व्यापम घोटाला कट्टरपंथी सोच का नतीजा

मध्यप्रदेश के व्यापम घोटाले में सामने आए 634 मैडिकल छात्रों के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट ने दाखिला रद्द कर दिया है और उच्च न्यायालय का निर्णय बरकरार रखा है. 2008 से 2012 के बीच अवैध ढंग से प्रवेश पाए इन कथित डाक्टरों का कैरियर अब बरबाद हो गया है, क्योंकि उन्होंने प्रवेश के समय घोटालेबाजों का साथ लिया था.

इन 634 छात्रों से सहानुभूति रखने की कोई वजह नहीं है, क्योंकि देश भर में इस तरह के काम हो रहे हैं जो छात्रों को बचपन से गलत राह पर ले जा रहे हैं और सिखा रहे हैं कि शिक्षा में हर तरह का हेरफेर संभव है और परीक्षा पैसे, चालबाजी, नकल, बेईमानी का खेल है, प्रतिभा का आकलन नहीं. अगर इन 634 ही नहीं, कुछ हजार या लाख छात्रछात्राओं के कैरियर की सिस्टम को सुधार के लिए कुरबानी देने पड़े तो गलत न होगा.

यह ध्यान रखने की बात है कि असल अपराधी वे हैं जिन्होंने इन छात्रों को प्रवेश दिलाया था और उन्हें अभी तक सजा मिल पाई है या नहीं स्पष्ट नहीं है. बहुतों पर मुकदमे चल रहे हैं, कुछ लापता हैं, कुछ जमानत पर छूटे हैं, पर इतना पक्का है कि अब तक जो भी कानूनी कार्यवाही हुई है वह और गुनाहगारों को रोकने में असफल है और देश भर में नकल और मुन्नाभाइयों की फसल जम कर बोई जा रही है.

हमारी शिक्षा असल में वैदिक हिंदूवादी बन गई है जिस में गुरु की सेवा, उसे दक्षिणा देने और उस की बात को सिरमाथे रखने का निरंतर आदेश दिया जाता है. ज्ञान, तर्क, समीक्षा, नई सोच, शोध का हमारी शिक्षा में बहुत कम स्थान है. व्यापम जैसे घोटाले इसीलिए हो रहे हैं, क्योंकि द्रोणाचार्य आदर्श हैं जो एक मेधावी धनुर्धारी का अंगूठा इसलिए कटवा लेते हैं ताकि उन का प्रिय शिष्य परीक्षा में पास हो सके.

व्यापम उस राज्य की देन है जो कट्टरपंथी सोच का गढ़ बना हुआ है और जहां नए विचारों की हवा को भोपाल गैस से ज्यादा जहरीला समझा जाता है. इस मामले में अदालत ने पाया था कि जैसे सफलता के लिए किए जाने वाले मंत्रों में एक ही भाषा का उपयोग किया जाता है वैसे ही छात्रों ने परीक्षा में ओएमआर शीटों में एक जैसी गलती की थी यानी पूरी तरह नकल की थी. ऐसे छात्र मैडिकल की डिग्री के तो कतई हकदार नहीं हैं, क्योंकि वे गलती पर गलती कर सकते हैं.

यह आश्चर्य है कि इस तरह की खामियों के बावजूद देश में प्रतिभाएं हैं और देश में ही नहीं देश के बाहर भी नाम कमा रही हैं. शायद जहरीले पौधों में कुछ फलदार पेड़ भी चल ही जाते हैं. ज्यादा अफसोस यह है कि शिक्षा में बेईमानों को पकड़ने का नाटक तो थोड़ाबहुत किया जा रहा है पर प्रणाली बदलने पर कोई नई सोच नहीं है.

‘बेगम जान’ की अभिनेत्री ने तोड़ी बोल्डनेस की हदें

हाल ही में बेगम जान के ट्रेलर में दमदार किरदार में दिखीं अभिनेत्री पल्लवी शारदा इन दिनों सोशल मीडिया में जबदस्त चर्चाओं में हैं. पल्लवी इन दिनों सिडनी में छुट्टियां मना रही हैं. इस दौरान उन्होंने अपने फैंस के साथ वैकेशन की तस्वीरें शेयर की हैं. इन तस्वीरों में पल्लवी बेहद हॉट नजर आ रही हैं. फिल्म इंडस्ट्री में पल्लवी अपनी सिंपल और सोबर इमेज के लिए जानी जाती हैं. वहीं ऐसे में उनकी ये बोल्ड अवतार एक तरह से चौंकाने वाली ही है. सिडनी में छुट्टियां मनाने के दौरान पल्लवी बिकिनी में तस्वीरें खिंचवाती दिखाई दीं. वहीं उन्होंने अपनी बिकिनी फोटोज अपने इंस्टाग्राम एकाउंट पर फैंस के साथ शेयर की है. इन तस्वीरों में पल्लवी काफी ग्लैमरस अवतार में नजर आईं. वहीं उनके इस अवतार को फैंस काफी पसंद कर कर रहे हैं.

पल्लवी ने हाल ही में फिल्म बेगम जान के लिए शूटिंग पूरी की है. फिल्म के ट्रेलर में दिखाई दे रहा है कि पल्लवी इस फिल्म में बोल्ड और दमदार रोल अदा कर रही हैं. वहीं इस फिल्म में विद्या बालन लीड में हैं. पल्लवी ने कई बॉलीवुड फिल्मों में काम किया है. दस तोला, रणबीर कपूर के साथ ‘बेशरम’ और आयुष्मान खुराना के साथ ‘हवा हवाई’ में भी पल्लवी लीड रोल्स में दिखाई दीं, लेकिन ये फ़िल्में बॉक्स ऑफ़िस पर ढेर रहीं.

पल्लवी शारदा रणबीर कपूर की फिल्म बेशरम में भी दिखाई दी थीं. इस फिल्म में उन्होंने रणबीर के साथ रोमांस किया था. वहीं ये फिल्म भी कुछ खास नहीं कर पाई लेकिन पल्लवी को अभिनय के लिए काफी तारीफें मिली थीं.

वहीं बेगम जान की शूटिंग पूरी करने के बाद जमकर प्रमोशन में लगी पल्लवी ने काम से थोड़ा ब्रेक लिया और सिडनी पहुंच गईं. उन्होंने सिडनी में जमकर मस्ती की और खूब तस्वीरें शेयर कीं. पल्लवी ने अपनी सिडनी वैकेशन की तस्वीरें सोशल एकाउंट पर फैंस के साथ शेयर की हैं. इन तस्वीरों में वे बेहद हॉट और ग्लैमरस नजर आ रही हैं. वहीं उनकी बोल्ड तस्वीरों को फैंस काफी पसंद कर रहे हैं.

पल्लवी ने ऑस्कर नॉमिनेटिड फ़िल्म Lion में एक रोल निभाया है. इस बार के एकेडमी अवॉर्ड्स में बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर केटेगरी में देव पटेल समेत ‘लॉयन’ को कई नॉमिनेशन मिले थे. मनोज बाजपेयी के साथ उन्होंने ‘दस तोला’ में बतौर लीडिंग लेडी डेब्यू किया. उन्होंने करण जौहर की फिल्म माई नेम इज खान में भी सपोर्टिंग रोल निभाया था.

हाल ही में पल्लवी अपनी फिल्म के प्रमोशन के लिए कपिल शर्मा के शो पर पहुंची थीं. इस दौरान उनकी ड्रेस ने उन्हें काफी परेशान किया था. बार-बार ड्रेस ठीक करतीं पल्लवी की ये उलझन सोशल मीडिया पर चर्चा में रही थी.

शिवराज को भारी पड़ सकता है सिंधियाओं से बैर

बात अब से कोई छह महीने पहले की है. मध्य प्रदेश की वरिष्ठ और कद्दावर मंत्री यशोदाराजे सिंधिया मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान के गृह नगर विदिशा एक कार्यक्रम में भाग लेने पहुंची थीं. इस कार्यक्रम में विदिशा नगर पालिका अध्यक्ष मुकेश टंडन को उन्होंने लगभग अपमानित करते चलता कर दिया था. मुकेश टंडन कभी विदिशा की सड़कों पर ऑटो रिक्शा चलाते थे. अपनों को उपकृत करने में कंजूसी बरतने बाले शिवराज सिंह चौहान उन पर इस कदर मेहरबान हुये कि आज विदिशा में टंडन के नाम का सिक्का चलता है.

अपने कुछ वफ़ादारों को उपकृत कर उनकी लाइफ बना देने का रिवाज अब भारतीय राजनीति में मान्य हो चला है पर यशोधरा ने जो सुलूक शिवराज सिंह के इस चेले के साथ किया उसे शिवराज सिंह ने इस हद तक आहत किया कि भिंड जिले की अटेर विधानसभा उप चुनाव के प्रचार  में उन्होने सिंधिया खानदान के भारतीय स्वतन्त्र्ता संग्राम आंदोलन में योगदान के बारे में जो ताना कसा उससे सियासी गलियारों में क्रिकेट के एक दिवसीय मैच के आखिरी ओवरों सा रोमांच है और किसी बड़ी टूट फूट से इंकार करने की स्थिति में कोई नहीं.

कडवे बोल और इतिहास

अटेर की एक चुनावी मीटिंग को संबोधित करते शिवराज सिंह ने कहा, 1857 की क्रांति में अटेर इलाका महारानी लक्ष्मीबाई के साथ खड़ा रहा था, अंग्रेजों का साथ इस इलाके ने कभी नहीं दिया. मैं यह भी जानता हूं कि यहां अंग्रेजों के साथ मिलकर सिंधिया (राजघराने) ने बड़े जुल्म ढाए, पर लोगों ने बहादुरी के साथ इनका मुक़ाबला किया. दरअसल में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपना राज बढ़ाने और बनाए रखने देसी रियासतों से एक करार किया था जिसे सहायक संधि के नाम से जाना गया. इस संधि का  प्रमुख बिन्दु यह था कि रियासतें अंग्रेजी सेना का खर्च उठाएंगी, जिसके एवज में अंग्रेज उस रियासत के दुश्मनों से निबटने में उसकी मदद करेंगे.

जिन रियासतों ने इस संधि को माना वहां अंग्रेजों ने अपना एक अफसर निगरानी के लिए तैनात कर दिया. चूंकि साल 1804 में ग्वालियर के सिंधिया राज घराने ने भी इस संधि को माना था, इसलिए कालांतर में उसका नाम भी गद्दारों की सूची में शुमार हो गया जो आज तक कायम है. इस लिहाज से शिवराज सिंह ने नया कुछ नहीं कहा बस एक ऐतिहासिक सच को दोहराकर अटेर का कड़ा मुकाबला अपने पक्ष में करने की कोशिश की जो किसी भी लिहाज से गलत या नाजायज बात नहीं कही जा सकती.

पर यह भूल गए

जैसे एक दिवसीय मैच में बहुत देर से डटा बल्लेबाज बॉलर की खूबी से नहीं, बल्कि अपनी गलती या लापरवाही से आउट होता है वैसा ही इस मामले में हुआ. शिवराज सिंह ने तीर तो ठीक चलाया था, लेकिन वह गलत जगह जाकर लगा. मुकेश टंडन के अपमान के बाद यशोधरा राजे को उस कार्यक्रम में जानबूझ कर नहीं बुलाया गया जिसमे उनकी मौजूदगी जरूरी थी.  यशोधरा एक मामूली से प्यादे की वजह से हुई अपनी अनदेखी हजम नहीं कर पा रहीं थीं, लिहाजा वे बेहद भावुक पर हमलावर अंदाज में पलटवार करते बोलीं, यह किस तरह की राजनीति है, मैं समझ नहीं पा रही हूं. जो लोग सिंधिया परिवार की देशभक्ति पर सवाल खड़े कर रहे हैं वे शायद भूल गए हैं कि यह भाजपा आज जहां खड़ी है उसका रोड मेप मेरी मां राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने तैयार किया था.

मीडिया के सामने लगभग रोते हुये यशोधरा ने यह भी गिनाया कि भाजपा को खड़ा करने राजमाता ने न केवल खुद के बल्कि हम बहनों (बड़ी बहन वसुंधरा राजे, मुख्य मंत्री राजस्थान ) तक के हिस्से के गहने बेचकर चुनाव के लिए गाड़ियों का इंतजाम किया और पार्टी को चंदा भी दिया. केवल आर्थिक योगदान की चर्चा कर वे चुप नहीं हो गईं. बकौल यशोधरा,  जब हम लोग छोटे थे तब अम्मा से मिलने तरस जाते थे क्योकि वे देशसेवा के काम में लगी होतीं थीं. आज जब अपने ही लोग सिंधिया उपनाम लेकर आरोप लगा रहे हैं तो इसे किस तरह बर्दाश्त किया जा सकता है? यशोधरा राजे मानती हैं कि पार्टी बदल गई है उसके लोग भी बदल गए हैं, वे सब कुछ भूल गए हैं और मैं जब भी इस तरह की बातों का विरोध करती हूं तो लोग मुझे कहते हैं कि आपको क्या लेना देना. असल में लोग मुझे दबाने कि कोशिश करते हैं क्योकि मैं एक महिला हूं.

इस तरह की लंबी चौड़ी बयानबाजी के बाद उपसंहार या इति के रूप में यशोधरा ने कहा, सीएम सब जानते हैं, उन्होंने राजमाता से सीखा है, इसलिए मैं उम्मीद करती हूं कि वे गलत नहीं बोलेंगे. आमतौर पर सधे बयानों और संतुलित राजनीति के लिए पहचाने जाने वाले शिवराज सिंह यशोधरा राजे के इस भावुक आक्रमण पर घबराए हुये हैं कि अब क्या करें? बिलाशक विजयराजे सिंधिया के योगदान को भाजपा में कोई नकार नहीं सकता, जिनहोने पहले जनसंघ और फिर भाजपा के लिए जो किया वह वाकई एक मिसाल है. इन्दिरा गांधी से खुला बैर रखने वाली विजयराजे सिंधिया की यह राजनैतिक प्रतिबद्धता ही थी कि उन्होंने आखिरी सांस तक अपने इकलौते बेटे कांग्रेसी खेमे के माधवराव सिंधिया से बात तक नहीं की थी.

