अभिनेत्रियों का बोल्ड से बॉलीवुड तक का सफर

बॉलीवुड में अपना नाम बनाने के लिये बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं ये तो आप जानते ही होंगे पर बॉलीवुड की अभिनेत्रियां आज जिस मुकाम पर हैं. उसके पीछे अपार मेहनत का पहाड़ है. और कुछ अभिनेत्रियों नें तो बॉलीवुड में बॉल्ड सीन्स देकर एंन्ट्री ली है, आद हम आपको कुछ उन ही अभिनेत्रियों के नाम बताने वाले हैं. जिन्होनें बॉलीवुड में डेब्यू करने के लिये बॉल्ड  फिल्मों में बॉल्ड सीन्स देने का सहारा लिया…

शर्लिन चोपड़ा

अभिनेत्री शर्लिन नें बॉल्ड फिल्म कामसूत्र 3D से डेब्यू किया था. बेहद बॉल्ड सीन्स देने वाली अभिनेत्री शर्लिन इसी फिल्म से काफी पहचान बनाने में कामयाब रही थीं.

पोली दाम

2012 से हेट स्टोरी से बॉलीवुड में डेब्यू करने वाली अभिनेत्री पोली ने फिल्म में बॉल्डनेस की काफी हदें पार करती दिखाई दीं, इसके अलावा अन्य कईं बॉलीवुड फिल्मों में पोली नें बॉल्ड सीन्स दियें हैं.

मल्लिका शेरावत

साल 2003 में रिलीज हुई फिल्म ख्वाइश से बॉलीवुड में डेब्यू किया था. फिल्म में मल्लिका काफी बॉल्ड सीन्स देते हुए नजर आईं इसी फिल्म से मल्लिका को काफी पहचान मिल गई थी. बाद में मल्लिका नें कईं बॉलीवुड फिल्मों में अपने बॉल्ड सीन्स का जाल बिखेरा है.

मनारा

साल 2014 मे रिलीज हुई फिल्म जिद में अभिनेत्री मनारा काफी बॉल्ड अवतार में नजर आईं, मनारा की बॉल्डेस के जादू से फिल्म नें बॉक्स ऑफिस पर भी काफा धमाका किया था.

कैटरीना कैफ

कैटरीना बॉलीवुड की टॉप अभिनेत्रीयों में गिनी जाती हैं. और लंबे समय तक बॉलीवुड के टॉप अभिनेत्री के खिताब पर भी राज कर चुकी हैं पर इन्होनें भी ये सब ख्यति पाने के लिये बॉल्ड फिल्म का सहारा लेना पड़ा था. 2003 में कैजाद गुस्ताद के निर्देशन में बनीं “बूम” फिल्म से बॉलीवुड में डेब्यू किया l इस फिल्म में कैटरीना नें काफी बॉल्ड सीन्स दिये थे.

कोचिंग की बैसाखी पर रेंगती शिक्षा व्यवस्था

कुछ वर्षों पहले रसायन का नोबेल पुरस्कार हासिल करने वाले भारतीय मूल के अमेरिकीब्रिटिश वैज्ञानिक वी रामकृष्णन ने एक टिप्पणी भारत की कोचिंग इंडस्ट्री के बारे में की थी. इस संबंध में पहली बात उन्होंने यह कही थी कि शुद्ध विज्ञान (प्योर साइंस) की तरफ उन का आना इसलिए संभव हुआ क्योंकि उन का दाखिला देश (भारत) के किसी मैडिकल या इंजीनियरिंग कालेज में नहीं हो पाया था. दाखिला इसलिए नहीं हुआ क्योंकि पुराने खयाल के उन के मातापिता यह मानने को तैयार ही नहीं थे कि मैडिकल-इंजीनियरिंग कालेजों का ऐंट्रैंस टैस्ट निकालने के लिए कोचिंग लेनी बहुत जरूरी है.

कोचिंग इंडस्ट्री को ले कर अपनी बात को और ज्यादा साफ करते हुए उन्होंने यह भी कहा था कि अब तो कोचिंग संस्थानों में दाखिले के लिए भी कोचिंग की जरूरत पड़ने लगी है. लिहाजा, जब तक ऐंट्रैंस टैस्ट का स्वरूप नहीं बदला जाता व छात्रों और अभिभावकों में कोचिंग के प्रति नफरत नहीं पैदा की जाती, तब तक इस बीमारी का इलाज संभव नहीं है.

कोचिंग बिना कामयाबी

कोचिंग के खिलाफ वी रामकृष्णन से मिलतीजुलती राय अपने देश में सुनाई पड़ती रही है. इधर यूपीएससी (आईएएस) की परीक्षा में देश में तीसरी रैंक हासिल करने और बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले 30 साल के गोपाल कृष्ण रोनांकी ने भी वैज्ञानिक वी रामकृष्णन जैसी बातें कही हैं.

सिविल सेवा की तैयारी के लिए समाज की परिपाटी के मुताबिक वे भी कोचिंग सैंटर जौइन करना चाहते थे, लेकिन पिछड़े इलाके से आने की वजह से किसी भी कोचिंग सैंटर ने उन्हें दाखिला नहीं दिया. ऐसे में गोपाल के पास सैल्फ स्टडी के अलावा कोई चारा नहीं बचा.

कोचिंग से महरूम होने को उन्होंने कमजोरी के बजाय अपनी ताकत बनाई. परीक्षा के लिए उन्होंने कोई कोचिंग अटैंड नहीं की और कड़ी मेहनत व लगन की बदौलत सिविल सर्विस एग्जाम में कामयाब हो कर दिखा दिया कि बिना कोचिंग के भी सफलता पाई जा सकती है.

गोपाल कृष्ण रोनांकी भले ही कोचिंग सैंटर में दाखिला नहीं मिलने के कारण सैल्फ स्टडी के लिए प्रेरित हुए, लेकिन सीबीएसई की 12वीं परीक्षा की इस साल की टौपर नोएडा की रक्षा गोपाल के सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं थी. उस ने अपनी मरजी से कोचिंग की बैसाखी लिए बिना खुद बेहतर पढ़ाई की योजना बनाई और परीक्षा में टौप कर के दिखा दिया कि अगर हौसला हो तो किसी भी परीक्षा की चुनौती ऐसी नहीं है, जिसे पार न किया जा सके. रक्षा गोपाल ने बिना ट्यूशनकोचिंग के 99.6 फीसदी अंक ला कर टौप किया है.

उपरोक्त उदाहरणों के बावजूद हमारे समाज में ट्यूशनकोचिंग का दबदबा बढ़ता जा रहा है. मांबाप कोचिंग सैंटरों और ट्यूशन पढ़ाने वाले अध्यापकों का स्तर जाने बगैर अपने बच्चों को कोचिंग के लिए भेज रहे हैं और सामान्य पढ़ाई से ज्यादा ट्यूशनकोचिंग पर खर्च कर रहे हैं.

लाइसैंस भी जरूरी नहीं है

कोचिंग का जाल इतना गहरा है कि सरकार को भी इस की चिंता है. मानव संसाधन विकास मंत्रालय कई बार इस पर चिंता जताता रहा है. कुछ ऐसी ही टिप्पणी पिछले साल मशहूर फिल्म अभिनेता और लोकसभा सांसद परेश रावल ने संसद में की थी. उन्होंने प्राइवेट कोचिंग संस्थानों को शैक्षिक आतंकवाद फैलाने वाला बताते हुए देश में प्राइवेट कोचिंग के लिए नियमकानून बनाने की मांग की थी.

इस मर्ज का एक सिरा इस विरोधाभासी तथ्य से भी जुड़ा है कि लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने के लिए नहीं भेजना चाहते हैं, लेकिन उन कोचिंग सैंटरों में जरूर भेजते हैं जहां कई बार सरकारी स्कूलों के ही टीचर पढ़ाते हैं. इन तथ्यों के केंद्र में यह इशारा बारबार मिलता है कि कुछ ऐसे उपाय किए जाएं ताकि बोर्ड परीक्षाओं, मैडिकल और इंजीनियरिंग ऐंट्रैंस में कोचिंग की भूमिका घटाई जा सके.

लेकिन ऐसा लगता है कि यह भूमिका कम करने को ले कर समाज से ले कर सरकार तक कोई गहरी दुविधा है जो उन्हें इस दिशा में आगे बढ़ने से रोक देती है.

जब से मैडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों का बोलबाला बढ़ा और इन संस्थानों से निकले डाक्टर इंजीनियर लाखोंकरोड़ों कमाते दिखे, तो हर कोई अपने बच्चे को जैसेतैसे इसी लाइन में खड़ा करने की तैयारी में जुट गया.

आज स्थिति यह है कि देश के सभी इंजीनियरिंग व मैडिकल कालेजों में कुल मिला कर 40 से 45 हजार सीटें हैं, पर इन में दाखिला पाने को ले कर हर साल 10 लाख छात्रों के बीच होड़ सी मची रहती है. वे चाहे इन सीटों के लिए पूरी तरह काबिल न हों, लेकिन हर हाल में उन्हें इन्हीं में दाखिला चाहिए. इस का फायदा उठाया है देश में कुकुरमुत्ते की तरह राजस्थान के कोटा और दिल्ली से ले कर हर छोटेबड़े शहर की गलीकूचों में खुले कोचिंग सैंटरों ने.

ये अपने एकाध पूर्व छात्र की सफलता का ढोल पीटते हुए बच्चे को इंजीनियर और डाक्टर बनाने का सपना देखने वाले मांबाप से लाखों रुपए ऐंठने में कामयाब होते हैं. पर क्या कोई यह देख पा रहा है कि आखिर इस गोरखधंधे में किस का भला हुआ है?

अरबों डौलर का बिजनैस

देश के वित्तीय कारोबारों पर नजर रखने वाली आर्थिक संस्था एसोचैम ने इस बारे में एक आकलन पेश करते हुए दावा किया था कि 2015 के अंत तक देश में कोचिंग का कारोबार 40 अरब डौलर तक पहुंच चुका है. यह आकलन बेमानी नहीं कहा जाएगा क्योंकि इस में यह आंकड़ा भी निकल कर आया था कि प्राइमरी में पढ़ने वाले 87 फीसदी और सैकंडरी में पढ़ने वाले करीब 95 फीसदी बच्चे ट्यूशन या कोचिंग लेते हैं.

इस ट्यूशन की वजह से अभिभावकों की जेब पर भारी बोझ पड़ा है पर चूंकि वे बच्चे के भविष्य की खातिर कोई रिस्क नहीं लेना चाहते, इसलिए वे कोचिंग से परहेज नहीं करते हैं. यही नहीं, 78 फीसदी अभिभावकों ने एसोचैम के अध्ययन में यह तक कहा कि आज बच्चों पर ज्यादा नंबर लाने का दबाव है और बिना कोचिंग के ऐसा कर पाना मुमकिन नहीं लगता है.

महानगरों और छोटे शहरों में प्राइमरी स्तर तक के बच्चों की हर महीने की ट्यूशन फीस जहां 1,000 से 3,000 रुपए है वहीं सैकंडरी के बच्चों के ट्यूशन पर हर महीने औसतन करीब 5,000 रुपए या इस से अधिक का खर्चा आता है. बड़े शहरों में तो स्कूल की फीस के बाद कोचिंग पर औसतन 10,000 रुपए तक का हर महीने का खर्चा पेरैंट्स पर आ रहा है.

एसोचैम ने यह सर्वे रिपोर्ट दिल्ली, एनसीआर, मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई, लखनऊ, अहमदाबाद, जयपुर और चंडीगढ़ में 1,200 पेरैंट्स से बातचीत के बाद तैयार की थी.

सर्वे में शामिल 78 प्रतिशत पेरैंट्स ने कहा कि पढ़ाई का स्तर और माहौल काफी बदल गया है. बच्चों पर ज्यादा नंबर लाने का दबाव है. बिना ट्यूशन के ऐसा मुमकिन नहीं है. इन में करीब 86 प्रतिशत अभिभावकों ने माना था कि उन के पास अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए पर्याप्त समय नहीं है. पति और पत्नी दोनों कामकाजी होने की वजह से उन के पास तो अपने बच्चों के साथ गुजारने के लिए भी वक्त नहीं होता. ऐसे में उन के पास बच्चों को प्राइवेट कोचिंग में भेजने के अलावा और कोई चारा नहीं बचता.

राष्ट्रपति चुनाव : अब देखने को बाकी क्या रहा है

मौजूदा राष्ट्रपति चुनाव में अब देखने समझने को कुछ बाकी नहीं रह गया है, सिवाय इसके कि एनडीए के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद कितने वोटों के अंतर से यूपीए की प्रत्याशी मीरा कुमार को हराते हैं, हां यह जरूर साफ हो गया है कि राष्ट्रपति दलित समुदाय का होगा.

रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी निसंदेह चौंका देने वाली इस लिहाज से है कि किसी को अंदाजा नहीं था कि भगवा खेमा दलित उम्मीदवार पर दांव खेलने का जोखिम उठाएगा. भाजपा और आरएसएस का दलित प्रेम छद्म ही सही शबाब पर है, जिसका ताल्लुक देश के मौजूदा सामाजिक और जातिगत समीकरणों से है. यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बहुत बड़ी दिक्कत है कि वे यदि किसी सवर्ण को इस पद का उम्मीदवार बनाते तो उन पर सीधा आरोप यह लगता कि दलित क्यों नहीं और अब एक दलित उम्मीदवार को राष्ट्रपति भवन पहुंचा रहे हैं तो पूछा जा रहा है कि दलित ही क्यों.

दलित शब्द मूलतः अंग्रेजों की देन है, वे जब भारत आए तो यह देख कर हैरान रह गए थे कि एक बहुसंख्यक आबादी ऐसे तबके की है जिसमे कोई बल, बुद्धि या विवेक नहीं है. इसे अंग्रेजों ने अपनी भाषा में डिप्रेस्ड कहा, यानि हिन्दी में दलित जो ऊंची जाति वालों के इशारों पर नाचती है. आज भी हालत अपवाद स्वरूप ज्यों की त्यों है, कोविंद खुशी खुशी भाजपा के और मीरा कुमार कांग्रेस के इशारों पर नृत्य कर रहीं हैं, उन्हें अपनी तयशुदा हार का कोई मलाल नहीं है. उनके पिता बाबू जगजीवन राम नेहरू गांधी परिवार के दरबार में ठीक वैसे ही बैठा करते थे जैसे राम दरबार में हनुमान बैठता था.

भाजपा का एक बड़ा वर्ग अपने पितृ पुरुष लालकृष्ण आडवाणी को इस अहम ओहदे पर विराजमान देखना चाहता था, इस वर्ग का आडवाणी से भावनात्मक लगाव है. यह बात नरेंद्र मोदी को भी मालूम है और आरएसएस को भी कि अगर किसी और सवर्ण भाजपाई को राष्ट्रपति बनाया गया तो अंदरूनी असंतोष पनपेगा, इसलिए उन्होंने इसे दबाये रखने कोविंद को खोज निकाला, जो संघ खेमे से हैं और साफ सुथरी छवि वाले भी हैं. उनके नाम पर सब सहमत भले ही न हों पर खामोश रहे क्योंकि सवाल दलित वोट बैंक का है. आडवाणी खेमा अगर कोविंद की उम्मीदवारी का विरोध करता तो आरोप उस पर ही दलित विरोधी होने का लगता.

गलत नहीं कहा जाता कि राष्ट्रपति रबर स्टाम्प होता है, जिसका जाति से कोई ताल्लुक नहीं नहीं होता, सो बैठे बिठाये भाजपा को ऐसा उम्मीदवार मिल गया है जो रबर ही रहेगा, लोहा होने की कोशिश नहीं करेगा. अब इस चुनाव में औपचारिकताए ही शेष बची हैं, क्योंकि तमाम छोटे बड़े दल भाजपा के साथ हैं, यहां तक कि मुलायम सिंह और नीतीश कुमार जैसे दिग्गज भी इस ट्रम्प चाल के कायल हो चुके हैं, जिसके सामने मायावती और लालू यादव के प्रलाप मीरा कुमार के कोविंद से ज्यादा लोकप्रिय होने और बिहार की बेटी होने की दलीलों का कोई असर नहीं हो रहा.

नरेंद्र मोदी ने महज तीन साल में ही या तो दलित दल और नेता अपने पाले में ले लिए हैं या फिर खत्म कर दिये हैं. राम विलास पासवान, अनुप्रिया पटेल और रामदास अठावले जैसे दलित नेता सत्ता सुख भोग रहे हैं तो मायावती और उनकी पार्टी बसपा अब कहने भर को रह गई है. एनडीए जिसको भी उम्मीदवार बनाती उसका जीतना वोटों के लिहाज से तय था, इसके बाद भी उसने सुरक्षित और कूटनीति वाला रास्ता चुना, जिसके जबाब में सोनिया गांधी की अगुवाई वाला 17 छोटे बड़े दलों वाला विपक्ष अब खिसियाई राजनीति कर रहा है. रही बात राष्ट्रपति की जाति की तो यह मुद्दा दम तोड़ रहा है, वजह राष्ट्रपति आखिरकार राष्ट्रपति ही होता है और आम लोग इस पर विवाद या बहस नहीं चाहते. मीरा कुमार हारने को तैयार हैं, तो यह उनकी अपने पिता जैसी निष्ठा है जिसके एवज में काफी कुछ उन्हें मिल चुका है.

फिल्म रिव्यू : ट्यूबलाइट

बौलीवुड के कुछ फिल्मकार बड़े कलाकारों का साथ मिलते ही दर्शकों को मनोरंजन प्रदान करने या दर्शकों को एक बेहतरीन कहानी सुनाने की बनिस्बत अपने एजेंडे को फिल्म के माध्यम से पेश करने लग जाते हैं. परिणामतः फिल्म इतनी खराब बनती है कि दर्शक फिल्म को सिरे से नकार देता है. फिल्मकार की इस हरकत का खामियाजा फिल्म से जुड़े बडे़ स्टार को झेलना पड़ता है कि दर्शक ने इस स्टार की फिल्म को स्वीकार नहीं किया. ऐसे ही फिल्मकार हैं कबीर खान. कबीर खान की फिल्म ‘‘ट्यूबलाइट ’’ उनके निहित एजेंडे वाली फिल्म है, जिसे वह बेहतर कहानी व मनोरंजन वाली फिल्म के रूप में नहीं बना सके. परिणामतः फिल्म के कलाकारों की अभिनय क्षमता, कैमरामैन का बेहतरीन काम, शाहरुख खान की मौजूदगी भी इस फिल्म को डूबने से नहीं बचा सकती.

यूं तो फिल्मकार के अनुसार ‘‘ट्यूबलाइट ’’ एक बहुत बुरी तरह से असफल रही अंग्रेजी फिल्म ‘‘लिटिल ब्वाय’’ का भारतीयकरण है. कबीर खान का दावा है कि उनकी फिल्म ‘ट्यूबलाइट ’ की वजह से ‘लिटिल ब्वाय’ को लोग जानने लगे हैं. मगर फिल्म ‘ट्यूबलाइट ’ देखकर फिल्म ‘लिटिल ब्वाय’ के निर्माता सोच रहे होंगे कि काश उन्होंने अपनी फिल्म के अधिकार कबीर खान को न दिए होते. जिन्होंने फिल्म ‘लिटिल ब्वाॅय’ देखी है, उन्हे इस बात का अहसास हो जाता है कि ‘ट्यूबलाइट ’ और ‘लिटिल ब्वाय’ दोनों ही फिल्में एजेंडे वाली हैं. फिल्म ‘लिटिल ब्वाय’ में बच्चे को बाइबल सिखाने का मसला है, तो कबीर खान ने अपनी फिल्म ‘‘ट्यूबलाइट ’’ को इस एजेंडे के साथ बनाया है कि यदि चीन यानी किसी भी देश का निवासी तीन पीढ़ियों से भारत में रह रहा है, तो वह हिंदुस्तानी ही होता है, उसके हिंदुस्तानी होने पर शक या सवाल नहीं उठाया जा सकता.

फिल्म ‘‘ट्यूबलाइट ’’ की कहानी सितंबर 1962 में उत्तर भारत के कुमायूं क्षेत्र के अंतर्गत जगतपुर नामक एक गांव की है, जहां लक्ष्मण (सलमान खान) को बचपन से ही ‘ट्यूबलाइट ’ पुकारते हैं. क्योंकि वह थोड़ा मंद बुद्धि है. पर उसका छोटा भाई भरत (सोहेल खान) उसे कैप्टन मानता है. भरत की वजह से ही लोग ‘ट्यूबलाइट ’ बुलाना बंद कर देते हैं. लक्ष्मण और भरत के माता पिता बचपन में ही गुजर चुके हैं. इनकी परवरिश बन्ने खां (ओम पुरी) ने अपने आश्रम में रखकर की है. भारत चीन सीमा पर तनाव बढ़ने के बाद भारतीय सेना में नवयुवकों की भर्ती शुरू की जाती है. बन्ने खां की सलाह पर भरत आर्मी में भर्ती हो जाता है. लक्ष्मण भी आर्मी में जाना चाहता है. पर उसकी मंदबुद्धि के कारण उसका चयन नहीं हो पाता.

भारत और चीन के बीच युद्ध छिड़ जाता है. अब लक्ष्मण अपने भाई भरत को लेकर परेशान है. इसी बीच गांव में एक जादूगर (शाहरुख खान) आता है. जो कि लक्ष्मण को अपने शो का हिस्सा बनाकर साबित करता है कि यदि आप पूरे यकीन के साथ किसी काम को अंजाम दें, तो हो सकता है. लक्ष्मण दूर से अपने हाथों के इशारे से एक बोटल हिला देता है. अब इसमें जादूगर का क्या खेल रहा? यह बात सामने नहीं आती है. उसके बाद बन्ने खां भी लक्ष्मण को समझाते हैं कि यदि वह यकीन रखे, तो युद्ध जल्दी खत्म होगा और उसका भाई वापस आ जाएगा.

