‘….खिलावे समोसा गरम गरम’

भोजपुरी फिल्म ‘महाभारत’ के बाद निर्माता सचिन यादव अपना नया वीडियों एलबम ‘तोहरे ठुमके पर दोहा कतर हिलेला’ लेकर आ रहे हैं.

इसमें ठुमका लगाया है प्रिसेंस शरीन ने. प्रिसेस शरीन नामी स्टेज डांसर है. वीडियो आने से पहले इसके 2 गाने ‘मारे गटागट’ और ‘खिलावे समोसा गरमगरम’ चर्चा में है.

इसमें अपनी मनमोहक अदाओं से दिल को धडकाने का काम प्रिसेंस शरीन ने किया. वीडियो के म्यूजिक डायरेक्टर अनुज तिवारी और कोरियोग्राफर संतोष सर्वदर्शी है. वीडियो के गाने विजय राज यादव, प्रदीप और अलका झा ने अपनी आवाज से सजाया है.

वीडियों के दूसरे कालाकारो में सचिन यादव, प्रिसेस शरीन, विजय राज यादव, सुनील भगत और संतोष सिंह है.

प्रिसेस शरीन कहती हैं कि इसमें डांस देखकर लोगों के होश उड़ जायेंगे. यह लोगों को पसंद आयेगा क्योंकि इसका फ्लेवर दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाया गया है.

शस्त्रों की होड़ में पिसती शांति

संयुक्त राष्ट्र संघ की बच्चों के उत्थान के लिए काम करने वाली एजेंसी यूनिसेफ यानी यूनाइटेड नेशंस चिल्ड्रैंस फंड का आकलन है कि अगर मौजूदा हालात ऐसे ही रहे तो इस साल 80 हजार बच्चों पर मौत का साया मंडरा रहा है.

यूनिसेफ ने यह आकलन नाइजीरिया के मौजूदा परिदृश्य को देखते हुए लगाया है. उस के मुताबिक, नौर्थईस्ट नाइजीरिया में इस साल 5 लाख बच्चों को भुखमरी का सामना करना पड़ सकता है. वहीं, बोको हराम की वजह से पैदा हुए मानवीय संकट के कारण 80 हजार बच्चों को अगर इलाज की सुविधा नहीं मिली तो उन की मौत हो सकती है. इस तरह, अकेले नाइजीरिया में ही हजारों बच्चों का भविष्य अधर में है.

वहीं, दूसरी ओर सीरिया के अलेप्पो में राष्ट्रपति बशर अल असद की सेनाओं ने शहर के ज्यादातर हिस्से पर कब्जा कर लिया है. ऐेसे में अलेप्पो के पूर्वी हिस्से में विद्रोहियों के कब्जे वाले छोटे से इलाके में फंसे लोगों ने भावुक अंतिम संदेश भेजे हैं. सीरियाई सेना की तेज बमबारी के बीच इन लोगों ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से मदद की अपील की. अपने ट्वीट में कार्यकर्ता लीना ने लिखा कि पूरी दुनिया के लोगों, सोना मत. आप कुछ कर सकते हो. प्रदर्शन करो, यहां के नरसंहार को रोको.

अपने वीडियो संदेश में लीना ने कहा कि घेराबंदी में फंसे अलेप्पो में नरसंहार हो रहा है. यह मेरा अंतिम वीडियो हो सकता है. असद के खिलाफ विद्रोह करने वाले 50 हजार से अधिक लोगों पर नरसंहार का खतरा है. लोग बमबारी में मारे जा रहे हैं. अलेप्पो को बचाओ, इंसानियत को बचाओ. कई संदेशों में उम्मीद खत्म होती दिखती है.

एक वीडियो में एक व्यक्ति कह रहा है कि हम बातचीत से थक गए हैं. कोई हमारी नहीं सुन रहा है. वह देखो, बैरल बम गिर रहा है. यह वीडियो बम गिरने की आवाज के साथ खत्म होता है. सुबह उठा एक व्यक्ति लिखता है, ‘क्या मैं अभी जिंदा हूं?.

भारत व पाकिस्तान के बीच वर्ष 1971 में हुए युद्घ में 16 दिसंबर को भारतीय सेना ने दुश्मन के 93 हजार सैनिकों को, आत्मसमर्पण कराने के बाद, बंदी बना लिया था. बंदी बनाए गए इन सैनिकों की, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के अडि़यल रवैए के कारण, ढाई वर्ष तक भारत को मजबूरी में मेहमाननवाजी करनी पड़ी. एक जिद्दी प्रधानमंत्री के कारण हजारों सैनिकों तथा उन के परिवारजनों को कष्ट झेलना पड़ा. भारत को भी उन की सुरक्षा तथा खानेपीने के लिए भारी खर्च करना पड़ा.

पिछले 20 सालों से चल रहे प्रोजैक्ट का नतीजा है कि भारत ने इंटरकौंटिनैंटल बैलिस्टिक मिसाइल का 5वां टैस्ट सफलतापूर्वक कर लिया है. अग्नि-5 मिसाइल एटमी हथियार ले जाने की क्षमता रखती है तथा 5,500 किलोमीटर तक मार कर सकती है. चीन भी इस की जद में है. मिसाइल का चौथा टैस्ट जनवरी 2015 में किया गया था. रक्षा मामलों में होने वाले खर्च में भारत ने रूस को पछाड़ा. पहले नंबर पर अमेरिका, दूसरे पर चीन, तीसरे स्थान पर ब्रिटेन, चौथे पर भारत तथा 5वें स्थान पर रूस है.

रिपोर्ट का एक अहम पहलू यह है कि इस के मुताबिक, वर्ष 2018 में ब्रिटेन को पछाड़ते हुए भारत सूची में तीसरे स्थान पर पहुंच जाएगा, क्योंकि पिछली सरकारों ने इस कार्यक्रम पर बहुत पैसा खर्च किया था.

लेकिन व्यापक विनाश के हथियार आतंकियों के हाथों न पड़ें, इस मुद्दे को भारत ने यूएन सिक्योरिटी काउंसिल में जोरदार तरीके से उठाया है. विश्व की शांति की सब से बड़ी संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के प्रतिनिधि तन्मय लाल ने कहा कि विनाशकारी हथियार को आतंकियों के हाथ में पहुंचने से रोकने के लिए हुआ समझौता देशों की सरकारों को जल्द से जल्द स्वीकार करना चाहिए.

पाकिस्तान की सेना के संरक्षण में वहीं रह रहे आतंकवादी हाफिज सईद ने अपने योग्य व तेजतर्रार छात्रों से दूसरे देशों के न्यूक्लियर शोध संस्थानों में दाखिला लेने की अपील की है. यह दुनिया के लिए चिंता का विषय है. आतंकवादियों का विभिन्न नागरिकताओं का कौकेटेल बड़ी तादाद में अलगअलग देशों में नुकसान पहुंचाने की घातक योजना बना रहा है. अपनी सुविधा व सुरक्षा के लिए किए तकनीकी विकास द्वारा मानव ने, नासमझी से, दुनिया को ही खत्म करने के सारे इंतजाम कर लिए हैं.

क्यूबा देश ने चेक रिपब्लिक देश का कर्ज चुकाने के लिए अनोखा औफर दिया है. शीतयुद्घ के दौरान लिए गए कर्ज को उतारने के लिए उस ने रुपए की जगह रम शराब देने की पेशकश की है.

चेक रिपब्लिक के वित्त मंत्रालय ने बताया कि क्यूबा सरकार की ओर से 18 अरब रुपयों (222 मिलियन पाउंड) का कर्ज शराब के रूप में चुकाने का प्रस्ताव रखा गया है. क्यूबा ने कहा है कि वह रुपयों के बदले उतने ही मूल्य की रम शराब देगा और किस्तों में कर्ज चुकाएगा. अगर चेक रिपब्लिक क्यूबा के इस प्रस्ताव को मान लेता है तो उस के पास इतनी रम शराब जमा हो जाएगी जो शायद आने वाले 100 साल में भी खत्म न हो.

