भगवा नहीं कारपोरेट रंग में रंगे योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश के भगवाधारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने पहनावे, रहन-सहन और विचारों से भले ही आधुनिक संस्कृति का विरोध करते नजर आते हों, पर सरकार की कार्यशैली को वह ‘कारपोरेट रंग’ में रंग देना चाहते हैं. मुख्यमंत्री खुद भले ही भगवाधारी हों, पर अपने कर्मचारियों को वह ड्रेस कोड में देखना चाहते हैं. जींस और टीशर्ट के साथ सैंडल पहनने से मनाही कर दी गई है. धूम्रपान मना है. समय से आफिस आना जाना है. सरकार इस प्रयास में है कि कर्मचारियों की उपस्थित को बायोमैट्रिक किया जाये. देखने में यह बदलाव जितना सुखद है हकीकत में यह बदलाव इतना सरल नहीं है.

मंत्रियों, विधायकों, छोटे बड़े अफसरों की पूरी जानकारी योगी साफ्टवेयर पर रखना चाहते हैं, जिससे एक क्लिक से वह किसी के बारे में भी पूरी जानकारी हासिल कर सकें. सरकारी विभागों को यह कह दिया गया है कि वह अपने कामकाज और आने वाली योजनाओं को पावर प्वांइट में बनाकर मीटिंग में पेश करे. इसकी एक कापी मुख्यमंत्री कार्यालय के पास होगी. विभागों की समीक्षा भी पावर प्वाइंट प्रजेंटेंशन के जरीये होगी. सभी फाइलों को डिजीटल फार्म में रखने का काम शुरू करके सरकारी आफिस को फाइल मुक्त करने की पूरी तैयारी है.

कामचोरी, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी में लिप्त सरकारी नौकरशाही और नेता कैसे सुधरेंगे, यह देखने वाली बात है. योगी सरकार उत्तर प्रदेश में कारपोरेट कार्यशैली लाना चाहती है पर उसके पास कोई ठोस सांचा नहीं बन पा रहा है. सुबह मीटिंग और देर रात तक प्रेजेंटेशन चलने के मैराथन प्रसास के बाद भी 20 दिनों में सरकार के कामकाज कोई ठोस शक्ल उभर कर नहीं आ पाई है. सरकार अपने प्रयासों से उपरी चमकदमक तो दिखाने में सफल हो रही है पर सही मायनों में कोई राहत मिलती नहीं दिख रही है.

योगी की सबसे बड़ी चुनौती अब उनके पुरातनवादी विचार हैं जिसको वह अब तक ढोते रहे हैं. अपने भाषणों में वह एक मुख्यमंत्री से ज्यादा धार्मिक गुरू सा प्रवचन देते नजर आ रहे हैं. जिसमें यह बारबार वह ईश्वर की महिमा के जरीये समस्याओं के समाधान की बात करते दिखते हैं. असल में अगर सबकुछ भगवान के भरोसे ही होना है तो इस पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन का क्या अर्थ रह जाता है. पहले के प्रधानमंत्री राजीव गांधी जब कम्प्यूटर को भारत में लाये तो भाजपा और उसके जैसे पुरातनवादी विचारधारा के लोग इसके प्रबल विरोधी थे. कम्प्यूटर को बेरोजगारी का सबसे बडा माध्यम बताया गया था.

आज पुरातनवादी विचारधारा के समर्थन करने वाले ही नहीं तमाम साधू, संत, बाबा तक कंम्यूटर के दीवाने हो गये. योगी आदित्यनाथ जब मुख्यमंत्री बने तो उनके विषय में यह जानकारियां आने लगी कि वह कम्प्यूटर ही नहीं सोशल मीडिया के सबसे बडे समर्थक हैं. अपने ईमेल के जवाब खुद देते हैं. गोरखपुर के मंदिर में अपने निवास में योगी आदित्यनाथ खुद का बड़ा मीडिया सेंटर मैनेज करते हैं. जिसके जरीये वह अपने लेख, संदेश लोगों तक पहुंचाते हैं.

एक तरफ मुख्यमंत्री आधुनिक संचार शैली के दीवाने हैं, दूसरी तरफ वह मुख्यमंत्री आवास में तब तक रहने नहीं गये जब तक उसका शुद्वीकरण नहीं हो गया. तमाम आफिसों में पूजापाठ कराया गया. यह सब कराने का कारण यह था कि सरकार के आचार और विचार बदल जायें. अगर इस तरह से ही सरकार के आचार और विचार बदलने हैं तो आधुनिक कंप्यूटर प्रणाली, पावर प्रजेंटेंशन की क्या जरूरत है? असल में योगी सरकार ने प्रदेश में जिन अपेक्षाओं को जगा दिया है उनको पूरा करना उसके बस से बाहर है. ऐसे में योगी सरकार हर दिशा में हाथ पांव मार रही है. जिससे जनता में इस उम्मीद को कायम रखा जा सके कि सरकार उसके लिये काम कर रही है. इसका जमीन पर कोई प्रभाव दिखेगा यह मुश्किल दिख रहा है.

सबसे बड़ा सैक्स सिंबल कहलाना पसंद है : रणवीर

एनर्जैटिक और हंसमुख रणवीर सिंह मुंबई से हैं. अभिनय उन का पैशन है, लेकिन कालेज के दिनों में कई बार उन्हें लगा था कि अभिनय का खयाल करना उन के लिए ठीक नहीं. इसलिए वे लेखन के क्षेत्र में उतरे. जब वे विदेश पढ़ाई के लिए गए, तो एक बार फिर अभिनय की ओर आकर्षित हुए, जहां उन्होंने कई नाटकों में काम किया और खूब प्रशंसा पाई. इस के बाद वे भारत आए और अभिनय की ओर रुख किया. कई औडिशन के बाद उन्हें यशराज की फिल्म ‘बैंड बाजा बारात’ मिली. यहीं से उन के अभिनय की शुरुआत हुई. उन की अभी तक की फिल्मों में ‘बाजीराव मस्तानी’ उन की एक यादगार फिल्म है, जिस में उन्होंने बाजीराव की भूमिका बखूबी निभाई. उन्हें सब से बड़ा सैक्स सिंबल कहलाना पसंद है.

फिल्म ‘बेफिक्रे’ के किरदार से अपनेआप को कैसे रिलेट करते हैं?

‘बेफिक्रे’ एक फिलौसफी है, जिस का अर्थ जीवन है अधिक सोचना नहीं वर्तमान में जीना. मेरे हिसाब से पूरी तरह जीया जाना चाहिए. मैं जब फिल्में करता हूं या दोस्तों, परिवार वालों से मिलता हूं, तो पूरी तरह उन के साथ रहता हूं. इस के अलावा जो दिल में आए उसे करना पसंद करता हूं.

आप अपनी सफलता को कैसे देखते हैं?

सफलता की परिभाषा मेरे लिए अलग है. मैं ने औरों के लिए क्या किया, समाज को क्या वापस किया, कितनी अच्छाई आप चारों ओर बिखेर रहे हैं? ये सब देखता हूं. इस के अलावा क्या मैं अपनी शर्तों पर काम कर सकता हूं? मेरी सफलता छोटी है. अपने टर्म पर जो लाइफ को जीए, वही इंसान सफल है. मुझे नहीं लगता कि मैं सफल हूं. हालांकि कई फिल्में सफल हुई हैं पर मैं अभी लार्जर विजन से दूर हूं.

पेरिस की शूटिंग का अनुभव कैसा था?

वहां मेरे लिए निर्देशक ने एक आलीशान अपार्टमैंट खरीद दिया था. बहुत ही अच्छा अनुभव था. जगह बहुत खूबसूरत है. वहां के लोग भी बहुत अच्छे हैं. वहां का खाना, वहां की बोली अद्भुत है. मूड भी वैसा ही रहा.

क्या आप को स्टारडम खत्म हो जाने का डर कभी सताता है?

अभी तक सोचा नहीं है. मैं हमेशा चाहता हूं कि मुझे काम मिलता रहे. ‘मनी’ और ‘फेम’ मुझे कभी भी आकर्षित नहीं करती. मुझे पैसा पसंद है जिस से मुझे हर तरह का ऐशोआराम मिल रहा है. ये सही है कि जितना अधिक पैसा और प्रसिद्धि आप के पास रहेगी, जिंदगी उतनी ही कठिन होगी, जिस में आप के खुद का व्यक्तित्व प्रभावित होता है.

गोआ और मणिपुर में राजनीतिक खरीदफरोख्त

उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में अपने बलबूते पर सरकार बना कर भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष को बड़ा झटका दिया है. लेकिन गोआ और मणिपुर में खरीदफरोख्त कर सरकारें बना कर उस ने अपनी प्रतिष्ठा पर नाहक दाग लगवाया है. रातोंरात विधायकों या छोटे दलों को फुसलाया न जाता तो भी वहां भाजपा की ही सरकारें बनतीं और मामला लोकतांत्रिक ही लगता. जब एक पार्टी की नदी बड़ी बन रही होती है तो छोटे नालों और नदियों से पार्टियां या इक्केदुक्के विधायक अपनेआप उस में आ मिलते हैं. कांग्रेस में टूट का इंतजार कर भाजपा आराम से सरकार बना सकती थी. उत्तराखंड में भाजपा एक बार ऐसी गलती कर चुकी है जिस से उस की किरकिरी हुई थी. पर उस ने बाद में समझौता कर लिया था. अब, उस का अच्छा परिणाम मिला.

भारतीय जनता पार्टी की आंधी अब उस तेजी से बढ़ रही है कि दूसरे दल उस के साथ बहने को ही सही समझेंगे. देश में कुछ साल एक ही पार्टी का राज रहेगा, यह पक्का है. 60, 70 व 80 के दशकों में जो बुद्धिजीवी गैरकांग्रेसवाद का झंडा उठाते थे, उन्हें अब गैरभाजपावाद के झंडे को उठाने का मौका मिल रहा है. राजनीति में यह चलता है और दुनिया के सब देशों में ऐसा होता रहता है.

छोटे राज्यों को हड़पने की कोशिश में भाजपा ने संदेश दिया है कि वह किसी भी कीमत पर एकछत्र राज चाहती है. हालांकि, यह नीति बहुत कामयाब नहीं रहती क्योंकि एकछत्र राज में दंभ और निरंकुशता दिमाग पर हावी हो जाती है. फिर गुस्सा कहीं, किसी और रूप में फूटता है, तब उसे संभालना कठिन हो जाता है जैसा इंदिरा गांधी के साथ 1973-1974 में होने लगा था.

20 मिनट का क्लाइमैक्स शूट करने में 30 करोड़ खर्च

कटप्‍पा ने बाहुबली को क्‍यों मारा? इस सवाल का जवाब लोगों को अब तक नहीं मिला है. हालांकि माना जा रहा है कि अब फिल्म का सेकंड पार्ट ‘बाहुबली: द कन्क्लूजन’ रिलीज होने के बाद सभी को इसका जवाब मिल जाएगा. बता दें कि यह फिल्म 28 अप्रैल 2017 को रिलीज हो रही है. वैसे अगर फिल्म की बात करें तो तो इसका बजट करीब 250 करोड़ रुपए है. फिल्म से जुड़ी ऐसी कई बातें हैं जो लोग नहीं जानते. आज हम बता रहे हैं ‘बाहुबली-2’ के कुछ ऐसे ही इंटरेस्टिंग फैक्ट्स.

बाहुबली-2 के क्लाइमैक्स सीन को शूट करने में करीब 30 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं. यह सीन 20 मिनट का है. फिल्म के फर्स्ट पार्ट में क्लाइमेक्स सीन को शूट करने की लागत करीब इससे आधी यानी (15 करोड़ रुपए) आई थी.

बाहुबली के डायरेक्टर एसएस राजामौली के मुताबिक इस फिल्म का तीसरा पार्ट भी बनेगा. हालांकि इसके बारे में अभी किसी भी तरह की डिटेल सामने नहीं आई है. राजामौली के मुताबिक मुझे लगता है कि फिल्म में क्लियरिटी देने के बजाय कन्फ्यूजन ज्यादा हो गया है. इसके लिए मैं माफी चाहता हूं. हालांकि इसके दो पार्ट में जो कहानी है, उसे अब नहीं खींचा जाएगा. बाहुबली-3 को नए सिरे से बनाया जाएगा. खासतौर पर इस फिल्म को देखकर लोगों को जो एक्सपीरियंस होगा, वो पहले कभी नहीं हुआ होगा.

फिल्म के सभी सेटेलाइट राइट्स करीब 78 करोड़ रुपए में बिके हैं. देशभर में यह फिल्म करीब 6500 स्क्रीन्स पर रिलीज होगी. इसके हिंदी राइट्स करीब 120 करोड़ रुपए और विदेशी राइट्स 52 करोड़ रुपए में बिके हैं. सेटेलाइट और थिएट्रिकल राइट्स की वजह से यह फिल्म रिलीज से पहले ही 500 करोड़ रुपए की कमाई कर चुकी है.

माना जा रहा है कि फिल्म के चार क्लाइमेक्स तैयार किए गए हैं. उन्हीं में से किसी एक को फिल्म में रखा गया है. हालांकि डायरेक्टर ने क्लाइमेक्स की जानकारी लीक नहीं होने दी है.

सोनी टीवी ने बाहुबली-2 (हिंदी वर्जन) के सेटेलाइट राइट्स रिकॉर्ड 51 करोड़ रुपए में खरीदे हैं. यह किसी भी डब फिल्म के लिए मिलने वाली अब तक की सबसे बड़ी रकम है. इसकी टीवी स्क्रीनिंग के लिए भी चैनल ने बड़ी रकम खर्च की है.

‘बाहुबली’ का वॉटरफाल (झरने) वाला सीन तो सभी को याद है. माना जा रहा है कि वैसा ही सीन फिल्म के सेकंड पार्ट में भी रखा गया है. इसके अलावा कुछ वॉर सीन्स भी हैं.

एक्टर प्रभास ने फिल्म ‘बाहुबली’ के फर्स्ट पार्ट के बाद से अगले 4 साल के पीरियड में कोई दूसरी फिल्म साइन नहीं की है. यहां तक कि उनकी फैमिली और फ्रेंड्स भी उनके इस फैसले से नाखुश थे और उन्होंने प्रभास को इतना बड़ा रिस्क लेने से पहले चेताया भी था. लेकिन आखिर में ऐसा लगा कि यह सब वाकई में जरूरी था.

भले ही लोगों का मानना है कि ‘बाहुबली’ एक परफेक्ट फिल्म है, लेकिन असलियत में कहानी कुछ और ही है. दरअसल, फिल्म के सिनेमेटोग्राफर केके सेंथिल कुमार के मुताबिक, फिल्म के फर्स्ट पार्ट में कई वीएफएक्स एरर थी. उनके मुताबिक वो CGI (कम्प्यूटर ग्राफिक्स इमेज) में मेजर इश्यू की वजह से बेहद निराश थे. हालांकि फिल्म के सेकंड पार्ट में इन गलतियों को सुधार लिया गया है.

फिल्म ‘सुल्तान’ और ‘दंगल’ में सलमान और आमिर खान की तरह ‘बाहुबली-2’ में प्रभास ने अपना वजन करीब 30 किलो बढ़ाया. बाहुबली के फर्स्ट पार्ट में जहां प्रभास का वजन 120 किलो था, वहीं इसके सेकंड पार्ट में उनका वेट करीब 150 किलो रहा. इसके लिए दो डायटीशियन और ट्रेनर ने उनकी मदद की. इतना ही नहीं फिल्ममेकर्स ने उनकी एक्सरसाइज के लिए करीब 1.5 करोड़ रुपए के इक्विपमेंट्स खरीदे.

बाहुबली-2 में विजुअल एक्सपीरियंस को और मजेदार बनाने के लिए आईमैक्स फॉर्मेट में रिलीज किया जाएगा. इतना ही नहीं फिल्म में वर्चुअल रियलिटी एक्सपीरियंस के लिए करीब 200 थिएटर्स में इसे 4K High Definition format में रिलीज किया जाएगा. इससे ऑडियंस फिल्म की भव्यता को और बेहतर तरीके से देख सकेंगे.

फिल्म बाहुबली-2 के इंटरनेशनल वर्जन को हॉलीवुड मूवी ‘इनक्रेडिबल हल्क’ के एडिटर विंसेंट टैबिलोन ने एडिट किया है. विंसेट को क्लैश ऑफ द टाइटंस, टेकन 2 और नाऊ यू सी मी जैसी फिल्मों के लिए जाना जाता है.

‘बुक माय शो’ की एडवांस बुकिंग के मामले में भी ‘बाहुबली-2’ रिकॉर्ड बनाने के करीब है. यह जल्द ही ‘दंगल’ का रिकॉर्ड तोड़ देगी.

पौजिटिविटी मेरी सब से बड़ी ताकत : कियारा आडवाणी

फिल्म ‘फगली’ से अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत करने वाली अदाकारा कियारा आडवाणी मानती हैं कि अब फिल्मों में हीरोइनों का रूप बदल गया है. अब हीरोइनों का काम सिर्फ पेड़ के इर्दगिर्द नाचगाना भर नहीं रहा. वे भी अपरोक्ष रूप से फिल्मी दुनिया से ही हैं. अशोक कुमार उन के परनाना थे, जबकि जूही चावला, सईद जाफरी और अनुराधा पटेल से भी उन का नाता है. जहां तक अभिनय का सवाल है तो कियारा आडवाणी की सब से बड़ी खासीयत यह है कि अब तक उन की 3 फिल्में आई हैं और तीनों ही फिल्मों में उन्होंने अलग तरह के किरदार निभाए हैं. हास्य फिल्म ‘फगली’ में कियारा युवा आत्मविश्वासी लड़की देवी के किरदार में नजर आईं, जबकि बायोपिक ‘एम एस धोनी अनटोल्ड स्टोरी’ में एक साधारण लड़की व धोनी की पत्नी साक्षी के किरदार में नजर आईं. अब वे रोमांचक फिल्म ‘मशीन’ में ऐक्शन करते हुए नजर आई हैं. प्रस्तुत हैं उन से हुई बातचीत के खास अंश :

आप के दिमाग में अभिनय की बात कब आई?

बचपन से ही. मेरे मातापिता फिल्मों से नहीं जुड़े हैं. वे तो व्यवसाय व शिक्षाजगत से संबंध रखते हैं. मेरी मां जेनवी जाफरी अपना प्ले स्कूल चलाती हैं और पिता जगदीप आडवाणी व्यवसायी हैं. मेरी पढ़ाई मुंबई में ही हुई है, लेकिन मेरे परनाना अशोक कुमार बौलीवुड के महान कलाकार थे. आज भी लोग उन्हें दादामुनि के नाम से जानते हैं. बचपन से ही मुझे नाचगाने का शौक रहा है. मैं माधुरी दीक्षित, करिश्मा व करीना कपूर की फैन रही हूं. पर मातापिता के दबाव के चलते मैं ने पढ़ाई पर ध्यान दिया. मैं ने मास कम्युनिकेशन में स्नातक की पढ़ाई की. उस के बाद मैं ने फिल्मों में काम पाने के लिए औडिशन देना शुरू किया. मुझे पहली फिल्म ‘फगली’ मिली. उस के बाद मैं ने ‘एम एस धोनी : अनटोल्ड स्टोरी’ में साक्षी का किरदार निभाया. अब हालिया प्रदर्शित फिल्म ‘मशीन’ में एकदम अलग किरदार में नजर आई हूं.

आप के पिता ने आप को अभिनय को कैरियर बनाने की इजाजत दी?

इस का श्रेय आमिर खान की फिल्म ‘थ्री इडिएट्स’ को जाता है. इस फिल्म को देखने के बाद मेरे पिता ने कहा कि पढ़ाईर् पूरी करने के बाद अपनी पसंद का कैरियर चुन सकती हूं. मास कम्युनिकेशन में स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मैं ने अनुपम खेर के ऐक्ंिटग स्कूल से अभिनय की ट्रेनिंग हासिल की. रोशन तनेजा के ऐक्ंिटग स्कूल से भी मैं ने प्रशिक्षण लिया.

अभिनय की शुरुआत करना कितना कठिन रहा?

देखिए, जब फिल्म इंडस्ट्री में आप का कोई गौडफादर न हो, तो परेशानी का सामना तो करना ही पड़ता है. जब मैं औडिशन दे रही थी और बारबार असफल हो रही थी, तभी मेरी दूसरी नानी की बेटी अनुराधा पटेल ने फोन कर मेरे फोटोग्राफ मांगे थे और वे फोटोग्राफ अपने मित्र कबीर सदानंद को दिए जो फिल्म ‘फगली’ के निर्देशक थे. उस के बाद कबीर सदानंद ने मुझे औडिशन के लिए बुलाया और मेरा चयन हो गया.

मैं तो यह भी मानती हूं कि यदि आप स्टार डौटर हैं तब भी कठिनाई आती है, क्योंकि दर्शकों द्वारा आप को स्वीकार किया जाना जरूरी है. दर्शक ही असली राजा है. इसलिए मेरी राय में सिर्फ कठिन परिश्रम करना ही एकमात्र उपाय है. इसलिए मैं ने ‘फगली’ और ‘एम एस धोनी : अनटोल्ड स्टोरी’ के समय कहा था कि फिल्म देखिए. दोनों ही फिल्मों में लोगों ने मेरे काम को सराहा.

मुझे तब बहुत खुशी मिलती है जब लोग सड़क पर मिलते हैं और मुझे साक्षी कह कर बुलाते हैं. मैं खुद चाहती हूं कि लोग मुझे मेरे काम की वजह से पहचानें. इन दिनों फिल्म ‘मशीन’ में मेरे काम को काफी पसंद किया जा रहा है.

फिल्म ‘मशीन’ के किरदार को ले कर क्या कहेंगी?

इस फिल्म में मैं ने एक शहरी लड़की सारा का किरदार निभाया है, जो अंदर से काफी रोमांटिक है, पर बाहर से सशक्त है. वह जिस से प्यार करती है, उस पर सबकुछ न्योछावर कर देती है. उसे अपने प्यार को पाने के लिए लड़ना भी आता है. निजी जिंदगी में मैं भी ऐसी ही हूं. इसलिए इस किरदार के साथ मैं ने रिलेट किया. सारा का व्यक्तित्व बहुत कवितामय है. यह फिल्म प्रेम कहानी पर आधारित है.

फिल्म का नाम ‘मशीन’ क्यों रखा?

यह मेटाफोर है. ‘मशीन’ एक रोमांचक फिल्म है. फिल्म में हर 15 मिनट में टर्निंग पौइंट है. रोमांचक फिल्में मुझे भी बहुत पसंद हैं. इसलिए इस फिल्म में काम करने में मुझे मजा आया. इस फिल्म में सस्पैंस भी है.

यह फिल्म कैसे मिली?

मुझे इस फिल्म के लिए औडिशन नहीं देना पड़ा, जबकि मुझे अपनी पहली फिल्म ‘फगली’ और दूसरी फिल्म ‘एम एस धोनी : अनटोल्ड स्टोरी’ के लिए औडिशन देना पड़ा था. मुझे लगता है कि इस की मूल वजह यह है कि 2 फिल्मों में मेरा काम देख कर बौलीवुड के सारे फिल्मकार मेरी प्रतिभा का आकलन कर चुके हैं. यदि कभी भी कोई फिल्मकार चाहेगा कि मैं औडिशन दूं तो मैं औडिशन देने के लिए तैयार हूं. मुझे औडिशन देने में कोई समस्या नहीं है, जबकि मुझे पता है कि अब्बास मस्तान अपनी फिल्म के साथ किसी कलाकार को जोड़ने से पहले दस बार सोचते हैं. यहां तक कि फिल्म के हीरो मुस्तफा ने भी अपनी अभिनय व नृत्य प्रतिभा की एक शो रील बना कर अपने पापा को दिखाई थी.

फिल्म में एक गाना है, ‘तू चीज बड़ी है मस्तमस्त…’ कई साल पहले इसी गाने पर थिरक कर रवीना टंडन ने काफी शोहरत बटोरी थी. आप के क्या अनुभव रहे?

मुझे इस गाने पर नृत्य करने का मौका मिला यही मेरे लिए अच्छी बात है. यह गाना अक्षय कुमार और रवीना टंडन का कल्ट गाना रहा है. मैं यहां बताना चाहूंगी कि बचपन में मैं परिवार में या दोस्तों के यहां शादी के अवसर पर इसी गाने पर नृत्य किया करती थी. अब मुझे उसी गाने पर कैमरे के सामने नाचते हुए काफी खुशी मिली.

अब्बास मस्तान के साथ काम करने के अनुभव क्या रहे?

पहली फिल्म ‘फगली’ के प्रदर्शन के बाद मैं ने एक सूची बनाई थी कि मुझे किनकिन निर्देशकों के साथ काम करना है. उसी सूची में से मुझे नीरज पांडे के साथ फिल्म ‘एम एस धोनी : अनटोल्ड स्टोरी’ में अभिनय करने का मौका मिला. फिर उसी सूची में से अब्बास मस्तान के साथ फिल्म ‘मशीन’ करने का मौका मिला.

अब्बास मस्तान ने प्रीति जिंटा, काजोल व प्रियंका चोपड़ा को अपनी फिल्मों से स्टार बनाया. फिल्म ‘एतराज’ में प्रियंका चोपड़ा या ‘बाजीगर’ में काजोल को देखिए. इतना ही नहीं उन्होंने अपनी फिल्मों में हमेशा एक हीरोइन को सशक्त नारी के रूप में पेश किया.

आप को इस बात का डर नहीं था कि यह फिल्म वे अपने बेटे मुस्तफा के  लिए बना रहे हैं, तो स्वाभाविक है आप के किरदार के बजाय वे मुस्तफा के किरदार को महत्त्व देंगे?

फिल्म की पटकथा पढ़ने के बाद तो शक की कोई गुंजाइश नहीं बची थी. मैं ने तो उन से अपनी तरफ से ही पूछा था कि क्या आप इसी स्क्रिप्ट पर फिल्म बनाएंगे? उन्होंने एक ही बात कही थी, ‘मेरे लिए फिल्म की कहानी, कंटैंट व किरदार अहमियत रखते हैं, कलाकार नहीं.’

मैं मानती हूं कि फिल्म निर्देशक का माध्यम है. इसलिए मैं सह कलाकारों के नाम पर गौर करने के बजाय निर्देशक के नाम पर गौर करती हूं. मैं 3 फिल्में कर चुकी हूं पर मैं कहना चाहूंगी कि मुस्तफा उन कलाकारों में से रहे जिन के साथ मैं ने बड़ी सहजता से काम किया है.

आप की पहली फिल्म ‘फगली’ के हीरो मोहित मारवाह की वह पहली फिल्म थी. अब आप की तीसरी फिल्म ‘मशीन’ के हीरो मुस्तफा की भी पहली फिल्म है?

मैंने पहले ही कहा कि सिनेमा निर्देशक का माध्यम है और मैं निर्देशक पर गौर कर के ही फिल्म चुनती हूं. वैसे मोहित मारवाह और मुस्तफा दोनों प्रतिभाशाली कलाकार हैं.

किस तरह की फिल्में करना चाहती हैं?

मैं खुद को दोहराने में यकीन नहीं रखती. यह अच्छी बात है कि अब तक मुझे तीनों फिल्मों में विविधतापूर्ण किरदार निभाने का मौका मिला. ‘फगली’ में मैं ने दिल्ली की लड़की का किरदार निभाया, जिस में उस लड़की को कई तकलीफों से गुजरना पड़ता है. इसे निभाना मेरे लिए काफी कठिन था. मैं अखबारों या समाचार चैनलों में पढ़ती या सुनती रहती हूं. मैं तो बहुत सुरक्षित घर में पलीबढ़ी हूं. इस के बावजूद मैं ने जानबूझ कर पहली फिल्म ऐसी चुनी थी, जो मेरी जिंदगी के अनुभवों के विपरीत हो. फिल्म में जो हिंसा थी, वह मेरे लिए एकदम नया अनुभव था. इस से एक कलाकार के तौर पर मुझे खुद को विकसित करने में मदद मिली.

खुद को किस तरह परिभाषित करेंगी?

मैं अपने मातापिता की ही तरह आत्मविश्वासी, सशक्त व सकारात्मक सोच के साथ आशावादी हूं. मेरी पौजिटिविटी मेरी सब से बड़ी ताकत है.

आप सलमान खान से परिचित हैं?

मेरी मम्मी और सलमान खान बचपन के दोस्त हैं. स्टार बनने से पहले सलमान सर और मेरी मां दोनों साथ साइकिल चलाया करते थे. मेरी मां ने ही मेरी मौसी शाहीन का परिचय सलमान सर से कराया.  मैं सलमान सर से उन के घर पर कई बार मिली हूं. वे काफी अच्छे इंसान हैं.

जूही चावला से क्या रिश्ता है?

जब मेरे मातापिता डेट कर रहे थे, तब उन की दोस्ती जूही चावला से हुई थी. वे मुझे मेरे जन्म के समय से जानती हैं. मैं उन्हें जूही आंटी कह कर बुलाती हूं. हम होलीदीवाली एकदूसरे के घर जा कर मनाते हैं.

सईद जाफरी से कभी मुलाकात हुई?

जब मैं 5 साल की थी, तब मेरी लंदन में जाफरी अंकल से मुलाकात हुई थी.

आप सोशल मीडिया पर भी व्यस्त हैं, पर सोशल मीडिया पर गालियां भी मिलती हैं?

मैं ट्विटर व इंस्टाग्राम पर हूं. अब मैं आलोचना भी सुन लेती हूं. हर कोई कुछ न कुछ कहता रहता है. सोशल मीडिया पर लोग कमैंट करते रहते हैं. अब इस तरह की बातों पर कम ध्यान देती हूं. मेरा ध्यान अपने काम पर ज्यादा रहता है. कुछ की आलोचना सुनना पसंद है. सोशल मीडिया पर हर कमैंट नहीं पढ़ती. देखिए, जिसे जो कहना है, कहता रहेगा. हम किसी को रोक नहीं सकते. आखिर हम सभी इंसान हैं, हमारा अपना परिवार है. मुझे ज्यादा आलोचनाएं नहीं सहनी पड़ीं.

हौलीवुड में हीरोइन के हिस्से काफी रोमांचक किरदार आते हैं, पर अब भारत में भी इस तरह की शुरुआत हो गई है, तो इसे आप कैसे देखती हैं?

अब बौलीवुड में महिला केंद्रित फिल्में बन रही हैं और दर्शक इन्हें पसंद भी कर रहे हैं. महिला किरदार अब ज्यादा सशक्त लिखे जा रहे हैं. यह अच्छी शुरुआत है. मैं ने ऐसे अच्छे वक्त में कैरियर शुरू किया है, जब नारीप्रधान फिल्में बनने लगी हैं. अब पुरुष कलाकारों के समान ही महिला कलाकारों को भी सम्मान दिया जाता है. मेरे साथ तो सैट पर अच्छा व्यवहार किया गया. मैं भी चाहती हूं कि फिल्म में किरदार भले छोटा हो, पर वह महत्त्वपूर्ण हो.

आप किसे अपना प्रतिस्पर्धी मानती हैं?

मेरे लिए तो सभी प्रतिस्पर्धी हैं, क्योंकि सभी प्रतिभाशाली हैं.

आने वाली फिल्में?

मैंने नई फिल्में अनुबंधित नहीं की हैं, पर कुछ पटकथाएं पढ़ रही हूं और इन के बारे में फिल्म ‘मशीन’ के बाद अंतिम निर्णय लूंगी.

हिन्दुत्व की नायिका बनने को बेचैन उमा भारती

जब नरेंद्र मोदी प्रधान मंत्री बने थे तब देश भर में यह आशंका थी कि अब भाजपा हिन्दुत्व का अपना एजेंडा थोपेगी, लेकिन नरेंद्र मोदी ने हिन्दुत्व से जुड़े मसलों पर ज्यादा तब्बजुह नहीं दी और अप्रत्यक्ष रूप से हिन्दुत्व की बात करते रहे, तो लगा था कि बात आई गई हो गई लेकिन जैसे ही योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्य मंत्री बनाया गया तो अब वे तमाम बातें हो रहीं हैं जिनका कि डर था.

जाहिर है भाजपा इस खुश या गलत फहमी में है कि उसे उत्तर प्रदेश में वोट हिन्दुत्व के चलते मिले हैं. आदित्यनाथ तो धड़ल्ले से मंदिर, बीफ और वंदे मातरम का राग अलाप रहे हैं पर साध्वी उमा भारती की बैचेनी के अपने अलग माने हैं जो एक महीने से भी कम वक्त में 2 दफा यह कह चुकी हैं कि वे राम मंदिर के लिए जान देने और फांसी चढ़ने को भी तैयार हैं.

बकौल उमा चूंकि मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है इसलिए वे इस विषय पर ज्यादा नहीं बोलेंगी. अब इससे ज्यादा और बोलने को तो यही बचता है कि चलो अयोध्या और फाबड़े गेंती उठाकर मंदिर की नींव खोदना शुरू कर दो, आगे जो होगा सो आडवाणी जी देखेंगे. धर्म के नाम पर मार काट मचे, हिंसा हो,  बैर फैले जैसी बातें उमा के लिए कतई चिंता की नहीं जो 24 साल पहले दहाड़ती रहतीं थीं कि एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो.

दरअसल में भाजपा के अंदर उमा भारती की हैसियत दोयम दर्जे की हो चली है, लेकिन आदित्यनाथ की ताजपोशी के बाद उन्हें मध्य प्रदेश के सीएम पद का सपना दोबारा दिख रहा है. इस गफलत के चलते  भाजपा का नया शेप वे नहीं देख पा रहीं हैं कि वह भगवा कांग्रेस बन चुकी है, जिसका मकसद जैसे भी हो जनता को उलझाए रखना है. इस नए रूप में भाजपा एक मुंह से विकास की तो दूसरे मुंह से हिन्दुत्व की बात कर रही है और 2019 तक यह सिलसिला जारी रहेगा. ऐसे में उमा का मंदिर राग उसे तकलीफ देह ही साबित हो रहा है.

फ्री हेंड आदित्यनाथ को दिया गया है और उमा समझ रहीं हैं कि पूरी संत बिरादरी को यह डिस्काउंट मिला हुआ है. बार बार मंदिर के लिए फांसी चढ़ने की बात वे कहती हैं तो कोई चिड़िया भी चूं नहीं करती, उलट इसके आदित्यनाथ के मवेशी भी सुर्खियां बन जाते हैं. जाहिर है वे अपनी तुलना अपने से जूनियर आदित्यनाथ से करने की बीमारी का शिकार हो चली हैं जो एक तरह की हीनता ही है. राम मंदिर निर्माण अब महज शिगूफा बन कर रह गया है, आम लोगों की दिलचस्पी उसमें नहीं रही है, इसलिए इसे अब अभियान भाजपा नहीं बनाएगी लेकिन बात जरूर करती रहेगी.

उमा का बीच में टांग फसाना भाजपाइयों को रास नहीं आ रहा है, जिनकी हालत घर की शादी में अपनी अहमियत रीति रिवाजों और रस्मों की जानकार होने की बिना पर यह जताने की रह गई है कि नहीं पहले माता पूजन होगा फिर मंडप डलेगा. बैचेनी और उग्र तात्कालिक प्रतिक्रिया देना उमा की 2 पुरानी कमजोरियां हैं, जिन्हें अब राम के अलावा कुछ नहीं दिख रहा तो उनकी मंशा से कोई इत्तफाक भी नहीं रख रहा. बच्चों जैसे पैर पटककर एक हद से ज्यादा वे ध्यान अपनी तरफ खींच पाएंगी ऐसा लग नहीं रहा. इस पर भी तकलीफ यह कि इन दिनों मोदी से भी बड़े नायक बने आदित्यनाथ उनके नाम का जिक्र तक नहीं करते.

गुरमेहर कौर कट्टरपंथियों का बनी निशाना

‘जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार के खिलाफ लगाए गए राजद्रोह के आरोप को साबित करने में दिल्ली पुलिस नाकाम रही है.’ पिछली 3 मार्च को अखबारों में छपा यह समाचार गुरमेहर कौर को राष्ट्रद्रोही और बेइज्जत करने के बवाल में भले ही दब गया हो, पर कई बातें एकसाथ उजागर कर गया. मसलन, यह इस बार एक 20 वर्षीय छात्रा गुरमेहर कौर कथित राष्ट्रप्रेमियों के निशाने पर है और देश के शिक्षण संस्थानों में बोलने पर तो पता नहीं, लेकिन सच बोलने पर लगी पाबंदी बरकरार है.

जो आवाज तथाकथित भक्तों को पसंद नहीं आती उसे दबाने हेतु पुलिस, कानून और मीडिया के अलावा कारगर हथियार हैं हल्ला, हिंसा, मारपीट, धरना, प्रदर्शन. यदि यह आवाज एक युवती की हो तो बलात्कार तक की धमकी देने से कट्टरवादी चूक नहीं रहे. अभिव्यक्ति की आजादी का ढिंढोरा बीते 3 साल से खूब पीटा जा रहा है, लेकिन यह आजादी दरअसल किसे है और कैसे है यह गुरमेहर के मामले से एक बार फिर उजागर हुआ.

आज देश के विश्वविद्यालय राजनीति के अड्डे बने हैं, वहां खुलेआम छात्र शराब पीते हैं, ड्रग्स लेते हैं, सैक्स कर संस्कृति और धर्म को विकृत करते हैं, जैसी बातें अब चौंकाना तो दूर की बात है कुछ सोचने पर भी विवश नहीं करतीं. इस की खास वजह यह है कि किसी भी दौर में युवाओं को मनमानी करने से न तो पहले रोका जा सका था और न आज रोक पा रहे हैं. युवा खूब ऐश और मौजमस्ती करें, यह हर्ज की बात नहीं लेकिन वे कहीं सोचने न लगें यह जरूर चिंता की बात है, क्योंकि युवापीढ़ी का सोचना राजनीति के साथसाथ धर्म को भी एक बहुत बड़ा खतरा लगता है. ये लोग हिप्पी पीढ़ी चाहते हैं जो दिमागी तौर पर अपाहिज और ऐयाश हो, लेकिन बदकिस्मती से कई युवा गंभीरतापूर्वक सोचते हैं और कहते भी हैं तो तकलीफ होना स्वाभाविक है.

तकलीफ का इलाज बेइज्जती

फरवरी के तीसरे सप्ताह में राजधानी दिल्ली के रामजस कालेज में हुई हिंसा की खबर दब कर रह जाती, यदि यह हिंसा 2 छात्र संगठनों आईसा और एबीवीपी के बीच न हुई होती.

कौन है गुरमेहर और कैसे वह रातोंरात कन्हैया की तरह चमकी, इसे जानने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि आरएसएस और भाजपा समर्थक एबीवीपी की इमेज लगातार बिगड़ रही है. पहली मार्च को ही दिल्ली पुलिस ने उस के 2 सदस्यों को गिरफ्तार किया था. इस पर तुरंत ऐक्शन लेते एबीवीपी के राष्ट्रीय मीडिया संयोजक साकेत बहुगुणा ने 2 सदस्यों प्रशांत मिश्रा और विनायक शर्मा को निलंबित कर दिया था. इन दोनों पर आईसा के सदस्यों को मारनेपीटने का आरोप था, जिस की पुलिस ने एफआईआर भी दर्ज की थी.

यह बात आम नहीं थी बल्कि इस के पीछे गुरमेहर नाम की एक छात्रा थी जिसे ले कर कन्हैया जितना ही बवाल मचा था.

