⚲

आहत- भाग 1: एक स्वार्थी का प्रेम

हैवलौक अंडमान का एक द्वीप है. कई छोटेबड़े रिजोर्ट्स हैं यहां. बढ़ती जनसंख्या ने शहरों में प्रकृति को तहसनहस कर दिया है, इसीलिए प्रकृति का सामीप्य पाने के लिए लोग पैसे खर्च कर के अपने घर से दूर यहां आते हैं.

1 साल से सौरभ ‘समंदर रिजोर्ट’ में सीनियर मैनेजर के पद पर काम कर रहा था. रात की स्याह चादर ओढ़े सागर के पास बैठना उसे बहुत पसंद था. रिजोर्ट के पास अपना एक व्यक्तिगत बीच भी था, इसलिए उसे कहीं दूर नहीं जाना पड़ता था. अपना काम समाप्त कर के रात में वह यहां आ कर बैठ जाता था. लोग अकसर उस से पूछते कि वह रात में ही यहां क्यों बैठता है?

सौरभ का जवाब होता, ‘‘रात की नीरवता, उस की खामोशी मुझे बहुत भाती है.’’

अपनी पुरानी जिंदगी से भाग कर वह यहां आ तो गया था, परंतु उस की यादों से पीछा छुड़ाना इतना आसान नहीं था. आज सुबह जब से प्रज्ञा का फोन आया है तब से सौरभ परेशान था.

अब रात के सन्नाटे में उस की जिंदगी के पिछले सारे वर्ष उस के सामने से चलचित्र की तरह गुजरने लगे थे…

4 साल पहले जब सौरभ और शालिनी की शादी हुई थी तब उसे लगा था जैसे उस का देखा हुआ सपना वास्तविकता का रूप ले कर आ गया हो. शालिनी और सौरभ गोवा में 2 हफ्ते का हनीमून मना कर अपनी नई जिंदगी की शुरुआत करने दिल्ली आ गए. इतनी अच्छी नौकरी, शालिनी जैसी सुंदर और समझदार लड़की को अपनी पत्नी के रूप में पा कर सौरभ जैसे बादलों पर चल रहा था.

मगर सौरभ भूल गया था कि बादल एक न एक दिन बरस जाते हैं और अपने साथ सब कुछ बहा ले जाते हैं. शादी के पहले 1 साल में ही सौरभ को उस के और शालिनी के बीच के अंतर का पता चल गया. शालिनी खूबसूरत होने के साथसाथ बहुत ही खुले विचारों वाली भी थी, सौरभ के विचारों के बिलकुल विपरीत. उसे

खुले हाथों से खर्च करने की आदत थी, परंतु सौरभ मितव्ययी था. छोटीमोटी नोकझोंक उन के बीच चलती रहती थी, जिस में जीत हमेशा शालिनी की ही होती थी. शालिनी के व्यक्तित्व के सामने जैसे सौरभ का व्यक्तित्व गौण हो गया था.

रात के अंतरंग पलों में भी शालिनी को सौरभ से कई शिकायतें थीं. उस के अनुसार सौरभ उसे संतुष्ट नहीं कर पाता.

शालिनी जहां पार्टियों में जाना बहुत पसंद करती थी वहीं सौरभ का वहां दम घुटता था, परंतु शालिनी की जिद पर उस ने सभी पार्टियों में जाना शुरू कर दिया था. पार्टी में जाने के बाद शालिनी अकसर यह भूल जाती थी कि वह यहां सौरभ के साथ आई है.

ऐसी ही एक पार्टी में सौरभ की कंपनी का एक क्लाइंट विमल भी आया था. वह शालिनी के कालेज का मित्र था तथा एक बहुत बड़े उद्योगपति घराने का इकलौता चिराग था. उस से मिलने के बाद तो शालिनी जैसे यह भी भूल गई कि पार्टी में और लोग भी हैं.

बातें करते हुए विमल के हाथों का शालिनी के कंधों को छूना सौरभ को अच्छा नहीं लग रहा था, परंतु वहां पार्टी में उस ने शालिनी को कुछ नहीं कहा.

घर आने पर जब सौरभ ने शालिनी से बात करनी चाही तो वह भड़क उठी, ‘‘कितनी छोटी सोच है तुम्हारी… सही में, कौन्वैंट स्कूल में पढ़ने से अंगरेजी तो आ जाती है, पर मानसिकता ही छोटी हो तो उस का क्या करेंगे?’’

‘‘शालू, वह विमल बहुत बदनाम आदमी है. तुम नहीं जानती…’’

‘‘मैं जानना भी नहीं चाहती… जो स्वयं सफल नहीं हो पाते न वे औरों की सफलता से ऐसे ही चिढ़ते हैं.’’ सौरभ बात आगे नहीं बढ़ाना चाहता था, इसलिए चुप हो गया.

अगले दिन शालिनी की तबीयत ठीक नहीं थी तो सौरभ ने उसे परेशान करना ठीक नहीं समझा और बिना नाश्ता किए औफिस चला गया.

दोपहर में शालिनी की तबीयत के बारे में जानने के लिए लैंडलाइन पर सौरभ लगातार फोन करता रहा, परंतु शालिनी ने फोन नहीं उठाया. मोबाइल भी शालिनी ने बंद कर रखा था. काफी प्रयास के बाद शालिनी का फोन लग गया.

‘‘क्या हुआ शालिनी? ठीक तो हो न तुम? मैं कितनी देर से लैंडलाइन पर फोन कर रहा था… मोबाइल भी बंद कर रखा था तुम ने.’’

‘‘हां, मैं ठीक हूं. विमल ने लंच के लिए बुलाया था… वहां चली गई थी… मोबाइल की बैटरी खत्म हो गई थी.’’

‘‘क्या…विमल के साथ…’’

‘‘हां, क्यों?’’

‘‘मुझे बता तो सकती थी…’’

‘‘अब क्या इतनी छोटी सी बात के लिए भी तुम्हारी इजाजत लेनी पड़ेगी?’’

‘‘बात इजाजत की नहीं है, सूचना देने की है. मुझे पता होता तो इतना परेशान नहीं होता.’’

‘‘तुम्हें तो परेशान होने का बहाना चाहिए सौरभ.’’

‘‘खैर, छोड़ो शालिनी… घर पर बात करेंगे.’’

रिसीवर रखने के बाद सौरभ सोच में पड़ गया कि सुबह तक तो शालिनी

उठने की भी हालत में नहीं थी और दोपहर तक इतनी भलीचंगी हो गई कि बाहर लंच करने चली गई. फोन पर भी उस का व्यवहार सौरभ को आहत कर गया था. रात में उस ने शालिनी से इस विषय पर बात करने का मन बना लिया.

मगर रात में तो शालिनी का व्यवहार बिलकुल ही बदला हुआ था. पूरे घर में सजावट कर रखी थी उस ने. टेबल पर एक केक उस का इंतजार कर रहा था.

‘‘शालिनी, यह सब क्या है? आज किस का जन्मदिन है?’’

‘‘केक काटने के लिए उपलक्ष्य का इंतजार क्यों करना…अपने प्यार

को सैलिब्रेट करने के लिए केक नहीं काट सकते क्या?’’ शालिनी अपनी नशीली आंखों का जाल सौरभ पर डाल चुकी थी.

दोनों ने साथ केक काटा, फिर शालिनी ने अपने हाथों से सौरभ को डिनर कराया. शालिनी ने पहले से ही सब कुछ तय कर रखा था. धीमा संगीत माहौल को और खूबसूरत बना रहा था. उस रात दोनों ने एकदूसरे से खुल कर प्यार किया.

जानलेवा बना पत्नी के प्रेमी से अवैध संबंध

उस दिन मई 2021 की 11 तारीख थी. तीर्थनगरी हरिद्वार के पथरी थाने के थानाप्रभारी अमर चंद्र शर्मा अपने औफिस में बैठे कुछ आवश्यक काम निपटा रहे थे, तभी उन के पास एक महिला आई और बोली, ‘‘साहब, मेरी मदद कीजिए.’’

वह महिला बड़े ही दुखी लहजे में बोली, ‘‘मेरा नाम अंजना है और मैं रानी माजरा गांव में रहती हूं. साहब, परसों 9 मई को मेरा पति संजीव सुबह फैक्ट्री गया था, लेकिन शाम को वापस नहीं लौटा. उस के न लौटने पर उस की फैक्ट्री व परिचितों के घर जा कर पता किया लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. उस के बारे में कुछ पता न चलने पर मैं आप के पास मदद मांगने आई हूं. अब आप ही मेरे पति को तलाश सकते हैं.’’

‘‘ठीक है, हम तुम्हारे पति को खोज निकालेंगे. तुम लिखित तहरीर दे दो और साथ में अपने पति की एक फोटो दे दो.’’ थानाप्रभारी ने कहा.

‘‘ठीक है साहब. मुझे शक है कि मेरे गांव के ही प्रधान ने मेरे पति को गायब कराया है. कहीं उस ने मेरे पति के साथ कुछ गलत न कर दिया हो. इस बात से मेरा दिल बैठा जा रहा है.’’ वह बोली.

‘‘ठीक है, जांच में सब पता लगा लेंगे. अगर प्रधान का इस सब में हाथ हुआ तो उसे सजा जरूर दिलाएंगे.’’ इंसपेक्टर शर्मा ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा.

‘‘ठीक है साहब,’’ कह कर वह महिला अंजना वहां से चली गई. कुछ ही देर में वह वापस लौटी और एक तहरीर और फोटो थानाप्रभारी शर्मा को दे गई तो उन्होंने संजीव की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करा दी.

थानाप्रभारी शर्मा अभी कुछ प्रयास करते, उस से पहले ही अगले दिन फिर अंजना उन से मिलने आ गई. उस ने गांव के प्रधान द्वारा अपने पति को मार देने का आरोप लगाते हुए लाश जंगल में पड़ी होने की आशंका जाहिर की.

उस ने यह बात उस की इस हरकत से इंसपेक्टर शर्मा को उस पर शक हो गया. ऐसी हरकत तो इंसान तभी करता है, जब वह खुद उस मामले में संलिप्त हो और दूसरे को फंसाने की कोशिश करता है.

अंजना भी जिस तरह से गांव के प्रधान को बारबार इंगित कर रही थी, उस से यही लग रहा था कि अंजना का अपने पति संजीव को गायब कराने में हाथ है और इस में वह गांव के प्रधान को फंसाना चाहती है.

संजीव ने गांव के कई विकास कार्यों के बारे में सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांग रखी थी. इस से प्रधान और संजीव के बीच विवाद चल रहा था. इसी का फायदा शायद अंजना उठाना चाहती थी.

अंजना पर शक हुआ तो इंसपेक्टर शर्मा ने अंजना के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. उस में एक नंबर पर अंजना की काफी बातें होने की बात पता चली. 9 मई को भी कई बार बातें हुई थीं. दोनों की लोकेशन भी कुछ देर के लिए साथ में मिली.

अंजना पर जब शक पुख्ता हो गया तो 16 मई, 2021 को थानाप्रभारी शर्मा ने अंजना को पूछताछ के लिए थाने बुलाया. फिर महिला कांस्टेबलों बबीता और नेहा की मौजूदगी में अंजना से काफी सवाल किए, जिन का सही से अंजना जवाब नहीं दे पाई. जब सख्ती की गई तो अंजना ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया.

अंजना ने ही अपने पति संजीव की हत्या की थी. हत्या में उस का साथ उस के प्रेमी शिवकुमार उर्फ शिब्बू ने दिया था, जोकि धनपुरा गांव में रहता था. उसी ने हत्या के बाद संजीव की लाश पैट्रोल डाल कर जलाई थी. पुलिस ने शिवकुमार को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया.

दोनों की निशानदेही पर पीपली गांव के जंगल के काफी अंदर जा कर संजीव की अधजली लाश पुलिस ने बरामद कर ली. मौके से ही हत्या में प्रयुक्त रस्सी और प्लास्टिक बोरी भी बरामद हो गई.

लाश को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया गया. दोनों अभियुक्तों से पूछताछ के बाद जो कहानी निकल कर सामने आई, वह काफी हैरतअंगेज थी.

उत्तराखंड के शहर हरिद्वार के पथरी थाना क्षेत्र के गांव रानी माजरा में रहता था संजीव. संजीव पदार्था स्थित पतंजलि की फूड पार्क कंपनी में काम करता था. परिवार के नाम पर उस की पत्नी और 12 साल का बेटा सनी था.

जब परिवार का मुखिया सही न चले तो परिवार का बिगड़ना तय होता है. संजीव में कई गलत आदतें थीं, जिस से अंजना काफी परेशान रहती थी. संजीव को अप्राकृतिक यौन संबंध बनवाने का शौक था, जिस के चलते वह शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार भी रहता था.

कभीकभी उस की मानसिक स्थिति काफी बदतर हो जाती थी. घर के सामने से कोई कुत्ता गुजर जाता तो वह कुत्ते को जम कर मारतापीटता था. कई बार उस ने पुलिस कंट्रोल रूम में फोन कर के पुलिसकर्मियों को गालियां दीं. पुलिसकर्मियों ने शिकायत की तो उस की हालत देख कर थाना स्तर से कोई काररवाई नहीं की जाती. उस के दिमाग में कब क्या फितूर बस जाए कोई नहीं जान सकता था.

धनपुरा गांव में रहता था 45 वर्षीय शिवकुमार उर्फ शिब्बू. शिवकुमार के परिवार में पत्नी, एक बेटी और एक बेटा था. शिवकुमार दूध बेचने का काम करता था. संजीव के घर वह पिछले 10 सालों से दूध देने आता था.

संजीव से उस की दोस्ती थी. संजीव ने शिवकुमार को अपनी पत्नी अंजना से मिलाया. दोनों मे दोस्ती कराई. दोस्ती होने पर शिवकुमार दूध देने घर के अंदर तक आने लगा. अंजना से वह घंटों बैठ कर बातें करने लगा. कुछ ही दिनों में वे दोनों काफी घुलमिल गए. उन के बीच हंसीमजाक भी होने लगा.

एक दिन दूध देने के बाद शिवकुमार अंजना के पास बैठ गया. उसे देखते हुए बोला, ‘‘भाभी, लगता है आप अपना खयाल नहीं रखती हो?’’

अंजना को उस की बात सुन कर हैरत हुई, बोली, ‘‘अरे, भलीचंगी तो हूं …और कैसे खयाल रखूं?’’

‘‘सेहत पर तो आप ध्यान दे रही हो, जिस से स्वस्थ हो लेकिन अपने हुस्न को निखारनेसंवारने में बिलकुल भी ध्यान नहीं दे रही हो.’’

‘‘ओह! तो यह बात है. मैं भी सोचूं कि मैं तो अच्छीखासी हूं.’’ फिर दुखी स्वर में बोली, ‘‘अपने हुस्न को संवार कर करूं भी तो क्या.  जिस के साथ बंधन में बंधी हूं, वह तो ध्यान ही नहीं देता. उस का शौक भी दूसरी लाइन का है. मुझे खुश करने के बजाय खुद को खुश करने के लिए लोगों को ढूंढता फिरता है.’’

‘‘क्या मतलब…?’’ चौंकते हुए बोला.

शिवकुमार कुछकुछ समझ तो गया था लेकिन अंजना से खुल कर पूछने के लिए उस से सवाल किया.

‘‘यही कि वह आदमी है और आदमी से ही प्यार करता है, उसे औरत में कोई लगाव नहीं है. जैसेतैसे उस ने कुछ दिन मुझे बेमन से खुशी दी, जिस की वजह से एक बेटा हो गया. उस के बाद उस ने मेरी तरफ देखना ही बंद कर दिया. उस के शौक ही निराले हैं.’’

