परवीन बॉबी संग ऐसी थी महेश भट्ट की अधूरी प्रेम कहानी

डायरेक्टर, राइटर महेश भट्ट का अंदाज-ए-बयां अल्हदा है, जो उन्हें दूसरों से अलग करता है. उनका अपने लिखे को कहना एक सम्मोहन के समान है, जो कम डायरेक्टरों में दिखता है. मगर इस अल्हदा डायरेक्टर के साथ एक अन्य कहानी भी जुड़ी है. जोकि उनके व्यक्तित्व को अन्य डायरेक्टरों से अलग करती है. दरअसल, यहां महेश भट्ट और परवीन बॉबी की अधूरे अमर प्रेम की चर्चा हो रही है, जो लोगों के दिलों में एक फिल्म की तरह जिन्दा है.

वह फिल्म जिसमें प्रेमिका, परवीन बॉबी की ज़ान चली गई थी. और उनकी याद में महेश भट्ट अब भी अपने उस हसीं दौर को याद करते हैं. भट्ट साहब का वह दौर जब उन्होंने दो पत्नियों के बावजूद, परवीन बॉबी के साथ इश्क खत्म नहीं किया था. मगर एक मोड़ में उन दोनों के प्यार को अलग होना पड़ा, तो वह मोड़ कहां आया, उसके लिए पढ़ते हैं महेश भट्ट और परवीन बॉबी के अधूरे प्रेम की यह कहानी.

उन दिनों परवीन बॉबी टॉप की अदाकारा थी और उनका कबीर बेदी से ब्रेकअप हुआ था. हालांकि ब्रेकअप के बावजूद, परवीन शादीशुदा महेश भट्ट को दिल दे चुकी थी. परवीन पर महेश के प्यार का खुमार इस तरह चढ़ा था कि उन्हें लिव-इन में रहना भी गलत नहीं लगा. जबकि यह कहा जा रहा था कि महेश, परवीन के साथ उनके स्टारडम की वजह से हैं.

हालांकि, सूत्रों के मुताबिक वे दोनों जब प्यार मे हुआ करते थे तो स्टारडम पीछे रह जाता था. महेश भट्ट और परवीन बॉबी के प्रेम ने कई वर्षों तक सांस ली, मगर परवीन बॉबी की खराब हालत के कारण, महेश ने परवीन से दूरी बनाना शुरू कर दी थी. जिससे परवीन बॉबी मानसिक रोगी हो गई थी. वह अपने आपको मारने की कोशिश भी करती थी.

महेश भट्ट ने एक साक्षात्कार में कहा है कि एक बार जब वह घर पहुंचे तो परवीन ने हाथ में चाकू पकड़ रखा था और कह रही थीं कि मुझे कोई मारना चाहता है. तो उस समय मुझे परवीन की मानसिक बीमारी का पता लगा था. महेश ने आगे बताया कि वह परवीन का बहुत खराब दौर था. जब डॉक्टर ने उन्हें इलेक्ट्रिक शॉक देने की बात कही थी. महेश ने उस मुश्किल वक्त में परवीन का साथ दिया था. मगर एक वक्त आया जब महेश ने हार मानकर, परवीन को छोड़ दिया था. वह वक्त परवीन की बिगड़ती हालत ही थी. जब महेश भट्ट, परवीन को अकेला छोड़ अपनी पत्नी के पास वापस चले गए थे .

हालांकि, महेश और परवीन की यह अधूरी कहानी अब तक लोगों के जेहन में यादगार बनी है. क्योंकि महेश भट्ट ने अर्थ फिल्म में अपने और परवीन की अधूरी प्रेम कहानी को बयां किया था, जोकि परवीन संग महेश भट्ट के अधूरे रहे प्रेम का साक्ष्य हैं.

फ्लॉप हो सकती है सचिन की बायोपिक फिल्म..!

