आवाज और अंदाज ही मेरी पहचान : देवी

भोजपुरी गायकी में देवी एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने भोजपुरी के पारंपरिक व आधुनिक गीतों को गाने में एक अलग ही मुकाम हासिल किया है. उन के पहले भोजपुरी अलबम ‘पुरवा बयार’ ने लोकप्रियता के सारे रिकौर्ड तोड़ दिए थे.

बिहार के छपरा जिले की रहने वाली देवी के मांबाप दोनों ही प्रोफैसर हैं. उन्होंने देवी के हुनर को पहचाना और उन्हें इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए बढ़ावा दिया. पेश हैं, देवी से हुई बातचीत के खास अंश:

आप ने 5 साल की उम्र में गाना शुरू कर दिया था. आप का पहला अलबम कब आया था?

जब मैं ने 5 साल की उम्र में घर में पहली बार गीत गाया था, तब मेरे मांबाप को लगा था कि मैं गायकी में अपना कैरियर बना सकती हूं. मेरे पापा ने मुझे बचपन से ही शास्त्रीय संगीत की तालीम घर पर दिलवाई. जब मैं गाती थी, तो आसपास और स्कूल के लोग अपनी सुधबुध खो कर मेरे गीत सुनते थे. नतीजतन, मेरे मांबाप ने मुझे अपना अलबम निकालने के लिए कहा.

मैं पहली बार साल 2002 में दिल्ली आई थी. वहां मैं ने सैकड़ों म्यूजिक कंपनियों में अपना अलबम निकलवाने के लिए बात की थी, लेकिन मेरे गीतों की सादगी के चलते कोई भी म्यूजिक कंपनी रिस्क नहीं लेना चाहती थी.

आजकल एक चलन है कि बिकना जरूरी है. इस के लिए लोग भोजपुरी की मिठास को बेहूदगी की हद से भी आगे ले जाने में गुरेज नहीं कर रहे हैं. ऐसे हालात में एलटीटी नाम की एक म्यूजिक कंपनी ने बहुत ही छोटे बजट में मेरे पहले अलबम ‘पुरवा बयार’ के लिए हामी भरी. इस अलबम ने बाजार में आते ही लोकप्रियता के सारे रिकौर्ड तोड़े थे.

आप के सुपरहिट गीत कौनकौन से रहे हैं?

वैसे तो मेरे गाए सभी गीतों को मेरे श्रोताओं और प्रशंसकों ने हाथोंहाथ लिया है, पर मेरे कुछ गीत बेहद लोकप्रिय रहे, जिन में ‘अईले मोर राजा’, ‘यारा’, ‘बावरिया’, ‘अंखियां से अंखियां मिला के’ खास हैं.

आप ने भिखारी ठाकुर और महेंद्र मिश्रा के गीतों को भी अपनी आवाज दी है. आप को कैसा महसूस हुआ?

भोजपुरी गीतों के लिए भिखारी ठाकुर और महेंद्र मिश्रा ने जो योगदान दिया है, वह आज तक किसी भी गीतकार ने नहीं दिया है. उन्होंने पारंपरिक व सामाजिक मुद्दों पर गीत लिखे, जो आज भी सब से ज्यादा पसंद किए जाते हैं. मेरे लिए उन के लिखे गीत गाना गर्व की बात है.

भोजपुरी गायन में गायक से नायक बनने की परंपरा रही है, फिर भी आप ने भोजपुरी फिल्मों से दूरी बनाए रखी. क्यों?

मेरे पास भोजपुरी फिल्मों के बहुत से औफर आए, लेकिन भोजपुरी फिल्मों में शब्दों के चयन के चलते मैं ने काम करने से मना कर दिया. इस के बावजूद मैं अच्छे गाने गा कर लोगों के दिलों पर राज कर रही हूं.

आप ने एक हिंदी फिल्म भी बनाई, साथ ही कई हिंदी फिल्मों में गाने भी गाए. क्या आगे भी किसी हिंदी फिल्म को बनाने पर विचार चल रहा है?

मैं ने ‘जलसाघर की देवी’ नाम से फिल्म बनाई, जिस में गाए गीतों को मैं ने अपनी आवाज भी दी और खुद ही ऐक्टिंग भी की है. इस फिल्म में रवींद्र जैन ने संगीत दिया था, जिसे दर्शकों ने काफी पसंद किया.

सामाजिक बुराइयों को ले कर भी आप ने कई गीत गाए हैं. इस का विचार कहां से आया?

हमारे समाज में बाल विवाह, दहेज प्रथा, अशिक्षा जैसी कई बुराइयां हैं. ऐसे में गीतसंगीत इन बुराइयों को दूर करने का एक अच्छा जरीया भी माना जा सकता है. इसीलिए मैं ने भिखारी ठाकुर और महेंद्र मिश्रा के लिखे गीतों को गाया.

सुना है कि आप ने एक म्यूजिक आश्रम भी बनाया है?

जी हां, आप ने बिलकुल ठीक सुना है. मैं ने शास्त्रीय गीतसंगीत के साथसाथ भारतीय परंपराओं, लोक गायन और साफसुथरे भोजपुरी गायन के लिए ऋषिकेश में देवी म्यूजिक आश्रम बनाया है, जहां देशविदेश से लोग संगीत सीखने आते हैं.

‘सरस सलिल’ पत्रिका को ले कर आप के क्या विचार हैं?

‘सरस सलिल’ एक अच्छी पत्रिका है और यह सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वासों का विरोध करने के साथसाथ अच्छी जानकारियों का खजाना समेटे हुए है. मौका मिलने पर मैं इसे जरूर पढ़ती हूं.

नोएडा के हाउसिंग सोसाइटी विवाद के सबक

दिल्ली के पास नोएडा में 25 सौ परिवारों की एक बड़ी सोसाइटी पर वहां काम करने वाली एक युवती के घर न लौटने पर पास की बस्ती के लोगों ने बड़ा हमला कर घरों में काम करने वालों के बारे में चौंका दिया है. इस कांड की गूंज पूरी दुनिया में पहुंच गई है कि भारत जो अमीर देशों में गिने जाने की भरपूर कोशिश कर रहा है, अभी तक अपने अमीरोंगरीबों के भेदभावों की खाई को पाट नहीं सका है.

30 साल की शादीशुदा जोहरा बीबी एक मर्चैंट नेवी में काम कर रहे साहब के यहां काम करती थी, पर मेमसाब से खटपट पर उस का एक रात लापता हो जाना उस के शौहर को परेशान कर बैठा और वह बस्ती की भीड़ ले आया. जोहरा तो मिल गई, पर आलीशान मकानों से सटे झुग्गी इलाकों के बारे में सैकड़ों सवाल भी खड़े कर गई. जोहरा कोई गुलाम नहीं थी. वह मरजी से तय हुए वेतन और शर्तों पर काम कर रही थी. यह जाहिर सी बात है कि वह पश्चिम बंगाल से दिल्ली इसलिए आई थी कि गांव में उसे इतने पैसे भी नहीं मिलते थे, जो खूंख्वार कहे जा रहे साहब दे रहे थे.

जोहरा जैसी लाखों औरतें देशभर में घरों में काम कर रही हैं और मेमसाबों को खाना पकाने, झाड़ूपोंछा  करने, बरतन मांजने, बच्चे पालने से छुटकारा दिलाती हैं. ये लाखों औरतें इन मेमसाबों की ज्यादतियों की शिकार नहीं हैं, ये उस सरकार के निकम्मेपन और उस समाज के दकियानूसीपन की शिकार हैं, जो उन्हें अपने गांवों, कसबों में इज्जत की रोटी नहीं दिला पा रहे. ये मालिकों को गालियां दे कर अपना मन हलका कर सकती हैं, पर उस के लिए जिम्मेदार इन का अपना समाज भी है, जो इन्हें न पढ़ने देता है, न हुनर सीखने देता है.

पूरी दुनिया में भारत के भेदभाव की थूथू हो रही है, पर उस धर्म व उन कानूनों की नहीं, जिन की वजह से सारी इज्जत व सारा पैसा मुट्ठीभर आधा प्रतिशत लोगों के हाथों में जमा हो गया है.

25 सौ घरों की महागुन मौडर्ने सोसाइटी किसानों से जबरन मनचाहे मुआवजे की जमीन पर बनी है और प्लौट काटने वालों ने गरीबों के घरों का इंतजाम ही नहीं किया. इन हजारों घरों को चलाने के लिए लोग कहां रहेंगे, कैसे रहेंगे, कहां शौच के लिए जाएंगे, कहां से पानी लाएंगे, इस की फिक्र करे बिना ऊंचे शानदार मकान बनवा दिए गए.

अफसोस यह है कि जिन की जमीन ली गई, वे चुप हैं. जिन्हें झुग्गियों में रहना पड़ रहा है, वे इसे अपने कर्मों का फल मानते हैं. जिन्हें रोजाना फटकार सुननी पड़ती है, वे अपना कामकाज सुधारने में कोई पहल नहीं करते.

अमीरों को दोष देना आसान है. युगों से यह चला आ रहा है, पर कम ही समाज गरीबों को नई दिशा देने का काम करते हैं. जोहरा बीबी जैसी कामवालियों को जिंदगीभर यही उबाऊ काम करना पड़ेगा, इतना पक्का है. वह कभीकभार बिफर उठे तो कोई बड़ी बात नहीं, क्योंकि उसे दिलासा देने, समझाने, पुचकारने वाला कोई है नहीं. न उस के घर में, न पड़ोस में, न मंदिरमसजिद में, न नेता की कोठी में, न सरकार के महल में.

जोहरा बीबी के साथ जो हुआ वह खबरों में आया, क्योंकि लड़ाई अमीरगरीब के बीच थी, पर पूरे देश में गरीबगरीब, गरीब और थोड़े कम गरीब के बीच लगातार चलती है. उस में शिकार ज्यादा नुकसान पाते हैं, पर उन की खबरें सुर्खियां नहीं बनतीं, लंदन के अखबारों में नहीं छपतीं.

राजनीतिक भ्रष्टाचार की जननी है महंगाई

सरकार का मतलब होता है जनता की सुविधाओं की प्रबंधक, व्यवस्थापक. उस की जिम्मेदारी है कि वह अपने क्षेत्र में सुशासन की व्यवस्था करे, चोरी, डकैती, बेईमानी, लूट, हत्या, बलात्कार, दंगाफसाद आदि पर नियंत्रण कर के आम जनता को सुख, सम्मान व अधिकार दिलाए. तब तो वह जनता की सरकार, जनता के लिए और जनता द्वारा बनाई गई सरकार है अन्यथा चोरों, दलालों व पूंजीपतियों की सरकार कहलाएगी. अगर जनता आह भरभर कर जीवनयापन कर रही है, महंगाई, भ्रष्टाचार व अभावों के दुखों तले दबी हुई है तो निश्चित रूप से सरकार भ्रष्टाचार में व्यस्त व मस्त है. यों भ्रष्टाचार के अनेक कारण हैं किंतु एक सुदृढ़ कारण यह है कि सरकार अपने वफादार सिपाहियों (जनप्रतिनिधियों) को खुश रखने की बेहतर से बेहतर तरकीब करती रहती है. कुछ तरकीबें तो ऐसी भी हैं जिन से पक्ष व विपक्ष के सभी जनप्रतिनिधि खुश हो जाते हैं, जैसे जब सरकार माननीयों के वेतन, भत्ते, पैंशन व अन्य सुखसुविधाओं में कई गुना बढ़ोतरी करती है.

सरकारें बिना पूंजीवादी व्यवस्था के आश्रित हुए स्वयं को विकलांग महसूस करती हैं. तो जाहिर है जिस से अंधाधुंध चुनावखर्च हेतु चंदा लेंगे, निर्वाचित होने पर उन के साथ नमकहलाली ही करेंगे. दूसरी बात यह भी है कि  अपनी कई पीढि़यों को आर्थिक रूप से मजबूत व संपन्न करना भी निर्वाचित सदस्यों की विवशता बनती जा रही है.

बड़े नगरों व राजधानी में भी आवास व व्यापार की सुविधा बनाना ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी अकूत धनसंपदा जमा करना, आवासीय व व्यापरिक जड़ें मजबूत करना आदि भी माननीयों के राजनीतिक दायित्वों के मुख्य हिस्से बनते जा रहे हैं.

हमारे देश में पहले नेता फटेहाल और जनता मालामाल होती थी. किंतु आज उस का उलटा, नेता मालामाल और जनता फटेहाल हो गई है. नेता दूसरों के दुखों से सुखी होते हैं और दूसरों के सुखों से दुखी होते हैं. पहले नेताओं की सोच होती थी कि हम देश को सबकुछ समर्पित कर दें, किंतु आज के नेताओं की सोच है कि हम अपने व्यक्तित्व विकास के लिए राष्ट्र से सबकुछ ले लें.

देश में दंगेफसाद, हड़ताल, धरनेप्रदर्शन के पीछे कोई सोच काम कर रही है. चर्चा का विषय है कि यह माननीयों की ही सोच है. आमजन को उन की रोजमर्रा की आवश्यकताओं, सुविधाओं, मेहनतमजदूरी से वंचित कर दो. ऐसे में वे या तो परलोक सभा का टिकट पाएंगे अन्यथा पाने लायक हो जाएंगे.

आम आदमी बनाम पूंजीपति

 सरकार बनते ही माननीय केवल धनपशुओं की भीड़ से सज जाते हैं. वे भांतिभांति के उपहार व भेंट, वफादारी की भावना से, समर्पित करते हैं. मतदाताओं को तो माननीयगण पहचान ही नहीं पाते. मतदाता पहुंचे भी उन के द्वार, तो लाइन में सब से पीछे नजर आएगा. जब माननीय जी से अपनी बात कहने का उस का नंबर आएगा, तब तक माननीय जी फुर्र हो जाएंगे.

सरकार में बैठे सीएम हों या पीएम, दोनों के पास आम आदमी से कम, पूंजीपति से मिलने के लिए ज्यादा समय रहता है. देश के भ्रष्टों को गले लगा कर आदर्श नागरिक बनने का ढोंग किया जाता है. माननीयों को सरकारी कार से दौरा करते रहने से फुरसत नहीं मिलती. ऐसे में वे क्या योजनाएं, परियोजनाएं बनाएंगे. उन की नाक के नीचे भ्रष्टाचार फलफूल रहा होता है लेकिन वे कहते हैं कि उन्हें तो पता ही नहीं. जबकि उन के इशारे के बिना भ्रष्टाचार का एक पत्ता भी नहीं हिल सकता, भ्रष्टाचारी सांस नहीं ले सकता. आज राजनीति भ्रष्टाचार की जननी हो गई है.

यह कैसा विकास

 आम जनता की बेहतरी के बारे में वे कब, कैसे और क्यों सोचेंगे, सोचना और समझना उन के जीवन का बड़ा ही दुर्लभ कार्य है. माननीयगण देश के विकास की बात तो कर रहे हैं और विकास भी दिखाई पड़ रहा है, किंतु इस विकास के कार्यों से क्या देश की आम जनता सुखी हो रही है, क्या उस के दुखों का कारण समाप्त हो रहा है.

चार, छह और आठ लेन की बड़ी चौड़ी सड़कें, बड़ेबड़े हवाईअड्डे, बड़ेबड़े पुल, ओवरब्रिज, वातानुकूलित फाइवस्टार होटल, आलीशान बंगले, खूबसूरत पार्क क्या ये सब देश की आम जनता को सुख पहुंचाने के लिए बनाए जा रहे हैं? उक्त समस्त विकास कार्य तो माननीयों व धनपशुओं के लिए ही विकसित किए जा रहे हैं. यह तो आम जनता के विकास से परे की बात है.

ऐसा विकास कार्य एकांगी है. आवश्यकता है किसान, मजदूर, शिल्पकार, गरीब, नौजवान, छात्र, महिलाओं व अधिकारवंचित समाज के लोगों के लिए ऐसे कार्य किए जाने की जिन से उन्हें रोजगार के साथसाथ स्वावलंबन, स्वाभिमान, आत्मसम्मान व अधिकार भी प्राप्त हो सकें, उन को शोषण व उत्पीड़न से मुक्ति मिल सके. लेकिन माननीयों के पास विकास की ऐसी सोच है ही नहीं क्योंकि ये तो संतुलित विकास की सोच है.

जनता को जागरूक हो कर अपनी आवश्यकताओं के बारे में जोरदार ढंग से सरकार को एहसास कराना होगा तभी राजनीतिक भ्रष्टाचार समाप्त हो सकेगा और दुखी मानवता सुखी हो सकेगी.

योग के नाम पर भोग का गंदा खेल

गोवा में पढ़ीलिखी, समझदार 2 विदेशी औरतों के साथ एक गैरब्राह्मण योग गुरु का बलात्कार करना कोई नई बात नहीं. तांत्रिक अनुष्ठानों के बहाने सदियों से धर्म के नाम पर औरतों को बहकाया जाता रहा है कि उन का शरीर तो क्षणभंगुर है. काया के ऊपर पहुंचने और चरम आनंद को प्राप्त करने के लिए तांत्रिक प्रक्रियाएं ईश्वर प्रदत्त हैं और जिस गुरु के पास यह ज्ञान है उसे पूजो, पैसा दो भले ही वह शरीर से खिलवाड़ करे. अब इस प्रकार स्वयंभू गुरु औनलाइन अवतरित होने लगे हैं और एक अमेरिकन व एक कैनेडियन औरत ऐसे ही एक गुरु 38 वर्षीय प्रतीक कुमार अग्रवाल के झांसे में आ गईं और 7 दिन के ट्रेनिंग कोर्स के लिए आ पहुंचीं.

योग का प्रचार इस तरह हो रहा है कि देशविदेश में इसे हर रोग के इलाज के लिए बता दिया जाता है और भेड़चाल में हजारों लोग योग गुरुओं के चरणों में बिछे चले जाते हैं.

इन औरतों को भी किसी तरह की मानसिक परेशानियां रही होंगी और फिर से वे भी योग के नाम पर आकर्षित हो धूर्त के हाथों में पड़ गई होंगी. इन्होंने बलात्कार का आरोप तो लगाया ही है इन का पैसा भी गया होगा, यह भी पक्की बात है.

पुलिस ऐसे मामलों में ज्यादा कुछ नहीं कर सकती, क्योंकि प्रमुखतया शिकार स्वयं शिकारी के फंदे में पड़े थे. उन के साथ जोरजबरदस्ती की गई थी, यह साबित करना कठिन होगा. बलात्कार में शारीरिक भय दिखाया गया था, यह औरतों के लिए साबित करना मुश्किल होगा. सफाई में इस तरह के संबंध से इनकार करा जाए या उसे सहमति से बने संबंध कहा जाए तो गलत ठहराना काफी कठिन होगा.

योग क्रियाओं के नाम पर हमारे देश में ही नहीं दुनिया भर में न जाने क्याक्या किया जा रहा है. इसे रोगों के उपचार का पक्का तरीका साबित करा जा चुका है और हाल यह है कि अच्छेभले अस्पताल भी योग का लेबल चिपका कर मनचाहा पैसा पाने लगे हैं. इस शातिर ने जो किया वह तो मामूली सा लगता है. जो तेज होते हैं वे तो योग के नाम पर मजे में भोग करते हैं.

हेमंत सोरेन : पिता के साए से निकलने की छटपटाहट

झारखंड के मुख्यमंत्री रहे हेमंत सोरेन को अपने पिता शिबू सोरेन की परछाईं से बाहर निकलने का नुसखा हाथ लग गया है. राज्य की रघुवर दास सरकार ने हेमंत सोरेन को अपनी राजनीति चमकाने और आदिवासियों के बीच गहरी पैठ बनाने का बेहतरीन मौका दे दिया है.

सीएनटी ऐक्ट (छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम-1908) और एसपीटी ऐक्ट (संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम-1949) में संशोधन कर रघुवर दास सरकार ने बैठेबिठाए नया झमेला मोल ले लिया है.

हेमंत सोरेन इस मुद्दे को भुनाने की जुगत में लग गए हैं और वे हर मंच से ऐलान कर रहे हैं कि जब तक सरकार सीएनटी और एसपीटी ऐक्ट में किए गए बदलाव को वापस नहीं लेगी, तब तक आंदोलन जारी रहेगा.

हेमंत सोरेन को उम्मीद है कि जिस तरह से उन के पिता शिबू सोरेन अलग झारखंड राज्य की मांग को ले कर एक बड़ा आदिवासी आंदोलन खड़ा करने में कामयाब हुए थे, उसी तरह की कामयाबी अब उन्हें भी मिल सकती है.

10 अगस्त, 1975 को जनमे हेमंत सोरेन फिलहाल झारखंड मुक्ति मोरचा के कार्यकारी अध्यक्ष हैं. साल 2014 में हुए झारखंड विधानसभा चुनाव में उन्हें और उन की पार्टी को करारी हार मिली थी. वे दुमका विधानसभा सीट पर भाजपा के हेमलाल मुर्मू से 24,087 वोटों से चुनाव हार गए थे.

81 सीटों वाली झारखंड विधानसभा में बहुमत के लिए 41 सीटों की जरूरत होती है और भाजपा गठबंधन ने 42 सीटों पर कब्जा जमा कर हेमंत सोरेन की सरकार को बाहर का रास्ता दिखा दिया था.

