‘पार्टीशन : 1947’ एक बेहतरीन फिल्म

इतिहास के पन्नों को जब भी कुरेदा जाता है, तब तब दर्दनाक कहानियों के साथ ही राजनैतिक षडयंत्रों की नफरत वाली कहानियां सामने आती हैं. 15 अगस्त 1947 के लिए लाखों क्रांतिकारियों ने अपना खून बहाया था. पर इस आजादी में भी अंग्रेज शासकों व इंग्लैंड के तत्कालीन प्रधानमंत्री चर्चिल के षडयंत्र का समावेश था.

उसी षडयंत्र के साथ भारत में वायसराय हाउस में पनप रही एक पंजाबी हिंदू और एक मुस्लिम लड़की की प्रेम कहानी को बेहतर ढंग से परदे पर लेकर आयी हैं फिल्मकार गुरींदर चढ्ढा. गुरींदर चढ्ढा ने अपनी इस फिल्म में आजादी से चंद माह पहले की कहानी को उकेरते हुए न सिर्फ भारत में अंतिम वायसराय लार्ड माउंटबेंटन व उनकी पत्नी लेडी एडवीना के मानवीय पक्ष को पेश किया है, बल्कि उन्हें मानवतावादी और भारत के हितैषी के रूप में पेश किया है, जो कि अपने ही देश के शासकों के षडयंत्र का मोहरा बनकर रह जाते हैं.

देश को आजाद हुए 70 वर्ष हो गए हैं, मगर उस वक्त के इतिहास में दबी तमाम कहानियां अभी तक दर्शकों के समक्ष नहीं पहुंची हैं. उन्हीं में से एक कहानी फिल्म ‘‘पार्टीशनः1947’’ का हिस्सा है. इस कहानी के अनुसार मो.अली जिन्ना की अलग पाकिस्तान देश की मांग का समर्थन करने के पीछे अंग्रेज सल्तनत और वहां के उस वक्त के प्रधानमंत्री चर्चिल की अपने देश का अरब देशों के तेल पर कब्जा बनाए रखने की नीति शामिल थी. उनका मकसद सोवियत संघ व हिंदुस्तान को और करीब न आने देना भी था. इस षडयंत्रकारी सोच के चलते मो.अली जिन्ना ने पं.नेहरू की इस बात का भी विरोध किया था कि मो.जिन्ना बिना बंटवारे वाले आजाद हिंदुस्तान के पहले प्रधान मंत्री बने और मुस्लिम लीग पहली सरकार बनाए.

कहानी शुरू होती है हिंदुस्तान को आजाद करने के लिए हिंदुस्तान के नेताओं के बीच सहमति बनाने के लिए वायसराय की हैसियत से लार्ड माउंटबेटन के भारत आगमन से. उनके भारत आगमन के साथ ही वायसराय हाउस में कार्यरत लोगों के कामकाज में परिवर्तन होता है. लार्ड माउंटबेटन की बेटी के साथ रहने के लिए आलिया नूर (हुमा कुरेशी) तथा लार्ड माउंटबेटन की सेवा में जीत सिंह (मनीष दयाल) की नियुक्ति की जाती है. जीत सिंह कभी पुलिस विभाग में रहते हुए जेल में कार्यरत थे. उस वक्त जेल में बंद आलिया के पिता (ओम पुरी) की मदद करते करते जीत, आलिया से प्यार कर बैठे थे. जबकि आलिया का विवाह आसिफ (अरूणोदय सिंह) के साथ तय हो चुका था. पर वह देश से बाहर था. अब आलिया व जीत सिंह की पुनः मुलाकात होती है और प्यार फिर से उभरता है. प्यार किसी मुकाम पर पहुंचे, उससे पहले ही आसिफ की वापसी मो.अली जिन्ना के ड्रायवर की हैसियत से होती है.

इधर माउंटबेटन मो. अली जिन्ना, महात्मा गांधी, पंडित नेहरू आदि से मिलना शुरू करते हैं. वह चाहते हैं कि देश को आजादी बिना बंटवारे के मिल जाए. पर एक दिन माउंटबेटन को अहसास होता है कि बिना बंटवारे के मो.अली जिन्ना नहीं मानेंगे. उसी बीच पूरे देश में हिंदू मुस्लिम दंगे भड़क उठते हैं, जिन्हें शांत करने में अंग्रेज फौज असफल रहती है और फिर पूरी फिल्म में यह दिखाया गया है कि किस तरह देश का बंटवारा होता है. लार्ड माउंटबेटन व उनकी पत्नी खुद को अपने ही देश के शासकों द्वारा ठगा हुआ महसूस करते हैं. फिर लार्ड माउंटबेटन अपनी पत्नी व बेटी के संग मिलकर किस तरह दंगा पीड़ितों की मदद के लिए तत्पर नजर आते हैं. इसी दंगे की चपेट में आसिफ के कहने पर पिता के साथ लाहौर जा रही आलिया आती है. अंततः आलिया व जीत सिंह का मिलन होता है.

लार्ड माउंटबेटन को सही ठहराने वाली यह फिल्म इतिहास के जानकारों के अलावा आम दर्शकों में भी रोमांच पैदा करती है. पर इतिहास की सच्चाई पर इतिहाकारों की अपनी राय हो सकती है. फिल्मकार ने 1947 के माहौल को फिल्म में बहुत सुंदर तरीके से गढ़ा है. फिल्म की पटकथा में बहुत बारीकी से काम किया गया है. पटकथा इस तरह से बुनी गयी है कि फिल्म अंत तक दर्शक को बांधकर रखती है. यह पटकथा लेखन का ही कमाल है कि आलिया व जीत की प्रेम कहानी कहीं भी देश की आजादी व बंटवारे के दर्द के बीच में नहीं आती है. दोनों समानांतर चलती हैं. पर लार्ड माउंटबेटन व उनकी पत्नी के रिश्तों को ठीक से उकेरने की जरुरत थी.

इसी तरह हालात की वजह से उपज रही पीड़ा ठीक से उभर नहीं पाती है. फिल्म के कुछ सीन अस्वाभाविक से लगते हैं. देश को आजाद करने व बंटवारे को लेकर सारे घटनाक्रम ठीक से चलते हैं, पर इसका निर्णय सुनाने व अमल में लाने की इतनी जल्दबाजी की गयी कि फिल्म थोड़ी सी लड़खडा जाती है. यदि फिल्मकार इसे सही ढंग से समेटने का प्रयास करता, तो शायद फिल्म की लंबाई थोड़ी सी बढ़ जाती, पर वह बेहतर होता. फिल्म के संवाद काफी बेहतर बन पड़े हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो आलिया के किरदार में हुमा कुरेशी और जीत सिंह के किरदार में मनीष दयाल उभर कर आते हैं. दोनों ही कलाकार प्रेम, प्रेम से दूर होने, देश के बंटवारे के दर्द को भी अपनी आंखों व चेहरे के भावों से इस तरह पेश किया है कि आम दर्शक के दिलों तक अपनी पीड़ा पहुंचा देते हैं. आसिफ की सलाह पर जीत सिंह से दूर लाहौर अपने पिता के साथ जाते समय जिस तरह से आलिया के आंसू निकलते हैं, वह अपने आप प्यार के टूटने व देश के बंटवारे के दर्द को लेकर बहुत कुछ कह जाता है. बालीवुड के फिल्मकार इसे इतना मैलोड्रामैटिक बना देते कि वह दर्द दर्शकों के दिलों को न छू पाता. लार्ड माउंटबेटन के किरदार में हुग बेन्नेविले भी जमे हैं. ओम पुरी, डेंजिल स्मिथ, नीरज कावी ने भी अच्छा काम किया है.

एक घंटा 46 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘पार्टीशनः 1947’ की लेखक व निर्देशक गुरींदर चढ्ढा, कैमरामैन बेन स्मिथहार्ड व कलाकार हैं-स्व.ओम पुरी, हुमा कुरेशी, मनीष दयाल, हुग बेनेवले, गिलियान एंडरसन, नीरज कावी व अन्य.

चीन की पैतरेबाजी उसे भी भारी पड़ेगी

चीन अब पैतरे दिखाने पर उतारू नजर आ रहा है. उस को चकाचौंध कर देने वाली अमीरी का गुमान ज्यादा हो गया है. चीन में अपना राज मजबूत बनाए रखने के लिए वहां की कम्यूनिस्ट पार्टी अब ऐसे शत्रु को ढूंढ़ रही है, जिसे कालिख से पोत कर वह अपनी जनता को भटकाव में रख सके.

पहले चीन ने रूस को दुश्मन करार दिया था, अब रूस से दोस्ती हो गई है, क्योंकि रूस के रास्ते वह यूरोप के बाजारों तक पहुंचना चाहता है. पाकिस्तान से उस की दोस्ती पुरानी है. तब से जब पाकिस्तान पूरी तरह अमेरिका के पलड़े में था. वह भारत को तो 1950 से दुश्मन मान रहा है, जब भारत ने दलाई लामा की हिमायत की और 1958 में उन्हें भारत में शरण दी. तब भारत को सबक सिखाने के लिए चीन ने 1962 में उत्तरी सीमा पर हिमालय पार कर सैनिक भेज कर जवाहर लाल नेहरू की सरकार की चूलें हिला दीं.

अब भारत ने चीन की वन रोड वन बैल्ट योजना में भाग लेने से इनकार कर दिया है और रूस व जापान के साथ मिल कर चीन का मुकाबला करने का फैसला किया है, तो सिक्किम व भूटान के पठारी इलाकों, जिन्हें डोकलाम के नाम से जाना जा रहा है, पर चीन हक जमा रहा है. चीन का आरोप है कि भारतीय सैनिक टुकड़ी ने चीनी इलाके में घुसपैठ की है.

चीन अब तिब्बत की तरफ से लड़ाई की तैयारी में लगा है. भारत की फौजें भी इस इलाके में हैं. चीन के लिए इस मामले में लड़ाई करना काफी फायदे में हो सकता है. उसे सीमा से सटे अपने दूसरे देशों को जताना है कि चीन आर्थिक मोरचे पर ही नहीं, बल्कि सैनिक मोरचे पर भी अब दुनिया का सब से बड़ा देश बनने वाला है. अगर उस की बात नहीं मानी गई, तो वह जबरन मनवा सकता है.

भारत को चीन की इस धींगामुस्ती का तो मुकाबला करना ही होगा, चाहे कोई भी कीमत हो. आमतौर पर इस तरह की खटपट बातचीत से सुलझ जाती है, पर दुनिया के बदलते ताकत के नक्शे की मांग है कि चीन अमेरिका, भारत और जापान से उलझ कर जता दे कि वह ही सब से ताकतवर है. भारत की चीन से चाहे लड़ाई की कोई मंशा न हो, फिर भी अगर चीन न माना तो उसे जवाब तो देना ही होगा.

चीन बारबार 1962 की बात दोहरा रहा है, पर 1962 और 2017 के भारत में बहुत फर्क है. तब हम खाना भी भीख मांग कर खाते थे, आज अरबों रुपए का खाना बाहर बेचते हैं. हमारे पास पहले उधार चढ़ा रहता था, आज विदेशी मुद्रा का बड़ा भंडार है. भारत अब कोई छोटामोटा गरीब देश नहीं है. वह तीसरे नंबर की आर्थिक ताकत बनने वाला है. चीनभारत युद्ध दोनों के लिए महंगा होगा, यह पक्का है.

भरम और शरम से फैलता एड्स का रोग

पटना, बिहार के मीठापुर इलाके की रहने वाली राधिका को उस के बेटे उमेश ने इलाज के लिए बिहार के सब से बड़े सरकारी अस्पताल पटना मैडिकल कालेज अस्पताल में भरती कराया था. उस औरत को पेट में दर्द और सूजन की शिकायत थी. डाक्टर ने उसे कुछ दवा दे कर 10 दिन बाद आने के लिए कहा. उमेश ने बताया कि दवा खाने के बाद भी उस की मां की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ और दर्द काफी ज्यादा बढ़ गया. वह दोबारा अपनी मां को अस्पताल ले गया. मैडिकल इमर्जैंसी में कहा गया कि यह सर्जिकल इमर्जैंसी का मामला है, वहां ले कर जाओ. सर्जिकल इमर्जैंसी ने इसे मैडिकल इमर्जैंसी का मामला बता कर भरती करने से मना कर दिया.

