गौडफादर होना जरूरी : सना खान

मौडलिंग से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली हीरोइन सना खान मुंबई की रहने वाली हैं. उन्होंने कई इश्तिहारों, फीचर फिल्मों और टैलीविजन के रिऐलिटी शो में काम किया है. 17 साल की उम्र में उन्होंने पहली ऐड फिल्म की थी, जिस को बहुत तारीफ मिली थी. ऐड से ही उन्हें फिल्मों के औफर मिलने शुरू हुए.

पेश हैं, सना खान से हुई बातचीत के खास अंश:

आप अपने बारे में कुछ बताएं?

कोई भी चीज आप को कभी भी आसानी से नहीं मिलती. हर काम में मेहनत होती है. मैं ने मौडलिंग के साथसाथ रिऐलिटी शो से अपना कैरियर शुरू किया और फिल्मों की तरफ आई. मैं दक्षिण भारतीय फिल्में भी कर चुकी हूं. अगर वहां कुछ अच्छा काम मिलेगा, तो मैं फिर करना चाहूंगी.

गौडफादर न होने से फिल्म इंडस्ट्री में काम मिलना कितना मुश्किल होता है?

इंडस्ट्री के बाहर के लोगों को काम मिलना बहुत ही मुश्किल होता है, फिल्मी सितारों के बच्चों के काम को दर्शक देखना चाहते हैं. उन की पहली या दूसरी फिल्म फ्लौप हो भी जाए, तो भी उन्हें एक मौका फिर से मिलता है, जो बाहर वालों को नहीं मिलता.

आप को फिल्म इंडस्ट्री में किस तरह की जद्दोजेहद करनी पड़ी?

पहले तो यहां काम मिलना मुश्किल होता है, फिर अच्छे रोल की चाहत होती है. कई बार ऐसे में जो भी काम मिलता है, उसी में संतुष्ट होना पड़ता है, क्योंकि परदे पर आना, दिखना भी तो जरूरी है. एक काम से ही दूसरा काम मिलता है.

क्या आप का फिल्मों में आना इत्तिफाक था या बचपन से इच्छा थी?

इत्तिफाक ही था. मैं ने कभी नहीं सोचा था कि मैं फिल्मों में काम करूंगी. मैं तो पढ़लिख कर एक अच्छी नौकरी कर सैटल होना चाहती थी.

मैं ने कालेज के दौरान टाइमपास के लिए मौडलिंग शुरू की थी और कब यह मेरा जुनून बन गया, पता भी नहीं चला. अब मैं यही करना चाहती हूं.

आप आगे कौन सी फिल्में कर रही हैं?

अभी एक कौमेडी फिल्म ‘टौम डिक ऐंड हैरी’ कर रही हूं, जिस की शूटिंग शुरू हो चुकी है. वह अगले साल रिलीज होगी.

आप को किस तरह की फिल्मों में काम करना पसंद है?

मुझे रोमांटिक, ऐक्शन और थ्रिलर फिल्में बहुत पसंद हैं. लेकिन फिल्म साइन करते समय सब से पहले मैं बैनर देखती हूं, उस के बाद फिल्म के डायरैक्टर, स्क्रिप्ट, फिर स्टार कास्ट को देखती हूं.

आप के यहां तक पहुंचने में परिवार का कितना सहयोग रहा?

परिवार में मेरी मां का सब से ज्यादा सहयोग रहा. मैं अपनी मां के साथ रहती हूं.  जब मैं परेशान रहती थी, तो उन का सहयोग हमेशा मिलता था.

फिल्मों में प्यारमुहब्बत के सीन करने में आप कितना सहज रहती हैं?

मैं तो कभी भी सहज नहीं रहती हूं और चाहती हूं कि ऐसे सीन हों भी नहीं. लेकिन आज इंडस्ट्री बदल रही है. दर्शकों की पसंद बदल रही है.

फिल्म की स्क्रिप्ट अगर अच्छी है, तो थोड़ाबहुत ऐसे सीन की वजह से मैं उसे छोड़ नहीं सकती, क्योंकि मैं एक कलाकार हूं और मुझे हर तरह के सीन करने हैं.

आप कितनी फैशनेबल हैं और क्या मेकअप पसंद करती हैं?

मुझे फैशन करना पसंद है. मेकअप करना भी अच्छा लगता है. मैं खुद ही अपना मेकअप और हेयर स्टाइल करती हूं.

आप को कभी ‘कास्टिंग काउच’ का सामना करना पड़ा?

यकीनन करना पड़ा और इंडस्ट्री में सभी को करना पड़ता है. मैं मुंबई से हूं, पर शुरुआत में बहुत संघर्ष रहा, क्योंकि तब आप को कुछ पता नहीं होता है, जिस का फायदा लोग उठाना चाहते हैं.

मेरे सामने ऐसे कई लोग आए, जिन्होंने फिल्म में काम करने के लिए अजीब शर्त रखी. मैं सोचती हूं कि क्या उन्होंने अपना चेहरा आईने में नहीं देखा? आसपास गंदे लोग बहुत हैं. पर जिन्हें काम देना होता है, वे ऐसी घटिया बातें नहीं करते.

डांस सब से आसान होता है : सिमरन शेख

गरीब परिवार में जनमी सिमरन शेख ने 9 साल की कम उम्र में ही डांस करना शुरू किया था, ताकि स्टेज शो कर के घर की जरूरतों को पूरा किया जा सके. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की रहने वाली सिमरन शेख का परिवार बाद में मुंबई में रहने लगा था. उन्होंने न केवल डांस के जरीए अपने घर की माली मदद की, बल्कि अपनी पढ़ाई भी जारी रखी. 19 साल की उम्र में सिमरन शेख ने भोजपुरी, हिंदी और मराठी फिल्मों में अपनी एक अलग पहचान बना ली है. उन्होंने 2 भोजपुरी फिल्मों के साथ कई वीडियो अलबम और मराठी फिल्में भी की हैं. वे विदेशों में भी अपने डांस शो कर चुकी हैं. पेश हैं, सिमरन शेख के साथ की गई बातचीत के खास अंश:

आप के लिए 9 साल की कम उम्र में ही डांस शो करना क्यों जरूरी हो गया था?

परिवार में कुछ हालात ऐसे बन गए थे कि जिंदगी मुश्किल हो गई. गरीबी आ गई. ऐसा लगा कि पढ़ाई और जिंदगी दोनों रुक जाएंगी. स्टेज पर डांस करना ही सब से आसान काम दिखाई दे रहा था. इस में रोज पैसा मिल जाता था.

मुंबई में ऐसे बहुत सारे स्टेज शो होते थे, जहां बच्चों को भी डांस करने को मिल जाता था. यहीं काम शुरू हो गया. इस के सहारे जिंदगी की मुश्किलें कम होने लगीं. डांस शो करना कैरियर बन गया. उम्र के साथ डांस बढ़ता गया. साथ ही साथ मैं ऐंकरिंग भी करने लगी. मेरी आवाज अच्छी है, तो गाने भी गाने लगी. डांस से ज्यादा पैसा ऐंकरिंग से मिलने लगा, तो इस काम को ज्यादा करने लगी.

डांसर के रूप में आप को कभी ऐसे हालात से रूबरू होना पड़ा, जो पसंद न आए हों?

मैं ने बचपन से डांस करना शुरू कर दिया था. मुझे देखने वाले की नजर से ही पता चल जाता था कि वह क्या सोच रहा है. ऐसे में मैं उस से दूरी बना लेती थी. हर जगह अच्छे लोग भी होते हैं. दर्शक कई बार ऐसे हालात बना देते हैं, जो डांसर को पसंद नहीं आते, पर वह उन हालात को संभाल लेता है.

ऐक्टिंग के क्षेत्र में आप ने कैसे कदम रखा?

जब मैं ने डांस के साथसाथ बतौर ऐंकर और सिंगर के रूप में काम करना शुरू किया, तो लोगों ने कहा कि मैं बहुत सारे काम कर सकती हूं. मुझे लगा कि ऐक्टिंग भी की जा सकती है. मेरे कुछ जानकार थे. उन की तरफ से फिल्मों में काम करने के औफर आए. वे सब भोजपुरी फिल्में थीं. मेरी अपनी बोली भोजपुरी है, इसलिए मैं ने फिल्में कीं और वीडियो अलबम भी किए. अब मैं मराठी फिल्म भी कर रही हूं.

आप किस क्षेत्र को ज्यादा अच्छा मानती हैं?

मुझे अच्छी ऐक्टिंग पसंद है. मैं ऐक्टर बनना चाहती हूं. पर मैं सभी काम करना पसंद करती हूं. सिंगर और परफौर्मर के रूप में मेरी अच्छी इमेज है. मैं ब्रिटेन, मलयेशिया, इंडोनेशिया, दुबई, मौरीशस और बैंकौक में शो कर चुकी हूं.

मेरी 2 भोजपुरी फिल्में ‘नजरिया काहके लडावल’ और ‘सजनवा बड़ा दिलवाला’ लोगों को पसंद आईं. अभी कुछ और फिल्मों के साथ मराठी फिल्म भी शूट हो रही है.

आप की जिंदगी बहुत जद्दोजेहद से भरी रही है. आप रिश्तों को कैसे देखती हैं?

जिंदगी की भागदौड़ में रिश्ते कई बार बहुत पीछे छूट जाते हैं. परिवार के साथ अब दोस्तों के बीच भी रिश्ते बनते हैं. हर जगह अच्छे लोग भी होते हैं, जो सही सलाह देते हैं, मदद करते हैं. जिंदगी की जद्दोजेहद जीने की कला सिखा देती है. अच्छे रिश्तों को संभालने की जरूरत होती है.

आप को और क्या क्या पसंद है?

मुझे डांस और सिंगिग ही सब से ज्यादा पसंद हैं. मुझे खाने में सादा खाना बहुत अच्छा लगता है. अगर अपने हाथ से बना कर खाना हो, तो मैं दालचावल, भिंडी की सब्जी और चिकन खाना पसंद करती हूं. पहनने में मुझे आरामदायक पोशाक पसंद है.

क्या आप ‘सरस सलिल’ पत्रिका पढ़ती हैं?

हां, मैं ‘सरस सलिल’ पढ़ती हूं. इस की सब से बड़ी वजह यह है कि इस में गांव, गरीब, मजदूर को ध्यान में रख कर लिखा जाता है. बहुत गंभीर बातों को आसान शब्दों में समझाया जाता है.

दलितों से खाने पीने में भी भेदभाव

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने इस बार न के बराबर प्रचार किया था, लेकिन जितना किया उस में अपनी जिंदगी से ताल्लुक रखती एक अहम बात यह बताई थी कि राजनीति के शुरुआती दिनों में जब वे गांवगांव घूमते मुचैराह गांव पहुंचे थे, तो वहां उन्होंने छोटी जाति वालों का दिया गुड़ खा लिया था. इस पर उन के गांव वालों ने उन का और उन के परिवार का बहिष्कार कर दिया था. बाद में ग्राम प्रधान की दखलअंदाजी के चलते मामला आया गया हो गया था.

यह दीगर बात है कि मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री रहते कभी इस अहम वाकिए का जिक्र नहीं किया, लेकिन तकरीबन 40 साल बाद गांवदेहातों और एक हद तक शहरों से भी इस तरह की छुआछूत बंद हो गई है, यह न तो मुलायम सिंह यादव कह सकते हैं और न ही बसपा प्रमुख मायावती ही दावा कर सकती हैं, फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तो किसी तरह की उम्मीद करना ही बेकार है.

दरअसल, जातिगत छुआछूत व भेदभाव और जोरजुल्म धर्म की देन हैं. नेता तो इस के तवे पर अपनी रोटियां सेंकते हैं. साल 2016 में नेताओं में तो होड़ सी लग गई थी कि कौन दलितों के घर जा कर ज्यादा से ज्यादा खाना खाता है. इस में भी खास मुकाबला भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बीच था. दोनों ने ही दलितों के घर जा कर खाना खाया था और यह जताने की कोशिश की थी कि वे ही दलितों के सच्चे हमदर्द हैं.

दलितों के घर जा कर उन की औरतों के हाथ का बना खाना खा कर की जाने वाली सियासत इस लिहाज भी गौर करने के काबिल है कि ऊंची जाति वाले नेता ही दलितों के घर गए.

दूसरी बात यह कि आज भी गांवदेहातों में दलितों के साथ दूसरी ज्यादतियों के साथसाथ खानेपीने में भी भेदभाव किया जाता है, जिस से उन में उन के दलित यानी शूद्र और पिछले जन्म के पापी होने का डर भरा रहे.

मायावती, रामविलास पासवान या कोई और दलित नेता किसी दलित के घर जा कर खाना खाता, तो ज्यादा तो क्या तनिक भी हल्ला नहीं मचता.

दूसरे लफ्जों में कहें, तो हल्ला इसलिए मचता है कि ऊंची जाति वाले नेता दलितों के घर जा कर खाना खाते हैं यानी उन पर एहसान करते हैं. ठीक वैसे ही जैसे राम ने एक दलित औरत शबरी के दिए जूठे बेर खा कर उस पर एहसान किया था.

हो जाता है धर्म भ्रष्ट

दलित के घर गुड़ खाने पर मुलायम सिंह यादव के परिवार का बहिष्कार सैफई गांव में हुआ था, यह बात कतई हैरानी की नहीं है. ऐसा आज भी इफरात से होता है कि दलित के घर खाना तो दूर की बात है, ऊंची जाति वाले उन के सामने पड़ने से भी कतराते हैं, क्योंकि धार्मिक किताबों में लिखा है कि सुबहसुबह उन का चेहरा देखने से धर्म भ्रष्ट हो जाता है.

मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में एक महल्ला है, जिस का नाम साहू महल्ला है. अब से तकरीबन 20 साल पहले तक इस बड़े शहर के लोग सुबहसुबह इस महल्ले से हो कर नहीं गुजरते थे, क्योंकि सुबह साहू यानी तेलियों का चेहरा देखने से दिन अच्छा नहीं गुजरता, यह माना जाता है. साहू या तेली जाति पूरी तरह से अछूतों की जमात में नहीं आती है, बल्कि उस की गिनती पिछड़े तबके में होती है.

आज उसी जबलपुर समेत देशभर के लोग सुबहसुबह जब टैलीविजन देखते हैं, तो उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा देखने में परहेज नहीं होता, उलटे देशभर में लोग उन के पैर पड़ते हैं.

हालांकि लोगों के दिलोदिमाग में बैठी छुआछूत की हकीकत केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने उत्तर प्रदेश चुनाव प्रचार के दौरान ही यह कहते हुए बताई थी कि चूंकि वे छोटी जाति के हैं और प्रधानमंत्री बन गए हैं, तो कइयों को यह नागवार गुजरता है.

इधर देहातों में आलम यह है कि अगर कोई दलित सामने पड़ जाए, तो ऊंची जाति वाले नाकभौं सिकोड़ लेते हैं. हर गांव में बिजली और सड़क आ जाने के बाद भी दलित महल्ले अलग हैं, क्योंकि दलितों को ऊंची जाति वालों के बराबर रहने का हक आज भी नहीं है.

विदिशा के पास के एक गांव ढोलखेड़ी में अब एक ही ब्राह्मण परिवार बचा है, जिस के एक नौजवान का कहना है कि आज भी उस के पिता या चाचा को मजबूरी में अगर दलित महल्ले से हो कर गुजरना पड़ता है, तो वे घर आ कर नहाते हैं.

इस नौजवान के मुताबिक, जब ऊंची जाति वालों के यहां तेरहवीं होती है, तो छोटी जाति वालों को पूजापाठ की जगह से बहुत दूर बैठा कर खाना खिलाया जाता है, जिस से भगवान का और ऊंची जाति वालों का धर्म भ्रष्ट न हो.

दलितों को खाना तो अलग दूर बैठा कर खिलाया ही जाता है, पर इस पर भी शर्त यह है कि दलित अपने बरतन अलग से लाएं, जिस से उन के जूठे बरतन धोने का पाप ऊंची जाति वालों को न लगे.

गांवों में तेरहवीं में पूरे गांव को न्योता देना आम बात है, जिस में छुआछूत की नुमाइश खुलेआम होती है. अपने बराबरी वालों को तंबू में बैठाया जाता है, पर दलितों को दूर रखा जाता है.

दलित क्यों ऊंची जाति वालों के यहां तेरहवीं में खाना खाने जाते हैं, यह हालांकि अलग बहस की बात है, पर भोपाल के नजदीक बैरसिया के रहने वाले एक दलित मंशाराम की मानें, तो यह रिवाज पीढि़यों से चला आ रहा है. अगर वे उन के यहां न जाएं, तो उन पर और ज्यादा जुल्म ढाए जाते हैं.

बात अजीब है, पर है सच कि जिस के पीछे मंशा यह है कि दलितों को बेइज्जत करने और उन्हें उन के दलितपन का एहसास कराने का कोई मौका ऊंची जाति वाले नहीं छोड़ते.

तेरहवीं में तो बुलाते हैं, पर यही ऊंची जाति वाले शादीब्याह में दलितों को आमतौर पर नहीं बुलाते, क्योंकि यह शुभ और मांगलिक काम होता है.

दलित अगर महंगी शादी करें, तो भी आएदिन बवाल मचने की खबरें देशभर से आती रहती हैं. दलित दूल्हों के घोड़ी पर चढ़ने को ले कर हर कहीं उन्हें मारापीटा जाता है और डरायाधमकाया भी जाता है.

फर्क सियासत और धर्म में

 धर्म के नाम पर दलितों पर जोरजुल्म करने की बीमारी कभी दूर होगी, ऐसा लग नहीं रहा. इस की वजह सियासत कम धर्म ही ज्यादा है.

नामी नेता दलितों के घर जा कर खाना खाते हैं, उन की मंशा भले ही सियासत की हो, पर कभी किसी शंकराचार्य या धर्मगुरु ने क्यों इस तरह की सुर्खियां बटोरने की कोशिश नहीं की?

इस सवाल का जवाब साफ है कि ऐसे लोग ही छुआछूत, भेदभाव और जातिगत अत्याचार बनाए रखना चाहते हैं. अगर वे भी नेताओं की तरह दिखावे के लिए ही सही दलितों के यहां खाना खाने लगेंगे, तो पंडों की दुकानें बंद हो जाएंगी, जो धर्म के नाम पर ही चलती हैं.

अमित शाह या राहुल गांधी के दलितों के घर खाना खाने पर मायावती तिलमिला कर कहती हैं कि खाना खाने के बाद वे घर जा कर नहाए थे, तो यह इलजाम सियासी हो सकता है, लेकिन हकीकत में मायावती एक सच भी कह रही होती हैं कि अभी भी सवर्ण किस हद तक दलितों से बैर रखते हैं.

यह वह दौर है, जब भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दलित होने के माने बदलने की कोशिश, जिसे साजिश कहना बेहतर होगा, रच रहे हैं कि पैसे वाले दलितों को ऊंची जाति का मान लिया जाए. इस से हिंदुओं की तादाद भी बढ़ेगी और पंडों को अच्छीखासी दक्षिणा भी मिलेगी.

इन की मंशा अगर वाकई समाज और देश से छुआछूत और जातिगत भेदभाव मिटाने की होती, तो ये पहले भीमराव अंबेडकर की तर्ज पर धार्मिक किताबें जलाने की बात करते, क्योंकि आदमी को आदमी न मानने का रोग आया तो इन्हीं किताबों से है.

दरअसल, भगवा ब्रिगेड को एक बड़ा डर यह सता रहा है कि अगर पढ़ेलिखे और पैसे वाले दलितों को वक्त रहते अपने पाले में नहीं लाया गया, तो ये लोग ऊंची जाति वालों को ही अछूत बना कर अपना एक अलग समाज बना लेंगे.

इस वजह से ऊंची जाति वाले अछूत और अल्पसंख्यक हो जाएंगे यानी इनसानियत या धर्म नहीं, बल्कि अलगथलग पड़ जाने का डर और दक्षिणा का लालच अब ऊंची जाति वालों को मजबूर कर रहा है कि वे अपना मन मारते हुए कुछ दलितों का हाथ थामें, लेकिन ऐसा सच में नहीं हो रहा है, बल्कि दिखावे के लिए ज्यादा हो रहा है, क्योंकि हजारों सालों से ऊंची जाति वाला होने का गरूर दूर होने में भी हजारों साल लग जाएंगे, इसलिए कुछ फीसदी पैसे वाले दलितों को घेरा जा रहा है, जिस से गरीब दलितों को लतियाया जा सके.

मिरर गेम : मनोविज्ञान पर स्तरहीन फिल्म

मूलतः आईटी प्रोफेशनल विजित शर्मा पहली बार बतौर लेखक व निर्देशक रहस्य व रोमांच प्रधान मनोवैज्ञानिक फिल्म ‘‘मिरर गेमःअब खेल शुरू’’ लेकर आए हैं. मनोचिकित्सक प्रोफेसर के इर्द गिर्द घूमने वाली यह फिल्म प्रभावित नहीं करती. दर्शकों को दुविधा में डालने के प्रयास में रहस्यमय परिस्थितियों को पैदा करते हुए लेखक निर्देशक स्वयं कन्फ्यूज हो गए हैं.

फिल्म की कहानी के केंद्र में मनोचिकित्सक प्रोफेसर जय वर्मा (परवीन डबास) हैं. प्रोफेसर वर्मा के एक विद्यार्थी रणवीर भार्गव ने दो वर्ष पहले आत्महत्या कर ली थी, जिसके लिए प्रोफेसर जय वर्मा खुद को दोषी मानते हैं, इसलिए वह अपना ईलाज डा.सोनल से करवा रहे हैं. वह अपने प्रोफेसर के काम को भी सही ढंग से अंजाम नहीं दे पा रहे हैं. विश्वविद्यालय में उनकी पत्नी तान्या वर्मा (शान्ति अकिनेनी) का रोनी (ध्रुव बाली) के साथ रोमांस की चर्चाएं हैं. पर जय वर्मा को तान्या के प्रेमी का नाम नहीं पता. घर के अंदर पति पत्नी के बीच मधुर संबंध नहीं हैं. तान्या चाहती है कि जय वर्मा उसे तलाक दे दे, मगर जय वर्मा ऐसा नहीं करना चाहते. जय की सोच है कि जो उनकी नहीं हो सकती, वह दूसरे की कैसे हो जाए. इसलिए वह तान्या की हत्या करना चाहते हैं.

इस बीच रोनी उनके पास विद्यार्थी बनकर आता है और उनसे अपने शोधकार्य में मदद चाहता है. जय वर्मा को लगता है कि इसके माध्यम से वह अपना काम कर सकते हैं. जय वर्मा, रोनी की मदद इस शर्त पर करने के लिए तैयार होते हैं कि वह उनकी पत्नी की हत्या उनकी योजना के अनुसार कर दे. जय वर्मा की योजना है कि वह रोनी व तान्या दोनों को खत्म कर देंगे. उसके बाद शुरू होता है रहस्य का खेल.

तान्या के गायब हो जाने के बाद पुलिस की जांच शुरू होती है. पुलिस जांच अधिकारी शेणाय (स्नेहा रामचंद्रन) पुलिस मनोचिकित्सक डा. राय (पूजा बत्रा) भी इस जांच का हिस्सा बन जाती हैं. पुलिस को लगता है कि जय वर्मा सीजोफ्रेनिया का शिकार है. उसके दो रूप हैं और उसी ने अपनी पत्नी तान्या को गायब किया है. पता चलता है कि यह रोनी ही तान्या का प्रेमी है जो कि प्रोफेसर जय वर्मा से अपने भाई रणवीर भार्गव की मौत का बदला लेने के लिए तान्या से झूठा प्यार का नाटक कर रहा है. जय वर्मा के फंस जाने पर  रोनी खुद ही तान्या को सच बताकर उसकी हत्या कर देता है. उधर जय वर्मा की शतरंजी चाल में फंस कर रोनी मारा जाता है. बाद में जय वर्मा भी सारे आरोपों से बरी हो जाते हैं. और डा. सोनल के साथ नई जिंदगी शुरू करते हैं.

लेखक निर्देशक विजित शर्मा यदि अपनी फिल्म को इंसानी मनोविज्ञान तक ही सीमित रखते तो शायद फिल्म बेहतर बन जाती. मगर बदले की भावना की कहानी के साथ दर्शकों के मन में शक की सुई इधर उधर घुमाने के चक्कर में जिस तरह के घटनाक्रम गढ़े गए हैं, उससे फिल्म स्तरहीन हो जाती है. फिल्म सीजोफ्रेनिया और मल्टीपल पर्सनालिटी डिसआर्डर की बात करती है, मगर लेखक व निर्देशक की अपनी कमजोरियों के चलते यह बात ठीक से उभर नहीं पाती कि इस तरह की बीमारी से ग्रसित इंसान के दिमाग में उस वक्त क्या चल रहा होता है.

इस विषय पर अति रोचक व अति संजीदा फिल्म बन सकती थी, लेकिन विजित शर्मा पूरी तरह से असफल रहे. पूरी फिल्म में एक भी दृश्य में जय वर्मा अपनी दिमागी बीमारी से जूझते नजर नहीं आते. दवा का सेवन बंद करने के बावजूद वह एक उच्च स्तर के प्रोफेसर की तरह कई तरह की बुद्धिमत्तापूर्ण योजनाएं बनाते रहते हैं. दूसरी बात फिल्म में तकनीकी शब्द उपयोग किए गए हैं और उनका अर्थ भी नहीं स्पष्ट किया गया, जिससे आम दर्शक बोर हो जाता है. किसी भी किरदार को पूरी गहराई के साथ पेश नहीं किया गया. फिल्म का अंत क्या होगा, यह इंटरवल से पहले ही समझ में आ जाता है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो परवीन डबास और शांति अकिनेनी ने ठीक ठाक अभिनय किया है. मगर सीजोफ्रेनिया ग्रसित इंसान की दिमागी हालत को परवीन डबास ठीक से परदे पर नहीं ला सके, अब इसमें पटकथा लेखक व निर्देशक की भी कमजोरी रही है. पर फिल्म में पूजा बत्रा को छोटे से किरदार में जाया किया गया है. स्नेहा रामचंद्रन का किरदार भी उभर नही पाता. ध्रुव  बाली कुछ दृश्यों में ही जम पाए हैं.

एक घंटे 47 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘मिरर गेमःअब खेल शुरू’’ का निर्माण राहुल कोचर, सह निर्माण, लेखन व निर्देशन विजित शर्मा ने किया है. कैमरामैन जोश इथेवारिया, गीतकार सिद्धांत कौशल तथा कलाकार हैं-परवीन डबास, पूजा बत्रा, ध्रुव बाली,  स्नेहा रामचंद्रन, शांति अकिनेनी व अन्य.

यह शोर तो बंद होना ही चाहिए

सुबहसुबह अजान से नींद खुल जाने पर गायक सोनू निगम ने ट्वीट कर हंगामा सा खड़ा कर दिया है. जहां बहुत से लोग इसे मुसलिमों के प्रति बढ़ते भेदभाव की शक्ल दे रहे हैं, वहीं दूसरे हर तरह के धार्मिक शोर को बंद कराने का अवसर ढूंढ़ने लगे हैं. अजान, कीर्तन, जागरण, भजन आदि से आम आदमी को भरमाए रखने की धर्मों की पुरानी आदत है. वे नहीं चाहते कि उन के भक्त जो अज्ञानता, अंधविश्वासों, चमत्कारों की चाह में धर्म के नाम पर अपनी जेबें भी ढीली करते रहते हैं और मरनेमारने को भी तैयार रहते हैं, बिदक जाएं. इसीलिए सुबहशाम मंदिरों में घंटियां बजाई जाती हैं, गुरुद्वारों से अरदास की आवाजें आती हैं और मसजिदों से अजान की.

सोनू निगम ने सही कहा है कि जब लाउडस्पीकर नहीं थे तब तक जो चाहे चीख कर कुछ भी कर ले, पर ईश्वर की नहीं आदमी की खोज लाउडस्पीकर का इस्तेमाल कर धर्म का प्रचार करना ऐन चुनावों से पहले सड़कों पर नेताओं को वोट देने की गुहार से भी बुरा है.

शांति का हक हरेक को है और यह जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा है. किसी भी तरह का शोर चाहे किसी बरात का हो, शामियाने में बज रहे गाने हों या नेताजी का भाषण केवल उन तक पहुंचे जो उस परिधि में हैं जहां उन के भक्त या समर्थक हैं. बाहर जाने वाले शोर को तो बंद करना ही होगा.

सरकार ने पहले ही गाडि़यों में प्रैशर हौर्न लगाने पर प्रतिबंध लगा रखा है. काफी शहरों में लोगों ने अब आमतौर पर हौर्न बजाना बंद कर दिया है. मंत्रियों की गाडि़यों से सायरन तो बहुत पहले से बंद हो चुके हैं. स्कूलों तक को सामूहिक परेड के समय धीमी आवाज में ही लाउडस्पीकर चलाने की अनुमति है. पार्टी में आप इतने जोर से म्यूजिक बजाएं कि पड़ोसी हल्ला करें, तो आफत आ जाती है.

ऐसे में धर्म को क्लीन चिट नहीं दी जा सकती. धर्म के नाम पर वैसे ही बहुत कुछ अनाचार होता है. कम से कम शांति की हत्या तो न की जाए. माना धर्मों को शांति तो क्या लोगों की हत्याओं पर शर्म नहीं आती पर अंधविश्वासी धर्म के बिचौलिए रात भर या सुबहसुबह तो जीतेजी न मारें.

बेटे ने वायरल किया मां बाप का वीडियो

मां बाप बना रहे थे शारीरिक संबंध, 13 साल के बेटे ने वीडियो बना कर कर दिया वायरल. 13 साल के एक लड़के के माता-पिता ने अपने बेटे के फ्रेसबुक फ्रेंड को पकड़ने के लिए साइबर क्राइम पुलिस का दरवाजा खटखटाया है. दंपती का आरोप है कि फेसबुक पर किसी ने उनके बेटे से उनका इंटिमेट वीडियो रिकॉर्ड करने को कहा.