युद्ध के नाम पर कर्ज

इस तरह के मामले दिखाते हैं कि कुछ देशों की अर्थव्यवस्था शराब, अफीम तथा घातक हथियारों के वृहद उत्पादन पर निर्भर होती जा रही है. क्यूबा ने यह कर्ज शीतयुद्घ के दौरान अपने शत्रु अमेरिका को डराने के लिए हथियार खरीदने के लिए लिया था. इन देशों की युद्घ के नाम पर अपने नागरिकों को कर्जे में लादने तथा किसी भी तरीके से अपनी तथा अपने नागरिकों की आय बढ़ाने की नीयत खोटी है. यह नीति शराबखोरी, नशाखोरी तथा घातक शस्त्रों की होड़ को बढ़ा रही है.

साउथ चाइना सी में चीन अति आधुनिक तथा मारक मिसाइलें तैनात कर रहा है. सैटेलाइट से ली गई तसवीरें इस सत्य को दुनिया के सामने उजागर कर रही हैं. चीन ने अपने मिलिटरी पावर का प्रदर्शन करने के लिए वहां पर जोरदार युद्घ अभ्यास भी किया है. साउथ चाइना सी के द्वीपों को ले कर दक्षिणपूर्व एशिया के अन्य देश भी अपना अधिकार व्यक्त कर चुके हैं. और वे भी चीन से मुकाबले को तैयार हैं. चीन की प्रभावी क्षेत्र विस्तार की नीति पूरे विश्व के लिए खतरा बन गई है. अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ताईवान से बातचीत करने पर बीजिंग ने अमेरिका को धमकी दे डाली है. सीमा विवाद को ले कर भारत का चीन के साथ हमेशा तनाव बना रहता है.

विश्व के अनेक गरीब देश शिक्षा की दयनीय हालत से जूझ रहे हैं. सरकारों को जो पैसा शिक्षा जैसे सब से महत्त्वपूर्ण कार्य पर खर्च करना चाहिए, विश्व में शक्तिशाली देशों की गलत नीतियों तथा शोषण की प्रवृत्ति के कारण गरीब तथा छोटे देशों को अपने रक्षा बजट पर खर्च करना पड़ रहा है. बड़े देश घातक तथा अधिक मारक शस्त्रों का निर्माण कर के उस की बिक्री बढ़ाने के लिए नएनए हथकंडे अपनाते हैं. विश्व के सभी छोटेबड़े देशों का रक्षा बजट प्रतिवर्ष बढ़ता जा रहा है.

कभी आप ने सोचा है कि देश की अर्थव्यवस्था अगर बहुत बुरी हालत में चली जाए या फिर आप कंगाल हो गए, तो क्या करेंगे? नौर्वे में एक प्रथा है कि स्कूली पढ़ाई खत्म होने पर लगभग 18 वर्ष की उम्र में लोग बहुत कम पैसों के साथ बच्चों को अफ्रीका भेज देते हैं. वहां कोई होटल बुकिंग नहीं होती. कोई साथी नहीं होता. वे टैंट वगैरा में रेगिस्तान में रहते हैं, कुछ भी खातेपीते हैं. इस बीच, वे कई चीजें सीखते हैं, जीवन का मूल्य समझते हैं.

इस प्रकार नौर्वे के बच्चे विश्व में बढ़ते शरणार्थियों को गाली नहीं देते, क्योंकि वे उन का कठिन जीवन देख चुके होते हैं. गरीबी का दर्द गरीब व्यक्ति ही बेहतर तरीके से समझ सकता है. नौर्वे ने चांद तथा मंगल पर अपने रौकेट नहीं भेजे लेकिन वह देश विश्व में अपने वृद्घों को सभी प्रकार की सुविधाएं देने में सब से आगे है.

विश्व के सभी देशों के नीतिनिर्माताओं को नौर्वे से अच्छी सीख ले कर उसे अपने देश में भी अपनाना चाहिए. हमें 100 वर्षों की दीर्घकालीन योजनाएं बनाने से पहले अपने देश प्रदेश के सब से अंतिम व्यक्ति के हित को ध्यान में रख कर विकास की योजनाएं बनानी चाहिए, न कि सब से घातक शस्त्र बनाने की होड़ में पड़ने के और झूठे राष्ट्रवाद व देशभक्ति के नारे लगाने के.

हिजाब हो बेहिजाब : बुरके पर लगे प्रतिबंध

यूरोप व पश्चिमी देशों में इसलामी बुरके को बैन करने की मांग जोर पकड़ रही है. यह सही है. धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि धर्म अपने अंधभक्तों को अलग किस्म की पोशाकें पहनने को मजबूर करे.

हमारे देश में बुरके पर प्रतिबंध की मांग नहीं उठ रही, क्योंकि इसलाम की तरह हिंदू धर्म भी परदे में गहरा विश्वास रखता है. कट्टर हिंदुओं को तो यह भी बुरा लगता है कि आजकल लड़कियों ने चुन्नी भी छोड़ दी और जींस व टौप में खुलेआम घूम रही हैं.

बदन दिखाना जरूरी नहीं है. बदन की सुरक्षा करना हरेक का फर्ज है. आदमी भी केवल लंगोट पहने नहीं घूमते. वे फैशन या धर्म के लिए नहीं, व्यावहारिकता के लिए कमीजपैंट पहनते हैं. लड़कियां भी, चाहे फैशन की दीवानी हों, न शरीर दिखाना चाहती हैं न बोल्ड अदाएं दिखाना चाहती हैं. वे तो बंधन नहीं चाहतीं जो धर्म उन पर थोपता है, जिन की जरूरत नहीं.

मुसलिम औरतें अकसर धर्म के आदेश को अपनी निजी पसंद कहने लगती हैं. यह गलत है. यह छलावा है. यह खुद को धोखा देना है और दूसरों को बहकाना है. यह अंधविश्वास के कीचड़ में डूब जाने का कदम है कि कीचड़ की ठंडक से उन्हें असीम सुख मिल रहा है.

बहुत गरीब ही सादगी का गुणगान करते हैं. वे जबरन अपने को बहलाते हैं. हिजाब या बुरका कोई लड़की मन से नहीं पहनती. जैसे हर सफल युवा अपनी सफलता दिखाना चाहता है, वैसे ही हर लड़की अपना सौंदर्य व व्यक्तित्व लोगों को दिखाना चाहती है. 17-18 साल की लड़की पर बुरके या परदे को लादना उस की आजादी में खलल है.

बुरका व परदा धार्मिक अत्याचार का नतीजा है. यह पुरुषों की साजिश है कि कहीं उन की औरतों को देख कर कोई उन्हें उठा न ले जाए. पर यह समस्या औरतों की नहीं, आदमियों की है. अच्छी चीज को ढक दिया जाएगा तो वह सड़ जाएगी, उस पर जाले लग जाएंगे. यही लड़कियों के साथ होता है जो अपने बदन का पूरा उपयोग अपनी बदन ढकने वाली पोशाकों के कारण नहीं कर पातीं. उन्हें इन बंधनों से आजादी मिलनी ही चाहिए.

फैशन के नाम पर अगर बदन दिखाया जाता है तो कपड़े भी तो दिखाए जाते हैं. फिल्मी फैस्टिवलों में ऐक्ट्रैस मीटरों लंबे गाउन पहनती हैं जिन्हें संभालने के लिए 2-2, 3-3 सहायिकाएं चाहिए होती हैं. यह न मूर्खता है न बंदिश. यह आजादी है. बुरका या हिजाब पहनना इस आजादी की हत्या की निशानी है. धर्म और धार्मिक समाज इस तरह हावी हो जाता है कि लड़कियां न केवल इसे पहनती हैं बल्कि इन की हमउम्र न पहनें तो ये हल्ला मचाती भी हैं. उन्हें रोकने के लिए सरकारी कानून का होना जरूरी है.