पंजाब के जालंधर में जन्मी गुरमेहर के पिता कैप्टन मंदीप सिंह 1999 में चर्चित कारगिल युद्ध में शहीद हुए थे तब उस की उम्र महज 2 साल थी. स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद गुरमेहर दिल्ली यूनिवर्सिटी के लेडी श्रीराम कालेज से साहित्य से एमए कर रही थी.

गुरमेहर आम लड़कियों जैसी ही है पर एक बात उसे हमेशा कचोटती रही कि उस के पिता नहीं हैं. वे शहीद हुए थे. यह गर्व की बात उस के लिए थी पर शहादत की नौबत किन वजहों के चलते आई यह बात गंभीरता से उस ने दिल्ली आ कर सोचनी शुरू की. हालांकि उस के सोचने पर कोई बंदिश पहले भी नहीं थी. उस की मां राजविंदर कौर ने उस की परवरिश लड़कों की तरह और बेहतर तरीके से की थी.

20 वर्षीय युवती से कोई गहरी सोच की उम्मीद नहीं करता, लेकिन गुरमेहर ने पिता की कमी महसूस की और लगातार सोचने के बाद उस ने एक निष्कर्ष निकाला कि उस के पिता की मौत की वजह पाकिस्तान नहीं था बल्कि युद्ध था.

यह निष्कर्ष एकदम दार्शनिकों जैसा था जिस में बुद्ध की करुणा और महावीर की अहिंसा दोनों थी. जिस युवती से पिता की बांहों में झूलने जैसे सैकड़ों सुख 2 देशों की हिंसा ने छीने थे, उस ने अगर उन की वजह युद्ध बता दिया तो देखते ही देखते देश भर में खासा बवाल मच गया.

गुरमेहर उत्साहित थी कि उस ने एक विश्वव्यापी गुत्थी सुलझा ली है और इसे पुष्टि के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों खासतौर से दोस्तों और छात्रों के साथ शेयर करना चाहिए. उस ने ऐसा किया भी. यही उस का गुनाह था जिस के चलते वह अपमान और दुख के उस दौर से गुजरी जिसे कोई सामान्य युवती बरदाश्त ही नहीं कर सकती.

राजनीति और लैफ्टराइट के चिंतन से अनजान गुरमेहर जब इन चीजों से टकराई तो उसे एहसास हुआ कि उस ने कोई भारी गलती कर दी है, जिस से देशभर में हंगामा बरपा हुआ है. हुआ यों कि उस ने अपनी बात को प्रभावी ढंग से कहने के लिए सोशल मीडिया को जरिया बनाया और फेसबुक पर सिलसिलेवार 34 प्ले कार्ड्स पर अपने निष्कर्ष को पोस्ट करते हुए मन की बात कही थी. इन कार्ड्स के जरिए उस ने बताया था कि मैं बचपन में मुसलमानों से नफरत करती थी और हर मुसलमान को पाकिस्तानी समझती थी, पर मां के बारबार समझाने पर मेरे दिल से नफरत निकल पाई.

देखा जाए तो बात साधारण होते हुए भी असाधारण थी यह एक युवती की आपबीती, पर उस के अपने मौलिक विचार थे जो एबीवीपी को नागवार गुजरे. पूर्वार्द्ध में कहे गए गुरमेहर के वाक्य ‘पाकिस्तान ने मेरे पिता को नहीं मारा’ के माने एबीवीपी ने अपने हिसाब से राष्ट्रद्रोह के निकाले और उसे प्रताडि़त करना शुरू कर दिया. 18 साल पहले जिस के पिता की शहादत के चर्चे देश भर में थे, उन की बेटी पलभर में राष्ट्रद्रोही करार दे दी गई. गुरमेहर हैरत और सकते में थी कि आखिरकार ये सब हो क्या रहा है.

इसी बवंडर में यह बात भी उभर कर सामने आई कि दिल्ली के रामजस कालेज में आयोजित एक संगोष्ठी में 2 छात्र नेताओं उमर खालिद और शेहला राशिद को भी न्योता दिया गया था. इस पर एबीवीपी बिफर उठी और उसे ये सब राष्ट्रद्रोह की साजिश लगा. उस ने इस संगोष्ठी का खुल कर विरोध किया और संगोष्ठी नहीं होने दी.

गुरमेहर एबीवीपी की इस हरकत से आहत हुई और उस ने सोशल मीडिया पर उस का विरोध किया. जल्द ही लोग उस से सहमत हो कर जुड़ने लगे और उस का वीडियो शेयरिंग के साथ हैशटेग भी करने लगे.

विवाद बढ़ा तो वामपंथी छात्र संगठन ने एक मार्च निकालने का फैसला ले लिया. यह मार्च पहली मार्च को ही निकाला जाना था. छात्र संघों की ताकत और पहुंच की बात करें तो हर कोई जानता है कि वामपंथी, हिंदूवादियों पर भारी पड़ते हैं क्योंकि वे किसी दायरे या फिर धार्मिकसांस्कृतिक बंधनों में जकड़े नहीं हैं और खुले दिमाग वाले हैं.

दिखाया संस्कृति का सच

2 अलगअलग विचारधाराओं में टकराव स्वाभाविक बात है, पर एबीवीपी के कार्यकताओं ने अपने धार्मिक संस्कार जल्द ही दिखा दिए और गुरमेहर के साथ खुलेआम अभद्रता की, गुरमेहर को गालियां दी गईं और उस की कुरती की एक बांह भी फाड़ दी गई. इस सब का मकसद एक युवती की बेइज्जती कर उस का मनोबल तोड़ना था. इस पर भी बात नहीं बनी थी तो उस को बलात्कार की भी धमकी दी गई.

इतने घिनौने और घटिया स्तर पर बात आ जाएगी यह बात इस लिहाज से उम्मीद के बाहर नहीं थी कि हिंदूवादियों का यह पुराना हथियार है कि औरतों से जीत न पाओ तो उन को बेइज्जत करने में हिचको मत. कोई खूबसूरत महिला प्रणय निवेदन करे तो उस की नाक काट डालो, मामला जायदाद का हो तो विरोधी पक्ष की महिला को भरी सभा में नग्न कर दो और तो और चारित्रिक शक जाहिर करते सीता जैसी पत्नी भी त्याग दो.

गुरमेहर के मामले में भी ये पौराणिक दांव खेले गए हालांकि वह जानतीसमझती थी कि उस का समर्थन कर रहे लोग कहीं ज्यादा सशक्त हैं, पर वह हिंसा की हिमायती नहीं थी. इसलिए पलायन कर गई, लेकिन बलात्कार की धमकी की रिपोर्ट उस ने लिखाई जिस पर दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने संज्ञान लिया और उसे सुरक्षा भी मुहैया कराई.

निश्चित रूप से गुरमेहर को आभास था कि एबीवीपी के संस्कार ही युद्ध के हैं, जिस धर्म और संस्कृति का वह पालन करती है वह मारकाट चीरहरण, अंगभंग और छलकपट से भरी पड़ी है. इसलिए इन से नारी सम्मान  या दूसरे किसी लिहाज की उम्मीद न करने की उस ने समझदारी दिखाई और वापस जालंधर चली गई. जातेजाते उस ने कहा कि वह मार्च में शामिल नहीं होगी और शांति से रहना चाहती है.

उस ने दोहराया कि वह किसी से डरती नहीं है, लेकिन तय है कि एक शहीद देशभक्त की बेटी कभी यह बरदाश्त नहीं कर सकती कि वे लोग उसे राष्ट्रद्रोही का खिताब दें जिन्हें धर्म और राष्ट्र में फर्क करने की भी तमीज नहीं है. जालंधर जा कर उस ने सहयोगियों का शुक्रिया अदा किया और खुद को फसाद से दूर कर लिया.

मचता रहा बवाल

यह महज इत्तफाक नहीं है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही वैचारिक टकराव छात्रों के बीच हिंसा की हद तक बढ़ा है. हिंदूवादियों के हौसले बुलंद हैं और वे किसी भी विरोधी का मुंह बंद करने को उसे राष्ट्रोही और गद्दार करार दे देते हैं.

