कातिल फिसलन: दारोगा राम सिंह के पास कौनसा आया था केस- भाग 3

सलोनी की बात सुनते ही पास खड़ी महिला सिपाही ने उसे मारने के लिए हाथ ऊपर किया, लेकिन राम सिंह ने उसे रोक दिया और सलोनी से पूछा, ‘‘तो तुम्हारी उंगलियों के निशान उस छड़ पर कैसे आए?’’

‘‘मुझे नहीं मालूम साहब… मुझे नहीं मालूम,’’ कहते हुए सलोनी फूटफूट कर रोने लगी. दारोगा राम सिंह बाहर निकला तो उस ने सुधीर को बच्चों के साथ थाने की बैंच पर बैठा पाया.

दारोगा राम सिंह ने सुधीर से कहा, ‘‘तुम अपने वकील से बात कर लो. अगर वकील रखने में पैसों की समस्या आ रही है तो कोर्ट में अर्जी दे देना. कोर्ट तुम को वकील मुहैया कराएगा.’’

दारोगा राम सिंह को उन लोगों से हमदर्दी होने लगी थी, क्योंकि उस ने सुखलाल का असली रूप वीडियो में देख लिया था, लेकिन सुधीर गुस्से में चिल्ला उठा, ‘‘मुझे कोई वकील नहीं करना साहब. मैं क्यों परेशान होऊं उस के लिए, जो उस सुखलाल के साथ गुलछर्रे उड़ाती थी और मुझे ही जेल भिजवा दिया था. हो गया होगा दोनों में पैसों को ले कर झगड़ा और यह खून हो गया.’’

‘‘ऐसा नहीं है सुधीर…’’ दारोगा राम सिंह ने उसे समझाया, ‘‘गैरकानूनी हथियार रखने के जुर्म में तुम्हारी जो गिरफ्तारी पहले हुई थी, वह सुखलाल ने केवल तुम्हारी बीवी को पाने के लिए साजिशन कराई थी. इस में तुम्हारी बीवी का कोई कुसूर नहीं था. वह बेचारी तो बस तुम्हारे लिए उस के आगे झुकती चली गई. वह तुम से और केवल तुम से ही प्यार करती है.’’

सुधीर हैरानी से दारोगा राम सिंह का मुंह ताकने लगा. राम सिंह ने सुखलाल के मोबाइल फोन में मिला वही वीडियो उस के आगे चला दिया.

‘‘नहींनहीं… बंद कीजिए इसे दारोगा बाबू,’’ वीडियो देखता हुआ सुधीर चिल्लाया. सलोनी के शरीर पर सुखलाल का हाथ लगने वाला सीन वह नहीं देख पाया और वहीं बैठ कर रोने लगा. सलोनी के प्रति उस का शक आंसुओं से बाहर निकल चुका था.

सुधीर बोला, ‘‘मैं तो उसी रात सुखलाल को मारने उस के कमरे में गया था साहब, जिस के अगले दिन उस की लाश मिली. उस समय वह सो रहा था, लेकिन कानूनी बंधन का डर मुझे रोकने में कामयाब हो गया और मैं घर से निकल कर पूरी रात तनाव में इधरउधर भटकता रहा.

‘‘कल दोपहर को घर लौटने पर उस हैवान के मरने की खुशखबरी मिली. खैर, चाहे उसे मेरी सलोनी ने मारा हो या जिस ने भी, मैं उस का शुक्रगुजार हूं.’’

पिता को यों रोते देख साथ खड़े बच्चे और भी सहम गए. राम सिंह ने सुधीर को उठाया और लौकअप की ओर इशारा किया. उस का संकेत समझ कर सुधीर बेतहाशा सलोनी से मिलने भागा. सलोनी भी उसे देखते ही उस की ओर दौड़ी, लेकिन दीवार बनी सलाखों ने उस के पैर रोक दिए.

सुधीर उस का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘चिंता मत करना. चाहे जैसे भी हो, तुम को यहां से मैं छुड़ा कर ले जाऊंगा, वरना अपनी भी जान दे दूंगा,’’ इतना कह कर वह वहां से चल दिया.

कुछ दिन बीत गए. दारोगा राम सिंह का बचपन एक अनाथ के रूप में बीता था. मांबाप के बिना बच्चों की क्या हालत होती है, वह अच्छी तरह जानता था. सलोनी थाने में बंद थी और सुधीर वकील खोजने में. ऐसे में उस के बच्चे किस हाल में होंगे?

दारोगा राम सिंह को चिंता हुई तो वह अपनी पत्नी के साथ खानेपीने का कुछ सामान ले कर सुधीर के घर आया. उस का सोचना सही निकला और बच्चे बेसहारा जैसे घर में बैठे मिले.

दारोगा राम सिंह ने उन से पूछा, ‘‘पापा कहां हैं बेटा?’’

‘‘वे तो सुबह से बाहर गए हैं… हम को भूख लगी है, लेकिन पास वाली आंटी ने अभी तक खाना नहीं दिया,’’ बड़े वाले बेटे ने कहा.

दारोगा राम सिंह का कलेजा भर आया. उस ने अपनी बीवी की ओर देखा. राम सिंह की बीवी ने दोनों बच्चों को अपनी गोद में बिठाया और बोली, ‘‘मैं भी तो तुम्हारी आंटी हूं. देखो, मैं लाई हूं खाना.’’

वह उन को खाना खिलाने लगी. कुछ देर सकुचाने के बाद बच्चे उस से घुलनेमिलने लगे.

तभी छोटा वाला बेटा बोल पड़ा, ‘‘आंटीआंटी, मेरे भैया बहुत बहादुर हैं.’’

‘‘अच्छा, क्या किया है भैया ने?’’

‘‘भैया ने उस विलेन अंकल को नीचे गिरा दिया, जो मम्मी को आएदिन परेशान करता था.’’

दारोगा राम सिंह को उस की यह बात सुन कर झटका लगा. उस ने तुरंत उस की ओर देखा, लेकिन फिर समझदारी से काम लेते हुए बड़े वाले बेटे से पूछा, ‘‘बेटा, तुम ने ऐसा क्यों किया जो तुम्हारा यह प्यारा सा छोटा भाई बता रहा है?’’

बड़ा वाला बेटा मुसकरा कर बोला, ‘‘अंकल, मम्मी कहती हैं कि मच्छर मारने वाली दवा पीने से आदमी मर जाता है, इसलिए मैं ने वही दवा उस विलेन अंकल के जूस में मिला दी थी. छोटे भाई ने तो मेरा फोटो भी लिया था.’’

दारोगा राम सिंह के कानों में जैसे बम फूट रहे थे. बड़े वाले बेटे ने उसे मोबाइल फोन में अपना वह फोटो भी दिखाया, जिस में वह सुखलाल के शराब की बोतल को जूस की बोतल समझ के उस में लिक्विडेटर मिला रहा था.

दारोगा राम सिंह कुछ और पूछता, इस से पहले ही छोटा वाला बेटा बोला, ‘‘रात को हम ने चुपके से सीढ़ी पर कंचे रख दिए थे… विलेन अंकल रोज की तरह बाथरूम जाने के लिए बाहर आए और फिसल कर नीचे गिर गए. इस का मैं ने वीडियो भी बनाया है. मेरे भैया… बहुत बहादुर…’’ कह कर वह ताली बजाने लगा.

दारोगा राम सिंह ने वीडियो लिस्ट से जल्दी से वह वीडियो खोजा. सचमुच उस में बड़ा वाला बेटा सीढ़ी पर कंचे रखता दिख रहा था और उस के तुरंत बाद सुखलाल अपना पेट पकड़े वहां आया क्योंकि लिक्विडेटर मिली शराब पी कर सोने के बाद शायद उस की तबीयत बिगड़ रही थी. उस का पैर इसी जल्दी में कंचों पर पड़ा और वह नीचे गिर गया, जहां जमीन पर पड़ी छड़ पेट में धंस गई होगी और वह मर गया.

चूंकि छड़ों के वे टुकड़े सलोनी ने ही उधर फेंके थे, सो उन पर उस की उंगलियों के निशान भी मिल गए, इस घटना का समय बिलकुल वही था जो पोस्टमार्टम में सुखलाल की मौत का बताया गया था.

‘‘बेटा, तुम ने ऐसा क्यों किया?’’ दारोगा राम सिंह ने बड़े बेटे से पूछा.

वह लड़का बोला, ‘‘वे विलेन अंकल मम्मी को हमेशा परेशान करते थे. मैं ने बहुत बार छिप कर देखा था. उस दिन मम्मी के सिर में उन्होंने ही चोट लगा दी थी. जब मैं स्कूल से आया तो पता चला और मुझे बहुत गुस्सा आया.’’

‘‘और यह मोबाइल फोन कहां से मिला तुम को?’’

‘‘यह नानाजी ने हम को दिया है वीडियो गेम खेलने के लिए,’’ बड़े बेटे के कहने के बाद वे दोनों बच्चे फिर खाना खाने लगे.

दारोगा राम सिंह ने अपनी पत्नी की ओर देखा. वह भी हैरान थी. उस ने पूछा, ‘‘बचपन को क्या सजा दी जाएगी?’’

‘‘बचपन किलकने के लिए होता है…’’ दारोगा राम सिंह का चेहरा अब तनाव मुक्त दिखने लगा था. वह हंसते हुए बोला, ‘‘यह केस कानून के लिए एक हादसा माना जाएगा. इन बच्चों की मां भी कुछ दिनों में घर आ जाएगी.’’

सेक्स के दौरान फेविक्विक से चिपका कपल

बात राजस्थान के उदयपुर के गोगुंदा थानांतर्गत केलाबावड़ी के जंगल से शुरू होती है, जिस में 2 जिंदगियां

खत्म हो गईं और एक के माथे पर हत्या का आरोप लग गया. इस जिले में उबेश्वर के जंगलों में मजावद गांव के पास 18 नवंबर, 2022 की सुबहसुबह लाश मिलने की सूचना पर कांस्टेबल विजेश कुमार और कांस्टेबल भवानी सिंह मौके पर पहुंच गए. वहां उन्हें 2 लाशें नग्नावस्था में मिलीं. एक लाश युवक की थी, जबकि दूसरी एक युवती की.

पास में महिला के कपड़े कुरती और लेगी पड़ी थी. जबकि वहीं जींसटीशर्ट भी थी. बरामद लाश के आसपास पाए गए उन के कुछ सामानों से उन की पहचान राहुल मीणा (30) और सोनू कुंवर (28) के रूप में हुई. कांस्टेबल ने इस की जानकारी गोगुंदा के एसएचओ योगेंद्र व्यास को दे दी. उन्होंने उन्हें बताया कि दोनों लाशों को क्षतिग्रस्त किया गया है. ऐसा जान पड़ता है, जैसे मरने वालों पर किसी ने गुस्सा निकाला हो.

उस ने अपने अधिकारियों को यह भी बताया कि पुरुष के गुप्तांग और स्त्री के वक्षों को नुकसान पहुंचाया गया है. शरीर की चमड़ी जगहजगह उधड़ी हुई है.

