बी प्रैक्टिकल : प्रमोशन के लिए क्या करना पड़ा

बीके सिंह ईस्ट ऐंड वैस्ट कंपनी में काम करते हैं. वे जन्मजात प्रैक्टिकल आदमी हैं. कायदे से उन के जैसे काबिल आदमी का प्रमोशन हो जाना चाहिए. वह भी तब, जब जोनल मैनेजर अपनी जाति का हो. लेकिन जुगाड़ बैठ नहीं रहा है.

दरअसल, बीके सिंह का मुकाबला एक दूसरे प्रैक्टिकल आदमी से है. दूसरा यानी केपी पांडे. वे चतुर तो हैं ही, बैकग्राउंड से मजबूत भी हैं. वे 10-20 हजार रुपए यों ही खर्च कर सकते हैं.

यह तो खतरे की घंटी है. सावधान हो गए बीके सिंह. उन को गिरने से पहले ही संभलने की आदत है. मन ही मन उन्होंने एक ऐसी चाल सोची, जिस की काट केपी पांडे के पास नहीं थी.

केपी पांडे विधुर हैं और बीके सिंह एक खूबसूरत पत्नी के पति. बीके सिंह की किस्मत से जलने वालों में जोनल मैनेजर भी थे. जोनल मैनेजर ने शादियां तो की थीं 3, पर 2 स्वर्ग सिधार गईं, एक ने तलाक दे दिया.

अरबपति आदमी पति न हो, तो लड़कियां चिंतित हो जाती हैं. जोनल मैनेजर की चिंता करने वालियों की भी कमी नहीं थी. यह चिंतन शिविर उन की टपकती हुई लार को धार बना रहा था.

एक दिन बीके सिंह ने अपनी पत्नी सुलोचना को कह ही दिया, ‘‘सोच रहा हूं कि बौस को किसी दिन डिनर पर बुला लूं. कैसा रहेगा?’’

‘‘कौन से बौस को? तुम्हारे तो कई बौस हैं. अभी तो बौस शायद खन्ना हैं, जिन से तुम्हारी बिलकुल नहीं बनती.’’

बात को काटते हुए बीके सिंह ने कहा, ‘‘जोनल मैनेजर को बुलाने की सोच रहा हूं. वे कई बार कह चुके हैं कि घर के खाने का मजा ही कुछ और है. बेचारे विधुर जिंदगी जी रहे हैं.’’

‘‘क्यों… हैट्रिक तो वे लगा ही चुके हैं. अब उन्हें क्या परेशानी है? वे एक और ले आएं.’’

बातचीत से यह अंदाजा तो लग ही जाता है कि सुलोचना उन पत्नियों में से नहीं हैं, जो केवल ‘जी हां’ कहती हैं. वह वकालत में ग्रेजुएट थी. प्रैक्टिस शुरू नहीं की थी. उसे अपने पति के पैतरे पसंद नहीं थे.

उसे जो बात पसंद नहीं आती, साफसाफ कहना पसंद करती थी. यह सच बीके सिंह पर भी शादी के सालभर के अंदर ही सामने आ चुका था.

बीके सिंह ने बच्चे पैदा करने की योजना पर बात करने की कोशिश की, तो सुलोचना ने साफ मना कर दिया. उस का मानना था कि पहले एकदूसरे को जान तो लें कि बच्चे पाल भी सकेंगे या नहीं. कम से कम 2 साल तो पूरे हो जाने दो.

बीके सिंह को अगर शाप देना आता, तो कमंडल से पानी ले कर सुलोचना को शाप दे देते, ‘ऐ दुष्ट बालिके, तू ने बाबा की आत्मा को कष्ट दिया है. जा, तू अनंतकाल तक मां नहीं बनेगी. पर ऐसा हो न सका.

‘‘मैं इस रविवार को ही उन्हें खाने पर बुला लेता हूं,’’ ऐसा कह कर बीके सिंह ने अपनी बात रखी.

सुलोचना ने भी ज्यादा बहस नहीं की, तो बीके सिंह ने उसे हां के रूप में लिया और रविवार को जोनल मैनेजर को डिनर पर बुला लाए.

जोनल मैनेजर हिंदी कविताओं के रसिया थे, साथ ही हनी सिंह के गानों के दीवाने भी.

डिनर सर्व कर रही सुलोचना को उन्होंने इशारा कर के बात बीके सिंह से कही, ‘‘हिंदी कविताओं में तो एक ही कवि हुए सुमित्रानंदन पंत… बाले तेरे रूपजाल में कैसे उलझा दूं लोचन. उन के बाद के कवि तो रोते रह गए. उस के बाद भी एक कवि और हो गए. नाम याद नहीं आ रहा. उन की कविता है, ‘अगर मैं ने किसी के होंठ चूमे, अगर मैं ने किसी की मदभरी अंगड़ाइयां चूमीं. महज इस से किसी का पुण्य, मुझ पर पाप कैसे बन गया?’ वाह… वाह… इसे कहते हैं कविता.’’

जोनल मैनेजर को पता था कि यहां कविताएं उन के अलावा किसी और को नहीं आतीं. जो पढ़ेंगे, वह सही ही होगी. वैसे भी बौस जो करते हैं, सही करते हैं. हुआ भी यही. सुलोचना मटन का डोंगा रख कर जा चुकी थी.

सुलोचना के चले जाने से जोनल मैनेजर साहब नाराज हो रहे थे. उन्होंने घूर कर बीके सिंह को देखा.

बीके सिंह प्रैक्टिकल आदमी थे. तुरंत वे बात की तह तक पहुंच गए. सुलोचना को आवाज दी, ‘‘अरे, जरा दही लाना.’’

सुलोचना दही ले कर आई. जोनल मैनेजर साहब ने हनी सिंह की चर्चा छेड़ दी, ‘‘दुनिया में जीना कितना मुश्किल

है. देखो बेचारे हनी सिंह को. उस पर बारबार बेहूदगी फैलाने के आरोप लगा दिए जाते हैं. वह तो गायक है. कलाकार इन चीजों से परे होता है. मैं कहता हूं कि मर्दऔरत का संबंध तो सदियों से चला आ रहा सच है.’’

‘‘आदमी की सोच ही अब छोटी हो गई है सर. एक बच्ची नंगी पड़ी हो, तो भी हमें बेहूदगी नजर नहीं आती है, क्योंकि हम उसे औरत की नजर से नहीं देखते. सोच का ही सारा खेल है,’’ बीके सिंह ने कहा.

जोनल मैनेजर साहब खुश हो रहे थे कि बात की दिशा बिलकुल सटीक जा रही है. बात को और पकड़ाने के लिए उन्होंने सीधे सुलोचना से कहा, ‘‘आप को भी साथ में डिनर कर लेना चाहिए था.’’