उमेश ने अपनी मां को ले कर 19-20 दफा मैडिकल और सर्जिकल इमर्जैंसी के चक्कर लगाए. आखिरकार सर्जिकल इमर्जैंसी में जांच कर एचआईवी समेत कुछ टैस्ट कराने को कहा गया. टैस्ट में जब एचआईवी पौजिटव पाया गया, तो डाक्टरों का रवैया पहले से ज्यादा खराब हो गया. उन्होंने परचे को फाड़ डाला और किसी प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराने की सलाह दे डाली.

उमेश के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह प्राइवेट अस्पताल का खर्च उठा पाता, इसलिए वह अपनी बीमार मां को ले कर घर चला गया. कुछ दिनों के बाद जब राधिका की तबीयत काफी बिगड़ने लगी, तो उमेश फिर से उसे पटना मैडिकल कालेज अस्पताल ले गया. डाक्टरों ने उसे डांटफटकार लगाते हुए अस्पताल से जाने की धमकी दे डाली. बाद में अस्पताल के सुपरिंटैंटैंड के दखल के बाद राधिका को भरती कराया गया. उस के बाद भी राधिका का इलाज शुरू नहीं हो पाया और कुछ ही घंटे बाद उस ने दम तोड़ दिया.

एड्स और एचआईवी को ले कर जागरूकता पैदा करने की मुहिम पर सरकार करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाती है, पर सरकार के मातहत काम करने वाले कई डाक्टरों में ही जागरूकता नहीं है. एड्स छुआछूत की बीमारी नहीं है. जिस्मानी रिश्ता बनाने और एड्स मरीज का खून किसी मरीज को चढ़ाने से ही एड्स होने का खतरा होता है. पटना मैडिकल कालेज अस्पताल में एड्स की मरीज राधिका के इलाज करने को ले कर डाक्टरों के रवैए ने यह साबित कर दिया है कि सरकारी अस्पतालों के डाक्टरों और मुलाजिमों के बीच भी एड्स को ले कर जागरूकता फैलाने की ज्यादा दरकार है.

संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए जीवन के अधिकार में साफतौर पर कहा गया है कि एड्स मरीजों को तालीम, सेहत और जायदाद से जुड़े समान अधिकार दिए गए हैं. अगर कोई डाक्टर एड्स मरीज के साथ भेदभाव करता है, तो वह जीवन के अधिकार के उल्लघंन का अपराधी करार दिया जाएगा.

बिहार के सीतामढ़ी की रहने वाली 25 साल की सपना अपने पति के एड्स की बीमारी को छिपाने का नतीजा भुगत रही है. वह बताती है कि उस का पति नागपुर में ट्रक ड्राइवर था. अचानक वह बीमार पड़ा. पहले डाक्टर ने बताया कि उसे कैंसर हो गया है, पर बाद में पता चला कि एड्स है. सपना ने परिवार में किसी को नहीं बताया कि उस के पति को एड्स है. उस ने गुपचुप तरीके से पटना के बाद दिल्ली में इलाज कराया, पर अपने पति को बचा नहीं सकी.

नैशनल एड्स कंट्रोल और्गनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में एचआईवी के 86 फीसदी मामलों में असुरक्षित सैक्स संबंध से ही यह बीमारी फैलती है. एचआईवी संक्रमित खून चढ़ाने पर 2.57 फीसदी लोग एड्स की चपेट में आते हैं. वैसे तो खून देने वालों का एचआईवी टैस्ट कराने के बाद ही किसी मरीज को खून चढ़ाया जाता है, पर गांवों और दूरदराज के इलाकों में कई डाक्टर इस बात की अनदेखी करते हैं.

एचआईवी संक्रमित सूई से एड्स के चंगुल में फंसने वालों का आंकड़ा 1.97 फीसदी है. एचआईवी की चपेट में आने पर मरीज पहले टीबी का शिकार होता है, क्योंकि टीबी होने पर शरीर में बीमारी से लड़ने की ताकत कम हो जाती है. कुछ को निमोनिया या मैनिनजाइटिस भी होता है. इस मसले पर एड्स स्पैशलिस्ट डाक्टर दिवाकर तेजस्वी कहते हैं कि असुरक्षित यौन संबंध एड्स के फैलने की सब से बड़ी वजह है. तकरीबन 70 फीसदी आदमी को एचआईवी संक्रमित होने का पता ही नहीं चलता है, क्योंकि इस बीमारी के लक्षण 10 से 12 साल के बाद सामने आते हैं.

लगातार बुखार आना, एक महीने से ज्यादा समय तक दस्त होना, 10 फीसदी से ज्यादा वजन कम हो जाना, मुंह में छाले आना, बदन पर खुजली होना, 3-4 हफ्ते से ज्यादा समय तक खांसी और उलटी होना इस के खास लक्षण हैं. ऐसा होने पर तुरंत डाक्टर को दिखा कर एचआईवी पर जीत हासिल की जा सकती है.

एड्स को ले कर आज भी समाज में कई तरह के भरम फैले हुए हैं. किसी को गले लगाने और चुंबन लेने या साथ सोने से एड्स नहीं फैलता है. बगैर कंडोम के सैक्स करने, किसी एचआईवी मरीज का खून किसी सेहदमंद इनसान को चढ़ा देने और बच्चों को स्तन से दूध पिलाने पर ही एड्स फैलता है. थूक वगैरह से यह बीमारी होने का कोई खतरा नहीं होता है.

लोग यह समझते हैं कि मच्छरों के काटने से भी एड्स फैलता है, जबकि मच्छर के काटने पर भी एड्स का कोई खतरा नहीं होता है. कोई भी कीड़ा जब किसी इनसान को काटता है, तो वह उस के खून या जिस्म में फैले वायरस को दूसरे इनसान के शरीर में नहीं डाल सकता है. एचआईवी मरीज के शौचालय का इस्तेमाल करने पर भी एड्स नहीं होता है.

साथी से वफादारी और सैक्स बनाने पर कंडोम का इस्तेमाल कर एड्स से बचा जा सकता है. अगर सैक्स करने वाले दोनों लोग एड्स के शिकार हों, तो उस के बाद भी सैक्स करते समय कंडोम का इस्तेमाल जरूरी है, वरना इन्फैक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है. इस से इलाज में दिक्कत हो सकती है और जान भी जा सकती है.

अगर पति और पत्नी दोनों को एड्स हो, तो भी वे एड्स के वायरस से मुक्त बच्चे को जन्म दे सकते हैं. डाक्टर की सलाह और इलाज से ऐसा मुमकिन है. मैडिकल साइंस के मुताबिक, अभी भी देश के 60 फीसदी लोगों को एड्स के बारे में कुछ नहीं पता है. एचआईवी पोजिटिव होने पर आरटीआर दवाओं को नियमित रूप से लिया जाए, तो मरीज कई सालों तक सामान्य जिंदगी जी सकता है.

एड्स के खिलाफ डटा एक डाक्टर

पटना के मशहूर डाक्टर दिवाकर तेजस्वी गरीब मरीजों के इलाज, जांच और दवा का पूरा इंतजाम खुद करते हैं. ‘बिल क्लिंटन एड्स फाउंडेशन’ से जुड़े डाक्टर दिवाकर तेजस्वी पिछले 15 सालों से एड्स और टीबी के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं और आम लोगों को जागरूक करने का काम कर रहे हैं.

23 सितंबर, 2005 को उन्होंने पहली बार पटना के भीड़ भरे एक्जीबिशन रोड पर बीच सड़क पर मजमा लगाया और एड्स से पीडि़त महिला रामपति के हाथों से बिसकुट खा कर उन्होंने यह बताने की कोशिश की थी कि एड्स छूत की बीमारी नहीं है. एड्स के मरीज को इलाज के साथ हमदर्दी की भी जरूरत होती है. बिहार के सारण जिले के चैनवा प्रखंड के चड़वा गांव की रहने वाली रामपति के पति मुख्तार की मौत एड्स की वजह से हो चुकी थी.

डाक्टर दिवाकर तेजस्वी ‘पब्लिक अवेयरनैस फौर हैल्थफुल एप्रोच फौर लीविंग’ के नाम से अपना संगठन भी चला रहे हैं. इस के साथ ही गांवों और दूरदराज के इलाकों में हैल्थ कैंप लगा कर आम आदमी को एड्स और हैल्थ के प्रति जागरूक करने की मुहिम चला रहे हैं. वे अब तक एक हजार से ज्यादा जागरूकता और फ्री हैल्थ चैकअप कैंप लगा चुके हैं.

18 अगस्त, 1968 को पटना में जनमे डाक्टर दिवाकर तेजस्वी एचआईवी एड्स के स्पैशलिस्ट और एड्स पर अपनी रिसर्च को कई इंटरनैशनल मंचों पर पेश कर चुके हैं. वे कहते हैं कि एड्स अब लाइलाज बीमारी नहीं रही है. अगर सही समय पर इस का सही तरीके से इलाज शुरू कर दिया जाए, तो इस का मरीज लंबी जिंदगी जी सकता है. जिस तरह से डायबिटीज, ब्लड प्रैशर वगैरह के मरीज नियमित रूप से दवा खा कर आम जिंदगी जी रहे हैं, उसी तरह एड्स के मरीज भी जी सकते हैं. इतना ही नहीं, अगर पति और पत्नी दोनों एचआईवी पोजिटिव हैं, तो वे डाक्टरी देखरेख में सेहतमंद बच्चे पैदा कर सकते हैं.

साल 1992 में नालंदा मैडिकल कालेज अस्पताल से एमबीबीएस की डिगरी हासिल करने वाले डाक्टर दिवाकर तेजस्वी बताते हैं कि संक्रमित औरत के पेट में पल रहे बच्चे को अगर आपरेशन कर के निकाल लिया जाए और वह अपने बच्चे को अपना दूध न पिलाए, तो बच्चे को मां से संक्रमण का खतरा एक फीसदी भी नहीं रहता है.

इसी तरह मर्द के वीर्य को धो कर महिला के गर्भ में आर्टिफिशियल इन्ट्रायूटेरिन इनसेमिनेशन तकनीक से डाला जाए और दवा से औरत का वायरल लोड 1000 कौपी से कम रखा जाए, तो सेहतमंद बच्चे पैदा हो सकते हैं. फिलहाल यह तकनीक काफी खर्चीली है, पर आने वाले दिनों में इस खर्च में कमी आएगी.

डाक्टर दिवाकर तेजस्वी कहते हैं कि एचआईवी एड्स ज्यादातर मजदूरों और ट्रक ड्राइवरों के जरीए फैलता है. असुरक्षित यौन संबंध एड्स के फैलने की सब से बड़ी वजह है. तकरीबन 70 फीसदी मरीजों को एचआईवी संक्रमित होने का पता ही नहीं चलता है, क्योंकि इस बीमारी के लक्षण 10 से 12 साल के बाद सामने आते हैं. लगातार बुखार आना, एक महीने से ज्यादा समय तक दस्त होना, 10 फीसदी से ज्यादा वजन कम हो जाना, मुंह में छाले आना, बदन पर खुजली, 3-4 हफ्ते से ज्यादा समय तक खांसी और उलटी होना इस के मुख्य लक्षण हैं. ऐसा होने पर तुरंत डाक्टर को दिखा कर अपना इलाज कराएं.