शहर से ही सटे जंगल में 2 लाशें मिलने से पूरे इलाके में सनसनी फैल गई. पुलिसकर्मियों की इस पहल के बाद उदयपुर के एसपी विकास कुमार ने हत्याकांड की जांच के लिए टीमें बनाईं.

गोगुंदा के एसएचओ योगेंद्र व्यास की देखरेख में जांच शुरू की गई. घटनास्थल से मिले सुराग के आधार पर मालूम हुआ कि राहुल मीणा एक सरकारी स्कूल में टीचर था. दोनों मृतकों का पता भी मालूम हो गया था. उन के घर 10 किलोमीटर के दायरे में स्थित अलगअलग गांवों में थे.

उदयपुर के एसपी विकास कुमार के दिशानिर्देश पर गहन जांच की जाने लगी. पहली प्राथमिकता हत्याकांड में शामिल अपराधियों का पता लगाना और संबंधित साक्ष्य जुटाने की थी. आगे की जांच के सिलसिले में 200 लोगों से पूछताछ की गई और आसपास के 50 स्थानों के सीसीटीवी फुटेज खंगाले गए. दोनों मृतकों के मोबाइल नंबर भी मिल गए, उन की  बीते 2 हफ्ते की काल डिटेल्स निकलवाई गई.

जांच में यब भी पता चला कि दोनों मृतक शादीशुदा थे. उन के अपनेअपने जीवनसाथी थे. शादीशुदा होते हुए भी उन के द्वारा जंगल में सैक्स संबंध के लिए आने का मतलब प्रेमप्रसंग और अवैध रिश्ते का लग रहा था. पुलिस ने मृतक राहुल मीणा की पत्नी से पूछताछ की तो कई संदिग्ध बातों की जानकारी मिली.

उस ने पुलिस को बताया कि उस के पति के अवैध संबंध सोनू कुंवर नाम की महिला से थे. कुछ समय पहले उन की जानपहचान भादवी गुड़ा स्थित शेषनाग मंदिर में आतेजाते हुई थी. वह मंदिर इच्छापूर्ति मंदिर के रूप में दूरदूर तक मशहूर है.

पति के नाजायज रिश्ते के बारे में मालूम होने पर उस ने विरोध जताया था. इसे ले कर उस का पति के साथ हर रोज झगड़ा होने लगा. उन्हीं दिनों उस की मंदिर से जुड़े तांत्रिक भालेश कुमार से मुलाकात हुई. वह पिछले 7-8 सालों से भादवी गुड़ा स्थित उस इच्छापूर्ति मंदिर में रह कर लोगों को कष्ट निवारण के लिए ताबीज बना कर देता था.

इसी के साथ राहुल और सोनू के मोबाइल डिटेल्स से भी एक ऐसा नंबर मिला, जिस पर  लगातार कई बार बातें करने के बारे में पता लगा. वह नंबर उसी तांत्रिक भालेश कुमार का था.

राहुल की पत्नी ने पुलिस को बताया कि उस ने तांत्रिक से मदद मांगी थी. दूसरी तरफ पुलिस को तांत्रिक से राहुल और सोनू के बातचीत करने के सुराग मिलने से जांच की सूई अनैतिक संबंध के साथसाथ तंत्रमंत्र और अंधविश्वास की ओर भी घूम गई.

फिर क्या था पुलिस ने तांत्रिक भालेश कुमार को तुरंत थाने बुलवा लिया. उस से राहुल और सोनू के बारे में पूछताछ की गई. तांत्रिक मंदिर का एक जानामाना व्यक्ति था. उस की समाज में काफी इज्जत थी. उस के पास लोग दूरदूर से अपनी व्यक्तिगत समस्याओं से ले कर घरेलू झगड़े आदि के निदान के लिए आते थे.

यह जानते हुए भी कि भालेश के उपाय निहायत ही अंधविश्वास वाले थे, लेकिन लोग उस के पास मानसिक संतुष्टि के लिए आते थे.

भालेश ने खुद को राहुल और सोनू के साथ किसी भी तरह की गहरी जानपहचान होने से इनकार कर दिया. उस ने बताया कि उस के पास हर दिन अनेक लोगों के फोन आते रहते हैं और लोग उस से मिलते हैं. वे दोनों भी उसी जैसे थे.

पुलिस के यह कहने पर कि दोनों की उस के साथ कई बार लंबीलंबी बातें हुई हैं. यहां तक कि उस ने रात में भी बातें की हैं. उन की हत्या कर दी गई है.

उस की समस्या के बारे पूछे जाने पर भालेश बौखला गया और इस बारे में गुप्त रखने की बात बताई. किंतु जब पुलिस ने उस पर अंधविश्वास बढ़ाने और तंत्रमंत्र कर लोगों को बरगलाने के कानून में जेल भेजने की धमकी दी, तब वह टूट गया.

हालांकि पूछताछ के क्रम में भालेश ने खुद को एक सिद्ध पुरुष और विकट साधना और लंबे समय तक मंत्र जाप करने वाला व्यक्ति बताया.

उस ने यह भी बताया कि उस की इसी योग्यता के पुण्य प्रताप से उसे इस मंदिर में जगह मिली हुई है. यहां वह लोगों की समस्याओं का निदान करता है.

इसी के साथ उस ने कथित तौर पर राहुल और सोनू के बीच अवैध संबंध तथा अंधविश्वास की हैरान कर देने वाली बातें बताईं. साथ ही दोहरे हत्याकांड को अंजाम देने की बात भी कुबूल कर ली.

उस के बाद राहुल और सोनू कुंवर की हत्या के बारे में जो खुलासा हुआ, वह काफी चौंकाने वाला निकला— कोरोना प्रकोप का असर काफी हद तक कम होने के बाद लौकडाउन खुला तो मंदिर भी खुल गए थे. लोगों का आनाजाना शुरू हो गया था. लोग नई तरह की अजीबोगरीब समस्या ले कर आने लगे थे.

इन में अधिकांश लोग प्रेम विवाह, दांपत्य जीवन में तकरार, विवाह टूटने, आर्थिक स्थिति बिगड़ने, कानूनी मामले में फंसने आदि से ले कर अवैध रिश्ते से छुटकारा पाने तक की समस्या के निदान के लिए आते थे.

उन्हीं में राहुल की पत्नी समेत सोनू कुंवर के परिजन भी थे. राहुल की पत्नी ने तांत्रिक भालेश से अपनी समस्या बताई कि वह पति को वश में रखने के लिए कोई उपाय बताए. उस का पति किसी दूसरी औरत के साथ प्रेम संबंध बनाए हुए है और उस की उपेक्षा करता है. यहां तक कि उस के साथ यौन संबंध भी नहीं बनाता है. लंबे समय से राहुल देर रात को घर आ रहा था और शराब पी कर अकसर झगड़ा करता था. इस पर राहुल के परिवार के लोग मंदिर में भालेश जोशी के पास आए और राहुल के ऐसा करने का कारण पूछा.

इस पर तांत्रिक भावेश ने राहुल और सोनू कुंवर के बीच में अफेयर की बात बता दी थी. राहुल के इस व्यवहार से क्षुब्ध हो कर उस की पत्नी तांत्रिक भालेश से मदद मांगने आई थी.

इस सिलसिले में राहुल भी भालेश से मिला था. लेकिन उस की तमन्ना कुछ और ही थी. वह भी प्रेमिका से छुटकारा पाना चाहता था. बताते हैं कि उस की नजर तांत्रिक भालेश की बेटी पर थी. इस कारण सोनू कुंवर से छुटकारा दिलाने का कोई उपाय पूछा.

जबकि सोनू कुंवर भी अलग से भावेश से मिली थी. वह राहुल से गहरे संबंध कायम बनाए रखने और उस के पत्नी से संबंध तुड़वाने की मांग कर रही थी. ऐसे में भालेश उलझन में घिर गया था. वह समझ नहीं पा रहा था कि किस की बात माने और किस के खिलाफ व किस के पक्ष में तंत्र साधना करे.

तंत्रमंत्र और ताबीज आदि से जुड़ी एक सच्चाई को वह अच्छी तरह जानता था कि इस से किसी समस्या का निदान नहीं निकलता है. यह सिर्फ मानसिक संतुष्टि भर होता है. किंतु हां, उस ने भी रोजीरोटी के लिए दूसरे फरेबी तांत्रिकों की तरह ही एक ज्ञानी और सिद्ध तांत्रिक होने का चोला पहन लिया था.

दूसरों की समस्याओं का निदान करने वाले भालेश खुद समस्या में फंस गया था, क्योंकि उसे सोनू कुंवर ने काम नहीं करने पर बदनाम करने की धमकी दी थी.

इसी तरह राहुल तांत्रिक भालेश की बेटी को भी चाहता था. उस ने तांत्रिक से कहा कि वह अपनी तंत्रसाधना के जरिए उस की इच्छा की पूर्ति करे. उस ने धमकी दी कि यदि उस की इच्छा पूरी नहीं हुई तो वह उस के खिलाफ दुष्प्रचार कर उस की छवि को पलक झपकते ही मिटा सकता है. भालेश दोनों तरफ से तंत्रमंत्र के झूठे साम्राज्य के ध्वस्त होने और अपनी बदनामी होने से घबरा गया. उस के सामने उलझन यह थी कि राहुल और सोनू दोनों वशीकरण की साधना करना चाहते थे.

जैसा कि उन्हें मालूम था कि भालेश ने वशीकरण सीख कर और सवा लाख मंत्रजाप कर ही सिद्धि हासिल की है. उस के बारे में लोगों में ऐसी मान्यता थी कि इस जाप के पूरा होते ही उन की हर इच्छा पूर्ण हो जाती है.

एक तरफ भालेश के सामने राहुल की इच्छापूर्ति के लिए बेटी को दांव पर लगाने की बात थी. दूसरी तरफ सोनू की धमकी थी. सोनू कुंवर ने भालेश का हाथ पकड़ते हुए धमकी दी थी कि यदि उस ने उसे वशीकरण नहीं सिखाया तो वह सभी को बता देगी कि उस ने मेरे साथ गलत हरकत करने की कोशिश की है. यह बात पुलिस को भी बता दूंगी और वह जेल जाएगा. उस का बनाबनाया नाम खत्म कर दूंगी.

तांत्रिक ने बेटी के दांव पर लगे होने की बात  सामने नहीं आने दी और उस ने दोनों से छुटकारा पाने के लिए एक साजिश रच डाली. उस ने राहुल और सोनू कुंवर को अपनी इच्छापूर्ति के लिए आखिरी बार यौन संबंध बनाने के लिए राजी कर लिया. इस के लिए वे दोनों तैयार हो गए. तांत्रिक ने दोनों को हिदायत दी कि वे अपनी इच्छाओं के बारे में किसी से जिक्र नहीं करेंगे. घटना वाले दिन यानी 15 नवंबर, 2022 की शाम को तांत्रिक क्रिया के बहाने राहुल और उस की प्रेमिका को गोगुंदा इलाके के एकांत जंगल में ले गया और उन्हें अपने सामने ही सैक्स संबंध बनाने को कहा.