पुलिस ने बताया कि पहले-पहले तो लड़के ने न्यूड पिक्स भेजने को मना कर दिया लेकिन वह बार-बार और तस्वीरें भेजने के लिए कहता रहा. बाद में तेजल ने उसकी न्यूड पिक्स को इंटरनेट पर डाल देने की धमकी दी जिससे लड़का डर गया. लड़के के पास और कोई विकल्प नहीं था. उसने अपनी ममी की अर्धनग्न तस्वीर उसे भेज दी. तेजल ने इसके बाद उससे कहा कि वह अपने माता-पिता का अंतरंग वीडियो उसे भेजे और उसने ऐसा ही किया. उसने रिकॉर्ड किया और फेसबुक पर वीडियो भेज दिया.

तेजल ने वीडियो देखने के बाद उसके माता-पिता का नंबर लिया और उनसे फिरौती मांगने लगा. उसने लड़के के पिता को वे सारी तस्वीरें और वीडियो भेजे. लड़के के पिता यह देखकर हैरान रह गए कि ये सब उनके बेटे ने ही उसे भेजा था. तेजल ने 1 करोड़ रुपये की मांग रखी. उसने कहा कि अगर रकम मिली तो वह उनका वीडियो पॉर्न साइट्स में नहीं डालेगा.

लड़के के पिता ने पुलिस से संपर्क किया. उन्होंने पुलिस को बताया कि उसने उनके बेटे को भी तस्वीरें पॉर्न साइट्स में डालने की धमकी दी थी. लड़के ने अपने पिता को यह भी बताया कि तेजल इसी तरह बहुत सारे बच्चों को परेशान कर रहा है. पुलिस ने तेजल का अकाउंट देखा तो पता चला कि उसने अपना अंकाउंट डीऐक्टिवेट कर दिया है.

यह बहुत अजीब मामला था जब एक टीनएजर ने अपने माता-पिता का सेक्स वीडियो बनाया और उसे किसी फेसबुक फ्रेंड को सेंड कर दिया. लड़के के पिता का कहना है कि जून 2016 में तेजल पटेल नाम के एक लड़के ने उनके बेटे से फेसबुक पर दोस्ती की. वह उससे अश्लील भाषा में चैट किया करता था और यह सब अप्रैल 2017 तक चलता रहा. तेजल अश्लील वीडियो, तस्वीरें, और चाइल्ड पॉर्नोग्रफ़ी कॉन्टेंट उनके बेटे को भेजता रहा. उसे किसी तरह उनके बेटे की न्यूड फोटो मिल गई.

स्कूल की छुट्टियों के दौरान उनका बेटा फेसबुक पर ज्यादा समय बिताने लगा. तेजल ने उसका फोन नंबर लिया और उसे फोन करना शुरू कर दिया. पुलिस ने बताया कि तेजल ने उनके बेटे को चाइल्ड पॉर्नोग्रफी देखने को उकसाया. इसके बाद तेजल ने उनके बेटे से परिवार के लोगों के बारे में पूछा और अपनी और उनकी न्यूड तस्वीरें भेजने को कहा.

सहारनपुर में सुलग रही जातीय आग

उत्तरप्रदेश के सहारनपुर जिले में सुलग रही जातीय आग बुझ नहीं रही है. पिछले 12 दिनों जिले के एक के बाद एक 3 गांव हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़ की चपेट में आ चुके हैं. कथित प्रशासनिक सतर्कता के बावजूद 2 लोग मारे जा चुके हैं और दो दर्जन से अधिक घायल हैं. हिंसा प्रभावित इलाकों में दहशत इस कदर हावी है कि पुलिस जवानों की गश्त के बावजूद लोग डरे हुए हैं.

मौजूदा विवाद की शुरुआत 5 मई को शब्बीरपुर गांव में अंबेडकर की प्रतिमा लगाए जाने से हुई. इस गांव के ठाकुर समुदाय ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस के लिए प्रशासन से अनुमति नहीं ली गई. विवाद में दलितों के घर फूंक दिए गए और विरोध में आए पक्ष के एक युवक की मौत हो गई. इस के बाद नजदीक के गांव शिमलाना में ठाकुर समुदाय के लोगों द्वारा महाराणा प्रताप जयंती कार्यक्रम का जुलूस निकाला जा रहा था तो दलित युवकों ने विरोध किया. यहां से पूरा मामला जातीय हिंसा में बदल गया.

जुलूस को ले कर बात बढी तो ठाकुर समुदाय के लोगों ने दलितों के यहां तोड़फोड़ की. धीरेधीरे हिंसा की आग मिर्जापुर और  बड़गांव में भी पहुंच गई. इस दौरान भीम आर्मी सामने आई और हजारों दलितों ने प्रशासन के खिलाफ ठाकुरों का पक्ष लेने का आरोप लगाते हुए 21 मई को दिल्ली के जंतर मंतर पर इकट्ठा हो कर प्रदर्शन किया. दो साल पहले बनी भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आजाद ने शब्बीरपुर में दलितों पर हमले के विरोध में रैली आयोजित की थी. भीड़ ने दलितों के 25 घर जला दिए थे.

दिल्ली में रैली के दो दिन बाद इसी गांव में ठाकुर समुदाय ने दलितों पर फिर हमला कर दिया. इस हिंसा में करीब 20 दलित जख्मी हो गए और सरसवा गांव का 25 साल का आशीष मेघराज नाम का युवक मारा गया. उसे सहारनपुर जिला अस्पताल में मृत घोषित कर दिया गया. मुख्य चिकित्सा अधिकारी बीएस सोढी ने बताया कि मेघराज को चाकू का गहरा घाव लगा था. दलित घायलों को ले कर कई एंबुलेंस गाड़ियां आईं . अस्पताल के बाहर बड़ी तादाद में गांव के दलित लोगों ने इकट्ठा हो कर हमले का विरोध जताया.

23 मई को बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती शब्बीरपुर गांव गईं, जहां दलितों के घर जला दिए गए थे. वह पीड़ित लोगों से मिलीं. उन्होंने रैली की. इस रैली में शब्बीरपुर समेत सहारनपुर के कई गांवों के लोग आए थे. रैली में शामिल कई लोगों ने बताया कि शब्बीरपुर और सहारनपुर के बीच कई जगह उन पर हमले किए गए.

अस्पताल के दो इमरजेंसी वार्डों में घायलों का इलाज चल रहा है. लाडवा गांव के भीम आर्मी के एक सदस्य शिवम खेवडिया के अनुसार दोनों वार्डों में भर्ती कम से कम 8 दलितों पर हमले हुए. इन में से एक वार्ड में भर्ती सहारनपुर जिले के हलालपुर गांव के टिंकु कुमार से मुलाकात हुई. उसे कई जगह चोटें आई हैं और सिर पर घाव है. उस ने बताया कि उसे कई टांके लगे हैं. वह मायावती का भाषण सुनने अपने दो दोस्तों के साथ मोटरसाइकिल पर गया था. जब वे वापस लौट रहे थे तब ठाकुरों के लोगों ने उन पर हमला कर दिया. उन्हें अंभेता चंद गांव के पास रोका गया और लाठियों से बुरी तरह मारनेपीटने लगे. वे लोग ‘महाराणा प्रताप की जय’ और ‘वंदेमातरम’ के नारे लगा रहे थे.

टिंकु कुमार के बेड के पास उस का दोस्त नरसिंह भी सिर में चोट और चेहरे पर घाव से पीड़ित था. नरसिंह ने बताया कि उस के मुंह पर मुक्के मारे गए. उस के पिता राजकुमार बेड के पास बैठे थे. वह रैली में नहीं गए थे. राजकुमार ने बताया कि उन्होंने बेटे को चेताया कि वह रैली में नहीं जाए. वह किसी अनहोनी से पहले ही भयभीत थे.

सरसावा कस्बे का बालेश कुमार भी इसी वार्ड में भर्ती था. उस ने बताया कि उस पर चंदरपुर के पास हमला हुआ. मैं रैली से वापस जा रहा था. उसी समय लोगों के एक ग्रुप ने हमला कर दिया. वे मुझे पीटने लगे और मुझ पर चाकू से हमला करने की कोशिश की. दूसरे इमरजेंसी वार्ड में इलाज करा रहे शब्बीरपुर गांव के इंदरपाल [50] ने बताया कि करीब 10 लोगों के एक समूह ने उन पर हमला किया, जो उन के ही गांव के थे. वह 5 मई के हमले में हुए नुकसान के कारण मायावती को सुनने गया था. मेरे परिवार ने और दोस्तों ने हमले में सब कुछ खो दिया. अब हम चाहते हैं कि हमारी नेता मायावती मदद और मुआवजे के लिए प्रशासन पर दबाव बनाए.

अस्पताल के बाहर पुलिस पर गुस्साए प्रदर्शनकारी ‘यूपी पुलिस हाय हाय’ और ‘योगी सरकार, नहीं चलेगी’ के नारे लगा रहे हैं. शाम के समय प्रदर्शनकारियों की भीड़ बढ रही है. पुलिस उन्हें रोकने की कोशिश कर रही है पर प्रदर्शनकारी और घायलों के दोस्त लोग इमरजेंसी वार्ड में घुस रहे हैं. पुलिस उन्हें इमरजेंसी वार्ड से बाहर निकाल रही है. एक गुस्साया दलित जोर से चिल्ला रहा है, ‘तुम साले भगवा पुलिस ने ठाकुरों की मदद की है इस में.’ भीम आर्मी के कई सदस्य वार्ड में घुसने की असफल कोशिश कर रहे हैं. दलितों के घेरे को एक आदमी संबोधित कर कहने लगा, ‘अगर कोई वीडियो बनाते हुए देख लिया तो फोन तोड़ दो उस का.’ भीड़ में शामिल भीम आर्मी के एक व्यक्ति ने मेरा फोन एक  तरफ करते हुए कहा कि कृपया समझिए, आप मीडिया के लोग हमें वीडियो में नक्सलवादी बताते हैं.

भीम आर्मी के खेवडिया कहते हैं कि मई से सहारनपुर की घटनाओं को ले कर मीडिया पुलिस के बताए अनुसार पक्षपात रवैया अपना रहा है. आप देख सकते हैं अस्पताल के बाहर क्या हो रहा है. अस्पताल के बार एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि हिंसा इसलिए भड़की क्योंकि रैली में जा रहे दलित लोग हाथों में पत्थर ले कर विरोधी समुदाय के घरों में फेंक रहे थे. जब यह खबर ठाकुरों के पास पहुंची तो वे इकट्ठे हो कर रैली से लौट रहे लोगों पर हमला करने लगे. उन्होंने अपना बदला लिया.

सहारनपुर के बीएसपी कार्यकर्ता दीपक कुमार कहते हैं कि पुलिस हमले की झूठी अफवाह फैला रही है. सहारनपुर के अन्याय से दलित समुदाय गुस्साया हुआ जरूर था पर उन में से किसी ने भी  बहनजी की रैली के मौके पर किसी पर पत्थर फेंकने की मूर्खता नहीं की. दीपक कुमार ने कहा कि मायावती जब राज्य की मुख्यमंत्री थीं तब पुलिस इतनी मनुवादी नहीं थी. पुलिस मनुस्मृति की इतनी अनुयायी नहीं थी पर मौजूदा सरकार के अंतर्गत है.

बीएसपी का एक अन्य कार्यकर्ता कहता है कि आज के बाद मुझे लग रहा है कि पिछड़ी जातियों को इकट्ठा कर के इस स्थिति में बदलाव हो सकता है. दलित बहुजन को इकट्ठा करने का काम केवल भीम आर्मी कर रही है. भीम आर्मी के सुखविंदर कहते हैं कि कब तक हम बर्दाश्त करेंगे. हर समय हम यहां जातिवाद की सच्चाई सुनते हैं और अपने हक के लिए खड़े होते हैं. ये ठाकुर हम पर फिर हमला करते हैं. भीम आर्मी के लोग दिल्ली केंद्र सरकार से अपील करने गए थे कि वह सहारनपुर की हिंसा को रोके.

हिंदुत्व राजनीति के परिणाम सामाजिक संबंधों में इस वीभत्स तरीक से घटित होते दिख रहे हैं. इस तरह भाजपा की हिंदुत्व की सोशल इंजीनियरिंग की राजनीति विभाजनकारी साबित हो रही है जो न सामाजिक एकता न सामंजस्य स्थापित कर पा रही है.

लोन वुल्फ : आतंक का नया चेहरा

9 अप्रैल, 2017 : मिस्र के अलैक्जैंड्रिया और तांता शहरों के गिरजाघरों में हुए धमाकों के बाद राष्ट्रपति अब्देल फतेह अल सीसी ने देश में 3 महीने के आपातकाल की घोषणा कर दी. इन धमाकों में 45 लोगों की मौत हो गई जबकि सैकड़ों घायल हो गए. 2 गिरजाघरों में हुए विस्फोटों की जिम्मेदारी आतंकी संगठन आईएस ने ली है. अलैक्जैंड्रिया के सैंट मार्क्स चर्च में शक होने पर सुरक्षा बलों ने चर्च के मुख्यद्वार पर ही आत्मघाती हमलावर को रोक लिया था, जहां उस ने खुद को उड़ा लिया.

3 अप्रैल, 2017 : रूस में सैंट पीट्सबर्ग के मैट्रो स्टेशन पर 3 धमाकों में 10 लोगों की मौत हो गई जबकि 50 से अधिक लोग घायल हो गए. बम विस्फोट करने वाले संदिग्ध व्यक्ति की पहचान को प्रारंभिक तौर पर स्वीकार कर लिया गया है. यह संदिग्ध व्यक्ति मध्य एशियाई है, जिस के सीरियाई आतंकवादियों से संबंध हैं.

विशेषज्ञों ने विश्लेषण किया है कि यह हमलावर खुद के बनाए हुए बम को ले कर मैट्रो में गया था. वह डब्बे में बीच वाली जगह पर खड़ा हुआ था. मैट्रो टे्रन के चलने के दौरान उस ने विस्फोट कर दिया.

7 अप्रैल, 2017 : स्वीडन की राजधानी स्टौकहोम में एक ट्रक भीड़भाड़ वाले शौपिंग इलाके में घुस गया और लोगों को रौंदते हुए निकल गया, जिस में 5 लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए. यह घटना स्टौकहोम के ड्रोटिनिंगटन क्वीन स्ट्रीट पर हुई. अधिकारियों के मुताबिक यह घटना आतंकी हमलों की ओर इशारा करती है.

7 मार्च, 2017 : भारत में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में करीब 12 घंटे चली मुठभेड़ के बाद सैफुल्लाह मारा गया. यह भारत पर आईएस का पहला हमला था. शुरुआती जांच के हिसाब से यह स्वघोषित कट्टरपंथी या लोन वुल्फ था जो खुद को आईएसआईएस खुरासान गु्रप के तौर पर प्रचारित कर रहा था.

जरमनी की राजधानी बर्लिन के क्रिसमस मार्केट में हुए ट्रक हमले की जिम्मेदारी आईएसआईएस ने ली. उस से जुड़ी एक एजेंसी अमाक ने हमले के दूसरे दिन बयान जारी कर के हमले की जिम्मेदारी ली. बयान में कहा गया है कि गठबंधन देशों को निशाना बनाने की अपील के बाद आईएस के एक लड़ाके ने हमला किया. हमले में

12 लोगों की मौत हो गई थी और 50 से ज्यादा घायल हुए थे.

आतंकी वारदात को अंजाम देने के बाद यह आतंकी बच कर भाग निकलने में भी सफल रहा. इसलिए जरमनी में इस बात का खौफ था कि वह दूसरा हमला कर सकता है लेकिन वह 2 दिनों बाद इटली पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारा गया. इसे लोन वुल्फ या अकेले भेडि़ए का हमला माना जा रहा है.

क्या बला है लोन वुल्फ

मौजूदा दौर में लोन वुल्फ हमले का मतलब है बिना किसी नेतृत्व के अपने धार्मिक, सांप्रदायिक और कट्टर विचारधारा के नाम पर अकेले हथियार ले कर आम लोगों व सुरक्षाबल पर हिंसक हमले करना. इस सिलसिले में जो शोध हुए हैं, वे बताते हैं कि ऐसे लोन वुल्फ अकसर किसी छोटे से नैटवर्क का हिस्सा होते हैं. कुछ तो सिर्फ परिवार के सदस्यों व दोस्तों से मदद लेते हैं. या उन की असलियत बहुत नजदीकी लोगों को ही पता होती है.

बोस्टन में बम धमाका करने वाले दोनों लोग भाई थे, जबकि सैन बै्रंडिनो में हमला करने वाले पतिपत्नी थे. यूरोप में पिछले 9 महीनों में इस तरह के जो हमले हुए हैं वे नौजवानों के छोटे से नैटवर्क की करतूतें थीं. वे एकदूसरे को जानते थे, दोस्त थे या पासपड़ोस के ही लड़के थे. खुफिया एजेंसी के लिए इस तरह के हमलावरों को ढूंढ़ना टेढ़ी खीर होता है.

पुलिस व सुरक्षा एजेंसियां पस्त

आधुनिक युग में आतंकवाद का चेहरा कोई खास अलग नहीं है, लेकिन जैसे ही इस पर आईएसआईएस की मुहर लगती है, हमारी रीढ़ की हड्डी में कंपकंपी छूट जाती है. यह हमें ज्यादा डराता है. आईएसआईएस महज हत्याएं नहीं करता, बल्कि सभ्य समाज और बर्बरता के बीच का फासला कम करता हुआ ऐसे कृत्य को न्यायसंगत व सही भी ठहराता है. वह यह भी समझाता है कि ऐसा करने में गई उस के सदस्यों की जानें दरअसल शौर्य का प्रतीक हैं. आईएसआईएस एक ऐसी फ्रैंचाइज है जो कोई भी हथिया सकता है बिना उस की इजाजत के. सिर्फ इतना भर करना होता है कि हमला करो, हिंसा फैलाओ, बेगुनाह और मासूम लोगों की जानें लो और हमले से ठीक पहले एक संदेश जारी कर दो कि इस हमले का रिश्ता आईएसआईएस से है. आईएसआईएस को बुरा नहीं लगता, वह भी तुरतफुरत ऐसे हमलों की जिम्मेदारी या कहें कि श्रेय लेने में पीछे नहीं रहता.

जब आतंक का रूप ऐसा हो जाए तो चुनौती यह है कि इस से निबटा कैसे जाए. तमाम देशों की सुरक्षा एजेंसियां इस तरह को हमलों को कैसे रोकें, जहां न तो कोई गुट काम कर रहा है, न कोई ट्रेनिंग या उकसावे के कैंप चल रहे हैं, न कोई बड़ा हथियारों का जखीरा जमा किया जा रहा है. अलकायदा के जमाने में तो यही होता रहा है कि एजेंसिया ऐसे लोगों पर नजर रखती थीं जो अपने देश से बाहर जाते थे.

फ्रांस के आतंकी और मतीन में काफी समानताएं हैं. फ्रांस का हमलावर भी पुलिस की नजर में था और मतीन भी. दोनों ही के बारे में पुलिस को लगता था कि वे नाराज युवक हैं, और हिंसा की इस पराकाष्ठा तक नहीं पहुंच सकते. दोनों ही मामलों में पुलिस और एजेंसियां गलत साबित हुई हैं.

लोन वुल्फ का हाइटैक हथियार

‘लोन वुल्फ टैररिज्म : अंडरस्टैडिंग द ग्रोइंग थ्रेट’ पुस्तक के लेखक जैफ्री सिमोन आतंकवाद की इस नई प्रवृत्ति के बारे में कहते हैं –

‘‘मेरी पुस्तक लोन वुल्फ आतंकवाद की बढ़ती समस्या के बारे में है जो संगठित आतंकवाद से अलग तरह की है जिस के हम सातवें, आठवें और नवें दशक और 21वीं सदी के पहले 5 सालों में आदी रहे हैं. बुनियादी तौर पर लोन वुल्फ एक व्यक्ति होता है, वह 2 व्यक्ति भी हो सकते हैं, वे बाहरी लौजिस्टिक और आर्थिक सहायता के बिना काम करते हैं.

‘‘दरअसल वे अपने लिए काम कर रहे होते हैं. उन की पहचान कर पाना या उन्हें पकड़ पाना मुश्किल होता है क्योंकि उन की किसी से बातचीत नहीं होती, न गु्रप के कोर सदस्य पकडे़ जाते हैं.

अपनी पुस्तक में मैं ने कहा है कि इंटरनैट ने इस खेल को बदल दिया है.  इंटरनैट ने इन आतंकवादियों को यह अवसर दिया है कि आतंकवादी संगठन के वैब पेजेज, ट्वीट्स और ब्लौग पढ़ कर स्वयंमेव उग्रवादी बन सकते हैं. लेकिन इस से अधिकारियों को लोन वुल्फ के बारे में जानने का मौका मिल सकता है क्योंकि कई वुल्फ हमले से पहले संदेश भेजते हैं. हाल ही में लोन वुल्फ की संख्या भी बढ़ती जा रही है और उन के द्वारा की जानेवाली तबाही भी.

‘‘परंपरागत आतंकवादी और लोन वुल्फ आतंकवादियों में एक फर्क यह है कि लोन वुल्फ आतंकवादी नएनए तरीके अपनाते हैं. बुनियादी तौर पर लोन वुल्फ बहुत खतरनाक होते हैं और बहुत रचनात्मक भी. चूंकि उन के पीछे कोई सामूहिक निर्णय प्रक्रिया नहीं होती, इसलिए वे अपनी पसंद का तरीका या रणनीति चुन सकते हैं. इस कारण लोन वुल्फ की संख्या बढ़ती जा रही है. यह एक ट्रैंड बन सकता है.’’

आईएसआईएस आतंकवाद के इतिहास में सब से ज्यादा तकनीक और मीडियापसंद गुट है. इस ने इंटरनैट के इस्तेमाल में महारत हासिल की हुई है. अलकायदा ने भी उस का इस्तेमाल किया मगर आईएसआईएस इसे और ऊंचे स्तर तक ले गया. इसलिए यह कह पाना मुश्किल है कि आने वाले दिनों में क्या नई बात निकल कर आती है.

हमें यह जरूर जानना चाहिए कि आईएसआईएस इराक और सीरिया में घिर चुका है. हो सकता है निकट भविष्य में यह देखने को मिले कि वह हार चुका है मगर वह विकेंद्रित वैश्विक ताकत के रूप में बना रहेगा. इंटरनैट और सोशल मीडिया का उपयोग कर लोगों को आत्मघाती हमले करने को प्रेरित करता रहेगा.

रहना होगा सावधान

फ्रांस के एक शिक्षाविद के मुताबिक, ये वो लोग हैं जो किसी भी समाज में ऐडजस्ट नहीं हो सकते. ये लोग एक काल्पनिक दुनिया में रहते हैं और ये इसलाम के कट्टरपंथ से नहीं, बल्कि अपने ही मन के कट्टरपंथ से प्रभावित हैं. हमलों में आईएसआईएस का नाम लेना इन्हें अच्छा लगता है क्योंकि वह एकमात्र समाजविरोधी और विश्वविरोधी संस्था है. आईएसआईएस आधुनिकता के खिलाफ है और दुनिया को इसलाम के शुरुआती दौर में ले जाना चाहता है. दरअसल, इसलाम का कट्टरपंथी रूप नहीं है यह, वास्तविकता यह है कि यह कट्टरपंथ का इसलामीकरण है.

आतंक के इस नए हाइटैक व धार्मिक हथियारों से घिरे रूप से पूरी दुनिया परेशान है. आज भले ही लोन वुल्फ के निशाने पर फ्रांस, अमेरिका जैसे यूरोपीय देश हों लेकिन जिस तरह से एशिया, खासकर भारत, पिछले कई सालों से आतंक के निशाने पर रहा है उस से यहां भी लोन वुल्फ की क्रूर करतूतों की गुंजाइश और बढ़ जाती है. जाहिर है आने वाले खतरे से चारकदम आगे चलने व निबटने के लिए कमर कसने में ही समझदारी है.

लोन वुल्फ का आईएसआईएस कनैक्शन

आईएसआईएस की लोन वुल्फ आतंकी हमले की सोच काफी पुरानी है. सितंबर 2014 में आईएसआईएस ने अपने एक सरगना का औडियोटेप जारी किया था. उस टेप में इराक पर हवाई हमला करने वाले अमेरिका और उसके सहयोगियों पर लोन वुल्फ के ढंग के हमले करने का आह्वान किया गया था. अकेले आतंकी हमला करने वालों को पश्चिमी देशों में लोन वुल्फ कहा जाता है.  पहले हमले छोटे स्तर पर ही होते थे, अब ये बड़ा रूप लेते जा रहे हैं. इस हमले का यूरोप में नतीजा यह हुआ है कि सभी मुसलमान और मध्यपूर्व से आए मुसलिम शरणार्थी संभावित आतंकवादी के कठघरे में खड़े कर दिए गए हैं.

अमेरिका के ओरलैंडो के गे क्लब में उस रात ऐसा ही खौफनाक वाकेआ हुआ था. अंधाधुंध फायरिंग कर के 50 से ज्यादा लोगों की जान लेने वाले उमर मतीन के बारे में अभी तक इतना ही पता चल सका है कि वह इसलामिक स्टेट यानी आईएस से प्रभावित था, लेकिन यह हत्याकांड उस ने इसलामिक स्टेट के किसी निर्देश पर नहीं किया था. लेकिन कई अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार मतीन ने हमले से पहले और हमले के दौरान इमरजैंसी सर्विस को फोन कर के यह स्वीकार किया था कि वह इसलामिक स्टेट के लिए प्रतिबद्ध है.

इस घटना से 2015 में कैलिफोर्निया के सैन ब्रैंडिनों में हुई शूटिंग याद आती है, जहां हमलावर ने एक क्लिनिक में गोलीबारी कर के 14 लोगों की जान ले ली थी और हमले से पहले सोशल मीडिया में स्वीकार किया था कि वह आईएसआईएस के प्रति आस्था रखता है. इस के बाद आईएस ने भी न सिर्फ उस की प्रतिबद्धता को स्वीकार किया, बल्कि हमले की जिम्मेदारी भी ली थी.

अकेले भेडि़यों की फौज

यह भी एक तरह से आईएस की रणनीति का ही हिस्सा है. वह लगातार ऐसे समर्थक तैयार करने की कोशिश करता रहता है, जो जहां कहीं भी हैं, जैसे भी हैं, अपनी तरह से उस के लिए कुछ करते रहें. खासकर अगर वे खिलाफत वाले क्षेत्र में जा बसने की हिजरत की अपनी जिम्मेदारी निभाने की स्थिति में नहीं हैं.

पिछले कुछ समय से इसलामिक स्टेट अपने दुश्मनों से घिर गया है. रूस, पश्चिमी सैनिक गठबंधन और अरब देशों की आसमान से बरसती हजारों मिसाइलों के कारण इराक और सीरिया की अपनी जमीन पर उस की हालत खस्ता है. वह इराक में 45 प्रतिशत और सीरिया की 20 प्रतिशत जमीन खो चुका है मगर इस का बदला चुकाने के लिए वह दुनियाभर में आतंकवादी वारदातों को अंजाम दे कर कई देशों को दहला रहा है.

आईएस ने ओरलैंडो के हमले की जिम्मेदारी ली, और कहा कि इस काम को इसलामिक स्टेट के एक लड़ाके ने अंजाम दिया. लेकिन यह बयान जिस तरह संक्षिप्त है, उस से यही लगता है कि संगठन को इस हमले की पहले से कोई जानकारी नहीं थी और यह किसी अकेले सिरफिरे की हरकत है. इस के विपरीत पेरिस हमले के दौरान जो जिम्मेदारी ली गई थी, उस में जिस तरह का ब्योरा दिया गया था, वह बता रहा था कि बयान देने वाला हमले की साजिश में शामिल था.

निशाने पर फ्रांस, अमेरिका और…

फ्रांस में भी लोन वुल्फ का हमला हो चुका है जिस में केवल ट्रक के जरिए आतंकी हमला किया गया. वह महज 30 साल का नौजवान था ट्यूनीशिया से आ कर फ्रांस में बसे समुदाय का. पुलिस उसे शातिर अपराधी के तौर पर जानती थी, वह अकसर हथियारों का इस्तेमाल किया करता था. पुलिस की उस पर नजर रहती थी, लेकिन कभी भी उस के बारे में यह शक तक नहीं हुआ कि वह किसी कट्टरपंथी इसलामी संगठन से जुड़ा हुआ है.

जब वह फ्रांस के राष्ट्रीय दिवस का उत्सव मना रहे लोगों की भीड़ में ट्रक ले कर उन्हें कुचलता हुआ बढ़ा तो उस के पास एक पिस्टल और एक अन्य गन थी. उस ने इसी गन से फायरिंग भी की. उस के ट्रक से कुछ हथगोले और अन्य हथियार मिले, लेकिन जांच में पता चला कि वे नकली थे. इस हमले में 77 लोगों की मौत हुई जबकि 50 से ज्यादा लोग जख्मी हुए. इतना क्रूर कदम उठाने की उसे प्रेरणा या ट्रेनिंग कहां से मिली, यह पता नहीं चल पाया .

फ्रांस में पिछले 10 महीनों में दूसरा बड़ा हमला था. हमले के तुरंत बाद पुलिस ने ट्रक के ड्राइवर को मार गिराया. 2015 में 13 नवंबर को हुए हमले से उबर ही रहा था फ्रांस, जिसमें करीब 130 लोग मारे गए थे, कि यह हमला हो गया.

अमेरिका में भी लोन वुल्फ हमले की कई वारदातें हुई हैं. ओरलैंडो के गे क्लब का हमला हो या फिर सिनेमाघर में अंधाधुंध गोलियां बरसाने वाली घटना, दोनों ही मामलों में हमलावर अकेले थे और लोन वुल्फ की तरह घटना को अंजाम दे रहे थे. उन का किसी आतंकी संगठन से संबंध भी नहीं पाया गया.

आतंक की सिरफिरी ब्रैंडिंग

लोन वुल्फ सिर्फ हमले ही नहीं करता बल्कि कभी उन के हमले बहुत छोटे स्तर के भी होते हैं. दक्षिण जरमनी में एक सिरफिरे शख्स ने 4 लोगों को ट्रेन में कुल्हाड़ी मार कर जख्मी कर दिया. हमलावर की कुल्हाड़ी का शिकार हुए 3 लोग गंभीररूप से घायल हुए, जबकि एक को हलकी चोट आई. यह घटना बवेरिया में वुर्जबर्ग और ट्रेचलिंगन के बीच एक लोकल ट्रेन में हुई. हमलावर को पुलिस ने ढेर कर दिया. चाकू और कुल्हाड़ी से लैस इस हमलावर की पहचान 17 साल के अफगानी युवक के रूप में हुई.

ये सभी ऐसे आतंकी थे जिन्हें आज की भाषा में लोन वुल्फ यानी अकेला भेडि़या या अकेला हमलावर कहा जाता है. ये आईएसआईएस की रणनीति थी जो जहां है वहीं रहे और हमले का मौका तलाशता रहे, जब मौका मिले अपने निशाने पर हमला बोल दे. पहली बार किसी आतंकवादी संगठन ने लोन वुल्फ का फंडा अपनाया है. यह बेहद खतरनाक है क्योंकि इस के लिए किसी खास ट्रेनिंग या पैसे की जरूरत पडती है, सिर्फ दिमागी ब्रेन वौश चाहिए.

लोन वुल्फ की ये आतंकी घटनाएं इस तथ्य की ओर संकेत करती हैं कि इसलामिक स्टेट एक स्थायी मानसिक अवस्था बन चुका है. दरअसल

इस मामले में आईएसआईएस अलकायदा से बहुत आगे है. अलकायदा महज आतंक फैलाने का काम कर रहा था तो आईएसआईएस वैचारिक आतंकवाद का एक ऐसा विचार, जो आम से दिखने वाले साधारण लोगों को हिंसक तरीके अपनाने के लिए उकसाता है.

जिस तरह देसी उत्पाद ग्लोबल ब्र्रैंड का ठप्पा लगते ही आकर्षण का केंद्र बन जाता है वैसे ही किसी भी तरह की हिंसा में आईएसआईएस का ठप्पा लगते ही वह वैश्विक घटना में बदल जाती है. उन के पीछे बड़ी संगठित ताकत सक्रिय रहती थी.

आतंक की आर्थिक रणनीति

अब आतंकवाद के नए रूप में किसी संगठन को लंबे अरसे तक योजना बना कर करोड़ों रुपए खर्च कर हमले करवाने की जरूरत नहीं, बल्कि कोई भी अकेला इंसान इन्हें अंजाम दे कर दुनियाभर में दहशत फैला सकता है. लेकिन अब दुनियाभर में ऐसी ही दहशत पैदा करने के लिए 1 या 2 लोग ही काफी होंगे.

वह किसी एक जीप या कार पर सवार हो किसी भीड़ को कुचलता हुआ निकल सकता है या फिर रसोई में काम आने वाले चाकू की मदद से ही किसी भीड़ वाले इलाके में एकसाथ दसों लोगों का कत्ल कर सकता है.

ऐसी हरकत चीन के शिनच्यांग में देखी गई है. ऐसे इंसान के लिए कोई धार्मिक आतंकवादी या अलगाववादी संगठन प्रेरणा का स्रोत बनता है. उसे संगठन से मदद की कोई जरूरत नहीं होती और न ही उस के निर्देशों की जरूरत होती है.  ऐसे लोग कई देशों के लिए एक बड़ी परेशानी बने हुए हैं.

बहरहाल, लोन वुल्फ जिस तरह पनप रहे हैं उन से निबटने के लिए सैन्य या पुलिस ताकत से काम नहीं चलेगा. ऐसे तत्त्व अब हर समाज में नजर आ रहे हैं.

गुजारा भत्ता कानून : कोर्ट का बदलता नजरिया

भारतीय कानून व्यवस्था में महिलाओं के हितों को ध्यान में रख कर कई कानून अस्तित्व में आए हैं. इसी प्रकार की एक कानूनी व्यवस्था गुजारा भत्ता व भरणपोषण को ले कर भी है. लेकिन, अदालतें अब आत्मनिर्भर महिलाओं को गुजारा भत्ता देने से साफ इनकार करने लगी हैं. अदालतें  उन महिलाओं की गुजारे भत्ते की मांग को खारिज कर रही हैं जो पति से वसूली की मंशा रखते हुए तलाक से पहले अपनी नौकरी छोड़ देती हैं या सक्षम होते हुए भी कुछ काम नहीं करतीं. बदलते माहौल में अदालतें अब पत्नी की योग्यता और कार्यक्षमता का आकलन करने के बाद ही उन्हें गुजारे भत्ते का हकदार ठहरा रही हैं. पत्नी को हर प्रकरण में गुजारा भत्ता मिल ही जाएगा, यह जरूरी नहीं. पेश हैं कुछ उदाहरण जिन्होंने इस मामले को नए मोड़ दिए हैं :

पति की कमाई पर मुफ्तखोरी : हाल ही में दिल्ली की एक अदालत ने घरेलू हिंसा के एक मामले में महिला को मिलने वाले 5,500 रुपए के मासिक अंतरिम भत्ते में इजाफा कर उसे 25,000 रुपए करने की मांग की याचिका को खारिज कर दिया और अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि महिला पढ़ीलिखी है. महिला के पास एमए, बीएड और एलएलबी जैसी डिगरियां हैं और वह खुद कमा सकती है, इसलिए उस से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वह घर पर आलसी की तरह बैठे और पति की कमाई पर मुफ्तखोरी करे.

अदालत ने कहा कि महिला ने गुजारा भत्ते में वृद्धि की मांग का न तो कारण बताया और न ही यह साबित किया कि उस के खर्च में वृद्धि कैसे हो गई.  अदालत का यह फैसला गुजाराभत्ता कानून के हो रहे दुरुपयोग के मद्देनजर  काफी अहम है.

पति भी गुजारे भत्ते का हकदार : भारत जैसे देश में जहां यह माना जाता है कि गुजारे भत्ते की हकदार पत्नी ही होती है, ऐसे में अगर पति से गुजारा भत्ते की मांग कर रही पत्नी को उलटा पति को  गुजारा भत्ता देने का अदालत से फरमान मिल जाए तो आप को हैरानी होगी. लेकिन, ऐसा हुआ है. महिलाओं के गुजारा भत्ता मांगने की इसी खराब आदत पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महिला को आदेश दिया है कि वह अपने पति को गुजारे भत्ते के रूप में हर महीने 20 हजार रुपए का भुगतान करे. अदालत ने महिला को यह भी निर्देश दिया कि वह पति को कार भी दे.

दरअसल, मामला कुछ ऐसा था कि पतिपत्नी के एक विवादित मुकदमे में पति ने वर्ष 2002 में अपनी पत्नी को अपनी संपत्ति की मालकिन बनाया था लेकिन पतिपत्नी के बीच बाद में झगड़े होने लगे जिस के चलते पत्नी ने अपने बच्चों के साथ मिल कर अपने पति को साल 2007 में उस के ही घर से बाहर निकाल दिया. जिस के बाद साल 2008 में पति ने कड़कड़डूमा कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल की और साथ ही, हिंदू मैरिज ऐक्ट की धारा-24 के तहत गुजारा भत्ता दिए जाने की गुहार लगाई.

याचिका में पति ने कहा कि उसे घर से निकाला गया और उसे गुजारे के लिए खर्चा तक नहीं दिया जा रहा. याचिका में कहा गया था कि पीडि़त की पत्नी की सालाना आमदनी एक करोड़ रुपए है और उस के पास 4 गाडि़यां भी हैं, दूसरी तरफ पति की कोई आमदनी नहीं है और वह सड़क पर आ चुका है.

जिस के बाद साल 2009 में निचली अदालत ने फैसला सुनाया कि हिंदू मैरिज ऐक्ट के तहत पतिपत्नी में से जो भी आर्थिक रूप से संपन्न है वह दूसरे को गुजारा भत्ता दे सकता है और चूंकि पत्नी आर्थिक रूप से संपन्न है, इसलिए वह हर महीने अपने पति को 20 हजार रुपए गुजारा भत्ता दे.

इस फैसले के बाद पत्नी हाईकोर्ट पहुंची थी लेकिन हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया और पत्नी को निर्देश दिया कि वह अपने पति को हर महीने 20 हजार रुपए गुजारा भत्ता और साथ ही कार भी दे.

बराबर कमाई तो गुजारा भत्ता नहीं: पति के बराबर ही कमाने वाली महिला को पति से गुजारा भत्ता पाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है. इस का उदाहरण पिछले दिनों एक मामले में देखने को मिला जिस में गुजारा भत्ता मांगने अदालत पहुंची पत्नी की अर्जी को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अनुराधा शुक्ला भारद्वाज ने खारिज कर दिया. कारण था पत्नी की पति के बराबर ही कमाई होना.

अदालत ने कहा कि लैंगिक समानता के इस दौर में पति को महज मर्द होने के कारण कानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता है. दरअसल, इस मामले में पत्नी ने पति से आवास सुविधा मुहैया कराने की मांग की थी. अदालत ने कहा कि पत्नी को इस के लिए यह साबित करना होगा कि वह अपनी आर्थिक अक्षमता के कारण अपने लिए आवास का इंतजाम करने में लाचार है.

