परफौर्मैंस दें टिकट लें

जब से अंगरेजी के ‘परफौर्मैंस’ शब्द ने हिंदी के बाल पकडे़ हैं, तब से सड़क से ले कर संसद तक सब एकदूसरे से इस के सिवा कुछ और मांग ही नहीं रहे हैं. इस शब्द का मतलब चाहे पता हो या न हो, वे संसद में हर एक से ईमानदारी, देशभक्ति, त्याग, जनसेवा मांगने के बदले ‘परफौर्मैंस’ को मांगतेमांगते अपना गला सुखाए जा रहे हैं, तो घर में बाप अपने बेटे से ‘परफौर्मैंस’ पर ‘परफौर्मैंस’ मांगते हुए दिमागी बुखार किए जा रहा है, ‘‘अस्पताल में जब औक्सिजन नहीं मिलेगी, तो निकलेगी सारी हेकड़ी. देख बेटा, कुछ भी ले ले, पर मुझे ‘परफौर्मैंस’ चाहिए बस. जो करना है कर, जैसे करना है कर…’’

चाहे बेटा अपनी जवानी को दांव पर लगा कर बाप को कितना भी अच्छा कर के क्यों न दिखा दे, पर एक असंतुष्ट बाप है कि उस से रत्तीभर भी संतुष्ट नहीं होता है, ठीक पार्टी के बाप की तरह. उसे सबकुछ करने के बाद भी लग रहा है कि उस का बेटा और तो सबकुछ दे रहा है, पर ‘परफौर्मैंस’ वैसी नहीं दे रहा, जैसी उसे देनी चाहिए.

अरे बापजी, अब बेटे को मार डालोगे क्या? अरे भैयाजी, पार्टी वर्कर को अब मार डालोगे क्या? पार्टी में रह कर उन्हें भी कुछ खाने दो. हमाम में तनिक नंगा नहाने दो, वरना कल को हमाम ही बंद हो गए, तो नंगे नहाने की इच्छा मन में ही दबी रह जाएगी.

जनसेवक हो कर अपने बाथरूम में नंगे नहाए, तो क्या नहाए? नंगे नहाने का जो सामूहिक मजा हमाम में है, वैसा अकेले बाथरूम में नहाने में कहां? पार्टी के हिसाब से तनिक ढील दें, अपने हिसाब से थोड़ीबहुत ही सही, इन्हें भी जीने दो, खानेपीने दो. बंदा जब हराम की खाएगा, तभी तो पार्टी का झंडा शान से उठा कर चल पाएगा.

भैयाजी आए थे. वे बहुत गुस्से में थे. गुस्से में रहना उन का भाव है, उन का स्वभाव है. यह दूसरी बात है कि जब उन के क्लास लगाने के दिन थे, उन दिनों क्लास से तो छोडि़ए, वे स्कूल से ही महीनोंमहीनों गायब रहते थे. उन का बाप आ कर मास्टर साहब के आगे अपनी नाक रगड़ कर उन का रीएडमिशन करा जाता था बेचारा. वे नहीं सुधरे तो नहीं सुधरे.

बेचारे बाप की नाक रगड़रगड़ कर नाक से ‘क’ रह गई. पर अब वे जहां भी जाते हैं, पार्टी वर्करों की क्लास पर क्लास लगाते हैं. जब देखो, क्लास लगाने में बिजी. जब देखो, पूरे दमखम के साथ क्लास लगाने में मस्त.

कल उन्होंने आते ही मेरी क्लास ली. गुस्सा आने से पहले ही वे मुझ पर बरसते हुए बोले, ‘‘और… यह क्या चल रहा है सब?’’

‘‘भैयाजी, पार्टी का नाम कमा रहा हूं. ईवीएम में अपने ‘टच’ के लिए जनता के बीच अपने को दिनरात खपा रहा हूं.’’

‘‘पार्टी का नाम कमा रहे हो या पार्टी की नाक पर बैठ कर अपना नाम कमा रहे हो?’’ वे भादों के घन समान गरजे. हुंकार ऐसी कि क्लास के बाहर उन की पार्टी के नेताओं को भी सुनाई दी, तो वे अपना बोरियाबिस्तर इकट्ठा करने की सोचने लगे.

भैयाजी भैयाजी हैं या बब्बर शेर, यह उन्हें भी नहीं मालूम. बस, आदमी होने के बाद भी बब्बर शेर हो, तो हम जैसे गीदड़ों पर दहाड़ ही लेते हैं.

‘‘यह क्या अनापशनाप सुन रहा हूं तुम्हारे बारे में?’’ उन्होंने पानी का गिलास खुद पीने के बदले मेरी ओर बढ़ाया, तो मैं परेशान.

‘‘आप को कहीं से गलत जानकारी मिली होगी भैयाजी. मैं तो तनमन से पार्टी को समर्पित हो कर सोएसोए भी जनहित में काम कर रहा हूं,’’ मैं ने अपने दोनों हाथ जोड़े. वे शांत होने के बदले और दहाड़े. लगा कि कहीं कोई जरूर बहुत बड़ी गड़बड़ है, क्योंकि छोटीमोटी गड़बड़ तो पार्टी में दिनरात चलती रहती है.

असल में हम पार्टी में रह कर देश की लड़ाई उतनी नहीं लड़ते, जितनी अपनेअपने वजूद की लड़ाई लड़ते रहते हैं.

‘‘तो बताओ, तुम ने इन सालों में क्याक्या किया? अपना रिपोर्टकार्ड दिखाओ? वे तो कह रहे हैं कि… देखो बंधु, हमें ‘परफौर्मैंस’ चाहिए बस. वे दे सकते हो तो दो, वरना अगले चुनाव में अपना टिकट साफ हुआ समझो,’’ वे घुड़के.

‘‘भैयाजी, इन सालों में मैं ने पार्टी की कसम, अपने लिए कुछ नहीं किया. अपना कोई भी रिश्तेदार सरकारी नौकरी में नहीं लगाया, न ही किसी अपने गधे रिश्तेदार का डाक्टरी में एडमिशन दिलाया. न ही अपना कहीं कोई एक भी प्लाट खरीदा. किसी कंपनी में मैं ने अपनी बीवीबच्चों के नाम से कोई गुपचुप साझेदारी भी नहीं की.

‘‘इतना ही नहीं, मैं ने कभी किसी कारोबारी को भी नहीं धमकाया. किसी बलात्कारी को नहीं बचाया. अपने घर की रोटी को छोड़ कर मैं ने किसी का टुकड़ा तक नहीं खाया.

