‘बाहुबली 2’ की हीरोइन का खुल गया ये राज

‘बाहुबली-द बिगिनिंग’ में बाहुबली के साथ प्यार और जंग में कंधा से कंधा मिलाकर लड़ने वाली अवंतिका का किरदार तमन्ना भाटिया ने निभाया था. मिल्की व्हाइट तमन्ना की अदाकारी और खूबसूरती ने आपको भी इंप्रेस किया होगा. लेकिन क्या आप जानते हैं कि तमन्ना का हिंदी सिनेमा से बहुत पुराना नाता है और आज तक उन्होंने एक भी हिट हिंदी फिल्म में काम नहीं किया है. ‘बाहुबली’ ने तमन्ना को देशभर में शोहरत तो दिलवाई, लेकिन इससे उनकी फिल्मों को दर्शक नहीं मिले.

‘बाहुबली-द कन्क्लूजन’ इस साल की मोस्ट अवेटेड फिल्मों में शामिल है. पहले पार्ट के मुकाबले दूसरे पार्ट में तमन्ना का काम कम होगा, जबकि दूसरी लीडिंग लेडी अनुष्का शेट्टी ‘बाहुबली 2’ में ज्यादा नजर आएंगी. फिलहाल हम आपको तमन्ना के बारे में जानकारी देते हैं. तमन्ना को ज़्यादातर दर्शक दक्षिण भारतीय सिनेमा की एक्ट्रेस समझते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है.

तमन्ना ने अपने करियर की शुरुआत हिंदी सिनेमा से की. 2005 में उन्होंने ‘चांद सा रोशन चेहरा’ फिल्म से डेब्यू किया था, लेकिन ये फिल्म बुरी तरह फ्लॉप रही और तमन्ना ने इसके बाद सीधे साउथ इंडिया की ट्रेन पकड़ ली, जहां उनकी हर एक तमन्ना पूरी हुई.

दक्षिण भारतीय भाषाओं की फिल्मों में तमन्ना ने कई हिट फिल्में दीं और वहां के तकरीबन सभी सुपरस्टार्स के साथ स्क्रीन स्पेस शेयर किया. साउथ सिनेमा में बड़ा नाम कमाने के बाद तमन्ना हिंदी सिनेमा में अधूरी रह गई ख्वाहिश को पूरा करने के इरादे से एक बार फिर मुंबई लौटीं. 2013 में तमन्ना ने साजिद ख़ान के निर्देशन में बनी फिल्म ‘हिम्मतवाला’ से अजय देवगन जैसे सुपरस्टार के साथ कमबैक किया.

उस वक्त साजिद ने मीडिया को बताया था कि तमन्ना उनकी फिल्म से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में डेब्यू कर रही हैं, जबकि इस बात को छिपा लिया था कि वो पहले भी हिंदी सिनेमा में किस्मत आजमा चुकी हैं. इसके बाद तमन्ना साजिद की फिल्म ‘हमशकल्स’ में फीमेल लीड में नजर आईं, जो 2014 में रिलीज हुई. ये दोनों फिल्में बॉक्स ऑफिस पर फ्लाप रहीं. 2014 में ही तमन्ना अक्षय कुमार के साथ ‘एंटरटेनमेंट’ में दिखाई दीं. ये फिल्म औसत रही.

फिर 2015 में आई ‘बाहुबली-द बिगिनिंग’. कहने को तो ये फिल्म तमिल और तेलुगु भाषाओं के दर्शकों के लिए बनाई गई थी, लेकिन इसके हिंदी डब वर्जन ने देशभर में धूम मचा दी. तकनीकी रूप से देखा जाए तो तमन्ना की ये फिल्म भी हिंदी भाषाई नहीं थी. पिछले साल तमन्ना सोनू सूद और प्रभु देवा के साथ ‘तूतक तूतक तूतिया’ में बतौर फीमेल लीड दिखाई दीं, लेकिन ये फिल्म भी नहीं चली.

निगेटिव रोल में धमाका करेंगी ये 4 सुपरस्टार

अभिनेत्रियों के लिए हिंदी सिनेमा का माहौल अब पूरी तरह बदल गया है. रियल स्पेस में काम करने के लिए बॉलीवुड की कई टॉप एक्ट्रेस ने खुद की इमेज से हटकर नए रास्ते पर चलने का मन बना लिया है. ग्लैमर किरदार से हटकर सिनेमा के पर्दे पर अपनी नई पहचान बनाने के लिए इस साल बॉलीवुड की चुनिंदा एक्ट्रेस पॉजिटिव छोड़ निगेटिव या यूं कह लें कि ग्रे शेड किरदार में नजर आयेंगी. वो भी इस साल की बहुप्रतिक्षित फिल्मों में. किसी के लिए यह बदलाव करियर के लिए नया मौका है. तो किसी के लिए कमबैक का धमाकेदार रास्ता. तो कोई खुद को दोबारा से हिंदी फिल्म इंडस्टी में सेट करने की कोशिश कर रहा है.

इन सभी एक्टरों की मौजूदगी इस साल तब और जबरदस्त हो जाएगी. जब वह दमदार कहानी में सहायक नहीं बल्कि विलेन के प्रमुख रोल में नजर आयेंगी. अक्सर ऐसा कहा जाता है कि एक्ट्रेस बिग स्टार की फिल्मों में कास्ट होकर सेफ प्ले करने का आसान रास्ता अपनाती हैं. लेकिन सिनेमा के बदलते दौर ने एक्ट्रेस को रियलिस्टिक सिनेमा की नई पहचान बना दिया है. फिर चाहे वह विद्या बालन हो या फिर अनुष्का शर्मा.

गौरतलब है कि इस साल रोमांटिक इमेज से हटते हुए यामी गौतम, सोनाक्षी सिन्हा, काजोल और श्रद्धा कपूर मस्ट वॉच इमेज के साथ पेश होने के लिए तैयार हैं. आइए जानते हैं कि कौन सी फिल्में है और इनके निगेटिव किरदार में आने के पीछे की वजह क्या है.