सिंधिया राजघराना आज भी भाजपा और कांग्रेस के बीच बंटा हुआ है. माधवराव के बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस कभी भी सीएम प्रोजेक्ट कर सकती है, इसलिए कांग्रेसी खेमे ने कैच लपकते राजमाता को बीच में ला खड़ा किया, जिससे तिलमिलाई यशोधरा राजे ने शिवराज सिंह सहित पूरी भाजपा को कटघरे में खड़ा कर दिया है. अब भाजपा जो भी जबाब दे या न भी दे तो उसकी छीछलेदार होना तय है. अपनी मां और पूर्वजों के बाबत यशोधरा ने अपनी बहन वसुंधरा राजे से भी चर्चा की है जो खुद राजस्थान में कई दिक्कतों से घिरी हुई हैं. तय यह भी है कि अगर कांग्रेस ज्योतिरादित्य सिंधिया को बतौर सीएम पेश कर मध्य प्रदेश का विधानसभा चुनाव लड़ती है, तो शिवराज सिंह की राह आसान नहीं रह जाएगी, क्योंकि सिंधिया की साफ सुथरी छवि और लोकप्रियता का कोई तोड़ मजबूत दिख रही भाजपा के पास है नहीं.

दूसरी दिक्कत भाजपा में ही शिवराज सिंह का बढ़ता विरोध है. दो दिग्गजों रघुनंदन शर्मा और बाबूलाल गौर ने देर न करते शिवराज सिंह को घेरा तो आला कमान और उसमे भी साध्वी उमा भारती की प्रतिक्रिया का लोग बैचनी से इंतजार कर रहे हैं जो राजमाता विजयराजे सिंधिया को अपने आदर्श मानती हैं, क्योंकि वे ही उन्हे राजनीति में लाईं थीं. अपनी बुआओं वसुंधरा और यशोधरा से तयशुदा दूरी पर चलते रहने बाले ज्योतिरादित्य सिंधिया खामोश हैं, जो यशोधरा–शिवराज सिंह विवाद में अपनी संभावनाएं देख रहे हैं लेकिन वे ज्यादा देर चुप रहेंगे ऐसा लग नहीं रहा. ग्वालियर में चर्चा है कि वे अपने एक चहेते पत्रकार की किताब के विमोचन के वक्त इस मुद्दे पर बोलेंगे, क्योकि देश भर के लेखक पत्रकार इस आयोजन में शिरकत करने आ रहे हैं. यह ज्योतिरादित्य के लिए मुफीद मौका अपने खानदान और पूर्वजों पर बोलने का होगा.

कहा यह भी जा रहा है कि अगर शिवराज सिंह अपने किसी चहेते के अपमान को अगर सहन नहीं कर पाये और इस तरह उसे भुनाया, तो ये उनके लड़खड़ाने के भी संकेत हैं. दूसरे अगर सिंधिया परिवार में कोई अंदरूनी संधि हो गई तो भी नुकसान भाजपा का ही होगा, कांग्रेस के पास तो खोने को अब कुछ बचा ही नहीं है.

जब कैटरीना ने किया गुलशन ग्रोवर को सिड्यूस

कैटरीना कैफ बॉलीवुड की सफल अभिनेत्रियों में से एक हैं. इन्होंने बॉलीवुड में डेब्यू अमिताभ बच्चन और गुलशन ग्रोवर स्टारर फिल्म बूम से किया था. लेकिन उनकी डेब्यू फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप हुई थी. फिल्म बकायदा डिजास्टर थी. लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है. आगे इस फिल्म के बारे में हम आपको कुछ ऐसा बताने जा रहे हैं जिसे जानकर आप दंग रह जाएंगे. इस फिल्म में कैटरीना कैफ और गुलशन ग्रोवर ने किस किया था. यही नहीं इन दोनों ने करीब दो घंटे तक लिप लॉक सीन की प्रैक्टिस की थी. एक इंटरव्यू के दौरान गुलशन ग्रोवर ने बताया था कि फिल्म बूम के लिए दिया जाने वाला किसिंग सीन उनके करियर का सबसे मुश्किल दौर था. इसके लिए उन्हें दो घंटे तक प्रैक्टिस करनी पड़ी थी. इस सीन को शूट करने के लिए गुलशन काफी नर्वस थे. उन्होंने कई बार बंद कमरे में इसके लिए प्रैक्टिस की थी.

गुलशन ने आगे बताया कि कैटरीना और गुलशन जब इसकी प्रैक्टिस कर रहे थे तो वहां से अमिताभ बच्चन गुज़र रहे थे. दोनों को प्रैक्टिस करते देख बिग बी ने उन्हें चीयर किया और वहां से चले गए. गुलशन ने कहा कि इसके बाद तो बस स्ट्रेस बढ़ा था और कुछ नहीं. गुलशन ने बताया कि जब दोनों डायरेक्टर कैजाद के सामने थे, सीन शूट करने के लिए डायरेक्टर ने कैटरीना को टेबल पर आने के लिए कहा और गुलशन को कॉलर से पकड़कर किस करने के लिए कहा. इस पर गुलशन कुछ देर के लिए तो काफी शॉक्ड रह गए, लेकिन कैटरीना ने काफी कॉन्फिडेंस के साथ इस सीन को किया.

कुछ सालों बाद जब कैटरीना अच्छी खासी स्टार बन चुकी थीं तो उनकी डेब्यू फिल्म में गुलशन ग्रोवर के साथ दिए गए किसिंग सीन पर काफी कंट्रोवर्सी हुई थी. जब कैटरीना से फिल्म बूम के विवादित सीन के बारे में पूछा गया था तो उन्होंने कहा था कि इसमें रिएक्ट करने जैसा क्या है. ऐसे सीन देना कोई नई बात नहीं है. फिल्म बूम हमेशा इंटरनेट पर रही है. मैंने ये सीन दिए, इसके लिए मैं मना नहीं करूंगी लेकिन मैं कंफर्टेबल नहीं थी. ऐसी भी खबरें आई थी कि बूम फिल्म एक बार फिर से डीवीडी के जरिए रिलीज की जाएगी, जिसमें वो गुलशन और कैटरीना के वो सभी इंटिमेट सीन होंगे जो पहले काटे गए थे. हालांकि कैटरीना ने इस खबर का खंडन किया था. उस समय ऐसा माना जा रहा था कि फिल्म से लिप लॉक सीन इसलिए काटे गए थे क्योंकि सलमान खान ने फिल्म के मेकर्स को ऐसा करने पर मजबूर किया था. कैटरीना ने बताया था कि फिल्म बूम के बाद उन्हें कई फिल्मों के ऑफर मिले लेकिन उन्होंने साइन नहीं किया. वो इसलिए क्योंकि वो ऐसे रोल की तलाश में थी जिसके जरिए वो अपनी पहचान बनातीं.

फिल्म रिलीज होने पर जब गुलशन से फिल्म के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि बूम एक निराली फिल्म है. जैकी, अमिताभ और मैंने इसमें गैंगस्टर का किरदार निभाया है. इसमें मेरा रोमांटिक रोल भी है. इसमें कैटरीना ने मुझे सिड्यूस करने की कोशिश की है.

नेताजी को समझ में आया कानून सबके लिए एक है

उस दिन तारीख थी 8 दिसंबर. राजस्थान के शहर धौलपुर के कचहरी परिसर में उस दिन आम दिनों से कुछ ज्यादा ही भीड़ थी. सर्दी होने के बावजूद लोग 10 बजे से पहले ही कचहरी पहुंच गए थे. कारण यह था कि उस दिन बहुचर्चित नरेश कुशवाह हत्याकांड का फैसला सुनाया जाना था, जिस में अभियुक्त थे धौलपुर के बसपा विधायक बी.एल. कुशवाह. अदालत के फैसले से जहां एक तरफ विधायक बी.एल. कुशवाह के भविष्य का निर्णय होना था, वहीं दूसरी ओर राजस्थान के कई प्रमुख दलों की निगाहें भी इस फैसले पर टिकी थीं. इस की वजह यह थी कि विधायक को सजा होने पर बसपा की एक सीट कम हो जाती, जिस के लिए उपचुनाव होना तय था, क्योंकि राजस्थान में मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल दिसंबर 2018 तक था.  अदालत ने नरेश कुशवाह हत्याकांड का फैसला सुनाने की तारीख 8 दिसंबर पहले ही तय कर दी थी. सत्र न्यायाधीश सलीम बदर निर्धारित समय पर अदालत पहुंच गए. उन्हें ही इस केस का फैसला सुनाना था. पुलिस गार्ड भी अभियुक्तों बी.एल. कुशवाह और सत्येंद्र सिंह को जेल वैन में ले कर समय पर अदालत आ गए थे.

अपर सत्र न्यायाधीश के कुरसी संभालते ही अदालत में सन्नाटा छा गया. दोनों अभियुक्त तो अदालत में थे ही, मृतक नरेश कुशवाह के घर वाले, राज्य सरकार की ओर से नियुक्त लोक अभियोजक अजय कुमार गुप्ता, विपक्ष के वकील रामकुमार शर्मा और सत्येंद्र सिंह के वकील सुरेंद्र शर्मा भी अदालत में मौजूद थे. अदालत में शांति बनाए रखने का आदेश देने के बाद न्यायाधीश महोदय ने अपना फैसला सुनाना शुरू किया, ‘‘अदालत ने दंड के रूप में दी जाने वाली सजा पर दोनों पक्षों को ध्यान से सुना. अभियुक्तों के वकीलों का तर्क है कि इस से पहले अभियुक्तों ने कोई भी अपराध नहीं किया है. उन के विरुद्ध अपराध भी पहली बार सिद्ध हुआ है, जो जघन्य से जघन्यतम नहीं है. इसलिए उन्हें दिए जाने वाले दंड में नरमी बरती जानी चाहिए. जबकि लोक अभियोजक अजय कुमार गुप्ता ने नरेश कुशवाह हत्याकांड को जघन्य अपराध बताते हुए अधिकतम दंड देने की गुजारिश की है.’’

न्यायाधीश महोदय ने अपना फैसला सुनाते हुए आगे कहा, ‘‘दोनों पक्षों के तर्कों पर मनन करने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि आरोपी बनवारी लाल कुशवाह की छोटी बहन सीमा कुशवाह का प्रेम संबंध नरेश कुशवाह के साथ था और वह नरेश से प्रेम विवाह करना चाहती थी. लेकिन दोनों परिवारों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में कोई बराबरी नहीं थी. सीमा का परिवार आर्थिक रूप से समृद्ध और रौबरुतबे वाला था. जबकि नरेश एक साधारण किसान का बेटा था.

‘‘आरोपी बनवारी लाल को यह बात बरदाश्त नहीं थी कि उस की बहन ऐसे युवक से शादी करे जिस का परिवार उस के परिवार के साथ खड़ा होने लायक ही न हो, इसलिए उस ने नरेश कुशवाह की हत्या का षडयंत्र रचा और अपने निजी सुरक्षाकर्मी सत्येंद्र सिंह और उस के करीबी रोबिन सिंह को पैसा दे कर नरेश कुशवाह की हत्या करवा दी, जो औनर किलिंग की श्रेणी में आती है. माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी घटनाओं पर अत्यधिक कड़ा रुख अपनाते हुए दिशानिर्देश दिए हैं कि ऐसे अपराधियों को मृत्युदंड से दंडित किया जाना चाहिए.’’ न्यायाधीश श्री सलीम बदर ने इस संबंध में कुछ उदाहरण पेश करने के बाद कहा, ‘‘प्रस्तुत मामले में आरोपी बनवारीलाल कुशवाह ने अपने धनबल का प्रयोग कर के किराए के हत्यारों से नरेश कुशवाह की हत्या इसलिए कराई ताकि उस की बहन सीमा उर्फ सुषमा नरेश से प्रेम विवाह न कर सके. इस के लिए सत्येंद्र सिंह और रोबिन सिंह को पैसा दिया गया. इस केस की तमाम पत्रावलियों और साक्ष्यों पर गौर करने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि इस केस की परिस्थितियां ऐसी नहीं हैं कि इसे जघन्य से जघन्यतम माना जाए.’’

न्यायाधीश महोदय ने एक नजर अदालत में मौजूद लोगों पर डाली और फिर अपना फैसला सुनाने लगे, ‘‘अदालत आरोपी सत्येंद्र सिंह जाट, निवासी जलालपुर करीरा, जिला बुलंदशहर को भादंसं की धारा 302 और धारा 120बी के तहत हत्या का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास व 10 हजार रुपए का दंड देती है.’’ कुछ देर रुक कर न्यायाधीश महोदय ने उचटती नजरों से बी.एल. कुशवाह की ओर देखा और फिर अपना फैसला सुनाने लगे, ‘‘आरोपी बनवारीलाल कुशवाह, निवासी जमालपुर, जिला धौलपुर पर भादंसं की धारा 120बी सपठित धारा 302 भादंवि के आरोप साबित हुए हैं. अत: बनवारीलाल कुशवाह को भी आजीवन कारावास और 10 हजार रुपए के अर्थदंड की सजा दी जाती है.’’

इस केस के अन्य अभियुक्तों के विरुद्ध चूंकि अभी जांच चल रही थी, इसलिए न्यायाधीश महोदय ने पुलिस को आदेश दिया कि जल्दी से जल्दी जांच और गिरफ्तारी का काम किया जाए. अदालत का फैसला सुन कर विधायक बनवारीलाल कुशवाह व सत्येंद्र सिंह के चेहरे उतर गए. जबकि मृतक नरेश कुशवाह के पिता मेघसिंह और मां जमुना देवी ने इस फैसले पर खुशी जताई. अदालत के निर्णय के बाद पुलिस बल ने दोनों आरोपियों को अपनी कस्टडी में ले लिया. अब उन्हें आगे की जिंदगी जेल में काटनी थी. दरअसल, 27 दिसंबर, 2012 को झीलकापुरा गांव के रहने वाले थानसिंह कुशवाह ने धौलपुर के सदर पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई कि 2 युवक लाल रंग की डिसकवर मोटरसाइकिल पर उन के घर आए और उस के भाई नरेश कुशवाह को बुला कर ट्यूबवेल पर ले गए.

कुछ देर बाद उस ने गोली चलने की आवाज सुनी तो वह छोटे भाई पुष्पेंद्र और अन्य ग्रामीणों के साथ खेत में स्थित ट्यूबवेल पहुंचा. वहां वे दोनों युवक नरेश को गोली मार रहे थे और कह रहे थे कि जान से मार डालो. जब हम लोग वहां पहुंचे तो दोनों हमलावर मोटरसाइकिल पर बैठ कर भाग गए. हम नरेश को अस्पताल ले कर गए, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. उसी दिन पुलिस ने सदर थाने में मुकदमा संख्या 316/2012 धारा 302 के तहत दर्ज कर लिया. हत्या की सूचना पर तत्कालीन पुलिस अधिकारियों में एएसपी किशन सहाय, सीओ सिटी दशरथ सिंह, थानाप्रभारी हवा सिंह आदि मौके पर पहुंचे. पुलिस ने मौका मुआयना कर के पूछताछ की लेकिन यह पता नहीं चला कि नरेश की हत्या करने वाले कौन थे और हत्या की वजह क्या थी. पुलिस ने उसी दिन नरेश के शव का पोस्टमार्टम करा कर उस के घर वालों को सौंप दिया. पुलिस ने मामले की जांचपड़ताल शुरू की. पुलिस के सामने परेशानी यह थी कि हत्यारे अज्ञात थे. उन का कोई अतापता नहीं चल पा रहा था. पुलिस ने मृतक नरेश के घर वालों से पूछताछ की तो उन्होंने इस बात की आशंका जताई कि नरेश की हत्या प्रभावशाली लोगों के इशारे पर की जा सकती है.