‘‘बाहर के बैंक में तो छोडि़ए, मेरा अपने देश के बैंक में भी वही एक पुराना खाता चल रहा है. यकीन नहीं है तो… जोकुछ मेरे पास है, सब पार्टी जौइन करने के वक्त का है. यह जो मैं ने कुरतापाजामा पहन रखा है, वह भी ससुराल वालों का दिया हुआ है.

‘‘मैं और बीवी एक ही चप्पल पहनते हैं. यह सब बस इसलिए कि… जनता में जो हमारी पार्टी की इमेज खराब हो चुकी है, उसे एक बार फिर बनाया जाए…’’

‘‘यही तो शिकायत आई है तुम्हारी. इन्हीं बातों को ले कर तो पार्टी हाईकमान तुम से नाराज हैं. पार्टी दफ्तर में तुम्हारी शिकायतें लगातार आ रही हैं कि बंदा… अरे, हम राजनीति में जनकल्याण करने को थोडे़ ही आते हैं. हम तो बस नारा जनकल्याण का लगाते हैं और जनता के पैसे पर सरेआम डांसरों के साथ मंचों पर झूमतेगाते हैं.

‘‘हम राजनीति में आ कर जनता की भलाई नहीं करते, बल्कि अपने कल्याण के लिए पैदा हुए जीव हैं. हमें तीनों लोकों में राज करना है, इसलिए जनता की सोचने के बदले पार्टी की सोचो. पार्टी है तो हम हैं.

‘‘ऐसा सुनहरी मौका फिर नहीं मिलने वाला. विपक्ष को हमेशाहमेशा के लिए चित करना है. अगर अगली बार भी टिकट चाहते हो, तो पार्टी के लिए जीजान से काम करो बरखुरदार, पार्टी के लिए.

‘‘जनता को तो स्वर्ग में भी भेज दो, तो भी वह भूख, भय, भ्रष्टाचार ही चिल्लाती रहेगी. हमें साम, दाम, दंड, भेद जैसे भी हो, पार्टी के लिए ‘परफौर्मैंस’ चाहिए बस. लोकतंत्र में जवाबदेही जनता के लिए नहीं, पार्टी के लिए ही बनती है.

‘‘अगली दफा फिर टिकट लेना हो तो… आज का लोकतंत्र सिविक सैंस का नहीं, पार्टी  परफौर्मैंस का है मेरे भोले कार्यकर्ताजी, समझे तो ठीक, वरना टिकट कटा.’’

‘‘मैं सब समझ गया भैयाजी…’’ और मेरी क्लास खत्म हुई.

फैसला : 20 रुपए में भीड़ काबू करेगी सरकार

बढ़ती महंगाई के बाबत नरेंद्र मोदी और उन की सरकार को सोशल मीडिया पर पानी पीपी कर कोस रहे 95 फीसदी लोगों को पता ही नहीं चला है कि जिस प्लेटफार्म टिकट को वे 2 रुपए से 10 रुपए का हुआ बता रहे हैं, वह अब कुछ दिनों के लिए ही सही 20 रुपए का कर दिया गया है.

कारोबार की भाषा में कहें, तो त्योहारी सीजन शुरू हो चुका है. आम लोगों की जेब हलकी करने के लिए बाजार में बंपर छूट की बहार छाई हुई है. सौ रुपए की चीज डेढ़ सौ रुपए की बता कर सवा सौ रुपए में बेची जा रही है. ग्राहक 25 रुपए की नकली बचत पर खुश हो रहे हैं और कारोबारी उन की बेवकूफी पर हंसते हुए अपना गल्ला भर रहे हैं.

त्योहारी सीजन से पैसा बनाने में सरकार भी पीछे नहीं रही है. उस ने प्लेटफार्म टिकट का दाम दोगुना कर दिया है और बहाना सिक्योरिटी और भीड़ पर काबू करने का बनाया है यानी सरकार यह मान रही है कि प्लेटफार्म टिकट की कीमत बढ़ा देने से बेवजह की भीड़ नहीं होगी, तो उस की नादानी, मासूमियत या चालाकी कुछ भी कह लें, पर हंसी आना लाजिमी है, जबकि बीते दिनों हुए रेल हादसों ने रेल सुरक्षा की पोल खोल कर रख दी है. ये हादसे भीड़ की वजह से नहीं, बल्कि रेलवे के मुलाजिमों की लापरवाही और अंगरेजों के जमाने की रेल पटरियों की वजह से हुए थे.

अब होगा यह कि त्योहारों पर बेटिकट चलने वालों में से जो कुछ ईमानदारी बरतते हुए 10 रुपए का प्लेटफार्म टिकट खरीदने की सोच भी रहे होंगे, वे अब सोचने की भी जहमत नहीं उठाएंगे. हां, उन टिकट चैकरों की जरूर चांदी हो आएगी, जो सौ दो सौ रुपए की घूस ले कर बिना प्लेटफार्म टिकट वालों को बाइज्जत बाहर जाने देंगे.

सरकार ने यह सोचने की जरूरत ही नहीं समझी कि प्लेटफार्म टिकट वे लोग खरीदते हैं, जो किसी को लेने या छोड़ने स्टेशन जाते हैं. जरूरतमंदों, औरतों और बुजुर्गों को बैठानेउतारने वाले तो मजबूरी में सरकार को कोसते हुए 20 रुपए देंगे, जबकि ऐसे लोगों से तो पैसा लेना ही नहीं चाहिए.

लेकिन 20 रुपए की मार से बचने के लिए जुगाड़ू भारतीय या तो बिना प्लेटफार्म टिकट लिए ही प्लेटफार्म पर जाएंगे या फिर ट्रेन आने तक बाहर ही खड़े रहेंगे और ज्यादा समझदार लोग पैसेंजर ट्रेन का सब से नजदीकी रेलवे स्टेशन का टिकट खरीद कर मूंछों पर ताव देते हुए प्लेटफार्म पर नजर आएंगे.

त्योहारों पर उमड़ती भीड़ इस बेतुके फैसले से काबू करने की बात सोचना ही सरकार की पैसा कमाऊ सोच को उजागर करता है. आम लोग रोजमर्राई चीजों के बढ़ते दामों से परेशान हो चुके हैं. इस पर भी कोई मंत्री यह कहे

कि मोटरसाइकिल और कार चलाने वालों की जेब में पैट्रोल देने लायक पैसा है, तो सरकार हफ्ता वसूलने वाली ज्यादा लगती है, सरकार कम.