राहुल मीणा और सोनू कुंवर उस के कहे अनुसार सैक्स संबंध बनाने लगे. जिस के बाद उस ने मंत्र जाप करते हुए एक बोतल से तरल पदार्थ उन पर उड़ेल दिया. वह तरल पदार्थ उन दोनों के गुप्तांगों तक भी पहुंच गया.

वह तरल पदार्थ दरअसल फेविक्विक था, जिस के दोनों के बदन पर गिरते ही वे चिपक गए. प्रेमी युगल को जरा भी समय नहीं मिल पाया कि वे उस से बच सकें. कुछ समझ पाते, तब तक वे बुरी तरह चिपक चुके थे. अलग होने की कोशिश में दोनों के गुप्तांगों व शरीर के अन्य हिस्सों की चमड़ी उधड़ गई.

उधर तांत्रिक भालेश ने राहुल का प्राइवेट पार्ट काट दिया और सोनू कुंवर के वक्षों पर भी वार कर दिया. उस के बाद उन दोनों की हत्या कर वहां से वह फरार हो गया. हत्या के लिए उस ने चाकू और पत्थर का इस्तेमाल किया था. हत्याकांड को अंजाम देने के लिए तांत्रिक ने 15 रुपए वाली 50 फेविक्विक खरीदी थीं. उन्हें खोल कर सारा तरल पदार्थ एक छोटी बोतल में भर लिया था.

इतनी अधिक संख्या में फेविक्विक खरीदने को ले कर किसी तरह की साजिश का कोई शक नहीं हुआ, क्योंकि वह ताबीज बनाता था इस वजह से वह पहले भी अकसर फेविक्विक खरीदा करता था.

मर्डर के दौरान तांत्रिक के अंगूठे और हाथपैर पर भी फेविक्विक लग गई थी, जिसे हटाने के प्रयास में उस के हाथपैर की खाल भी उधड़ गई थी. तांत्रिक उस दिन के बाद से पट्टी बांध कर घूम रहा था.

हालांकि उस ने इस दौरान पूरी सतर्कता बरतते हुए हाथों में ग्लव्स पहन रखे थे, फिर भी ग्लव्स के फटने से उस के हाथों में फेविक्विक लग गई थी. पुलिस ने तांत्रिक भालेश से पूछताछ कर उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

जल समाधि: आखिर क्यूं परेशान था सुशील? भाग 2

प्रकाश समझ गया था कि लोहा गरम है. उस ने रीता को अपनी बांहों में भर लिया और उस के होंठों को चूमने लगा. रीता भी किसी लता की तरह उस की बांहों में समा गई और फिर दोनों की गरम सांसें पूरे कमरे में गूंजने लगीं. दोनों के शरीर एकदूसरे से ऐसे चिपटे हुए थे, जैसे उन्हें किसी ने एक ही कर दिया हो. उस दिन के बाद उन दोनों ने कई बार जम कर सैक्स का मजा लूटा.

ऐसा नहीं था कि यह जिस्मानी रिश्ता अनजाने में बना था, बल्कि रीता ने जानबूझ कर प्रकाश के साथ संबंध को बढ़ने दिया, ताकि वह उस के साथ हमबिस्तर हो कर एक लड़का पैदा कर सके. यही नहीं, बातोंबातों में रीता ने यह डर भी प्रकाश पर जाहिर कर दिया था कि उसे फिर से लड़की हुई तो क्या होगा? प्रकाश ने रीता से वादा किया था कि उस की मर्दानगी में वह दम है, जो लड़की नहीं, बल्कि लड़का ही पैदा करेगी और अगर फिर भी भ्रूण की जांच में लड़की होती है, तो वह उसे गिरवा देगा.

और ऐसा भी लगता था कि रीता के ससुर ने इन दोनों के बीच आने की कोई कोशिश नहीं की. कहीं न कहीं वे भी चाहते थे कि जो हो रहा है, होने दिया जाए. आखिरकार वे भी तो एक पोता चाहते ही थे. कुछ समय के बाद वही हुआ, जिस का इंतजार रीता को था. वह पेट से हो गई. सुशील खुश तो हुआ, पर अगले पल ही मायूसी ने उसे घेर लिया.

‘‘इस बार भी लड़की हो गई तो…?’’ सुशील बोला. ‘‘हम पहले जांच करा लेंगे, उस के बाद ही इसे पनपने देंगे,’’ यह कहते हुए रीता के चेहरे पर चमक थी. जांच के नतीजे ने बताया कि रीता के पेट में पल रहा बच्चा एक लड़का ही है, तो यह जान कर राममोहन, सुशील और रीता सभी खुशी से झूम उठे.

ठीक समय आने पर रीता ने सुंदर चेहरे वाले गोरे लड़के को जन्म दिया… छोटे बालक को देख कर सब की आंखें फैल गई थीं, क्योंकि राममोहन के परिवार में तो सभी सांवले थे, ऐसे में एक गोरे बालक का जन्म सब को सुहा रहा था. राममोहन तो बस इसी बात से खुश थे कि उन के वंश को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें एक पोता मिल गया था. 2 महीने बीत गए थे. रीता अपने बेटे को जी भर कर देखती और मन ही मन अपने उस फैसले पर खुश होती, जब उस ने प्रकाश के साथ संबंध कायम किए थे.

आज प्रकाश रीता के घर पहुंचा, तो राममोहन सिर्फ मुसकरा कर रह गए. रीता अपने कमरे में बैठी थी, जिस की देह चिकनी और गदराई हो गई थी… इधर कई महीनों से प्रकाश रीता के साथ हमबिस्तर भी नहीं हुआ था और आज इसी उम्मीद में वह रीता के पास आया था. प्रकाश ने रीता को चूमना चाहा, तो रीता ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा, ‘‘मुझ से दूर ही रहो, अब मैं एक बेटे की मां हूं.’’ ‘‘अजी, इस में मेरी भी मेहनत लगी है,’’ प्रकाश ने रीता की पीठ सहलाते हुए कहा.

दादी अम्मा : आखिर कहां चली गई थी दादी अम्मा

विश्वास: क्या थी कहानी शिखा की

कातिल फिसलन: दारोगा राम सिंह के पास कौनसा आया था केस- भाग 2

तफतीश पूरी होने तक के लिए सुखलाल के कमरे को सील कर दारोगा राम सिंह वहां से चला गया.

दोपहर को अचानक सुधीर लौट आया. सलोनी भाग कर उस से लिपट गई और पूछा, ‘‘कहां चले गए थे आप अचानक आधी रात से?’’

‘‘दुकान के लिए निकलना है मुझे…’’ सुधीर ने बेरुखी से उसे खुद से अलग करते हुए कहा.

सलोनी उसे देखती रह गई. उस ने फिर बातों का सिलसिला शुरू करना चाहा, ‘‘अरे, पुलिस आई थी यहां. सुखलाल की मौत हो गई न आज…’’

‘‘हां, मुझे पता चला है पड़ोसियों से इस बारे में,’’ सुधीर ने उसे बीच में ही टोक दिया, ‘‘तुम को पैसे की तंगी हो जाएगी, फिर अब तो…’’

सलोनी उस की बात सुन कर सन्न रह गई. सुधीर तीखे लहजे में आगे बोला, ‘‘मेरे कहने का मतलब है कि हम को अब किराया नहीं मिल सकेगा न.’’

इतना कह कर सुधीर अपना थैला ले कर दुकान के लिए निकल गया. सलोनी उस के कहे का मतलब अच्छी तरह समझ रही थी. वह बच्चों को अपनी बांहों में भर कर उदास मन से फिर वहीं बैठ गई.

कुछ दिन ऐसे ही बीतते रहे. उधर सुखलाल की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ चुकी थी. दारोगा राम सिंह उसे पढ़ने में लगा था. सुखलाल की मौत की वजह पेट में लोहे की छड़ धंसना बताई गई थी. बाकी शरीर पर लगी चोटें जानलेवा नहीं थीं. इस के अलावा एक बात जिस ने राम सिंह को चौंका दिया, वह थी सुखलाल के शरीर में मिली जहरीली चीज की मात्रा. जहरीली चीज भी क्या थी, घरों में मच्छर भगाने के लिए काम में आने वाला लिक्विडेटर उस की शराब में मिलाया गया था.

दारोगा राम सिंह को समझ नहीं आ रहा था कि इस का क्या मतलब है? लिक्विडेटर इतना ज्यादा जहरीला नहीं होता कि कोई उस का इस्तेमाल किसी को जहर दे कर मारने के लिए करे. और सुखलाल खुद उसे पीएगा नहीं, फिर यह क्या चक्कर है? फोरैंसिक और फिंगर प्रिंट रिपोर्टें भी उस के सामने थीं. उन के मुताबिक जो छड़ सुखलाल के पेट में धंसी थी, उस पर सुखलाल के अलावा एक और आदमी की उंगलियों के निशान मिले थे. सुखलाल पर एकसाथ इतने सारे हमले कैसे हुए? पहले शराब में जहरीली चीज दी गई, उस के बाद पेट में छड़ घोंपी गई. मारने वाले को इतने से भी संतोष नहीं मिला तो उस ने उस को ऊपर से नीचे गिरा दिया और सुखलाल ने अपने बचाव के लिए किसी को कोई आवाज क्यों नहीं दी?

दारोगा राम सिंह को समझ आने लगा कि सुखलाल की मकान मालकिन सलोनी उस से झूठ बोल रही है. उस ने गुप्त रूप से उस के पड़ोसियों से पूछताछ शुरू कर दी. बाकियों ने तो कुछ खास बात नहीं बताई लेकिन सुखलाल के कमरे की खिड़की के ठीक सामने रहने वाले छात्र विवेक ने कहा, ‘‘सर, उस

रात मैं रोज की तरह जाग कर अपने कंपीटिशन के इम्तिहान की तैयारी में जुटा था तो मैं ने सुधीर भैया को सीढि़यों से ऊपर सुखलाल चाचा के कमरे में जाते देखा था, पर वे बाहर कब आए, इस का मुझे ध्यान नहीं.’’

‘‘अच्छा,’’ राम सिंह को ऐसी ही किसी बात का शक तो पहले से था. उस ने आगे पूछा, ‘‘सुखलाल और सुधीर

की कोई दुश्मनी? वह तो किराएदार था उस का.’’

‘‘सर… वह…’’ विवेक खुल कर कुछ बोलने से बचता दिखा. राम सिंह ने उसे भरोसा दिलाया कि केस में उस का नाम नहीं आएगा.

विवेक ने डरतेडरते कहा, ‘‘सर, सुधीर भैया को शक था सुखलाल चाचा और सलोनी भाभी को ले कर…’’

दारोगा राम सिंह मुसकरा उठा कि यहां भी वही चक्कर. वह वहां से चल पड़ा. गैरकानूनी हथियार रखने के केस में सुधीर के पहले भी गिरफ्तार होने की जानकारी तो उसे अपने थाने के रिकौर्ड से मिल ही चुकी थी. वह चाहता तो सुधीर को सीधे गिरफ्तार कर सकता था, मगर वह अपने महकमे के दूसरे पुलिस वालों सा नहीं था. किसी भी केस को बिना किसी पक्षपात के हल करना उस की पहचान थी.

दारोगा राम सिंह को अब सुखलाल के मोबाइल फोन की तलाश थी. उसे वह न तो सुखलाल के कमरे में मिला था और न ही उस के कपड़ों में. अचानक उस की छठी इंद्रिय ने उस से कुछ कहा और वह उसी जगह आया जहां सुखलाल की लाश पड़ी मिली थी.

दारोगा राम सिंह ने इधरउधर खोजना शुरू किया और आखिर एक पौधे के पीछे छिपा पड़ा सुखलाल का मोबाइल फोन उसे मिल गया.

थाने आ कर दारोगा राम सिंह उसे खंगालने लगा और जल्दी ही अपने काम की चीज उसे नजर आ गई. उस में सुखलाल और सलोनी का एक वीडियो था जो शायद सुखलाल ने चोरीछिपे बनाया था. उस में सुखलाल अपने कपड़े उतारते हुए कह रहा था, ‘बस, मुझे खुश करो, तुम्हारा पति तुरंत थाने से बाहर आ जाएगा.’

वहीं सलोनी उस के आगे गिड़गिड़ा रही थी, ‘मैं अपने पति से बहुत प्यार करती हूं… मुझे ऐसा काम करने को मजबूर मत कीजिए.’

लेकिन सुखलाल ने उस की एक न सुनी और अपने दिल की कर के ही उसे बिस्तर पर लिटा दिया. वीडियो को आगे देखना राम सिंह को सही नहीं लगा. वह हर औरत की इज्जत करता था. उस ने ऐसे भी कई केस देखे थे जहां औरत

ने अपने साथ हुए इस तरह के जुल्मों

का बदला खुद लिया था. उस ने अपनी इसी सोच के साथ एक बार फिर सलोनी से मिलने का फैसला किया और उस के घर पहुंचा.

‘‘दारोगा बाबू, आप यहां,’’ सलोनी उसे देख कर ठिठक गई.

‘‘डरिए नहीं… बस, आप से कुछ जानकारियां चाहिए थीं,’’ दारोगा राम सिंह उसे सहज करने के लिए बोला और सामान्य तरीके से इसी केस के सिलसिले में बातें करने लगा.

इसी बीच दारोगा राम सिंह ने अपना मोबाइल फोन सलोनी के हाथ में दिया जिस से उस की उंगलियों के निशान उस पर आ जाएं और उन का मिलान छड़ पर मिले निशानों से हो सके.

सलोनी उस की यह चालाकी समझ नहीं सकी. राम सिंह ने वापस आ कर उन निशानों की जांच कराई और इस बार फिर उस का सोचना सही निकला. छड़ पर सुखलाल के अलावा सलोनी की

ही उंगलियों के निशान थे. उस ने तुरंत सलोनी को गिरफ्तार कर लिया.

लौकअप में सलोनी दारोगा राम सिंह के सामने रोरो कर कहने लगी, ‘‘दारोगा साहब, मैं ने किसी का खून नहीं किया है. जिंदगी तो मेरी उस सुखलाल ने बरबाद की थी. मैं अकेली उस भारीभरकम आदमी को कैसे मार सकती हूं? मैं ने तो अपने घर की साफसफाई में कुछ दिनों पहले ही लोहे की छड़ों के सारे टुकड़े पास की उसी खाली जमीन में फेंक दिए थे.’’

दादी अम्मा : आखिर कहां चली गई थी दादी अम्मा- भाग 4

जब नर्सिंग होम से डिस्चार्ज होने का समय आया तो दादी अम्मा ने दोनों से कहा, ‘बेटा, अब मुझे घर छोड़ आओ और तुम भी अपना घर देखो. तुम ने मुझ पर बहुत बड़ा एहसान किया है.’

‘यह क्या कह रही हैं, अम्मा. हम दोनों के मांबाप तो रहे नहीं. आप की खिदमत से लगा जैसे उन की कमी दूर हो गई,’ मेहनाज ने कहा.

अम्मा उस के सिर पर हाथ फिराने लगीं. लेकिन अम्मा को आरजू और पोतेपोतियों की याद सता रही थी. इसलिए साजिद और मेहनाज को आगे कभी उन के साथ रहने की तसल्ली दे कर अपने घर आ गईं. उन के आने पर कुछ दिन तक तो बेटेबहुएं उन के आसपास रहे, लेकिन फिर उन का रवैया पहले जैसा हो गया, अम्मा के प्रति उपेक्षित व्यवहार. वे फिर अपनी मौजमस्ती में डूब गए.

कुछ समय बीता तो दादी अम्मा की तबीयत फिर बिगड़ने लगी. अब कौन उन की देखभाल करेगा. वे जबरदस्ती अपने बेटों पर बोझ नहीं बनना चाहती थीं. एक दिन दादी अम्मा ने घर छोड़ दिया. किसी को बता कर नहीं गईं कि कहां जा रही हैं.

आज उन्हें घर छोड़े हुए 1 महीने से ऊपर हो चला था. सभी रिश्तेदारों के बीच खोजा, लेकिन कहीं पता नहीं चला. जब पूरा घर सूना और उजड़ा सा लगा तो बेटों को उन की अहमियत का पता चला. अब वे चाह रहे थे कि किसी भी तरह अम्मा घर वापस आ जाएं. इसीलिए हाजी फुरकान के आगे वे दुखड़ा रो रहे थे.

दूसरे दिन हाजी फुरकान, गफूर मियां, जाबिर मियां और मजहबी कार्यक्रमों के नाम पर चंदा उगाहने वाले रशीद अली को ले कर रेहान के घर पर पहुंच गए. आंगन में दरी बिछा कर उस पर कालीन डाल दी गई और बीच में हुक्का व पानदान रख दिया गया.

‘‘बताओ मियां, क्या परेशानी है?’’ थोड़ी देर हुक्का गुड़गुड़ाने के बाद राशिद अली ने पूछा.

‘‘अम्मा का कुछ पता नहीं चल रहा है. पता नहीं किस हाल में हैं. दुनिया में हैं भी या नहीं?’’ रेहान ने बुझी आवाज में कहा.

‘‘देखो मियां, घबराओ नहीं, हम अपने इलम से अभी पता लगा लेते हैं,’’ जाबिर मियां ने तसल्ली दी, फिर सब से बोले, ‘‘सब लोग खामोश रहें. हमें अपना काम करने दें.’’

वे कुछ देर तक आंखें बंद कर के मुंह ऊपर उठा कर बुदबुदाते रहे. फिर धीरे से बोले, ‘‘बेटा, सब्र से काम लेना. हम ने पता लगा लिया है. तुम्हारी अम्मा अब इस दुनिया में नहीं हैं.’’

‘‘आप ने कैसे पता लगाया?’’ जुबैर ने जिज्ञासावश पूछना चाहा कि गफूर मियां ने उसे बीच में ही झिड़क दिया, ‘‘देखो बेटे, या तो हम पर यकीन करो या फिर हमें बुलाते ही नहीं.’’ फिर हाजी फुरकान पर बिगड़ते हुए बोले, ‘‘मियां, कैसे दीन से फिरे हुए लोगों के घर ले आए हमें. चलो, जाबिर मियां. यहां रुकना अब ठीक नहीं है.’’

इस पर हाजी फुरकान ने जुबैर को डांटना शुरू कर दिया, ‘‘तुम लोग क्या जाबिर मियां को ऐसावैसा समझ रहे हो. बड़े पहुंचे हुए हैं. अपने कब्जे में की हुई रूहानी ताकतों से वे सात समंदर पार की खबर निकाल लेते हैं, यह तो फिर भी यहीं का मामला है. और सुनो, मेरे कहने से तो आ भी गए, वरना ऐसीवैसी जगह तो वैसे भी ये लोग हाथ नहीं डालते हैं,’’ फिर गफूर मियां और जाबिर मियां को समझाते हुए बोले, ‘‘बच्चा है, गलती से पूछ बैठा. आप कहीं मत जाइए, आप की जो खिदमत करनी होगी, उस के लिए ये लोग तैयार हैं. मैं गारंटी लेता हूं.’’

थोड़ी देर तक नाकभौं सिकोड़ने के बाद जाबिर मियां दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए रेहान से बोले, ‘‘देखो बेटे, आप की वालिदा को तो कोई वापस ला नहीं सकता, अलबत्ता उन को शांति मिले, इस के लिए काफी कुछ किया जा सकता है.’’

‘‘वह कैसे?’’ रेहान ने पूछा.

‘‘उन के जीतेजी जो ख्वाहिशें अधूरी रह गई हैं उन्हें पूरा कर के उन को सुकून मिल सकता है. बताओ, क्याक्या ख्वाहिशें थीं उन की? फिर हम ऐसे उपाय बताएंगे कि अम्मा को शांति मिल जाएगी और आप लोगों का प्रायश्चित्त भी हो जाएगा,’ जाबिर मियां उगलदान में पान की पीक थूकने के बाद बोले.

‘‘चचाजान, अम्मा को खीर, पान, रसगुल्ले, फल और मुरब्बे बहुत पसंद थे. बिरयानी भी चाव से खाती थीं,’’ फैजान ने बताया.

‘‘अजी मियां, ये दोचार बातें क्या बता रहे हो, हम ने अपने इलम से पता लगा लिया है कि उन्हें क्याक्या पसंद था,’’ जाबिर मियां हुक्का गुड़गुड़ाने के बाद बोले, ‘‘देखो बेटे, तुम्हारी अम्मा को जो पसंद था, उस की लिस्ट हम दे देते हैं. ये सारा सामान ले आओ, जब तक हम और साथियों को बुला लेते हैं.’’

रेहान ने जब लिस्ट देखी तो उस के होश उड़ गए. उस में 40 मुल्लाओं को धार्मिक अनुष्ठान के मौके पर मुर्गमुसल्लम, पुलाव, खीर, फल और मिठाई मिला कर 25 व्यंजन खिलाने और कपड़े दिए जाने के अलावा गफूर मियां और रशीद अली को अलग से 11-11 हजार रुपए दिए जाने की हिदायत दे डाली थी जाबिर मियां ने.

इन कठमुल्लों के फरमान को टालना तीनों भाइयों के बस की बात नहीं थी. फिर भी थोड़ी देर के लिए वे सोच में पड़ गए.

उन्हें चुप देख कर हाजी फुरकान ने व्यंग्यात्मक शब्दों की तोप दागी, ‘‘मियां, ये लोग तो समझो मुफ्त में परेशानी दूर कर रहे हैं, वरना इस नेक काम के तो लाखों लेते हैं. और यह भी समझो कि अगर इन से आप लोगों का रिश्ता बना रहा तो अपनी रूहानी ताकत और तावीजगंडों से आगे भी इस घर को बुरी हवा से बचाए रखेंगे.’’

इस से आगे बढ़ कर गफूर मियां ने और डरा दिया, ‘‘बेटा, सोच लो, अगर मजहब की परंपराओं को भुला दिया तो इस घर को बरबाद होने से कोई नहीं बचा सकेगा, समझे. हमारा क्या, यहां नहीं तो दूसरों के दुखदर्द दूर करेंगे.’’

‘‘आप नाराज मत होइए. कल अम्मा का चालीसवां है. हम सारा इंतजाम कर देंगे. बस, आप दुआएं देते रहें, आप ही सहारा हैं,’’ रेहान उन के आगे गिड़गिड़ाने लगा.

दूसरे दिन सुबह से ही रेहान, जुबैर और फैजान व उन की पत्नियां चालीसवें के धार्मिक अनुष्ठान की तैयारी में जुट गए. घर के आंगन में बड़ी सी दरी बिछ गई, भट्ठियों पर देगें चढ़ा दी गईं और कठमुल्लों के प्रवचनों के लिए छत के कोनों पर लाउडस्पीकर लगा दिए गए.

दोपहर होतेहोते कठमुल्लों की भीड़ आंगन में इकट्ठी हो गई. जाबिर मियां के आदेश पर दरी के बीच में अम्मा की पसंद का नाम ले कर तरहतरह के पकवान सजा दिए गए. आरजू यह सब देख कर दुखी हो रही थी. वह खुले विचारों की थी और रूढि़यों व मजहब के नाम पर धंधेबाजों से उसे नफरत थी.

वह सोच रही थी कि मुसलिम समाज में कितना ढकोसला है. जब दादी अम्मा जीवित थीं तो ये बेटे उन को 2 रोटी और 1 कटोरी दालसब्जी नहीं देते थे और अब उन की मृत्यु हो जाने पर कितने पकवान उन के नाम पर बना रहे हैं, जिन्हें वे स्वयं ही खाएंगे. उसे जब इस ढकोसले से चिढ़ होने लगी तो कमरे में चली गई.

थोड़ी देर बाद जाबिर मियां ने प्रवचन शुरू किया. उन्होंने संबोधन के कुछ शब्द ही बोले थे कि दरवाजा खटखटाने की आवाज आई. कमरे से निकल कर आरजू ने जब दरवाजा खोला तो सामने दादी अम्मा खड़ी थीं, साथ में साजिद और मेहनाज भी थे.

कुछ पल के लिए आरजू चौंकी, फिर ‘दादी अम्मा’ कहते हुए उन से लिपट कर रोने लगी. जब दादी अम्मा आंगन में आईं तो उन्हें जिंदा देख कर अफरातफरी मच गई. तीनों बेटे और बहुएं उन्हें भय व आश्चर्य से देखने लगे.

‘‘घबराओ नहीं, अम्मा जिंदा हैं. लेकिन तुम लोगों ने तो इन्हें जीतेजी मार ही दिया था. जब इन्हें रोटी और कपड़ों की जरूरत थी तो पूछा नहीं और अब पकवानों व कपड़ों के ढेर लगा रहे हो. और ये लोग प्रवचन कर रहे हैं, इन की झूठी मौत का बहाना बना कर कमाई कर रहे हैं,’’ साजिद ने अपने दिल की भड़ास निकाल डाली.

आंगन में सन्नाटा सा छा गया. हाजी फुरकान और उन के साथ आए कठमुल्लों की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. उन्होंने वहां से खिसकने में ही भलाई समझी. कठमुल्लों के जाने के बाद सारे बच्चे अम्मा से लिपट गए.

‘‘कहां चली गई थीं, दादी अम्मा, मुझे छोड़ कर?’’ आरजू ने आंसू पोंछते हुए पूछा.

‘‘मैं बताता हूं,’’ साजिद ने कहा. और फिर साजिद ने जो बताया उसे सुन कर बेटे और बहुएं शर्म से गड़ गए.

दरअसल, पिछली बार जब दादी अम्मा बीमार पड़ीं तो वे लापरवाह बेटों व बहुओं पर बोझ बनने और अपनी देखभाल न हो पाने के दुख से बचने के लिए दूसरे शहर में बुजुर्गों की देखभाल करने वाले संस्थान में चली गईं, ताकि बाकी जिंदगी वहीं काट सकें. वे साजिद और मेहनाज के पास भी यह सोच कर नहीं गईं कि जब सगे बेटेबहुएं अपने नहीं हुए तो दूर के रिश्तेदार पर बोझ क्यों बना जाए. इस की जानकारी होने पर साजिद और मेहनाज ने तमाम दौड़धूप के बाद उन का पता लगाया और किसी तरह उन्हें वापस घर आने के लिए राजी किया.

‘‘अम्मा, हमें माफ कर दो. हम से बड़ी भूल हो गई. अब हम कभी ऐसा नहीं करेंगे. हमें एक मौका दे दो,’’ कहते हुए तीनों बेटे और बहुएं दादी अम्मा के पास आ गए. उन्होंने एकएक कर के सब को गले लगाया. ऐसा करते उन की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए.

बहके कदमों का खूनी अंजाम

राजस्थान के भरतपुर जिले के चिकसाना थाना क्षेत्र के गांव नौह निवासी हरिप्रसाद शर्मा के शादीशुदा बेटे पवन शर्मा के रहस्यमय परिस्थितियों में घर से देर रात गायब हो जाने पर परिवार ही नहीं, मोहल्ले के लोग भी अचंभित हो गए.

गुमशुदा पवन शर्मा के घर वालों को उस की पत्नी टीना ने बताया कि देर रात किसी का फोन आया था, जिस के बाद कामधंधे के लिए जाने की बात कह कर वह कहीं चले गए. जाते समय उन्होंने बताया था कि थोड़ी देर में आ जाएंगे.

टीना की बात पर यकीन कर के घर वाले कुछ नहीं बोले. हालांकि आधी रात को कामधंधे के लिए कहीं चले जाने की बात उन के गले से नहीं उतरी, पर और कोई चारा भी नहीं था. लेकिन 4-5 दिन गुजर जाने के बाद पवन वापस नहीं आया तो पिता हरिप्रसाद शर्मा थाने में बेटे की गुमशुदगी दर्ज कराने के लिए जाने लगे.

इस पर पहले तो टीना ने उन्हें यह कह कर रोकने की कोशिश की कि वो कामधंधे के लिए गए हैं, गुमशुदगी दर्ज कराई तो पुलिस उलटे हमें ही परेशान कर सकती है. फिर बाद में कुछ सोच कर उस ने ससुर के साथ चिकसाना थाने जा कर पति की गुमशुदगी दर्ज करवा दी.

पुलिस ने हरिप्रसाद से पवन का हुलिया, पहने गए कपड़ों सहित अन्य जरूरी जानकारी ले कर गुमशुदगी दर्ज कर ली और अपने स्तर से पवन को तलाशना शुरू कर दिया.

लेकिन हफ्ते-2 हफ्ते की बात छोडि़ए, 4-5 महीने बीत जाने के बाद भी पवन की खबर नहीं मिली, जिस से उस के घर वाले निराश हो चुके थे. जबकि बहू टीना अपने में मस्त रहती.

बच्चों को उस ने पहले ही पवन के दादादादी के पास बेहतर पढ़ाई कराने के बहाने भेज दिया था, इसलिए उस पर कोई जिम्मेदारी तो थी नहीं. वह आजादी से मनमानी कर रही थी. बस एक काम वह जरूर कर रही थी. वह यह कि सभी व्रत उपवास और धार्मिक कार्यों में घर वालों के साथ जरूर शामिल होती थी.

पवन की गुमशुदगी के बाद घर वालों की नजर में टीना एक तरह से दुखियारी बन चुकी थी, इसलिए हर कोई उस से सहानुभूति रखता था.

अक्तूबर 2022 महीने की 18 तारीख थी. हरिप्रसाद शर्मा को नींद नहीं आ रही थी. जवान बेटे के असमय वियोग ने उन्हें उम्र से कहीं ज्यादा बूढ़ा बना दिया था. जीवन बोझ लगने लगा था. बस बेटे के वापस आने की उम्मीद में ही जिंदा थे.

देर रात हरिप्रसाद शर्मा पानी पीने के लिए उठे तो बहू के कमरे से किसी मर्द की आवाज सुन उन्हें लगा कि शायद उन की मुराद पूरी हो गई है और बेटा वापस आ गया है. कौतूहलवश उन के कदम बहू के कमरे की तरफ बढ़ चले. लेकिन थोड़ी दूर जा कर ही उन्हें रुकना पड़ा.

कमरे के अंदर बेटा तो नहीं था, बल्कि पड़ोसी भोगेंद्र उर्फ भोला उन की बहू के साथ आपत्तिजनक हालत में था. बहू टीना का हाथ पकड़ कर वह कह रहा था, ‘‘जानू, किस्मत अच्छी थी जो अपना काम भी हो गया और किसी को पता भी नहीं चला. मस्त रहो तुम, अब अपन ऐश करेंगे.’’

यह सुन कर अपमान, शर्म और दुख से आहत हो हरिप्रसाद ने बहू के कमरे को बाहर से ताला लगा दिया और थाने में सूचना देने चल पड़े. लेकिन जब तक पुलिस पहुंचती भोगेंद्र उर्फ भोला ने फोन कर अपने पिता दिनेश चंद और भाई को बुला लिया.

उन दोनों ने हरिप्रसाद के घर वालों से लड़झगड़ कर कमरे का ताला तोड़ कर भोगेंद्र को वहां से निकाल लिया और अपने साथ ले गए. भोगेंद्र उसी रात को गांव से दिल्ली चला गया.

हरिप्रसाद शर्मा ने 20 नवंबर, 2022 को चिकसाना थाने पहुंच कर लिखित शिकायत कर दी. उन्होंने अपनी बहू टीना और उस के प्रेमी भोगेंद्र द्वारा अपने बेटे पवन की हत्या अथवा उसे गायब करने का आरोप लगाया.

एसएचओ विनोद कुमार मीणा ने मामले की गंभीरता देखते हुए हत्या के ऐंगल से मामले की जांच शुरू की और भरतपुर के एसपी श्याम सिंह के आदेश तथा एएसपी बृजेश ज्योति उपाध्याय (आईपीएस) के निर्देशन में पुलिस टीम गठित की गई, जिस में एएसआई बलबीर सिंह, महेंद्र सिंह, हेडकांस्टेबल कैलाश चंद और सिपाही पुष्पेद्र सिंह, उदयवीर सिंह तथा योगेंद्र सिंह को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने सब से पहले दिल्ली से गांव लौटे आरोपी भोगेंद्र और टीना को हिरासत में ले कर उन से मनोवैज्ञानिक ढंग से पूछताछ की. इस के साथ ही साक्ष्य एकत्रित किए.

पुलिस पूछताछ से घबरा कर टीना और भोगेंद्र ने हत्या को अंजाम देना कुबूल कर लिया, जिस के बाद दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया. आरोपियों के कुबूलनामे के बाद पवन की हत्या की जो कहानी उजागर हुई, वह इस प्रकार निकली—

राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सरहद पर बसा एक बड़ा शहर है भरतपुर, जिसे उत्तर प्रदेश के लोग राजस्थान का प्रवेश द्वार भी कहते हैं. इसी भरतपुर जिले के चिकसाना थाना क्षेत्र गांव नौह में ब्राह्मणों के कई परिवार रहते हैं.

इन में से एक परिवार है हरिप्रसाद शर्मा का. इन के बेटे पवन शर्मा की शादी की उम्र निकलती जा रही थी. उस के योग्य कोई रिश्ता नहीं मिल पाने से मातापिता और रिश्तेदार चिंता में रहते थे.

तभी पवन के लिए उत्तर प्रदेश के महानगर कानपुर से टीना नाम की लड़की का रिश्ता आया. फिर दोनों ओर से बातचीत हो जाने पर यह रिश्ता तय हो गया और 2015 में पवन की शादी टीना के साथ हो गई.

महानगर की रहने वाली खुले स्वभाव की टीना को गांव में स्थित ससुराल आ कर थोड़ी परेशानी हुई, लेकिन भरतपुर शहर गांव के नजदीक होने के कारण वह धीरेधीरे वहां के रंग में रचबस गई. हंसीखुशी के साथ पतिपत्नी का समय बीतने लगा और 5 साल में टीना 2 बच्चों की मां भी बन गई.

बच्चे बड़े हुए तो दंपति ने उन्हें उन की अच्छी पढ़ाई के लिए थोड़ी दूर स्थित दादादादी के पास छोड़ दिया. टीना और पवन पिता के साथ रहने लगे. पवन और टीना की उम्र में बड़ा अंतर था. जहां टीना 23 की थी वहीं पवन 37 साल का यानी उन की उम्र में 14 साल का अंतर था.

उम्र का ये बड़ा अंतर शुरू में तो पता नहीं चला, लेकिन वक्त गुजरने के साथ ही दांपत्य जीवन में यह अंतर अपना असर दिखाने लगा. जहां टीना हिरनी की तरह कुलांचे भर कर दौड़ना चाहती थी तो वहीं 2 बच्चों का बाप बनने के बाद पवन धीरगंभीर हो गया था और कामधंधे को ले कर ज्यादा समय गुजारने लगा था.

पति द्वारा अपनी उपेक्षा से आहत टीना ने इसी दौरान करीब 2 साल पहले ब्राह्मण परिवार के हमउम्र पड़ोसी युवक भोगेंद्र उर्फ भोला से जानपहचान बढ़ा ली, जो बाद में अवैध संबंधों में बदलती गई.

27 वर्षीय भोगेंद्र दिल्ली की किसी प्राइवेट फर्म में नौकरी करता था और गांव में घर होने के कारण समयसमय पर आताजाता रहता था. जब से टीना से उस की आंखें चार हुईं, भोगेंद्र टीना के आकर्षण में फंस कर उस के आसपास मंडराने लगा और दोनों का प्रेम परवान चढ़तेचढ़ते अनैतिकता की हदें पार कर गया.

पवन को भोला का बारबार उस के घर आना अच्छा नहीं लगता था, लेकिन 2 बच्चों की मां बन चुकी पत्नी पर वह शक नहीं करना चाहता था, इसलिए देवरभाभी का रिश्ता मान कर चुप रह जाता था, जिस का बेजा फायदा उठा कर टीना और भोगेंद्र उर्फ भोला मर्यादा की सीमाएं लांघ गए थे.

मई महीने की एक रात थी, जब थकान के कारण पवन जल्दी घर आ कर सो गया था. देर रात उस की नींद खुली तो अपनी पत्नी को भोगेंद्र के साथ हमबिस्तर देख सन्न रह गया.

फिर परिवार की बदनामी होने के चलते दोनों को कड़ी फटकार लगा कर उस ने मामला दबा दिया, लेकिन वासना की आग में जल रहे टीना और भोगेंद्र ने अपने रास्ते के कांटे पवन को ठिकाने लगाने का मन बना लिया था. वे मौके की तलाश में रहने लगे.

तयशुदा साजिश के अनुसार 29 मई, 2022 की रात को टीना ने फोन कर दिल्ली से भोगेंद्र को गांव बुलाया तो वह अपने दोस्त उत्तर प्रदेश के एटा जिले के रहने वाले दीप सिंह के साथ रात साढ़े 12 बजे गांव पहुंचा और दीप सिंह को घर के बाहर बाइक पर छोड़ कर खुद टीना से मिलने घर में घुस गया.

वह बेखौफ हो कर उस से रोमांस करने लगा, तभी पवन की नींद खुल गई और अपनी पत्नी को गैरमर्द की बाहों में देख अपना आपा खो बैठा. वह भोगेंद्र उर्फ भोला से भिड़ गया. लेकिन कदकाठी से मजबूत भोगेंद्र ने नींद से जागे पवन का मुंह दबोच कर उसे काबू में कर लिया और अपने साथी दीप सिंह को बुला कर उस की मदद से पवन की रस्सी से गला घोट कर हत्या कर के ठिकाने लगा दिया.

रात ढलने वाली थी, इसलिए रजाई के कवर में लाश लपेट कर बोरे में भर कर दोनों दोस्तों ने वह बैड के अंदर बने बौक्स में रख दी. उन्होंने सोचा कि मौका देख कर नहर में फेंक देंगे. फिर दोनों सुबह होने से पहले बाइक से दिल्ली चले गए. अगले दिन वट सावित्री व्रत आया, यह व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सलामती के लिए रखती हैं.

टीना ने भी व्रत पूजा की और बाद में उसी बैड पर बैठ कर खीरपूरी खाई, जिस के अंदर बौक्स में पति की लाश रखी गई थी. इत्मीनान से फोन पर किसी से देर तक बातचीत करने के बाद वह सो गई.

एकदो दिन से ज्यादा लाश को घर में नहीं रखा जा सकता था, क्योंकि गरमी के दिन थे. बदबू फैल कर हत्या का राज फाश कर सकती थी. लिहाजा वापस भोगेंद्र अपने दोस्त दीप सिंह के साथ गांव नौह पहुंचा. दोनों ने बाइक से गांव से 2 किलोमीटर दूर स्थित गिरिराज नहर में लाश बड़े पत्थर से बांध फेंक दी. इस के बाद वे दोनों वापस दिल्ली लौट गए.

इस बीच रोनेधोने के साथ ही टीना ने एकदो दिन खानापीना छोड़ कर घर वालों को जता दिया कि वह पति के लापता हो जाने से बेहद दुखी है. साथ ही गुमशुदगी दर्ज होने के बाद कुछ दिनों तक शातिरदिमाग टीना और भोगेंद्र ने मोबाइल से बात करनी बंद कर दी, ताकि किसी को उन शक न हो. इसी बीच टीना अपने पीहर वालों को बुला कर उन के साथ कानपुर चली गई.

वापस भरतपुर आने के बाद टीना घर वालों और पुलिस की गतिविधियों के समाचार दूसरे फोन से प्रेमी भोगेंद्र को दे कर सचेत करती रही. खास बात यह रही कि गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस और घर वाले पवन को तलाशते रहे और भोगेंद्र तथा टीना वापस मिलने लगे और उन की नजदीकियां बढ़ती गईं.

2 बच्चों की मां टीना और भोगेंद्र का प्रेम धीरेधीरे पागलपन की हद तक पहुंच चुका था. दोनों को एकदूसरे से मिले बिना चैन नहीं था, इसलिए दोनों देर रात को उस वक्त चोरीछिपे मिल लेते थे. जब दुनिया वाले सो रहे होते.

दीपावली से पहले महिलाओं का सब से महत्त्वपूर्ण व्रत करवाचौथ आया. तब भी टीना ने पति की लंबी उम्र और सलामती के लिए वह सावित्री का व्रत रखा. उस ने नई साड़ी पहन, शृंगार कर के दूसरी औरतों की तरह करवाचौथ की कहानी सुन कर चंद्रमा की पूजा आरती भी की. किसी को शक तक नहीं होने दिया कि गुमशुदा पवन शर्मा के साथ अनहोनी हो चुकी है.

लेकिन 16 अक्तूबर, 2022 की रात को हरिप्रसाद को बहू की हकीकत पता लग गई. भोगेंद्र उर्फ भोला और टीना की निशानदेही पर पुलिस ने मृतक के कमरे में उस के बैड से खून से सना रजाई का कवर, नायलौन की रस्सी के अतिरिक्त हत्याकांड में प्रयुक्त बाइक बरामद कर ली.

अभियुक्त भोगेंद्र को रिमांड पर ले कर पुलिस उसे उस जगह ले गई, जहां उस ने पवन की लाश फेंकी थी. गोताखोरों की मदद से नहर के गंदे पानी से मृतक का करीब 6 महीने पुराना शव जो करीबकरीब नष्ट हो चुका था. उस की हड्डियां और वह बड़ा पत्थर बरामद कर जब्त कर लिया, जिस से बांध कर शव फेंका था.

साथ ही नहर से मिली मृतक पवन की पैंट शर्ट की जेबों से पवन तथा टीना के आधार कार्ड जन आधार कार्ड भी बरामद कर सबूत के लिए जब्त कर लिए और हत्याकांड के बाद फरार हो गए भोगेंद्र के साथी दीप सिंह निवासी एटा (उत्तर प्रदेश) को तलाशना शुरू किया.

पुलिस टीम ने उसे भी जल्दी गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया. साथ ही 21 नवंबर से 4 दिन के पुलिस रिमांड पर चल रहे भोगेंद्र उर्फ भोला को भी रिमांड अवधि पूर्ण होने तथा सभी वांछित साक्ष्य बरामद कर लेने के बाद 24 नवंबर, 2022 को अदालत में पेश किया गया, जहां से कोर्ट के आदेश पर दोनों आरोपियों को न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया.

मृतक की पत्नी टीना को पहले ही गिरफ्तार कर कोर्ट के आदेश पर जेल भेजा जा चुका था. कथा लिखे जाने तक पवन शर्मा हत्याकांड के सभी तीनों आरोपियों को जेल भेज दिया गया था.

हालांकि मामला न्यायालय में विचाराधीन है, लेकिन दुखद बात यह रही कि टीना की नासमझी या यूं कहिए कि टीवी के क्राइम पैट्रोल जैसे शो लगातार देखने के कारण उपजी शातिराना हरकतों की वजह से उस की खुशहाल गृहस्थी तो उजड़ी ही, साथ ही 2 निर्दोष मासूम बच्चे भी अनाथ हो गए

उदास क्षितिज की नीलिमा: आभा को बहू नीलिमा से क्या दिक्कत थी- भाग 3

अच्छा पूजापाठ की बात कह कर मजाक बनाया जा रहा. वह दुखी हो जाता मन ही मन.

उस की हंसी उड़ती और वह अलसाए कदमों को खींचते हुए उन से दूर चला जाता, हमेशा एकाकी.

पहाड़ी मंदिर पर दर्शनार्थी का पूजा निबटा कर अभी नल में हाथमुंह धोते हुए वह दुनियाभर की इन्हीं बातों पर अपना सिर पीट रहा था कि नीलिमा ने उसे आवाज दी- “पंडित जी.”

“क्या है?” पुकारने वाले को बिना देखे ही वह चिड़चिड़ा कर बोल पड़ा था. मन ही मन जिस बात पर खफा था, दुखी था, उसी शब्द के कानों में पड़ते ही उस ने पलट कर जवाब दिया. मगर जैसे ही उस ने बोलने वाले की ओर देखा, खूबसूरत नीलिमा को पा कर सकपका गया. अभी तक वह सास के साथ ही ऊपर आती थी, इसलिए क्षितिज ने कभी उस पर गौर नहीं किया था.

आज पीली सिफोन की साड़ी में सोने सा उस का उज्ज्वल रंग सुनहरे सूरज सा चमक रहा था. 5.4 फुट की हाइट, लंबी, भींगी, एक अलसायी सी चोटी, ललाट पर गोल लाल बिंदी और कलाई में पीली चूड़ियों की धूम थी.

क्षितिज ने शांति से निहारा, वह नल पर अपना पैर धोती रही. फिर क्षितिज की ओर मुखातिब हुई, “आप को देर तो न हो जाएगी? पूजा कर देंगे?”

“हां, क्यों नहीं? देर किस बात की?”

“आप को कचहरी जाना है न.”

“हां, आप को किस ने बताया?”

“आप के पापा ने मेरी सासुमां को बताया था, आप वहां जूनियर वकील हैं.”

“चलिए, पूजा कर देता हूं.”

पूजा की थाली ले  कर मंदिर के गर्भगृह तक चलते हुए नीलिमा पिछड़ जाती है तो क्षितिज मुड़ कर देखता है. नीलिमा लंगड़ा कर चल रही थी.

“अरे, क्या हुआ आप को?” क्षितिज ने चौंकते हुए पूछा. नीलिमा ने घटना बताई. क्षितिज ने पूजा की थाली उस के हाथ से ले ली और उसे सहारा दे कर मंदिर के गर्भगृह तक ले आया.

पूजा करते हुए उसे बारबार नीलिमा के बारे में जानने की इच्छा होती रही. पूजा के बाद किसी  तरह क्षितिज ने नाम से बातचीत शुरू की.

“अगर बुरा न मानें तो आप का नाम जान सकता हूं?”

“नाम तो नीलिमा है, लेकिन बुरा क्यों मानने लगी?”

“आप शादीशुदा हैं न, शादीशुदा स्त्री में दिलचस्पी लेना…”

“देखिए, शादीशुदा स्त्री कोई अजूबा नहीं होती, वह शादी के बाद अपने सारे अधिकार खो नहीं देती.”

“वह तो ठीक है लेकिन पति को पसंद नहीं होता न.”

“पत्नी को भी पति की ढेरों बातें पसंद नहीं होतीं, क्या पति, पत्नी के अनुसार चलता है?

और मेरी तो बात ही अलग है. पति ही पसंद नहीं, तो पति की पसंद पर जाऊं ही क्यों?”

क्षितिज अचरज से उसे देख रहा था, बोला, “काश, आप मेरी दोस्त हो पातीं. आप में तो गजब का आत्मविश्वास है.”

“दोस्त होने में दिक्कत क्या है. मैं कल से आधा घंटा पहले आ जाया करूंगी, फिर हमें बात करने को कुछ वक्त मिल जाया करेगा. दोस्ती तो एकदूसरे को अच्छी तरह जानने से ही होगी न.”

दोनों ने अब अपने लिए समय निकालना शुरू किया.

नीलिमा का खिला रूप, धूपधूप सा आत्मविश्वास, जिंदगी को तसल्ली से जीने की इच्छा… उदास क्षितिज में भी आसमानी रंग भरने लगे, उस की झिझक जाती रही.

नीलिमा और क्षितिज मंदिर के पीछे पहाड़ पर बैठ कुछ देर बातें करते.

“जानते हो क्षितिज, मैं शादी से पहले की जिंदगी को खूब याद करती हूं.”

“क्यों, ऐसा क्या था पहले, जो अब नहीं है?”

“कालेज, घूमनाफिरना, अपनी पसंद का खाना, पहनना, अपने शौक…सबकुछ. ग्रेजुएशन करते हुए मैं ने केक बनाना सीखा. शादी से पहले तक मेरा बिसनैज अच्छा चल निकला था.”

“फिर शादी की जल्दी क्या थी?”

“जल्दी मुझे नहीं, मेरे बड़े भाई व भाभी को थी.

“बचपन में पापा की मौत के बाद मां ने बड़ी मुश्किल से हमें संभाला और बड़े भाई, जो मुझ से 5 साल बड़े हैं, मात्र 19 साल के होते ही पापा के औफिस में नौकरी में लगा दिए गए. नौकरी लग गई, तो 22 साल में 20 साल की लड़की से मां ने उन का विवाह भी करवा दिया. इसलिए जैसे ही मेरी स्नातक पूरी हुई, बड़े भाईभाभी ने मेरी शादी का कर्तव्य निभा कर छुट्टी पा जाने में ही अपनी भलाई समझी.

“जब भाई की शादी 22 साल में हुई तो मां के पास भी चारा नहीं था कि वे मेरी शादी रोक लें और वह भी तब जब अच्छाभला लड़का मिल गया था.  इकलौता लड़का, अपना अच्छा बड़ा घर, सरकारी नौकरी और सास के सिवा कोई जिम्मेदारी भी न थी. अब अलग बात है कि यह अकेली सास सौ बोलने वाली औरतों के बराबर है.

“अभी तो यह हाल है कि हमारा जिंदा रहना ही पूजापाठ और कर्मकांड के लिए रह गया है.

आएदिन तीनचार घंटे पूजा की तैयारी में लगाओ,  पूजा की सामग्री के पीछे पैसा और समय बहा, अपने शौक और जरूरी कामों को मारो.  इस के बाद भी सास की सहेली मंडली के नाज उठा कर बदनामी भी सहो. एक और बड़ी मुश्किल मेरी ड्रैस को ले कर है. मैं वैस्टर्न ड्रैस की शौकीन हूं, लेकिन यहां तो बहू का ऐसा लेबल लग गया है कि साड़ी के सिवा कुछ पहन ही नहीं सकती.”

“तुम्हारी जिंदगी तो बिलकुल मेरी जैसी है नीलू.”

नीलिमा ने देखा क्षितिज की ओर. आसमान की नीलिमा से क्षितिज के संधिस्थल की दूरी मिट चुकी थी. नीलिमा धीरे से उठ कर क्षितिज के बिलकुल पास बैठ गई. दोनों के चेहरे पास थे, सांसें गहरी हो चली थीं. क्षितिज ने उम्रभर की शिद्दत जुटा कर नीलू के होंठों पर अपने होंठ रख दिए. नीलू की आंखें बंद हो गईं.

क्षितिज ने हटते हुए कहा- “नीलू, मुझे माफ करो. प्यार पर जोर न चल सका.”

“अब कोई माफी नहीं होगी.”

क्षितिज का चेहरा पीला पड़ने लगा. नीलिमा ने उसे गले से लगा लिया और उस के होंठों पर भरपूर चुंबन रख दिया.

“नीलू…”

“अब पाप की धारणा में मत बहना. अगर पाप ही कहना है तो मेरा निरूपम से रिश्ता पाप है, वह रिश्ता जहां सिर्फ शरीर के सुख के लिए एक स्त्री को रौंदा जाता है. अगर पाप है तो वही है. प्रेम तो सब से शुद्ध है, शांत है, आनंद है.”

“नीलू,  पापा बता रहे थे तुम्हारा मायका टाटी सिलवे है, सुवर्ण रेखा नदी से आगे. क्यों न मायके जाओ और उधर मैं सुवर्ण रेखा के तट पर तुम से मिलूं?”

“जाने नहीं देते और घर में चाहता भी कौन है कि मैं वहां जाऊं. लेकिन हम सुवर्ण रेखा पर मिलेंगे जरूर. तुम बता देना, मैं आ जाऊंगी.”

और इस तरह दोनों का सफर शुरू हुआ.

नीलिमा जब भी आती, अपने पसंदीदा वैस्टर्न ड्रैस में. और क्षितिज को भी मिल गई थी अपने पसंद से जीनेपहनने की आजादी.

वैसे यह सबकुछ उन्हें मिला था कुछ कीमत चुका कर ही.

कभी झूठ, कभी बहाने- नीलिमा और क्षितिज  को बड़ी मुश्किलों से  निभानी पड़ रही थी यह दोस्ती.

लेकिन जब 2 दिलों के दर्द एक थे, उदासियां एक थीं, सपने और जिंदगी एक सी थी, तो दोस्ती की सारी बाधाओं को तो पार पाना ही था.

नीलिमा और क्षितिज आज के युवा थे, उन्हें यह कतई पसंद नहीं था कि उन के जीवन और इच्छा की डोर किसी और के हाथों में बंधी रहे.

जब दोनों ने कुछ अपनी कही, कुछ उन की सुनी, लगा उन का दर्द उन की असुविधाएं अलग कहां.

नीलिमा ने उस दिन नदी के किनारे बैठ क्षितिज से पूछा- “तो तुम्हारा आखिरी फैसला यही है?”

“हां, बस यही. तुम न मत कहना.”

नीलिमा और क्षितिज वापस घर आ गए थे. वे बेचैन थे. क्या यह फैसला सही था? क्षितिज ने  इस बारे में रामेश्वर सर से बात की. उन्होंने भी माना, इस तरह चोरीछिपे मिलना सही नहीं. अब ज्यादा दिन ऐसे ही बीते तो निश्चित ही परिवार व समाज के हाथों उन दोनों की बुरी गत होगी.

रामेश्वर सर ने क्षितिज को सारी बातें समझा दीं.

महीनेभर नीलिमा ने जैसेतैसे बिताया.

एक दिन रामेश्वर सर नीलिमा की ससुराल आए. उन लोगों से कहा कि वे नीलिमा के पापा के दोस्त हैं, उन के घरवालों ने नीलिमा को खाने पर बुलाया है, साथ ले जाने आए हैं, शाम तक नीलिमा को वापस भेज देंगे. नीलिमा सारी बातें जानती थी, वह रामेश्वर के साथ चली आई.

शाम को नीलिमा के बदले आया नीलिमा के निरूपम से तलाक के कागज. वे अवाक रह गए. ससुराल और मायके में हड़कंप मच गया.

नीलिमा ने साफ कर दिया कि वह बालिग है, जिंदगीभर मरमर कर नहीं जिएगी.

सारा कुसूर, सारा दोष जब लड़की का ही है और उसे शांति से, अपनी मरजी से सजनेसंवरने व पसंदीदा काम करने का अधिकार ही नहीं, तो वह घुटघुट कर नहीं जी सकती.

चूंकि तलाक के साथ नीलिमा ने किसी संपत्ति की मांग नहीं की थी, उसे बहुत जल्द तलाक मिल गया.

रामेश्वर के पास अपने 3 मकान थे. उन में 2 को वे किराए पर दिया करते थे.  उन में से एक के किराएदार पहले से ही घर खाली करने वाले थे. उन के घर खाली करते ही क्षितिज और नीलिमा  कोर्टमैरिज का फैसला कर रामेश्वर के इस बढ़िया हवादार मकान में साथ रहने चले आए.

अब सेवाराम की नींद उड़ी. बेटे को बुलवा कर लाख समझाया लेकिन बेटा टस से मस नहीं हुआ. तो सेवाराम बिफर पड़े- “पंडित हो कर कुर्मी की शादीशुदा औरत से विवाह. बहुत हेठी होगी, पूरा धंधा चौपट हो जाएगा, पंडित बिरादरी में नाक कटेगी, यजमानों के घर छूट जाएंगे. कुछ तो समझो.”

“कुछ नहीं समझना है पिताजी. प्यार में निर्णय लिया जाता है, आप समझें मेरी परेशानी.

पूजापाठ बहुत हुआ, अब मुझे मेरी जिंदगी जीने दीजिए. और यह मेरी अकेली की बात भी नहीं, नीलिमा को अकेला क्यों छोड़ दूं? उस ने तो मेरी खातिर इतनी हिम्मत की. अगर आज की युवा पीढ़ी अंधविश्वास और कर्मकांड के पीछे, जातपांत, भेदभाव और कुसंस्कार के पीछे अपना सुकून गंवा दे, तो उस की सारी ऊर्जा व्यर्थ चली जाएगी. समाज के लिए, आर्थिक और राजनीतिक बेहतरी के लिए एक युवा क्या कुछ नहीं कर सकता है. आप लोग उन की क्षमता को अंधविश्वास व भेदभाव की परंपरा में नष्ट करना चाहते हैं?”

क्षितिज खुद आश्चर्य में था कि उस ने अपनी दिल की बात इतनी बेझिझक कही कैसे? क्या यह नीलिमा की दी हुई शक्ति और प्रेरणा है…

सेवाराम अब भी अड़े थे- “बेटा, तू यह सब बातें छोड़, चल एक काम कर, तुझे जितना रहना है उस के साथ रह ले, घूम ले, शादी मत करना. ब्राह्मण का बेटा सोने की अंगूठी है, सोने की अंगूठी में दोष नहीं होता. एकदो साल बाद मैं तेरे लिए  ब्राह्मण की अच्छी लड़की ले आऊंगा.”

“पिताजी, आप इतने वर्षों से पूजापाठ करते आ रहे हैं, लेकिन आप ने पूजा का अर्थ नहीं समझा. जिस दिन मानव से प्रेम कर लेंगे, धर्मजाति का भेद भूल जाएंगे. आप की पूजा पूरी हो जाएगी. मैं नीलिमा के साथ जिंदगीभर का साथ निभाने जा रहा हूं पिता जी.  हां, आप की जरूरतों पर मैं हमेशा आप का साथ दूंगा.”

कोर्टमैरिज के बाद नीलिमा और क्षितिज के नए घर में प्रेम की नीलवर्णी अपराजिता खिल उठी. वह उदास क्षितिज नीलिमा की गहराई में समा कर आशा का आकाश हो गया था.

विश्वास: क्या थी कहानी शिखा की- भाग 3

‘‘तब क्या दूसरों को खुश करने के लिए तुम अपनी मां को चरित्रहीन करार दे दोगी? उन की झूठी बातों पर विश्वास कर के अपनी मां को उस की सब से प्यारी सहेली से दूर करने की जिद पकड़ोगी?’’

‘‘मुझ पर क्या गुजर रही है, इस की आप को भी कहां चिंता है, मम्मी,’’ शिखा चिढ़ कर गुस्सा हो उठी, ‘‘मैं आप की सहेली नहीं बल्कि सहेली के चालाक पति से आप को दूर देखना चाहती हूं. अपनी बेटी की सुखशांति से ज्यादा क्या कमल अंकल के साथ जुडे़ रहना आप के लिए जरूरी है?’’

‘‘कमल अंकल मेरे लिए तुम से ज्यादा महत्त्वपूर्ण कैसे हो सकते हैं, शिखा? मुझे तो अफसोस और दुख इस बात का है कि मेरी बेटी को मुझ पर विश्वास नहीं रहा. मैं पूछती हूं कि तुम ही मुझ पर विश्वास क्यों नहीं कर रही हो?  अपनी सहेलियों की बकवास पर ध्यान न दे कर मेरा साथ क्यों नहीं दे रही हो? मेरे मन में खोट नहीं है, इस बात को मेरे कई बार दोहराने के बावजूद तुम ने उस पर विश्वास न कर के मेरे दिल को जितनी पीड़ा पहुंचाई है, क्या उस का तुम्हें अंदाजा है?’’ बोलते हुए अंजलि का चेहरा गुस्से से लाल हो गया.

‘‘यों चीखचिल्ला कर आप मुझे चुप नहीं कर सकोगी,’’ गुस्से से भरी शिखा उठ कर खड़ी हो गई, ‘‘चित भी मेरी और पट भी मेरी का चालाकी भरा खेल मेरे साथ न खेलो.’’

‘‘क्या मतलब?’’ अंजलि फौरन उलझन का शिकार बन गई.

‘‘मतलब यह कि पापा ने अपनी बिजनेस पार्टनर सीमा आंटी को ले कर आप को सफाई दे दी तब तो आप ने उन की एक नहीं सुनी और यहां भाग आईं, और जब मैं आप से कमल अंकल के साथ संबंध तोड़ लेने की मांग कर रही हूं तो किस आधार पर आप मुझे गलत और खुद को सही ठहरा रही हो?’’

अंजलि को बेटी का सवाल सुन कर तेज झटका लगा. उस ने अपना सिर झुका लिया. शिखा आगे एक भी शब्द न बोल कर अपने कमरे में लौट गई. दोनों मांबेटी ने तबीयत खराब होने का बहाना बना कर रात का खाना नहीं खाया. शिखा के नानानानी को उन दोनों के उखडे़ मूड का कारण जरा भी समझ में नहीं आया.

उस रात अंजलि बहुत देर तक नहीं सो सकी. अपने पति के साथ चल रहे मनमुटाव से जुड़ी बहुत सी यादें उस के दिलोदिमाग में हलचल मचा रही थीं. शिखा द्वारा लगाए गए आरोप ने उसे बुरी तरह झकझोर दिया था.

राजेश ने कभी स्वीकार नहीं किया था कि अपने दोस्त की विधवा के साथ उस के अनैतिक संबंध थे. दूसरी तरफ आफिस में काम करने वाली 2 लड़कियों और राजेश के दोस्तों की पत्नियों ने इस संबंध को समाप्त करवा देने की चेतावनी कई बार उस के कानों में डाली थी.

तब खूबसूरत सीमा को अपने पति के साथ खूब खुल कर हंसतेबोलते देख अंजलि जबरदस्त ईर्ष्या व असुरक्षा की भावना का शिकर रहने लगी.

राजेश ने उसे प्यार से व डांट कर भी खूब समझाया पर अंजलि ने साफ कह दिया, ‘मेरे मन की सुखशांति, मेरे प्यार व खुशियों की खातिर आप को सीमा से हर तरह का संबंध समाप्त कर लेना होगा.’

‘मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा जिस से अपनी नजरों में गिर जाऊं. मैं कुसूरवार हूं ही नहीं, तो सजा क्यों भोगूं? अपने दिवंगत दोस्त की पत्नी को मैं बेसहारा नहीं छोड़ सकता हूं. तुम्हारे बेबुनियाद शक के कारण मैं अपनी नजरों में खुद को गिराने वाला कोई कदम नहीं उठाऊंगा,’ राजेश के इस फैसले को अंजलि किसी भी तरह से नहीं बदलवा सकी.

पहले अपने पति और अब अपनी बेटी के साथ हुए टकरावों में अंजलि को बड़ी समानता नजर आई. उस ने सीमा को ले कर राजेश पर चरित्रहीन होने का आरोप लगाया था और शिखा ने कमल को ले कर खुद उस पर.

वह अपने को सही मानती थी, जैसे अब शिखा अपने को सही मान रही थी. वहां राजेश अपराधी के कटघरे में खड़ा हो कर सफाई देता था और आज वह अपनी बेटी को सफाई देने के लिए मजबूर थी.

अपने दिल की बात वह अच्छी तरह जानती थी. उस के मन में कमल को ले कर रत्ती भर भी गलत तरह का आकर्षण नहीं था. इस मामले में शिखा पूरी तरह गलत थी.

तब सीमा व राजेश के मामले में क्या वह खुद गलत नहीं हो सकती थी? इस सवाल से जूझते हुए अंजलि ने सारी रात करवटें बदलते हुए गुजार दी.

अगली सुबह शिखा के जागते ही अंजलि ने अपना फैसला उसे सुना दिया, ‘‘अपना सामान बैग में रख लो. नाश्ता करने के बाद हम अपने घर लौट रहे हैं.’’

‘‘ओह, मम्मी. यू आर ग्रेट. मैं बहुत खुश हूं,’’ शिखा भावुक हो कर उस से लिपट गई.

अंजलि ने उस के माथे का चुंबन लिया, पर मुंह से कुछ नहीं बोली. तब शिखा ने धीमे स्वर में उस से कहा, ‘‘गुस्से में आ कर मैं ने जो भी पिछले दिनों आप से उलटासीधा कहा है, उस के लिए मैं बेहद शर्मिंदा हूं. आप का फैसला बता रहा है कि मैं गलत थी. प्लीज मम्मा, मुझे माफ कर दीजिए.’’

अंजलि ने उसे अपने सीने से लगा लिया. मांबेटी दोनों की आंखों में आंसू भर आए. पिछले कई दिनों से बनी मानसिक पीड़ा व तनाव से दोनों पल भर में मुक्त हो गई थीं.

उस के बुलावे पर वंदना उस से मिलने घर आ गई. कमल के आफिस चले जाने के कारण अंजलि के लौटने की खबर कमल तक नहीं पहुंची.

वंदना को अंजलि ने अकेले में अपने वापस लौटने का सही कारण बताया, ‘‘पिछले दिनों अपनी बेटी शिखा के कारण राजेश और सीमा को ले कर मुझे अपनी एक गलती…एक तरह की नासमझी का एहसास हुआ है. उसी भूल को सुधारने को मैं राजेश के पास बेशर्त वापस लौट रही हूं.

‘‘सीमा के साथ उस के अनैतिक संबंध नहीं हैं, मुझे राजेश के इस कथन पर विश्वास करना चाहिए था, पर मैं और लोगों की सुनती रही और हमारे बीच प्रेम व विश्वास का संबंध कमजोर पड़ने लगा.

‘‘अगर राजेश निर्दोष हैं तो मेरा झगड़ालू रवैया उन्हें कितना गलत और दुखदायी लगता होगा. बिना कुछ अपनी आंखों से देखे, पत्नी का पति पर विश्वास न करना क्या एक तरह का विश्वासघात नहीं है?

‘‘मैं राजेश को…उन के पे्रम को खोना नहीं चाहती हूं. हो सकता है कि सीमा और उन के बीच गलत तरह के संबंध बन गए हों, पर इस कारण वह खुद भी मुझे छोड़ना नहीं चाहते. उन के दिल में सिर्फ मैं रहूं, क्या अपने इस लक्ष्य को मैं उन से लड़झगड़ कर कभी पा सकूंगी?

‘‘वापस लौट कर मुझे उन का विश्वास फिर से जीतना है. हमारे बीच प्रेम का मजबूत बंधन फिर से कायम हो कर हम दोनों के दिलों के घावों को भर देगा, इस का मुझे पूरा विश्वास है.’’

अंजलि की आंखों में दृढ़निश्चय के भावों को पढ़ कर वंदना ने उसे बडे़ प्यार से गले लगा लिया.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें