मोबाइल और आईपैड, व्हाट्सऐप और इंस्टाग्राम, कपिल शर्मा का कौमेडी शो और डीजे के म्यूजिक के परे की दुनिया को आज जिस तरह से इग्नोर किया जा रहा है, यह अगले 5-7 साल में अपना असर दिखाने लगेगा. आज के किशोरों को इन खिलौनों के वीडियो गेम्स में मजा तो आता है पर ये सब बदन पर जंग लगाने वाले हैं, माइंड को रस्टी करने वाले हैं.

मानव की मूलभूत जरूरतों से इन का सीधा संबंध नहीं है. ये किसी को तेज नहीं बनाते, नई जानकारी नहीं देते, कुछ करने की प्रेरणा नहीं देते. टैकी होने से कोई नया कुछ ईजाद कर ले जरूरी नहीं. हो सकता है वे इन बेहद उलझी तकनीकों का पूरा लाभ उठा पा रहे हों पर वे सुख को पास ले आएं जरूरी नहीं.

इतिहास के पन्ने खोल कर देखेंगे तो पता चलेगा कि आदमी तब खुश हुआ जब उस ने उत्पादन के और तरीके ढूंढ़े. आज भी बहुतकुछ नया बन रहा है पर लग रहा है कि जनता का बड़ा हिस्सा जो नया बन रहा है उस का गलत इस्तेमाल कर रहा है.

हिंसा से भरे वीडियो गेम्स रोमांच पैदा करते हैं और किशोरों को शैतानियों से रोकते हैं, पर वे ही उन आत्मघाती हमलों के लिए तो जिम्मेदार नहीं जिन से आज दुनिया भर में खौफ है. इन खेलों में खिलाड़ी एक नहीं कईकई को मारता है और जितनों को मारता है, उतने ज्यादा अंक मिलते हैं. यही गुस्सा फेसबुक और व्हाट्सऐप पर अनर्गल गालियों में दिखता है जो दूसरे देश, धर्म, रंग वाले के लिए कही जाती हैं. यही गुस्सा अब वोटरों की पसंद में बदल रहा है. हर देश में गुस्सैलों का राज होने लगा है. जिस ने जितने मारे वह उतना ही मजबूत.

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