सोनाक्षी सिन्हा

निर्माता शाहरूख खान की फिल्म इत्तेफाक में सोनाक्षी सिन्हा ग्रे शेड किरदार में नजर आयेंगी. पहली बार वह इस तरह की भूमिका निभा रही हैं. अभी तक केवल उन्होंने एक्शन और रोमांटिक फिल्मों में ही हाथ आजमाया है.

कहानी है यूएसपी

सोनाक्षी सिन्हा और सिद्धार्थ मल्होत्रा की यह फिल्म एक मिस्ट्री थ्रिलर होगी. ऐसा बताया जा रहा है कि इस फिल्म में थ्रिलर और एक्शन का स्तर हाई रहनेवाला है. सोनाक्षी भले ही लगातार फिल्में कर रही हैं. लेकिन अभी तक उन्होंने कोई wow फेक्टर वाली फिल्म नहीं की है.

यामी गौतम

रामगोपाल वर्मा की सरकार 3 में वह निगेटिव किरदार में दिखाई देंगी. करियर के लिहाज से यह फिल्म उनके लिए बेहद अहम है. इससे उन्हें खुद को रोमांटिक किरदार से हटकर खुद को नए तरीके से पेश करने का मौका मिलेगा.

गेम चेंजर

काबिल के पहले भी यामी केवल रोमांटिक फिल्मों में दिखाई दे रही थी. सरकार 3 का नतीजा चाहे कुछ भी हो लेकिन यामी के करियर के लिए यह फिल्म गेम चेंजर साबित हो सकती है. अपने करियर की रफ्तार आगे बढ़ाने के लिए भी उन्होंने निगेटिव भूमिका निभाने का फैसला लिया है.

श्रद्धा कपूर

हसीना : द क्वीन आफ मुंबई में श्रद्धा दाऊद इब्राहिम की बहन हसीना पारकर की निगेटिव भूमिका में नजर आयेंगी. अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के मुंबई से चले जाने और अपने पति की हत्या के बाद हसीना पारकर ने इस पूरे कारोबार की बागडोर अपने हाथों में ले ली थी. दक्षिण मुंबई के कई इलाकों में हसीना का दबदबा था.

करियर के लिए रिस्क जरूरी

साल 2010 में अपने करियर की शुरुआत तीन पत्ती से करने वाली श्रद्धा कपूर को 2013 में रिलीज हुई आशिकी 2 ने उनके करियर को एक बड़ा हिट दिया. 2016 उनके लिए निराशा भरी रही. वहीं ओके जानू को भी दर्शकों का साथ नहीं मिला. द क्‍वीन ऑफ मुंबई हसीना से उन्होंने खुद के लिए पहली बार रिस्क लिया है. मुमकिन है कि यह फिल्म श्रद्धा की इमेज के लिए गेम चेंजर साबित हो.

काजोल का कमबैक

साउथ के सुपरस्टार धनुष के साथ काजोल पहली बार स्क्रीन शेयर कर रही हैं. इस फिल्म का निर्देशन रजनीकांत की बेटी सौंदर्य ने किया है. काजोल इसमें बिजनेस वीमेन की भूमिका में दिखाई देंगी.

निगेटिव में दमदार

काजोल लंबे समय बाद वीआईपी 2 में ग्रे शेड किरदार में दिखाई देंगी. इससे पहले वह गुप्त में निगेटिव भूमिका निभा चुकी हैं. दर्शकों को दोबारा उन्हें ग्रे किरदार में देखना दिलचस्प होगा.

इंदिरा गांधी की तरह है नरेंद्र मोदी का करिश्मा

नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उन का करिश्मा 1971 की इंदिरा गांधी की तरह का सा है और वे अपनी ही पार्टी के पुराने नेताओं को छोड़ कर अकेले मुश्किल इलाकों में भी जीत सकते हैं. सब की आंखें वैसे उत्तर प्रदेश की ओर ही लगी थीं और नरेंद्र मोदी ने अकेले धुआंधार प्रचार कर के समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी को धराशायी कर दिया. बिहार वाली कहानी नहीं दोहराई जा सकी.

भाजपा की उत्तर प्रदेश में जीत का मतलब है कि उत्तर प्रदेश शायद जातियों के मकड़जाल से निकल रहा है. भाजपा ने न गरीबों की बात की, न मंडल कमीशन की, न अंबेडकर की, फिर भी जीत गई, तो मतलब है कि अब सिर्फ इसलिए वोट नहीं डाले जाएंगे कि कोई उन की बात कर रहा है.

उत्तर प्रदेश की गरीबी की वजह उस की जाति है. यहां की जनता सैकड़ों जातियों में बंटी है. बहुजन समाज पार्टी ने दलितों को मुहरा बना कर कई बार सत्ता पाई, पर दलित वैसे के वैसे ही रहे. पिछड़े यादवों की सरकारें बनीं, पर यादव व दूसरे पिछड़े वैसे के वैसे ही रहे. कांग्रेस जब तक जीतती रही, वह इन जातियों का हल्ला मचा कर जीतती रही. अब अगर भारतीय जनता पार्टी बिना राम मंदिर जैसे मुद्दे की नाव पर सवार हो कर ही जीती है, तो साफ है कि माहौल बदल रहा है.

भाजपा सरकार पिछली सरकारों से खास अलग है, ऐसा सोचना कुछ ठीक नहीं होगा. हर सरकार लगभग एक सा काम करती है. कुछ भी करो यदि हल्ला ज्यादा हो तो सरकार हाथ खींच लेती है. भाजपा का भगवा रंग तो वैसे भी सभी पार्टियां अपनाती ही हैं. पिछले कुंभ में इलाहाबाद में अखिलेश यादव ने खुद लग कर ऐसा इंतजाम किया था, जो कोई धार्मिक पार्टी करती.