इन प्रभावशाली लोगों में बनवारीलाल कुशवाह का नाम सामने आया. बनवारीलाल कुशवाह का मध्य प्रदेश व अन्य कई जगहों पर चिटफंड का लंबाचौड़ा कारोबार होने की बात भी पता चली. यह भी पता चला कि बनवारीलाल कुशवाह मध्य प्रदेश के पूर्व गृह राज्यमंत्री और मौजूदा विधायक नारायण सिंह का रिश्तेदार है. नरेश की हत्या की वजह यह पता चली कि नरेश का बनवारीलाल कुशवाह की बहन सीमा उर्फ सुषमा से प्रेम प्रसंग चल रहा था. सीमा नरेश से विवाह करना चाहती थी. बनवारीलाल इस के खिलाफ था. इस की वजह यह थी कि नरेश बेहद गरीब परिवार से था, जबकि सीमा आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से संपन्न परिवार की बेटी थी. बनवारीलाल ने एकदो बार दूसरों के माध्यम से नरेश को इस बात के लिए आगाह भी किया था, लेकिन सीमा नरेश से ही शादी करना चाहती थी. संभव है इसी बात को ले कर नरेश की हत्या की गई हो.

इस बीच, बनवारीलाल कुशवाह ने सन 2013 के आखिर में हुए राजस्थान की 14वीं विधानसभा के चुनाव में धौलपुर सीट से बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी के रूप में नामांकन पत्र दाखिल कर दिया. कहते हैं कि चिटफंड कंपनियों से मोटा पैसा कमाने और छोटे भाई बालकिशन की ससुराल राजनीतिक परिवार में हाने के कारण बनवारीलाल कुशवाह की राजनीति में आने की इच्छा थी. बनवारीलाल कुशवाह ने अपने संपर्कों के बल पर बसपा का टिकट हासिल कर लिया. राजस्थान में उस समय जनता महंगाई जैसे कारणों को ले कर सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी की सरकार बदलना चाहती थी. इसलिए भाजपा के पक्ष में लहर चल निकली. भाजपा की लहर के बावजूद धौलपुर से बसपा के टिकट पर बनवारीलाल कुशवाह विधायक चुन लिए गए.

विधानसभा चुनाव के दौरान बनवारीलाल कुशवाह द्वारा भरे गए नामांकन पत्र के साथ 8 नवंबर, 2013 को नोटरी से सत्यापित शपथपत्र में उन्होंने खुद की वार्षिक आय 1 करोड़ 47 लाख 64 हजार 130 रुपए बताई, जबकि पत्नी शोभारानी की वार्षिक आय 38 लाख 55 हजार 750 रुपए बताई. शपथपत्र में बनवारीलाल ने खुद की ओर से 18 कंपनियों में 12 करोड़ 55 लाख रुपए एवं पत्नी शोभारानी की ओर से 15 कंपनियों में 2 करोड़ 85 लाख रुपए का निवेश बताया गया. शपथपत्र में कुशवाह ने धौलपुर के गांव जमालपुर में 3.83 एकड़ जमीन, दलेलपुर में 0.63 एकड़ जमीन और धौलपुर में 20,664 वर्गफुट गैर कृषि भूमि होना बताया. इस के अलावा उन्होंने दिल्ली एवं ग्वालियर में अपनी संपत्तियां होने की बात भी कही थी.

विधायक चुने जाने के बाद बनवारीलाल कुशवाह पर विधानसभा चुनाव में गलत शपथपत्र पेश करने के आरोप भी लगे. इस संबंध में कई लोगों की ओर से अलगअलग अधिकारियों को ज्ञापन भी दिए गए. ज्ञापन में आरोप लगाए थे कि बनवारीलाल कुशवाह मध्य प्रदेश में चिटफंड धोखाधड़ी मामले में आरोपी हैं. बनवारीलाल कुशवाह भले ही धौलपुर से विधायक चुने गए, लेकिन वे गिरफ्तारी के डर से राजस्थान विधानसभा के पहले सत्र में तय समय पर शपथ लेने नहीं पहुंचे. बाद में 6 फरवरी, 2014 को वे शपथ लेने विधानसभा पहुंचे, उस से पहले ही पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले कर पूछताछ की. पूछताछ में पता चला कि वे अंतरिम जमानत पर हैं. बाद में पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया. इस के बाद बनवारीलाल कुशवाह ने 7 फरवरी, 2014 को विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल के चैंबर में शपथ ली. अगर वे चुनाव के 60 दिनों के भीतर शपथ नहीं लेते तो उन की विधानसभा सदस्यता रद्द हो सकती थी.

दूसरी ओर पुलिस नरेश हत्याकांड की जांच कर रही थी. एक साल से अधिक समय से मामले की जांच एक से दूसरे पुलिस अधिकारियों के बीच घूमती रही. मृतक नरेश के परिजनों द्वारा पुलिस पर लगातार काररवाई का दबाव बनाने से मामले की जांच में तेजी आई. जांचपड़ताल के बाद पुलिस ने अप्रैल 2014 में सत्येंद्र सिंह को नरेश की हत्या के आरोप में उत्तर प्रदेश की बुलंदशहर जेल से रिमांड लिया. बुलंदशहर जिले के शिकारपुर थानाक्षेत्र के गांव करीरा के रहने वाले सत्येंद्र सिंह ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि नरेश की हत्या की साजिश धौलपुर विधायक बी.एल. कुशवाह और उस के साथियों ने रची थी. आवश्यक जांचपड़ताल के बाद धौलपुर पुलिस ने नरेश हत्याकांड में सत्येंद्र सिंह के विरुद्ध धारा 302, 120बी एवं 201 भादंसं के तहत और बनवारीलाल कुशवाह के विरुद्ध भादंसं की धारा 302 एवं 120बी के तहत मामला दर्ज कर लिया. इन के अलावा कुछ अन्य लोगों को भी इस मामले में नामजद किया गया.

नरेश हत्याकांड में नाम आने से विधायक बनवारीलाल कुशवाह की मुश्किलें बढ़ गईं. कुशवाह के साथ उन के भाई शिवराम एवं चचेरे भाई जितेंद्र कुशवाह ने जून, 2014 में धौलपुर की अदालत में अग्रिम जमानत की अर्जी लगाई. अदालत ने 6 जून, 2014 को तीनों कुशवाह भाइयों की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी. इस अर्जी में कुशवाह बंधुओं ने कहा कि नरेश की हत्या में उन्हें गलत फंसाया जा रहा है. इस के जवाब में लोक अभियोजक अनंतराम त्यागी ने अदालत में दलील दी कि नरेश की हत्या के अपराध में पुलिस ने सत्येंद्र नामक व्यक्ति को पकड़ा था. उस ने पुलिस को बताया कि नरेश की हत्या की योजना विधायक बी.एल. कुशवाह और उस के साथियों ने बनाई थी. नरेश की हत्या के लिए 4 लाख रुपए की सुपरी दे कर बुलंदशहर से एक शूटर को भी बुलाया गया था.

त्यागी ने अदालत को बताया कि नरेश के परिजनों ने सत्येंद्र की शिनाख्त धौलपुर जिला कारागार में की थी. इस प्रकरण की जांच भरतपुर आईजी द्वारा की जा रही है. प्रारंभिक जांच में माना गया है कि नरेश हत्याकांड में बी.एल. कुशवाह का हाथ है. विधायक कुशवाह ने बाद में दूसरी अदालतों से इस मामले में अग्रिम जमानत हासिल करने के प्रयास किए, लेकिन उन्हें किसी भी अदालत से राहत नहीं मिली. पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिशों में जुटी थी. इसी बीच विधायक के खिलाफ मामला होने के कारण इस प्रकरण की जांच सीबीसीआईडी को सौंप दी गई. सीबीसीआईडी ने जांच कर के विधायक कुशवाह की गिरफ्तारी के प्रयास तेज कर दिए. पुलिस के बढ़ते दबाव को देख कर आखिरकार कुशवाह ने 13 अक्तूबर, 2014 को जयपुर स्थित पुलिस मुख्यालय में आत्मसमर्पण कर दिया. आत्मसमर्पण के बाद पुलिस ने विधायक बी.एल. कुशवाह को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने इस की सूचना राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल को भी दे दी. कुशवाह के आत्मसमर्पण के मौके पर सीबीसीआईडी के डीआईजी डा. गिरराज मीणा ने बताया कि मामले की जांच के दौरान पुलिस को एक सिमकार्ड की जानकारी मिली थी. यह सिमकार्ड दिल्ली स्थित गरिमा होम्स एंड फार्म्स लिमिटेड के नाम थी, जो कंपनी के कर्मचारी सत्येंद्र सिंह को जारी हुई थी.

सत्येंद्र सिंह विधायक कुशवाह का गनमैन था. नरेश की हत्या के बाद से वह भी फरार था. उत्तर प्रदेश पुलिस ने सत्येंद्र को आर्म्स एक्ट में गिरफ्तार किया था. राजस्थान पुलिस सत्येंद्र को बुलंदशहर जेल से गिरफ्तार कर के लाई थी. डीआईजी डा. मीणा ने बताया था कि सत्येंद्र सिंह ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि उस ने अपने साथी रोबिन के साथ मिल कर नरेश की हत्या की थी. इस हत्या की साजिश विधायक बी.एल. कुशवाह ने अपने साथियों के साथ रची थी. जांच में सामने आया कि नरेश और विधायक कुशवाह की बहन के प्रेम संबंध थे. वे दोनों शादी करना चाहते थे, इसीलिए बी.एल. कुशवाह और उन के भाई नरेश को अपनी बहन से दूर रहने की चेतावनी देते थे.

बाद में बी.एल. कुशवाह और उस के साथियों ने धौलपुर के मनिया स्थित गेस्टहाउस में गनमैन सत्येंद्र के साथ मिल कर नरेश की हत्या की साजिश रची थी. नरेश की हत्या के लिए घटना से कुछ दिन पहले शूटर रोबिन सिंह को धौलपुर लाया गया था. आत्मसमर्पण के बाद पुलिस ने बी.एल. कुशवाह को दूसरे दिन अदालत में पेश कर के रिमांड पर ले लिया. बाद में अदालत के आदेश पर उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में धौलपुर जिला जेल भेज दिया गया. आवश्यक जांचपड़ताल के बाद पुलिस ने अक्तूबर, 2014 के आखिर में धौलपुर के न्यायिक मजिस्ट्रैट (एक) की अदालत में बी.एल. कुशवाह एवं सत्येंद्र सिंह के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल कर दिया. यह प्रकरण विधिवत सुनवाई के लिए धौलपुर के सत्र न्यायालय में पहुंचा. जहां इस केस की सुनवाई अपर जिला एवं सत्र न्यायायाधीश ने शुरू की. इसी बीच कुशवाह ने अपनी मां की तबीयत खराब होने की बात कह कर मां की देखभाल के लिए अंतरिम जमानत की अर्जी लगाई. अदालत ने 27 मई, 2015 को कुशवाह को 2 लाख रुपए के मुचलके पर सशर्त अंतरिम जमानत दे दी. बाद में 10 जून को कुशवाह ने धौलपुर जिला कारागार में अपनी हाजिरी दी.

जेल जाने के बाद से ही कुशवाह जमानत हासिल करने के प्रयासों में जुटे थे, लेकिन राजस्थान हाईकोर्ट ने उन की जमानत याचिका खारिज कर दी थी. बाद में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में जमानत अर्जी दाखिल की. सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2016 में आदेश दिया कि इस केस को 6 महीने में निपटाया जाए. सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद धौलपुर के अपर जिला एवं सत्र न्यायालय में 6 महीने से इस मामले की निरंतर सुनवाई चल रही थी. सर्वोच्च न्यायालय की ओर से दी गई 6 महीने की अवधि 22 अगस्त, 2016 को पूरी हो गई तो कुशवाह ने अपने वकील के मार्फत अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश धौलपुर की अदालत में जमानत अर्जी दाखिल की, जिसे 2 सितंबर, 2016 को अदालत ने खारिज कर दिया. इस के बाद 8 दिसंबर, 2016 को इस केस में फैसला सुना दिया गया. बाद में 13 दिसंबर को राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल ने धौलपुर से बसपा विधायक बी.एल. कुशवाह की सदस्यता समाप्त कर दी. इस के साथ ही धौलपुर विधानसभा सीट खाली होने की घोषणा कर दी गई. यह संयोग ही रहा कि बी.एल. कुशवाह सन 2013 में 8 दिसंबर को पहली बार विधायक चुने गए थे और ठीक 3 साल बाद 8 दिसंबर, 2016 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. बाद में विधानसभा अध्यक्ष ने उन की सदस्यता भी 8 दिसंबर, 2016 से ही समाप्त की.