‘‘जी नहीं, मैं मांसाहारी नहीं हूं,’’ छोटा सा जवाब दे कर वह चुप हो गई.

जोनल मैनेजर साहब के गरम त पर दो बूंद पानी पड़ा. वे बीके सिंह से बोले, ‘यह गलत बात है सिंह. सुलोचना अगर मांसाहारी नहीं हैं, तो शाकाहारी खाना बनवा लेते. तीनों मिल कर खाना खाते.’’

जोनल मैनेजर साहब को पूरी उम्मीद थी कि सुलोचना अपना कीमती समय उन की झोली में डाल देगी, लेकिन वह तो वहां से जा चुकी थी.

जोनल मैनेजर ने जल्दीजल्दी खाना खत्म किया और कार में बैठ कर चले गए. जाते समय सुलोचना नमस्कार करने के लिए हाजिर हुई, लेकिन इस से उन का मन नहीं भरा.

जोनल मैनेजर साहब के जाते ही बीके सिंह की साढ़ेसाती शुरू हो गई. वह उलझ पड़े, ‘‘अगर 2 मिनट उन के पास बैठ जाती, तो क्या बिगड़ जाता. घर आया मेहमान है, थोड़ा प्रैक्टिकल होना पड़ता है. काम भागे तो नहीं जा रहे थे.’’

‘‘कहां बैठ जाती… उस की गोद में… देखा नहीं, कैसे घूर रहा था वह. तुम अपनी बातें अपने पास ही रखो. मुझे ये चोंचले पसंद नहीं हैं.’’

इस बात को अभी 5 दिन भी नहीं बीते थे कि जोनल मैनेजर साहब की लार बदस्तूर टपकने लगी. उन्होंने बीके सिंह को बुलाया. उस दिन के खाने की तारीफ की. सुलोचना के गुणों की तारीफ की. संस्कारों पर भाषण दिया. लगे हाथ यह कहना भी नहीं भूले कि अगले महीने गुप्ता रिटायर हो रहा है. उस की जगह ईस्ट जोन को एक ईमानदार और मेहनती सबमैनेजर चाहिए.

बीके सिंह ने इसे अपने लिए औफर समझा. उन्होंने अगले रविवार आने का जोनल मैनेजर साहब को न्योता दे दिया.

सुलोचना को इस बात से न तो पहले कोई परेशानी थी, न अब है. उस ने नौकरानी से कह दिया कि एक आदमी का खाना ज्यादा बनेगा.

नियत समय से एक घंटा पहले ही अपनी नीयत संभाले जोनल मैनेजर साहब तशरीफ ले आए. इस बार उन के पास गानों की सीडी के साथसाथ एक किताब भी थी ‘लोलिता’.

बीके सिंह मिठाई लाने अभीअभी मार्केट चले गए थे. उन्हें अंदाजा नहीं होगा कि साहब एक घंटा पहले ही घर आ जाएंगे.

जोनल मैनेजर साहब ने आते  सुलोचना के हाथ में वह किताब रखी और बोले, ‘‘यह पुस्तक वर्ल्ड फेम की है. लोलिता नाम की एक किशोरी की कहानी है. आम सोच का पाठक इस में सैक्स देखता है, लेकिन यह एक चिंतन है. आप इसे जरूर देखें. आप तो एक सुलझी हुई औरत हैं.’’

सुलोचना ने किताब ले तो ली, लेकिन उसे उन के सामने ही टेबिल पर रख कर अंदर कमरे में जा कर तकिए पर नया कवर चढ़ाने लगी.

जब सुलोचना पानी ले कर जोनल मैनेजर के पास आई, तो उन्होंने कहा, ‘‘आप इतनी खूबसूरत हैं… मौडलिंग वगैरह क्यों नहीं कर लेतीं?’’

इस पर सुलोचना ने जो कहा, उस की उम्मीद नहीं थी, ‘‘आप की उम्र इतनी ज्यादा हो गई है. आप किसी आश्रम में क्यों नहीं चले जाते?’’

जोनल मैनेजर साहब यह सुन कर सोचने लगे, ‘क्या यह बदनसीब नहीं जानती कि उन के पति की किस्मत उन के ही हाथों में कैद है? क्या इस अभागी को इस बात की भी जानकारी नहीं कि वे अगर खुश हो जाएं, तो उस की जिंदगी बना सकते हैं?’

अब जोनल मैनेजर साहब अपने असली रूप में आने लगे,  ‘‘आप मेरी बेइज्जती कर रही हैं. मैं ने आप की तारीफ की और आप मेरी बुराई कर रही हैं. यह शिष्टाचार नहीं है.’’

‘‘इस में बुराई वाली बात कहां से आ गई. बूढ़ा होना कोई गुनाह नहीं है. सभी लोग बूढ़े होते हैं. यह बेइज्जती कैसे हो गई? एक सचाई आप ने कही और एक सचाई मैं ने.

‘‘रही शिष्टाचार की बात, तो किसी सहकर्मी के घर उस की गैरहाजिरी में आना और उस की पत्नी को बेहूदा किताब भेंट करना क्या है? मैं तो कहती हूं कि समय के पहले आना भी अशिष्टता है.’’

‘‘तुम नहीं जानती कि किस से बात कर रही हो. मैं चाहूं तो एक क्षण में तुम्हारे पति को सड़क पर खड़ा कर सकता हूं.’’

‘‘और अगर मैं चाहूं, तो तुम्हें अटैंप्ट टू रेप के जुर्म में जेल भिजवा सकती हूं. मैं ने भी वकालत की डिगरी चोरी से हासिल नहीं की है.

‘‘जब तक कोर्ट में यह साबित होगा कि तुम ने मेरे साथ जिस्मानी संबंध बनाने की कोशिश की या नहीं, तब तक तुम्हारा मुंह पूरी तरह से काला हो चुका होगा. चुपचाप शांत बैठो और खाना पकने तक इंतजार करो.’’

जोनल मैनेजर साहब एकदम से दनदनाते हुए निकल जाना चाहते थे, लेकिन लग रहा था कि किसी ने सारी हवा निकाल दी हो. टांगें काम नहीं कर रही थीं. उन्हें बीके सिंह पर गुस्सा आ रहा था कि मनहूस कहां चला गया. अब तक उसे आ जाना चाहिए था. उस

को तो कलाकंद मिठाई लाने के लिए भेजा था, कोलकाता जाने को तो नहीं कहा था.

कलाकंद मिठाई का पैकेट लिए बीके सिंह आए तो देखा कि साहब किसी से फोन पर बात कर रहे हैं. उन्होंने बीके सिंह की ओर देखा भी नहीं और बोले, ‘‘आज का प्रोग्राम रहने दो, फिर कभी खा लेंगे. एक अर्जैंट फोन आ गया है…’’

बीके सिंह अभी बोलने के लिए उचित शब्द तलाश ही रहे थे कि साहब दनदनाते हुए निकल गए. भागते हुए बीके सिंह कार तक गए जरूर, लेकिन दरवाजा खोलने का भी मौका नहीं मिला.

