Story In Hindi: मजदूर की सच्ची मुहब्बत – डिग्गी का दर्द

Story In Hindi: सोन नदी पर पुल बन रहा था. सैकड़ों मजदूर और कई इंजीनियर लगे हुए थे. मजदूरों में मर्दऔरत दोनों थे. वे सब दूरदराज से आए थे, इसीलिए ठेकेदार ने उन के रहने के लिए साइट पर ही कच्चे मकान बनवा दिए थे.

मजदूरों में एक रोहित नाम का लड़का ठेकेदार का बहुत चहेता था. 6 फुट लंबा कद, गोराचिट्टा रंग, चौड़ा सीना, लंबे बालों वाले रोहित की पर्सनैलिटी गजब की थी. उस में कमी थी तो सिर्फ यही कि वह किसी की झूठी तारीफ नहीं कर पाता था, इसीलिए 25 साल की उम्र होने के बावजूद वह अकेला था.

एक दिन रोहित की नजर डिग्गी नाम की एक मजदूर लड़की पर पड़ी. डिग्गी का असली नाम क्या था, किसी को नहीं मालूम था, पर वहां ठेकेदार से ले कर इंजीनियर और मजदूर सभी उसे डिग्गी कह कर ही बुलाते थे.

20 साल की डिग्गी बहुत ही मेहनती लड़की थी. वह देखने में बहुत ही खूबसूरत थी, पर हालात की मारी वह बचपन में ही अनाथ हो गई थी और मजदूरी कर के अपना गुजारा करती थी.

डिग्गी चरित्र की बिलकुल साफ थी. बहुत से इंजीनियर और मजदूर उस की भरीपूरी देह देख कर उस पर फिदा हो गए थे. कुछ लोग तो पैसे का भी लालच देते थे, पर वह जिस्म का सौदा करने के बजाय मजदूरी करना ठीक समझी थी. उसे मालूम था कि जिस्म का सौदा कर के वह जवानी में तो ऐशोआराम की जिंदगी जी सकती है, पर उस सुख का अंत बहुत कष्टकारी होता है.

रोहित ने डिग्गी के बारे में सबकुछ पता लगा लिया था और उसे अच्छे से मालूम था कि डिग्गी को सिर्फ प्यार की ताकत से ही अपनाया जा सकता है.

रोहित ने अपने दिल की बात ठेकेदार को बता दी, जिस से ठेकेदार उसे उसी जगह रहने को बोलता जहां डिग्गी काम कर रही होती थी, ताकि वह ज्यादा से ज्यादा समय उस के साथ बिता सके और एक दिन उस के दिल में अपनी जगह बना ले.

डिग्गी का शरीर बहुत आकर्षक और कामवासना से भरपूर था, पर दिनभर मेहनत करने के बाद वह रात को गहरी नींद में सो जाती थी. अकेले रहते हुए भी तनहाई उस से कोसों दूर थी.

इधर रोहित के सिर पर प्यार का भूत सवार था, इसलिए वह दिनभर काम करता, शरीर उस का भी थका रहता था, पर रात की तनहाई उसे काट खाने को दौड़ती थी, क्योंकि उस ने अपनी आंखों में डिग्गी को पाने का ख्वाब जो सजा रखा था.

एक दिन रोहित ने डिग्गी की तरफ देखा, पर जब डिग्गी उस की ओर देखने लगी तो उस ने नजरें घुमा लीं. पर धीरेधीरे डिग्गी समझ गई कि रोहित उस से प्यार करता है, क्योंकि यह लड़कियों का स्वभाव होता है कि वे मर्द की पहली नजर देख कर ही भांप लेती हैं कि सामने वाला उस से क्या चाहता है.

रोहित का जमीर इस बात की गवाही नहीं दे रहा था कि वह सामने से अपने दिल की बात डिग्गी से कह दे, पर एक शाम को ठेकेदार ने डिग्गी से बोल दिया, ‘‘डिग्गी, रोहित तुझे बहुत पसंद करता है, लेकिन वह कुछ कह नहीं पाता है. तुम दोनों की जोड़ी बहुत अच्छी जमेगी. क्या खयाल है तुम्हारा रोहित के बारे में?’’

इतना सुन कर डिग्गी शरमाते हुए वहां से चली गई. ठेकेदार समझ गया कि डिग्गी के दिल में भी रोहित के प्रति प्रेम है, नहीं तो वह उस की बातों का बुरा मान गई होती.

अब डिग्गी रोहित के चालचलन पर ध्यान देने लगी. सीधासादा लड़का किसी और मजदूर औरत से किसी तरह का लगाव नहीं रखता था, इसलिए डिग्गी मन ही मन उस से प्यार करने लगी. वह रोजाना सुबह उठ कर नहा लेती और साफसुथरे कपड़े पहनती. जिस दिन रोहित को नहीं देखती तो बेचैन हो जाती.

रोहित को भी एहसास हो चुका था कि डिग्गी के दिल में उस की ऐंट्री हो चुकी है. अब रोहित हर उस इनसान से झगड़ जाता था, जो डिग्गी के बारे में गलत बोलता था.

जाति से रोहित दलित था. वह ठेकेदार का चहेता और विश्वासपात्र मजदूर था. ठेकेदार ने उस के नाम से भी ठेकेदारी का लाइसैंस बनवा दिया था, ताकि जो टैंडर अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व्ड होता था, वह उस के हाथ से न जाने पाए.

ठेकेदार उस टैंडर को रोहित के नाम से ले लेता था. रोहित के खाते में पैसा आता और वह ईमानदारी से ठेकेदार को दे देता था. काम ठेकेदार अपने हिसाब से करवाता था, इसीलिए इंजीनियर और बाकी के मजदूर रोहित का कुछ नहीं बिगाड़ पाते थे.

एक दिन रोहित फावड़े से मिट्टी खोद रहा था कि अचानक फावड़ा उस के पैर में लग गया. चोट लगने से खून निकलने लगा. वहीं पर डिग्गी काम कर रही थी. वह तुरंत कपड़े से घाव को बांधने लगी और रोने लगी, ‘‘ध्यान कहां रहता है तुम्हारा, कितना खून निकल रहा है.’’

यह सुन कर बाकी मजदूर हैरान रह गए कि रोहित को चोट लगी है तो डिग्गी इतना परेशान क्यों हो गई? रोहित की आंखें भर आई थीं. वे दोनों सब के सामने एकदूसरे के गले लग गए.

रोहित से लिपट कर डिग्गी रोरो कर सुनाने लगी, ‘‘बरसों पहले मैं ने अपने मातापिता को खो दिया था, अब तुम मेरी जिंदगी में आए हो. अगर तुम्हें कुछ हो गया तो फिर मेरा जीने का कोई मकसद ही नहीं रहेगा.’’

ठेकेदार ने उस शाम दोनों को अपने केबिन में बुलाया और बोला, ‘‘तुम दोनों की शादी मैं करा दूंगा, फिलहाल एकसाथ रहो.’’

डिग्गी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस रात रोहित हिम्मत कर के डिग्गी के कमरे पर गया. डिग्गी से जितना हो पाया था, वह उतना सजसंवर कर बैठी थी.

रोहित को अपने कमरे पर देख कर डिग्गी शरमाते हुए बोली, ‘‘रोटीसब्जी बनाई है, खा लो.’’

रोहित बोला, ‘‘मुझे तुम्हारे प्यार की भूख है. मैं तुम से प्यार करने आया हूं.’’

डिग्गी शरमाते हुए बोली, ‘‘मैं आप को अपना सबकुछ मानती हूं. मेरे जिस्म के एकएक हिस्से पर सिर्फ तुम्हारा ही हक है. आप मुझे कभी छोड़ कर मत जाना, नहीं तो मै एक पल भी जिंदा नहीं रह पाऊंगी.’’

रोहित बोला, ‘‘हम दोनों को अब सिर्फ मौत ही जुदा कर सकती है.’’

इतना सुन कर डिग्गी रोहित से लिपट गई. दोनों ने एकदूसरे पर चुंबनों की बौछार कर दी. नदी के किनारे बने उस छोटे से कमरे में डिग्गी की सिसकारियों के साथ दोनों की कामवासना शांत हो गई.

उस दिन से डिग्गी रोहित का भी खाना बनाती थी. काम खत्म होने के बाद रोहित मार्केट से सब्जीराशन जैसा घर का सामान खरीद लाता था.

धीरेधीरे समय बीतता गया. 8वीं तक पढ़ा रोहित ठेकेदारी के सारे दांवपेंच

जान चुका था. अब डिग्गी मजदूरी नहीं करती थी. वह रोहित के साथ साइट पर रहती और औरत मजदूरों की देखरेख करती थी.

एक बार सड़क पुल का टैंडर रोहित के नाम से लिया गया. काम शुरू हो गया था कि अचानक उस के मालिक की सड़क हादसे में मौत हो गई. रोहित को बहुत दुख हुआ. उस के ऊपर पुल बनवाने की सारी जिम्मेदारी आ गई.

इस के पहले भी कई टैंडर रोहित के नाम से कंप्लीट हो चुके थे, जिस से सारे अफसर और इंजीनियर रोहित को ही जानते थे. उस ने भी अपनी सूझबूझ का परिचय दिया और उस पुल को अपने हिसाब से कंप्लीट करवाया, जिस में बहुत सारा पैसा बचा लिया. इस के बाद उस ने अपने लिए एक फ्लैट खरीदा

और डिग्गी को साइट पर ले जाना बंद कर दिया.

रोहित दूसरे ठेकेदारों की तुलना में ज्यादा कमीशन देता था. सारे नेताओं और अफसरों से उस की पहचान हो चुकी थी, इसलिए उसे टैंडर मिलते गए और वह एक कुशल ठेकेदार बन गया. इधर डिग्गी भी अपने रोहित की तरक्की देख कर बहुत खुश थी.

एक बार साइट पर रोहित की मुलाकात नीलू नाम की एक इंजीनियर से हुई. नीलू रोहित की पर्सनैलिटी और पैसा देख कर आकर्षित हो गई और 8वीं जमात तक पढ़ा रोहित नीलू की खूबसूरती और इंगलिश बोलने की कला देख कर उस पर फिदा हो गया.

रोहित टैंडर की दुनिया में राज करना चाहता था, इसलिए सोचा कि अगर नीलू जैसी पढ़ीलिखी लड़की उस के साथ रहेगी तो उस का सपना पूरा हो जाएगा.

रोहित डिग्गी को भूल कर नीलू के प्रेमजाल में फंस गया. दोनों एकदूसरे को डेट करने लगे. 2-2 दिन तक रोहित घर नहीं जाता था. डिग्गी के फोन करने पर साइट पर होने का बहाना बनाता, लेकिन हकीकत में वह नीलू के साथ होटल में गुलछर्रे उड़ा रहा होता था.

एक रात जब रोहित घर नहीं आया तो डिग्गी साइट पर गई. वहां मजदूरों से पता चला कि ठेकेदार साहब तो नीलू मैडम के साथ गाड़ी में बैठ कर शाम को ही चले गए थे.

डिग्गी को बहुत दुख हुआ. उस रात उसे नींद नहीं आई. सुबह होते ही वह साइट पर आई और रोहित से लिपट कर रोने लगी. वह बोली, ‘‘रोहित, मेरे साथ ऐसा मत करो. तुम्हारे अलावा इस दुनिया में कोई नहीं है मेरा.’’

इस बात पर रोहित ने उसे कुछ पैसे दे कर बोला, ‘‘घर जाओ, आज शाम को आऊंगा. नीलू को ले कर ज्यादा चिंता मत करना. उस के आने से मुझे फायदा ही हुआ है, नुकसान नहीं.’’

डिग्गी बोली, ‘‘अगर आज शाम को नहीं आओगे, तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा, सोच लेना.’’

इधर नीलू को जब पता चला कि साइट पर डिग्गी आई थी, तो वह रोहित से नाराजगी जाहिर करते हुए बोली, ‘‘उसे इतना सिर पर मत चढ़ाओ और आज शाम को घर जाने के लिए क्यों बोले हो? आज शाम हम ने फिल्म देखने का प्लान बनाया है न…’’

रोहित नीलू को खोना नहीं चाहता था, इसलिए वह रात को घर नहीं गया और नीलू के साथ फिल्म देखने चला गया. इस बात को डिग्गी ने दिल पर ले लिया. अब वह समझ गई थी कि रोहित उस की जिंदगी में कभी वापस नहीं आएगा, इसलिए जिद में आ कर उस ने पंखे से लटक कर फांसी लगा ली.

सुबह रोहित जब घर गया, तो डिग्गी को पंखे से लटकता देख कर उस का सिर चकरा गया. वह तुरंत जमीन पर गिर गया और चिल्लाचिल्ला कर रोने लगा.

डिग्गी इतना बड़ा कदम उठा लेगी, रोहित ने शायद सपने में भी नहीं सोचा था. डिग्गी सही बोलती थी कि उस के बिना उस का इस दुनिया में कोई नहीं है. सब से बड़ा दुख रोहित को तब हुआ, जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह पता चला कि डिग्गी 3 महीने के पेट से थी.

डिग्गी और उस के पेट में पल रहे बच्चे की मौत का जिम्मेदार रोहित था. झूठे प्यार के चक्कर में एक मजदूर से ठेकेदार बना रोहित अपना सच्चा प्यार और बसाबसाया घरपरिवार खो बैठा. Story In Hindi

Funny Story In Hindi: साहबजी के श्री चरनन में

Funny Story In Hindi: आदरणीय… परमादरणीय सब से बड़े साहबजी, जयहिंद.

जैसे कि आप को पता ही है कि हम 4 चपरासी पिछले 15 सालों से आप के दफ्तर के दरवाजे पर बैठ कर आप के लिए काम करवाने आने वालों से आप के कहे मुताबिक रेट वसूलते रहे हैं. हम से रेट वसूलवाते हुए पता नहीं आप जैसे कितने बड़े साहब आए और आ कर चले गए, पर हम वहीं के वहीं रहे साहबजी.

हे सब से बड़े साहबजी, हमारे द्वारा वसूला गया रेट ऊपर तक जाता है, जैसा कि हमें बताया गया है. इस में हमें कोई एतराज भी नहीं कि हमारे द्वारा जनता से वसूला गया रेट कहां जाता है? जहां जाता हो, वहां जाता रहे. अपना काम तो बस, काम करवाने आयों से आप के द्वारा तय रेट वसूलने के बाद ही उसे दफ्तर में दाखिल होने की इजाजत देना है और इस काम को पिछले 15 सालों से हम पूरी ईमानदारी से निभाते भी आ रहे हैं.

हम ने बिन रेट लिए आप के दफ्तर में आज तक किसी को घुसने नहीं दिया, चाहे वह यमराज ही क्यों न हो. लेकिन हमारी इस ईमानदारी के बाद भी हम वहीं के वहीं बैठे हैं, पर उसी आप के दफ्तर के बाहर वाले स्टूल पर और हम से काम करवाने वाले पता नहीं कहां से कहां पहुंच गए.

कसम बीवीबच्चों की बड़े साहबजी, जो हम ने आज तक जनता से वसूले गए पैसों में से एक पैसा भी अपनी जेब में रखा हो. हम आप के दफ्तर के वे ईमानदार मुलाजिम हैं, जो छोटे बाबू की हथेली में 5 बजने के तुरंत बाद पूरी ईमानदारी से पाईपाई जमा करवाते रहे हैं. हम आप के दफ्तर के सींसियर बंदे हैं, इस का अंदाजा इसी बात से आसानी से लगाया जा सकता है बड़े साहबजी.

बड़े साहबजी, हमें इस बात का बिलकुल दुख नहीं है कि हम गलत काम करते हैं. वैसे भी सही काम यहां कौन कर रहा है? सभी तो अपनेअपने हिसाब से जनता को खा ही रहे हैं. पैसे ले कर भी उसे उस की फाइलों पर नचा ही रहे हैं. हर दफ्तर में जनता होती ही खाने को है, नचाने को है.

बड़े साहबजी, हम चाहते तो नहीं थे कि आप से गुहार लगाएं, आप को वसूले गए धन में से अपने हिस्से का दर्द सुनाएं, पर क्या करें बड़े साहबजी, अब पानी सिर से ऊपर हो रहा है, इसलिए हम आप से गुहार लगाते हैं कि जितना आप के कहने से हम काम करवाने आने वालों से वसूलते हैं, हमें अभी भी उस में से उतना ही कमीशन मिल रहा है, जितना 15 साल पहले मिला करता था.

आप ने अपने दफ्तर में काम करवाने आने वालों के रेट में तो कमरतोड़ इजाफा कर दिया है, पर हमें आप के लिए पैसे इकट्ठे करने में से 15 साल पहले वाला रेट ही मिल रहा है. उस में से भी 2 परसैंट छोटे बाबू मार जाते हैं.

बुरा मत मानना बड़े साहबजी, पर आप की वजह से जनता की सीधी गालियां कौन सुनता है? हम सुनते हैं साहबजी… हम. जनता से पैसे वसूलने के लिए बदनाम कौन होता है? आप? नहीं बड़े साहबजी, हम होते हैं… हम.

बड़े साहबजी, आप तो जानते ही हैं कि हमारे गालियां सुनने से नीचे से ऊपर तक पता नहीं कितनों की जेबें भरती हैं. पता नहीं आप को पता हो या न हो, पर अब वसूली के इस कमीशन में अपना गुजारा होना बहुत मुश्किल हो गया है बड़े साहबजी, इसलिए आप से सादर निवेदन है कि आप सब के लिए इकट्ठे किए गए पैसों में से हमारा कमीशन भी समय के साथ बढ़ाएं.

ऐसा नहीं है कि अपनी मजबूरी हम ने आज तक किसी से न कही हो. इस बारे हम ने म झले बाबू से कई बार गुहार लगाई, उन के आगे हाथ जोड़े, पर उन्होंने हर बार हमें हड़का कर टाल दिया कि जब तक उन्होंने जो फ्लैट खरीदा है, उस की किस्तें पूरी नहीं हो जातीं, उन का बेटा कौन्वैंट स्कूल से जैंटलमैन बन
कर निकल नहीं जाता, तब तक हमारे कमीशन में कोई इजाफा नहीं किया जा सकता. वे खुद इन दिनों केवल हमारे द्वारा वसूले गए पैसों के हिस्से से रोतेबिलखते पल रहे हैं.

बड़े साहबजी, हमारा पिछले 15 बरसों से कमीशन के तौर पर शोषण हो रहा है. जितना हमें आप के द्वारा कमीशन मिलता है, जनता में हम उस से कहीं ज्यादा बदनाम हो रहे हैं. महल्ले वाले सोचते हैं कि हमारे पास पता नहीं कितनी दौलत है, पर वे यह नहीं जानते कि हमारे द्वारा इकट्ठी की गई दौलत जाती कहांकहां है.

आप से हाथ जोड़ कर निवेदन है कि आप काम करवाने आने वालों से जो हम से इकट्ठा करवाते हैं, उस में से जो हमें कमीशन के नाम पर देते हैं, उस की परसैंटेज बढ़ाई जाए. पुराने रेट में जनता से पैसा वसूलने में अब हमें बहुत शर्म आने लगी है.

आप को तो आटेदाल के भाव क्या ही पता होंगे बड़े साहबजी, क्यों पता होंगे बड़े साहबजी, आप को यही बता दें कि बाजार में जो आटा पहले 10 रुपए किलो मिलता था, अब वह 40 रुपए किलो हो गया है और जनता से पैसा वसूलने पर हमारा कमीशन वही 15 साल पुराने वाला.

अब देखो न साहबजी, बाजार में जो दाल पहले 50 रुपए किलो मिलती थी, अब वह 100 रुपए किलो भी नहीं मिल रही और जनता से पैसा वसूलने पर हमारा कमीशन वही 15 साल पुराने वाला.

अब देखो न साहबजी, बाजार में जो दूध पहले 20 रुपए लिटर मिलता था, अब वह 50 रुपए लिटर भी नहीं मिल रहा और जनता से पैसा वसूलने पर हमरा कमीशन वही 15 साल पुराने वाला. आलूप्याज, सब्जियों के रेट तो आप से क्या ही डिसक्स करें…

बड़े साहबजी से निवेदन है कि परमानैंट सरकारी कमीशन एजेंट होने के नाते हमारे कमीशन में बैक डेट से दोगुना बढ़ोतरी की जाए. हो सके तो इस बीच जो हमारा बकाया बनता है, वह भी हमें एरियर के तौर पर एकमुश्त जारी किया जाए, ताकि हम अपने परिवार के साथ उठनेबैठने लायक बनें.

हम हैं आप के दफ्तर के दरवाजे पर सुबह के 9 बजे से ले कर शाम के 6 बजे तक बिना हिलेडुले जनता से पैसे वसूलने, जनता से 200-400 रुपल्ली लेने के बदले हजारहजार की गालियां सुनने वाले 4 कमीशनिया चपरासी. Funny Story In Hindi

Hindi Romantic Story: प्यार का धागा – कैसे धारावी की डौल बन गई डौली

Hindi Romantic Story: सांझ ढलते ही थिरकने लगते थे उस के कदम. मचने लगता था शोर, ‘डौली… डौली… डौली…’

उस के एकएक ठुमके पर बरसने लगते थे नोट. फिर गड़ जाती थीं सब की ललचाई नजरें उस के मचलते अंगों पर. लोग उसे चारों ओर घेर कर अपने अंदर का उबाल जाहिर करते थे.

…और 7 साल बाद वह फिर दिख गई. मेरी उम्मीद के बिलकुल उलट. सोचा था कि जब अगली बार मुलाकात होगी, तो वह जरूर मराठी धोती पहने होगी और बालों का जूड़ा बांध कर उन में लगा दिए होंगे चमेली के फूल या पहले की तरह जींसटीशर्ट में, मेरी राह ताकती, उतनी ही हसीन… उतनी ही कमसिन…

लेकिन आज नजारा बदला हुआ था. यह क्या… मेरे बचपन की डौल यहां आ कर डौली बन गई थी.

लकड़ी की मेज, जिस पर जरमन फूलदान में रंगबिरंगे डैने सजे हुए थे, से सटे हुए गद्देदार सोफे पर हम बैठे

हुए थे. अचानक मेरी नजरें उस पर ठहर गई थीं.

वह मेरी उम्र की थी. बचपन में मेरा हाथ पकड़ कर वह मुझे अपने साथ स्कूल ले कर जाती थी. उन दिनों मेरा परिवार एशिया की सब से बड़ी झोपड़पट्टी में शुमार धारावी इलाके में रहता था. हम ने वहां की तंग गलियों में बचपन बिताया था.

वह मराठी परिवार से थी और मैं राजस्थानी ब्राह्मण परिवार का. उस के पिता आटोरिकशा चलाते थे और उस की मां रेलवे स्टेशन पर अंकुरित अनाज बेचती थी.

हर शुक्रवार को उस के घर में मछली बनती थी, इसलिए मेरी माताजी मुझे उस दिन उस के घर नहीं जाने देती थीं.

बड़ीबड़ी गगनचुंबी इमारतों के बीच धारावी की झोपड़पट्टी में गुजरे लमहे आज भी मुझे याद आते हैं. उगते हुए सूरज की रोशनी पहले बड़ीबड़ी इमारतों में पहुंचती थी, फिर धारावी के बाशिंदों के पास.

धारावी की झोपड़पट्टी को ‘खोली’ के नाम से जाना जाता है. उन खोलियों की छतें टिन की चादरों से ढकी रहती हैं.

जब कभी वह मेरे घर आती, तो वापस अपने घर जाने का नाम ही नहीं लेती थी. वह अकसर मेरी माताजी के साथ रसोईघर में काम करने बैठ जाती थी.

काम भी क्या… छीलतेछीलते आधा किलो मटर तो वह खुद खा जाती थी. माताजी को वह मेरे लिए बहुत पसंद थी, इसलिए वे उस से बहुत स्नेह रखती थीं.

हम कल्याण के बिड़ला कालेज में थर्ड ईयर तक साथ पढे़ थे. हम ने लोकल ट्रेनों में खूब धक्के खाए थे. कभीकभार हम कालेज से बंक मार कर खंडाला तक घूम आते थे. हर शुक्रवार को सिनेमाघर जाना हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया था.

इसी बीच उस की मां की मौत हो गई. कुछ दिनों बाद उस के पिता उस के लिए एक नई मां ले आए थे.

ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद मैं और पढ़ाई करने के लिए दिल्ली चला गया था. कई दिनों तक उस के बगैर मेरा मन नहीं लगा था.

जैसेतैसे 7 साल निकल गए. एक दिन माताजी की चिट्ठी आई. उन्होंने बताया कि उस के घर वाले धारावी से मुंबई में कहीं और चले गए हैं.

7 साल बाद जब मैं लौट कर आया, तो अब उसे इतने बड़े महानगर में कहां ढूंढ़ता? मेरे पास उस का कोई पताठिकाना भी तो नहीं था. मेरे जाने के बाद उस ने माताजी के पास आना भी बंद कर दिया था.

जब वह थी… ऐसा लगता था कि शायद वह मेरे लिए ही बनी हो. और जिंदगी इस कदर खुशगवार थी कि उसे बयां करना मुमकिन नहीं.

मेरा उस से रोज ?ागड़ा होता था. गुस्से के मारे मैं कई दिनों तक उस से बात ही नहीं करता था, तो वह रोरो कर अपना बुरा हाल कर लेती थी. खानापीना छोड़ देती थी. फिर बीमार पड़ जाती थी और जब डाक्टरों के इलाज से ठीक हो कर लौटती थी, तब मुझ से कहती थी, ‘तुम कितने मतलबी हो. एक बार भी आ कर पूछा नहीं कि तुम कैसी हो?’

जब वह ऐसा कहती, तब मैं एक बार हंस भी देता था और आंखों से आंसू भी टपक पड़ते थे.

मैं उसे कई बार समझाता कि ऐसी बात मत किया कर, जिस से हमारे बीच लड़ाई हो और फिर तुम बीमार पड़ जाओ. लेकिन उस की आदत तो जंगल जलेबी की तरह थी, जो मुझे भी गोलमाल कर देती थी.

कुछ भी हो, पर मैं बहुत खुश था, सिवा पिताजी के जो हमेशा अपने ब्राह्मण होने का घमंड दिखाया करते थे.

एक दिन मेरे दोस्त नवीन ने मुझसे कहा, ‘‘यार पृथ्वी… अंधेरी वैस्ट में ‘रैडक्रौस’ नाम का बहुत शानदार बीयर बार है. वहां पर ‘डौली’ नाम की डांसर गजब का डांस करती है. तुम देखने चलोगे क्या? एकाध घूंट बीयर के भी मार लेना. मजा आ जाएगा.’’

बीयर बार के अंदर के हालात से मैं वाकिफ था. मेरा मन भी कच्चा हो रहा था कि अगर पुलिस ने रेड कर दी, तो पता नहीं क्या होगा… फिर भी मैं उस के साथ हो लिया.

रात गहराने के साथ बीयर बार में रोशनी की चमक बढ़ने लगी थी. नकली धुआं उड़ने लगा था. धमाधम तेज म्यूजिक बजने लगा था.

अब इंतजार था डौली के डांस का. अगला नजारा मुझे चौंकाने वाला था. मैं गया तो डौली का डांस देखने था, पर साथ ले आया चिंता की रेखाएं.

उसे देखते ही बार के माहौल में रूखापन दौड़ गया. इतने सालों बाद दिखी तो इस रूप में. उसे वहां देख

कर मेरे अंदर आग फूट रही थी. मेरे अंदर का उबाल तो इतना ज्यादा था कि आंखें लाल हो आई थीं.

आज वह मुझे अनजान सी आंखों से देख रही थी. इस से बड़ा दर्द मेरे लिए और क्या हो सकता था? उसे देखते ही, उस के साथ बिताई यादों के झरोखे खुल गए थे.

मु?ो याद हो आया कि जब तक उस की मां जिंदा थीं, तब तक सब ठीक था. उन के मर जाने के बाद सब धुंधला सा गया था.

उस की अल्हड़ हंसी पर आज ताले जड़े हुए थे. उस के होंठों पर दिखावे की मुसकान थी.

वह अपनेआप को इस कदर पेश कर रही थी, जैसे मुझे कुछ मालूम ही नहीं. वह रात को यहां डांसर का काम किया करती थी और रात की आखिरी लोकल ट्रेन से अपने घर चली जाती थी. उस का गाना खत्म होने तक बीयर की पूरी

2 बोतलें मेरे अंदर समा गई थीं.

मेरा सिर घूमने लगा था. मन तो हुआ उस पर हाथ उठाने का… पर एकाएक उस का बचपन का मासूम चेहरा मेरी आंखों के सामने तैर आया.

मेरा बीयर बार में मन नहीं लग रहा था. आंखों में यादों के आंसू बह रहे थे. मैं उठ कर बाहर चला गया. नवीन तो नशे में चूर हो कर वहीं लुढ़क गया था.

मैं ने रात के 2 बजे तक रेलवे स्टेशन पर उस के आने का इंतजार किया. वह आई, तो उस का हाथ पकड़ कर मैं ने पूछा, ‘‘यह सब क्या है?’’

‘‘तुम इतने दूर चले गए. पढ़ाई छूट गई. पापी पेट के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम तो करना ही था. मैं क्या करती?

‘‘सौतेली मां के ताने सुनने से तो बेहतर था… मैं यहां आ गई. फिर क्या अच्छा, क्या बुरा…’’ उस ने कहा.

‘‘एक बार माताजी से आ कर मिल तो सकती थीं तुम?’’

‘‘हां… तुम्हारे साथ जीने की चाहत मन में लिए मैं गई थी तुम्हारी देहरी पर… लेकिन तुम्हारे दर पर मुझे ठोकर खानी पड़ी.

‘‘इस के बाद मन में ही दफना दिए अनगिनत सपने. खुशियों का सैलाब, जो मन में उमड़ रहा था, तुम्हारे पिता ने शांत कर दिया और मैं बैरंग लौट आई.’’

‘‘तुम्हें एक बार भी मेरा खयाल नहीं आया. कुछ और काम भी तो कर सकती थीं?’’ मैं ने कहा.

‘‘कहां जाती? जहां भी गई, सभी ने जिस्म की नुमाइश की मांग रखी. अब तुम ही बताओ, मैं क्या करती?’’

‘‘मैं जानता हूं कि तुम्हारा मन मैला नहीं है. कल से तुम यहां नहीं आओगी. किसी को कुछ कहनेसम?ाने की जरूरत नहीं है. हम दोनों कल ही दिल्ली चले जाएंगे.’’

‘‘अरे बाबू, क्यों मेरे लिए अपनी जिंदगी खराब कर रहे हो?’’

‘‘खबरदार जो आगे कुछ बोली. बस, कल मेरे घर आ जाना.’’

इतना कह कर मैं घर चला आया और वह अपने घर चली गई. रात सुबह होने के इंतजार में कटी. सुबह उठा, तो अखबार ने मेरे होश उड़ा दिए. एक खबर छपी थी, ‘रैडक्रौस बार की मशहूर डांसर डौली की नींद की ज्यादा गोलियां खाने से मौत.’

मेरा रोमरोम कांप उठा. मेरी खुशी का खजाना आज लुट गया और टूट गया प्यार का धागा.

‘‘शादी करने के लिए कहा था, मरने के लिए नहीं. मुझे इतना पराया सम?ा लिया, जो मुझे अकेला छोड़ कर चली गई? क्या मैं तुम्हारा बो?ा उठाने लायक नहीं था? तुम्हें लाल साड़ी में देखने

की मेरी इच्छा को तुम ने क्यों दफना दिया?’’ मैं चिल्लाया और अपने कानों पर हथेलियां रखते हुए मैं ने आंखें भींच लीं.

बाहर से उड़ कर कुछ टूटे हुए डैने मेरे पास आ कर गिर गए थे. हवा से अखबार के पन्ने भी इधरउधर उड़ने लगे थे. माहौल में फिर सन्नाटा था. रूखापन था. गम से भरी उगती हुई सुबह थी वह. Hindi Romantic Story

Best Hindi Kahani: खिल उठी कलियां

Best Hindi Kahani: हवाईजहाज के पहिए से दिल्ली आया काबुल का किशोर अफगानिस्तान से एक 13 साल का किशोर हवाईजहाज के व्हील वैल (हवाईजहाज के पहिए की जगह) में छिप कर काबुल से दिल्ली पहुंच गया. जब उस किशोर से पूछताछ की गई, तो उस ने बताया कि वह अफगानिस्तान का रहने वाला है और गलती से भारत आने वाली फ्लाइट में चढ़ गया था, जबकि उसे ईरान जाना था. काबुल एयरपोर्ट पर वह मुसाफिरों की गाड़ी के पीछेपीछे अंदर घुस गया था और फिर हवाईजहाज के व्हील वैल में छिप गया था. सफर के दौरान पहिए के अंदर जाने के बाद दरवाजा बंद हो गया और वह उसी में चिपका रहा. यह बेवकूफी पर हिम्मत का काम है, क्योंकि जिस ऊंचाई पर हवाईजहाज उड़ता है, वहां बेहद ठंड होती है और औक्सीजन न के बराबर होती है

‘‘आप चाहें मु झ से कुछ भी कहें, लेकिन अब मैं दोबारा किसी कीमत पर काशान से निकाह नहीं करूंगी. उस ने मेरी जिंदगी जहन्नुम बना दी और आप बोल रही हैं कि मैं काशान से निकाह कर के अपनेआप को दोबारा उसी कैदखाने में कैद कर लूं? घुटन होती है मु झे वहां… आप लोग सम झते क्यों नहीं?’’ हिना बारबार अपनी अम्मी को सम झा रही थी, लेकिन वे किसी भी कीमत पर हिना का निकाह दोबारा काशान से ही करवाना चाहती थीं.

‘‘बेटी, तुम क्यों नहीं सम झ रही हो… काशान के अब्बू रफीक मियां ने खुद हमारे यहां आ कर माफी मांगी है. वे चाहते हैं कि तुम दोबारा उन के घर की बहू बनो,’’ हिना की अम्मी अमीना उसे प्यार से सम झाते हुए बोलीं.

‘‘चलिए ठीक है, मैं काशान से दोबारा निकाह करने के लिए तैयार हूं, मगर मैं किसी भी कीमत पर हलाला नहीं करूंगी. क्या बिना हलाला के रफीक मियां मेरा निकाह काशान से करवाएंगे?’’ हिना ने गुस्से से अपनी अम्मी से कहा.

‘‘हिना, तुम अच्छी तरह से जानती हो कि शरीयत में अगर शौहर गुस्से में आ कर अपनी बीवी को तलाक ए बिद्दत दे देता हैं और वह दोबारा उसी लड़की निकाह करना चाहता है, तो उस की बीवी को हलाला जैसी रस्म से गुजरना ही पड़ेगा… और फिर आसिफ तुम्हारा देवर भी लगता है. तुम उसे बचपन से जानती हो.

उस से चुपचाप तुम्हारा निकाह करवा दिया जाएगा और अगले दिन आसिफ तुम्हें तलाक दे देगा और तुम्हारा काशान से दोबारा हो जाएगा,’’ हिना की अम्मी अमीना ने शरीयत का हवाला देते हुए हिना को सम झाया.

‘‘तो क्या शौहर गलती करे और सजा केवल उस की बीवी को ही मिले? क्या औरत की कोई इज्जत और उस का वजूद नहीं होता है? जब जी चाहा अपना लिया और जब जी चाहा जिंदगी से निकाल कर फेंक दिया?’’ हिना रोते हुए बोली.

हिना की बात सुन कर अमीना चुपचाप कमरे से बाहर आ गईं.

हिना को सम झ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. जिस को वह बेइंतहा मुहब्बत करती थी आज उसी के साथ उस का हलाला करवाने की बात की जा रही है. उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे वह आसिफ को एक बार फिर एक बड़ा जख्म देने की तैयारी कर रही है.

हिना को उस के शौहर काशान ने तलाक दे दिया था और उस के इद्दत के दिन पूरे हो गए थे, इसलिए उस की अम्मी और अब्बू उसे दोबारा काशान से निकाह करने के लिए बोल रहे थे, लेकिन वह किसी कीमत पर काशान से निकाह नहीं करना चाहती थी.

काश, हिना ने उस वक्त आवाज उठाई होती, जब आसिफ से उस की शादी न कर के काशान से करवाने की बात कही गई थी, तो आज उस की जिंदगी खराब नहीं होती.

यह सोचते ही हिना को ऐसा महसूस होने लगा था कि उस के जख्म एक बार फिर हरे हो गए हैं और उन में से टीस उठने लगी है.

कितनी मुहब्बत करते थे वे दोनों. आसिफ हिना के पड़ोस में ही रहता था. बचपन में वह और आसिफ साथ ही खेला करते थे. जब वह पढ़ाई करती थी, तो अकसर आसिफ से सवाल के जवाब पूछने पहुंच जाती थी.

पढ़तेपढ़ाते वे दोनों कब जवानी की दहलीज पर पहुंच गए, उन्हें इस का पता ही नहीं चला… यही नहीं, वे दोनों एकदूसरे से मुहब्बत भी करने लगे थे और यह बात किसी से छिपी हुई नहीं थी. 1-2 बार हिना के अब्बू ने खुद ही कहा था कि वे उस की शादी आसिफ से ही करवाएंगे.

सबकुछ ठीक ही चल रहा था. आसिफ अपने अब्बू के साथ कपड़े की दुकान पर ही बैठता था और साथ ही वह पढ़ाई भी कर रहा था. इसी बीच आसिफ के अब्बू बीमार पड़ गए. उन का काफी इलाज करवाया गया, लेकिन वे बच नहीं पाए.

आसिफ को अपने अब्बू के इलाज में काफी पैसे खर्च करने पड़ गए, जिस की वजह से दुकानदारी गड़बड़ा गई और घर के हालात खराब हो गए.

उस वक्त हिना ने खुद आसिफ का हौसला बढ़ाया था, जिस के चलते आसिफ की हिम्मत नहीं टूटी. उस ने पढ़ाई छोड़ कर दुकान पर बैठना शुरू कर दिया था. बेहतर क्वालिटी का सामान और पढ़ालिखा होने से उस की दुकान फिर चल निकली.

पैसे की कमी देखते हुए हिना ने आसिफ को बैंक से लोन लेने का सु झाव दिया. आसिफ ने भागदौड़ कर के बैंक से दुकान के लिए लोन ले लिया था. उसी से दुकान का काम भी अच्छा चल निकला.

उधर हिना के अब्बू ने उस का रिश्ता ढूंढ़ना शुरू कर दिया था. हिना को जब इस बात का पता चला, तो उस ने आसिफ से उस के घर पर अपनी अम्मी के जरीए रिश्ता भेजने के लिए बोल दिया.

आसिफ की अम्मी जब रिश्ता ले कर घर आईं, तो हिना बहुत खुश थी और वह आसिफ के साथ शादी के सपनों में खो गई. लेकिन हिना के अब्बू ने साफ मना करते हुए कह दिया, ‘‘हम अपनी बेटी की शादी किसी बड़े घर में करेंगे, जहां पर वह रानी बन कर रहेगी. तुम्हारे घर में तो उसे ढंग का कपड़ा और खाना भी नहीं मिलेगा.’’

हिना के अब्बू की बात सुन कर आसिफ की अम्मी चुपचाप वहां से चली गईं.

उस दिन हिना बहुत रोई थी, लेकिन वह इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाई कि अपने अब्बू से बोल सके कि वह आसिफ से ही शादी करेगी.

हिना को अच्छी तरह से याद है कि जब वह आसिफ से मिली थी, तो आसिफ काफी रोया था और उस को अपनी मुहब्बत की दुहाई दे रहा था, लेकिन वह खामोश रही और चुपचाप घर वापस आ गई थी.

हिना के अब्बू ने पैसे वाला देख कर उस की शादी आसिफ के चाचा रफीक मियां के बेटे काशान से करवा दी थी. रफीक मियां काफी अमीर थे. जमीनजायदाद के अलावा एक कपड़े की दुकान भी थी, जिस पर काशान अपने अब्बू के साथ बैठता था.

हिना की शादी बहुत ही धूमधाम के साथ हुई. सभी को यकीन था कि हिना वहां बहुत सुखी रहेगी. लेकिन शादी के एक महीने बाद से ही हिना और काशान में झगड़े शुरू हो गए. इन झगड़ों की वजह यह भी थी कि हिना पढ़ीलिखी थी और काशान ठीक से दस्तखत भी नहीं कर पाता था. काशान अकसर उस की बेइज्जती कर देता और पिटाई भी. वह हिना को कहीं अकेले बाहर भी नहीं जाने देता था.

काशान औनलाइन सट्टेबाजी किया करता था. यही नहीं, उस ने औनलाइन जुआ भी खेलना शुरू कर दिया था. हिना जब मना करती, तो काशान झगड़ा करना शुरू कर देता.

उधर लगातार जुए और सट्टेबाजी की वजह से दुकान में घाटा हो रहा था, लेकिन सास का कहना था कि जब से हिना के पैर घर में पड़े हैं, तब से नुकसान हो रहा है, जबकि सभी जानते थे कि काशान औनलाइन सट्टे और जुए में सबकुछ बरबाद कर रहा है.

एक दिन झगड़ा ज्यादा बढ़ गया तो सास भी अपने बेटे की तरफदारी करने लगीं और काशान ने हिना को तलाक दे दिया. तलाक की बात सुन कर सभी हैरान रह गए थे. हिना चुपचाप अपने घर आ गई थी. सभी सोच रहे थे कि हिना की जिंदगी खराब हो गई है, लेकिन यह बात हिना जानती थी कि कम से कम उसे इस जहन्नुम से तो छुटकारा मिल गया.

‘‘हिना…’’ तभी किसी की आवाज सुन कर वह यादों के भंवर से निकल कर वापस आ गई. उस ने देखा कि कमरे में उस की सहेली अंजुम खड़ी थी. उस ने अपने गालों पर आए आंसुओं को पोंछते हुए अंजुम को एक ओर बैठने का इशारा किया.

‘‘हिना, तुम क्यों नहीं खाला की बात मान लेती… जिस से तुम मुहब्बत करती थी उसी से तुम्हें हलाला की रस्म अदा करनी पड़ेगी, तो इस में परेशानी किस बात की है…’’ अंजुम उसे सम झाते हुए बोली.

आसिफ का नाम सुनते ही हिना के चेहरे पर अनोखी चमक आ गई थी, लेकिन वह कुछ नहीं बोली. पर फिर उस ने कुछ सोच कर अंजुम के सामने हामी भर ली. उस की ‘हां’ सुन कर अंजुम वहां से चली गई.

दूसरी ओर जब से रफीक चाचा ने आसिफ से हिना के साथ हलाला करने के रस्म अदायगी की बात कही थी, तब से वह काफी उल झन में था, इसलिए वह छत पर बैठा यों ही मोबाइल में फालतू की रील्स देख रहा था.

‘‘आसिफ, नीचे आ कर खाना खा लो,’’ तभी उसे अपनी अम्मी की आवाज सुनाई दी.

आसिफ ने मोबाइल जेब में रखा और छत से नीचे उतर आया. अम्मी ने उस को खाना दे दिया. उस ने हाथमुंह धो कर बेमन से खाना खाया और फिर अपने कमरे में चला गया.

आसिफ को लग रहा था कि हिना की बेइज्जती करने के लिए ही उस का इस्तेमाल किया जा है.

उधर हिना बिना किसी को बताए आसिफ के घर पहुंच गई. उस की अम्मी को ‘सलाम’ कर के वह सीधी आसिफ के कमरे में दाखिल हो गई.

‘‘क्या हो रहा है?’’ हिना ने पूछा.

‘‘तुम…?’’ आसिफ ने हैरान हो कर कहा.

‘‘हां आसिफ, मैं तुम से बात करने आई हूं,’’ सामने पड़े हुए स्टूल पर बैठते हुए हिना बोली.

‘‘क्या बात है?’’ आसिफ ने हिना से पूछा.

आसिफ को देख कर हिना को लग रहा था कि अचानक उस के दिल की धड़कन तेज हो गई थी.

‘‘अभी रफीक मियां तुम्हारे पास आए थे न?’’ हिना बोली.

‘‘हां, वे फिर तुम्हें अपने घर की बहू बनाना चाहते हैं. वे मानते हैं कि गलती काशान की थी,’’ आसिफ धीरे से बोला.

‘‘अगर गलती काशान की थी, तो सजा मु झे क्यों दी जा रही है?’’ भर्राई हुई आवाज में हिना बोली.

‘‘काशान से दोबारा निकाह के लिए हलाला तो करना ही पड़ेगा,’’ आसिफ बोला.

‘‘मुझे मालूम है कि मेरा निकाह तुम्हारे साथ हो रहा है, इसीलिए अब मैं ने ‘हां’ कर दी है. मैं जानती हूं कि उस के अम्मीअब्बू को तो इस बात का एहसास नहीं हो रहा है कि उन की बहू के साथ उस घर में क्याक्या जुल्म हुए हैं और वह किस तरह जहन्नुम की आग में जल रही थी, क्योंकि उन्हें लगता है कि जिंदगी में पैसा ही सबकुछ है.

‘‘लेकिन तुम तो मु झ से मुहब्बत करते थे… तुम इस बात को कैसे भूल गए? बस, मैं तुम्हें इतना बताने आई हूं कि निकाह के बाद मैं तुम्हारी बीवी बन जाऊंगी. क्या तुम अपनी बीवी को किसी दूसरे के हवाले कर दोगे?’’ रोते हुए हिना बोली.

‘‘लेकिन…’’ हिना की बात से आसिफ के पूरे बदन में सिहरन सी दौड़ गई और वह कुछ बोल न सका.

‘‘और हां, अगर हलाला के नाम पर तुम ने मु झे तलाक दे दिया, तब भी मैं उस जहन्नुम में नहीं जाऊंगी. निकाह कुबूल करना या न करना मेरा फैसला होगा.’’

‘‘तब सभी मु झे गलत कहेंगे…’’ आसिफ ने कहा.

‘‘तुम तो पढ़ेलिखे सम झदार हो. क्या लोगों के कहने पर अपनी बीवी को छोड़ दोगे?’’ हिना रोती जा रही थी और बोले जा रही थी. उसे सम झ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे.

उधर हिना को रोते देख कर अनायास ही आसिफ की आंखों से भी आंसू बहने लगे थे. तभी किसी ने हिना के कंधे पर हाथ रखा. हिना ने देखा कि कमरे में उस के अब्बू आ गए थे और उन के साथ ही आसिफ की अम्मी भी खड़ी थीं.

‘‘बेटी, मुझे माफ कर दो. मैं सिर्फ अपनी इज्जत और रुतबे का खयाल कर रहा था. मैं नहीं जानता था कि मेरी बेटी किस दर्द से गुजर रही है. मैं ने तुम दोनों को एक बार अलग कर के गलती की थी, लेकिन अब मैं यह गलती दोबारा नहीं करूंगा. अब तुम सिर्फ आसिफ की ही दुलहन बनोगी,’’ अब्बू ने कहा.

हिना ने देखा कि उस के अब्बू की भी आंखों में आंसू थे. वह उठ कर कर अब्बू के गले लग गई. आज उसे लग रहा था कि एक बार फिर से उस की जिंदगी में बहार आ गई है और कलियां खिलने लगी हैं. Best Hindi Kahani

Hindi Family Story: एक सच यह भी

Hindi Family Story: ‘‘नलिनी…’’ अपने नाम की पुकार के साथ ही नलिनी के हड़बड़ाते कदम ठिठक गए और उस की नजरें पुकार की दिशा में घूम गईं.

‘‘इन लोगों ने मु झे जबरदस्ती पकड़ लिया है. मैं बेकुसूर हूं. मैं ने कुछ नहीं किया. इन्हें सम झाओ…’’

‘‘मैडम, क्या आप इसे पहचानती हैं?’’ एक पुलिस वाले ने नलिनी से पूछा.

अपने पति जतिन की आंखों में सवालिया निशान देख कर नलिनी के चेहरे पर घबराहट दिखने लगी और ‘हां’ में हिलने वाली उस की गरदन कब ‘न’ के अंदाज में इधर से उधर तेजी से हिल उठी, खुद नलिनी को भी पता नहीं चला.

रेहान का चेहरा लटक गया. आंखों में उभरे आशा के दीप अचानक से बुझ गए.

जिस सवाल से नलिनी पूरा दिन बचने की कोशिश करती रही, रात को बिस्तर पर आते ही जतिन ने वही सवाल बंदूक की गोली सा दाग दिया, ‘‘तुम वाकई उस शख्स को नहीं जानती?’’

‘‘किस को?’’ नलिनी ने अनजान बन कर पूछा, लेकिन उस के दिल की गड़गड़ाहट बेकाबू हुए जा रही थी.

‘‘वही जिसे मौल से पुलिस पकड़ कर ले जा रही थी.’’

‘‘आप मु झ पर शक कर रहे हैं?’’

‘‘नहीं. अगर तुम कह रही हो, तो वाकई तुम उसे नहीं जानती. आओ, अब सो जाते हैं,’’ जतिन हमेशा की तरह नलिनी को अपनी बांहों में ले कर सुलाने लगे, पर नलिनी का दिल रो उठा.

‘कितना प्यार और भरोसा करते हैं जतिन मु झ पर… और मैं उन के भरोसे का यह सिला दे रही हूं… सिर्फ उन का ही नहीं, बल्कि मैं ने रेहान का भी भरोसा तोड़ दिया है. कितनी उम्मीद से उस ने मु झे पुकारा था और मैं ने उसे पहचानने से ही इनकार कर दिया…’ गहराती रात के साथ नलिनी के दिल का दर्द बढ़ता जा रहा था. वह जतिन के सीने से लग कर फफक उठी.

‘‘मुझे माफ कर दीजिए. मैं ने आप से झूठ बोला था. मैं उस शख्स को जानती हूं,’’ नलिनी बोली.

‘‘मुझे मालूम है,’’ यह कहते हुए जतिन शांत थे.

‘‘क्या? पर कैसे?’’ नलिनी ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘अरे यार, वकील हूं. पारखी नजर और तेज दिमाग रखता हूं.’’

‘‘फिर भी आप ने कोई सवालजवाब नहीं किया?’’

‘‘तुम्हारे प्यार के आगे सब बातें फालतू हैं. अगर तुम नहीं बताना चाहती, तो मैं कभी भी नहीं पूछूंगा.’’

‘‘लेकिन मैं सबकुछ बताना चाहती हूं. मेरे दिल पर बहुत बड़ा बो झ है. सोचा तो था कि वह किस्सा वहीं दफन हो गया, पर अब आप को बताए बिना मु झे चैन नहीं पड़ेगा.

‘‘आप को तो पता ही है कि शादी से पहले मैं एक डिस्पैंसरी में नौकरी करती थी. लोगों की सम झाइश के लिए मुझे आसपास के कसबों और शहरों का दौरा करना पड़ता था. यह वाकिआ हमारी मंगनी के बाद का है.

‘‘मैं पास के एक शहर का दौरा कर के बस से लौट रही थी. एक कसबानुमा जगह पर बस रुकी. 2-4 मुसाफिर उतरे. उस के बाद ड्राइवर ने चाबी घुमाई, पर बस नहीं चली. खलासी और कुछ दूसरे लोगों ने उतर कर बस को धक्का भी लगाया, पर वह नहीं चली.

‘‘ड्राइवर ने हाथ खड़े कर दिए कि बस आगे नहीं जा पाएगी. अब तो सवेरे ही कुछ हो पाएगा. सभी लोग रात गुजारने का बंदोबस्त कर लें.

‘‘मेरे पास सूटकेस ले कर उतरने के अलावा कोई चारा नहीं था. मैं ने एक आदमी से किसी होटल का पता पूछा, तो उस ने सामने एक लौज की ओर इशारा कर दिया, जहां लुंगी पहने कुछ लोग शराब पीते, बोटियां चबाते नजर आ रहे थे.

‘‘मैं उस ओर जाने की सोचने से ही सिहर उठी थी. हमारी बस का एक मुसाफिर, जो मेरे सामने वाली सीट पर बैठा था और इसी कसबे में उतर गया था, अपने एक दोस्त से बतियाता अभी तक वहीं खड़ा था. उस ने मेरी कशमकश का अंदाजा लगा लिया था. वह मेरे पास आया और अपने घर चलने की कहने लगा.

‘‘उस ने मु झ से कहा, ‘घबराइए नहीं. घर पर मेरे मातापिता हैं, छोटी बहन भी है.’

‘‘मेरे पास दूसरा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. उस ने एक आटोरिकशा किया और मैं उस के साथ चल दी.’’
जतिन ने पूछा, ‘‘यह वही नौजवान था, जो आज मौल में मिला था?’’

‘‘हां, वही था. उस का नाम रेहान है. पर उस वक्त तक मु झे मालूम नहीं था कि मैं एक मुसलिम नौजवान के साथ जा रही हूं, वरना उस समय के हिंदूमुसलिम दंगे वाले माहौल में मैं ऐसा खतरा कभी नहीं उठाती.

‘‘जब तंग गलियों से आटोरिकशा गुजरने लगा, तो मु झे अहसास हुआ कि एक अनजान शख्स के साथ आ कर मैं ने कितनी बड़ी गलती कर दी है. इस से अच्छा तो वहीं बसस्टैंड पर ही जागते हुए रात गुजार देती.

इतने लोग थे तो वहां. पर अब क्या हो सकता था…

‘‘एक घर के आगे जा कर आटोरिकशा रुका, तो अंदर से एक लड़की चहकती हुई आई और ‘भाईजान’ कहते हुए उस शख्स से लिपट गई. तब कहीं जा कर मेरी जान में जान आई.

‘‘तब तक उस के मातापिता भी बाहर आ चुके थे. उन्हें देख कर मेरा माथा ठनका. पहली नजर में ही मु झे लग गया कि मैं किसी कट्टर मुसलिम परिवार में आ गई हूं.’’

‘‘लेकिन इस में इतना खौफ खाने की वजह?’’ जतिन ने सवाल किया.

‘‘एक तो यही कि उस समय भी माहौल ठीक नहीं था. दूसरे, अपने दौरों के दौरान मैं ने हमेशा यह महसूस किया कि मुसलिम बहुत कट्टर होते हैं और मेरी परिवार नियोजन की दलीलों पर वे जरा भी कान नहीं देते थे.’’

‘‘ओह…’’ जतिन के मुंह से निकला.

‘‘रेहान की बहन, जिस का नाम सलमा था, उसे चहकते हुए बता रही थी कि अम्मी ने उस की मनपसंद मुर्ग बिरयानी बना रखी है… मु झे तो यह सुन कर ही मितली आने लगी थी. पर उस की अम्मी बहुत सम झदार निकलीं. तब तक रेहान उन्हें मेरे बारे में सबकुछ बता चुका था…

‘‘रेहान की अम्मी बोलीं, ‘इसे अपना ही घर सम झो बेटी.’

‘‘यह बात कह कर उन्होंने मु झे अपना बना लिया था. फिर तो मेरे लाख कहने पर भी वे मेरे लिए ताजा खाना बना कर ही मानी थीं. सब ने मेरे साथ बैठ कर दाल और आलू की सब्जी खाई थी. यह कह कर कि बिरियानी हम कल खा लेंगे, मेहमाननवाजी का मौका कबकब मिलता है.

‘‘उन्होंने मेरा दिल जीत लिया था. सारा खौफ पल में छूमंतर हो गया था. रात को मैं और सलमा एक कमरे में सो गए थे. रेहान ने बैठक में बिस्तर लगा लिया था.

‘‘अनजान माहौल में नींद आते मु झे वक्त लगा था. सच कहूं, तड़के जा कर ही आंख लग पाई थी कि तभी मैं चौंक कर उठ बैठी थी. देखा, रेहान मेरे ऊपर झुका हुआ था.

‘‘मैं चिल्लाने ही वाली थी कि उस ने अपना हाथ मेरे मुंह पर रख दिया और बोला, ‘आप की बस ठीक हो गई है, इसलिए उठाने आया था. बाहर माहौल अभी भी गड़बड़ ही है. हमें चुपचाप निकलना होगा.’

‘‘मैं ‘ओह’ कह कर बुरी तरह झेंप गई थी. उस की अम्मी ने गले लग कर खूब अपनेपन से मु झे विदा किया था. रेहान मु झे छिपताछिपाता बसस्टैंड ले गया.

‘‘बस में बिठा कर वह तब तक मुसकरा कर हाथ हिलाता रहा, जब तक मैं उस की आंखों से ओ झल नहीं हो गई थी. मेरी उस से वही पहली और आखिरी मुलाकात थी.

‘‘पूरी रात किसी अनजान विधर्मी परिवार के साथ गुजारने की यह बात न तो मैं ने अपने परिवार वालों को बताई और न तुम्हें. बेवजह तिल का ताड़ बन जाता. आज भी यही सोच कर मैं ने उसे पहचानने से ही इनकार कर दिया कि पता नहीं तुम इस पहचान का क्या मतलब निकाल लो.’’

‘‘बस, इतना ही भरोसा है अपने प्यार पर? नलिनी, वक्त, इज्जत और एतबार ऐसे परिंदे हैं, जो एक बार उड़ जाएं, तो वापस नहीं आते,’’ जतिन ने कहा.

‘‘तभी तो शर्मिंदा हूं. और अब अपने प्यार पर विश्वास के संबल से ही सबकुछ बताने की हिम्मत कर पाई हूं… कल की घटना याद करती हूं, तो अब भी सहम जाती हूं. बम, आतंकवाद, विस्फोट… क्या रेहान ऐसा कर सकता है?’’

‘‘मैं ने खुद उसे कूड़ेदान में पैकेट रखते देखा था. उस के कूड़ेदान में पैकेट रख कर दूर हटने के थोड़ी देर बाद ही विस्फोट हो गया था,’’ जतिन गंभीर थे.

‘‘ओह, कोई इनसान इतना दोगला भी हो सकता है, मैं ने नहीं सोचा था. अच्छा हुआ, मैं ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया. ऐसे आतंकवादी देशद्रोहियों को तो फांसी ही लगनी चाहिए,’’ नलिनी फिर से तैश में आ
गई थी.

‘‘तुम बहुत जल्द फैसले लेती, बदलती रहती हो नलिनी. जिस इनसान से, उस के परिवार से तुम मिल कर आई हो, मेहमाननवाजी देख कर आई हो, उस के बारे में इतनी जल्दी अपनी राय बदल ली?

‘‘जिस तरह कानों सुना हमेशा सच नहीं होता, उसी तरह कई बार आंखों देखा भी सच नहीं होता.

‘‘यह भी तो हो सकता है कि बम कूड़ेदान में पहले से रखा हो. रेहान उस में कूड़ा डालने गया हो और उस की तसवीर सीसीटीवी कैमरे में कैद होते ही विस्फोट हो गया हो…’’

‘‘हां, बिलकुल मुमकिन है. मु झे तो लगता है कि बिलकुल ऐसा ही हुआ है,’’ नलिनी बोली.

‘‘लो, फिर तुम ने इतनी जल्दी राय बदल ली… कभी किसी के बहकावे में मत आओ. अपना दिमाग भी लगाओ. इनसानी संबंधों में सब से बड़ी गलती यह है कि हम आधा सुनते हैं, एकचौथाई सम झते हैं, जीरो सोचते हैं, लेकिन अपनी राय दोगुनी देते हैं.’’

‘‘अच्छा वकील साहब. मैं ने हार मानी. मुझ में आप जैसा तेज दिमाग नहीं है,’’ नलिनी ने जैसे हथियार डाल
दिए थे.

‘‘मेरे साथ जेल चलोगी?’’

‘‘क्यों? हम ने क्या किया है?’’ नलिनी बौखला उठी थी.

‘‘रेहान से मिलने,’’ जतिन की मुसकराहट बरकरार थी.

‘‘ओह. आप तो मु झे डरा ही देते हैं,’’ कह कर नलिनी इतमीनान से जतिन के सीने से लग गई थी. जब जिंदगी नामक स्क्रीन लो बैटरी दिखाती है और कोई चार्जर नहीं मिलता, तब जो पावर बैंक काम आता है, उसे पति कहते हैं.

अगले दिन धड़कते दिल से जतिन का हाथ थामे नलिनी जेल में दाखिल हुई.

रेहान ने नलिनी को देखा, तो मुंह फेर लिया और बोला, ‘‘मैं इन्हें नहीं जानता. इन्हें कह दीजिए कि यहां से चली जाएं.’’

‘‘रेहान, भाई प्लीज, इसे माफ कर दो. यह उस वक्त बहुत घबरा गई थी. मैं जतिन हूं. नलिनी का पति और एक वकील. मुझे सब खुल कर बताओ. शायद मैं तुम्हारी मदद कर सकूं,’’ जतिन बोले.

‘‘मैं आतंकवादी कैसे हो सकता हूं साहब? मैं तो खुद अपना पूरा परिवार ऐसे ही एक हादसे में खो बैठा हूं,’’ रेहान बोला.

‘‘क्या? सलमा, अम्मी…’’ नलिनी हैरान थी.

‘‘हां, नलिनी बहन. सलमा, अम्मीअब्बू सब ऐसे ही एक विस्फोट में जान से हाथ धो बैठे थे. मैं तो जीतेजी ही मर चुका था.

‘‘इनसान उन चीजों से कम बीमार होता है, जो वह खाता है, बल्कि उन चीजों से ज्यादा बीमार होता है, जो उसे अंदर ही अंदर खाती हैं.

‘‘सम झ नहीं आता कि बेकुसूर लोगों की जान लेने से इन का कौन सा मकसद पूरा होता है? मुसलिम तो मैं भी हूं, लेकिन मेरा क्या किसी का भी धर्म ऐसा घिनौना काम करने की इजाजत नहीं देता.

‘‘मैं तो अपने डिस्पोजेबल बरतन कूड़ेदान में डालने गया था और काउंटर पर पैसे दे कर निकल ही रहा था कि वह धमाका हो गया.

‘‘मैं तो खुद हैरान था कि यह क्या हुआ कि तभी वहां तैनात पुलिस वालों ने पूछताछ करना शुरू कर दिया और मुझे पकड़ लिया.

‘‘जब तक माजरा समझ आता तब तक बहुत देर हो चुकी थी. मेरी पहचान ही मेरी दुश्मन बन गई.

‘‘धर्म एक होने से क्या इनसानों का मकसद भी एक हो जाता है? खैर, अब फांसी भी हो जाए तो कोई गम नहीं. मेरी बहन ने तो मु झे गलत नहीं सम झा. मेरे लिए इतना ही काफी है.’’

‘‘जल्दी जागना हमेशा ही फायदेमंद होता है. चाहे वह नींद से हो, अहम से हो या वहम से हो. चिंता मत करो. तुम्हारा केस अब मैं लड़ूंगा. तुम्हारी कही गई बातों पर मुझे भरोसा है. तुम बस अपना मनोबल बनाए रखना,’’ जतिन ने कहा.

नलिनी ने आगे बढ़ कर सलाखें पकड़े खड़े रेहान के हाथों पर अपने हाथ रख दिए थे, जो इस बात का सुबूत थे कि इस जंग में वह भी उस के साथ है. Hindi Family Story

Hindi Romantic Story: प्यार का नशा

Hindi Romantic Story: गीता का ब्याह तो रामशरण से हुआ था, लेकिन वह उसे नहीं चाहती थी. उस का दिल तो अपने पुराने आशिक सुखराम से लगा हुआ था.

शादी के पहले ही संगीता उसे अपना सबकुछ दे बैठी थी. शादी तो घर वालों ने उस की पसंद पूछे बिना ही रामशरण से कर दी थी. उस ने भी घर वालों को अपनी पसंद नहीं बताई थी.

रामशरण चौकीदार था. उस की अकसर नाइट ड्यूटी रहा करती थी. वह सीधासादा आदमी था. रात को 8 बजे टिफिन ले कर घर से निकलता, तो सुबह 8 बजे ही लौटता.

संगीता रात को घर में अकेली रहती. रात को देर तक वह अपने आशिक सुखराम से मोबाइल पर बातें करती थी. वीडियो काल कर के भी अपना हालेदिल बयां करती थी.

आशिक सुखराम संगीता के मायके वाले गांव में रहता था. कभीकभार वह संगीता से मिलने आया करता था.

वह पूरी रात वहीं गुजारता, ऐश करता और सुबह चला जाता.

ऐसा कई महीने तक चलता रहा.

संगीता के पड़ोसियों में सुखराम को ले कर खुसुरफुसुर हुआ करती थी. कोई पूछता, तो संगीता कह देती, ‘‘मेरे सुक्खू भैया हैं, कभीकभार मिलने आ जाते हैं.’’

पड़ोसी इतने नादान नहीं थे. उन्हें शक हो गया था कि चुपचाप रात को आने वाला भैया नहीं, बल्कि सैयां है. कई औरतें इस बारे में खूब रस लेले कर बातें किया करती थीं.

बूढ़ी सुखिया काकी कहती थीं, ‘‘बेचारा रामशरण कमातेकमाते मर रहा है और इधर यह छैलछबीली औरत पराए मर्द के साथ पाप कर रही है. नरक में जाएगी, नरक में. कहे देती हूं कि एक दिन भुगतेगी.

‘‘मैं ने दुनिया देखी है. पराया मर्द किसी का सगा हुआ है क्या… रस ले कर छोड़ देगा. आजकल तो लोग हत्या भी कर देते हैं. कोई बताओ रे, बेचारा रामशरण इस पापलीला से अनजान है अभी तक.’’

जब रामशरण से किसी ने कुछ नहीं बताया, तो एक दिन सुबह सुखिया काकी ने ही हिम्मत दिखाई. उन्होंने काम से लौट रहे रामशरण को अपने घर के पास रोक लिया और पूछा, ‘‘आ गए बेटा…’’

‘‘हां काकी, कैसी हो?’’

‘‘मैं तो ठीक हूं बेटा, तुम अपनी सुनाओ. खड़ी कर दो साइकिल, आओ बैठ जाओ थोड़ा सुस्ता लो.’’

रामशरण जा कर सुखिया काकी के घर में बैठ गया.

‘‘कल रात को तुम्हारा साला आया था. तुम से मुलाकात हुई कि नहीं? वह अकसर रात को आता है,’’ सुखिया काकी ने बताया.

‘‘मु झे कुछ नहीं पता काकी. मेरा कोई साला नहीं है. मेरी पत्नी संगीता अपने मातापिता की एकलौती औलाद है. मैं उस से पूछूंगा कि कौन आता है,’’ रामशरण को शक हुआ.

‘‘लेकिन बेटा, मेरा नाम मत लेना. मु झे तो लगता है कि तुम्हारे साथ धोखा हो रहा है. बुरा मत मानना, लेकिन मुझे तुम्हारी औरत का चालचलन ठीक नहीं लगता.’’

रामशरण घर गया. पहले तो उस के मन में आया कि वह संगीता से पूछे कि कौन आता है, लेकिन बाद में उस ने सोचा कि वह खुद ही पकड़ेगा, पूछताछ करना ठीक नहीं होगा.

उसी दिन रामशरण ने महल्ले के एक लड़के से बात की, ‘‘राजू, मेरे घर की देखभाल किया कर. पता चला है कि कोई आता है.’’

‘‘आप को आज पता चला है, वह तो कई महीने से आ रहा है. चाची कहती हैं कि वह उन का भैया है. अब वह दिखाई पड़ गया, तो आप को फोन करूंगा.

‘‘आप खुद ही पूछ लेना कि वह कौन है. कोई गलत आदमी होगा, तो उस की कुटाई की जाएगी तबीयत से,’’ राजू बोला.

समय गुजरता गया. एक रात रामशरण का फोन बज उठा. उस ने देखा कि राजू का फोन है. उस ने कहा, ‘‘हां, राजू बोल, क्या बात है?’’

‘चाचा, कुछ देर पहले ही वह आदमी आप के घर आया है. आ जाओ जल्दी से.’

‘‘ठीक है बेटा, आता हूं.’’

कुछ देर में रामशरण घर पहुंच गया और उस ने दरवाजा खटखटाया.

‘‘कौन है?’’ अंदर से संगीता की आवाज आई.

‘‘मैं हूं, दरवाजा खोलो,’’ रामशरण बोला.

यह सुन कर संगीता घबरा गई.

उस ने सुखराम को जल्दी से पलंग के नीचे छिपाया और फिर जा कर दरवाजा खोला.

‘‘आज रात को ही कैसे आ गए?’’ संगीता ने पूछा.

‘‘ब्लड प्रैशर की दवा भूल गया था. वही लेने आया हूं.’’

‘‘रुको, मैं ला देती हूं.’’

‘‘नहीं, रहने दो. मैं दवा यहीं खाऊंगा,’’ यह कह कर रामशरण अंदर चला गया.

संगीता दवा और पानी लेने चली गई. इधर रामशरण ने तंबाकू रगड़ना शुरू कर दिया.

‘‘यह क्या? आए हो दवा खाने और तंबाकू खाने लगे. तंबाकू खाते हो, इसीलिए ब्लड प्रैशर बढ़ता है.
फेंको तंबाकू और दवा खाओ,’’ संगीता बोली.

लेकिन रामशरण तंबाकू रगड़ता ही रहा. तंबाकू तेज था. उस ने तंबाकू हथेली पर जोर से ठोंका, तो उस की झार से पलंग के नीचे छिपे सुखराम को खांसी आ गई. अब तो संगीता को काटो तो खून नहीं. वह बुरी तरह घबरा गई.

‘‘कौन हो भाई? कहां छिपे हो? सामने आओ,’’ रामशरण ने कहा.

जब सुखराम नहीं निकला, तो रामशरण ने उसे खींच कर निकाला और पूछा, ‘‘कब से यह खेल चल रहा है?’’

घबराहट के मारे सुखराम कुछ बोल नहीं सका.

‘‘घबराओ नहीं, बोलो… मैं मारपीट नहीं करूंगा भाई,’’ रामशरण बोला.

फिर भी सुखराम कुछ नहीं बोल पाया.

‘‘यह बेचारा नहीं बोल पा रहा है, तो तुम ही बता दो मेरी जान,’’ रामशरण ने संगीता की ओर देख कर कहा.

‘‘पूछ ही रहे हो तो सबकुछ सचसच बता देती हूं. यह मेरा प्रेमी है. मैं इसे ही पसंद करती हूं. इस के बिना जी नहीं सकती,’’ संगीता बोली.

‘‘ठीक है, लेकिन मुझ से शादी क्यों की? मु झे पहले ही बता दिया होता. मैं बिलकुल तुम से शादी न करता. लेकिन अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है.

तुम इस से शादी कर लो,’’ रामशरण ने कहा.

उसी बीच सुखराम भाग खड़ा हुआ.

बाहर राजू डंडा लिए खड़ा था. उस ने सुखराम को पकड़ लिया और पिटाई शुरू कर दी. शोर सुन कर महल्ले के तमाम लोग आ गए वहां. कुछ और लोग भी सुखराम की धुनाई करने लगे.

रामशरण ने बाहर निकल कर उन लोगों को मना किया और कहा, ‘‘इसे जाने दो.’’

राजू ने कहा, ‘‘किस मिट्टी के बने हो चाचा? हमें इसे कूटने दो.’’

‘‘नहीं, जाने दो, मत मारो,’’ रामशरण शांत भाव से बोला.

लोगों ने सुखराम को छोड़ दिया. वह जान बचा कर भागा.

लोग तरहतरह की बातें कर रहे थे. ज्यादातर लोग रामशरण की हंसी उड़ा रहे थे. उसे डरपोक और नामर्द कह रहे थे. उन का कहना था कि पकड़े गए आदमी को खूब कूट कर पुलिस के हवाले करना था.

रामशरण अगले ही दिन संगीता को ले कर उस के मायके गया और उस के मातापिता से सारा हाल कह सुनाया. इतना ही नहीं, उस ने पंचायत बैठा दी और कहा, ‘‘मैं संगीता की शादी सुखराम से करा देना चाहता हूं. इस से मेरी नहीं निभेगी. उसे बुलाया जाए.’’

पता लगाया गया तो सुखराम घर में मिल गया. कुछ लोग उसे पंचायत में खींच लाए.

मुखिया गजाधर काका ने सुखराम से पूछा, ‘‘क्या तुम संगीता से ब्याह करोगे?’’

‘‘मैं क्यों ब्याह करूं… मेरे जैसे इस के कई यार होंगे. बुलाती थी तो चला जाता था. जब यह अपने पति की नहीं हुई, तो मेरी क्या होगी? यह तो मु झ से अपने पति को मरवाने की बात कहती थी. अच्छा हुआ कि मैं हत्या के पाप से बच गया,’’ सुखराम बोला.

सुखराम की यह बात सुन कर पंचायत सन्न रह गई.

रामशरण ने कहा, ‘‘अब मैं कुछ नहीं कर सकता. मैं तो दोनों की शादी कराने आया था. अब मैं इस औरत को नहीं रख सकता. मेरी कोई गलती हो तो आप लोग बताएं.’’

मुखिया ने कहा, ‘‘तुम ठीक कह रहे हो. तुम्हारा कोई कुसूर नहीं है. यह झूठे प्यारवार का चक्कर ही बहुत खराब है. यह हमारे देश में, समाज में तेजी से बढ़ रहा है. इस के चलते हत्याएं हो रही हैं.

‘‘समाज को जागना होगा, वरना बच्चों की इसी तरह जिंदगी बरबाद होगी. मैं बहुत चिंतित हूं. यह समस्या कैसे दूर होगी? क्या हमारे लड़केलड़कियां इसी तरह नाक कटाएंगे?’’

संगीता बहुत रोईगिड़गिड़ाई, लेकिन रामशरण उसे अपने साथ नहीं ले गया.

संगीता अपने मायके में रह कर मेहनतमजदूरी करने लगी. वह पछता रही थी कि अगर नाजायज प्यार में न पड़ती, तो उस की जिंदगी तबाह न होती. Hindi Romantic Story

Best Hindi Story: बचाने वाला महान

Best Hindi Story: दलित गर्लफ्रैंड को बाइक से 500 मीटर घसीटा उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में एक नौजवान ने अपनी प्रेमिका को बाइक से तकरीबन 500 मीटर तक सड़क पर घसीट दिया. इस दौरान वह लड़की चीखतीचिल्लाती रही, लेकिन आरोपी प्रेमी ने उसे नहीं छोड़ा. घसीटने की वजह लड़की के आधे से ज्यादा कपड़े फट गए. हालांकि, लड़की की आवाज सुन कर कुछ गांव वाले मदद के लिए दौड़े, तो हड़बड़ाहट में आरोपियों की बाइक फिसल कर गिर गई. इस के बाद वे दोनों आरोपी पैदल भाग निकले. लड़का ओबीसी समाज का और लड़की दलित समाज की बताई गई. उन दोनों में इश्कबाजी का मामला था और इसी चक्कर में उन के बीच झगड़ा हो गया था. जाति प्यार पर हावी हो गई थी.

पंच मेलाराम की नजरें काफी दिनों से अपने घर के साथ चौराहे पर नुक्कड़ वाली जगह पर लगी हुई थीं. वहां पर गरीब हरिया की विधवा बहू गुलाबो मिट्टी की कच्ची झोंपड़ी में बच्चों के लिए टौफीबिसकुट, पैनपैंसिलों, कौपियों वगैरह की दुकान चलाती थी.

पंच मेलाराम नुक्कड़ वाली वह जगह हरिया से खरीदना चाहता था. दरअसल, उस का म झला बेटा निकम्मा व आवारा था, इसलिए मेलाराम गुलाबो की दुकान की जगह पर अपने उस बेटे को शराब की दुकान खोल कर देना चाहता था.

विधवा गुलाबो के घर में अपाहिज सास व 2 बेटियों के अलावा बूढ़ा शराबी ससुर हरिया भी था, जो दो घूंट शराब पीने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था.

पंच मेलाराम ने हरिया को शीशे में उतार लिया था. उसे हर रोज खूब देशी दारू पिला रहा था, ताकि नुक्कड़ वाली जगह उसे मिल जाए.

वह जगह हरिया के नाम नहीं थी. मकान की मालकिन पहले हरिया की अपाहिज पत्नी संतरा थी. बेटे नरपाल की शादी हो गई, तो बहू गुलाबो आ गई.

गुलाबो बेहद मेहनती, गुणवान, अच्छे चरित्र की औरत थी. वह अपनी सास की प्यारी बहू बन गई थी.

नरपाल भी बाप की तरह शराबी था. कभीकभी जंगल में जंगली जानवरों का शिकार कर के मांस बेच कर वह कुछ पैसे कमाता था.

सास ने मकान बहू गुलाबो के नाम कर दिया था. उसे यकीन था कि मकान बहू के नाम होगा तो बचा रहेगा, नहीं तो बापबेटा शराब के लालच में उसे बेच खाएंगे.

नरपाल एक दिन घने जंगल में जंगली जानवर का शिकार करने गया और वापस नहीं आया. 4 दिन बाद तलाश करने पर नरपाल के कपड़े मिले.

कपड़े मिलने का सब ने यही मतलब लगाया कि कोई जंगली जानवर उसे खा गया है. अब वह दुनिया में नहीं रहा.

बेचारी गुलाबो जवानी में विधवा हो गई. जवान होती बेटियों और अपाहिज सास की जिम्मेदारी उस पर आ गई थी.

एक दिन शाम के समय हरिया ने बहू से कहा कि अगर दुकान वाली जगह मेलाराम को बेच दी जाए, तो अच्छे पैसे मिल जाएंगे. अपने रहने वाले दोनों कच्चे मिट्टी के बने कमरे पक्के हो जाएंगे. खर्चे के लिए पैसा बच जाएगा.

‘‘पिताजी, दुकान वाली जगह बेच दी, तो घर का चूल्हा नहीं जलेगा. कच्चे मकान में रहा जा सकता है, पर भूखे पेट जिंदा रहना मुश्किल है. जगह बेच कर पैसा कितने दिन चलेगा?’’ गुलाबो ने दूर की बात सोचते हुए कहा, तो हरिया कुछ देर के लिए चुप हो गया.

दुकान के बाहर पंच मेलाराम खड़ा ससुरबहू की बातें सुन रहा था. वह भीतर आ गया और गुलाबो की भरीपूरी छाती पर नजरें टिकाते हुए चापलूसी भरे लहजे में बोला, ‘‘देखो हरिया, तुम्हारी बहू विधवा हो गई तो क्या हुआ, हमारे गांव की इज्जत है. शाम होते ही यहां चौक में कितने आवारा किस्म के लोग खड़े हो कर बेहूदा इशारे करते हैं.’’

‘‘यही बात तो मैं इसे सम झा रहा हूं. नुक्कड़ वाली जगह बेच कर जो पैसा मिलेगा, उस से पक्का मकान बनवा लेंगे. कुछ पैसा जरूरत के लिए बच भी जाएगा. आगे की आगे देखी जाएगी. मेरी दोनों पोतियां बड़ी हो रही हैं. सभी मिल कर काम करेंगे, तो हमारे बुरे दिन गुजर जाएंगे,’’ हरिया ने अपनी बात कही.

‘‘पिताजी, जगह बेचने का पैसा तो सालभर का खर्चा नहीं चला पाएगा. दोनों बेटियां जवान हो रही हैं. इन की शादियां भी करनी हैं. सासू मां भी दूसरों की मुहताज हैं,’’ गुलाबो ने कहा.

गुलाबो की बात पर मेलाराम हमदर्दी जताते हुए बोला, ‘‘गुलाबो, तू अपने रोजगार की चिंता मत कर. मैं सरकारी स्टांप पेपर पर लिख कर दूंगा. तुम्हारी दुकान पर मैं शराब की दुकान खोलूंगा. महीनेभर मैं कम से कम 10-12 लाख रुपए की आमदनी होगी. उस कमाई में से 25 फीसदी हिस्सा तुम्हारा होगा. महीने के महीने तुम्हें तुम्हारा हिस्सा मिल जाएगा.’’

‘‘वह तो बाद की बात है काका. काम चलने में सालभर लग जाएगा. इस से पहले हम खाएंगे क्या?’’

‘‘उस की चिंता मत कर गुलाबो. तुम हमारे खेतों में काम करो. 5 हजार रुपए हर महीना दूंगा. जब हमारी शराब की दुकान चल पड़ेगी, तुम काम छोड़ देना. लाखों रुपए तुम्हें तुम्हारा हिस्सा मिला करेगा. देखना मौज करोगी,’’ कहते हुए मेलाराम ने 5 हजार रुपए उस के सामने लहरा दिए.

‘‘रुपए रख लो बहू. 5 हजार रुपए हर महीने मिलेंगे. जब हमारी दुकान में दारू का कारोबार चल निकलेगा, तो तुम्हारा हिस्सा लाखों में मिलेगा. तब खेतों में काम करना छोड़ देना,’’ ससुर हरिया ने हरेहरे नोटों को ललचाई नजरों से देखते हुए कहा.

इधर गुलाबो भी सोच में पड़ गई. वह छोटी सी दुकान में हर महीने मुश्किल से हजारबारह सौ रुपए ही कमा पाती थी. इसी मामूली से काम में उस का सारा दिन खत्म हो जाता था.

अगर मेलाराम के खेतों में काम करने से 5 हजार रुपए महीना मिल जाए, तो 2 हजार रुपए में घर का खर्चा चला कर वह 3 हजार रुपए बचा सकती है. इस तरह 2-3 साल काम करेगी, तो अपनी दुकान की जगह बेचे बगैर ही वह अपने दोनों कमरे पक्के बनवा सकती है.

अभी गुलाबो सोच ही रही थी कि मेलाराम ने 5 हजार रुपए गुलाबो के सामने रख दिए. जब उस ने दूसरे दिन काम पर आने को कहा, तो गुलाबो ने गंभीर लहजे में अपने मन की बात कही, ‘‘ठीक है काका, आप के खेतों में काम जरूर करूंगी, मगर मैं अपनी सास और पति की निशानी अपने मकान का एक कोना तक नहीं बेचूंगी. पहले ही कहे देती हूं.’’

‘‘अरे हरिया, तू अपनी बहू को ठंडे दिमाग से सम झाना. मैं जो भी काम करूंगा, उस में तुम्हारा भी फायदा होगा,’’ कहते हुए मेलाराम चला गया.

‘‘बहू सारे रुपए संभाल ले. कल से काम पर जाना शुरू कर दे. तुम्हारी दुकान पर मैं काम कर लूंगा. बूढ़ा आदमी हूं, बैठा रहूंगा,’’ हरिया ने आगे की योजना बनाते हुए कहा.

रुपए ले कर गुलाबो सास के पास गई और सारी बात बताई, तो सास ने नुक्कड़ वाली दुकान की जगह बेचने से साफ मना कर दिया. वह बहू के मेलाराम के खेतों में काम करने के पक्ष में नहीं थी, मगर उसे अपनी बहू पर यकीन था.

गुलाबो को काम करते हुए महीनेभर से ऊपर हो गया था. दूसरे महीने का पैसा भी मेलाराम ने दिया नहीं था. शाम को जाते समय गुलाबो ने पैसे मांगे, तो मेलाराम ने उसे रुकने को कहा. उस के साथ काम करने वाली दूसरी औरतें जा चुकी थीं.

दरअसल, मेलाराम ने खेत पर भी मकान बना रखा था. वह उस में खेतों की रखवाली करने या फसल में रात को पानी देने के लिए रुकता था.

शाम हो चली थी. दूरदूर तक सन्नाटा पसरा था. गुलाबो को लगा कि अगर ज्यादा देर हो गई, तो अकेले गांव जाना मुश्किल होगा.

मेलाराम अपने कमरे में था. वह काफी समय से बाहर निकल नहीं रहा था. गुलाबो परेशान हो कर कमरे में घुस गई. महीने का पैसा मांगा, तो मेलाराम ने झपट कर उसे अपनी बांहों में कस लिया और उस की साड़ी खोलने लगा.

गुलाबो ने मेलाराम को अपने से दूर कर उसे उस की बूढ़ी उम्र का एहसास कराना चाहा, ‘‘यह क्या पागलपन है? तुम मेरे बाप की उम्र के हो. ऐसी घिनौनी हरकत तुम्हें शोभा नहीं देती.’’

तभी बाहर से गुलाबो की 12 साला बेटी उसे तलाश करती हुई वहां आ गई. उस ने अपनी मां से छेड़छाड़ करते मेलाराम को पीछे से काट खाया, तो वह गाली बकते हुए बुरी तरह बिदक गया.

मेलाराम ने मासूम बच्ची को जोर से धक्का दिया. वह दीवार से जा टकराई. उस के सिर से खून बह निकला. चोट लगने से वह बेहोश हो गई.

गुस्से में मेलाराम दूसरे कमरे से तलवार उठा लाया, जो उस ने पहले से छिपा कर रखी थी. वह दहाड़ते हुए बोला, ‘‘देख गुलाबो, अगर तू अपनी जवानी का खजाना मु झ पर नहीं लुटाएगी, तो मैं तेरी हत्या कर के तेरी जवान होती बेटी की इज्जत लूट लूंगा.’’

‘‘बेटी के साथ मुंह काला मत करना. हम मांबेटी तो पहले ही मुसीबत की मारी हैं,’’ बेचारी गुलाबो अपनी हालत पर सिसक उठी.

मेलाराम के हाथ में चमकती तलवार देख कर वह घबरा उठी थी. अगर उस की हत्या हो गई, तो उस की बेटी को बचाने कौन आएगा?

‘‘ठीक है. अगर अपनी जवान होती बेटी की आबरू बचाना चाहती है, तो तू पहले सफेद कागज पर लिख कि अपनी नुक्कड़ वाली दुकान मु झे बेच रही है. साथ ही, जिस्म से सारे कपड़े उतार दे.

‘‘बूढ़ा आदमी हूं, थोड़ेबहुत मजे लूटूंगा. तेरी बेटी को तेरे साथ हिफाजत से घर छोड़ आऊंगा. तेरा महीने का पैसा इस शर्त पर दूंगा कि हर शाम मेरी इच्छा पूरी कर के जाया करेगी.’’

‘‘कमीने, अपने घर की एक इंच जगह नहीं बेचूंगी. तेरी यह इच्छा कभी पूरी नहीं होगी,’’ गुलाबो नफरत से गरजी.

‘‘ठीक है, तू ऐसे नहीं मानेगी. पहले तेरी बेटी का गला धड़ से अलग करता हूं,’’ गुर्राते हुए उस ने चमकती तलवार उस की बेटी की गरदन पर रख दी.

ऐसा दिल दहला देने वाला नजारा देख कर गुलाबो कांप उठी. वह नीच गांव से दूर खेतों में मांबेटी की हत्या कर के लाशें दबा देगा. कोई पूछेगा नहीं. उन दोनों का खात्मा हो जाएगा. उस का पति जिंदा नहीं है. ससुर शराबी है. अपाहिज सास भीख मांगती फिरेगी.

अभी गुलाबो सोच में उल झी थी कि मेलाराम फिर गरजा, ‘‘अरे, सोच क्या रही है? जल्दी से सादा कागज पर अपना नाम लिख. अपने सुलगतेमचलते जिस्म से कपड़े उतार, नहीं तो तेरी बेटी का खात्मा हो गया, समझ ले.’’

मजबूर गुलाबो ने सामने पड़े कागज पर दस्तखत कर अपना बदन मेलाराम को सौंप दिया.

गुलाबो का मादक बदन मेलाराम के दिलोदिमाग में वासना का तूफान जगाने लगा था.

मेलाराम ने जवानी में ऐसा मचलता हुस्न नहीं देखा था. वह अभी आगे बढ़ता कि बाहर से आती कुछ आवाजें सुन कर चौंक उठा. आवाजें उस के मकान के नजदीक से आ रही थीं.

गुलाबो ने फटाफट अपने कपड़े पहन लिए, तभी उस की छोटी बेटी हांफती हुई आई और मां से लिपटते हुए बोली, ‘‘मां… मां, बाहर देखो, पापा आ रहे हैं. अपने साथ पुलिस को भी ला रहे हैं.’’

‘‘यह तू क्या कह रही है गुडि़या? तेरे पापा को तो जंगली जानवर…’’ गुलाबो इतना कह पाई थी कि आंधीतूफान की तरह गुस्से की आग में सुलगता हुआ उस का पति नरपाल वहां आ पहुंचा.

उस ने मेलाराम को देखते ही दबोच लिया और उसे इतना मारा कि उस के दोनों हाथ टूट गए और एक आंख फूट गई. अगर पुलिस वाले नहीं बचाते, तो नरपाल मेलाराम को मार ही डालता.

हैरानी में डूबी गुलाबो ने नरपाल से पूछा, ‘‘तुम्हें तो जंगली जानवर…’’

‘‘नहीं…नहीं, मु झे जंगली जानवर क्या खाएंगे, मु झे तो मेलाराम और इस के दोनों बेटों ने जंगल में पकड़ लिया था. मैं नशे में था. ये तीनों हमारा मकान हड़पना चाहते थे.

‘‘मना करने पर इन लोगों ने मु झे बुरी तरह मारापीटा और बेहोशी की हालत में नंगा कर के नदी में बहा दिया. इन का अंदाजा था कि लोग सम झेंगे कि मु झे जंगली जानवर खा गए.’’

नरपाल की बात सुन कर तो गुलाबो ने वह कागज फाड़ डाला, जिस पर मेलाराम ने उस से दस्तखत कराए थे.

गुलाबो आगे बढ़ कर नरपाल से लिपट गई.

‘‘ऐसा हादसा तुम्हारे शराब पीने की आदत के चलते हुए था. पंच मेलाराम हमारे मकान की नुक्कड़ वाली जगह पर शराब की दुकान खोलना चाहता था,’’ गुलाबो ने पति की शराब पीने की आदत पर अपना विरोध जताया.

‘‘गुलाबो, नशा समाज के लिए अभिशाप है. मैं इस का बुरा नतीजा भुगत चुका हूं. अगर एक भला आदमी मुझे बेहोशी की हालत में बहती नदी से न बचाता, तो मेरी बेटी और पत्नी के साथ पता नहीं क्या हो जाता.

‘‘अब मैं न शराब पीऊंगा और न ही शराब की दुकान खुलेगी. अब ये शैतान जेल जाएंगे,’’ नरपाल ने इतना कहा, तो गुलाबो पति की बांहों में समा गई. Best Hindi Story

Story In Hindi: पुराना खाता

Story In Hindi: मंथन की एक राशन की दुकान थी. यह दुकान महल्ले में ही थी, जिस से अगलबगल के लोग सामान खरीद कर ले जाते थे.

मंथन की यह दुकान बहुत पुरानी थी. उस के दादापरदादा के समय की, जिस में पुरानी काठ की लकडि़यों का फर्नीचर था. हर साल दीवाली पर पेंट होने से दुकान अच्छी कंडीशन में थी.

जब से मंथन ने दुकान संभाली थी, तब से वह ग्राहकों पर खास ध्यान देने लगा था. वह सब ग्राहकों से मुसकरा कर बातें करता था. उस के बात करने के तरीके में एक तरह का अपनापन था. लिहाजा, सबकुछ ठीकठाक चल रहा था.

मंथन के पिताजी की तबीयत बहुत ज्यादा खराब रहने लगी थी. लिहाजा, ज्यादातर मंथन ही दुकान पर बैठता था. एक दिन की बात है. खुशबू, जो रजत की बहन थी, सामान लेने मंथन की दुकान पर गई.

मंथन की कदकाठी बढि़या और चेहरा बहुत ही खूबसूरत था. गोरा रंग, घुंघराले बाल, लंबी नाक, चौड़ी छाती. टीशर्ट और लोअर में भी वह काफी फब रहा था.

रजत के पिताजी अजय बाबू पहले घर का राशनपानी लेने मंथन के यहां जाते थे, लेकिन इधर अब वे भी बीमार रहने लगे थे. रजत को औफिस के कामों से ही समय नहीं मिल पाता था, तो वह भला राशनपानी कैसे ला पाता.

रजत की नईनई शादी हुई थी, लिहाजा, वे लोग नईनवेली बहू को घर से बाहर भेजना ठीक नहीं सम झते थे. सौदा लाने के लिए अब खुशबू ही मंथन की दुकान पर आनेजाने लगी थी.

उस दिन जब खुशबू ने मंथन को देखा, तो देखती ही रह गई. सामान ले कर वह कब की घर पहुंच चुकी थी, लेकिन उस का मन घर में नहीं लग रहा था. बारबार उस का ध्यान मंथन की पर्सनैलिटी को देख कर री झा जा रहा था.

खुशबू की एक सहेली थी, जो उस के घर के बगल में ही रहती थी. उस का नाम सलोनी था. सलोनी और खुशबू हमउम्र होने के साथसाथ पक्की सहेलियां भी थीं.

खुशबू अपने दिल की सारी बातें सलोनी को और सलोनी अपने दिल की सारी बातें खुशबू को बताती थी. दोनों का दिल एकदूसरे के बिना नहीं लगता था.

उसी दिन शाम को खुशबू ने अपने दिल की बात सलोनी को बताई, ‘‘सलोनी, मैं तु झे एक बात बताना चाहती हूं. पता नहीं यह कहना ठीक रहेगा भी या नहीं. कैसे कहूं, मु झे बहुत शर्म आती है.’’

‘‘अरे, दोस्तों से कैसी शर्म. दोस्ती ही एक ऐसा रिश्ता है, जिस में लोग अपने दिल की हर बात बता देते हैं. अब बोल भी दे…’’ सलोनी ढलते सूरज को देखते हुए बोली.

‘‘तुम मंथन को जानती हो…’’

‘‘हां, हमारे महल्ले में राशन की दुकान वाला…’’

‘‘हां, वही,’’ खुशबू बोली.

‘‘अरे यार, उसे कौन नहीं जानता… महल्ले की सब लड़कियां उस पर मरती हैं. वे रीता भाभी हैं न… उन का चक्कर मंथन से सालभर पहले से चल रहा था.

‘‘रीता भाभी के पति को जब रीता और मंथन के अफेयर की खबर सुनाई पड़ी, तो उन्होंने रीता भाभी की जम कर पिटाई कर दी थी और राशन लेने के लिए खुद जाने लगे थे.

‘‘और वह गुडि़या, जो मंथन के किराएदार की बेटी थी, के साथ भी मंथन का चक्कर चल रहा था. मंथन है ही इतना खूबसूरत कि उस पर किसी का भी दिल आ जाए.

‘‘हमारे महल्ले की सब औरतों में चर्चा है कि मंथन को जो भी औरत या लड़की देखती है, तो वह उस की हो कर रह जाती है. सब को लगता है कि मंथन का किसी न किसी से चक्कर चल रहा है.

‘‘मंथन का तो पड़ोस की शालू से भी अफेयर था. पता नहीं क्या हुआ होगा. शालू और मंथन के बारे में तो महल्ले की लड़कियां 2 साल पहले चर्चा कर रही थीं.’’

‘‘यानी मंथन मु झे नहीं मिलेगा,’’ कहते हुए खुशबू का चेहरा उतर गया.

‘‘ऐसा कैसे कह सकती हो,’’ सलोनी ने चुटकी ली.

‘‘अब जब इतने सारे गुण हैं, तो वह मु झ बेशक्ल लड़की को क्यों प्यार करेगा? वह इतना हैंडसम है कि उस को कहने भर की देर है, कोई भी लड़की उस के लिए मरने को तैयार हो जाएगी… मेरी तो किस्मत ही खराब है,’’ खुशबू बोली.

‘‘तू किसी से कमतर क्यों रहने लगी… आज भी जब तू महल्ले से गुजरती है, तो लोगों की आंखें तु झ पर से हट नहीं पातीं. तू कम थोड़ी है. महल्ले के लड़के तो तु झ पर जान छिड़कते हैं. तू एक बार कह कर तो देख, वे तेरे लिए कुछ भी कर सकते हैं,’’ सलोनी ने कहा.

‘‘देख, मु झ से फालतू की बात मत कर. मैं ऐसीवैसी लड़की नहीं हूं, जो हर किसी को अपना दिल देती फिरूं. मैं केवल और केवल मंथन की हूं…’’ खुशबू ने कहा.

शाम कब की रात में ढल चुकी थी. खाना खा कर बिस्तर पर लेटी खुशबू छत को ताकती रही. वह लगातार करवटें बदलती रही, लेकिन नींद आंखों से गायब रही. उसे बारबार सलोनी के बताए लड़कियों के नाम याद आ रहे थे. रीता भाभी, गुडि़या, शालू… उन के पासंग में भी नहीं ठहरती थी वह. सांवला रंग, औसत देह, लेकिन उस की छातियां भरीभरी थीं और उस के कूल्हे भारी थे, जो उस के सांवलेपन में भी चार चांद लगाते थे. फिर पता नहीं कब उसे नींद आ गई.

सुबह खुशबू की नींद देर से खुली. सलोनी कब से आ कर उस के घर पर बैठी थी. कितनी बार आवाज लगाई थी, ‘‘सलोनी, जल्दी करो. जल्दी से तैयार हो जाओ. हम लोग कालेज के लिए लेट हो रहे हैं…’’

खुशबू नहाधो कर कालेज के लिए निकली, लेकिन उस का मन कालेज में भी नहीं लगा. किसी तरह कालेज खत्म कर के वह घर लौटी.

अब खुशबू मंथन की दुकान पर किसी न किसी बहाने जाने लगी. जब उसे सामान की लिस्ट थमाई जाती, तो वह जानबू झ कर कुछ सामान लाती और कुछ सामान छोड़ देती.

मंथन भी खुशबू की आंखों की भाषा को बखूबी सम झ रहा था. एक दिन मौका पा कर वह खुशबू से बोला, ‘‘अच्छा, एक बात बताओ. तुम मु झे देख कर इतना मुसकराती क्यों हो?’’

खुशबू हंसते हुए बोली, ‘‘आप को देख कर कहां मुसकराती हूं. मेरी सूरत ही ऐसी है कि लोगों को मेरा चेहरा मुसकराता हुआ दिखता है. इस में मैं क्या करूं?’’

यह सुन कर मंथन मुसकरा कर रह गया.

एक दिन खुशबू ने 500 रुपए के नोट में छिपा कर एक कागज पर अपना मोबाइल नंबर लिख दिया और घर आ गई, लेकिन उस के दिल में खलबली सी मची हुई थी.

रात को वह सोने के लिए छत पर चली गई और मंथन के फोन का इंतजार करने लगी. रात के तकरीबन 1 बजे उस का मोबाइल वाईब्रेट करने लगा. नया नंबर था. खुशबू का दिल बल्लियों उछलने लगा.

खुशबू ने फोन रिसीव किया. दूसरी तरफ की आवाज को सुनने की गरज से वह धीरे से बोली, ‘‘हैलो…’’

दूसरी तरफ से मंथन की आवाज आई, ‘अभी तक जाग रही हो?’

‘‘हां,’’ वह धीरे से बोली.

‘अब तो चांदतारे सब सो गए और तुम जाग रही हो. भला किस के इंतजार में?’

‘‘कौन सो गया है और कौन जाग रहा है. मैं तो सदियों से नहीं सोई… तुम्हारा इंतजार कर रही हूं इस छत पर,’’ खुशबू बोली.

‘अच्छा, तो तुम भी छत पर सो रही हो, ताकि मु झ से बातें कर सको. कहो तो आ जाऊं तुम्हारे पास? 2-4 छतों का ही तो फासला है,’ मंथन बोला.

‘‘नहीं, मत आना,’’ खुशबू बोली.

‘वैसे, मैं भी आज छत पर सोया हूं,’ मंथन ने बताया.

इस के बाद मंथन और खुशबू में ढेर सारी बातें हुईं. अब तो यह रोज की बात थी. खुशबू और मंथन छत पर ही सोते थे. सोते क्या थे, सोने का बहाना करते थे और प्रेम की पेंगे भरते थे.

सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. एक साल पलक झपकते ही बीत गया. अगले साल खुशबू की रिश्ते की बात चलने लगी, पर वह शादी की बात को टालती रहती थी.

इधर शहर में एक बहुत बड़ा शौपिंग मौल खुल गया था. मंथन से कम दाम पर सामान बेचने वाला. शहर के लोग उधर ही भाग रहे थे.

मंथन के पिता अब चल फिर नहीं पाते थे. परिवार की जिम्मेदारी का सारा बो झ अब मंथन के कंधों पर आ गया था. वह ज्यादा तनाव में रहने लगा था.

एक दिन जब मंथन ने सुबह दुकान खोली थी, तब उस की दुकान में बहुत से ग्राहक सामान लेने आए हुए थे. तभी रजत अपने पापा अजय बाबू के साथ मंथन की दुकान पर पहुंचा और उस ने इशारे से मंथन को बताया, ‘‘जैम की शीशी, होरलिक्स का डब्बा और चौकलेट का पैकेट दे दो.’’

मंथन ने चौकलेट का पैकेट, जैम की शीशी और होरलिक्स का पैसा जोड़ कर बिल बनाया.

परची थमाते हुए मंथन बोला, ‘‘रजत बाबू, 700 रुपए हो गए.’’

रजत ने एमआरपी और चीजों के दाम को मिलाया. दाम ठीकठाक ही लगाए गए थे, लेकिन 1-2 सामान में एमआरपी से 2-3 रुपए ही कम निकले.

रजत ने आंखें तरेरते हुए कहा, ‘‘मंथन, तुम ने तो एमआरपी पर ही सब सामान के दाम लगा दिए हैं… जबकि मौल में अभी भारी डिस्काउंट चल रहा है. हम वहीं से सब सामान लेंगे. चलिए पापा…’’

रजत के पापा ये सब बातें बहुत ध्यान से सुन रहे थे. वे बोले, ‘‘मौल तो आज खुला है बेटा, इस से पहले मैं और तुम्हारे दादाजी भी इसी दुकान से सामान खरीदते रहे हैं. तब मंथन के दादाजी दुकान चलाते थे. इन लोगों ने खूब साथ दिया है हमारा. यह रिश्ता एक दिन में नहीं बना है, बल्कि इस को बनने में सालोंसाल लगे हैं.’’

‘‘आप की तरह मैं बेवकूफ नहीं हूं पापा, जो इन से महंगे दाम पर सामान खरीदूं. आखिर हम भी पैसा बहुत मेहनत से कमाते हैं. जब और लोग कंपीटिशन कर रहे हैं, तो इन को भी तो दाम कम करना चाहिए. ये लोग पहले की तरह अब ज्यादा पैसे नहीं ले सकते. अब जमाना बदल गया है,’’ रजत ने कहा.

‘‘रजत बेटा, तुम शायद कोरोना के समय को भूल गए हो. उस समय तुम इसी मंथन के यहां से सामान ले जाते थे. और तुम्हें यह भी पता होना चाहिए कि उस समय तुम्हारे बैंक से तुम्हारी सैलरी नहीं आ रही थी. तब भी हम लोगों को घर बैठे सामान आसानी से मिल जाता था.

‘‘और इसी मंथन की दुकान से तुम ने दसियों हजार रुपए का राशन खाया है. उस समय यही मंथन पीछे के दरवाजे से हमें चीजें मुहैया करवाता था.

‘‘उस समय ये बड़ेबड़े मौल न जाने किस बिल में समा गए थे. तब पुलिस के न जाने कितने लाठीडंडे खा कर मंथन सामान इधरउधर से जुगाड़ कर के पूरे महल्ले को देता था.

‘‘फिर भी मैं वहीं से सामान लूंगा. मौल बैस्ट है मेरे लिए,’’ इतना कह कर रजत वहां से चला गया.

बात आईगई हो गई. अजय बाबू और रजत दोनों खुशबू पर शादी के लिए जोर दे रहे थे. 6 महीने और बीत गए. जो अजय बाबू मंथन के परिवार को इतना अच्छा कहते थे, जब उन को पता चला कि मंथन और खुशबू एकदूसरे से प्यार करते हैं, तो उन के जातिवाद ने सिर उठा लिया.

एक दिन अजय बाबू मंथन की दुकान पर तमतमाए हुए पहुंचे और मंथन को कई झापड़ रसीद कर दिए.
अजय बाबू का शरीर गुस्से से कांप रहा था. वे तमतमाए हुए लहजे में बोले, ‘‘हम ने तुम लोगों को जरा सा मुंह क्या लगा लिया, तुम अपनी औकात से बाहर आ कर हमारे सिर पर चढ़ गए. कहां हम कुलीन ब्राह्मण और कहां तुम बनिया. तुम लोगों को हमेशा अपनी औकात में रहना चाहिए. हमारी बहनबेटियों से खिलवाड़ करते हो… हद में रहा करो, नहीं तो होश ठिकाने लगा दूंगा.’’

दिन बीतते चले गए. कई साल गुजर गए. उम्र निकल जाने के चलते खुशबू के लिए रिश्ते भी अब आने बंद हो गए थे. इधर परिवार और 2 बहनों की शादी की जिम्मेदारी मंथन के कंधों पर थी. वह जैसे बलिदान की वेदी पर झूल गया.

एक दिन अचानक अजय बाबू को लकवा मार गया. अब वे बिस्तर से उठ भी नहीं पाते थे. खुशबू ने पूरे मन से अपने पापा की सेवा की, पर जल्दी ही वे चल बसे.

इतना ही नहीं, एक दिन रजत अपनी कार से औफिस जा रहा था कि तभी उस की कार सामने से आ रही दूसरी कार से टकरा गई और रजत के कार के परखच्चे उड़ गए.

रजत को अस्पताल में भरती करवाया गया. रजत अब महीनों तक बिस्तर से उठ नहीं सकता था. डाक्टर कह रहे थे कि इतने बड़े हादसे में अगर वह बच गया है, तो यही बहुत बड़ी बात है.

रजत की बैंक की प्राइवेट नौकरी थी, जो छूट गई. उस की पत्नी सविता के घर वालों ने कुछ महीनों तक मदद की, उस के बाद उन्होंने भी हाथ खींच लिए.

पूरे 2 साल तक रजत बिस्तर पर रहा. बच्चों की फीस जमा नहीं करवा पाने के चलते स्कूल ने बच्चों के नाम काट दिए. अब रजत के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ने जाते थे.

एक दिन की बात है. घर में राशन खत्म हो गया था और बच्चे भूख से बिलबिला रहे थे. रजत के पापा अगर जिंदा होते, तो जरूर मंथन से कह कर राशन ले आते.

कुछ सोच कर सविता ने सारी बात जा कर मौल वाले दुकानदार को बताई, पर उस दिन सविता के पैरों तले की जमीन खिसक गई, जब मौल वाले ने सामान उधार देने से साफ मना कर दिया. उस ने बहुत सारे ग्राहकों के सामने ही सविता की बेइज्जती भी कर दी. सविता बेइज्जती का घूंट पी कर वहां से चली आई.

घर आ कर सविता ने सारी घटना रजत को बताई. रजत अपनी बेबसी पर दांत पीस कर रह गया था. उस के पैर अभी पूरी तरह से ठीक नहीं हुए थे. कमर की हड्डी भी टूट गई थी. वह लाचार था.

खैर, उड़तेउड़ते यह बात मंथन को पता चली. उस का और अजय बाबू का पुराना संबंध था. इस नाते वह घर का पूरा राशन रजत के यहां देने चला आया.

रजत और सविता दोनों हैरान से मंथन को ताक रहे थे.

मंथन ने रजत को नमस्ते किया और पूछा, ‘‘आप कैसे हैं?’’

रजत को जवाब देते न बना, फिर भी वह मंथन से बोला, ‘‘ठीक हूं. धीरेधीरे रिकवरी हो रही है.’’

‘‘आप के ऐक्सीडैंट के बारे में सुना था, लेकिन दुकान में भीड़भाड़ रहने के चलते आप से मिलने नहीं आ सका. कुछ झिझक भी थी. पता नहीं आप क्या सोचेंगे? वैसे, कुछ दिनों से बच्चों को स्कूल जाते नहीं देखा. वे स्कूल जाते हैं न?’’

‘‘स्कूल तो जाते हैं, लेकिन अब प्राइवेट स्कूल में नहीं, बल्कि सरकारी स्कूल में जाते हैं, लेकिन इधर उन की स्टेशनरी खत्म हो गई है, इसलिए हफ्तेभर से वे स्कूल नहीं जा रहे हैं.’’

‘‘हां, इधर मैं भाभी को भी देखता हूं, वे सुबहसुबह शायद बच्चों को पढ़ाने जाती हैं.’’

‘‘हां, बगल में प्राइमरी स्कूल है. वहीं 6-7 हजार रुपए की प्राइवेट नौकरी कर रही है. वहीं बच्चों को पढ़ाने जाती है. बेचारी को मेरे ऐक्सीडैंट के बाद बाहर निकलना पड़ गया. अब क्या करूं… सविता की कमाई तो मेरी दवादारू में ही खर्च हो जाती है.’’

‘‘पढ़ाने या काम करने में कोई बुराई थोड़ी ही है. सविता भाभी तो ज्ञान का दीपक जला रही हैं… आप के परिवार के लिए कुछ राशन ले कर आया हूं. आप मेरे पुराने खाते को फिर से चालू कर दीजिए.’’

‘‘मंथन, मु झे शर्मिंदा मत करो. मैं पहले ही अपनी नजरों में गिर चुका हूं. मैं अपने बरताव पर शर्मिंदा हूं.’’

‘‘मुसीबत के समय ही तो अपने लोग काम आते हैं. अगर कल को मेरे ऊपर कोई मुसीबत आन पड़ी तो आप लोग मेरी मदद करने आएंगे न? आप बच्चों को स्कूल भेजिए. आप स्टेशनरी का सामान मेरी दुकान से मंगवा लीजिएगा. सब्जीभाजी भी भिजवा दूंगा. जब आप ठीक हो जाएंगे, तब मेरा हिसाब कर दीजिएगा.’’

‘‘सब्जी तो आप नहीं बेचते हैं, फिर सब्जी कैसे देंगे?’’ सविता ने पूछा.

‘‘मेरा एक दोस्त आजकल सब्जी बेच रहा है. उस के यहां से खरीद कर मैं आप को भिजवा दूंगा और पैसे हिसाब में लिख दूंगा.

‘‘अच्छा, अब मैं चलता हूं. दुकान पर लड़का अकेला है,’’ कह कर मंथन चलने को हुआ.

‘‘दुकान पर चले जाना, लेकिन पहले मेरी बहन खुशबू के हाथ की चाय तो पी लो,’’ रजत बोला.

इस के बाद रजत ने खुशबू को इशारा किया, तो वह किचन में चाय बनाने चली गई. थोड़ी देर बाद गरमागरम चाय आ गई.

चाय खत्म कर मंथन बाहर जाने लगा कि तभी रजत ने टोका, ‘‘बहुत दिनों से मेरे मन में एक बात चल रही थी. इतना उपकार तो तुम ने मु झ पर दिया है, लेकिन अभी मैं चलनेफिरने में नाकाम हूं. मेरी खुशबू के प्रति भी कुछ जिम्मेदारी है. मु झे यह भी मालूम है कि तुम दोनों एकदूसरे से बहुत प्यार करते हो. मेरे पिताजी पुराने खयालात के थे, लेकिन अब दुनिया बदल रही है. मु झे भी नए ढंग से सोचना होगा.

‘‘तुम दोनों बेकुसूर होते हुए भी सजा काट रहे हो, इसलिए मेरी तुम से एक गुजारिश है कि तुम मेरी बहन को स्वीकार कर लो. बहुत दुख दिया है मैं ने तुम दोनों को. आज से मु झे तुम मेरी जिम्मेदारियों से मुक्त करो.

‘‘मेरी बहन जहां और जिस के साथ खुश रहेगी, वहीं उस की शादी होनी चाहिए. लेकिन मेरी माली हालत बहुत खराब है. मैं दहेज नहीं दे सकता.’’

‘‘दहेज नहीं दे सकते… मतलब मु झे मुफ्त में आप की बहन से शादी करनी पड़ेगी?’’ मंथन बोला.

खुशबू ने कनखियों से मंथन को ताका. उस को लगा कि अब फिर से वह कुंआरी रह जाएगी. मंथन तो दहेज ले कर ही मानेगा.

तभी मंथन खिलखिला कर हंस पड़ा, ‘‘भाई साहब, आप की बहन को मैं एक जोड़े में विदा करवा कर ले जाऊंगा. अभी मेरी दुकान बहुत बढि़या चल रही है. मैं अपनी दोनों बहनों की शादी कर चुका हूं. हर तरह की जिम्मेदारी का बो झ खत्म हो गया है.

‘‘खुशबू जैसी सम झदार जीवनसाथी पा कर मेरा काम और भी आसान हो गया है. अच्छा, अब मैं चलता हूं. आप लोग शादी की तारीख तय कीजिए.’’

अब रजत, सविता और खुशबू के चेहरे पर खुशी नजर आ रही थी. Story In Hindi

Best Hindi Kahani: दूसरी शादी – परवेज की बेबसी

Best Hindi Kahani: अफरोज के जाने के बाद परवेज की जिंदगी थम सी गई थी. बच्चे अकेले से हो गए थे. अपनों ने जो रंग दिखाया था, उस ने परवेज को झकझोर कर रख दिया था. बच्चों की आंखों में मां की तड़प, उन की बेबसी, उन की मासूमियत भरी आवाज और अपनों से मिले दर्द से वे सहम गए थे.

चाची का बच्चों की औकात से ज्यादा काम करवाना, उन के बच्चों का मारना, तंग करना, खाना न देना, उन को बारबार ‘तुम्हारी तो मां भी नहीं है’ कह कर मजाक उड़ाना, कहीं बाहर जाओ तो बच्चों का दिनभर चड्डी में ही टौयलैट किए हुए ही भूखेप्यासे रहना… बच्चों की ऐसी बुरी दशा और बेबसी देख कर परवेज पूरी तरह टूट चुका था.

कोरोना की दूसरी लहर ने देशभर में मौत का जो नंगा नाच नचाया था, उस से कोई शहर ही नहीं, बल्कि गांवमहल्ला और शायद कोई खानदान ऐसा बचा हो, जो इस की चपेट में न आया हो.

अफरोज के जाने के बाद परवेज अकेला अपने मासूम बच्चों के साथ गांव में रहता था. उस की बड़ी बेटी 8 साल की, उस से छोटी बेटी 5 साल की और उस से छोटा बेटा डेढ़ साल का था.

जो लोग कल तक परवेज की इज्जत करते थे, उस के बच्चों की देखभाल भी करते थे, आज अफरोज के जाने के बाद वे उन से आंखें चुराने लगे थे. लौकडाउन की वजह से परवेज का कामधंधा चौपट हो गया था. कहीं से कोई आमदनी का जरीया न था, ऊपर से इन बच्चों को छोड़ कर वह कहीं जा भी नहीं सकता था.

परवेज के बच्चे अपने चाचा के बच्चों के साथ खेलने की कोशिश करते, तो वे इन्हें मार कर भगा देते. उन की चाची मासूम बच्ची से घर का झाड़ूपोंछा करवाती थीं. जब वह थक जाती तो रोते हुए परवेज के पास आती और कहती कि चाची अपने बच्चों को तो खाना देती हैं, हमें नहीं देतीं.

एक दिन तो हद ही हो गई. परवेज किसी काम से बाहर गया था. लौटा तो देखा कि उस की छोटी बेटी और बेटा कमरे में बैठे रो रहे थे. परवेज ने उन से पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

बेटी ने बताया, ‘‘चाची मुझ से बड़ा कुकर धुलवा रही थीं. वह मुझ से नहीं उठ रहा था, तो मुझे डांटने लगीं. उन्होंने मुझे खाना नहीं दिया, तो कोई बात नहीं. कम से कम मेरे भाई को तो खाने को कुछ दे देतीं, वह सुबह से भूखा था.’’

यह सुनते ही परवेज का दिल रोने लगा, पर वह कर भी क्या सकता था. कुछ दिनों बाद उसे काम के सिलसिले में वापस मुंबई जाना था. घर पर पड़ेपड़े कई महीने गुजर गए थे.

जब परवेज ने अपनी बड़ी बेटी को बताया, तो वह बोली, ‘‘अब्बा, हम अकेले कैसे रहेंगे? हमें भी साथ ले चलो.’’ परवेज ने उसे समझाया, ‘‘मैं वहां पहुंच कर कुछ ही दिनों में तुम सब को भी ले जाऊंगा.’’

अचानक बेटी बोली, ‘‘आप नई अम्मी ले आओ. हमें भी अम्मी चाहिए. आप दूसरी शादी कर लो.’’

परवेज अफरोज को नहीं भुला पा रहा था और फिर नई मां बच्चों की सही ढंग से देखभाल कर पाएगी या नहीं, इस की कोई गारंटी नहीं थी. लेकिन बच्ची की जिद ने उसे मजबूर कर दिया और वह भी यही सोचने लगा कि कम से कम बच्चों को वक्त पर खाना तो मिलेगा और देखभाल करने वाला कोई तो होगा.

इस तरह परवेज दिल पर पत्थर रख कर मुंबई आ गया और कुछ ही दिन हुए थे कि उस का काम भी चल निकला और जल्द ही उस के लिए एक रिश्ता आ गया, जो उस के एक दोस्त ने बताया था.

उस ने परवेज को एक फोटो दिखाया और बोला, ‘‘यह हिना है. इस के 2 बच्चे हैं. शौहर का अभी एक साल पहले इंतकाल हुआ है. यह अभी अपनी मां के घर है. तुम हां बोलो, तो मैंबात चलाऊं?’’

परवेज ने हिना के मासूम बच्चों के बारे में सुन कर हां कर दी, क्योंकि वह भी अपने बच्चों की मां के न होने का दुख जानता था.

अगले दिन परवेज ने हिना, उस के मांबाप और दोनों बच्चों को अपने ही घर बातचीत करने के लिए बुला लिया. उन्होंने परवेज से काम और बच्चों के बारे मे पूछा, उस के बाद उन्होंने बताया कि हिना के दोनों बच्चों को बचपनसे ही डायबिटीज है. इन्हें इंसुलिन लगती है. अगर तुम्हें यह रिश्ता मंजूर हो तो बताओ.

परवेज ने उन मासूम बच्चों को देखा, जो महज 8 साल और 6 साल के थे. फिर मासूम से चेहरे वाली हिना पर नजर डाली जो अभी जवान ही थी, हां कर दी और अगले ही हफ्ते उन का निकाह हो गया.

निकाह के तीसरे ही दिन हिना ने परवेज को बच्चों को लाने के लिए गांव भेज दिया. कुछ ही दिनों में वह अपने बच्चों को मुंबई ले आया.

हिना जैसी मां पा कर परवेज के बच्चे भी खुश हो गए. हिना ने दिलोजान से बच्चों का खयाल रखना शुरू कर दिया. वह अपने हाथों से उन्हें खाना खिलाती, उन की देखभाल करती और उन्हें कभी मां की कमी महसूस न होने देती. परवेज ने भी उस के बच्चों का अच्छे प्राइवेट स्कूल में दाखिल करा दिया था.

एक दिन हिना ने परवेज को अपनी कहानी सुनाई कि उस के रोंगटे खड़े हो गए. उस ने बताया, ‘‘जब मेरे शौहर का इंतकाल हुआ, तो हम घूमने गुजरात गए थे. उन्हें पहले से ही डायबिटीज थी. वहां पर हम और उन के दोस्तों के परिवार घूमने गए थे कि अचानक इन की तबीयत खराब हो गई. दोस्तों ने इलाज कराने में कोई कमी न छोड़ी, फिर भी वे न बच पाए.

‘‘जब मेरी सास को पता चला, तो वे मुझे धक्का देते हुए बोलीं कि तू ने मेरे बेटे को मार दिया. मैं तो अपने होश में न थी, उन के ये अल्फाज सुन कर बेहोश हो गई. जब होश आया तो मेरा सबकुछ लुट चुका था. मेरा अपनी सुसराल में रहना दूभर हो चुका था.

‘‘मेरे बच्चे भी डायबिटीज के मरीज थे, जो सूख कर कांटा हो गए थे. जेठानी सारा काम मुझ से करवाती थीं. मेरे बच्चों को कभी खाना मिलता, कभी नहीं मिलता. सास ने जीना मुश्किल कर रखा था. आखिर में मुझे अपने मांबाप के घर जाना पड़ा.

‘‘वहां मुझे दो वक्त का खाना तो मिल रहा था, लेकिन शौहर की कमी ने झकझोर कर रख दिया था. अम्मीअब्बा को हमेशा यही बात सताती रहती थी कि बिना शौहर के मेरा और बच्चों का क्या होगा. मेरी भाभी भी बच्चों पर गुस्सा होती रहती थीं. उन्हें कभी किचन में नहीं घुसने दिया जाता था.’’

पर, अब हिना बहुत खुश थी. शादी के एक साल बाद परवेज के घर एक चांद सा बेटा हुआ. जो रिश्तेदार उन्हें दुत्कारते थे, आज खुशीखुशी मिलते हैं. हिना की सास भी मिलने आती रहती हैं. परवेज का भाईभाभी रोज फोन पर बच्चों से बात करते हैं और छुट्टियों में मुंबई आ जाते हैं.

आज परवेज का घरपरिवार खुशहाल है. उस का कामधंधा भी अच्छा चल रहा है. घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं है. बुरा वक्त कब निकल गया, पता ही नहीं चला. Best Hindi Kahani

Long Hindi Story: सुबह की किरण – दो सहेलियों का प्यार

Long Hindi Story: ‘‘आ ओ, तुम यहां बैठ जाओ,’’ समीर ने प्रीति को अपने बगल में खड़ा देखा तो अपनी सीट से उठते हुए कहा.

‘‘नहीं, तुम बैठो, मुझे अगले स्टैंड पर उतरना है.’’

‘‘तुम बैठो, तुम्हें खड़ा होने में तकलीफ हो रही है,’’ उस ने फिर आग्रह किया तो प्रीति उस की सीट पर बैठ गई.

बस में खचाखच भीड़ थी. तिल भर भी पैर रखने की जगह नहीं थी. प्रीति का एक पैर जन्मजात खराब था. इसलिए थोड़ा लंगड़ा कर चलती थी. नीलम ठीक उस के पीछे खड़ी थी. मुसकराती हुई बोली, ‘‘चलो तुम्हारी तकलीफ समझाने वाला कोई तो मिला.’’

अगले स्टैंड पर दोनों सहेलियां उतर गईं. समीर भी उन के पीछेपीछे उतरा.

‘‘तुम्हारी सहेली के साथ मैं ने अन्याय किया,’’ वह प्रीति को देखते हुए मुसकरा कर बोला, ‘‘लेकिन क्या करूं, सीट एक थी और तुम दो.’’

‘‘कोई बात नहीं, अगली बार तुम मुझे लिफ्ट दे देना,’’ नीलम भी मुसकराते हुए बोली तो समीर ने पूछा, ‘‘वैसे, तुम दोनों यहां कहां रहती हो?’’

‘‘बगल में ही, गौरव गर्ल्स होस्टल में,’’ नीलम ने बताया.

‘‘अच्छा है, अब तो हमारा इसी स्टैंड से कालेज आनाजाना होता रहेगा. मैं भी थोड़ी दूर पर ही रहता हूं. मेरे बाबूजी एक कंपनी में जौब करते हैं और यहीं उन्होंने एक अपार्टमैंट खरीदा हुआ है.’’ समीर, प्रीति और नीलम एक ही कालेज में थे. आज कालेज में उन का पहला दिन था.

प्रीति आगरा की रहने वाली थी और नीलम लखनऊ की. दोनों गौरव गर्ल्स होस्टल में एक रूम में रहती थीं. प्रीति के पिताजी एक अच्छे ओहदे वाली सर्विस में थे, किंतु असमय उन का देहांत हो गया था जिस के कारण उस की मां को अनुकंपा के आधार पर उसी औफिस में क्लर्क की नौकरी मिल गई थी.

प्रीति के बाबूजी बहुत पहले अपना गांव छोड़ कर आगरा में आ गए थे और यहीं उन्होंने एक छोटा सा मकान बना लिया था. गांव की जमीन और मकान उन्होंने बेच दिया था. प्रीति की मां चाहती थीं कि वह आईएएस की तैयारी करे ताकि एक ऊंची पोस्ट पर जा कर अपनी विकलांगता के दर्द को भुला सके, इसलिए उन्होंने उसे दिल्ली में एमए करने के लिए भेजा था. प्रीति को शुरू से ही साइकोलौजी में गहरी रुचि थी और बीए में भी उस का यह फेवरेट सब्जैक्ट था इसलिए उस ने इसी सब्जैक्ट से एमए करने का विचार किया. प्रीति को शुरू से ही कुछ सीखने और अधिकाधिक ज्ञानार्जन करने की इच्छा थी. वह साइकोलौजी में शोध कार्य करना चाहती थी और भविष्य में किसी कालेज में लैक्चरर बनने की ख्वाहिश पाले हुए थी.

नीलम एक बड़े बिजनैसमैन की बेटी थी. उस के पिताजी चाहते थे कि उन की बेटी दिल्ली के किसी कालेज से एमए कर ले और उस की सोसायटी मौडर्न हो जाए क्योंकि आजकल बिजनैसमैन के लड़के भी एक पढ़ीलिखी और मौडर्न लड़की को शादी के लिए प्रेफर करते थे. इसलिए उस ने दिल्ली के इसी कालेज में ऐडमिशन ले लिया था और ईजी सब्जैक्ट होने के कारण साइकोलौजी से एमए करना चाहती थी. समीर के पिताजी उसे आईएएस बनाना चाहते थे और समीर भी इस के लिए इच्छुक था, इसलिए वह भी साइकोलौजी से एमए करने के लिए कालेज में ऐडमिशन लिए हुए था.

प्रीति एक साधारण परिवार की थी और स्वभाव से भी बहुत ही सरल, इसलिए उस की वेशभूषा और पोशाकें भी साधारण थीं. पर वह सुंदर व स्मार्ट थी. उसे बनावशृंगार और मेकअप पसंद नहीं था किंतु दूसरी ओर नीलम सुंदर और छरहरे बदन की गोरी लड़की थी और अपने शरीर की सुंदरता पर उस का सब से ज्यादा ध्यान था. वह मेकअप करती और प्रतिदिन नईनई ड्रैस पहनती. कालेज में जहां प्रीति अपनी किताबों में उल?ा रहती वहीं नीलम अपनी सहेलियों के साथ गपें मारती और मस्ती करती.

एक दिन प्रीति लंच के समय कालेज की लाइब्रेरी में कुछ किताबों से कुछ नोट्स तैयार कर रही थी. तभी नीलम उस के पास आई और बोली, ‘‘अरे पढ़ाकू, यह लंच का समय है और तुम किताबों से माथापच्ची कर रही हो जैसे रिसर्च कर रही हो. चलो चल कर कैफेटेरिया में चाय पीते हैं.’’

‘‘तुम जाओ, मैं थोड़ी देर बाद आऊंगी,’’ प्रीति ने कहा तो नीलम चली गई.

तभी उस ने महसूस किया कि उस के पीछे कोई खड़ा है. उस ने पलट कर पीछे की ओर देखा तो समीर था.

बस में मिलने के बाद समीर आज पहली बार उस के पास आ कर खड़ा हुआ था. क्लास में कभीकभी उस की ओर देख लिया करता था, किंतु बात नहीं करता था.

‘‘प्रीति सभी लोग कैफेटेरिया में चाय पी रहे हैं और तुम यहां बैठ कर नोट्स बना रही हो? अभी तो परीक्षा होने में काफी देर है. चलो, चाय पीते हैं.’’

‘‘बाद में आऊंगी समीर, थोड़े से नोट्स बनाने बाकी हैं, पूरा कर लेती हूं.’’

‘‘अब बंद भी करो,’’ समीर ने उस की नोटबुक को समेटते हुए कहा.

‘‘अच्छा चलो,’’ प्रीति भी किताबों को नोटबुक के साथ हाथ में उठाते हुए उठ खड़ी हुई.

जब समीर और प्रीति कैफेटेरिया में पहुंचे तो वहां पहले से ही नीलम अपनी कुछ क्लासमेट्स के साथ बैठ कर चाय पी रही थी. अगलबगल और भी कई लड़केलड़कियां थीं.

‘‘आ गई पढ़ाकू,’’ सविता ने उस को देखते हुए चुटकी ली.

‘‘मैं ने कहा, तो मेरे साथ नहीं आई. अब समीर के एक बार कहने पर आ गई. हां भई, उस दिन बस में उठ कर अपनी सीट जो तुम्हें औफर की थी. अब उस का कुछ खयाल तो रखना ही पड़ेगा न.’’ नीलम की बात सुन कर उस की सहेलियां हंसने लगीं.

समीर कुछ झोंप सा गया. बात आईगई हो गई किंतु इस के बाद प्रीति और समीर अकसर आपस में मिलते. प्रीति को साइकोलौजी के कई टौपिक्स पर बहुत ही अच्छी पकड़ थी. उस ने साइकोलौजी में कई जानेमाने लेखकों की पुस्तकों का अध्ययन किया था. जब कभी क्लास में कोई लैक्चरर आता तो उस विषय के ऐसे गंभीर प्रश्नों को उठाती कि सभी उस की ओर ताकने लगते.

समीर को उस के पढ़ने में काफी मदद मिलती. समय के साथसाथ उन के बीच आपसी लगाव बढ़ रहा था. उन के बीच का गहराता संबंध कालेज में चर्चा का विषय था. कुछ साथी उस पर चुटकियां लेने से नहीं चूकते.

‘लंगड़ी ने समीर को अपने रूपजाल में फंसा लिया है,’ कोई कहता तो कोई उन दोनों की ओर इशारा करते हुए अपने मित्र के कान में कुछ फुसफुसाता, जिस का एक ही मतलब होता था कि उन दोनों के बीच कुछ पक रहा है. अब वह किसकिस को जवाब देता. इसलिए चुप रहता.

वैसे भी समीर अपने कैरियर के प्रति सीरियस था. उसे आईएएस की तैयारी करनी थी जिस में साइकोलौजी को मुख्य विषय रखना था. वह इस विषय के बारे में अधिकाधिक जानकारी प्राप्त कर लेना चाहता था. उधर प्रीति को इसी विषय के किसी टौपिक पर रिसर्च करना था. इसलिए दोनों के अपनेअपने इंटरैस्ट थे. किंतु लगातार एकदूसरे के साथ संपर्क में रहने के कारण उन के अंदर प्रेम का भी अंकुरण होने लगा था जिस को दोनों महसूस तो करते किंतु इस की आपस में कभी चर्चा नहीं करते.

ऐसे ही कब 2 वर्ष गुजर गए उन्हें पता ही नहीं चला. दोनों ने एमए फर्स्ट डिवीजन से पास कर लिया. फिर समीर ने आईएएस की तैयारी के लिए दिल्ली में ही एक कोचिंग जौइन कर ली और प्रीति एक प्रोफैसर के अंडर पीएचडी करने लगी.

नीलम ने किसी तरह एमए किया और घर चली गई. उस के पिता ने उस की शादी एक बिजनैसमैन से कर दी. उस के निमंत्रण पर प्रीति उस की शादी में गई. उस ने समीर को भी निमंत्रण दिया था लेकिन किसी कारणवश समीर नहीं पहुंच पाया. नीलम ने प्रीति से वादा किया था कि भले ही वह उस से दूर है लेकिन जब कभी वह याद करेगी वह जरूर उस से मिलेगी. बिछुड़ते वक्त दोनों सहेलियां खूब रोईं.

इधर समीर और प्रीति के बीच दूरी बढ़ी तो लगाव भी कम होने लगा. उन के बीच कुछ महीनों तक तो फोन पर संपर्क होता रहा, फिर धीरेधीरे वह समाप्त हो गया. यही दुनियादारी है. कभी समीर जब तक उस से एक बार नहीं मिल लेता उसे चैन न मिलता, अब उसे उस की याद ही नहीं रही. प्रीति ने भी उस से बात करनी बंद कर दी.

जीवन किसी का भी हर वक्त एकजैसा कहां रहता है. यह कोई जानता भी तो नहीं कि कब किस के साथ क्या घट जाए. प्रीति अभी दिल्ली में ही थी कि एक दिन सुबह सुबह ही उसे खबर मिली कि उस की मां को हार्टअटैक आया है और वह अस्पताल में भरती है. सुनते ही वह आगरा के लिए भागी किंतु वहां पहुंचने पर मालूम हुआ कि उस की मां अब दुनिया में नहीं रहीं.

प्रीति पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. वह फफक कर रोने लगी. अब उस का एकमात्र सहारा मां भी उसे छोड़ गई थीं. अस्पताल में वह मां के शव को पकड़ कर रो रही थी. उस को सांत्वना देने वाला कोई नहीं था. उस की मां के औफिस वाले आए हुए थे. उन लोगों ने कहा, ‘‘बेटी, अब अपने को संभाल…यह समय रोने का नहीं है. उठो, अब मां का दाहसंस्कार करने की सोचो…अब आग भी तुम्हें ही देनी है.’’

इस दुखभरी घड़ी में अपनों की कितनी याद आती है. उस ने समीर को फोन लगाया लेकिन उस का फोन तो डैड था. शायद उस ने नंबर बदल लिया था. अंतिम बार जब उस से भेंट हुई थी तो कहा था, अब दूसरा सिम लेगा. हारथक कर उस ने नीलम को याद किया. नीलम से उस की शादी में अंतिम बार भेंट हुई थी. वैसे भी उस से कभीकभी बातें होती रहती थीं. उस के हस्बैंड की प्रयागराज में एक बड़ी कपड़े की दुकान थी. वह खुले विचारवाला युवक था, इसलिए नीलम को कहीं आनेजाने में रोक नहीं थी.

नीलम खबर सुनते ही आगरा के लिए अपनी गाड़ी से चल पड़ी. प्रीति के जिम्मे अभी काफी काम थे. अस्पताल का बिल चुकाना, मां का दाहसंस्कार क्रिया करना और अकेले पड़े घर को संभालना. एक युवती जिस को दुनियादारी का भी कोई ज्ञान न हो और जिस की जिंदगी मां पिता की छत्रछाया में बीती हो, व जिस को घर संभालने का कोई व्यावहारिक ज्ञान न हो, अचानक इस तरह की विपत्ति पड़ने पर क्या स्थिति हो सकती है, यह तो वही समझा सकती है जिस के सिर पर यह अचानक बोझ आ पड़ा हो.

इस स्थिति में पड़ोसी भी बहुत काम नहीं आते सिवा सांत्वना के कुछ शब्द बोल देने के. और जिस का कोई अपना न हो उस के लिए तो यह क्षण बड़े ही धैर्य रखने और आत्मबल बनाए रखने का होता है और वह भी तब जब कोई अपना बहुत ही करीबी उसे छोड़ कर चला गया हो. सब से बड़़ी दिक्कत यह थी कि उस के पास पैसे नहीं थे और मां के बैंक अकाउंट का उस के पास कोई लेखाजोखा न था. पिछले महीने मां ने उस के खाते में जो पैसा ट्रांसफर किया था वह अब तक खर्च हो चुका था.

नीलम से वह कुछ मांगना तो न चाहती थी किंतु उस के पास इस के सिवा कोई रास्ता भी नहीं बचा था, इसलिए उस ने उस से कुछ मदद करने के लिए कहा. नीलम ने चलते वक्त चैकबुक और अपना डैबिट कार्ड भी पास में रख लिया. नीलम ने गांव के अपने सहोदर चाचाजी को बुला लिया जिन्होंने प्रीतिकी मां के दाहसंस्कार करवाने में बहुत मदद की. नीलम ने अस्पताल के सारे बिल भर दिए और मां के दाहसंस्कार व पारंपरिक विधि में होने वाले दूसरे आवश्यक खर्च को वहन किया.

प्रीति दकियानूसी विचारों वाली युवती नहीं थी, इसलिए उस ने विद्युत शवदाह द्वारा अपनी मां का दाहसंस्कार किया और अन्य पारंपरिक क्रियाएं भी बहुत सादे ढंग से संपन्न कीं. जब तक प्रीति सारी क्रियाओं से निबट नहीं गई तब तक नीलम उस के साथ रही.

परिस्थितियां चाहे जितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों मनुष्य को उस से तो बाहर निकलना ही पड़ता है और प्रीति भी इस से निकल तो गई किंतु वह जिस खालीपन का एहसास कर रही थी उसे भरना बहुत ही मुश्किल था.

कुछ समय बाद नीलम प्रयागराज लौट गई और प्रीति अपने मकान को एक विश्वस्त आदमी को किराए पर दे कर अपना रिसर्च वाला काम पूरा करने के लिए दिल्ली लौट आई. उसे पता चला कि उस की मां ने अपने नाम से एक इंश्योरैंस भी कराया था जिस का अच्छाखासा पैसा नौमिनी होने के कारण उसे मिल गया.

मां के बैंक अकाउंट में भी काफी पैसे थे, इसलिए उस को अपने रिसर्च के काम में कोई दिक्कत न आई. उस ने नीलम का सारा पैसा लौटा दिया. समय बीतता गया और उस के साथसाथ प्रीति भी पहले से ज्यादा सम?ादार व परिपक्व होती गई. उसे आगरा के ही एक कालेज में लैक्चरर की नौकरी मिल गई.

इस दुनिया में कहां किसी को किसी से मतलब होता है. वह अकेली थी. समीर जो कभी उस के दिल के करीब आ चुका था उस से भी उस का संपर्क टूट गया था. नीलम अपने घर चली गई थी जिस से कभीकभी फोन पर बातचीत होती रहती थी.

लड़कियों की शादी में तो वैसे ही काफी दिक्कतें होती हैं और उस का तो एक पैर भी खराब था. और उस की शादी के बारे में सोचने वाला भी कोई नहीं था. जो लोग उस के संपर्क में आते थे, वे उस की सुंदरता से आकर्षित हो कर आते थे न कि उस का जीवनसाथी बनने के लिए. इसलिए ऐसे लोगों से वह हमेशा ही अपने को दूर रखती थी. अब तो उस की जिंदगी का एक ही मकसद था घर से कालेज जाना, वहां मनोयोग से छात्रों को पढ़ाना और शाम को घर लौट कर मनोविज्ञान की पुस्तकों का गहरा अध्ययन करना.

इधर, वह मनोविज्ञान पर एक किताब लिख रही थी जिस से उस का खालीपन कट जाता था. कालेज के उस के सहकर्मी पढ़ाने में कम कालेज की आपसी राजनीति में ज्यादा इंटरैस्ट लेते थे और उन की इन बेवजह की चर्चाओं से वह अपने को हमेशा ही दूर रखती थी, इसलिए उन लोगों से भी उस का ज्यादा संबंध नहीं था.

किंतु कालेज के प्रिंसिपल उस को बहुत सम्मान देते थे क्योंकि उन की निगाहों में उसे इतनी कम उम्र में काफी अच्छी जानकारी थी, इसलिए वे उस की हर संभव मदद भी करते थे. कालेज के छात्र भी उस की कक्षाओं को कभी भी नहीं छोड़ते थे क्योंकि उस से अच्छा लैक्चर देने वाला कालेज में कोई अन्य लैक्चरर नहीं था.

एक दिन सुबह उस ने अखबार में देखा कि समीर नाम का कोई आईएएस अधिकारी उस के शहर में जिला अधिकारी बन कर आया हुआ है.

समीर नाम ने ही उस के दिल में हलचल पैदा कर दी. वह सोचने लगी यह वही समीर तो नहीं जो कभी उस के दिल के बहुत करीब हुआ करता था और घंटों मनोविज्ञान के किसी टौपिक पर उस से चर्चा करता था. क्या समीर आईएएस बन गया?

यह प्रश्न उस के जेहन में कौंध रहा था और वह बहुत देर तक समीर के साथ बिताए गए उन पलों को याद कर रही थी जो 5 वर्ष बाद भी अभी तक वैसे ही तरोताजा थे जैसे यह बस कुछ पलों पहले की बात हो.

यही पता लगाने के लिए एक दिन वह उस के औफिस पहुंची तो पता लगा कि साहब अभी मीटिंग में व्यस्त हैं. दूसरे दिन समीर से मिलने के लिए उस के चैंबर में जाना चाहा तो, दरवाजे पर खड़े चपरासी ने उसे रोक दिया और उस से स्लिप मांगी. उस ने सोचा, पता नहीं वही समीर है या कोई और, इसलिए उस ने चैंबर में उस से मिलने का विचार त्याग दिया. वह सोचने लगी वैसे तो जिलाधिकारी आम आदमी के हितों के लिए जिला में पदस्थापित होता है और उस से मिलने के लिए कोई भी व्यक्ति स्वतंत्र है लेकिन अफसरशाही ने आम आदमी से जिलाधिकारी को कितना दूर कर दिया है.

वैसे जिलाधिकारी से उस के द्वारा समयसमय पर लगाए जाने वाले जनता दरबार में भी आसानी से भेंट हो सकती थी किंतु उस के बारे में जानने की तीव्र जिज्ञासा इतनी थी कि वह बहुत समय तक इस के लिए इंतजार नहीं कर सकती थी. सो, जिलाधिकारी द्वारा राजस्व से संबंधित मुकदमों की सुनवाई के लिए किए जाने वाले कोर्ट के दौरान उस ने उसे देखने का मन बनाया.

उसे किसी ने बताया था कि उस दिन जिलाधिकारी न्यायालय में मुकदमे की सुनवाई करेंगे. जब वह उस के न्यायालय में पहुंची तो समीर मुकदमे की कोई फाइल देख रहा था. वह न्यायालय में खड़ी थी किंतु समीर ने उसे नहीं देखा और वह ?ाट न्यायालय के कमरे से बाहर आ गई. फिर अपने घर पहुंची. अब उस ने सोचा कि वह उस के आवास में जा कर मिलेगी. जब वह उस के आवास पहुंची तो फिर चपरासी ने स्लिप मांगी. उसे लगा, वह तो लड़की है, लोग जाने उस के बारे में क्याक्या सोचने लगें, इसलिए उस से बिना मिले ही वापस घर लौट आई.

समीर को जिला में पदस्थापित हुए 4 महीने से अधिक हो गए थे, किंतु उन दोनों की मुलाकात नहीं हुई थी. अब तक मनोविज्ञान पर प्रीति की लिखी पुस्तक ‘आने वाली पीढि़यां और मनोविज्ञान’ को छापने के लिए दिल्ली का पाठ्यपुस्तकों से संबंधित एक प्रकाशक तैयार हो गया था. पुस्तक की पांडुलिपि उस ने प्रकाशक को सौंप दी थी जो अब मुद्रण के लिए भेजी जा चुकी थी.

अगले महीने उस की प्रतियां तैयार हो कर आ जाने वाली थीं और पुस्तक का विमोचन उस के कालेज के हौल में होना तय हुआ था. प्रिंसिपल के आग्रह पर जिलाधिकारी समीर ने भी विमोचन समारोह में आना स्वीकार कर लिया था और उसी के हाथों उस की पुस्तक का विमोचन होना था.

काम की बहुत ज्यादा व्यस्तता के कारण समीर का ध्यान इस ओर नहीं गया था कि इस की लेखिका वही प्रीति है जो कभी दिल्ली में उस के साथ मनोविज्ञान में एमए कर रही थी. पिंसिपल साहब खुद इन्विटेशन ले कर गए थे और प्रीति ने उन से कभी समीर की चर्चा नहीं की थी.

प्रीति यह सोच कर काफी उत्सुक और रोमांचित थी कि उस की पुस्तक का विमोचन समीर के हाथों होगा और उसी के द्वारा वह सम्मानित की जाएगी. वह सोच रही थी कि वह क्षण कैसा होगा जब वह पहली बार इतने दिनों के बाद समीर के सामने जाएगी. आज वह दिन आ ही गया था.

रात में उसे नींद ठीक से नहीं आई थी. बारबार उसे समीर की बातें, उस के साथ घंटों मनोविज्ञान के विभिन्न पहलुओं पर हुई चर्चाएं याद आ रही थीं. उस समय समीर उस से बारबार कहता था कि वह आईएएस बन कर समाज की सेवा करना चाहता है और अब उस की मनोकामना पूरी हो गईर् थी. उस ने जो सोचा था उसे वह मिल गया था.

क्या समीर की शादी हो गई है या अभी भी वह कुंआरा है, यह प्रश्न भी उस के मन में बारबार कौंध रहा था. वह सोच रही थी कि यदि समीर की शादी हो गई है तो उस की पत्नी कैसी होगी. यदि समीर ने उसे देख कर पुरानी बातों को कुरेदना शुरू किया तो उस की पत्नी की प्रतिक्रिया क्या होगी? कहीं वह उस के संबंधों को ले कर आशंकित तो न हो जाएगी.

उस के मन में पहली बार इतना उत्साह था. दिल में हलचल थी. वहीं, अंदर से समीर से मिलने का एक मधुर एहसास भी था. उस ने अपनी सब से अच्छी साड़ी निकाली और पहली बार अपना इतनी देर तक शृंगार किया. आज सच में वह काफी सुंदर लग रही थी.

पुस्तक विमोचन समारोह के लिए कालेज के हौल को काफी सजाया गया था. शहर के कई गणमान्य व्यक्तियों को भी बुलाया गया था. दूसरे कालेजों के शिक्षक और कई विद्वानों को भी आमंत्रित किया गया था. सब के खानेपीने का इंतजाम पुस्तक के प्रकाशक की ओर से था.

वह कालेज रिकशा से जाती थी, किंतु आज प्रिंसिपल ने उसे लाने के लिए अपनी गाड़ी ड्राइवर के साथ भेजी थी और कालेज के एक जूनियर लैक्चरर को भी साथ लगा दिया था.

जब वह कालेज के हौल में पहुंची तो अधिकतर मेहमान आ चुके थे. लाउडस्पीकर पर कोई पुराना संगीत काफी कम आवाज में बज रहा था. पुस्तक विमोचन की सारी आवश्यक तैयारियां कर ली गई थीं. अब जिलाधिकारी के आने की प्रतीक्षा थी.

तभी जिलाधिकारी समीर के आने का माइक पर अनाउंसमैंट हुआ. समीर के स्टेज पर पहुंचते ही सभी उपस्थित मेहमान उस के सम्मान में खड़े हो गए.  प्रिंसिपल ने समीर का स्टेज पर स्वागत किय??ा और उन्हें अपनी बगल में विशेष अतिथि के रूप में बैठाया. ठीक उस के बगल में प्रीति भी बैठी हुई थी. प्रीति ने समीर को देख कर हाथ जोड़े तो वह अप्रत्याशित रूप से उस को स्टेज पर देख कर विस्मित होते हुए बोला, ‘‘अरे तुम, प्रीति?…यहां?’’

‘‘क्या आप एकदूसरे को पहचानते हैं?’’ प्रिंसिपल ने पूछा.

‘‘हम दोनों ने एक ही साथ दिल्ली में एक ही कालेज से साइकोलौजी में एमए किया है.’’

‘‘लेकिन प्रीति ने यह कभी नहीं बताया,’’ प्रिंसिपल ने अब प्रीति की ओर मुखातिब होते हुए कहा, ‘‘क्यों प्रीति, इतना बड़ा राज तुम छिपाए हुए हो. मुझे तो कम से कम बताया होता.’’

प्रीति प्रिंसिपल को क्या बताती कि उस ने कई बार समीर से मिलने की कोशिश की थी लेकिन कुछ संकोच, कुछ झिझक और परिस्थितियों ने उसे उस से नहीं मिलने दिया और चाह कर भी वह समीर से अपने संबंधों को अपने सहकर्मियों के साथ साझा न कर पाई.

‘‘समीर तुम से मिलने की मैं ने बहुत बार कोशिश की, लेकिन मिल नहीं पाई,’’ वह सकुचाते हुए धीरे से बोली.

‘‘अब यह बहानेबाजी न चलेगी प्रीति. फंक्शन के बाद मैं तुम्हारे घर पर आऊंगा. मां कैसी हैं?’’

सुनते ही प्रीति की आंखें नम होने लगीं और वह इस का कोई जवाब नहीं दे पाई तो प्रिंसिपल ने मामले की नाजुकता को समझाते हुए, बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा, ‘‘इत्मीनान से इस संबंध में बातें होंगी. अभी हम लोग पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम शुरू करते हैं.’’

पुस्तक का विमोचन करते हुए समीर ने प्रीति की सादगी, नम्रता और उस के कोमल भावों की विस्तृत चर्चा करते हुए अपने कालेज के दिनों की यादों को सब के साथ सा?ा करते हुए कहा कि प्रीति कालेज में एक ऐसी लड़की थी जिस से हमारे प्रोफैसर भी बहुत प्रभावित थे. प्रीति को साइकोलौजी पर जितनी पकड़ है उतनी बहुत कम लोगों को होती है. हमें गर्व है कि इस शहर में हमारे बीच प्रीति जैसी एक विदुषी हैं.’’

समीर की बातों से पूरा हौल तालियों से गड़गड़ाने लगा तब प्रीति ने महसूस किया कि समीर, जिस के बारे में उस ने सोचा था कि वह उसे भूल गया है, बिलकुल उस की थोथी समझा थी. उस के दिल में उस के प्रति अभी भी उतना ही लगाव और प्रेम है जितना कालेज के दिनों में हुआ करता था.

फंक्शन के बाद समीर ने उस से उस का फोन नंबर लिया और उस के घर की लोकेशन नोट करते हुए कहा कि इस रविवार को वह उस के साथ ही लंच करेगा. अपना विजिटिंग कार्ड उसे थमाते हुए उस ने रविवार को इंतजार करने के लिए कहा.

फंक्शन के बाद उस के सभी सहकर्मी उस को आंखें फाड़ कर देख रहे थे. समीर ने सभी लोगों के बीच जिस प्रकार प्रीति की प्रशंसा की थी और सम्मान दिया था उस का किसी को भी अनुमान नहीं था. प्रीति ने घर आ कर पूरे घर को साफ किया, ड्राइंगरूम में सोफे को करीने से लगाया और घर के बाहर पड़े हुए गमलों को ठीक से लगाया और उन में पानी दिया.

मां के गुजर जाने के बाद प्रीति अंदर से काफी टूट गई थी. घर में कोई नहीं था और उस का जीवन अकेलेपन के दौर से गुजर रहा था, इसलिए पूरा घर ही अस्तव्यस्त पड़ा हुआ था. किंतु समीर ने जब से कहा था कि रविवार को उस के घर आ कर उस के साथ लंच करेगा उस के शरीर में एक नया ही उत्साह पैदा हो गया था, मनमयूर नाचने लगा था और जीवन के प्रति एक नया नजरिया पैदा हो गया था.

रविवार को सुबह से ही प्रीति समीर के लिए लंच की तैयारी में लगी हुई थी. इस बीच फोन पर उस ने प्रयागराज से नीलम को भी बुला लिया था. वह पुस्तक विमोचन समारोह में कुछ जरूरी कामों में व्यस्त रहने के कारण नहीं आ पाई थी. नीलम भी समीर से मिलने के लिए उत्साहित थी. एक लंबे समय के बाद तीनों एकसाथ एक टेबल पर मिलने वाले थे.

समीर ने उसे फोन पर सूचना दी थी कि वह रविवार को 2 बजे के बाद आएगा, उसे एक जरूरी मीटिंग में शामिल होना है क्योंकि जिले में सोमवार को सीएम का दौरा होने वाला था. किंतु वह उस दिन 12 बजे ही आ गया.

‘‘सीएम साहब का दौरा रद्द हो गया तो मैं जल्दी आ गया,’’ आते ही वह बोला. उस का घर एक संकरी गली में था. उस की गाड़ी सड़क पर खड़ी थी. बौडीगार्ड साथ में था.

उसे अचानक आया देख प्रीति और नीलम दोनों उठ खड़ी हुईं.

नीलम को देख कर उस ने सोफे पर बैठते हुए कहा, ‘‘अरे तुम कब आईं. तुम भी आगरा में ही रहती हो क्या?’’

‘‘नहीं, तुम्हारे बारे में प्रीति ने बताया तो मिलने आ गई,’’ नीलम मुसकराते हुए बोली.

‘‘अच्छा हुआ तुम आ गईं. मैं इस शहर में पिछले 4 महीने से हूं लेकिन प्रीति को मेरी कभी याद न आई.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है समीर, तुम से मिलने का मैं ने कई बार सोचा लेकिन मिलने की हिम्मत न हुई.’’ प्रीति ने कहा.

‘‘क्यों, मैं तुम्हारे लिए गैर कब से हो गया. यह क्यों नहीं कहतीं कि तुम मु?ा से मिलना ही नहीं चाहती थीं.’’ अब प्रीति उस से क्या कहती और कहती भी तो क्या उस की सफाई से समीर की उलाहना दूर हो जाती?

‘‘अच्छा, अब बता मां जी कहां हैं?’’

‘‘समीर, अब प्रीति की मां इस दुनिया में नहीं हैं,’’ नीलम ने बताया.

कुछ देर तक समीर चुप रहा, फिर बोला, ‘‘सौरी प्रीति, मैं ने तुम्हारे दिल के दर्द को कुरेदा. अब घर में कौन रहता है?’’

‘‘इस के साथ अब कोई रहने वाला नहीं है समीर. यह नितांत अकेलापन का जीवन जीती है. अपनी दुनिया में खोई हुई. जिस तरह कालेज में किताबों में खोई रहती थी, अब भी किताबें ही इस की साथी हैं,’’ नीलम बोली.

समीर थोड़ी देर तक घर में इधरउधर देखते रहा. उस की मां और बाबूजी का फोटो सामने की दीवार पर टंगा हुआ था. उस ने सोचा उस का ध्यान अब तक उन फोटो पर क्यों नहीं गया जो वह प्रीति को बारबार मां की याद दिलाता रहा. उस ने हाथ जोड़ कर उस के मातापिता के फोटो के सामने जा कर उन्हें प्रणाम किया और प्रीति से बोला, ‘‘जिंदगी इसी का नाम है. यह कोई नहीं जानता कि किस की जिंदगी उस को किस तरह जीने के लिए मजबूर करेगी. तुम से बिछुड़ने के बाद मैं एक बौयज होस्टल में शिफ्ट कर गया जहां सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाले लड़के रहते थे. घर में पढ़ने का माहौल नहीं था.

‘‘वहां एक दिन किसी ने मेरा स्मार्टफोन चुरा लिया. उस फोन में बहुत सारी इन्फौर्मेशन थीं, उसी में तुम्हारा फोन नंबर भी था. मैं ने तुम्हें खोजने का प्रयास किया किंतु तुम्हें ढूंढ़ नहीं पाया. फिर मेरी कोचिंग की क्लासेज चलने लगीं और परीक्षा की तैयारी में इतनी बुरी तरह उल?ा कि फिर तुम्हारी ओर ध्यान ही नहीं गया और इसी बीच मेरे बाबूजी का तबादला कंपनी वालों ने दूसरे शहर में कर दिया जहां वे मां के साथ शिफ्ट कर गए.

‘‘मैं इकलौती संतान था. घर में कोई रहने वाला नहीं था, इसलिए पिताजी ने 3 कमरों के इस अपार्टमैंट में एक कमरा निजी उपयोग के लिए रख कर 2 कमरे किराए पर दे दिए. लेकिन प्रीति तुम चाहतीं तो मेरे घर जा कर मेरे किराएदार से मेरा फोन नंबर मांग सकती थीं क्योंकि कभीकभी मैं वहां जाया करता था और किराएदार को मेरा फोन नंबर मालूम था. तुम तो मेरे घर आई थीं. मेरे मातापिता तुम्हें बहुत ही लाइक करते थे. मां तो हमेशा ही तुम्हारे सरल स्वभाव की प्रशंसा करती थीं और पिताजी अकसर कहा करते थे कि किसी भी व्यक्ति का गुण प्रधान होता है न कि उस का शरीर.

‘‘मेरे मांबाबूजी इसी हफ्ते यहां घूमने आने वाले हैं. मैं तुम्हें उन से मिलवाऊंगा.’’

‘‘हां समीर, मुझे भी उन से मिलने की बहुत इच्छा है. उन से मिले हुए काफी दिन हो गए हैं. उन के आने के बाद तुम मुझे फोन करना, मैं उन से मिलने जरूर आऊंगी. लेकिन तुम अपनी पत्नी को ले कर क्यों नहीं आए?’’

समीर ने हंसते हुए कहा, ‘‘अभी तुम्हारी जैसी कोई मिली नहीं.’’

‘‘क्यों मजाक करते हो समीर. मेरे जैसी कोई मिले भी नहीं. हैंडीकैप होना एक अभिशाप से कम नहीं है.’’

‘‘ऐसा न कहो प्रीति, आज भी मनोविज्ञान के क्षेत्र में तुम्हारा मुकाबला करने वाला इस शहर में कोई नहीं है.’’

यह तो प्रीति नहीं जानती थी कि समीर के साथ उस का क्या रिश्ता है किंतु अंदर ही अंदर यह जान कर कि वह अब तक कुंआरा है उस के मन के तार झांकृत हो उठे.

इस बीच समीर के मांबाबूजी के आने का वह बेसब्री से इंतजार करती रही और फिर कुछ ही दिनों बाद समीर ने उसे फोन कर बताया कि उस के मांबाबूजी आए हुए हैं और उस से मिलना चाहते हैं. आज रात का डिनर उन के साथ करोगी तो उसे खुशी होगी.

प्रीति तो इसी अवसर का इंतजार कर रही थी, इसलिए उस ने उस के निमंत्रण को सहर्ष स्वीकार कर लिया. उसे अंदर आने से कोई न रोके, इसलिए समीर ने उस को लाने के लिए अपनी प्राइवेट कार भेज दी थी.

प्रीति को लेने समीर अपने आवास के गेट तक स्वयं आया. जब वह उस के साथ ड्राइंगरूम में पहुंची तो उस के मांबाबूजी उस का इंतजार कर रहे थे. उस ने उन के पैर छुए. उन्होंने उसे अपनी बगल में बैठा लिया.

‘‘समीर तुम्हारी हमेशा चर्चा करता है. सुना मां भी नहीं रहीं. घर में अकेली हो. बेटी मैं समझा सकती हूं तुम्हारी तकलीफ को. लड़की वह भी अकेली,’’ समीर की मां बोलीं.

‘‘बेटी, अब आगे क्या करना है?’’ समीर के बाबूजी ने पूछा.

‘‘क्या करूंगी बाबूजी. दिन में कालेज में पढ़ाती हूं, रात में अध्ययन, कुछ लेखन.’’ उस ने नम्रता से कहा.

‘‘अभी क्या लिख रही हो?’’

‘‘अभी तो कुछ नहीं. इस पुस्तक का रिस्पौंस देख लेती हूं कैसा है, फिर आगे का प्लान बनाऊंगी.’’

‘‘यह पुस्तक ‘आनेवाली पीढि़यां और मनोविज्ञान’ मैं ने पढ़ी. समीर ने दी थी. यह सच है कि मनोविज्ञान के स्थापित सिद्धांत आने वाली पीढि़यों के संदर्भ में वैसे ही न रहेंगे.’’

‘‘बाबूजी, आप भी क्या न… आते ही पुस्तक की चर्चा में लग गए. घर और बाहर रातदिन यही तो यह करती है. आज तो हम एंजौय करें. वैसे प्रीति, मैं तुम से पूछना भूल गया था, सारे आइटम वेज ही रखे हैं. मांबाबूजी वैजिटेरियन हैं.’’

‘‘मैं भी वैजिटेरियन ही हूं.’’

खाना खाने के बाद जब प्रीति जाने को हुई तो मां ने उसे रोका.

‘‘बेटी, तुम्हारी शादी की कहीं बात चल रही है क्या?’’

प्रीति कुछ न बोल पाई. जवाब देती भी क्या. उस की शादी के लिए कौन बात करने वाला था.

‘‘सम?ा गई बेटी. अब तो तुम्हारे घर में तुम्हारे सिवा कोई है नहीं जिस से तुम्हारी शादी के बारे में बात की जाए. समीर तुम्हारी बहुत प्रशंसा करता है. आईएएस में उस के सिलैक्शन के बाद कई अमीर घराने के लोग अपनी बेटियों की शादी के लिए आए. वे सभी अपनी दौलत के बल पर समीर को खरीदना चाहते थे.

‘‘समीर का इस संबंध में स्पष्ट मत था कि शादी मन का मिलन होता है, सिर्फ शरीर का नहीं और जो लड़की अपने बाप की हैसियत के बल पर इस घर में आएगी वह कभी भी अपना दिल उसे न दे पाएगी. बेटी, अगर तुम्हें कोई आपत्ति न हो और समीर से तुम्हारा मन मिलता हो तो इस घर में तुम्हारी जैसी बहू पा कर हम प्रसन्न होंगे. समीर के पिताजी की भी यही इच्छा है. समीर भी यही चाहता है. अब सबकुछ तुम पर निर्भर करता है. तुम इत्मीनान से फैसला ले कर बताना. कोई जल्दी नहीं है, हम तुम्हारे जवाब का इंतजार करेंगे.’’

‘‘लेकिन मांजी, कहां समीर की पोस्ट और कहां मैं एक साधारण कालेज की लेक्चरार.’’

‘‘अब लज्जित न करो प्रीति,’’ समीर बोला, ‘‘मेरे और तुम्हारे संबंधों के बीच हमारी पोस्ट और हैसियत बीच में कहां से आ गई, इसी से बचने के लिए तो मैं ने

अब तक किसी शादी का प्र्रस्ताव स्वीकार नहीं किया.’’

प्रीति ने लज्जा से सिर झांका लिया.

उस ने समीर के मांबाबूजी के पैर छूते हुए कहा, ‘‘आप लोगों का आदेश मेरे लिए आज्ञा से कम नहीं.’’

फिर उस की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे.

समीर उसे छोड़ने उस के घर तक गया. जब वह लौटने लगा तो उस ने प्रीति को अपने गले से लगा लिया. और बोला, ‘‘प्रीति पतिपत्नी का रिश्ता बराबर का होता है, आज भी मैं वही समीर हूं जो कालेज के दिनों में हुआ करता था और आगे भी ऐसे ही रहूंगा.’’

समीर के गले लगी प्रीति को ऐसा लग रहा था मानो सारे जहां की खुशियां उसे मिल गई हैं. रात का सियाह अंधेरा अब समाप्त हो चुका था. सुबह की नई किरणें फूटने लगी थीं. Long Hindi Story

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