अब तो इंतजार उस दिन का है, जब बसअड्डों, रेलवे स्टेशनों और चौराहों के अलावा एटीएम और बैंकों के बाहर सरकारी मुलाजिमों की तैनाती इस बाबत होगी कि वे लोगों को पकड़ कर उन का पैसा छीन कर खजाने में जमा करें.

इधर गरीबों की चिंता में दुबलाई जा रही सरकार अपने खर्चे कम नहीं कर रही है, उलटे लोगों की मेहनत की कमाई पर तरहतरह से डाका डाल रही है.

20 रुपए का प्लेटफार्म टिकट इस की बेहतर मिसाल है.

मुमकिन है, अगले साल त्योहारी सीजन में किराया ही दोगुना कर दिया जाए. फिर लोग अष्टमी, नवमी की पूजा और दीवाली मनाने घर नहीं जाएंगे. जब सारा पैसा किराए की शक्ल में सरकार झटक लेगी, तो मिठाई, आतिशबाजी और नए कपड़े, उपहार वगैरह 5वीं क्लास के निबंध की बातें हो जाएंगी. इस के बाद भी जो ट्रेन से घर जाएगा, तो यह माना जाएगा कि वह बेईमानी से पैसा कमाता है. ऐसे लोगों के यहां इनकम टैक्स के छापे पड़ सकते हैं.

लोग अगर विरोध करेंगे, जिस की उम्मीद कम ही है, तो उन से कहा जाएगा कि जाओ, पहले उस कांग्रेस का विरोध करो, जिस ने 60 साल देश को लूटा. हमें तो अभी 3 साल ही हुए हैं.

इस एक्ट्रैस की वजह से दीपिका को मिला था पहला ब्रेक

बौलीवुड की पद्मावती दीपिका पादुकोण एक वर्सटाइल एक्ट्रेस है, जो फिल्मों में अपने किरदार के साथ पूरा-पूरा न्याय करती हैं. दीपिका की अदाकारी ही नहीं, बल्कि उनकी खूबसूरती के भी लोग कायल हैं.

एक के बाद एक हिट फिल्में देने के बाद दीपिका आज अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी लोगों के लिए मिसाल बन गई हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं, इस खूबसूरत अदाकारा को बौलीवुड में अपना पहला ब्रेक कैसे मिला?

दीपिका की सबसे पहली फिल्म थी ‘ओम शान्ति ओम’, जिसमें वे बौलीवुड के बादशाह शाहरुख खान के अपोजिट दिखाई दी थीं. कहा जाता है कि जब फराह खान ओम शांति ओम बना रही थीं, तो उन्हें शाहरुख के अपोजिट एक नए चेहरे की तलाश थी. उन्होंने अपने सभी जान-पहचानवालों को अपनी इस इच्छा के बारे में बताया. जैसा कि सभी जानते हैं मलाइका अरोड़ा फराह खान के खास दोस्तों में से एक है, उन्होंने भी ये बात सुनी. मलाइका उन दिनों माडलिंग करती थीं और इसी दौरान उन्होंने दीपिका को भी एक दफा माडलिंग करते देख लिया.

मलाइका को दीपिका इतनी भा गईं कि उन्होंने फराह खान से दीपिका की सिफारिश कर दी. फराह भी दीपिका से मिलने के लिए राजी हो गईं.

इसके बाद जैसे ही फराह दीपिका से मिली, उन्होंने दीपिका को बगैर किसी स्क्रीन टेस्ट के फाइनल कर लिया. इसी तरह दीपिका के करियर ने अपनी पहली उड़ान भरी. इसके बाद तो जैसे दीपिका ने रुकना सिखा ही नहीं, उन्होंने एक के बाद एक बेहतरीन फिल्में करके अपने करियर को ऊपर पहुंचा दिया.

बिना मेकअप के ऐसी दिखती हैं संजय दत्त की बेटी त्रिशाला

हाल ही में संजय दत्त की फिल्म भूमि बिग स्क्रीन पर रिलीज हुई थी, जिसने दोबारा लोगों के बीच संजय दत्त के नाम का डंका बजा दिया. इस फिल्म में संजय दत्त की अदाकारी को सराहा जा रहा है और उन्हें दर्शकों का भरपूर प्यार मिल रहा है.

इस फिल्म में संजय दत्त ने ऐसे पिता की भूमिका निभाई है, जो अपनी बेटी को न्याय दिलाने के लिए किसी भी हद तक चला जाता है. इस फिल्म में संजय दत्त की अदाकारी में एक पिता का दर्द साफ़ देखा जा सकता है.

फ़िल्मी स्क्रीन पर ही नहीं, बल्कि असल ज़िन्दगी में भी संजय दत्त अपनी बेटी से बेहद करीब हैं और उसके लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं. ये बात उनकी बेटी त्रिशाला कई बार अपने सोशल मीडिया पोस्ट के ज़रिये बयां कर चुकी हैं. भले ही त्रिशाला बौलीवुड की कोई फेमस अदाकारा नहीं हैं, लेकिन उनकी फैन फोलोइंग को देखकर कोई भी उन्हें सेलिब्रिटी से कम नहीं मान सकता. वे बौलीवुड के सेलेबस की ही तरह अपनी निजी ज़िन्दगी लोगों के साथ शेयर करती है, जिसकी कुछ तस्वीरें वे समय-समय पर अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर शेयर करती रहती हैं.

वैसे तो त्रिशाला बेहद ग्लैमरस हैं, लेकिन वे बिना मेकअप भी बहुत सुन्दर दिखाती हैं. कुछ समय पहले उन्होंने अपनी एक तस्वीर शेयर की थी, जिसमें वे बगैर मेकअप दिखाई दे रही थी. इस तस्वीर को देखकर लोगों ने उनकी बेहद तारीफ की थी. इस तस्वीर में वे एक आम लड़की की ही तरह खूबसूरत दिखाई दे रही हैं.

बता दें कि उनके इस ग्लैमरस लुक के बावजूद उन्होंने कभी कोई फिल्म नहीं की. इसकी वजह और कोई नहीं, बल्कि उनके पिता संजय दत्त हैं. असल में संजय दत्त नहीं चाहते उनकी बेटी ग्लैमर की इस दुनिया में रहकर अपनों से दूर हो जाए जैसे कि वे अपने माता-पिता से हो गए थे. यही वजह है कि संजय दत्त ने अपनी बेटी को बौलीवुड से हमेशा दूर रखा.