ज्ञानरंजन : एड्स मरीजों के इलाज में अपनी बीमारी भूल गए

‘बिहार नैटवर्क औफ पीपुल लीविंग विद एचआईवी एड्स’ के अध्यक्ष ज्ञानरंजन बताते हैं कि एड्स को ले कर समाज में कई तरह की गलत बातें फैलाई गई हैं. इस बीमारी का पता लगने के बाद भी उसे छिपाने की कोशिश ही जानलेवा साबित होती है. अगर पता लगने के तुरंत बाद किसी अच्छे डाक्टर की सलाह पर दवाएं लें, तो जिंदगी को बेहतर और लंबा बनाया जा सकता है.

पटना के रहने वाले 35 साल के ज्ञानरंजन खुद एचआईवी पोजिटिव हैं और साल 2001 में खून चढ़ाने के दौरान वे एचआईवी की चपेट में आ गए थे. साल 2004 में ब्लड डोनेशन के दौरान उन्हें एचआईवी पोजिटिव होने के बारे में पता चला. तब से अब तक वे दवा खा कर आम जिंदगी गुजार रहे हैं. उन की बीवी भी एचआईवी की शिकार हैं, लेकिन उन के बच्चे इस से मुक्त हैं. ज्ञानरंजन बताते हैं कि बच्चे के जन्म से पहले उन्होंने पूरी सावधानी बरती और डाक्टर की देखरेख में रहे. एड्स के मरीजों की देखभाल करने और उन के इलाज में हर तरह की मदद करने को ही उन्होंने अपना मिशन बना लिया है.

संस्कृति की ठेकेदारी में उलझी पोर्न साइट्स 

पटना रेलवे जंक्शन पर कुल 10 प्लेटफौर्म हैं. जंक्शन होने के कारण यहां यात्रियों की भागदौड़ और धक्कामुक्की आम बात है. पिछले कुछ महीनों से हर प्लेटफौर्म पर ऐसे युवकयुवतियों की भरमार नजर आती है, जिन्हें रेलगाड़ी से कहीं आनाजाना नहीं होता. वे प्लेटफौर्म पर बैठे घंटों स्मार्टफोन पर नजरें टिकाए घंटों साथ गुजार देते हैं. 10 रुपए का प्लेटफौर्म टिकट ले कर वे युवा निश्चिंत हो कर पीठ पर लैपटौप बैग लटकाए वहां समय गुजारते हैं. ये युवा वहां पोर्न साइट्स सर्च करते रहते हैं और पोर्न फिल्में देखते हैं. आप सोच रहे होंगे आखिर इस के लिए रेलवे प्लेटफौर्म पर जाने की क्या जरूरत है? जरूरत है, क्योंकि रेलवे ने पटना जंक्शन पर मुफ्त वाईफाई सेवा शुरू की है. इस से युवाओं को वहां मुफ्त में पोर्न साइट्स का आनंद लेने का मौका मिलता है.

रेलवे ने देश के कई स्टेशनों को वाईफाई सेवा से लैस कर दिया है, पर रेलवे की मुफ्त वाईफाई सेवा का सब से ज्यादा इस्तेमाल पटना जंक्शन पर हो रहा है. स्टेशन पर मुसाफिरों की बढ़ती संख्या और वाईफाई के इस्तेमाल को देखते हुए इस की क्षमता 10 गुना अधिक बढ़ाने की तैयारी की जा रही है. वाईफाई इस्तेमाल करने के मामले में दूसरे नंबर पर जयपुर, तीसरे पर बेंगलुरु और चौथे पर दिल्ली रेलवे स्टेशन हैं. गौरतलब है कि पटना जंक्शन समेत देश 23 रेलवे स्टेशनों को रेलटैल और युगल की ओर से मुफ्त वाईफाई सेवा से लैस किया गया है.

सभी 23 रेलवे स्टेशनों में से पटना रेलवे स्टेशन पर सब से ज्यादा मुसाफिर वाईफाई का उपयोग कर रहे हैं. फिलहाल पटना जंक्शन पर एक गीगाबाइट क्षमता के वाईफाई की मशीन लगाई गई है. यात्रियों द्वारा इंटरनैट का अधिक इस्तेमाल किए जाने से उस की गति काफी धीमी हो गई है. इसे सुधारने के लिए रेलवे ने वाईफाई की क्षमता 10 गीगाबाइट करने का प्रस्ताव रेल मंत्रालय को भेजा है.

रेलवे सूत्रों के मुताबिक पटना जंक्शन पर सब से ज्यादा रेल यात्री यूट्यूब और पोर्न साइट्स सर्च कर रहे हैं. सब से ज्यादा डाटा इन्हीं साइट्स को देखने से खर्च हो रहा है. उस के बाद विकिपीडिया को सर्च किया जा रहा है. ज्यादातर मुसाफिर इन्हीं साइट्स का बड़े पैमाने पर उपयोग कर रहे हैं. इस के अलावा रेल यात्री मुफ्त वाईफाई से अपने मोबाइल ऐप्स भी जम कर अपडेट करते हैं. फिल्म डाउनलोड करने में यात्री वाईफाई का जम कर इस्तेमाल करते हैं. पटना के बाद बिहार के गया और हाजीपुर जंक्शन को भी रेलवे ने फ्री वाईफाई से लैस कर दिया है.

एक ओर जहां रेलवे की फ्री वाईफाई सेवा का ज्यादातर इस्तेमाल पोर्न साइट्स देखने के लिए किया जा रहा है, वहीं नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले साल बीएसएनएल, एमटीएनएल और दूसरे इंटरनैट सर्विस प्रोवाइडर्स को 13 पोर्न साइट्स पर बैन लगाने का आदेश दिया था. भजभज मंडली सरकार का मानना है कि पोर्न साइट्स देखने से बच्चे और युवा बिगड़ सकते हैं. यह बच्चों के भविष्य और देश के लिए ठीक नहीं है.

समाजसेवी किरण राय कहती हैं कि पोर्न साइट्स को देखने से सभ्यता और संस्कृति के बिगड़ने की दलील देना रूढि़वादी मानसिकता को दर्शाता है. आज इंटरनैट के जमाने में सबकुछ खुला है और हर कोई अपनी मरजी और जरूरत के हिसाब से उस का उपयोग कर रहा है. इसलिए पोर्न साइट्स के नाम पर संस्कृति की दुहाई देना या होहल्ला मचाना ठीक नहीं है.

जानकारों का मानना है कि सैक्स सृष्टि को चलाने के लिए जरूरी चीज है, फिर यह गंदा और समाज को भटकाने वाला कैसे हो सकता है? हां, यह जरूर है कि हर समय सैक्स के बारे में सोचना और उस में लिप्त रहना ठीक नहीं है. वैसे यह तर्क हर चीज पर लागू होता है. पटना हाईकोर्ट के वकील अनिल कुमार सिंह कहते हैं कि अति हर चीज की खराब है. जैसे किसी बीमारी के इलाज के लिए दवा की मात्रा तय की जाती है, उस का अधिक डोज जानलेवा हो सकता है. ठीक उसी प्रकार सैक्स की अति भी ठीक नहीं है.

पोंगापंथी समाज और सरकार को यह समझना चाहिए कि पोर्न साइट्स युवाओं को भटकाने का काम नहीं कर रही हैं. ये समाज का अहम हिस्सा हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो सुप्रीम कोर्ट पोर्न साइट्स पर बैन लगाने वाली याचिका को खारिज नहीं करता.

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि किसी को उस के कमरे में पोर्न देखने से कैसे रोका जा सकता है? यह संविधान की धारा 21 के तहत मिला व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का खुला उल्लंघन है. कामसूत्र की रचना करने वाले देश में व्यक्तिगत आजादी को सब से ऊपर रखना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि कामुकता व्यक्तिगत इच्छा है. इस पर जबरन या कानूनन रोक लगाना वाजिब नहीं है.

गौरतलब है कि इंदौर के रहने वाले एडवोकेट कमलेश वासवानी ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर पोर्न वैबसाइट्स पर रोक लगाने की मांग की थी. याचिकाकर्ता का तर्क था कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले ज्यादातर अपराध की वजह पोर्न साइट्स हैं. इन से सैक्स अपराधों को बढ़ावा मिलता है. कोर्ट ने इस दलील को मानने से इनकार कर दिया है.

गूगल के सर्वे के मुताबिक भारत में 5 में से 3 मोबाइल फोन उपयोग करने वाले पोर्न साइट्स देखते हैं. देश के कुल 50त्न  स्मार्टफोन पर पोर्न साइट्स देखी जाती हैं. देश में 4.31 मिनट, उत्तर प्रदेश में 7.11 मिनट और दिल्ली में 8.02 मिनट पर पोर्न साइट्स देखी जाती हैं. इतना ही नहीं महिलाएं भी पोर्न साइट्स देखने में पीछे नहीं हैं. 25त्न महिलाएं पोर्न साइट्स देखना पसंद करती हैं. यह दुनिया भर के 23त्न आंकड़े से 2 फीसदी ज्यादा है.

डाक्टर दिवाकर तेजस्वी कहते हैं कि सैक्स करने या सैक्स की किताब पढ़ने वालों को उस से दिमागी शांति और आनंद मिलता है. किसी को सैक्स करने से रोका नहीं जा सकता और न ही किसी तरह की सैक्सी फिल्म देखने पर सरकार द्वारा पाबंदी लगाई जा सकती है. अगर पोर्न साइट्स देखने से युवा और समाज में भटकाव आता तो अमेरिका आज सब से फिसड्डी देश होता. अमेरिका में रोजाना 14.2 अरब लोग पोर्न पेज पर विजिट करते हैं, यह आंकड़ा दुनियाभर का 40% है.

भारत में करीब 8.22 मिनट पोर्न सामग्री देखी जाती है, जबकि दुनिया भर में यह आंकड़ा 8.56 मिनट है. उतरी भारत में सब से ज्यादा पोर्न साइट्स देखी जाती हैं. पोर्न साइट्स देखने के मामले में मिजोरम सब से आगे है. भारत में सब से ज्यादा सनी लियोनी की पोर्न फिल्मों को देखा जाता है. उस के बाद लीजा एन, भारतीय सैक्स, भारतीय बीवी और भारतीय भाभी को सब से ज्यादा सर्च किया जाता है.

भारतीय समाज और संस्कृति में पोर्न और सैक्स पर बात करने की सख्त मनाही है. इस मसले पर बात करने वाले को समाज से भटका हुआ व्यक्ति माना जाता है. यदि किसी घर में किसी बच्चे ने गलती से भी इस बारे में कुछ पूछ लिया तो डांट कर उसे चुप करा दिया जाता है या दूसरी बातों से उसे बहला दिया जाता है.

पुराने समय में तो व्यभिचार समाज और परिवार पर ज्यादा हावी था. जानकारों का मानना है कि पुराने जमाने में परिवार के ही कई मर्द और औरतों के बीच नाजायज रिश्ता कायम हुआ करता था. किसी का अपने जेठ से तो किसी का भाभी से, ससुर का बहू से, दामाद के सास के साथ सैक्स के रिश्ते बनते रहते थे. यह सब काफी चोरीछिपे, परदे के पीछे और घुप्प अंधेरे में हुआ करता था, इसलिए उस समाज को सुसंस्कृत माना जाता है. आज सैक्स को ले कर धीरेधीरे ही सही खुलापन आया है, जिस से पुराने जमाने के तथाकथित सुसंस्कृत लोग हायतोबा मचाए रहते हैं.

हाईस्कूल के मास्टर सुकांत सिंह कहते हैं कि भारतीय समाज सैक्स को छिपछिपा कर उपयोग में लाता है. दबी जबान में इस के बारे में बातें की जाती हैं. पुराने जमाने में सैक्स की कहानियों की किताबें बड़े पैमाने पर बिकती थीं. उस समय भी बच्चे और बड़े दोनों चोरीछिपे उन किताबों को पढ़ते थे. बाप की अलमारियों और बक्सों से सैक्स कहानियों की किताबें चुरा कर उन के बच्चे भी पढ़ा करते थे.

क्या इस से समाज और देश बरबाद हो गया? क्या बड़ेबड़े अफसर, वैज्ञानिक, डाक्टर, इंजीनियर, लेखक, कवि, साहित्यकारों ने कभी सैक्स की किताबें नहीं पढ़ीं? कभी पोर्न साइट्स नहीं देखीं? ऐसे में पोर्न साइट्स देखने वाले आज के युवाओं के भटकने या बरबाद होने की सोच बेकार है. आज सैक्स की किताबों की जगह पोर्न साइट्स ने ले ली है और युवाओं के साथ बुजुर्ग भी उस का जम कर आनंद उठा रहे हैं. ये केवल मनोरंजन का जरिया भर हैं.

अमिताभ नहीं, ये एक्टर है रेखा का असली प्यार

बॉलीवुड अभिनेत्री रेखा की ज़िन्दगी किसी रहस्य से कम नहीं है. रेखा का भारी-भरकम मेकअप से लदा चेहरा भले ही उनकी ख्वाहिशो पर पर्दा डाल देता हो लेकिन हकीकत यही है की उनके भीतर ख्वाहिशों का पूरा कब्रिस्तान बसता है. रेखा के व्यक्तिव को लेकर हमेशा से ही अटकलों का बाजार गर्म रहा है लेकिन ना तो किसी दावे की कोई जांच-परख हुई और ना ही रेखा ने कभी इसे लेकर मुंह खोला. इसलिए उनसे जुड़ा हर सच अपने-आप में आजाद है अब जिसे जितना ग्रहण करना है अपने हिसाब से ग्रहण कर सकता है.

आज तक यह साफ़ नही हो पाया है की रेखा किस के नाम का सिंदूर लगाती है. लेकिन इसको लेकर एक सनसनीखेज खुलासा हुआ है. खबरों के मुताबिक रेखा बॉलीवुड के बाबा यानी संजय दत्त के नाम का सिंदूर लगाती है. आज कल सोशल मीडिया पर रेखा और संजय दत्त की गुप्त शादी की खबरे बहुत ही वायरल हो रही है. जबकि उनके पूर्व पति मुकेश अग्रवाल की बहुत पहले ही मृत्यु हो चुकी है.

इसके बाद से रेखा ने आज तक किसी से शादी नहीं की थी. मीडिया रिपोर्ट्स से मिली जानकारी के मुताबिक बता दें कि हाल ही में यासिर ओसमान की किताब से रेखा और संजय दत्त की गुप्त शादी के खुलासे से पुरे बॉलीवुड में हंगामा मच गया है.

बता दें कि यासिर की किताब “Rekha The Untold Story” के मुतबिक 1984 में आई फिल्म ‘जमीन आसमान’ की शूटिंग के दौरान रेखा और संजय के बीच नजदीकियां बढ़ गई और फिल्म खत्म होने तक दोनों एक-दूसरे के प्यार में पागल हो चुके थे. यहां तक की फिल्म खत्म होते ही दोनों ने गुपचुप तरीके से शादी भी रचा ली थी जिसकी भनक आजतक किसी को नही है.

संजय दत्त के अलावा रेखा का नाम हमेशा से अमिताभ बच्चन से भी जुड़ता रहा है लेकिन ये बात भी सभी जानते है कि अमिताभ के जीवन में जया के आने के बाद से रेखा अकेली हो गयी थी इसी वजह से रेखा संजय के इतने करीब जा पहुंची थी और इसलिए ही रेखा आज भी संजय के नाम का सिंदूर लगाती है.

राजनेताओं की बीमारी राज क्यों, जानिए असलियत

30 साल से भी पहले तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम जी रामचंद्रन के अस्पताल में भरती होने पर एक पत्रिका ने लिखा था, ‘‘पूरे अक्तूबर ही सैंट्रल मद्रास के अपोलो अस्पताल में रहस्य और अनिश्चितता की हवा बहती रही.’’ ये शब्द आसानी से जयललिता, राज्य की मुख्यमंत्री, के आिखरी दिनों को बयान करते हैं. 23 सितंबर, 2016 को जब जे जयललिता को बुखार व डिहाइड्रेशन के लिए भरती किया गया और 4 दिसंबर को उन्हें दिल का दौरा पड़ा,  लोगों को कम ही जानकारी हो पाई. उन के निवासस्थान  या उन की पार्टी के औफिस से कोई न्यूज बाहर नहीं आई. बस, अस्पताल के आम मैडिकल बुलेटिन आते रहे.

आखिरी बुलेटिन कुछ ऐसा था, ‘‘सम्माननीय मुख्यमंत्री का रेस्पिरेटरी सपोर्ट और पैसिव फिजियोथेरैपी का इलाज चल रहा है. धीरेधीरे उन के स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है.’’ यह बुलेटिन इतना अस्पष्ट व अधूरा सा था कि कुछ लोगों ने कोर्ट में केस भी कर दिया कि सरकार मुख्यमंत्री की स्वास्थ्य की पूरी जानकारी दे. लेखक वसंथी कहते हैं, ‘‘इस चुप्पी की आशा थी. 30 साल पहले एमजीआर के बहुत निकट होने के बाद भी जयललिता को उन की गंभीर बीमारी का पूरा अंदाजा नहीं था.’’

दरअसल, आज भारतीयों को अपने नेताओं की हैल्थ के राज को राज रहने की आदत डाल लेनी चाहिए, विशेषरूप से जब उन की हालत खराब हो रही हो. ऐसा आजादी से पहले से चल रहा है. तत्कालीन मुसलिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना को भारत-पाक बंटवारे से एक साल पहले टीबी हुई थी. लैरी कौलिंस और डौमिनिक लपरी ‘फ्रीडम ऐट मिडनाइट’ में लिखते हैं, ‘‘अगर जिन्ना साधारण मरीज होते तो सारी उम्र सैनेटोरियम में रह जाते. वे आम मरीज नहीं थे, जिन्ना जानते थे कि अगर उन के हिंदू शत्रुओं को पता चल जाता कि वे मर सकते हैं, तो उन का राजनीतिक आउटलुक बदल जाता.’’

एक चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी वाराणसी में बीमार पड़ीं. 10 दिन दिल्ली के अस्पताल में रहीं. खबर इतनी ही बाहर आई कि उन्हें फीवर और डिहाइड्रेशन था, उन की पार्टी ने पहली बार उन की बीमारी की न्यूज नहीं छिपाई. अगस्त 2011 में कांग्रेस पार्टी के मुख्य प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी ने कहा था कि उन का औपरेशन हुआ है जो सफल हुआ. सर्जरी किसलिए हुई, यह नहीं बताया गया था.

दिल्ली के सब से बड़े हैल्थ सीक्रेट्स में से एक है, पूर्व सूचना और प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी की हैल्थ. इन्हें 2008 में हार्टअटैक के बाद कई साल लाइफ सपोर्ट पर रखा गया. प्रियरंजन दासमुंशी अभी भी अपोलो अस्पताल में हैं. उन की पत्नी दीपा, उन के स्वास्थ्य के बारे में प्रश्न पूछने पर कोई जवाब नहीं देतीं. उन का अस्पताल का बिल सरकार भरती है.

ब्रैंडिंग गुरु सुहेल सेठ कहते हैं, ‘‘दिल्ली और भारत में लोगों का मानना है कि हैल्थ और सैक्स की बात सार्वजनिक नहीं होनी चाहिए. बीमारी उन्हें आम इंसान बना देती है और उन्हें यह भी चिंता होती है कि बीमारी के  कारण कहीं उन्हें पार्टी से किनारे न कर दिया जाए.’’

इमेज कंसल्टैंट और कौलमनिस्ट दिलीप चेरियन कहते हैं, ‘‘नेताओं में ताकत होती है, बीमारी के मामलों में पार्टी सच सामने नहीं आने देती. अनिश्चितता पार्टी के लिए अच्छी नहीं होती, इसलिए पार्टी वाले कुछ नहीं बताते.’’ इस के विपरीत भाजपा आजकल अपने नेताओं के स्वास्थ्य से संबंधी हाल बता रही है. सुषमा स्वाराज ने पिछले महीने ट्वीट किया, ‘‘मैं किडनी फेलियर के कारण एम्स में हूं. इस समय मैं डायलिसिस पर हूं. किडनी ट्रांसप्लांट के लिए मेरे टैस्ट्स हो रहे हैं.’’ सुषमा अपने ट्रीटमैंट का हाल बताती रहीं. भाजपा की सांसद मीनाक्षी लेखी कहती हैं कि हर पार्टी का काम करने का अपना तरीका होता है.

अमेरिका में ऐसे मैडिकल डेटा की कोई कानूनी जरूरत नहीं है पर हाल के प्रैसिडैंट्स ऐसा करते हैं. मार्च 2016 में बराक ओबामा ने अपनी हैल्थ की 2 पेज की रिपोर्ट दी जिस में बेसिक सूचना के साथ कोलैस्ट्रौल स्तर के डिटेल्स भी थे. जौर्ज बुश ने भी 2006 में अपनी हैल्थ की 4 पेज की रिपोर्ट रिलीज की थी. फिर भी, लास एंजेल्स टाइम्स के अनुसार, अमेरिका के इतिहास में आधे से ज्यादा प्रैसिडैंट्स को सीरियस बीमारी थी और उन्होंने उसे छिपाया था.

दिलीप चेरियन और पूर्व रेल मंत्री व टीएमसी सांसद दिनेश त्रिवेदी मानते हैं कि राजनीतिज्ञों को अपने स्वास्थ्य के बारे में साफसाफ बताना चाहिए, पब्लिक फिगर को पारदर्शी होना चाहिए. अगर आप गरमी सहन नहीं कर सकते तो किचन से बाहर चले जाना चाहिए.

डा. जलील पारकर, जिन्होंने शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे का इलाज वर्ष 2000 में किया था और नवंबर 2012 में उन की मृत्यु की घोषणा भी उन्होंने की थी, कहते हैं, ‘‘कभीकभी नर्स, टैक्नीशियंस, सिक्योरिटी स्टाफ से गलत न्यूज लीक हो जाती हैं, बाल ठाकरे के समय मुझे मुंबई पुलिस कमिश्नर, आईबी दिल्ली से फोन आए क्योंकि राजनीतिक हलचल हो रही थी पर अंत में यह परिवार के फैसले पर निर्भर करता है.’’

दरअसल, पावर खोने का खतरा रहता है. भारत जैसे देश में जहां पार्टी अकसर एक व्यक्ति से बंधी रहती है, खतरा बढ़ जाता है. सो, बीमारियां राज बनी रहती हैं. पब्लिक कुछ भी कहती रहे, कुछ भी चाहती रहे, राजनीति में जनता की भावनाओं का क्या महत्त्व. जनता एक व्यक्ति की अंधभक्त बनी रहे तो बनी रहे, क्या और किसे फर्क पड़ता है. जनता की भावनाओं से हमेशा खिलवाड़ किया जाता रहा है, आगे भी किया जाता रहेगा.

एक औरत की तवायफ से बीवी बनने की कहानी

पेशे से ड्राइवर विपिन पांडे मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले का रहने वाला था. अकसर उसे सवारियां ले कर नागपुर जाना पड़ता था. यह रास्ता महज ढाई घंटे का था. नागपुर में सवारियां छोड़ कर वापस छिंदवाड़ा की सवारियों की बाट जोहता विपिन खाली समय में सैक्स की जरूरत को पूरा करने के लिए कोठे पर जाने लगा था. गंगाजमुना गली ‘संतरों का शहर’ कहे जाने वाले नागपुर की बदनाम गली है, जहां कोठों पर इफरात से देह धंधा होता है. अब से कुछ महीने पहले विपिन ऐसे ही एक कोठे पर गया, तो कोठे की मालकिन परवीन ने उसे पिंकी के पास भेज दिया.

