चिड़िया चुग गईं खेत: शादीशुदा मनोज के साथ थाईलैंड में क्या हुआ था – भाग 1

कंपनी मीटिंग के लिए थाईलैंड ले जाने वाली कंपनी की बात सुनते ही मनोज और उस के दोस्तों की बाछें खिल गईं. एक तो कंपनी के खर्चे पर विदेश जाने का मौका और वह भी थाईलैंड जैसी जगह, जहां पत्नी और बच्चों का झंझट नहीं. यानी सोने पर सुहागा. मनोज और उस के दोस्त सुरेश और भावेश तैयारियों में लग गए. वे दिन गिनने लगे. जाने के जोश में वे अतिरिक्त उत्साह से काम करने लगे. जाने का दिन भी आ गया. अहमदाबाद से तीनों मुंबई पहुंचे. कंपनी के देशभर के डीलर मुंबई में इकट्ठा होने वाले थे फिर वहां से सब इकट्ठा बैंकौक जाने वाले थे.

रात की फ्लाइट से सब बैंकौक पहुंचे और सुबह बस से पटाया पहुंचे. होटल पहुंच कर सब अपनेअपने कमरों में जा कर आराम करने लगे. मनोज को हफ्तेभर से बहुत मेहनत करनी पड़ रही थी. वह थकान से निढाल हो कर पलंग पर लेट गया. लेटते ही उस को झपकी आ गई. आधे घंटे बाद ही रूम की बेल के बजने से उस की नींद खुल गई. उस ने झल्लाते हुए नींद में ही दरवाजा खोला.

भावेश और सुरेश तेजी से कमरे में आए और चहकते हुए बोले, ‘‘चल यार, थाई मसाज करवा कर आते हैं.’’

‘‘शामवाम को चलेंगे यार, अभी तो थोड़ा सोने दो, बहुत थक गया हूं,’’ मनोज ने पलंग पर लेटते हुए कहा.

‘‘अरे, शाम को तो ओपन शो देखने जाएंगे. मसाज का टाइम तो अभी ही है. फिर आने के बाद नाश्ता करेंगे,’’ सुरेश ने कहा.

‘‘अबे, तू यहां सोने आया है क्या. और थाई मसाज करवाने से तो सारी थकान उतर जाएगी,’’ भावेश ने सुरेश को देख कर आंख मारी.

‘‘और क्या, होटल के सामने वाली सड़क के उस पार ही तो मसाज पार्लर है,’’ सुरेश ने कहा.

‘‘तुम लोग जरा देर भी सोए नहीं क्या, मसाज पार्लर भी ढूंढ़ आए. गजब हो यारो तुम भी,’’ मनोज आश्चर्य से उठ बैठा.

सोने के लिए तो उम्र पड़ी है. यहां चार दिन तो ऐश कर लें. चलचल उठ जा और चिंता मत कर, हम भाभी को कुछ नहीं बताएंगे,’’ भावेश ने मनोज से चुटकी ली.

मनोज झेंप गया, ‘‘चलो, चलते हैं,’’ कह कर उठ गया.

तीनों होटल से बाहर निकले और रोड क्रौस कर ली. सामने ही रोज मसाज पार्लर था. तीनों पार्लर में चले गए. रिसैप्शन पर भड़कीले और कम कपड़ों में एक थाई लड़की खड़ी थी. उस ने मुसकरा कर तीनों का स्वागत किया. उस ने गहरे गले की शौर्ट ड्रैस पहन रखी थी. उस के आधे उभार ड्रैस से बाहर दिखाई दे रहे थे.

उसे देखते ही सुरेश और भावेश की बाछें खिल गईं. मीठीमीठी बातें कर के उस लड़की ने तीनों का मन जीत लिया. थाई मसाज के उस लड़की ने तीनों से कुल 2,400 भाट रखवा लिए. भाट थाइलैंड की करैंसी है. सुरेश, भावेश ने तो खुशी से पैसे दे दिए लेकिन मनोज को 800 भाट देते हुए थोड़ा बुरा लगा. इतना पैसा सिर्फ मसाज करवाने के लिए. इस से तो दोनों बच्चों के लिए या पत्नी मीरा के लिए अच्छी ड्रैसेज आ जातीं. थोड़ा भारी मन लिए हुए वह मसाज केबिन की ओर बढ़ा. उस के दोनों दोस्त पहले ही खुशी से फड़कते हुए केबिनों में जा चुके थे. मनोज ने भी एक केबिन का दरवाजा खोला और धड़कते हुए दिल से अंदर दाखिल हुआ.