सचिन तेंदुलकर यानि क्रिकेट का भगवान. सचिन की बायोपिक फिल्म ‘सचिन-ए बिलियन ड्रीम्स’ का ट्रेलर अभी हाल ही में रिलीज हुआ. लगभग दो मिनट के इस ट्रेलर को दर्शक कुछ खास पंसद नहीं कर रहे हैं. सचिन की बायोपिक फिल्म 26 मई को रिलीज होने वाली है, लेकिन सचिन की फिल्म ऐसा न हो कि फ्लॉप हो जाए. ऐसे कई कारण है जिसके वजह से सचिन की बायोपिक फिल्म फ्लॉप होने की आशंका है.

सचिन की बायोपिक फिल्म का ट्रेलर देखने के बाद लोगों के विचारों में बदलाव आ रहा है. इसकी एक खास वजह है क्योंकि लोगों अधिकांश बॉयोपिक में जिस व्यक्ति की बॉयोपिक है उसकी भूमिका में किसी अभिनेता को देखा है. ऐसे में उन्हें यहां सचिन की जगह कोई अभिनेता नहीं दिखाई देगा. यहां पर दर्शकों को किसी एक्टर की कमी जरुर खलेगी.

सचिन एक महान क्रिकेटर हैं वहीं अगर उनकी फिल्म में कोई बड़ा कलाकार उनकी भूमिका निभा रहा होता तो इस बॉयोपिक को देखने की इच्छा और अधिक बढ़ती. तब जिज्ञासा होती कि सचिन की भूमिका में वह अभिनेता कैसा लग रहा है. दूसरे कलाकार से दोहरा फायदा होता. पहला यह कि सचिन को पसंद करने वाले इस फिल्म को इसलिए देखते क्योंकि वह सचिन पर आधारित है वहीं दूसरा यह कि बॉलीवुड अभिनेता को पसंद करने वाले दर्शक भी उस फिल्म को देखते क्योंकि दर्शक यह देखाना चाहते कि सचिन की भूमिका में उनका सुपरस्टार कैसा लग रहा है.

क्रिकेट में सचिन को देखने की आदत हो गई है और यहां भी सचिन का होना लोगों का फिल्म के प्रति रुचि कम कर सकता है. एक मजेदार बात जरुर है कि सचिन के बचपन की भूमिका में उनका बेटा नजर आएगा. जो सचिन के बचपन को सही प्रतिबिंबत करेगा लेकिन बेटा कितने सही से पिता के बचपन की भूमिका को निभा पाएगा यह कहा नहीं जा सकता.

फिल्म को देखना बहुत रोचक होगा क्योंकि सचिन खुद अपने जीवन को स्वयं कैसे पर्दे पर उतार पाते है. यह देखना बहुत दिलचस्प होगा कि सचिन खुद के साथ कितना न्याय कर पाते हैं. इन वजहों से सचिन की बायोपिक फिल्म फ्लॉप हो  सकती है.

चीन को खुला मैदान क्यों दे रहा है अमेरिका

अमेरिका के खब्ती नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन को विश्वपटल पर एशियाई आर्थिक साम्राज्य बनाने का आमंत्रण दे रहे हैं. 12वीं सदी में चीन के पड़ोसी मंगोलिया के मंगोलों ने यूरोप के बड़े हिस्से पर राज किया था. अब चीन यही बात दोहरा रहा है. उस ने अपने बंदरगाह भीवू से 8,000 मील का सफर कर, सामान से लदी ट्रेन को लंदन 18 दिनों में पहुंचा कर दर्शा दिया है कि यूरोप चीन के लिए दूर नहीं है. चीन की आर्थिक विकास की दर अब पहले की तरह 12-13 प्रतिशत नहीं है पर ऊंचे स्तर पर 6-7 प्रतिशत की दर भी कम नहीं है क्योंकि यूरोप और अमेरिका में विकास दर 1-2 प्रतिशत है और आर्थिक विकास में प्रति व्यक्ति आय का चीनियों का यूरोपीयों से फासला भी कम होता जा रहा है.

चीन की उन्नति के पीछे उस का इतिहास और परंपराएं भी हैं. चीन हमेशा नई चीजें खोजता रहा है. अंगरेजों ने उसे गुलाम बनाने की कोशिश की और वे बीजिंग तक पहुंच गए पर वे व्यापार का हक पाने से ज्यादा कुछ न कर पाए. चीन मंगोलों से हारा, जापान से हारा पर पश्चिमी देश उस पर हावी न हो पाए क्योंकि चीन में कर्मठता व नई सोच की कमी नहीं रही.