सरकार का लौलीपौप हुआ टांयटांय फिस

सरकार का नोटबंदी से काला बाजारियों को पकड़ने और जीएसटी से सारे देश को एक कर डालने का लौलीपौप टांयटांय फिस हो गया और गले में फांस बन कर अटका पड़ा है. ऐसा ही लौलीपौप मुफ्त बिजली साबित होगी. जब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मुफ्त पानी देने की घोषणा की थी, तो जिन लोगों ने उसे अर्थव्यवस्था के लिए घातक बताया था, अब वे ही मुफ्त बिजली का ढिंढोरा पीट कर गरीबों के उत्थान की बात कर रहे हैं.

देश में बिजली की पैदाइश जरूरत से ज्यादा है, पर इसे घरघर, दुकानदुकान और फैक्टरीफैक्टरी पहुंचाना मुश्किल है. खर्चा तो तार डालने, खंभे खड़े करने, बिजली स्टेशन बनाने और रखरखाव में होता है और सरकार की कमर बिल न वसूलने पर नहीं, बल्कि इस सुविधा को घरघर पहुंचाने में टूट जाएगी.

बजाय इस के सरकार उद्योगों, व्यापारों और खेती को इतना ठीक करवाती कि हर जना अपनी खेती, अपना पानी, अपनी बिजली और अपना वाहन खुद खरीद कर सके, पर सरकार ने पिछली कांग्रेस सरकारों की तरह मुफ्त बिजली बांटने पर जोर दिया है. 3 साल तक ढोल पीटने के बाद नरेंद्र मोदी अब समझ रहे हैं कि धर्म, राष्ट्रवाद और गौमाता के फरेब से जनता ऊब चुकी है और इसे सरकार से मुक्ति चाहिए जो दूसरी सरकारों की तरह यह दे ही नहीं सकती, इसलिए मुफ्त की बिजली का लौलीपौप दिया जा रहा है.

बिजली विज्ञान की सब से बड़ी देन है, जिस की वजह से सुरक्षा भी मिली है और रातदिन काम करने का मौका भी. किसानों को मौसम पर ही आंखें लगाए रखना जरूरी नहीं है. वे जब जरूरत हो, जमीन में छेद कर के पानी निकाल सकते हैं. बच्चे रातभर पढ़ सकते हैं. औरतें देर रात तक काम कर सकती हैं.

जिन घरों में बिजली के बिल देने लायक पैसे नहीं हैं, उन्हें मुफ्त बिजली मिले यह ठीक है, पर ऐसे घर हों ही क्यों? क्यों नहीं सरकार हर घर में एकदो नौकरियों का इंतजाम कर देती? क्यों नहीं सरकार बजाय व्यापारियों को कर्मचारी निकालने को मजबूर करने के उन्हें नए रखने के लिए इनाम देती, ताकि लोग ज्यादा नौकरियां पैदा करें?

मुफ्त की बिजली पर खर्च कोई ज्यादा नहीं होगा, पर जो लोग पहले मुफ्त पानी को ले कर आम आदमी पार्टी को कोस रहे थे, वे अब हक्केबक्के रह जाएंगे कि उन की चहेती पार्टी भी कर्मठता की जगह मुफ्तखोरी को बढ़ावा दे रही हैं. भारतीय जनता पार्टी की चिंता ठीक है क्योंकि नोटबंदी और जीएसटी से जो माहौल पैदा हुआ है, वह गौभक्तों, विचारकों की हत्याओं, पूजापाठी स्टंटों के कारण अब और जहरीले धुएं से भर रहा है और पार्टी को अब बचाव के रास्ते ढूंढ़ने होंगे.

जनता को इस दौरान सरकार के हाथों कुछ खैरात मिल जाए, तो क्या हर्ज है?

‘छोटे लालू’ से परेशान ‘छोटे मोदी’

राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने जैसे ही कहा कि भारतीय जनता पार्टी के नेता और नीतीश कुमार की सरकार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी की बहन रेखा मोदी 12 सौ करोड़ रुपए के सृजन महाघोटाले की पार्टनर हैं, इस के बाद भी अब तक सुशील कुमार मोदी और उन की बहन की गिरफ्तारी नहीं की गई है, रवि जालान को भी गिरफ्तार नहीं किया गया है, जबकि उस के यहां कई सुबूत मिले हैं, वैसे ही लालू प्रसाद यादव के लाड़ले ‘छोटे लालू’ यानी तेजस्वी यादव के हाथों राजनीति करने का बेहतरीन मौका हाथ लग गया.

तेजस्वी यादव ने भी सुशील कुमार मोदी के खिलाफ मोर्चा खोल कर उन्हें सियासी रूप से पटकनी देने की कवायद शुरू कर दी है. यही वजह है कि लालू प्रसाद यादव के समर्थक अब तेजस्वी यादव में लालू प्रसाद यादव की छवि देखने लगे हैं और उन्हें ‘छोटे लालू’ के नाम से पुकारने लगे हैं.

वैसे, सुशील कुमार मोदी ने भी लालू प्रसाद यादव और उन के परिवार को बेनामी जायदाद के कई मामलों में फंसा कर बैकफुट पर खड़ा कर रखा है.

अब तेजस्वी यादव भी उन्हें उन के ही हथियार से शिकस्त देने की तैयारी में लग गए हैं.

तेजस्वी यादव कहते हैं कि सृजन घोटाले के तमाम सुबूत मिटाए जा रहे हैं. कंप्यूटर और लैपटौप से हार्डडिस्क गायब की जा रही है. इस घोटाले में केवल छोटी मछलियां ही पकड़ी गई हैं, बड़े घोटालेबाजों को बचाया जा रहा है.

तेजस्वी यादव सुशील कुमार मोदी के खिलाफ आंकड़े दिखाते हुए कहते हैं कि मोदी को दिल्ली में उन के भाई आरके मोदी की कंपनी में हिस्सेदारी वाले 2 फ्लैट मिले हैं. उपमुख्यमंत्री रहते हुए सुशील कुमार मोदी ने नोएडा और गाजियाबाद में 2 फ्लैट कैसे खरीदे? उस पैसे का स्रोत क्या है? सुशील कुमार मोदी हमेशा यह कहते रहे हैं कि उन के भाई की कंपनी और जायदाद से उन्हें कोई लेनादेना नहीं है. आरके मोदी और उन के बेटे खोखा कंपनी बना कर मनी लौंड्रिंग भी करते रहते हैं.