इस पर शिवकुमार उस से सुहानुभूति जताते हुए बोला, ‘‘यह तो आप के साथ अत्याचार हो रहा है, शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से. आप कैसे सह लेती हो इतना सब?’’

‘‘क्या करूं…जब नसीब में ही सब लिखा है तो भुगतना तो पडे़गा ही.’’ दुख भरे लहजे में अंजना ने कहा.

‘‘जैसे वह आप का खयाल नहीं रखता, वैसे आप भी उस का खयाल मत रखो. आप का भी अपना वजूद है, आप को भी अपनी खुशी का खयाल रखने का हक है.’’ उस ने उकसाया.

‘‘खुद को खुश रखने की कोशिश भी करूं तो कैसे, संजीव मेरी खुशियों में आग लगाने में पीछे नहीं हटता. अब उस से बंध गई हूं तो उस के साथ ही निभाना पड़ेगा.’’

‘‘आप अपनी खुशी के लिए कोई भी कदम उठा सकती हैं. इस के लिए आप पर कोई बंधन नहीं है. जरूरत है तो आप के एक कदम बढ़ाने की.’’

‘‘कदम तो तभी बढ़ेंगे, जब कोई मंजिल दिखे. बिना मंजिल के कदम बढ़ाने से कोई फायदा नहीं, उलटा कष्ट ही होगा.’’ वह बेमन से बोली.

‘‘मंजिल तो आप के सामने ही है लेकिन आप ने देखने की कोशिश ही नहीं की.’’ शिवकुमार ने अंजना की आंखों में देखते हुए कहा.

शिवकुमार की बात सुन कर अंजना ने भी उस की आंखों में देखा तो वहां उसे अपने लिए उमड़ता प्यार दिखा. अंजना के दिल को सुकून मिला कि उसे भी कोई दिल से चाहता है और उस का होना चाहता है.

‘‘लेकिन शिव, हम दोनों का ही अपना बसाबसाया परिवार है. ऐसे में एकदूसरे की तरफ कदम बढ़ाना सही होगा.’’ अंजना ने सवाल किया.

‘‘मेरी छोड़ो, अपनी बात करो. कौन सा परिवार… परिवार के नाम पर पति और एक बेटा. पति ऐसा कि जो अपने लिए ही मस्ती खोजता रहता है, जिसे अपनी पत्नी की जरूरतों का कोई खयाल नहीं और न ही उस की भावनाओं की कद्र करता है. ऐसे इंसान से दूर हो जाना बेहतर है.’’

‘‘कह तो तुम ठीक रहे हो शिव. जब उसे मेरा खयाल नहीं तो मैं क्यों उस की चिंता करूं.’’

‘‘हां भाभी, मैं आप को वह सब खुशियां दूंगा, जिस की आप हकदार हैं. बस आप एक बार हां तो कहो.’’

अंजना ने उस की बात सुन कर मूक सहमति दी तो शिवकुमार ने उसे बांहों में भर कर कर सीने से लगा लिया. उस के बाद शिवकुमार ने अंजना को वह खुशी दी, जो अंजना पति से पाने को तरसती थी. उस दिन शिवकुमार ने अंजना की सूखी जमीन को फिर से हराभरा कर दिया.

फिर तो उन के बीच नाजायज संबंध का यह रिश्ता लगभग हर रोज निभाया जाने लगा. अंजना का चेहरा अब खिलाखिला सा रहने लगा. वह अब अपने को सजानेसंवारने लगी थी. शिवकुमार के बताए जाने पर वह शिवकुमार के दिए जाने वाले कच्चे दूध से चेहरे की सफाई करती. दूध उबालने के बाद पड़ने वाली मोटी मलाई को अपने चेहरे पर लगाती, जिस से उस के चेहरे की चमक बनी रहे.

समय का पहिया निरंतर आगे बढ़ता गया. संजीव से उन के संबंध छिपे नहीं रहे. उसे पता चला तो उसे बिलकुल गुस्सा नहीं आया. अमूमन कोई भी पति अपनी पत्नी के अवैध रिश्ते के बारे में जानता तो गुस्सा करता, पत्नी के साथ मारपीट लड़ाईझगड़ा करता, लेकिन संजीव के मामले में ऐसा कुछ नहीं था. उस के दिमाग में तो और ही कुछ चल रहा था. जो उस के दिमाग में चल रहा था उसे सोच कर वह मंदमंद मुसकरा रहा था.

अब संजीव दोनों पर नजर रखने लगा. एक दिन उस ने दोनों को शारीरिक रिश्ता बनाते रंगेहाथ पकड़ लिया. उसे आया देख कर शिवकुमार और अंजना सहम गए.

संजीव ने दोनों को एक बार खा जाने वाली नजरों से देखा, फिर उन के सामने कुरसी डाल कर आराम से बैठ गया और बोला, ‘‘तुम दोनों अपना कार्यक्रम जारी रखो.’’

उस के बोल सुन कर शिवकुमार और अंजना हैरत से एकदूसरे को देखने लगे. उन के आश्चर्य की सीमा नहीं थी. संजीव ने जो कहा था उन की उम्मीद के बिलकुल विपरीत था. संजीव के दिमाग में क्या चल रहा है, दोनों यह जानने के लिए उत्सुक थे.

उन दोनों को हैरत में पड़ा देख कर संजीव मुसकरा कर बोला, ‘‘चिंता न करो, मुझे तुम दोनों के संबंधों से कोई एतराज नहीं है. मैं तो खुद तुम दोनों को संबंध बनाते देखने को आतुर हूं.’’

संजीव के बोल सुन कर अंजना के अंदर की औरत जागी, ‘‘कैसे मर्द हो जो अपनी ही बीवी को पराए मर्द के साथ बिस्तर पर देखना चाहते हो. तुम इतने गिरे हुए इंसान हो, मैं तो सपने में भी नहीं सोच सकती थी.’’

‘‘तुम्हारे प्रवचन खत्म हो गए हों तो आगे का कार्यक्रम शुरू करो.’’ बड़ी ही बेशरमी से संजीव बोला.

‘‘क्यों कोई जबरदस्ती है, हम दोनों ऐसा कुछ नहीं करेंगे.’’ अंजना ने सपाट लहजे में बोल दिया.

संजीव ठहाके लगा कर हंसा, फिर बोला, ‘‘मुझे न बोलने की स्थिति में नहीं हो तुम दोनों. मैं ने बाहर वालों को तुम दोनों के नाजायज संबंधों के बारे में बता दिया तो समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगे.’’

बदनामी का भय इंसान को अंदर तक हिला कर रख देता है. अंजना और शिवकुमार भी बदनाम नहीं होना चाहते थे. वैसे भी जिस से उन को डरना चाहिए था, वह खुद उन को संबंध बनाने की छूट दे रहा था. ऐसे में दोनों ने संबंध बनाए रखने के लिए संजीव की बात मान ली.

अंजना और शिवकुमार शारीरिक संबंध बनाने लगे. संजीव उन के पास ही बैठ कर अपनी आंखों से उन को ऐसा करते देखता रहा और आनंदित होता रहा. किसी पोर्न मूवी में फिल्माए जाने वाले दृश्य की तरह ही सब कुछ वहां चल रहा था.

अंजना के साथ संबंध बनाने के बाद संजीव ने शिवकुमार से अपने साथ अप्राकृतिक संबंध बनाने को कहा. शिवकुमार ने न चाहते हुए उस की बात मान ली. संजीव को उस की खुशी दे दी. अब तीनों के बीच बेधड़क संबंधों का यह नाजायज खेल बराबर खेला जाने लगा.

अंजना और शिवकुमार को संजीव ब्लैकमेल कर रहा था. दोनों को अपने प्यार में बाधा पहुंचाने वाला और बदनाम करने की धमकी देने वाला संजीव अब अखरने लगा था. उस से छुटकारा पाने का एक ही तरीका था, वह था उसे मौत की नींद सुला देने का. दोनों ने संजीव को ठिकाने लगाने का फैसला किया तो उस पर योजना भी बना ली.

शिवकुमार का फेरूपुर गांव में खेत था, उसी में उस ने अपना एक अलग मकान बनवा रखा था. 9 मई को अंजना संजीव को यह कह कर वहां ले गई कि वहीं तीनों मौजमस्ती करेंगे. संजीव अंजना के जाल में फंस गया. उस के साथ शिवकुमार के मकान पर पहुंच गया. शिवकुमार वहां पहले से मौजूद था.

शिवकुमार के पहुंचते ही शिवकुमार ने अंजना को इशारा किया. अंजना ने तुरंत पीछे से संजीव को दबोच लिया. दुबलापतला संजीव अंजना के चंगुल से तमाम कोशिशों के बाद भी छूट न सका.

शिवकुमार ने संजीव के गले में रस्सी का फंदा डाल कर कस दिया, जिस से दम घुटने से संजीव की मौत हो गई. शिवकुमार ने उस की लाश प्लास्टिक बोरी में डाल कर बोरी बंद कर दी और उस बोरी को बाइक पर रख कर वह पीपली गांव के जंगल में ले गया और जंगल में काफी अंदर जा कर संजीव की लाश फेंक दी. लाश ठिकाने लगा कर वह वापस आ गया.

योजना के तहत 11 मई, 2021 को अंजना ने पथरी थाने में पति की गुमशुदगी दर्ज करा दी. अंजना ने ग्राम प्रधान पर हत्या का शक जाहिर किया, जिस से हत्या में ग्रामप्रधान फंस जाए. इधर अंजना को पता नहीं क्यों भय सताने लगा कि वे दोनों किसी बड़ी मुसीबत में फंसने वाले हैं.

इस भय के कारण 14 मई को ईद के दिन अंजना ने शिवकुमार से संपर्क किया और शिवकुमार से कहा कि लाश को पैट्रोल डाल कर जला दो. शिवकुमार ने फिर से जंगल जा कर संजीव की लाश पर पैट्रोल डाल कर जला दी.

लेकिन दोनों की ज्यादा होशियारी काम न आई, दोनों पुलिस के हत्थे चढ़ गए. चूंकि अंजना ही वादी थी, ऐसे में पीडि़त को गुनहगार साबित करना पुलिस के लिए टेढ़ी खीर साबित होता है. लेकिन थानाप्रभारी अमर चंद्र शर्मा ने बड़ी सूझबूझ से पहले पुख्ता सुबूत जुटाए, फिर अंजना को उस के प्रेमी शिवकुमार के साथ गिरफ्तार किया.

थानाप्रभारी शर्मा ने दोनों के खिलाफ भादंवि की धारा 302/201/120बी के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर दोनों को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

हत्यारा हमसफर

उस दिन जनवरी 2020 की 7 तारीख थी. शाम के 7 बज रहे थे. हर रोज की तरह घरेलू नौकरानी पूजा, जयपुर की यूनिक टावर सोसायटी के आई ब्लौक स्थित रोहित तिवारी के फ्लैट नंबर 103 पर काम करने के लिए पहुंची. उस ने डोरबैल बजाई तो मालकिन श्वेता तिवारी ने दरवाजा नहीं खोला और न ही अंदर कोई हलचल सुनाई दी.

पूजा ने दरवाजे को अंदर की ओर धकेला तो वह खुल गया. नौकरानी कमरे के अंदर पहुंची तो उस के मुंह से चीख निकल गई. कमरे के अंदर पलंग पर मालकिन श्वेता तिवारी मृत पड़ी थीं. उन का मुंह खून से लाल था.पूजा चीखतेचिल्लाते बाहर निकली और पासपड़ोस के फ्लैट्स में रहने वाले लोगों को जानकारी दी. मर्डर की खबर से सोसायटी में हडकंप मच गया, लोगों की भीड़ जुटने लगी. इसी बीच किसी ने थाना प्रताप नगर पुलिस को सूचना दे दी.

पौश सोसायटी के फ्लैट में हत्या की सूचना पा कर प्रताप नगर थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ मौके पर आ गए. उन्होंने यह खबर वरिष्ठ अधिकारियों को दी और पूछताछ में जुट गए. पूछताछ से पता चला कि जिस फ्लैट में मर्डर हुआ है उस में रोहित तिवारी किराए पर रहते हैं. रोहित इंडियन औयल कारपोरेशन में सीनियर मैनेजर हैं और जयपुर एयर पोर्ट पर बतौर फ्यूल इंचार्ज तैनात हैं. मर्डर उन की पत्नी श्वेता तिवारी का हुआ है.

हत्या का मामला हाई प्रोफाइल था. सूचना पा कर पुलिस कमिश्नर आनंद श्रीवास्तव, डीआईजी सुभाष बघेल, एएसपी डा. अवधेश सिंह, एसपी डा. सतीश कुमार, डीएसपी (पूर्वी) राहुल जैन तथा सीओ संजय शर्मा घटना स्थल पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम तथा डौग स्क्वायड टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने जयपुर एयरपोर्ट पर तैनात रोहित तिवारी को उन की पत्नी श्वेता की हत्या की सूचना दी तो कुछ देर में वह भी फ्लैट पर आ गए.

रोहित ने फ्लैट के अंदर देख कर पुलिस अधिकारियों को बताया कि बेड पर पड़ी लाश उस की पत्नी श्वेता की है, लेकिन उस के 21 माह के मासूम बेटे श्रीयम का पता नहीं है. लगता है, हत्यारों ने श्वेता की हत्या के बाद श्रीयम का अपहरण कर लिया है. रोहित की बात सुन कर पुलिस अधिकारी सन्न रह गए. क्योंकि अभी तक जानकारी हत्या की थी लेकिन अब श्रीयम के अपहरण की बात सामने आई थी.

पुलिस अधिकारियों ने हत्या और अपहरण के इस मामले को गंभीरता से लेते हुए घटना स्थल का बारीकी से निरीक्षण शुरू किया. कमरे के अंदर पड़े बेड पर 30-32 वर्षीय श्वेता तिवारी की लाश पड़ी थी. उस के सिर से खून रिस रहा था, जिस से उस का चेहरा खून से लाल था. उस का गला भी रेता गया था. सिर पर भी जख्म था.

बेड पर खून से सना चाकू पड़ा था, बेड के नीचे अदरक कूटने वाली लोहे की मूसली पड़ी थी. बिस्तर भी खून से तरबतर था. खून की बूंदे दीवार पर भी दिखाई दे रही थीं. कमरे में रखी प्लास्टिक टेबल पर चाय के 2 कप रखे थे. जिस में कुछ चाय बची हुई थी. श्वेता का मोबाइल फोन भी गायब था.

घटना स्थल का निरीक्षण करने के बाद पुलिस अधिकारियों ने अनुमान लगाया कि श्वेता का हत्यारा कोई करीबी ही रहा होगा, जिस के आने पर श्वेता ने दरवाजा खोला और उसे कमरे में बिठा कर चाय पिलाई. इसी बीच हत्यारे ने अदरक कूटने वाली मूसली से उस के सिर पर प्रहार कर उसे पलंग पर गिरा दिया होगा, फिर चाकू से उस का गला रेता होगा. इस के बाद वह श्रीयम का अपहरण कर ले गया होगा. पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त चाकू व मूसली को सुरक्षित कर लिया.

फोरैंसिक टीम ने भी घटना स्थल का निरीक्षण किया और दीवार, प्याले, फर्श व बेड से फिंगरप्रिंट उठाए. डौग स्क्वायड टीम ने सुराग के लिए खोजी कुत्ते को छोड़ा. खोजी कुत्ता घटना स्थल को सूंघ कर भौंकते हुए बाहर निकला और रोहित की कार के 2 चक्कर काटे. कुछ देर वह रोहित के आसपास भी मंडराता रहा. इस से टीम को रोहित पर शक हुआ. किंतु उस के खिलाफ कोई पक्का सुबूत न मिलने से उस से ज्यादा कुछ पूछताछ नहीं की गई.

