मार्मिक बदला – भाग 3 : रौनक से कौनसा बदला लेना चाहती थी रागिनी

‘‘रागिनी का कहना था कि असलम का मतलब सिर्फ खाना बनवाने

और खाने से था. टीवी पर खबर देख कर मेरे और रागिनी के परिवार के लोग भी आ गए थे. रागिनी के घर वालों का तो पता नहीं, लेकिन मैं और मेरे घर वाले रागिनी की बात को मानने को तैयार नहीं थे कि रागिनी का बलात्कार नहीं हुआ है. जब रागिनी के मम्मीपापा जाने लगे तो रागिनी भी उन के साथ जाने को तैयार हो गई. मैं ने भी उसे रोकने की कोशिश नहीं की.’’

‘‘उस के बाद तो संपर्क किया होगा?’’ डा. कबीर ने पूछा.

‘‘डा. रौनक खिसिया गए कि उसी ने संपर्क किया था यह बताने को कि वह मां बनने वाली है… मैं ने छूटते ही कहा कि फिर तो पक्का हो गया कि उस के साथ बलात्कार हुआ था, क्योंकि मेरा बच्चा होने का तो सवाल ही नहीं उठता. मैं तो बेहद एहतियात बरतता था. सुन कर उस ने फोन रख दिया. उस के बाद आपसी सम झौते से हमारा तलाक हो गया. इसी बीच मु झे एमडी में दाखिला मिल गया और मैं ने खुद को पढ़ाई और फिर काम में  झोंक दिया.’’

‘‘रागिनी का हालचाल मालूम नहीं किया?’’

डा. रौनक ने इनकार में सिर हिलाया.

‘‘जिस गांव जाना नहीं उस की राह क्यों पूछता और पूछता भी किस से? एमडी करने वैल्लोर गया था, फिर वहीं से स्पैशलाइजेशन करने विभिन्न देशों में घूमता रहा सो किसी ऐसे से संपर्क ही नहीं रहा जो रागिनी के संपर्क में हो.’’

‘‘घर वालों ने शादी के लिए नहीं कहा?’’

‘‘पहली शादी के लिए ही जल्दी मचाते हैं सब लोग जो मैं ने खुद ही जल्दी मचा कर करवा ली थी. एमडी करने के दौरान ही मम्मीपापा चल बसे थे. रिश्तेदारों को दूसरी शादी करवाने का उत्साह नहीं होता और अपने को तो अकेले रहने की आदत पड़ चुकी है. बहुत देर हो गई है डा. कबीर, कमरे में चल कर आराम करना चाहिए शुभ रात्रि,’’ कह कर डा. रौनक ने हाथ मिलाया और अपने कमरे की ओर बढ़ गए.

डा. कबीर को उन का रवैया बहुत गलत लगा और उन की सहानुभूति अवहेलना में बदल गई. अगले रोज सिवा औपचारिक अभिवादन के उन्होंने डा. रौनक से कोई बात नहीं की. सम्मेलन खत्म होने के बाद सब अपनेअपने शहर लौट गए. प्राय सालभर बाद डा. कबीर को अपने भतीजे आलोक की शादी में अमृतसर जाना पड़ा. वहां शादी से पहले एक समारोह में उन के भाई ने उन्हें अपने पड़ोसी डा. भुपिंदर सिंह से मिलवाया. डा. कबीर को नाम कुछ जानापहचाना सा लगा. इस से पहले कि वे कुछ सोच पाते, उन की भतीजी ने डा. भुपिंदर सिंह से पूछा, ‘‘और सब नहीं आए अंकल?’’

‘‘सासबहू तो अपनी समाजसेवा से लौटने के बाद ही आएंगी, रूपिंदर टैनिस खेल कर आ गया है अभी कपड़े बदल कर आता होगा.’’

सासबहू और समाजसेवा… तार जुड़ते से लगे… डा. सतीश के दोस्त

भुपिंदर सिंह ही लगते हैं आतंकवाद के बैनिफिशियरी डा. कबीर दिलचस्पी से उन के पास ही बैठ गए. औपचारिक बातचीत खत्म भी नहीं हुई थी कि एक किशोर को देख कर डा. कबीर को जैसे करंट छू गया. हूबहू डा. रौनक की फोटोकौपी.

‘‘मेरा बेटा रूपिंदर, टैनिस की अंडर नाइनटीन प्रतियोगिता में भाग लेने की तैयारी कर रहा है,’’ डा भुपिंदर सिंह ने गर्व से बताया.

‘‘आई सी. और कितने बच्चे हैं आप के?’’

‘‘बस यही है जी, सवा लाख के बराबर एक. असल में इस के जन्म के बाद मम्मी ने इस की मां को अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी करने में लगा दिया. एमबीबीएस तो कर ही चुकी थी, एमडी करने में व्यस्त हो गई और फिर स्पैशलाइजेशन के लिए हम दोनों ही विदेश चले गए और इन्हीं व्यस्तताओं के चलते रूपिंदर को भाईबहन दिलवाने का समय निकल गया.’’

हालांकि डा. रौनक ने यह नहीं बताया था कि उन की पत्नी भी डाक्टर थी. डा. कबीर को यकीन था कि वह रागिनी है और यह यकीन कुछ ही देर में पक्का हो गया जब किसी फैशन मैगजीन में छपी महिला की तसवीर से डा. भुपिंदर सिंह ने उन का परिचय करवाया, ‘‘मेरी पत्नी रागिनी और रागिनी ये आलोक के चाचा डा. कबीर पाल हैं.’’

रागिनी ने शालीनता से हाथ जोड़े और कहा, ‘‘आलोक के चाचा होने के नाते आप का हमारे घर आना भी बनता है भाई साहब, जाने से पहले आप जरूर आइएगा.’’

‘‘जी, जरूर. पत्नी यहीं कहीं होगी भाभीजी के आसपास, उन से मिलने पर सब तय कर लीजिएगा,’’ डा. कबीर ने विनम्रता से कहा और मन ही मन सोचा कि आप से तो मु झे अकेले में मिलना ही है… पिछले वर्र्ष सुनी एकतरफा कहानी का दूसरा पहलू जानने को.

पड़ोस में रहने वाली डाक्टर रागिनी कहां काम करती हैं यह पता लगाना मुश्किल नहीं था और यह भी कि किस समय वे अपेक्षाकृत कम व्यस्त होती हैं.

शादी के अगले रोज लंच के बाद डा. कबीर रागिनी के हस्पताल पहुंच गए. रागिनी लंच के बाद अपनी कुरसी पर ही सुस्ता रही थी. डा. कबीर को देख कर चौंकना स्वाभाविक था. डा. कबीर ने बगैर किसी भूमिका के बताया कि कैसे पिछले वर्ष एक मैडिकल कौन्फ्रैंस में उन की मुलाकात डा. रौनक से हुई थी और उन्होंने अपने को आतंकवाद का शिकार बताया था. उस के बाद डा. सतीश ने अपने एक दोस्त के बारे में बताया, जो आंतकवाद की शिकार युवती से शादी कर के बहुत खुश था.

‘‘डा. रौनक की कहानी सुन कर मु झे लगा कि वे आतंकवाद के शिकार नहीं अपने वहम और पूर्वाग्रहों के शिकार हैं,’’ डा. कबीर ने कहा, ‘‘यहां आने पर रूपिंदर को देख कर मैं सम झ गया कि आतंकवाद के जिस बैनिफिशियरी का जिक्र डा. सतीश कर रहे थे वे आप के पति ही हैं. बस, जिज्ञासावश डा. रौनक से सुनी कहानी का दूसरा पहलू सुनने चला आया हूं. अगर आप को बुरा लगा हो तो धृष्टता के लिए क्षमा मांग कर चला जाता हूं.’’