भारतीय जनता पार्टी धीरेधीरे कांग्रेस की जगह ले रही है, पर उसे कांग्रेस की तरह दूसरी जमातों के नेता भी लेने पड़ रहे हैं. यह केवल ब्राह्मणवादी पार्टी नहीं रह गई है और एक बसपा के पहले रहे नेता को उस ने राज्य का अध्यक्ष बनाया था. भाजपा का नया रंग उसे हर जाति के साथ जोड़ रहा है और यही उस की जीत की वजह है.

इन राज्य चुनावों में जीत का मतलब यह न निकाला जाए कि कोई भी पार्टी हमेशाहमेशा के लिए है. राजनीति में कर्मठता का भी काफी योगदान है और अखिलेश यादव व राहुल गांधी ने इन चुनावों में अपनी मेहनत दिखाई, चाहे वे जीत न पाए. फिर भी किसी भी पार्टी के लिए हमेशा के लिए बने रहना मुश्किल है. पंजाब में अकालीभाजपा सरकार का बुरी तरह हारना इसी का सुबूत है.

लोकतंत्र हो या तानाशाही, जब तक जनता खुश न रहे तब तक शासन में रह रहे लोगों से डर कर रहना होगा. भाजपा ने नोटबंदी से लोगों को नाराज किया, पर जवाब में अखिलेशराहुल या मायावती ने ऐसा कोई काम नहीं किया, जो नरेंद्र मोदी के कामों या काम करने की बातों से बेहतर लगता हो.

इन विधानसभा चुनावों में जीत के बाद भाजपा की मनमानी पर और रोक लगेगी. जीत का मतलब होता है जिम्मेदारी. लोग कुछ ज्यादा ही मांगने लगते हैं. हमारे देश में तो लोग चाहते हैं कि सबकुछ पकापकाया मिल जाए. जब नई पार्टी सत्ता में आती है, तो लोगों की मांगें बढ़ जाती हैं. यही मांगें पहले कांग्रेस और फिर समाजवादी पार्टी को ले डूबीं.

अब कांग्रेस बनाएगी अपना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

असलम शेर खान हाकी के जाने माने खिलाड़ी रहे हैं, जिन्हें कांग्रेस ने अपने सुनहरे वक्त में पार्टी में भर्ती कर लिया था. मकसद मुसलमानों को अपने पाले में बनाए रखना था. भोपाल के इस कांग्रेसी खिलाड़ी को केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी जगह दी गई थी, लेकिन असलम जमीनी नेता साबित नहीं हो पाये और धीरे धीरे वे भी सैकड़ों कांग्रेसी नेताओं की तरह गुजरे कल का अफसाना बन कर रह गए.

उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस दुर्गति का शिकार हुई तो उन नेताओं को नए नए आइडिये सूझ रहे हैं जो किसी वजह से दूसरी पार्टी में नहीं जा पा रहे, असलम उनमे से एक हैं. बगैर यूरेका यूरेका चिल्लाये उन्होंने कुछ मीडियाकर्मियों को बुलाया और कांग्रेसी आरएसएस बनाने का एलान कर डाला. बड़ी संजीदगी से उन्होंने बताया कि उनका आरएसएस भी गैर राजनैतिक मंच होगा और धर्मनिरपेक्ष ताकतों की मदद करेगा. हाल फिलहाल यह मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ में ही काम करेगा बगैरह बगैरह.

दूसरी दिलचस्पी की बात उन्होंने यह बताई कि अभी इस कांग्रेसी आरएसएस के बाबत उन्होंने सोनिया राहुल से इजाजत नहीं ली है. असलम शेर खान पर तरस खाने की यह एक पर्याप्त वजह है. जो आरएसएस के माने नहीं समझते कि उसमे और कांग्रेस में बस दिखावे का फर्क है और कांग्रेसी दुर्दशा की वजह भाजपाई आरएसएस नहीं बल्कि वह कांग्रेसी आरएसएस ही है जिसके गठन की कभी विधिवत या औपचारिक घोषणा नहीं हुई.

इस विचार धारा को दुनिया भर में गांधीवाद के नाम से जाना जाता है. यह कांग्रेस की हार नहीं हो रही बल्कि गांधीवाद को समझने की शुरुआत हो रही है. नरेंद्र मोदी ने तो इसकी प्रस्तावना भर लिखी है, उपसंहार तक आते आते तो जाने कितने मंदिर मस्जिद बनेंगे टूटेंगे और मौजूदा दौर के कथित हिंदूवादी जाने कितना विध्वंस कराएंगे.  इस संभावित बरबादी के लिए अब किसी नए आरएसएस की जरूरत नहीं है और न ही वह किसी असलम या अनिल से बनने वाली, हां सत्ता की वासना अगर यह है तो दिल को बहलाने ख्याल बुरा नहीं है. वैसे भी 10 जनपथ और नागपुर में कोई फर्क करने लायक है नहीं.

अधेड़ उम्र में सेक्स लाइफ का रोमांच है ‘खुजली’

एक जमाने में अपने रोमांटिक किरदारों से लोगों के दिलों में जगह बनाने वाले एक्टर जैकी श्रॉफ एक बार फिर फिल्मी परदे पर रोमांस का तड़का लगाएंगे. लेकिन इस बार उनका ये रोमांस थोड़ा बोल्ड होगा. दरअसल सोनम नायर की एक शॉर्ट फिल्म आ रही है ‘खुजली’ जिसमें जैकी श्रॉफ और नीना गुप्ता लीड रोल में होंगे. फिल्म की कहानी अधेड़ अवस्था में पहुंच चुके एक ऐसे कपल की कहानी बताती है जो अपनी सेक्स लाइफ को और रोमांचक बनाना चाहता है.