चीन ने नई तकनीक को बखूबी समझा और धार्मिक पचड़ों में न पड़ कर विकास की राह पर चला. आज हालत यह है कि भारतीय युवा अमेरिका और यूरोप जा रहे हैं जबकि चीनी अब चीन लौट रहे हैं.

चीन की प्रगति उस तरह की है कि मूर्ख के हाथों में फंसा अमेरिका जल्दी ही उस से पिछड़ जाए और चीन ही विश्व का नेता बन जाए तो बड़ी बात नहीं. यूरोप को एहसास होने लगा है कि यदि रूस ने एक बार फिर यूरोप पर आक्रमण  किया तो उसे अब अमेरिका नहीं, चीन का मुंह देखना होगा क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप और रूसियों की तो चुनावों से पहले ही सांठगांठ शुरू हो गई थी.

चीनी आज भी बेहद उत्पादक हैं और वे नई खोजों में बहुत समय व शक्ति लगा रहे हैं. अमेरिका भी चीनियों से डरता है और अमेरिका में दक्षिणी अमेरिकियों, मुसलिमों व भारतीयों के प्रति घृणा का माहौल बना है पर चीनियों के खिलाफ नहीं, क्योंकि चीनी अपनी रक्षा करना अरसे से जानते हैं.

अफसोस यह है कि हमारे देश को उस पाकिस्तान की चिंता ज्यादा है जो असल में कल तक भारत का हिस्सा था और जिस की संस्कृति व रहनसहन नितांत भारतीय ही है. यहां स्पर्धा चीनियों के खिलाफ नहीं, पाकिस्तान के खिलाफ खड़ी की जा रही है जबकि भारत की असल प्रतियोगिता चीन से है. चीन की शक्ति को पहचानने और उसे बढ़ने से रोकने की शक्ति अब किसी में नहीं.

ये 3 एक्ट्रेस हैं बॉलीवुड की सबसे अमीर अभिनेत्रियां

बात जब भी फिल्मों की होती है तो एक्ट्रेस और एक्टर्स की बात होना लाजमी है. बॉलीवुड की फिल्मों में अक्सर एक्टर्स की तुलना में एक्ट्रेस को काफी कम फीस दी जाती है. लेकिन फिर भी ये एक्ट्रेस अपनी खूबसूरती और टैलेंट के दम पर खूब पैसे कमाती हैं. ऐसे में ये तय करना मुश्किल होता है कि कौन सबसे अमीर है. आपके इसी सवाल को आज हम हल करने वाले हैं जिससे आपको पता चल जायेगा कि कमाई के मामले में कौन है बॉलीवुड की क्वीन.

ऐश्वर्या राय बच्चन- नेट वर्थ 35 मिलियन डॉलर

साल 1994 में मिस वर्ल्ड का खिताब जितने वाली ऐश्वर्या राय बच्चन आज एक वर्ल्ड फेमस मॉडल-एक्ट्रेस हैं. नीली आंखों वाली ऐश्वर्या का जन्म 1 नवंबर, 1973 को हुआ था. उनकी आखिरी फिल्म ऐ दिल है मुश्किल थी. आपको जानकर हैरानी होगी कि कमाई के मामले में वह बॉलीवुड की क्वीन हैं. 35 मिलियन डॉलर की नेट वर्थ के साथ, ऐश्वर्या राय इस साल की सबसे अमीर बॉलीवुड एक्ट्रेस हैं.

अमीषा पटेल- नेट वर्थ 30 मिलियन डॉलर

फिल्म कहो ना प्यार है से बॉलीवुड में डेब्यू करने वाली एक्ट्रेस अमीषा पटेल भले ही आजकल किसी फिल्म में नजर न आती हों लेकिन उनकी सालाना इनकम जानकर आप भी अचंभे में पड़ जाएंगे. 125 से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुकी मॉडल-एक्ट्रेस अमीषा 30 मिलियन डॉलर के साथ दूसरे नंबर पर हैं. आज वह एक इंडिया की हाई प्रोफाइल सेलेब्रिटीज में से एक हैं.