नरेश हत्याकांड के अभी 3 आरोपी फरार चल रहे हैं. इन में बी.एल. कुशवाह के भाई शिवराम और जितेंद्र कुशवाह के अलावा शूटर रोबिन शामिल हैं. रोबिन उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर का रहने वाला है. पुलिस के अनुसार, रोबिन ने ही नरेश को गोली मारी थी. नरेश की हत्या के समय वह सत्येंद्र के साथ था. पुलिस की जांचपड़ताल एवं अदालत के फैसले में नरेश कुशवाह एवं सीमा उर्फ सुषमा कुशवाह के प्रेम प्रसंग की जो कहानी सामने आई है, वह इस प्रकार है—

धौलपुर के सदर थानान्तर्गत गांव झीलकापुरा के रहने वाले मेघसिंह कुशवाह के 5 बेटे थे. मेघसिंह गरीब किसान हैं. खेतीबाड़ी कर अपना गुजरबसर करते हैं. मेघसिंह का बेटा नरेश कुशवाह धौलपुर की कमला कालोनी में किराए का कमरा ले कर 12वीं की पढ़ाई कर रहा था. खर्च चलाने के लिए वह कुछ कामकाज भी करता था. इसी मकान में नरेश के ऊपर वाले कमरे में किराए पर बी.एल. कुशवाह की बहन सीमा उर्फ सुषमा अपनी बहन रिंकेश के साथ रहती थी. ये दोनों बहनें धौलपुर में गर्ल्स स्कूल में 9वीं कक्षा की छात्राएं थीं. इसी दौरान नरेश का सीमा से प्रेम शुरू हुआ. दोनों एक साथ ही खाना बनाते और खाते थे. बाद में उन का प्यार परवान चढ़ता गया. सीमा ने तय कर लिया था कि वह शादी नरेश से ही करेगी. नरेश से वह उस के मोबाइल पर बात भी करती थी. नरेश ने उसे कई बार फोन करने को मना भी किया लेकिन वह दिल के हाथों मजबूर थी, इसलिए नहीं मानी. नरेश उस से कहता था कि हम दोनों की शादी नहीं हो सकती, क्योंकि तुम बड़े और पैसे वाले घर की लड़की हो. इस पर सीमा नरेश से कहती कि चाहे कुछ भी हो जाए, शादी मैं तुम से ही करूंगी. मैं अपने भाइयों को तुम से शादी करने के लिए मना लूंगी. सीमा ने 2-3 बार नरेश की मां जमुनादेवी से भी बात की थी. उन्होंने उसे नरेश से बातें करने से मना किया था लेकिन सीमा ने नरेश की मां को समझाया कि इलेक्शन के बाद मैं अपने भाइयों को शादी के लिए मना लूंगी. सीमा ने जमुनादेवी को बताया कि उस ने अपनी भाभी से भी यह बात बता दी है.

जमुनादेवी ने नरेश को भी समझाया था कि सीमा पैसे वाले बड़े घर की लड़की है, जिस के साथ तेरी शादी नहीं हो सकती. तू उस से बात मत किया कर. इस पर नरेश ने कहा था कि सीमा खुद फोन करती है और कहती है कि शादी करूंगी तो तुझ से वरना मर जाऊंगी.

नरेश की हत्या से 20 दिन पहले जब दोनों बात कर रहे थे तो सीमा के छोटे भाई को पता चल गया. इस के बाद उस ने नरेश को धमकी दी कि तू उस की बहन का पीछा छोड़ दे वरना अंजाम ठीक नहीं होगा. नरेश की हत्या से 7-8 दिन पहले बनवारीलाल कुशवाह ने भी सीमा से प्रेम को ले कर नरेश को अंजाम भुगतने की धमकी दी थी.

सीमा नरेश को प्रेमपत्र भी लिखती थी. एक बार वह नरेश के साथ एक मंदिर में मनौती मांगने भी गई थी, वहां नरेश ने अपने एक चचेरे भाई को सीमा से मिलवाते हुए कहा था कि यह तेरी भाभी है. हम शादी की मन्नत मांगने आए हैं.

बाद में सीमा के लिखे प्रेमपत्र नरेश के एक बैग से मिले. यह बैग काफी दिनों तक धौलपुर में उसी मकान मालिक के पास पड़ा रहा, जिस में नरेश किराए का कमरा ले कर रहता था. पुलिस ने इन प्रेमपत्रों की लिखावट की पुष्टि के लिए सीमा की स्कूल की उत्तर पुस्तिकाओं व प्रेमपत्रों की हस्तलिपि की जयपुर में विधि विज्ञान प्रयोगशाला में जांच कराई. इस में दोनों हस्तलेख एक ही पाए गए थे.

जिस दिन नरेश की हत्या की गई थी, उस दिन सीमा जयपुर में थी. इस घटना का उसे बाद में पता चला था. नरेश की हत्या से पहले ही सीमा का रिश्ता धौलपुर के रहने वाले गोरेलाल कुशवाह के लड़के आकाश से तय कर दिया गया था.

नरेश हत्याकांड की जांच के दौरान 5 जनवरी, 2013 यानी नरेश की हत्या से करीब एक हफ्ते बाद धारा 161 सीआरपीसी के तहत दर्ज कराए अपने बयानों में सीमा ने अपने व नरेश के प्रेम संबंधों को सहज व स्वाभाविक रूप से स्वीकार किया था. हालांकि बाद में वह अपने बयान से पलट गई थी. इस पर जज साहब ने अपने फैसले में लिखा कि सीमा अभियुक्त बनवारीलाल कुशवाह की सगी छोटी बहन है. बनवारीलाल कुशवाह वर्तमान में धौलपुर से निर्वाचित विधायक हैं.

कोई लड़की जो अपने प्रेमी के साथ विवाह करना चाहती हो और इस के लिए अपने घर वालों तक से बगावत कर रही हो, वह तब तक ही अपने प्रेमी का साथ देगी, जब तक उस का अपना अंतिम उद्देश्य अर्थात प्रेमी के साथ विवाह न हो जाए.

लेकिन जब उस का प्रेमी ही जीवित न हो तो उस का अपने परिवार वालों के साथ बगावत करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता. उस लड़की की लाचारी को शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता, जिसे उसी घर में रहना है, जिस घर का व्यक्ति उसी के प्रेम संबंधों के चलते उस के प्रेमी की हत्या के आरोप में जेल में बंद हो.

– कथा अदालत के फैसले एवं विभिन्न रिपोर्ट्स पर आधारित

ये हैं सिनेमा, टैलीविजन और मौडलिंग की ‘रानी’

टैलीविजन पर आने वाले सीरियलों के साथ ही भोजपुरी फिल्मों में काम करने वाली रीना रानी कहती हैं कि एक आम परिवार की तरह उन के मातापिता भी चाहते थे कि उन की बेटी पढ़लिख कर अच्छी सी नौकरी करे. ऐक्टिंग और एंकरिंग के काम को ले कर उन के मातापिता ऊहापोह की हालत में रहते थे, लेकिन जब उन्हें लगातार काम, पहचान और पैसा मिलने लगा, तो घर वालों ने राहत की सांस ली. पटना में अपनी पहचान बनाने के बाद साल 2008 में रीना रानी सपनों की नगरी मुंबई पहुंच गईं. आज 2 बच्चों की मां होने के बाद भी उन के ऐक्टिंग, एंकरिंग और मौडलिंग का सफर जारी है.

‘फुलवा’, ‘झांसी की रानी’, ‘सीआईडी’, ‘क्राइम पैट्रोल’, ‘कोई है’, ‘सावधान इंडिया’, ‘खानदान’, ‘बड़ी मालकिन’ जैसे सीरियलों से अपनी पहचान बना चुकी रीना रानी आज दर्जनों सीरियलों में ऐक्टिंग कर रही हैं. टैलीविजन सीरियलों के साथसाथ उन्होंने कई भोजपुरी फिल्मों में भी हीरोइन का किरदार निभाया है.

‘हमार घर वाली’, ‘दुलहनिया लेके जाइब हम’, ‘लाल चुनरियावाली’, ‘गंगा तोहरे देस में’, ‘प्यार हो गईल त हो गईल’, ‘चंदा’, ‘अपनेबेगाने’, ‘गुंडाराज’, ‘रंगबाज राजा’, ‘वाह खिलाड़ी वाह’, ‘छैला बाबू तू कईसन दिलदार बाड़ा हो’ जैसी कई भोजपुरी फिल्मों में हीरोइन का किरदार अदा किया.

रीना रानी कहती हैं कि किसी भी क्षेत्र में औरतों व लड़कियों की हालत ठीक नहीं है. उन्होंने मौडलिंग, थिएटर, सिनेमा और राजनीति में घुस कर यही देखा और जाना है. वे कहती हैं कि औरतों की तरक्की केवल राजनीतिक नारों, सरकारी योजनाओं और उपदेश देने वाली किताबों तक ही सिमटी है. हकीकत में तो यही दिखाई देता है कि कोई भी ‘आधी आबादी’ को उस का पूरा हक देने के लिए तैयार नहीं है. उन्होंने नाटकों के साथसाथ पटना दूरदर्शन के लिए भी कई प्रोग्राम किए हैं. असली पहचान उन्हें ईटीवी के प्रोग्राम ‘मिसेज भाग्यशाली’ में की गई एंकरिंग से मिली.

इस फैमिली गेम शो के 2 हजार ऐपिसोडों में उन्होंने एंकरिंग कर अपने हुनर का लोहा मनवाया. मौडलिंग, एंकरिंग और ऐक्टिंग के रास्ते राजनीति के अखाड़े में उतरी रीना रानी मानती हैं कि औरतों को पढ़ाई के साथसाथ अपनी जिंदगी का मकसद तय कर लेना चाहिए. शादी के बाद भी उन्हें कैरियर जारी रखने या बनाने का हक हासिल करने की जरूरत है.

तकरीबन 30 भोजपुरी फिल्मों और ढेरों टैलीविजन सीरियलों में काम कर चुकी रीना रानी बताती हैं कि पढ़ाई के दौरान ही उन्हें मौडलिंग और ऐक्टिंग का शौक जगा था. साल 1992 में ‘मिस बिहार’ का खिताब जीतने के बाद उन के हौसलों को मानो पंख मिल गए. उस के बाद उन्हें थिएटर करने का मौका मिला.

भोजपुरी के भिखारी ठाकुर के लिखे नाटक ‘गबर घिचोर’ के जरीए उन्होंने थिएटर की शुरुआत की. उस के बाद साल 1994 में वे सिवान से पटना आ गईं और पटना के थिएटर में मसरूफ हो गईं.

पिछले लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के टिकट पर बिहार की महाराजगंज सीट से चुनाव लड़ने वाली रीना रानी राजनीति के अखाड़े में उतर चुकी हैं. उस चुनाव में उन का मुकाबला प्रभुनाथ सिंह, साधु यादव और धूमल सिंह जैसे बाहुबलियों से हुआ था. इस के बावजूद उन्हें अच्छे खासे वोट मिले थे.

रीना रानी कहती हैं कि सिस्टम को बदलने के लिए सिस्टम के अंदर घुसना जरूरी है. बाहर खड़े हो कर लोग राजनीति में बदलाव की बात तो करते हैं, लेकिन राजनीति का हिस्सा बनने से कतराते हैं. पढ़ेलिखे लोगों के राजनीति में हिस्सा लेने से ही राजनीति का चाल, चरित्र और चेहरा बदल सकता है.

गुरमेहर कौर बनाम अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद

दिल्ली के रामजस कालेज में एक सेमिनार में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों को आमंत्रित करने पर भारतीय जनता पार्टी की युवा शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने हंगामा खड़ा कर दिया है. सेमिनार के दिन विद्यार्थी परिषद ने जम कर आमंत्रित करने वाले छात्रों और उन के समर्थक अध्यापकों की धुनाई की. ये वे छात्र हैं जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कन्हैया कुमार के साथ थे और दलितों और पिछड़ों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं. परिषद इन आवाजों में से कश्मीर में सेना की ज्यादतियों पर ज्यादा आपत्ति कर रही है, क्योंकि विद्यार्थी परिषद का मानना है कि कट्टर हिंदू धर्म को बचाने के लिए कुछ भी करना जायज है.

जब रामजस कालेज में सेमिनार के लिए आमंत्रित करने वालों के समर्थन में कारगिल में शहीद कैप्टन मंदीप सिंह की बेटी गुरमेहर कौर खुल कर सामने आई तो एबीवीपी ने जम कर उसे मांबहन की गालियां देनी शुरू कर दीं और वे भूल गए कि वे ही औरतों को देवी मानने की झूठी मान्यताएं फैलाते रहते हैं. उन्होंने गुरमेहर कौर को देख लेने की धमकी दे डाली.

इस सब पर कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए. हमारे युवाओं को हिंदू संस्कृति में केवल मातापिता, गुरुओं, पंडों और पुजारियों के बीच बिना तर्कवितर्क मानने की शिक्षा दी जाती है. दुनिया का कोई भी धर्म असल में किसी तरह के सवालों की इजाजत नहीं देता तो यह हिंदू धर्म कैसे अलग हो सकता है? विद्यार्थी परिषद के छात्रों के लिए दंगा फैलाने का यह सुनहरा अवसर था, अब वे सरकार के खिलाफ तो बोल नहीं सकते, क्योंकि सरकार उन की अपनी है. वे ईरान व पाकिस्तान में धर्म के विरुद्ध किसी के कुछ बोलने पर हल्ला मचाने वालों का पूरा अनुसरण करते हुए हर पोल खोलने की बात को दबा देना चाहते हैं.

युवाओं से उम्मीद की जाती है कि वे खुद नया सोचें, दूसरों को भी नया सोचने के लिए कहें पर राजनीतिक व धार्मिक जहर इस तरह गहरी पैठ बना चुका है कि युवा खेमों में बंट गए हैं. कुछ को भगवा दिखता है तो कुछ को लाल. कुरेद कर नया ढूंढ़ने वाला खेमा गायब हो गया है. रामजस कालेज में हुआ हंगामा और उस पर मोदी सरकार की शाबाशी साबित करती है कि हर दिमाग पर धार्मिक परत चढ़नी जरूरी होने लगी है.

विधानसभा चुनाव : जीत के पार चुनौतियां हजार

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी और पंजाब में कांग्रेस को जनता ने बहुमत से सरकार बनाने का मौका दे कर चुनौती दी है कि अब वे इन प्रदेशों को विकास की राह पर आगे ले जाएं. इन दलों ने चुनाव में जनता से जो वादे किए थे, उन को पूरा करें. उत्तर प्रदेश में अब तक भारतीय जनता पार्टी को इस बात का मलाल था कि इस राज्य में उस की सरकार नहीं है. ऐसे में वह प्रदेश का सही विकास नहीं कर पा रही है. उत्तर प्रदेश ने पहले 73 सांसदों और अब 325 विधायकों का साथ दे कर भाजपा के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा कर दिया है. कानून व्यवस्था बनाए रखने, भ्रष्टाचार खत्म करने और विकास को गति देने के लिए भाजपा के सामने अब बच कर निकलने का कोई रास्ता जनता ने नहीं छोड़ा है. उत्तर प्रदेश की जनता ने यह भी दिखा दिया है कि बहुमत हासिल करने वाली पार्टी को वह अर्श से फर्श पर भी उतार सकती है. साल 2007 में जीती बहुजन समाज पार्टी और साल 2012 में जीती समाजवादी पार्टी इस की मिसाल हैं.

दलित और पिछड़े समाज के चिंतक मानते हैं कि मुलायम सिंह यादव और कांशीराम की ही तरह मायावती और अखिलेश यादव को भी मिल कर ‘नव हिंदुत्व’ का मुकाबला करना होगा. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने अगड़ों, पिछड़ों और दलितों का नया समीकरण बना कर सब से बड़ी जीत हासिल की है. 1991 की राम लहर में भी भाजपा को इतनी सीटें नहीं मिली थीं. अब वह अगड़ापिछड़ा और दलित गठजोड़ को कैसे एकजुट रख पाएगी, यह बड़ी चुनौती होगी.