केबिन में बड़ा रहस्यमय और सपनीला सा माहौल था. पीली नारंगी मद्धिम रोशनी. एकतरफ लाल रंग की सुगंधित मोमबत्तियां जल रही थीं. खुशबू और रोशनी का बड़ा दिलकश कौंबिनेशन था. मसाज बैड के पास एक 25-26 साल की खूबसूरत युवती खड़ी थी. वह चटक लाल रंग की शौर्ट बिना बांहों की ड्रैस पहने खड़ी थी. लाल रंग में उस का गोरा रंग गजब का खिला हुआ दिख रहा था. टाइट ड्रैस में से उस के सीने के उभार स्पष्ट दिख रहे थे. मनोज क्षणभर को अपनी सुधबुध खो कर लोलुप दृष्टि से उसे देखता रह गया. लड़की उस की हालत देख कर मुसकरा दी तो मनोज झेंप गया.

मसाज वाली लड़की ने इशारे से उसे कपड़े उतार कर बैड पर लेटने को कहा. मनोज उस के जादू में खोया या यंत्रवत कपड़े एक ओर रख कर बैड पर लेट गया. बैड की चादर मुलायम और मखमली थी. इतनी नर्म चादर मनोज ने अपने जीवन में पहली बार देखी थी. कमरे में मनोज को ऐसा लग रहा था कि वह किसी तिलिस्मी दुनिया में आ गया है. वह एक अनोखी रूमानी दुनिया में पहुंच गया. तभी लड़की ने एक सुगंधित तेल उस की पीठ पर लगा कर मसाज करना शुरू कर दिया.

लड़की के मादक स्पर्श से वह मदमस्त हो कर एक मादक खुमारी में खो गया. उस पर एक हलका सा नशा छाता जा रहा था. बंद कमरे में एक जवान लड़की के साथ एक रोमांटिक माहौल में मसाज करवाने का यह उस का पहला अनुभव था. 800 भाट खर्च होने का अफसोस जाता रहा. मसाज करीब 1 घंटे तक चला. थोड़ा नशा हलका होने पर जानपहचान बढ़ाने के मकसद से मनोज ने उस लड़की से बातचीत करनी शुरू कर दी. वह लड़की थोड़ीबहुत अंगरेजी बोल पा रही थी. मनोज ने उस से उस का नाम पूछा तो उस ने जूली बताया. मनोज ने उस की शिक्षा और घरपरिवार के बारे में बात की. वह 25 वर्ष की गे्रजुएट लड़की थी. उस का घर पटाया से दूर एक गांव में था. मातापिता बूढ़े थे. वह घर चलाने के लिए पटाया में यह काम कर रही थी.

न जाने उस के चेहरे और स्वर में ऐसी क्या पीड़ा थी, एक दर्द सा झलक रहा था कि मनोज का दिल पिघल गया. यों भी, वह कच्चे मन का भावुक इंसान था.

खुल गई आंखें : रवि के सामने आई कैसी हकीकत- भाग 1

दफ्तर से अपने बड़े सरकारी बंगले पर जाते हुए उस दिन अचानक एक ट्रक ने रवि की कार को जोरदार टक्कर मार दी थी. कार का अगला हिस्सा बुरी तरह से टूटफूट गया था.

खून से लथपथ रवि कार के अंदर ही फंसा रह गया था. वह काफी समय तक बेहोशी की हालत में कार के अंदर ही रहा, पर उस की जान बचाने वाला कोई भी नहीं था.

हां, उस के आसपास तमाशबीनों की भीड़ जरूर लग गई थी. सभी एकदूसरे का मुंह ताक रहे थे, पर किसी में उसे अस्पताल ले जाने या पुलिस को बुलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी.

भला हो रवि के दफ्तर के चपरासी रामदीन का, जो भीड़ को देख कर उसे चीरता हुआ रवि के पास तक पहुंच गया था. बाद में उसी ने पास के एसटीडी बूथ से 100 नंबर पर फोन कर पुलिस को बुला लिया था.

जब तक पुलिस रवि को ले कर पास के नर्सिंगहोम में पहुंची तब तक उस के शरीर से काफी खून बह चुका था. रामदीन काफी समय तक अस्पताल में ही रहा था. उस ने फोन कर के दफ्तर से सुपरिंटैंडैंट राकेश को भी बुला लिया था जो वहीं पास में रहते थे.

रवि के एक रिश्तेदार भी सूचना पा कर अस्पताल पहुंच गए थे. गांव दूर होने व बूढ़े मांबाप की हालत को ध्यान में रखते हुए किसी ने उस के घर सूचना भेजना उचित नहीं समझा था. वैसे भी उस के गांव में संचार का कोई खास साधन नहीं था. इमर्जैंसी में तार भेजने के अलावा और कोई चारा नहीं होता था.

रवि की पत्नी गुंजा अपने सासससुर व देवर रघु के साथ गांव में ही रहती थी. वह 2 साल पहले ही गौना करा कर अपनी ससुराल आई थी. रवि के साथ उस की शादी बचपन में तभी हो गई थी, जब वे दोनों 10 साल की उम्र भी पार नहीं कर पाए थे.

गांव में रहने के चलते गुंजा की पढ़ाई 8वीं जमात के बाद ही छूट गई थी पर रवि 5वीं जमात पास कर के अपने चाचा के पास शहर में ही पढ़ने आ गया था. उस ने अच्छीखासी पढ़ाई कर ली थी. शहर में पढ़ाई करने के चलते उस का मन चंचल हो गया था. वैसे भी वह गुंजा से हर मामले में बेहतर था.

शादी के समय तो रवि को कोई समझ नहीं थी, पर जब गौने के बाद विदा हो कर गुंजा उस के घर आई थी और पहली बार जवान और भरपूर नजरों से उस ने उसे देखा था तभी से उस का मन उस से उचट गया था.

गुंजा कामकाज में भी उतनी माहिर नहीं थी जितनी रवि ने अपनी पत्नी से उम्मीद की थी. यहां तक कि सुहागरात के दिन भी वह गुंजा से दूर ही रहा था.

गुंजा गांव की पलीबढ़ी लड़की थी. शक्लसूरत और पढ़ाईलिखाई में कम होने के बावजूद मांबाप से उसे अच्छे संस्कार मिले थे. उस ने रवि की अनदेखी के बावजूद उस के बूढ़े मांबाप और रवि के छोटे भाई रघु का साथ कभी नहीं छोड़ा.

मांबाप के लाख कहने के बावजूद रवि जब उसे अपने साथ शहर ले जाने को राजी नहीं हुआ तब भी उस ने उस से कोई खास जिद नहीं की, न ही अकेले शहर जाने का उस ने कोई विरोध किया.

शहर में आ कर रवि अपने दफ्तर और रोजमर्रा के कामों में ऐसा बिजी हुआ कि गांव जाना ही भूल गया. उसे अपने मांबाप से भी कुछ खास लगाव नहीं रह गया था क्योंकि वह अपनी बेढंगी शादी के लिए काफी हद तक उन्हीं को कुसूरवार मानता था.

तनख्वाह मिलने पर घर पर पैसा भेजने के अलावा रवि कभीकभार चिट्ठी लिख कर मांबाप व भाई का हालचाल जरूर पूछ लेता था, पर इस से ज्यादा वह अपने घर वालों के लिए कुछ भी नहीं कर पाता था.

3-4 दिन आईसीयू में रहने के बाद अब रवि को प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर दिया था. दफ्तर के अनेक साथी तन, मन और धन से उस की सेवा में लगे हुए थे. बड़े साहब भी लगातार उस की सेहत पर नजर रखे हुए थे.

नर्सिंगहोम में जहां सीनियर सर्जन डाक्टर अशोक लाल उस के इलाज पर ध्यान दे रहे थे, वहीं वह वहां की सब से काबिल नर्स सुधा चौहान की चौबीसों घंटे की निगरानी में था.

सुधा चौहान जितना नर्सिंगहोम के कामों में माहिर थी, उतना ही सरल उस का स्वभाव भी था. शक्लसूरत से भी वह किसी फिल्मी नर्स से कम नहीं थी. उस की रातदिन की सेवा और बेहतर इलाज के चलते रवि को जल्दी ही होश आ गया था.

उस समय सुधा ही उस के पास थी. उसे बेचैन देख कर सुधा ने सहारा दिया और उस के सिरहाने तकिया रख दिया. अगले ही पल नर्स सुधा ने शीशी से एक चम्मच दवा निकाल कर आहिस्ता से उस के मुंह में डाल दी

रवि कुछ कहने के लिए मुंह खोलना चाहता था, पर पूरे चेहरे पर पट्टी बंधी होने के चलते वह कुछ भी कह पाने में नाकाम था. सुधा ने हलकी मुसकान के साथ उसे इशारेइशारे में चुप रहने को कहा.

सुधा की निजी जिंदगी भी बहुत खुशहाल नहीं थी. उस का पति मनीष इस दुनिया में नहीं था. उस की रिया नाम की 5 साल की एक बेटी थी जो उस के साथ ही रहती थी.

बेरुखी : पति को क्यों दिया ऐश्वर्या ने धोखा – भाग 1

नरेश की लाश 2 दिनों बाद एक कुएं से बरामद हुई थी. दुर्गंध फैली थी, तब लोगों को पता चला था कि कुएं में लाश पड़ी है. उस के बाद पुलिस को सूचना दी गई थी. नरेश की पत्नी ऐश्वर्या ने उस की गुमशुदगी दर्ज करा रखी थी. नरेश शहर का जानामाना व्यवसायी था. पिता की मौत के बाद सारा कारोबार वही संभाल रहा था, जिस की वजह से वह काफी व्यस्त रहता था. वह सुबह घर से निकलता था तो रात 10 बजे से पहले लौट नहीं पाता था.