अंदर आते ही बीके सिंह सुलोचना पर फुंफकारे, ‘‘तुम ने हमारे साहब की बेइज्जती की होगी. वह इतने गुस्से में क्यों थे?’’

सुलोचना, जो जोनल मैनेजर के जाने की खुशी मना रही थी, इस बेहूदा सवाल से झल्ला गई. उस ने कहा, ‘‘जोनल मैनेजर की बेइज्जती तो की ही, लेकिन उस के असली हकदार तुम हो. उस के कहने पर कलाकंद मिठाई लेने चले गए अकेली पत्नी को दांव पर लगा कर. बौस खुश हो गया, तो प्रमोशन हो जाएगा. क्यों?

‘‘तुम ने मुझे पहचाना ही नहीं आज तक, नहीं तो मुझे प्लेट में सजा कर पेश करने की हिम्मत नहीं दिखाते. अच्छा हुआ वह चला गया, नहीं तो चप्पल से खातिरदारी करती मैं उस की.’’

‘‘तुम समझती क्या हो अपनेआप को. बड़ा आदमी है, जरा हंसबोल लोगी, तो तुम्हारा यह रूप घिस नहीं जाएगा. वह अगले महीने मुझे ईस्ट जोन का सबमैनेजर बनाने वाला था. तुम ने सब गुड़गोबर कर दिया.’’

‘‘अपने बूते कुछ कर नहीं सकते, तो बीवी को ढाल बना लिया. मैं द्रौपदी

नहीं हूं कि दांव पर लगा दोगे और मैं कन्हैयाकन्हैया कर के रोने लगूंगी. मैं उस का मुंह नोच लूंगी. उस का भी और तुम्हारा भी. मुझे तो तुम्हारे चेहरे से घिन हो रही है.’’

बीके सिंह अभी इतने भी प्रैक्टिकल नहीं हुए थे कि बीवी की गालियां सुनने के बाद भी मुसकरा सकें. उन की नजर में जरा सा हंसबोल लेना गलत नहीं था. सभी करती हैं. यह जमाना ही कारोबार का है. जिस के पास जो बैस्ट है, दे रहा है. एक बार आदमी कामयाब हो जाए, तो कोई नहीं पूछता कि कामयाबी के सूत्र क्या थे?

सुलोचना थोड़ी पुराने खयालों की थी. वह अभी उतनी प्रैक्टिकल नहीं हुई थी.

पीएम बनने के अलावा विकल्प नहीं था : मनमोहन

संप्रग सरकार में लगातार दो बार प्रधानमंत्री रहे डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि उनके पास प्रधानमंत्री बनने के फैसले पर विचार के लिए विकल्प ही नहीं था. उन्होंने ये बातें पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की पुस्तक के विमोचन मौके पर कही.

तीन मूर्ति सभागार में पूर्व राष्ट्रपति की पुस्तक ‘द कोलिशन ईयर्स’ के विमोचन मौके पर मनमोहन सिंह ने कहा कि उनकी इस स्थिति से प्रणब मुखर्जी भलीभांति परिचित थे. मनमोहन सिंह ने वर्ष 2004 में अपने प्रधानमंत्री बनने का जिक्र करते हुए कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उन्हें इस पद के लिए चुना और प्रणबजी मेरे बहुत ही प्रतिष्ठित सहयोगी थे. उनके (मुखर्जी के) पास यह शिकायत करने के सभी कारण थे कि मेरे प्रधानमंत्री बनने की तुलना में वह इस पद के लिए अधिक योग्य हैं. लेकिन वे इस बात को भी अच्छी तरह जानते थे कि मेरे पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था. उनकी इस टिप्पणी पर प्रणब मुखर्जी और मंच पर बैठे कांग्रेस नेताओं के साथ पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी भी हंस पड़ीं.

राजनीतिक यात्र समझने का प्रयास : मुखर्जी

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि उन्होंने अपनी पुस्तक ‘द कोलिशन ईयर्स’ में राजनीतिक कार्यकर्ता की नजर से 1996-2004 तक की लंबी राजनीतिक यात्र को समझने और समीक्षा का प्रयास किया है. उन्हें संसद में लंबा अनुभव रहा है और देश के कई बड़े नेताओं को सुनने का मौका मिला. प्रणब ने कहा कि यह पुस्तक किसी इतिहासकार की नजर से नहीं बल्कि एक राजनीतिक कार्यकर्ता के नजरिये से लिखी गई है.

‘ओजे सिंपसन केस’ जैसी पहेली है आरुषि केस

बहुचर्चित आरुषि तलवार हत्याकांड दुनिया के सबसे चर्चित ओजे सिंपसन केस से हूबहू मेल खाता है. दोनों ही मामलों में साक्ष्यों के अभाव में मुख्य आरोपियों को बरी कर दिया गया.

क्या है ओजे सिंपसन केस

लॉस एंजिलिस में 13 जून 1994 को नेशनल फुटबाल लीग के पूर्व खिलाड़ी ओजे सिंपसन ने पूर्व पत्नी निकोल ब्राउन सिंपसन और एक रेस्टोरेंट के वेटर रॉन गोल्डमैन की हत्या कर दी थी. ओजे ने निकोल के सिर पर कई बार वार किया था जिससे उसका सिर लहूलुहान हो गया और उनकी गले की हड्डी भी चूर चूर हुई थी. वारदात के दो घंटे बाद पहुंची पुलिस को मौके से खून से सना एक दस्ताना मिला था. वारदात की सूचना देने और जांच के लिए ओजे के घर पहुंची पुलिस टीम को वह नहीं मिले. वह वारदात की रात ही शिकागो निकल गए थे.

जांच टीम ने घर की दीवार फांद कर प्रवेश किया, घर के पिछवाड़े उन्हें खून के कुछ धब्बे मिले थे. नाटकीय ढंग से 17 जून 1994 को ओजे सिंपसन की गिरफ्तारी हुई. लगभग 16 महीने बाद 3 अक्तूबर 1995 को कोर्ट ने ओजे सिंपसन को सबूतों के अभाव में मामले से बरी कर दिया.

ऐसे आरोप झुठलाये गए

डीएनए: पुलिस ने सिंपसन के खिलाफ बेहद सटीक और कसा हुआ केस तैयार किया था. सबूत के तौर पर उस वक्त नए प्रचलन में आई डीएनए जांच को आधार बनाया गया था. लेकिन सिंपसन के वकीलों ने खून के नमूनों को गलत ढंग से लेने और लैब में सही तरीके से उसके रखरखाव का आरोप लगाते हुए इस जांच को बेबुनियाद साबित कर दिया था.