भाजपा के लिए चिंता करने वाली यह बात भी है कि लोकसभा चुनाव के मुकाबले विधानसभा चुनाव में उस का वोट फीसदी कम हुआ है. लोकसभा चुनाव में भाजपा को 42.63 फीसदी वोट मिले थे, जबकि विधानसभा चुनाव में यह फीसदी 39.70 पर आ गया है.

भाजपा के साथसाथ सपा और बसपा के लिए भी यह चुनौतियों भरा समय है. मायावती के काम करने के तरीके का जादू टूट रहा है, तो सपा के मंडल की राजनीति पर खतरा उमड़ रहा है. जिस तरह का बहुमत भाजपा को मिला है, कांग्रेस को भी किसी दौर में ऐसा बहुमत मिल चुका है. ऐसे प्रचंड बहुमत के बाद चुनौतियों की कला से निबटना सब से बड़ी कामयाबी मानी जाती है.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के कुछ समय पहले की बात है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह लखनऊ की मोहनलालगंज संसदीय सीट से सांसद कौशल किशोर के घर गए थे. कौशल किशोर दलित बिरादरी के नेता हैं. वे भाजपा के विरोधी भी रहे हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में वे भाजपा में शामिल हुए और सांसद बने थे.

अमित शाह ने कौशल किशोर के घर जा कर यह संदेश दिया कि भाजपा अब दलित जातियों के साथ सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना चाहती है. कौशल किशोर के घर गए अमित शाह ने वहां पर भोजन किया था. आमतौर पर कोई बड़ा नेता जब ऐसे किसी कार्यकर्ता के घर जाता है, तो बाहरी लोग खाना बनाने का काम करते हैं, पर अमित शाह ने घर के बने भोजन को खाने की बात कही थी.

कौशल किशोर के परिवार के लोगों और उन की पत्नी ने जो भी अपनी रसोई में बनाया था, उसे बड़ी तारीफ के साथ अमित शाह ने खाया था. वहां मौजूद सभी को सुखद आश्चर्य हुआ था कि इतनी बड़ी पार्टी का नेता कितने सहज भाव से एक दलित के घर खाना खाने गया था. 2014 के लोकसभा चुनाव तक भाजपा को अगड़ी जातियों खासकर बनियों की पार्टी माना जाता था.  मोदीशाह की जोड़ी ने इस सोच को बदलने की शुरुआत की. लोकसभा चुनाव में जीत के बाद मोदीशाह की जोड़ी को एक बल मिला. भाजपा में अगड़ी जतियों का दबदबा कमजोर हुआ.

लोकसभा चुनाव में भाजपा ने दूसरी पार्टियों से दलित नेताओं को शामिल किया. इन में छोटेबड़े तमाम तरह के नेता शामिल हुए. ‘अपना दल’ की अनुप्रिया पटेल, बिहार से रामविलास पासवान, महाराष्ट्र से रामदास अठावले, उदित राज, कौशल किशोर ऐसे बहुत सारे नाम इस लिस्ट में शामिल हैं.

भाजपा में दलित और पिछड़े नेता पहले भी रहे हैं. ये नेता हाशिए पर होते थे. अगड़ी जातियों के नेता उन को अपने दबाव में रखते थे. मोदीशाह की जोड़ी ने इन नेताओं को आगे बढ़ाने का काम शुरू किया. उत्तर प्रदेश में अनुप्रिया पटेल और कौशल किशोर जैसे नेताओं को नई पहचान दी.

सपा बसपा से नाराजगी

पहली बार अमित शाह ने पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ बना कर पाल और गड़रिया समुदाय के नेता एसपीएस बघेल को उस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पद पर अगड़ी जातियों के दावे को दरकिनार करते हुए केशव प्रसाद मौर्य को कुरसी दी.

उत्तर प्रदेश में दलित जातियों में जाटव बिरादरी के बाद पासी सब से बड़ी तादाद में हैं. बसपा पासी और जाटव बिरादरी के सहारे ही आगे बढ़ी थी. पासी धीरेधीरे अपनी अनदेखी से नाराज हो कर बसपा से टूट गए. भाजपा ने पासी बिरादरी को अपने से जोड़ने के सिलसिले में पासी बिरादरी में असर रखने वाले नेताओं को आगे बढ़ाया.

पूर्वांचल में राजभर समुदाय बड़ी तादाद में है, जो बसपा और सपा दोनों की अनदेखी का शिकार था. भाजपा ने राजभर समुदाय के ओमप्रकाश राजभर को अपने साथ लिया. केंद्रीय मंत्रिमंडल से ले कर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के गठबंधन तक में भाजपा ने अपने छोटेछोटे सहयोगियों को पूरा हक दिया.

लोकसभा चुनावों में मिली जीत के बाद ही मोदीशाह का ‘मिशन उत्तर प्रदेश’ शुरू हो चुका था. अपने अगड़े वोट बैंक की नाराजगी के जोखिम कोे दरकिनार करते हुए इस मोदीशाह जोड़ी ने गैरजाटव दलितों और गैरयादव पिछड़ों को भरपूर अहमियत दी.

चुनावी टिकट देने के समय भाजपा ने 70 टिकटें गैरजाटव दलितों और 112 टिकटें पिछड़ों को दीं. चुनाव के पहले भाजपा ने 2 सौ से ज्यादा पिछड़ा वर्ग सम्मेलन और दलित सम्मेलन कराए. भाजपा ने 90 हजार कार्यकर्ताओं की पैदल सेना तैयार की थी, जिस में सब से ज्यादा दलितपिछड़े तबके के लोग थे.

अगड़ी जातियों की नाराजगी को कम करने के लिए भाजपा ने राजनाथ सिंह और कलराज मिश्र को चुनाव प्रचार में आगे रखा. गैरजाटव जातियां इस वजह से परेशान थीं कि उन को बसपा में हक नहीं मिल रहे थे. गैरयादव पिछड़े सपा में यादव बिरादरी के बढ़ते दबदबे से नाराज थे. भाजपा ने इसी वोट बैंक में सेंधमारी की. इन जातियों में जातीयता की बात को दबा कर धर्म, हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को आगे बढ़ाया.

भाजपा ने मुसलिम बिरादरी को एक भी टिकट न दे कर परोक्ष रूप से धार्मिक तुष्टीकरण को नई परिभाषा दी. सपा और बसपा जैसे दल इस चाल को समझ नहीं पाए. वे मुसलिम तुष्टीकरण की राह पर आगे चल पड़े. उत्तर प्रदेश विधानसभा के शुरुआती दौर में भाजपा ने इस बात को हवा देने में परहेज किया. इस के बाद जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुसलिम बहुल इलाकों का चुनाव खत्म हो गया, तो भाजपा ने हिंदुत्व के प्रतीक चिह्नों को उठा कर हिंदुत्व का ऐसा धुव्रीकरण किया, जो अंडर करंट के रूप में था. भाजपा को जितनी उम्मीद थी, उस से ज्यादा समर्थन उसे हासिल हुआ.

मुश्किल दौर में बसपा

बहुजन समाज पार्टी केवल एक दल नहीं है, यह एक विचारधारा थी, जिस के सहारे समाज का सब से कमजोर तबका अपने को सहज पाता था. बसपा उस के हकों को ले कर सजग थी. कांशीराम ने भाजपा के राम मंदिर कार्ड को जवाब देते हुए दलितपिछड़ा गठजोड़ बनाया था, जिस के तहत ‘मिले मुलायमकांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ जैसे नारे लगे थे. पर समय के साथसाथ बसपा अपनी नीतियों पर नहीं चल पाई. कांशीराम के बाद सत्ता मायावती के हाथ में आई, तो बसपा के जनाधार में गिरावट शुरू हो गई.

दलित जातियों में राजनीतिक चेतना के आने से गैरजाटव जातियां अपने को बसपा में अनदेखा महसूस करने लगीं. यही वजह थी कि बसपा धीरेधीरे अपने बेस वोट को खोने लगी. पार्टी पर अपना दबदबा मजबूत रखने की कोशिश में मायावती दूसरे नेताओं को पार्टी के साथ नहीं जोड़ पाईं, जिस के चलते कांशीराम के समय के बसपा नेता पार्टी से दूर होते गए.

सत्ता के जरीए सामाजिक ताकत हासिल करने के सिद्धांत पर अमल करते हुए बसपा ने भाजपा से 3 बार समर्थन ले कर सरकार बनाई थी. तब मायावती मुख्यमंत्री बनी थीं. दलितों को तब बसपा में केवल जाटव जातियों का असर नजर आने लगा था.

गैरजाटव जातियां और उन के नेता अनदेखी का शिकार हो कर बसपा से टूटने लगे. गैरजाटव जातियों के टूटने से पार्टी को मजबूत बनाने की कोशिश में मायावती ने दलितब्राह्मण गठजोड़ की सोशल इंजीनियरिंग को तैयार किया. 2007 में बसपा बहुमत से सरकार बनाने में कामयाब रही. बसपा की इस सरकार के समय ही दलितों को अपनी अनदेखी खुल कर नजर आने लगी. बहुमत की सरकार में मायावती अपनी छाप छोड़ने में नाकाम रहीं. यहीं से बसपा के जनाधार का टूटना शुरू हो गया था.

2009 के लोकसभा चुनाव में मायावती ने प्रधानमंत्री बनने का सपना देखा था, पर उस चुनाव में बसपा को मनचाही कामयाबी नहीं मिली. 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा सत्ता से बाहर हुई, तो बसपा की धुर विरोधी सपा सरकार में आ गई.

2014 के लोकसभा चुनावों में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली. 2017 के विधानसभा चुनावों में बसपा सत्ता की सब से प्रमुख दावेदार थी. इस के बाद भी उस को महज 19 सीटें ही मिल पाईं. यह मायावती के काम करने के तरीके पर सब से बड़ा सवाल है. बसपा का कोर वोटर टूट रहा है. मायावती का जादू ढलान पर है.

बसपा को 1991 में विधानसभा में 12 सीटें मिली थीं. 2017 में वह वापस 19 सीटों पर सिमट गई है. इस बात का अहसास मायावती को था. इस की कमी को पूरा करने के लिए ही मायावती ने दलितमुसलिम गठजोड़ की खिचड़ी पकाने की तैयारी की थी, पर इस का स्वाद पूरी तरह से बेस्वाद नजर आया.

बसपा के पास अब उत्तर प्रदेश में इतने विधायक भी नहीं बचे हैं, जिन के सहारे पार्टी प्रमुख मायावती 2018 में राज्यसभा में अपनी सदस्यता को बचाए रख पाएं. पार्टी में इतने विधायक भी नहीं हैं कि वे उत्तर प्रदेश की विधानसभा में सदस्य विधानपरिषद बनी रह सकें. ऐसे में राष्ट्रीय पार्टी का तमगा भी बचा रहना मुश्किल है.

मायावती लोकसभा और विधानसभा का चुनाव कम ही लड़ती हैं. ऐसे में वे राज्यसभा को अपने लिए बेहतर जरीया समझती हैं. मायावती की राज्यसभा सदस्यता 2 अप्रैल, 2018 को खत्म हो रही है. ऐसे में दोबारा वे राज्यसभा कैसे पहुंचेगी, यह मुश्किल सवाल है.

दरअसल, बसपा ने चुनाव में जीत को हासिल करने के लिए ऐसे करोड़पति नेताओं को टिकट देना शुरू किया, जिन को दलित समाज से कोई लेनादेना नहीं होता था. ऐसे लोग बसपा से टिकट और दलितों से वोट पा कर चुनाव जीत जाते थे. समाज के लिए कुछ न करने से लोग ऐसे नेताओं से नाराज होने लगे.

ऐसे लोगों में से ज्यादातर ठेकेदार, प्रौपर्टी डीलर जैसे लोग होते थे. इन लोगों को टिकट देने के लिए जमीनी नेताओं की अनदेखी की जाती थी. 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने सब से ज्यादा करोड़पति नेताओं को टिकट दिए.

अब दलित समाज भी जागरूक हो गया है. उसे अपनी अनदेखी का अहसास होने लगा है. वह धीरेधीरे अपने हकों को लेने और समझने लग गया है. भाजपा ने ऐसे दलित और पिछड़े तबके के दर्द को समझते हुए उन को ‘नव हिंदुत्व’ का पाठ पढ़ाया और धर्म के नाम पर भाजपा के पक्ष में खड़ा  कर लिया.

भाजपा ने ‘नव हिंदुत्व’ के नाम पर दलितों को अपने साथ तो जोड़ लिया है, पर जमीन पर दलितों को इज्जत दिलाना मुश्किल काम है. आज भी समाज में छुआछूत और गैरबराबरी का भाव फैला हुआ है. मायावती अपनी इस हार को भले ही ईवीएम मशीनों की गड़बड़ी से जोड़ कर देख रही हैं, पर असल बात यह है कि उन के काम करने के तरीके का जादू खत्म हो गया है. बसपा के आंदोलन को बचाने के लिए मायावती को अपने अहम को खत्म करते हुए नए प्रयोग करने होंगे, नहीं तो बसपा के साथ दलितों की आवाज के गुम हो जाने का खतरा मंडरा रहा है.

हाशिए पर मंडल राजनीति

अयोध्या के राम मंदिर आंदोलन के पहले मंडल आयोग ने जिस तरह से हिंदी बोलने वाले प्रदेशों की राजनीति को प्रभावित किया था, अब वह दौर खात्मे की ओर है. बसपा में जिस तरह से मायावती का राज चला, उसी तरह से सपा में मुलायम सिंह यादव और उन के परिवार का कब्जा हो गया. गैरजाटव की तरह गैरयादव जातियां सपा से टूटने लगीं.

2012 में बसपा को हराने के लिए सपा के साथ पिछड़ी और अगड़ी जातियां बड़ी तादाद में एकजुट हो गईं और सपा की सरकार बहुमत से बनी. सरकार बनने के बाद गैरयादव जातियां हाशिए पर सिमटने लगीं. बड़ी तादाद में दूसरे यादवों के साथसाथ मुलायम परिवार सत्ता में शामिल हो गया.

2014 के लोकसभा चुनाव में सपा के जो 5 लोग चुनाव जीते, वे सभी मुलायम परिवार के थे. अखिलेश सरकार के आखिरी साल में पार्टी परिवार के विवाद में फंस गई. पारिवारिक कलह के चलते पार्टी में टूटफूट हो गई. मुलायम सिंह यादव हाशिए पर चले गए और अखिलेश यादव पार्टी के नए अगुआ बन गए. मुलायम सिंह यादव की राजनीति का जन्म समाजवाद और मंडल की राजनीति से हुआ था. वे सपा में सब को साथ ले कर चलते थे. यह समीकरण बाद में टूट गया.

अखिलेश यादव ने अपनी टीम में परिवार के नौजवानों पर भरोसा किया. पार्टी में गैरयादव जातियों को पूरा हक नहीं मिल सका. अखिलेश सरकार पर खुल कर आरोप लगे कि सरकारी नौकरियों में पक्षपात किया गया. अखिलेश यादवों के साथ अपने विकास के मौडल पर चल रहे थे. वे गैरयादव जातियों की नाराजगी को समझ नहीं पाए और कांग्रेस से गठजोड़ करने के बाद भी बुरी तरह से चुनाव हार गए.

भाजपा ने मंडल के दौर की राजनीति को खत्म करने की कोशिश की है. इस से सपा को सब से ज्यादा झटका लगा है.  अखिलेश यादव को लगता है कि उत्तर प्रदेश में समझाने से नहीं बहकाने से वोट मिलता है. इस बात के पक्ष में उन के अपने तर्क हो सकते हैं. सरकार बनाने के लिए सत्ता में रहने वाले दल अपने घमंड को अगर छोड़ कर काम करें, तो शायद जनता तक पहुंच पाना आसान हो जाए.

समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवपाल यादव ने कहा कि विधानसभा में समाजवाद की नहीं, घमंड की हार हुई है. चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के लिए समय माकूल नहीं है. बसपा के सामने जहां अपनी पार्टी को फिर से खड़ा करने की चुनौती है, वहीं सपा के लिए घरेलू झगड़ों से पार पाना होगा.

राजस्व महकमे के पटवारी तेरी महिमा निराली

 

पटवारी राजस्व महकमे का भले ही एक मामूली कर्मचारी होता है, लेकिन उस के कारनामे एक से बढ़ कर एक हैं. छोटे ही नहीं, बल्कि बड़े किसानों की गांठ से भी वह पैसा निकलवाने का तरीका बखूबी जानता है. पटवारी को बगैर भेंट चढ़ाए किसानों के जूते घिस जाते हैं, लेकिन काम नहीं होता. पटवारी की कलम का मारा किसान जिंदगी भर मुकदमे में उलझा रहता है. इसलिए झंझट से बचने के लिए लोग पटवारी को नाखुश नहीं करते और उस की मांग पूरी करते रहते हैं.

बीच का खेत नहीं सूखा

पिछले साल यानी 2016 में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सूबे सूखे की चपेट में थे. इस आपदा की मार से दोनों सूबे के कई किसानों ने मौत को गले लगा लिया. जो बचे वे पटवारियों की करामात के कारण खून के आंसू रोते रहे. सूखा पटवारियों के लिए कमाई का सुनहरा मौका था. जिन किसानों ने पटवारियों को खुश कर दिया, उन का मुआवजा बन गया, लेकिन जिन्होंने भेंट नहीं चढ़ाई, वे भटकते रह गए. सतना जिले के एक किसान सोमेश तिवारी ने बताया, ‘एक बड़े खेत के 3 हिस्से हैं. मुझे खेत के बीच में हिस्सा मिला है, लेकिन मैं ने उसे घूस नहीं दी थी. उस ने जो रिपोर्ट पेश की थी, उस में लिखा था कि सोमेश की फसल को नुकसान नहीं हुआ है. सोचिए कि ऐसा कैसे हो सकता है  सूखे से तो पूरा खेत ही प्रभावित होगा न  बीच की फसल सूखे से कैसे बच जाएगी  मैं ने पटवारी की शिकायत कलेक्टर, विधायक और कृषि मंत्री से भी की. अखबारों में खबर भी छपवाई, लेकिन उस का बाल बांका भी नहीं हुआ. मैं आज तक मुआवजा नहीं पा सका.’

बाढ़ से तबाही, मुआवजा न के बराबर

पिछले साल ही जुलाईअगस्त में मध्य प्रदेश के रीवा जिले में बाढ़ आई. शहर में तो तबाही हुई ही, कई गांव भी बरबाद हो गए. रीवा से 24-25 किलोमीटर दूर हटवा गांव से हो कर नई सड़क बनाई गई है. उस सड़क में तकनीकी खामी यह है कि उस की ऊंचाई घरों से काफी अधिक है. चूंकि मकान नीचे हो गए और नाले को पाट दिया गया, इसलिए बरसात का पानी महाना नदी में न जा कर लोगों के घरों में भर गया. इस से कई घरों में चूल्हे नहीं जले. कई मकान ढह गए. कुछ लोगों को पंचायत से खाना दिया गया और यहांवहां रहने का इंतजाम किया गया. लेकिन जब नुकसान की जांच होने लगी तो पटवारी ने अपनी करामात दिखा दी. जिन्हें कम नुकसान हुआ था, उन्हें ज्यादा मुआवजा दिलवा दिया और जो तबाह हो गए, उन्हें न के बराबर रकम मिली. कुछ लोगों ने दूर तक लिखापढ़ी की, मुख्यमंत्री तक बात पहुंचाई, लेकिन कोई हल नहीं निकला.

सरपंच के जरीए पहुंचता है पैसा

मैं अपना एक तजरबा साझा कर रहा हूं. साल 2006 में मेरे पिताजी गुजर गए, तो मैं पटवारी के पास वारसाना (कागजी तौर पर पिता का वारिस बनना) कराने गया. पटवारी ने कहा, ‘आप सरपंच को पूरी जानकारी दीजिए, मसलन कितने भाईबहन हैं, माताजी हों तो उन का विवरण दीजिए. यह सब कर के आइए तो काम हो जाएगा.’

मैं अपने चचेरे भाई के साथ सरपंच के पास गया, ताकि काम आसानी से हो जाए. वहां कई लोग पहले से अलगअलग काम ले कर बैठे हुए थे. सरपंच पैसे ले कर लोगों के काम निबटा रहा था. वारसाने के लिए 500 से 1000 रुपए लिए जा रहे थे. यह बता दूं कि मेरे गांव के लोग बहनबेटियों के नाम वारसाने में दर्ज नहीं कराते. यह पटवारी और सरपंच की कमाई का जरीया होता है. पैसे ले कर बहनबेटी को मरा घोषित करने में उन्हें देर नहीं लगती. मेरा घर चूंकि मध्य प्रदेश में है और मैं छत्तीसगढ़ में सालों से रहता हूं, इसलिए सरपंच मुझे ठीक से नहीं जानता था. मेरे चचेरे भाई ने उसे मेरा परिचय दिया तो वह बोला, ‘गांव के हेडमास्टर से लिखवा कर लाइए कि आप कितने भाईबहन हैं, तो फिर मैं दस्तखत कर दूंगा. मैं तो आप को ठीक से जानता नहीं. आप गलत जानकारी देंगे तो मैं फंस जाऊंगा.’

इस पर मेरे चचेरे भाई ने सरपंच को हड़काया, ‘इन्हें कैसे नहीं जानते  वोट डालने ये रायपुर से आए थे. सरपंच बन गए तो भूल गए  जल्दी से करो काम इन का. ये नहीं जाएंगे किसी हेडमास्टर के पास. जैसे सब का काम कर रहे हो, वैसे ही इन का भी कर दो. ले लो जो तुम्हारा हिसाबकिताब होता हो.’

‘नहीं, भाई गंगा मैया की कसम खा कर कहता हूं कि मैं किसी का एक पैसा नहीं लेता, जनता की सेवा फ्री करता हूं. लेकिन सचिव और पटवारी नहीं मानते न, इसलिए 500 रुपए जमा करा दीजिए, काम हो जाएगा. पटवारी के पास भी नहीं जाना पड़ेगा, जो मैं कहता हूं, वही वे करते हैं,’ सरपंच ने नरम पड़ कर मेरे चचेरे भाई से पूछा, ‘इन की बहनों का क्या करना है  2 बहनें हैं न  उन्हें मृत घोषित कराना है या उन का नाम लिखना है.’

‘नहीं सरपंच साहब, बहनों ने लिख कर दिया है कि उन्हें हिस्सा नहीं चाहिए. उन्हें मरी घोषित करूंगा तो वे बेहद दुखी होंगी.’

मैं ने यह कह कर बहनों का लिखा हुआ कागज सरपंच के सामने रख दिया.

‘ठीक है. आप पत्रकार हैं, पैसे मत दीजिए. मैं अपनी तरफ से पटवारी को दे दूंगा. वे मानने वाले नहीं, लेकिन आप का काम हो जाएगा,’ सरपंच न जाने क्या सोच कर बोला और मुझे बख्श दिया. कुछ दिनों बाद मेरा वारसाना बन गया.

पटवारियों के कर्मचारी

ज्यादातर पटवारी सरकारी काम कराने के लिए निजी कर्मचारी रखते हैं. वे कर्मचारी पटवारी के मकान में काम करते हैं. उन कर्मचारियों में बेरोजगार युवक और पढ़नेलिखने वाले बच्चे होते हैं. किसान और दूसरे लोग उसी कर्मचारी को भेंटचढ़ावा चढ़ाते हैं. कर्मचारी के मार्फत पटवारी पैसे लेते हैं. कर्मचारी रखने के सवाल पर एक पटवारी ने बताया, ‘काम इतना ज्यादा होता है कि मैं अकेले नहीं कर पाता, इसलिए निजी तौर पर सहयोगी रख लिया है. इस से किसानों और छात्रछात्राओं के काम नहीं अटकते, लोग परेशान नहीं होते और कुछ पैसे एक बेरोजगार को भी मिल जाते हैं. मैं अपने सहयोगी से पैसे नहीं मांगता. जो दे देता है, वह रख लेता हूं.’

जब पटवारी को पड़ गई मार

मैं एक ऐसे पटवारी को जानता हूं, जो रंगीनमिजाज था. यह बता दूं कि गांवों में पटवारी किसी बड़े आदमी के घर में ही रुकते हैं. जहां वे रुकते हैं, वहां उन की दामाद की तरह खातिरदारी होती है. जब वे आते हैं, तो चौकीदार गांव में घूमघूम कर लोगों को इस की जानकारी देता है. किसान वहीं जा कर अपना काम कराते हैं. एक पटवारी ऐसे घर में रुकते थे., जहां कई जवान लड़कियां थीं. उस घर में उस युवा पटवारी की खूब आवभगत होती थी. कहने को तो पटवारी उस घर की बेटियों को बहन मानता था, लेकिन बाद में उस की करतूत उजागर हो गई. एक लड़की को गर्भ ठहर गया. जब पता चला कि यह करतूत पटवारी ने की है, तो उस की जम कर धुनाई हुई. सारा खायापीया निकल आया. नौकरी जातेजाते भी बची. लेदे कर उस ने वहां से अपना तबादला कराया, तब कहीं जान बची.

नमस्कार का जवाब नहीं देते

मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में एक पटवारी थे. उन का किस्सा उन के दामाद और मेरे पत्रकार साथी ने सुनाया, ‘मेरे ससुर साहब एक बार किसी बड़े अधिकारी से खफा हो गए. उन्होंने उन के आलीशान बंगले का कुछ हिस्सा अतिक्रमण घोषित कर दिया. अफसर परेशान. मकान टूटने की नौबत आ गई. वे भागेभागे कलेक्टर के पास गए. कलेक्टर ने मेरे ससुर साहब को बुलाया. चूंकि कलेक्टर मेरे ससुर साहब से बखूबी परिचित थे, इसलिए मुसकरा कर पूछा, ‘पंडितजी, बात क्या है  क्यों खफा हैं इन से ’ इस पर मेरे ससुर साहब बोले, ‘बात यह है साहब कि मैं इन्हें नमस्कार करता हूं, तो ये उस का जवाब नहीं देते. इसलिए ऐसी नाप कर दी कि इन का बंगला अतिक्रमण में आ गया.’ यह सुनना था कि कलेक्टर ने ठहाके लगाए. उस अफसर ने माफी मांगी, तब जा कर ससुर साहब ने सही नाप की और बंगला टूटने से बच गया.’

चुनावों में भाजपा का दबदबा और राष्ट्रवाद का नारा

14 फरवरी, 2017 को आरएसएस मुखिया मोहन भागवत उज्जैन के वाल्मीकि धाम पहुंचे थे. इस से ज्यादा हैरत की बात यह थी कि उन्होंने यहां के मुखिया, दलित संत, उमेशनाथ के पैर छू कर आशीर्वाद लिया था. इन दोनों में लंबी चर्चा हुई. चर्चा का अंत उमेशनाथ की इस चेतावनी के साथ हुआ था कि आरक्षण खत्म नहीं होना चाहिए, दूधमलाई वालों को नहीं, बल्कि सफाई करने वालों को मिलना चाहिए. उमेशनाथ की दलित समुदाय में वैसी ही पूछपरख है जैसी सवर्णों में शंकराचार्यों और ब्रैंडेड धर्मगुरुओं श्रीश्री रविशंकर और अवधेशानंद जैसों की है. यह दीगर बात है कि वे रहते बेहद साधारण ढंग से हैं. क्षिप्रा नदी के किनारे बसे वाल्मीकि धाम में विलासिता का कोई साधन नहीं है और यह आश्रम लगभग कच्चा बना हुआ है.
मोहन भागवत उमेशनाथ की आरक्षण सलामती की मांग पर लगभग प्रतिक्रियाहीन रहे थे पर उस दिन उन्होंने जोर दे कर कहा था कि संस्कृति गांवों और जंगलों से विकसित होती है. उन्होंने गांधी के ग्राम्यदर्शन की भी जम कर तारीफ की.

तब इस मुलाकात के माने यह निकाले गए थे कि मोहन भागवत 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों, खासतौर से उत्तर प्रदेश के चुनाव, की तैयारी कर रहे हैं. उमेशनाथ के पैर पड़ने का सीधा सा मतलब था कि संघ और भाजपा अब दलित संतों के आगे नतमस्तक हैं और उन्हें किसी कीमत पर दलितों के वोट चाहिए. 11 मार्च के नतीजों में यह साफ भी हो गया कि उत्तर प्रदेश में दलितों ने बहुजन समाज पार्टी और मायावती को नकार कर भाजपा के पक्ष में बड़े पैमाने पर वोट किया है. खासतौर से वाल्मीकि समाज ने, जिस के नाम से ऊंची जाति वालों का नाकभौं सिकोड़ना आज भी बरकरार है.

