे. अंदर एक ओर घास का छोटा सा मैदान था, जहां पर कई गाय और बछड़े बंधे हुए थे.

आफरीन ने अपने मोबाइल से वीडियो बनाना शुरू किया और धीरेधीरे खिड़की के पास जा पहुंची. बलवंत राय अंदर दोस्तों के साथ बैठा हुआ शराब पी रहा था और उस के दोस्त उस की मक्खनबाजी करने में लगे थे.

‘‘देखना अगला इलैक्शन तो हमारे भैया ही जीतेंगे,’’ एक दोस्त बोला.

‘‘हां, तो राजनीति में है ही क्या… लोगों को धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर एकदूसरे से लड़वाओ और राज करो… एक जाति की लड़की का रेप करो तो दूसरी जाति वाले को फंसाओ और दूसरे धर्म की लड़की का रेप करो तो किसी और धर्म के लोगों को फंसाओ.

‘‘अभी देखो न, जब मैं ने चलती कार में उस लड़की का रेप किया तो वह लगी चिल्लाने… मैं ने भी बस चाकू से उस की जीभ काट दी… न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी…’’ बलवंत राय हंसते हुए बोला.

खिड़की के बाहर वीडियो शूट करते हुए आफरीन की आंखें हैरत से फैल गई थीं कि तभी किसी ने पीछे से आ कर उस को पकड़ लिया और उस का मोबाइल छीन लिया.

‘‘क्या रे चिकनी. क्या जासूसी कर रही थी? और तू हमारे टुकड़ों पर पालने वाला कुत्ता… तू अब हमें ही काटने की तैयारी कर रहा था,’’ बलवंत राय के सामने दोनों को ले जाने के बाद वह आगबबूला हो रहा था.

उस के एक आदमी ने उसे बताया कि आफरीन के मोबाइल में गाय और बछड़ों के वीडियो हैं और दोस्तों के साथ हो रही बातें भी रिकौर्ड हैं.

‘‘देखो छमिया. शक्ल से तो कश्मीरी लगती हो. अगर ये सब ले कर तुम पुलिस के पास चली भी जाओगी तो भी पुलिस हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी. पर, आज हम तेरे इन गालों को काट कर देखेंगे कि इन में कितना रस है और फिर कल तुम पुलिस में चली जाना अपने साथ हुए रेप की खबर देने,’’ बलवंत राय ने आफरीन के गालों को सहलाते हुए कहा.

‘‘नहीं बलवंत राय, आफरीन मेरी होने वाली बीवी है. उसे कुछ मत करना, नहीं तो ठीक नहीं होगा,’’ अनुभव चीख पड़ा था.

‘‘ओह, तो लव का लफड़ा है,’’ इतना कह कर बलवंत राय ने अपनी शर्ट उतार फेंकी और आफरीन की ओर बढ़ा. उस की आंखों में हवस के कीड़े नाच रहे थे कि तभी उस के मोबाइल पर उस के विधायक पिताजी का फोन आ गया.

‘‘अरे, कुछ दिनों के लिए अपनी नीच हरकतों को बंद करो. वह जो लड़की की जबान काटने वाला केस है, वह मीडिया में पहुंच गया है और तुम्हारा नाम भी उछल रहा है. इस तरह तो मेरी कुरसी भी खतरे में पड़ जाएगी, इसलिए कुछ दिन के लिए शुद्ध भगवाधारी ब्रह्मचारी जैसी जिंदगी बिताओ, नहीं तो मैं बचा नहीं पाऊंगा तुम्हें,’’ और इतना कह कर फोन काट दिया.

बलवंत राय काफी कुछ समझ चुका था. वह बोला, ‘‘इन दोनों को बांध कर रखो. इन का इस्तेमाल हम कल होने वाली रैली में करेंगे.’’

अगले दिन ‘बिटिया बचाएंगे… देश जगाएंगे’ नाम की रैली थी. तमाम पुलिस बल इकट्ठा था. तमाम लोगों के ‘हिंदू हृदय सम्राट’ बलवंत राय जनता को संबोधित करने जा ही रहा था कि माइक पर एक महिला की तेज आवाज गूंज पड़ी, ‘‘पाकिस्तान जिंदाबाद, हिंदुस्तान मुर्दाबाद…’’

सब इधरउधर देखने लगे. भला इस रैली में ऐसा नारा कौन लगा सकता है?