प्रीति जिंटा- नेट वर्थ 30 मिलियन डॉलर

तीसर नंबर पर हैं डिंपल गर्ल प्रीति जिंटा जिनकी सालाना आय 30 मिलियन डॉलर है. वह बॉलीवुड की हिंदी फिल्मों के साथ ही तेलगु, पंजाबी और अंग्रेजी भाषा की फिल्मों में काम कर चुकी हैं. वह इंडियन प्रीमियर लीग टीम की मालिक भी हैं जिसे किंग्स इलेवन पंजाब के नाम से जाना जाता है. वह कई टीवी शो को जज कर चुकी हैं. इसके अलावा वह अपने चैट शो अप क्लोज एंड पर्सनल विद प्रीति जिंटा को भी होस्ट कर चुकी हैं.

दीपिका पादुकोण को ऐसे मिला था पहला चांस

दीपिका पादुकोण की गिनती आज बॉलीवुड की बड़ी अभिनेत्रियों में होती है. उन्होंने सिने जगत के कई बड़े स्टार्स जैसे शाहरुख, अमिताभ बच्चन के साथ काम किया है. अब तो वह हॉलीवुड में भी अपनी उमदा एक्टिंग का नमूना पेश कर चुकी हैं. लेकिन क्या आपको पता है, साल 2008 में शाहरुख के साथ बॉलीवुड में डेब्यू करने वाली दीपिका की पहली फिल्म हिमेश रेशमिया के साथ हो सकती थी.

जी हां! दीपिका हिमेश रेशमिया की फिल्म से लॉन्च होने के लिए पूरी तरह तैयार थीं. ऐसा हो भी जाता अगर दीपिका पर फराह खान की नजर न पड़ी होती. हाल ही में एक इंटरव्यू में फराह खान ने दीपिका और अपनी फिल्म ओम शांति ओम से रिलेटेड कुछ दिलचस्प किस्से शेयर किए.

आज से 25 साल पहले फिल्म जो जीता वही सिकंदर से एक कोरियोग्राफर के तौर पर बॉलीवुड में अपना करियर स्टार्ट करने वाली फराह खान ने कहा-“मैंने दीपिका से कहा कि अगर तुम स्क्रीन टेस्ट में पास हो गई तो मैं तुम्हें शाहरुख के साथ रोल दूंगी नहीं तो मैं तुम्हें सेकेंड लीड दूंगी. दीपिका इसके लिए राजी हो गई थीं.”

लेकिन केवल स्क्रीन टेस्ट पास कर लेने से ही वह एक्ट्रेस नहीं बन गई. इसके लिए फराह को दीपिका पर काफी मेहनत करनी पड़ी. आपको तो पता ही है दीपिका साउथ इंडियन फैमिली से बिलॉन्ग करती हैं. यही वहज है कि वह हिंदी ठीक ढंग से बोल नहीं पाती थीं और यही सबसे बड़ी दिक्कत थी. इसके लिए उन्हें हिंदी क्लासेस लेनी पड़ी.

इससे रिलेटेड एक किस्से को याद करते हुए फराह ने कहा- “दीपिका अपनी हिंदी क्लास मिस कर रही थीं जिसे लेकर मैंने उन्हें डांटा और वो रो पड़ी जिससे उनका मेकअप गंदा हो गया, फिर से मेकअप करने में उन्हें फिर से 4 घंटे लगे और मुझे 4 घंटे इंतजार करना पड़ा. मैंने उस दिन सीख लिया कि हीरोइनों को कभी मत डांटो नहीं तो आपको इंतजार करना होगा.”

दीपिका में मॉर्डन हेमा मालिनी जैसी खूबियां देखने वाली फराह ने बताया कि शाहरुख खान के साथ अपना पहला रोमेंटिक सीन देते हुए वे कांपने लगी थीं. फराह ने कहा कि जब उनकी बोली में सुधार नहीं हुआ तो उन्होंने बहुत मुश्किल से दीपिका की आवाज से मिलती आवाज खोजी और ‘ओम शांति ओम’ में डबिंग कराई. लेकिन आज जिस तरह से उन्होनें अपनी भाषा को सुधारा उससे फराह बहुत खुश हैं. क्योंकि भाषा को सुधारना आसान काम नहीं होता.

अगर नरेंद्र मोदी राम तो उनके कितने हैं हनुमान

भाजपा संसदीय दल की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सांसदों की भूमिका तय कर दी है कि वे सब हनुमान हैं और खुद नरेंद्र मोदी मर्यादा पुरुषोत्तम राम हैं. हनुमान एक शक्तिशाली बंदर था जिसने कई असंभव अभियानों को अंजाम तक पहुंचाया और कभी उफ करना तो दूर की बात है राम से कोई सवाल भी नहीं पूछा. ऐसी ही निष्ठा की उम्मीद मोदी अपने सांसदों से रखते हैं कि वे सेवक बने रहें. त्रेता की रामायण और आज की लोकतान्त्रिक रामायण में कई समानताएं और कुछ असमानताएं भी हैं. मोदी ने कभी वनवास नहीं भोगा, न ही वे किसी रघुकुल में पैदा हुये थे, पर आज वाकई वे किसी चक्रवर्ती सम्राट से कम नहीं, जिसके अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े रोकने कोई लव कुश नहीं और तो और तो और इस रामायण में माता सीता होते हुये भी नहीं हैं, जो जाने कौन से गुनाह का वनवास भोगते राम राम जपने की अपनी आदत नहीं छोड़ पा रहीं.

भाजपाइयों का राम बन जाने का शौक नया नहीं है. मंदिर आंदोलन के दौरान राम का टाइटल और भूमिका लालकृष्ण आडवाणी के पास थे. वे तो रथ पर धनुष बाण लेकर ही निकलते थे कि रावण कहीं दिख भर जाये तो एक तीर में ही उसका काम तमाम कर दें. संसदीय दल की मीटिंग में वे थे, पर शायद ही हनुमान खुद को वह भी मोदी का कहलाना पसंद करें, अच्छा होता मोदी उन्हे विश्वामित्र टाइप का कोई किरदार थमा देते. राम ने छल से एक और बंदर बाली को मारा था पर मोदी तो रोज किसी न किसी बाली का राजनैतिक वध करते हैं. कांग्रेस को तो उन्होंने लंका की तर्ज पर उखाड़ ही फेंका है.

राम ने एक शूद्र स्त्री शबरी के झूठे बेर खाये थे, मोदी ने तो शबरी के बेर ही छीन लिए. रामायण में एक शूद्र था शंबूक, वह पठन पाठन का बड़ा शौकीन था, इसी शौक शौक में वह अपनी जाति भूल गया और वेदों का श्रवण पाठन करने लगा. अपना यह अपराध जब उसे समझ आया तब तक वह सुनने की शक्ति खो चुका था.

लोकतन्त्र की यह मजबूरी है कि मोदी ने इस रिवाज में कुछ छूट दे दी और दलितों को कुम्भ स्नान करा दिया, जिससे वे पवित्र भाव से मतदान करें. दलितों ने भी हालिया उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में शबरी को छोड़ राम को चुना. हनुमान की अपनी पूरी टीम थी जिसमे सुग्रीव, जामवंत, अंगद वगेरह प्रमुख थे, बेहतर होता कि मोदी मीटिंग में टाइटल वितरण भी कर देते कि कौन क्या है. इससे  लोगों को यह लोकतान्त्रिक रामायण समझने में आसानी रहती.