तेजस्वी यादव आगे कहते हैं कि मोदी के भाई की कंपनी का सालाना टर्नओवर 512 करोड़ रुपए है, इस के बाद भी कंपनी का टर्नओवर साल 2015-16 और 2014-15 में जीरो कैसे दिखाया गया?

तेजस्वी यादव के आरोपों से झल्लाए सुशील कुमार मोदी सफाई देते हुए कहते हैं कि उन्होंने फ्लैट खरीदने के लिए आईसीआईसीआई बैंक से 10 लाख रुपए का कर्ज लिया था और बाकी रकम का चैक से भुगतान किया गया था. इस की पूरी जानकारी चुनाव आयोग और आयकर विभाग को दाखिल किए गए रिटर्न में बताई गई है.

उस के बाद वे लालू प्रसाद यादव पर पलटवार करते हुए कहते हैं कि लालू प्रसाद यादव और उन का परिवार यह बताए कि राबड़ी देवी 18 फ्लैटों की मालकिन कैसे बन गईं? तेजस्वी यादव 26 साल की उम्र में 26 बेनामी जायदाद के मालिक कैसे बन गए?

सुशील कुमार मोदी आगे कहते हैं कि वे पिछले 25 सालों से विधायक और मंत्री रहे हैं और उन की आमदनी और खर्च के एकएक पैसे का हिसाब है. क्या लालू, राबड़ी, तेजस्वी, मीसा, तेजप्रताप और लालू यादव का पूरा परिवार अपनी जायदाद के बारे में बता सकता है?

बिहार विधानसभा में विरोधी दल के नेता तेजस्वी यादव कहते हैं कि माइक्रो ब्लौगिंग साइट के जरीए सुशील कुमार मोदी और उन की बहन रेखा मोदी सृजन घोटाले में शामिल हैं. घोटाले की रकम के बंटवारे में दोनों के बीच झगड़ा हुआ था. साल 2005 से साल 2013 तक वे वित्त मंत्री रहे और उन्हें घोटाले का पता नहीं चला?

सुशील कुमार मोदी सफाई देते हुए कहते हैं कि रेखा मोदी ने उन के ऊपर भी मुकदमा कर रखा है. उन की 2 दर्जन चचेरी, फुफेरी और मौसेरी बहनों में से एक वे भी हैं.

रेखा ने उन के ऊपर साल 2010 में घरेलू हिंसा का झूठा मुकदमा (केस नंबर-41/2010) पटना सिविल कोर्ट में दर्ज किया था. अदालत ने उस केस को खारिज कर दिया था. उस आदेश के खिलाफ रेखा मोदी ने अपील दायर कर रखी है.

‘छोटे मोदी’ और ‘छोटे लालू’ के बीच छिड़ी आरोपों की जंग के बीच राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और उन के परिवार के खिलाफ 11 सितंबर, 2017 को आयकर विभाग ने बड़ी कार्यवाही की.

आयकर विभाग ने लालू प्रसाद यादव की बेटी मीसा भारती के दिल्ली में बिजवासन में बने फार्म हाउस को जब्त कर लिया है. पटना में लालू के माल की जमीन समेत दूसरी जायदाद को जब्त किया गया है. मीसा की जब्त जायदाद का बाजार भाव 165 करोड़ रुपए है.

नई दिल्ली के बिजवासन का फार्म हाउस नंबर-26 को फर्जी कंपनी मिशैल पैकर्स ऐंड प्रिंटर्स प्राइवेट लिमिटेड के लिए ले कर मीसा और उन के पति शैलेश कुमार को फायदा पहुंचाया गया. इस की मार्केट वैल्यू 40 करोड़ रुपए है.

नई दिल्ली के न्यू फ्रैंड्स कालोनी के मकान नंबर-1088 को फर्जी कंपनी एबी ऐक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के नाम पर ले कर तेजस्वी यादव, चंदा यादव और रागिनी यादव को फायदा पहुंचाया गया. इस की मार्केट वैल्यू 40 करोड़ रुपए है.

पटना के दानापुर के जलालपुर में 9 प्लाटों को फर्जी कंपनी डिलाइट मार्केटिंग प्राइवेट लिमिटेड के नाम पर ले कर राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव को फायदा पहुंचाया गया. इन सभी प्लाटों की मार्केट वैल्यू 65 करोड़ रुपए है.

दानापुर के जलालपुर में ही 3 प्लाट एके इन्फोसिस्टम के नाम पर ले कर राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव को फायदा पहुंचाया गया. इस की मार्केट वैल्यू 20 करोड़ रुपए है.

गौरतलब है कि 5 जुलाई, 2017 को तेजस्वी यादव के खिलाफ सीबीआई की एफआईआर और 7 जुलाई, 2017 को लालू प्रसाद यादव के 20 ठिकानों पर सीबीआई और इनकम टैक्स की छापेमारी के बाद से ही सुशील कुमार मोदी ने तेजस्वी यादव के इस्तीफे की मांग को तेज किया था. इस मामले को ले कर ही राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड) और कांग्रेस के महागठबंधन में महाघमासान मचा था.

26 जुलाई, 2017 को जब लालू प्रसाद यादव ने राजद विधायक दल की बैठक के बाद तेजस्वी यादव के इस्तीफा नहीं देने की बात दोहराई, तो नीतीश कुमार ने राज्यपाल को जा कर अपना इस्तीफा सौंप दिया था और भाजपा के साथ मिल कर अपनी सरकार बचा ली थी.

नीतीश कुमार के इसी पलटीमार रवैए की वजह से लालू प्रसाद यादव और उन का परिवार बौखलाया हुआ है. लालू प्रसाद यादव के साथ कदम से कदम मिलाते हुए तेजस्वी यादव ने भी नीतीश सरकार और सुशील कुमार मोदी के खिलाफ मोरचा खोल दिया है.

आदमी काजी तो औरतें क्यों नहीं?

बरसों से इस देश में पंडित, मुल्ला, पादरी, पुरोहित जैसे काम मर्द ही संभालते आए हैं. वैसे, अब बहुत से मंदिरों में औरतें पुजारी भी दिखती हैं. बहुत सी साध्वियां भी आप देख सकते हैं. साधुसंन्यासी औरतों ने अपना एक अलग अखाड़ा भी बना लिया है, जिस का नाम ‘परी अखाड़ा’ है.

आप को याद होगा इलाहाबाद कुंभ स्नान के दौरान इस अखाड़े को बाकायदा बनाया गया था और इस को बनाने में साध्वियों को बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ा था, क्योंकि मर्द साधुसंन्यासी इस की सख्त खिलाफत कर रहे थे.