नरेश की पत्नी ऐश्वर्या को परिवार वालों ने स्वीकार नहीं किया था, इसलिए वह उसे ले कर शहर के सब से महंगे इलाके में फ्लैट ले कर अलग रह रहा था. ऐश्वर्या बेहद खूबसूरत थी. शादी के अभी एक साल ही बीते थे कि यह हादसा हो गया था. लाश बरामद होने के बाद पुलिस ऐश्वर्या से पूछताछ करने पहुंची तो पहला सवाल यही किया, ‘‘आप को किसी पर शक है?’’

‘‘नहीं.’’ सुबकते हुए ऐश्वर्या ने कहा.

‘‘याद कीजिए, आप के पति का कभी किसी से लेनदेन को ले कर विवाद तो नहीं हुआ था, जिस का उन्होंने आप से जिक्र किया हो?’’

‘‘वह व्यवसाय की बातें घर पर बिलकुल नहीं करते थे.’’

पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में ऐश्वर्या ने जो बताया था, उस के अनुसार, नरेश का बनारसी साडि़यों का काफी बड़ा कारोबार था. काम की अधिकता की वजह से उन का लोगों से मिलनाजुलना कम ही हो पाता था. क्योंकि उन के पास समय ही नहीं होता था. इस फ्लैट में आए उन्हें ज्यादा दिन नहीं हुए थे. गार्ड के अनुसार, वह ठीकठाक आदमी था. नरेश के बारे में गार्ड इस से ज्यादा कुछ नहीं बता सका था. नरेश बड़ा कारोबारी था, इसलिए शहर के व्यापारी उस के कातिलों को पकड़ने के लिए पुलिस पर काफी दबाव बनाए हुए थे. बारबार आंदोलन की धमकी दे रहे थे. कातिलों तक पहुंचने के लिए पुलिस पूरा जोर लगाए हुए थी. नरेश की किसी व्यापारी से दुश्मनी तो नहीं थी, इस के लिए उस के कर्मचारियों से पूछताछ की गई. उन सब का कहना था कि रुपयोंपैसों के लिए उन्होंने अपने मालिक को कभी किसी से लड़तेझगड़ते नहीं देखा था. पुलिस के लिए हैरानी वाली बात यह थी कि घर वाले कुछ बोलने को तैयार नहीं थे. इस की वजह शायद नरेश से घर वालों की नाराजगी थी.

पुलिस ने नाराजगी की वजह पूछी तो लोगों ने बताया कि नरेश ने प्रेम विवाह किया था, इसलिए घर वाले नाराज थे. पुलिस को लगा कि इतनी सी बात के लिए कोई अपने खून का कत्ल नहीं कर सकता. इस के अलावा नरेश ऐसी बिरादरी से थे, जो शुद्ध व्यवसायी होती है. ऐसे लोगों के बारे में कत्ल की बात सोचना भी ठीक नहीं था.

पुलिस ने नरेश के सभी नंबरों की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच की. उन में कुछ भी संदिग्ध नहीं मिला. घूमफिर कर शक की सुई ऐश्वर्या पर आ टिकी. इस प्रेम विवाह से नरेश के घर का कोई भी सदस्य खुश नहीं था. इस के बावजूद नरेश भाइयों के साथ ही व्यवसाय कर रहा था. सभी पहले की ही तरह मिलजुल कर व्यवसाय करते थे. नरेश अपनी मां से मिलने घर भी जाया करता था.

फ्लैटों में रहने वालों को वैसे भी एकदूसरे के बारे में कम ही पता होता है. अगर इलाका पौश हो तो ऐसे मामले में लोग चुप्पी साधे रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं. फ्लैट बने ऐसे होते हैं कि अंदर क्या हो रहा है, बगल वाले को भी पता नहीं चलता. लेदे कर एक गार्ड ही बचता था, जिसे पता होता था कि इमारत में कौन कब आताजाता है. इसलिए पुलिस गार्ड के पास पहुंची.

मामले की जांच कर रहे इंसपेक्टर शर्मा ने पूछा, ‘‘तुम हर आनेजाने वाले का रिकौर्ड रखते हो?’’

‘‘नहीं साहब, यहां ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. आने वाले से सिर्फ पूछ लेते हैं कि किस से मिलना है?’’ गार्ड ने सहज भाव से कहा.

‘‘पूछने के बाद उसे जाने देते हो?’’ इंसपेक्टर शर्मा ने पूछा.

‘‘नहीं, पहले उस फ्लैट वाले से फोन पर पूछते हैं, जिस में उसे जाना होता है. उधर से भेजने के लिए कहा जाता है, तभी अंदर जाने देते हैं.’’

‘‘क्या, ऐश्वर्या मैडम से भी कोई मिलने आता था?’’