पुलिस जांच: सिंपसन के वकीलों ने इस मामले में लास एंजिलिस पुलिस की जांच को संदिग्ध साबित कर दिया. सबूत की तलाश न कर पाना, शिकागो में मौजूद सिंपसन को केस में फंसाने के लिए झूठी कहानी गढ़ना जैसे आरोप लगाकर पुलिसिया जांच को निराधार साबित कर दिया.

स्टेटस से खिलवाड़: ओजे सिंपसन की प्रसिद्धी को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाते हुए उनके वकीलों ने मीडिया में अलग सा माहौल तैयार कर दिया. केस को कमजोर करने में इसका बहुत लाभ मिला.

आखिर कब छूटेगी रणबीर कपूर की ये आदत

बी टाउन के चौकलेटी एक्टर कहे जाने वाले रणबीर कपूर अक्सर अपनी फिल्मों के साथ साथ स्मोकिंग कि वजह से भी सुर्खियों में रहने लगे हैं. हाल ही में फिल्म ‘रईस’ से बौलीवुड में डेब्यू करने वाली पाकिस्तानी एक्ट्रेस माहिरा खान को रणबीर कपूर के साथ स्मोकिंग करते देखा गया था.

जिसके बाद उनकी तस्वीरें काफी वायरल हुई थी. साथ ही माहिरा खान और रणबीर कपूर के अफेयर की भी चर्चा होने लगी हैं. लेकिन रणबीर के साथ ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है कि जब वो अपनी स्मोकिंग की वजह से चर्चा में हैं. रणबीर पहले भी बी टाउन की एक्ट्रेस कटरीना कैफ के साथ ऐसी ही सुर्खियां बंटौर चुके हैं. आइए बताते हैं वो रोचक किस्सा.

सभी जानते हैं कि रणबीर कपूर और कैटरीना कैफ काफी समय तक एक दूसरे के साथ रिलेशनशिप में रह चुके हैं. मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक उस दौरान भी रणबीर कपूर काफी स्मोकिंग करते थे. जिसकी वजह से कई बार कैटरीना रणबीर कपूर से नाराज हो जाती थीं. लेकिन ऐसा नहीं था कि रणबीर कपूर इस लत से छुटकारा नहीं पाना चाहता थे. कहा जाता है कि रणबीर ने स्मोकिंग छोड़ने के कई तरीके अपने आए थे.

एक न्यूज वेबसाइट के मुताबिक उस वक्त कैटरीना रणबीर कपूर की स्मोकिंग की लत छुड़वाने के लिए उन्हें औस्ट्रिया भी लेकर गई थीं. जी हां, कहा जाता है कि वो कैटरीना ही थीं जो रणबीर को औस्ट्रिया उनकी स्मोकिंग की लत छुड़वाने के लिए हेल्थ केयर के पास लेकर गई थीं. लेकिन इसका भी कुछ खास फर्क नहीं पड़ा था. हां, उन्होंने तीन हफ्तों तक सिगरेट को हाथ तक नहीं लगाया था.

स्मोकिंग छोड़ने को लेकर रणबीर कपूर की ये पहली कोशिश नहीं थी. इसके बाद भी रणबीर ये लत छोड़ने की ट्राई करते रहे बस फर्क सिर्फ इतना था कि अब उनके साथ कैटरीना नहीं बल्कि दीपिका पादुकोण थीं. हम सिर्फ फिल्म में काम करने को लेकर बात कर रहे हैं.

दरअसल ये रणबीर की दीपिका के साथ फिल्म तमाशा के दौरान का मामला है. उस वक्त भी खबर थी कि रणबीर ने सिगरेट छोड़ने के लिए ई हुक्का का सहारा लिया है. जिसकी सलाह उनके दोस्तों ने उन्हें दी है. बता दें कि ई हुक्का में तंबाकू और निकोटिन का इस्तेमाल नहीं होता हैं, इसके इतनी तेजी से पौपुलर होने की वजह भी यहीं है कि इसका नशा सिगरेट से मिलता जुलता हैं.

प्रेम में औनलाइन फ्रौड से इस तरह बचें

नैशनल क्राइम ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार सोशल मीडिया के जरिए की गई दोस्ती और प्रेम ज्यादातर मामलों में फेक आइडैंटिटी का इस्तेमाल होता है जिस कारण प्रेम करने वाली युवतियां औनलाइन ज्यादा फरेब का शिकार होती हैं.

आज देश में 10 करोड़ से ऊपर की आबादी इंटरनैट के विभिन्न माध्यमों जैसे व्हाट्सऐप, गूगल, ट्विटर, इंस्टाग्राम, लिंक्डइन, फेसबुक आदि का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रही है. सरकारी और निजी भागीदारी ने इंटरनैट की पहुंच को जनजन तक पहुंचा दिया है, पर इस का सब से बड़ा खमियाजा उन युवकयुवतियों को भुगतना पड़ रहा है जो बिना सोचेसमझे इंटरनैट से प्रेम की पेंगें बढ़ाते हैं.

वर्चुअल फ्रैंडशिप इंटरनैट की दुनिया के लिए कोई नया शब्द नहीं. एक बड़ा युवावर्ग काल्पनिक दुनिया के अंजामों से बेपरवा लगातार इस की दलदल में धंसता जा रहा है. औनलाइन प्रेम के नाम पर धोखे की हजारों घटनाएं आएदिन घट रही हैं, जिन में अधिकतर मामलों में शोषण, ब्लैकमेलिंग या उगाही के शिकार हुए लोग तब जागते हैं जब उन का सबकुछ लुट चुका होता है.

ऐसे में जरूरी है कि हम सतर्क व सचेत रहें. फ्रैंडशिप जरूर स्वीकार करें पर अलर्ट रह कर.

क्या है वर्चुअल प्रेम

‘वर्चुअल प्रेम’ का सीधा सा तात्पर्य है काल्पनिक प्यार यानी युवकयुवती आमनेसामने न बैठ कर इंटरनैट के माध्यम से प्रेम के तारों को जोड़ते हैं. यहां पहचान के नाम पर पेश करने वाले की एक औनलाइन प्रोफाइल होती है जिस की सत्यनिष्ठा की कोई गारंटी नहीं होती. प्रोफाइल फेक भी हो सकती है. दूर बैठे, उंगलियों की हरकतों पर की गई इस दोस्ती में कोई वास्तविकता नहीं होती. ज्यादातर मामलों में छद्म तसवीर व फेक प्रोफाइल व फेक इनफौर्मेशन को आधार बनाया जाता है.

फ्रौड के इन रास्तों से बचें

अकसर औनलाइन माध्यमों जैसे फेसबुक, ट्विटर आदि के जरिए फेक आइडैंटिटी के साथ फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजी जाती है, जिसे युवतियां आंख मूंद कर स्वीकार कर लेती हैं जो बिलकुल  उचित नहीं. बिना किसी की आइडैंटिटी जाने उस की रिक्वैस्ट ऐक्सैप्ट करना मुसीबत को न्योता देना है.