एक आदमी आफरीन और अनुभव के मुंह पर टेप लगा कर स्टेज पर खींचता हुआ लाया, जिसे जनता की ओर दिखाते हुए वह आदमी बोला, ‘‘देखो साथियो, हम एकता की बात करते हैं और ये कश्मीरी लोग ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ करते हैं. इतना ही नहीं, ‘‘यह देखिए, इन के पास से गौमांस भी बरामद हुआ है,’’ यह कह कर उस आदमी ने एक बैग में गौमांस लोगों को दिखाया.

‘‘ओह तो ये लोग गाय काट कर पार्टी करते हैं. अब चलेगा इन पर प्रतिबंधित पशु काटने का केस और देशद्रोह का मुकदमा, तब अक्ल ठिकाने आ जाएगी,’’ बलवंत राय ने आफरीन को पुलिस की तरफ धकेल दिया.

अनुभव और आफरीन चिल्लाते रहे कि ये उन के खिलाफ एक साजिश है, पर भला सत्ता में बैठे विधायक के बेटे के खिलाफ उठती आवाजें कौन सुनता?

बेकुसूर को सजा दी गई. आफरीन को देशद्रोही मान कर जेल में डाल दिया गया.

और उस दिन के बाद से आफरीन और अनुभव कभी मिल नहीं सके… न जाने कितने अनुभव और आफरीन जेल में बंद होंगे…

आज आफरीन यह भी नहीं जानती कि अस्पताल में जंग लड़ती लड़की जिंदा भी है या नहीं. अलबत्ता, उसे हर पल यह जरूर जताया जाता है कि उस ने देश विरोधी नारे लगाए हैं और वह एक देशद्रोही है.

देशद्रोही आफरीन- भाग 2: क्या थी उसकी कहानी

डाक्टरों ने उस लड़की की पूरी जांच करने के बाद जो बताया, उस ने आफरीन और उस नौजवान को अंदर तक हिला दिया था.

‘‘इस लड़की के साथ रेप किया गया और जब वह शोर मचाने लगी होगी तो उन दरिंदों ने न केवल उस की जीभ काट दी, बल्कि उस को इतना मारा कि उस की रीढ़ की हड्डी और पैर टूट गए. हमारे लिए इस लड़की को जिंदा रख पाना किसी चुनौती से कम नहीं है,’’ डाक्टर ने कहा.

रात के 3 बजे चुके थे. आफरीन अब भी अस्पताल में ही थी.

‘‘जी देखिए, अब मुझे जाना होगा और मैं आप की हिम्मत की तारीफ करता हूं, जो आप ने इस लड़की की मदद के लिए जुटाई… वैसे, मेरा यह कार्ड रख लीजिए. आप को किसी भी तरह की मदद की जरूरत पड़े, तो मुझ से बात कीजिएगा,’’ वह नौजवान बोला.

एक फीकी सी मुसकराहट से आफरीन ने उस नौजवान को शुक्रिया कहा.

आफरीन भी अस्पताल में ज्यादा देर न रुकी. लड़की के घर वाले कहां हैं? कौन हैं? यह जानने के लिए पीडि़ता का होश में आना जरूरी था, पर डाक्टरों के मुताबिक अभी उस के होश में आने में समय था.

आफरीन अगले दिन काम पर नहीं गई, मन जो उचाट था. दूसरे दिन ही अस्पताल जा पहुंची और पीडि़ता का हाल जाना. पीडि़ता की आंखों में आंसू थे, जो सिर्फ दर्द बयां कर रहे थे. वह बोल तो नहीं सकती थी, पर लिख तो सकती?है, यह खयाल आते ही आफरीन ने उसे अपना पैन और कौपी दी, जिस पर पीडि़ता ने बड़ी मुश्किल से एक मोबाइल नंबर लिखा और एक कार का नंबर.

मोबाइल नंबर उस लड़की के पिताजी का था, जिन्हें आफरीन ने सीधे अस्पताल आने को कहा और कार का नंबर उस गाड़ी का रहा होगा, जिन लोगों ने उस का रेप कर के उसे बीच रास्ते में फेंक दिया होगा.