जब विपिन पिंकी के पास पहुंचा, तो उसे ठगा सा देखता रह गया. चौड़ा माथा, बड़ीबड़ी आंखों के अलावा दुनियाभर की मासूमियत पिंकी के चेहरे पर उस ने देखी, तो वह अपने आने का मकसद ही भूल गया.

पिंकी ने आने वाले इस तगड़ेरोबदार नौजवान ग्राहक की हिचकिचाहट देखी, तो वह चौंक गई. वह तो यह मान कर चल रही थी कि अब यह ग्राहक अपने पैसों की कीमत वसूलने के लिए दूसरे ग्राहकों की तरह उस पर टूट पड़ेगा.

दोनों की नजरें मिलीं और ऐसी मिलीं कि वे एकदूसरे की आंखों से होते हुए दिलों में बस गए. प्यार का इजहार होते देर न लगी. दोनों ने बहुत देर तक कुछ इस तरह दिल की बातें कीं, मानो पहले से एकदूसरे को जानते हों.

विपिन जब वहां से जाने लगा, तो पिंकी अपने दिल और जज्बातों को काबू में नहीं रख पाई और उस का हाथ पकड़ कर बोली, ‘‘दोबारा आइएगा.’’

इस पर विपिन ने दरवाजे से पलटते हुए पिंकी को अपनी बांहों में भरा और जल्द ही आने का वादा भी किया.

पिंकी के दिल में हलका सा शक था कि कहीं विपिन बाहर जा कर उसे भूल न जाए और मुमकिन है कि यह उस की कोरी हमदर्दी रही हो. उधर विपिन के दिल का हाल भी बेहाल था. पहली मुलाकात में ही पिंकी उस के दिलोदिमाग पर छा गई थी.

वादे के मुताबिक विपिन दोबारा परवीन के कोठे पर गया और इस दफा भी पिंकी की फरमाइश की तो बुढ़ाती परवीन चौंकी नहीं, क्योंकि कोठों पर आने वाले ग्राहकों की इस तासीर को वह खूब समझती थी कि कई दफा ग्राहक जिस लड़की से संतुष्ट हो जाते हैं, फिर बारबार उसी की मांग करते हैं.

परवीन को कतई अंदाजा नहीं था कि उस के पिंजरे में बंद पिंकी नाम की मैना को इस तोते से इश्क हो गया है, जिस की इजाजत कोठों के सख्त उसूल नहीं देते हैं.

दर्द से भरी दास्तां

 दूसरी बार जब विपिन पिंकी के पास आया, तो उस की कहानी ने विपिन को भीतर तक झकझोर दिया. राजस्थान के बूंदी जिले के गांव शंकरपुरा के कंजर समुदाय में पैदा हुई पिंकी जब महज 15 साल की थी, तब उस के मांबाप की मौत हो गई थी. चूंकि उस के पिता ने 2 शादियां की थीं, इसलिए उस की सौतेली मां उसे अपने भाई राजा उर्फ ठेला के यहां ले आई.

गुजरबसर के लिए सौतेली मां देह धंधा करने लगी और राजा अपनी बहन की दलाली कर ग्राहक ढूंढ़ढूंढ़ कर लाने लगा, तो पैसों की बरसात होने लगी.

पिंकी को यह सब अच्छा नहीं लगता था. वह चाहती थी कि गुजारा तो मेहनतमजदूरी कर के भी किया जा सकता है, फिर यह गंदा धंधा क्यों?

जवान होती पिंकी पर हर किसी की नजर ठहर जाना कुदरती बात थी, पर सौतेली मां के पास आए ग्राहकों की नजरों का वह सामना नहीं कर पाती थी, जो सीधे उस के नाजुक अंगों पर जा पड़ती थीं.

पिंकी अब इस बात से डरने लगी थी कि कहीं मां और मामा उस से भी यह पेशा न कराने लगें. लेकिन खामोशी से यहां रहते हुए सबकुछ देखने और सहने के अलावा उस के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था.

एक दिन सौतेले मामा ने पिंकी को बताया कि अब उसे ग्वालियर में रहने वाले मौसा के यहां जाना है, तो पिंकी की खुशी का ठिकाना न रहा, क्योंकि इस गंदगी से उसे आजादी जो मिल रही थी.

लेकिन पिंकी का यह खयाल गलत निकला. दरअसल, सौतेले मामा ने उसे मौसा के हाथों 9 लाख रुपए में बेच दिया था.

मौसा पान सिंह ग्वालियर के रेशमपुरा इलाके में रहता था, जो देह धंधे के लिए बदनाम है. जल्द ही अपने 9 लाख रुपए वसूलने के लिए पान सिंह ने उस से धंधा कराना शुरू कर दिया, तो मासूम पिंकी समय से पहले ही सयानी हो गई.

कुछ महीने पिंकी अपने जिस्म के जरीए मौसा का कर्ज चुकाती रही, फिर एक दिन उसे पता चला कि अब उसे नागपुर जाना है, क्योंकि मौसा पान सिंह ने उसे वहां की मशहूर तवायफ परवीन के हाथों 15 लाख रुपए में बेच दिया है.

इस तरह पिंकी गंगाजमुना गली में आ कर वहां की रौनक बन गई. चूंकि वह कम उम्र और कसे बदन की थी, इसलिए उस के पास ग्राहकों की भीड़ उमड़ने लगी थी.

फिर मचा हंगामा

विपिन ने पिंकी की कहानी सुनी, तो वह और भी जज्बाती हो उठा. एक दिन मौका देख कर वह पिंकी को ले कर कोठे से भाग गया. दोनों बैतूल जिले के मुलताई इलाके में आ गए, जहां विपिन ने 3 मार्च, 2017 को उस से कोर्ट मैरिज कर ली.

किसी की बीवी बनने का पिंकी का सपना तो पूरा हो गया था, पर वह जानती थी कि परवीन के गुरगे उन्हें छोड़ेंगे नहीं. बात सच भी थी. पिंकी के भागने की खबर से तिलमिलाई परवीन ने बड़े पैमाने पर उसे ढूंढ़ने के लिए अपने आदमी लगा दिए थे.

पिंकी को ले कर विपिन भोपाल आ गया. वहां शिवाजी नगर इलाके में उस के मौसा प्रकाश शर्मा पुलिस महकमे में थे. मौसामौसी के सामने विपिन ने यह तो मान लिया कि उस ने नागपुर की रहने वाली पिंकी से लव मैरिज कर ली है, पर उस की पूरी हकीकत नहीं बताई.

प्रकाश शर्मा ने कुछ सोचसमझ कर दोनों को अपने घर पर रहने की इजाजत दे दी, तो दोनों की खुशी दोगुनी हो गई.

विपिन को भरोसा था कि कुछ दिनों की नाराजगी के बाद घर वाले भी पिंकी को बतौर बहू मंजूर कर लेंगे और इस तरह वह और पिंकी इज्जत की जिंदगी गुजारेंगे. उस का मौसेरा भाई गौरव अभी कालेज में पढ़ रहा था, जो नई भाभी को देख कर खुशी से फूला नहीं समाया था.

पिंकी अपने मौसा ससुर के यहां दिल लगा कर काम करती थी. उस का मकसद इन लोगों का दिल जीतने के अलावा खुद को एक अच्छी बहू साबित करना भी था.

महज 15 दिनों में ही पिंकी अपनी गुजरी जिंदगी को भूल चली थी. विपिन ने भी एक टै्रवल एजेंसी में ड्राइवर की नौकरी कर ली थी, ताकि वे दोनों मौसा पर बोझ न बनें.

23 मार्च, 2017 की सुबह थी. प्रकाश शर्मा के घर 2 बड़ी गाडि़यां आ कर रुकीं और उन में से 16 लोग उतरे और घर में घुस कर पिंकी को ढूंढ़ने लगे. पिंकी उस वक्त गौरव का टिफिन तैयार करने के लिए रसोईघर में काम कर रही थी. उन 16 लोगों में से कुछ आवाजें उसे जानीपहचानी लगीं, तो वह पीछे के दरवाजे से भाग खड़ी हुई. वे सब उस के पुराने नातेरिश्तेदार और परवीन के गुरगे ही थे.

उन लोगों ने गौरव और उस की मां को खूब मारा. प्रकाश अपने दफ्तर और विपिन नौकरी पर जा चुका था.

एक पुलिस वाले के यहां दिनदहाड़े मारपीट की वारदात होने से पड़ोसी बाहर आए, तो गुंडों ने उन्हें भी धमकाया और गौरव को अपने साथ गाड़ी में यह कहते हुए ले गए कि विपिन और पिंकी को दे कर इसे ले जाना.

इस वारदात की खबर से भोपाल में हड़कंप मच गया. गुंडे गौरव को ले कर ब्यावराराजगढ़ के रास्ते राजस्थान की तरफ भाग रहे हैं, यह जानकारी पुलिस वालों को गौरव के मोबाइल फोन की लोकेशन से मिलती रही, जिस पर गुंडों का ध्यान नहीं गया था.

मामला चूंकि पुलिस महकमे में काम कर रहे मुलाजिम के बेटे को अगवा किए जाने का था, इसलिए पुलिस वालों ने चीते सी फुरती दिखाई और इस पूरे गिरोह को ब्यावरा के पास घेर कर सभी को गिरफ्तार कर लिया. इन में पिंकी के मामा और मौसा भी शामिल थे.

भोपाल में जब हकीकत खुली, तो सुनने वाले हैरान रह गए कि विपिन ने एक तवायफ से शादी की है, जिस की वजह से गौरव को अगवा किया गया था.

मुजरिम गिरफ्तार कर जेल भेज दिए गए, पर पिंकी को ले कर तरहतरह की चर्चाएं होती रहीं. किसी ने विपिन की इस पहल को उस की बेवकूफी और नादानी बताया, तो कइयों ने उसे शाबाशी दी कि मर्द हो तो ऐसा, जिस ने जिंदगी और प्यार के सही माने समझे और एक मिसाल पेश की.

विपिन अभी भी इस बात पर टिका हुआ है कि वह पिंकी का साथ किसी भी सूरत में नहीं छोड़ेगा और उस से शादी की है तो निभाएगा भी. वहीं पिंकी को डर है कि जेल से बाहर आते ही परवीन के गुरगे उसे और विपिन को मार डालेंगे, इसलिए वे दोनों अब अलग कहीं रहने लगे हैं.

पढ़े लिखों पर भारी पड़ते अनपढ़

मार्च, 2017 के तीसरे या चौथे सप्ताह की बात है. छुट्टी का दिन होने की वजह से भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी जे.सी. मोहंती दोपहर को अपने सरकारी बंगले में बने औफिस में बैठे फाइलें देख रहे थे. उन की टेबल पर फाइलों का ढेर लगा था. वह राजस्थान में जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी के भूजल विभाग में अतिरिक्त मुख्य सचिव हैं. वह पानी के महकमे से जुड़े हैं और इस समय गर्मी का मौसम चल रहा है, इसलिए फाइलों की संख्या काफी हो गई थी. वह फाइल पर मातहत अधिकारियों द्वारा लिखी गई टिप्पणियों को ध्यान से पढ़ रहे थे कि अचानक उन के मोबाइल फोन की घंटी बजी. उन्होंने मोबाइल के स्क्रीन पर आने वाले नंबर को सरसरी तौर पर देखा और फिर स्विच औन कर के कहा, ‘‘हैलो.’’

‘‘सर, मैं स्टेट बैंक औफ इंडिया से बोल रहा हूं.’’ फोन करने वाले ने कहा.

‘‘हां, बताइए.’’ श्री मोहंती ने फाइल पर नजरें गड़ाए हुए ही कहा.

‘‘सर, आप को पता ही होगा कि एक अप्रैल से स्टेट बैंक औफ बीकानेर एंड जयपुर  सहित देश के 5 बैंकों का एसबीआई में विलय हो रहा है. आप का खाता एसबीबीजे में है. आप के एसबीबीजे के एटीएम कार्ड का वेरिफिकेशन करना है, ताकि उसे एसबीआई से जोड़ा जा सके.’’ दूसरी ओर से फोन करने वाले ने नपेतुले शब्दों में कहा.

बात करने वाले का लहजा सभ्य और अधिकारी जैसा था. इसलिए जे.सी. मोहंती ने पूछा, ‘‘वह तो ठीक है, लेकिन इस में मुझे क्या करना है?’’

‘‘सर, आप अपने एटीएम कार्ड के नंबर बता दीजिए.’’ फोन करने वाले ने कहा.

एसबीबीजे के एसबीआई में विलय की बात श्री मोहंती को पता थी, क्योंकि रोज ही मीडिया में इस की खबरें आ रही थीं. इसलिए उन्होंने टेबल पर ही रखे अपने पर्स से स्टेट बैंक औफ बीकानेर एंड जयपुर का एटीएम कार्ड निकाल कर उस पर सामने की ओर लिखे बारह अंकों का नंबर फोन करने वाले को बता दिया.

दूसरी ओर से फोन करने वाले ने एटीएम कार्ड नंबर नोट करते हुए दोबरा बोल कर कन्फर्म करते हुए कहा, ‘‘थैंक्यू सर, आप का एक मिनट और लूंगा, आप को एटीएम कार्ड के पीछे लिखा सीवीवी नंबर भी बताना होगा.’’

जे.सी. मोहंती ने सीवीवी नंबर भी बता दिया. इस के बाद फोन कट गया तो वह फिर से अपने काम में व्यस्त हो गए. कुछ देर बाद उन के मोबाइल पर एक मैसेज आया. उन्होंने मैसेज देखा तो उस में ओटीपी नंबर था. उसे उन्होंने अपनी डायरी में नोट कर लिया.

मैसेज आने के करीब 10 मिनट बाद उन के मोबाइल पर एक बार फिर उस व्यक्ति का फोन आया. उस ने कहा, ‘‘सर, आप को एक बार और कष्ट दे रहा हूं. आप के मोबाइल पर ओटीपी नंबर का मैसेज आया होगा. इसी ओटीपी नंबर से आप के एटीएम कार्ड और बैंक खाते का वेरिफिकेशन किया जाएगा. कृपया आप वह ओटीपी नंबर बता दीजिए, ताकि आप के खाते और एटीएम कार्ड को वेरिफाई कर के स्टेट बैंक औफ इंडिया से जोड़ कर अपडेट किया जा सके.’’

कुछ देर पहले ही अपनी पर्सनल डायरी में लिखा ओटीपी नंबर जे.सी. मोहंती ने सहज भाव से फोन करने वाले को बता दिया और अपने काम में व्यस्त हो गए. शासन सचिवालय में आसीन आईएएस अधिकारियों का जीवन बहुत व्यस्त होता है. दिनभर मीटिंगों और फाइलों में सिर खपाना पड़ता है.

कभी संबंधित मंत्री बुला लेते हैं तो कभी मुख्य सचिव. मुख्यमंत्री औफिस से भी दिन में 2-4 बार किसी न किसी फाइल के बारे में पूछताछ की जाती है. वैसे भी उन दिनों राजस्थान विधानसभा का बजट सत्र चल रहा था, इसलिए भूजल विभाग के सवालों के जवाब के लिए उन का विधानसभा में उपस्थित रहना जरूरी था.

इन्हीं व्यस्तताओं के बीच जे.सी. मोहंती के मोबाइल पर पचासों मैसेज ऐसे आए, जिन्हें वह खोल कर देख या पढ नहीं सके. 3 अप्रैल, को वह सचिवालय के अपने औफिस में बैठे थे. जिस समय वह थोड़ा फुरसत में थे, तभी उन के मोबाइल पर एक मैसेज आया. उन्होंने वह मैसेज पढ़ा तो हैरान रह गए. मैसेज के अनुसार उन के बैंक खाते से 30 हजार रुपए निकाले गए थे.

जबकि बैंक से या एटीएम से उन्होंने कोई पैसे नहीं निकाले थे, इसलिए वह परेशान हो उठे. वह तुरंत शासन सचिवालय में ही स्थित स्टेट बैंक औफ बीकानेर एंड जयपुर की शाखा पर पहुंचे और बैंक मैनेजर को पूरी बात बताई. बैंक मैनेजर ने मामले की गंभीरता को समझते हुए तुरंत जे.सी. मोहंती के बैंक खाते की डिटेल निकलवाई, जिसे देख कर श्री मोहंती को झटका सा लगा. उन के बैंक खाते से 22 मार्च से 3 अप्रैल के बीच अलगअलग समय में 2 लाख 73 हजार रुपए निकाले गए थे.

उन के मोबाइल पर बैंक की ओर से इस निकासी के मैसेज भी भेजे गए थे, पर व्यस्तता की वजह से वह उन मैसेजों को देख नहीं सके थे. खाते से करीब पौने 3 लाख रुपए निकलने की डिटेल देख कर जे.सी. मोहंती को करीब 15 दिनों पहले मोबाइल पर आए उस फोन की याद आ गई, जिस में खुद को बैंक अधिकारी बता कर किसी आदमी ने उन से एटीएम कार्ड का नंबर, सीवीसी नंबर और ओटीपी नंबर मांगा था.

जे.सी. मोहंती को समझते देर नहीं लगी कि वह साइबर ठगों द्वारा ठगी का शिकार हो गए हैं. उन के साथ औनलाइन ठगी की गई है. उन्हें दुख इस बात का था कि सितंबर, 2016 में एक बार और उन के साथ साइबर ठगी हो चुकी थी. उस समय उन के क्रेडिट कार्ड से विदेश में 86 हजार रुपए की शौपिंग की गई थी. जयपुर के थाना अशोकनगर में इस की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी. लेकिन ठगों का पता नहीं चल सका था.

इस औनलाइन ठगी से जे.सी. मोहंती परेशान हो उठे थे. उन्होंने बैंक मैनेजर से पैसों की निकासी रोकने को कहा ही नहीं, बल्कि बैंक की जरूरी कागजी खानापूर्ति भी की, ताकि औनलाइन ठगी करने वाले भविष्य में उन के खाते से पैसे न निकाल सकें. इस के बाद अपने औफिस पहुंच कर उन्होंने पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल को फोन कर के अपने साथ हुई साइबर ठगी की जानकारी दी.

जे.सी. मोहंती के साथ हुई ठगी की बात सुन कर संजय अग्रवाल हैरान रह गए. हैरानी की बात यह थी कि राजस्थान पुलिस और विभिन्न बैंकों की ओर से अकसर समाचार पत्रों, इलैक्ट्रौनिक और डिजिटल मीडिया द्वारा रोजाना लोगों को औनलाइन ठगी के बारे में जागरूक करने के लिए बताया जा रहा है कि किसी भी व्यक्ति को फोन पर अपने एटीएम कार्ड या बैंक खाते की डिटेल कतई न दें.

पुलिस और बैंकों की इतनी कवायद के बावजूद भी आम आदमी रोजाना इन ठगों का शिकार हो रहे हैं, लेकिन अगर कोई सीनियर आईएएस अफसर इस तरह की ठगी का शिकार हो जाए तो ताज्जुब होगा ही. संजय अग्रवाल ने जे.सी. मोहंती को रिपोर्ट दर्ज कराने की सलाह देते हुए साइबर ठगों को जल्दी ही पकड़ने का आश्वासन दिया.

मूलरूप से ओडि़सा के रहने वाले राजस्थान कैडर के सन 1985 बैच के आईएएस अधिकारी जे.सी. मोहंती ने उसी दिन जयपुर में शासन सचिवालय के पास स्थित थाना अशोकनगर में अपने साथ हुई इस ठगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी. औनलाइन ठगी का यह मात्र एक उदाहरण है. ऐसी ठगी राजस्थान सहित देश के लगभग हर राज्य में रोजाना सौ-पचास लोगों के साथ हो रही है. राजस्थान में सन 2016 में साइबर क्राइम के 907 मुकदमे दर्ज हुए थे, जिन में 530 मुकदमे सिर्फ जयपुर शहर में दर्ज हुए थे.

मुकदमों के दर्ज होने के बाद जांच में सामने आया कि साइबर ठग खुद को बैंक मैनेजर बता कर लोगों के मोबाइल पर फोन कर के कहते हैं कि ‘आप का एटीएम कार्ड बंद हो रहा है या आप के एटीएम कार्ड की क्रय करने की सीमा बढ़ाई जा रही है अथवा आप के एटीएम कार्ड को आधार कार्ड से लिंक किया जा रहा है.’

किसी भी व्यक्ति से ये ठग मोबाइल फोन पर कहते हैं कि ‘आप का एटीएम कार्ड पुराना हो गया है. उस के बदले नया कार्ड जारी किया जा रहा है, इसलिए आप को एटीएम कार्ड का नया पासवर्ड दिया जा रहा है. आप ने पिछली बार एटीएम से कब रकम निकाली थी? क्या आप ने नए केवाईसी या आधार कार्ड को लिंक नहीं किया है?’

बैंक वालों की तरह तकनीकी बातें कह कर ये ठग मोबाइल फोन पर ही लोगों से एटीएम कार्ड का नंबर, सीवीसी नंबर और ओटीपी नंबर पूछ लेते हैं. इस के बाद ये साइबर ठग स्मार्ट फोन या कंप्यूटर के माध्यम से मनी ट्रांसफर सौफ्टवेयर द्वारा उस व्यक्ति के खाते की रकम निकाल लेते हैं.

राजस्थान में इस तरह की लगातार हो रही ठगी की वारदातों का पता करने के लिए जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने अतिरिक्त पुलिस आयुक्त प्रफुल्ल कुमार के निर्देशन तथा पुलिस उपायुक्त (क्राइम) डा. विकास पाठक के नेतृत्व में क्राइम ब्रांच की तकनीकी शाखा एवं संगठित अपराध शाखा के अधिकारियों की एक टीम बनाई.

इस टीम ने जांच शुरू की तो पता चला कि इस तरह की वारदातें करने वाले महाराष्ट्र के पुणे जिले के तलेगांव इलाके में रह रहे हैं. टीम ने उन अपराधियों को चिन्हित कर उन की निगरानी शुरू की तो पता चला कि ये ठग कौल सैंटर की तर्ज पर बैंक अधिकारी बन कर रोजाना सैकड़ों लोगों को फोन करते हैं और उन से एटीएम कार्ड का नंबर आदि पूछ कर औनलाइन ठगी करते हैं.

कई दिनों की निगरानी के बाद क्राइम ब्रांच ने महाराष्ट्र के पुणे के एसपी (ग्रामीण) सुवेज हक तथा क्राइम ब्रांच के अधिकारियों की मदद से 27 मार्च को 5 लोगों को महाराष्ट्र के तलेगांव दाभाड़े से गिरफ्तार किया. इन में झारखंड के जिला जामताड़ा के करमाटांड निवासी 3 सगे भाई यूसुफ, मुख्तार एवं अख्तर शामिल थे. यूनुस के इन तीनों बेटों में यूसुफ सब से बड़ा और अख्तर सब से छोटा था.

इन के अलावा महाराष्ट्र के पुणे के तलेगांव दाभाड़े निवासी संजय सिंधे और शैलेश को भी गिरफ्तार किया गया था. इन के पास से पुलिस ने 10 छोटे और 4 बड़े मोबाइल फोन, 15 सिम, 7 एटीएम कार्ड और 9 लाख 86 हजार  500 रुपए बरामद किए थे. इन लोगों ने पिछले साल जयपुर के रहने वाले गोपाल बैरवा को फोन कर के उन से 29 हजार 600 रुपए ठगे थे. इस का मुकदमा जयपुर पूर्व के थाना बस्सी में दर्ज था.

गिरफ्तार अभियुक्तों को पुलिस जयपुर ले आई. इन से की गई पूछताछ में पता चला कि झारखंड के जामताड़ा जिले के करमाटांड के रहने वाले तीनों ठग भाइयों ने अपने गांव के ही दूसरे लोगों से बैंक अधिकारी बन कर औनलाइन ठगी करना सीखा और फर्जी आईडी से दर्जनों सिम हासिल कर के आसान तरीके से मोटा पैसा कमाने लगे.

ये लोग ठगी के लिए फर्जी आईडी से लिए गए सिम और दर्जनों मोबाइल का उपयोग करते थे, ताकि पुलिस इन तक पहुंच न सके. इन लोगों ने फर्जी मोबाइल सिमों पर ई-वौलेट भी रजिस्टर्ड करा रखे थे, जिन में शिकार हुए आदमी के बैंक खाते से औनलाइन पैसे ट्रांसफर करते थे. इस के बाद ये औनलाइन शौपिंग करते या ई-वौलेट के माध्यम से उस पैसे को अपने बैंक खाते में भेज देते. ये ठगी गई रकम से ई-वौलेट के जरिए मोबाइल भी रिचार्ज करते थे. इस के लिए ये मोबाइल की दुकान चलाने वालों से मिलीभगत कर उन्हें 30 से 40 प्रतिशत तक कमीशन का लालच देते थे. इस तरह मोबाइल रिचार्ज कर दुकानदारों से मिलने वाली रकम को ये लोग अपने घर वालों के बैंक खाते में जमा कराते थे.

देश भर में हो रही औनलाइन ठगी की वारदातों को देखते हुए झारखंड सहित विभिन्न राज्यों की पुलिस ने झारखंड के जामताड़ा इलाके में रहने वाले साइबर ठगों पर शिकंजा कसा तो करमाटांड के रहने वाले तीनों ठग भाई अपने साथियों संजय सिंधे और शैलेश की मदद से इसी साल फरवरी से पुणे के तलेगांव इलाके में किराए के एक मकान में रहने लगे. उसी मकान से ये पांचों ठगी की वारदात करते थे.

पूछताछ में पता चला कि इन पांचों अभियुक्तों ने पिछले एक साल में राजस्थान सहित देश के 23 राज्यों में 85 हजार से अधिक फोन किए थे. लेकिन ये मुख्य रूप से राजस्थान के लोगों को अपना निशाना बनाते थे. इस का पता इस से चलता है कि 85 हजार फोन में से लगभग 50 हजार फोन राजस्थान के सभी 33 जिलों में किए गए थे.

राजस्थान का ऐसा कोई जिला नहीं बचा था, जहां इन लोगों ने ठगी न की हो. अकेले जयपुर शहर में ही इन लोगों ने करीब 5 हजार फोन किए थे. पुलिस ने इन से जो करीब 10 लाख रुपए बरामद किए थे, ये रुपए एक महीने का कलेक्शन बताया गया था.

तीनों ठग भाइयों ने धोखाधड़ी से करोड़ों रुपए कमाए हैं. ठगी की रकम को इन्होंने करीब 25 बैंक खातों और 50 से अधिक ई-वौलेट में जमा कराई थी. इन के 10 बैंक खातों की डिटेल खंगाली जा रही है. इन में 4 खाते प्राइवेट बैंकों और 6 सरकारी बैंकों में हैं. इन में 4 बैंक खाते केरल में हैं. इन सभी खातों में 58 लाख 18 हजार रुपए जमा हुए थे, लेकिन इन में एक जनवरी, 2017 से 23 मार्च तक 8 लाख 49 हजार रुपए ही बचे थे.

जयपुर पुलिस ने इस से पहले औनलाइन ठगी के एक अन्य मामले में 23 मार्च को एक अभियुक्त दिनेश मंडल को मुंबई से वहां की पुलिस की मदद से गिरफ्तार किया था. मूलरूप से झारखंड के जामताड़ा का रहने वाला दिनेश मंडल मुंबई में वर्ली स्थित जनता कालोनी के कोलीकम में रह कर औनलाइन ठगी कर रहा था.

उस ने पिछले साल जयपुर के विनोद कुमार पाल को फोन कर के खुद को बैंक अधिकारी बता कर एटीएम कार्ड और ओटीपी नंबर पूछ कर उन के खाते से 7 हजार रुपए औनलाइन निकाल लिए थे. इस का मुकदमा जयपुर पश्चिम के थाना सदर में दर्ज हुआ था. पुलिस ने दिनेश मंडल से 4 मोबाइल फोन और 7 सिम बरामद किए थे. उस से की गई पूछताछ में पता चला कि उस ने ठगी के लिए मोबाइल फोन से लगभग 29 सौ लोगों को फोन किए थे.

जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने लगातार हो रही औनलाइन ठगी की वारदातों को देखते हुए काफी समय पहले अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (प्रथम) प्रफुल्ल कुमार के निर्देशन एवं पुलिस उपायुक्त (क्राइम) डा. विकास पाठक के नेतृत्व में क्राइम ब्रांच की विशेष टीम गठित कर इस टीम को ऐसे अपराधियों का पता लगाने का जिम्मा सौंपा था.

इस टीम ने ठगी के एकएक मामले का अध्ययन कर अपराधियों की कार्यप्रणाली समझी. उस के बाद तकनीकी माध्यम से उन मोबाइल नंबरों का पता लगाया, जिन से लोगों को ठगी का शिकार बनाया गया था. व्यापक जांचपड़ताल के बाद पुलिस ने झारखंड से 3 ठगों को गिरफ्तार किया था.

इस से पहले इसी साल 24 फरवरी को सब से पहले सत्यम राय को पकड़ा गया. वह झारखंड के देवघर के खाजुरिया बसस्टैंड के पास स्थित विकासनगर का रहने वाला था. फिलहाल वह पश्चिम बंगाल के कोलकाता के टालीगंज में के.एम. लक्षकार रोड पर रह रहा था. उस ने पिछले साल जयपुर के राजेंद्र गहलोत को अपना शिकार बनाया था.

20 साल के सत्यम राय ने फोन पर खुद को बैंक अधिकारी बता कर राजेंद्र गहलोत से एटीएम कार्ड और ओटीपी नंबर पूछ कर उन के खाते से 43 हजार 391 रुपए औनलाइन निकाल लिए थे. इस ठगी का मुकदमा जयपुर दक्षिण के थाना ज्योतिनगर में दर्ज है.

पूछताछ में सत्यम राय ने बताया था कि राजेंद्र गहलोत से ठगी कर के उस ने 21 हजार 891 रुपए का सैमसंग गैलेक्सी ए 5 एड्रौयड मोबाइल फोन औनलाइन खरीदा था. बाकी रकम उस ने अलगअलग गेटवे के माध्यम से बैंक खाते तथा वौलेटों में डाली थी. मोबाइल फोन आ गया तो उसे ओएलएक्स पर आईफोन एस-5 से एक्सचैंज कर लिया था.

कोलकाता से बीबीए की पढ़ाई करने के बाद सत्यम राय ने हिंदी, अंग्रेजी, भोजपुरी और बंगला सहित अन्य भाषाएं सीखीं, ताकि पूरे देश में विभिन्न बोलीभाषाओं में बात कर लोगों को झांसे में ले सके. पूछताछ में उस ने बताया था कि वह ठगी के जरिए मिली रकम के एक हिस्से से औनलाइन शौपिंग करता था, जिसे वह बेच कर पैसे खड़े कर लेता था.

पुलिस ने सत्यम राय से सैमसंग गैलेक्सी ए-7, आईफोन एस-5 और सैमसंग गैलेक्सी ए-5 फोन बरामद किए थे. उस से पूछताछ और उस के मोबाइल फोन की जांच से पता चला कि उस ने देश के अनेक राज्यों में ठगी के लिए कुल 2860 लोगों को फोन किए थे.

जयपुर के सूरज प्रजापति से 55 हजार रुपए की इसी तरह की गई ठगी में पुलिस ने सागरदास और उस के साले विक्कीदास को 26 फरवरी, 2017 को गिरफ्तार किया था. ये दोनों ठग झारखंड में जामताड़ा जिले के अंबेडकर चौक पंडेडीह के रहने वाले थे. पुलिस ने इन से 5 मोबाइल फोन बरामद किए थे. इन मोबाइल फोनों में फर्जी आईडी पर जारी किए गए सिम मिले थे. जीजासाले ने अलगअलग राज्यों में ठगी के लिए करीब 779 लोगों को फोन किए थे.

जयपुर निवासी राजेश कुमार वर्मा से बैंक अधिकारी बन कर 21 हजार 566 रुपए की  औनलाइन ठगी करने के मामले में जयपुर पुलिस ने झारखंड के जामताड़ा जिले के करमाटांड थाना के धरवाड़ी गांव के रहने वाले जयकांत मंडल को मार्च, 2017 के पहले सप्ताह में गिरफ्तार किया था.

पुलिस ने उस से 3 मोबाइल फोन, 4 सिम और 4 एटीएम कार्ड बरामद किए थे. वह झारखंड के धनबाद के देवली गोविंदपुर में रह कर आईटीआई कर रहा था. उस ने कई भाषाएं सीख रखी थीं. जांच में पता चला कि जयकांत ने ठगी के लिए विभिन्न मोबाइल नंबरों से अलगअलग राज्यों में ठगी के लिए करीब 9068 लोगों को फोन किए थे.

जांच में पता चला है कि झारखंड के जिला जामताड़ा के करमाटांड सहित कुछ इलाके साइबर अपराधियों के गढ़ हैं. कहा जाता है कि करमाटांड के झिलुआ गांव के रहने वाले सीताराम मंडल ने सन 2008-09 में बैंक अधिकारी बन कर लोगों से औनलाइन ठगी के साइबर अपराध को जन्म दिया था. इस का जाल अब पूरे जामताड़ा जिले में फैल चुका है. आजकल वहां 150 से अधिक गिरोह काम कर रहे हैं, जिन में 20 से 30 साल के युवा शामिल हैं.

इन में कुछ गिरोह ऐसे भी हैं, जिन्होंने वेतन और कमीशन के आधार पर दूसरे युवकों को नौकरी दे रखी है. कुछ पुराने ठग नई पीढ़ी के युवाओं को औनलाइन ठगी की ट्रेनिंग देते हैं और इस के बदले में मोटा मेहनताना वसूलते हैं. इन गिरोहों ने बैंक अधिकारी बन कर पूरे देश में अब तक कई अरब रुपए की ठगी की है.

मजे की बात यह है कि इन में ज्यादातर ठग ज्यादा पढ़ेलिखे नहीं हैं. लेकिन देश के अलगअलग राज्यों की भाषाएं सीख कर ये लोगों को ठग रहे हैं. देश में ऐसा कोई वर्ग नहीं है, जो इन की ठगी का शिकार न हुआ हो.

केंद्रीय मंत्री से ले कर, विभिन्न राज्यों के मंत्रियों, आईएएस एवं आईपीएस अधिकारियों, जज, डाक्टर, प्रोफेसर, आयकर अधिकारी, इंजीनियर, चार्टर्ड एकाउंटैंट, बिजनेसमैन सभी इन की ठगी का शिकार हो चुके हैं, जबकि इन लोगों को कहा जाता है कि ये अपनी बुद्धि और वाकचातुर्य के बल पर देश को चला रहे हैं.

आम आदमी को तो ये ठग कुछ ही मिनट में बातों में उलझा कर उस का एटीएम कार्ड और ओटीपी नंबर आदि हासिल कर लेते हैं. इन ठगों ने केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री, बांका के जिला जज, एयरपोर्ट अथौरिटी के एजीएम सहित तमाम बडे़बडे़ अधिकारियों को ठगा है.

साइबर ठगी में लगे तमाम लड़के उच्च शिक्षा भी हासिल कर सूचना प्रौद्योगिकी में दक्ष हो रहे हैं, ताकि लोगों को उन के हिसाब से हैंडल किया जा सके. जामताड़ा में साइबर क्राइम की शुरुआत एसएमएस से मोबाइल फोन का बैलेंस उड़ा कर दूसरों को सस्ती दरों पर मोबाइल फोन का बैलेंस बेचने से हुई थी. इस के बाद 8-9 सालों में यह जिला पूरे देश में चर्चित हो चुका है.