अब 372 में से असल हनुमान को पहचान पाना कठिन काम तो है क्योकि सारे बंदर एक से दिखते हैं. कुछ कुछ लोग अमित शाह को असली हनुमान मानते हैं, जबकि कुछ लोग उन्हे लक्ष्मण करार देते हैं. इस राम दरबार जिसे संसदीय दल की मीटिंग कहा गया में खुद को राम तो मोदी ने घोषित कर दिया, पर यह भूल गए कि राम हनुमान की ताकत से नहीं, बल्कि विभीषण की गद्दारी से जीता था. अब विभीषण कौन है लोग अभी तक अंदाजे ही लगा रहे हैं. मान लेने में हर्ज नहीं की यही राम राज्य है, जिसमें गरीबी भुखमरी और अपराध चरम पर हैं, पर चूंकि राम राज्य है इसलिए ये सब चीजें दिखेंगी नहीं, वे तो यज्ञ और हवन के धुएं में उड़ रही हैं.

त्रेता में भी यही होता था कि गुलाम और औरतें खुले आम बिकती थीं. लोग जानवरों की तरह लड़ते थे, इसलिए ऋषि मुनियों की दुकाने खूब चमकती थीं. आज भी चमकती हैं बस फर्क यह है कि राम तो एक ही है, हनुमान कई हो गए हैं, जिन्हें कुर्सी के सपने से दूर रखने समारोह पूर्वक यह खिताब दे दिया गया है जिससे उनमे दासत्व का भाव बना रहे.

मुझे एक लड़की से प्यार हो गया. मगर एकदूसरे का फोन नंबर नहीं लिया. अब क्या करूं.

सवाल
मैं बिहार का हूं. एक शादी में उत्तर प्रदेश की एक लड़की से मुलाकात हुई और प्यार हो गया. हम दोनों ने शादी का फैसला कर लिया, मगर लापरवाही की वजह से एकदूसरे का फोन नंबर नहीं लिया. मैं उसे खोना नहीं चाहता. अब क्या करूं?

जवाब

जिस की शादी में आप को वह लड़की मिली थी, उस से व उस के घर वालों से आप को उस लड़की का अतापता मिल जाएगा. उन लोगों से पता कर के आप लड़की व उस के घर वालों से शादी की बात करें.

बाप-बेटे दोनों के साथ इश्क लड़ा चुकी हैं ये हॉट हीरोइनें

बॉलीवुड में हीरो तो काफी लंबी उम्र तक हीरो के रूप में ही काम करते रहते हैं, लेकिन हीरोइन लंबे समय तक नायिका नहीं बनी रह सकती. यही कारण है कि अक्सर ऐसा हुआ है जब नायक के रूप में बाप और बेटे दोनों ने ही एक ही हीरोइन के साथ फिल्मी पर्दे पर रोमांस किया है. आज हम आपको बताएंगे ऐसी ही कुछ बॉलीवुड अभिनेत्रियों के बारे में जिन्होंने फिल्मों में बाप बेटे दोनों के साथ इश्क लड़ाया है.

सनी देओल और धर्मेन्द्र दोनों हीरो बन कर लंबे समय तक साथ आते रहें हैं और रोमांस करते रहे. धर्मेन्द्र और सनी जब साथ में हीरो बन कर आते रहे तब कई  नायिकाओं ने दोनों के साथ फिल्मों में रोमांस किया.

माधुरी दीक्षित ने ‘दयावान’ में विनोद खन्ना के साथ रोमांस किया. फिल्म में उन्होंने इतना हॉट किस दिया कि आज भी लोग इस सीन को देख आश्चर्य में डूब जाते हैं. ‘मोहब्बत’ में उन्होंने अक्षय खन्ना के साथ मोहब्बत की.

डिम्पल कपाड़िया के नाम पर तो और भी बड़ा रिकॉर्ड है. वे धर्मेन्द्र-सनी के साथ-साथ विनोद और अक्षय खन्ना की भी हीरोइन बनीं. डिम्पल ने जहां धर्मेन्द्र के साथ बंटवारा, शहजादे जैसी फिल्में की तो दूसरी ओर सनी के साथ अर्जुन, गुनाह, आग का गोला, मंजिल-मंजिल जैसी फिल्मों में इश्क फरमाती नजर आईं. विनोद खन्ना के साथ डिम्पल ने खून का कर्ज, इंसाफ जैसी फिल्में की. अक्षय खन्ना के साथ वे ‘दिल चाहता है’ में नजर आईं, जिसमें कम उम्र  के युवक का अधिक उम्र की महिला के प्रति आकर्षण को दर्शाया गया था.

