‘ग्लैमरस लुक’ वाली दुल्हनियां बनीं कल्पना शाह

‘पटना वाले दुल्हनियां ले जायेंगे’ में कल्पना शाह ने बहुत ही चुलबुली दुल्हन का किरादार अदा किया है. निर्माता केशरीनाथ और निर्देशक संजय सिन्हा ने अलग कहानी वाली इस फिल्म को पारिवारिक मनोरंजन से भरपूर बनाया है.

फिल्म में पटना वाली दुल्हनियां का किरदार कल्पना शाह ने अदा किया है. उनके हीरो के रूप में मुन्ना सिंह है. फिल्म में गुजंन पंत भी है. पटना वाली दुल्हनियां के किरदार पर कल्पना शाह ने कहा कि यह बहुत ही सुदंर दिखने वाली खूबसूरत, छरहरी, चुलबुली सी दिखने वाली लडकी का रोल है.

इस फिल्म के गाने अलग है. कल्पना ने कहा कि यह फिल्म हिन्दी फिल्म दिल वाले दुल्हनियां ले जायेगे से पूरी तरह अलग है. फिल्म पूरी तरह से पटना की जिदंगी के हिसाब से है. मेरा लुक मेरी दूसरी फिल्मों से अलग है. कुछ शौट काफी ग्लैमरस भी है. यह कहीं से उबाऊ नहीं है. मेरे यादगार किरदारों में से एक है.

प्रेम विवाह और नाक फुलाती पंचायतें

अपने कुदरती खजाने के लिए मशहूर शांत राज्य केरल में शादी का एक ऐसा मामला गरमाया हुआ है, जिस ने ‘लव जिहाद’ के जिन को बोतल से दोबारा बाहर निकाल दिया है. हालांकि वह जिन भी शर्मिंदा है कि प्यार जैसी पाक चीज को समाज की नाक की खातिर क्यों बारबार बलि का बकरा बनाया जाता है?

मामला कुछ यों है कि केरल के कोट्टायम जिले के टीवीपुरम इलाके की रहने वाली अखिला अशोकन ने एक मुसलिम नौजवान शफीन से निकाह करने के लिए अपने धर्म को बदला और हादिया बन कर उस की जीवनसंगिनी बन गई.

हादिया और शफीन ने निकाह तो कर लिया था, पर उन के आगे की राह कांटों भरी थी, क्योंकि हादिया के पिता अशोकन ने इस मामले को ‘लव जिहाद’ का नाम दे कर केरल हाईकोर्ट का रुख कर लिया था.

अशोकन ने यह आरोप लगाया कि उन की बेटी अखिला यानी हादिया से जबरदस्ती धर्म बदलवाया गया है और उसे ले कर चिंता जताई कि हादिया को आतंकवादी संगठन आईएस में शामिल कराने के लिए सीरिया भेज दिया जाएगा. यह भी कहा जा रहा है कि इस्लामिक स्टेट ने हादिया को अपने यहां भरती किया है, शफीन तो मुहरा भर है.

बता दें कि निकाह के बाद शफीन हादिया को मस्कट ले जाने वाले थे, जहां उन के मातापिता भी रहते हैं, लेकिन चूंकि हादिया यानी अखिला के पिता अशोकन अदालत का दरवाजा खटखटा चुके थे, इसलिए अदालत ने शफीन के हादिया के साथ मस्कट जाने पर रोक लगा दी.

इतना ही नहीं, केरल हाईकोर्ट ने इस शादी को गैरकानूनी करार देते हुए इसे ‘लव जिहाद’ बताया और हादिया को उस के परिवार वालों के हवाले कर दिया. साथ ही, 16 अगस्त को मामले की जांच नैशनल इनवैस्टिगेशन एजेंसी को सौंप दी.

केरल हाईकोर्ट के इस फैसले को चुनौती देने के लिए शफीन ने सुप्रीम कोर्ट से नैशनल इनवैस्टिगेशन एजेंसी की जांच को बंद करने की गुजारिश करते हुए एक याचिका दायर की थी, जिस में एजेंसी पर निष्पक्ष जांच नहीं करने का आरोप लगाया गया था.

उस याचिका के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हादिया के पिता अशोकन को नसीहत देते हुए कहा था कि उन्हें अपनी बेटी की निजी जिंदगी में दखलअंदाजी करने का कोई हक नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, लड़की की उम्र 24 साल है और उसे अपने भविष्य के बारे में फैसला करने का पूरा हक है. मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की पीठ ने सवाल उठाया कि यह मामला ‘लव जिहाद’ का है या नहीं, यह बाद की बात है, लेकिन क्या हाईकोर्ट के पास संविधान के अनुच्छेद 226 में दिए गए अधिकार का इस्तेमाल कर के इस शादी को खारिज करने का हक है?

पीठ ने इस मामले की जांच नैशनल इनवैस्टिगेशन एजेंसी द्वारा कराने के आदेश के मुद्दे पर भी सवाल खड़ा किया. साथ ही, कोर्ट ने लड़की का ब्रेनवाश करने की संभावनाओं को तलाशने का निर्देश दिया.

इधर नैशनल इनवैस्टिगेशन एजेंसी ने बताया कि केरल में कई कट्टरपंथी समूह लोगों का धर्म बदलवाने की कोशिश में लगे हैं और वे ताजा मुस्लिम बने लोगों को जिहाद के नाम पर अफगानिस्तान और सीरिया भेज रहे हैं. हादिया के मामले में भी ऐसा ही होने का शक जताया गया.

जब हाईकोर्ट ने इस मामले की जांच की, तो पाया कि अशोकन की नई याचिका के बाद हादिया की जल्दबाजी में शादी करा दी गई थी. ऐसा भी लगा कि हादिया को अपने होने वाले पति के बारे में कोई खास जानकारी नहीं थी. हादिया का धर्म बदलवाने वाली औरत की संदिग्ध और आपराधिक गतिविधियों की बात भी कोर्ट के सामने आई.

जज इस नतीजे पर भी पहुंचे थे कि हादिया का दिमाग अपने काबू में नहीं है. उस पर कट्टरपंथ का इतना गहरा असर है कि वह सहीगलत सोचने की हालत में नहीं है.

नतीजतन, इसी साल 25 मई को हाईकोर्ट ने इस निकाह को गैरकानूनी मानते हुए रद्द कर दिया और माना कि इस शादी की कानून की नजर में कोई अहमियत नहीं है.

हादिया और शफीन के निकाह का मामला तो ‘लव जिहाद’ की तलवार पर बड़ी अदालतों में लटका हुआ है, लेकिन हमारे देश में अपनी जातबिरादरी या धर्म से बाहर प्यार और उस के बाद शादी करने वाले जोड़ों पर सितम ढाने वाली गांवों की पंचायतें भी किसी से कम नहीं हैं.

बात साल 2016 की है. बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के महेशवारा गांव में एक लड़के को गांव की ही एक लड़की से प्यार हो गया और 14 दिसंबर को वे दोनों गांव से भाग कर एक रिश्तेदारी में चले गए और शादी कर ली.

पता चलने पर लड़की के पिता और गांव वाले उन्हें वापस गांव ले आए और 17 दिसंबर की रात को पंचायत हुई. लड़के ने लड़की के साथ रहने की इच्छा जताई, तो पंचायत ने तालिबानी फैसला सुनाते हुए गांव से बाहर शादी करने को कहा और गांव में रहने के एवज में 51 हजार रुपए और 5 मन चावलदाल देने की सजा सुनाई.

लड़के के घर वालों ने यह शर्त मानने से इनकार कर दिया, तो दबंगों ने लड़कालड़की को जम कर पीटा और गांव से बाहर निकाल दिया.

साल 2013 में छत्तीसगढ़ में एक दलित लड़के द्वारा अंतर्जातीय शादी करने पर उसे कड़ी सजा मिली. दरअसल, रामगढ़ जिले के कोसमंदा गांव के निर्मल सारथी ने दूसरी जाति की एक लड़की सुमन से अगस्त, 2010 में घर वालों को बिना बताए घर से भाग कर शादी कर ली थी.

इस के बाद सारा गांव नाराज हो गया. पंचायत बैठी, तो निर्मल सारथी की मां रामबाई और छोटे भाई को बुलाया गया और उन की पिटाई की गई. वे दोनों किसी तरह अपनी जान बचा कर भागे.

अगले दिन रामबाई अपने परिवार वालों के साथ थाने पहुंची, पर उन लोगों की रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई. पुलिस सुपरिंटैंडैंट और कलक्टर से भी शिकायत की गई, पर कोई फायदा नहीं हुआ.

उधर गांव की पंचायत ने अंतर्जातीय शादी करने वाले निर्मल सारथी और उस के परिवार वालों को गांव में नहीं रहने का लिखित फरमान जारी कर दिया.

इस सिलसिले में वहां के विधायक शुक्राजीत नायक का कहना था, ‘‘एक विधायक होने के नाते मैं अंतर्जातीय शादी के हक में हूं, लेकिन आप को समझना होगा कि जाति और समाज की पंचायत को किनारे कर के ऐसा कुछ करना मुमकिन नहीं है. किसी को अगर शादी करनी है, तो इस में सब की रजामंदी होनी चाहिए.’’

निर्मल सारथी से शादी करने वाली सुमन का मानना था, ‘‘हम ने कोई गुनाह नहीं किया है. हम बालिग हैं, लेकिन हमारे चलते मेरे पति के परिवार वालों को सताया जा रहा है. गांव में मेरे परिवार वालों और दूसरी बड़ी जातियों के डर के चलते कोई भी हमारी मदद नहीं कर रहा है.’’

हालांकि बाद में कुछ सामाजिक संगठनों के दखल से निर्मल सारथी और सुमन गांव लौट आए, लेकिन उन्हें बाद में भी तरहतरह से सताने की कोशिश की गई.

बिहार के समस्तीपुर जिले में एक प्रेमी जोड़े को अंतर्जातीय शादी करना महंगा पड़ गया. वहां के मोहिउद्दीन नगर थाना क्षेत्र के नगर बाजार की महादलित परिवार की लड़की विभा कुरसाहा गांव के एक लड़के राजवल्लभ राय से प्यार करती थी. उन दोनों ने

27 अगस्त, 2016 को शादी कर ली थी. लेकिन नाराज पंचायत ने उन्हें गांव छोड़ देने का फरमान सुना डाला और उन के साथ मारपीट की.

ये तो चंद उदाहरण हैं. कई मामलों में तो इस तरह की शादियों में औनर किलिंग तक हो जाती है. शादी के बाद लड़का और लड़की को भाईबहन की तरह रहने की सजा सुनाई जाती है, चाहे वे एक बच्चे के मांबाप बन चुके हों. दूसरे धर्म में शादी या किसी दूसरी बिरादरी में गठबंधन कर लेना पंचायतों को इतना खलता है कि वे अपने हाथ खून से रंग लेती हैं.

औनर किलिंग के मामले में हरियाणा बदनाम रहा है. उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार समेत दूसरे राज्यों में भी ऐसी शादी करने वालों पर कहर बरपाने वाली पंचायतें बैठी हैं, जिन की फूली नाक ऐसे रिश्तों को कतई बरदाश्त नहीं करती है.

दुख की बात तो यह है कि पंचायतें सरेआम अपराध करती हैं या अपराध करने के लिए उकसाती हैं, इस के बावजूद सरकार और पुलिस प्रशासन इन के खिलाफ कोई कड़ी कार्यवाही नहीं कर पाते हैं या ऐसा करने से बचते हैं.

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल भी इन पंचायतों की वकालत करते हुए इन्हें समाज सुधार का अहम हथियार बता देते हैं.

सवाल उठता है कि ऐसी क्या वजह है, जो ऐसी शादियों के खिलाफ वे ही लोग खड़े हो जाते हैं, जिन से इंसाफ पाने की उम्मीद की जाती है?

दरअसल, चाहे आज हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, लेकिन हमारे देश के ज्यादातर लोगों की सोच रूढि़वादी मानसिकता से ऊपर नहीं उठ पाई है. ऐसी शादियों को वे अपनी आन, बान और शान पर बट्टा लगा मानते हैं और उन के खिलाफ जा कर शादी करने वालों की वे हत्या कर देने में झिझक महसूस नहीं करते हैं.

ज्यादातर मामलों में तो पंचायत का अंदरूनी मामला समझ कर प्रशासन उस से कन्नी काट लेता है. हां, ज्यादा दबाव पड़ता है, तो पुलिस दिखावे के लिए एफआईआर दर्ज कर लेती है, लेकिन उस के बाद कार्यवाही करने से बचती है. कभी कोई पुलिस वाला समाज के खिलाफ जा कर मामले की तह तक पहुंचना भी चाहता है, तो पंचायत की एकजुटता के चलते उसे सुबूत ही नहीं मिल पाते हैं.

अगर ऐसी शादियों को करने वाली लड़कियों के नजरिए से देखा जाए, तो वे बहुत बोल्ड कदम उठाती हैं. उन्हें मालूम होता है कि ऐसा करने की सजा के एवज में उन की जान पर भी बन सकती है. तो क्या लड़कियों के फैसलों को दबाने के लिए मर्दवादी पंचायत उन के सपनों को कुचलने की चाल चलती हैं? एक लड़की हो कर हमारे खिलाफ जाएगी, इसे तो सजा मिलनी ही चाहिए, पंचायतों की यही सोच उन्हें गांव से बेदखल करने, आबरू लूटने या जान से मार देने के बेतुके फरमान सुना देती हैं, ताकि और लड़कियां ऐसा कदम उठाने से पहले सौ बार सोचें.

पंचायतों की इस तानाशाही का इलाज क्या है? झूठी शान दिखाने के लिए 2 हंसतेखेलते लोगों की जिंदगी मुहाल कर देने में कौन सी मर्दानगी है? इस का सब से आसान इलाज तो यही लगता है कि जनता में ऐसी शादियों को ले कर जागरूकता आनी चाहिए, पर ऐसा करना भी टेढ़ी खीर है, क्योंकि पंचायतों से ज्यादा तो वे परिवार आगबबूला होते हैं, जिन के बच्चों ने यह हिम्मती कदम उठाया होता है.

पंचायतों में घर के लोग ही अपनी औलाद की फजीहत ज्यादा करते हैं. शर्म की बात तो यह है कि ऐसी दरिंदगी होने के बावजूद कोई पीडि़त को बचाने का जोखिम नहीं उठाता है.

सख्त कानून बना कर ऐसे मामलों को रोका जा सकता है, लेकिन उस में पुलिस प्रशासन का सहयोग होना बहुत जरूरी है. वह पुख्ता सुबूत जुटाए, लड़कालड़की को सिक्योरिटी दे, मांबाप व पंचायत को समझाए, तो ऐसी शादियों को ले कर होने वाले अपराधों में भी कमी आ सकती है.

इस के अलावा सियासी दलों को भी ऐसी शादियों को बढ़ावा देने में पहल करनी चाहिए. सरकार चाहे तो कुछ भी कर सकती है. उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल सरकार अंतर्जातीय शादी करने वाले जोड़ों को 50 हजार रुपए बतौर उपहार देती है. तमिलनाडु में ऐसा करने वाले जोड़ों को सरकारी नौकरी में मदद मिलती है.

जब भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे ‘राष्ट्रहित’ में सही मानते हुए मान्यता दे दी है, तो छोटी पंचायतों को देश की सब से बड़ी पंचायत का सम्मान करना चाहिए, तभी इस देश से सही माने में जातिवाद की बुराई दूर हो पाएगी.

आर्थिक आजादी से हम अब भी कोसों दूर

आजादी के बाद देश को केवल राजनीतिक आजादी मिली, आर्थिक आजादी नहीं. इसलिए हम आर्थिक विकास के मामले में पिछड़ गए. लाइसैंस, कोटा, परमिट राज के कारण देश में उद्योगधंधों और व्यापार करने पर कई तरह की पाबंदियां लगी हुई थीं. हम ने आर्थिक नीतियों के नाम पर वह रास्ता चुना जो विकासविरोधी था. उन दिनों साम्यवाद और समाजवाद वैचारिक फैशन थे. साम्यवाद से प्रभावित पंडित जवाहरलाल नेहरू इस भेड़चाल में शरीक हो गए और उन्होंने देश के लिए समाजवाद का रास्ता चुना.

विकास के इस मौडल ने देश की प्रगति के सारे रास्ते अवरुद्ध कर दिए. देश की उत्पादक शक्तियों को परमिट, कोटा राज की जंजीरों में जकड़ दिया गया. इसलिए, देश को राजनीतिक आजादी तो मिली, मगर आर्थिक आजादी एक दूर का सपना बनी रही.

नोबेल पुरस्कार विजेता अमेरिकी अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन (1912-2006) उन  गिनेचुने अर्थशास्त्रियों में से थे जिन्होंने अपने समय के आर्थिक चिंतन को बहुत गहरे तक प्रभावित किया. भारत जब आजादी के बाद आर्थिक नियोजन के जरिए 5वें दशक में अपनी आर्थिक विकास की राह तय कर रहा था तब 1963 में मिल्टन फ्रीडमैन को सलाहकार के तौर पर बुलाया था. इस के बाद फ्रीडमैन ने एक लेख ‘इंडियन इकोनौमिक प्लानिंग’ लिखा था. उस में वे भारत के आर्थिक विकास की अपार संभावनाओं को पुरजोर तरीके से उजागर करते हैं.

आर्थिक नीति का अभाव

फ्रीडमैन के विश्लेषण से भारत की आर्थिक बदहाली के कारण की शिनाख्त करने के नाम पर पिछले कई दशकों में जो कई मिथक पैदा किए गए हैं, वे ध्वस्त हो जाते हैं. और असली कारण सामने आ जाता है. उन्होंने कहा था कि भारत की निराशापूर्ण धीमी विकास दर की वजह धार्मिक और सामाजिक व्यवहार या लोगों की गुणवत्ता में नहीं, बल्कि भारत द्वारा अपनाई गई आर्थिक नीति में मिलेगा. भारत के पास आर्थिक विकास के लिए जरूरी किसी चीज का अभाव नहीं है. अभाव है तो सही आर्थिक नीति का.

इसलिए 1991 में नरसिंहा राव ने लाइसैंस, कोटा, परमिट राज खत्म किया तो लोगों को पहली बार लगा कि देश को दूसरी आजादी मिली है या देश को पहली बार आर्थिक आजादी मिली है.

भारत की आजादी के आसपास कई देश स्वतंत्र हुए थे. उन में से जो नियंत्रणमुक्त अर्थव्यवस्था के रास्ते पर चले, वे कहां के कहां पहुंच गए. जापान, इसराईल, मलयेशिया, इंडोनेशिया जैसे देश शून्य से उठ कर खड़े हो गए और विकास की दौड़ में बहुत आगे निकल गए. दूसरी ओर, भारत आज भी अविकसित देशों की कतार में खड़ा है.

जुलाई 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहा राव की अल्पमत सरकार ने स्पष्ट उदारीकरण की नीति की घोषणा की.

हालांकि 1991 के बाद के सुधार धीमे, अधूरे और हिचकिचाहटभरे थे लेकिन फिर इन्होंने भारतीय समाज में कई आधारभूत और गंभीर परिवर्तनों की प्रक्रिया को शुरू किया. यह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण पड़ाव है जितनी कि दिसंबर 1978 में चीन में हुई डेंग की क्रांति.

देश के कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि 1991 में नरसिंहा राव सरकार द्वारा लाइसैंस, कोटा राज खत्म करने के बाद देश आर्थिक आजादी की बयार को अनुभव कर पाया. इसे हमें आर्थिक सुधारों के जरिए ज्यादा कारगर बनाना चाहिए. कुछ आर्थिक सुधार हुए भी, मगर हम दुनिया के बाकी देशों से काफी पीछे हैं.

आर्थिक आजादी का मतलब होता है देश में उद्योगधंधे, व्यापार, व्यवसाय करना सुगम हो. उन पर बेवजह की पाबंदिया न लगाई जाएं. मगर भारत में उद्योगधंधे करना आज 2017 में भी काफी मुश्किल काम है. यह बात आर्थिक आजादी सूचकांक में झलकती भी है.

वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित आर्थिक आजादी के एक सूचकांक में भारत  पिछड़ कर 143वें पायदान पर पहुंच गया है. जबकि पिछले साल इस सूचकांक में भारत 123वें पायदान पर था. खास बात यह है कि अमेरिका के एक थिंकटैंक हैरिटेज फाउंडेशन द्वारा तैयार किए जाने वाले इस सूचकांक में पाकिस्तान सहित अनेक दक्षिण एशियाई पड़ोसी देश भारत से बेहतर स्थिति में हैं. रपट में भारत के खराब प्रदर्शन के लिए आर्थिक सुधारों की दिशा में समानरूप से प्रगति न हो पाने को जिम्मेदार ठहराया गया है.

हैरिटेज फाउंडेशन ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भले ही पिछले 5 वर्षों में भारत की औसत सालाना विकास दर करीब 7 फीसदी रही है लेकिन विकास को गहराईपूर्वक नीतियों में जगह नहीं दी गई है. और यह बात जो आर्थिक आजादी को सीमित करती है. थिंकटैंक ने भारत को ‘अधिकांश रूप से अस्वतंत्र’ अर्थव्यवस्था की श्रेणी में रखा है और कहा है कि बाजारोन्मुख सुधारों की दिशा में प्रगति समानरूप से नहीं हो पा रही है.

दावों की खुलती पोल

सरकार सरकारी क्षेत्र के उद्योगों के जरिए बहुत से  क्षेत्रों में व्यापक रूप से मौजूदगी बनाए हुए है. रिपोर्ट के मुताबिक, रैगुलेटरी माहौल उद्योगिकता को हतोत्साहित कर रहा है. यही नहीं, भारत को इस सूचकांक में मिले कुल 52.6 अंक गत वर्ष के मुकाबले 3.6 अंक कम हैं, जब भारत 123वें पायदान पर था.

आर्थिक आजादी सूचकांक में हौंगकौंग, सिंगापुर और न्यूजीलैंड अव्वल रहे हैं. दक्षिण एशियाई देशों में सिर्फ अफगानिस्तान 163 पायदान और मालदीव 157 पायदान के साथ भारत के नीचे हैं. 125 पायदान के साथ नेपाल, 112वें पर श्रीलंका, 141 पर पाकिस्तान, 107वें पर भूटान और 128वें पर बंगलादेश ने आर्थिक आजादी के मामले में भारत को पीछे छोड़ दिया है.

भारत में अकूत संपत्ति और दरिद्रता दोनों समानरूप से विद्यमान हैं. भारत एक ओर तेजी से अपना विकास कर रहा है, वहीं, दूसरी ओर अपनी विशाल व विविधतापूर्ण आबादी के लिए हरेक के लायक विकास का रास्ता भी ढूंढ़ रहा है.

यह रपट मोदी सरकार के सुधार के दावों पर पूरी तरह सवालिया निशान लगाती है. देश के बहुत सारे राजनीतिक पंडित और अर्थशास्त्री चुनाव होने से पहले नरेंद्र मोदी के बारे में कह रहे थे कि वे भारत के लिए मार्गेट थैचर या तेंग सियाओ पिंग साबित हो सकते हैं. इन दोनों नेताओं की खासीयत यह थी कि उन्होंने अपने देशों को समाजवादी मकड़जाले से मुक्त किया और बाजार द्वारा तय विकास के रास्ते पर आगे बढ़ा कर संपन्न बनाया.

विकास की धीमी रफ्तार

गुजरात मौडल का सपना देश में जम कर बेचा गया और उस की अद्भुत सफलता के बाद नरेंद्र मोदी से भी यह उम्मीद की जाने लगी कि वे आर्थिक सुधारों के रास्ते पर चल कर भारत को तरक्की के रास्ते पर ले जाएंगे. लेकिन 3 साल में ज्यादातर उद्योगपति, अर्थशास्त्री इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि मोदी जिस कछुआ चाल से आर्थिक सुधार कर रहे हैं उन से किसी बुनियादी सुधार करने की उम्मीद करना बेकार है. पिछले कुछ वर्षों से कोई भी कार्य करना आसान नहीं रहा. उल्टे, और कठिन हो गया है.

बेशक, भारत ने दुनिया के सब से तेज विकास दर वाले देश के तौर पर हाल ही अपना मुकाम बनाया है. लेकिन देश में बुनियादी परिवर्तन के मामले में आर्थिक सुधारों की दृष्टि से मोदी सरकार की कोशिशें नाकाफी हैं. तो क्या इस सरकार ने आर्थिक सुधार नहीं किए? यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन मोदी सरकार यह नहीं जान पाई कि कितने बड़े पैमाने पर सुधार जरूरी हैं. मोदी की कोशिश ऐसे फलों को तोड़ने की है जिन तक आसानी से हाथ पहुंच सके.

भारत में व्यवसाय करना कठिन है. विदेशी कंपनियों की यह आम राय है. यह राय केवल विदेशी कंपनियों की ही नहीं है बल्कि देशी उद्योगपति भी यही शिकायत कर रहे हैं.

बजाज आटो के प्रबंध निदेशक राजीव बजाज ने देश में नए प्रयोगों को ले कर सरकारी रवैए पर बड़ा करारा व्यंग्य किया. अपनी क्वाड्रिसाइकिल को बाजार में उतारने में आ रही अड़चनों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि देश की रैगुलेटरी संस्थाएं और सरकारी मंजूरी से जुड़ी शर्तें नवाचारों का गला घोंटने का काम कर रही हैं.

अगर ऐसा ही रहा तो ‘मेक इन इंडिया’ की पहल ‘मैड इन इंडिया’ में बदल जाएगी. बजाज आटो के प्रबंधक निदेशक ने यह भी कहा कि देश में क्वाड्रिसाइकिल की बिक्री शुरू करने के लिए उन्हें 5 वर्षों से इंतजार करना पड़ रहा है, जबकि यूरोपीय, एशियाई और लैटिन अमेरिकी देशों में इस चौपहिया गाड़ी का चलन बढ़ रहा है. उन्होंने इस पर आश्चर्य जताया कि प्रदूषणमुक्त, ईंधन के मामले में किफायती और सुरक्षित होने के बावजूद क्वाड्रिसाइकिल को मंजूरी नहीं दी जा रही. शायद इसलिए मंजूरी नहीं मिल रही कि कुछ लोगों को लगता है कि चारपहिया वाहन खतरनाक होते हैं और लोगों को तीनपहिया वाहनों की सवारी करनी चाहिए. ये दोनों बयान इस बात के सुबूत हैं कि भारत में आर्थिक स्वतंत्रता की अब भी बेहद कमी है. यहां नए उद्योगधंधे चलाना अब भी लोहे के चने चबाने जैसे हैं.

पर्याप्त आर्थिक सुधारों की हिमायत करने वाले ये लोग भले ही उद्योगपति हों मगर आर्थिक स्वतंत्रता का उपयोग केवल अमीरों के लिए नहीं  है. इस की जरूरत उन के लिए ज्यादा है जो समाज के सब से ज्यादा निम्न आर्थिक वर्ग में गिने जाते हैं.

एक गरीब फेरीवाले से बड़ा मुक्त उद्यम का हिमायती कोई नहीं हो सकता. आर्थिक स्वतंत्रता के लिए विभिन्न लाइसैंसों और निरर्थक कानूनों को हटाना भी जरूरी है जिन के दायरे में लोग जीते हैं. स्वतंत्रता के अभाव और अत्यधिक नियंत्रण से गरीब लोग ही सब से ज्यादा शिकार बनते हैं. अमीर लोग तो सरकारी नियंत्रण के बावजूद अपना रास्ता निकाल लेते हैं जबकि गरीबों के पास आर्थिक स्वतंत्रता के अलावा कोई चारा नहीं है. इस मामले में भी हम पिछड़े हुए हैं.

आर्थिक विकास में नाटकीय वृद्धि लाखों भारतीयों को गरीबी से मध्यवर्ग की समृद्धि में ले गई. इस से भारत की गरीबी की दर में कमी आई. उन्हें आर्थिक उदारवाद का लाभ मिला. दूसरी तरफ बड़ी संख्या में कृषि पर निर्भर भारतीयों को इस का लाभ नहीं मिल पाया क्योंकि कृषि का क्षेत्र सुधारों से अछूता है.

वितरण क्षेत्र में छोटे क्रोनीज की भरमार है जो उदारवाद को रोकते हैं. वे किसानों और उपभोक्ताओं के बीच बाधा बन कर खड़े हो जाते हैं और दोनों को नुकसान पहुंचाते हैं. लेकिन किसानों को गंभीररूप से नुकसान पहुंचाते हैं. शहरी क्षेत्रों में आर्थिक उदारवाद के अभाव के कारण अवैध और अनौपचारिक क्षेत्र बरकरार हैं. इस कारण रेहड़ी वाले जैसे हाशिए के व्यवसायी, कानून का शासन न होने के कारण, परेशानी झेलने को मजबूर हैं.

आर्थिक सुधार उन तक पहुंचने चाहिए ताकि वे कानून और मार्केट पूंजीवाद का लाभ उठा सकें. जहां आर्थिक स्वतंत्रता ज्यादा होती है वहां भ्रष्टाचार कम होता है. यह पता चलता है कि श्रेष्ठ भ्रष्टाचार विरोधी अभियान केवल बयानबाजी या कठोर दंडों पर आधरित नहीं होते, बल्कि खरीदने व बेचने के आर्थिक एजेंटों को मिलने वाले प्रोत्साहनों को कम करने और ऐसे फेवर करने के  अधिकार को खत्म करने पर निर्भर करते हैं.

बिगड़ती कानून व्यवस्था

मोदी समर्थकों और विरोधियों की यह शिकायत रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में 2 कदम आगे, 3 कदम पीछे की चाल से ही सुधार हो रहे हैं.

वैसे, मोदी धड़ाकेदार सुधारों या बिगबैंग सुधारों पर नहीं, नारों पर विश्वास करते हैं. इस के बावजूद मोदीभक्त अर्थशास्त्री दावा करते हैं कि मोदी ने बाकी प्रधानमंत्रियों की तुलना में ज्यादा आर्थिक सुधार किए.

जानेमाने मोदीभक्त अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला कहते हैं, ‘‘मोदी के 2 वर्षों के शासन में पिछले 22 वर्षों के मुकाबले ज्यादा सुधार हुए हैं.’’ जबकि, इस दौरान नोटबंदी और जीएसटी ने छोटे उद्योग में और व्यापारियों को करारी लात मारी है. गौरक्षकों ने पशु व्यापार को पंगु बना दिया है. बिगड़ती कानून व्यवस्था उद्योगों को चलाने में कठिनाई पैदा कर रही है.

पिछले वर्षों में हम ने भले ही कई आर्थिक बदलाव किए हों मगर इस मोरचे पर सुधार करना बाकी है. कालाबाजारी खत्म करने का नारा काफी नहीं है.

बैंकों में बढ़ते एनपीए से स्पष्ट है कि बैंकिंग सैक्टर में किस तरह सरकार की नाक के नीचे बेईमानी हो रही है. इस क्षेत्र में सुधारों की सख्त जरूरत है.

लंबे समय से जिस सुधार की सब से ज्यादा जरूरत है और कई सरकारें आने के बावजूद वह लटका हुआ है वह है – श्रम सुधार.  कम्युनिस्ट विचारधारा की देन के कारण रोजगार वृद्धि रुक रही है. मेक इन इंडिया की सफलता के लिए भी यह सुधार बेहद जरूरी है. इस के बगैर हमारी विशाल आबादी हमारी ताकत बनने के बजाय हमारे लिए बोझ बन जाएगी.

चाहे कांग्रेस की सरकार हो या भाजपा की सरकार, दोनों ने तय किया है कि वे श्रम सुधार करेंगे तो ब्राह्मणों द्वारा संचालित यूनियनों की सहमति से जो कभी काम को महत्त्व ही नहीं देते और आसानी से इस के लिए तैयार नहीं हो रहे. इस से पहले जरूरत है प्रशासनिक सुधारों की भी. इस के बारे में वीरप्पा मोईली की रपट मौजूद होने के बावजूद उस पर अमल नहीं किया गया.

दरअसल, लोगों को तेज गति से सुधारों की उम्मीद थी जो पूरी नहीं हो पाई है. जब तक आर्थिक सुधार लागू नहीं होते, देश आर्थिक आजादी सूचकांक के पायदान पर सब से नीचे के देशों के साथ रहेगा. झंडा फहराना और वंदे मातरम का नारा या भारत माता की जय कहने से आर्थिक विकास नहीं होगा.    ॉ

पोर्न स्टार से एक्ट्रेस बनने की तैयारी में हैं मिया

सुनने में आया है कि सनी लियोन के बाद अब एक और एडल्ट स्टार इंडियन फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखने जा रही हैं. ये कोई और नहीं बल्कि अमेरिका की फेमस पोर्न स्टार मिया खलीफा हैं.

24 वर्षीय मिया जो 2014-15 तक पोर्न इंडस्ट्री में सक्रीय रही हैं, वह अब जल्द ही भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में आगाज कर सकती हैं. कहा जा रहा है कि वह बौलीवुड नहीं बल्कि मलयालम फिल्म के जरिए भारतीय फिल्मों में एंट्री करेंगी.

खबरें हैं कि पोर्न इंडस्ट्री छोड़ अब जर्नलिस्ट के तौर पर काम कर रहीं मिया मलयालम फिल्म ‘चंक्न्स 2: द कन्क्यूजन’ से अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत करने जा रही हैं. जो इसी साल अगस्त में रिलीज फिल्म ‘चंक्न्स’ की सीक्वल फिल्म हैं. यह 2018 में रिलीज हो सकती है.

फिल्म के डायरेक्टर ओमर लूलू ने अपने एक इंटरव्यू के दौरान बताया कि मिया खलीफा इस फिल्म में आइटम नंबर के अलावा एक अहम किरदार निभाएंगी.

बताते चलें कि दो साल पहले खबरें थी कि सनी लियोन की तरह मिया भी बिग बौस (सीजन 9) में एंट्री लेंगी. इन खबरों पर मिया खलीफा ने बाकायदा ट्वीट करके कहा था कि वह न तो कभी भारत आएंगी और न ही बिग बौस में शामिल होंगी. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या वाकई मिया खलीफा अपनी कसम तोड़कर इंडिया में आगाज करेगी या ये खबरें महज अफवाहें हैं.

आपको बता दें कि 2014 में एडल्ट फिल्मों में अपना करियर शुरू करने वाली मिया खलीफा पहले एक रेस्टोरेंट में काम करती थी. वो माडलिंग करना चाहती थी लेकिन एडल्ट फिल्मों के एक प्रोड्यूसर ने मिया को अपनी फिल्म में काम करने का आफर दिया जिसे मिया ने स्वीकार कर लिया. देखते ही देखते मिया दुनिया की टाप 10 एडल्ट फिल्म स्टार में शामिल हो गईं.

लेकिन जल्द ही मिया खलीफा का मन इस काम से ऊब गया और उसने पोर्न फिल्म इंडस्ट्री छोड़ने की घोषणा कर दी. खुद मिया खलीफा का दावा है कि पिछले कुछ सालों से वो एडल्ट फिल्में छोड़कर बतौर जर्नलिस्ट और एंकर काम कर रही है.

भारत को लड़नी होगी लंबी राजनयिक लड़ाई

सोमवार को हांगकांग के अखबार साउथ चाइना मॉर्निग पोस्ट में छपी एक खबर इस समय पूरे भारत के लिए चिंता का कारण बनी हुई है. इस खबर के अनुसार, चीन तिब्बत में बहने वाली सांगपो नदी से एक हजार किलोमीटर लंबी एक सुरंग बनाएगा, जो सांगपो के पानी को शिनजियांग प्रांत के रेगिस्तान तक पहुंचाएगी. अखबार ने इस सुरंग की परिकल्पना को चीनी इंजीनियरों के कमाल के रूप में पेश किया है. खबर में यह भी कहा गया है कि जब इसका पानी शिनजियांग के रेगिस्तान में पहुंचेगा, तो वह कैलिफोर्निया की तरह लहलहा उठेगा.

सांगपो तिब्बत के पठार में मानसरोवर झील से निकलने वाली वह नदी है, जिसे हम भारत में ब्रहमपुत्र कहते हैं. यह नदी भारत और बांग्लादेश के एक बड़े हिस्से की जीवन रेखा है. अगर इसका रुख मोड़ा गया, तो भारत की सबसे चौड़े पाट वाली नदी ब्रहमपुत्र के सूखने का खतरा खड़ा हो जाएगा. साथ ही वह संस्कृति भी खतरे में पड़ जाएगी, जो इस पानी के आस-पास विकसित होकर फल-फूल रही है. वैसे ऐसी खबरें पहले भी आती रही हैं कि चीन कई बांध बनाकर भारत की तरफ होने वाले जल के प्रवाह को रोकना चाहता है. तब चीन का तर्क था कि वह ब्रहमपुत्र पर कोई बांध नहीं बना रहा, हां उसकी कुछ सहायक नदियों पर बांध जरूर बना रहा है.

लेकिन ताजा खबर सीधे-सीधे यही कहती है कि सांगपो नदी का पानी शिनजियांग के रेगिस्तान में भेजा जाएगा. हालांकि चीन सरकार के प्रवक्ता ने अगले ही दिन इस पूरी खबर का खंडन कर दिया, लेकिन अखबार में जिस विस्तार से यह खबर छपी है, इसे तुरंत ही खारिज भी नहीं किया जा सकता. संभव है कि चीन अभी इसका खुलासा न करना चाहता हो. वैसे अखबार के हिसाब से भी चीन की यह भावी योजना है और दुनिया की यह सबसे लंबी सुरंग बनाने से पहले इंजीनियर एक कम लंबी सुरंग का प्रयोग कर रहे हैं.

चीन के साथ यह ताजा आशंका डोका ला विवाद के तुरंत बाद खड़ी हुई है, इसलिए इसे भारत पर दबाव बनाने की कोशिश के रूप में भी देखा जाएगा. वैसे भी, यह कहा जाता है कि भारत और चीन धीरे-धीरे जलयुद्ध की ओर बढ़ रहे हैं. चीन को लगता है कि यही अकेला मुद्दा है, जिससे वह भारत पर भारी पड़ सकता है. भारत ही नहीं, एशिया के बहुत सारे देश तिब्बत से निकलने वाली जलधाराओं पर निर्भर करते हैं. वियतनाम और लाओस जैसे देश भी इसे लेकर चीन की शिकायत करते रहे हैं. यह भी कहा जाता है कि चीन नदियों की अंतरराष्ट्रीय संधियों की परवाह नहीं करता.

चीन की एक अन्य दिक्कत यह भी है कि उसने पर्यावरण की परवाह कभी नहीं की और उसे होने वाले नुकसान को हमेशा नजरंदाज किया है. यही वजह है कि पर्यावरण प्रदूषण के मामले में चीन बहुत आगे चला गया है. इसे कम करने के लिए वह प्राकृतिक तरीके अपनाने की बजाय कृत्रिम बारिश जैसी चीजें आजमा रहा है. जाहिर है कि चीन इसकी कीमत भी चुका रहा है.

एक समय था, जब चीन के बारे में भूशास्त्री यह बताते थे कि वहां 50 हजार से भी ज्यादा नदियां हैं. कुछ समय पहले चीन सरकार ने जो अधिकृत आंकड़ा जारी किया, उसके हिसाब से वहां 22,909 नदियां हैं. आधे से ज्यादा नदियां कहां गायब हो गईं, यह अभी भी एक पहेली है. आबादी और विकास के साथ ही चीन की बिजली व पानी की जरूरतें बढ़ रही हैं, इसलिए वह नदियों पर बांध बनाने और उनका रुख मोड़ने का काम बड़े पैमाने पर कर रहा है. लेकिन यह चीन का अपना मामला है. जबकि पानी के मसले पर भारत को राजनयिक स्तर पर अपने हक की लड़ाई लड़नी होगी, और अपने जैसे देशों को भी साथ लेना होगा.

अब ऐसी दिखने लगी हैं मीनाक्षी शेषाद्री

बीते जमाने की फेमस अदाकारा मीनाक्षी शेषाद्री ने हाल ही में अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर कुछ तस्वीरें शेयर की हैं. लेकिन इन तस्वीरों को देखकर आप शायद उन्हें पहचान नहीं पाएंगे. कहते हैं न, वक्त के साथ-साथ धीरे-धीरे सबकुछ बदल जाता है, वैसे ही समय के साथ मीनाक्षी की छवि भी लोगों की याद से धुंधली पड़ने लगी है.

मीनाक्षी ने ‘हीरो’, ‘घायल’, ‘दामिनी’, ‘घातक’, ‘शहंशाह’, ‘तूफान’, ‘दिलवाला’, ‘आंधी-तूफान’ जैसी कई बड़ी फिल्मों में काम किया और इन फिल्मों की बदौलत 90 के दशक की सफल अभिनेत्रियों में उनका नाम शुमार हो गया. उन्होंने इसके अलावा कई फिल्मों में अपने अभिनय का जादू दिखाया, लेकिन परिवार के लिए उन्होंने ये शोहरत छोड़ दी.

बता दें कि मीनाक्षी भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, कत्थक और ओडिसी जैसी नृत्य शैलियों में पारंगत हैं और फिल्मों को अलविदा कहने के बाद वे टैक्सास में ‘चियरिश डांस स्कूल’ नामक कथक और क्लासिकल डांस स्कूल चलाती हैं. इसके अलावा वे कई बार स्टेज पर अपनी कला का प्रदर्शन भी कर चुकी हैं, जिसके लिए उन्हें अनन्य पुरस्कारों से नवाज़ा गया है.

मीनाक्षी को बौलीवुड में पहला ब्रेक सुभाष घई की फिल्म ‘हीरो’ से मिला था, जो उस समय ब्लौकबस्टर हिट हुई थी. इसके बाद तो जैसे मीनाक्षी ने रुकना ही नहीं सीखा और एक के बाद एक सफल फिल्मों में अपना योगदान दिया. मीनाक्षी अब अपनी बेटी के बड़े होने का इंतज़ार कर रही हैं, उनके मुताबिक वे इसके बाद ही फिल्मों में वापसी करेंगी.

जब मुंबई के रेड लाइट एरिया में पहुंची ये एक्ट्रेस

भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में पहले भी वैश्याओं की जिन्दगी पर फिल्में बनी हैं, जिसमें मीना कुमारी से लेकर रेखा और नए जमाने की अदाकाराएं जैसे ऐश्वर्या राय, रानी मुखर्जी और करीना कपूर भी वैश्याओं के रोल निभाती नजर आ चुकी हैं.

इन फिल्मों में वैश्यालयों में रहनेवाली इन महिलाओं की जिन्दगी को करीब से दिखाने का प्रयत्न किया गया था, अब एक ऐसी ही कोशिश कर रही हैं फेमस बौलीवुड एक्ट्रेस सोभिता धुलिपाला, जो जल्द ही ‘मूतोन’ नामक फिल्म में वैश्या का रोल करती हुई नजर आएंगी.

हाल ही में मिली जानकारी के मुताबिक सोभिता इस फिल्म की जमकर तैयारियां कर रही हैं और इसलिए उन्होंने हाल ही में अपने किरदार पर रिसर्च करने के लिए मुंबई की बदनाम गलियों में अपना डेरा डाला था. सोभिता मुंबई के कमाठीपुरा में वैश्याओं की जिन्दगी से जुड़ी जानकारी हासिल करने गई थीं, जहां उन्होंने उनकी दिनचर्या को करीब से देखा.

उन्होंने बताया कि वे इस फिल्म में कमाठीपुरा की एक प्रभावशाली महिला के रोल में दिखाई देंगी. सोभिता के मुताबिक उन्हें यहां रहनेवाले परिवार से बातचीत करने और उन्हें करीब से जानने का मौका मिला. इतना ही नहीं, उन्हें एक परिवार के छोटे से कमरे में रहने का भी मौका मिला.

इस फिल्म के डायलौग्स को और प्रभावशाली बनाने के लिए अनुराग कश्यप को इन्हें लिखने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, वहीं फिल्म को डायरेक्ट गीतू मोहनदास कर रही हैं. बताया जा रहा है कि फिल्म ‘मूतोन’ 2018 में मलयालम और हिंदी में रिलीज होगी.

जवानों ने की आदिवासी लड़कियों से छेड़छाड़

यह शर्मनाक हादसा छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के पालनार कसबे के आदिवासी गर्ल्स होस्टल का है. बीती 31 जुलाई को पालनार होस्टल की आदिवासी लड़कियां चहक रही थीं. एक नाचगाने के जलसे की तैयारियां कर रही वे लड़कियां बारिश का लुत्फ उठाते हुए घर न जा पाने का अफसोस भी कर  रही थीं कि राखी के दिन अपने भाइयों की कलाई पर राखी नहीं बांध पाएंगी.

होस्टल में खासी चहलपहल थी. जलसे की तैयारियां कर रही लड़कियां उस वक्त और खुश हो उठीं, जब उन्हें यह पता चला कि नजदीक के कैंप से कई जवान उन से राखी बंधवाने आ रहे हैं.

गौरतलब है कि नक्सली इलाके छत्तीसगढ़ में जगहजगह सीआरपीएफ के कैंप लगे हुए हैं, जिन में सेना के जवान डेरा डाले हुए हैं. जिस वक्त वरदी पहने कई जवान होस्टल आए, तब कुछ लड़कियां बाथरूम गई हुई थीं.

उन में से जब कुछ लड़कियां अपने कमरों की तरफ लौट रही थीं, तब उन्हें देख कर राखी बंधवाने की मंशा लिए आए जवानों ने एक बार फिर अपना असली रंग दिखा दिया. उन्होंने बाथरूम से आती लड़कियों को रास्ते में रोक कर उन की तलाशी की बात कही, तो वे लड़कियां घबरा उठीं.