ये पहली बार है जब नीना गुप्ता और जैकी श्रॉफ किसी फिल्म में साथ नजर आएंगे और नीना इसे लेकर काफी एक्साइटेड हैं. निर्देशक सोनम नायर भी जैकी श्रॉफ और नीना गुप्ता की जोड़ी को लेकर काफी खुश हैं. फिल्म के लिए जैकी और नीना गुप्ता को साइन करने के बारे में पूछे जाने पर सोनम नायर ने कहा कि नीना गुप्ता का ह्यूमर काफी शालीन और व्यंग्यपूर्ण है और कुछ इसी तरह का ह्यूमर जैकी श्रॉफ का भी है.

शूट के दौरान जैकी श्रॉफ और नीना गुप्ता ने काफी एंजॉय किया. कई बार तो निर्देशक को ही उन्हें मजाक छोड़ काम करने के लिए बोलना पड़ता था.

दांत हैं अनमोल, इनका रखें खास ख्याल

दांतों के हलके से दर्द को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए क्योंकि यह हलका दर्द भी किसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है. ठंडागरम लगना, पायरिया, कैविटी, सांस में बदबू और दांतों का बदरंग होना आदि मात्र यही दांतों की बीमारियां नहीं हैं बल्कि खराब दांतों की वजह से आप को गरदन में दर्द, रीढ़ की हड्डी में दर्द, सिरदर्द, दिमागी तनाव, ब्रेन कैंसर और मुंह के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं. अगर गर्भवती महिला के दांतों में कोई गंभीर समस्या है तो गर्भस्थ शिशु पर भी इस का प्रभाव पड़ सकता है. यहां तक कि गंदे और टेढ़ेमेढ़े दांत आप को दिल का रोगी भी बना सकते हैं. आमतौर पर हम दांतों के दर्द को हलके में लेते हैं, कम दर्द हुआ तो नमक और तेल का सहारा व ज्यादा हुआ तो कोई दर्दनिवारक गोली खा ली.

प्रिया ने भी अपने दांत के दर्द को कभी गंभीरता से नहीं लिया. आज वह हर हफ्ते अस्पताल के चक्कर लगातेलगाते परेशान है. क्योंकि उस का सामान्य दर्द अब कैंसर की शक्ल ले चुका है. डैंटल कालेजों के अध्ययन बताते हैं कि गलत लाइफस्टाइल का कुप्रभाव दांतों पर भी पड़ता है. दिल्ली की 80 प्रतिशत आबादी दांतों की किसी न किसी परेशानी से जूझ रही है. दांतों में दिक्कतें बचपन से ही शुरू हो जाती हैं. लेकिन हम ध्यान नहीं देते, जबकि सिर्फ साफसफाई का ध्यान रख कर भी 50 फीसदी दांतों की बीमारियों को दूर रखा जा सकता है.

दांतों की अच्छी तरह सफाई न होने पर उन पर परत जम जाती है. इस में जमा बैक्टीरिया टौक्सिंस बनाते हैं, जो दांतों को नुकसान पहुंचाते हैं. दांतदर्द अपनेआप में कोई बीमारी नहीं है बल्कि आने वाले खतरे का संकेत मात्र है. दांतों के दर्द की शुरुआत आमतौर पर मसूड़ों में सूजन, ठंडागरम लगना और कैविटी लगने से होती है.

ज्यादातर मामलों में दर्द की वजह कैविटी होती है. दांतों के सड़ने पर उस की सतह पर होने वाले छिद्र यानी होल को कैविटी कहते हैं. इस से आसानी से बचा जा सकता है. आप का डाक्टर आसानी से इस का इलाज कर सकता है बशर्ते, इसे शुरुआत में ही पहचान लिया जाए. अगर आप के दांत में काले या भूरे धब्बे दिखाई दें और दांतों में दर्द हो, तो समझ लीजिए कि आप को कैविटी है. अगर आप जल्दी इलाज नहीं कराएंगे तो दांतों में सड़न के साथ ही मसूड़ों में सूजन, जबड़ों में दर्द और सिरदर्द की शिकायत हो सकती है. मीठे खा- पदार्थों से बैक्टीरिया पैदा होता है और इस से दांतों में ब्लैक स्पौट बन जाते हैं. आमतौर पर इसे ही हम कीड़ा लगना कहते हैं. ऐसे में तुरंत डैंटिस्ट के पास जाएं.

दांतों में होने वाले दर्द की जड़

सीनियर डैंटल सर्जन डा. शारदा अरोड़ा कहती हैं कि आजकल मसूड़ों और दांतों में दिक्कत बचपन से ही शुरू हो रही है. इस का एक कारण बच्चों को पिज्जा, चौकलेट, आइसक्रीम और चाउमीन जैसे फास्ट फूड खिलाना है. मुंह की दिक्कतों का सीधा असर शरीर के बाकी हिस्सों पर पड़ता है.

वे कहती हैं कि डायबिटीज के रोगियों को दांतों का ज्यादा ध्यान रखना चाहिए. डायबिटीज का मतलब है रक्त में ग्लूकोज की ज्यादा मात्रा. अगर शुगर कंट्रोल में नहीं है तो दांतों और मसूड़ों पर भी बुरा असर पड़ता है. डायबिटीज के मरीजों में मसूड़ों के खिसकने, इन्फैक्शन और जीभ में जलन होने जैसी दिक्कतें होती हैं. डायबिटीज की बीमारी उन रक्तकणों को नुकसान पहुंचाती है जो शरीर को संक्रमण से बचाने का काम करते हैं.

गम डिजीज

गम डिजीज यानी मसूड़ों की बीमारी एक तरह का इन्फैक्शन है जो दांतों के नीचे हड्डियों तक फैल जाता है. यह एक आम समस्या है जिस के  कारण दांत टूट जाते हैं. गम डिजीज के 2 स्टेज होते हैं. अगर पहले स्टेज पर ही इस का पता चल जाए तो इस से होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है. गम डिजीज से पहले की स्टेज को जिंजीवाइटिस कहते हैं. इस दौरान ब्रश करते समय मसूड़ों से खून आना, मसूड़ों का दांतों के ऊपर निकल जाना, मसूड़ों का लाल होना, सूजन और दर्द, निरंतर सांसों से दुर्गंध आना जैसे लक्षण होते हैं.

प्रैग्नैंट महिलाओं में मसूड़ों की समस्या होना आम बात है. इसलिए उन्हें अपनी सेहत और दांतों का खास खयाल रखना चाहिए. गम डिजीज की दूसरी स्टेज बहुत गंभीर होती है. इस के कुछ लक्षण इस प्रकार हैं– किसी चीज को काटते समय सभी दांतों का समान रूप से नहीं बैठना, मसूड़ों और दांतों के बीच पस बनना, दांतों का गिरना, दांतों और मसूड़ों के बीच बहुत गैप होना आदि. अगर गम डिजीज का इन में से कोई भी लक्षण दिखाई दे तो दांतों को ठीक से ब्रश करें, और तुरंत दांतों के डाक्टर से सलाह लें.

दांत का दर्द

आमतौर पर कुछ खाते समय दांतों में भोजन का अंश फंस जाना, कैविटी, नया दांत निकलना या कोई सख्त चीज काटने के कारण दांतों में क्रैक की वजह से भी दांत में दर्द होने लगता है. इस के लिए गरम पानी से कुल्ला करें और धीरेधीरे दांतों के बीच फ्लौस करें ताकि अगर खाना अटका हो तो वह निकल जाए. अगर दर्द ज्यादा हो तो कोईर् दर्दनिवारक दवा लें, आइसपैक या टौवेल में आइस लपेट कर उसे गालों पर कुछ देर के लिए रखें.

नौक्डआउट टीथ

अगर आप गिर जाते हैं या मुंह में चोट लगती है तो आप के दांत हिल सकते हैं. ऐसे में अगर आप तुरंत ध्यान देते हैं और डैंटिस्ट के पास जाते हैं तो आप के दांत पूरी तरह निकलने से बच सकते हैं. अगर आप को चक्कर आए या आप बेहोशी जैसा महसूस करें या फिर गिरने से कोई और गंभीर चोट आई हो तो तुरंत डैंटिस्ट के पास जाएं.

दांतों में धब्बे

तंबाकू और दूसरी कई खानेपीने की चीजों के कारण दांतों में काले दाग या धब्बे हो जाते हैं. उम्र बढ़ने के साथ ही धब्बे भी बढ़ते जाते हैं. हालांकि इन धब्बों से कोई नुकसान नहीं होता है लेकिन दिखने में ये अच्छे नहीं लगते. वैसे भी हर कोई सफेद चमकते दांत ही चाहता है. इन से बचने के लिए कैमिकलरहित व फ्लोराइडरहित यानी सौ प्रतिशत नैचुरल टूथपेस्ट का इस्तेमाल करें जिस से दाग कम हो सकें. आप डैंटिस्ट के पास जा कर ब्लीच भी करवा सकते हैं लेकिन यह बहुत महंगा पड़ेगा. दूसरे व्हाइटनिंग टूथपेस्ट बहुत धीरेधीरे असर करते हैं, जबकि सौ प्रतिशत नैचुरल टूथपेस्ट बहुत जल्द असर करते हैं.

तनाव का दांतों पर असर

टैंशन का हमारे दांतों पर सीधा असर पड़ता है. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्च के मुताबिक, तनाव में नींद में दांत पीसना और बर्निंग माउथ सिंड्रोम जैसी दिक्कतें हो सकती हैं. दांत पीसने की आदत से दांत टूट सकते हैं. इस से सिरदर्द और जबड़ों में दर्द भी हो सकता है. तनाव, दांत पीसने की वजह बनता है, जिस से दांत बिगड़ जाते हैं. इस के  अलावा बर्निंग माउथ सिंड्रोम में जीभ, होंठ, तालू या पूरे मुंह में जलन महसूस होती है. यह समस्या आमतौर पर वृद्ध महिलाओं में होती है.

दांतों से दिल को खतरा

ओरल इन्फैक्शन में जो बैक्टीरिया होते हैं, वही बैक्टीरिया हार्ट प्रौब्लम का कारण भी होते हैं. एक रिसर्च के मुताबिक, हार्ट अटैक के 40 फीसदी मरीजों में मसूड़ों की दिक्कत पाई गई. इसलिए ओरल इन्फैक्शन को कभी भी हलके में नहीं लेना चाहिए. हार्ट के साथ ही लंग्स इन्फैक्शन भी ओरल इन्फैक्शन के बैक्टीरिया से बढ़ता है. जब दांत खराब होते हैं या मसूड़ों में सूजन होती है तो धमनियां सिकुड़ जाती हैं. इस की वजह से दांतों में मौजूद बैक्टीरिया ब्लड वेसल्स में जा कर उन में भी ब्लौक बना देते हैं और वे संकरी हो जाती हैं. रिसर्च यह भी कहती है कि जिन महिलाओं को मसूड़ों की दिक्कत होती है, उन के मिसकैरिज या प्रीमैच्योर बच्चा होने की आशंका बढ़ जाती है.

सर्वाइकल पेन दांतों की देन

सर्वाइकल पेन और माइग्रेन की वजह आप के दांत भी हो सकते हैं. लंबे समय तक रहना वाला यह इन्फैक्शन जौइंट में दर्द का मुख्य कारण बनता है. डाक्टर नीरजा सिंघला एक सीनियर डैंटिस्ट हैं, उन्हें माइग्रेन और सर्वाइकल पेन की समस्या थी. उन्होंने 10 सालों तक कईर् तरह के इलाज कराए लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

खुद डाक्टर होने के  बावजूद वे समझ नहीं पा रही थीं कि उन के इस दर्द की वजह क्या है. उन्होंने फिजियोथेरैपी का सहारा लिया. लेकिन थोड़ाबहुत ही फायदा हुआ, समस्या जड़ से समाप्त नहीं हुई. इसी दौरान उन की मुलाकात न्यूरो मसक्यूलर डैंटिस्ट डाक्टर संजय अरोड़ा से हुई और तब उन्हें पता चला कि उन के दर्द की जड़ उन के दांत हैं.