निरीक्षण के बाद पुलिस अधिकारियों ने मृतका श्वेता का शव पोस्टमार्टम के लिए जयपुर के महात्मा गांधी अस्पताल भिजवा दिया.

श्वेता तिवारी का मायका उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर स्थित सर्वोदय नगर में था और ससुराल गांधी नगर, दिल्ली में थी. रोहित ने फोन कर के श्वेता की हत्या और मासूम श्रीयम के अपहरण की जानकारी अपने माता पिता तथा ससुराल वालों को दे दी. बेटी की हत्या की खबर पा कर श्वेता के पिता सुरेश कुमार मिश्रा तथा उन की पत्नी माधुरी मिश्रा घबरा गईं.

परिवार में कोहराम मच गया. वह पत्नी, बेटे शुभम व परिवार के अन्य सदस्यों के साथ निजी वाहन से जयपुर के लिए रवाना हो लिए. अब तक श्वेता की हत्या की खबर टीवी चैनलों पर भी प्रसारित होने लगी थी. वह मोबाइल फोन पर रास्ते भर हत्या की जानकारी लेते रहे.

पुलिस कमिश्नर आनंद श्रीवास्तव ने इस हत्या और अपहरण के मामले को बेहद गंभीरता से लिया. उन्होंने 22 महीने के श्रीयम का पता लगाने के लिए 6 थाना प्रभारियों, 3 सीओ तथा पुलिस के 100 जवानों को लगा दिया. भारीभरकम पुलिस फोर्स ने डीएसपी (पूर्वी) राहुल जैन तथा एसपी डा. सतीश कुमार के निर्देशन में श्रीयम की खोज आरंभ की.

इस बारे में पुलिस ने तकरीबन डेढ़ सौ लोगों से पूछताछ की. दरजनों संदिग्ध लोगों को हिरासत में ले कर उन से कड़ाई से पूछताछ की. सैकड़ों संदिग्ध नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई, तकनीक का सहारा लिया. लेकिन श्रीयम का कोई सुराग नहीं मिला और न ही श्वेता के हत्यारों का.

पुलिस अधिकारी रात भर रोहित तिवारी के फ्लैट पर जुटे रहे. एसपी डा. सतीश कुमार एएसपी डा. अवधेश सिंह तथा सीओ संजय शर्मा  अन्य पुलिस कर्मियों के साथ जांच में जुटे थे.

वह सीसीटीवी फुटेज खंगाल चुके थे और कमरे की हर चीज का निरीक्षण कर रहे थे. तभी रोहित तिवारी के मोबाइल फोन पर एक मैसेज आया. मैसेज देख कर वह चीख पड़ा, ‘‘सर, यह देखो श्रीयम के अपहर्त्ता का मैसेज आया है. उस ने 30 लाख रुपए फिरौती की मांग की है.’’

फिरौती का मैसेज मृतका श्वेता के मोबाइल नंबर से भेजा गया था. रोहित ने उसी नंबर पर काल बैक कर अपहर्त्ता से कहा कि वह फिरौती की रकम देने को तैयार है लेकिन पहले श्रीयम का चेहरा दिखाए. लेकिन फोन करने वाले ने चेहरा नहीं दिखाया और फोन डिसकनेक्ट कर दिया.

पुलिस अधिकारियों की समझ में यह नहीं आ रहा था कि अपहर्त्ता को रोहित का मोबाइल नंबर कैसे मिला. क्या अपहर्त्ता रोहित की जान पहचान का है?

पुलिस अधिकारी अभी जांच कर ही रहे थे कि सुबह मृतका श्वेता के मांबाप व अन्य परिजन रोहित के फ्लैट पर आ गए. श्वेता के पिता सुरेश कुमार मिश्रा तथा मां माधुरी मिश्रा ने आते ही एसपी डा. सतीश कुमार को बताया कि उन की बेटी की हत्या उन के दामाद रोहित ने ही की है.

5 जनवरी को मोबाइल रिचार्ज न करवाने की बात को ले कर रोहित और श्वेता के बीच झगड़ा हुआ था. मारपीट करने के बाद रोहित ने उन के मोबाइल पर फोन किया था. उस ने गुस्से में कहा था, ‘‘पापा जी, हम बहुत परेशान हैं. आप को जितना रुपया चाहिए, ले लो लेकिन श्वेता को अपने साथ ले जाओ. नहीं तो मैं इस की हत्या कर दूंगा.’’

इस पर उन्होंने रोहित को समझाने का प्रयास किया तो उस ने फोन काट दिया. इस के बाद उन्होंने श्वेता को काल कर के समझाया था. लेकिन यह नहीं सोचा था कि रोहित हत्या कर ही देगा.

रोहित जिस तरह से बारबार अपनी बेगुनाही का सबूत दे रहा था और हत्या के समय अपनी मौजूदगी औफिस में बता रहा था, उस से पुलिस अधिकारियों को उस पर शक बढ़ता जा रहा था. लेकिन जब मृतका के मांबाप ने भी उस पर सीधे तौर पर हत्या का आरोप लगाया तो पुलिस का भी शक उस पर गहराने लगा.

8 जनवरी, 2020 की दोपहर 3 बजे हल्ला मचा कि एक बच्चे का शव रोहित के फ्लैट की बाउंड्रीवाल के पीछे झाडि़यों में पड़ा है. पुलिस ने झाडि़यों से शव को बाहर निकाला, शव तौलिया में लिपटा था. तौलिया हटाया गया तो सभी अवाक रह गए, शव श्रीयम का ही था. उस की हत्या गला दबा कर की गई थी. श्रीयम का सिर भी कुचला गया था. जिस श्रीयम को खोजने के लिए पुलिस के 100 जवान पसीना बहा रहे थे, उस का शव उसी के घर के पीछे झाडि़यों में पड़ा था. नाती की लाश देख कर सुरेश कुमार मिश्रा व उन की पत्नी माधुरी मिश्रा फफक पड़ी. बेटे शुभम ने मांबाप को धैर्य बंधाया.मासूम श्रीयम की हत्या की जानकारी पाते ही पुलिस कमिश्नर आनंद श्रीवास्तव तथा डीएसपी (पूर्वी) राहुल जैन वहां आ गए. उन्होंने मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारियों से कहा कि मां के बाद बेटे की हत्या दिल को झकझोर देने वाली है. ऐसे क्रूर हत्यारों को वह जल्द से जल्द सलाखों के पीछे देखना चाहते हैं. इस के बाद उन्होंने श्रीयम का शव भी पोस्टमार्टम के लिए महात्मा गांधी अस्पताल भेज दिया.

भारी पुलिस सुरक्षा के बीच 3 डाक्टरों के एक पैनल ने श्वेता और उस के मासूम बेटे श्रीयम के शव का पोस्टमार्टम किया. पोस्टमार्टम के बाद दोनों शव मृतका के पति रोहित के बजाय मृतका के मातापिता को सौंप दिए गए.

सुरेश कुमार मिश्रा बेटी श्वेता व नाती श्रीयम के शव सर्वोदय नगर (कानपुर) स्थित अपने घर ले आए. वहां भैरवघाट पर उन का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

अंतिम संस्कार का दृश्य बड़ा ही हृदय विदारक था. शव यात्रा के समय 22 महीने के श्रीयम का शव श्वेता की गोद में था. ठीक इसी तरह उन्हें चिता पर लिटाया गया. श्वेता का एक हाथ बेटे के ऊपर था. ठीक वैसे ही जैसे कोई सो रही मां अपने बेटे को अपनी बांहों की सुरक्षा देती है. श्मशान घाट पर जिस ने भी यह दृश्य देखा उस का कलेजा फट गया. लोग तो अपनी आंखों से आंसू नहीं रोक सके.

उधर डबल मर्डर की गुत्थी सुलझाने के लिए जयपुर पुलिस अधिकारियों ने मृतका के पति रोहित तिवारी पर शिकंजा कसा और उस से सख्ती से पूछताछ की. पुलिस अधिकारी उसे एयर पोर्ट ले गए और घटना वाले दिन यानी 7 जनवरी की सीसीटीवी फुटेज खंगाली.

पता चला कि उस रोज रोहित तिवारी सुबह 9 बजे एयरपोर्ट पहुंचा था और पत्नी की हत्या की सूचना मिलने के बाद एयरपोर्ट से घर को निकला था. फुटेज से यह भी पता चला कि रोहित घटना के समय वहां एक बैठक में मौजूद था.

उस के मोबाइल की लोकेशन भी दिन भर एयरपोर्ट की ही मिल रही थी. सारे सबूत रोहित के पक्ष में जा रहे थे जिस से पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं कर पा रही थी. यद्यपि पुलिस अधिकारियों को पक्का यकीन था कि दोहरी हत्या में रोहित का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हाथ हो सकता है.

पुलिस ने रोहित पर कड़ा रुख अपनाया तो पुलिस पर दबाव बनाने के लिए उस ने कोर्ट का रुख किया. 9 जनवरी को रोहित ने जयपुर की निचली अदालत में अपने वकील दीपक चौहान के मार्फत प्रार्थना पत्र दे कर पुलिस पर प्रताडि़त करने का अरोप लगाया.

कोर्ट ने इस मामले में प्रताप नगर थानाप्रभारी को 10 जनवरी को प्रकरण से जुड़े तथ्यों के साथ उपस्थित होने का आदेश दिया.

रोहित की इस काररवाई से पुलिस बौखला गई. जिस मोबाइल फोन से रोहित के मोबाइल पर मैसेज किया गया था, पुलिस ने उस मोबाइल फोन की जांच में जुट गई. जांच से पता चला कि श्वेता अपने मोबाइल फोन में पैटर्न लाक लगाती थी, जिसे कोई दूसरा नहीं खोल सकता था.

इस का मतलब मैसेजकर्ता ने श्वेता का सिम निकाल कर किसी दूसरे मोबाइल में डाला था. मैसेज करते समय इस मोबाइल फोन की लोकेशन जयपुर के सांगानेर की मिली. पुलिस फोन के आईएमईआई नंबर के सहारे उस दुकानदार तक पहुंची, जहां से वह हैंडसेट खरीदा गया था.

वहां से मोबाइल खरीदार के बारे में जानकारी नहीं मिली तो उस फोन के आईएमईआई (इंटरनैशनल मोबाइल इक्विपमेंट आइडेंटिटी) नंबर को ट्रेस कर पुलिस मैसेजकर्ता तक पहुंच गई.

पुलिस मैसेजकर्ता को उस के घर से पकड़ कर थाने ले आई. उस ने अपना नाम सौरभ चौधरी निवासी भरतपुर (राजस्थान) तथा हाल पता सांगानेर बताया. उस से जब श्वेता व उस के मासूम बेटे श्रीयम की हत्या के संबंध में पूछा गया तो उस ने ऐसा कुछ करने से इनकार किया.

लेकिन जब उस के साथ सख्ती की गई तो वह टूट गया और दोहरी हत्या करने का जुर्म कबूल कर लिया. सौरभ चौधरी ने बताया कि रोहित तिवारी ने ही उसे 20 हजार रुपए दे कर पत्नी व बेटे की हत्या की सुपरी दी थी. मतलब दोहरी हत्या की साजिश रोहित ने ही रची थी.

सौरभ से पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने 10 जनवरी, 2020 को रोहित तिवारी को भी बंदी बना लिया. थाने में जब उस का सामना सौरभ चौधरी से हुआ तो उस का चेहरा लटक गया और उस ने सहज ही पत्नी श्वेता की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया.

डबल मर्डर के हत्यारों के पकड़े जाने की जानकारी पुलिस कमिश्नर आनंद श्रीवास्तव और डीसीपी (पूर्वी) डा. राहुल जैन को हुई तो वह थाना प्रताप नगर आ गए. उन्होंने आरोपियों से पूछताछ की, फिर प्रैसवार्ता कर घटना का खुलासा कर दिया.

चूंकि हत्यारोपियों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया था, इसलिए थानाप्रभारी ने भादंवि की धारा 302/201 तथा 120बी के तहत सौरभ चौधरी तथा रोहित तिवारी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. पुलिस द्वारा पूछताछ करने पर एक ऐसे पति की कहानी सामने आई जिस ने दूसरी शादी रचाने के लिए अपनी पत्नी व बच्चे के कत्ल की साजिश रच डाली.उत्तर प्रदेश के कानुपर महानगर के काकादेव थाना अंतर्गत एक मोहल्ला है सर्वोदय नगर. सुरेश कुमार मिश्रा अपने परिवार के साथ इसी सर्वोदय नगर में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी माधुरी मिश्रा के अलावा एक बेटा और 3 बेटियां थीं. सुरेश कुमार मिश्रा भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) में अधिकारी थे, जो अब रिटायर हो चुके हैं. उन का आलीशान मकान है, मिश्राजी अपनी 2 बेटियों की शादी कर चुके थे.

श्वेता सुरेश कुमार मिश्रा की सब से छोटी बेटी थी. वह अपनी दोनों बहनों से ज्यादा खूबसूरत थी. जब वह आंखों पर काला चश्मा लगा कर घर से बाहर निकलती थी तो लोग उसे मुड़मुड़ कर देखते थे, लेकिन वह किसी को भाव नहीं देती थी. श्वेता ने कानपुर छत्रपति साहू जी महाराज विश्वविद्यालय से बीए किया था.

वह आगे की पढ़ाई जारी रखना चाहती थी ताकि अपने पैरों पर खड़ी हो सके, लेकिन पिता सुरेश कुमार मिश्रा कोई अच्छा घरवर ढूंढ कर उस के हाथ पीले करना चाहते थे. उन्होंने उस के लिए वर की खोज भी शुरू कर दी. उसी खोज में उन्हें रोहित तिवारी पसंद आ गया.

रोहित के पिता उमाशंकर तिवारी मूल रूप से औरैया जनपद के गांव कंठीपुर के रहने वाले थे, लेकिन वह दिल्ली के गांधी नगर के रघुवरपुरा स्थित माता मंदिर वाली गली में रहते थे. उमाशंकर तिवारी के परिवार में पत्नी कृष्णादेवी के अलावा बेटा रोहित तथा 2 बेटियां थीं. बेटियों की शादी वह कर चुके थे.

रोहित अभी कुंवारा था. रोहित पढ़ालिखा हैंडसम युवक था. वह इंडियन आयल कारपोरशन में मैनेजर था. उस की पोस्टिंग दिल्ली में ही थी. सुरेश कुमार मिश्रा ने रोहित को देखा तो उसे अपनी बेटी श्वेता के लिए पसंद कर लिया.

फिर 24 जनवरी, 2011 को रीतिरिवाज से रोहित के साथ श्वेता का विवाह धूमधाम से कर दिया. उस की शादी में उन्होंने लगभग 30 लाख रुपए खर्च किए थे.

शादी के बाद श्वेता और रोहित ने बड़े प्रेम से जिंदगी का सफर शुरू किया. हंसतेखेलते 2 साल कब बीत गए दोनों में किसी को पता ही न चला. लेकिन इन 2 सालों में श्वेता मां नहीं बन सकी. सूनी गोद का दर्द जहां श्वेता और रोहित को था, वहीं श्वेता के सासससुर को भी टीस थी. सास कृष्णादेवी तो श्वेता को ताने भी देने लगी थी.

इतना ही नहीं, श्वेता को कम दहेज लाने की भी बात कही जाने लगी. उस के हर काम में कमी निकाली जाने लगी. यहां तक कि उस के खानपान और पहनावे पर भी सवाल उठाए जाने लगे. उसे तब और गहरी चोट लगी जब उसे पता चला कि उस के पति रोहित के किसी अन्य लड़की से नाजायज संबंध हैं, जो उस के साथ कालेज में पढ़ती थी.