झारखंड विकास मोरचा 19 सीटें जीत कर दूसरी सब से बड़ी पार्टी बनी थी. झारखंड मुक्ति मोरचा को 8, कांग्रेस को 6 और बाकी को 6 सीटें हासिल हुई थीं. भाजपा गठबंधन को 35 फीसदी वोट मिले थे, जबकि साल 2009 के चुनाव में उसे 11 फीसदी ही वोट मिले थे.

हेमंत सोरेन की अगुआई में चुनाव लड़ कर झामुमो को पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले सीट और वोट फीसदी दोनों में इजाफा हुआ. साल 2009 में झामुमो को 18 सीटें और कुल 14.47 फीसदी वोट मिले थे, जबकि साल 2014 के चुनाव में उसे 19 सीटों पर जीत मिली, पर वोट फीसदी में जोरदार इजाफा हुआ.

यह आंकड़ा मोदी लहर के बाद भी 20.4 फीसदी तक पहुंच गया था. विधानसभा चुनाव में भाजपा का सीधा मुकाबला झामुमो से रहा था.

41 साल के हेमंत सोरेन अपने पिता की अक्खड़ और उग्र सियासत के उलट शांत, हंसमुख और हमेशा मुसकराने वाले नेता हैं. वे हर किसी की बात गौर से सुनते हैं और उस के बाद ही अपनी बात कहते हैं.

ज्यादातर आदिवासी जहां मांस और मदिरा के शौकीन होते हैं, वहीं हेमंत सोरेन शाकाहारी हैं. बीआईटी, मेसरा से मेकैनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले इस युवा नेता ने साल 2003 में सियासत के अखाड़े में कदम रखा था और झामुमो के झारखंड छात्र मोरचा के अध्यक्ष के तौर पर राजनीति का कखग सीखना शुरू किया था.

हेमंत सोरेन ने साल 2005 में अपने पिता की सीट दुमका से चुनावी राजनीति की शुरुआत की, पर मुंह की खानी पड़ी थी. साल 2009 में दुमका विधानसभा सीट से चुनाव जीत कर वे पहली बार विधानसभा पहुंचे. उस के बाद अर्जुन मुंडा की सरकार में 11 सितंबर, 2010 को उपमुख्यमंत्री बने. 13 जुलाई को मुख्यमंत्री बने और 14 दिसंबर, 2014 तक उस कुरसी पर रहे.

विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार और मुख्यमंत्री की कुरसी चले जाने के बाद हेमंत सोरेन हार मान कर चुप बैठने और कुरसी का मातम मनाने के बजाय अपनी पार्टी को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं में नया जोश और जुनून भरने की कवायद में पूरे जोरशोर से लगे हुए हैं. पारंपरिक सियासतबाज के उलट अपनी हार का ठीकरा दूसरी पार्टियों के सिर फोड़ने के बदले हेमंत सोरेन अपनी कमजोरियों को ढूंढ़ने और दुरुस्त करने की मुहिम में लगे हुए हैं.

हेमंत सोरेन रोज कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं. उन से सीधी बातचीत कर रहे हैं. पार्टी को झाड़पोंछ कर चमकाने की हर मुमकिन कोशिश की जा रही है. पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाते हुए वे कहते हैं कि जनता के बीच रहिए, उन की सुनिए.

उन की हर परेशानी को दूर करने की कोशिश कीजिए. सियासत की लंबी पारी खेलनी है, तो नेताओं के बीच बैठ कर ऐशमौज करने के बजाय जनता के साथ रहिए. जनता सब देखती है और मेहनत का फल भी देती है.

‘गुरुजी’ उर्फ शिबू सोरेन के बेटे और मुख्यमंत्री की कुरसी गंवाने वाले हेमंत सोरेन झारखंड की सियासत की नई कहानी लिखने को बेचैन हैं. ज्यादातर जींस और टीशर्ट या सूट पहनने वाले हेमंत सोरेन नेताओं की नकल करने के बजाय पार्टी को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश में लगे दिखते हैं.

हेमंत सोरेन में अपने पिता की सोच और साए से बाहर निकल कर पार्टी को नया रंगरूप देने की छटपटाहट साफ दिखती है. वे जनता के भरोसे को जीतने और उस की उम्मीदों पर खरा उतर कर राजपाट करने की बात करते हैं, जबकि उन के पिता शिबू सोरेन राजनीतिक फायदे को देख कर पाला बदलने और सरकार बनानेगिराने के खेल के माहिर खिलाड़ी रहे हैं.

साल 1980 में शिबू सोरेन पहली बार जब सांसद बने, तो उस समय वे कांग्रेस के साथ थे. 1983 में जनता दल बना, तो उन्होंने कांग्रेस को ठेंगा दिखा कर जनता दल का दामन थाम लिया.

2 साल बाद उन्हें लगा कि वहां उन की दाल नहीं गल रही है, तो फिर कांग्रेस की गोद में जा बैठे और 1985 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के साथ मिल कर लड़ा.

साल 1990 आतेआते कांग्रेस से शिबू सोरेन का मन भर गया और उन्होंने फिर से जनता दल का झंडा उठा लिया. उन्होंने जनता दल के घटक दल के रूप में चुनाव लड़ा. उन की पार्टी झामुमो के 6 उम्मीदवार जीत कर संसद पहुंच गए. 1993 में उन का माथा फिर घूमा और वे अपने 6 सांसदों के साथ कांग्रेसी प्रधानमंत्री नरसिंह राव के पक्ष में खड़े हो गए. इस के लिए वे 3 करोड़, 20 लाख रुपए घूस लेने के आरोप में भी फंसे हुए हैं.

इस के कुछ समय बाद ही उन का कांग्रेस से मन उचट गया और वे भाजपा के साथ मिल कर नीतीश कुमार को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने की मुहिम में लग गए. साल 1996 में नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री तो बने, पर सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाए और जनता दल टूट गया. तब ‘गुरुजी’ यानी शिबू सोरेन लालू प्रसाद यादव के साथ खड़े हो गए.

साल 2000 में जब अलग झारखंड राज्य बना, तो वे मुख्यमंत्री बनने के लोभ में भाजपा की अगुआई वाले राजग में शामिल हो गए. जब भाजपा ने बाबूलाल मरांडी को मुख्यमंत्री बना दिया, तो शिबू सोरेन बिदक कर कांग्रेस-राजद गठबंधन की छत के नीचे जा बैठे. साल 2007 में शिबू सोरेन ने मधु कोड़ा को झारखंड का मुख्यमंत्री बनाने में मदद की और साल 2008 में खुद मुख्यमंत्री बनने के चक्कर में कोड़ा सरकार को गिरा दिया था.

हेमंत सोरेन कहते हैं कि सियासत ही क्या, किसी भी काम में उठने और गिरने का दौर चलता रहता है. गिरने के बाद अपनी गलतियों और कमजोरियों को खोज कर उसे दूर कर के ही दोबारा चोटी पर पहुंचा जा सकता है.

अपनी पार्टी झामुमो को मजबूत करने के साथसाथ वे सीएनटीएसपीटी ऐक्ट में बदलाव करने, केंद्र सरकार के भूमि अधिग्रहण संबंधी कानून और स्थानीय नीति को ले कर भाजपा सरकार के खिलाफ विरोधी दलों को एकजुट करने की मुहिम में भी लग गए हैं. इस से भाजपा के रघुवर दास की अगुआई वाली सरकार के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं.

बदसूरत कहकर ताने मारते थे लोग और अब…

पुरुषों की तुलना में महिलाओं को अक्सर कमजोर माना जाता है. लोगों को यकीन होता है कि जो काम पुरुष कर सकते हैं, उसे महिलाएं नहीं कर सकती हैं. लेकिन बॉडी बिल्डर यास्मीन चौहान मनक ने लोगों की सोच को बदल कर रख दिया है.

यास्मीन ने बताया कि स्कूलिंग के दौरान वह दूसरी लड़कियों की खूबसूरती देख उदास हो जाया करती थीं. तब उन्होंने खुद की बॉडी को शेप में लाने का फैसला किया. वह पिछले 20 सालों से जिम में इसके लिए पसीना बहा रही हैं.

फिलहाल अपने पति के साथ गुड़गांव में रहने वाली यास्मीन बताती हैं कि मैं बचपन से काफी पतली थी. वजन बढ़ाने के लिए इलाज भी कराया, लेकिन कुछ फायदा नहीं हुआ. लोग मुझे बदसूरत कहते थे, लेकिन मुझे उनकी बातों का बुरा नहीं लगता, क्योंकि मैं भी खुद को बदसूरत ही मानती थी.

यास्मीन ने कहा मैं स्कूल से पासआउट होने के बाद कॉलेज पहुंची, तब मैंने जिम जाने का निर्णय लिया. उस वक्त मैं 17 साल की थी. हालांकि, तब लड़कियों के लिए जिम जाना काफी मुश्किल था, लेकिन मेरे फैमिली मेंबर्स ने सपोर्ट किया और मैं रोजाना जिम जाने लगी. इस दौरान कई लोग मुझे डिस्करेज भी करते थे, लेकिन मैंने कभी उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया. जिम जाने की वजह से न सिर्फ मेरा कॉन्फिडेंस लौटा, बल्कि मैं खूबसूरत और अट्रैक्टिव भी दिखने लगी.

खबरों के अनुसार मनक गुडग़ांव में अपना एक जिम चलाती हैं और अपने जिम में वो हर महीने करीब 300 लड़के-लड़कियों को ट्रेनिंग देती है.

विदेशों तक पहुंच गए भोजपुरी डांस शो : सीमा सिंह

भोजपुरी फिल्मों में सब से अच्छा आइटम डांस करने वाली सीमा सिंह को लगातार 5 बार बैस्ट डांसर का अवार्ड दिया गया है. आज वे अपने देश से ले कर विदेशों तक में डांस शो कर रही हैं. 8 साल के अपने कैरियर में सीमा सिंह भोजपुरी, हिंदी, मराठी, गुजराती, तमिल और बंगाली फिल्मों में आइटम डांस कर चुकी हैं. पेश हैं, उन से की गई बातचीत के खास अंश:

विदेशों में पहले हिंदी फिल्मों के कलाकार ही शो करने जाते थे, पर अब भोजपुरी कलाकार भी वहां जा रहे हैं. इस की क्या वजह है?

विदेशों में बड़ी तादाद में भोजपुरी बोली के लोग बसे हुए हैं. वे लोग यूट्यूब पर भोजपुरी गानों को सर्च कर के सुनते रहते हैं. ऐसे में अपनी बोली से उन का लगाव बना रहता है.

शुरुआत में भोजपुरी के कलाकार विदेशों में कम जाते थे, पर अब विदेशों में इवैंट प्लान करने वाली कंपनियां भोजपुरी कलाकारों को ले कर शो प्लान करने लगी हैं. पहले जहां अरब देशों में ही ऐसे शो होते थे, पर अब दूसरे देशों में भी ऐसे शो होने लगे हैं.

क्या ऐसे डांस शो में आइटम डांसरों की ही डिमांड है?

नहीं, ऐसा बिलकुल भी नहीं है. भोजपुरी फिल्मों की हीरोहीरोइन और दूसरे कलाकारों को भी लोग बेहद पसंद करते हैं. डांस शो इन सब के साथ होता है.

अपने देश में डांस शो के दौरान कई बार हंगामा और मारपीट तक हो जाती है. विदेशों में क्या हाल है?

विदेशों में ऐसी परेशानियां नहीं होती हैं. इस की सब से बड़ी वजह यह भी है कि वहां की कानून व्यवस्था बहुत ही सख्त है.

आप ठाकुर परिवार से हैं, जहां लड़कियों का स्टेज पर डांस करना अच्छा नहीं माना जाता है. ऐसे में आप ने अपने घर वालों को कैसे राजी किया?

मैं इलाहाबाद के मऊ आइमा की रहने वाली हूं. मेरा परिवार रूढि़वादी ठाकुर बिरादरी से आता है. हम भले ही मुंबई में पलेबढ़े हैं, पर हमारी सोच गांव वाली ही थी.

मेरी बहन फिल्मों में ऐक्टिंग करती थी. जब मैं ने डांस शो करने का फैसला किया, तो मेरे पिताजी ने विरोध किया. लेकिन जब मैं ने डांस शो जीता, तब मेरे पिताजी को लगा कि मेरा डांस करने का फैसला सही था. तब से वे मेरा सहयोग करने लगे हैं.

आइटम डांस करने पर जब मुझे लगातार 3 बार बैस्ट डांसर का खिताब दिया गया, तो गांव वालों की भी सोच बदली. अब वे मुझे भी हीरोइन की तरह इज्जत की नजर से देखते हैं.

आप किसी हीरोइन की ही तरह खूबसूरत दिखती हैं. औफर मिलने के बाद भी आप बतौर हीरोइन काम क्यों नहीं करती हैं?

मुझे केवल डांस का शौक है. ऐक्टिंग का मुझे कोई शौक नहीं है. मुझे लोग ‘आइटम क्वीन’ के नाम से पहचानते हैं. भोजपुरी फिल्मों में दर्शक सब से ज्यादा डांस और गाने देखने के लिए आते हैं. वे सब मेरे नाम पर थिएटर तक आते हैं.

मेरा एक आइटम डांस आरा जिला नाम से बना था. वह लोगों को इतना पसंद आया कि मुझे ‘आरा जिला’ ही कहने लगे थे.

बहुत से लोग आइटम डांस को बेहूदा भी कहते हैं. इस पर आप की क्या राय है?

सोचने वाली बात यह है कि जो लोग भोजपुरी फिल्मों के आइटम डांस देखते ही नहीं, वे ही उस को बेहूदा कहते हैं. भोजपुरी आइटम डांस की बुराई करने वाले हिंदी फिल्मों के ‘शीला की जवानी’ और ‘मुन्नी बदनाम’ जैसे दूसरे गानों की तारीफ करते हैं.

भोजपुरी फिल्मों में बैडरूम सीन नहीं होते, चुंबन सीन नहीं होते, हीरोइन बिकिनी नहीं पहनती, फिर भी उस की बुराई होती है.

आप ने गांवदेहांत को बहुत करीब से देखा है. आप वहां की लड़कियों में क्या बदलाव महसूस करती हैं?

पिछले कुछ सालों में गांवदेहात की लड़कियों में आत्मविश्वास बढ़ गया है. वे पढ़ने के लिए स्कूल जाने लगी हैं. उन्हें फैशन के बदलाव की पूरी जानकारी होती है. गांवदेहात के बाजारों में आप को फैशन वाले वे सभी कपड़े मिल जाएंगे, जो शहरों में मिलते हैं. कुछ इलाकों में वे लड़कों से ज्यादा तरक्की करने लगी हैं.

आप अपनी कामयाबी का क्रेडिट किसे देंगी?

मैं ने डांस सीखा नहीं है. मेरे डांस कोरियोग्राफर कानू मुखर्जी ही मेरे गुरु हैं. मैं उन को ही अपनी कामयाबी का क्रेडिट देती हूं. इस के बाद घर में मेरी मां का भी बहुत सहयोग रहा है.

मेरा रोजाना हमबिस्तरी करने का मन करता है. क्या करूं. मेरी दिक्कत दूर करें.

सवाल
मैं 25 साल का हूं. शादी को 3 साल हो चुके हैं. मेरा रोजाना हमबिस्तरी करने का मन करता है, लेकिन काम की वजह से मुझे बाहर जाना पड़ता है. ऐसे में मुझे नींद नहीं आती और लगता है कि किसी भी लड़की के साथ सोऊं. मेरा काम ऐसा है कि बीवी को अपने साथ नहीं रख सकता. कभी मुझे कहीं जाना पड़ता है, तो कभी कहीं. मेरी दिक्कत दूर करें?

जवाब
आप को टूरिंग जौब छोड़ कर ऐसी नौकरी खोजनी चाहिए, जिस में हर रात आप घर पर रह सकें. आप पूरी मेहनत से ऐसी नौकरी की तलाश करेंगे, तो जरूर कामयाब होंगे. तब बीवी का साथ आप को रोजाना मिलेगा.

खुलेपन से लुट रहा है खजाना

गीत संगीत में खुलापन तो हिंदी, गुजराती और पंजाबी समेत सभी बोलियों व भाषाओं में छाया हुआ है, पर जितनी बुराई भोजपुरी गानों में खुलेपन की होती है, उतनी किसी और की नहीं होती. लेकिन भोजपुरी गानों की बुराई करने वालों से ज्यादा इस को पसंद करने वाले हैं. यही वजह है कि यूट्यूब पर सब से ज्यादा डाउनलोड होने वाले गानों में भोजपुरी के गाने शामिल हैं.

भोजपुरी गानों की लोकप्रियता ही है कि हनी सिंह तक इन गानों के रैप सौंग बनाने लगे हैं. उन्होंने भोजपुरी सौंग ‘तू लगइलू जब लिपस्टिक, हिलेला आरा डिस्ट्रिक…’ का जब रैप सुनाया, तो सभी को पसंद आया.

यही वजह है कि भोजपुरी फिल्मों के बराबर ही भोजपुरी संगीत का उद्योग खड़ा हो गया है. कुछ समय पहले तक तो गाने रिकौर्ड कराने और उन का वीडियो अलबम बनवाने के लिए लोगों को दिल्ली, मुंबई और वाराणसी के चक्कर लगाने पड़ते थे, लेकिन अब वही वीडियो अलबम पटना, हाजीपुर, छपरा, गोपालगंज और रांची में तैयार हो जाते हैं. भले ही कैसेट और सीडी का धंधा 70 फीसदी बंद हो गया हो, पर म्यूजिक में कैरियर बनाने वालों की कमी नहीं है.

झारखंड और बिहार के शहरों में ही नहीं, बल्कि गांवकसबों तक में गानों को डाउनलोड करने वाली दुकानें खुल गई हैं. गानों को डाउनलोड करने की जितनी दुकानें बिहार और झारखंड में खुली हैं, उतनी दुकानें किसी और प्रदेश में नहीं मिलेंगी. 35 से 40 रुपए में एक जीबी वाला मैमोरी कार्ड गानों से डाउनलोड किया जा रहा है.

केवल पटना शहर में ही आडियो और वीडियो अलबम बनाने वाले तकरीबन 40 स्टूडियो हैं. हर स्टूडियो में एक महीने में 5 से 6 अलबम तैयार होते हैं. एक अलबम में तकरीबन 8 गाने होते हैं. एक आडियोवीडियो अलबम अब 50 हजार से ले कर 80 हजार रुपए तक में तैयार हो जाता है.

पटना के अलावा छपरा, गोपालगंज, मुजफ्फरपुर, हाजीपुर और रांची में भी ऐसे वीडियो अलबम बनते हैं. बिहार में ऐसे बढ़ते रोजगार को देखते हुए मुंबईदिल्ली जाने वाले यहां के बाशिंदे वापस अपने शहरों को लौट आए हैं.

नहीं भटकते नौजवान

 पटना के रहने वाले मनोज अपने भाई बंटी के साथ म्यूजिक डायरैक्शन का काम करने मुंबई गए थे. उस समय पटना में इस तरह के कारोबार की कोई सुविधा नहीं थी. मुंबई में भोजपुरी फिल्मों में ये दोनों भाई म्यूजिक डायरैक्शन का काम करने लगे. घर से बाहर रहने की परेशानी के साथ ये लोग स्टूडियो में असिस्टैंट के रूप में ही काम करते थे.

लेकिन जब पटना में इस तरह की सुविधाएं शुरू हो गईं, तो मनोज और बंटी ने 4 साल पहले पटना आ कर खुद का काम शुरू किया. इस समय तक पटना में ही म्यूजिक अलबम बनने का काम शुरू हो चुका था.

मनोज कहते हैं, ‘‘4 साल में हम सौ से ज्यादा गायक कलाकारों के लिए काम कर चुके  हैं. अब नौजवानों में गायक बनने का रुझान तेजी से बढ़ा है, जिस से म्यूजिक अलबम बनाने का कारोबार बढ़ गया है. सीडी और कैसेट की बिक्री घटने के बाद भी म्यूजिक उद्योग पनप रहा है.’’

पटना के ही रहने वाले रत्नेश कुमार राय ‘रेडियो मिर्ची’ में नौकरी करते थे. साल 2008 में जब पटना में म्यूजिक का कारोबार बढ़ने लगा, तो उन्होंने रेडियो मिर्ची से नौकरी छोड़ दी और खुद का म्यूजिक स्टूडियो खोल दिया.

वे कहते हैं, ‘‘अपना स्टूडियो खोलने के बाद हम ने 2 म्यूजिक अलबम ‘शामियाना के चोप’ और ‘ए राजा बाजा बाजी के ना बाजी’ निकाला. ये दोनों ही अलबम सुपरहिट रहे. इस से न केवल गायक कलाकारों का नाम हुआ, बल्कि हमें भी म्यूजिक कंपनी बनाने का फायदा नजर आ गया.

‘‘आज हमारे यहां से कई गायक कलाकार म्यूजिक उद्योग में अपनी जगह बना रहे हैं. रोजाना ऐसे कलाकार बहुत सारी उम्मीदें ले कर पटना आते हैं. पहले यही लोग मुंबई भाग जाते थे.

‘‘अब बिहार ही भोजपुरी म्यूजिक का सब से बड़ा उद्योग और बाजार दोनों बन गया है. ऐसे में यहां के कलाकारों को बाहर नहीं जाना पड़ता.’’

एक साल पहले पटना में शिवा म्यूजिक स्टूडियो खोलने वाले शंकर सिंह कहते हैं, ‘‘एक हिट अलबम कई लोगों के रोजगार देने का साधन बन जाता है. यह आज की ही बात नहीं है. भोजपुरी में गाने गा कर हिट होने वाले ही फिल्मों में हीरो के रूप में कामयाब होते हैं. मनोज तिवारी, दिनेशलाल यादव जैसे तमाम उदाहरण हैं.

‘‘हम ने ‘रतिया कहां बितौला ना’ नामक हिट अलबम निकालने के बाद एक के बाद एक  कई बडे़ धमाके किए हैं.

‘‘कैसेट और सीडी का धंधा बंद होने के बाद पूरे देश की म्यूजिक इंडस्ट्री प्रभावित हुई है. इस के बावजूद भी सब से ज्यादा भोजपुरी गानों के ही अलबम बन रहे हैं. कुछ साल पहले तक पंजाबी म्यूजिक जिस तरह से बढ़ रहा था, अब भोजपुरी गानों का बाजार बढ़ रहा है.’’

‘रंगीला कैसेट’, दिल्ली के मालिक एसएन निराला कहते हैं, ‘‘कैसेट और सीडी का अब केवल 20 से 25 फीसदी कारोबार ही रह गया है.

70 फीसदी गाने यूट्यूब और इंटरनैट की दूसरी साइटों तक ही सिमट कर रह गए हैं.

‘‘यूट्यूब और इंटरनैट पर हर गाने पर मिलने वाले हिट के आधार पर इश्तिहार का रेट तय होता है. इस के साथ ही साथ जब किसी म्यूजिक कंपनी से गानों को यूट्यूब और इंटरनैट पर अपलोड किया जाता है, तो हर डाउनलोड पर एक तय रकम म्यूजिक कंपनी को जाती है.’’

गीतकार पवन पांडेय कहते हैं, ‘‘गाना गाने और लिखने वाले को सीधी पहचान हिट अलबम से मिलती है. यही वजह है कि शुरुआत में ये लोग अपना पैसा लगा कर अलबम बनवाते हैं. एक हिट अलबम से गायक को बहुत सारे स्टेज प्रोग्राम करने का मौका मिलता है.

‘‘हिट होने के बाद गायक को एक स्टेज प्रोग्राम को 20 से 35 हजार रुपए तक मिलने लगते हैं. स्टेज से मिलने वाले पैसों को वह अपना मेहनताना समझ लेता है.’’

खुलापन है हिट फार्मूला

जिस तेजी से भोजपुरी म्यूजिक इंडस्ट्री आगे बढ़ रही है, उसी तेजी से इन के गानों पर बेहूदा होने का दाग भी लग रहा है.

मजेदार बात यह है कि हर कोई दूसरे पर बेहूदगी फैलाने का जिम्मेदार मान रहा है. सचाई यह है कि भोजपुरी गानों पर इस तरह के आरोप पुराने समय से लगते आ रहे हैं. इन गानों को सुनने वालों का एक बड़ा तबका है. भोजपुरी फिल्मों की कामयाबी का फार्मूला भी यही गाने ही होते हैं. हर फिल्म में 7 से 8 गाने होते हैं. इस के अलावा एक से 2 आइटम सौंग होते हैं. ठीक इसी तरह से वीडियो अलबमों में भी होता है.

शंकर सिंह कहते हैं, ‘‘वैसे तो एक अलबम में हर तरह के गाने होते हैं, पर हिट वही होते हैं, जो बेहूदा कहे जाते हैं. यूट्यूब पर ये भोजपुरी हौट सांग के नाम से जाने जाते हैं.’’

इन के नाम भी इसी तरह से रखे जाते हैं. यही नहीं, केला और बैंगन तक का प्रयोग कर के शब्दों से बेहूदगी फैलाने का पूरा इंतजाम किया जाता है. गाने के शब्दों से ही बेहूदगी टपकती दिखती है.

वीडियो अलबमों में ‘गुदगुदी होता राजाजी’, ‘सील टूट जाई’, ‘खुलल इंटरनैट’, ‘डिस्कवरी देखा ए देवरू’, ‘दरदिया उठे ये ननदी’, ‘बाइलैंस ब्लाउज के’, ‘लहंगा में धइले बांटी सर्दी’, ‘जोवन चूसे देवरा’, ‘हमार लहंगा के अंदर वाईफाई बाटे’ जैसे नाम रखे जाते हैं. अब ऐसे गानों का आरकैस्ट्रा भी होता है, जिस में इन गानों पर बहुत ही बेहूदा डांस होता है. 

एसएन निराला कहते हैं, ‘‘लोकगीतों में पुराने समय से ही ऐसे शब्दों, हावभाव का इस्तेमाल किया जाता था, जिस को बेहूदा कहा जा सकता है. शादी और झूमर गीत इस के उदाहरण हैं. शादी में गाली गाने का रिवाज था. अब सबकुछ कारोबार बन गया है. ऐसे में बहुत सारे लोगों तक पहुंच जाता है.’’

गायिका खुशबू उत्तम कहती हैं, ‘‘गाना लिखने वाले ऐसे गानों के बीचबीच में कुछ शब्द डाल देते हैं. जब गाने वाला एतराज करता है, तो वह तर्क देता है कि इसी शब्द में गाने का पूरा रस है.’’

गाना लिखने वाले गीतकार पवन पांडेय कहते हैं, ‘‘म्यूजिक बनाने वाले लोग ऐसे गानों को जल्दी बाजार तक पहुंचा देते हैं, जिन को लोग चटखारे ले कर सुनते हैं.’’

तकरीबन 5 सौ गाने लिख चुके पवन पांडेय आगे कहते हैं, ‘‘लेखक और गायक को फायदा उसी गाने से होता है, जिसे सुनने वाले मजा ले कर सुनते हैं.’’

म्यूजिक स्टूडियो चलाने वाले शंकर सिंह कहते हैं, ‘‘केवल अकेले में ही नहीं, शादीब्याह, बरात और तमाम मौकों पर भी ऐसे गाने खूब बजते हैं, जिन पर लोग डांस करते हैं. ऐसे में यह बात पूरी तरह से समझ आती है कि ऐसे गानों को सुनने वाले पसंद करते हैं, इसलिए ये बनते और बिकते हैं.’’

एसएन निराला कहते हैं, ‘‘दुर्गा पूजा और कांवर यात्रा के समय ही धार्मिक भजन वाले गाने चलते और बिकते हैं, बाकी समय ऐसे गाने ही चलते हैं. होली के समय ऐसे गानों की भरमार हो जाती है. दीवाली के बाद ही होली के गानों की तैयारी होने लगती है.’’

गायक और ऐक्टर प्रवीण उत्तम कहते हैं, ‘‘भोजपुरी बोली के सुनने वालों में ये गाने लोकप्रिय हैं. अब ज्यादातर लोग ऐसे गानों को अपने मोबाइल में लोड कर के सुनते हैं. कई ऐसे शब्द होते हैं, जो भोजपुरी में खराब लगते हैं, पर असल में उन का मतलब ऐसा नहीं होता है.

‘‘आम भाषा में पति शब्द का प्रयोग किया जाता है. जब गाने में पति को भतार कहा जाता है, तो यह बुरा लगता है. जब तक सुनने वालों को ये गाने पसंद आ रहे हैं, तब तक ये बनते रहेंगे. देखा जाए, तो गाने लिखने वाले गांव और कसबों के लोग होते हैं. वे वहां की जिंदगी को समझ कर नए तरह से पेश करने की कोशिश करते हैं.

‘‘कई बार इन में गांवदेहात की जिंदगी के संबंधों को देखने का मौका भी मिलता है. पतिपत्नी, देवरभाभी, जीजासाली ऐसे ही तमाम रिश्तों को दिखाया जाता है.’’

जब हैरी मेट सेजल : समय और पैसे की बर्बादी

रोमांस के बादशाह माने जाने वाले शाहरुख खान का तिलिस्म अब टूटता जा रहा है. फिल्म ‘जब हैरी मेट सेजल’ ने तो उनके इस तिलिस्म के किले को ही धराशाही कर दिया है. इस रोमांटिक फिल्म में रोमांस या इमोशन कहीं नजर ही नहीं आता. यह फिल्म अति घटिया कहानी व पटकथा का पुलिंदा मात्र है. शाहरुख खान और अनुष्का शर्मा भी निराश ही करते हैं.

फिल्म की कहानी हरींद्र सिंह उर्फ हैरी (शाहरुख खान) और सेजल (अनुष्का शर्मा) की यूरोप यात्रा के इर्द गिर्द घूमती है. हैरी एक ट्यूरिस्ट गाइड है, जो लोगों को पूरे यूरोप की यात्रा कराता है. हैरी मूलतः पंजाबी है. सेजल एक गुजराती लड़की है, जिसकी सगाई हो चुकी है. वह शादी करने से पहले पूरा यूरोप घूमना चाहती है. जब वह यूरोप घूमने निकलती है, तो सगाई के बाद उसकी सगाई की अंगूठी अम्सटडर्म में खो जाती है, जिसकी तलाश में वह एयरपोर्ट से वापस आ जाती है. सेजल चाहती है कि अंगूठी ढूढ़ने मे हैरी उसकी मदद करे और उसके साथ रहे. पर हैरी ऐसा नहीं चाहता. वह खुद को अच्छा इंसान नहीं मानता. वह सेजल से कहता है कि अपनी महिला ग्राहकों के साथ शारीरिक संबंध बनाने की उसकी प्रवृत्ति है. पर सेजल उसकी बातों को अविवेकपूर्ण मानकर हंसती है और खुद को आधुनिक नारी का तमगा देती है.

बहरहाल, सेजल के सामने हैरी झुकता है और उसके साथ अंगूठी ढूढ़ने के लिए तैयार हो जाता है. अंगूठी ढूढ़ते हुए एक बार फिर पूरे यूरोप की यात्रा करते हैं. हैरी के साथ सेजल खुद को कुछ ज्यादा ही सुरक्षित महसूस करती है. उधर हैरी को भी प्यार व रिश्ते की अहमियत बेहतर तरीके से समझ में आती है. भारत वापसी से दो दिन पहले अंगूठी सेजल के हैंड बैग में ही मिलती है.फिल्म की कहानी जैसे  आगे बढ़ती है, वैसे दर्शक की समझ में नहीं आता कि कहानी कहां जा रही है? कई बार दर्शक को लगता है कि फिल्मकार उन्हे मूर्ख बना रहा है. कहानी में जो मोड़ आते हैं, वह भी इतने बेकार हैं कि दर्शक खुद को ठगा हुआ महसूस करता है. फिल्म की कहानी के साथ दर्शक जुड़ ही नहीं पाता. कई बार यह फिल्म महज एक ऐसा खींचा हुआ सीरियल नजर आती है, जिसकी कहानी आगे बढ़ने का नाम न ले रही हो. फिल्म में जबरन कुछ अवांछनीय दृश्य जरूर भरे गए हैं. फिर भी फिल्म गति नहीं पकड़ती है.

फिल्म में नौ गाने हैं, जिसमें से एक गाना ‘राधा..’ रीमिक्स करके भी उपयोग किया गया है, इस तरह दस गाने फिल्म में 38 मिनट तक छाए रहते हैं, जो कि फिल्म को कमजोर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते. दर्शक यह सोच सकता है कि इन गानों को चित्रहार के रूप में पेश करने के लिए जबरन एक कहानी गढ़ने का असफल प्रयास किया गया हो.

रोमांटिक कामेडी फिल्म ‘‘जब हैरी मेट सेजल’’ के कुछ सीन शाहरुख खान और काजोल की सफलतम फिल्म ‘‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ से चुराकर हूबहू फिल्माए गए हैं. फिल्म ‘‘जब हैरी मेट सेजल’’ देखकर दर्शक को इस बात का अहसास हो जाएगा कि फिल्मकार कितनी घटिया, वाहियात, बोरिंग फिल्म का निर्माण कर सकता है. घटिया व अति बुरी फिल्मों के रूप में जानी जाने वाली शाहरुख खान की पिछली फिल्मों ‘दिलवाले’, ‘फैन’ और ‘रईस’ का भी रिकार्ड यह फिल्म तोड़ती है.

अफसोस की बात यह है कि फिल्मकार इम्तियाज अली ने अपनी इस फिल्म में भारतीयों को आलू की तरह पूरे विश्व में मौजूद दिखाते हुए यह बताने की कोशिश की है कि पुर्तगाल हो या बुद्धापेस्ट हर जगह भारतीय अवैध तरीके से न सिर्फ रह रहे हैं, बल्कि वहां पर वह अपराध में लिप्त हैं. हैरी के  उत्तेजक व चुलबुले मजाक अजीब से लगते हैं. इंटरवल के बाद शाहरुख खान का अभिनय भद्दा लगता है और यह प्रेम कहानी नजर नहीं आती. फिल्म का क्लायमेक्स घटिया और बहुत ही ज्यादा वाहियात है. पूरा क्लायमेक्स समझ से परे है. फिल्मकार व कहानीकार ने यह स्पष्ट ही नहीं किया है कि हैरी पंजाब से अम्स्र्टडम क्यों गया था. वह वजहें कैसे खत्म हुई कि वह फिर पंजाब आ गया. कुल मिलाकर यह फिल्म बेसिर पैर  की सोच वाल कहानी है.

फिल्म में प्राग, अम्सटर्डम, बर्लिन, हालैंड की खूबसूरत लोकेशन दर्शक को आकर्षित कर सकती है, मगर महज अच्छी लोकेशन का क्षणिक नयन सुख लेने के लिए पैसे बर्बाद नहीं किए जा सकते. क्योंकि प्रेम कहानी के नाम पर यह एक सिरदर्द वाली फिल्म है.

दो घंटे 24 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘जब हैरी मेट सेजल’’ का निर्माण गौरी खान ने ‘‘रेड चिल्ली इंटरटेनमेंट’’ के बैनर तले किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक इम्तियाज अली, संगीतकार प्रीतम, गीतकार इरशाद कामिल, कैमरामैन के यू मोहन तथा कलाकार हैं- शाहरुख खान, अनुष्का शर्मा, सयानी गुप्ता, ईवलीन शर्मा, पारस अरोड़ा, अरू कृषांस वर्मा, चंदन राय सान्याल व अन्य.

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