हेमा मालिनी की पहली हिंदी फिल्म है ‘सपनों का सौदागर’. उसमें राज कपूर उनके नायक थे. बतौर हीरो राज कपूर का करियर अंतिम दौर में था. इसके बाद हेमा मालिनी ने राज कपूर के बेटे रणधीर कपूर के साथ ‘हाथ की सफाई’ की. राज कपूर के मंझले बेटे ऋषि कपूर के साथ भी वे ‘एक चादर मैली सी’ में नजर आईं.

श्रीदेवी जब बतौर हीरोइन अपने करियर के शिखर पर थीं तब धर्मेन्द्र और सनी देओल भी हीरो बन कर फिल्मों में आ रहे थे. धर्मेन्द्र के साथ बतौर हीरोइन श्रीदेवी ने ‘नाकाबंदी’ की. जबकि सनी देओल के साथ वे चालबाज, निगाहें, राम अवतार सहित कुछ फिल्मों में नजर आईं.

सनी देओल की पहली फिल्म ‘बेताब’ की हीरोइन अमृता सिंह थीं. किसी ने तब सोचा भी नहीं होगा कि आगे चलकर ये सनी पुत्तर के पिता गरम धरम की हीरोइन भी बनेंगी. फिल्म ‘सच्चाई की ताकत’ में अमृता को धर्मेन्द्र की हीरोइन बनने का अवसर मिला.

जया प्रदा ने धर्मेन्द्र के साथ गंगा तेरे देश में, कुंदन, ऐलान-ए-जंग, मर्दों वाली बात, कयामत, फरिश्ते, शहज़ादे, न्यायदाता जैसी कई फिल्में कीं. वहीं सनी देओल के साथ वे वीरता और ज़बरदस्त में हीरोइन के रूप में नजर आईं.

फिल्म लाल बादशाह में शिल्पा शेट्टी को अमिताभ बच्चन की नायिका बनने का अवसर मिला. अभिषेक के साथ शिल्पा ने ‘फिर मिलेंगे’ की, लेकिन इसमें वे अभिषेक की हीरोइन नहीं थीं हालांकि दोनों के बीच कई दृश्य थे.

इसी तरह ऐश्वर्या राय बच्चन ने अभिषेक के साथ कुछ ना कहो, गुरु, उमराव जान, बंटी और बबली, रावण जैसी फिल्में की. दूसरी ओर अमिताभ बच्चन के साथ उन्होंने कुछ फिल्में की, लेकिन बतौर हीरोइन कभी अमिताभ के साथ नजर नहीं आईं. कजरारे-कजरारे गाने में वे जरूर अमिताभ के साथ दिखाई दी थीं, लेकिन इस आधार पर शिल्पा या ऐश्वर्या को इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.

वो 5 शराबी एक्ट्रेस, जिन्होंने सारी हदें की थी पार

हाल ही में कैंसर से खुद को बचाने वाली मनीषा कोइराला शराब के लत में इतनी फंस चुकी थीं कि उन्हें कई तरह की बीमारियों ने घेरा था. शादी के बाद रिश्ता भी टूट गया. मनीषा कोइराला शराब के चक्कर में अपनी स्किन भी खराब कर चुकी हैं.

दो बेटियों को गोद लेने वाली हर बार अपने लिंकअप्स के चलते बॉलीवुड में चर्चा का विषय बनी रहती हैं सुष्मिता सेन. सुष की इस बात को बहुत कम लोग ही जानते हैं कि उन्हें शराब की बुरी लत है. सिंगल मदर सुष्मिता सेन शराब पीती हुई कई पार्टी में नज़र आ चुकी हैं.

बॉलीवुड की ट्रैजेडी क्वीन मीना कुमारी परदे पर जो अभिनय करती थीं, उसके सामने दिलीप कुमार जैसे अभिनेता भी फेल हो जाते थे. पर्दे पर बेहतरीन एक्टिंग करने वाली मीना कुमारी नीजी ज़िंदगी में भी बहुत शराब पीती थीं. उनकी मौत भी इसके कारण ही हुई थी.