सिर्फ फेसबुक ही क्यों लिंक्डइन, इंस्टाग्राम, मैसेंजर, ट्विटर जैसी अति सक्रिय ऐप्लिकेशंस को हम अनजाने में अपने एकांत का साथी बना तो लेते हैं, लेकिन तब अनजाने में हम बहुत बड़ी मुसीबत मोल ले रहे होते हैं.

प्रेम के नाम पर चैटिंग तक तो ठीक है पर बात तब बिगड़ती है जब हम एक कदम आगे बढ़ कर डेटिंग, मीटिंग, लाइव सैक्सुअल ऐक्सपोजर, कामुकता आदान प्रदान और एकदूसरे की फाइनैंशियल सपोर्ट तक आ पहुंचते हैं. यहीं से मुसीबत अपना रास्ता बना लेती है.

चैटिंग, डेटिंग, मीटिंग सब करें पर जब तक आप अच्छी तरह से अपने साथी को जान न लें, उस की प्रोफाइल की छानबीन न कर लें तब तक ऐसा करना खतरनाक हो सकता है.

जरा बच के, राह है मुश्किल

प्रेम की राह चलते धोखा खाने वालों में से आप भी एक न हों, इस के लिए कदम जरा सोचसमझ कर बढ़ाएं. प्रेम से गुरेज नहीं, पर ब्लाइंडफेथ को दरकिनार करें तभी होगी सच्ची दोस्ती की भरमार. निम्न बातों का ध्यान जरूर रखें :

– नो कमिटमैंट, नो ट्रस्ट.

– जस्ट फ्रैंडशिप डोंट बी ऐक्सेसिम.

– सौदेबाजी से बच कर मित्रता करें.

– नो फाइंनडिंग, नो डेटिंग.

– गोपनीय सूचनाएं मसलन, घर का पता, टैलीफोन नंबर, अर्निंग सोर्स, पेरैंटस की जौब, आदि गोपनीय ही रखें.

– लाइव वीडियो शेयर न करें.

– लाइव सैक्सुअल ऐक्सपोजर से बचें.

– अनजान लोगों के साथ दोस्ती करने से पहले सौ बार सोचें, प्रोफाइल की पूरी डिटेल का पता लगाएं.

– अकेले में डेटिंग से बचें.

– अपने परिवार में उन दोस्तों के बारे में जरूर बताएं.

क्या करें जब हों साइबर क्राइम का शिकार युवक युवतियां गाहेबगाहे औनलाइन फ्रौड का शिकार होते हैं. ऐसे में कभी धमकी तो कभी शोषण, ऐक्सटौरशन, मनीफ्रौड और ब्लैकमेलिंग आदि की घटनाएं सामने आती हैं. ऐसी घटनाओं को साइबर क्राइम की श्रेणी में रखा जाता है.

इन से संबंधित शिकायत या मुकदमे के लिए विभिन्न थानों के अंतर्गत एक अलग ‘साइबर क्राइम प्रकोष्ठ का गठन किया गया है जहां तुरंत ही इन की शिकायत दर्र्ज करा, संबंधित के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा सकती है.

फेसबुक पर अभद्र टिप्पणी से ले कर फोन पर आने वाले हौक कौल, ब्लैंक कौल या टीजिंग फोन कौल या फिर आप के बैंक खातों आदि से अननौन डैबिट या ट्रांजैक्शन आदि से जुड़े मामलों की तत्काल शिकायत अपने इलाके के थाने में इस प्रकोष्ठ के अंदर की जा सकती है.

साइबर कानून के संज्ञान में आने से शिकायतकर्ता को एक अचूक हथियार मिल गया है. वह अपने साथ हो रहे किसी भी प्रकार के फ्रौड की सूचना यहां दे सकता है. इसलिए चुप न बैठें, आक्रोश दिखाएं. औनलाइन प्रेम के जाल में न फंसे. इस के लिए मुस्तैद रहें, अपनी आंखें खोल कर रखें.

ऐसे मामलों में सटें नहीं और सामने वाले को अपनी किसी भी कमजोरी का फायदा उठाने का अवसर न दें. औनलाइन दोस्ती, चैटिंग आदि से कोई गुरेज नहीं यह वक्त की मांग है, पर सूझबूझ और भरपूर समझदारी के साथ. जगे रहें और दूसरों को हमलावर होने का मौका न दें.

भेदभावों के भेद और ब्लैक लाइफ मैटर्स का नारा

रेस, रिलीजन, कास्ट, रंग के भेदभाव को चुनावी जंग में भुनाना निर्दोषों के लिए महंगा ही पड़ता है. अपने देश में अगर मुसलिम, दलित इस के शिकार बन रहे हैं तो पढ़ेलिखे, उदार, तार्किक अमेरिका में. वहां ‘ब्लैक लाइफ मैटर्स’ के नारे को ले कर लोग रोज जुलूस निकालते हैं क्योंकि देशभर में कालों के खिलाफ उन्माद सा फैलाया गया है. हर काले को नशेड़ी, अपराधी माना जा रहा है और जब चाहे गोरे पुलिस वाले उन्हें रोक कर उन की तलाशी लेनी शुरू कर देते हैं और जरा सा भी चूंचप्पड़ करने पर उन्हें गोली मार दी जाती है. अदालतें छोड़ ही देती हैं गोरे पुलिस वालों को.

यह कहर अब लेटिनो यानी दक्षिण अमेरिका से आए लोगों, चीनियों, वियतनामियों और सब से ज्यादा भारतीयों पर टूट रहा है. अमेरिका के एक शहर इडाहो में भारतीय मूल के टैक्सी ड्राइवर गगनदीप सिंह की 19 वर्षीय गोरे लड़के ने इसलिए हत्या कर डाली कि उसे एक भारतीय के कारण एक विश्वविद्यालय में सीट नहीं मिली. जैसे गोधरा कांड के बाद 2 हजार से ज्यादा मुसलमान आदमियों, औरतों, बच्चों को मारा गया था वैसे ही अमेरिका में भारतीयों को मारा जा रहा है, क्योंकि वे अपनी मेहनत से ऊंची जगह पा रहे हैं. कुछ समय पहले तो डौटबस्टर कह कर बिंदी लगाए काली युवतियों के साथ जम कर बदसुलूकी का दौर चला था.

ताजा मामले में जैकब कोलमैन का गुस्सा इतना था कि उस ने गगनदीप से रास्ते में टैक्सी रुकवाई, फिर एक दुकान से चाकू खरीदा और उस से उस की हत्या कर डाली. कोई रंजिश नहीं, कोई विवाद नहीं, केवल रेशियल भेदभाव.

भारत क्या इस का विरोध कर सकता है? किस मुंह से करेगा? यहां तो हर रोज गौमांस खाने के नाम मुसलिमों को मारा जा रहा है और निचला काम बेगार में न करने पर दलितों को. हम कैसे कहेंगे कि डोनाल्ड ट्रंप का अमेरिका भेदभाव दूर करे जबकि वे चुनाव जीते ही इस भेदभाव को भुना कर हैं. उन्होंने कहा था कि वे श्वेतों का राज फिर कायम करना चाहते हैं. वे चीन की दीवार सी लंबी दीवार मैक्सिको और अमेरिका के बीच खड़ी करना चाहते हैं ताकि आधेकाले आधेगोरे उस के देश में आ ही न सकें. इसीलिए अमेरिकियों ने एक खब्ती को राष्ट्रपति चुन लिया.

बेवकूफ नेता देश का बड़ा नुकसान कर जाता है. हिटलर, मुसोलिनी ऐसे ही खब्ती, जिद्दी थे. उन्होंने रेस, जाति, धर्म का जम कर इस्तेमाल किया और अपने देश में ही कई फाड़ कर दिए. अमेरिका गोरों, कालों, भूरों, पीलों हिंदुओं, मुसलिमों के नाम पर बंट रहा है. इस का नुकसान होगा ही. इंटरनैट ने जोड़ा था अब यही ट्रंप के तोड़क संदेश को हर सिरफिरे तक पहुंचा रहा है.

जब ये एक्टर बोला ‘माई रे माई हमरा ऊहे लइकी चाही’

इन दिनों भोजपुरी सिनेमा के अभिनेता प्रदीप पांडेय ‘चिंटू’ और अभिनेत्री प्रीति ध्‍यानी के प्‍यार के चर्चे जोरों शोरो पर हैं. खबर है कि चिंटू, प्रीति ध्‍यानी को पाने की डिमांड अपनी मां से भी कर चुके हैं!

प्रीति को पाने के लिए वह कई तरह की तिकड़म बाजी भी कर रहे हैं. लेकिन सवाल ये है कि क्या ‘चिंटू’ की मां उनकी बात मानेंगी और क्या इन दोनों का मिलन संभव हो पाएगा?

अब अगर इसका जवाब चाहिए तो आप थोड़ा इंतजार कीजिए, क्‍योंकि ये बातें हैं उस पिक्‍चर की, जो अब फ्लोर पर आने को तैयार और बेकरार है. जी हां, हम सही कह रहे हैं. अब आप ज्यादा सोचिये नहीं क्योंकि अंजलि फिल्म्स क्रिएशन के बैनर तले बनी ‘माई रे माई हमरा ऊहे लइकी चाही’ में चिंटू और प्रीति की रोमांटिक जोड़ी जल्‍द ही दर्शकों की सामने होगी.

इस फिल्‍म में चिंटू और प्रीति दोनों इश्‍क लड़ाते नजर आएंगे. बता दें कि इन्हें परफेक्‍ट रील भोजपुरी जोड़ी बताया जा रहा है.

फिल्‍म के निर्देशक अजय कुमार झा का कहना है कि ‘माई रे माई हमरा ऊहे लइकी चाही’ एक बेहतरीन फिल्‍म है. इसकी कहानी काफी ताजा और अलग है. बात अगर गानों की करें, तो इसके गाने ऐसे जो एक बार सुनने के बाद ही लोगों की जुबान पर चढ़ जाएंगे. गीतकार श्याम देहाती, विनय और सुमीत चंद्रवंशी ने गानों पर काफी मेहनत की है, जो लोगों को दिखेगा भी.

सामाजिक-पारिवारिक जोनर की इस फिल्‍म में प्रदीप पांडेय ‘चिंटू’ और प्रीति ध्‍यानी के अलावा निशा दुबे, सुशील सिंह, प्रीति सिंह, मनोज टाइगर, प्रकास जैश समेत अन्य कई कलाकार और आभिनेताओं की शानदीर एक्टिंग देखने को मिलेगी.

राम मंदिर नहीं अब लगेगी ‘राम की मूर्ति’

संविधान भले ही धर्म की राजनीति को गलत माने. धर्म को राजनीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता. अयोध्या में अब उत्तर प्रदेश की सरकार राम मंदिर के बजाये ‘राम की मूर्ति’ लगाने की योजना बना रही है. इसको अयोध्या के पर्यटन से जोड़ कर योजना तैयार की जा रही है. पर्यटन विभाग अयोध्या में सरयू नदी के किनारे 100 मीटर ऊंची राम की मूर्ति लगायेगा. इस मूर्ति का जो डिजाइन पर्यटन विभाग तैयार कर रहा है वह दूसरी राम के मूर्तियों से अलग होगा.

इस मूर्ति में राम को धनुष लिये दिखाया जायेगा. अगर सबकुछ ठीक रहा तो दीवाली तक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरयू किनारे उस जगह पर भूमिपूजन कर सकते हैं. भाजपा के रणनीतिकार अब इस बात पर चर्चा कर रहे है कि ‘राम की मूर्ति’ की ऊंचाई क्या होनी चाहिये. पार्टी के एक वर्ग का मानना है कि यह मूर्ति भारत में सबसे बड़ी होनी चाहिये.

देश में सबसे ऊंची मूर्तियों में अभी तक सरदार पटेल की बनने वाली थी. इसकी ऊंचाई 182 मीटर रखी जानी है. इसके साथ महाराष्ट्र में 210 मीटर ऊंची शिवाजी की मूर्ति लगाई जानी है. इन दोनों का ही भूमि पूजन हो चुका है. राम की मूर्ति को अगर इन से छोटा रखा गया तो इससे राम का अनादर होगा. 2014 के लोकसभा चुनाव में सरदार पटेल की मूर्ति बड़ा मुद्दा था. इसको बनाने के लिये गांव गांव में हर घर से लोहा दान मांगा गया था. अभी तक यह मूर्ति बन कर तैयार नहीं हुई है. गुजरात सरकार इस मूर्ति को लगा रही है. गुजरात सरकार के बाद महाराष्ट्र सरकार ने शिवाजी की मूर्ति लगाने की पहल शुरू कर दी. इसका भूमि पूजन हो चुका है.

गुजरात और महाराष्ट्र के बाद उत्तर प्रदेश की सरकार ने राम की मूर्ति को लगाने की शुरुआत कर दी है. सरयू नदी किनारे बनने वाली इस मूर्ति को राम मंदिर से दूर रखा गया है. पर्यटन विभाग 100 मीटर ऊंची मूर्ति लगाने का प्रस्ताव बना चुका है. अब मूर्ति की ऊंचाई को लेकर बदलाव की मांग की जा रही है. भाजपा 2019 के चुनाव से पहले राम की मूर्ति को लगवा देना चाहती है. पर्यटन विभाग नई अयोध्या तैयार करना चाहती है. जिससे पर्यटक ज्यादा से ज्यादा अयोध्या आ सकें.

अयोध्या के संत इसे राम मंदिर से जोड़ कर देखने को तैयार नहीं हैं. वह कहते हैं कि राम मंदिर और राम की मूर्ति अलग अलग मुद्दा है. दोनों को आपस में जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिये. अयोध्या में राम मंदिर का महत्व गर्भगृह से जुड़ा है. उससे अलग कहीं भी राम मंदिर बनाने या राम की मूर्ति लगाने को धार्मिक भावनाओं को पूरा नहीं करेगा. भाजपा इस तरह के काम से लोगों का ध्यान राम मंदिर से हटा नहीं सकती है. अयोध्या का विकास हो पर राम मंदिर को दरकिनार करके ऐसा कोई विकास भक्तों के गले से नीचे नहीं उतरेगा.

आरुषि केस : नौ साल बाद भी नहीं सुलझा रहस्य

15 मई 2008 की रात नोएडा के सेक्टर-25 के फ्लैट संख्या एल-32 में एक पिता के विश्वास, मां की ममता, नौकर की विश्वसनीयता के साथ 14 साल की आरुषि का कत्ल हुआ था. यह कैसे और क्यों हुआ, ये बातें नौ साल के बाद डॉ. राजेश और डॉ. नुपुर तलवार के इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा बरी किये जाने के बाद फिर पहेली बन गई हैं. एक बार फिर से यह सवाल खड़ा हुआ कि आखिर आरुषि को किसने मारा.

हाईकोर्ट के फैसले से एक तरफ देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली सवाल के घेरे में है तो दूसरी तरफ हर मां-पिता और स्कूली बच्चे आज भी आरुषि के हत्यारों का सच सामने आने का इंतजार कर रहे हैं. 15 मई 2008 की रात सेक्टर-25 स्थित जलवायु विहार के एल-32 के अंदर ऐसी हलचल हुई कि सारी दुनिया की निगाहें लग गईं. घर के अंदर मां, पिता, आरुषि और उस घर का नौकर हेमराज था.

एक फ्लैट के अंदर चार लोग थे और रात के 12 से 1 बजे के बीच इनमें से दो की हत्या हो जाती है- आरुषि और हेमराज. आरुषि की एक की कमरे में तो हेमराज की लाश छत पर मिलती है. आरुषि की लाश हत्या के अगले दिन दोपहर के आस-पास तो हेमराज की लाश दूसरे दिन बरामद की जाती है. कातिल ने तेज वार किये, गले पर वार के बावजूद आवाज नहीं निकली और भी बहुत कुछ. हत्या के बाद आरुषि के कमरे में रखा मोबाइल और कंप्यूटर रात 1 से 4 बजे के बीच कई बार इस्तेमाल किया गया. दो लोग ही घर के अंदर थे.

हत्या के बाद सुबह जब घर पर नौकरानी आई तब जाकर डॉ. तलवार और नुपुर बेटी की मौत के बारे में बताते हैं. वहीं पुलिस भी सुबह जल्दबाजी में घटनास्थल को छोड़ हेमराज को खोजने बाहर निकल गई. एक दिन बाद रिटायर्ड डीएसपी के. के. गौतम जब छत पर यूं ही गए तो नौकर हेमराज की लाश मिली. इसके बाद पूरे मर्डर की दिशा ही बदल गई और आरुषि-हेमराज की हत्या अबूझ मर्डर मिस्ट्री बन गई.

तलवार दंपति पर शक की वजह

  1. घर में मर्डर, दंपति को पता नहीं
  2. मर्डर के बाद तलवार दंपति ने पुलिस से पहले दोस्तों को फोन किया.
  3. मर्डर के बाद प्रथम दृष्टया यह बात सामने आई की सबूत मिटाने की कोशिश की गइ.
  4. हेमराज के सिर पर गोल्फ स्टिक (क्लब) से वार किया गया था और तलवार गोल्फ खेलते हैं.

आरुषि हत्याकांड में तलवार दंपति बरी

आरुषि हत्याकांड में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुरुवार को तलवार दंपति को बरी कर दिया. दो सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से आरोप साबित नहीं होते हैं. सीबीआई के पास अपनी कहानी साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं. कोर्ट ने आरुषि के मां-बाप डॉ. नूपुर और डॉ. राजेश तलवार को संदेह का लाभ पाने का हकदार मानते हुए रिहा करने के आदेश दिए.

सीबीआई अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी

राजेश और नूपुर तलवार को सीबीआई अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गई थी. न्यायमूर्ति बीके नारायण एवं न्यायमूर्ति अरविंद कुमार मिश्र (प्रथम) की खंडपीठ ने गुरुवार को दोपहर बाद तकरीबन तीन बजे फैसला सुनाया. अदालत ने कहा कि सीबीआई की कहानी के समर्थन में ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए हैं. जिस घर में हत्या हुई, उसमें किसी तीसरे व्यक्ति के प्रवेश की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है. हाईकोर्ट ने सीबीआई अदालत के इस निष्कर्ष को नहीं माना कि घर में किसी तीसरे व्यक्ति के आने की संभावना नहीं है, इसलिए हत्या तलवार दंपति द्वारा ही की गई है.

खंडपीठ ने कहा कि सीबीआई के पास पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं. ऐसी परिस्थिति में सर्वोच्च न्यायालय के प्रतिपादित विधि संहिता के मुताबिक यह केस संदेह का लाभ देने के लिहाज से एकदम सही है.तलवार दंपति के अधिवक्ता दिलीप कुमार ने बताया कि सीबीआई की तरफ से प्रस्तुत परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी में तारतम्यता नहीं है इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि तलवार दंपति ने ही हत्या की है.

वर्ष 2008 में दोहरा हत्याकांड हुआ था

15/16 मई 2008 की रात नोएडा के सेक्टर 25 स्थित जवलायु विहार में डॉ. राजेश व नूपुर तलवार की 14 वर्षीय पुत्री आरुषि तलवार अपने कमरे में मृत पाई गई थी. दो दिन बाद उनके घरेलू नौकर हेमराज की लाश घर की छत पर पाई गई.

सबूतों के सवाल पर उलझी सीबीआई

आरुषि-हेमराज हत्याकांड की तफ्तीश करने वाली देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी की कहानी सबूतों के जाल में उलझ गई. सीबीआई ने इस मर्डर मिस्ट्री को सुलझाने के लिए दो बार जांच की लेकिन दोनों बार उसकी कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा. पहली बार क्लोजर रिपोर्ट लगाने पर विशेष अदालत ने नाखुशी जताई तो गुरुवार को हाईकोर्ट के फैसले ने उसकीकहानी के आधार पर दोषसिद्ध किए गए तलवार दंपति को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया.