यहां काबिलेगौर बात यह है कि दुनियाभर की चमक धमक से वास्ता खत्म कर चुका संन्यासी समाज भी मर्दवादी सोच से अपना वास्ता खत्म नहीं कर पाया है.

अभी हाल ही में कुछ मुस्लिम औरतों ने काजी बनने की इच्छा जाहिर की. इस के लिए उन्होंने इस्लाम की जरूरी जानकारी ली और वे काजी बन गईं. यह पहल मुंबई, जयपुर और कानपुर की कुछ औरतों ने की थी.

उन का इतना करना था कि जैसे मुस्लिम समाज में हलचल मच गई. यह मुद्दा देश में चर्चा का विषय बन कर उभर आया. टैलीविजन चैनलों में बाकायदा इस पर चर्चा चलने लगी. अखबारों में लेख छपने लगे. देश में इस बहस में जो बातें औरतों के खिलाफ कही जा रही थीं, उन में से कुछ का जिक्र करना जरूरी है.

सब से पहले तो यह कि औरत को काजी बनने की इजाजत इस्लाम धर्म में नहीं है. वे काजी नहीं बन सकतीं, क्योंकि ये कयामत के आसार हैं. दुनिया खत्म हो जाएगी. उन को माहवारी आती है, इसलिए वे काजी नहीं बन सकतीं.

शबरी माला मंदिर हो या शनि शिंगणापुर या फिर हाजी अली की दरगाह हो, हर जगह औरतों की माहवारी अचानक सामने आ गई और उन्हें इन इबादतगाहों में दाखिल होने से मना कर दिया गया.

अचानक उभरी इस बहस के पीछे की सियासत को समझना भी मुश्किल नहीं है. यह मर्दवादी सोच की बौखलाहट भी है, जो औरत को काबू में करने के लिए तरहतरह के बहाने ढूंढ़ रही है.

अब यहां यह जानना भी जरूरी है कि आखिर काजी है क्या? ज्यादातर लोगों ने तो बस एक कहावत सुनी होगी कि मियांबीवी राजी तो क्या करेगा काजी. इस के आगे कुछ नहीं.

काजी का मतलब है वह न्यायाधीश, जो मुसलिम समाज के इसलामिक कानून के आधार पर इंसाफ कर सके और धार्मिक रीतिरिवाजों, वैवाहिक परंपराओं का पालन व धार्मिक अनुष्ठानों को पूरा करा सके.

काजी के सवाल पर भारत में एक अधिनियम भी बना हुआ है, जिसे काजी अधिनियम या काजी ऐक्ट कहते हैं. साल 1864 का एक प्रस्ताव था, जिस के तहत शहर, कसबे या परगने में मुसलिम समुदाय की रीतियों, विवाह के अनुष्ठानों और दूसरे मौकों के अनुष्ठानों को कराने के लिए काजी का होना जरूरी है.

अंगरेज सरकार ने इस के लिए एक अधिनियम पास किया था, जो ‘काजी अधिनियम 1880’ कहलाया था. इस अधिनियम के तहत किसी स्थानीय क्षेत्र के लिए भी जहां मुसलिम समुदाय की तादाद यह इच्छा करती है कि एक या ज्यादा काजियों को उक्त क्षेत्र में रखा जाए, तो राज्य सरकार स्थानीय लोगों की सलाह पर ऐसा कर सकती है. ऐसी नियुक्तियां राज्य सरकारों द्वारा काफी लंबे समय तक की जाती रही हैं.

भारत के सभी मुसलिमों पर यह ऐक्ट तब तक लागू माना जाएगा, जब तक कि यह ऐक्ट खत्म नहीं कर दिया जाता है.

अब यहां दूसरा सवाल यह उठता है कि उस काजी ऐक्ट 1880 को अगर गौर से देखें, तो पाएंगे कि कहीं भी उस ऐक्ट में यह नहीं लिखा है कि काजी के पद पर औरतें नहीं आ सकतीं और न ही औरत की माहवारी पर कुछ कहा गया है.

हम जिस ऐक्ट से गवर्न होते हैं, किसी बहस के लिए उसे ही आधार माना जाएगा और कोई न्यायिक वाद भी उसी के दायरे में निबटाया जाएगा, इसलिए किसी औरत के काजी बनने के खिलाफ जो भी बहस है, वह अधिनियम के खिलाफ है, जिसे भारत में स्वीकारा नहीं जा सकता.

दूसरी बात, हर साल लाखों की तादाद में औरतें हज करने मक्का जाती हैं. हज की गाइडलाइन में भी माहवारी के बारे में नहीं लिखा है और न ही वहां इस किस्म की कोई रुकावट है.

अगर इस मुद्दे के दूसरे पहलू पर गौर करें, तो देखेंगे कि आज के जमाने में काजी ऐक्ट पूरी तरह से अप्रासंगिक हो चुका है. यह उस जमाने की जरूरत थी, जब कानून और प्रशासनिक अमला इतना मजबूत नहीं था. हर शहर के कुछ समझदार लोग मिलबैठ कर किसी ईमानदार और पढ़ेलिखे आदमी को आलिम या फाजिल चुन लेते थे, जो शहर के तमाम धार्मिक और पारंपरिक रीतिरिवाजों से जुडे़ मामलों को समझता और पूरा कराता था. आज काजियों के पास कोई काम नहीं है, न ही कोई कानूनी पावर. सरकार ने भी साल 1982 के बाद से काजी की नियुक्ति बंद कर दी है.

इस सब के बावजूद अगर कोई औरत काजी, मौलवी, आलिम या फाजिल बनना चाहती है, जो उस के फायदे की बात भी नहीं है, फिर भी उसे किसी आधार पर रोका नहीं जा सकता है. भारत का संविधान भी इस की इजाजत नहीं देता है.

जैसे मर्दों को इन ओहदों से कुछ खास हासिल नहीं हुआ, उन की सोच का लैवल ऊंचा नहीं उठ सका, वैसे ही औरतों की सोच इन ओहदों से ऊंची तो नहीं उठ सकती, उन्हें कुछ नहीं मिलेगा. हां, काजी बन कर कम से कम समाज के हर क्षेत्र में वे अपनी मौजूदगी तो दर्ज करा पाएंगी.

पर मजहब को जानने और उस पर बोलने का एकाधिकार उलेमा अपने हाथ में ही रखना चाहते हैं. उन्हें इस बात का खतरा है कि औरतें अगर इस क्षेत्र में भी आ गईं, तो उन की बात सुनने वाला कोई नहीं रह जाएगा.