गुरमेहर ने एबीवीपी की छीछालेदार करा दी थी इसलिए जल्द ही भगवा खेमा शीर्ष स्तर पर सक्रिय हो गया. मैसूर से भाजपा सांसद प्रताप सिन्हा ने गुरमेहर की तुलना अंडरवर्ल्ड सरगना दाउद इब्राहिम से करते हुए कहा कि 1993 के बम धमाकों के मास्टरमाइंड दाउद ने देश विरोधी काम के बाद यह नहीं कहा था कि वह पुलिस वाले का बेटा है. केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने भी गुरमेहर को देशद्रोही कह डाला.

वीरेंद्र सहवाग जैसे क्रिकेटर भी जबानी जंग में कूदे और रेसलर फोगाट बहनें गीता और बबीता भी बगैर सोचेसमझे बोलीं. बकौल सहवाग 300 रन उस ने नहीं, उस के बल्ले ने बनाए थे जैसी बात गुरमेहर ने कही है. इसे सहवाग की नादानी ही कहा जाएगा जो वह यह नहीं समझ पाया कि गुरमेहर कर्म और क्रिया का संबंध नहीं बता रही बल्कि एक विश्वव्यापी समस्या की बात करते अहिंसा के पक्ष में उदाहरण भी दे रही है.

हालांकि गुरमेहर के पक्ष में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी आगे आए और भाजपा नेता शत्रुघ्न  सिन्हा ने भी उस का समर्थन किया. बातबात पर भाजपा और नरेंद्र मोदी का समर्थन करें वाले गीतकार जावेद अख्तर को भी पहली दफा ज्ञान प्राप्त हुआ कि गुरमेहर के साथ गलत हो रहा है, इस के बाद बहस और आरोपप्रत्यारोप राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रद्रोह की नई परिभाषाओं के इर्दगिर्द सिमट कर रह गए. शायद गुरमेहर को निशाने पर लेने का मकसद भी यही था.

उधर, गुरमेहर की मां राजविंदर कौर कहती ही रह गईं कि मेरी बेटी पर राजनीति मत करो वह एक बच्ची है, जिस की भावनाएं सच्ची हैं लेकिन गुरमेहर पर राजनीति बहुत जरूरी भी हो गई थी हालांकि इस से इस पूरे मामले का धार्मिक पहलू ढक गया. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का यह कहना बेवजह नहीं था कि देश विरोधी नारे भाजपा और एबीवीपी वाले खुद लगाते हैं.

यह बात कितनी सच कितनी झूठ है, यह तो वही जानें, पर यह जरूर सच है कि आरएसएस की छत्रछाया में पलेबढ़े एबीवीपी की नजर में छात्रशक्ति का इकलौता मतलब हिंदुत्व होता है. इस पर बोलने वाले को चुप कराने के लिए किया गया हर काम वे जायज मानते हैं. यहां तक कि एक युवती की इज्जत लूटने या बलात्कार की धमकी देना भी हर्ज की या पाप की बात नहीं समझते.

हिंदू या भारतीय

गुरमेहर तो हमेशा की तरह बहाना थी, एबीवीपी का असल मकसद तो कुछ और था जिसे 28 फरवरी को दिल्ली में निकाले गए वामपंथी शिक्षक छात्र संगठनों के मार्च में माकपा महासचिव सीताराम येचुरी और माकपा नेता डी राजा ने खुल कर बताया.

इन के मुताबिक हमारा राष्ट्रवाद ‘हम भारतीय हैं’ पर आधारित है न कि हिंदू कौन है, पर आधारित है. एबीवीपी के गुंडे तर्क से नहीं जीत पा रहे हैं, इसलिए हिंसा का रास्ता अपना रहे हैं.

पर आम लोगों की बड़ी चिंता जो गुरमेहर के पूरे सच से नावाकिफ थे, यह थी कि शिक्षण संस्थाओं में राष्ट्रवाद पर चर्चा नहीं होनी चाहिए और कहीं भी राष्ट्रविरोधी नारे नहीं लगाए जाने चाहिए. युवाओं को सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए और इस तरह की नेतागीरी से दूर रहना चाहिए.

कालेजों या यूनिवर्सिटी में इस पर एतराज क्यों, क्या युवाओं को अपने विचार रखने का हक नहीं? क्या यह अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ षड्यंत्र नहीं? युवा आक्रोश ही देश का भविष्य बनता है. साल 1975 में जयप्रकाश नारायण ने युवाओं को इकट्ठा करना शुरू किया था और इंदिरा गांधी को सत्ता से उखाड़ फेंकने में कामयाबी हासिल की थी.

एबीवीपी की बातें समझ से परे हैं. यह लोकतंत्र है जो सभी को अपनी बात कहने की आजादी देता है पर कोई गुरमेहर बोले तो उसे बजाय सीधे धर्म विरोधी करने के राष्ट्रद्रोही कह कर बहिष्कृत करने का षड्यंत्र, मुंह बंद करने जैसी बात नहीं तो क्या है. इस संवेदनशील मुद्दे का दिलचस्प ऐतिहासिक सच यह है कि न तो एबीवीपी को मालूम है कि हिंदू कौन हैं न ही भाजपा और आरएसएस को मालूम है और मालूम भी है तो वे इस सच से डरते और कतराते रहते हैं कि दरअसल, आदिवासी ही इस देश का मूल निवासी हैं बाकी सब बाहरी लोग हैं जिन्हें आर्य कहा जाता है शायद यही डर सत्ता पर काबिज रहने को उन्हें और हिंसक व आक्रामक बनाता है.

उत्तर प्रदेश के नतीजों के मायने भी तो समझिए

उत्तर प्रदेश में कभी अपने दम पर सरकार बना सकने वाली मायावती की बहुजन समाज पार्टी इस विधानसभा चुनाव में 22 प्रतिशत वोट पा कर सिर्फ 19 सीटों पर सिमट गई तो इस की वजह वे खुद हैं. मायावती 4 बार मुख्यमंत्री बनीं पर उन का एजेंडा कभी दलितों का विकास नहीं रहा. वे उसी ब्राह्मणवादी सोच में डूबी रहीं जिस की वजह से सदियों से हिंदू गुलाम रहे-मूर्तिपूजा. उन्होंने अंबेडकर, कांशीराम व अपनी मूर्तियां स्थापित कराईं पर यह नहीं सोचा कि इन मूर्तियों से दलितों को कोई लाभ नहीं मिलेगा जैसे कि राम, कृष्ण और शिव की मूर्तियों से कभी हिंदुओं को लाभ नहीं मिला.

यह ठीक है कि अपने देवताओं की मूर्तियां दुनियाभर में बनती रही हैं चाहे वे यूरोप में ईसा मसीह की हों, मिस्र में रेमसे शासकों की हों, बुद्घ की भारत, चीन, जापान में हों या कम्युनिस्ट देशों में लेनिन, मार्क्स और स्टालिन की हों पर यह समझना चाहिए कि उन से समर्थकों को एक जगह एकत्र होने का मौका तो मिलता है पर वे दूसरों से कट जाते हैं.

मायावती को ज्यादा सीटें जीतने के लिए जो 3-4 प्रतिशत वोट और चाहिए थे वे इसलिए नहीं मिल पाए क्योंकि मायावती किसी भी तरह के दलितविकास का मौडल नहीं दिखा सकती थीं. मायावती ने सोच रखा था कि चूंकि उन्होंने अंबेडकर स्मारक बनवा दिए, सो वे वोट पा जाएंगी. जबकि सच यह है कि हर वोट के लिए बेहद जुझारू होना पड़ता है और ऐसा ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी ने किया.

मायावती को अगर दलितों का उद्घार करना है तो उन्हें अब उस मानसिकता को तोड़ने के लिए लड़ना होगा जिस की वजह से दलित ही नहीं, वैश्य, पिछड़े यानी शूद्र और अछूत सदियों मुगलों और अंगरेजों के शासनों में भी निचले स्तर पर बने रहे. मायावती यदि यह खुद नहीं कर सकतीं तो उन्हें राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए क्योंकि वे देशभर में फैले दलितों को अपने मंच पर खड़ा नहीं कर पाईं.

2014 के बाद 2017 में उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में भाजपा की जीतों ने यह साफ कर दिया है कि राजनीति चतुराई, तिकड़मी, लेनदेन, समझौतों से चलती है. 1915 से 1977 तक इसी वजह से कांग्रेस सफल रही और अब वही नरेंद्र मोदी व अमित शाह कर रहे हैं. मायावती को अपने समर्थकों से कहना होगा कि वे अपने बलबूते तब तक समाज में बराबरी की जगह न पा सकेंगे जब तक वे आर्थिक तौर पर मजबूत न होंगे. मायावती को सीटों की राजनीति छोड़ कर दबेकुचलों के विकास का मार्ग अपनाना पड़ेगा.

लालू प्रसाद यादव : मिट्टी ने की मिट्टी पलीद

लालू प्रसाद के परिवार पर 90 लाख रूपए की मिट्टी गैरकानूनी तरीके से पटना के संजय गांधी जैविक उद्यान को बेचने के आरोप से बिहार की राजनीति गरमा गई है. लालू इस मसले पर सफाई-दर-सफाई दे रहे हैं और नीतीश कुमार चुप्पी साधे हुए हैं. पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने लालू के बेटे और वन एवं पर्यावरण मंत्री तेजप्रताप यादव को बर्खास्त करने की मांग कर डाली है. गौरतलब है कि पटना और दानापुर के बीच सगुना मोड़ के पास बिहार का सबसे बड़ा मौल बनाया जा रहा है. बताया जा रहा है कि वह मौल लालू और उनके परिवार का है. राजद के सुस्संड के विधायक अबू दौजाना की कंपनी मौल बना रही है. उसी मौल से निकली मिट्टी को बगैर टेंडर निकाले जैविक उद्यान को बेच दिया गया है.

मोदी ने आरोप लगाते हुए कहा है कि अपने परिवार को मिट्टी घोटाले में फंसते देख कर लालू यादव आधी रात को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलने उनके घर पहुंच गए. 4 अप्रैल को अपने जनता दरबार के बाद मोदी ने बताया कि डिलाइट मार्केटिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी में तेजप्रताप यादव, तेजस्वी यादव और चंदा यादव साल 2014 से ही डायरेक्टर हैं. उसी कंपनी की जमीन पर बिहार का सबसे बड़ा मौल बनाने का दावा किया जाता रहा है. मौल को बनाने के लिए काट कर निकाली गई मिट्टी को जैविक उद्यान को बेच दिया गया है. मौल के 2 अंडर ग्राउंड फ्लोर के लिए काटी गई मिट्टी गैरकानूनी तरीके से जैविक उद्यान को बेची गई है. इस मामले की अगर ईमानदारी से जांच कराने से दूध का दूध और पानी का पानी हो सकता है.

गौरतलब है कि साल 2008 में जल संसाधन मंत्री ललन सिंह ने लालू यादव पर आरोप लगाया था कि रेलवे के 2 होटल हर्ष कोचर को देने के एवज में कोचर ने पटना के सगुना मोड़ के पास 2 एकड़ जमीन लालू को दी थी. उसी जमीन पर मौल बनाया जा रहा है. मौल को बनाने का काम मेरीडियन कंस्ट्रक्शन इंडिया लिमिटेड कर रही है. यह कंपनी राजद विधयक सैयद अबु दौजाना की है.

मोदी का दावा है कि बगैर कोई टेंडर निकाले मिट्टी उठाने और गिराने का काम रूपसपुर के बीरेंद्र यादव के एमएस इंटरप्राइजेज को दिया गया. पिछले 2 महीने से रात 10 बजे से लेकर सुबह 5 बजे के बीच 5 लाख घन फुट मिट्टी ढुलाई का काम चल रहा था. जबकि रात के समय में वन्य प्राणियों के उद्यान में निर्माण कार्य या किसी भी तरह की गतिविधियों पर रोक है. मोदी बताते हैं कि बिहार वन्य प्राणी संरक्षण कोष से मिट्टी की कीमत चुकाई गई है, जबकि 334 करोड़ 41 लाख रूपए से बनाए गए कोष के ब्याज की राशि केवल वन्य प्राणियों के संरक्षण पर ही खर्च की जा सकती है.

अपने ऊपर लगे आरोपों से तिलमिलाए लालू मोदी को झूठा बताते हुए कहते हैं कि मोदी का आरोप पूरी तरह से गलत है और वह किसी भी तरह की जांच के लिए तैयार हैं. लालू कहते है कि वह पिछले कई सालों से चिड़ियाखाना को मुफ्त में गोबर देते रहे हैं. आखिर मिट्टी बेचने और खरीदने का कोई रिकार्ड तो होगा, वह मोदी क्यों नहीं सामने लाते हैं? मोदी केवल झूठ का व्यपार करते हैं.

इस मसले पर जब संजय गांधी जैविक उद्यान के निदेशक नंदकिशोर से बात की गई तो उन्होंने कहा कि उद्यान के सौंदर्यीकरण के लिए 44 लाख रूपए की मिट्टी की खरीद की गई है, जिसकी कीमत 27 लाख है. मिट्टी की खरीद में सभी नियमों का पालन किया गया है. एसएस इंटरप्राइजेज से मिट्टी की खरीद हुई हैं और इस खरीद योजना को 7 महीने पहले ही मंजूरी मिली थी. उन्होंने यह भी दावा किया किया है कि किसी राजनेता के यहां से मिट्टी नहीं खरीदी गई है.

राजद विधयक सैयद अबु दौजाना कहते हैं कि मौल से निकाली गई मिट्टी को संजय गांधी जैविक उद्यान नहीं बल्कि उनके दूसरे प्लौटों पर भेजा गया है. उनकी कपंनी कन्वर्जन पर जमीन लेकर मौल बना रही है. सुशील मोदी अपने गलत आरोप के लिए माफी मांगे, नहीं तो उन पर मानहानि का मुकदमा किया जाएगा.

जैविक उद्यान में मिट्टी भराई के मामले को लेकर हल्ला मचने के बाद राज्य के मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह को जांच का जिम्मा सौंपा गया है. जांच की रिपोर्ट आने के बाद ही सच्चाई का पता चल सकेगा, लेकिन फिलहाल तो मिट्टी ने लालू यादब और महागठबंधन सरकार की मिट्टी पलीद कर ही दी है.

भारत में नए राजनीतिक दौर की शुरुआत

1947 के बाद 2017 देश में राजनीति की नई करवट ले रहा है. जैसे 1947 में गोरे शासकों को हटा कर पूरे भारत पर कांग्रेस सरकार ने कब्जा जमा लिया था वैसे ही 2017 में भारतीय जनता पार्टी देश की सत्ता पर कब्जा करने के साथ कई राज्यों की सत्ता पर भी काबिज हो गई है. नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने 3-4 साल की छोटी सी अवधि में जो राजनीतिक सफलता पाई है उस के पीछे इन दोनों की कठिन मेहनत और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 50 साल की चेष्टा रही है.

कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी अब फिर से खड़ी हो पाएंगी, इस में संदेह है. इन पार्टियों से निकले एकमत वाले अगर भारतीय जनता पार्टी के धार्मिक, सामाजिक व आर्थिक हथियारों की तोड़ निकाल पाएं, तभी यह संभव है. पुराने लेबल अब उसी तरह इतिहास के कूड़ेदान में पहुंच गए हैं जैसे भाजपा के पुराने नेता केवल दिखावटी चेहरे बने हुए हैं.

भाजपा की अपनी खास नीति है और कोई कारण नहीं कि वह उसे देश में लागू क्यों न करें. वह बहुत सी बातें खुल्लमखुल्ला कहती रही है और अब तो उसे पर्याप्त जनसमर्थन भी प्राप्त है. धार्मिक हों या आर्थिक मुद्दे, वह हर तरह के प्रयोग करने में स्वतंत्र है और प्रयोग करेगी, इस में संदेह नहीं. आम जनता चाहे सोच कर या किसी भावना में बह कर उसे समर्थन दिया है तो देश को स्वीकार करना ही होगा.

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