किसे कहां क्या मिला
5 राज्यों के चुनावों में भाजपा को 2 और कांग्रेस को 1 राज्य में सरकार चलाने का बहुमत मिला. गोआ और मणिपुर में दोनों ही दलों को बहुमत नहीं मिला. कांग्रेस नंबर वन पार्टी होने के बाद भी सरकार नहीं बना सकी. कांग्रेस को उसी के पुराने दांव से मात दे कर भाजपा ने 5 राज्यों के चुनावों का फैसला 4-1 से अपने पक्ष में करने के लिए अपनी साख को दांव पर लगा दिया.

जिस तरह से केंद्र के दखल से राज्यों में कभी कांग्रेस सरकार बनतीबिगड़ती थी, अब भाजपा उसी का अनुसरण कर रही है. गोआ और मणिपुर में सब से बड़ी पार्टी के रूप में कांग्रेस जीत कर आई. गोआ में कांग्रेस को 17 और मणिपुर में 28 सीटें मिलीं. इस के मुकाबले भाजपा को गोआ में 13 और मणिपुर में 21 सीटें ही मिल पाईं. दोनों ही राज्यों में सरकार बनाने के लिए बहुमत किसी दल के पास नहीं है. ऐसे में अन्य विधायकों को अपनी ओर मिला कर के भाजपा ने गोआ और मणिपुर में अपनी सरकारें बना लीं.
कांग्रेस इसे केंद्र सरकार द्वारा सत्ता का दुरुपयोग किया जाना बता रही है. उस ने इस मुद्दे को ले कर लोकसभा में हंगामा भी मचाया. जिस तरह से मणिपुर और गोआ में सब से बड़ी पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए नहीं बुलाया गया, उस को ले कर दोनों ही राज्यों के राज्यपालों पर भी आरोप लग रहे हैं. आमतौर पर राज्यपाल जिस पार्टी के सब से अधिक विधायक होते हैं, उसे ही सरकार बनाने का न्योता देते हैं. कई बार राज्यपाल अपने विवेक से भी फैसला करते हैं. अप्रत्याशित बहुमत मिलने के बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा किसे मुख्यमंत्री बनाएगी, यह चुनाव से कम रोमांच नहीं था जो राजनाथ सिंह के नाम से शुरू होते गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ पर खत्म हुआ.

पंजाब में उतरा भगवा नशा
उत्तर प्रदेश की कामयाबी का भाजपा का नशा अगर पंजाब में उतरता दिखाई दिया तो इस से ये तथ्य तो स्थापित होते हैं कि 5 राज्यों के चुनावों में कोई राष्ट्रीय या दूसरी लहर नहीं थी और राज्यों में सिर्फ सत्ताविरोधी लहर चली है. आमतौर पर लोग अपनेअपने राज्यों की सरकारों के कामकाज से संतुष्ट नहीं रहते, भाजपा ने इस का फायदा अगर खासतौर से उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में उठाया तो पंजाब में इस का खमियाजा भी उसे भुगतना पड़ा. शिरोमणि अकाली दल और भाजपा का गठबंधन खारिज कर दिया गया है और वोटरों ने कांग्रेस पर भरोसा जताया है तो बात हैरत की इस लिहाज से है कि वहां सत्ता की प्रबल दावेदार आम आदमी पार्टी एक बेहतर विकल्प के रूप में थी, पर धाकड़ कांग्रेसी नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह की जमीनी पकड़ कांग्रेस के काम आई.

नशा पंजाब चुनाव में एक बड़ा मुद्दा था जिसे ले कर काफी बवंडर पिछले एक साल से मच रहा था. राज्य सरकार का उम्मीदों पर खरा न उतरना और बादल परिवार की बदनामी भी हार की वजह बनी. इसीलिए भाजपा अब बड़ी मासूमियत से कह रही है कि हम तो पंजाब में अतिथि और सहयोगी थे. प्रचार का जिम्मा तो एसएडी का था. यानी मीठामीठा गप और कड़वाकड़वा थू वाली बात की जा रही है, जो राजनीति का शगल भी है.

नरेंद्र मोदी प्रचार के दौरान सिर्फ पंजाब की शान और खेतीबाड़ी की बातें करते बादल साहब, बादल साहब करते रहे थे लेकिन राहुल गांधी ने नशे पर रोक की बात प्रमुखता से कही थी और सारे फैसले अपने हाथ में रखने का एक पुराना कांग्रेसी रिवाज भी पहली दफा तोड़ते अमरिंदर सिंह को अपने हिसाब से फैसले लेने की छूट दी थी, जिस से मतदाता में यह संदेश गया था कि अब कांग्रेस बदल रही है और सबकुछ 10 जनपथ से तय नहीं होगा.

दरअसल, पंजाब में कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती भाजपा-एसएडी गठबंधन नहीं, बल्कि आम आदमी पार्टी थी. अरविंद केजरीवाल यहां लंबे वक्त से सक्रिय थे, पर संगठनात्मक ढांचा न बना पाने के कारण वे पीछे रह गए. नवजोत सिंह सिद्धू भी पंजाब में एक बड़ा फैक्टर थे, जिन्होंने पत्नी नवजोत कौर सहित भाजपा छोड़ दी थी. आम आदमी पार्टी ने उन्हें नहीं लिया तो वे कांग्रेस में चले गए. उन की लोकप्रियता का फायदा कांग्रेस को मिला, नतीजा सामने है कि भाजपा व एसएडी के गठबंधन और आप को पछाड़ कर कांग्रेस सत्ता में हैं.

पंजाब में कांग्रेस की वापसी से यह भी जाहिर होता है कि वोटरों का मूड हर जगह अलग है. विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दे काफी अहम होते हैं और रही बात जाति या धर्म की तो ये मुद्दे पंजाब में कहनेभर को थे. यहां का युवा अच्छी बात है कि नशे के दुष्परिणामों को समझने लगा है, इसलिए उस ने पंजाब के नाम या बदनामी से ऊपर उठते कांग्रेस को मौका दिया.

ऐसे उलझी कांग्रेस
उत्तराखंड के नतीजे इस लिहाज से चौंकाने वाले नहीं हैं कि वहां कांग्रेस और मुख्यमंत्री हरीश रावत को ले कर जबरदस्त असंतोष था. वहां भाजपा ने 70 में से 57 सीटें जीतीं और कांग्रेस को महज 11 सीटें मिल पाईं. पहाड़ी और मैदानी दोनों इलाकों में कांग्रेस मतदाताओं की नाराजगी का शिकार इस तरह हुई कि हरीश रावत दोनों सीटें हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा से हार गए.

उत्तराखंड में भाजपा ने उत्तर प्रदेश की तरह हाहाकारी प्रचार नहीं किया था. यह बात उस से छिपी नहीं रह गई थी कि जो हालत उस की पंजाब में है वही यहां कांग्रेस की है. लिहाजा, उसे उत्तराखंड में उत्तर प्रदेश जितना पसीना नहीं बहाना पड़ा.

पिछले साल उत्तराखंड में हुई कांग्रेसी बगावत के बाद कांग्रेस को सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ी थी, तब कहीं जा कर हरीश रावत मुख्यमंत्री बन पाए थे. उन्होंने बजाय जनहित के काम करने और मुद्दों पर बात करने के, भाजपा का रास्ता अपनाया और सालभर पूजापाठ में उलझे रहे. नतीजतन, जनता ने उन्हें खारिज कर दिया.

इन नतीजों से यह भी स्पष्ट हो गया था कि उत्तर प्रदेश में केवल दलितों ने ही नहीं, बल्कि सपा को नकारते पिछड़ों ने भी भाजपा को वोट दिया. कुछ मुसलिमबाहुल्य सीटों पर भी भाजपा जीती तो साफ लगा कि आरएसएस अपने राष्ट्रवाद की नई अवधारणा में सफल हो रहा है जिस के तहत अब हिंदू केवल सवर्ण नहीं, बल्कि सभी देशवासी हैं.

दलितों और आदिवासियों को घेरने का काम आरएसएस और भाजपा ने बड़े पैमाने पर उज्जैन के सिंहस्थ महाकुंभ में भी किया था जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इन्हीं उमेशनाथ के साथ क्षिप्रा में डुबकी लगाई थी और सामाजिक समरसता का नारा बुलंद किया था. कुछ बड़े और सनातनी हिंदू धर्मगुरुओं को भी दलित संतों के साथ डुबकी लगवाई गई थी.
खुद मोहन भागवत ने अलग से दलित आदिवासियों के साथ डुबकी लगाई थी और उन के साथ बैठ कर खाना भी खाया था. इस से और पहले यह काम अमित शाह उत्तर प्रदेश में कर चुके थे तो इन सब की मंशा साफ थी कि अब हिंदू और हिंदुत्व के माने बदले जा रहे हैं. दलित भले ही सवर्णों के लिए अछूत और हेय हों पर अस्वीकार्य नहीं हैं.

राष्ट्रवाद हुआ हिंदुत्व
उत्तर प्रदेश का नतीजा हैरान कर देने वाला है. खुद अमित शाह ने 11 मार्च को लखनऊ की पत्रकारवार्त्ता में माना था कि दलितों और गरीबों ने भाजपा सरकार और नरेंद्र मोदी में भरोसा जताया है. तमाम अनुमानों और सर्वेक्षणों को ध्वस्त करते उत्तर प्रदेश में भाजपा ने यों ही 325 सीटों का आंकड़ा नहीं छू लिया है जिस के बारे में कहा जा रहा है कि 1991 की रामलहर से ज्यादा जोरदार और असरदार 2017 की मोदीलहर है. दिलचस्पी और हैरत की बात यह है कि कहीं भी उग्र हिंदुत्व की बात नहीं की गई, चुनावप्रचार के दौरान बाबरी मसजिद को धक्का दे कर तोड़ने की धौंस भी नहीं दी गई थी. जयजय श्रीराम के उद्घोष नहीं किए गए थे, सबकुछ बड़ी योजनाबद्घ तरीके से किया गया.

यह योजना कई चरणों में कई बिंदुओं पर चली. पहली यह कि दलितों को उन के हिंदू होने का एहसास कराया गया. इस बाबत तमाम टोटके किए गए, यहां तक कि मोहन भागवत और अमित शाह ने उमेशनाथ के चरणों में सिर तक नवा दिया. दूसरी अहम बात, बड़े पैमाने पर बजाय हिंदुत्व के राष्ट्रवाद की बात की गई.

यह राष्ट्रवाद है क्या बला, यह बात खुद इस का राग अलाप रहे लोग नहीं समझ पा रहे जिस के बारे में मोहन भागवत बहुत स्पष्ट कह चुके हैं कि आरएसएस की लत एक बार जिसे लग जाए तो फिर वह छूटती नहीं. यानी राष्ट्रवाद एक नया नशा है जिस के तहत वंदेमातरम और भारत माता की जय बोलना अनिवार्य है. चुनावी सभाओं में नरेंद्र मोदी ने जयजय श्रीराम की जगह हरहर महादेव के नारे लगाए और लगवाए और मतदान समाप्त के बाद वे सीधे सोमनाथ के मंदिर भी गए थे.

इन तमाम ड्रामेबाजियों का हिंदू जातियों की आपसी लड़ाई और बैर से गहरा संबंध है. राममंदिर निर्माण आंदोलन के वक्त हिंदुओं में एक धार्मिक उन्माद था जिसे भी भाजपा अब कहीं जा कर एक सामाजिक क्रांति व बदलाव में ढाल कर पेश कर पाने में कामयाब हो रही है. अब कोई सीधे नहीं कहता कि धर्म के नाम पर देश को मजबूत करो. अब कहा जाता है कि विकास और सामाजिक समरसता चाहिए तो भाजपा को वोट दो.

लोगों ने उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में भाजपा को वोट दिया तो भाजपा बहुत साफ कहने लगी है कि वह दलितों और मुसलमानों की दुश्मन नहीं, बल्कि हमदर्द है. वह अब महज ब्राह्मण और बनियों की पार्टी नहीं रह गई है, बल्कि उन सब की पार्टी है जो खुद को भारतीय मानते हैं. उस का मानना है कि भारत को खतरा कट्टरवादी हिंदुओं से नहीं, बल्कि कट्टरवादी मुसलमानों और वामपंथियों से ज्यादा है जो आएदिन राष्ट्रद्रोह की बातें करते रहते हैं. यह राष्ट्रद्रोह भारत माता की जय न बोलना और देश को अपना न मानना है. वामपंथी राष्ट्रद्रोह के नारे लगाते हैं, इसलिए वे भगवा मंडली के अनुसार देश यानी नए हिंदुत्व के दुश्मन हैं और उन से निबटना है तो भाजपा को मजबूती देनी होगी. वहीं, वामपंथियों का मकसद देश के टुकड़े करना है और इस काम में मुसलमान भी उन के साथ हैं. ये ही नक्सली हिंसा को बढ़ावा देते हैं और दलितों को बरगलाते हैं. देश की सहिष्णुता को उन से बड़ा खतरा है और वे हमारी जातिगत फूट का फायदा उठाते हैं, इसलिए हमारा एक होना जरूरी है.

इस वर्ग का मानना है कि अभिव्यक्ति और आजादी की मांग करने वाले ये लोग नहीं चाहते कि देश एक हो. और ये विघटनकारी, अलगाववादी हैं और बोलने की आजादी का बेजा फायदा उठाते रहते हैं. ये नास्तिक और अधर्मी हैं. इन्हें सबक सिखाना जरूरी है कि अब सभी लोग जातपात छोड़ कर आरएसएस और भाजपा के तंबू के नीचे आ जाएं जिस से इन के नापाक मंसूबों को नाकाम किया जा सके. ये लोग ऐयाश हैं, एहसानफरामोश हैं जो खातेपीते तो देश का हैं पर वफादारी पाकिस्तान की करते हैं. दरअसल ये ऋषिमुनियों वाले धर्म और संस्कृति को फलतेफूलते नहीं देखना चाहते. ऐसा भाजपा के कार्यकर्ता ही नहीं, दूसरे आम लोग भी कहते हैं जो धर्म में अंधश्रद्धा रखते हैं.

चूंकि हिंदू धर्म और हिंदुत्व के नाम पर दलितों व पिछड़ों को साथ मिला पाना मुश्किल था, इसलिए चाल, चरित्र और चेहरा बदलते आरएसएस और भाजपा ने राष्ट्रवाद का नारा दिया जिस में कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र नहीं है बल्कि सभी हिंदू हैं. हिंदू शब्द की नई परिभाषा देने में 20 साल लग गए. इस दौरान कई उतारचढ़ाव आए. लेकिन इन हिंदूवादियों ने जोखिम उठाया और 2014 के लोकसभा चुनाव में पिछड़े वर्ग के नरेंद्र मोदी को नायक के रूप में पेश कर दिया.