वर्ष 2013 में जब श्वेता की प्रताड़ना ज्यादा बढ़ गई तो वह ससुराल छोड़ कर मायके में आ कर रहने लगी. यहां वह 7 महीने तक रही. उस के बाद एक प्रतिष्ठित कांग्रेसी नेता ने बीच में पड़ कर समझौता करा दिया. उस के बाद सुरेश कुमार मिश्रा ने श्वेता को ससुराल भेज दिया.

ससुराल में कुछ समय तक तो उसे ठीक से रखा गया. लेकिन उसे फिर से प्रताडि़त किया जाने लगा. मांबाप की नुकताचीनी पर रोहित उसे पीट भी देता था. कृष्णा देवी तो सीधेसीधे उसे बांझ होने का ताना देने लगी थी. ननद नूतन और मीनाक्षी भी अपने मांबाप व भाई का ही पक्ष ले कर प्रताडि़त करती थीं.

ससुराली बातों की प्रताड़ना से दुखी हो कर श्वेता ने एक रोज अपनी बड़ी बहन सपना को एक खत भेजा, जिस में उस ने अपना दर्द बयां करते हुए लिखा, ‘सपना दीदी, रोहित तथा उस के मांबाप मुझे बहुत परेशान करते हैं. चैन से जीने नहीं देते. सब पीटते हैं, मुझे नीचा दिखाते हैं. खाने को भी नहीं देते. यहां तक कि मेरे पहनावे पर सवाल उठाते हैं.

‘‘मुझे यह भी पता चला है कि रोहित के एक युवती से संबंध हैं. वह उस के कालेज समय की दोस्त है. वह उसी से प्यार करता है. यही वजह है कि वह मुझे प्रताडि़त करता है. उसे मेरी हर बात बुरी लगती है. मामूली बातों पर मारपीट कर घर से जाने को कहता है. सासससुर भी उसी का साथ देते हैं. नौकरानी की तरह दिन भर घर का काम करवाते हैं. यदि मेरे साथ कोई अप्रिय वारदात हो जाए तो ये सभी जिम्मेदार होंगे.’’

छोटी बहन का दर्द सुन कर सपना बहुत दुखी हुई. उस ने सारी बात मांबाप को बताई. तब सुरेश कुमार मिश्रा ने दामाद रोहित तथा उस के मांबाप से बात की और अनुरोध किया कि वे लोग श्वेता को प्रताड़ित न करें.

इतना ही नहीं उन्होंने श्वेता को भी समझाया कि वह परिवार में सामंजस्य बनाए रहे. लेकिन सुरेश कुमार के अनुरोध का रोहित और उस के परिजनों पर कोई असर न पड़ा, उन की प्रताड़ना बदस्तूर जारी रही.

इसी तनाव भरी जिंदगी के बीच रोहित का तबादला उदयपुर के महाराणा प्रताप एयरपोर्ट पर हो गया. श्वेता दिल्ली छोड़ कर पति के साथ उदयपुर चली गई. उदयपुर में ही श्वेता ने अप्रैल 2018 में बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम श्रीयम रखा गया. बेटे के जन्म के बाद श्वेता को लगा कि अब उस की खुशियां वापस आ जाएंगी और पति के स्वभाव में भी परिवर्तन आएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.श्रीयम के जन्म से न तो रोहित को खुशी हुई और न ही उस के स्वभाव में परिवर्तन आया. उस की प्रताड़ना बदस्तूर जारी रही. रोहित के मातापिता भी श्रीयम के जन्म से खुश नजर नहीं आए.

उदयपुर एयरपोर्ट पर तैनाती के दौरान रोहित तिवारी की मुलाकात सह कर्मी हरीसिंह से हुई. धीरेधीरे दोनों में गहरी दोस्ती हो गई. हरी सिंह अपनी पत्नी सुधा सिंह को साथ ले कर रोहित के घर आने लगा. सुधा सिंह मिलनसार थी. इसलिए श्वेता और सुधा अपना सुखदुख एकदूसरे से शेयर कर लेती थीं. श्वेता ने प्रताडि़त किए जाने की बात भी सुधा से शेयर की थी.

सौरभ चौधरी हरीसिंह का साला था. वह भरतपुर में रहता था, और हैंडीक्राफ्ट का काम करता था. हरीसिंह के मार्फत सौरभ की जानपहचान रोहित से हुई. वह रोहित के घर आने लगा. उस ने श्वेता से भी पहचान बना ली, और उस से खूब बतियाने लगा. सौरभ जब भी रोहित से मिलने आता था, वह उसे शराब पिलाता था.

इधर श्रीयम के जन्म के बाद रोहित तिवारी का ट्रांसफर उदयपुर से जयपुर हो गया. जयपुर में रोहित ने प्रताप नगर थाना क्षेत्र के जगतपुरा में स्थित यूनिक टावर सेक्टर 26, आई ब्लौक में फ्लैट संख्या 103 किराए पर ले लिया और पत्नी श्वेता तथा बेटे श्रीयम के साथ रहने लगा.

जयपुर आ कर भी श्वेता और रोहित के बीच तनाव बरकरार रहा. दोनों का छोटीछोटी बातों में झगड़ा और मारपीट होती रहती थी. हरीसिंह का साला सौरभ चौधरी यहां भी रोहित से मिलने आता था. उसे दोनों की तनाव भरी जिंदगी के बारे में जानकारी थी. रोहित कभीकभी शराब के नशे में कह भी देता था कि वह झगड़ालू श्वेता से छुटकारा पाना चाहता है.

दिसंबर 2019 की बात है. रोहित को कंपनी के काम से 8 से 21 दिसंबर के बीच शहर से बाहर जाना था. इसलिए वह श्वेता को अपने मांबाप के पास दिल्ली छोड़ गया. पहले वह कोलकाता गया फिर मुंबई. 21 दिसंबर को वह मुंबई से दिल्ली आया. घर वालों ने हमेशा की तरह उसे श्वेता के खिलाफ भड़काया. तब दोनों के बीच झगड़ा भी हुआ.

इस के बाद वह श्वेता को ले कर जयपुर आ गया. दोनों कार से आए थे. घर आ कर श्वेता ने अपनी मां माधुरी को फोन पर बताया कि रोहित ने 272 किलोमीटर के सफर में उसे पानी तक नहीं पीने दिया और वह झगड़ता रहा.

अब तक रोहित अपनी शादीशुदा जिंदगी से ऊब चुका था. वह दूसरी शादी रचा कर अपनी नई जिंदगी की शुरूआत करने के सपने देखने लगा, लेकिन एक पत्नी के रहते वह दूसरी शादी नहीं कर सकता था. उस ने श्वेता की हत्या के साथ मासूम श्रीयम की भी हत्या कराने का फैसला किया, ताकि शादीशुदा जिंदगी का नामोनिशान मिट जाए. वह जिंदगी की बैक हिस्ट्री को ही डिलीट करना चाहता था.

3 जनवरी, 2020 को रोहित ने सौरभ चौधरी को फोन कर जयपुर एयरपोर्ट के पास स्थित होटल फ्लाइट व्यू में बुलाया. वहां रोहित ने सौरभ के साथ बैठ कर पत्नी व बेटे की हत्या की साजिश रची. साजिश इस तरह रची गई कि रोहित का नाम सामने नहीं आए. रोहित ने हत्या के लिए सौरभ को 20 हजार रुपए भी दे दिए.

दरअसल सौरभ चौधरी शादीशुदा था. रोहित की तरह सौरभ भी पत्नी से परेशान रहता था और पत्नी से छुटकारा पाना चाहता था. इसलिए दोनों में तय हुआ कि पहले वह रोहित का साथ देगा. फिर रोहित उस की पत्नी की हत्या में उस का साथ देगा. यही कारण था कि मात्र 20 हजार में सौरभ डबल मर्डर को राजी हो गया था.

5 जनवरी, 2020 को मोबाइल रिचार्ज न कराने को ले कर रोहित और श्वेता के बीच झगड़ा और मारपीट हुई. इस के बाद उस ने श्वेता के पिता सुरेश कुमार मिश्रा को फोन कर के झगड़े की जानकारी दी और गुस्से में कहा, ‘‘पापा जी, आप श्वेता को ले जाइए. मैं उस का मुंह नहीं देखना चाहता. आप को जितना पैसा चाहिए ले लीजिए. अन्यथा मैं इस की हत्या कर दूंगा.’’

दामाद की धमकी से सुरेश कुमार मिश्रा घबरा उठे. उन्होंने दामाद को भी समझाया और बेटी को भी. लेकिन समझाने के बावजूद रोहित का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ. उस ने फोन कर सौरभ चौधरी को जयपुर बुला लिया और श्वेता तथा उस के मासूम बेटे श्रीयम की हत्या की पूरी योजना तैयार कर के हत्या का दिन तारीख और समय तय कर दिया.

योजना के मुताबिक 7 जनवरी, 2020 की सुबह 9 बजे रोहित जयपुर एयरपोर्ट पहुंच गया और अपने काम पर लग गया. वह वहां एक मीटिंग में भी शामिल हुआ. वहां लगे सीसीटीवी कैमरों के सामने भी वह आताजाता रहा, ताकि उस का फोटो कैमरों में कैद हो जाए.

इधर योजना के मुताबिक सौरभ चौधरी भी 7 जनवरी को दोपहर बाद लगभग 2 बजे रोहित के यूनिक टावर अपार्टमेंट स्थित फ्लैट पर पहुंचा और डोरवेल बजाई. श्वेता ने दरवाजा खोला तो सामने सौरभ खड़ा था.

चूंकि सौरभ को श्वेता जानतीपहचानती थी, इसलिए उसे घर के अंदर ले गई और कमरे में बिठाया. फिर उस ने 2 कप चाय बनाई और दोनों ने बैठ कर चाय पी. चाय पी कर दोनों ने कप प्लास्टिक की टेबल पर रख दिए.

इसी बीच श्वेता दूसरे कमरे में चली गई, जहां उस का बेटा श्रीयम सो रहा था. तभी मौका पा कर सौरभ रसोई में गया और अदरक कूटने वाली लोहे की मूसली उठा लाया. चंद मिनट बाद श्वेता वापस आई तो सौरभ ने अकस्मात श्वेता के सिर पर मूसली से वार कर दिया. श्वेता सिर पकड़ कर पलंग पर गिर पड़ी.

इस के बाद सौरभ ने श्वेता को दबोच लिया, और मूसली से उस का सिर व चेहरा कूट डाला. इस के बाद वह पुन: रसोई में गया और चाकू ले आया और चाकू से श्वेता का गला रेत दिया. उस ने चाकू पलंग पर तथा मूसली पलंग के नीचे फेंक दी.

श्वेता की हत्या करने के बाद सौरभ चौधरी दूसरे कमरे में पहुंचा, जहां मासूम श्रीयम पलंग पर सो रहा था. सौरभ को उस मासूम पर जरा भी दया नहीं आई और न ही उस का कलेजा कांपा. उस ने श्रीयम को गला दबा कर मार डाला तथा उस का सिर भी कूट डाला. इस के बाद सौरभ ने उस का शव तौलिए में लपेटा और बाउंड्री वाल के पीछे झाडि़यों में फेंक दिया.

श्रीयम का शव ठिकाने लगाने के बाद उस ने फिर से कमरे में आ कर श्वेता का मोबाइल फोन अपनी जेब में डाला और मुंह पर कपड़ा ढक कर फ्लैट से निकल गया. बाद में उस ने श्वेता का मोबाइल फोन तोड़ कर सांगानेर से शिकारपुरा की ओर बहने वाले नाले में फेंक दिया और दूसरा फोन खरीद कर फिरौती के लिए रोहित को मैसेज भेजा.

इधर शाम 4 बजे नौकरानी काम करने फ्लैट पर आई तब घटना की जानकारी हुई. इस के बाद तो कोहराम मच गया. थाना प्रताप नगर पुलिस को सूचना मिली तो पुलिस मौके पर पहुंची.

11 जनवरी, 2019 को पुलिस ने अभियुक्त रोहित तिवारी तथा सौरभ चौधरी को जयपुर कोर्ट में पेश किया. पुलिस ने मृतका का मोबाइल फोन व सिम कार्ड बरामद करने के लिए अदालत में अभियुक्तों की 3 दिन के रिमांड की अरजी लगाई. अदालत ने 2 दिन की रिमांड अरजी मंजूर कर ली.

रिमांड मिलने पर जब पुलिस ने सौरभ से श्वेता के मोबाइल फोन व सिम के बारे में पूछा तो उस ने सिम तो बरामद करा दिया, लेकिन मोबाइल फोन के बारे में बताया कि उस ने मोबाइल तोड़ कर सांगानेर के नाले में फेंक दिया था. रिमांड के दौरान पुलिस मोबाइल बरामद नहीं कर सकी. जिस से उन दोनों को 13 जनवरी को अदालत में पेश करना पड़ा.पुलिस की अरजी पर अदालत ने 15 जनवरी, 2020 तक फिर से रिमांड अवधि बढ़ाई लेकिन पुलिस मोबाइल फोन फिर भी बरामद नहीं कर सकी. इसलिए उन्हें अदालत में पेश कर जयपुर की जिला जेल भेज दिया गया. हरीसिंह को पुलिस ने उदयपुर से हिरासत में जरूर ले लिया था, परंतु बाद में उसे इस मामले में क्लीन चिट दे दी.

 

प्यार की भूल

गली में जैसे ही बाइक के हौर्न की आवाज सुनाई दी, शमा के साथसाथ उस की सहेलियां भी चौंक उठीं. क्योंकि वह बाइक शमा के प्रेमी नरेंदर की थी. नरेंदर अपनी बाइक से कपड़ों की फेरी लगाता था. शमा के घर के नजदीक पहुंचते ही वह बारबार हौर्न बजाता. तभी तो बाइक के हौर्न की आवाज सुनते ही एक सहेली ने शमा को छेड़ते हुए कहा, ‘‘लो जानेमन, आ गई तुम्हारे यार की कपड़ों की चलतीफिरती दुकान.’’

‘‘हट बदमाश, तू तो ऐसे कह रही है जैसे वह केवल मेरे लिए ही यहां आता है. क्या मोहल्ले का और कोई उस से कपडे़ नहीं खरीदता है?’’

‘‘और नहीं तो क्या, वह तेरे लिए ही तो इस गांव में आता है.’’ सहेलियों ने शमा को छेड़ते हुए कहा, ‘‘वह बेचारा तो सारे गांव छोड़ कर पता नहीं कहां से धक्के खाता हुआ तेरे दीदार के लिए इस गांव में आता है.’’

सहेलियों की चुहलबाजी से शमा शरमा गई और उन के बीच से उठ कर अपने कमरे में चली गई.

जब वह कमरे से बाहर निकली तो गुलाबी रंग का फूलों के प्रिंट वाला सुंदर सूट पहन कर आई थी. यह सूट पिछले सप्ताह नरेंद्र ने उसे यह कहते हुए दिया था कि इसे सिलवा कर तुम ही पहनना, किसी और को मत देना. इसे मैं अमृतसर से सिर्फ तुम्हारे लिए ही लाया हूं. यूं समझो शमा, यह सूट मेरे प्यार की निशानी है.

नरेंदर के दिए उसी सूट को पहन कर शमा घर से निकली. नरेंदर उस के सामने खड़ा था. जैसे ही वह घर से बाहर आई, उसे देख कर वह खुश हो गया. वह मंत्रमुग्ध सा हो कर उसे ऊपर से नीचे तक देखता रह गया था. उस सूट ने उस की खूबसूरती में चारचांद लगा दिए थे. वह किसी अप्सरा से कम सुंदर नहीं लग रही थी.