दुनिया बहुत आगे जा चुकी है. जिस सऊदी अरब को उलेमा अपने हर काम का रोल मौडल मान कर चलते हैं, वह भी बदल रहा है.

साल 2015 के नगरपरिषद के चुनाव में औरतों ने वहां भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई. 978 महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरीं, उन में से कई जीत भी गईं. पहली महिला नेता बनने का खिताब मक्का प्रांत की सलमा बिन हिजाब अल ओतिबी को मिला.

यह नहीं पता कि भारत के उलेमा इस जीत को किस नजरिए से देखते हैं, लेकिन दुनिया के नक्शे पर सऊदी अरब के चुनाव को औरतों की आजादी का ‘फाइनल फ्रंटियर’ माना जा रहा है.

जब वहां इतना बड़ा बदलाव स्वीकार हो रहा है, तो हमारे देश में किसी औरत को काजी स्वीकार करने में इतनी तकलीफ क्यों?

पर्सनल ला बोर्ड नामक एक एनजीओ के जनरल सैक्रेटरी वली रहमानी बयान देते हैं कि देश में बढ़ती असहनशीलता के खिलाफ वे मुहिम चलाएंगे. यह बात अहम है. ऐसी मुहिम चलाने का उन्हें पूरा हक है, लेकिन उस के साथ ही मुसलिम औरतों की तरक्की के खिलाफ उन की और उन की कौम की बढ़ती असहनशीलता भी गाहेबगाहे देश के लोगों को देखने और सुनने को मिलती है. उम्मीद है, इस के बारे में भी वे जरूर सोचेंगे और उस के खिलाफ भी कोई न कोई मुहिम जरूर चलाएंगे. यह भी कौम की बड़ी खिदमत होगी.

इस से मुस्लिम कौम और भारत देश दोनों का ही फायदा होगा और फिर यह दोहराना लाजिमी हो जाता है कि आदमी काजी बन सकते हैं, तो फिर औरतें क्यों नहीं?

मौत का गड्ढा खोदते बालू माफिया

14 सितंबर, 2017 की सुबह के तकरीबन साढ़े 5 बजे 60 साल के पवन सिंह रोज की तरह गंगा नदी में नहाने के लिए घर से निकलने लगे. उन के 5 पोतेपोतियों ने भी साथ चलने की जिद की. पवन सिंह ने उन्हें जाने से मना किया, पर बच्चे अपनी जिद पर अड़े रहे.

आखिरकार पवन सिंह पोते पोतियों को लेकर गंगा नदी के किनारे पहुंच गए. बच्चों ने अपनेअपने कपड़े उतारे और पानी में छलांग लगा दी. अपने इन मासूम बच्चों को पानी में अठखेलियां करते देख पवन सिंह खुश होते रहे.

4 बच्चे किनारे से कुछ आगे की ओर बढ़ने लगे, तो पवन सिंह जोर से चिल्लाए कि आगे मत जाओ. गहरा गड्ढा है.

पानी में मस्ती करते बच्चों तक उन की आवाज नहीं पहुंची. जब तक पवन सिंह उन्हें वापस लाने के लिए आगे बढ़ते, तब तक वे चारों बच्चे पानी में डूबने लगे. पवन सिंह उन्हें बचाने के लिए तेजी से आगे बढ़े. उन के साथ उन का एक पोता भी आगे लपका.

पवन सिंह ने तैर कर चारों बच्चों को पकड़ लिया, पर कुछ पल में वे भी पानी में डूबने लगे. पांचों बच्चे उन से लिपट गए.

इसी बीच किनारे पर खड़ी कुछ औरतों ने 2 साडि़यां बांध कर उन की ओर फेंकीं. पवन सिंह ने साड़ी के एक किनारे को पकड़ लिया, पर गांठ खुल गई और वे अपने पांचों मासूम पोते पोतियों समेत गंगा की गहराइयों में समा गए.

नदी के किनारे ही गहरे पानी में डूब कर जान गंवा चुके बच्चों की मां कंचन देवी और रूबी देवी का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था. उन की चीखों से पूरे गांव वालों की आंखें नम हो गईं. गैरकानूनी तरीके से नदी के किनारे मिट्टी और बालू काटने वाले बालू माफिया ने दादा पवन सिंह समेत 5 मासूम पोतेपोतियों को लील लिया.

इस तरह बिहार के पटना जिले के मोकामा ब्लौक के मरांची गांव में तीन भैया टोला के एक ही परिवार के 6 लोगों की जान चली गई.

सुबह के तकरीबन 6 बजे डहर घाट पर हुई इस दर्दनाक घटना के बाद गांव वालों ने बालू माफिया के खिलाफ कमर कस ली. वे नदी के किनारे से मिट्टी और बालू निकालने पर तुरंत पाबंदी लगाने की मांग को ले कर आंदोलन पर उतर आए. पर गंगा के किनारे ही कई लोगों की डूबने से हुई मौत के बाद भी चिमनी संचालक और बालू माफिया बाज नहीं आ रहे हैं और न ही प्रशासन  उन पर नकेल कसने को ले कर गंभीर है.

इस हादसे में पवन सिंह के साथ निक्की कुमारी (11 साल), अनमोल शर्मा (10 साल), काजल कुमारी  (12 साल), निर्मला कुमारी  (9 साल) और मौला कुमारी  (7 साल) गंगा के पानी में डूब गए.

निक्की कुमारी और अनमोल पवन सिंह के बड़े बेटे निरंजन के बच्चे थे. काजल, निर्मला और मौला पवन सिंह के छोटे बेटे पंकज किशोर सिंह के बच्चे थे.

इस टोले के रहने वाले सुदामा सिंह बताते हैं कि पवन सिंह काफी अच्छे तैराक थे, लेकिन अपने पोतेपोतियों को डूबता देख शायद वे घबरा गए होंगे.

मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि पवन सिंह के शरीर से उन के पोतेपोतियों के लटकने की वजह से हो सकता है कि वे तैर नहीं पाए हों. बच्चे उन के कंधे और कमर पकड़ कर लटके हुए थे और ‘बाबाबाबा’ चिल्ला रहे थे. सभी बच्चों को बचाने की कोशिश में वे भी डूब गए.

गांव वालों ने बताया कि बालू और मिट्टी माफिया वाले गैरकानूनी तरीके से खुदाई करते हैं और नदी के किनारे ही 20-25 फुट तक खुदाई कर डालते हैं.

मरांची गांव में नदी के किनारे ईंट के 10 भट्ठे हैं, जो किनारे से ही मिट्टी खोद कर निकाल लेते हैं और कई जगहों पर मौत के गड्ढे बना कर छोड़ देते हैं.

अब इन 6 मौतों के बाद प्रशासन की आंखें खुली हैं और गैरकानूनी खुदाई करने वालों पर नकेल कसने का ऐलान किया है. डूब कर मरने वाले के परिवार को 4-4 लाख रुपए का चैक बांटने में फुरती दिखाई गई, पर यह मामला ठंडा होने के बाद सरकारी अफसर फिर से चादर तान कर सो जाएंगे.

मरांची गांव की सीमा से तकरीबन एक किलोमीटर दूर गंगा का किनारा है. नदी के किनारे 10 ईंटभट्ठे हैं. भट्ठा चलाने वाले कानून को ठेंगा दिखाते हुए बेरोकटोक नदी के किनारे से मिट्टी काटते रहते हैं. मरांची गांव ही नहीं, मोकामा समेत गंगा के किनारे समूचे राज्य में ईंटभट्ठे चलाने वालों की मनमानी चलती है. कुछ महीने पहले भी मोकामा के शिवनार गांव के तरवन्ना घाट पर एक आदमी की गहरे पानी में डूबने से मौत हो गई थी.

गांव वाले दबी जबान में कहते हैं कि बालू और मिट्टी काटने वाले सारे ठेकेदार अपराधी हैं. वे पुलिस को चढ़ावा चढ़ाते रहते हैं और नदी के किनारे बेरोकटोक मौत की खाई खोदते रहते हैं.

बालू और मिट्टी के कारोबारी नदी के किनारे की जमीन मालिकों से खुदाई करने के लिए करार करते हैं. 8 से 10 हजार रुपए प्रति कट्ठा (तकरीबन 350 वर्गफुट) की दर पर किसानों से बालूमिट्टी खरीदने का करार होता है. करार में 4 फुट गहरी बालू या मिट्टी काटने की बात लिखी जाती है, पर ठेकेदार 25 से 30 फुट गहराई तक खोद डालते हैं.

गड्ढे में किसी की डूबने से मौत होने के बाद प्रशासन गैरकानूनी खुदाई पर रोक लगाने का आदेश जारी कर देता है. नदी के किनारे से ईंटभट्ठों को हटाने का निर्देश दिया जाता है. सारे आदेश और निर्देश फाइलों से बाहर आज तक नहीं निकल सके हैं और लोग जान गंवाने को मजबूर हैं.

मरांची गांव के पप्पू सिंह कहते हैं कि हर साल बारिश से पहले चिमनी वाले नदी के किनारे गहरी खुदाई कर ढेर सारी मिट्टी जमा कर के रख लेते हैं. इस से घाट के किनारे 20-25 फुट गहरे गड्ढे हो जाते हैं. बारिश होने पर इन गड्ढों में पानी भर जाता है. गंगा में नहाने आने वाले गांव के लोग इस बात को जानते हैं और सावधान रहते हैं, पर अकसर गलतियां हो ही जाती हैं. बाहरी लोगों को नदी के किनारे बने गड्ढों का पता नहीं चल पाता है और नहाने के दौरान वे डूबने से मारे जाते हैं.

जेम्स को इस लड़की ने बनाया सेक्स एडिक्ट

‘द एक्स फैक्टर’ विजेता और गायक जेम्स आर्थर ने अपनी नई आत्मकथा ‘बैक टू द बाय’ में एक चौकाने वाला खुलासा किया है. उनका कहना है कि वह सेक्स एडिक्ट हैं.

गायक रीटा ओरा के साथ उनके प्रेम प्रसंग का अंत होने के बाद वह सेक्स के आदी हो चुके हैं.

जेम्स ने कहा, ‘अगर मैं ईमानदारी से कहूं तो रीटा से नजदीकी बढ़ने के बाद मैं थोड़ा सेक्स का आदी हो गया हूं. मैंने ट्विटर के जरिए सैकड़ों महिलाओं के साथ नंबरों की अदला-बदली की. उनसे आनलाइन चैट के जरिये बात करनी शुरू कर दी और उनसे नजदीकियां बढाई. उन्होंने कहा कि उनके फ्लैट पर अक्सर महिलाएं सेक्स के लिए आती रहती हैं. मैं इतनी सारी महिलाओं के साथ सो चुका हूं कि गिनती भी भूल गया हूं.

आर्थर ने 2012 में टीवी लाइव शो प्रतियोगिता ‘द एक्स फैक्टर’ जीता था, जिसके बाद से ही वह सफलता के रथ पर सवार हैं. रीटा जो उस वक्त लाइव शो में अतिथि थीं, ने उन्हें मिलने को कहा. आर्थर ने कहा, ‘मुझे अंदाजा नहीं था कि रीटा जैसी महिला वास्तव में मुझमें रुचि रखेगी. मैंने खुद को समझाया और कहा कि यह सच नहीं हो सकता. रीटा ने गलती की है, उसे लगता है कि मैं अच्छा आदमी हूं. पर ऐसा नहीं है. यह बहुत ही भ्रामक स्थिति है.

मैंने और रीटा ने इन सब के बाद कई बार एक दूसरे से मुलाकात की. हमनें एकसाथ कुछ अद्भुत रातें साथ गुजारी. उसने एक रात मुझे बताया, ‘मैं तुमसे प्यार करती हूं. उसने यह बहुत ईमानदारी से कहा था और मैं उस पर विश्वास भी करना चाहता था, हालांकि मुझे यह सब पागलपन लग रहा था.’ रीटा ने थोड़े समय बाद बात करनी बंद कर दी.’

मेरी बीवी की कई लड़कों से दोस्ती है. ऐसे में आप बताएं मुझे क्या करना चाहिए.

सवाल
मेरी शादी को 6 महीने हो चुके हैं. मेरी बीवी मायके में रह कर अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती है. उस की कई लड़कों से दोस्ती है. मुझे लगता है कि कहीं वह किसी लड़के से प्यार न करने लगे. मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब

शादी की बुनियाद यकीन पर टिकी होती है. आप को अपनी बीवी पर भरोसा करना चाहिए. उसे किसी से प्यार करना होता, तो शादी से पहले ही कर लेती. वैसे, आप उसे अपने पास रख कर भी पढ़ाई पूरी करा सकते हैं, पर वजह प्यार होनी चाहिए न कि शक.

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