डाक्टर संजय अरोड़ा का दावा है कि सर्वाइकल पेन की मुख्य वजह आप के दांतों की बनावट ही है. जब हमारे ऊपर और नीचे के दांत टकराते हैं, तो इस का पूरा दबाव हमारे जबड़े पर पड़ता है. दांतों के टकराने से जबड़े पर अतिरिक्त दबाव बनता है और दांतों तक खून पहुंचाने वाली मुलायम नसें प्रभावित होती हैं. चूंकि जबड़े का संबंध हमारे गले और कंधे से है, इसलिए अतिरिक्त दबाव के कारण ये प्रभावित हो जाते हैं. जिस से कंधे और बैकपेन की दिक्कत होने लगती है. इस के लिए बाकायदा दांतों में फिलिंग की जाती है ताकि दांत टकराएं नहीं और आप के जबड़े को हिलनेडुलने की पूरी जगह मिल जाए.

दांतों के मूवमैंट की एक उचित जगह होती है. लेकिन कैविटी और बिगड़ी हुई लाइफस्टाइल से दांत प्रभावित होते हैं. कई बार शेखी बघारने या दोस्तों को दिखाने के चक्कर में हम अखरोट जैसी कड़ी चीजें भी दांतों से तोड़ने की कोशिश करते हैं लेकिन हमें पता नहीं होता कि इसी दौरान हम सर्वाइकल पेन नाम की नई समस्या खुद अपने लिए तैयार कर लेते हैं. दरअसल, सबकुछ दांतों की बनावट पर निर्भर करता है.

बच्चे के दांतों का रखें ध्यान

बच्चों को फ्लोराइड वाला टूथपेस्ट प्रयोग न करने दें. नवजात शिशु की दूध की बोतल अच्छे से साफ करें, साथ ही सोते हुए उन के मुंह में बोतल न छोड़ें. जितना संभव हो, उन्हें चौकलेट या च्यूइंगम से दूर रखें. हो सके तो बच्चे के मसूड़ों की हाथ से मालिश करें. बच्चों को सौ प्रतिशत नैचुरल टूथपेस्ट का इस्तेमाल करने दें. यदि उसे वे खा भी लेंगे यानी उन के पेट में वह चला जाएगा तो भी किसी तरह का कोई नुकसान नहीं होगा.

क्या करें

– खानेपीने के बाद कुल्ला करें.

– सोते हुए दांत चबाने की आदत है तो गार्ड्स पहनें. इस से दांत घिसेंगे नहीं.

– 6 महीने में दांतों की जांच जरूर कराएं.

–  रोजाना 2 बार ब्रश करें.

– कम से कम 3 मिनट तक जरूर ब्रश करें.

– जीभ को भी साफ करें.

क्या न करें

– खट्टी चीजें ज्यादा न खाएं.

– जंक और पैक्ड फूड ज्यादा खाने से बचें.

– ज्यादा मीठा न खाएं. दांतों में चिपकने वाली चीजों से बचें.

– दांतों पर कुछ भी रगड़ें नहीं. दांतों पर रगड़ने से इनेमल के खराब होने का खतरा होता है.

– उंगलियों से मसूड़ों की मसाज करें.

उत्तर प्रदेश में अबकी बार पूजा पाठ की सरकार

उत्तर प्रदेश में बहुमत की जीत के बाद भाजपा अपने धर्म के एजेंडे को लागू करने के लिये प्रतिबद्व दिख रही है. दिल्ली से लेकर लखनऊ तक नवरात्रि के अवसर पर जिस तरह से मुख्यमंत्री आवास से लेकर लोकसभा तक फलाहार का दौर चला वह शुद्वरूप से धार्मिक एजेंडा है. लोकसभा चुनाव में जिस तरह से वोटों का धार्मिक ध्रुवीकरण हुआ उसके बाद उत्तर प्रदेश में जिस तरह का बहुमत भाजपा को मिला वहां से भाजपा को अब अपने धार्मिक एजेंडे को लागू करने में कोई झिझक नहीं रह गई है. भाजपा अब अपने धर्म के एजेंडें को पार्टी की ‘यूएसपी‘ यानि लोकप्रियता मानकर चल रही है. यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में शुद्व धार्मिक योगी आदित्यनाथ को अपना मुख्यमंत्री बनाया. मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ अपने धर्म के फेस को पूरी तरह से चमकाते दिख रहे हैं.

मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद भी योगी आदित्यनाथ अपने सरकारी आवास 5 कालीदास मार्ग में रहने के लिये नहीं गये. वह वीवीआईपीगेस्ट हाउस में एक पखवारा से अधिक रहे. इस दौरान मुख्यमंत्री के सरकारी आवास में पूजापाठ और शुद्वीकरण जैसे धार्मिक काम किये गये. प्रवेशद्वार पर ओम और स्वास्तिक के निशान बने और सड़क तक को गंगाजल से पवित्र किया गया. एक एक गतिविधि का अप्रत्यक्ष रूप से प्रचार भी किया गया. हालत यह हो गई कि पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को कहना पड़ा कि जब हमारी सरकार आयेगी हम भी आफिस और घर को शुद्व करेंगे. एक व्यक्ति के रूप में देश का संविधान किसी को भी अपने धर्म के हिसाब से रहने की आजादी देता है. आमतौर पर संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों से उम्मीद की जाती थी कि वह धर्म के एजेंडे में बंध कर काम नहीं करेंगे.

धर्म और राजनीति को अलग अलग करके देखा जाता था. 90 के दशक के बाद जब अयोध्या का मंदिर आंदोलन चला तो धर्म और राजनीति एक ही सिक्के के 2 पहलू होकर रह गये. मुसलिम ध्रुवीकरण के लिये जब रमजान के महीनों में रोजा अतार की दावत का जोर चला तो यह मांग भी उठने लगी कि नवरात्रि और दूसरे अवसरों पर इसी तरह किया जाये. नेताओं को अब धर्म का एजेंडा पूरी तरह से पंसद आ गया है. वह जनता का ध्यान दूसरे मुद्दों से हटाकर यही ले आते हैं. जिससे भावनाओं के आधार पर वोट लिये जा सके.

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में केवल मुख्यमंत्री और उनके सरकारी आवास पूजापाठ का दौर नहीं हुआ बाकी मंत्रियों ने भी उसी पंरपरा का पालन किया. असल में कुछ सालों से सभी पार्टियां धर्म के सहारे वोट की फसल काटने की राह पर चल रही हैं. ऐसे में कोई दूसरे को बुरा नहीं कहता. पहले धर्म और राजनीति को अलग अलग करके देखा जाता था. वामपंथी और समाजवादी दोनों विचारधारा इस बात की प्रबल समर्थक थी कि धर्म को राजनीति से दूर रखा जाये. धार्मिक कट्टरपंथ का भी खूब विरोध होता था. बसपा ने भी अपने शुरुआती दिनों में इस विचारधारा को बनाये रखा.

मंदिर आन्दोलन के बाद सभी दल धर्म के नाम पर वोट की फसल काटने में लग गये. ऐसे में विचारधारा की राजनीति खत्म हो गई. राजनीति में व्यक्तिवाद और अवसरवाद शामिल हो गया. अब धर्म का विरोध खत्म हो गया. ऐसे में धर्म की राजनीति शुरू हो गई. भाजपा ने इसे हिन्दुत्व की शक्ल दे दी. अयोध्या में मंदिर विध्वंस के बाद भाजपा को जनता का बहुत समर्थन नहीं मिला जिससे उसे अपने धर्मिक एजेंडे पर चलने में असमंजस हो रहा था. विरोधी दल यह मान रहे थे कि जैसे ही भाजपा ने हिन्दुत्व या राममंदिर का नाम लिये वह हाशिये पर चली जायेगी.

भाजपा ने बहुत ही चतुराई से राजनीतिक दलों के सामाजिक और जातीय आधार में सेंधमारी लगाई. भाजपा ने पिछडी और दलित जातियों में हिन्दुत्व की भावना को जाग्रत किया. लोकसभा में जीत बाद भाजपा का हौसला बढ़ गया. उत्तर प्रदेश की जीत ने भाजपा में नई चेतना का संचार किया है. अब भाजपा इस राह पर चलने के लिये पूरी तरह से तैयार है. विरोधियो की मजबूरी है कि वह खुद धर्म के एजेंडे पर चले हैं, ऐसे में वह खुलकर भाजपा के धर्म के एजेंडे का विरोध नहीं कर पा रहे हैं. जनता फिलहाल खुश है. पर अगर भाजपा केवल धर्म के एजेंडे पर ही चलती रही तो जनता को मोह भंग हो सकता है क्योकि धर्म के एजेंडे से चल कर देश और समाज का भला नहीं हो सकता है.

करोड़ों के नाटक, हजारों के टिकट और शो हाउसफुल

 

के आसिफ ने जब 1960 में ‘मुगल-ए-आज़म’ फ़िल्म बनाई तब उसका बजट 1.5 करोड़ था. रिचर्ड एटनबरा की फ़िल्म गांधी का बजट 2.2 करोड़ अमरीकी डॉलर था. अभी कुछ हफ़्ते पहले रिलीज़ हुई हॉलीवुड की फ़िल्म ‘ब्यूटी एंड द बीस्ट’ का बजट 16 करोड़ अमरीकी डॉलर था. इन तीनों फ़िल्मों में एक समानता है. ये तीनों विषय मंच पर म्यूज़िकल नाटक के रूप में प्रस्तुत हो चुके हैं. इन म्यूज़िकल नाटकों का बजट एक करोड़ से लेकर करीबन 3.5 करोड़ तक पहुंचा है. जो नाटक इतने बड़े बजट में बने हैं उनके टिकट भी महंगे बिके. ‘मुगल-ए-आज़म’ के टिकट 500 से शुरू हो कर 7,500 रुपए तक बिके. और इसके सारे शो हाउसफ़ुल हुए हैं.

हेड-लाइव एंटरटेनमेंट डिज़्नी इंडिया और ‘ब्यूटी एंड द बीस्ट’ नाटक के निर्देशक विक्रांथ पवार का कहना है, “इतने बड़े नाटक को बनाने का प्रॉसेस जटिल होता है. इस प्रोडक्शन में एक साथ 80 लोग मंच पर परफॉर्म कर रहे थे. पूरे शो के लिए 200 लोग काम कर रहे थे. लाइव एंटरटेनमेंट के विकल्प वैसे भी कम हैं और लोग उन्हें देखना पसंद करते हैं.”

अभिनेता बोमन इरानी ‘गांधी-द म्यूज़िकल’ के साथे जुड़े हैं. उनका कहना है, “लोग न्यूयॉर्क में ब्रॉड-वे देखने के लिए अगर पैसा खर्च करते हैं तो अपने देश के बड़े प्रोडक्शन्स क्यों नहीं देखेंगे? पश्चिम से तुलना करें तो हमारे यहां तो ऐसे बड़े म्यूज़िकल्स के लिए जगहों के विकल्प भी कम हैं. ऐसे में तीन बड़े म्यूज़िकल बनना कतई छोटी बात नहीं है. भारतीय विषयों और संगीत से बनते ये म्यूज़िकल्स दर्शक पसंद कर रहे हैं.”

नीपा जोशीपुरा को जब ‘मुगल-ए-आज़म’ नाटक देखना था तब टिकट की क़ीमत देख सोच में तो पड़ी थीं, लेकिन आख़िरकार उन्होंने टिकट ख़रीद ही लिया. उन्होंने कहा, “ऐसे नाटक बार-बार नहीं आते. संगीत, नृत्य और नाट्य तीनों का इतना अच्छा मेल देखना है तो फिर पैसों के बारे में क्यूं सोचना! आप पूरा समय उस विषय के माहौल में रहते हैं. प्रोडक्शन में कहीं समझौता नहीं किया गया. मुझे ये ‘लार्जर दैन लाइफ़’ अनुभव लगा.” सिली पॉइंट प्रोडक्शन के ‘गांधी द म्यूज़िकल’ में 15 नए गाने हैं और क्रू को मिला कर 60 लोग इसे प्रस्तुत करते हैं.

एक फोटो के चलते एक्ट्रेस बन गई गांव की ये लड़की

बॉलीवुड एक्ट्रेस और मॉडल सारा गुरपाल एक कार्यक्रम के सिलसिले में चंडीगढ़ पहुंचीं. इस दौरान उन्होंने मॉडलिंग में आने के पीछे की कहानी शेयर की. बताया कैसे हरियाणा के रतिया गांव की लड़की एक फोटोग्राफर के चलते मॉडल बनी और फिर एक्ट्रेस. बॉलीवुड मूवी ‘ड्रामा क्वीन’ एक्ट्रेस सारा ने बताया कि एक बार वो कॉलेज परफॉर्मेंस की तैयारी में स्टेज के पीछे बिजी थी, तभी फोटोग्राफर ने लाइट चेक करने के लिए बुलाया. इस दौरान सारा की कुछ फोटोज खींची, जो बेहतरीन थीं. फिर उन्होंने फोटोग्राफर के कहने पर अपना फोटोशूट कराया. इस इंसीडेंट के बाद से सारा को कॉन्फिडेंस आया और उन्होंने ब्यूटी कॉन्टेस्ट में अप्लाई किया और विनर भी बनीं. बाद में सारा 2012 में मिस चंडीगढ़ भी बनीं.

फैशन डिजाइनिंग की पढ़ाई खत्म कर सारा ने सबसे पहले कॉमर्शियल्स और पंजाबी वीडियोज में काम करना स्टार्ट किया. इंडियन क्लासिकल डांस सीखने के दौरान वो यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ इंडियन थिएटर का भी हिस्सा रहीं. अपने 6 साल के करियर में ब्यूटी कॉन्टेस्ट जीतने के बाद उन्होंने ने अब तक कई म्यूजिक वीडियोज, कॉमर्शियल्स और एक्टिंग शूट में काम किया है.

सारा ने कहा कि मैं खुद को एक आर्टिस्ट के तौर पर देखती हूं न कि किसी मॉडल के रूप में. मैंने खुद को किसी एक जोनर में नहीं बांधा क्योंकि मुझे लगता है कि एक आर्टिस्ट को वर्सेटाइल होना चाहिए. उसे हर वो चीज करनी चाहिए जो उसका मन करता है. उन्होंने कहा कि मॉडलिंग और एक्टिंग दोनों ही फील्ड एक दूसरे से अलग हैं. काम करने के तरीके से लेकर बाकी सभी चीजों में. जैसे प्रोफेशनलिज्म, लोगों का बर्ताव, काम करने के तौर-तरीके और नजरिए तक का फर्क मिला. मॉडलिंग में कई बार न चाहते हुए भी कुछ ऐसी चीजें करनी पड़ जाती हैं जिनके बारे में सोचा नहीं होता. वहीं एंटरटेनमेंट की दुनिया में ऐसा नहीं है. अगर आप पॉजिटिव हैं.

कटप्पा ने खुद बताया क्यों मारा बाहुबली को

सिनेमाई संसार की सर्वाधिक चर्चित और बहुप्रतिक्षित फिल्म बाहुबली-2 के जरिए वैश्विक प्रश्न बन चुका ‘कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा’ का जवाब अब मिलने वाला है. बिना किसी शक के बाहुबली 2 बहुप्रतिक्षित फिल्मों में से एक है जिसका इंतजार दर्शकों को काफी लंबे समय से है. इस फिल्म को इतना सीक्रेट रखा गया है जैसे कि यह ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट के अंतर्गत आती हो. लेकिन अब महिष्मति ने इसके राज बताने शुरू कर दिए हैं.

कटप्पा की भूमिका निभा रहे अभिनेता सत्याराज ने स्वयं अब इस प्रश्न का जवाब दिया है कि ऐसी कौन सी परिस्थिति रही जिसके चलते उसने बाहुबली को मार गिराया. कटप्पा केवल बाहुबली का किरदार नहीं है, वो इंटरनेट मेम्स का स्टार बन चुका है. उस पर मिलियन जोक्स बन चुके हैं और उनसे अमूमन जो सवाल पूछा जाता है वो है कि आखिर कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा.

अगर आप अप्रैल में फिल्म के आने का इंतजार नहीं कर सकते तो हम आपको इसका जवाब बता देते हैं. सत्याराज ने बताया कि उनसे कई बार यह सवाल पूछा जाता है लेकिन इससे वो खीझते नहीं हैं. पूरी दुनिया मुझसे पूछ रही है कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा. मुझे अब सवाल के बार-बार पूछे जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता है.

हाल ही में यही सवाल एक पत्रकार ने जब सत्याराज से किया जो फिल्म में कटप्पा का किरदार निभा रहे हैं, तो उन्होंने कहा क्योंकि मेरे निर्देशक ने मुझे ऐसा करने के लिए कहा था.

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