इसी बीच कलकत्ता से एकदम चीनी जैसी दिखती एक महिला ले लेलिन (जू जू) अपने बेटे गुओ (मातिन) के साथ जगतपुर गांव की सीमा के पास अपने घर में रहने आती है. चीन के साथ युद्ध छिड़ चुका है. इसलिए लक्ष्मण और गांव के दूसरे युवक ले लेलिन को चीनी समझकर उनके घर को जलाने की असफल कोशिश करते हैं. तब बन्ने खां लक्ष्मण को समझाते हैं कि यदि वह महात्मा गांधी के पदचिन्हों पर चलते हुए चीनी से दोस्ती करेगा, तो उसका भाई जल्दी वापस आ जाएगा. लक्ष्मण की लेलिन व गुओ से दोस्ती हो जाती है. ले लेलिन भी लक्ष्मण से यकीन की बात करती है. इनकी दोस्ती गांव के दूसरे लोगों को पसंद नहीं आती. क्योंकि सभी उसे चीनी समझकर दुश्मन मानते हैं.

एक मुकाम आता है, जब पूरे गांव के बीच ले लेलिन कहती है कि,‘‘वह पूरे दिल से हिंदुस्तानी है. उसके हिंदुस्तानी होने पर सवाल उठाने का हक किसी को नहीं है.’ कई घटनाक्रम बदलते हैं. भूकंप आता है और लक्ष्मण को लगता है कि उसके यकीन से चट्टान हिली. इधर युद्ध बंद हो जाता है. ले लेलिन वापस कलकत्ता जाने की बात करती हैं. भरत मिल जाता है, जिसका सैनिक छावनी में इलाज चल रहा है.

सलमान खान एकदम नए अवतार में हैं. लेकिन मंदबुद्धि इंसान के पूरे मैनेरिजम को पकड़ने में वह असफल रहे हैं. वैसे भी इन स्टार कलाकारों का अपना मैनेरिज्म लोगों के सिर पर इस कदर चढ़कर बोलता है कि दिव्यांग किरदारों को निभाना इनके लिए आसान नहीं कहा जा सकता. स्व.ओम पुरी व बाल कलाकार मातिन रे तंगू ने बेहतरीन काम किया है. मगर ‘बजरंगी भाईजान’ जैसा करिश्मा इस बार बाल कलाकार व सलमान खान के बीच नहीं जम पाया. फिल्म में शाहरूख खान की छोटी सी भूमिका प्रभावित नहीं करती. बृजेंद्र काला, मो.जीशान अयूब व यशपाल शर्मा ने बेहतरीन काम किया है. सोहेल खान के हिस्से कुछ खास करने का है नहीं.

फिल्म की गति बहुत धीमी है. पटकथा की कमजोरी के चलते इंटरवल से पहले कहानी किसी अन्य मोड़ पर होती है, जबकि इंटरवल के बाद कहानी किसी अन्य मोड़ पर होती है. कमजोर पटकथा की वजह से पूरी कहानी बिखरी हुई नजर आती है. कमजोर पटकथा व निर्देशन के चलते फिल्म में यकीन करने का मुद्दा भी उभर नही पाता. फिल्म में इमोशनल पक्ष को उभारने के लिए पटकथा व निर्देशन के स्तर पर मेहनत नहीं की गयी. परिणामतः कई इमोशनल सीन भी दर्शकों को भावुक नहीं बना पाते. फिल्म अपने पड़ोसियों से प्यार करने की बात करती है, मगर यह मुद्दा भी उभर कर नही आता.

फिल्म में ‘हिंदी चीनी भाई भाई’ का संदेश देने का असफल प्रयास किया गया है. क्योंकि संदेश वाहक दूर नजर आता है. हर सीन इतना बनावटी लगता है कि यह संदेश ‘हिंदी चीनी बाय बाय’ में बदल जाता है. फिल्म में रंगभेद का मुद्दा भी है. उत्तरपूर्वी भारतीयों के साथ जिस तरह का भेदभाव होता है, उस हकीकत को सही अर्थों में पेश करने में ‘ट्यूबलाइट ’ बुरी तरह से असफल रहती है. फिल्म के क्लायमेक्स में कोई रोचकता नहीं है. कबीर खान तो युद्ध दृश्यों को फिल्माने में महारत रखते हैं. उन्होंने डाक्यूमेंट्री फिल्मकार के रूप में कई युद्ध दृश्यों को चित्रित किया है, पर इस फिल्म में वह विफल रहे.

फिल्म का रेडियो वाला गाना प्रभावित करता है. कैमरामैन असीम मिश्रा तारीफ के हकदार हैं.

दो घंटे 16 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘ट्यूबलाइट ’’ का निर्माण ‘‘सलमान खान फिल्मस’’ के बैनर तले सलमा खान व सलमान खान ने किया है. लेखक व निर्देशक कबीर खान, संगीतकार प्रीतम, कैमरामैन असीम मिश्रा तथा कलाकार हैं- सलमान खान, सोहेल खान, स्व. ओम पुरी, बृजेंद्र काला, मो.जीशान अयूब, झू झू, बाल कलाकार मातिन रे तंगू, यशपाल षर्मा व मेहमान कलाकार शाहरुख खान.

बर्फीले पहाड़ों पर किसके फोटोशूट ने मचा दी हलचल

हमेशा अपनी बोल्डनैस के कारण सुर्खियों में रहने वाली मॉडल जेलीन कुक के फोटोशूट ने तो जैसे बवाल मचा दिया है. बता दें कि जेलीन पहले भी कई बार विवादों में फंस चुकी है.

हाल ही में जेलीन ने एक न्यूड फोटोशूट करवाया है. इस फोटोशूट में वे पहाड़ को ऊपर खड़ी हैं. उन्होंने ये तस्वीरें इंस्टाग्राम पर भी शेयर की हैं.

आपको बता दें कि मॉडल जेलीन लगातार अपनी बोल्ड तस्वीरें इंस्टाग्राम पर शेयर करती रहती हैं और उनकी एक अच्छी खासी फैन फोलोइंग हैं. जेलीन कुक न्यूजीलैंड से हैं.

मेरे पति पर मुखमैथुन का जनून सवार है. कई बार उन का वीर्य मेरे मुंह में ही स्खलित हो जाता है. क्या करूं.

सवाल
मैं 25 वर्षीय विवाहिता हूं. मेरे पति बहुत ही रोमांटिक हैं. नियमित सहवास करते हैं. कई तरह की रतिक्रीड़ाएं करते हैं. मैं भी उन्हें पूरा सहयोग देती हूं. आजकल उन पर मुखमैथुन का जनून सवार है. मैं जानना चाहती हूं कि इस से हमारे स्वास्थ्य पर कोई दुष्प्रभाव तो नहीं पड़ेगा. कई बार मुखमैथुन करते हुए उन का वीर्य मेरे मुंह में ही स्खलित हो जाता है.

जवाब

मुखमैथुन भी संभोग की एक प्रक्रिया है. यदि इस में आप के पति को आनंद मिलता है, तो इस में कोई हरज नहीं है. जहां तक स्वास्थ्य पर इस के दुष्प्रभाव की बात है, तो यदि यौनांगों की साफ सफाई पर खास ध्यान दिया जाए, तो इस का स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता.

जिस्म की मौज में मौत की छाया

13 जनवरी, 2016 की दोपहर के यही कोई साढ़े 3 बजे बंगलुरु के थाना सोलादेवनहल्ली पुलिस को सप्तगिरि अस्पताल से सूचना मिली कि कुछ देर पहले श्रुति गौड़ा नाम की एक महिला शहर के जानेमाने एडवोकेट अमित मूर्ति को अस्पताल में इलाज के लिए लाई थी. उन की छाती में गोलियां लगी थीं. डाक्टरों ने उन्हें बचाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह बच नहीं सके. उन्हें लाने वाली श्रुति पैसों और खून का इंतजाम करने गई थी लेकिन लौट कर नहीं आई. सूचना के अनुसार, मामला आपराधिक यानी हत्या का लग रहा था, इसलिए थाना पुलिस ने तुरंत मामले की डायरी तैयार की. पुलिस अस्पताल जाने की तैयारी कर ही रही थी कि तभी 2 लोग थाने में दाखिल हुए. उन में एक नौजवान था और दूसरा बुजुर्ग. नौजवान बुजुर्ग के हाथों से रिवौल्वर छीनने की कोशिश कर रहा था. वह रिवौल्वर छीन पाता, उस के पहले ही बुजुर्ग ने रिवौल्वर थानाप्रभारी की मेज पर रखते हुए कहा, ‘‘सर, आप मुझे गिरफ्तार कर लीजिए. मैं ने इस रिवौल्वर से एडवोकेट अमित मूर्ति की हत्या की है.’’

‘‘नहीं सर, यह सच नहीं है. एडवोकेट अमित मूर्ति की हत्या इन्होंने नहीं, मैं ने की है.’’ नौजवान ने कहा.

थानाप्रभारी बुजुर्ग को भी जानते थे और युवक को भी. बुजुर्ग का नाम गोपालकृष्ण गौड़ा था. नौजवान उन का बेटा राजेश गौड़ा था. गोपालकृष्ण को इलाके में कौन नहीं जानता था. वह समाजसेवक तो थे ही, एक राजनीतिक पार्टी से भी जुड़े थे. इसलिए थानाप्रभारी को एकबारगी विश्वास नहीं हुआ कि बापबेटे जिस हत्या की बात कर रहे हैं, ऐसा सचमुच कर सकते हैं.

लेकिन थोड़ी ही देर पहले ही उन्हें सप्तगिरि अस्पताल से एडवोकेट अमित मूर्ति की हत्या की सूचना मिल चुकी थी, इसलिए उन्होंने सवालिया नजरों से गोपालकृष्ण की ओर देखा तो उन्होंने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा, ‘‘सर, मेरा बेटा झूठ बोल कर मुझे बचाना चाहता है. उस की हत्या मैं ने ही की है.’’

इस के बाद राजेश ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘सर, मेरे पिता निर्दोष हैं. एडवोकेट अमित मूर्ति को मैं ने ही गोलियां मारी हैं, क्योंकि वह निहायत ही गिरा हुआ आदमी था. उस के मेरी पत्नी श्रुति गौड़ा से अवैध संबंध थे.’’

राजेश के इतना कहते ही थानाप्रभारी को समझते देर नहीं लगी कि मामला क्या था और एडवोकेट अमित मूर्ति की हत्या किस ने की है. फिर भी सच्चाई सामने लाने के लिए उन्होंने एक परीक्षा ली. उन्होंने कहा, ‘‘गुनहगार तो आप दोनों ही हैं, लेकिन असली गुनहगार कौन है, यह अभी साफ हो जाएगा.’’

अपनी बात कह कर उन्होंने मेज पर रखा रिवौल्वर गोपालकृष्ण गौड़ा के हाथों में देते हुए थोड़ी दूर पर रखी किसी चीज पर निशाना लगाने को कहा. जब वह उस चीज पर निशाना नहीं लगा सके तो साफ हो गया कि हत्या उन्होंने नहीं, उन के बेटे राजेश गौड़ा ने की थी. वह बेटे को बचाने के लिए झूठ बोल रहे थे. थानाप्रभारी ने दोनों को हिरासत में ले लिया और आगे की जांच के लिए सप्तगिरि अस्पताल जा पहुंचे.

अस्पताल में थानाप्रभारी ने डाक्टरों का बयान ले कर मृतक अमित मूर्ति की लाश कब्जे में लेने की काररवाई पूरी की. तभी उन्हें पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिली कि हिसार घाट स्थित तीनसितारा होटल राजबिस्टा की तीसरी मंजिल पर स्थित कमरा नंबर 301 में एक महिला ने आत्महत्या कर ली है.

थानाप्रभारी हत्या के एक मामले की जांच कर ही रहे थे, ऐसे में आत्महत्या की इस दूसरी घटना की सूचना पा कर वह थोड़ा खीझ से उठे. लेकिन वह कर ही क्या सकते थे. अपनी ड्यूटी तो उन्हें निभानी ही थी. उन्होंने फोन द्वारा इस घटना की जानकारी अधिकारियों को देने के साथ क्राइम टीम को भी बता दिया और तत्काल वहां की काररवाई निपटा कर होटल राजबिस्टा जा पहुंचे.

थानाप्रभारी के पहुंचने तक पुलिस अधिकारियों के साथ क्राइम टीम भी वहां पहुंच चुकी थी. रिसैप्शन पर पूछताछ में पता चला कि रजिस्टर में आत्महत्या करने वाली महिला का नाम श्रुति गौड़ा लिखा है. थानाप्रभारी श्रुति का नाम सुबह से कई बार सुन चुके थे, इसलिए उन्हें मृतका की शिनाख्त की जरूरत नहीं पड़ी.

वह समझ गए कि आत्महत्या करने वाली श्रुति गौड़ा कोई और नहीं, थोड़ी देर पहले हिरासत में लिए गए गोपालकृष्ण गौड़ा की बहू यानी राजेश गौड़ा की पत्नी है, जिस ने मृतक एडवोकेट अमित मूर्ति को सप्तगिरि अस्पताल में भरती कराया था.

थानाप्रभारी ने अधिकारियों की उपस्थिति में ही घटनास्थल की सारी काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और थाने आ गए. अब तक मिली जानकारी से स्पष्ट हो गया था कि मामला प्रेमत्रिकोण का है. इस प्रेमत्रिकोण में क्या और कैसे हुआ, इस बात की जानकारी राजेश गौड़ा से पूछताछ के बाद ही पता चल सकता थी. थाने में राजेश गौड़ा से की गई पूछताछ में इस मामले में जो सच्चाई सामने आई, वह इस प्रकार थी—

बंगलुरु-कोयंबटूर नेशनल हाईवे के किनारे स्थित कगलीपुर गांव के रहने वाले थे 78 वर्षीय गोपालकृष्ण गौड़ा. सुखी और संपन्न होने के साथसाथ वह समाजसेवी भी थे. साथ ही वह एक राजनीतिक पार्टी से भी जुड़े थे. यही वजह थी इलाके में उन्हें हर कोई जानता था. उन के परिवार में पत्नी के अलावा एक ही बेटा था राजेश गौड़ा.

राजेश गौड़ा स्वस्थसुंदर और पढ़ालिखा युवक था. पढ़ाई पूरी होते ही उसे एक जानीमानी रियल एस्टेट कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई थी. सम्मानित परिवार का होने और बढि़या नौकरी मिलने के बाद राजेश के लिए तमाम रिश्ते आने लगे थे. आखिरकार गोपालकृष्ण ने रामनगर रामोहल्ली के रहने वाले एक कारोबारी की बेटी श्रुति को पसंद कर राजेश से उस की शादी कर दी थी.

श्रुति भी राजेश से किसी मामले में कम नहीं थी. वह सुंदर तो थी ही, उस की नौकरी भी राजेश से अच्छी थी. वह सरकारी नौकरी में थी. उस का पद था पंचायत डेवलपमेंट अफसर का. उसे सरकारी गाड़ी और मकान मिला हुआ था. साथ ही घर का काम करने के लिए सरकारी नौकर भी. श्रुति जैसी पढ़ीलिखी और कमाऊ पत्नी पा कर राजेश खुश ही नहीं था, बल्कि गर्व भी महसूस कर रहा था.

राजेश की तरह उस के मांबाप भी श्रुति को बहुत मानते थे. धीरेधीरे 4 साल बीत गए. इस बीच श्रुति 2 बच्चों की मां बन गई. लेकिन यह भी सच है कि समय कभी किसी का नहीं हुआ. कब किस का समय बदल जाए, कोई नहीं जानता.

पंचायत डेवलपमेंट अफसर होने की वजह से श्रुति को कभीकभी क्षेत्र के लोगों के कामों के लिए पुलिस और वकीलों से भी मिलना होता था. उन्हीं वकीलों में एक अमित मूर्ति भी था. उसी से मिलतेमिलाते श्रुति के कदम बहक गए.

अमित के रौबदार चेहरे, स्वस्थ व सुंदर कदकाठी और व्यवहार ने श्रुति को काफी प्रभावित किया था. यही हाल एडवोकेट अमित मूर्ति का भी था. 2 बच्चों की मां होने के बावजूद श्रुति की सुंदरता पर वह मर मिटा था. इस में उस का दोष भी नहीं था, खूबसूरत श्रुति की बातचीत करने की अदा ही कुछ ऐसी थी कि किसी को भी मन भा जाए.

अमित के पिता बंगलुरु के जानेमाने वकील तो थे ही, बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी थे. अमित उन का एकलौता बेटा था. उस की शादी ही नहीं हो चुकी थी, बल्कि वह 3 साल के एक बेटे का पिता भी था. अमित पिता के साथ ही वकालत कर रहा था. पिता उसे अपनी ही तरह अच्छा वकील बनाना चाहते थे, शायद इसीलिए उन्होंने उसे पढ़ने के लिए अमेरिका भेजा था.

अमित और श्रुति दोनों के ही मनों में एकदूसरे के लिए चाहत पैदा हो चुकी थी, इसलिए वे अपनीअपनी गरिमा भूल कर एकदूसरे से मिलनेजुलने लगे थे. श्रुति को मोटरसाइकिल की सवारी बहुत पसंद थी, इसलिए अकसर वह अमित के साथ मोटरसाइकिल से लंबी ड्राइव पर निकल पड़ती थी. चोरीचोरी दोनों ही जिंदगी का लुत्फ उठा रहे थे.

लेकिन यह भी सच है कि कोई भी काम कितना ही छिपा कर किया जाए, एक न एक दिन वह लोगों की नजरों में आ ही जाता है. राजेश गौड़ा को भी पत्नी की इस हरकत का पता चल गया. श्रुति की हकीकत जान कर राजेश के होश उड़ गए. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक सभ्य परिवार की शिक्षित बहू, जो 2 बच्चों की मां भी थी, इस तरह की हरकत कर सकती है.

चूंकि राजेश का परिवार समाज में प्रतिष्ठित था, इसलिए उस ने पत्नी को समझाना चाहा तों श्रुति ने लापरवाही से हंसते हुए कहा कि जैसा वह सोच रहा है, ऐसा कुछ भी नहीं है. अमित से सिर्फ उस की दोस्ती है और वह उस से काम के सिलसिले में मिलतीजुलती रहती है.

श्रुति ने भले ही सफाई दे दी थी, लेकिन राजेश को पत्नी की इस सफाई पर विश्वास नहीं हुआ था. इसलिए वह श्रुति पर नजर रखने लगा था. इस का नतीजा यह निकला कि एक दिन उस ने श्रुति को अमित मूर्ति के साथ एक होटल में बैठी पकड़ लिया. राजेश ने उसे जलील करते हुए कहा, ‘‘अगर तुम्हें अमित इतना ही पसंद है तो तुम इस के साथ चली क्यों नहीं जाती.’’

‘‘ठीक है, अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो मैं तुम्हें तलाक दिए देती हूं.’’ श्रुति ने कहा और अमित के साथ होटल से बाहर निकल गई.

श्रुति की यह बात सुन कर राजेश तिलमिला उठा. उसे श्रुति से ऐसी उम्मीद बिलकुल नहीं थी. यह बात उस ने अपने घर वालों को बताई तो सभी परेशान हो उठे. जब इस का पता श्रुति के मातापिता को चला तो उन्होंने उस से बात की और अमित से संबंध खत्म करने का दबाव डाला. आखिर मांबाप के दबाव में श्रुति ने अपने मोबाइल से अमित का नंबर डिलीट करते हुए वादा किया कि अब वह अमित से कोई संबंध नहीं रखेगी.

मांबाप के दबाव में श्रुति ने अमित से न मिलने का वादा तो कर लिया, लेकिन वह मांबाप से किया वादा निभा नहीं सकी. किसी को संदेह न हो, इस के मद्देनजर श्रुति ने अमित मूर्ति से मिलनेजुलने का स्थान और समय बदल दिया. अब वे ऐसी जगह मिलते थे, जहां कोई नहीं जाता था. शहर से दूर निर्जन स्थानों पर जा कर दोनों निश्चिंत हो जाते थे.

लेकिन राजेश निश्चिंत नहीं था. वह श्रुति पर नजरें जमाए था. श्रुति अकसर घर से जल्दी निकल जाती थी तो देर से लौट कर आती थी. पूछा जाता तो वह कह देती कि औफिस में काम ज्यादा था, इसलिए देर हो गई.

इसी बीच राजेश ने श्रुति के मोबाइल पर अमित का कोई संदेश पढ़ लिया. उस ने जब श्रुति से उस संदेश के बारे में पूछा तो उस ने यह कह कर बात खत्म कर दी कि अमित ने उसे परेशान करने के लिए संदेश भेजा है.

चूंकि राजेश को श्रुति की बातों पर विश्वास नहीं था, इसलिए उस ने उस पर नजर रखने के लिए जनवरी, 2017 के पहले सप्ताह में उस की कार में चुपके से जीपीएस लगवा कर उसे अपने मोबाइल से कनेक्ट करवा लिया.

13 जनवरी, 2017 को श्रुति 1 बजे के करीब राजेश से यह कह कर घर से निकली कि वह एक जरूरी मीटिंग के लिए औफिस जा रही है, वापस आने में देर हो सकती है.

श्रुति के जाने के बाद राजेश ने मोबाइल में उस की लोकेशन देखी तो पता चला कि उस की कार औफिस की ओर जाने के बजाय रिंग रोड की ओर जा रही है. इस से राजेश का खून खौल उठा. उस ने अपने ड्राइवर कुमार से कार निकलवाई और श्रुति का खेल खत्म करने के लिए जाने लगा. उस के पिता गोपालकृष्ण गौड़ा भी यह कहते हुए कार में बैठ गए कि उन्हें बाजार से मकर संक्रांति की पूजा के लिए कुछ सामान खरीदना है.

श्रुति की कार की लोकेशन आचार्य पीयूष कालेज के करीब मिली थी, इसलिए राजेश ने ड्राइवर से कार पीयूष कालेज की ओर ले चलने को कहा. राजेश की कार कालेज के करीब पहुंची तो उसे सुनसान जगह पर श्रुति की कार खड़ी दिखाई दे गई. राजेश ने अपनी कार रुकवाई और श्रुति की कार की ओर चल पड़ा.

कार से निकलते ही उस ने रिवौल्वर निकाल ली थी, जिसे गोपालकृष्ण गौड़ा ने देख लिया था. उन्हें किसी अनहोनी की आशंका हुई, इसलिए वह ड्राइवर कुमार के साथ राजेश की ओर दौड़े. उन के पहुंचने से पहले ही राजेश श्रुति की कार के पास पहुंच गया था. कार में श्रुति के साथ अमित को देख कर वह आपा खो बैठा और अमित के सीने को निशाना बना कर 2 गोलियां दाग दीं.

वह श्रुति पर भी गोली चलाना चाहता था, लेकिन गोपालकृष्ण और ड्राइवर ने उसे पकड़ लिया. पिता ने उस के हाथ से रिवौल्वर छीन कर श्रुति से कहा कि वह घायल अमित को तुरंत अस्पताल ले जाए. इस के बाद उन्होंने ड्राइवर से थाने चलने को कहा.

यह संयोग ही था कि श्रुति राजेश के हाथों से मरतेमरते बच गई थी. लेकिन दुर्भाग्य ने उस का पीछा नहीं छोड़ा. डरीसहमी श्रुति ने घायल अमित को साथ ले जा कर सप्तगिरि अस्पताल में भरती कराया. अस्पताल से वह बाहर निकली तो उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? क्योंकि अब वह किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रह गई थी.

आखिर उस ने एक खतरनाक फैसला ले लिया और अपने मातापिता को इस घटना की सूचना दे कर वह होटल राजबिस्टा पहुंची. वहां अपना पैनकार्ड दिखा कर उस ने कमरा बुक कराया, जिस में जा कर उस ने पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली. इस तरह एक प्रेमकहानी का अंत हो गया.

14 जनवरी, 2017 को सोलादेवनहल्ली पुलिस ने गोपालकृष्ण गौड़ा और राजेश गौड़ा को अदालत में पेश किया, जहां से गोपालकृष्ण गौड़ा को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. जबकि सबूत जुटाने के लिए पुलिस ने राजेश गौड़ा को 5 दिनों के रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि समाप्त होने पर राजेश को दोबारा अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

समाज के इस ढोल में पोल ही है

सास बहू की तकरारों के किस्से हर जबान पर होते हैं पर साथसाथ रहते उन में अकसर ऐसा प्रेम हो जाता है कि एकदूसरे के बिना जीना दूभर हो जाता है. जौनपुर के निकट मछली शहर की एक 55 वर्षीय बहू की सड़क पर जाते हुए दुर्घटना में मौत का समाचार जब इलाहाबाद में इलाज करा रही उस की 78 वर्षीय सास को मिला तो उन्होंने दम तोड़ दिया. दोनों की अरथी एकसाथ घर से निकली.

सास लंबी बीमारी से ग्रस्त थीं पर बहू ने अपनेपन से उन का ध्यान रखा था. इसीलिए बहू की मृत्यु के समाचार का आघात सास सह न सकीं और चल बसीं.

सासबहू का 10-15 साल साथ रहने के बाद प्यार स्वाभाविक है. अगर इस प्यार में खटास पैदा होती है तो समाज के उन विध्वंसकों के कारण जो हर समय सासबहू के मामूली मतभेद को बढ़ाचढ़ा कर पेश करते रहते हैं. इस बारे में इतने सवाल किए जाते हैं कि हर सास को हर बहू पर संदेह होने लगता है. इस पर दूसरे रोज तेजाब डालते हैं.

महान संस्कारों और संस्कृति का ढोल पीटने वाले भूल जाते हैं कि इस ढोल में पोल ही है बस. हमारे यहां संबंध केवल स्वार्थ और संदेह पर टिके हैं और यह हमें विरासत में मिला है. जिन पौराणिक घटनाओं का आंख मूंद कर हवाला दिया जाता है उन में सासबहू का मतभेद जम कर महिमामंडित किया गया है. जो प्रवचन आज दिनरात दिए जा रहे हैं और जिन का धंधा अब चमचमाने लगा है उन में सास के मन में भरा जाता है कि वह पूजनीय है, कामधाम न करे, बैठ कर खाए. केवल पुत्रवती बहू को स्वीकारे, दहेज सांस्कारिक है और बहू को रीतिरिवाजों से बांध कर रखे. ऐसे में बहू भला कैसे खुश रहेगी.

अगर उलट शिक्षा दी जाए कि बहू जीवन का अभिन्न अंग है, बेटे के बराबर नहीं, बढ़ कर है, बेटी की तरह पराए घर में भी नहीं रहती. सासबहू में जौनपुर वाली सासबहू का लगाव होना स्वाभाविक ही है. आज की गलत शिक्षा पाश्चात्य देन नहीं, हमारी अपनी सांस्कृतिक विरासत है जिसे चिपका कर नहीं माथे पर लगाने में गर्व हो रहा है.

एक घर में रहते सास को सब से ज्यादा भरोसा बहू पर करना चाहिए. बेटे से भी बढ़ कर, बेटी को नाराज कर के भी. बहू से विवाद तभी खत्म होंगे जब वह दोस्त, सहयोगी अपनी सी हो.

राष्ट्रपति चुनाव : विपक्ष की रणनीति का इंतजार

भारतीय जनता पार्टी ने बिहार के मौजूदा राज्यपाल रामनाथ कोविंद को एनडीए का राष्ट्रपति उम्मीदवार घोषित कर आखिर सारी अटकलबाजियों पर न सिर्फ विराम लगा दिया, बल्कि विपक्ष को शायद अपनी रणनीति फिर से बनाने के लिए बाध्य कर दिया. सच तो यही है कि जिस नाम की अब तक कहीं चर्चा तक न थी, उस नाम को सामने लाकर भाजपा नेतृत्व ने एक बार फिर सबको चौंका दिया है. मूलत: कानपुर के ग्रामीण इलाके से आने वाले रामनाथ कोविंद पिछले करीब दो साल से बिहार के राज्यपाल हैं.

उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात में एक तहसील है डेरापुर. इसी के झींझक कस्बे के छोटे से गांव परौख के दलित परिवार में एक अक्तूबर, 1945 को रामनाथ कोविंद का जन्म हुआ. बाद में 1977 से 1979 तक वह दिल्ली हाईकोर्ट और 1980 से 1993 तक सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के स्टैंडिंग काउंसिलर रहे. जनता पार्टी के शासनकाल में वह प्रधानमंत्री मोराजी देसाई के निजी सचिव भी रहे. कोविंद बीजेपी  के टिकट पर दो बार विधानसभा का चुनाव लड़े, लेकिन हार गए. 1994 और 2000 में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए सांसद चुने गए और 12 साल तक सदन के सदस्य रहे. उनकी पहचान गरीबों और हाशिये के समाज के हक के लिए काम करने वाले नेता की रही है, जिसकी तस्दीक राज्यसभा के उनके कार्यकाल के दौरान अनुसूचित जाति, जनजाति और महिला हित के मुद्दों पर उनकी आवाज उठाने में भी हुई. इस समाज के लिए तमाम कानूनी लड़ाइयां भी उन्होंने नि:शुल्क लड़ीं. यह भी उनका कौशल रहा कि संघ का पुराना कार्यकर्ता होने के बावजूद बहुत संतुलन के साथ उन्होंने अपनी छवि कभी कट्टरवादी की नहीं बनने दी. राज्यपाल के रूप में दो साल की बिना विवाद की संतुलित पारी खेलकर उन्होंने अपनी सांविधानिक योग्यता भी साबित कर दी है.

रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा के साथ विपक्षी गुणा-गणित भले ही नए सिरे से शुरू हो गई हो, लेकिन सच तो यही है कि इस अप्रत्याशित चेहरे को सामने लाकर भाजपा ने विपक्ष के समीकरण बिगाड़ दिए हैं. भाजपा के वोट और समर्थन के समीकरण की मौजूदा गणित में बड़ा हेरफेर न हुआ, तो तय है कि इसके बाद विपक्ष की लड़ाई शायद औपचारिक रह जाएगी. पार्टी ने कोविंद का नाम घोषित करके बिहार और उत्तर प्रदेश को एक साथ साधने का काम किया है. इस चयन में 2019 की राजनीति के गणित को भी देखा जाएगा, जो दिखाता है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व और उसके रणनीतिकार 2014 की शानदार जीत और 2017 की यूपी फतह के बावजूद चौबीसों घंटे काम कर रहे हैं और राजनीति की पिच पर एक भी हल्की गेंद नहीं फेंकना चाहते हैं. चयन यह भी दिखाता है कि लोकसभा चुनावों के बाद दलित जिस तरह भाजपा की चिंता में शामिल हुआ था और 2017 में यूपी जीतते-जीतते उसे जो विस्तार मिला, यह उसी का अगला कदम है. इस चिंता में उसकी हिंदी पट्टी की चिंता भी छिपी है,

बिहार के गवर्नर और यूपी के दलित को सर्वोच्च पद पर पहुंचाने का गर्व से दीप्त भाव भी, जिसकी ब्रांडिंग करने में वह आगे कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहेगी. फिलहाल तो इतना ही कि सब कुछ भाजपा की रणनीति के मुताबिक चला, तो यूपी पहली बार देश को राष्ट्रपति भी देगा. और इसी बिना पर संभवत: अगले चुनाव की नींव रखी जाएगी. चयन यह भी बताता है कि विपक्ष को अब भाजपा की राजनीति के बदलते चेहरे को गंभीरता से समझने की जरूरत है. उस राजनीति को, जिसमें नए प्रतीकों के जरिए दलितों के दिल में बसने की चिंता भी है, और कारगर दिखती कोशिशें भी.

न्यू इंडिया और विध्वंस का कमिटमैंट

जब हाईस्पीड ट्रेन ‘तेजस’ में यात्रियों द्वारा हैडफोन लूटने और तोड़फोड़ करने की खबर आई तो मेरा हृदय श्रद्घा से भर गया. गला रुंधने लगा. माथा सजदा करने की मुद्रा में झुक गया. बड़ी मुश्किल से खुद पर काबू किया. खुशी के आंसूओं पर लाठी चार्ज कर, उन्हें तितरबितर कर के फिर से उन्हें उन के मंतव्य तक पहुंचाया. आखिर हम ने एक बार फिर अपनेआप को साबित कर ही दिया. समय और सरकारें चाहे हमें कितनी भी कसौटियों पर क्यों न कसें, हमारा स्कू्र हमेशा ढीला था और ढीला ही रहेगा. हम हर अग्निपरीक्षा में बिना नकल किए सिद्घ कर चुके  हैं कि सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का हमारा कमिटमैंट किसी भी देश, काल या परिस्थिति में कमजोर होने वाला नहीं है.

हमारा यही राष्ट्रीय कमिटमैंट हमें एकसूत्र में बांधता है. सारी विविधताओं के बीच सरकारी संपत्ति पर कब्जा करने का एक सा देशव्यापी जज्बा हमें एकसूत्र में पिरोता है.

तानाशाह सरकारों ने जबजब हमारी आवाज दबाने की कोशिश की है, हम ने दोगुनी ताकत से पब्लिक प्रौपर्टी का टेंटुआ दबाया है. सरकारी संपत्ति का निर्माण हमारे द्वारा दिए गए कर के धन से होता है, इसलिए उस का विध्वंस भी हमारे करकमलों से ही होना चाहिए. इस मामले में सरकारों की भी सोच यही रही है, ‘तेरा तुझ को अर्पण, क्या लागे मेरा.’

सरकारी संपत्ति को विपत्ति की शक्ल देना हमारा शौक ही नहीं, बल्कि आदत बन चुकी है. इसलिए केवल किसी आंदोलन, प्रदर्शन, दंगे या अन्य किसी विपदा के समय ही हमें संपदा याद नहीं आती है, बल्कि शांतिकाल में भी हम अपने हथियार की धार चैक करते रहते हैं और हाईस्पीड ट्रेन तेजस में अभी हाल में हम ने इस की सफल नैटप्रैक्टिस भी की.

क्षतिग्रस्त संपत्ति ही सरकार को नवनिर्माण की प्रेरणा दे सकती है. इसलिए सरकार को इसे गंभीरता से लेते हुए स्किल इंडिया प्रोग्राम के तहत शामिल करना चाहिए. देश के हर नागरिक के लिए वयस्क होने के बाद साल में कम से कम एक बार अपने महल्ले, कसबे या शहर की सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना अनिवार्य किया जाना चाहिए. इस के लिए सरकारी व गैरसरकारी संस्थाओं को अपने स्तर पर प्रशिक्षण केंद्र लगाने चाहिए.

हर व्यक्ति को अपने आयकर विवरण में अपने द्वारा गत वित्तीय वर्ष में नुकसान पहुंचाई गई संपत्ति का ब्योरा देना अनिवार्य करना चाहिए. ऐसा न करने पर या गलत ब्योरा देने पर कारण बताओ नोटिस जारी किया जाना चाहिए. क्षमता से अधिक संपत्ति डैमेज किए जाने पर संदिग्ध व्यक्तियों के ठिकानों पर सीबीआई और ईडी द्वारा छापामारी की जानी चाहिए.

शहर की नगरपालिका के पास हर व्यक्ति द्वारा ध्वस्त की गई प्रौपर्टी का रिकौर्ड मौजूद होना चाहिए. प्रौपर और अपडेटेड रिकौर्ड न होने पर भ्रष्ट कर्मचारियों के खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिए, ताकि आमजन का सिस्टम पर भरोसा बना रहे. पर्याप्त प्रयासों के बावजूद आमजन अगर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने में असमर्थ है तो संपत्ति का निर्माण करने वाले ठेकेदारी की निविदा (ठेका) निरस्त कर उन से विदा लेनी चाहिए ताकि संपत्ति विध्वंसकों का हौसला बना रहे.

देशवासियों में सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाने के बढ़ते जनून को देखते हुए सरकार को चाहिए कि हौकी की जगह इसे राष्ट्रीय खेल का दरजा दे. खेल मंत्रालय को देश के साथ इस खिलवाड़ को मतलब इस खेल को कौमनवैल्थ और ओलिंपिक गेम्स में शामिल करने के लिए पूरा जोर लगाना चाहिए, ताकि घर फूंक कर तमाशा देखने के साथसाथ हम कुछ पदक भी कमा सकें.

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