हीनता का फायदा
नरेंद्र मोदी पसंद किए गए तो इस की वजह गुजरात का उन का विकास मौडल या देसी भाषणशैली कम, बल्कि उन का पिछड़े वर्ग से होना अहम था जिस ने पिछड़ों और दलितों को भाजपा के प्रति आश्वस्त किया था. इस के बाद तो भाजपा सवर्णों की बात करना ही भूल गई. वह दलितों, गरीबों की बात करती रही. बस, ‘दलित’ की जगह शब्द ‘गरीब’ इस्तेमाल किया गया.

इसी वजह से मायावती अपना हश्र देख सकते में है. वे शायद ही कभी यह हकीकत समझ पाएं कि दलितों के अंदर पसरी जातिगतहीनता को भाजपा ने भावनात्मक रूप से भुनाया है. भाजपा गांधी की कांग्रेस की तरह सदियों से प्रताडि़त और उपेक्षित रहे दलित समुदाय को यह गारंटी देने में सफल रही कि अब उस का झुकाव छोटी जातियों की तरफ है, जिन की दुर्दशा की एक बड़ी वजह जातिगत अत्याचार, भेदभाव या प्रताड़ना कम, बल्कि उन का गरीब होना ज्यादा है. इसलिए अब उन के भले और उत्थान की योजनाएं बना कर उन्हें अमल में भी लाया जाएगा.

पढ़ेलिखे और पैसे वाले पिछड़ों, जिन की गिनती लगातार बढ़ रही है, को भी यह अदा भायी और उन्होंने भाजपा में ही सुरक्षा देखी तो बात कतई हैरानी की नहीं क्योंकि ये भी अपनी जातिगतहीनता से उबरने को बेचैन थे. 2007 की मायावती की सोशल इंजीनियरिंग राजनीतिक थी पर भाजपा ने इसे सामाजिक तौर पर अपनाने का प्रचार किया.

बड़ी तेजी से यह प्रचार भी हुआ कि सिर्फ मुसलमान ही देश का दुश्मन नहीं, बल्कि देश का दुश्मन वह भी है जो इस राष्ट्रवाद की परत में छिपे नव हिंदुत्व को नहीं मानता. उत्तर प्रदेश के नतीजों के बाद सोशल मीडिया पर इस आशय के मैसेज खूब वायरल हुए जिन में यह कहा गया था कि भूतप्रेत भगाने के लिए हनुमानचालीसा पढि़ए और वामपंथी, राष्ट्रद्रोहियों को भगाने के लिए वंदेमातरम व भारत माता की जय बोलिए. एक मैसेज का आशय यह था कि अगर 3 तलाक का मामला सुप्रीम कोर्ट तय नहीं कर सकता क्योंकि इस से मुसलमानों के धर्म और मन को ठेस पहुंचती है तो उस सुप्रीम कोर्ट को यह हक भी नहीं कि वह राममंदिर निर्माण का फैसला करे क्योंकि इस से 100 करोड़ हिंदुओं को ठेस पहुंचती है. कुछ छुटभैये और मंझोले हिंदूवादियों ने अब दोबारा राममंदिर निर्माण की बात कहनी शुरू कर दी है. यह साजिश के तौर पर हो रहा है ताकि ऊंचे सवर्ण भाजपा के जहाज को छोड़ कर न जाने लगें कि उस पर दलित व पिछड़े सवार होने लगे हैं.

इस तरह की बातें पढ़े और लिखे सवर्णों, जिन्हें देशदुनिया और धार्मिक पोंगापंथ से कोई सरोकार नहीं रहा, के लिए नहीं, बल्कि तेजी से हिंदू हो रहे पिछड़ों और दलितों को बरगलाने के लिए ज्यादा की जाती हैं जो यह मानने लगे हैं कि अब वे देश की मुख्यधारा है और देश की जिम्मेदारी उन के कंधों पर आ गई है और चूंकि देश खतरे में है, इसलिए भाजपा ने उत्तर प्रदेश के चुनाव में एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया. मायावती ने सौ मुसलमानों को टिकट दिए तो उन की मंशा दलितों के कंधों पर मुसलमानों की पालकी ढुलवाने की थी. कितनी चालाकी से यादवमुसलमान गठजोड़ तोड़ा गया और दलितमुसलमान गठजोड़ बनने ही नहीं दिया गया. यह बात न तो अखिलेश यादव समझ पाए और न मायावती. मायावती इस मुगालते में रहीं कि दलित अभी भी मनुवाद के नाम पर उन के साथ हैं.

बात साफ भी है कि भाजपा और आरएसएस की तरफ से अब यह नहीं कहा जाता कि हिंदू धर्म खतरे में है बल्कि यह कहा जाता है कि देश खतरे में है. देशविरोधी ताकतों को सिर्फ भाजपा ही सबक सिखा सकती है जो दिनोंदिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में मजबूत हो रही है. इस उन्मादी प्रचार का एक फायदा यह भी होता है कि लोग बढ़ती महंगाई को भूल जाते हैं, अपनी रोजमर्राई परेशानियों से दूर हो जाते हैं और नए भजनों पर झूमना शुरू कर देते हैं.

अब बढ़ेगा पूजापाठ
दलित और पिछड़े, दरअसल, घोषित तौर पर मुख्यधारा के हिंदू यानी खुद को सवर्ण कहलाने और महसूस करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं. लेकिन करवाया उन से भजनपूजन ही जाएगा जिस से पंडेपुजारियों को बदस्तूर दानदक्षिणा मिलती रहे. भारत माता के नाम पर वही छल किया जा रहा है जो बाली को मारने के लिए राम ने किया था. फर्क इतना भर है कि एक बड़ी सामाजिक ताकत, जिसे खत्म नहीं किया जा सकता, को गले लगा कर अपने सनातनी स्वार्थ सिद्ध किए जा रहे हैं.

यही काम आजादी के बाद से कांग्रेस कट्टर लोगों को छलती रही थी. महात्मा गांधी इस के जनक थे जो वर्णव्यवस्था को कायम रखने के हिमायती थे और ‘रघुपति राघव राजा राम’ जैसे भजन गाया करते थे. बाद में जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल ने इस रिवाज को कायम रखा और मंदिरों व हिंदुत्व पर खासा ध्यान दिया. तब सिर्फ कांग्रेसी ही सोचते थे कि धर्मप्रधान इस देश में सत्ता में रहना है तो पूजापाठ करते रहना होगा जिस से धर्म और जातिवाद बना रहे और ढका भी. सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का काम इसी षड्यंत्र का हिस्सा था.

60 साल कांग्रेस जो करती रही, वही अब भाजपा कर रही है. उस ने गांधी की चालाकियों को हथियार बना लिया है. गांधी की तरह मोहन भागवत, अमित शाह और नरेंद्र मोदी को देर से सही, पर समझ आया कि दरअसल हिंदुस्तान और हिंदुत्व की ताकत मुट्ठीभर सवर्ण नहीं, बल्कि दलित, पिछड़े और आदिवासी हैं. इसलिए अब कोई राममनोहर लोहिया या कांशीराम पैदा ही न होने दिया जाए वरना हिंदुत्व की पोल खुल जाएगी. उत्तर प्रदेश के पिछड़े अब यादव और गैरयादव जातियों में बंट गए हैं तो यह हिंदुत्व के लिहाज से चिंता की नहीं, बल्कि सुकून की बात है.

इस बाबत पहले आरएसएस ने वैचारिक प्लेटफौर्म बनाया और फिर नरेंद्र मोदी ने खूब श्मशान व दीवाली की बातें की, गायों को हाथ से चारा खिलाया और देखते ही देखते खुद को गांधी के बराबर लोकप्रिय मानने लगे.

दरअसल, सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस धर्म और उस के पोंगापंथ से दूर होने लगी थी, इसलिए उस पर तुरंत वामपंथियों के सहयोगी होने का ठप्पा लगा दिया गया. इस का आधार वैचारिक कम, धार्मिक न होना ज्यादा था. जितने मंदिरों में दर्शन और पूजापाठ नरेंद्र मोदी 3 साल से कम वक्त की मियाद में कर चुके हैं, उस से कहीं कम मनमोहन सिंह ने 10 साल में किए होंगे.

धर्मप्रधान देश में विकास योजनाओं और उन के नाम पर भ्रष्टाचार कहनेभर की बात रहती है. असल मुद्दा पूजापाठ होता है जिसे भूलने का खमियाजा कांग्रेस भुगत रही है और यह सिलसिला अभी और चलने का अंदेशा है क्योंकि राज उस भाजपा का है जिस की बुनियाद धर्म पर ही रखी है. ऊंची जाति वालों को दरअसल समझ आ गया है कि वे तो हर लिहाज से श्रेष्ठ हैं और रहेंगे, इसलिए देश के लिए काम करने की जिम्मेदारी दलितों व पिछड़ों को अब दे दी जाए तो सौदा घाटे का नहीं. इन की हैसियत रहेगी तो खेत में काम करने वाले मजदूरों सरीखी ही, काम करते रहने से वे खेत के मालिक नहीं हो जाएंगे. ये लोग अभी धर्म की चालाकियां नहीं सीख पाए हैं.

अब पूजापाठ, यज्ञ, हवन और दानदक्षिणा का जो दौर धीमा होता दिखाई दे रहा था वह बहुत बड़े पैमाने पर होगा. भाजपा और आरएसएस का मकसद पंडों के लिए नए ग्राहक तैयार करना था, जिस में वे कामयाब हो गए हैं.

भाजपाशासित राज्यों में अवधेशानंद, रामदेव और श्रीश्री रविशंकर जैसे धर्मगुरु त्रेता व द्वापर युग के ऋषिमुनियों की तरह स्वच्छंद विचरण करते हैं. वे योग, आयुर्वेदिक दवाइयों, प्रवचनों, दीक्षाओं, यज्ञ, हवन का कारोबार करते हैं और बदले में मुख्यमंत्रियों को आशीर्वाद देते चलते बनते हैं.

व्यक्तिपूजा व चाटुकारिता
इन चुनावों में जिस तरह से मोदी का भक्तिगान किया गया, उस से साबित हो गया कि चुनावों में व्यक्तिपूजा व चाटुकारिता की परंपरा आज भी बरकरार है.

सत्तर के दशक के एक धाकड़ कांग्रेसी नेता थे असम के देवकांत बरुआ. उन की इकलौती योग्यता थी इंदिरा गांधी की चापलूसी करते रहना. एवज में इंदिरा गांधी ने उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया था और बिहार का राज्यपाल भी बना दिया था. एक और कांग्रेसी नेता विद्याचरण शुक्ल थे जो इंदिरा गांधी की स्तुति यह कहते करते थे कि तेरी सुबह की जय, तेरी शाम की जय, तेरे काम की जय, तेरे नाम की जय. विद्याचरण शुक्ल ने ‘सरिता’ का गला घोंटने की कोशिश की थी कि वह धर्म की पोल न खोले.

व्यक्तिपूजा की यह हद इंदिरा युग की याद बेवजह नहीं दिलाती, जिन्हें कांग्रेसियों ने देवी साबित करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी थी, जिस का खमियाजा आखिरकार आपातकाल के रूप में देश को भुगतना पड़ा था. इंदिरा गांधी हार तो हार, अदालत का फैसला न मानने तक की हद तक मनमानी करने पर उतारू हो गई थीं, जिस की एक बड़ी वजह तत्कालीन चाटुकार थे. नरेंद्र मोदी को भगवान साबित करने पर तुले लोग बरुआ और शुक्ला सरीखा गुनाह ही कर रहे हैं जिन्हें रोकने वाला कोई नहीं, क्योंकि यह उन का हक हर लिहाज से है.

मोदीभक्त इस बात की जानबूझ कर अनदेखी कर रहे हैं कि 3 राज्यों में भाजपा कांग्रेस से पिछड़ी है. जोड़तोड़ कर उस ने गोआ और मणिपुर में सरकार बना लिया तो यह उस का संवैधानिक अधिकार है. पर इस से साबित यह होता है कि कोई लहर मोदी के नाम की नहीं थी. अगर होती तो पंजाब उस से अछूता नहीं रहता. फिर जश्न किस बात का बिलाशक उत्तर प्रदेश में भाजपा ने उम्मीद से परे वह आंकड़ा पार कर लिया है जिस का अंदाजा उस मीडिया को भी नहीं था, जो अब दिनरात मोदी के गुणगान तरहतरह से कर अपनी झेंप व खिसियाहट ढक रहा है. नरेंद्र मोदी को 2014 के मुकाबले, प्रतिशत में इस बार कम वोट मिले हैं. षड्यंत्र रचा जा रहा है कि इस पूरे खेल में लोकतंत्र कहीं नहीं दिखना चाहिए, और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर बोलने वालों का गला दबोचते रहना जरूरी है जिस से जातिगत गुलामी बनी रहे.

दक्षिणपंथ के बढ़ते खतरे
संकीर्णता की आंधी जब समूची दुनिया में चल रही हो तो धर्म, जातियों का गढ़ भारत कैसे बच सकता है. कुछ समय से विश्वभर में उदार बनाम संकीर्ण विचारों की लड़ाई चल रही है. इस में लोकतंत्र के नाम पर संकीर्ण विचारों की विजय होती दिख रही है. भारत जैसे सब से बड़े लोकतंत्र में ऐसी शक्तियों का मजबूत होना निश्चित ही नुकसानदायक है.

अब यह तय है कि आने वाले समय में विश्व में संकीर्णता फैलेगी, लोकतंत्र की उदारता के लिए कोई जगह नहीं होगी, सोच विस्तृत होने के बजाय सिकुड़ती जाएगी क्योंकि माहौल ऐसा बनाया जा रहा है. तर्क, बहस के लिए स्पेस नहीं रहेगा. स्वतंत्र बोलने, लिखने वालों पर अपने देश का द्रोही होने के आरोप लगाए जाएंगे. कालेजों, विश्वविद्यालयों और इंगलैंड का औक्सफौर्ड विश्वविद्यालय ब्रैक्सिट का शिकार हो रहा है. स्कूलों से इस की शुरुआत की जा चुकी है. हर जगह असहमति के विचार रखने वालों पर हिंसा का प्रयोग किया जाने लगा है. विचारों से मतभेद रखने वालों की खैर नहीं होगी. अमेरिका फर्स्ट, भारत अग्रणी, चीनी साम्राज्य, तुर्की का औटोमन एंपायर शब्द एक ही बात कह रहे हैं. राजनीतिबाजों के हाथ में धर्म हमेशा लोकतंत्र को खत्म करने का हथियार रहा है. अब ये लोग लोकतंत्र के नाम पर तानाशाही रवैए को जगजाहिर करने पर उतारू होंगे. डोनाल्ड ट्रंप के नए बजट में कितने ही उदारवादी संस्थानों को आर्थिक सहायता बंद कर दी गई है.

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