‘‘अरे नहीं भाई साहब, आप पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने मु झ से बगैर मिले रौनक को गलत कहा है सो अब तो आप न भी चाहें तो भी मैं आप को अपनी कहानी सुनाऊंगी ही,’’ रागिनी हंसी.

‘‘एलकेजी से एमबीबीएस तक का सफर मैं ने और रौनक ने साथ ही तय किया था, जाहिर है ंिंजदगी का सफर भी साथ ही तय करना था, लेकिन एमडी करने के बाद जब तक एमडी में दखिला नहीं मिलता तब तक तो नौकरी करनी ही थी. मु झे संयोग से अपने शहर में ही नौकरी मिल गई, लेकिन रौनक को जम्मू के एक सीमावर्ती गांव में हालांकि उस गांव में मेरे लिए कोई काम नहीं था फिर भी रौनक के अकेलेपन के रोने से द्रवित हो कर मैं ने मम्मीपापा को शादी के लिए मना लिया. उस रात जो हुआ वह अप्रत्याशित था, लेकिन उस से भी ज्यादा अप्रत्याशित था रौनक का व्यवहार.

‘‘रौनक के जाते ही घुसपैठियों ने मु झे चाय और फिर दालचावल बनाने को कहा. वे लोग खाना खा ही रहे थे कि पुलिस आ गई और खाना छोड़ कर उन्होंने खिड़कियों पर मोरचा संभाल लिया और आतेजाते मु झ पर लातघूसों की बौछार करते रहे. उन्हें इतना समय ही कहां मिला कि मेरे साथ कुछ करते, इस का सुबूत अधखाया खाना और चाय के जूठे बरतन थे.

‘‘उसी रौनक ने जिस ने यह कह कर शादी की थी कि वह मेरे बिना जीने की

कल्पना भी नहीं कर सकता, मु झ पर और सुबूतों पर यकीन करने से इनकार कर दिया. एक डाक्टर होने के नाते क्या रौनक को मालूम नहीं है कि कोई भी गर्भनिरोधक उपाय शतप्रतिशत सुरक्षित नहीं होता. खैर, सब के सम झाने के बावजूद मैं ने गर्भपात नहीं करवाया.

‘‘उस हालत में न तो नौकरी कर सकती थी न ही पढ़ाई, मगर खाली घर बैठना भी नहीं चाहती थी सो मैं ने समय काटने के लिए एक एनजीओ जौइन कर लिया. वहां की संचालिका स्नेहदीप कौर ने मु झे अपने पुत्र के लिए पसंद कर लिया और पुत्र ने भी यह कह कर किसी का भी बच्चा होने दो, कहलाएगा तो यह मेरा बच्चा ही और मैं इसे इतना अच्छा इनसान बनाऊंगा. मु झे शादी के लिए मना लिया. संयोग से रूपिंदर पासपड़ोस में भी सभी का चहेता है.

‘‘वैसे तो मैं रौनक को भूल चुकी हूं और मन ही मन उन घुसपैठियों का भी धन्यवाद करती हूं, जिन के कारण मु झे भुपिंदर जैसे पति और स्नेहदीप जैसी सास मिलीं, जिन के सहयोग से मैं आज एक जानीमानी गाइनौकोलौजिस्ट हूं, मगर अभी भी यदाकदा रौनक का व्यवहार याद कर के तिलमिला जाती हूं और उस से बदला लेने को जी चाहता है. आप के पास रौनक का पता है?’’

‘‘संपर्क तो नहीं रखा उस से, लेकिन यह तो जानता ही हूं कि कहां काम करता है. मिलना चाहेंगी उस से?’’

‘‘कदापि नहीं. बस उस से मूक बदला लेने को रूपिंदर की तसवीर भेजना चाहूंगी यह सिद्ध करने को कि न तो गर्भनिरोधक उपायों पर विश्वास करना चाहिए और न ही बचपन के प्यार पर जो करने की भूल मैं ने करी थी.’’

डा. कबीर ने चुपचाप एक कागज पर डा. रौनक का पता लिख दिया.

 

प्यार में खलल डालने वाली सीक्रेट वाइफ- भाग 2

नरसिंह के 2 लड़कियों से संबंध होने की जानकारी मिलने पर पुलिस ने उन में छिपे प्रेम त्रिकोण की कहानी का अनुमान लगाया. इस की आशंका भी हुई कि रानी इसी प्रेम त्रिकोण के चलते मारी गई होगी. नरसिंह द्वारा रानी को अस्पताल लाने के कारण वह पहले से ही संदेह के दायरे में आ चुका था.
फिर क्या था, एसपी डा. शिवदयाल ने कोतवाली पुलिस को नरसिंह से गहन पूछताछ के निर्देश दिए. नरसिंह को हिरासत ले लिया गया. पूछताछ की शुरुआत में तो उस ने खुद को निर्दोष बताया, लेकिन जब उसे कुछ बातें रितु के साथ प्रेम संबंध और रानी से सीक्रेट शादी के बारे में बताई गईं, तब वह मानसिक दबाव में आ गया. और फिर वह लोगों से छिपाए सच को मन में दबाए नहीं रख सका. उस ने रानी के साथ गुप्त शादी और रितु से प्रेम संबंध की बात उगल दी.

उस ने पुलिस को यह भी बताया कि रानी के साथ उस की शादी की जानकारी होने पर ही रितु उस से नफरत करने लगी थी. इस कारण ही रितु ने रानी को मारने का काम किया.इस तरह नरसिंह ने रितु पर रानी की हत्या का आरोप लगाते हुए बताया कि इस में उस ने अपनी एक सहेली प्रियंका की मदद ली. रानी के बेहोश होने की जानकारी उसी ने दी थी. फिर वह भागाभागा सीधा रानी के कमरे पर गया था और उसे बेहोश जान कर उपचार के लिए अस्पताल ले गया.

कई युवतियों से चल रहा था प्रेम प्रसंग

नरसिंह से मिली जानकारी पर पुलिस ने समय गंवाए बगैर रितु और उस की सहेली प्रियंका को भी हिरासत में ले लिया. साथ ही चुन्नी भी बरामद कर ली गई, जिस की मदद से दोनों ने रानी का गला घोटा था. उन दोनों ने भी अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. उस के बाद तीनों आरोपियों को अदालत में पेश कर दिया गया. वहां से सभी न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिए गए.इस तरह से रानी की मौत के बाद नरसिंह के कारनामे की जो कहानी सामने आई, उस में 3 युवतियों की जिंदगियां शामिल थीं. प्रेम संबंध चतुष्कोणीय बने हुए थे तो लिवइन रिलेशन और अवैध विवाह की कहानी भी थी. उस की पूरी दास्तान इस प्रकार जगजाहिर हुई—

देवास के हेमंतराव मार्ग निवासी नरसिंह उर्फ बबलू की परमार्थी मेन मार्केट में एक मैडिकल स्टोर है. उस की शादी 14 साल पहले हो चुकी है. खूबसूरत पत्नी और 3 बच्चे हैं. उन की पारिवारिक जिंदगी मजे में कट रही थी, फिर भी उस के दिल को सुकून नहीं था.दरअसल, नरसिंह किशोरावस्था से ही दिलफेंक किस्म का रहा है. उस के दोस्तों की मानें तो शादी से पहले उस ने कई लड़कियोंं को अपने प्रेमजाल में फंसा रखा था. वह बात करने की लच्छेदार शैली और मधुरता से थोड़े समय में ही किसी भी लड़की को अपना दीवाना बना लेता था. पहनावा भी अच्छा होता था. धनवान की तरह दिखता था. हमेशा उस के कपड़े से भीनीभीनी इत्र की खुशबू आती रहती थी.