घर की ओट में खड़ी शमा की सहेलियां जब जोरजोर से हंसी तो शमा और नरेंदर की तंद्रा भंग हुई. घबराहट और शरम से भरी शमा ने जल्दीजल्दी नरेंद्र से कहा, ‘‘अच्छा, मैं चलती हूं.’’

नरेंदर ने आगे बढ़ कर उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘नहीं शमा, आज नहीं. आज मुझे तुम से बहुत जरूरी बात करनी है.’’

शमा के कदम वहीं रुक गए.

जालंधर शहर की बस्ती शेख निवासी नरेश चौहान के 2 बेटे थे सुरेंदर चौहान और नरेंदर चौहान. कई साल पहले किसी वजह से नरेश की मृत्यु हो गई, जिस की वजह से परिवार का भार उन की पत्नी सुदेश कुमारी के ऊपर आ गया. जो सगेसंबंधी थे, उन्होंने भी मदद करने के बजाय सुदेश का साथ छोड़ दिया था. मेहनतमजदूरी कर के उन्होंने जैसेतैसे दोनों बच्चों का पालनपोषण किया. जहां तक हो सका, उन्हें पढ़ाया भी.

बड़ा बेटा सुरेंदर जब जवान हो कर किसी फैक्ट्री में काम करने लगा तो घर के हालात कुछ सामान्य हुए. कुछ समय बाद उस ने कुछ रुपए इकट्ठे कर के और कुछ इधरउधर से कर्ज ले कर छोटे भाई नरेंदर को कपड़े का काम करवा दिया. उसे एक मोटरसाइकिल भी खरीदवा दी. नरेंदर सुबह कपड़े का गट्ठर बांध कर अपनी बाइक पर रखता और जालंधर से बाहर दूरदूर गांवों में जा कर कपड़ा बेचता.

मोटरसाइकिल से गांवगांव घूम कर कपड़ों की फेरी लगाने पर उस का काम चल निकला. अब दोनों भाई कमाने लगे तो वे पैसे मां को दे देते. मां ने पैसे जोड़जाड़ कर बड़े बेटे सुरेंदर की शादी कर दी.

पर शादी के कुछ दिनों बाद वह अपनी पत्नी को ले कर अलग रहने लगा था. जबकि नरेंदर मां के साथ रहता था. नरेंदर खूब मेहनत कर रहा था. उस का व्यवहार भी अच्छा था जिस की वजह से उसे ठीकठाक आमदनी हो जाती थी.

एक बार वह कपड़े बेचने के लिए नंगल लाहौरा गांव गया. वहां की रहने वाली भोलीनामक महिला उसे अपने घर बुला कर ले गई.

उस दिन भोली व उस की बेटी शमा ने उस से 5 हजार रुपए के कपड़े खरीदे. उसी समय उस की मुलाकात शमा से हुई थी. शमा बहुत खूबसूरत थी. उसी दिन उस की शमा से आंखें लड़ गईं.

इस के बाद वह नंगल लाहौरा गांव का रोजाना ही चक्कर लगाता और शमा के घर के नजदीक बाइक पहुंचते ही बारबार हौर्न बजाता.

हौर्न की आवाज सुनते ही शमा घर से बाहर निकल आती थी. दोनों एकदूसरे को देख कर मुसकराने लगते थे. कभीकभी अच्छे कपड़े दिखाने की बात कह कर वह भोली के घर में भी चला जाता था.

जब नरेंदर उस के यहां ज्यादा ही आनेजाने लगा तो शमा के घर वालों ने उस से बेरुखी से बात करनी शुरू कर दी. इस बारे में नरेंदर ने शमा से फोन पर पूछा तो शमा ने घर वालों की नाराजगी के बारे में बता दिया. घर वालों से चोरीछिपे शमा नरेंदर से मिलती रही. उन की फोन पर भी बात होती रहती. इस तरह उन का प्यार परवान चढ़ता रहा. यह सन 2004 की बात है.

नरेंदर शमा की पूरी पारिवारिक स्थिति जान गया था. शमा की 5 बहनें और एक भाई था. पिता की पहले ही मौत हो चुकी थी. घर की पूरी जिम्मेदारी शमा की मां भोली के कंधों पर ही थी. शमा की बड़ी बहन शादी लायक थी, उस के लिए भोली कोई अच्छा लड़का तलाश रही थी.

नरेंदर जितना शमा को चाहता था, उस से कई गुना अधिक शमा भी उस से प्यार करती थी. नरेंदर हृष्टपुष्ट और भला लड़का था. वह कमा भी अच्छा रहा था, इसलिए उसे उम्मीद थी कि शमा की शादी उस से कर देने पर भोली को कोई ऐतराज नहीं होगा.

पर पता नहीं क्यों नरेंदर ने किसी के माध्यम से शमा से शादी करने का प्रस्ताव भोली के पास भेजा तो भोली ने उस के साथ बेटी का रिश्ता करने से साफ इनकार कर दिया. इस से दोनों प्रेमियों के इरादों पर पानी फिर गया.

ऐसे प्रेमियों के पास घर से भाग कर शादी करने के अलावा कोई और दूसरा रास्ता नहीं बचता, सो शमा और नरेंदर ने भी घर से भाग कर शादी करने की योजना बनाई.

नरेंदर ने मंदिर के पंडित से ले कर वकील तक का इंतजाम कर के शमा से कहा, ‘‘शमा, अब मेरी बात गौर से सुनो. मैं ने शादी की सारी तैयारियां पूरी कर ली हैं. कल सुबह तुम्हें किसी बहाने से अपने गांव से निकल कर बसअड्डे पहुंचना है. फिर वहां से कोई बस पकड़ कर तुम जालंधर आ जाना. मैं तुम्हें वहीं मिलूंगा. वहां से हम साथसाथ चंडीगढ़ चलेंगे और वहीं शादी कर लेंगे. तुम चिंता मत करो, मैं ने सारा इंतजाम कर लिया है.’’

‘‘मैं घर से कपड़े भी लेती आऊं?’’ शमा ने पूछा.

‘‘नहीं, तुम्हें कुछ भी साथ लाने की जरूरत नहीं है. तुम बस इतना करना कि टाइम से पहुंच जाना.’’ नरेंदर ने शमा को अच्छी तरह समझा दिया था. इतना ही नहीं उस ने किराएभाड़े के लिए कुछ पैसे भी उसे दे दिए थे.

योजना के अनुसार शमा निर्धारित समय पर नरेंदर के पास जालंधर पहुंच गई. फिर वहां से बस द्वारा दोनों चंडीगढ़ पहुंच गए. पहले उन्होंने एक मंदिर में शादी की फिर उस शादी को नोटरी पब्लिक के जरिए रजिस्टर भी करवा लिया.

नरेंदर शमा से शादी कर के बहुत खुश था. उस ने अपनी शादी के लिए बहुत बढि़या इंतजाम कर रखा था. हनीमून को वह यादगार बनाना चाहता था इसलिए उस ने चंडीगढ़ में ही एक थ्रीस्टार होटल में सुइट बुक करवा रखा था. वह बेहद उत्सुक था पर उस रात उस की उत्सुकता ठंडी पड़ गई. उस के सारे अरमानों पर पानी फिर गया.

उस के दिल को इतना बड़ा धक्का लगा कि उस ने सोचा भी नहीं होगा. क्योंकि अपनी मनपसंद की जिस शमा को वह जीजान से चाहता था, सब के विरोध के बावजूद जिस से उस ने शादी की, वह लड़की नहीं बल्कि किन्नर निकली. अब पूरा ब्रह्मांड उसे घूमता नजर आ रहा था. वह बुदबुदाने लगा कि मैं समाज को अब क्या मुंह दिखाऊंगा.

इस के बाद वह बैड से उठ कर जोरजोर से रोने लगा था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. गुस्से से तमतमाते हुए उस ने शमा के गाल पर एक जोरदार थप्पड़ रसीद करते हुए कहा, ‘‘बताओ, मैं ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था. अपनी जान से ज्यादा तुम्हें प्यार किया था और तुम ने मेरे साथ इतना बड़ा छल किया. बताओ, क्यों किया ऐसा? सच बताओ नहीं तो मैं तुम्हारी जान ले लूंगा.’’ नरेंदर के सिर पर जैसे खून सवार हो गया था.

‘‘मैं कुछ नहीं जानती नरेंदर, तुम्हारे प्यार की कसम. मैं तो बचपन से ही ऐसी हूं. मां ने कहा था कि शादी के बाद अपने आप ठीक हो जाऊंगी.’’ शमा ने मासूमियत से जवाब दिया था.

नरेंदर समझ गया कि या तो शमा इतनी भोली है कि उसे इस बारे में कुछ पता नहीं या वह बेहद चालाक है. लेकिन बात कुछ भी रही हो, पर अब वह क्या करे. यह प्रश्न बारबार नरेंदर के दिमाग में घूम रहा था. वक्त की बेरहम आंधी ने उस की खुशियों के चमन को एक झटके में उखाड़ कर तहसनहस कर दिया था. शमा के मिन्नतें करने पर नरेंदर उसे अपने घर ले गया.

2 दिन अपने घर पर रखने के बाद उस ने शमा को घर से निकालते हुए कह दिया, ‘‘शमा, तुम ने मेरे साथ धोखा किया है. अब मैं यह बताना चाहता हूं कि तुम इस घटना को एक बुरा सपना समझ कर भूल जाना. मैं भी भूलने की कोशिश करूंगा. हां, एक बात याद रखना कि आज के बाद कभी भूल कर भी मेरे सामने मत आना. जिस दिन तुम मेरे सामने आ गई तो समझ लेना कि वह दिन तुम्हारी जिंदगी का आखिरी दिन होगा.’’

शमा को इतनी जल्दी भुला देना नरेंदर के लिए आसान नहीं था. इसलिए उस ने जालंधर से दूर जाना उचित समझा. वह अपना सब कुछ छोड़छाड़ कर अपनी मां को ले कर दिल्ली आ गया. यहां उस ने औटो चलाना शुरू कर दिया. दूसरी ओर शमा भी अपनी मां के पास चली गई.

वक्त के साथ सब कुछ सामान्य होता चला गया था. दूसरी ओर शमा की बड़ी बहन की शादी राजकुमार नामक युवक के साथ हो गई. शादी के बाद भोली के ऊपर लोगों का कर्ज भी हो गया था.

मां जो मेहनतमजदूरी करती, उस से बड़ी मुश्किल से घर का खर्च चल पाता था. ऐसी हालत में शमा ने मां का हाथ बंटाना जरूरी समझा. उस ने एक आर्केस्ट्रा ग्रुप जौइन कर लिया. इस काम में अच्छीखासी कमाई थी सो घर के हालात धीरेधीरे बदलने लगे.

शमा जालंधर के आर्केस्ट्रा ग्रुप में काम करती थी. गांव से जालंधर आने में शमा को परेशानी होती थी, इसलिए वह अपनी मां और भाईबहन को जालंधर ले आई. वहीं उस ने एक किराए का कमरा ले लिया. शमा और नरेंदर दोनों अपनेअपने काम में लग गए थे, इसलिए उन की प्रेमकहानी का अंत हो चुका था.

वक्त के बेरहम थपेड़ों में दोनों ने एकदूसरे को भुला दिया था. इस तरह वक्त का पहिया अपनी गति से घूमता रहा था. एकएक कर इस बात को पूरे 11 साल गुजर गए थे. न तो नरेंदर को पता था कि शमा अब कहां है और न ही शमा यह जानती थी कि उसे अपने घर से निकालने के बाद नरेंद्र कहां और किस हाल में है.

पहली मई 2017 की बात है. शमा रात 8 बजे अपने घर से अपनी स्कूटी पर किसी काम से बाजार जाने के लिए निकली. चलते समय उस ने अपनी मां से कहा था कि वह किसी जरूरी काम से बाहर जा रही है, थोड़ी देर में लौट आएगी. लेकिन वह उस रात घर नहीं लौटी तो भोली ने शमा को फोन मिलाया. पर उस का फोन बंद था.

रात भर तलाशने पर भी शमा का कहीं कोई पता नहीं चला. अगली सुबह शमा की एक सहेली ने बताया कि रात शमा उस को बस्ती शेख के तेजमोहन नगर की गली नंबर 6 के कोने पर मिली थी, पूछने पर उस ने बताया था किसी रिश्तेदार से मिलने जा रही है.

‘‘लेकिन यहां हमारा कोई रिश्तेदार तो क्या, कोई जानकार भी नहीं रहता.’’ भोली ने बताया.

बहरहाल, भोली अपने बेटे और दामाद को साथ ले कर तेजमोहन नगर की गली नंबर 6 में पहुंची तो मकान नंबर 3572/19 के सामने शमा की स्कूटी खड़ी मिली. आसपास के लोगों से पूछने पर पता चला कि वह मकान पिछले 4 महीनों से किसी नरेंदर चौहान ने किराए पर ले रखा था.

मकान के बाहर छोटा सा ताला था. भोली और उस के बेटे और दामाद ताला खोल कर जब भीतर गए तो वहां का नजारा देख कर उन सब के होश उड़ गए. बैड पर शमा की लाश पड़ी थी. तब भोली ने इस की सूचना थाना डिवीजन-5 पुलिस को दी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी सुखबीर सिंह अपने सहयोगी इंसपेक्टर नरेश जोशी के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल का मुआयना करने से पता चला कि मृतका के गले में दुपट्टा कसा हुआ था. इस के अलावा उस की गरदन पर गहरा घाव भी था.

पूछताछ करने पर पता चला था कि उस मकान में नरेंदर चौहान किराए पर रहता था. वह मृतका का पति था. पड़ोसियों ने बताया कि शमा रात करीब सवा 8 बजे वहां पहुंची थी. इस के कुछ देर बाद ही उस के कमरे से लड़ाईझगड़े की जोरजोर की आवाजें आने लगी थीं. कुछ देर बाद आवाजें आनी बंद हो गईं. रात करीब साढ़े 10 बजे उन्होंने नरेंदर और उस की मां को घर के बाहर निकल कर कहीं जाते हुए देखा था.

भोली ने भी अपने बयान में यही बताया था कि शमा की हत्या उस के दामाद नरेंदर चौहान और उस की मां सुदेश चौहान ने मिल कर की है.

इंसपेक्टर सुखबीर सिंह ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भेज दी. भोली के बयान के आधार पर पुलिस ने नरेंदर चौहान और उस की मां सुदेश चौहान के खिलाफ भादंवि की धारा 302/34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर तहकीकात शुरू कर दी.

3 डाक्टरों के पैनल ने शमा की लाश का पोस्टमार्टम कर जो रिपोर्ट दी, उस में उन्होंने साफ लिखा था कि शमा एक किन्नर थी और उस की मौत गला घोंटने और गरदन पर कोई तेज नुकीली चीज के वार से हुई थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद पुलिस ने नरेंदर की तलाश शुरू कर दी. इस के लिए पुलिस की टीमें लगातार छापेमारी कर रही.

खास मुखबिर भी नरेंदर की तलाश में दिनरात एक किए हुए थे. 7 जुलाई 2017 को एक मुखबिर ने सूचना दी कि नरेंदर अपनी मां के साथ दिल्ली के सब्जीमंडी क्षेत्र में छिपा हुआ है.

सूचना मिलते ही पुलिस टीम दिल्ली रवाना हो गई और मुखबिर द्वारा बताए पते पर दबिश दे कर नरेंदर को गिरफ्तार कर के दिल्ली से जालंधर ले आई. उस समय वहां उस की मां मौजूद नहीं थी.

नरेंदर को अदालत में पेश कर 2 दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया पर रिमांड अवधि में उस ने अपना मुंह नहीं खोला. तब 10 जुलाई को उसे फिर से अदालत में पेश कर 3 दिन के रिमांड पर ले कर सख्ती से पूछताछ की गई.