नाम में सब रखा है बंधु

इसी धरती के एक मशहूर नाटककार शेक्सपियरजी लिख गए हैं कि ‘नाम में क्या रखा है’. ऐसा लिख कर वे नामों के साथ कुश्ती लड़वा गए हैं.

बताइए भई, नाम के लिए आदमी क्या नहीं करता? मरे को जिंदा और जिंदा को मरा हुआ बताने में नाम का बड़ा रोल होता है. नाम में क्या नहीं रखा प्यारे. नाम के लिए लोग बदनाम तक होने का मौका ढूंढ़ते हैं. बदनाम होते ही उन का नाम हो जाता है, जैसे अपने आसाराम बापू. ‘बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा’, यह मंत्र न जाने कितने नामशुदा बदनाम हो कर जपते रहते हैं. शेक्सपियरजी, नाम में ही सबकुछ रखा है.

मेरा एक दोस्त दो नंबर की ग्रेजुएशन डिगरी लिए बैठा है. एक बार नाटकों की बात चली, तो तपाक से ज्ञान बघारते हुए बोला, ‘यार, सैक्सपियर ने क्या नाटक लिखा है रोमियोजूलियट…’

मैं ने फौरन उन्हें टोका, ‘यार दो नंबरी, क्यों बेचारे सीधेसादे विदेशी नाटककार का नाम बदनाम करते हो? नाम तो सही लिया करो. सैक्सपियर नहीं, शेक्सपियर बोलो.’

अब बताइए दिवंगत शेक्सपियरजी, नाम में कुछ रखा है कि नहीं?

मेरे एक दूसरे दोस्त जानेमाने व्यंग्यकार हैं. वे कारखाने में नौकरी करते हैं. अखबारों में भी वे अकसर व्यंग्य कौलम लिखते हैं. एक अंगरेजीदां ने उन्हें शुभ काम

का आमंत्रण अशुभ उच्चारण में भेज दिया. दोस्त का नाम है सुरेश वैश्य. अंगरेजीदां मेजबान ने लिफाफे पर उन्हें संबोधित किया ‘सुरेश वैश्या’. अच्छेभले कारखाना कामगार का नाम कोठे से जोड़ दिया. वैश्य को भैंस भी लिखा होता, तो सहन होता.

व्यंग्यकार दोस्त खुद पर हुए व्यंग्य से बिफरे हुए मुझे लिफाफा दिखाने आए. मैं ने उन्हें समझाया. उन की आग को बुझाते हुए कहा, ‘यार, गलती मेजबान की नहीं, अंगरेजी भाषा का आविष्कार करने वाले की है. चूंकि ‘राम’ को अंगरेजी में ‘रामा’ लिखा जाता है, सो आप को बेचारे ने ‘वैश्या’ लिख भेजा. मेजबान के नेक इरादे में आप का पेशा बदलने का इरादा कतई शामिल नहीं होगा.’

तो देवियोसज्जनो, नाम में ही सबकुछ रखा है मानोजानो. आप मशहूर सैक्सपियर, माफ करें शेक्सपियर के झांसे में न आएं. मैं किस से कहूं? मैं खुद भी इस नाम के फेर का सताया हुआ हूं. आप चाहें तो पत्नी का सताया भी कह सकते हैं.

एक बार फोन पर अपने सुपरिचित, सुदूर बुकस्टौल वाले से पूछ रहा था, ‘बौस, सरिता, मुक्ता नहीं आईं क्या? आएं तो बता देना?’

फोन पर मेरी बातचीत सुन रही श्रीमतीजी हाथ में सब्जी काटने वाला चाकू और बेलन एकसाथ ले कर प्रकट हुईं. वे दांत पीसते हुए गरजीं, ‘मैं रसोई में से सब सुन रही थी, बहरी नहीं हूं. तुम सूने कमरे में किन सौतनों से बतियाते रहते हो. मैं बूढ़ी हो गई हूं न? बुला लो उस सौत सरितामुक्ता को, रचाओ रासलीला.

‘शर्म नहीं आती तुम्हें 2 बच्चों के बाप हो कर भी, पराई संतानों की मांओं पर लार टपकाते हुए?’

अचानक आई मुसीबत को टालने की मैं ने कोशिश की. गुस्साई पत्नी को दूर से ही समझाया, ‘अरी मेरी सुंदरी सुनयना, मैं तुम्हारी सौतनों का नहीं, पत्रिकाओं का नाम ले रहा था. गैर की मांओं से नहीं बुकस्टौल वाले से बात कर रहा था. अपना गुस्सा शांत करो देवी, मेरी जान बख्शो. जाओ, दोबारा रसोई की ओर जाओ.’

नाम का यह फेर जो न करा दे, थोड़ा समझो. अपनी बंबई जिस का नाम मुंबई हो गया है नाम की मारी है. बंबई नगरिया का बखान अपने लंबे डौन अमिताभ ने ‘डौन’ नामक फिल्म में किया है. डौन के श्रीमुख (असलियत में किशोर कुमार के श्रीमुख) से आप ने बंबई नगरिया के नामों वाला गीत सुना ही होगा, ‘ई है बंबई नगरिया तू देख बबुआ…’

गीत में अमिताभजी महाराज कहते हैं, ‘कोई बंदर नहीं है, फिर भी नाम बांदरा, चर्च का गेट है चर्च है लापता, बिन धोबी का धोबी तालाब देखो…’

इस गीत से हमें बंबई या मुंबई नगरिया की काफीकुछ जानकारी हासिल होती है. जानकारी हासिल करने के लिए और भी कई सोर्स हैं जैसे अखबार, पत्रपत्रिकाएं. तमाम नामों का होनाखोना, सोना हमें इन्हीं से हराम होता है. नाम होता?है तो अखबार लेता है, वरना क्या लेगा. ‘इसे’ सम्मान, ‘उसे’ जूता, ‘मुझे’ अपमान, ‘तुझे’ जेल तो लिख नहीं देगा अखबार.

मान हो या अपमान, नाम तो जरूरी है. लेकिन साहब शेक्सपियर कहते थे, ‘नाम में क्या रखा है?’ अगर इस शीर्षक से लिखी हरि भटनागर की कहानी में भटनागरजी का नाम न छपा होता. लेखक आपत्ति जड़ता, ‘वाह जी, वाह, नाम गायब कर दिया मेरा. मैं कैसे साबित करूं कि ‘नाम में क्या रखा है’ कथा मेरी है या गैर की? अब रचना में दाम के साथ नाम हो तो ठीक वरना…’

संपादकजी कथाकार को लाख बहलाएं, ‘मान्यवर दाम लीजिए. नाम में क्या रखा है?’ तो कथाकार टेसू की तरह अड़ेगा ही, ‘वाह जी वाह, नाम ही में तो सबकुछ रखा है.

‘बताइए, आप की पत्रिका में आप की जगह संपादक में मेरा नाम छप जाए तो…? आसाराम बापू की जगह राष्ट्रपिता बापू छप जाए या राष्ट्रपिता बापू की जगह आसाराम बापू छप जाए तो…?’

नाम ही तो बदनाम होता है बंधु, चाहे वो संत का हो या संत के आश्रम का. यह और बात है कि घरवालियां अपने घर वालों का नाम नहीं लेतीं, ऐजी, ओजी, चुन्नू के पापा, मुन्नू के बापू’ जैसे शब्दों से काम चला लेती हैं. सोचती हैं कि नाम में क्या रखा है.

देवियो, आप अपना भ्रम दूर कर लें. पुलिस इसी नाम के फेर में कभीकभी शरीफ की जगह गैरशरीफ, सज्जन के बजाय दुर्जन के घर का दरवाजा खटखटाने लग जाती है. यह चूक उसे कभीकभी महंगी पड़ती है. गैरशरीफ या दुर्जन अदालत में मानहानि का केस दर्ज करा देता है. ‘नामहिं हाथी पाइए, नामहिं हाथी पांव’.

आदरणीय शेक्सपियरजी ने ‘नाम  क्या रखा है?’ जैसी बात कह कर भले ही लाखों छपास पीडि़तों को नाम के पीछे रोज पत्रिकाओं के दफ्तर की परिक्रमा से छुटकारा दिलाने की नाकाम कोशिश की हो, लेकिन छपास पीडि़त कैसे मान लें कि ‘नाम में क्या रखा है?’

उस की इस पीड़ा यानी ‘नाम की पीड़ा’ का उपचार तो पत्रपत्रिकाओं में आएदिन छपने वाले नाम से ही होता है. अगर एक दिन न छपे, तो ‘दैनिक छपास पीडि़त’ के पेट और पैरों में कुछ होने लगता है. उसे लगता है कि अखबार के दफ्तर की ओर अब दौड़े कि तब. उसे कबीर याद आने लगते हैं, ‘काल करे सो आज कर, आज कर सो अब…’

हीरोइन ने ऐसे लिया प्रेम चोपड़ा से रेप सीन का बदला

किसी भी सीन को शूट करना आसान नहीं होता, फिर चाहे वो रोमांटिक सीन हो, इमोशनल, एक्शन या फिर एक रेप सीन और ये बात फिल्म स्टार्स से बेहतर भला कौन समझ सकता है. कई बार इन सीन्स के दौरान वो घायल हो जाते हैं तो कई बार उन्हें अपने को-स्टार का ही गुस्सा झेलना पड़ता है. प्रेम चोपड़ा के साथ भी ऐसा ही हुआ था. अपने किए एक रेप सीन के लिए प्रेम चोपड़ा को हीरोइन का गुस्सा झेलना पड़ा था.

बात 70 के दशक की है, जब रेप सीन फिल्मों का जरूरी हिस्सा होते थे. उस वक्त प्रेम चोपड़ा काफी मशहूर विलेन थे और लगभग हर फिल्म में उनका किरदार हीरोइन के साथ जबरदस्ती करने वाला ही होता. इस तरह के किरदार करते करते प्रेम चोपड़ा इन सीन्स को शूट करने की कला भी सीख गए थे. लेकिन एक रेप सीन को शूट करते वक्त उनकी कला उन्हीं पर भारी पड़ गई.

सीन ऐसे था. प्रेम चोपड़ा को पीछे से आकर हीरोइन को दबोचना था और उसकी बाजुओं को पकड़ना था. प्रेम चोपड़ा ने ऐसा ही किया. लेकिन किसी वजह से हीरोइन सही एक्सप्रैशन नहीं दे पा रही थी. जोर-जबरदस्ती का जो रिएक्शन निर्देशक को चाहिए था वो नहीं मिल पा रहा था. सीन के लिए कई रीटेक देने पड़े लेकिन फिर भी सीन सही शूट नहीं हो पाया.

शूट के दौरान प्रेम चोपड़ा असमंजस में थे. उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि हीरोइन सीन में दिलचस्पी क्यों नहीं दिखा रही. उनके मन में सवाल था लेकिन सोचा कि शूट के बाद ही पूछ लूंगा. खैर, जैसे-तैसे सीन शूट हो गया लेकिन इससे पहले कि प्रेम चोपड़ा उस हीरोइन से कुछ पूछते उसने जाकर निर्देशक से शिकायत लगा दी और कहा कि प्रेम चोपड़ा ने उन्हें चोट पहुंचाई है और उन्हीं की वजह से उनकी बाजू में चोट लग गई.

निर्देशक ने हीरोइन को काफी समझाने की कोशिश की लेकिन वो नहीं मानी और शूट छोड़कर चली गई. अगले दिन शूट पर भी नहीं आई. मन ही मन वो प्रेम चोपड़ा से बदला लेने के बारे में सोचती रही और आखिरकार सेट पर वापस आ भी गई.

फिर से एक सीन शूट होना था और सीन के मुताबिक, हीरोइन को विलेन को थप्पड़ मारना था. हीरोइन को तो जैसे इस सीन का बेसब्री से इंतजार था. जैसे ही शूट शुरु हुआ हीरोइन ने अपना बदला लेते हुए विलेन यानि प्रेम चोपड़ा को इतनी जोर से थप्पड़ मारा कि सब सहम गए. खुद प्रेम चोपड़ा के पैरों तले जमीन खिसक गई.

वो गाल पर हाथ लगाए निर्देशक के पास गए और उनसे इस बात की शिकायत की. लेकिन शिकायत करने पर प्रेम चोपड़ा को जो सुनने को मिला उसने उनके और होश उड़ा दिए. निर्देशक ने उन्हें बताया कि हीरोइन उनसे अपने साथ किए बर्ताव का बदला लेना चाहती थी.

विधानसभा की समितियां भंग नहीं होंगी : सिसोदिया

दिल्ली विधानसभा की समितियां संविधान के नियमों का पालन करके गठित की गई हैं. इन्हें भंग नहीं किया जाएगा. उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने विधानसभा में यह जानकारी दी है.

उप मुख्यमंत्री ने उपराज्यपाल के संदेश को असंवैधानिक करार दिया. उन्होंने कहा कि उपराज्यपाल का अभिभाषण भी सदन पटल पर रखने से पूर्व कैबिनेट की मंजूरी के लिए रखा जाता है. उन्होंने भाजपा पर हमला करते हुए कहा कि इनकी लोकतंत्र में आस्था नहीं है. जो संदेश सरकार को नियम 175 के तहत भेजा गया है. ऐसी शक्तियां राष्ट्रपति के पास भी संविधान की धारा 86(2) में है, लेकिन आज तक किसी भी राज्य सरकार को कभी उन्होंने ऐसा कोई पत्र नहीं भेजा है. ये अंग्रेजों के जमाने की सोच है और संविधान निर्माताओं ने ही संविधान से इसे हटा दिया है. यदि दिल्ली विधानसभा को सीधे पत्र भेजा जाता है तो यह सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट आदेशों का उल्लंघन है.

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन उपराज्यपाल का पत्र

उपराज्यपाल या राज्यपाल किस स्थिति में सरकार को संदेश भेजेंगे, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2013 में फैसला दिया था. उप मुख्यमंत्री ने बताया कि अरुणाचल के एक मामले में यह आदेश आया था. इसके तहत कोई भी मसौदा केवल कैबिनेट की अनुमति के बाद ही विधानसभा को भेजा जाएगा.

ये सदस्य होंगे

समिति के सदस्य संजीव झा, आदर्श शास्त्री, अमानतुल्ला खान, अलका लाम्बा, विशेष रवि, सही राम, सौरभ भारद्वाज, रितुराज गोविंद व जगदीश प्रधान होंगे.

‘दिल्ली सरकार किसी जवाबदेही से डरती नहीं’

सिसोदिया ने कहा कि इन समितियों की वजह से कामकाज की प्रक्रिया में तेजी आई है और काम होने शुरू हुए हैं. जरूरत होगी तो इन समितियों में दिल्ली सरकार के मंत्री भी जाएंगे. दिल्ली सरकार किसी भी जवाबदेही से डरती नहीं है. उप मुख्यमंत्री ने कहा कि इन समितियों के माध्यम से आम आदमी की आवाज सीधे बड़े अधिकारियों तक पहुंचाने की कोशिश की गई है. ये समितियां सदन से बनी हैं.

अधिकार कम किए जाने पर विधायक खफा

चांदनी चौक से विधायक अलका लांबा ने कहा कि अदालत ने सरकार की जगह उपराज्यपाल को दिल्ली का मुखिया माना है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. उन्होंने कहा कि दिल्ली को यदि पूर्ण राज्य का दर्जा मिल गया होता तो आज सदन के इन मसलों पर चर्चा करने की आवश्यकता नहीं होती.

संविधान का खुला उल्लंघन : विजेंद्र

नेता प्रतिपक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि दिल्ली विधानसभा की समितियों का गठन संविधान का उल्लंघन कर किया गया है. इन्हें भंग किया जाना चाहिए. समितियां वे कार्य कर रही हैं जो उनके अधिकार व दायरे से बाहर हैं.विधायकों को विश्वास में लिए बिना उपराज्यपाल से पत्रचार कर नियमों का गम्भीर उल्लंघन किया गया है.

एलजी हाउस से लीक हुई गोपनीय चिट्ठी

अति गोपनीय पत्र लीक हो रहे हैं. उपराज्यपाल द्वारा विधानसभा को भेजे गए पत्र में भी ऐसा ही हुआ है. विधानसभा पटल पर दस्तावेज आने से पूर्व ही वह मीडिया के माध्यम से जनता के बीच आया है. विधानसभा अध्यक्ष रामनिवास गोयल ने गहरी नाराजगी जाहिर की है. कहा कि यह पत्र राजनिवास के अधिकारी विजय कुमार के माध्यम से लीक हुए हैं.

जब परिवार का पेट पालने के लिए रेखा को करने पड़े बोल्ड सीन

‘बीवी हो तो ऐसी’, ‘दो अनजाने’, ‘सौतन की बेटी’, ‘फूल बने अंगारे’, ‘इंसाफ की देवी’ जैसी अनेक शानदार फिल्मों में नजर आईं दिग्गज अभिनेत्री भानुरेखा गणेशन उर्फ रेखा मनोरंजन जगत का जाना माना नाम हैं. रेखा के अभिनय के साथ ही उनकी खूबसूरती के भी सभी कायल हैं.

आज भी उनकी खूबसूरती में वही आकर्षण है, जो वर्षों पहले हुआ करता था. रेखा का जन्म 10 अक्टूबर, 1954 को चेन्नई में तमिल अभिनेता जेमिनी गणेशन और तेलुगू अभिनेत्री पुष्पावली के घर में हुआ था. उनके पिता अभिनेता के तौर पर काफी सफल हुए और रेखा भी उन्हीं के पद्चिन्हों पर चलीं. वे तेलुगू को अपनी मातृभाषा मानती हैं.

उन्हें हिंदी, तमिल और अंग्रेजी का भी ज्ञान है. उन्होंने चेन्नई के लोकप्रिय चर्च पार्क कौन्वेंट में शिक्षा ग्रहण की. उन्होंने अभिनय क्षेत्र में करियर बनाने के लिए पढ़ाई छोड़ दी. हालांकि, उनकी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी और आर्थिक तंगी की वजह से उन्हें मनोरंजन की दुनिया में कदम रखना पड़ा.

इसके अलावा उनका निजी जीवन भी काफी सुर्खियों में रहा. रेखा और अमिताभ के प्यार के चर्चे आम थे. कहा जाता था कि इन दोनों के बीच प्यार इस कदर था कि आपस में कुछ कहे बिना ही दोनों एक दूसरे के दिल की बात समझ लेते थे. अचानक ही रेखा और अमिताभ के रास्ते अलग अलग हो गए, अमिताभ ने फिर कभी रेखा की तरफ मुड़ कर नहीं देखा और 3 जून, 1973 को जया बच्चन से शादी कर ली.

बौलीवुड के कुछ सूत्रों का कहना है कि अमिताभ की जया से शादी हो जाने के बाद भी रेखा उन्हें प्यार करती थीं. खबर यह भी आई कि उन्होंने साल 1990 में उद्योगपति मुकेश अग्रवाल से शादी की. इसके बाद विनोद मेहरा के साथ भी उनका नाम जोड़ा गया. हालांकि, रेखा ने कभी अपने निजी जीवन को लेकर सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कहा.

हिंदी फिल्मों की बेहतरीन अभिनेत्री मानी जाने वाली रेखा ने अपने करियर की शुरुआत 1966 में बाल कलाकार के तौर पर तेलुगू फिल्म ‘रंगुला रतलाम’ से की थी. अभिनेत्री के तौर पर उन्होंने फिल्म ‘सावन भादो’ के साथ पर्दापण किया था. वह अपनी खूबसूरती के लिए हमेशा सुर्खियों में रहीं. उनके करियर में काफी उतार-चढ़ाव आए और उन्होंने कई बड़े कलाकारों के साथ काम किया. अपनी लाजवाब अदाकारी के दम पर कई सालों तक इंडस्ट्री को सुपरहिट फिल्में देने और नये कीर्तिमान स्थापित करने वाली रेखा के सामने आज भी कई अभिनेत्रियां फीकी लगती हैं.

उन्होंने ‘ऐलान’, ‘रामपुर का लक्ष्मण’, ‘धर्मा’, ‘कहानी किस्मत की’, ‘नमक हराम’, ‘प्राण जाए पर वचन ना जाए’, ‘धर्मात्मा’, ‘दो अंजाने’, ‘खून पसीना’, ‘गंगा की सौगंध’, ‘घर’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘सुहाग’, ‘खूबसूरत’, ‘सिलसिला’, ‘उमराव जान’, ‘निशान’, ‘अगर तुम ना होते’, ‘खून भरी मांग’, ‘इजाजत’, ‘बीवी हो तो ऐसी’, ‘भ्रष्टाचार’, ‘फूल बने अंगारे’, ‘खिलाड़ियों का खिलाड़ी’, ‘आस्था’, ‘बुलंदी’, ‘जुबैदा’, ‘लज्जा’, ‘दिल है तुम्हारा’, ‘कोई मिल गया’, ‘क्रिश’ जैसी कई शानदार फिल्मों में अपने अभिनय के जलवे बिखेरे.

रेखा कई फिल्मों में बोल्ड अंदाज में भी दिखीं. वह अपने बेबाक बोल, सेक्स पर खुले विचारों और अपनी विवादास्पद लाइफ को लेकर अकसर सुर्खियों में रहीं हैं. हालांकि, आज रेखा कायमाबी के उस पर शिखर पर हैं, जहां हर किसी के लिए पहुंचना नामुमकिन है. उन्होंने यहां तक पहुंचने के लिए कड़ा संघर्ष किया, अपने परिवार को पालने के लिए कई फिल्मों में बोल्ड किरदार निभाएं है.

वर्ष 1984 में आई निर्देशक गिरीश कर्नाड की फिल्म ‘उत्सव’ में रेखा ने मुख्य भूमिका निभाई. रेखा ने इसमें वसंतसेना नाम की एक ऐसी महिला का किरदार निभाया है जो एक गरीब शख्स से रिश्ता बनाती है. इस फिल्म में शेखर सुमन और रेखा के बोल्ड सीन हैं. इसके लिए रेखा को आलोचना का भी शिकार होना पड़ा. इसके बाद वर्ष 1996 में आई फिल्म ‘कामसूत्र’ में रेखा ने कामसूत्र पढ़ाने वाली टीचर का रोल निभाया. लेकिन रेखा अभिनीत यह बोल्ड सीन्स से भरी एक ऐसी फिल्म थी, जो कभी रिलीज नहीं हो पाई. इसे मीरा नायर ने डायरेक्ट और प्रोड्यूस किया था.

निर्देशक मानिक चटर्जी की फिल्म ‘घर’ में भी रेखा के अभिनय का एक नायाम नजर आया. इसमें रेखा के साथ विनोद मेहरा मुख्य भूमिका में थे. इस फिल्म में विकास (विनोद मेहरा) की पत्नी आरती (रेखा) के साथ गैंगरेप हो जाता है. इसके बाद वह किन परिस्थितियों से गुजरती हैं, यह दिखाया गया है. रेखा ने इस रोल को बखूबी निभाया था.

रेखा और अक्षय कुमार ने फिल्म ‘खिलाड़ियों का खिलाड़ी’ में भी कई बोल्ड सीन दिए. इसमें वह एक लेडी डौन के रूप में नजर आईं थी, जो अपनी बहन के प्रेमी से ही प्यार कर बैठती है. इसके बाद अक्षय और रेखा के साथ होने की भी अफवाहें भी उड़ी थीं.

आखिरकार बौबी देओल को मिला काम, ‘रेस 3’ में आएंगे नजर

‘रेस’ फिल्‍म की तीसरी सीरीज से जबसे सलमान खान जुड़े हैं तबसे यह फिल्‍म सुर्खियां बटोर रही है. अब इस बार सुपरस्‍टार धर्मेंद्र के बेटे बौबी देओल के लिए अच्‍छी खबर आई है.

दरअसल इस फिल्म के लिए बौबी देओल का नाम भी फाइनल कर लिया गया है. फिल्‍म ‘रेस 3’ के प्रोड्यूसर रमेश तौरानी ने सोशल मीडिया के जरिये यह खबर दी है.

तौरानी ने मीडिया को बताया, “मैंने बौबी के साथ फिल्म ‘सोल्जर’ और ‘नकाब’ में काम किया है और वो एक अच्छा अनुभव था. वो बेहद प्रोफेशनल और अच्छे इंसान हैं इसलिए उनके साथ काम करना काफी दिलचस्प होता है. इस फिल्म के लिए उन्हें एक दम अलग तरह से स्टाइल किया जाएगा और फैंस उन्हें एक नए लुक में देखेंगे. रेस के सारे किरदारों को समझने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी.”

बता दें कि फिल्‍म ‘सोल्‍जर’ में लंबे बालों वाले लुक से बौलीवुड में छा गये थे. बौबी ने ‘बरसात’, ‘गुप्‍त’ जैसी कई सुपरहिट फिल्‍में दी लेकिन इन कुछ सुपरहिट फिल्‍में देने के बाद वह अचानक फिल्‍मों से गायब हो गए थे. हाल ही में बौबी, श्रेयस तलपड़े द्वारा निर्देशित फिल्‍म ‘पोस्‍टर ब्वायेज’ में नजर आ चुके हैं. इस फिल्म से पहले वह आखिरी बार 2014 में फिल्‍म ‘यमला पगला दीवाना’ में नजर आए थे.

हाल ही में एक इंटरव्‍यू के दौरान खुद बौबी देओल ने कहा था, ‘मैं बेसब्री से काम का इंतजार कर रहा था और काम करने के लिए मर रहा था.’ उनका कहना है कि जब आप सालों तक काम नहीं करते तो लोगों को लगने लगता है कि आप या तो आप काम नहीं करना चाहते या आलसी हैं, या फिर खुश हैं और आराम कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है. मैं इस पूरी इमेज से बाहर निकलने के लिए बहुत मेहनत कर रहा हूं और उम्‍मीद करता हूं कि अब लोग मुझे एक नई नजर से देखेंगे.

खबरें हैं कि मशहूर कोरियोग्राफर रेमो डिसूजा इसे निर्देशित करने वाले हैं. इस फिल्म के लिए और भी कई स्टार्स के नामों की चर्चा हो रही थी, लेकिन अब तक बौबी देओल के साथ इसमें सलमान खान, जैकलीन फर्नांडिज और इमरान हाशमी का नाम ही फाइनल हुआ है. खबरें हैं कि ‘रेस 3’ की शूटिंग नवंबर से शुरू होगी और यह फिल्‍म अगले साल ईद के मौके पर रिलीज होगी.

मेट्रो के बढ़े किराये पर राजनीति तेज

मेट्रो का बढ़ा किराया मंगलवार से लागू हो गया. इस पर आम लोगों ने तो गुस्सा जाहिर किया ही, दिल्ली विधानसभा से लेकर सड़क तक भी तकरार नजर आई. ‘आप’ ने एक बार फिर इसके पीछे साजिश की बात कहकर भाजपा पर निशाना साधा, वहीं भाजपा ने दिल्ली सरकार पर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया. एबीवीपी ने सड़कों पर प्रदर्शन किया तो वहीं ‘आप’ ने मेट्रो स्टेशनों पर सत्याग्रह करने का ऐलान कर दिया है.

 ‘आप’ दो दिन किराया सत्याग्रह करेगी

दिल्ली मेट्रो का किराया बढ़ाने के विरोध में ‘आप’ सत्याग्रह करेगी. मंगलवार को ‘आप’ ने कहा कि केंद्र ने जबरदस्ती किराया बढ़ाया है. बुधवार और गुरुवार को शाम चार बजे ‘आप’ कार्यकर्ता हर मेट्रो स्टेशन पर लोगों को जागरूक करेंगे. इसके अलावा 13 अक्तूबर को केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय का घेराव करेंगे.

‘आप’ के प्रदेश संयोजक और दिल्ली सरकार में मंत्री गोपाल राय ने कहा कि किराया बढ़ने से मेट्रो से यात्रा करने वालों की संख्या में कमी आएगी. लोग यातायात के दूसरे साधनों की तरफ जाएंगे. उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र की भाजपा सरकार ने निजी कैब कम्पनियों को फायदा पहुंचाने के लिए मेट्रो का किराया बढ़ाया है. आंदोलन के सिवाय ‘आप’ के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है. ‘आप’ कार्यकर्ता मेट्रो स्टेशन के बाहर खड़े होकर न केवल विरोध करेंगे, बल्कि जनता से संवाद भी स्थापित करेंगे.

‘मेट्रो खाली हो जाएगी, सड़कों पर जाम बढ़ेगा’

दिल्ली सरकार के लोकनिर्माण मंत्री सत्येंद्र जैन ने मेट्रो किराये में वृद्धि को बड़ी साजिश करार दिया है. जैन मंगलवार को विधानसभा में बोल रहे थे. उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार के विरोध के बावजूद किराया बढ़ा दिया गया. इससे सड़कों पर जाम बढ़ेगा. लोग मेट्रो छोड़कर निजी वाहनों का इस्तेमाल करेंगे. सत्येंद्र जैन ने कहा कि मेट्रो में हर वर्ष आठ फीसदी तक यात्रियों का इजाफा होता है. किराया बढ़ाने के बाद यदि यात्रियों की संख्या में इजाफा नहीं होता है तो इससे साफ हो जाएगा कि लोग मेट्रो को लेकर उत्साहित नहीं हैं.

‘दस दिन पहले जागी सरकार’

विधायक ओपी शर्मा ने आरोप लगाया कि दिल्ली सरकार मेट्रो किराये पर महज दस दिन पहले जागी है. मेट्रो में दिल्ली सरकार की भी 50 प्रतिशत हिस्सेदारी है. 2009 से अब तक मेट्रो किराया चार बार में 21 प्रतिशत बढ़ा है. 2016 में किराया बढ़ाने के लिए कमेटी बनी थी, जिसमें 91 प्रतिशत किराया बढ़ाने का फैसला किया गया था. शर्मा ने कहा कि सरकार को मेट्रो के अगले चरणों को पूरा करने के लिए काम करना चाहिए ताकि यात्रियों को इन सेवाओं का लाभ मिले.

‘किसी राज्य को नहीं सौंप सकते’

मेट्रो में बढ़े किराये पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और शहरी विकास मंत्री हरदीप सिंह पुरी में पत्र युद्ध छिड़ा है. केजरीवाल, पुरी को पत्र भेज रहे हैं और वे उनका जवाब भेज रहे हैं. ताजा पत्र में पुरी ने केजरीवाल को जवाब भेजते हुए कहा कि मेट्रो ज्वाइंट वेंचर में चलती है. इसे किसी राज्य को नहीं दिया जा सकता.

पुरी ने कहा, मुख्यमंत्री केजरीवाल को उनके अफसरों ने ठीक से नहीं बताया. एफसीसी की सिफारिशें रोकना डीएमआरसी बोर्ड के अधीन नहीं है. इस बाबत बार-बार सच्चई को नजरअंदाज किया जा रहा है. केजरीवाल तथ्यों से दूर हैं. शहरी विकास मंत्री ने कहा कि डीएमआरसी 50-50 के ज्वाइंट वेंचर में है.

जनता बोली, हमारा बजट बिगड़ गया

मेट्रो किराये में मंगलवार से बढ़ोतरी होने के बाद दिल्ली वाले परेशान नजर आए. छात्रों से लेकर दफ्तर जाने वाले कामगारों और आम लोगों ने परेशानी होने की बात कही. वहीं, कुछ लोग किराए में बढ़ोतरी से अंजान थे. इस दौरान कई जगह किराए में बढ़ोतरी के खिलाफ प्रदर्शन भी हुए.

मयूर विहार फेस 1 मेट्रो स्टेशन. सुबह 11: 00 बजे : मयूर विहार फेस 1 मेट्रो स्टेशन पर सुबह के समय अन्य दिनों की तरह ही काफी भीड़ थी. यहां कुछ यात्री ऐसे मिले जिन्हें किराये में बढ़ोतरी की जानकारी नहीं थी. संजय सैनी ने अपने बेटे के साथ राजेंद्र पैलेस के लिए दो टोकन खरीदे तो उन्हें प्रति टोकन 40 रुपये चुकाने पड़े. इससे नाराज होकर वे मेट्रो सहायता केंद्र पर मौजूद ऑपरेटर से बहस करने लगे. उन्हें किराये में बढ़ोतरी की जानकारी दी गई. संजय ने बताया कि पहले वे 18 रुपये देते थे, फिर 30 रुपये देने लगे और अब यह किराया बढ़कर 40 हो गया है. उन्होंने कहा कि वे अब डीटीसी से चलने के बारे में सोच रहे हैं.

विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन, दोपहर 02: 00 बजे : विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन पर डीयू के कई छात्रों ने किराये में बढ़ोतरी पर निराशा जताई. लॉ फैकल्टी में पढ़ने वाले छात्रा अनुभव कौशिक ने बताया कि वे गुरुग्राम से आते हैं. उन्होंने कहा कि इस वर्ष दो बार किराया बढ़ाया जा चुका है. उनके लिए कॉलेज आना काफी महंगा होता जा रहा है. यहां भी कई लोग ऐसे थे जिन्हें किराये में बढ़ोतरी की जानकारी नहीं थी, लेकिन जब अधिक पैसे कटे तो वे ग्राहक सेवा केंद्र गए. छात्रों का एक ग्रुप मेट्रो परिसर के अंदर इसी विषय पर बात कर रहा था. इनमें से कुछ छात्रों ने कहा कि इस बढ़ोतरी के कारण उनका बजट ही बिगड़ गया है.

राजीव चौक पर किराये को लेकर बहस, शाम 4:30 बजे : राजीव चौक के गेट नंबर-5 पर किराए में बढ़ोतरी का विरोध करने और उसका समर्थन करने वाले लोग भी मिले. इन लोगों के बीच किराये में वृद्धि पर बहस कराई गई. अशोक कुमार और टीएन धींगरा अपने बुजुर्ग मित्रों के साथ मेट्रो के किराये में बढ़ोतरी का समर्थन कर रहे थे. उन्होंने कहा कि अगर बेहतर सुविधा लेनी है तो पैसे तो खर्च करने ही पड़ेंगे . उन्होंने कहा कि मेट्रो पहले से घाटे में चल रही है. अगर किराया नहीं बढ़ाया गया तो इसका हाल भी डीटीसी जैसा होगा. यहीं पर कुछ युवा किराये में वृद्धि का विरोध करते नजर आए. सचिन ने कहा कि सरकार ने चार महीने में दूसरी बार किराया बढ़ा दिया है. इससे न सिर्फ गरीब बल्कि मेट्रो में चलने वाले 80 फीसदी मध्यमवर्गीय श्रेणी के लोगों को भी दिक्कत आएगी. उन्होंने कहा कि लोगों की सैलरी बढ़ नहीं रही है, लेकिन दफ्तर तक पहुंचने का खर्च तेजी से बढ़ रहा है.एक युवक ने कहा कि वह छत्तरपुर से नोएडा आता है. पहले 23 रुपये लगते थे. फिर 41 रुपये लगने लगे और अब 54 रुपये. इससे बजट बिगड़ गया है.

‘मेट्रो का एक दिन के लिए बहिष्कार करें’

राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर किराया वृद्धि के खिलाफ युवाओं ने अभियान चलाया. एक दर्जन युवा किराये में बढ़ोतरी के खिलाफ लोगों से एक दिन के लिए मेट्रो का बहिष्कार करने की अपील कर रहे थे. अमित ने बताया कि पिछली बार किराया बढ़ाने का फैसला हुआ था तो उन्होंने लोगों से यह अपील की थी. इस अभियान की वजह से करीब 5 लाख कम लोगों ने मेट्रो की यात्रा की थी.

विभागों की चक्करघिरनी में फंसा बिहार पर्यटन

बिहार के चप्पेचप्पे में पर्यटन बिखरा हुआ है. इस के बावजूद यहां का पर्यटन उद्योग दम तोड़ रहा है. पर्यटन की बदहाली पर गौर करें तो इस की वजह साफ हो जाती है. राज्य की पर्यटन नीति यहां की औद्योगिक नीति के तहत संचालित होती है. औद्योगिक नीति को उद्योग विभाग तय करता है. वहीं टूरिस्ट बसों को परिमिट देने का काम परिवहन विभाग के पास है. टूरिस्ट होटलों के रजिस्ट्रेशन का नियंत्रण 1863 के सराय ऐक्ट के तहत जिलाधीश की मुट्ठी में है. इस लिहाज से पर्यटन विभाग कहने को ही पर्यटन विभाग है. उस के पास अपने बूते पर्यटन की तरक्की की योजना बनाने की बात तो दूर, एक कदम अपनी मरजी से चलने की भी क्षमता नहीं है.

पर्यटन स्थलों के रखरखाव के अलावा पर्यटन विभाग के पास कोई काम नहीं है. ऐसी हालत में राज्य में पर्यटन की तरक्की की बात ही बेमानी हो जाती है.

बिहार का पर्यटन कई विभागों के जाल में फंसा हुआ है. कोई भी नई योजना बनाने और उसे पास कराने के लिए उसे कई विभागों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, इस से राज्य का पर्यटन उद्योग लचर व लाचार बन कर रह गया है. हालत यह है कि पर्यटन के क्षेत्र में निवेश के नाम पर केवल बयानबाजी और ऐलान ही होते रहे हैं. बिहार में पर्यटन की तमाम संभावनाओं के बाद भी कोई निवेशक आगे नहीं आ पाता है. दरअसल, राज्य के पर्यटन में निवेश करने के लिए कई देशी और विदेशी निवेशक इच्छुक हैं, पर विभागों की चक्करघिरनी में फंसने को वे भी तैयार नहीं हैं.

फाइलों में उलझी योजना

साल 2003 में केंद्रीय पर्यटन विभाग ने 20 सालों के लिए एक बड़ी योजना बनाई. उस वक्त पर्यटन के दिन फिरने की उम्मीद जगी थी, पर 13 सालों के बाद भी 241 पृष्ठों में बनी योजना फाइलों से बाहर नहीं निकल सकी. जिस से पर्यटन उद्योग पंगु होता गया और पर्यटक बिदकने लगे.