जामताड़ा इलाके से जब मोबाइल फोन से बहुत ज्यादा फोन किए जाने लगे तो मोबाइल कंपनियों को मोटी कमाई होने लगी. नेटवर्क की समस्या दूर करने के लिए मोबाइल कंपनियों ने वहां नए टौवर लगवा दिए, जिस से वहां नेटवर्क अच्छा हो गया. इस से ठगों का काम और ज्यादा आसान हो गया.

ठगी की रकम से ठग ऐशोआराम की जिंदगी जीते हैं. उन के पास आलीशान मकान और लग्जरी गाडि़यां हैं. सड़कें खराब होने से गाडि़यां चलाने में परेशानी हुई तो इन ठगों ने सड़कें भी खुद ही बनवा लीं. अब ये अपराधी खुद को भारतीय रिजर्व बैंक का अधिकारी बता कर ठगी करने लगे हैं. एटीएम रिन्यू करने, उस की वैलिडिटी बढ़ाने एवं आधार कार्ड से जोड़ने के बहाने तो कई सालों से चल रहे हैं.

जामताड़ा इलाके में रोजाना किसी न किसी राज्य की पुलिस साइबर ठगों की तलाश में पहुंचती रहती है. इसलिए अब यहां के ठग थोड़ेथोड़े समय के लिए दूसरे राज्यों में जा कर अपना  ठगी का धंधा करते हैं.

जामताड़ा से पिछले 2 सालों में 268 साइबर अपराधी गिरफ्तार किए गए हैं. इन से 16 सौ से ज्यादा मोबाइल फोन, 176 लग्जरी कारें और करोड़ों रुपए बरामद किए गए हैं.  जयपुर पुलिस की ओर से देवघर से गिरफ्तार मिथलेश ने पुलिस को बताया कि वह अपना एसबीआई का बैंक एकाउंट साइबर ठगों को किराए पर देता था. इस के बदले वह खाते में जमा होने वाली रकम से 20 प्रतिशत हिस्सा लेता था.

भले ही अपराधी पकड़े जा रहे हैं, लेकिन साइबर ठगी बंद होने का नाम नहीं ले रही है. पढ़लिख कर आदमी बुद्धिमान हो जाता है, लेकिन जामताड़ा के अनपढ़ या मामूली शिक्षित अपराधी उन लोगों की आंखों से भी काजल चुरा लेते हैं, जो खुद को सब से ज्यादा समझदार समझते हैं.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

प्रग्रति अग्रवाल

औरत बनना आसान नहीं : अली असगर

फिल्म और टैलीविजन के कलाकार व कौमेडियन अली असगर किसी परिचय के मुहताज नहीं हैं. वे ‘द कपिल शर्मा शो’ में ‘नानी’ के किरदार में खूब दिखाई दिए हैं. अली असगर ने ऐक्टिंग की दुनिया में साल 1998 से ले कर अब तक का लंबा सफर तय किया है. हालांकि शुरू में उन का ऐक्टिंग से दूरदूर तक कोई लेनादेना नहीं था. न तो उन के परिवार में कोई इस क्षेत्र में था और न ही अली असगर ने कभी ऐक्टिंग सीखी थी.

अली असगर के पिता रैस्टोरैंट कारोबारी थे और अली असगर भी इसी क्षेत्र में अपना कैरियर बनाने की तैयारी कर चुके थे. लेकिन उन की मंजिल ऐक्टिंग की दुनिया में उन का इंतजार कर रही थी, इसलिए उन्होंने होटल मैनेजमैंट की डिगरी लेने के बाद विदेश में नौकरी के औफर को छोड़ कर दोस्तों के साथ शौकिया तौर पर ऐक्टिंग करने की सोची. धीरेधीरे उन्हें कामयाबी व पहचान दोनों मिलती गईं. उन्होंने न केवल गंभीर किरदार निभाए, बल्कि स्टैंडअप कौमेडी में भी अपना सिक्का जमाया. पेश हैं, अली असगर से हुई बातचीत के खास अंश:

क्या आप ने ऐक्टिंग करने के बारे में कभी कुछ गंभीरता से सोचा था?

नहीं, कभी नहीं सोचा था. सोचा कुछ और था, बन कुछ और गया. दोस्तों के साथ टैलीविजन पर ऐक्टिंग के जो औफर मिलते गए, वे करता गया. मेरा पहला टैलीविजन शो दूरदर्शन पर ‘एक दो तीन चार’ था.

टैलीविजन इंडस्ट्री में खुद की पहचान बनाने में आप को कब कामयाबी मिली?

मेरे कैरियर का टर्निंग प्वौइंट टैलीविजन सीरियल ‘कहानी घरघर की’ था, जिस में मैं ने कमल अग्रवाल नामक किरदार निभाया था. यह मेरे लिए बहुत बड़ा प्लेटफार्म साबित हुआ. लोग मुझे एक गंभीर ऐक्टर के रूप में जाननेपहचानने लगे थे.

शुरुआती दिनों में आप टैलीविजन और फिल्मों में जो किरदार निभा रहे थे, क्या उन से संतुष्ट थे?

संतुष्ट तो था, लेकिन मैं फिल्मों में जैसे किरदार निभाना चाहता था, वैसे कभी नहीं मिले. जो ख्वाहिशें मैं बतौर एक ऐक्टर बड़े परदे पर पूरी होते देखना चाहता था, उस के औफर मुझे टैलीविजन पर मिले. लेकिन मैं ने ऐसा कभी नहीं सोचा था कि सिर्फ फिल्में या सिर्फ टैलीविजन ही करूंगा. मेरे पास जो भी काम आता गया, मैं वह करता गया.

ज्यादा मेहनत फिल्मों में है या टैलीविजन पर?

टैलीविजन में समय ज्यादा देना पड़ता है. आजकल टैलीविजन पर डेली सोप ही ज्यादा चल रहे हैं और अगर कोई कलाकार सीरियल कर रहा है, तो 30 दिनों में समझो 40 दिनों का काम करना पड़ता है.

इस मामले में फिल्मों में थोड़ा रिलैक्स मिल जाता है. वहां शैड्यूल खत्म हो जाता है. मगर टैलीविजन का शैड्यूल कभी खत्म ही नहीं होता.

सीरियल ‘कहानी घरघर की’ के बाद आप काफी लंबे समय से किसी दूसरे सीरियल में दिखाई नहीं दिए. इस की क्या वजह रही?

सच कहूं, तो मैं ने काम किया नहीं. इस सीरियल के तुरंत बाद ‘कौमेडी सर्कस’ शुरू हो गया था और इसी तरह के शो चलने भी लगे थे. इसी बीच मैं ऐंकरिंग भी करने लगा था. मुझे अलगअलग तरह के किरदार निभाने का मौका मिलता गया. मैं ने 4-5 साल पहले एक सीरियल किया था ‘जीनी और जूजू’. इस के बाद कुछ समय पहले एक शो किया था ‘वह तेरी भाभी है पगले’, जो सिर्फ 6 महीने चला था.

सच तो यह है कि टैलीविजन में अब कंटैंट नहीं रहा. मुझे तो अभी से लगने लगा है कि टैलीविजन का मौजूदा दौर भी बदलने वाला है, क्योंकि आजकल सब डिजिटल हो रहा है. आज किसी के पास इतना समय नहीं है कि वह टैलीविजन के सामने ज्यादा देर बैठे. जिंदगी में भागदौड़ बहुत ज्यादा हो गई है.

आप को कौमेडी करने में ज्यादा मजा आता है या गंभीर किरदार निभाने में?

दोनों का ही अपना एक अलग मजा है. गंभीर किरदार स्पाइसी फूड है, तो कौमेडी स्वीट डिश है. शरीर को हर तरह के खाने की जरूरत होती है.

कहते हैं कि लोगों को रुलाना आसान है, हंसाना मुश्किल. इस बात में कितनी सचाई है?

दोनों ही काम मुश्किल हैं.

‘द कपिल शर्मा शो’ में ‘नानी’ का किरदार निभाने से पहले आप कितनी तैयारी करते थे?

काफी तैयारी करनी पड़ती थी. दरअसल, हर किरदार को बनाने के पीछे कई लोग होते हैं, जैसे राइटर, क्रिएटिव टीम व शो से जुड़े तमाम लोग. सब की मेहनत होती है. औरत बनना आसान नहीं है.

भोपाल में जब किन्नरों ने बिखेरे हुस्न के जलवे

साल भर किन्नरों को नफरत और हिकारत से देखते रहने वाले लोगों की बैचेनी और दीवानगी का आलम यह था कि वे दोपहर से ही देश का यह इकलौता जुलूस देखने सड़कों पर अपने लिए जगह ढूंढने लगे थे जहां से नजर भर कर इसका लुत्फ उठाया जा सके. मौका था भोपाल में हर साल निकलने बाले भुजरियों या कजलियों के विसर्जन का, जिसे एक रिवाज की शक्ल में किन्नर ही अंजाम देते हैं. इस जुलूस में इस बार भी किन्नरों ने अपने हुस्न के ऐसे जलवे सड़कों पर बिखेरे कि देखने वाले दिल थामे रहे. किन्नरों की अदाएं फिल्मी हीरोइनों को भी मात कर रहीं थीं और वे रोज के मुकाबले खूबसूरत भी नजर आ रहे थे. इस खास जलसे के लिए किन्नर तैयारियां भी खास ही करते हैं, कुछ ब्यूटीपार्लर जाकर सजने संवरने पर हजारों रुपये खर्च करते हैं तो कई छांट छांट कर ऐसी सेक्सी ड्रेस पहनते हैं, जिनसे नाजुक अंग ढकें कम दिखें ज्यादा.

किन्नर, लोगों को लुभाने के अपने मकसद में कामयाब भी रहे. पुराने भोपाल के पीर गेट से लेकर कर्बला जहां भुजरियों का विसर्जन होता  है तक मनचलों का हुजूम इस जुलूस के पीछे पीछे ऐसे चला मानों इसे पूरा नहीं देखा तो जिंदगी बेकार है. बच्चे तो बच्चे बूढ़ों ने भी नौजवानों के साथ जमकर सीटियां बजाईं और किन्नरों के साथ ठुमके भी लगाए. लोग किन्नरों को नजदीक से देखने और छूने को इतने उतावले थे कि जुलूस के दौरान पुलिस वालों को कई दफा लाठिया भी उन पर भांजनी पड़ीं, जिस पर इन दीवानों ने कोई एतराज नहीं जताया.

करीना कपूर, कैटरीना कैफ, आलिया भट्ट जैसे दिख रहे किन्नरों ने फिल्मी गानों पर बेहतरीन डांस भी पेश किया. घटा घिर घिर आई …और जरा ठहरो बलमा आधी रात होने दो …सरीखे गानों पर तो देखने वालों ने देखते ही देखते रुपये न्योछावर कर अपनी जेबें खाली कर दीं. सनी लियोनि बने एक किन्नर को सबसे ज्यादा न्योछावर मिली जिसकी सेक्सी अदाओं ने लोगों को होश खोने मजबूर कर दिया. किन्नरों का यह जुलूस भोपाल में नवाबों के जमाने से निकल रहा है. कहा यह जाता है कि अब से कोई डेड़ सौ साल पहले भोपाल में भीषण अकाल पड़ा था, तब नबाब ने किन्नरों से भुजरियों का जुलूस निकालने कहा था जिससे बारिश अच्छी हुई थी. कही सुनी इस बात में भले ही दम न हो पर अब किन्नरों के हुस्न के जलवों में जरूर इतना दम आ गया है कि उन पर इस एक दिन में ही पैसों की इतनी बारिश हो जाती है जितनी साल भर में भी नहीं होती.

 

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