आखिर उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही शमा की हत्या की थी. पुलिस अधिकारियों के सामने अपनी कहानी बताते हुए वह जोरजोर से दहाड़ें मार कर रोने लगा. उस ने उस की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

नरेंदर अपनी मां के साथ दिल्ली में रह रहा था और औटो चला कर अपना गुजारा कर रहा था, जबकि शमा जालंधर में आर्केस्ट्रा का काम करते हुए अपनी मां और भाईबहनों के साथ रह रही थी. इत्तफाक से दिल्ली में नरेंदर की मां बीमार रहने लगी थी उस की सेवा के लिए नरेंदर का काम प्रभावित होने लगा था.

मां के इलाज पर भी काफी खर्च आ रहा था. ऐसे में जालंधर में रहने वाले नरेंदर के भाई सुरेंदर ने उसे सलाह दी कि वह मां को ले कर जालंधर चला आए. दोनों भाई मिल कर मां का इलाज भी करवा लेंगे और कामधंधा भी प्रभावित नहीं होगा.

भाई की सलाह मान कर नरेंदर मां को साथ ले कर दिल्ली छोड़ कर जालंधर की बस्ती शेख में किराए का कमरा ले कर रहने लगा यहां भी उस ने औटो चलाना शुरू कर दिया था.

यह लगभग 3 महीने पहले की बात है. तब तक न शमा जानती थी कि नरेंदर इन दिनों जालंधर में है और न ही नरेंदर यह बात जानता था कि शमा अब जालंधर में रहती है. नरेंदर शमा को एक दु:स्वप्न समझ कर पूरी तरह भुला चुका था.

30 अप्रैल, 2017 की बात है. उस दिन शाम के समय शमा को नरेंदर के चाचा का लड़का छिंदा बाजार में मिल गया था. दोनों बड़े दिनों बाद मिले थे, इसलिए भीड़ से हट कर आपस में बातें करने लगे. बातोंबातों में छिंदा ने उसे बता दिया कि आजकल नरेंदर भाई भी यहीं रह रहे हैं. शमा ने छिंदा से नरेंदर का फोन नंबर ले लिया.

अगले दिन शमा ने नरेंदर को फोन कर के मिलने की इच्छा जताई तो पहले नरेंद्र ने मिलने से इनकार कर दिया. उस ने कहा, ‘‘अब हमारे बीच कुछ नहीं बचा है, मैं तुम्हें भूल भी चुका हूं इसलिए मिलने का क्या फायदा?’’

‘‘सिर्फ एक बार मैं तुम से मिलना चाहती हूं.’’ शमा ने कहा तो वह तैयार हो गया. उसी दिन पहली मई को शमा रात करीब 8 बजे नरेंदर से मिलने उस के घर पहुंच गई.

शमा को देखते ही नरेंदर का खून खौल उठा. उस की आंखों के सामने बीते दिनों की बातें किसी चलचित्र की तरह दिखाई देने लगी थीं. बड़ी मुश्किल से उस ने अपने गुस्से पर काबू पाते हुए ठंडे लहजे में कहा, ‘‘शमा, तुम्हें यहां मेरे पास नहीं आना चाहिए था. याद है, मैं ने अलग होते समय तुम से क्या कहा था?’’

शमा मुसकरा कर बोली, ‘‘अभी भी गुस्सा हो मुझ से?’’

तभी नरेंदर ने कहा, ‘‘अच्छा, जो हुआ सो हुआ. शायद यही नियति ने लिखा था. अब एक काम करते हैं तुम आर्केस्ट्रा का काम छोड़ दो. हम दोनों अपने प्यार से मिल कर एक नई दुनिया बसाते हैं. रहा सवाल संतान का तो हम कहीं से कोई बच्चा गोद ले लेंगे.’’

‘‘नहीं नरेंदर, अब चाह कर भी मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती और न ही आर्केस्ट्रा का काम छोड़ सकती हूं. मेरे इसी काम से मेरे परिवार का खर्च चलता है. मैं उन्हें भूखा नहीं मार सकती.’’ शमा बोली.

नरेंदर को गुस्सा आ गया. वह उसे गालियां देते हुए बोला, ‘‘तो मेरे पास यहां क्या करने आई है? याद है, मैं ने क्या कहा था. जिस दिन तू मेरे सामने आएगी, मैं तुझे खत्म कर दूंगा.’’ नरेंदर ने उसे जोरदार थप्पड़ रसीद करते हुए कहा, ‘‘मैं सब कुछ भूलभाल कर तुझे अपनाने को दोबारा तैयार हो गया और तू है कि अपने बहनभाई और रंडियों वाले नाचगाने का पेशा छोड़ने को तैयार नहीं है. आज मैं तुझे जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’’

कह कर नरेंदर वहां से उठ कर दूसरे कमरे में गया और अपनी मां को उठा कर जबरदस्ती बाथरूम में बंद कर दिया. इस के बाद वह शमा के पास पहुंचा और उसी के दुपट्टे से उस ने उस का गला घोंट दिया. कहीं वह जिंदा न रह जाए, यह सोच कर उस ने एक तेजधार चाकू का भरपूर वार शमा की गरदन पर किया था.

उस की हत्या करने के बाद उस ने बाथरूम का दरवाजा खोल कर अपनी मां को बाहर निकाला. मां सुदेश ने बाहर आ कर जब शमा की लाश देखी तो उसे माजरा समझते देर नहीं लगी. सुदेश ने नरेंदर को काफी भलाबुरा कहा. पर अब कुछ नहीं हो सकता था. इस के बाद वह मां को ले कर दिल्ली चला गया. पर पुलिस ने उसे वहीं से ढूंढ निकाला.

उस की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त चाकू भी बरामद कर लिया. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद उसे अदालत में पेश किया गया और अदालत के आदेश पर उसे जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखने तक सुदेश गिरफ्तार नहीं हो सकी थी.

-कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चाओं पर आधारित

Holi Special : सतरंगी रंग – कैसा था पायल का जीवन

Story in hindi

तुम ऐसी निकलीं – भाग 4: फरेबी आशिक की मोहब्बत

मोनिका नकली सी हंसी के  साथ मुसकरा दी. ‘मोनिका…’ अचानक  उस के मुंह से निकला. उस ने अचानक महसूस किया कि अंतरंग क्षणों में वह उस के कानों में  इसी भावुकता से फुसफुसाता था. ‘मोनिका…’ वह दोबारा मन में बोला. इतने में वह साफसाफ  बोली, ” पैसे, पैसों के  हिसाब के लिए आई हूं.”

“ओह, अच्छा.” वह समझा कि मोनिका बहुत ही सुसंकृत है और  वह सब के सामने बहुत कायदे से पेश आना चाहती है, इसलिए  उस ने गरदन दाएं और बाएं दौडा़ कर देखा. मगर आसपास तो उन दोनों के सिवा और कोई भी था ही नहीं. सो, उस को लगा कि उस की गैरहाजिरी में शायद  वह चादरें पसंद कर  ले गई होगी. तो, आज उन के  पैसे देने आई होगी.

“हां, तो मोनिका…” उस ने आंखें मिला कर कहा तो वह नजर नीची कर के फिर बोली, “आज तुम  मेरा हिसाब पूरा कर दो, 5 बार के मेरे  पैसे दे दो, 2 हजार रुपए के  हिसाब से 10 हजार बनते हैं.  आप, 8 हजार रुपए दे दो.”

मोनिका ऐसा कह कर खामोश हो गई,  पर उस की आंखें नीची ही रहीं. उस के कानों ने यह सुना, तो वह तो जैसे आसमान से गिरा. उस को लगा कि  वह जैसे किसी सडे़ हुए गोबर में फेंक दिया गया हो, छपाक… यह वही मोनिका है  और किस बात के पैसे मांग रही है, उन मुलाक़ातों, ताल्लुकातों के जिन में वह भी  अपनी मरजी से शामिल हुई. मगर वह तो उस से बहुत प्यार करती थी.

“मोनिका,” उस के मुंह से निकला और मुंह खोलते ही जैसे सडा़ हुआ  गोबर सीधा उस के मुंह में गया,  लेकिन उस ने  अपनी आंखों से, पलकों से वह बदबूदार गोबर हटाया और  पलकें झपकाते हुए कहा, “मोनिका, हम तो एकदूसरे की  पूरी सहमति से… है ना… और यह तो प्यार था.”

“मगर, मैं तो  किसी प्रेमव्रेम को बिलकुल भी  नहीं मानती. चादर की  तरह मेरी देह भी, बस, बिक्री के  लिए ही सजतीसंवरती  है.

“तुम, गंदे आदमी,  जिस से पता नहीं कैसीकैसी मछली सी भयानक बदबू आती रहती है. तुम, जो मुझे एक चुन्नी के समान अपने अंग में लपेटे रखना चाहते हो, तुम, जो केवल अपनी शारीरिक वासनाओं को तृप्त करना चाहते हो, तुम, कैसे राक्षस हो, दैत्य हो, मुझे पता है क्योंकि तुम को मैं ने सहा है. और तुम कहते हो  मुझे  प्यार करते हो? तुम…” और वह चुप हो गई.

अब वह गिड़गिडा़ने लगा, “मोनिका, अब तो  मैं ने अपना जीवन तुम्हारे हाथ में दे दिया  है. मेरे पास शब्द नहीं हैं, मेरे मन की  आवाज सुनो. तुम आज मेरे कोमल दिल को लात मार रही हो  पर एक दिन जरूर…”

मगर मोनिका बिलकुल  ही जड़ हो कर बैठी  थी.  अचानक  उस से बेहतर  होने  का तेज मोनिका के हावभाव  में उदित हुआ. विश्वास  और व्यावहारिकता के रंग  उस की आंखों में छा गए. वह जैसे किसी जरूरी काम को याद कर के  उठ खड़ी हुई. उस के इस रूखेपन से  अब तो वह जैसे  दोबारा उस गोबर में सन  कर लथपथ हो गया था. उस  बदबू से बचने के लिए उस ने  जल्दी से 5 हजार रुपए थमा दिए और  उस की तरफ से अपना  मुंह मोड़ लिया.

मोनिका रुपए लपक कर सीधे  अपने रास्ते चलती  गई. अब वह जरा सा दूर थी. लेकिन अब भी गोबर की हलकीहलकी गंध वहां पर  रह गई थी. उस ने पानी से भरा हुआ  एक जग लिया और  अपना मुंह छपाकछपाक कर धो लिया. एक सूखे कपड़े से मुंह साफ कर अब वह छिम्मा को याद कर रहा था. उस को तो गलती से ही  कभीकभार ही  उस पर  प्यार उमड़ता क्योंकि  छिम्मा तो उस के लिए, बस, एक  टाइमपास  ही थी. मगर वह औरत बड़ी  दिलदार थी.  वस्त्र पहनतेपहनते ही  उस के हाथ पर सौदोसौ रुपए रख ही देती थी.  कितनी मधुर मोहरे वाली महक आती थी उस के भीगे बदन से. और एक यह  थी, निर्लज्ज मटर गली वाली लालची. छि: कितना गंदा नाम, बदनाम, मोनिका.

वह टूट कर  बिखरा, बेकार, बेजान  खिलौना सा बन गया था.  जाते हुए मोनिका की  चप्पल दूर से  ही आवाज कर रही थी और  उसे एकाएक लगा कि एक चप्पल ऊपर उठी और उड़ती हुई  सीधी उस के गाल पर चट से  आ लगी है. अपने  कोमल गाल पर मोनिका  की चप्पल खा कर वह दर्द से कराहने  लगा कि उस के कान में सर्कस  के  मैनेजर की  आवाज पड़ी. वह  वहीं पर एक जोकर को समझा रहा था कि, “तू तो है ही इस काबिल कि तेरी जम कर  हंसी उडा़ई जाए.  हमें पता है कि तेरा कौन सा बटन कब और कैसे दबाना है, समझा कि नहीं? तुझे शरबत पिला कर तेरा सत्कार कर रहे हैं, तो ऐसे ही नहीं, हम  तुझ से दोगुना काम भी  निकाल लेंगे, यह मत भूलना.”

उस को लगा कि यह डायलौग उस के लिए फिट था. उस ने दोनों हाथों से अपने  कान बंद कर लिए और मदहोशी वाली हालत  में  कदमताल करताकरता  बाहर निकल पड़ा. और  सर्कस का मैदान छोड़ कर वह आगे  कहीं किसी सड़क पर आ गया.

“अरे, यह  सुराही तो बहुत जतन से सांचे पर ढाल कर पकाई थी.   इस से तो यह उम्मीद नहीं थी. हम ने सोचा था,  यह  बहुत दिन  साथ निभाएगी.  पर  यह शायद नए  पानी की तासीर से   डर गई. ओह, धत तेरी की. चल.”  वहां एक आदमी था जो   टुकड़ेटुकड़े हो गई सुराही को ठिकाने लगा रहा था.

उस ने यह सब अनदेखा किया मगर हर चीज तो वश में नहीं होती न. अचानक  वह अपने सामने देखता है कि  फैला हुआ लंबा उजाड़ रास्ता है.  यह देख कर वह  लड़खडा़ने  सा लगा और उसी रास्ते पर एक जगह लुढ़क गया. उस ने बंद आंखों से कुछ चित्र देखे, रमा और छिम्मा अपने हाथ हिला कर  उसे बुला रही थीं. वह एकाएक उठा और उठ कर खड़ा हो गया. ऐसा लगा कि कोई लतिका उस के  पीछे दौड़ती आ रही थी. फिर वह उस का  हाथ पकड़ कर पूछ रही थी, ‘सुनिए, ये वाली  10 चादरें खरीदनी  हैं, कितना डिस्काउंट मिलेगा?’

मगर उस को कुछ और भी  याद आने  लगा था…उस दिन एक फोन आया था कि नहींनहीं, मैं मोनिका हूं, लतिका नहीं. तो, ऐसे ही सारी जाजिम बिछाई जाती है. पहले चादर देखो, फिर वही चादर बिछा दो.

दिल्लगी बन गई दिल की लगी : भाग 4

परवेज अपनी कोशिश में लगे रहे आखिर उन्हें दुबई की एक अच्छी कंपनी में शानदार जौब मिल गई. वह साफिया बेगम को लाने उन के मायके गए. साफिया के भाई उन से बड़ी बदतमीजी से पेश आए. उन्होंने परवेज को साफिया से मिलने भी नहीं दिया और घर से निकाल दिया. भाइयों ने कुछ अरसे तो साफिया बेगम को अच्छे से खूब लाड़प्यार से रखा, फिर उन की आंखें बदलने लगीं.

मांबाप के मरते ही हालात और बुरे हो गए. भाभियां उन से जुबान चलाने लगीं. उन्हें मनहूस कह कर पुकारने लगीं. एक दिन घर में भाभियों का साफिया से झगड़ा हुआ. भाई वहां होते हुए भी तटस्थ रहे. बीवियों ने साफिया को तमाचे भी मारे.

इसे साफिया बरदाश्त नहीं कर सकीं. अपना सामान समेटा और बच्चे को ले कर कराची का रुख कर गईं. फिर हमारे मुहल्ले में एक कमरा किराए पर ले कर रहने लगीं. गुजारे के लिए वह सिलाईकढ़ाई करने लगीं. जल्द ही उन का काम अच्छा चलने लगा.

उन्हें अब अपनी गलती पर खूब पछतावा हो रहा था. वह समझ गई थीं कि बिना पति के औरत की कद्र नहीं रहती. उन्हें यह शिकायत थी कि दुबई जाते वक्त परवेज ने उसे नहीं पूछा. उसे यह पता ही नहीं चला कि परवेज उन्हें लेने आया था. पर गलती उन के भाइयों की थी, जिन्होंने परवेज को उन से मिलने तक नहीं दिया बल्कि बदतमीजी कर उसे घर से निकाल दिया.