राज्य सरकारें पर्यटन की तरक्की को ले कर कितनी लापरवाह और उदासीन हैं, इस का अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि साल 2010 में अलग पर्यटन नीति बनने के बाद भी उस पर रत्तीभर भी अमल नहीं हो सका है. इतना ही नहीं, पर्यटन विभाग को सभ्य बनाने की सारी कवायद उस समय धराशायी हो गई जब साल 2011 में पर्यटन नीति को फिर से औद्योगिक नीति से जोड़ दिया गया. इस से पर्यटन की तरक्की की जो उम्मीद जगी थी वह एक बार फिर से टूट गई. और तब से पर्यटन उद्योग की हालत लगातार खस्ता होती जा रही है.

नई और अलग पर्यटन नीति बनने के बाद कुछ निवेशक निवेश के  लिए आगे आए थे पर बाद में उन्होंने अपने कदम वापस खींच लिए. पर्यटन नीति वापस उद्योग विभाग की चारदीवारी में कैद हो गई. बिहार के ही एक बड़े बिल्डर ने पर्यटन में निवेश का मूड बनाया था, पर कुछ दिनों की बातचीत के बाद ही सरकारी रवैए व विभागों की उदासीनता देख उस ने भी अपने कदम वापस खींच लिए. बिल्डर का कहना है कि कई विभागों के जाल में पर्यटन विभाग के फंसे होने की वजह से पर्यटन से जुड़ी किसी भी छोटीबड़ी योजना को पास कराने के लिए निवेशक को पर्यटन विभाग के साथ उद्योग विभाग के चक्कर काटने पड़ेंगे. इस से सारा मामला बाबुओं की टेबलों के बीच चक्कर लगाता रह जाएगा.

राज्य में पर्यटन की तरक्की के लिए राज्य सरकार ने कुछ राज्यों के पर्यटन और पर्यटन नीति के बारे में जानकारियां इकट्ठी कीं पर उस पर कोई अमल नहीं हो सका. गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे पर्यटन के मामले में विकसित राज्यों में पर्यटन से जुड़ी तमाम योजनाएं पर्यटन नीति के तहत ही बनती और अमल में लाई जाती हैं. बिहार में सरकार ऐसा करने में लापरवाही बरतती रही है जिस से यहां पर्यटन की हालत बदतर होती जा रही है.

पर्यटन से प्राप्ति

समूची दुनिया में पर्यटन ही इकलौता उद्योग है जिस की पिछले 20 सालों के दौरान विकास दर 5 फीसदी प्रतिवर्ष है. वहीं ग्लोबल जीडीपी में पर्यटन उद्योग का योगदान 11 फीसदी है. दुनिया के कुल रोजगार में से 8 फीसदी रोजगार पर्यटन उद्योग में है. वर्ल्ड ट्रैवल ऐंड टूरिज्म काउंसिल के सर्वे के मुताबिक, भारत के जीडीपी में पर्यटन का योगदान 6.60 फीसदी तक हो सकता है और देश में पैदा होने वाले कुल रोजगार में 7.70 फीसदी पर्यटन में होगा.

बिहार में पर्यटन स्थलों के आसपास का माहौल और सुविधाएं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की नहीं हैं. विदेशी पर्यटकों के साथ भारत के दूसरे राज्यों के पर्यटकों में बिहार की छवि यही बनी हुई है कि यहां पर्यटकों की सुरक्षा का खास इंतजाम नहीं है, सड़क और बाकी परिवहन की सुविधा दुरुस्त नहीं है. राज्य में राजगीर, वैशाली, नालंदा और बोधगया जैसे कई बौद्ध पर्यटन स्थल होने के बाद भी दुनियाभर में उस का खास प्रचारप्रसार नहीं किया गया है. पर्यटकों की सुरक्षा के लिए अलग फोर्स नहीं है और न ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर के गाइड ही हैं. लिहाजा, यहां विदेशी पर्यटकों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.

बिहार में धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, ग्रामीण, योग आधारित पर्यटन और बुद्धिस्ट, सिख, सूफी और जैन सर्किट हैं. राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में सेवाक्षेत्र का योगदान 56.40 फीसदी है और इस में होटल तथा रैस्टोरैंट का हिस्सा 22.30 फीसदी है.

पर्यटन मामलों के जानकार सुनील राज बताते हैं कि अगर बिहार सरकार पर्यटन पर ध्यान दे तो इस में काफी ऊंची छलांग लगाई जा सकती है. राज्य में होटलों के कमरों और पर्यटकों का औसत एक कमरा, प्रति एक हजार भी नहीं है.

उपेक्षा की मार

बिहार में पिछले साल पर्यटन का बजट 155 करोड़ रुपए के करीब था, जिस में योजना मद के लिए केवल 8.43 करोड़ रुपए तय किए गए थे. इस से स्पष्ट हो जाता है कि राज्य सरकार पर्यटन को ले कर कितनी लापरवाह व उदासीन है.

इसी लापरवाही की वजह से बिहार सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी राज्य में देसी और विदेशी पर्यटकों की संख्या में कोई खास इजाफा नहीं हो पा रहा है. साल 2014 से 2 करोड़ 25 लाख 44 हजार 377 देसी और 8 लाख 29 हजार 508 विदेशी पर्यटक बिहार आए. साल 2012 और 2013 में भी यह आंकड़ा इसी के आसपास था. साल 2012 में 2 करोड़ 14 लाख 47 हजार 099 देसी और 10 लाख 96 हजार 933 विदेशी पर्यटकों ने बिहार के पर्यटन स्थलों का भ्रमण किया. 2013 में 2 करोड़ 15 लाख 88 हजार 306 देसी और 7 लाख 56 हजार 835 विदेशी पर्यटक बिहार घूमने आए थे. विदेशी पर्यटकों के मामले में बिहार की हालत देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले ठीकठाक है पर देसी पर्यटकों को लुभाने के मामले में बिहार टौप 10 की सूची में नहीं है.

आर्थिक मामलों के जानकार विनोद पांडे कहते हैं कि बिहार की जीडीपी और रोजगार पैदा करने के मामले में पर्यटन का योगदान जीरो है. वहीं, पर्यटन के क्षेत्र में निवेश का आंकड़ा भी जीरो ही है. यूनाइटेड नैशन वर्ल्ड टूरिस्ट और्गेनाइजेशन के मुताबिक, भारत के सकल घरेलू उत्पाद में पर्यटन का योगदान करीब 6.7 फीसदी है. पर्यटन के क्षेत्र में करीब 3 करोड़ रोजगार सृजन हो रहा है. वहीं, देश के कुल निवेश का 6.2 फीसदी पर्यटन के क्षेत्र में हो रहा है.

टौप 5 सूची में लाने की कवायद

पर्यटन के क्षेत्र में काफी पिछड़ने के बाद अब राज्य सरकार की नींद खुली है. उस ने पर्यटन के मामले में बिहार को देश के टौप 5 राज्यों की लिस्ट में शुमार कराने के लिए कमर कस ली है. इस के लिए पर्यटन रोडमैप बनाने की कवायद शुरू की गई है. राज्य की पर्यटन मंत्री अनिता देवी ने बताया कि इस के लिए मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जा रहा है और रोडमैप बनाने के लिए कंसल्टैंट की बहाली की जाएगी. पर्यटन विभाग के साथ कलासंस्कृति विभाग भी इस में मदद करेगा. उन्होंने  उम्मीद जताई कि रोडमैप को जमीन पर उतारने के बाद पर्यटन के क्षेत्र में बिहार लंबी छलांग लगाएगा.

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