‘‘साहब, यहां कोई न कोई किसी न किसी से मिलने आता ही रहता है. मैं किसकिस के बारे में बता सकता हूं.’’

‘‘अगर एक से ज्यादा बार कोई मिलने आया हो, तब तो पहचान सकते हो?’’

‘‘क्यों नहीं साहब,’’ गार्ड ने कहा.

इस के बाद इंसपेक्टर शर्मा ऐश्वर्या के फ्लैट पर पुन: लौट आए. उस से एक बार फिर पूछा, ‘‘मैडम, फिर याद कीजिए, कोई तो होगा, जिस से आप के पति की दुश्मनी रही होगी?’’

‘‘एक ही बात आप लोग कितनी बार पूछेंगे. मैं ने बताया तो कि मुझे कुछ नहीं पता.’’ ऐश्वर्या थोड़ा झल्ला कर बोली. इंसपेक्टर शर्मा ने इधरउधर देखते हुए पूछा, ‘‘आप यहां अकेली ही रहती हैं?’’

‘‘क्यों?’’ ऐश्वर्या ने थोड़ा विचलित हो कर पूछा.

‘‘मेरे कहने का मतलब यह है कि संकट की इस घड़ी में कोई तो आप का करीबी होना चाहिए.’’

‘‘मेरी अम्मी आई हैं.’’

‘‘अम्मी?’’ इंसपेक्टर शर्मा ने हैरानी से पूछा.

‘‘हां, मैं उन्हें अम्मी ही कहती हूं.’’ ऐश्वर्या ने कहा.

इस बीच इंसपेक्टर शर्मा उस के चेहरे पर आनेजाने वाले भावों को पढ़ते रहे. उन्होंने अगला सवाल किया, ‘‘क्या मैं उन से मिल सकता हूं?’’

‘‘इस समय वह घर में नहीं हैं.’’

‘‘कहां गई हैं?’’

‘‘बाजार से कुछ जरूरी सामान लेने गई हैं.’’

‘‘कब तक लौटेंगी?’’

‘‘डेढ़-दो घंटे लग सकते हैं.’’ ऐश्वर्या ने कहा.

‘‘कोई बात नहीं, मैं फिर आऊंगा तो उन से मिल लूंगा. आप जांच में सहयोग करती रहें, निश्चय ही एक न एक दिन कातिल पकड़ा जाएगा.’’ इंसपेक्टर शर्मा ने उठते हुए कहा. जैसे ही वह दरवाजे पर पहुंचे, अंदर से किसी महिला के खांसने की आवाज आई. उन्होंने पलट कर कहा, ‘‘आप तो कह रही थीं कि अंदर कोई नहीं है, फिर यह खांसा कौन?’’

‘‘मैं ने कब कहा कि अंदर कोई नहीं है. मेरी सास भी आई हुई हैं.’’ ऐश्वर्या ने कहा.

कुछ कहे बगैर इंसपेक्टर शर्मा बाहर आ गए. जीना उतरते हुए वह यही सोच रहे थे कि पिछली बार जब वह यहां आए थे, तब नरेश के घर वालों ने कहा था कि नरेश से सिवाय व्यवसाय के उन का कोई और संबंध नहीं है. फिर जख्म पर मरहम लगाने उस की मां यहां कैसे आ गई?

इंसपेक्टर शर्मा थाने आ कर इसी मामले पर गहराई से विचार करने लगे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐश्वर्या ने अपनी मां को अम्मी क्यों कहा? कहीं वह मुसलिम तो नहीं है? अब इस का पता कैसे चले? क्यों न नरेश के घर वालों से पूछा जाए? हो सकता है, इसी वजह से नरेश के घर वाले ऐश्वर्या को नापसंद करते रहे हों?

इस बारे में घर वालों से पूछने का निर्णय ले कर वह अन्य काम में लग गए. अगले दिन सुबहसुबह ही ऐश्वर्या का फोन आया. वह थोड़ी घबराई हुई थी. उस ने हकलाते हुए कहा, ‘‘इंसपेक्टर साहब, जल्दी आइए. मैं आप को एक जरूरी बात बताना चाहती हूं.’’

इंसपेक्टर शर्मा तुरंत ऐश्वर्या के घर पहुंच गए. उन्हें कागज का टुकड़ा देते हुए उस ने कहा, ‘‘यह देखिए, इस में क्या लिखा है?’’

इंसपेक्टर शर्मा ने उसे खोल कर देखा. उस में लिखा था, ‘10 लाख रुपए 26 फरवरी तक पहुंचा देना, वरना अंजाम भुगतने को तैयार रहना.’

‘‘यह आप को कहां मिला?’’ इंसपेक्टर शर्मा ने पूछा.

‘‘गद्दे के नीचे रखा था.’’

प्यार का सफल प्रायश्चित्त

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सोच से आगे: आखिर कौन था हत्यारा

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Father’s Day Special – पछतावा: क्या बेटे ने लिया बाप से बदला?

दीनानाथ नगरनिगम में चपरासी था. वह स्वभाव से गुस्सैल था. दफ्तर में वह सब से झगड़ा करता रहता था. उस की इस आदत से सभी दफ्तर वाले परेशान थे, मगर यह सोच कर सहन कर जाते थे कि गरीब है, नौकरी से हटा दिया गया, तो उस का परिवार मुश्किल में आ जाएगा.

दीनानाथ काम पर भी कई बार शराब पी कर आ जाता था. उस के इस रवैए से भी लोग परेशान रहते थे. उस के परिवार में पत्नी शांति और 7 साल का बेटा रजनीश थे. शांति अपने नाम के मुताबिक शांत रहती थी. कई बार उसे दीनानाथ गालियां देता था, उस के साथ मारपीट करता था, मगर वह सबकुछ सहन कर लेती थी.

दीनानाथ का बेटा रजनीश तीसरी जमात में पढ़ता था. वह पढ़ने में होशियार था, मगर अपने एकलौते बेटे के साथ भी पिता का रवैया ठीक नहीं था. उस का गुस्सा जबतब बेटे पर उतरता रहता था.

‘‘रजनीश, क्या कर रहा है? इधर आ,’’ दीनानाथ चिल्लाया.

‘‘मैं पढ़ रहा हूं बापू,’’ रजनीश ने जवाब दिया.

‘‘तेरा बाप भी कभी पढ़ा है, जो तू पढ़ेगा. जल्दी से इधर आ.’’

‘‘जी, बापू, आया. हां, बापू बोलो, क्या काम है?’’

‘‘ये ले 20 रुपए, रामू की दुकान से सोडा ले कर आ.’’

‘‘आप का दफ्तर जाने का समय हो रहा है, जाओगे नहीं बापू?’’

‘‘तुझ से पूछ कर जाऊंगा क्या?’’ इतना कह कर दीनानाथ ने रजनीश के चांटा जड़ दिया.

रजनीश रोता हुआ 20 रुपए ले कर सोडा लेने चला गया.

दीनानाथ सोडा ले कर शराब पीने बैठ गया.

‘‘अरे रजनीश, इधर आ.’’

‘‘अब क्या बापू?’’

‘‘अबे आएगा, तब बताऊंगा न?’’

‘‘हां बापू.’’

‘‘जल्दी से मां को बोल कि एक प्याज काट कर देगी.’’

‘‘मां मंदिर गई हैं… बापू.’’

‘‘तो तू ही काट ला.’’

रजनीश प्याज काट कर लाया. प्याज काटते समय उस की आंखों में आंसू आ गए, पर पिता के डर से वह मना भी नहीं कर पाया.

दीनानाथ प्याज चबाता हुआ साथ में शराब के घूंट लगाने लगा.

शाम के 4 बज रहे थे. दीनानाथ की शाम की शिफ्ट में ड्यूटी थी. वह लड़खड़ाता हुआ दफ्तर चला गया.

यह रोज की बात थी. दीनानाथ अपने बेटे के साथ बुरा बरताव करता था. वह बातबात पर रजनीश को बाजार भेजता था. डांटना तो आम बात थी. शांति अगर कुछ कहती थी, तो वह उस के साथ भी गालीगलौज करता था.

बेटे रजनीश के मन में पिता का खौफ भीतर तक था. कई बार वह रात में नींद में भी चीखता था, ‘बापू मुझे मत मारो.’

‘‘मां, बापू से कह कर अंगरेजी की कौपी मंगवा दो न,’’ एक दिन रजनीश अपनी मां से बोला.

‘‘तू खुद क्यों नहीं कहता बेटा?’’ मां बोलीं.

‘‘मां, मुझे बापू से डर लगता है. कौपी मांगने पर वे पिटाई करेंगे,’’ रजनीश सहमते हुए बोला.

‘‘अच्छा बेटा, मैं बात करती हूं,’’ मां ने कहा.

‘‘सुनो, रजनीश के लिए कल अंगरेजी की कौपी ले आना.’’

‘‘तेरे बाप ने पैसे दिए हैं, जो कौपी लाऊं? अपने लाड़ले को इधर भेज.’’

रजनीश डरताडरता पिता के पास गया. दीनानाथ ने रजनीश का कान पकड़ा और थप्पड़ लगाते हुए चिल्लाया, ‘‘क्यों, तेरी मां कमाती है, जो कौपी लाऊं? पैसे पेड़ पर नहीं उगते. जब तू खुद कमाएगा न, तब पता चलेगा कि कौपी कैसे आती है? चल, ये ले

20 रुपए, रामू की दुकान से सोडा ले कर आ…’’

‘‘बापू, आज आप शराब बिना सोडे के पी लो, इन रुपयों से मेरी कौपी आ जाएगी…’’

‘‘बाप को नसीहत देता है. तेरी कौपी नहीं आई तो चल जाएगा, लेकिन मेरी खुराक नहीं आई, तो कमाएगा कौन? अगर मैं कमाऊंगा नहीं, तो फिर तेरी कौपी नहीं आएगी…’’ दीनानाथ गंदी हंसी हंसा और बेटे को धक्का देते हुए बोला, ‘‘अबे, मेरा मुंह क्या देखता है. जा, सोडा ले कर आ.’’

दीनानाथ की यह रोज की आदत थी. कभी वह बेटे को कौपीकिताब के लिए सताता, तो कभी वह उस से बाजार के काम करवाता. बेटा पढ़ने बैठता, तो उसे तंग करता. घर का माहौल ऐसा ही था.

इस बीच रात में शांति अपने बेटे रजनीश को आंचल में छिपा लेती और खुद भी रोती.

दीनानाथ ने बेटे को कभी वह प्यार नहीं दिया, जिस का वह हकदार था. बेटा हमेशा डराडरा सा रहता था. ऐसे माहौल में भी वह पढ़ता और अपनी जमात में हमेशा अव्वल आता.

मां रजनीश से कहती, ‘‘बेटा, तेरे बापू तो ऐसे ही हैं. तुझे अपने दम पर ही कुछ बन कर दिखाना होगा.’’

मां कभीकभार पैसे बचा कर रखती और बेटे की जरूरत पूरी करती. बाप दीनानाथ के खौफ से बेटे रजनीश के बाल मन पर ऐसा डर बैठा कि वह सहमासहमा ही रहता. समय बीतता गया. अब रजनीश

21 साल का हो गया था. उस ने बैंक का इम्तिहान दिया. नतीजा आया, तो वह फिर अव्वल रहा. इंटरव्यू के बाद उसे जयपुर में पोस्टिंग मिल गई. उधर दीनानाथ की झगड़ा करने की आदत से नगरनिगम दफ्तर से उसे निकाल दिया गया था.

घर में खुशी का माहौल था. बेटे ने मां के पैर छुए और उन से आशीर्वाद लिया. पिता घर के किसी कोने में बैठा रो रहा था. उस के मन में एक तरफ नौकरी छूटने का दुख था, तो दूसरी ओर यह चिंता सताने लगी थी कि बेटा अब उस से बदला लेगा, क्योंकि उस ने उसे कोई सुख नहीं दिया था.

मां रजनीश से बोलीं, ‘‘बेटा, अब हम दोनों जयपुर रहेंगे. तेरे बापू के साथ नहीं रहेंगे. तेरे बापू ने तुझे और मुझे जानवर से ज्यादा कुछ नहीं समझा…

‘‘अब तू अपने पैरों पर खड़ा हो गया है. तेरी जिंदगी में तेरे बापू का अब मैं साया भी नहीं पड़ने दूंगी.’’

रजनीश कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, ‘‘नहीं मां, मैं बापू से बदला नहीं लूंगा. उन्होंने जो मेरे साथ बरताव किया, वैसा बरताव मैं नहीं करूंगा. मैं अपने बेटे को ऐसी तालीम नहीं देना चाहता, जो मेरे पिता ने मुझे दी.’’

रजनीश उठा और बापू के पैर छू कर बोला, ‘‘बापू, मैं अफसर बन गया हूं, मुझे आशीर्वाद दें. आप की नौकरी छूट गई तो कोई बात नहीं, मैं अब अपने पैरों पर खड़ा हो गया हूं. चलो, आप अब जयपुर में मेरे साथ रहो, हम मिल कर रहेंगे.‘‘

यह सुन कर दीनानाथ की आंखों में आंसू आ गए. वह बोला, ‘‘बेटा, मैं ने तुझे बहुत सताया है, लेकिन तू ने मेरा साथ नहीं छोड़ा. मुझे तुझ पर गर्व है.’’

दीनानाथ को अपने किए पर खूब पछतावा हो रहा था. रजनीश ने बापू की आंखों से आंसू पोंछे, तो दीनानाथ ने उसे गले लगा लिया.

Father’s Day Special – विटामिन-पी: संजना ने कैसे किया अस्वस्थ ससुरजी को ठीक

संजनाटेबल पर खाना लगा रही थी. आज विशेष व्यंजन बनाए गए थे, ननदरानी मिथिलेश जो आई थी.

‘‘पापा, ले आओ अपनी कटोरी, खाना लग रहा है,’’ मिथिलेश ने अरुणजी से कहा.

‘‘दीदी, पापा अब कटोरी नहीं, कटोरा खाते हैं. खाने से पहले कटोरा भर कर सलाद और खाने के बाद कटोरा भर फ्रूट्स,’’ संजना मुसकराती हुई बोली.

‘‘अरे, यह चमत्कार कैसे हुआ? पापा की उस कटोरी में खूब सारे टैबलेट्स, विटामिन, प्रोटीन, आयरन, कैल्सियम होता था… कहां, कैसे, गायब हो गए?’’ मिथिलेश ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘बेटा यह चमत्कार संजना बिटिया का है,’’ कहते हुए वे पिछले दिनों में खो गए…

नईनवेली संजना ब्याह कर आई, ऐसे घर में जहां कोई स्त्री न थी. सासूमां का देहांत हो चुका था और ननद का ब्याह. घर में पति और ससुरजी, बस 2 ही प्राणी थे. ससुरजी वैसे ही कम बोलते थे और रिटायरमैंट के बाद तो बस अपनी किताबों में ही सिमट कर रह गए थे.

संजना देखती कि वे रोज खाना खाने से पहले दोनों समय एक कटोरी में खूब सारे टैबलेट्स निकाल लाते. पहले उन्हें खाते फिर अनमने से एकाध रोटी खा कर उठ जाते. रात को भी स्लीपिंग पिल्स खा कर सोते. एक दिन उस ने ससुरजी से पूछ ही लिया, ‘‘पापाजी, आप ये इतने सारे टेबलेट्स क्यों खाते हैं.’’

‘‘बेटा, अब तो जीवन इन पर ही निर्भर है, शरीर में शक्ति और रात की नींद इन के बिना अब संभव नहीं.’’

‘‘उफ पापाजी, आप ने खुद को इन का आदी बना लिया है. कल से आप मेरे हिसाब से चलेंगे. आप को प्रोटीन, विटामिन, आयरन, कैल्सियम सब मिलेगा और रात को नींद भी जम कर आएगी.’’

अगले दिन सुबह अरुणजी अखबार देख रहे थे तभी संजना ने आ कर कहा, ‘‘चलिए पापाजी, थोड़ी देर गार्डन में घूमते हैं, वहां से आ कर चाय पीएंगे.’’

संजना के कहने पर अरुणजी को उस के साथ जाना पड़ा. वहां संजना ने उन्हें हलकाफुलका व्यायाम भी करवाया और साथ ही लाफ थेरैपी दे कर खूब हंसाया.

‘‘यह लीजिए पापाजी, आप का कैल्सियम, चाय इस के बाद मिलेगी,’’ संजना ने दूध का गिलास उन्हें पकड़ाया.

नाश्ते में स्प्राउट्स दे कर कहा, ‘‘यह लीजिए भरपूर प्रोटींस. खाइए पापाजी.’’

लंच के समय अरुणजी दवाइयां निकालने लगे, तो संजना ने हाथ रोक लिया और कहा, ‘‘पापाजी, यह सलाद खाइए, इस में टमाटर, चुकंदर है, आप का आयरन और कैल्सियम. खाना खाने के बाद फू्रट्स खाइए.’’

अरुणजी उस की प्यार भरी मनुहार को टाल नहीं पाए. रात को भोजन भी उन्होंने संजना के हिसाब से ही किया. रात को संजना उन्हें फिर गार्डन में टहलाने ले गई.

‘‘चलिए पापा, अब सो जाइए.’’

अरुणजी की नजरें अपनी स्लीपिंग पिल्स की शीशी तलाशने लगीं.

‘‘लेटिए पापाजी, मैं आप के सिर की मालिश कर देती हूं,’’ कह कर उस ने अरुणजी को बिस्तर पर लिटा दिया और तेल लगा कर हलकेहलके हाथों सिर का मसाज करने लगी. कुछ ही देर में अरुणजी की नींद लग गई.

‘‘संजना, बेटी कल रात तो बहुत ही अच्छी नींद आई.’’

‘‘हां पापाजी, अब रोज ही आप को ऐसी नींद आएगी. अब आप कोई टैबलेट नहीं खाएंगे.’’

‘‘अब क्यों खाऊंगा. अब तो मुझे रामबाण औषधि मिल गई है,’’ अरुणजी गार्डन जाने के लिए तैयार होते हुए बोले.

‘‘थैंक्यू भाभी,’’ अचानक मिथिलेश की आवाज ने अरुणजी की तंद्रा भंग की.

‘‘हां बेटा, थैंक्स तो कहना ही चाहिए संजना बेटी को. इस ने मेरी सारी टैबलेट्स छुड़वा दीं. अब तो बस मैं एक ही टैबलेट खाता हूं,’’ अरुणजी बोले.

‘‘कौन सी?’’ संजना ने चौंक कर पूछा.

‘‘विटामिन-पी यानी भरपूर प्यार और परवाह.’’

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