इंटरनैट और तकनीक के दौर में कार के असली मालिक का पता लगाना कोई मुश्किल काम नहीं था. आफरीन ने गाड़ी के मालिक का पता लगाया तो उसे पता चला कि गाड़ी का मालिक और कोई नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक का बेटा है.

‘‘नाम इतना बड़ा और काम इतना नीच…’’ तिलमिला उठी थी आफरीन, ‘‘पर, ऐसे भेडि़यों को सजा दिला कर रहूंगी मैं.’’

‘‘पर, तू क्या सजा दिलाएगी उन लोगों को जिन्होंने एक लड़की पर बिलकुल भी दया नहीं दिखाई और उलटा उस की जीभ ही काट ली और फिर मत भूल कि तू इस बड़े और अजनबी शहर में अकेली रह रही है और यहां कोई भी नहीं है जो तेरा साथ दे, तेरे पास सुबूत भी क्या?है उस विधायक के बेटे के खिलाफ?’’ अपनेआप से ही सवाल किया था आफरीन ने.

आफरीन ने अपने हैंडबैग में हाथ डाला तो उस नौजवान का कार्ड हाथ में आ गया, जिस ने आफरीन की मदद की थी. उस का नाम अनुभव शर्मा था और वह उसी विधायक का सचिव था, जिस के बेटे ने रेप किया था.

‘‘तो मुझे सुबूत के लिए अनुभव से मिलना होगा,’’ ऐसा सोच कर आफरीन दिए गए पते पर चली गई और अनुभव से मुलाकात कर उस से मदद मांगी.

‘‘जी बिलकुल. मैं आप की पूरी तरह से मदद करूंगा, पर भला क्या मदद चाहिए आप को?’’

‘‘दरअसल, उस दिन आप ने इस लड़की को अस्पताल पहुंचाने में मेरी मदद की थी. मैं ने उस लड़की से जबरदस्ती करने वाले का पता लगा लिया है और मैं उन लोगों को सजा दिलाना चाहती हूं,’’ आफरीन ने कहा.

‘‘जी, ऐसे लोगों को सजा जरूर मिलनी चाहिए, पर वह कमीना है कौन और कहां रहता है?’’ अनुभव ने पूछा, तो बदले में आफरीन ने उस गाड़ी का नंबर आगे कर दिया, जिसे देख कर अनुभव को समझते देर नहीं लगी कि आफरीन क्या कहना चाह रही है.

‘‘पर आफरीनजी, मैं इन लोगों के लिए काम करता हूं और बदले में ये लोग मुझे पैसे देते हैं. भला मैं इन से गद्दारी कैसे कर सकता हूं?’’

अनुभव की बातें सुन कर आफरीन को धक्का सा लगा था. वह कुछ बोल तो न सकी, पर उस की कश्मीरी आंखों में झील सी लहरा आई थी.

‘‘आप मेरी मजबूरी को समझिए आफरीनजी,’’ अनुभव ने कहा.

‘‘जी हां, आप मर्दों की मजबूरी मैं खूब समझती हूं और आप भला क्यों मजबूर होंगे. वह लड़की आप की रिश्ते में कुछ भी तो नहीं लगती थी, पर भला तब भी आप अपनी मजबूरी इसी तरह तब जाहिर करते जब वह पीडि़ता आप की बहन या बेटी होती?’’ आफरीन गुस्से से बोली और वहां से उठ कर चली गई और अनुभव उसे देखता रह गया.

रेप की उस पीडि़ता के परिवार वालों का बुरा हाल था. खुद पीडि़ता जिंदगी और मौत की जंग लड़ रही थी. पुलिस सुबूतों की कमी में खामोश थी और आफरीन के अंदर अब भी बेचैनी थी.

रात के 9 बजे अनुभव ने आफरीन को फोन कर के उस से मिलने की इच्छा जाहिर की, तो आफरीन ने बेहिचक हो कर उसे अपने फ्लैट पर बुला लिया.

‘‘आफरीन जी देखिए, उस दिन आप की बातों ने मेरे जमीर पर गहरी चोट पहुंचाई थी, पर उस दिन मैं अपनी ड्यूटी पर था और चाह कर भी आप की मदद नहीं कर सकता था. पर आज मैं उस विधायक की नौकरी को लात मार आया हूं और आप के मिशन में आप के साथ हूं. बताइए, मुझे क्या करना होगा?’’

‘‘मुझे आप सिर्फ उस विधायक के बेटे के बारे में कुछ जानकारी दीजिए, मसलन, वे लोग क्या करते हैं? कैसे आदमी हैं? वगैरह…’’

‘‘वे लोग अपनी राजनीति के लिए कुछ भी कर सकते हैं. रेप और खून करना उन के लिए आम बात है और मैं तो आप से यही कहूंगा कि उन लोगों से अपना ध्यान हटा कर आप अपना काम करें तो बेहतर होगा,’’ अनुभव ने आगे बोलना शुरू किया.

देशद्रोही आफरीन- भाग 1: क्या थी उसकी कहानी

‘‘राजनीति का एक रूप यह भी हो सकता है… और वे लोग इस हद तक भी जा सकते हैं… मैं ने कभी नहीं सोचा था,’’ जेल की एक सीलन भरी कोठरी में पड़ी हुई एक लड़की बुदबुदा उठी थी.

वह लड़की, जिस का नाम आफरीन था, को देख कर कोई भी कह सकता था कि उस के चेहरे का उजलापन चांद को भी मात करता होगा, पर अब इस उजलेपन पर अमावस की छाया पड़ गई थी और उस का चेहरा बुझ सा गया था, उस की आंखों को काले गड्ढों ने आ कर दबोच लिया था.

आफरीन के शरीर में जवानी के जितने भी प्रतीक थे, वे सारे अब उस की बदहाली बतलाते थे और भला ऐसा होता भी क्यों न. बेचारी आफरीन पर देशद्रोह का आरोप जो लगा था. जी हां, देशद्रोह का.

अपने देश भारत के दुश्मन पाकिस्तान को ‘जिंदाबाद’ कहने का आरोप लगा था आफरीन पर.

पर आफरीन ही क्यों? भला कोई भी सच्चा भारतीय ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे क्यों लगाएगा?

आफरीन का जन्म कश्मीर में हुआ था. उस के अब्बू का सूखे मेवों का कारोबार था. आफरीन की नानी पाकिस्तान के लाहौर से थीं, जो बंटवारे के बाद भारत में आ गई थीं और तब से यहीं रह रही थीं.

आफरीन का बचपन लाहौर और पाकिस्तान की बातें और कहानियां सुन कर बीता था. नानी को जब भी समय मिलता, वे अपने लाहौर की मीठी यादों में खो जातीं. आफरीन को लाहौर की हर एक छोटीछोटी बातें बतातीं और अपनी यादें बांटतीं. बचपन में आफरीन को नानी की बातों से कभी यह अहसास नहीं हुआ कि पाकिस्तान एक दुश्मन देश है.

‘अगर नानी का पाकिस्तान इतना ही अच्छा है तो इन दोनों देशों में हमेशा ही जंग क्यों जारी रहती है? क्यों दोनों ही तरफ के लोग मारे जाते हैं? कितना अच्छा हुआ होता कि पाकिस्तान का जन्म ही नहीं हुआ होता, फिर तो दोनों तरफ इतनी नफरत ही न होती,’ आफरीन ऐसी बातें अकसर सोचती थी, पर भला सियासत करने वालों को इन सब जोड़ने वाली बातों से क्या सरोकार, उन्हें तो लोगों को तोड़ कर ही अपनी सियासत चमकाने में मजा आता है.

नानी की बड़ी इच्छा थी कि वे मरने से पहले एक बार लाहौर हो आएं, पर उन की यह इच्छा तब उन के साथ ही सुपुर्देखाक हो गई, जब वे एक लंबी बीमारी के बाद इस दुनिया को छोड़ कर चली गईं.

आफरीन ने दिल्ली आ कर पढ़ाई की और वकालत करने के बाद इसे ही अपना पेशा बना लिया.

एक दिन काम में काफी बिजी रहने के बाद जब रात के 10 बज गए, तो आफरीन ने एक कैब ली और रोहतास एन्क्लेव में अपने फ्लैट की ओर जाने लगी. अभी वह अपने औफिस से कुछ ही दूरी पर पहुंची थी कि उस ने देखा कि सड़क के बीचोंबीच कोई पड़ा हुआ है.

‘‘लगता है, किसी का एक्सीडैंट हुआ है… पर कमाल है कि इतनी गाडि़यां आजा रही हैं, पर इस को मदद देने का समय किसी के पास नहीं?है,’’ आफरीन बुदबुदा उठी थी.

‘‘भैया, जरा गाड़ी रोकना,’’ गाड़ी रुकवा कर आफरीन उस आदमी के पास गई.

और उस के बाद जो आफरीन ने देखा, वह देख कर उस की चीख निकल गई. वह एक लड़की थी, जो बिलकुल नंगी हालत में सड़क पर फेंक दी गई थी. देखने से ही लगता था कि उस के साथ रेप हुआ है. लड़की के मुंह से लगातार ढेर सारा खून निकल रहा था.

आफरीन को कुछ समझ नहीं आया. वह थोड़ा घबराई थी. उस ने देखा कि अभी उस लड़की की सांसें चल रही थीं यानी अगर अभी उसे समय रहते अस्पताल पहुंचा दिया जाए तो उस की जान बच सकती है. आफरीन ने कैब वाले को मदद के लिए बुलाया.

‘‘अरे क्या मैडम, इस को अस्पताल ले जा कर क्यों लफड़े में पड़ती हो? और वैसे भी यह रेप का केस लगता है… मैं किसी तरह के पचड़े में नहीं पड़ना चाहता… जो आप की मरजी हो करो. मैं यहां से जा रहा हूं,’’ इतना कह कर कैब ड्राइवर तेजी से चला गया.

हैरान हो गई थी आफरीन, ‘‘क्या वाकई इनसानियत मर गई थी… एक कैब ड्राइवर एक पीडि़ता को अस्पताल तक नहीं पहुंचा रहा है…’’

आफरीन के अगलबगल से गाडि़यां निकल रही थीं, पर कोई भी रुक कर इस लड़की का हाल तक नहीं पूछना चाह रहा है, पर कुछ भी हो जाए, मैं इस लड़की को अस्पताल तो पहुंचा कर ही रहूंगी,’’ सब से पहले तो आफरीन ने मोबाइल फोन से पुलिस को फोन लगाया, तो पुलिस ने जल्द से जल्द वहां पहुंचने का यकीन दिलाया.

‘‘अगर पुलिस को आने में देर हुई तो ज्यादा खून बहने के चलते यह लड़की मर भी सकती है,’’ यह सोच कर आफरीन ने लोगों को हाथ हिला कर मदद की गुहार लगानी शुरू की, आटोरिकशा और कैब वालों को भी रोका, पर सब बेकार रहा. तकरीबन एक घंटा हो चुका था, पुलिस का कहीं अतापता नहीं था.

इस बीच आफरीन ने लड़की के मुंह से बहता हुआ खून रोकने के लिए रूमाल लड़की के मुंह पर लगाया, तो उसे एहसास हुआ कि खून की एक धार लगातार उस के मुंह से बाहर आ रही थी. वह लड़की चाह कर भी कुछ बोल नहीं पा रही थी. दरिंदों ने रेप करने के बाद उस लड़की की जीभ ही काट दी थी.

‘‘शायद मैं इस लड़की को बचा नहीं पाऊंगी… कोई भी मदद को नहीं रुक रहा है… पर क्या करूं… मैं इसे छोड़ कर जा भी तो नहीं सकती… मेरा जमीर मुझे इस की इजाजत नहीं दे रहा है,’’ अपनेआप से ही बातें कर रही थी आफरीन.

तभी किसी ने रोड के किनारे अपनी लंबी सी कार रोकी. उस में से एक नौजवान निकला और फौरन आफरीन के पास पहुंचा.

‘‘जी कहिए… क्या कोई हादसा हुआ?है… उफ,’’ लड़की के नंगे शरीर और बहते खून को देख कर वह नौजवान भी परेशान हो उठा था. वह जल्दी से अपनी गाड़ी में रखा हुआ एक कपड़ा निकाल कर लाया और लड़की के शरीर को ढक दिया.

‘‘लगता है, किसी ने रेप के बाद इसे फेंक दिया है. क्या आप इसे उठाने में मेरी मदद करेंगी…?’’ उस नौजवान ने आफरीन को देखते हुए कहा.

‘‘जी जरूर,’’ इतना कह कर उन दोनों ने उस लड़की को गाड़ी में लिटा दिया और अस्पताल पहुंचा दिया.

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