दुबई आने के बाद वह फिर से साफिया के मायके गए. वहां पता चला कि भाइयों ने उसे निकाल दिया. तब उन्होंने साफिया को तमाम जगहों पर खोजा. इतना ही नहीं उन्होंने अखबार तक में इश्तहार निकलवाया पर साफिया का कहीं पता नहीं लगा.

परवेज ने थक के तलाश बंद कर दी और जो कुछ दुबई से कमा कर लाए, उस से एक बिजनैस शुरू कर दिया. रातदिन की मेहनत और ईमानदारी से बिजनैस खूब फैल गया. उन के एक अच्छे दोस्त ने उन की बहुत मदद की. उसी की बहन शमा से परवेज ने दूसरी शादी कर ली.

कराची में एक टेक्सटाइल मिल खरीद ली और बीवी और बेटे समेत कराची शिफ्ट हो गए. यहीं एक शानदार कोठी ले कर चैन से रहने लगे. उन की बीवी बहुत अच्छी समझदार व प्यार करने वाली थी. परवेज ने उसे सब कुछ बता दिया था. परवेज को साफिया याद आती तो वह बेचैन हो जाते क्योंकि वह उन की मोहब्बत थीं.

इतने अरसे के बाद साफिया को सामने देख कर वह हैरान हो गए. अब वह खुद पर काबू न रख सके. दूसरे दिन वह साफिया के घर पहुंच गए. साफिया अपने किए पर शर्मिंदा थीं. वह क्या गिला करतीं. उन्हें सब मालूम हो चुका था. परवेज ने कहा, ‘‘पुरानी बातें दोहराने से कोई फायदा नहीं है. मैं ने तुम्हें लाने की, तुम्हें ढूंढने की बड़ी कोशिश की थी, पर सारी कोशिशें नाकाम रहीं. तुम्हारे भाइयों ने मेरे साथ बड़ा बुरा सलूक किया था. मजबूरन मैं ने दूसरी शादी कर ली. क्या अब भी तुम मुझे कसूरवार ठहराओगी. अब चलो हमारे साथ चल कर रहो.’’

‘‘सच, इस में आप की कोई गलती नहीं है. मैं आप के साथ कैसे रह सकती हूं. आप की बीवी एतराज करेगी और फिर मुझे मंसूर से भी पूछना पड़ेगा, वह राजी होता है या नहीं.’’

‘‘कुछ सोचना नहीं है. फराज की मां को कोई एतराज नहीं होगा. मैं ने बात कर ली है उन से. तुम कल मंसूर के साथ तैयार रहना, मैं लेने आऊंगा.’’

शाम को जब मंसूर घर आया तो साफिया ने उसे सब कुछ बता दिया. पहले तो वह आपे से बाहर हो गया, पर जब साफिया ने उसे समझाया कि भूल उसी की थी, परवेज तो बेकसूर है. मां के बहुत मिन्नत करने पर मंसूर साथ जाने को राजी हो गया.

दूसरे दिन सुबह ही परवेज अपनी बीवी व फराज के साथ पहुंच गए. बहुत मोहब्बत से सब मंसूर व साफिया से मिले. उन्हें मिन्नत कर के अपने साथ घर ले गए. उन दोनों के लिए पहले से ही शानदार कमरे तैयार थे. परवेज ने मंसूर से कहा कि वह फौरन अपनी जौब छोड़ दे और फराज के साथ दफ्तर का काम संभाले. मंसूर तैयार न था, पर बाप ने उस के आगे हाथ जोड़ दिए. इतने अरसे के बाद बाप की चाहत मिली तो वह इनकार नहीं कर सका.

अगले हफ्ते मैं फराज से मिलने दफ्तर गई तो देखा कि फराज की कुरसी पर मंसूर बैठा था. फराज एक छोटी टेबल पर था. मुझे देखते ही मंसूर उठ कर चला गया.

फराज ने कहा, ‘‘शीना तुम हमारे लिए बहुत लकी हो, तुम्हारी मंगनी पर ही मुझे मेरी मां और भाई मिला.’’

इस के बाद मुझे फराज ने सारी कहानी सुनाई. मैं ये सब सुन कर भौचक्का रह गई. क्या किस्मत के खेल हैं, जिस कुरसी की वजह से मैं ने फराज पर डोरे डाले थे आज उसी कुरसी पर मंसूर बैठा था, जिस का प्यार मैं ने ठुकरा दिया था. 2 महीने बाद मेरी शादी थी. अब मुझे ये सोच कर डर लग रहा था कि मैं एक ही घर में मंसूर के साथ कैसे रहूंगी. अगर फराज को इस बात की भनक भी लग गई तो गजब हो जाएगा. वह तो मंसूर से बेहद प्यार करता है.

शादी हो कर मैं फराज की आलीशान कोठी में पहुंच गई. अब मेरा मंसूर से रातदिन का सामना था. मैं उसे इग्नोर नहीं कर सकती थी. हालांकि मेरे दिल में कोई चोर न था पर मैं मंसूर के दिल का हाल खूब समझ रही थी. क्योंकि उस के दिल में मेरी मोहब्बत एक नासूर बन कर पल रही थी.

रिसैप्शन पार्टी के दूसरे दिन जब फराज मेहमानों को छोड़ने स्टेशन गए थे तो मंसूर ने मुझे बुलाया. मुझे बैठने को कह कर गंभीर लहजे में कहने लगा,  ‘‘जानता हूं, हम दोनों एक मुश्किल सूरतेहाल से गुजर रहे हैं. मैं ने इस बारे में बहुत सोचा और इस नतीजे पर पहुंचा कि मुझे मंजर से हट जाना चाहिए. अब तुम मेरे भाई की अमानत हो. मैं तुम्हारे बारे में कोई गलत बात नहीं सोचना चाहता.

‘‘पर इस दिल का क्या करूं, जहां आज भी तुम्हारी तसवीर सजी हुई है. इस से पहले कि कभी कोई ऐसी बात हो जाए कि मैं अपनी ही नजरों में गिर जाऊं. मैं 2 दिनों में कतर की तरफ निकल जाऊंगा. वहां मेरा एक दोस्त अच्छी नौकरी बता रहा है.

‘‘मेरे जाने के बाद तुम सुकून से जिंदगी गुजारना. ये मेरी बदनसीबी है कि लंबे समय के बाद बाप का प्यार मिला पर तुम्हारे सुकून की खातिर ये नए रिश्ते ये बेपनाह प्यार ये दौलत ये दफ्तर सब छोड़ना पड़ेगा. मेरी अम्मी और अब्बा नहीं मानेंगे पर मैं मिन्नत कर के उन्हें मना लूंगा. मोहब्बत की खातिर मुझे इतनी कुर्बानी तो देनी पड़ेगी.

‘‘भले ही मेरी जिंदगी बरबाद हो जाए पर मेरी दुआ है कि तुम हमेशा खुश रहो, आबाद रहो. मेरे भाई को खूब खुश रखना. एक इल्तजा है कि अब ऐसा मजाक किसी और बदनसीब से नहीं करना, वरना मेरी तरह वह भी सारी उम्र का रोगी बन जाएगा.

‘‘मैं बरसों के बाद मिलने वाली खुशी को अधूरा छोड़ कर पराए देश चला जाऊंगा. अगर मुझ से कोई गुस्ताखी हुई हो तो दीवाना समझ कर माफ कर देना.’’ इतना कह कर वह खामोश हो गया. कुछ पल तो मैं सुन्न सी बैठी रही फिर उठ कर कमरे से बाहर आ गई. मेरे पास कहने को कुछ न था. मेरी शरारत ने मंसूर की जिंदगी तबाह कर दी. मैं उसे किस मुंह से रोकती. अब सिवाय पछतावे के कुछ हासिल नहीं है. अब मैं इस अहसास के साथ जिंदगी बसर करूंगी कि मेरी वजह से एक मासूम शख्स बनवास लेने पर मजबूर हो गया. काश! मैं ने वो दिल्लगी न की होती.

कायर – भाग 4 : क्या घना को मिल पाया श्यामा का प्यार

ऋषिकेश और घनसाली के रास्ते पर घनसाली से 5 किलोमीटर पहले भिलंगना नदी के तट पर पिलखी के पिलखेश्वर महादेव के मंदिर में बैसाखी के दिन एक विशाल मेला लगता है. घना इस मेले में श्यामा से मिलने के लिए आया था. वे दोनों इधरउधर की बातें करते हुए मेले से दूर सीढ़ीनुमा खेतों के किनारे जंगल में एक बुरांस के पेड़ के नीचे बैठ गए.

जंगल में सन्नाटा था. दूर नीचे सड़क पर कभीकभार किसी गाड़ी के गूंजने की आवाज आ जाती थी. चीड़ के पेड़ों से हवा छन कर सनसन की आवाज करती हुई बह रही थी और घाटी में बह रही भिलंगना नदी की आवाज से अपनी आवाज मिला रही थी.

धूप अभी भी सुहावनी थी, पर माहौल में बेखुदी का सा आलम था. घना बहुत ही उदास और खोएखोए मन से श्यामा को देख रहा था.

‘‘तुम कैसी हो श्यामा?’’ घना ने बात शुरू की, लेकिन उस के चेहरे पर निराशा झलक रही थी.

आज घना के चेहरे पर श्यामा से मिलने की कोई चमक नजर नहीं आ रही थी. वह पहले की तरह चंचल नहीं लग रहा था.

‘‘ठीक हूं, आप सुनाओ. जब से आप की नौकरी लगी है, आप तो हमारे लिए दुर्लभ जीव हो गए हैं,’’ श्यामा ने शिकायत भरे लहजे में कहा था, पर वह आज बहुत खुश थी, क्योंकि घना को देखते ही वह मानो सारी चिंताओं से छुटकारा पा गई थी.

‘‘अच्छा हुआ, आप ठीक समय पर आ गए. आप को पता है कि पिताजी मेरा रिश्ता एक जगह पक्का कर रहे हैं. मुझे और लड़के को मिलाने भर की देर है. मैं कई दिनों से टाल रही हूं. मैं आप का ही इंतजार कर रही थी. अब आगे का प्लान आज ही तैयार करना है,’’ कह कर उस ने घना की ओर देखा. घना दूर कहीं अपने में ही खोया हुआ था.

‘‘सुन रहे हो… कहां खो गए हो?’’

‘‘काश, खो पाता,’’ घना ने बहुत ही दुखी मन से कहा. ‘‘यह भावुक होने का समय नहीं है. सामने हमारी मंजिल है, बस आगे बढ़ने की देरी है. अब हमारे सपने सच होने वाले हैं,’’ श्यामा ने चुलबुले मन से कहा.

‘‘काश, सच हो पाते.’’

‘‘अब आप ऐन मौके पर ऐसा क्यों बोले जा रहे हैं? आप अब अपने पैरों पर खड़े हो और हम ने जो ख्वाब देखे थे, वे सच होने के लिए हमें देख रहे हैं,’’ श्यामा ने हैरान हो कर कहा.

‘‘अपने पैरों पर तो मैं जरूर खड़ा हूं, पर… पर जिन्होंने इन पैरों पर खड़ा होने के लायक बनाया है, मैं उन का क्या करूं?’’

‘‘क्या मतलब है आप का?’’

‘‘मेरे घर वालों ने भी मेरे लिए एक रिश्ता पक्का कर दिया है.’’

‘‘आप ने मना नहीं किया?’’ श्यामा ने घबराहट में पूछा.

‘‘मैं ने कहा था कि मैं ने अपने लिए एक दलित लड़की पसंद कर ली है और मैं उसी से शादी करूंगा. पर यह सुनते ही घर में भूचाल आ गया था, जैसे घर में कोई मर गया हो. वे गांवबिरादरी की बात करने लगे. मां अपने दूध की कसम देने लगीं. हम कहीं के नहीं रहेंगे और दहाड़ें मारमार कर रोने लगीं.’’

‘‘लेकिन यह सब तो होना ही था. इस की तो हमें पहले से ही जानकारी थी. हम इस ऊंचनीच की दुनिया से दूर अपना घर बसाएंगे. हम ने यही ख्वाब तो देखे थे. और अब तो आप अपने पैरों पर खड़े भी हो गए हो. मुझे भी कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जाएगी.’’

‘‘श्यामा, आज तो हम चले जाएंगे, पर अपनी जड़ों से कट कर हम कब तक अलग रह पाएंगे. कभी न कभी तो हमें यहां वापस आना ही पड़ेगा, और तब… क्या ये लोग हमें भूल जाएंगे? क्या हमें चैन से जीने देंगे?

‘‘मैं भी चाहता था कि हमारे सपने सच हों, पर नदी में रह कर मगर से बैर भी तो नहीं कर सकते. अब भलाई इसी में है कि हम एकदूसरे को भूल जाएं और…’’

‘‘और क्या? आप को यह सब पहले नहीं सूझा था. घना, आप उस रात जिस बहादुरी से मेरे घर प्यार की भीख मांगने आए थे, मैं आप की उस बहादुरी की कायल थी. मैं मरमिटी थी आप पर उस दिन. उस दिन मुझे लगा था कि आप जरूर समाज की इन सड़ीगली रीतियों के खिलाफ लड़ोगे. मुझे क्या पता था कि वह आप की बहादुरी नहीं, बल्कि पागलपन था.

‘‘अच्छा हुआ कि समय से पहले ही आप की औकात का पता चल गया. कितना भरोसा किया था मैं ने आप पर. मैं आप को सामाजिक बुराइयों से लड़ने वाला एक शेर समझती थी, पर आप तो कायर हो. आप ने मेरे साथ विश्वासघात किया है.’’

घना अपराधी की तरह जमीन पर नजरें गड़ाए सुनता रहा. श्यामा के लिए अब वहां पर ठहरना मुश्किल हो गया था. उस ने नफरत से घना की ओर देखा और तेज कदमों से वहां से चली गई.

श्यामा खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही थी. वह मेले के बजाय सीधे अपने घर चली गई. उस ने दरवाजा बंद किया. वह आज खूब रोना चाहती थी.

शाम को श्यामा की मां ने उसे रोटी खाने के लिए उठाया, ‘‘श्यामा उठ, रोटी खा ले.’’

‘‘नहीं मां, मन नहीं कर रहा है.’’

‘‘अरे बेटी, एक रोटी तो खा ले. भूखे पेट सोना अच्छा नहीं होता. कल लड़के वाले भी तुझे देखने आ रहे हैं,’’ मां ने उस के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.

श्यामा न चाहते हुए भी उठी. उस ने मां का दिल रखने के लिए आधी रोटी खाई और फिर बिस्तर पर पड़ गई. नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. घना के शब्दों से उसे इतनी पीड़ा हो रही थी, मानो उस के कानों में घना के शब्द नहीं, बल्कि गरमगरम सीसा पिघला कर डाला गया हो. उस का मन घना के लिए नफरत से  भर गया.

सुबह जब श्यामा की नींद खुली, तो धूप खिड़की के अंदर आ चुकी थी. उस ने एक अंगड़ाई ली और झटके के साथ पिछली बातों को भुला कर अपनी जिंदगी से दूर फेंकते हुए नए दिन का स्वागत करने के लिए अपने कमरे से बाहर निकल गई.

लड़के वाले दोपहर से पहले ही आ गए थे. उन का स्वागतसत्कार होने लगा. श्यामा मिठाई और चाय ले कर आई. उस ने सभी मेहमानों का स्वागत किया और मां के इशारे से वहीं पर बैठ गई.