लड़कियों पर प्रेम जाल फेंकने की हरकत से उस के घर वाले भी चिंतित हो गए थे. मोहल्ले की लड़कियों को छेड़ने की शिकायतें आने पर पिता ने 19 साल की उम्र में ही उस की शादी कर दी थी.खूबसूरत बीवी पा कर वह खुश हो गया था. कुछ सालों में ही 3 बच्चों का बाप भी बन गया. पत्नी बच्चों को संभालने में लग गई और वह पहले जैसे प्यार में कमी महसूस करने लगा. पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझी पत्नी की जब रोमांस में नीरसता आने लगी, तब नरसिंह तन्हाई की जिंदगी पा कर तड़प उठा.

उस की नजर दूसरी लड़कियों की तरफ घूमने लगी. नए दौर के प्यार के बोल और नई बाहों की तलाश करने लगा. संयोग से उस के मैडिकल स्टोर पर कई कमसिन लड़कियां अपनी निजी जरूरतों का सामान खरीदने आती थीं. नरसिंह उन से काफी घुलमिल कर बातें करने के साथसाथ कीमत में भी अतिरिक्त छूट दे दिया करता था.दुकान पर अकसर आने वाले लड़कियों में रितु भी थी. वैसे तो नरसिंह ने कई लड़कियों को अपनी चिकनीचुपड़ी बातों और व्यवहार से आकर्षित कर लिया था, लेकिन रितु पर उस का असर कुछ अधिक ही हुआ था.

शादीशुदा रितु भी फंस गई जाल में

उस वक्त रितु 23 साल की थी और नरसिंह 26 साल का था. दोनों युवा दिलों की धड़कनों से वाकिफ थे. रितु की नईनई शादी हुई थी और वह किसी से भी बात करने में संकोच नहीं करती थी. दूसरों के बारे में जानने की जिज्ञासा रखती थी.वह बेहद खूबसूरत और स्मार्ट थी. उस की सुंदरता और लटकेझटके देख कर नरसिंह भी उस का दीवाना बन गया था. एक बार बातोंबातों में उस ने बताया कि वह एक ज्वैलर्स की दुकान पर सेल्सगर्ल की नौकरी करती है.

उन की प्रेम कहानी की शुरुआत करीब 7 साल पहले बारिश के मौसम में उस वक्त शुरू हुई थी, जब रितु कुछ सामान खरीदने नरसिंह के मैडिकल स्टोर पर आई थी. तेज बारिश शुरू होने के कारण वह काफी समय तक उस की दुकान में रुकी रही थी. बारिश रुकने का इंतजार कर रही थी. उस वक्त तेज बारिश के कारण दुकान पर दूसरे ग्राहक भी नहीं आ रहे थे.इस मौके का फायदा नरसिंह ने मजे लेले कर उठाया. रितु के साथ खूब बातें कीं. उन के बीच इधरउधर की बातों के साथसाथ प्यारमोहब्बत की भी बातें होने लगीं.
नरसिंह ने उस की खूबसूरती के पुल बांध दिए. मेकअप से ले कर फिटिंग ड्रेस के फबने की तारीफ की. यहां तक कि उस की तुलना कैटरीना कैफ और प्रियंका चोपड़ा तक से कर दी.

जब नरसिंह ने उसे अच्छी दिखने वाली सैक्सी मौडल कहा, तब वह शरमा गई. रितु बारिश रुकने के बाद जाने लगी, तब नरसिंह एक पर्ची पर अपना मोबाइल नंबर लिख कर देते हुए बोला, ‘‘जब भी जरूरत हो काल कर लेना. जरूरी सामान भिजवा दूंगा.’’‘‘क्यों, मेरा आना अच्छा नहीं लगेगा?’’ रितु मजाकिया आंदाज में बोली.तब नरसिंह ने तुरंत उस का हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘‘ऐसा क्यों बोलती हो? मैं तो चाहता हूं कि तुम रोज कम से कम एक बार आओ…’’‘‘तो फिर हाथ छोड़ो, अभी चलती हूं. बहुत देर हो चुकी है. मैं काल करूंगी, नंबर सेव कर लेना.’’ कहती हुई रितु चली गई.

तुम मेरी हो: क्या शीतल के जख्मों पर मरहम लगा पाया सारांश- भाग 1

सारांश का स्थानांतरण अचानक ही चमोली में हो गया. यहां आ कर उसे नया अनुभव हो रहा था. एक तो पहाड़ी इलाका, उस पर जानपहचान का कोई भी नहीं. पहाड़ी इलाकों में मकान दूरदूर होते हैं. दिल्ली जैसे शहर में रह कर सारांश को ट्रैफिक का शोर, गानों की आवाजें और लोगों की बातचीत के तेज स्वर सुनने की आदत सी पड़ गई थी. किंतु यहां तो किसी को देखने के लिए भी वह तरस जाता था. जिस किराए के मकान में वह रह रहा था, वह दोमंजिला था. ऊपर के घर से कभीकभी एक बच्चे की मीठी सी आवाज कानों में पड़ जाती थी. पर कभी आतेजाते किसी से सामना नहीं हुआ था उस का.

उस दिन रविवार को नाश्ता कर के वह बाहर लौन में कुरसी पर आ कर बैठ गया. पास ही मेज पर उस ने लैपटौप रखा हुआ था. कौफी के घूंट भरते हुए वह औफिस का काम निबटा रहा था, तभी अचानक मेज पर रखे कौफी के मग में ‘छपाक’ की आवाज आई. सारांश ने एक तरफ जा कर कौफी घास पर उड़ेल दी. इतनी देर में ही पीछे से एक बच्चे की प्यारी सी आवाज सुनाई दी, ‘‘अंकल, मेरा मोबाइल.’’

सारांश ने मुड़ कर बच्चे की ओर देखा और मुसकराते हुए पास रखे टिशू पेपर से कौफी में गिरे हुए फोन को साफ करने लगा.

‘‘लाइए अंकल, मैं कर लूंगा,’’ कहते हुए बच्चे ने अपना नन्हा हाथ आगे बढ़ा दिया.

किंतु फोन सारांश ने साफ कर दिया और बच्चे को थमा दिया. बच्चा जल्दी से फोन को औन करने लगा. लेकिन कईर् बार कोशिश करने के बाद भी वह औन नहीं हुआ. बच्चे का मासूम चेहरा रोंआसा हो गया.

उस की उदासी दूर करने के लिए सारांश बोला. ‘‘अरे, वाह, तुम्हारा फोन तो छलांग मार कर मेरी कौफी में कूद गया था. अभी स्विमिंग पूल से निकला है, थोड़ा आराम करने दो, फिर औन कर के देख लेना. चलो, थोड़ी देर मेरे पास बैठो, नाम बताओ अपना.’’

‘‘अंकल, मेरा नाम प्रियांश है,’’ पास रखी दूसरी कुरसी पर बैठता हुआ वह बोला, ‘‘पर यह मोबाइल औन क्यों नहीं हो रहा, खराब हो गया है क्या?’’ चिंतित हो कर वह सारांश की ओर देखने लगा.

‘‘शायद, पर कोई बात नहीं. मैं तुम्हारे पापा से कह दूंगा कि इस में तुम्हारी कोई गलती नहीं है, अपनेआप छूट गया था न फोन तुम्हारे हाथ से?’’

‘‘हां अंकल, मैं हाथ में फोन को पकड़ कर ऊपर से आप को देख रहा था,’’ भोलेपन से उस ने कहा.