बीते जमाने की अदाकारा राखी की एक्टिंग से आप भी बहुत प्रभावित हुए होंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं कि राखी को शराब की बुरी लत है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार राखी को शराब पीने की बुरी लत प्यार में दिल टूटने के कारण लगी.

गदर एक प्रेम कथा में माइलस्टोन रोल करते हुए दर्शकों का मन मोहने वाली अमीषा पटेल अपनी निजी ज़िंदगी में कई बार अपने कपड़ों को लेकर चर्चा का विषय बनी रहती हैं. इतना ही नहीं कई बार तो उनके पीने के बाद उनकी बुरी दशा भी मीडिया में छाई रही.

गुरमेहर की अभिव्यक्ति और भजभज मंडली की परेशानी

दिल्ली के एक कालेज की छात्रा गुरमेहर कौर का दिलेरी से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से पंगा लेना भजभज मंडली को पसंद नहीं आया. उस पर देशद्रोही होने का आरोप तो मंडली नहीं लगा सकी क्योंकि वह कारगिल युद्ध में शहीद हुए कैप्टन मंदीप सिंह की बेटी जो है पर उस को बुराभला कहने में कोई कसर नहीं छोड़ी. ऋषियोंमुनियों के चरणस्पर्श कर के धन्य समझने वालों ने उसी भाषा का इस्तेमाल किया जो वे ऋषिमुनि, राजाओं और सामान्य व्यक्तियों से ग्रंथों में कहते पाए जाते हैं, जैसे तरहतरह के श्राप देना. कुछ ने उसे पथभ्रष्ट माना तो कुछ ने उसे नर्क में सड़ने का आदेश दिया. कुछ चार कदम आगे निकल गए और बिना सोचेसमझे उसे वेश्या या बलात्कार का उपयुक्त पात्र मानने लगे. बजाय उस की बात सुनने के, उस की जबान खींचने की कोशिश की गई.

ये उपाय सदियों से किए जा रहे हैं. कितने ही दस्युराजाओं को छलकपट से देवतास्वरूप राजाओं ने ऋषियोंमुनियों से श्राप दिलाने का भय दिखा कर हराया है और एकलव्य व शंबूक जैसों को सीधा किया है.

ईसाई चर्च, इसलामी मुल्लों और हिंदू पंडों ने एकसा व्यवहार किया है इस मामले में. और अगर दूर का भी यह अंदेशा हो कि एक मशाल ऐसी जल रही है जो कागजी महलों को जला सकती है तो उसे बुझा दिया जाता है.

वैसे तो धर्म के नाम पर सदा राजाओं और धर्र्म के दुकानदारों ने शक्ति हासिल कर राज किया है पर अब लोकतांत्रिक अधिकारों के जमाने में हर रोज ऐसे मुद्दे खड़े हो रहे हैं जो धार्मिक साम्राज्य पर हमला करते हैं. इन का मुकाबला करना जरूरी होता जा रहा है. गुरमेहर कौर ने धर्म के खिलाफ कुछ नहीं कहा पर धर्म की रक्षक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को चुनौती दे डाली. उस का यही एक बड़ा गुनाह है, शंबूक के वेद पढ़ने और एकलव्य के धनुर्विद्या सीखने की तरह का.

उसे धमकाने को सैकड़ों पंडे और द्रोणाचार्य खड़े हो गए क्योंकि देश की धुरी 1947 के बाद से ही उन के हाथों में है जो पूजापाठ के सहारे शासन करना चाहते हैं और जिन्होंने न जाने कैसे अभिव्यक्ति की आजादी को देने वाला संविधान स्वीकार कर लिया पर अब देशभक्ति के नाम पर अभिव्यक्ति को दिखावटी गहने का सा बनाने की

कोशिश की जा रही है. अगर विचारों की अभिव्यक्ति वास्तव में एक स्वतंत्रता होती तो गुरमेहर कौर को शासकों से सीधे गालियां न सुननी पड़तीं और उसे मुंह बंद रखने का फैसला न करना पड़ता.

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