श्यामा देखने में खूबसूरत तो थी ही, कदकाठी भी ठीक थी और सब से

बड़ी बात तो यह कि वह पढ़ीलिखी भी खूब थी.

बाद में लड़के के पिता ने कहा, ‘‘भाई, नया जमाना है. पढ़ेलिखे बच्चे हैं. उन्हें भी एकदूसरे के बारे में जानने का हक है.’’

वे सब बाहर चले गए. ‘‘मेरा नाम माधव है. सुना है, आप ने एमए किया है?’’ लड़के ने सन्नाटा तोड़ा.

‘‘जी हां, और मेरा नाम श्यामा है,’’ श्यामा ने सकुचाते हुए जवाब दिया.

‘‘एमए किस विषय में किया है

आप ने?’’

‘‘जी, समाजशास्त्र में.’’

‘‘मैं ने एमफार्मा किया है और मैं एक दवा कंपनी में सर्विस करता हूं,’’ कुछ देर रुक कर और श्यामा की आंखों में झांकते हुए वह हलके से मुसकराते हुए फिर बोला, ‘‘तो क्या विचार है? मेरा मतलब है कि आप मुझे अपने काबिल समझती हैं या नहीं?’’

‘‘जी, जैसा मेरे मांबाप उचित समझेंगे.’’

‘‘जी नहीं, मैं आप की बात से सहमत नहीं हूं. आप के मांबाप को जब ठीक लगा, तभी तो उन्होंने हमें घर पर बुलाया है, आप की पसंदनापसंद जानने के लिए.’’

‘‘जी, पसंदनापसंद…? इस गांव में यह पहली बार हो रहा है कि लड़के और लड़की को उन की पसंदनापसंद जानने के लिए अकेला छोड़ दिया गया है, वरना आज तक तो लड़का ही लड़की देख कर चला जाता था और अपनी पसंद बता देता था.’’

‘‘कुछ बातें समाज में तेजी से बदल रही हैं. हां, तो बताइए कि आप ने मुझे पसंद किया या नहीं?’’

‘‘जी, मुझे तो आप पसंद हैं…’’ श्यामा ने शरमाते हुए कहा था, ‘‘पर आगे जैसा मेरे पिताजी कहेंगे.’’

‘‘हां, यह हुई न बात. अब ठीक है.’’

उस दिन बात पक्की हो गई और फिर चट मंगनी और पट ब्याह भी हो गया. श्यामा सबकुछ भूल कर अपनी नई जिंदगी में मसरूफ हो गई. इस तरह एक साल कब बीता, पता ही नहीं चला.

श्यामा एक सामाजिक संस्था से जुड़ गई थी. इस बीच माधव को 2 महीने की ट्रेनिंग के लिए विदेश जाना पड़ा. श्यामा बहुत दिनों से मायके नहीं गई थी, इसलिए वह मायके जाने की तैयारी करने लगी.

श्यामा अपने गांव आ गई. इस बीच उसे शिबी से पता चला कि घना पागल हो गया है. दिल्ली में उस के मामा ने उस की शादी किसी अमीर घर की लड़की से करवा दी थी.

बाद में पता चला कि उस की पत्नी का कालेज के दिनों में किसी ईसाई लड़के से चक्कर था. लड़की के घर वालों ने जबरदस्ती उस की शादी घना से करवा दी थी, लेकिन कुछ ही दिन बाद उन में अनबन शुरू हो गई और एक दिन वह घर से गहनेपैसे ले कर उसी लड़के के साथ भाग गई.

घना यह सदमा सहन न कर सका और दिमागी संतुलन खो बैठा. उस के पिता उसे गांव ले आए. गांव में उस को ठीक करने के लिए कई देवीदेवताओं की पूजा होने लगी.

पागलपन के दौरे में घना लोगों को कभी जाति की खोखली बातों पर और कभी अंधविश्वास पर भाषण देता है, इसलिए लोग समझते हैं कि उस पर भूत का साया है. घना के बारे में सुन कर श्यामा को बहुत दुख हुआ, पर वह कर भी क्या सकती थी?

श्यामा को मायके में 2 महीने से भी ज्यादा समय हो गया था. उस का पति उसे लेने के लिए आ गया था. 1-2 दिन रहने के बाद जब वे लोग जा रहे थे, तो रास्ते में कुछ लोग घना को पकड़ कर अस्पताल ले जा रहे थे. शायद पागलखाने…

अचानक घना की नजर श्यामा पर पड़ी. उस ने गौर से श्यामा को देखा, वह श्यामा को पहचानने की कोशिश कर रह था. उस के साथ के लोग घना को खींच कर ले जा रहे थे. उस ने श्यामा की तरफ हाथ जोड़े, मानो वह श्यामा से माफी मांग रहा हो.

श्यामा फफक कर रो पड़ी. माधव ने उसे रोने दिया. वह जानता था कि श्यामा बहुत ही कोमल मन की है. वह किसी का बुरा नहीं देख सकती.

उन की बस का समय हो रहा था. थोड़ी देर बाद वह उठी और उस ने अपने पति से चलने को कहा.

दिल्ली पहुंच कर एक दिन माधव ने उस से घना के बारे में पूछा. श्यामा ने सच छिपाते हुए बस उस के शादी वाले किस्से को बता दिया.

माधव ने एक लंबी सांस ले कर कहा, ‘‘बेचारे के साथ बहुत बुरा हुआ.’’

‘‘हां, एक कायर के साथ इस से ज्यादा और क्या हो सकता था?’’ श्यामा ने बहुत ही लापरवाही से कहा.

माधव को श्यामा का यह जवाब अच्छा नहीं लगा.

‘‘हां, कायर नहीं तो और क्या? जो समस्याओं का सामना मजबूती से न कर सके, वह कायर नहीं तो और क्या है? कभी कालेज के दिनों में बड़ीबड़ी बातें करता था, जब समस्याओं का सामना करने का समय आया, तो हिम्मत ही जवाब दे गई.’’

‘‘परंतु अगर कभी तुम मुझे छोड़ कर चली गई, तो मैं भी पागल हो जाऊंगा,’’ माधव ने मजाक किया.

‘‘मुझ पर इतना ही विश्वास करते हो,’’ फिर एक पल के लिए शरारत भरी नजरों से माधव की ओर देख कर उस ने घुड़की दी, ‘‘कायर कहीं के.’’

इतना कह कर उस ने माधव की छाती पर सिर टिका दिया. माधव ने उसे अपनी बांहों में कस लिया.

मेरा संसार – अपने रिश्ते में फंसते हुए व्यक्ति की कहानी

Story in hindi

इंग्लिश रोज- भाग 3 : क्या सच्चा था विधि के लिए जौन का प्यार

गरमी का मौसम था. चारों ओर सतरंगी फूल लहलहा रहे थे. दोपहर के खाने के बाद दोनों कुरसियां डाल कर गार्डन में धूप सेंकने लगे. बाहर बच्चे खेल रहे थे. बच्चों को देखते विधि की ममता उमड़ने लगी. जौन की पैनी नजरों से यह बात छिपी नहीं. जौन ने पूछ ही लिया, ‘‘विधि, हमारा बच्चा चाहिए…? हो सकता है. मैं ने पता कर लिया है. पूरे 9 महीने डाक्टर की निगरानी में रह कर. मैं तैयार हूं.’’

‘‘नहींनहीं, हमारे हैं तो सही, वो 3, और उन के बच्चे. मैं ने तो जीवन के सभी अनुभवों को भोगा है. मां बन कर भी, अब नानीदादी का सुख भोग रही हूं,’’ विधि ने हंसतेहंसते कहा. ‘‘मैं तो समझा था कि तुम्हें मेरी निशानी चाहिए?’’ जौन ने विधि को छेड़ते हुए कहा, ‘‘ठीक है, अगर बच्चा नहीं तो एक सुझाव देता हूं. बच्चों से कहेंगे मेरे नाम का एक (लाल गुलाब) इंग्लिश रोज और तुम्हारे नाम का (पीला गुलाब) इंडियन समर हमारे गार्डन में साथसाथ लगा दें. फिर हम दोनों सदा एकदूसरे को प्यार से देखते रहेंगे.’’ इतना कह कर जौन ने प्यार से उस के गाल पर चुंबन दे दिया.

विधि भी होंठों पर मुसकान, आंखों में मोती जैसे खुशी के आंसू, और प्यार की पूरी कशिश लिए जौन के आगोश में आ गई. जौन विधि की छोटी से छोटी जरूरतों का ध्यान रखता. धीरेधीरे विधि के पूरे जीवन को उस ने अपने प्यार के आंचल से ढक लिया. सामाजिक बैठकों में उसे अदब और शिष्टाचार से संबोधित करता. उसे जीजी करते उस की जबान न थकती. कुछ ही वर्षों में जौन ने उसे आधी दुनिया की सैर करा दी थी. अब विधि के जीवन में सुख ही सुख थे. हंसीखुशी 10 साल बीत गए. इधर, कई महीनों से जौन सुस्त था. विधि को भीतर ही भीतर चिंता होने लगी, सोचने लगी, ‘कहां गई इस की चंचलता, चपलता, यह कभी टिक कर न बैठने वाला, यहांवहां चुपचाप क्यों बैठा रहता है? डाक्टर के पास जाने को कहो तो टालते हुए कहता है, ‘‘मेरा शरीर है, मैं जानता हूं क्या करना है.’’ भीतर से वह खुद भी चिंतित था. एक दिन बिना बताए ही वह डाक्टर के पास गया. कई टैस्ट हुए. डाक्टर ने जो बताया, उसे उस का मन मानने को तैयार नहीं था. वह जीना चाहता था. उस ने डाक्टर से कहा, ‘‘वह नहीं चाहता कि उस की यह बीमारी उस के और उस की पत्नी की खुशी में आड़े आए. समय कम है, मैं अब अपनी पत्नी के लिए वह सबकुछ करना चाहता हूं, जो अभी तक नहीं कर पाया. मैं नहीं चाहता मेरे परिवार को मेरी बीमारी का पता चले. समय आने पर मैं खुद ही उन्हें बता दूंगा.’’

अचानक एक दिन जौन वर्ल्ड क्रूज के टिकट विधि के हाथ में थमाते बोला, ‘‘यह लो तुम्हारा शादी की 10वीं वर्षगांठ का तोहफा.’’ उस की जीहुजूरी ही खत्म नहीं होती थी. विधि का जीवन उस ने उत्सव सा बना दिया था. वर्ल्ड क्रूज से लौटने के बाद दोनों ने शादी की 10वीं वर्षगांठ बड़ी धूमधाम से मनाई. घर की रजिस्ट्री के कागज और एफडीज उस ने विधि के नाम करवा कर उसे तोहफे में दे दिए. उस रात वह बहुत बेचैन था. उसे बारबार उलटी हो रही थी और चक्कर आते रहे. जल्दी से उसे अस्पताल ले जाया गया. वहां उसे भरती कर लिया गया. जौन की दशा दिनबदिन बिगड़ती गई. डाक्टर ने बताया, ‘‘उस का कैंसर फैल चुका है. कुछ ही समय की बात है.’’

‘‘कैंसर…?’’ कैंसर शब्द सुन कर सभी निशब्द थे. ‘‘तुम्हारे डैड, जाने से पहले, तुम्हारी मां को उम्रभर की खुशियां देना चाहते थे. तुम्हें बताने के लिए मना किया था,’’ डाक्टर ने बताया. बच्चे तो घर चले गए. विधि नाराज सी बैठी रही. जौन ने उस का हाथ पकड़ कर बड़े प्यार से समझाया, ‘‘जो समय मेरे पास रह गया था, मैं उसे बरबाद नहीं करना चाहता था, भोगना चाहता था तुम्हारे साथ. तुम्हारे आने से पहले मैं जीवन बिता रहा था. तुम ने जीना सिखा दिया है. अब मैं जिंदगी से रिश्ता चैन से तोड़ सकता हूं. जाना तो एक दिन सभी को है.’’ एक वर्ष तक इलाज चलता रहा. कैंसर इतना फैल चुका था कि अब कोई कुछ नहीं कर सकता था. अपनी शादी की 11वीं वर्षगांठ से पहले ही जौन चल बसा. अंतिम संस्कार के बाद उस के बेटे ने जौन की इच्छानुसार उस की राख को गार्डन में बिखरा दिया. एक इंग्लिश रोज और एक इंडियन समर (पीला गुलाब) साथसाथ लगा दिए. उन्हें देखते ही विधि को जौन की बात याद आई, ‘कम से कम तुम्हें हर वक्त देखता तो रहूंगा?’ इस सदमे को सहना कठिन था. विधि को लगा मानो किसी ने उस के शरीर के 2 टुकड़े कर दिए हों. एक बार वह फिर अकेली हो गई. एक दिन उस के अंतकरण से आवाज आई, ‘उठ विधि, संभाल खुद को, तेरे पास जौन का प्यार है, स्मृतियां हैं. वह तुझे थोड़े समय में जहानभर की खुशियां दे गया है.’ धीरेधीरे वह संभलने लगी. जौन के बच्चों के सहयोग और प्यार ने उसे फिर खड़ा कर दिया. कालेज में उसे नौकरी भी मिल गई. बाकी समय में वह गार्डन की देखभाल करती. इंग्लिश रोज और इंडियन समर की कटाईछंटाई करने की उस की हिम्मत न पड़ती. उस के लिए माली को बुला लेती. गार्डन जौन की निशानी था. एक दिन भी ऐसा न जाता, विधि अपने गार्डन को न निहारती, पौधों को न सहलाती. अकसर उन से बातें करती. बर्फ पड़े, कोहरा पड़े या फिर कड़कती सर्दी, वह अपने फ्रंट डोर से जौन के लगाए पौधों को निहारती रहती. उदासी में इंग्लिश रोज से शिकवेशिकायतें भी करती, ‘खुद तो अपने लगाए परिवार में लहलहा रहे हो और मैं? नहीं, नहीं, मैं शिकायत नहीं कर रही. मुझे याद है आप ने ही कहा था, ‘यह मेरा परिवार है डार्लिंग. मुझे इन से अलग मत करना.’

उस दिन सोचतेसोचते अंधेरा सा होने लगा. उस ने घड़ी देखी, अभी शाम के 4 ही बजे थे. मरियल सी धूप भी चोरीचोरी दीवारों से खिसकती जा रही थी. वह जानती थी यह गरमी के जाने और पतझड़ के आने का संदेशा था. वह आंखें मूंद कर घास पर बिछे रंगबिरंगों पत्तों की कुरमुराहट का आनंद ले रही थी. अचानक तेज हवा के झरोखे से एक सूखा पत्ता उलटतापलटता उस के आंचल में आ अटका. पलभर को उसे लगा, कोई उसे छू कर कह रहा हो… ‘डार्लिंग, उदास क्यों होती हो, मैं यही हूं तुम्हारे चारों ओर, देखो वहीं हूं, जहां फूल खिलते हैं…क्यों खिलते हैं? यह मैं नहीं जानता. बस, इतना जरूर जानता हूं, फूल खिलता है, झड़ जाता है. क्यों? यह कोई नहीं जानता. बस, इतना जानता हूं इंग्लिश रोज जिस के लिए खिलता है उसी के लिए मर जाता है. खिले फूल की सार्थकता और मरे फूल की व्यथा एक को ही अर्पित है.’

उस दिन वह झड़ते फूलों को तब तक निहारती रही जब तक अंधेरे के कारण उसे दिखाई देना न बंद हो गया. हवा के झोंके से उसे लगा, मानो जौन पल्लू पकड़ कर कह रहा हो, ‘आई लव यू माई इंडियन समर.’ ‘‘मी टू, माई इंग्लिश रोज. तुम और तुम्हारा शरारतीपन अभी तक गया नहीं.’’ उस ने मुसकरा कर कहा.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें