Story In Hindi: सबक

Story In Hindi, लेखक – सुनील

‘‘जरा यहां गाड़ी रोकना…’’ मीना के इतना कहते ही ड्राइवर ने झट से ब्रेक लगा दिए.

‘गांव तो अभी डेढ़ किलोमीटर दूर है. मैडम ने अभी एकदम से गाड़ी क्यों रुकवाई?’ आईएएस मीना की इस पहेली से जूझते ड्राइवर मनोहर ने सोचा.

मीना गाड़ी से बाहर निकलीं. कच्ची सड़क पर अभी भी धूल उड़ रही थी. तेज धूप में उन्होंने अपने काले चश्मे लगाए और एक खेत की पगडंडी की तरफ चल दीं. जब उन के साथ के लोग पीछेपीछे आने लगे, तो उन्होंने बिना मुड़े ही हाथ के इशारे से उन्हें रोक दिया.

उस पगडंडी पर तकरीबन 100 मीटर दूर एक ट्यूबवैल नजर आ रहा था. पानी चल रहा था. धान की फसल में पानी छोड़ा गया था. भरी दोपहर में वहां कोई नहीं था. एक पेड़ की छांव में कुत्ता ऊंघ रहा था.

जब मीना उस कुत्ते के करीब से गुजरीं, तो उस के कान खड़े हो गए. एक बार आंखें खोलीं और फिर सुस्ताने लगा. उस की सांसें धौकनी की तरह बड़ी तेज चल रही थीं.

मीना थोड़ा आगे बढ़ीं और उस ट्यूबवैल के पास जा कर खड़ी हो गईं.

दूर खड़े स्टाफ ने सोचा कि मैडम को प्यास लगी होगी, पर पानी तो गाड़ी में भी रखा था, वह भी बोतलबंद, तो इतनी दूर जाने की क्या जरूरत थी?

उधर आईएएस मीना के मन में बड़ी कशमकश थी और कुछ पुरानी यादें भी, जो आज भी नासूर बन कर उन को टीस दे रही थीं.

आज से 10 साल पहले की बात है, जब 15 साल की मीना सरकारी स्कूल में 10वीं जमात में पढ़ती थी. पढ़ाई में बड़ी होशियार, पर जाति से दलित थी, तो उस के तेज दिमाग की कोई कीमत नहीं थी.

मीना के मांबापू सरपंच के खेतों में मजदूर थे और अपने 5 जनों के परिवार को जैसेतैसे पाल रहे थे. मीना के 2 छोटे भाई आवारा थे और दिनभर यहांवहां पैर भिड़ाते घूमते रहते थे.

‘‘अरी ओ मीना, उठ जा. आज स्कूल नहीं जाना क्या?’’ जब मां की यह आवाज मीना के कानों में पड़ी तो वह झट से उठ बैठी.

मीना पढ़ाई में तो तेज थी ही, अच्छी देह की मालकिन भी थी. लंबा चेहरा, काले घने बाल, उभरी हुई बड़ी छातियां, चौड़े कूल्हे, जो उसे 20 साल की भरीपूरी लड़की दिखाते थे. यही वजह थी कि वह कई लोगों की हवसभरी निगाहों में आ चुकी थी. चूंकि दलित थी, तो ऊंची जात के लोग उसे अपने बाप का माल समझ कर हाथ साफ करना अपना जन्मजात हक समझते थे.

स्कूल के हैडमास्टर सेवकराम ऊंची जाति के थे और हमेशा मीना की ऊंची छातियों को मसलने के सपने देखते थे. उन्हें पता था कि अकेले यह काम इतना आसान नहीं होगा, क्योंकि मीना दबंग लड़की थी. अकेले उस पर हावी होना सेवकराम की बूढ़ी हड्डियों के बस की बात नहीं थी.

यही वजह थी कि उन्होंने स्कूल के 2 लड़कों महेश और दीपक को अपना परम चेला बनाया हुआ था. वे जानते थे कि महेश और दीपक की लार भी मीना की देह पाने के लिए टपकती रहती है. पर चूंकि मीना उन दोनों लड़कों को पसंद नहीं करती थी, तो सेवकराम ने एक टीचर बनवारी दास को भी अपने ‘हवसी गिरोह’ में शामिल कर लिया था. वे चारों ऊंची जाति के थे.

आज जब मीना स्कूल पहुंची, तो उस की पक्की सहेली गीता ने कहा, ‘‘मीना, तू हैडमास्टर साहब से मिल लेना.

उन्होंने तो तुझे कल ही अपने पास बुलाया था, पर मैं तुझे बताना भूल गई. तू उस समय बनवारी दास सर ने नोट्स ले रही थी.’’

थोड़ी देर के बाद मीना हैडमास्टर साहब के कमरे में पहुंची. उस समय वे अकेले थे. मीना को देखते ही वे कुरसी से खड़े हो गए और उस के पास आ गए.

‘‘सर, आप ने मुझे बुलाया था?’’ मीना ने पूछा.

हैडमास्टर साहब ने मीना को ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा, ‘‘हां. मैं तुम्हारी पढ़ाई से बहुत खुश हूं. मुझे उम्मीद है कि तुम हमारे स्कूल का नाम रोशन करोगी.’’

‘‘सर, मैं बड़ी मेहनत कर रही हूं. आप के आशीर्वाद से अच्छा रिजल्ट आएगा,’’ मीना ने कहा.

इतने में हैडमास्टर साहब ने मीना के गाल पर चुटकी काटते हुए कहा, ‘‘यह हुई न बात. मैं शाम को 5 बजे हमारे खेत वाले ट्यूबवैल पर कुछ बच्चों को पढ़ाता हूं. आज शाम से तुम भी आ जाना. जितनी ज्यादा मेहनत करोगी, उतना ऊपर जाओगी,’’ और इतना कह कर हैडमास्टर साहब मीना की छातियों को घूरने लगे.

मीना को इस तरह हैडमास्टर का घूरना थोड़ा अखरा, पर उस ने सोचा, ‘ऐसा नहीं हो सकता. हैडमास्टर साहब बड़े अच्छे इनसान हैं. ये तो मुझे शाम को पढ़ाने की बात भी कर रहे हैं. अपने दिमाग पर काबू पा. और अगर कोई ऐसीवैसी बात हुई तो मैं संभाल लूंगी.’

‘‘जी सर, मैं शाम को आ जाऊंगी,’’ इतना कह कर मीना वहां से चली गई. मीना के जाने के बाद हैडमास्टर सेवकराम ने महेश, दीपक और बनवारी दास को अपने पास बुलाया. उन के आते ही सेवकराम ने कहा,

‘‘मीना शाम को खेत पर आने के लिए मान गई है. हमारे पास आज का ही मौका है. शाम को वहां लोगों की ज्यादा आवाजाही नहीं होती है. उसे आसानी से अपने काबू में कर लेंगे.’’

‘‘बड़ी पढ़ाकू बनती है. छोटी जात की हो कर बड़ी सरकारी अफसर बनने का सपना देख रही है. आज शाम को इस का सारा नशा उतार देंगे,’’ महेश ने कहा.

‘‘कल इस का बापू मेरे पास आ कर गिड़गिड़ा रहा था और कह रहा था कि यही हमारी आखिरी आस है. पढ़ने में ठीक है, तो कोटे से सरकारी नौकरी मिल जाएगी.

‘‘इतना ही नहीं, मुझ से 500 रुपए उधार ले गया था. मुझे पता है कि वापस नहीं मिलेंगे. इस की बेटी से ही वसूल कर लेंगे,’’ हैडमास्टर सेवकराम ने कहा.

‘‘आप की चाल तो एकदम बढि़या है. बस, किसी तरह मीना आज शाम को ट्यूबवैल पर आ जाए,’’ बनवारी दास ने कहा.

‘‘तू मिल आई हैडमास्टर साहब से? वे क्या बोल रहे थे?’’ वापस क्लास में आई मीना से गीता ने पूछा.
मीना ने सारी बात बता दी. गीता भी खुश हुई कि मीना को खुद हैडमास्टर साहब कोचिंग देंगे, वह भी फ्री में.

दोपहर को घर का काम कर मीना ने खाना बनाया और अपने दोनों निकम्मे भाइयों को खिलाया. उस के मांबापू सरपंच के खेत पर गए थे.

मीना ने घर के सारे काम निबटाए और फिर स्कूल से मिला होमवर्क किया. उसे आज हैडमास्टर साहब से पढ़ने की जल्दी थी.

शाम के साढ़े 4 बजे मीना ने अपना सूटसलवार बदला और बस्ता ले कर हैडमास्टर साहब के खेतों की ओर चल दी. वहां तक जाने में आधा घंटे का समय लगना था.

हैडमास्टर साहब का ट्यूबवैल वाला खेत पगडंडी से थोड़ा अंदर था और वहां कोई नहीं आताजाता था. उस समय भी वहां सन्नाटा छाया हुआ था.

जब मीना ट्यूबवैल पर पहुंची, तो देखा कि हैडमास्टर रामसेवक के साथ वहां महेश और दीपक के अलावा बनवारी दास भी मौजूद थे. वह थोड़ा चौकन्ना हो गई, क्योंकि उसे महेश और दीपक कतई पसंद नहीं थे.

‘‘अरे, आओ मीना. तुम तो समय की बड़ी पाबंद हो,’’ हैडमास्टर रामसेवक बोले. उस समय उन्होंने बनियान और लुंगी पहनी हुई थी.

वहां एक खाट बिछी थी और 2-3 कुरसियां पड़ी हुई थीं. मीना ने हैडमास्टर रामसेवक और टीचर बनवारी दास को ‘नमस्ते’ कहा और फिर एक तरफ खड़ी हो गई.

उन चारों ने पहले ही प्लान बना लिया था कि पानी देने के बहाने मीना के गिलास में नशे की गोली मिला देंगे, फिर उस की जवानी का रस पीएंगे.

महेश ट्यूबवैल के कोठरे से 3-4 गिलास पानी के लिए आया. उस ने अपने हाथ से मीना को पानी दिया और कहा, ‘‘गरमी बहुत है. पहले पानी पी लो, फिर हम तीनों पढ़ाई करेंगे.’’

मीना ने गिलास हाथ में ले लिया, पर सारा पानी नहीं पीया, बस कुछ घूंट ही हलक के नीचे उतारा.

पता नहीं क्यों मीना को वहां अच्छा नहीं लग रहा था. उस ने अपनी चुन्नी को कमर पर कस कर बांध लिया था. जब तक वह कुरसी पर बैठती, तब तक उसे लगा कि सिर घूम रहा है.

मीना ने हैडमास्टर सेवकराम से कहा कि उसे पेशाब करने जाना है. यह सुन कर उन सब की बांछें खिल गईं.

रामसेवक बोले, ‘‘हां, यहीं पीछे एक छोटी सी कोठरी और है, वहां चली जाओ.’’

मीना जल्दी से वहां से निकली. उस का सिर अब तेजी से घूम रहा था. वह उस कोठरी में गई और हलक में उंगली डाल कर उलटी कर दी. इस से नशे का असर कम हुआ और फिर उस ने मटके में रखे पानी से अपना मुंह अच्छी तरह से धोया और फिर मन ही मन कुछ सोच कर वह ट्यूबवैल की तरफ बढ़ गई.

वहां जाते ही मीना ने कहा, ‘‘सर, मेरे सिर में दर्द हो रहा है. मुझे नींद भी बहुत आ रही है.’’

इतना सुनते ही दीपक बोला, ‘‘कोई बात नहीं, तुम खाट पर लेट जाओ. थोड़ी देर में आराम आ जाएगा.’’

मीना खाट पर लेट गई और सोने की ऐक्टिंग करने लगी. थोड़ी देर के बाद जब सब को लगा कि नशे का असर हो गया है, तो वे चारों उस पर छाने लगे.

दीपक ने मीना की चुन्नी खोलनी चाही कि तभी मीना ने कस कर एक लात उसे जमा दी. लात सीधी छाती पर पड़ी थी. दीपक दूर जा गिरा और एक ईंट उस के सिर पर लगी. उसे चक्कर आने लगे.

इस बीच उन तीनों को जैसे सांप सूंघ गया, क्योंकि उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि मीना ही उन पर यह चाल चल देगी.

तभी मीना ने अपनी कुहनी महेश के जबड़े पर मारी और घायल शेरनी की तरह उठ बैठी. टीचर बनवारी दास उस का यह खतरनाक रूप देख कर वहां से चंपत हो गया. अब बचे थे हैडमास्टर सेवकराम. मीना ने उन का बनियान खींच कर फाड़ दिया और जोर से चिल्लाई, ‘‘कोई बचाओ. ये लोग मेरी इज्जत पर हाथ डाल रहे हैं.’’

इतने में वहां बैठा एक कुत्ता जोर से भौंकने लगा. कुत्ते का शोर सुन कर उस खेत से थोड़ा दूर कुछ किसान चारा काट रहे थे. वे एकदम से ट्यूबवैल की तरफ दौड़े.

हैडमास्टर सेवकराम की घिग्गी बंध गई. फटी बनियान को संभालते हुए वे वहां से भागना चाहते थे, पर मीना ने उन पर मुक्कों की बरसात कर दी और चिल्लाई, ‘‘नीच आदमी. तेरी इतनी हिम्मत. मैं गरीब घर की बेटी जरूर हूं, पर कमजोर नहीं.’’

सेवकराम हाथ जोड़ने लगे, पर तब तक बाकी लोग वहां पहुंच गए. उन्होंने वहां का सीन देखते ही सबकुछ समझ लिया और हैडमास्टर पर पिल पड़े…

आईएसएस मीना जैसे अपनी यादों से लौट आईं. उस दिन के बाद हैडमास्टर सेवकराम ने वह स्कूल छोड़ दिया था. टीचर बनवारी दास को भी स्कूल से निकाल दिया गया. महेश और दीपक कहां गए, किसी को पता नहीं चला.

आईएसएस मीना ने काला चश्मा लगाया और वहां से लौटने लगीं. ऊंघ रहे कुत्ते ने उन्हें दोबारा देखा. उन्होंने बड़े प्यार से उसे पुचकारा और गाड़ी की तरफ बढ़ गईं. Story In Hindi

Hindi News Story: उपराष्ट्रपति के बहाने तीर तानों के चलाने

Hindi News Story: ‘‘यार, बहुत दिनों से मैं अपने पुराने दोस्तों से नहीं मिली हूं. सोच रही हूं कि कल उन के साथ लंच का प्रोग्राम बना लूं,’’ अनामिका ने विजय से कहा.

‘‘बना लो, पर मैं नहीं चल पाऊंगा,’’ विजय बोला.

‘‘क्यों? तुम कहीं जा रहे हो क्या?’’ अनामिका ने पूछा.

‘‘नहीं, पर उन लोगों के साथ मैं बोरियत महसूस करता हूं. वे हर बात में राजनीति घुसेड़ देते हैं. कभी भी अपनी बातें नहीं करते हैं. और वह जो तुम्हारा बैस्ट फ्रैंड है न जितेश, वह तो मुझे फूटी आंख नहीं सुहाता है,’’ विजय ने कहा.

‘‘विजय, तुम मेरे दोस्तों का नाम सुन कर इतना बिदक क्यों जाते हो? मैं इतने दिनों के बाद उन के साथ लंच का प्रोग्राम बना रही हूं और तुम मेरा मूड खराब कर रहे हो,’’ अनामिका थोड़ा नाराज हो कर बोली.

‘‘मैं कब मना कर रहा हूं. तुम जाओ अपने दोस्तों के पास और मजे करो,’’ विजय ने माहौल को थोड़ा हलका बनाते हुए कहा.

‘‘मैं तो जाऊंगी ही. जितेश से मेरी बात हुई थी. वह आज कन्फर्म कर देगा. फिर मैं, जितेश, राहुल, सुरजीत और सोनिया सब कल लंच पर मिलेंगे,’’ अनामिका ने अपना प्लान बता दिया.

इतने में जितेश का फोन आ गया, ‘‘हां जितेश, बोलो… कल हम सब मिल रहे हैं न?’’ अनामिका ने पूछा.

‘हां, हम सब ठीक दोपहर 1 बजे अनुपम रैस्टोरैंट पर मिलेंगे. तुम देर मत करना. कल बड़ा मजा आएगा,’ उधर से जितेश की आवाज आई.

‘‘ठीक है. मैं टाइम से पहुंच जाऊंगी,’’ इतना कह कर अनामिका ने फोन काट दिया.

अगले दिन अनामिका ने अपना पसंदीदा सूटसलवार पहना और ठीक दोपहर 1 बजे अनुपम रैस्टोरैंट जा पहुंची. उस के सारे दोस्त पहले ही वहां आ गए थे.

‘‘विजय ने परमिशन दे दी यहां आने की?’’ जितेश ने चुटकी ली.

‘‘क्या मतलब?’’ अनामिका ने आंखें तरेरते हुए पूछा.

‘‘पहले अपनी रिजर्व्ड सीट पर बैठते हैं, लंच का और्डर करते हैं, फिर कुछ टांग खिंचाई करेंगे. क्यों, सही कहा न जितेश?’’ सोनिया ने एक आंख दबाते हुए कहा.

‘‘एकदम सही पकड़े हैं आप. आज हमारा टारगेट ही यह सूटसलवार वाली दबंग लड़की है, जो विजय के प्यार में ऐसी बावली हो गई है कि अपने दोस्तों को भी भूल गई है,’’ राहुल बोला.

अनामिका को कुछ समझ नहीं आया. उसे भूख लगी थी. वह बोली, ‘‘विजय पुराण बाद में बांच लेना, पहले कुछ पेट पूजा कर लेते हैं.’’

‘‘जो हुक्म हमारी राजदुलारी,’’ जितेश ने रैस्टोरैंट का मेन दरवाजा खोलते हुए कहा.

दरअसल, जब से अनामिका की विजय से गहरी दोस्ती हुई थी, तब से वह अपने पुराने दोस्तों से बिलकुल कट गई थी. जब भी वे अनामिका को मिलने के लिए कहते, तब अनामिका विजय के साथ होने की मजबूरी जाहिर करती. फोन पर अपने दोस्तों को सिर्फ विजय की अच्छाइयां ही बताती थी. इस बात से अनामिका के सारे दोस्त उकता गए थे.

आज जब अनामिका लंच पर आई तो सब को मौका मिल गया उस की खिंचाई करने का. सब से पहले सुरजीत ने ताना कसा, ‘‘वैसे आज सूरज जरूर पश्चिम से निकला होगा, तभी तो अनामिका आज बिना विजय के हमारे साथ यहां बैठी है.’’

‘‘अबे यार, क्यों इसे तंग कर रहा है. अगर विजय को पता चल गया तो इसे अभी यहां से ले जाएगा,’’ सोनिया बोली.

‘‘मेरा विजय है ही ऐसा. मेरी एक आवाज पर कुछ भी कर सकता है. दुनिया में वही मेरी सब से ज्यादा केयर करता है,’’ अनामिका राहुल की प्लेट में मंचूरियन राइस सर्व करते हुए बोली.

‘‘हां, मैं ने भी देखा है विजय को अच्छी तरह, मेरे 1,000 रुपए तो आज तक वापस नहीं किए… पर तेरे लिए वह दुनिया हिला सकता है,’’ जितेश ने कहा.

‘‘यह ज्यादा हो रहा है. अगर विजय ने तुम्हारे 1,000 वापस नहीं किए, तो मैं कर देती हूं, पर उस पर इतना बड़ा इलजाम तो मत लगा,’’ अनामिका झल्ला कर बोली.

‘‘तू इलजाम की बात करती है. विजय की पैरवी करने में तू उपराष्ट्रपति रह चुके जगदीप धनखड़ से भी आगे निकल चुकी है, जिन्हें हाल ही में अपनी सेहत का हवाला दे कर पद से इस्तीफा देना पड़ा था.

‘‘कभी राजग सरकार के चहेते उपराष्ट्रपति रहे जगदीप घनखड़ पर अचानक ऐसी कौन सी गाज गिरी कि वे एकदम से एकांतवास में चले गए?’’ जितेश ने कहा.

‘‘तुम्हारा मतलब क्या है? मेरे और विजय के रिश्ते के बीच ये जगदीप धनखड़ अचानक कहां से आ गए? उन का हम सब से क्या लेनादेना?’’ अनामिका ने सवाल किया.

‘‘तुम्हारा रवैया हमें जगदीप धनखड़ की याद दिलाता है, जिन्होंने हमेशा राजग की हां में हां मिलाई. तुम भी विजय के मामले में ऐसा ही बरताव करती हो. पर जो हाल अब जगदीप धनखड़ का हुआ है, वह किसी से छिपा नहीं है,’’ सोनिया बोली.

‘‘ऐसा क्या हुआ है जगदीप धनखड़ के साथ?’’ अनामिका ने सवाल किया.

‘‘जगदीप धनखड़ ने सत्ता पक्ष राजग का हमेशा साथ दिया. उन्होंने इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौरान संविधान की प्रस्तावना में ‘सैक्यूलरिज्म’ और ‘सोशलिज्म’ जैसे शब्दों को जोड़े जाने को ‘नासूर’ करार दिया था.

‘‘इतना ही नहीं, जगदीप धनखड़ ने दिल्ली यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम के दौरान साफ कहा था कि ‘संसद सब से ऊपर है’ और संविधान के मुताबिक कोई भी संस्था इस से ऊपर नहीं हो सकती है.

‘‘उन्होंने कहा था कि सब से ऊपर तो संसद ही है, उस से ऊपर कोई अथौरिटी नहीं है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि संसद में जो सांसद चुन कर आते हैं, वे आम जनता की नुमाइंदगी करते हैं. संसद ही सबकुछ होती है, इस से ऊपर कोई नहीं होता है.’’

‘‘तुम अनुच्छेद 142 वाली बात भी तो बताओ. चलो, रहने दो. मैं ही सुनाती हूं…’’ सोनिया ने कहा, ‘‘जगदीप धनखड़ ने अनुच्छेद 142 को ‘न्यूक्लियर मिसाइल’ की संज्ञा देते हुए कहा था कि हम ऐसे हालात नहीं बना सकते, जहां आप भारत के राष्ट्रपति को निर्देश दें और वह भी किस आधार पर?

‘‘संविधान के तहत आप के पास एकमात्र अधिकार अनुच्छेद 145(3) के तहत संविधान की व्याख्या करना है. इस के लिए 5 या उस से ज्यादा जस्टिसों की जरूरत होती है.

‘‘हाल ही में जजों ने उपराष्ट्रपति को तकरीबन आदेश दे दिया और उसे कानून की तरह माना गया, जबकि वे संविधान की ताकत को भूल गए. अनुच्छेद 142 अब लोकतांत्रिक ताकत के खिलाफ एक ‘न्यूक्लियर मिसाइल’ बन गया है, जो चौबीसों घंटे न्यायपालिका के पास उपलब्ध है.’’

‘‘जगदीप धनखड़ ने एक कार्यक्रम के दौरान सुनियोजित धर्मांतरण का आरोप लगाया और कहा कि शुगर कोटेड फिलौसफी बेची जा रही है. उन्होंने कहा कि सनातन कभी विष नहीं फैलाता, सनातन स्वशक्तियों का संचार करता है. एक और संकेत दिया गया है जो बहुत खतरनाक है और देश की राजनीति को भी बदलने वाला है. यह नीतिगत तरीके से हो रहा है, संस्थागत तरीके से हो रहा है, सुनियोजित साजिश के तरीके से हो रहा है और वह है धर्म परिवर्तन.

‘‘उन्होंने आगे कहा कि शुगर कोटेड फिलौसफी बेची जा रही है. वे समाज के कमजोर वर्गों को निशाना बनाते हैं. वे हमारे आदिवासी लोगों में ज्यादा घुसपैठ करते हैं. लालच देते हैं. हम एक नीति के रूप में संरचित तरीके से बहुत दर्दनाक धार्मिक रूपांतरण देख रहे हैं और यह हमारे मूल्यों और संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत है,’’ सुरजीत ने बताया.

अनामिका उन सब की बातें बड़ी ध्यान से सुन रही थी.

राहुल ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘जगदीप धनखड़ ने मार्च, 2023 में शैक्षणिक संस्थानों और छात्र राजनीति पर बयान दिया था. उन्होंने कहा था कि कुछ यूनिवर्सिटी देश विरोधी विचारधारा का अड्डा बन चुकी हैं. उन के इस बयान को जेएनयू और कुछ दूसरी केंद्रीय यूनिवर्सिटियों की ओर इशारा समझ गया था.

‘‘जगदीप धनखड़ ने राज्यसभा में रुकावट से ले कर बिना चर्चा के विधेयक पास होने के आरोपों तक, कई मुद्दों पर विपक्ष को आड़े हाथों लिया था. उन्होंने खासतौर पर उन बड़े वकीलों पर निशाना साधा था, जो विपक्षी दलों खासकर कांग्रेस की नुमाइंदगी करने वाले राज्यसभा सदस्य भी हैं.

‘‘जगदीप धनखड़ ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम को रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कड़ी आलोचना की थी, जिस में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति की कौलेजियम सिस्टम को पलटने की कोशिश की गई थी.

‘‘इतना ही नहीं, जगदीप धनखड़ ने भारत के तत्कालीन चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की हाजिरी में दोनों सदनों द्वारा तकरीबन सर्वसम्मति से पास कानून को रद्द करने के लिए बड़ी अदालत पर सवाल उठाया था.

उन्होंने सांसदों की भी आलोचना करते हुए कहा था कि जब कानून को रद्द किया गया, तो सांसदों की तरफ से विरोध का एक स्वर तक नहीं उभरा,’’ सुरजीत ने जैसे जगदीप धनखड़ की एकतरफा राय की बखिया उधेड़ दी.

अनामिका थोड़ी देर तक चुप रही, फिर वह बोली, ‘‘ठीक है कि किसी उपराष्ट्रपति को अपने पद की गरिमा बना कर रखनी चाहिए. उन्हें सत्ता पक्ष का राग नहीं अलापना चाहिए. उन्हें विपक्ष की बातों का भी मान रखना चाहिए.

‘‘पर अब तो देश को नया उपराष्ट्रपति भी मिल गया है. राजग के उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन देश के अगले उपराष्ट्रपति चुने गए हैं. मंगलवार, 9 सितंबर, 2025 को उपराष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनावों में उन के हक में कुल 452 वोट पड़े. कुल 767 सांसदों ने उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए वोट दिया. इन में से 752 वैलिड थे और बाकी 15 अमान्य करार दिए गए.

‘‘सीपी राधाकृष्णन के सामने विपक्षी पार्टियों के साझा उम्मीदवार के तौर पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रह चुके बी. सुदर्शन रेड्डी चुनौती पेश कर रहे थे. बी. सुदर्शन रेड्डी को 300 फर्स्ट प्रैफरैंस वोट मिले और सीपी राधाकृष्णन को 452 वोट,’’ बताते हुए अनामिका ने अपना ज्ञान बघारा.

‘‘इस से ज्यादा बदलाव नहीं आएगा. ये भी जगदीप धनखड़ जैसे ही साबित होंगे. जब तक सरकार की राजी में राजी रखेंगे, तब तक इन्हें अच्छा ट्रीटमैंट मिलेगा, जब बागी सुर अपनाएंगे तो दूध में पड़ी मक्खी की तरह बाहर निकाल दिए जाएंगे,’’ जितेश बोला.

‘‘तुम भी विजय का ऐसे ही राग अलापती हो. किसी दिन उस की खामियों पर अपनी राय देना, तब सारी असलियत सामने आ जाएगी,’’ सोनिया बोली.

‘‘यार, इतना भी शर्मिंदा मत करो. ठीक है, विजय मेरी जिंदगी में बहुत खास है, पर मैं उस की अंधी पैरवी नहीं करती. लेकिन अगर तुम्हें ऐसा लगता है, तो आज के बाद मैं ध्यान रखूंगी और सही को सही और गलत को गलत कहूंगी, चाहे मेरी और विजय की अनबन ही क्यों न हो जाए,’’ अनामिका बोली.

‘‘यह हुई न बात. अब आई अनामिका अपने पुराने रंग में. इसी बात पर आज के लंच का बिल अनामिका देगी,’’ राहुल बोला.

यह सुनते ही सब ने ठहाका लगा दिया. अनामिका सब को टेढ़ी निगाहों से देख रही है. उस ने अपनी हंसी रोक रखी थी. Hindi News Story

Hindi Family Story: रंग लौट आए

Hindi Family Story: इस समय गोवा के खुशनुमा मौसम को चार चांद लग रहे थे. हवाओं में खूबसूरत नमी सिमट रही थी. मानसून की पहली बारिश ने कितनी ही मटमैली हो गई चीजों से कैसीकैसी धूल की परतें मिटा कर उन की चमक वापस लौटा दी थी.

मिसाल के तौर पर गुलमोहर का दरख्त कितना चटख हरा लगने लगा था. इतना ही नहीं, रिमझिम के मधुर संगीत के साथ धरती अपनी प्यास पूरी तरह बुझा लेने को उतावली थी, मगर अभी बस रिमझिम ही चल रही थी. तेज बौछारों का आना तो अभी बाकी था.

इस रिमझिम के सुर में डूबे हुए नारियल के पेड़ तो जैसे इतराए जा रहे थे. उन के पास बशर्ते मीठा जल था, लेकिन बादलों का यह उपहार उन को दीवाना कर देता था.

नारियल के पेड़ सड़क के किनारे इतने अनुशासित खड़े थे, जैसे किसी प्राइमरी पाठशाला की सभा में सीधे खड़े विद्यार्थी. हवा और रिमझिम की संगत में नारियल के पेड़ दीवाने बन कर संगीत के दीवानों की तरह झूम रहे थे.

गोवा की राजधानी पणजी से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर कैंडोलिम बीच पर एक नौजवान इस रिम?िम में सराबोर हो कर लहरों का आनाजाना देख रहा था.

इस नौजवान का नाम रोशन है. वह साफसाफ महसूस कर रहा है कि गोवा राज्य के उत्तरी भाग में बने इस छोटे से शहर कैंडोलिम में इस बार गिनेचुने सैलानी ही आए हैं, जबकि यह गोवा के सब से लंबे समुद्री बीच में से एक है.

रोशन को इस बार यहां लगातार हो रही बरसात की वजह से कम सैलानी होने का कोई दुख नहीं हो रहा था. इस की वजह यह थी कि उस की कुछ महीने की पक्की कमाई कुछ दिन पहले ही हो गई थी. अब वह एकदम निश्चिंत था.

अब वे जमाने गए कि जब रोशन घबराया सा रहता था. रोज रात को एक रजिस्टर में अपनी कमाई का हिसाबकिताब लिखा करता था. डरता रहता था कि कल को क्या होगा. अब उसे कोई फिक्र नहीं.

मीठी रिमझिम की तो लगातार झड़ी लगी हुई थी. इस समय सुबह के 10 बजे थे और रोशन का मन सूरज की तरह खिलाखिला था. इस तरह खिले रहने की आदत बनाने में उस की पुरानी प्रेमिका झलक का बड़ा ही योगदान रहा था. वह हमेशा खुश ही रहती थी.

रिमझिम की हर रिमझिम में कमाल और धमाल था. चाहे माहवारी की वजह से पूरे बदन में भयंकर दर्द हो रहा हो, पेट और कमर पर बल पड़े हों, मगर रिमझिम भी न जाने कौन सी मिट्टी की बनी थी कि वह अपनी एक सांस से दर्द को खींच लेती, फिर दूसरी सांस से मुसकराना, खिलखिलाना शुरू कर देती.

रोशन ने ‘आल इज वैल’ का यह सूत्र झलक से ही पाया था. वह उस शाम को आज तक न भूला है. हंस कर कैसे बोली थी झलक, ‘‘ऐ रोशन, इधर देख तो. नजर मिला न. कैसी उदासी और कैसा सुबकना?

‘‘देखो, कुछ भी हो, मगर तुम मुझे भूलना मत. बस इसी तरह हमारा प्यार अमर रहेगा. शादी की दावत खा कर जाना. भूलना मत,’’ ऐसी सीख दे गई वह. उस भावुक दिन, जब अपनी शादी का कार्ड देने बुलाया था.

इसी तरह की बातें हुआ करती थीं झलक की. वह तो अपनेआप में अनोखी थी. शादी के एक महीने बाद जब मायके आई तो वह सीधा रोशन को मिलने आ गई. घबराए से रोशन की सम?ा में नहीं आ रहा था कि झलक इतनी बेखौफ हो भी कैसे सकती है.

‘‘ओहो, इस में खौफ की कौन सी बात है रोशन?’’ रोशन के दिल की बात पढ़ कर बोली थी झलक, ‘‘सुन अब, गौर से सुन, तुझे एक बढि़या सलाह देने आई हूं,’’ वह किलक कर बोली थी.

‘‘झलक, तू मुझ को सलाह देगी… ठीक है, पर शादी करने की सलाह तो बिलकुल मत ही देना मुझे,’’ रोशन ने बिदक कर कह दिया था.

‘‘अरे पगले, कभी नहीं. शादी तो बरबादी है रे. अगर मेरे बाप पर इतना कर्ज न होता तो मै भी कौन सा शादी कर के ससुराल जाने वाली थी. कतई नहीं. बिलकुल नहीं,’’ झलक की यह सच्ची और खरी सी यह बात सुन कर रोशन ने भी बस गरदन हिला दी थी. इस सच से तो वह एकदम वाकिफ था, इसीलिए तो झलक से आज भी खफा न था. उस से नफरत नहीं करता था.

रोशन को सब मालूम था कि सट्टे और जुए का शौकीन झलक का बाप कितना गलीज है. झलक का बाप इतना गिरा हुआ था कि तब भी झलक ने अपनी सोच मैली न होने दी. ऐसे बाप की इतनी समझदार औलाद थी झलक. इतना नीच और नशेड़ी कि हर किसी से रुपए उधार मांगता फिरता था. शरमलाज तो जैसे सब बेच कर खाई थी उस जानवर ने. कितनी जगह से कर्ज ले रखा था. सब से ज्यादा तो लिया था उस डोलम होटल वाले से.

डोलम होटल वाले का एक भाई था. उस ने झलक से शादी की जिद कर ली थी. डोलम होटल वाला तो ?ालक को जैसे कोई चीज समझ कर डील कर रहा था.

गरीब की बेटी सारे गांव की दिलरुबा झलक ने यह कड़वी हकीकत बहुत पहले ही निगल कर पचा ली थी, इसलिए उस को रत्तीभर भी फर्क नहीं पड़ता था. उस ने वैसे भी अपनी मनमरजी की छोटी सी जिंदगी 14 साल की उम्र से 19 साल की उम्र तक तबीयत से जी ली थी. अब 20 की उम्र में बाप के कर्ज के बदले बेटी बलिदान कर दी गई थी.

डोलम होटल वाले को लगता था कि मासूम और कोमल झलक उस के भाई की पत्नी बनने जा रही है, पर यह उस की नादानी ही थी.

दरअसल, रोशन और झलक पिछले कई महीने से एकदूजे के हो गए थे. एकदूसरे की बांहों में दोनों को सांस आती और फिर हर तरह के प्यार की प्यासी झलक तो रोशन को ही अपना सबकुछ मानती थी.

रोशन ही तो उस का मातापिता, सगा, बंधु, परिचित, रिश्तेदार था. पिछले साढ़े 5 साल से हर साल उस के साथ शादी की सालगिरह मनाती थी.

वे दोनों दुनिया के लिए भले ही कुंआरे थे, मगर उन दोनों को ही पता था कि वे एकदूजे के लिए पतिपत्नी थे. दोनों देर तक गोमती पुल के नीचे एक कोने में समोसा और जलेबी खाते हुए अपने होने वाले बेटाबेटी के नाम तय करते थे. नाटकनाटक में झगड़ा भी किया करते थे, ताकि पतिपत्नी जैसा अहसास कर सकें.

और आज वही झलक गोवा में किसी और के संग हनीमून मना कर मायके लौटी थी.

यह झलक भी गजब थी कि ‘रोशनरोशन’ करती हुई सीधा उसी से मिलने आ गई थी.

‘‘गोवा में तेरा यह सब सामान खूब बिकेगा. मैं ने देखा है वहां मछलीचावल खाते हुए. एक से बढ़ कर एक चीनी मिट्टी की प्लेट. तू तो लखनऊ से मुंबई जा और वहां से बस का किराया 520 रुपए. सीधा पणजी चला जा,’’ यही राय देने आई थी झलक.

रोशन का घर लखनऊ में था. उस के पिता चीनी मिट्टी के बरतन बनाते और बेचा करते थे. रोशन को भी इस काम में बहुत ही चाव था. वह महज 9 बरस की कच्ची उम्र में सब सीख गया था. चिकनी मिट्टी को गीला कर के कितना सुखाना है, उसे आकार देते समय कितना धीरज रखना है, कैसे पकाना है वगैरहवगैरह.

रोशन ने आगे पढ़ाई भी नहीं की. किसी तरह 10वीं कर पाया था. सबक याद ही नहीं होता था उस को.
‘‘जितनी देर में यह सबक याद होता है उतनी देर में तो मैं कितने बरतन बना लेता,’’ एक दिन रोशन ने अपने लंगोटिया यार पामू से कहा.

‘‘नहींनहीं रोशन, कभी भी जल्दी नहीं. इस मिट्टी में कोई राज होता है. इसे हौलेहौले सामने आने दिया करो,’’ पामू उसे प्यार से समझाया करता.

पामू का परिवार भी चीनी मिट्टी के बरतन बनाया करता था. पामू भी तो इस काम को कुछ अलग ही ढंग से सीखने की कोशिश करता था, मगर कभी कुछ का कुछ बना देता, फिर कहता कि यह कलाकृति है. इस के पीछे एक सोच है.

मगर पामू के मातापिता को वह कलाकृति किधर से भी समझ नहीं आती थी. उसे वह एक तरफ रख कर अपने और्डर को पूरा करने लगते. उन को कप और प्लेट के बहुतायत में और्डर मिला करते थे.

पामू को कप और प्लेट के सिवा सबकुछ बनाने का मन करता. कभी मीनार, कभी टोपी, कभी गुटका तो कभी मुड़ा हुआ सांप. उस का दिमाग कुछ और ही किया करता था. खैर, वे तो पुराने दिन हो गए थे.

अब झलक की उस हौसलाअफजाई के बाद रोशन की आज की तसवीर एकदम अलहदा है.

28 साल के रोशन को अब इस जगह का सबकुछ मालूम था. वह सब जानतासमझता था. जिस गैस्ट हाउस में वह रहता था, उधर भी सब से जानपहचान हो गई थी.

गैस्ट हाउस में उस को ‘रोशन दादा’ कहने वाले कितने ही नौजवान थे. ज्यादातर तो हिमाचल प्रदेश के थे. सीधेसरल पहाड़ी नौजवान. मेहनती और सच्चे. इन के भरोसे ही यहां के ज्यादातर होटल चल पा रहे थे.

अब रोशन एक अलग ही उमंग में भरा हुआ है. वह 2 दिन बाद कार्निवाल के लिए जाने वाला है. कार्निवाल
की तैयारी का आलम इधर गजब ही रहता है. कितने तरह के तो बैंड आते हैं. देशीविदेशी पर्यटक बैंड की धुन पर खूब झूमते और नाचते हैं.

रोशन को तो कितनी बार यह भी लगता है कि कार्निवाल के चलते ही यहां की रंगत है. मगर फिर कितनी बार उस को लगता है कि इस के इतने सारे रंगबिंरगे तट हैं. इस वजह से गोवा एकदम खास है और अलग है.

रोशन के सोचने या न सोचने से कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला था, मगर कैंडोलिम बीच पर कार्निवाल की धूम ने कुछेक सैलानियों को मस्ती के सागर में तैरा दिया था.

‘अरे… अरे…’ खुशी के मारे एकाएक रोशन की आंखें चौड़ी हो गईं. कार्निवाल में रोशन ने अचानक ही पामू को देखा.

‘‘पामू… पामू… ओ पामू… पहचाना?’’ रोशन चीख कर बोला.

‘‘ओह रोशन, मैं ने एक ही बार में पहचान लिया,’’ कह कर पामू बच्चों के जैसे खिलखिला उठा.

पामू इधर कुछ नया करने का सोच कर आया था, पर इतना भी नया कर न सका. रोशन जानता था कि उस का लंगोटिया यार पामू एक सच्चा कलाकार है. उस की मदद करनी चाहिए.

रोशन ने एक उपाय सोचा. उस की जेब में 10,000 रुपए थे. इस समय उसे बारबार झलक याद आ रही थी.

‘‘पामू, इस बार इधर कम सैलानी हैं. लेकिन फिक्र मत कर, तेरी कलाकृतियां यहां बिक जाएंगी. दिखाना तो कैसा सामान लाया है?’’ रोशन उत्सुक हो कर पूछने लगा.

पामू ने अपना बक्सा खोल कर दिखाया. रोशन ने गौर से देखा. कुछ काम तो कमाल का कर रखा था पामू ने. उस ने छोटेछोटे प्रतीक बना रखे थे.

‘‘ये किस सांचे में ढाल कर बनाए?’’ रोशन कुछ पेपरवेट देखने लगा.

‘‘नहींनहीं रोशन, कोई भी सांचा नहीं है. अपनी कल्पना से ढाला है इन को. मगर यह तो सब को समझ नहीं आता है न,’’ कह कर पामू किसी गहरी सोच में डूब गया था.

‘‘पामू, तू इतने दिन इधर कैसे रहा? जब कमाई नहीं तो फिर रोटीपानी कैसे किया सब?’’

‘‘वह सब हो गया था.’’

‘‘कैसे मगर?’’ रोशन ने पूछा.

‘‘वह बस्तरिया बाजार है न, उधर गिटार बजाते हैं लड़के. उन के लिए नाचता था मैं, तो रोज का 200 रुपए हो जाता था. खाना वे ही देते थे, बस सोने का किसी न किसी जगह इंतजाम हो जाता था,’’ पामू ने हंस कर कहा.

वह आगे बोला, ‘‘2 दिन पहले ही इधर आया हूं. इधर होटल में किराया कम है न,’’ मगर ऐसा उस ने अपनी मजबूरी और परेशानी छिपाने के लिए कहा था. उस का यह अंदाज पुराना था और यह तो रोशन ने खूब भांप ही लिया था.

‘‘पामू, अभी तो शुरुआत है. मगर यहां कभीकभार ऐसे टूरिस्ट मिल जाते हैं, जो कलाकार को मुंहमांगी रकम देते हैं,’’ रोशन बोला.

‘‘हांहां, ऐसा हुआ है न मेरे साथ. 2 बार हुआ है. मुझे रुपया भी दिया और सैंडविच भी खिलाया, इसलिए तो मुझे भरोसा है,’’ पामू अब भी उम्मीद का दामन छोड़ना नहीं चाहता था.

‘‘कल मिलते हैं,’’ कह कर रोशन ने पामू से विदा ली.

रोशन झलक से फोन पर बात करता हुआ चला जा रहा था. ?ालक के ब्याह को अब 4 साल से भी ऊपर हो चले थे, इसलिए झलक अब एकदम बिंदास रहती थी. बच्चे उस ने पैदा किए नहीं. अपने तरीके से दिल से जिंदगी जीने लगी थी झलक.

रोशन ने बातों ही बातों में झलक को पामू की दशा का भी सच्चा हाल बयान कर दिया था. झलक ने इस बात को काफी गंभीरता से सुना.

झलक के साथ एक कमाल की बात हो गई थी. वह अब अपनी जिंदगी को खेल सम?ाने लगी थी. इसी खेलखेल में एक दिन झलक लौटरी के 50 टिकट खरीद कर ले आई. हर टिकट 500 रुपए का था. मगर कमाल की बात यह हुई कि 5 लाख का नकद इनाम झलक के नाम खुल गया. झलक की महिमा ही बढ़ गई.

मगर झलक भी ऐसी मजेदार कि उस ने एक रुपया तक न रखा. तथाकथित पति को ही सारे नोट थमा दिए. बस, उस घटना के बाद तो जैसे जादू ही हो गया था. अब ससुराल में झलक को कोई न रोकता था, न टोकता था.

झलक भी कोई बावली न थी कि पागलपंथी ही करने लगे. आचरण तो उस का संतुलित ही था, मगर अब वह अपने तरीके से बड़े फैसले लेने लग गई थी.

मिसाल के तौर पर झलक का देवर अपनी गर्लफ्रैंड को काठमांडू घुमाने ले जाना चाहता था. झलक ने उस की इस इच्छा का मान रखा. उस के पास पूरे 20 रुपए न थे, तो झलक ने उसे 20,000 रुपए दिए.

देवर झलक का मुरीद बन गया था. बात बाद में खुल गई थी. सारे परिवार को भी पता चल गया, मगर झलक पर किसी ने उंगली तक न उठाई. उस की पहली वजह यह कि झलक ने जो किया अपने परिवार के लिए किया. दूसरी और जोरदार वजह यह कि उसी गर्लफ्रैंड से देवर की सगाई और शादी भी हो गई थी.

अब देवरदेवरानी झलक की मुट्ठी में बंद थे, मगर झलक ने अपनी मुट्ठी कभी कस कर रखी ही नहीं.

इस बार रोशन की बात का मतलब महसूस कर झलक ने अपने तेज और बल का इस्तेमाल कर लिया. एक ही घंटे की चर्चा में देवरदेवरानी ने हां भर दी. गोवा जा कर और वहां का मुआयना कर के एक छोटा होटल खोलने की इच्छा बन गई उन की.

उसी रात को तीनों रवाना हो गए. झलक और देवरानी पीछे बैठे. आगे की सीट पर कार ड्राइवर और देवर. कार ड्राइवर भी इतना होशियार था कि उस ने तय समय से 4 घंटे पहले गोवा पहुंचा दिया.

कार्निवाल की धूम से सारा गोवा जवांजवां था. झलक अपने हनीमून के बाद अब आई थी, मगर कैंडोलिम
तो उस ने आज ही देखा था. रोशन से मुलाकात हो गई. खूब गपशप हुई.

इस दफा रोशन को यह वाली झलक कुछ अलगअलग सी लगी. मगर रोशन कुछ ही देर में सामान्य भी हो गया था, क्योंकि अब वह खुद भी पहले वाला रोशन तो था नहीं.

24 घंटे बाद देवरदेवरानी ने रोशन की मदद से कुछेक जगह बातचीत कर ली थी. एक बनाबनाया होटल मिल रहा था. थोड़ी मरम्मत की दर कार थी. उस की जिम्मेदारी रोशन ने उठा ली थी.

धीरेधीरे होटल की सजावट के लिए पामू को और्डर मिल गया था. पामू को तो जैसे मनचाही मुराद मिली, बिन मांगे मोती मिले.

रोशन ने पामू को ठीक से समझा दिया था. उस के लिए रहने और खाने का मुफ्त इंतजाम हो गया था. इस के अलावा टीम लगा कर कलाकृति बनाने का अलग से एडवांस मिल रहा था. इस तरह अब एक साल तक पामू को इधर ही काम करना था.

झलक ने पामू की जीवन नैया भी डगमग होने से बचा ली थी. इस डील को पक्का कर के यह तीनों अब लौट रहे थे. रोशन ने हाथ हिला कर वापस जाती झलक के चेहरे को गौर से देखा था.

रोशन को लगा जैसे उस की जन्मजन्मांतर की पत्नी झलक उस से कह रही है, ‘रोशन, तुम मुझे भी लौटा कर ले चलो. चलो, हम गोमती के पुल के नीचे बैठ कर समोसाजलेबी खाएं. अपनी वहीं बातें करें.’

रोशन का हिलता हुआ हाथ एकाएक रुक गया. उस के कान में झनझनाहट सी हुई. लगा, जैसे उस से कोई फुसफुसा कर कह रहा था. इस झलक ने रोशन की जिंदगी संवारने और अपनी बरबाद करने के लिए यह जन्म लिया है. Hindi Family Story

Hindi Funny Story: हनीमून की सनक

Hindi Funny Story: पिछले हफ्ते सब से छोटे बेटे की शादी ईएमआई पर निबटाते ही इधर मेरे मन में गंगा स्नान की भावना कुलांचें मारने लगी, तो उधर मेरी बीवी के मन में हनीमून पर जाने की.

सब से छोटे बेटे की शादी कर के लगा ज्यों गंगू तेली ने गृहस्थी का रण नहीं, बल्कि महारण जीत लिया हो. मैं अपने को सिकंदर से महान फील कर रहा था. हर शादीशुदा अपने घर में बच्चा पैदा होने पर उतना खुश नहीं होता जितना खुश वह उस का ब्याह हो जाने पर होता है.

बच्चों की शादियों से निबटीं तो एक दोपहर अचानक बीवी ने मेरे दिमाग पर भिनभिनाते हुए कहा, ‘‘सुनो जी…’’

‘‘अब क्या है?’’ मैं ने मिमियाते हुए पूछा तो वे बोलीं, ‘‘हे पतित देव, इस गृहस्थी में कदमकदम पर हम जहन्नुम तक गए, पर आज तक हनीमून पर नहीं गए. हनीमून में हुए बलिदानी कहते हैं कि शादी के बाद हनीमून पर गए बिना स्वर्ग नहीं जाया जाता.

‘‘बीतिकाल के कवि बीमारी लाल भी कह गए हैं कि हनीमून स्वर्ग का मारग है, जहां सयानप चालाकी सब सही. तहां झूठे चलै संग एक्स फ्रैंड के, जग जो कहै अब सो कही.’’

‘‘मतलब?’’ मैं दोबारा मिमियाया.

‘‘मतलब यह कि स्वर्ग का रास्ता हनीमून से हो कर जाता है. गृहस्थी में रहते बहुत नरक भोग लिया, अब…’’

अपनी पीठ पर पत्नी का सिर ढोते उस के मुख से ज्यों ही जहर से भी जहर वचन सुने तो मैं तो मैं, मेरी रूह तक कांप उठी. लगा, ज्यों उस में उस समय सोनम की आत्मा प्रवेश कर गई हो.

पर मैं राजा नहीं हूं भाई साहब… माना, मैं ने कदमकदम पर उस की हर इच्छा का खून किया है, ऐसे में अब कहीं इस ने किसी को मेरे नाम की सुपारी दे कर मेरा फाइनल खून कराने की तो नहीं सोची होगी? पर फिर सोचा कि अपनी मैरिज लव मैरिज तो है नहीं.

वैसे अंदर की बात कहूं सज्जनो, आजकल भाई लोगों से उतना डर नहीं लगता जितना डर नएनए तो छोडि़ए, 50 साल पुराने मुझ जैसे पतिपत्नियों को भी एकदूसरे से लग रहा है.

आह, क्या हनीमून जमाना आ गया भाई साहब. नहीं कहीं हनी, न कहीं मून. बस जिधर देखो, उधर खून ही खून.

मतलब, मेरा इधर का काम खत्म तो अब उधर का काम भी खत्म? आह रे गृहस्थी, तेरी यही कहानी. जिम्मेदारियां खत्म तो आत्मा हनीमूनयानी. लगता है, गृहस्थी की चक्की में पिसते मर्द की जरूरत परिवार को तभी तक रहती है जब तक उस के कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ रहता है. जैसे ही जिम्मेदारियां खत्म, वह काम का न काज का दुश्मन अनाज का.

आखिर मैं ने अपने को गुप्त हौसला देते हुए उसे समझा कर कहा, ‘‘देखो बेगम, जो अरेंज्ड मैरिज करते हैं, वे हनीमून पर नहीं जाया करते. वे हर शाम अपने से भी अपना मुंह छिपाते गलीसड़ी सब्जियां लाने सब्जी मंडी जाया करते हैं.

‘‘हनीमून जाने की तो छोड़ो, हम तो अब श्मशान घाट जाने लायक भी नहीं. अरेंज्ड मैरिज वालों के लिए हनीमून पर जाना पाप नहीं, महापाप होता है.

‘‘अरेंज्ड मैरिज वाले जो हनीमून पर जाते हैं तो वे मरने से पहले ही नरक को जाते हैं. हनीमून पर लव मैरिज करने वाले जाया करते हैं.

‘‘हनीमून पर जाना लव मैरिज वालों को ही शोभा देता है. हनीमून पर लव मैरिज करने वालों का ही एकाधिकार है. अरेंज्ड मैरिज करने वालों को ऐसी छिछोरी हरकत शोभा नहीं देती है.’’

हे मेरे समय के घोड़ी की लात खाने वाले अरेंज्ड विवाहितो, पता नहीं मैं कितना उन दिनों का बचाखुचा अरेंज्ड मैरिड खुशनसीब हूं जिन दिनों की शादियों में न फोटोग्राफर कदमकदम पर वरवधू को फेरे लगाने से रोका करता था और न ही शादी के तुरंत बाद हनीमून पर जाने के बाद मरवाए जाने की परंपरा थी.

उन दिनों शादी के तुरंत बाद हर शादीशुदा अपनी बीवी को दिल में लिए चार पैसे कमाने चुपचाप शहर चला जाया करता था और बीवी घर में बारहमासे गा कर पति की कमी को पूरा किया करती थी.

वैसे अब काबिलेगौर है यह कि मेरी जायज हरकत पर हरपल सोशल मीडिया के टच में रहने वाली मेरी परमादणीय बीवी अब मुझे हनीमून पर जाने के लिए उकसाने हेतु अगला क्या तीर चलाती है?

वैसे किसी भी वर्ग के परिवार की जिम्मेदारियां दुनियाभर के झूठ बोल, इधरउधर ठगी करने के बाद शायद ही कोई बाप होगा, जो स्वर्ग जाना नहीं चाहता होगा. Hindi Funny Story

Hindi Story: दूसरा मौका

Hindi Story: सदैव की प्रेमिका शीरी उस से उम्र में बड़ी थी और निचली जाति की भी. बड़ी मुश्किलों से उन की शादी हुई, पर ससुराल में शीरी को ज्यादा इज्जत नहीं मिली. बाद में वह औफिस में भी तरक्की करती गई, तो सदैव को यह बाद खटकने लगी. उस ने एक प्लान के तहत शीरी से शादी की थी. क्या था वह प्लान?

लखनऊ शहर के बाहरी छोर पर बना हुआ यह एक ओपन एयर रैस्टोरैंट था. ओपन एयर यानी सबकुछ खुला हुआ, यहां तक कि किचन में बनने वाली डिश को भी ग्राहक अपनी आंखों के सामने देख सकता था.

रैस्टोरैंट के बीच में अमलतास का एक पेड़ था, जिस के पीले रंग के फूल अपनी छठा बिखेर रहे थे. इस पेड़ के चारों तरफ कुरसियों और टेबलों को सजाया गया था और किनारे की क्यारियों में देशीविदेशी फूल लगे हुए थे.

एक किनारे पर आर्टिफिशियल झरना बना हुआ था, जिस से गिरता हुआ पानी आंखों को सुकून देता था. कभीकभी जब हवा का झौंका आता तो मिलेजुले फूलों की खुशबू फैल जाती. तब यहां बैठे प्रेमी जोड़ों का मन और भी रूमानी हो उठता था.

सदैव और शीरी ने किनारे वाली टेबल चुनी थी और दोनों अपने लिए मनपसंद चीजों का और्डर भी दे चुके थे. उन के यहां आने का मकसद सिर्फ टेस्टी खाना ही नहीं था, बल्कि अपने भविष्य के बारे में संजीदा बातें भी करना था.

सदैव और शीरी दोनों एक ही न्यूज चैनल ‘खबर तक’ में काम करते थे. सदैव एसोसिएट प्रोड्यूसर था, जबकि शीरी न्यूज रिपोर्टर थी.

साथ काम करतेकरते कब दोनों को एकदूसरे से प्यार हो गया पता ही नहीं चला और दोनों एकदूसरे के प्यार को 4 साल तक ईमानदारी की कसौटी पर जांचतेपरखते रहे और फिर जब दोनों ने समझ लिया कि उन के प्यार का रंग पक्का है, जिस पर पानी की कोई बौछार कोई असर नहीं डालेगी, तब उन दोनों ने शादी के बंधन में बंध जाने का फैसला कर लिया.

पर सदैव और शीरी के लिए शादी की राह इतनी आसान नहीं हो जाने वाली थी. सदैव अभी 25 साल का था और शीरी 27 साल की. उन दोनों का अलगअलग जाति से होना भी समस्या था, क्योंकि सदैव ब्राह्मण कुल से था, जबकि शीरी लोहार जाति की थी.

सदैव साधारण मिडिल क्लास परिवार का था. उस के परिवार वालों ने सदैव को पढ़ाने के लिए बैंक से
लोन लिया था, जिसे वे कई सालों तक चुकाते रहे थे, दूसरी तरफ शीरी मिर्जापुर के एक अमीर परिवार से ताल्लुक रखती थी.

शीरी के पापा एक मेकैनिकल वर्कशौप चलाते थे और तकरीबन 15 लोगों का स्टाफ था उन की वर्कशौप पर और इसी के सामने उन का आलीशान मकान बना हुआ था.

सदैव और शीरी दोनों जानते थे कि दूसरी जाति में शादी करना अब भी उतना आसान नहीं है, पर शीरी बहुत आशावादी लड़की थी. उस का मानना था कि अच्छा सोचने से अच्छा होता है, जबकि सदैव पर नैगेटिव सोच हावी रहती थी, क्योंकि जिस परिवार से वह ताल्लुक रखता था, वह परिवार भी छोटी सोच से अभी तक ऊपर नहीं उठ पाया था.

हालांकि, शीरी और सदैव ने जब शादी करने का फैसला किया था उस के बाद से शीरी अकसर ही सदैव की मां से, सदैव के दोस्त की हैसियत से फोन पर बात किया करती और उन का हालचाल लिया करती थी.

सदैव की मां भी बड़े प्यार से शीरी से बातें करती थीं, पर तब तक ही जब तक उन्हें यह नहीं पता चला कि उन का बेटा शीरी से शादी करना चाहता है.

‘‘क्या, अब उस लोहारिन से शादी करेगा तू, हमारा धर्म नष्ट कराएगा तू… नीच जाति की लड़की को घर लाएगा,’’ बम फूट गया था जैसे सदैव के घर में और कई बार बेटे और मातापिता में शादी को ले कर तीखी बहस भी हुई.

मिर्जापुर में जब शीरी ने फोन पर अपने मांबाप को उस की उम्र से छोटे और एक ब्राह्मण लड़के से शादी करने की बात बताई थी, तो उसे भी नाराजगी और गुस्सा ही झेलना पड़ा था.

शीरी के मांबाप ने खूब खरीखोटी सुनाई. उन्हें लोहार जाति का होने पर कोई अफसोस नहीं था और इसीलिए वे लोग चाहते थे कि शीरी अपनी जाति वाले किसी लड़के से ही शादी करे, ब्राह्मण जाति का लड़का उन्हें बिलकुल लुभा नहीं रहा था.

पर शीरी अपने मन और सदैव के प्यार के आगे मजबूर थी, सो उस ने अपने घर में साफ कर दिया था कि सदैव के अलावा वह किसी और से शादी नहीं करेगी.

‘‘तो क्या तुम अपनी ब्राह्मण सास से अपने लिए ‘लोहारिन’ और ‘छोटी जाति’ जैसे शब्द सुन पाओगी?’’

शीरी की मां ने कहा तो शीरी ने बदले जमाने और नई सोच का हवाला देते हुए कहा, ‘‘आप लोग अपने मन से कहानियां मत बनाओ. जहां तक सदैव के घर वालों की बात है तो सदैव उन्हें मना लेगा, पर पहले आप लोग तो मान जाओ.’’

सदैव ने भी अपने घर में अल्टीमेटम दे दिया था कि अगर उस की शादी शीरी से नहीं होगी तो वह खुदकुशी कर लेगा. उस की बात सुन कर मांबाप दोनों सन्न रह गए थे और बेटे की इस बात ने उन्हें कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया था.

दोनों परिवार आपस में मिले. उन लोगों की मुलाकात के समय काफी तनाव का माहौल था, पर दोनों परिवार ही अपने बच्चों की जिद के आगे मजबूर थे, इसलिए तमाम जद्दोजेहद और उठापटक के बाद बड़े बेमन से दोनों तरफ से शादी के लिए हां तो कर दी गई.

लेकिन सदैव के मांबाप चाहते थे कि शादी के कार्ड पर लड़की के नाम के आगे ‘विश्वकर्मा’ की जगह ‘शर्मा’ लिखवा दिया जाता तो ठीक रहता, क्योंकि उत्तर प्रदेश के पश्चिमी इलाके में एक ब्राह्मण वर्ग शर्मा नामक सरनेम का इस्तेमाल करता है, जिस से ब्राह्मण परिवार की साख बनी रहती और रिश्तेदारी में लड़की के लोहार होने की बात दब जाती.

पर अपना सरनेम बदला जाना शीरी के मांबाप को कतई मंजूर नहीं हुआ और उन्होंने इस बात से साफ इनकार कर दिया.

इस बात पर सदैव ने भी नाराजगी जताई तो सदैव की शादीशुदा बहन रोमी ने बीच का रास्ता बताया कि वे लोग 2 तरह के कार्ड छपवाएं. एक पर ‘विश्वकर्मा’ सरनेम हो जो लड़की वालों का रियल सरनेम है, इसलिए वे कार्ड उन्हें दिखा दिए जाएं, जबकि जो कार्ड उन्हें अपनी रिश्तेदारी में बांटने हैं उस पर वे लोग ‘शर्मा’ सरनेम डलवा दें और इस कार्ड की भनक लड़की वालों को न दी जाए.

बहन की इस सलाह पर ही अमल किया गया और इसे बड़ी चालाकी से अंजाम दिया गया.

शादी के कर्मकांड में भी कई रुकावटें आईं, पर सदैव के पापा सब बातों को सुलझे दिमाग से संभालते गए और शीरी और सदैव की शादी हो गई.

सदैव और शीरी को शादी के बाद सदैव के पुश्तैनी घर यानी मनमीत नगर जाना था जो नोएडा से तकरीबन 550 किलोमीटर की दूरी पर तराई इलाके में बसा हुआ था.

शीरी ने कार में बैठेबैठे ही सदैव के मकान पर नजर डाली जो एक छोटा सा साधारण मकान था. अंदर जा कर देखने पर भी घर और घर के लोग सामान्य से ही लगे, पर इस से शीरी को रत्तीभर भी फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि उसे तो कुछ दिन यहां रुकने के बाद वापस नोएडा अपने 3 बीएचके के फ्लैट में ही जाना था, जिसे सदैव ने किराए पर ले रखा है.

पहलेपहल ही शीरी का स्वागत अच्छा नहीं हुआ. उस को लंबा घूंघट न करने के लिए डांट पड़ी और किचन में घुसने को मना कर दिया गया, जबकि शीरी पहले से ही इन सब बातों के लिए तैयार थी.

शीरी किसी आदर्श बहू की तरह रोज सुबह 5 बजे जाग जाती और घर का झाड़ूपोंछा करने के बाद नहाती, फिर नाश्ते की तैयारी करने लगती, जबकि घर के सभी लोग तब तक सोते ही रहते. सास के जागने के बाद वह उन्हें रात की भीगी हुई मेथी का पानी देती और ससुर को अंकुरित स्प्राउट, जबकि देवर का नाश्ता रोज बदल कर देने का फरमान था सास का, सो देवर के लिए रोज इंटरनैट से देख कर नया नाश्ता बना देती.

‘‘ये चावल किस ने पकाए हैं? जरूर शीरी भाभी ने पकाए होंगे,’’ किचन में ननद की आवाज गूंज रही थी.
पर शीरी ने बिना सब्र खोए कहा, ‘‘दीदी, अगर आप को दूसरे चावल खाने हैं, तो मैं दोबारा पका देती हूं.’’

इस बात के बदले में ननद से कुछ न बोला गया. वह किचन से बाहर पैर पटकती चली गई.

जब तक शीरी अपनी ससुराल में रही, तब तक कोई ऐसा दिन नहीं गया होगा कि उस के काम में कोई कमी नहीं निकाली गई हो.

पर फिर भी शीरी अपनी जबान को दांतों तले दबाए रही और किसी के खिलाफ कुछ भी नहीं कहा.

आज शीरी और सदैव को नोएडा अपने काम पर लौटना था, इसलिए शीरी किसी विजेता की तरह नोएडा वापस आ रही थी. दोनों ने वापस आ कर औफिस जौइन कर लिया था.

अपनी शादी से पहले शीरी ने कश्मीर में हुए एक आतंकी हमले के दौरान तमाम खतरों के बीच जा कर बहुत शानदार रिपोर्टिंग की थी. आज काम पर लौटते ही उस के क्रिएटिव हैड ने अपने केबिन में बुला कर उसे शादी की बधाई देने के बाद शाबाशी दी और साथ ही उस की बेहतर और बेबाक रिपोर्टिंग के लिए उसे ‘न्यूज स्टार’ नामक अवार्ड मिलने की बधाई भी दी.

शीरी ने तुरंत ही यह बात बताने के लिए सदैव को फोन लगाया तो उस ने फोन काट दिया. उस की किसी गलती पर बौस ने उसे डांटा था. शाम को भी वह अनमना सा था.

‘‘यह सब होता रहता है,’’ शीरी ने कहा तो सदैव को बुरा लग गया.

‘‘तुम्हें तो अवार्ड दिया जा रहा है, इसलिए तुम खुश हो,’’ सदैव ने झंझलाते हुए कहा.

सदैव का यह रूप देख कर शीरी ने शांत हो जाना ही ठीक समझा. अगले 2-3 दिन तक घर का माहौल काफी बोझिल सा रहा.

अगले दिन सदैव ने शीरी से अपनी मंशा जाहिर कर दी कि उन के फ्लैट का किराया बहुत ज्यादा जाता है, तो क्यों न वे कोई फ्लैट खरीद लें. शीरी को इस में कोई बुराई नहीं नजर आई.

सदैव और शीरी ने अपने अपार्टमैंट्स से कुछ दूरी पर बने ‘शालीमार अपार्टमैंट्स’ में एक फ्लैट बुक कर दिया और 50 फीसदी रकम का भुगतान कर के बाकी पैसों की मासिक किस्त बनवा ली. शीरी ने अपनी सैलेरी से ईएमआई का पेमेंट करना स्वीकार कर लिया था.

कुछ दिनों के बाद ही शीरी ने अंबेडकरनगर में जा कर गरीब बच्चों के दुखदर्द को सामने लाने के लिए रिपोर्टिंग की, जिस की खूब तारीफ हुई और अब स्टाफ के लोगों को लगने लगा था कि हो न हो बहुत जल्दी ही शीरी को उस के लगातार अच्छे काम के लिए प्रमोशन दिया जाएगा.

और हुआ भी वही, शीरी को प्रमोट कर दिया गया, जबकि सदैव का साधारण सा इन्क्रीमेंट ही किया गया.
शाम को जब सदैव घर आया तो चाय पीते समय काफी गुस्से में लग रहा था और बौस और मैनेजमैंट के भेदभाव वाले रवैए के बारे में अनापशनाप बोल रहा था.

कहीं न कहीं सदैव के मुंह से यह बात भी निकल गई कि शीरी का अवार्ड और प्रमोशन उस के लड़की होने के चलते है, क्योंकि लड़कियों के लिए बहुत सारी चीजें पाना आसान हो जाता है. बौस लोग लड़कियों को पसंद करते हैं और उन्हें आगे बढ़ाने से उन का भी उल्लू सीधा होता है.

‘‘उल्लू सीधा होने से क्या मतलब है सदैव? तुम भी मेहनत करो तो तुम भी आगे बढ़ सकोगे,’’ शीरी का सब्र जवाब दे रहा था, इसलिए उस ने सवाल किया.

‘‘अरे, यह बात तुम अच्छी तरह समझती हो. अब भला उस अंबेडकरनगर वाली रिपोर्टिंग में तो ऐसी कोई खास बात नहीं थी, जिस के लिए वाहवाही की जाए.

‘‘पर आजकल तो दलित जाति के लिए दो हमदर्दी भरे शब्द बोल कर कोई भी लाइमलाइट में आ सकता है,’’ सदैव गुस्से में बक रहा था.

कितना जहर भरा था सदैव के मन और उस की बातों में, यह शीरी को अब धीरेधीरे पता चल रहा था, पर उस के पास सदैव के इस बरताव पर सिर्फ अवाक और दुखी होने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था.

4 महीने बीत चुके थे और इन्हीं खट्टीमीठी बातों के बीच शीरी को पता चला कि वह पेट से है. तुरंत ही उस ने यह खबर सदैव को सुनाई.

बाप बनने की खबर सुन कर सदैव भी खुशी से फूला नहीं समाया और शीरी ने जल्द ही अपनी मां को फोन लगा कर यह खुशखबरी सुना दी.

मां ने ढेर सारी सावधानियां रखने की ताकीद करनी शुरू कर दी, जबकि अभी तो शीरी का पेट से होना शुरुआती दौर में था.

7 महीने हो गए और अब शीरी को औफिस से मैटरनिटी लीव ले कर घर पर ही रहना था.

एक दिन शीरी ने कहा, ‘‘सासू मां यहां आ जातीं, तो ठीक रहता.’’

इस बात पर सदैव ने भी रजामंदी जताई और अपनी मां को नोएडा आ कर रहने को कहा, पर उसे अपनी मां की तरफ से कड़वे शब्द ही सुनने को मिले, ‘‘तो तू क्या चाहता है कि अब मैं आ कर तेरी बीवी की सेवा करूं और जब उस का बच्चा हो तो नौकरानी की तरह काम करूं?’’

सदैव समझ गया था कि उस की मां नोएडा नहीं आएंगी, इसलिए उस ने शीरी से मिर्जापुर से अपनी मां को ही बुला लेने को कहा.

शीरी ने अपनी मां को बुला लिया और उस की मां ने आते ही किचन और शीरी की देखभाल का जिम्मा संभाल लिया.

समय आने पर शीरी ने एक खूबसूरत सी बेटी को जन्म दिया. सदैव बहुत खुश हुआ, पर उस की मां और पापा की तरफ से कड़वे शब्द ही आए कि ‘एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा. ऊंचे कुल की लड़की से शादी करता तो लड़का पैदा होता. इस ने तो लड़की पैदा कर के रख दी है. और करो नीची जाति की लड़की से शादी’.

सदैव को अपने मांबाप से ऐसी उम्मीद तो नहीं थी, पर अब तो शीरी से शादी कर के वह भी जैसे परेशान ही हो रहा था.

औफिस में शीरी का बढ़ता हुआ कद और फिर लड़की पैदा होने पर अपने घर वालों द्वारा कोसे जाने से तो सदैव परेशान था ही कि इसी समय एक घटना और हो गई.

शीरी के चचेरे भाई हर्ष का उस की पत्नी से घरेलू विवाद के चलते तलाक हो गया, जिस के चलते शीरी परेशान थी, तो सदैव ने कहा, ‘‘तलाक के मामले हम लोगों में बहुत कम होते हैं, जबकि तुम लोगों में तो बातबात में तलाक हो जाता है.’’

सदैव की इस बात पर शीरी ने एतराज जताते हुए ‘हम लोग’ और ‘तुम लोग’ जैसे शब्दों का मतलब पूछा, जिस पर सदैव ने ‘हम लोग’ का मतलब ऊंची जाति और ‘तुम लोग’ का मतलब नीची जाति बताया.

शीरी को सम?ा में आ रहा था कि सदैव भले ही अच्छी नौकरी कर रहा था, देखने में भी अच्छा था, पर उस की सोच बहुत छोटी थी और वह उस सोच से ऊपर भी नहीं बढ़ पा रहा था.

न जाने कितनी बार शीरी ने सदैव से कहा कि अगर उसे औफिस में तरक्की नहीं मिल पा रही है, तो उसे किसी दूसरे चैनल में नौकरी करनी चाहिए, पर सदैव तो जहां था वहीं पड़े रहना चाहता था, उलटे शीरी की ये बातें उसे बुरी लग जाती थीं, तो वह उस से सीधे मुंह बात नहीं करता था.

2 दिन बाद शीरी का बर्थडे था. शीरी बहुत खुश थी, पर सदैव के चेहरे पर खुशी का कोई नामोनिशान नहीं था. हालांकि, उस ने बेमन से शीरी को विश जरूर किया और औफिस के लिए निकल गया.

शाम को सदैव जल्दी नहीं आया तो पूछने पर उस ने बताया कि वह औफिस में बिजी है. सदैव रात के 10 बजे घर आया. उस ने शराब पी हुई थी. वह सीधा अपने कमरे में चला गया. उस के इस बरताव पर शीरी का सब्र जवाब दे गया था.

शीरी ने सदैव से बात शुरू की, ‘‘मैं ने तो अपनी जाति और अपनी उम्र नहीं छिपाई थी. तुम्हारे परिवार से जो भी दर्द मिला, वह भी मैं ने सब हंस कर सहा, पर शादी के बाद तुम्हारे बरताव और प्यार में जमीनआसमान का फर्क क्यों आया?’’

शीरी आज सबकुछ साफ कर लेना चाहती थी. सदैव ने भी लड़खड़ाती जबान में उसे जवाब दिया, ‘‘दरअसल, तुम से शादी करना मेरा एक कैलकुलेशन था.

‘‘कैसा कैलकुलेशन?’’ शीरी ने पूछा, जिस के बदले में सदैव ने जो बताया उसे सुन कर शीरी चौंक गई थी.

सदैव ने नशे की झांक में शीरी को बताया कि उस ने शीरी से शादी सिर्फ इसलिए की है, क्योंकि आमतौर पर उस जैसी अमीर लड़की से उस की शादी नहीं हो पाती, वह नोएडा में कभी अपना फ्लैट नहीं खरीद पाता. मतलब, सदैव ने शीरी के परिवार के रुतबे और पैसे को देखते हुए सोचासमझा जाल बिछाया और शीरी से शादी की.

शीरी की समझ में आ रहा था कि उस ने सदैव से शादी कर के भारी भूल कर दी है. उस ने तो सदैव से प्यार किया था पर सदैव ने उसे अपना झूठा चेहरा ही दिखाया था.

लेकिन आज सदैव शराब के नशे में था, इसलिए न चाहते हुए भी उस की जबान चल रही थी, ‘‘और सच कहूं तो मुझे लगता है कि यह बच्चा मेरा नहीं है. मुझे तुम्हारे उस कलीग आशु पर शक है. आखिर वह भी तो छोटी जाति काही है.’’

सदैव ने यह बात कह कर एक हिचकी ली, पर उस के इन शब्दों ने मानो शीरी के कानों में पिघला सीसा उड़ेल दिया था. उसे लगा कि अपने गुस्से को संभालने में उस के शरीर का सारा जोर लगा जा रहा है.

शीरी के नथुने फड़कने लगे थे और पीछे खड़ी उस की मां की आंखों से आंसू लगातार बहे जा रहे थे.

‘‘मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. मुझ से तुम को समझने में भूल हो गई,’’ शीरी यह कहते हुए उठ खड़ी हुई थी.

अगली सुबह ही शीरी ने सदैव के खिलाफ घरेलू हिंसा और दिमागीतौर पर परेशान का केस दायर कर दिया और सदैव के पास तलाक के कागजात भिजवा दिए.

पहले तो सदैव ने इस बात को हलके में लिया, पर जब उसे लगातार कोर्ट के चक्कर लगाने पड़े और केस और वकीलों का खर्चा उठाना पड़ा, तो उस की जेब जवाब देने लगी. अभी तो उसे शीरी का खर्चा देना था और अपनी बेटी को हर महीने तय रकम भी देनी थी… और अब तो उस के हाथ से उस का फ्लैट भी निकल जाएगा.

सदैव ने शीरी से माफी मांग कर समझौता करना चाहा, पर शीरी अपने फैसले पर अडिग थी.

‘‘मैं ने तुम्हें समझने में पहली बार तो भूल कर दी थी, पर दूसरी बार भूल नहीं करूंगी. बड़ी मुश्किल से दूसरा मौका मिला है अपनी जिंदगी को संवारने का,’’ शीरी के चेहरे पर कठोर भाव थे.

शीरी ने ठीक मौके पर सदैव को पहचान लिया था, जिस ने प्रेम का जाल सिर्फ इसलिए फैलाया ताकि शीरी जैसी अमीर लड़की को अपनी पत्नी बना कर उस के पैसे पर ऐश कर सके.

जाति और ऊंचनीच के ढेर में पड़े हुए सदैव को तलाक दे कर शीरी ने खुद की जिंदगी को दूसरा मौका दिया था. Hindi Story

Story In Hindi: 2 नाव की सवारी

Story In Hindi: इम्तियाज की शादी शकीला से बड़ी धूमधाम से हुई थी. शकीला भी कोई ऐसेवैसे घर की लड़की नहीं थी, बल्कि एक अच्छे परिवार की पढ़ीलिखी लड़की थी. भले ही उस का रंग सांवला था, पर उस के चेहरे पर एक अजीब सी कशिश थी.

लंबे डीलडौल की और ऊंची उठी हुई छातियों की मलिका होने के साथसाथ शकीला की आवाज भी बड़ी मधुर थी. उस के काले घनेलंबे बालों का तो कहना ही क्या था.

बायोलौजी में बीएससी कर शकीला ट्यूशन पढ़ा कर अपना खर्च खुद उठाने के काबिल थी.

इम्तियाज मुंबई के सांताक्रूज इलाके में शकीला के साथ अकेला रहता था. दोनों में बहुत गहरा प्यार था. शकीला इम्तियाज पर जान छिड़कती थी, क्योंकि इम्तियाज भी शकीला के घर के कामों में काफी मदद करता था और उस की हर खुशी का खूब खयाल रखता था.

इम्तियाज एक सौफ्टवेयर इंजीनियर था, लेकिन खूबसूरत लड़की देख कर अकसर उस का दिल मचलने लगता था.

शकीला जब पेट हुई तो उस की अम्मी ने शकीला की देखभाल के लिए अपनी छोटी बेटी सानिया को उस के घर भेज दिया.

डिलीवरी होने में अभी एक हफ्ता बाकी था. सानिया ने पहले ही आ कर शकीला के घर की जिम्मेदारी अच्छी तरह संभाल ली थी और अपनी बहन शकीला को आराम देने में पूरी मदद करने लगी थी.

इम्तियाज ने जब शकीला की बहन सानिया को देखा तो उस का दिल मचलने लगा और वह उसे पाने के सपने संजोने लगा.

सानिया बला की खूबसूरत थी. एकदम गोरीचिट्टी, बड़ीबड़ी आंखें, गुलाबी होंठ, सुर्ख गाल और मदमस्त उठी हुई छातियां देख कर इम्तियाज तो उस का ऐसा दीवाना हुआ कि बस उसे पाने के लिए जुगत भिड़ाने लगा.

कुछ दिनों बाद शकीला ने आपरेशन के जरीए एक प्यारे से बेटे को जन्म दिया. इस वजह से शकीला को एक हफ्ते तक अस्पताल में भरती रहने को कहा गया.

इम्तियाज ने औफिस से छुट्टी ले ली और शकीला और बच्चे की अच्छी तरह देखभाल करने लगा.

2 दिन तक इम्तियाज ढंग से सो नहीं पाया, तो शकीला बोली, ‘‘आप आज रात घर पर जा कर आराम कर लो. वैसे भी सानिया घर में अकेली है.’’

इम्तियाज बोला, ‘‘ठीक है, मैं थोड़ा आराम कर के सवेरे जल्दी आ जाऊंगा. तुम अपना खयाल रखना.’’

देर रात घर पहुंच कर इम्तियाज ने डोरबैल बजाई तो सानिया नींद से उठती हुई दरवाजा खोलने आई.

सानिया ने जैसे ही दरवाजा खोला, उस की उभरी हुई छातियां देख कर इम्तियाज के मन में हलचल मचने लगी.

इम्तियाज सानिया से बोला, ‘‘मैं काफी थका हुआ हूं. थोड़ा आराम कर के मुझे सुबह 4 बजे जल्दी अस्पताल जाना है. अगर मेरी आंख नहीं खुली, तो मुझे 4 बजे उठा देना.’’

सानिया ने कहा, ‘‘ठीक है जीजाजी, आप आराम करो. मैं आप को 4 बजे उठा दूंगी,’’ और फिर वह ड्राइंगरूम में ही अपने बिस्तर पर लेट गई.

इम्तियाज बाथरूम जा कर फ्रैश होने लगा. जब वह बाथरूम से निकला, तो ड्राइंगरूम में सानिया को लेटे देख कर उस का मन डोलने लगा.

इम्तियाज काफी देर तक सानिया को यों ही निहारता रहा, फिर धीरे से उस के करीब जा कर उस ने सानिया के उभारों पर अपना हाथ रख दिया और उन्हें सहलाने लगा.

सानिया चौंक कर उठ गई और अपने जीजा से अलग होते हुए बोली, ‘‘यह आप क्या कर रहे हो…’’

इम्तियाज ने कहा, ‘‘कुछ नहीं. मै देख रहा हूं कि तुम्हारे इस संगमरमरी बदन को कुदरत ने बड़ी फुरसत से बनाया है. मैं इसे चूमना चाहता हूं. तुम्हारे इस दूधिया बदन से प्यार करना चाहता हूं.’’

सानिया बोली, ‘‘आप को शर्म नहीं आती जीजाजी… आप मेरी सगी बहन के शौहर हैं और आप उन्हें कैसे धोखा दे सकते हैं…’’

इम्तियाज ने कहा, ‘‘मैं शकीला को धोखा नहीं दे रहा हूं. मैं तो बस तुम्हारे साथ कुछ समय गुजारना चाहता हूं.’’

‘‘यह गलत है. आप मुझ से दूर हो जाओ. मैं अपनी बहन को धोखा नहीं दे सकती,’’ सानिया ने कहा.

‘‘पर मैं तो तुम दोनों को ही अपने साथ जिंदगीभर रखना चाहता हूं,’’ कहते हुए इम्तियाज ने सानिया के रसभरे गुलाबी होंठों को चूमना शुरू कर दिया.

सानिया इम्तियाज से अलग होने के लिए छटपटाने लगी कि तभी इम्तियाज ने उस के उभारों पर अपना हाथ फेरना शुरू कर दिया.

थोड़ी सी नानुकर के बाद सानिया सिसकियां भरने लगी. वह इम्तियाज को अपने ऊपर खींचने लगी, तो इम्तियाज को यह समझते देर न लगी कि सानिया गरम हो चुकी है.

इम्तियाज ने सानिया को अपनी बांहों में जकड़ लिया और उसे प्यार करने लगा. सानिया भी अब पूरा मजा लेने लगी. कुछ देर तक वे दोनों यों ही एकदूसरे के जिस्म से खेलते रहे, फिर चरमसुख पर पहुंच कर अलग हो गए.

सानिया मुसकराते हुए बोली, ‘‘जीजाजी, आप ने तो मुझे वह खुशी दी है, जिस की मैं ने कभी कल्पना भी नहीं की थी. अब मैं आप के बिना नहीं रह सकती. यह खुशी मुझे आप से बारबार चाहिए.’’

इम्तियाज बोला, ‘‘तुम फिक्र मत करो. तुम्हारा जब भी दिल करेगा, मैं तुम्हारे लिए हाजिर रहूंगा.’’

सानिया ने कहा, ‘‘पर जब कुछ दिनों के बाद मैं यहां से चली जाऊंगी, तब आप मुझे यह खुशी कैसे दोगे?’’

इम्तियाज बोला, ‘‘हम दोनों शादी कर लेंगे, क्योंकि मुझे तुम बहुत अच्छी लगती हो. मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता.’’

सानिया ने सवाल किया, ‘‘यह कैसे हो सकता है? मैं अपनी ही बहन का घर नहीं उजाड़ सकती.’’

इम्तियाज बोला, ‘‘तुम फिक्र मत करो. जब तक हम दोनों को शादी करने का मौका नहीं मिलता, हम यों ही एकदूसरे के जिस्म की जरूरत पूरी करते रहेंगे.’’

तभी 4 बज गए. इम्तियाज जल्दी से उठा और फ्रैश हो कर अस्पताल की तरफ भागा.

अस्पताल पहुंच कर इम्तियाज ने देखा कि शकीला गहरी नींद में सो रही थी. उस ने उस के माथे को चूमा तो उस की आंख खुल गई.

शकीला ने इम्तियाज का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘आ गए आप. मेरी वजह से आप को कितनी तकलीफ हो रही है. आप को बिलकुल भी आराम नहीं मिल रहा है. मैं कितनी खुशनसीब हूं, जो आप जैसा शौहर मुझे मिला.’’

इम्तियाज बोला, ‘‘खुशनसीब तो मैं हूं जो तुम्हारे जैसी मुहब्बत करने वाली बीवी मुझे मिली है और जिस ने मुझे बाप बनने का नसीब अता किया है. साथ ही, तुम मुझे दिलोजान से प्यार करती हो.’’

शकीला ने कहा, ‘‘आप भी बस कुछ भी बोल देते हो. आप खुद मुझे इतना प्यार देते हो, उस के सामने मेरा प्यार तो कुछ भी नहीं.’’

इस तरह इम्तियाज दो नाव की सवारी करने लगा. उसे जब भी मौका मिलता, वह सानिया के जिस्म के मजे लूटता.

फिर एक दिन ऐसा भी आया जब इम्तियाज की असलियत सब के सामने आ गई.

हुआ यों कि शकीला के घर आने के बाद काफी दिनों तक इम्तियाज को सानिया से मिलने का मौका नहीं मिला, तो एक रात जब शकीला गहरी नींद में सो गई तो इम्तियाज चुपके से उठा और सानिया के कमरे में चला गया.

सानिया पहले तो इम्तियाज को अपने कमरे में देख कर घबरा गई, पर जब इम्तियाज ने उसे अपनी बांहों में पकड़ कर चूमना शुरू किया, तो उस के भी सब्र का बांध टूट गया और उस ने अपनेआप को इम्तियाज के हवाले कर दिया.

इसी बीच अचानक शकीला की आंख खुल गई. आवाज सुन कर जब वह सानिया के कमरे में पहुंची तो इम्तियाज और सानिया का जिस्मानी खेल देख कर उस के होश उड़ गए.

शकीला ने चीख कर इम्तियाज को कहा, ‘‘तुम्हें शर्म नहीं आती… अपनी बीवी के होते हुए किसी दूसरी लड़की के साथ यह हरकत करते हुए… मैं तुम्हें एक शरीफ इनसान सम?ाती थी, पर तुम तो एकदम घटिया निकले.

‘‘मैं ने तुम पर आंख मूंद कर भरोसा किया और तुम ने मेरी ही छोटी बहन को अपने जाल में फंसा लिया.’’
इम्तियाज बोला, ‘‘मेरी बात तो सुनो मेरी जान.’’

शकीला ने कहा, ‘‘अब क्या रह गया सुनने को. मैं तो तुम्हारा चेहरा भी नहीं देखना चाहती. मुझे नफरत है ऐसे मर्दों से जो अपनी बीवी को धोखा देते हैं.’’

इम्तियाज बोला, ‘‘मैं तुम से भी प्यार करता हूं और सानिया से भी. मैं वादा करता हूं कि तुम दोनों का बहुत खयाल रखूंगा. मैं सानिया से भी निकाह कर के उसे अपने साथ रखूंगा. तुम मुझे सानिया दे दो, मैं तुम्हारे पैर चूमूंगा.’’

शकीला ने इम्तियाज के गाल पर एक जोरदार थप्पड़ रसीद करते हुए कहा, ‘‘बेशर्म इनसान, तुझे शर्म नहीं आती अपनी बीवी के सामने ही उस की छोटी बहन से निकाह करने को कहने की. तू ने ऐसा सोच भी कैसे लिया…

‘‘मैं जा रही हूं अपने बेटे को ले कर तुम्हारी जिंदगी से दूर. मैं इस पर तुम जैसे घटिया बाप का साया भी नहीं पड़ने देना चाहती.’’

डरीसहमी सानिया ने भी अपना सामान पैक किया और शकीला के साथ चलने को तैयार हो गई.

इम्तियाज अपने किए पर पछता रहा था, ‘‘मुझे माफ कर दो. मैं आइंदा ऐसा कोई काम नहीं करूंगा जिस से तुम्हारा दिल दुखे.’’

शकीला ने कहा, ‘‘मैं अब तुम्हें ऐसा मौका कभी नहीं दूंगी. मेरा तो दिल टूट चुका है तुम्हारी इस हरकत से. तुम ने क्या सोचा था कि एकसाथ दो नाव में सवारी कर के जिंदगी का मजा ले लोगे… यही हरकत अगर मैं करती तो तुम मुझे बदचलन कहते और दुनियाभर के इलजाम लगाते.

‘‘मैं उन औरतों में से नहीं हूं जो अपने शौहर के जुल्म को बरदाश्त करती है. मैं अगर इज्जत देना जानती हूं, तो सामने वाले से भी इज्जत ही चाहती हूं.

‘‘तुम्हें यह घमंड था कि दोनों बहनों से निकाह कर के उन के जिस्म से खेलते रहोगे और तुम्हें कोई रोकेगा भी नहीं. मैं आज के बाद तुम्हारी सूरत भी नहीं देखूंगी. तुम्हें तलाक का नोटिस मिल जाएगा. अब मैं तुम्हारे साथ एकपल भी नहीं रह सकती.’’

इस तरह शकीला ने इम्तियाज से तलाक ले लिया और जो थप्पड़ उस ने इम्तियाज के मुंह पर मारा, उस का असर इम्तियाज के दिल और जिंदगी पर भी एक गहरी छाप छोड़ गया.

इम्तियाज के दो नाव में सवारी करने के चक्कर में उस के हाथ से सानिया तो गई ही, उसे अपनी बीवी शकीला और बेटे से भी हाथ धोना पड़ा.

शकीला ने अपने शौहर को छोड़ कर यह साबित कर दिया कि औरत किसी से कम नहीं होती. हमें गर्व है शकीला जैसी औरतों पर. Story In Hindi

Family Story In Hindi: फर्क

Family Story In Hindi: गरीब झांझन की छोटी सी दुकान थी. एक वक्त ऐसा था जब अमीर जगदंबा बाबू ने उस की बहन की इज्जत लूट ली थी. पर अब वे लकवे के शिकार हो थे. उन का परिवार दानेदाने को मुहताज था. इसी बात का फायदा उठा कर झांझन ने उन की बेटी से अपनी बहन का बदला लेना चाहा. क्या उस की नीयत में खोट आ गया था?

जब बारिश और सर्द हवाओं ने जनवरी की ठंड का रंग और जमा दिया, तो गांव में सांझ ढले ही सन्नाटा होने लगा. लेकिन झांझन की दुकान काफी देर तक खुली रहती, क्योंकि जरूरतमंद गरीब लोग दिन में मजदूरी कर के आटा, दाल, चावल वगैरह खरीदने वहां पहुंच जाते थे.

झांझन की चांदी हो चली थी. वह भी मनमाने दाम पर चीजें बेच कर वक्त की नजाकत का फायदा उठाता.
धंधे में वह कतई बेमुरब्बत था, इसीलिए लोग कहते कि जगदंबा बाबू के घर एड़ी रगड़ कर भी इसे गरीबी के दुख का एहसास नहीं है. चार दिन से चार पैसे हो गए, तो गरीबों को ही खा जाने की नीयत हो गई.

मगर झांझन पर इस का कोई असर नहीं होता. हालांकि उस ने बिना पैसे की दुनिया देखी थी. वह दिनभर जगदंबा बाबू की भैंसें चराता था और एक गिलास मट्ठे के साथ 2 रोटियां खा कर उसे संतोष करना पड़ता था. तब इस दुकान और घर की जगह झोंपड़ी थी, पर चेहरे पर मस्ती थी.

भैंस चराने जाते समय कंधे पर रखी लाठी को झांझन राइफल से कम नहीं समझता था. यह काम वह कभी नहीं छोड़ता, अगर जगदंबा बाबू ने मजदूरी के लिए गई हुई उस की जवान बहन पर हाथ न डाल दिया होता और सबकुछ लुटा कर उस ने पिछवाड़े के पोखर में कूद कर अपनी जान न दे दी होती.

उस दिन के बाद लाख धमकाने, फुसलाने के बाद भी झांझन जगदंबा बाबू के घर काम पर नहीं गया.

जगदंबा बाबू का सर्वनाश देखना उस की जिंदगी की सब से बड़ी तमन्ना हो गई. वह गांव छोड़ कर पंजाब चला गया. मेहनतमजदूरी कर के कुछ रुपए जोड़े और गांव में लौट आया.

गांव आ कर जगदंबा बाबू के बारे में मालूम हुआ कि वे लकवे के शिकार हो कर चारपाई पर पड़े रहते हैं. उन से उठना, बोलना बिलकुल नहीं हो पाता. इस बात ने उसे तसल्ली दी.

दरअसल, जगदंबा बाबू ने जमींदारी जाने के बाद भी अपनी आदतें नहीं छोड़ीं और शराब व ऐयाशी में उन की सफेदी झड़ कर रह गई थी. ऊपर से 4-4 जवान बेटियां. 3 के ब्याहों में खेतीबारी उतनी ही रह गई, जितने से साधारण किसान पेट पाल सकता था.

बेटियों के बाद बेटे मधुकर की शादी में वे खास धूमधड़ाका तो नहीं कर पाए, मगर कर्ज में तकरीबन सारा खेत रेहन हो गया. जेवर वगैरह तो पहले ही साफ हो चुके थे.

मधुकर गांव में ही मजदूरी कर नहीं सकता था, इसलिए वह अंबाला चला गया. वहां से आए मनीऔर्डर से ही पूरे घर की गुजर होती थी.

दुकान बंद करते समय झांझन जगदंबा बाबू के घर की ओर देखता कि गरीबों की जानमाल व इज्जतआबरू पी जाने वाले जगदंबा बाबू कब तक मटियामेट होते हैं. उन के घर की दीवारों के गिरने का उसे बेसब्री से इंतजार था. वैसे तो वह उन्हें साफ ही कर देता, मगर मधुकर और दूसरे पट्टीदारों की कुछ दहशत अभी बाकी थी.

झांझन मन को समझा लेता कि अब तो जगदंबा बाबू खुद अपाहिज हैं, ऐसे को मारना बेकार है.

झांझन को हैरानी होती कि दानेदाने की मुहताजी झेलते दूसरे परिवारों की तरह इस दुष्ट का कोई बरतन तक उस के यहां गिरवी नहीं हुआ. ऐसा हो जाता, तो वह उसे औरों को शान से दिखादिखा कर जगदंबा बाबू को नीचा दिखा सकता.

यही वजह थी कि दुकानदारी निबट जाने के घंटाभर बाद ही वह दुकान बंद करता था, ताकि झूठी शान में बरबाद होने वाले जगदंबा बाबू के परिवार वाले शायद अकेले में ही कुछ गिरवी रख कर आटा वगैरह ले जाएं या फिर उधार ही मांगने आएं.

आखिर एक दिन जगदंबा बाबू की पत्नी सब ग्राहकों के चले जाने के बाद दुकान पर आईं. उन्हें आते देख कर झांझन को अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ. उस ने आंखें मलीं और जब यकीन हो गया कि वही हैं, तो नोट गिनने लग गया.

जगदंबा बाबू की पत्नी हसरत से नोटों को देखती रहीं कि इतने सारे नोट यह करमजला लिए बैठा है. नोटों की गरमी में ही तो उन्हें देख नहीं रहा.

जब देर तक झांझन ने उन की ओर निगाह नहीं डाली, तो बेइज्जत होने के बावजूद उन्हें बोलना पड़ा, ‘‘झांझन भैया, कुछ मेरी भी सुन लेते.’’

‘‘ओह, आप हैं भाभीजी… बताइए, क्या सौदा दूं?’’ झांझन ने चौंकने का नाटक किया.

‘‘सौदा तो आटा, दाल, तेल, चीनी सबकुछ चाहिए, मगर जेब में पैसे भी तो होने चाहिए,’’ उन्होंने लाचारी बयान की.

‘‘तो कोई जेवर, बरतन वगैरह ही लिए आतीं. दुकानदारी में तो सब काम हिसाब से चलता है,’’ वह उन के अंगअंग को घूरता हुआ बोला.

जगदंबा बाबू की पत्नी ने रुकरुक कर जो बात कही, उस का मतलब यह था कि घर में बेचने लायक और गिरवी रखने लायक कुछ भी नहीं बचा. 2 दिन से घर में चूल्हा नहीं जला और बच्चे भूख से मुरदा जैसे पड़े हैं. पोतापोती दोनों ही बुखार से तप रहे हैं, वरना वे आती ही नहीं.

उन के मुंह से बेबसी में निकल गया, ‘‘अब तो इस देह के सिवा कुछ भी नहीं बचा है.’’

‘‘भाभीजी, अब आप की देह में इतना कसाव नहीं बचा है. बहू या

सरोज को भेज देतीं, वे ही सामान ले जातीं,’’ झांझन की आंखों में शरारत चमक रही थी.

जगदंबा बाबू की पत्नी सबकुछ सुन कर और समझ कर भी होंठ दाब कर रह गईं. उन से कुछ कहा नहीं गया और धरती पर हाथ लगा कर उठने लगीं.

झांझन ने उन्हें 2 किलो आटा दे दिया और कहा, ‘‘आगे से जरूरत हो, तो आप कतई न आना.’’

जगदंबा बाबू की पत्नी के जाने के बाद झांझन सरोज के छरहरे बदन और मादक अंगों की कल्पना करता, कभी बहू के उस अनदेखे रूप की, जिस के लिए मधुकर अंबाला कमाने गया था. उस की अपनी पत्नी थी, बच्चे थे, मगर जगदंबा बाबू से बदले की भावना उसे कल्पना की इन गलियों में भटका रही थी. वैसे इधरउधर मुंह मारना उस की आदत भी नहीं थी.

जगदंबा बाबू की पत्नी ने उस रात खानेपीने के बाद अकेले में बहू को समझाया, ‘‘कल सब ग्राहकों के चले जाने के बाद तू झांझन की दुकान पर चली जाना… कोई जानेगा भी नहीं.’’

‘‘नहीं अम्मां, मैं इज्जत बेच कर जिंदा नहीं रहना चाहूंगी. ऐसा होने से पहले अपनी जान दे दूंगी,’’ बहू ने बिफर कर कहा.

‘‘तब इज्जत बनी रहेगी, जब तू भूख के मारे हमें बदनाम करेगी. लोग कहेंगे कि पेट की खातिर बहू ने जान दे दी. आखिर यह समय तो हमेशा बना नहीं रहेगा.

‘‘इस समय जान बचाने का सवाल है. तू कहे तो मैं झांझन को यहीं बुला दूंगी… न चोर जानेगा, न साह बताएगा.’’

‘‘चोर जाने या न जाने, मैं यह नहीं कर पाऊंगी. मुझे माफ करो और मायके भेज दो,’’ बहू सुबकने लगी.

‘‘मायके भेजने के लिए 400 रुपए होते, तो यह दिन क्यों देखना पड़ता. तू बैठी रह अपने हठ पर… मर जाने दे गोद के बच्चों को,’’ बड़बड़ाती हुई सास ने बहू को छोड़ बेटी से धीमेधीमे बात करनी शुरू कर दी.

अगले दिन ग्राहक छंट जाने पर कुत्तों से बचने को डंडा लिए हुए जगदंबा बाबू की पत्नी झांझन की दुकान पर आईं.

उन्हें देख कर झांझन के मुंह का जायका बिगड़ गया. दुकान में ताला लगाने की तैयारी कर के वह बोला, ‘‘आप फिर आ गईं?’’

‘‘मैं सौदा लेने नहीं आई हूं,’’ वे बोलीं.

‘‘फिर क्या करने आई हैं?’’ झांझन रुखाई से बोला.

‘‘तुम्हें बुलाने मेरी बेटी यहां आई और किसी ने देख लिया, तो कितनी जगहंसाई होगी.’’

‘‘अच्छा, ठीक है, यही सही. थोड़ा सामान तुम ले जाओ, बाकी मैं ले आऊंगा,’’ झांझन बागबाग था.

‘‘खाली सामान नहीं, 1,000 रुपए की भी जरूरत है. अगर तैयार हो तो बोलो?’’ कह कर वे जैसे चलने को तैयार थीं.

‘‘हां, तैयार हूं. मगर वहां मुझे आना कब है?’’ झांझन ने दिल कड़ा कर के पूछा.

‘‘तुम एक घंटे बाद आना. सरोज की कोठरी दरवाजे के बाएं ही है… दरवाजे खाली भिड़े होंगे,’’ कह कर आटा, दाल उठा कर वे इस तरह चलीं, जैसे रत्नों का ढेर लिए जा रही हों.

झांझन को खुशी के साथसाथ हैरानी भी हो रही थी कि इसी औरत को कभी आटा, दाल तो दूर, घी, दूध को देखने की भी फुरसत नहीं थी. नौकरचाकर जो चाहते, करते. अब यह भूख के लिए सबकुछ करने को तैयार है. अब उस का कलेजा ठंडा होगा, बहन का बदला ले कर.

झांझन ने 1,000 रुपए जेब में रखे और जगदंबा बाबू के घर की ओर कदम बढ़ा दिए.

झांझन जगदंबा बाबू के घर के सामने खड़ा था. सरोज के कमरे से उसे सिसकियों की आवाजें सुनाई दीं. जिस सरोज की अल्हड़ हंसी को ही वह पहचानता था, उस की सिसकियों ने उसे हिला कर रख दिया. उस की बहन की इज्जत से तो जगदंबा बाबू खेले थे, सरोज का क्या कुसूर था? सिर्फ यही न कि सरोज उन की बेटी है.

हो सकता है कि ऐसी ही किसी बेबसी का शिकार उस की बहन भी बनी हो. जब झांझन भी वही करेगा, जो जगदंबा बाबू ने किया, तो दोनों में फर्क ही क्या रह जाएगा.

इसी तरह ब्याह से पहले उस की बहन के अरमान कुचले गए थे. सरोज की भी अभी शादी नहीं हुई है. अगर उस ने भी मजबूरी में अपना सबकुछ सौंप कर परिवार को बचा कर बाद में उस की बहिन जैसा ही किया, तो झांझन की हालत भी क्या जगदंबा बाबू जैसी नहीं हो जाएगी?

झांझन सिहर उठा. उस ने धीरे से सरोज के कमरे का दरवाजा खोला.

सरोज ने सिसकते हुए कहा, ‘‘चले आओ.’’

‘‘नहीं, अपनी अम्मां को बुलाओ,’’ झांझन ने कहा.

‘‘अम्मां क्यों… तुम्हारा मतलब तो मुझ से है न,’’ सरोज ने आंसू पोंछते हुए कहा.

‘‘मैं ने कहा न, अम्मां को बुलाओ.’’

जगदंबा बाबू की पत्नी, जो दरवाजे के पास ही खड़ी थीं, पास आ कर बोलीं, ‘‘अब भी कुछ बाकी है झांझन ? अब तो तुम्हारे मन की हो रही है.’’

‘‘बहुतकुछ बाकी है अभी… मैं तो तुम्हें तौल रहा था. यह लो 1,000 रुपए… बुरे दिन तो आदमी पर आते ही रहते हैं, इन्हें हौसले से झेलना चाहिए और धनदौलत पा कर इनसानियत से नहीं खेलना चाहिए,’’ रुपयों की गड्डी जगदंबा बाबू की पत्नी को दे कर वह सीधे अपनी राह चल दिया.

दोनों मांबेटी हैरान हो कर उसे जाते देख रही थीं. Family Story In Hindi

Hindi Story: 911 – लव मैरिज क्यों बनीं जी का जंजाल

Hindi Story: रात के 2 बजे थे. हलकीहलकी ठंड पड़ रही थी. दशहरा और दिवाली की छुट्टियां खत्म हो गई थीं. धनबाद स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 2 पर बहुत भीड़ थी. इस में ज्यादातर विद्यार्थियों की भीड़ थी, जो त्योहार में दिल्ली से धनबाद आए थे. धनबाद, बोकारो और आसपास के बच्चे प्लस टू के बाद आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली पढ़ने जाते हैं. इस एरिया में अच्छे कालेज न होने से बच्चे अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए स्कूल के बाद दिल्ली जाना चाहते हैं. दिल्ली में कोचिंग की भी अच्छी सुविधा है. वहां वे इंजीनियरिंग, मैडिकल आदि की कोचिंग भी लेते हैं. कुछ तो टेंथ बोर्ड के बाद ही दिल्ली चले जाते हैं. वे वापस दिल्ली लौट रहे थे.

वे सभी कालका मेल के आने का इंतजार कर रहे थे. अनेकों के पास रिजर्वेशन नहीं था. वे वेटिंग टिकट ले कर किसी भी थ्री टियर में चढ़ने वाले थे. जिस के पास रिजर्वेशन होता, उसी की बर्थ पर 4 या 5 जने किसी तरह एडजस्ट कर दिल्ली पहुंचते. इस तरह के सफर की उन्हें आदत थी. अकसर सभी छुट्टियों के बाद यही नजारा होता. कुछ अमीरजादे तत्काल या एजेंट से ब्लैक में टिकट लेते, तो कुछ एसी कोच में जाते. पर ज्यादातर बच्चे थ्री टियर कोच में जाते थे और सब के लिए रिजर्वेशन मुमकिन नहीं था.

रात के 11 बज रहे थे. अभी भी ट्रेन आने में एक घंटा रह गया था. ट्रेन कुछ लेट थी. रोहित कंधों पर बैकपैक लिए चहलकदमी कर रहा था. उस की निगाहें किसी जानपहचान वाले को तलाश रही थीं, जिस के पास रिजर्व टिकट हो. उस की नजर मनोज पर पड़ी, तो उस ने पूछा, “तुम्हारी बर्थ है क्या?“

“नहीं यार, पर अपने महल्ले वाली सुनीता को जानता है न? S-7 कोच में उस का रिजर्वेशन है. वो देख… आ रही है अपने पापा के साथ.”

प्लेटफार्म पर वे बेटी के साथ खड़े थे. मनोज ने उन से कहा, “अंकल नमस्ते. आप वापस जा सकते हैं. हम लोग हैं न. सुनीता को कोई दिक्कत नहीं होने देंगे.”

तभी अनाउंस हुआ, “कालका मेल अपने निश्चित समय से 45 मिनट की देरी से चल रही है. यात्रियों की असुविधा के लिए हमें खेद है.”

सुनीता ने कहा, “हां पापा, आप जाइए. अभी हमारे पड़ोस की मनीषा भी आ रही होगी. उस की बर्थ भी हमारे ही कोच में है. और भी जानपहचान के फ्रैंड्स हैं. आप परेशान न हों. घर लौट जाइए. हम लोग मैनेज कर लेंगे.”

सुनीता के पापा लौट गए. थोड़ी देर में मनीषा भी आ गई. रोहित, मनोज, सुनीता और मनीषा चारों एक ही कालोनी में रहते थे, पर अलगअलग सैक्टर में. दोनों लड़के इंजीनियरिंग सेकंड ईयर में थे और लड़कियां ग्रेजुएशन कर रही थीं. इन में सुनीता ही सब से ज्यादा धनी परिवार से थी. रोहित और मनोज दोनों के पिता कोल इंडिया में क्लर्क थे. मनीषा के पिता कोल इंडिया में ही लेबर अफसर और सुनीता के पिता ठेकेदार थे. देश के अनेक भागों में कोयला भेजते थे.

रोहित बोला, “मेरे और मनोज के पास रिजर्व टिकट नहीं हैं. तुम लोग मदद करना. तुम दोनों एक बर्थ पर हो लेना और दूसरी बर्थ पर हम दोनों रहेंगे. अगर कोस्ट शेयर करना हुआ तो वो भी शेयर कर लेंगे.”

सुनीता ने कहा, “क्या बेवकूफों जैसी बात कर रहे हो? ऐसा क्या पहली बार हुआ है? इस के पहले भी तुम लोग हमारी बर्थ पर गए हो. क्या हम ने पैसा लिया है कभी? फिर ऐसी बात न करना. मगर, इस बार हम दोनों को लेडीज कोटे से बर्थ मिली है.“

मनीषा बोली, “हां, S-7 में बर्थ नंबर 1 से 8 तक लेडीज कोटा है. हम तो शेयर कर लेंगे, पर बाकी औरतों ने कहीं शोर मचाया तब क्या करोगे? “

मनोज बोला, “हम लोग पहले भी ये सिचुएशन झेल चुके हैं. इस को हम पर छोड़ दो, हैंडल कर लेंगे.”

ट्रेन आने पर सभी कोच में जा बैठे. लेडीज कोटे में एक बुजुर्ग महिला भी थी. उस ने कहा, “तुम दोनों लड़के यहां नहीं बैठ सकते हो.”

सुनीता ने कहा, “आंटी, आप तो इधर की ही लगती हैं. आप को पता होगा इस पीरियड में यहां से दिल्ली स्टूडेंट्स जाते हैं और इतनी भीड़ में हमें एडजस्ट करना पड़ता है.”

“अच्छा ठीक है, चुपचाप बैठो. तुम लोग न खुद सोते हो और न औरों को सोने देते हो.”

थोड़ी देर में टीटी आया. टिकट चेक करने के बाद उस ने लड़कों से कुछ कड़ी आवाज में कहा, “तुम लोग यहां नहीं बैठ सकते हो. एक तो वेटिंग की टिकट और ऊपर से लेडीज कोटा में आ बैठो हो. अगले स्टेशन गोमो में तुम लोग उतर जाना.”

मनोज बोला, “शायद आप हमें नहीं जानते. आप का बेटा भी अगले साल दिल्ली जाएगा पढ़ने. उस की ऐसी रैगिंग करूंगा कि वह रोते हुए वापस इसी ट्रेन से धनबाद आएगा. बाकी आप की मरजी.”

टीटी ने कहा, “तुम लोग तो गजब ही हो. जो चाहे करो, पर मैं तो मुगलसराय में उतर जाऊंगा. उस के बाद तुम जानो.”

“आगे भी हम देख लेंगे. पर, आप अपने रिलीवर को भी हमें तंग न करने को कह देते तो अच्छा होता.”

सुबह के 7 बजे ट्रेन मुगलसराय पहुंची. वहां ट्रेन कुछ देर रुकती है. रोहित और मनोज दोनों प्लेटफार्म पर उतर कर टी स्टाल पर सिगरेट पी रहे थे. उन्हें देख सुनीता और मनीषा भी उतर गईं. सुनीता ने मनीषा से कहा, “चल, 1-2 फूंक हम भी मार लेते हैं.”

दोनों उन के निकटआईं. सुनीता बोली, “क्या अकेलेअकेले पी रहे हो?“

“आओ, तुम भी पीओ,” मनोज ने कहा और चाय वाले से 2 कप चाय ले कर उन की ओर बढ़ा दिया.

सुनीता बोली, “और सिगरेट? “

मनोज ने अपना सिगरेट बढ़ाते हुए कहा, “लो, दो कश तुम भी ले लो. अगर मनीषा को भी चाहिए तो…?“

“नहीं, मुझे नहीं चाहिए” मनीषा बोली.

सुनीता ने कहा, “मैं शेयर नहीं करूंगी. मुझे अलग से नया सिगरेट दो.”

मनोज ने उसे सिगरेट जला कर दिया. दोतीन कश लेने के बाद सुनीता ने सिगरेट फेंक कर उसे सैंडल से बुझा दिया.

यह देख कर मनोज बोला, “तुम्हें पीते देख कर यह नहीं लगा कि तुम पहली बार पी रही हो. फिर तुम ने नाहक ही मेरा सिगरेट बरबाद कर दिया.”

“पैसे चाहिए सिगरेट के?“

“तुम से बहस करना बेकार है.”

खैर, सभी वापस ट्रेन में जा बैठे. रात के करीब 9 बजे ट्रेन दिल्ली पहुंची. चारों एक टैक्सी में बैठे. मनीषा और सुनीता को उन के होस्टल में छोड़ मनोज और रोहित अपने होस्टल पहुंचे. चारों एक ही शहर और कालोनी के रहने वाले थे, इसलिए छुट्टियों में ट्रेन में आनाजाना अकसर साथ होता था.

मनोज और रोहित के ब्रांच अलग थे. मनीषा और सुनीता के कॉम्बिनेशन एक ही थे, इसलिए उन में कुछ दोस्ती थी. सुनीता नेचर से ज्यादा फ्रैंक और डोमिनेटिंग थी. किसी से अनचाहा एनकाउंटर होने से या कोई मनीषा को तंग करता तो वह मनीषा को प्रोटेक्ट किया करती थी. मनीषा अंतर्मुखी थी.

इसी तरह ये चारों कभी ट्रेन में मिलते, तो कभी किसी मौल या मल्टीप्लेक्स में तो देर तक आपस में बातें करते.

मनोज और मनीषा के स्वभाव में अंतर था, फिर भी दोनों एकदूसरे के करीब आए.

रोहित और मनोज दोनों ने बीटैक पूरा किया और मनीषा और सुनीता ने पीजी. मनोज ने नोएडा में नौकरी ज्वाइन किया.

मनोज और मनीषा ने मातापिता की मरजी के विरुद्ध कोर्ट मैरेज किया. रोहित और सुनीता उन की शादी में आए थे.

एक साल बाद दोनों अमेरिका चले गए. मनोज अपने जौब वीजा H 1 B पर गया था और मनीषा उस की आश्रित H 4 वीजा पर. कुछ दिनों बाद मनीषा को भी EAD मिला, जिस से वह भी नौकरी कर सकती थी. उस ने भी नौकरी ज्वाइन की. उन्हें 2 बेटियां थीं. मनीषा का काम वर्क फ्राम होम होता था. यह उस के लिए एक वरदान था, वह अपनी बेटियों का भी ध्यान रख सकती थी. उन दिनों रोहित और मनोज और सुनीता और मनीषा के बीच रेगुलर संपर्क बना रहा, विशेषकर मनीषा और सुनीता के बीच.

इधर रोहित और सुनीता दोनों ने पुणे में नौकरी ज्वाइन किया. कुछ महीने बाद दोनों की शादी हुई. इस शादी में उन के मातापिता की सहमति थी. कुछ दिनों के बाद रोहित और सुनीता कनाडा चले गए. यहां भी मनीषा और सुनीता के बीच अच्छा संपर्क बना रहा.

इधर कुछ समय से मनीषा और मनोज के रिश्ते में कुछ खटास आने लगी थी. मनोज रोज रात को शराब पीता और मनीषा को भी पीने को कहता. पर मनीषा ने उस के लाख कहने के बावजूद शराब को होठों से नहीं लगाया. इस के चलते मनोज उस से बहुत नाराज रहता. कभीकभी वह गालीगलौज पर भी उतर आता. धीरेधीरे उन के बीच कड़वाहट बढ़ती गई, पर मनीषा ने अपना दुख सुनीता के सामने जाहिर नहीं किया.

एक बार तो मनोज ने मनीषा पर हाथ तक उठा दिया था. इसी तरह लड़तेझगड़ते करीब 10 साल गुजर गए.

एक बार जब मनीषा और सुनीता वीडियो चैट कर रही थीं, उसी बीच मनोज ने कालबेल बजाया. मनीषा को दरवाजा खोलने में कुछ वक्त लगा. उस ने फोन हाथ में लिए दरवाजा खोला. दरवाजा खुलते ही मनोज उस पर गरज पड़ा, “बिच, तुम को डोर खोलने में इतना टाइम क्यों लगा?“

मनीषा ने झट से फोन काट दिया. पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी और सुनीता को मामला समझने में देर नहीं लगी.

सुनीता के मन में अपनी सहेली के लिए चिंता हुई. कुछ दिनों बाद वह खुद मनीषा से मिलने अमेरिका आई. वह दो दिनों तक रही. इस बीच मनीषा और मनोज में बातचीत हां, नहीं या यस, नो तक सिमट कर रह गई थी.

जब मनोज औफिस गया था और बच्चे स्कूल, तब सुनीता ने मनीषा से पूछा, “मनोज आजकल कुछ नाराज दिख रहा है. कुछ खास बात है तो मुझे बताओ.“

“नहीं, कुछ ख़ास नहीं. कल से ही हम दोनों एकदूसरे से नाराज हैं और बातचीत करीब बंद है. फिर अपने ही एकदो दिन में ठीक हो जाएगा.“

“आर यू श्योर ? तुम कहो तो मैं मनोज से कुछ बात करूं? “

“नहींनहीं, इस की जरूरत नहीं है. कहीं ऐसा न हो बात और बिगड़ जाए. मैं मैनेज कर लूंगी.“

“ओके. फिर भी देखना, जरूरत पड़ने पर मैं या रोहित अगर तुम्हारे कुछ काम आ सके तो बहुत खुशी होगी हमें.“

सुनीता कनाडा लौट आई. उस ने रोहित को मनोज और मनीषा के बारे में बताया. सुनीता बोली, “मैं मनीषा को बहुत पहले से और अच्छी तरह जानती हूं. वह अंतर्मुखी है, अपने मन की बात जल्द किसी को नहीं बताती है. रोहित क्या हमें उस की मदद नहीं करनी चाहिए.“

“जरूर करनी चाहिए बशर्ते वह मदद मांगे. मियांबीवी के बीच में यों ही दखल देना ठीक नहीं है. फिलहाल लेट अस वेट एंड वाच.“

कुछ दिनों बाद सुनीता ने मनीषा को फोन किया. फोन उस की बेटी ने उठाया. सुनीता को बेटी की आवाज सुनाई पड़ी, “मम्मा, सुनीता आंटी का फोन है. क्या बोलूं ?”

‘बोल दे, मम्मा अभी सो रही है.“

सुनीता ने फोन काट दिया. उसे दाल में कुछ काला लगा. एक तो यह उस के सोने का टाइम नहीं था और दूसरे मनीषा की आवाज रोआंसी थी. उस ने समझ लिया कि जरूर आज फिर मनीषा के साथ कुछ बुरा घटा होगा.

रोहित कभी मनोज को फोन करता, तो रोहित महसूस करता कि उसे बातचीत करने में कोई दिलचस्पी नहीं है. थोड़ी देर इधरउधर की बात कर मनोज कहता, ‘और सब ठीक है, बाद में बात करते हैं,’ पर मनोज कभी काल नहीं करता था, बल्कि रोहित ही 10 – 15 दिनों में एक बार हालचाल पूछ लेता.

कुछ दिनों बाद एक बार सुनीता ने मनीषा को फोन कर पूछा, “कैसी हो मनीषा? तुम तो खुद कभी फोन करती नहीं हो.“

“क्या कहूं…? बस जीना एक मजबूरी हो गई है, इसलिए जिए जा रही हूं.“

“ऐसा क्यों बोल रही हो? अभी तुम्हारी उम्र ही क्या हुई है? अभी आगे बहुत लंबी जिंदगी पड़ी है. सुखदुख तो आतेजाते रहते हैं.“

“दुख हो तो झेल लूं, पर मेरा जीवन नासूर बन गया है सुनीता,“ मनीषा ने कहा.

“ऐसी कोई बात नहीं. आजकल हर ज़ख्म का इलाज है. तू बोल तो सही.“

मनीषा को कुछ देर खामोश देख कर सुनीता बोली, “तुम चुप क्यों हो गई हो? जब तक बोलोगी नहीं, मुझे तेरी तकलीफ का कैसे पता चलेगा. वैसे, मुझे कुछ अहसास है कि मनोज तुम्हें जरूरत से ज्यादा तंग करता है.“

मनीषा ने सिसकते हुए कहा, “2-2 बेटियां हैं, उन के लिए जीना मेरी मजबूरी है. पहले बात सिर्फ गालीगलौज तक रहती थी, अब तो अकसर बेटियों के सामने हाथ भी उठा देता है. वह भी बिना वजह.“

“आखिर वह चाहता क्या है? “

“तू तो जानती है, मेरा जौब वर्क फ्रॉम होम होता है. मुझे घर से बाहर ज्यादा जाने की जरूरत नहीं पड़ती है. मुझे ज्यादा तामझाम पसंद नहीं है.“

“तो इस से क्या हुआ?“

“मनोज को चाहिए कि मैं भी जींसशॉर्ट्स पहनूं, स्विमिंग सूट पहन कर स्विम करूं, उस के और उस के दोस्तों के साथ शराब पीऊं और डांस करूं. मुझ से यह सब नहीं होगा. उस के साथ कहीं पार्टी में जाती हूं, तो मैं अपने इंडियन ड्रेस में होती हूं.“

“इस में गलत क्या है, इस के लिए कोई तुम्हें फोर्स नहीं कर सकता है.“

“यह सब किताबों की बात है, प्रैक्टिकल लाइफ में नहीं. अब मनोज को साथ काम करने वाली शादीशुदा क्रिश्चियन औरत अमांडा मिल गई है, जो उस की मनपसंद है. कभी वह घर आती है तो उस के सामने भी मेरा अपमान करता है.“

“तो तुम बरदाश्त क्यों करती हो?“

“नहीं करूं तो रोज मार खाऊं? “

“तुम अमेरिका में रह कर ऐसी बात करती हो? एक काल 911 को कर, उस की सारी हेकड़ी निकल जाएगी.“

“नहीं, मुझ से नहीं होगा.“

“तो तू मर घुटघुट के,“ बोल कर सुनीता ने गुस्से में फोन काट दिया.

इस के कुछ ही दिनों के बाद सुनीता और रोहित अमेरिका गए. वे दोनों दूसरे शहर में होटल में रुके थे. सुनीता ने मनीषा को फोन किया. मनीषा का फोन बेडरूम में था. उस की बड़ी बेटी वहीं थी. उस ने कहा, “वन मिनट, मैं मम्मा को देती हूं.“

फोन वीडियो काल था. बेटी फोन लिए लिविंग रूम में आई, जहां मनोज और अमांडा शराब पी कर म्यूजिक पर डांस कर रहे थे. मनीषा मनोज को अमांडा को घर से बाहर निकालने के लिए बोल रही थी. इस पर मनोज मनीषा को गालियां दे रहा था और बोल रहा था, “यह नहीं जाएगी. तुझे जाना होगा,“ बोल कर वह मनीषा को घसीटने लगा. अमांडा भी उस का साथ दे रही थी. मनीषा को दरवाजे के बाहर निकाल कर मनोज ने दरवाजा बंद कर दिया. उधर सुनीता यह सब देख रही थी और रिकौर्ड कर रही थी.

सुनीता को यह सब सहन नहीं हुआ. उस ने फोन काट दिया और तुरंत 911 पर काल कर पूरी बात बता दी. कुछ ही मिनटों के अंदर मनीषा के घर पुलिस पहुंच गई, “यहां मनीषा कौन है?“

“मैं ही हूं. क्या बात है?“

“हमें सुनीता ने फोन कर आप की मदद करने के लिए कहा है. वैसे, सुनीता ने वीडियो क्लिप भी भेजी है. आप अपना स्टेटमेंट रिकौर्ड करवा दें. मनोज कौन है?“

“वे मेरे पति हैं और अंदर हैं.“

पुलिस के बेल दबाने पर मनोज ने दरवाजा खोला, तो उसे देख कर हक्काबक्का रह गया. पुलिस ने कहा, “आप को मेरे साथ थाने चलना होगा.“

मनोज को पुलिस ले गई. सुनीता ने फोन पर मैसेज भेजा था, “तुम दोनों बेटियों के साथ कनाडा आ जाओ. वहां से अपनी नई जिंदगी की शुरुआत करना.“ Hindi Story

Story In Hindi: बेरंग – श्रुति से मुलाकात कहां हुईं थी

Story In Hindi: मेरा गला सूख रहा था. मैं ने अपने छोटे भाई को आवाज दी लेकिन कोई जवाब न पा कर मैं समझ गई कि सोनू सो चुका है. उसे न जगा कर मैं ने स्वयं ही पानी ढूंढ़ने की कोशिश की थी, उस रात पानी तो नहीं मिला लेकिन ‘ठक’ की तेज आवाज हुई. ‘‘दीदी, आप ठीक हो न,’’ सोनू की घबराई आवाज सुन कर मुझे बहुत शर्मिंदगी हुई. आखिर जगा ही दिया न मैं ने. ‘‘पूरा गिलास पानी पी लिया आप ने. इतनी प्यास थी फिर भी मुझे नहीं उठाया.

दीदी, मैं यहां आप का ध्यान रखने आता हूं. प्लीज, मेरी नींद का मत सोचा करो.’’ सोनू की मीठी सी हक भरी झिड़की सुनना मुझे अच्छा लग रहा था. ‘अब तो शायद जिंदगी भर केवल सुनना ही सुनना हो,’ मैं बुदबुदाई थी. अजीब सी हालत थी उस वक्त दिल की. कल क्या होगा यही सोचसोच कर मेरे पूरे शरीर में सिहरन सी दौड़ रही थी. रात के 3 बज रहे थे लेकिन नींद नहीं आ रही थी. रहरह कर श्रुति की याद आ रही थी. श्रुति, क्या अपनी आंखों से अब उस को कभी नहीं देख पाऊंगी? श्रुति मेरी स्कूल के समय की सहेली, मुझे अपनी जान से भी ज्यादा प्यारी थी.

लेकिन आज लग रहा है कि अपनों से कहीं ज्यादा प्यार श्रुति मुझे करती थी. कुदरत का यह कैसा नियम है कि इनसान को जब नींद नहीं आती तो वह अपने अतीत को ही बारबार याद करता रहता है. मैं ने सोचा, चलो यह भी अच्छा है, कम से कम समय तो आसानी से कट जाएगा, वरना पिछले 18 दिन तो पहाड़ जैसे कटे थे. क्या करती मैं उन 18 दिनों में? चुपचाप लेटे रहने के अलावा मेरे पास और चारा भी क्या था. सारा शरीर, यहां तक कि मेरी आत्मा भी घायल हो चुकी थी.

कुछ भी करने लायक नहीं थी उस समय. एक गिलास पानी तक के लिए तो मैं दूसरों पर निर्भर थी. लेकिन हां, मेरी सोच पर तो मेरा बस था. मैं एक उच्च मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुई. मम्मी और पापा मुझे और छोटे भाई को बहुत प्यार करते हैं. बूआ, जो भरी जवानी में ही विधवा हो गई थीं, अपनी कोई औलाद न होने का दर्द, वह मुझे भरपूर प्यार दे कर दूर करती हैं. बूआ, पापा से उम्र में काफी बड़ी हैं. मैं इसलिए भी बूआ के बहुत करीब रही हूं क्योंकि उन की बातें मुझे बहुत अच्छी लगती थीं.

यह सच है कि बच्चे की जिस तरह परवरिश होती है वैसा ही वह बन जाता है. मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ. बूआ बहुत कम पढ़ीलिखी थीं. अंधविश्वासी भी बहुत थीं. बस, मुझ पर भी उन का अंधविश्वास हावी होता चला गया. बूआ का मानना था कि लड़की के लिए जो काम हैं वह हैं, सुंदर लगना, सजधज कर बैठना, पति की सेवा करना और बच्चे पालना. और भी जाने कितनी ही ऐसी बातें थीं जो बूआ ने मुझे बचपन में बताईं और मैं उन की सब बातें ग्रहण करती चली गई.

मैं स्कूल से लौटती तो बूआ को बताती, ‘बूआ, पता है आज वह सायरा मेरे साथ बैठी थी. वही काली सी.’ तब बूआ कहतीं, ‘अरे, हम ब्राह्मण लोग हैं, तू टीचर से नहीं कह सकती थी कि उस मलेच्छ के साथ न बैठाएं. एक तो काली, ऊपर से जाति की नीच.’ फिर बूआ मुझ पर गंगाजल छिड़कतीं और अच्छी तरह नहलातीं. श्रुति से मेरी मुलाकात छठी क क्षा में हुई थी. यों तो कक्षा में और भी लड़कियां थीं पर श्रुति सुंदर थी, शायद यही पहली खूबी थी जिस वजह से मैं ने उस की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया था. पहली बार श्रुति मेरे साथ घर आई थी तो मैं बोली थी, ‘बूआ, यह श्रुति है.

पढ़ने में बहुत तेज है.’ बूआ को पढ़ाईलिखाई से क्या लेनादेना था. वह बोलीं, ‘संजू, तेरी सहेली तो बहुत सुंदर और गोरी है.’ 12वीं कक्षा अच्छे नंबरों से पास कर के मैं ने कालिज में दाखिला लिया. श्रुति भी उसी कालिज में थी. हम ने सोचा हुआ था कि कभी भी अलग नहीं होंगे. समय के साथ हमारी दोस्ती बहुत मजबूत हो गई थी.

मैं कालिज में ‘ब्यूटी क्वीन’ क्या बनी कि सब मुझे ‘क्वीनी’ कह कर पुकारने लगे. बस, श्रुति ही मुझे ‘सजल’ कह कर पुकारती थी. सजल, तू क्या ले रही है, एन.सी.सी या एन.एस.एस. हमें इन दोनों में से किसी एक को चुनना था. मैं ने एन.सी.सी (नेशनल कैडेट कोर) ही चुना क्योंकि उस में कालिज के बाहर स्टेडियम आदि में ले जाया जाता था. लेकिन श्रुति ने एन.एस.एस (नेशनल सोशल सर्विस) लिया. उस के तहत उस ने ब्लाइंड स्टूडेंट प्रोजेक्ट लिया. उस का काम था खाली पीरियड में नेत्रहीन लड़कियों को पढ़ाना.

एक दिन उस ने मुझे कुछ बताया तो मैं खीज कर बोली थी, ‘देख श्रुति, तू उन्हें पढ़ाती है यह भलाई का काम है. लेकिन ये ‘डोनर कार्ड’ का क्या चक्कर डाल दिया है तू ने.’ ‘सजल, इन नेत्रहीन लड़कियों की तकलीफें देख कर मन बहुत भर आता है. इन से हम कुछ भी बात कर सकते हैं, लेकिन जानती है, मैं पूरापूरा ध्यान रखती हूं कि ‘देखो’ जैसे शब्द इन के आगे न बोलूं.’ ‘हां, श्रुति, मुझे भी इन्हें देख कर बहुत तरस आता है.’ ‘नहीं, सजल, इन के बारे में गलत धारणा बना बैठी है. ये दया के पात्र नहीं हैं.

बस, इन्हें हमारी मदद की थोड़ी जरूरत होती है, जो हम दे सकते हैं. ये लड़कियां बहुत मेहनती हैं. जानती है, हमें तो बने बनाए नोट्स गाइड के रूप में दुकानों पर मिल जाते हैं लेकिन ये लोग सारे उत्तर पहले बे्रल की मदद से लिखते हैं फिर उन्हें याद करते हैं.’ ‘तू डोनर कार्ड क्यों भर रही है?

मैं जानती हूं कि किसी के मरने के बाद उस की आंखें कुछ घंटों के भीतर दान करनी होती हैं. बस, ऐसा सोच कर ही तब मेरा मन दुखी हो गया था.’ श्रुति हंस पड़ी थी, ‘सजल, मरना तो सभी को है एक दिन. जीतेजी तो चल, हम अच्छे काम करते हैं और सब के काम आते हैं. लेकिन सोच, मरने के बाद भी अगर हम किसी के काम आएं तो मेरे खयाल में यह एक बहुत अच्छा काम है.’ ‘तुझे नहीं लगता कि ये डोनर कार्ड हर वक्त मौत का एहसास दिलाता रहेगा.?’ श्रुति कुछ बोली नहीं तो मैं गुस्से से वहां से चल पड़ी.

‘सुन, सजल, मेरी मान और तू भी कार्ड भर दे,’ वह हंसी तो मैं भुनभुनाती हुई वहां से चली आई. घर पहुंच कर बूआ को बताया तो वह हैरान थीं कि मेरी सहेली ऐसा कह सकती है. ‘इस में बुराई क्या है, दीदी?’ मम्मी के यह कहते ही बूआ भड़क उठी थीं, ‘बुराई की बात कर रही है, सुदेश? जानती भी है, अगर मौत के बाद कोई अंग निकल जाए तो अगले जन्म में उस अंग के बगैर जन्म होता है.’ बूआ की बात पर हमेशा की तरह मम्मी ने सिर हिलाया और चली गई थीं.

वैसे भी मम्मी की बूआ के आगे नहीं चलती थी. लेकिन बूआ के मुंह से पुनर्जन्म में अंगहीन होने की बात सुन कर मैं भयभीत हो गई थी. उम्र ही क्या थी मेरी, 18 साल. कालिज का पहला साल ही तो था. इस के बाद मैं ने श्रुति को बहुत समझाने की कोशिश की थी लेकिन वह टस से मस नहीं हुई थी और उस ने ‘डोनर कार्ड’ भर कर ही दम लिया था. श्रुति ने कालिज के पहले और दूसरे साल में 260 घंटे पढ़ाया था. वह अपनेआप में एक रिकार्ड था. मुझे एन.सी.सी. में कोई सर्टिफिकेट नहीं मिला था.

दरअसल परेड आदि से मेरी गोरी त्वचा झुलस जाती. बूआ ने जब मेरा रंग सांवला होते देखा तो मुझे परेड आदि में जाने से रोकने लगीं. मन से मैं भी यही चाहती थी. एक दिन श्रुति कालिज आई तो उसे देख कर मुझे हंसी आ गई. फिर 3 दिन बाद मैं उसे एक दुकान पर ले गई. ‘यह कहां ले आई मुझे?’ श्रुति ने हैरानी से पूछा. दुकान पर लगे बोर्ड की तरफ इशारा करते हुए मैं बोली, ‘पढ़, कहां खड़े हैं?’ वह कांटेक्ट लैंस की दुकान थी. दरअसल श्रुति को चश्मा लग गया था और मुझे उस का चश्मा लगाना पसंद नहीं आ रहा था.

मेरी बहुत जिद करने पर भी श्रुति लैंस लगवाने के लिए राजी नहीं हुई. तब मैं ने गुस्से में आ कर उस से बोलना बंद कर दिया. आखिर एक दिन उस ने हार मान अपने लिए लैंस बनवा लिए. मैं जानती थी वह मुझ से बात किए बगैर नहीं रह सकती थी.

तीसरे साल भी उस ने ब्लाइंड स्टूडेंट प्रोजेक्ट जारी रखा था. श्रुति कार चलाना सीख रही थी. जब वह अच्छी तरह सीख गई तब मैं यदाकदा उस के साथ कालिज आनेजाने लगी. एक दिन श्रुति घर आई हुई थी. बातोंबातों में पापा ने उसे बताया कि उन के एक दोस्त की बेटी की शादी है. वह तो आफिस से सीधे चले जाएंगे लेकिन हम सब को भी पहुंचना था.

अब समस्या यह थी कि शादी शहर से बाहर थी और टैक्सी से जाने के लिए बूआ तैयार नहीं थीं. तब श्रुति ने हम को सपरिवार छोड़ने की बात पापा से कही थी. उस दिन श्रुति दोपहर को ही हमारे घर आ गई थी पर वह कुछ थकीथकी सी लग रही थी. उस की आंखें भी सूजी हुई थीं, सो वह देर शाम तक सोती रही. जब मैं ने उसे जगाया और बताया कि उठ, अंधेरा होने लगा है तो वह हड़बड़ा कर उठी और जल्दील्दी तैयार होने लगी. तैयार होते समय श्रुति ने अपना बैग मुझे पकड़ा दिया था, जिसे मैं ने अपने पलंग पर रख दिया.

मैं, मम्मी व बूआ के साथ बाहर आई तो देखा श्रुति कार की पिछली सीट पर पड़े सामान को हटा रही थी. मैं श्रुति के साथ आगे बैठ गई. मम्मी, बूआ और सोनू पीछे बैठे हुए थे. कुछ देर बाद श्रुति ने मुझ से अपना बैग मांगा. ‘सौरी श्रुति, वह तो शायद घर पर ही रह गया.’ ‘सजल, मैं ने कहा था न कि बैग को कार में रख दो.’ ‘श्रुति बेटे, अगर बहुत जरूरी है तो अभी बहुत आगे नहीं आए हैं, वापस चलते हैं,’ मम्मी ने कहा तो बूआ भड़क गईं. ‘सुदेश, ऐसे आधे रास्ते मुड़ना बहुत बड़ा अपशकुन होता है,’ बूआजी लगातार बोले जा रही थीं. मम्मी का उतरा चेहरा श्रुति ने शीशे में देख लिया था.

वह शांत भाव से मम्मी से बोली, ‘नहीं, आंटी, ठीक है, वापसी में ले लूंगी.’ अभी हम रास्ते में ही थे कि पापा का मोबाइल पर फोन आ गया. बूआ ने उन से बात की. ‘श्रुति तेज चला न, क्या बैलगाड़ी चला रही है. आनंद हैरान हो रहा है कि हम अभी तक नहीं पहुंचे हैं.’ ‘जी बूआ,’ श्रुति तेज गाड़ी चलाने लगी. कार की रफ्तार अच्छीखासी थी पर बूआ को कुछ न कुछ कहना था सो बोलीं, ‘कल तक तो पहुंच ही जाएंगे न श्रुति, गाड़ी चलानी तो आती है न?’ बूआ का यों बोलना सोनू को अच्छा नहीं लगा.

सो वह बूआ को चुप होने के लिए बोलने लगा. बस, बूआ भड़क गईं. इधर मम्मी दोनों का बीचबचाव करने लगीं. तभी मैं चिल्लाई, ‘श्रुति, देख सामने….’ और फिर तेज धमाका हुआ, दर्द की लहर पूरे शरीर में फैल गई और फिर चारों ओर अंधेरा छा गया. मेरे पूरे बदन में दर्द हो रहा था. सिर में भी भारीपन महसूस हो रहा था. हाथ उठाने की कोशिश की तो उठा नहीं. आंखें खोलनी चाहीं तो खुलीं नहीं. अचानक मुझे याद आया कि हमारा तो एक्सीडेंट हुआ है. मैं जोर से चिल्लाई. ‘सोनू, सोनू, मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा, मेरा हाथ नहीं उठ रहा?’ मैं हांफने लगी थी.

फिर ध्यान आया कि सोनू भी तो पीछे ही बैठा था. पूछा, ‘हम कहां हैं सोनू, हमारी तो ट्रक से टक्कर हुई थी न? क्या हम अभी भी कार में ही हैं और तू ठीक है न?’ उस के हां कहने पर मुझे कुछ तसल्ली हुई. फिर मैं ने बाकी का पूछा. अचानक एक आवाज आई, ‘सिस्टर, इन्हें इंजेक्शन लगा दिया?’ ‘यह आवाज किस की थी, सोनू? कोई सिस्टर कह रहा था. हम कहां हैं?’ ‘दीदी,’ सोनू ने धीरे से कहा, ‘हम अस्पताल में हैं.’ ‘और मम्मी, बूआ और श्रुति?’ ‘वे सब अलगअलग कमरों में हैं.’

तभी माथे पर स्पर्श महसूस हुआ, ‘सजल, कैसी हो बेटा.’ ‘पापा, मैं ठीक नहीं हूं. मुझे बहुत दर्द हो रहा है. मैं आप को नहीं देख सकती. पापा, मुझे क्या हुआ है?’ मैं तेजतेज चिल्लाने लगी. तब 2 हाथों ने मुझे तेजी से पकड़ा और बांह पर इंजेक्शन लगाने का दर्द महसूस हुआ. इस के बाद मेरा दिमाग सुन्न हो गया. फिर ऐसे ही कई दिनों तक चलता रहा.

मैं अपनी आंखों के बारे में पूछती तो कोई संतोषजनक जवाब न मिलता. मेरी दुनिया तो केवल पीड़ा व आवाजों तक ही सीमित रह गई थी. कौन आ रहा है, जा रहा है, मुझे कुछ भी नहीं पता होता. बस, कदमों की आहट बता देती कि कोई है मेरे आसपास. कुछ दिनों बाद मम्मी मिलने आईं. मेरी आंखों पर बंधी पट्टी को धीरे से उन्होंने छुआ था. उन के कांपते हाथ उन की कमजोरी और दुख बता रहे थे. फिर 12 दिनों बाद बूआ भी मिलने आईं.

खिड़की के पास बैठे होने की वजह से शीशे के टुकड़े उन की कनपटी में घुस गए थे. वह मुझ से मिलते ही रोने लगी थीं. ‘दीदी, सजल ठीक है.’ मम्मी इतना ही बोल पाई थीं, ‘सोनू, बूआ को ले जाओ.’ ‘मम्मी, श्रुति कैसी है? वह अभी तक मिलने नहीं आई मुझ से.’ ‘जैसे तुम्हें बहुत चोटें आई हैं वैसे ही श्रुति को भी बहुत चोटें लगी थीं. बस, ठीक होते ही वह अवश्य आएगी,’ मम्मी का कांपता स्वर गूंजा था. इस के बाद मैं प्रतीक्षा कर रही थी उस दिन की, जब मेरी आंखों से पट्टी हटनी थी.

मम्मीपापा ने मुझे धीरेधीरे बताया था कि मैं 4 दिनों तक बेहोश रही थी. सामने से तेजी से आते ट्रक को श्रुति देख न सकी की. जब देखा तब तक संभलना बहुत मुश्किल था. हमारी और ट्रक की बहुत तेज टक्कर हुई थी. हमें अस्पताल में 3 घंटे लग गए थे. कांच के बारीक टुकडे़ मेरे चेहरे में घुस गए थे. घड़ी में 5 का घंटा बजा. सुबह होने वाली थी. पिछले कई दिनों से मेरे लिए दिनरात एक समान थे. सिर्फ घंटे की आवाज से ही दिन या रात होने का आभास होता था. उन दिनों एक ही सवाल मन में आता था, कैसे होती होगी उन लोगों की जिंदगी जो जन्मजात नेत्रहीन हैं.

मुझे तो फिर भी आस दिलाई गई है कि कल मेरी पट्टी खुलेगी और मैं फिर से देख सकूंगी. लेकिन वे लोग किस उम्मीद में जीते होंगे. क्या श्रुति जैसे लोगों के नेत्रदान की आस में? हां, वरना वे लोग कै से हंसते होंगे. मैं तब कितनी छटपटाई थी जब कुछ देख नहीं पा रही थी. आंखों से भले ही न रोई लेकिन दिल तो मेरा हर पल रोता रहा था. कितनी बेबस हो गई थी मैं. हो सकता है कुछ घंटों बाद जब पट्टी खुलेगी, मैं देख पाऊं और हो सकता है…. न भी देख पाऊं.

एक बार फिर से मेरा समूचा शरीर कांप उठा था. कुछ दिनों का अंधेरा मुझे बहुत कुछ सिखा गया था. सोचने लगी थी कि उस अंधेरे से यदि मैं उजाले की ओर न भी पहुंच सकी तो भी कुछ गम नहीं. कम से कम इस रंगीन दुनिया के कई रंग तो मैं देख पाई. अब तो मुझे यही रंग उन खास लोगों को भी दिखाने होंगे जो अब तक इन्हें देखने से वंचित रहे हैं. सोनू उठा और प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरा तो मेरी तंद्रा भंग हुई. वह बोला, ‘‘दीदी, सुबह हो गई है. आप बैठना चाहेंगी.’’