अपनी कहानी साबित करने के लिए सीबीआई के पास ठोस सबूत नहीं थे. सीबीआई तलवार दंपति के खिलाफ हत्या का एक भी सीधा साक्ष्य नहीं पेश कर सकी. उसके पास केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य थे. हाईकोर्ट ने केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर दोषी नहीं ठहराना सही नहीं माना. यही नहीं, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों में तारतम्य नहीं था. उनकी चेन कम्पलीट नहीं पाई गई और घटना में किसी तीसरे व्यक्ति के होने के संकेत मिले लेकिन सीबीआई ने इस तीसरे की तलाश ही नहीं की.

इसी तरह विशेष अदालत में भी सीबीआई की किरकिरी तब हुई थी जब इस मामले में उसकी ओर से आरोपित किए गए तलवार दंपति व उनके मित्र के घरों के नौकर विजय मंडल, राजकुमार व कृष्णा जमानत पर रिहा हो गए. सीबीआई इन तीनों के खिलाफ एक साल में कोई भी सबूत नहीं हासिल कर सकी. सीबीआई अदालत में तलवार दंपति के वकील मनोज सिसौदिया ने कहा कि हम शुरू से ही राजेश और नूपुर को निदरेष बता रहे थे, इसके समर्थन में हमने पर्याप्त साक्ष्य अदालत में दिए लेकिन तब उन तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया गया. आज उन्हीं पर मुहर लग गई.

हाईकोर्ट ने निचली अदालत के उन बिदुंओं और साक्ष्यों को नकार दिया, जिसके आधार पर सीबीआई की विशेष अदालत ने तलवार दपति को दोषी ठहराया था.

इन तथ्यों पर सुनाई गई थी उम्रकैद की सजा

– कत्ल की रात यानि 15/16 मई 2008 को राजेश तलवार, नूपुर, आरुषि, हेमराज को राजेश तलवार के चालक उमेश ने घर पर देखा था.

– फ्लैट में मौजूदा चारों व्यक्तियों को आखिरी बार देखने के बाद इतना समय नहीं था कि किसी बाहरी व्यक्ति के अंदर आने और कत्ल करने की वजह मिलती. फिर आरुषि के कमरे का दरवाजा आटोमेटिक क्लिक शट लॉक से बंद था. मकान में किसी अन्य व्यक्ति के अंदर आने का कोई साक्ष्य नहीं मिला है.

– कत्ल की रात राजेश तलवार के फ्लैट में किसी व्यक्ति के जबरन प्रवेश का भी कोई साक्ष्य नहीं मिला. न ही चोरी होने का भी कोई साक्ष्य मिला.

आरुषि मामले के अहम किरदार

आरुषि-हेमराज हत्याकांड हाईकोर्ट के गुरुवार को आए फैसले के बावजूद एक पहेली ही रहा. हत्या से लेकर न्यायालय की दहलीज तक मामले में 17 ऐसे किरदार रहें, जिनकी चर्चा गत नौ साल तक होती रही. तलवार दंपत्ति हत्यारोपी रहे, वहीं गवाहों, जांच अधिकारियों और सीबीआई जज श्यामलाल की भी अहम भूमिका रही.

दोषी जो अब हाईकोर्ट से बरी

डॉ. राजेश तलवार : आरुषि के पिता घटना के समय घर पर ही मौजूद थे. निचली अदालत ने हत्या का दोषी ठहराया था. पेशे से दंतचिकित्सक राजेश की हौजखास में क्लीनिक थी और नोएडा में एक मॉल में भी इनकी हिस्सदेारी है.

डॉ. नूपुर तलवार : आरुषि की मां और पेशे से दंत चिकित्सक हैं. सीबीआई ने उन्हें प्राथमिक तौर पर दोषी माना था. वह दांतों की देखभाल पर किताब लिख चुकी हैं और हत्याकांड की रात घर पर ही मौजूद थीं.

मामले को मुकाम तक पहुंचाया

एजीएल कौल : एजीएल कौल पर सीबीआई टीम की जिम्मेदारी थी, जो जांच की कड़िया जोड़ी. वह पहले भी निठारी कांड, बदायूं हत्या और पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या की जांच कर चुके हैं. कॉल की मृत्यु 2014 में दिल का दौरा पड़ने से हो गई थी.

न्यायाधीश श्याम लाल : सीबीआई के विशेष जज श्यामलाल ने ही एजेंसी की जांच रिपोर्ट में पेश 26 पारिस्थिति जनित सबूतों के आधार पर तलवार दंपत्ति को हत्या का दोषी ठहराया था. 26 नवंबर 2013 को जज ने राजेश और नुपूर को उम्र कैद की सजा सुनाते हुए तल्ख टिप्पणी की थी.

इन दस किरदारों पर मंडरात रहा शक

कृष्णा : डॉ. राजेश तलवार का कंपाउंडर. उसे नारको टेस्ट के बाद 13 जून 2009 को गिरफ्तार किया था. वह 15 दिन पुलिस हिरासत में रहा.

डॉ. अनीता दुर्रानी : डॉ. राजेश तलवार की सहयोगी और कारोबारी साझेदार हैं. इनका तलवार परिवार के घर पर आना जाना रहा.

प्रदीप तायल : नोएडा की जानी-मानी कंपनी फ्लैक्स के डायरेक्टर. सबूतों से छेड़छाड़ और काम में दखलअंदाजी के लगे आरोप.

ऋचा सक्सेना : जिला अस्पताल की तत्कालीन पैथोलॉजिस्ट ऋचा सक्सेना शुरू से ही इस मामले में संदेह के घेरे में रही हैं.

डॉ. सुनील दोहरे : आरुषि व हेमराज के पोस्टमार्टम में शामिल रहे. दोहरे पर रिपोर्ट में बदलाव को दबाव डाला गया था, जिसकी सीबीआई जांच हुई.

के. के. गौतम : राजेश तलवार के करीबी रहे पूर्व डीएसपी केके गौतम भी जांच के घेरे में रहे. उन्होंने सबसे पहले छत पर हेमराज का शव देखा.

राजकुमार : डॉ. अनीता दुर्रानी का नौकर व कृष्णा का दोस्त. मूल रूप से नेपाल का रहने वाला है. कृष्णा के नारको टेस्ट में नाम आने के बाद हिरासत में लिया.

विजय मंडल : तलवार के पड़ोसी का नौकर, हेमराज से भी दोस्ती दोस्ती थी. सीबीआई ने मामले में पूछताछ के लिए गिरफ्तार किया था.

डॉ. दिनेश तलवार : राजेश तलवार के भाई. एम्स में तैनात. हत्या की जानकारी पुलिस से पहले इन्हें दी गई और सबूत मिटाने के आरोप लगे थे.

नरेश राज : आरुषि की वेजाइनल स्वैव की स्लाइड से छेड़छाड़ मामले में जिला अस्पताल के डॉ. नरेश राज से पूछताछ कर चुकी है.

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