‘‘फिर तो पापा जरूर नया फोन दिला देंगे तुम्हें. हां, एक बात और, तुम इतने प्यारे हो कि मैं तुम्हें चुनमुन नाम से बुलाऊंगा, ठीक है?’’ सारांश ने स्नेह से प्रियांश की ओर देखते हुए कहा.

‘‘बुला लेना चुनमुन कह कर, मम्मी भी कभीकभी मुनमुन कह देती हैं मु झे. पर मेरे पापा तो बहुत दूर रहते हैं. मु झ से कभी मिलने भी नहीं आते. अब मैं नानी से फोन पर बात कैसे करूंगा?’’ कहते हुए चुनमुन की आंखें डबडबा गईं.

सारांश को चुनमुन पर तरस आ गया. प्यार से उस के गालों को थपथपाता हुआ वह बोला, ‘‘चलो, हम दोनों बाजार चलते हैं, मैं दिला दूंगा तुम को मोबाइल फोन.’’

‘‘पर अंकल, मेरी मम्मी नहीं मानेंगी न,’’ चुनमुन ने नाक चढ़ाते हुए ऊपर अपने घर की ओर इशारा करते हुए कहा.

‘‘अरे, आप की मम्मी को मैं मना लूंगा. हम दोनों तो दोस्त बन गए न, तुम्हारा नाम प्रियांश और मेरा सारांश. चलो, तुम्हारे घर चलते हैं,’’ कहते हुए सारांश ने चुनमुन का हाथ थाम लिया और सीढि़यों पर चढ़ना शुरू कर दिया.

दरवाजे पर नाइटी पहने खड़ी गौरवर्ण की आकर्षक महिला शायद चुनमुन का इंतजार कर रही थी. सारांश को देख कर वह एक बार थोड़ी सकपकाई, फिर मुसकरा कर अंदर आने को कहती हुई आगेआगे चलने लगी. भीतर आ कर सारांश ने अपना परिचय दिया.

उस के बारे में वह केवल इतना ही जान पाया कि उस का नाम शीतल है और पास के ही एक विद्यालय में अध्यापिका है. चुनमुन ने मोबाइल की घटना एक सांस में बता दी शीतल को, और साथ ही यह भी कि अंकल ने उस का नाम चुनमुन रखा है, इसलिए शीतल भी उसे इसी नाम से बुलाया करे, मुनमुन तो किसी लड़की के नाम जैसा लगता है.

शीतल रसोई में चली गई और सारांश चुनमुन से बातें करने लगा. तब तक शीतल फू्रट जूस ले कर आ गई. सारांश ने शाम को बाजार जाने का कार्यक्रम बना लिया. शीतल को भी बाजार में कुछ काम था. पहले तो वह साथ जाने में थोड़ी  िझ झक रही थी, पर सारांश के आग्रह को वह टाल न सकी.

तीनों शाम को सारांश की कार में बाजार गए और रात को बाहर से ही खाना खा कर घर लौटे. बाजार में चुनमुन सारांश की उंगली पकड़े ही रहा. सारांश भी कई दिनों से अकेलेपन से जू झ रहा था. इसलिए उसे भी उन दोनों के साथ एक अपनत्व का एहसास हो रहा था. शीतल के चेहरे पर आई चमक को सारांश साफसाफ देख पा रहा था. वह खुश था कि पड़ोसी एकदूसरे के साथ किस प्रकार एक परिवार की तरह जु

उस दिन के बाद चुनमुन अकसर सारांश के पास आ जाया करता था, सारांश भी कभीकभी उन के घर जा कर बैठ जाता था. सारांश को शीतल ने बताया कि उस के मातापिता हिमाचल प्रदेश में रहते हैं. ससुराल पक्ष के विषय में उस ने कभी कुछ नहीं बताया. सारांश भी अकसर उन को अपने मातापिता व छोटी बहन सुरभि के विषय में बताता रहता था. पिता दिल्ली में एक व्यापारी थे जबकि छोटी बहन एक साल से मिस्र में अपने पति के साथ रह रही थी.

उस दिन सारांश औफिस में बाहर से आए हुए कुछ व्यक्तियों के साथ व्यस्त था. एक महत्त्वपूर्ण बैठक चल रही थी. उस के फोन पर बारबार चुनमुन का फोन आ रहा था. सारांश ने 3-4 बार फोन काट दिया पर चुनमुन लगातार फोन किए जा रहा था. बैठक के बीच में ही बाहर जा कर सारांश ने उस से बात की.

चुनमुन को तेज बुखार था. शीतल ने डाक्टर को दिखा कर दवाई दिलवा दी थी और लगातार उस के पास ही बैठी थी. पर चुनमुन तो जैसे सारांश को ही अपनी पीड़ा बताना चाहता था. सारांश के दुलार से मिला अपनापन वह अपने नन्हे से मन में थाम कर रखना चाहता था.

मार्मिक बदला – भाग 2 : रौनक से कौनसा बदला लेना चाहती थी रागिनी

‘‘आप लोग जाइए शौपिंग के लिए, मैं डाक्टर रौनक के साथ कुछ समय बिताना चाहूंगा. उन की दुखती रग छेड़ने के बाद उन का ध्यान बंटाना तो बनता है,’’ डा. कबीर ने कहा.

डा. रौनक उन्हें गैस्टहाउस के लौन में ही टहलते हुए मिल गए, उन्होंने धीरे से उन के कंधे पर हाथ रख दिया.

‘‘अरे, आप डा. कबीर?’’ डा. रौनक ने चौंक कर कहा, ‘‘आप तो शौपिंग के लिए गए थे?’’

‘‘मगर यहां परदेश में आप को अकेले उदास छोड़ना अच्छा नहीं लगा सो लौट आया, शौपिंग कल कर लेंगे.’’

‘‘मेरे लिए इतना सोचने के लिए बहुतबहुत धन्यवाद कबीर भाई,’’ डा. रौनक नम्रता से बोले, ‘‘मेरी उदासी तो मेरी परछाईं है, देशपरदेश की साथिन उस के लिए आप अपना प्रोग्राम खराब मत करिए.’’

‘‘काहे का प्रोग्राम यार,’’ डा. कबीर भी अनौपचारिक हो गए, ‘‘हर जगह हर चीज मिलती है, लेकिन चाहे 2 रोज को भी अपने शहर से दूर जाओ फैमिली के लिए वापसी में कुछ ले कर आने का रिवाज बन गया है. बस इसीलिए भाई लोग बाजार चले गए हैं.’’

‘‘आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं, बहुत पुराना रिवाज है यह. पापा जब भी दौरे पर जाते थे तो मां और बहनें अटकलें लगाने लगती थीं कि वे क्याक्या ले कर आएंगे.’’

‘‘और आप की पत्नी?’’

‘‘कह नहीं सकता, क्योंकि उस समय तो मेरी शादी ही नहीं हुई थी और शादी के बाद रागिनी को छोड़ कर कहीं जाना ही नहीं हुआ. बहुत ही कम समय मिला उस के साथ रहने को,’’ डा. रौनक ने गहरी सांस ले कर कहा.

‘‘उफ, आई एम सो सौरी,’’ डा. कबीर का स्वर भीग गया, ‘‘वैसे हुआ कैसे ये सब?’’

‘‘डाक्टर बनते ही पहली पोस्टिंग जम्मू के एक सीमावर्ती गांव में हुई थी. जगह सुंदर थी, खानेपीने की दिक्कत भी नहीं थी, लेकिन अकेलापन बहुत था और उसे ही बांटने के लिए मैं ने रागिनी से शादी कर ली. बहुत मजे में गुजर रही थी जिंदगी.

‘‘एक रात घंटी बजने पर जब मैं ने दरवाजा खोला तो मुंहसिर लपेटे 6-7 लोग

एकदम अंदर घुस आए. उन में से एक बुरी तरह जख्मी था. उन की वेशभूषा से ही मैं सम झ गया कि वे सब सीमापार के घुसपैठिए हैं. एक ने मु झ पर बंदूक तान कर कहा कि मैं उन के जख्मी साथी का इलाज करूं. उसे देखने के बाद मैं ने कहा कि उस के जख्म बहुत गहरे हैं और इलाज की दवाइयां मेरे पास नहीं हैं. मेरे पास तो तुरंत खून रोकने के लिए बांधने को पट्टी भी नहीं थी.

‘‘बीवी का दुपट्टा फाड़ कर बांधा और अपनी मोटरसाइकिल पर जा कर तुरंत जरूरी दवाइयां लाने को तैयार हो गया.

‘‘रागिनी जो गले से दुपट्टा खींचे जाने पर तिलमिलाई हुई थी चिल्ला कर बोली कि ये कहीं नहीं जाएंगे.’’

‘‘इस का तो बाप भी जाएगा और तेरी तो मैं अभी ऐसी की तैसी करता हूं,’’ दांत किटकिटाता एक बंदूकधारी रागिनी की ओर लपका.

‘‘इसे मारना नहीं हिरासत में रखना है असलम, तभी तो यह डाक्टर दवाइयां ले कर जल्दी से लौटेगा,’’ दूसरे बंदूकधारी ने उसे रोका.

‘‘ठीक कहते हो उस्ताद, तब तक इस औरत से हम खिदमत करवाते हैं. भूखे हैं कब से. चल, डाक्टर फौरन इलाज का सामान ले कर आ और देख पुलिसवुलिस को बुलाने की हिमाकत करी तो तेरी बीवी जिंदा नहीं बचेगी.’’

‘‘मेरे जिंदा रहने की फिक्र मत करना रौनक…’’ रागिनी चिल्लाई.

यही उस की गलती थी. घुसपैठिए सर्तक

हो गए और उन्होंने अपने एक साथी अकरम

को मेरे कपड़े पहना कर मेरी कमर में पिस्तौल सटा कर मेरे पीछे मोटरसाइकिल पर बैठा दिया. इस बीच रागिनी चिल्लाती रही कि मेरी परवाह मत करना.

‘‘उस के चिल्लाने से शायद मेरी हिम्मत बढ़ी और दवा की दुकान पर कई लोगों को देखते ही मैं चिल्ला पड़ा कि यह आतंकवादी है मु झे इस से बचाओ.’’

इस से पहले कि अकरम कुछ कर पाता कुछ लोगों ने उसे दबोच कर उस की पिस्तौल छीन ली. उस के बाद पुलिस और फिर मिलिटरी ने हमारे घर को घेर लिया. घर में चारों तरफ खिड़कियां थी जिन से घुसपैठिए गोलियां दाग कर किसी को घर के पास नहीं फटकने दे रहे थे और घर के करीब न कोईर् दूसरा घर था और न ही कोई पेड़, जिस पर चढ़ कर सिपाही छत पर पहुंच सकते.

‘‘रागिनी ने जिद कर के यह घर लिया ही इसलिए था कि ताक झांक का डर न होने से हम उन्मुक्त हो कर जीया करेंगे. कई घंटों तक अंदर से गोलाबारी बंद होने यानी घुसपैठियों के असले के खत्म होने का इंतजार करने के बाद हार कर हैलिकौप्टर के जरीए कमांडो छत पर उतारे गए. सब घुसपैठियों ने खुद को गोली मार दी.

‘‘रागिनी रसोई के फर्श पर बेसुध पड़ी थी. थोड़े से उपचार के बाद वह ठीक हो गई. उस ने बताया कि पहले तो घुसपैठिए उस से लगातार चाय, खाना बनवाते रहे, लेकिन मकान की घेराबंदी के बाद उन्होंने उस पर लातघूसें बरसाने शुरू कर दिए कि इसी के उकसाने पर डाक्टर पुलिस ले कर आया है. उस का कहना था कि इस के अलावा उन्होंने उस के साथ कुछ गलत नहीं किया. मु झे उस का यह कहना बिलकुल अविश्वसनीय लगा. इतनी खूबसूरत अकेली जवान औरत को कौन ऐसे ही छोड़ेगा और यह कहने के बाद कि यह हमारी खिदमत करेगी, हम भूखे हैं.

गुनाह जो छिप न सका

गुनाह जो छिप न सका- भाग 1

उत्तर प्रदेश के ऊसराहार थाने में सुबह के करीब 10 बजे एक सूचना मिली कि कौआ गांव के नाग देवता मंदिर के पास सड़क किनारे नाली में एक लाश पड़ी है.यह मैसेज पुलिस नियंत्रण कक्ष से प्रसारित किया गया था. थाने में उस समय इमरजेंसी ड्यूटी पर एसआई रामकुमार सिंह मौजूद थे. उन्होंने थानाप्रभारी गंगादास को इस सूचना से अवगत करा दिया. यह बात 22 जुलाई, 2022 की है.

लाश मिलने की खबर से ही थानाप्रभारी गंगादास ने आवश्यक पुलिसकर्मियों को साथ लिया और घटनास्थल की ओर रवाना हो लिए. कौआ गांव से मीसापुरा जाने वाली सड़क पर नागदेव मंदिर के पास खेत किनारे नाली में उन्हें एक महिला की लाश पड़ी मिली. उस की उम्र 35 साल के आसपास थी. वह गुलाबी रंग की साड़ी और काला ब्लाउज पहने थी.

थानाप्रभारी ने शव का बारीकी से निरीक्षण किया तो महिला की दाहिनी कनपटी के ऊपर सिर पर गोली मारी गई थी. जिस जगह शव पड़ा था, वहां से कुछ दूर सड़क पर खून पड़ा था. खून के निशान नाली तक थे. सड़क पर नारियल, चावल, सिंदूर, पूजा सामग्री और टूटी चूडि़यां बिखरी पड़ी थीं. महिला की चप्पलें व पूजा की थाली भी सड़क पर पड़ी थी.

घटनास्थल व लाश का मुआयना करने के बाद थानाप्रभारी इस नतीजे पर पहुंचे कि नाग देवता मंदिर में पूजा कराने का झांसा दे कर महिला को लाया गया और सड़क पर गोली मार कर हत्या कर दी गई. इस के बाद शव को घसीट कर खेत किनारे बनी नाली में डाल दिया गया.

मामले की गंभीरता को देख कर थानाप्रभारी ने इस घटना की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी.
सूचना पाते ही एसएसपी जयप्रकाश सिंह, एसपी (देहात) सत्यपाल सिंह, एएसपी कपिल देव सिंह तथा डीएसपी (भरथना) विजय सिंह घटनास्थल पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने मौकाएवारदात पर डौग स्क्वायड तथा फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया.

पुलिस अधिकारियों ने बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण किया तथा थानाप्रभारी गंगादास से घटना के संबंध में जानकारी ली.फोरैंसिक टीम ने पूजा की थाली से फिंगरप्रिंट लिए. इस के अलावा भी टीम ने कई अन्य सबूत जुटाए. टीम ने खून आलूदा मिट्टी का नमूना भी रासायनिक जांच हेतु सुरक्षित कर लिया. महिला पुलिसकर्मी पूनम ने मृत महिला की जामातलाशी ली, लेकिन कुछ नहीं मिला.फिलहाल पुलिस के लिए सब से बड़ी समस्या लाश की शिनाख्त की थी. घटनास्थल पर कौआ गांव व उस के आसपास के गांव के लोग मौजूद थे. थानाप्रभारी गंगादास ने उन लोगों से पूछताछ की, लेकिन लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी.

थानाप्रभारी को उचित दिशानिर्देश दे कर पुलिस अधिकारी वहां से वापस लौट गए.
थानाप्रभारी ने घटनास्थल की जरूरी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद शव का पोस्टमार्टम हेतु इटावा के जिला अस्पताल भिजवा दिया. फिर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ भादंवि की धारा 302/201 के तहत मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी.

गुनाह जो छिप न सका- भाग 3

थानाप्रभारी गंगादास ने ब्लांइड मर्डर का खुलासा करने तथा आरोपी को गिरफ्तार करने की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी. फिर एसएसपी जयप्रकाश सिंह ने सिविल लाइंस पुलिस सभागार में प्रैसवार्ता की और कातिल सतीश चंद्र यादव के द्वारा एक नहीं, 2 हत्याएं किए जाने का खुलासा किया.
मिथलेश कौन थी? वह सतीश के संपर्क में कैसे आई? सतीश ने मिथलेश और उस के पति गजेंद्र की हत्या क्यों की? यह सब जानने के लिए हम पाठकों को उन के अतीत की ओर ले चलते हैं.

उत्तर प्रदेश के इटावा जिले का एक छोटा सा गांव है रमपुरा. यह ऊसराहार थानांतर्गत आता है. रमपुरा गांव से 2 किलोमीटर दूर नाग देवता का मंदिर है, जो आसपास के दरजनों गांवों में मशहूर है. आषाढ़ माह की पंचमी को यहां मेला लगता है. दरजनों संपेरे सांपों का दर्शन कराने यहां आते हैं.
नाग देवता मंदिर सुनसान जगह पर है. इसी रमपुरा गांव में रामसिंह यादव रहते थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे सतीश चंद्र, उमेश चंद्र तथा एक बेटी उमा थी. राम सिंह किसान थे. किसानी से ही वह अपने परिवार का भरणपोषण करते थे.

नौकरी की तलाश में आया दिल्ली

3 भाईबहनों में सतीश बड़ा था. उस का विवाह कमला नाम की युवती से हुआ था. कमला साधारण रंगरूप की युवती थी. सतीश की उस से नहीं पटती थी. पति की उपेक्षा से कमला ससुराल में कम और मायके में ज्यादा रहती थी. सतीश पढ़ालिखा था, इसलिए उस का मन खेतखलिहान में नहीं लगता था. वह कोई नौकरी कर अपना जीवन खुशहाल बनाना चाहता था.

नौकरी के मकसद से सतीश दिल्ली आ गया. लेकिन यहां उसे मनपसंद नौकरी नहीं मिली. छोटीमोटी नौकरी से जब उस का मन भर गया तो उस ने ड्राइविंग सीख ली. उस ने कुछ दिन आटो चलाया फिर किसी कंपनी की कार चलाने लगा.कुछ समय बाद उसे नोएडा स्थित कटियार ट्रैवल एजेंसी में काम मिल गया और वह वहां टैक्सी चलाने लगा. इस काम में वह रम गया और पैसा कमाने लगा. नोएडा में ही उस ने किराए पर कमरा ले लिया.

सतीश चंद्र यादव जिस ट्रैवल एजेंसी में टैक्सी चलाता था, उसी में गजेंद्र भी टैक्सी चलाता था. चूंकि दोनों ड्राइवर थे, सो उन में खूब पटती थी. रात में अकसर दोनों साथ खातेपीते थे. गजेंद्र राजस्थान के झुंझनू जिले के पचेरी थाना के पचेरी छोटी खुर्द गांव का रहने वाला था. नोएडा में वह पत्नी मिथलेश व 2 बच्चों के साथ किराए के मकान में रहता था.एक रोज सतीश चंद्र गजेंद्र के घर पहुंचा. गजेंद्र उस समय घर पर ही था. गजेंद्र को देख कर सतीश बोला, ‘‘किसी काम से इधर आया था. मैं ने सोचा कि अब आज की चाय भाभी के हाथ की पी कर ही जाऊंगा.’’

‘‘बिलकुल मेरे भाई, चाय भी और नाश्ता भी. आज पहलीपहली बार आया है तो तुझे खाली थोड़ी न जाने दूंगा,’’ कहते हुए गजेंद्र ने सतीश का हाथ पकड़ कर उसे कुरसी पर बिठा लिया. फिर उस ने पत्नी को आवाज दी, ‘‘अरे मिथलेश, जरा 2-3 कप चाय और कुछ नाश्ता बनाओ तो फटाफट.’’
मिथलेश चायनाश्ता तैयार करने लगी तो गजेंद्र और सतीश इधरउधर की बातों में मशगूल हो गए.

पहली ही नजर में दोस्त की पत्नी मिथलेश पर आ गया दिल

कुछ देर बाद मिथलेश चाय और नाश्ता ले कर आई और जब झुक कर ट्रे मेज पर रखने लगी तो सतीश उसे ठगा सा देखता ही रह गया. सतीश सोच में पड़ गया. वह कभी गजेंद्र को देखता तो कभी मिथलेश को. जिस के दिलकश चेहरे पर गजब का आकर्षण था. गजेंद्र उस के सामने कहीं भी नहीं ठहरता था.
वह पहली ही नजर में मिथलेश का ऐसा दीवाना बन गया था कि उसे अपने दिल से निकाल नहीं पाया. इस के बाद तो सतीश अकसर गजेंद्र के घर आनेजाने लगा. वह मिथलेश के लिए उपहार भी लाने लगा.
गजेंद्र की आय इतनी नहीं थी कि वह पत्नी को उपहार आदि दे सके. सतीश ने वह कमी पूरी की तो मिथलेश भी सतीश की ओर आकर्षित हो गई. दोनों के बीच हंसीमजाक भी होने लगी. अब सतीश गजेंद्र की गैरमौजूदगी में भी मिथलेश से मिलने आने लगा.

एक रोज सतीश मिथलेश को अपनी टैक्सी में बिठा कर लक्ष्मीनगर, दिल्ली ले गया. बहाना था शौपिंग का. उसी रोज सतीश ने उसे अपने दिल की बात कह दी. मिथलेश ने भी स्वीकृति दे दी कि वह भी उसे चाहती है. दोनों कुछ देर एक सुनसान पार्क में बैठे रहे. वहीं पहली बार सतीश ने मिथलेश को बांहों में भर कर चूमा था.

गुनाह जो छिप न सका- भाग 2

ब्लाइंड मर्डर ने उड़ाई पुलिस की नींद

लाश की शिनाख्त के लिए उन्होंने मृतका का हुलिया तथा उस के फोटो के पोस्टर छपवा कर इटावा तथा उस के आसपास के जिलों के सभी सार्वजनिक स्थानों पर चिपकवा दिए. गुमशुदा तलाश केंद्र तथा इटावा के सभी 20 थानों से भी पता किया गया, लेकिन मृतका की शिनाख्त नहीं हो सकी. किसी भी थाने में इस हुलिए की महिला की गुमशुदगी की सूचना दर्ज नहीं थी.

कई दिन बीत जाने के बाद भी जब महिला के शव की शिनाख्त नहीं हो पाई, तब इस ब्लाइंड मर्डर का रहस्य उजागर करने के लिए एसएसपी जयप्रकाश सिंह ने पुलिस की एक टीम गठित की और इस टीम की जिम्मेदारी सौंपी एसपी (देहात) सत्यपाल सिंह को. सहयोग के लिए क्राइम ब्रांच की टीम तथा एएसपी कपिल देव सिंह एवं डीएसपी (भरथना) विजय सिंह को भी लगाया गया.

गठित टीम ने सब से पहले कौआ गांव के लोगों से पूछताछ की. गांव के लोगों ने बताया कि घटनास्थल लगभग एक किलोमीटर दूर है और सुनसान जगह है. हत्या देर रात की गई थी. इसलिए हम ने न तो हत्यारोें को देखा और न ही गोली चलने की आवाज सुनी. उन्होंने यह भी कहा कि महिला उन के क्षेत्र की नहीं है. उसे दूरदराज क्षेत्र से किसी वाहन से लाया गया होगा.

ग्रामीणों से पूछताछ के बाद पुलिस टीम फिर से घटनास्थल पहुंची और खोजबीन शुरू की. खोजबीन के दौरान थानाप्रभारी गंगादास की निगाह कागज के एक टुकड़े पर पड़ी. उन्होंने उस टुकड़े को उठा कर देखा तो वह टोकननुमा पर्ची थी, जिस पर ‘कटियार ट्रैवल एजेंसी, नोएडा’ लिखा था. उन्होंने उस पर्ची को सुरक्षित कर लिया.थानाप्रभारी गंगादास ने घटनास्थल से पर्ची मिलने की जानकारी टीम के अन्य सदस्यों तथा एसपी (देहात) सत्यपाल सिंह को दी. इस पर सत्यपाल सिंह ने टीम को नोएडा जाने तथा ट्रैवल एजेंसी के मालिक से पूछताछ करने का आदेश दिया. दरअसल, सत्यपाल सिंह को पर्ची देख कर अंधेरे में उजाले की एक किरण नजर आने लगी थी.

28 जून, 2022 को पुलिस टीम सैक्टर 49, नोएडा स्थित कटियार ट्रैवल एजेंसी पहुंची और अपने आने का मकसद तथा पर्ची दिखा कर एजेंसी मालिक से पूछताछ की. एजेंसी मालिक ने पर्ची देख कर बताया कि वह इस तरह की पर्ची टोकन 2 साल पहले अपने टैक्सी ड्राइवरों को देता था. लेकिन कोरोना काल में बंद कर दी थी.उस ने यह भी बताया कि 3 साल पहले उस की एजेंसी में सतीश चंद्र यादव नाम का ड्राइवर टैक्सी चलाता था. वह मूलरूप से इटावा जिले के रमपुरा गांव का रहने वाला था. कोरोना काल में उस की छुट्टी कर दी थी.

ट्रैवल एजेंसी की पर्ची ने पहुंचाया कातिल तक

रमपुरा गांव का नाम सुन कर थानाप्रभारी गंगादास का माथा ठनका, क्योंकि रमपुरा गांव उन के ही थाना क्षेत्र में था और जिस जगह महिला का कत्ल हुआ था, वहां से 2 किलोमीटर दूर रमपुरा गांव था.
अब उन के दिमाग में विचार कौंधा, ‘क्या उस अज्ञात महिला का कातिल सतीश चंद्र ही है? क्या वही उसे पूजा के बहाने वहां लाया था? क्या मृत महिला उस की पत्नी थी या फिर प्रेमिका?’
इन सब के जवाब तभी संभव थे, जब सतीश चंद्र पकड़ में आता. ट्रैवल एजेंसी के मालिक से पूछताछ कर पुलिस टीम वापस लौट गई.

टीम ने सारी जानकारी एसपी (देहात) सत्यपाल सिंह को दी. श्री सिंह को लगा कि अब हत्या का खुलासा जल्द ही हो जाएगा. उन्होंने तुरंत सतीश चंद्र यादव को गिरफ्तार कर उस से सघन पूछताछ करने का आदेश पुलिस टीम को दिया.आदेश पाते ही पुलिस टीम ने सतीश के रमपुरा गांव स्थित घर पर दबिश डाली. लेकिन वह हाथ नहीं आया. सतीश चंद्र घर से फरार हो गया था. पुलिस टीम ने उस के कई संभावित ठिकानों पर भी उसे तलाश किया. लेकिन वह पुलिस को चकमा दे गया. आखिर ऊसराहार थानाप्रभारी गंगादास ने सतीश चंद्र यादव की टोह में खास खबरियों को लगा दिया.

एक नहीं 2 हत्याओं का राज उगला

पहली जुलाई, 2022 की सुबह 5 बजे एक खास मुखबिर ने थानाप्रभारी को सूचना दी कि सतीश इस समय भाऊपुर अंडरपास पर मौजूद है. चूंकि मुखबिर की सूचना महत्त्वपूर्ण थी, अत: गंगादास पुलिस टीम के साथ भाऊपुर अंडरपास जा पहुंचे. पुलिस को देख कर सतीश तेजी से भागा, लेकिन टीम ने घेराबंदी कर उसे दबोच लिया. सतीश को थाने लाया गया.थाने में जब उसे मृत महिला के फोटो दिखाए गए तो उस ने उसे पहचानने से साफ इंकार कर दिया. लेकिन उस की घबराहट और हावभाव बता रहे थे कि वह कुछ छिपा रहा है. तब उस पर सख्ती बरती गई. फिर वह मुंह खोलने को मजबूर हो गया.

सतीश ने बताया कि मृतक महिला उस के दोस्त गजेंद्र की पत्नी मिथलेश थी. जो राजस्थान के झुंझनू की रहने वाली है. इस के बाद सतीश ने एक नहीं, 2 मर्डर का खुलासा किया. उस ने मिथलेश के पति गजेंद्र की हत्या का भी खुलासा किया. इस खुलासे से पुलिस दंग रह गई.पुलिस ने सतीश की जामातलाशी ली तो उस के पास से एक तमंचा व 2 कारतूस बरामद किए. उस की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त कार भी बरामद कर ली. इस के अलावा मृतका मिथलेश का आधार कार्ड व कुछ जेवर भी बरामद कर लिए.

मार्मिक बदला – भाग 1 : रौनक से कौनसा बदला लेना चाहती थी रागिनी

अखिलभारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के वार्षिक सम्मेलन में कई विषयों पर संगोष्ठियां हो रही थीं. एक शाम ऐसी ही एक संगोष्ठी के समाप्त होने पर कुछ डाक्टर उसी विषय पर बात करते हुए परिसर में बने अतिथिगृह में अपनेअपने कमरे की ओर जा रहे थे.

‘‘डा. रंजन ने ठीक कहा है कि सब बीमारियों की जड़ मिलावट और कुपोषण है,’’ एक डाक्टर कह रहा था, ‘‘जिस के चलते आधुनिक चिकित्सा कोई चमत्कार नहीं दिखा सकती.’’

‘‘सही कह रहे हैं डा. सतीश. ये दोनों चीजें जीवन का विनाश कर सकती हैं. मिलावटखोरों को मानवता का दुश्मन घोषित कर देना चाहिए.’’

‘‘मिलावटखोर ही नहीं आतंकवादी भी मानवता के दुश्मन हैं डा. चंद्रा. कितने ही खुशहाल घरों को पलभर में उजाड़ कर रख देते हैं, लेकिन आज तक उन पर ही कोई रोक नहीं लग सकी तो मिलावटखोरों पर कहां लगेगी? आज रोज कुपोषण की रोकथाम के लिए अनेक छोटेबड़े क्लब पांच सितारा होटलों में मिलते हैं  झुग्गी झोंपडि़यों में रहने वाले बच्चों को कितना दूध दिया जाए इस पर विचारविमर्श करने को…’’

‘‘आप ठीक कहते हैं डा. कबीर हम सिर्फ विचारविमर्श और बातें ही कर सकते हैं. इस से पहले की हम बातों में उल झ जाएं और डाइनिंगरूम में बैठने की जगह भी न मिले, चलिए अपनेअपने कमरे में जाने से पहले खाना खा लें,’’ डा. चंद्रा ने कहा.

सब लोग डाइनिंगरूम में चले गए. खाना खा कर जब सब बाहर निकले तो डा. चंद्रा ने कहा, ‘‘मैं तो फैमिली के लिए शौपिंग करने जा रहा हूं, आप लोग चलेंगे?’’

‘‘अभी से कमरे में बैठ कर भी क्या करेंगे, चलिए शौपिंग ही करते हैं. आप भी चलिए न डा. रौनक,’’ डा. कबीर ने बेमन से खड़े व्यक्ति की ओर देख कर कहा.

‘‘धन्यवाद डा. कबीर, लेकिन मु झे किसी चीज की जरूरत नहीं है.’’

‘‘हम अपनी जरूरत के लिए नहीं फैमिली के लिए शौपिंग करने जा रहे हैं.’’

‘‘लेकिन मेरी फैमिली भी नहीं है,’’ डा. रौनक का स्वर संयत होते हुए भी भीगा सा लग रहा था.

‘‘यानी आप घरगृहस्थी के चक्कर में नहीं पड़े हैं.’’

‘‘ऐसा तो नहीं है डा. चंद्रा,’’ डा. रौनक ने उसांस ले कर कहा, ‘‘जैसाकि कुछ देर पहले डा. कबीर ने कहा था कि आतंकवादी पलभर में एक खुशहाल परिवार को उजाड़ देते हैं. मेरी जिंदगी की खुशियां भी आतंकवाद की आंधी उड़ा ले गई. खैर छोडि़ए, ये सब. आप लोग चलिए, देर कर दी तो मार्केट बंद हो जाएगी,’’ किसी को कुछ कहने का मौका दिए बगैर डा. रौनक तेजी से अपने कमरे की ओर बढ़ गए.

‘‘मु झे यह आतंकवाद वाली बात करनी ही नहीं चाहिए थी. इसे सुनने के बाद ही डा. रौनक एकदम गुमसुम हो गए थे, खाना भी ठीक से नहीं खाया,’’ डा. कबीर बोले.

‘‘आप को मालूम थोड़े ही था कि डा. रौनक आतंकवाद के शिकार हैं,’’ डा. चंद्रा ने कहा.

‘‘हरेक शै के अच्छेबुरे पहलु होते हैं. डा. रौनक आतंकवाद का शिकार हैं और मेरे एक मित्र डा. भुपिंदर सिंह आतंकवाद के बैनिफिशियरी,’’ डा. सतीश ने कहा, ‘‘भुपिंदर की माताजी एक समाजसेविका हैं. उन्होंने आतंकवाद की शिकार एक युवती से उस की शादी करवा दी और भुपिंदर शादी के बाद बेहद खुश हैं.’’

‘‘अरे वाह, पहली बार सुना कि कोई समाजसेविका किसी हालात की मारी को अपनी बहू बना ले और बेटा भी मान जाए.’’

‘‘हम ने भी ऐसा पहली बार ही सुना और देखा था. असल में भुपिंदर की माताजी बहुत ही कड़क और अनुशासनप्रिय हैं और भुपिंदर ने सोचा था कि सुख से जीना है तो शादी मां की पसंद की लड़की से ही करनी होगी, चाहे अच्छी हो या बुरी. लेकिन मां ने तो उसे एक नायाब हीरा थमा दिया है…’’

‘‘यानी लड़की सुंदर और पढ़ीलिखी है?’’ कबीर ने बात काटी.

‘‘डाक्टर है और बेहद खूबसूरत. व्यस्त गाइनौकोलौजिस्ट होने के बावजूद सासूमां की समाजसेवा में समय लगाती है सो वे उस से बहुत खुश रहती हैं और भुपिंदर के घरसंसार में सुखशांति,’’ डा. चंद्रा ने बताया.

 

प्यार में खलल डालने वाली सीक्रेट वाइफ- भाग 1

देवास (मध्य प्रदेश) के शहर कोतवाली टीआई एम.एस. परमार को 7 अगस्त, 2022 की शाम बेहद बेहोशी की गंभीरहालत में एक युवती को एम.जी. शासकीय अस्पताल ले जाने की सूचना मिली थी. उन्होंने तत्काल एसआई कृष्णा सूर्यवंशी को एक कांस्टेबल के साथ अस्पताल भेज दिया.अस्पताल पहुंची पुलिस को मालूम हुआ कि 23 वर्षीय युवती रानी थी. उसे केदारेश्वर मैडिकल स्टोर चलाने वाला नरसिंह दास उर्फ बबलू ले कर आया था. इमरजेंसी के डाक्टर की टीम ने जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया था.

पूछताछ में बबलू ने बताया कि रानी पिछले 3 साल से उस के मैडिकल स्टोर पर सेल्सगर्ल का काम कर रही थी. वह सीहोर जिले के बाऊपुर की रहने वाली थी और देवास के अखाड़ा रोड इलाके में किराए के मकान में रहती थी. उस की बिगड़ी हालत के बारे में पुलिस को जानकारी मिली कि शाम को रानी अपने कमरे में बेहोश पड़ी थी. वह अविवाहित थी और अकेली रहती थी. एसआई कृष्णा सूर्यवंशी ने यह जानकारी टीआई को दे दी.

नरसिंह के बयानों के आधार पर एम.एस. परमार को मामला संदिग्ध लगा. उन्हें नरसिंह पर भी संदेह हुआ कि शाम के समय वह उस के घर क्यों गया था? यह सब पूछताछ करने से पहले रानी की लाश को उन्होंने पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. इस घटना की जानकारी एसपी डा. शिवदयाल को भी दे दी गई.
डाक्टरी जांच की प्रारंभिक रिपोर्ट में युवती की मौत गला दबने पर दम घुटने से हुई बताई गई. मामला हत्या के रूप में सामने आने पर कोतवाली थाने में अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया.

मामले की तह तक पहुंचने के लिए एसपी (देवास) द्वारा एडिशनल एसपी मनजीत सिंह, सीएसपी विवेक चौहान और डीएसपी किरण शर्मा के नेतृत्व में कोतवाली टीआई एम.एस. परमार के संग एसआई पवन यादव, हर्ष चौहान, एएसआई संजय तंवर, हैडकांस्टेबल मनोज पटेल, रवि गडोरा, पवन पटेल आदि की एक टीम गठित की गई.

पुलिस ने रानी के पड़ोसियों से भी पूछताछ की. उन से मालूम हुआ कि नरसिंह का रानी के पास अकसर आनाजाना था. कभीकभी वह रात को वहीं ठहर जाता था. उस ने उस से शादी भी कर ली थी, जो सीक्रेट थी. इस पर पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि रानी की आकस्मिक मौत का मामला अवैध संबंध के नतीजे का हो सकता है.

नरसिंह के बारे में जुटाई गई कुछ और जानकारियों से मालूम हुआ कि वह दिलफेंक किस्म का व्यक्ति है. उस के संबंध रानी के अलावा शहर के एक जानेमाने ज्वैलर्स की दुकान पर काम करने वाली युवती रितु से भी हैं. रितु न केवल सचिन चौहान की विवाहिता है, बल्कि 7 साल की बेटी की मां भी है.

प्रेमिका रितु पर हुआ शक

पुलिस को नरसिंह के मोबाइल की लोकेशन से पता चला कि वह 7 अगस्त को जिस समय बेहोश रानी को अस्पताल ले कर गया था, उस के कुछ समय पहले ही उस की रितु के मोबाइल से भी बात हुई थी. उस वक्त रितु के मोबाइल की लोकेशन भी अखाड़ा रोड पर रानी के घर की ही थी. इस का मतलब था कि नरसिंह के रानी के पास पहुंचने से पहले रितु उस के आसपास ही थी.

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