महिलाओं से आर्थिक सहयोग की उम्मीद : एक अन्य मामले में  महिला द्वारा अपने पति से गुजारा भत्ता मांगने पर कोर्ट ने महिला की मांग को खारिज कर दिया और कहा कि आज के समय में घर चलाने में महिलाओं से आर्थिक मदद की उम्मीद की जाती है, न कि बेकार बैठने की. महिला द्वारा की गई गुजारे भत्ते की मांग को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि महिला ने खुद यह स्वीकार किया है कि उस ने ब्यूटीशियन का कोर्स किया है जिस का मतलब है कि उस के पास काम करने और कमाने का हुनर है, लेकिन इस के बावजूद वह काम करना नहीं चाहती.

इस मामले में मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट मोना टारडी ने फैसला सुनाते हुए कहा कि आज के जमाने में महिलाओं से भी उम्मीद है कि वे काम कर घर में आर्थिक रूप से सहयोग करेंगी.

पत्नी होना मुआवजे की वजह न बने: दिल्ली की  ही एक सत्र अदालत ने यह फैसला सुनाया कि अगर पत्नी अपने पति से ज्यादा पढ़ीलिखी है, तो तलाक की सूरत में केवल इस बिना पर उसे मुआवजा नहीं मिल सकता कि वह एक पत्नी है. इस मामले में एक महिला ने अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ते की मांग को ले कर अदालत में मामला दाखिल किया था, लेकिन उस की दलील खारिज हो गई.

जिला व सत्र न्यायाधीश सुजाता कोहली की अदालत ने अपने फैसले में कहा कि चूंकि महिला अपने पति से ज्यादा पढ़ीलिखी है, इसलिए  वह गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है.

कोर्ट ने केस खारिज करते हुए कहा कि महिला कोर्ट को यह बताने में नाकाम रही कि वह ज्यादा पढ़ीलिखी है, लेकिन इस के बावजूद उस ने कभी नौकरी करने के बारे में क्यों नहीं सोचा. याचिकाकर्ता महिला दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट थी  और उस के पास लाइब्रेरी साइंस में डिप्लोमा भी था जबकि पति केवल 12वीं पास था.

पति की हैसियत का होगा आकलन: एडवोकेट अनुपमा गुप्ता बताती हैं, ‘‘वैवाहिक विवादों से संबंधित मामलों में कई कानूनी प्रावधान हैं, जिन के जरिए पत्नी गुजारा भत्ता मांग सकती है. सीआरपीसी, हिंदू मैरिज ऐक्ट, हिंदू अडौप्शन ऐंड मेंटिनैंस ऐक्ट और घरेलू हिंसा कानून के तहत गुजारा भत्ते की मांग की जा सकती है. अगर पतिपत्नी के बीच किसी बात को ले कर अनबन हो जाए और पत्नी अपने पति से अपने और अपने बच्चों के लिए गुजारा भत्ता चाहे तो वह सीआरपीसी की धारा-125 के तहत गुजारे भत्ते की अर्जी दाखिल कर सकती है. लेकिन कई महिलाएं कानून का दुरुपयोग करते हुए अपने पति से भारी रकम वसूलती हैं.

‘‘कई बार प्रेमी के संपर्क में रहने के लिए विवाहित महिलाएं अपने मातापिता के घर जा कर बैठ जाती हैं और महिलाओं के लिए बने कानूनों, जैसे दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा और गुजारा भत्ता के कानूनों का पति पर दुरुपयोग करती है. कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए हाल ही में अदालत ने कई ऐसे फैसले दिए हैं जिन के अनुसार वे इस कानून का दुरुपयोग नहीं कर सकेंगी. हिंदू मैरिज ऐक्ट की धारा-24 के तहत गुजारा भत्ता तय होता है, जिसे तय करते वक्त पति व पत्नी की हैसियत देखी जाती है. अगर पत्नी की कमाई अच्छी हो और पति बेरोजगार हो तो गुजारा भत्ता पत्नी को भी देना पड़ सकता है. यानी पति या पत्नी जिस की भी माली हालत अच्छी नहीं है, उसे गुजारा भत्ता दिया जाता है. इस मामले में कानून में दोनों के प्रति एक ही नजरिया अपनाया गया है.’’

बिना कारण घर छोड़ेगी तो गुजारा भत्ता नहीं मिलेगा : एक दूसरे प्रकरण में पत्नी ने शादी के डेढ़ साल बाद ही पति का घर छोड़ दिया था. पति ने उसे इस के लिए कभी नहीं उकसाया था. पति ने उसे घर वापस बुलाने के लिए नोटिस भी भेजा लेकिन जब पत्नी की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला तो पति ने फैमिली कोर्ट में वैवाहिक अधिकारों को ले कर याचिका दायर की.

इस बीच पत्नी ने गुजारा भत्ता पाने के लिए याचिका दायर कर दी. फैमिली कोर्ट ने पति की याचिका स्वीकार कर पत्नी की याचिका खारिज कर दी. न्यायाधीश ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि यदि पत्नी ने बिना किसी ठोस कारण के पति का घर छोड़ा है तो उसे गुजारा भत्ता पाने का हक नहीं है.

महिला पेशेवर है तो गुजारा भत्ता नहीं  : एक अन्य फैसले में भी दिल्ली हाईकोर्ट ने घरेलू हिंसा के मामले में एक कामकाजी महिला को गुजारा भत्ता इस आधार पर देने से इनकार कर दिया कि महिला खुद एक पेशेवर है. वह बीते 13 साल से चार्टर्ड अकाउंटैंट के पेशे में है.

न्यायमूर्ति प्रदीप नंदराजोग और प्रतिभा रानी की खंडपीठ के समक्ष महिला ने अपने व अपने 2 बच्चों के अच्छे जीवन के लिए पति से 3 लाख रुपए प्रतिमाह गुजारा भत्ता दिए जाने की मांग की थी. निचली अदालत से निराशा हासिल होने पर महिला ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. सभी परिस्थितियों पर गौर करने के बाद खंडपीठ ने कहा कि उसे नहीं लगता कि महिला की याचिका में दम है.

अदालत ने महिला की उस दलील को भी खारिज कर दिया जिस में उस ने महज 7 हजार रुपए प्रतिमाह कमाने की बात कही थी. खंडपीठ ने कहा कि 7 हजार रुपए की राशि तो न्यूनतम आय के कानून से भी कम है. 13 साल तक चार्टर्ड अकाउंटैंट जैसे पेशे में रहने के बाद महज 7 हजार रुपए प्रतिमाह कमाने की दलील विश्वास योग्य नहीं है.

इस से पूर्व निचली अदालत ने महिला के पति को यह आदेश दिया था कि वह अपने 2 बच्चों के अच्छे जीवनयापन के लिए 22,900 रुपए प्रतिमाह गुजारा भत्ता दे. महिला के पेशेवर होने के कारण उसे गुजारा भत्ता दिए जाने से अदालत ने इनकार कर दिया था.

दरअसल, भारतीय समाज का ढांचा ही कुछ ऐसा बना हुआ है कि महिलाओं को जीवन के हर पड़ाव पर पुरुषों पर आश्रित रहने की आदत डाल दी जाती है और इसी आदत की वजह से महिलाएं आर्थिक रूप से सक्षम होते हुए भी पुरुषों पर निर्भर रहती हैं और उन से गुजारे के लिए मुआवजे की मांग करती हैं.

वैसे महिलाएं समानता की, बराबरी की मांग करती हैं, वे कहती हैं कि वे पुरुषों से किसी तरह से कम नहीं. मातापिता भी उन्हें बेटों के बराबर शिक्षा और सुविधाएं देते हैं तो फिर वे आत्मनिर्भर और पढ़ीलिखी होने के बावजूद पति से गुजारे भत्ते की मांग क्यों करती हैं? क्या सक्षम होते हुए भी सुविधा की मांग करना उन की बराबरी के अधिकार के आड़े नहीं आता?

प्लेटफार्म नं. 2 में सीमा सिंह ने लगाया ठुमका

भोजपुरी सिनेमा की चंचल चुलबुली आईटम क्वीन सीमा सिंह ने अभी हाल ही में झारखण्ड के खूबसूरत शहर रांची में भोजपुरी फिल्म प्लेटफार्म नं. 2 के लिए मन मोहक ठुमका लगाया है. उनका मंत्रमुग्ध कर देने वाला नृत्य उनके फैन्स को खूब आनन्दित करेगा. बड़े पैमाने पर उम्दा तकनिक के साथ निर्मित की जा रही भोजपुरी फिल्म ‘प्लेटफार्म नं. 2’ की शूटिंग पूरी हो गई है.

भोजपुरी सिने इंडस्ट्री में इस बेहतरीन फिल्म का निर्माण ब्लू व्रज फिल्म्स के बैनर तले किया जा रहा है. जिसकी निर्मात्री डॉ. नजमा शेख हैं. फिल्म का कुशल निर्देशन किया है निर्देशक रॉबिन्स कुमार सिन्हा. फिल्म की कथा, पटकथा व संवाद राहुल सिंह ने लिखा है. फिल्म के सभी गानों को संगीत से सजाया है संगीतकार महेश दास ने. फिल्म के सभी गीत बहुत ही कर्णप्रिय बनाये हैं, जो संगीतप्रेमियों को खूब पसंद आने वाले हैं.

इस फिल्म के जरिये भोजपुरी सिनेमा के रुपहले परदे पर एक नयी जोड़ी राहुल और रेशमा अपने हुनर का जौहर दिखाने वाले हैं. इनकी रोमांटिक जोड़ी सिनेप्रेमियों को खूब पसंद आने वाली है. फिल्म का छायांकन अधीर राज, नृत्यनिर्देशन राजू, मारधाड़ धर्मेश कर रहे हैं. मुख्य कलाकार नवोदित राहुल सिंह और रेशमा शेख के साथ के के गोस्वामी, राजेश अभागा, महेश अमन, मुन्ना बिहारी, बिरेन्द्र, नागेन्द्र, अखिलेश चैरसिया आदि हैं तथा इस फिल्म में आईटम क्वीन सीमा सिंह अपनी नृत्य कला का जलवा बिखेरते हुए नजर आयेंगी.

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