मैं ने इशारे से कहा तो सोनू ने मुझे सहारा दे कर बैठा दिया. मेरी पट्टी खोली गई तो हलकी सी रोशनी भी चुभ रही थी. सामने मम्मी, पापा, मेरा भाई धुंधले से ही सही, लेकिन दिख रहे थे. मैं ने दोबारा आंखें बंद कर लीं. कुछ दिनों बाद मैं घर पर आराम कर रही थी. अभी मुझे बाहर निकलना मना था. मुझे श्रुति की बहुत याद आ रही थी. मैं ने उस के घर फोन मिलाया. फोन उस के नौकर ने उठाया था.

श्रुति को बुलाने के लिए कहा तो उस ने ऐसी बात कह दी कि मुझे सारा कमरा घूमता नजर आया. इतना बड़ा धोखा. मुझ से इतना बड़ा सच छिपाया गया था. श्रुति, मेरी सब से प्यारी सहेली, इस दुनिया में न थी. वह मुझ से बहुत दूर जा चुकी थी. मैं फूटफूट कर रो रही थी. ‘‘पापा, आप लोगों ने मुझ से झूठ क्यों बोला?’’ कुछ देर बाद मम्मी ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए सारी बात बताई. मुझे उस की मौत की खबर ने अंदर तक तोड़ दिया था.

इन दिनों मम्मी, बूआ को मेरे पास नहीं आने देती थीं. क्यों, मैं अच्छी तरह जानती थी. मेरा पूरा चेहरा चोटों की वजह से कुरूप हो गया था. मगर मुझे अब इस की परवा नहीं थी. असली सुंदरता क्या होती है, यह मैं अब जान चुकी थी. मेरी आंखों पर पट्टी क्या चढ़ी, बूआ की पढ़ाई हुई हर पट्टी उतर गई. एक दिन बूआ मेरे कमरे में आईं. उन का मुंह कुछ उतरा हुआ था. मैं चुपचाप बैठी रही. वह मेरे पास आईं और मेरे हाथ में कुछ रख दिया. जैसे ही मेरी नजर उस चीज पर पड़ी, मेरी रुलाई फूट पड़ी.

‘‘यह तो श्रुति का वही बैग है न बूआ, जिसे मैं जल्दी में घर पर ही भूल गई थी.’’ मैं ने कांपते हाथों से बैग खोला और अंदर हाथ डाला तो मेरे हाथ में कुछ चीजें आईं. उन चीजों को देख कर मुझे लगा कि धरती फटे और मैं उस में समा जाऊं. मेरे सामने उस का आई डोनर कार्ड, चश्मा, कांटेक्ट लैंस और किसी नेत्र विशेषज्ञ का पर्चा था. श्रुति को आंखों में इन्फैक्शन हो गया था. मुझे याद आया कि उस दिन उस की आंखें लाल हो रही थीं. इसीलिए उस ने लैंस नहीं पहने होंगे. मैं उस का बैग घर पर ही भूल गई थी. काश, मैं यह बैग लेना न भूली होती. उफ, यह मैं ने क्या किया, हमारी दोस्ती, उस का मुझे नाराज न करना ही उस की मौत का कारण बन गया. मैं तड़पती रही.

अगले दिन बूआ, मम्मी और पापा मेरे पास बैठे हुए थे. मेरी आंखों से अभी भी आंसू बह रहे थे. मम्मी ने धीरे से मेरे हाथ में कुछ रखा. आंसू पोंछ कर ध्यान से देखा तो मेरी आंखें फिर छलछला गईं. वह और कुछ नहीं उन तीनों के कार्ड थे. बूआ की आंखों में पश्चात्ताप के आंसू थे. मैं उन के गले लग गई. यह अंत नहीं है. श्रुति का डोनर कार्ड मेरे घर रहने के कारण उस की आंखें दान करने की इच्छा तो पूरी नहीं हो पाई थी, लेकिन कहना नहीं होगा कि मेरा डोनर कार्ड तो उस की नेत्रदान की इच्छा पूर्ण कर सकता है. मैं खुद को उस के मातापिता की गुनाहगार मानती हूं. जबतब मैं उन से मिलती रहती हूं. श्रुति की जगह तो नहीं ले सकती लेकिन उस की कमी का एहसास मैं एक प्रतिशत भी कर सकूं, यह मेरी कोशिश रहती है.मेरी जानपहचान वालों में से अब कई लोगों ने नेत्रदान का फैसला ले लिया है. मैं उसी कालिज से एम.ए. कर रही हूं और ब्लाइंड स्टूडेंट प्रोजेक्ट, जो श्रुति की जिंदगी का एक अटूट हिस्सा रहा है, से भी जुड़ी हुई हूं. जी चाहता है कि सारी दुनिया को बता दूं कि अंधविश्वास में डूबे लोग, मौत के बाद भी उजाले की आस रखते हैं, शायद इसीलिए नेत्रदान करने के खयाल मात्र से ही कांप जाते हैं. लेकिन एक बार, सिर्फ एक बार, केवल 1 घंटे के लिए अपनी आंखों पर पट्टी बांध कर देखें. तब मेरी तरह शायद उन्हें भी पता चलेगा कि रंगों से दूर रह वह काली, अंधेरी दुनिया कैसी बेरंग होती है. Story In Hindi

Story In Hindi: एक ही आग में – एक विधवा की अधूरी चाह

Story In Hindi: ‘‘यह मैं क्या सुन रही हूं सुगंधा?’’ मीना ने जब यह बात कही, तब सुगंधा बोली, ‘‘क्या सुन रही हो मीना?’’

‘‘तुम्हारा पवन के साथ संबंध है…’’

‘‘हां है.’’

‘‘यह जानते हुए भी कि तुम विधवा हो और एक विधवा किसी से संबंध नहीं रख सकती,’’ मीना ने समझाते हुए कहा. पलभर रुक कर वह फिर बोली, ‘‘फिर तू 58 साल की हो गई है.’’

‘‘तो क्या हुआ?’’ सुगंधा ने कहा, ‘‘औरत बूढ़ी हो जाती है तब उस की इच्छा नहीं जागती क्या? तू भी तो 55-56 साल के आसपास है. तेरी भी इच्छा जब होती होगी तो क्या भाई साहब के साथ हमबिस्तर नहीं होती होगी?’’

मीना कोई जवाब नहीं दे पाई. सुगंधा ने जोकुछ कहा सच कहा है. वह भी तो इस उम्र में हमबिस्तर होती है, फिर सुगंधा विधवा है तो क्या हुआ? आखिर औरत का दिल ही तो है. उस ने कोई जवाब नहीं दिया.

तब सुगंधा बोली, ‘‘जवाब नहीं दिया तू ने?’’

‘‘तू ने जो कहा सच कहा है,’’ मीना अपनी रजामंदी देते हुए बोली.

‘‘औरत अगर विधवा है तो उस के साथ यह सामाजिक बंधन क्यों?’’ उलटा सुगंधा ने सवाल पूछते हुए कहा. तब मीना पलभर के लिए कोई जवाब नहीं दे पाई.

सुगंधा बोली, ‘‘अगर किसी की पत्नी गुजर जाती है तो वह इधरउधर मुंह मारता फिरे, तब यह समाज उसे कुछ न कहे, क्योंकि वह मर्द है. मगर औरत किसी के साथ संबंध बनाए, तब वह गुनाह हो जाता है.’’

‘‘तो फिर तू पवन के साथ शादी क्यों नहीं कर लेती?’’ मीना ने सवाल किया.

‘‘आजकल लिव इन रिलेशनशिप का जमाना है,’’ सुगंधा बोली, ‘‘क्या दोस्त बन कर नहीं रह सकते हैं?’’

‘‘ठीक है, ठीक है, तेरी मरजी जो आए वह कर. मैं ने जो सुना था कह दिया,’’ नाराज हो कर मीना बोली, ‘‘मगर तू 3 बच्चों की मां है. वे सुनेंगे तब उन पर क्या गुजरेगी, यह सोचा है?’’

‘‘हां, सब सोच लिया है. क्या बच्चे नहीं जानते हैं कि मां के दिल में भी एक दिल छिपा हुआ है. उस की इच्छा जागती होगी,’’ समझाते हुए सुगंधा बोली, ‘‘देखो मीना, इस बारे में मत सोचो. तुम अपनी लगी प्यास भाई साहब से बुझा लेती हो. काश, ऐसा न हो, मगर तुम मुझ जैसी अकेली होती तो तुम भी वही सबकुछ करती जो आज मैं कर रही हूं. समाज के डर से अगर नहीं भी करती तो तेरे भीतर एक आग उठती जो जला कर तुझे भीतर ही भीतर भस्म करती.’’

‘‘ठीक है बाबा, अब इस बारे में तुझ से कुछ नहीं पूछूंगी. तेरी मरजी जो आए वह कर,’’ कह कर मीना चली गई.

मीना ने जोकुछ सुगंधा के बारे में कहा है, सच है. सुगंधा पवन के साथ संबंध बना लेती है. यह भी सही है कि सुगंधा 3 बच्चों की मां है. उस ने तीनों की शादी कर गृहस्थी भी बसा दी है. सब से बड़ी बेटी शीला है, जिस की शादी कोटा में हुई है. सुगंधा के दोनों बेटे सरकारी नौकरी में हैं. एक सागर में इंजीनियर है तो दूसरा कटनी में तहसीलदार.

सुगंधा खुद अपने पुश्तैनी शहर जावरा में अकेली रहती है. अकेले रहने के पीछे यही वजह है कि मकान किराए पर दे रखा है.

सुगंधा के दोनों बेटे कहते हैं कि अम्मां अकेली मत रहो. हमारे साथ आ कर रहो, तब वह कभीकभी उन के पास चली जाती है. महीने दो महीने तक जिस बेटे के पास रहना होता है रह लेती है. मगर रहतेरहते यह एहसास हो जाता है कि उस के रहने से वहां उन की आजादी में बाधा आ रही है, तब वह वापस पुश्तैनी शहर में आ जाती है.

यहां बड़ा सा मकान है सुगंधा का, जिस के 2 हिस्से किराए पर दे रखे हैं, एक हिस्से में वह खुद रहती है. पति की पैंशन भी मिलती है. उस के पति शैलेंद्र तहसील दफ्तर में बड़े बाबू थे. रिटायरमैंट के सालभर के भीतर उन का दिल की धड़कन रुकने से देहांत हो गया.

आज 3 साल से ज्यादा समय बीत गया है, तब से वह खुद को अकेली महसूस कर रही है. अभी उस के हाथपैर चल रहे हैं. सामाजिक जिम्मेदारी भी वह निभाती है. जब हाथपैर चलने बंद होंगे, तब वह अपने बेटों के यहां रहने चली जाएगी. फिर किराएदारों से किराया भी समय पर वसूलना पड़ता है. इसलिए उस का यहां रहना भी जरूरी है.

ज्यादातर सुगंधा अकेली रहती है, मगर जब गरमी की छुट्टियां होती हैं तो बेटीबेटों के बच्चे आ जाते है. पूरा सूना घर कोलाहल से भर जाता है. अकेले में दिन तो बीत जाता है, मगर रात में घर खाने को दौड़ता है. तब बेचैनी और बढ़ जाती है. तब आंखों से नींद गायब हो जाती है. ऐसे में शैलेंद्र के साथ गुजारी रातें उस के सामने चलचित्र की तरह आ जाते हैं. मगर जब से वह विधवा हुई है, शैलेंद्र की याद और उन के साथ बिताए गए पल उसे सोने नहीं देते.

पवन सुगंधा का किराएदार है. वह अकेला रहता है. वह पौलीटैक्निक में सिविल मेकैनिक पद पर है. उस की उम्र 56 साल के आसपास है. उस की पत्नी गुजर गई है. वह अकेला ही रहता है. उस के दोनों बेटे सरकारी नौकरी करते हैं और उज्जैन में रहते हैं. दोनों की शादी कर के उन का घर बसा दिया है.

रिटायरमैंट में 6 साल बचे हैं. वह किराए का मकान तलाशने आया था. धीरेधीरे दोनों के बीच खिंचाव बढ़ने लगा. जिस दिन चपरासी रोटी बनाने नहीं आता, उस दिन सुगंधा पवन को अपने यहां बुला लेती थी या खुद ही वहां बनाने चली जाती थी.

पवन ऊपर रहता था. सीढि़यां सुगंधा के कमरे के गलियारे से ही जाती थीं. आनेजाने के बीच कई बार उन की नजरें मिलती थीं. जब सुगंधा उसे अपने यहां रोटी खाने बुलाती थी, तब कई बार जान कर आंचल गिरा देती थी. ब्लाउज से जब उभार दिखते थे तब पवन देर तक देखता रहता था. वह आंचल से नहीं ढकती थी.

अब सुगंधा 58 साल की विधवा है, मगर फिर भी टैलीविजन पर अनचाहे सीन देखती है. उस के भीतर भी जोश पैदा होता है. जोश कभीकभी इतना ज्यादा हो जाता है कि वह छटपटा कर रह जाती है.

एक दिन सुगंधा ने पवन को अपने यहां खाना खाने के लिए बुलाया. उसे खाना परोस रही थी और कामुक निगाहों से देखती भी जा रही थी. वह आंचल भी बारबार गिराती जा रही थी. मगर पवन संकेत नहीं समझ पा रहा था. वह उम्र में उस से बड़ी भी थी. उस की आंखों पर लाज का परदा पड़ा हुआ था.

सुगंधा ने पहल करते हुए पूछ लिया, ‘‘पवन, अकेले रहते हो. बीवी है नहीं, फिर भी रात कैसे गुजारते हो?’’

पवन कोई जवाब नहीं दे पाया. एक विधवा बूढ़ी औरत ने उस से यह सवाल पूछ कर उस के भीतर हलचल मचा दी. जब वह बहुत देर तक इस का जवाब नहीं दे पाया, तब सुगंधा फिर बोली, ‘‘आप ने जवाब नहीं दिया?’’

‘‘तकिया ले कर तड़पता रहता हूं,’’ पवन ने मजाक के अंदाज में कहा.

‘‘बीवी की कमी पूरी हो सकती है,’’ जब सुगंधा ने यह बात कही, तब पवन हैरान रह गया, ‘‘आप क्या कहना चाहती हो?’’

‘‘मैं हूं न आप के लिए,’’ इतना कह कर सुगंधा ने कामुक निगाहों से पवन की तरफ देखा.

‘‘आप उम्र में मुझ से बड़ी हैं.’’

‘‘बड़ी हुई तो क्या हुआ? एक औरत का दिल भी है मेरे पास.’’

‘‘ठीक है, आप खुद कह रही हैं तो मुझे कोई एतराज नहीं.’’

इस के बाद तो वे एकदूसरे के बैडरूम में जाने लगे. जल्दी ही उन के संबंधों को ले कर शक होने लगा. मगर आज मीना ने उन के संबंधों को ले कर जो बात कही, उसे साफसाफ कह कर सुगंधा ने अपने मन की सारी हालत बता दी. मगर एक विधवा हो कर वह जो काम कर रही है, क्या उसे शोभा देता है? समाज को पता चलेगा तब सब उस की बुराई करेंगे. उस पर ताने कसेंगे.

मीना ने तो सुगंधा के सामने पवन से शादी करने का प्रस्ताव रखा. उस का प्रस्ताव तो अच्छा है, शादी समाज का एक लाइसैंस है. दोनों के भीतर एक ही आग सुलग रही है.

मगर इस उम्र में शादी करेंगे तो मजाक नहीं उड़ेगा. अगर इस तरह से संबंध रखेंगे तब भी तो मजाक ही बनेगा.

सुगंधा बड़ी दुविधा में फंस गई. उस ने आगे बढ़ कर संबंध बनाए थे. इस से अच्छा है कि शादी कर लो. थोड़े दिन लोग बोलेंगे, फिर चुप हो जाएंगे. उस ने ऐसे कई लोग देखे हैं जो इस उम्र में जा कर शादी भी करते हैं. क्यों न पवन से बात कर के शादी कर ले?

‘‘अरे सुगंधा, आप कहां खो गईं?’’ पवन ने आ कर जब यह बात कही, तब सुगंधा पुरानी यादों से आज में लौटी, ‘‘लगता है, बहुत गहरे विचारों में खो गई थीं?’’

‘‘हां पवन, मैं यादों में खो गई थी.’’

‘‘लगता है, पुरानी यादों से तुम परेशानी महसूस कर रही हो.’’

‘‘हां, सही कहा आप ने.’’

‘‘देखो सुगंधा, यादों को भूल जाओ वरना ये जीने नहीं देंगे.’’

‘‘कैसे भूल जाऊं पवन, आप से आगे रह कर जो संबंध बनाए… मैं ने अच्छा नहीं किया,’’ अपनी उदासी छिपाते हुए सुगंधा बोली. फिर पलभर रुक कर वह बोली, ‘‘लोग हम पर उंगली उठाएंगे, उस के पहले हमें फैसला कर लेना चाहिए.’’

‘‘फैसला… कौन सा फैसला सुगंधा?’’ पवन ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘हमारे बीच जो संबंध है, उसे तोड़ दें या परमानैंट बना लें.’’

‘‘मैं आप का मतलब नहीं समझा?’’

‘‘मतलब यह कि या तो आप मकान खाली कर के कहीं चले जाएं या फिर हम शादी कर लें.’’

सुगंधा ने जब यह प्रस्ताव रखा, तब पवन भीतर ही भीतर खुश हो गया. मगर यह संबंध कैसे होगा. वह बोला, ‘‘हम शादी कर लें, यह बात तो ठीक है सुगंधा. मगर आप की और हमारी औलादें सब घरगृहस्थी वाली हो गई हैं. ऐसे में शादी का फैसला…’’

‘‘नहीं हो सकता है, यही कहना चाहते हो न,’’ पवन को रुकते देख सुगंधा बोली, ‘‘मगर, यह क्यों नहीं सोचते कि हमारी औलादें अपनेअपने घर में बिजी हैं. अगर हम शादी कर लेंगे, तब वे हमारी चिंता से मुक्त हो जाएंगे. जवानी तो मौजमस्ती और बच्चे पैदा करने की होती है. मगर जब पतिपत्नी बूढ़े हो जाते हैं, तब उन्हें एकदूसरे की ज्यादा जरूरत होती है. आज हमें एकदूसरे की जरूरत है. आप इस बात को क्यों नहीं समझते हो?’’

‘‘आप ने ठीक सोचा है सुगंधा. मेरी पत्नी गुजर जाने के बाद मुझे अकेलापन खूब खलने लगा. मगर जब से आप मेरी जिंदगी में आई हैं, मेरा वह अकेलापन दूर हो गया है.’’

‘‘सच कहते हो. मुझे भी अपने पति की रात को अकेले में खूब याद आती है,’’ सुगंधा ने भी अपना दर्द उगला.

‘‘मतलब यह है कि हम दोनों एक ही आग में सुलग रहे हैं. अब हमें शादी किस तरह करनी चाहिए, इस पर सोचना चाहिए.’’

‘‘आप शादी के लिए राजी हो गए?’’ बहुत सालों के बाद सुगंधा के चेहरे पर खुशी झलकी थी. वह आगे बोली, ‘‘शादी किस तरह करनी है, यह सब मैं ने सोच लिया है.’’

‘‘क्या सोचा है सुगंधा?’’

‘‘अदालत में गुपचुप तरीके से खास दोस्तों की मौजूदगी में शादी करेंगे.’’

‘‘ठीक है.’’

‘‘मगर, इस की हवा किसी को भी नहीं लगनी चाहिए. यहां तक कि अपने बच्चों को भी नहीं.’’

‘‘मगर, बच्चों को तो बताना ही पड़ेगा,’’ पवन ने कहा, ‘‘जब हमारे हाथपैर नहीं चलेंगे, तब वे ही संभालेंगे.’’

‘‘शादी के बाद एक पार्टी देंगे. जिस का इंतजाम हमारे बच्चे करेंगे,’’ जब सुगंधा ने यह बात कही, तब पवन भी सहमत हो गया.

इस के ठीक एक महीने बाद कुछ खास दोस्तों के बीच अदालत में शादी कर के वे जीवनसाथी बन गए. सारा महल्ला हैरान था. उन्होंने अपनी शादी की जरा भी हवा न लगने दी थी. 2 बूढ़ों की अनोखी शादी पर लोगों ने उन की खिल्ली उड़ाई. मगर उन्होंने इस की जरा भी परवाह नहीं की.

कोई खुश हो या न हो, मगर उन की औलादें इस शादी से खुश थीं, क्योंकि उन्हें मातापिता की नई जोड़ी जो मिल गई थी. Story In Hindi

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