सीआरपीएफ के जवानों की इस इलाके में पुलिस वालों और नक्सलियों से भी ज्यादा दहशत रहती है, इसलिए लड़कियां डर के मारे तलाशी से इनकार नहीं कर पाईं.

तलाशी के नाम पर जवानों ने जो घटिया हरकत की, उस ने सेना के जवानों की बदनीयती की पोल खोल दी.

तलाशी के बहाने उन्होंने लड़कियों के अंगों से छेड़छाड़ शुरू की तो वे और घबरा उठीं, पर हट्टेकट्टे और वर्दी के नशे में चूर जवानों का विरोध नहीं कर पाईं. तलाशी के नाम पर उन्होंने भोलीभाली लड़कियों की कैसी तलाशी ली होगी, यह बात किसी सुबूत की मुहताज नहीं है.

जब तलाशी के बहाने छेड़छाड़ पर पानी सिर से ऊपर गुजरने लगा, तो लड़कियों की हिम्मत वापस आई और उन्होंने शोर मचाते हुए विरोध शुरू कर दिया. इस पर और भी लड़कियां इकट्ठा होने लगीं, तो जवान भाग खड़े हुए, पर तब तक तकरीबन 14 लड़कियों के नाजुक अंगों से खिलवाड़ कर अपनी हवस और बुरी मंशा को अंजाम दे चुके थे.

बात जब होस्टल की वार्डन द्रौपदी सिन्हा तक पहुंची, तो इस शर्मनाक हादसे पर वे गुस्सा हो उठीं और सीधे  नजदीकी थाने कोंडाकोआ जा कर अज्ञात जवानों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी.

कुछ ही देर में पूरे राज्य में जवानों की इस बेजा हरकत पर खासा हल्ला मच गया और आदिवासी गुस्से से भर उठे कि हमारी लड़कियों को तो सीआरपीएफ के जवानों ने भेड़बकरी समझ रखा है, जो कभी भी कहीं भी नक्सली होने के शक में पकड़ कर तलाशी के नाम पर छेड़छाड़ शुरू कर देते हैं और मौका मिले तो बलात्कार तक कर डालते हैं.

माहौल गरमाते देख पुलिस और प्रशासन भी हरकत में आ गए और मामले की जांच के लिए तुरंत एक कमेटी बना डाली. इस कमेटी ने 13 छात्राओं के बयान दर्ज किए, तो एक हैरतअंगेज बात यह भी सामने आई कि उन जवानों के नाम और पहचान किसी को नहीं मालूम थे.

आदिवासी लड़कियों के बयानों से यह जाहिर हुआ कि एक जवान बारीबारी से उन्हें टटोलता रहा और दूसरा होस्टल की निगरानी करता रहा.

दंतेवाड़ा के कलक्टर सौरभ कुमार और पुलिस के आला अफसर भी पालनार गर्ल्स होस्टल पहुंचे, पर तब तक वे जवान फरार हो चुके थे.

बहरहाल, छात्राओं द्वारा बताए गए हुलिए के आधार पर उन की पहचान शुरू हुई और पुलिस ने अज्ञात वरदीधारियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 354 और 354 (क) के तहत मामला दर्ज कर उन जवानों की खोजबीन शुरू कर दी.

जवान या शैतान

मामले ने तूल पकड़ा, तो आदिवासी संगठनों के लोगों ने दबाव बनाना शुरू कर दिया. 8 अगस्त को पीडि़त छात्राओं को 231वीं बटालियन के 254 जवानों के फोटो और वीडियो दिखाए गए, तो उन्होंने उन्हें पहचान लिया.

पहला जवान 9 अगस्त को ही गिरफ्तार कर लिया गया, जिस का नाम शमीम अहमद है और वह जम्मूकश्मीर का रहने वाला है.

दूसरा जवान नीरज खंडेलवाल घटना के दूसरे दिन ही छुट्टी ले कर अपने घर देहरादून भाग गया था, जिसे 12 दिन बाद गिरफ्तार कर लिया गया.

शमीम और नीरज तो इसलिए जल्दी पकड़े गए, क्योंकि उन्होंने आदिवासी गर्ल्स होस्टल में घुस कर इन लड़कियों पर बुरी निगाह डाली थी और उन के साथ बेहूदा हरकतें भी की थीं.

कहने को तो इन जवानों की ड्यूटी नक्सलियों से निबटने और आदिवासियों की हिफाजत करने की है, पर होता उलटा है. ये जवान खुद आदिवासी लड़कियों और औरतों पर मौका पाते ही भूखे भेडि़यों की तरह टूट पड़ते हैं और देखते ही देखते उन की इज्जत तारतार कर देते हैं.

दरअसल, 31 जुलाई को पालनार में हुआ यह था कि जवानों की इमेज चमकाने के लिए प्रशासन ने खुद रक्षाबंधन का जलसा रखा था, जिसे नाम दिया गया था ‘सुरक्षा बलों के साथ बस्तर की औरतों का अनोखा रिश्ता’. दंतेवाड़ा के कलक्टर सौरभ कुमार और एसपी कमललोचन कश्यप की इजाजत से ही इसे किया गया था.

देर से ही सही, पर सच जब उजागर हुआ, तो कई सवाल भी साथ लाया कि अगर आदिवासी छात्राओं से जवानों को राखी बंधवानी ही थी, तो इस के लिए रक्षाबंधन वाले दिन के बजाय प्रोग्राम हफ्ताभर पहले क्यों रखा गया और खुले में रखने के बजाय बंद में क्यों रखा गया.

इस होस्टल में तकरीबन 5 सौ आदिवासी लड़कियां रहती हैं, जिन्हें कहा गया था कि वे नाचगाने की प्रैक्टिस करें.

कई और सवाल भी हैं. मसलन, क्या रक्षाबंधन पर बहनें भाइयों के सामने नाचतीगाती हैं? जवाब साफ है कि नहीं. इस दिन भाई भले ही वे फिर धर्म के क्यों न हों, अपनी बहनों को तोहफे देते हैं और उन की हिफाजत की जिम्मेदारी लेते हैं.

पर यहां तो उलटी गंगा बह रही थी. जवानों ने आते ही लड़कियों को छेड़ना शुरू कर दिया, जिस से लड़कियां अपने बचाव के लिए टायलेट की तरफ भागीं, पर वहां भी हैवान बने जवानों ने उन को बख्शा नहीं और मामले पर लीपापोती करते हुए यह जताने की कोशिश की गई कि केवल 2 जवान ही गए थे, जिन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है.

एक महीने तक तो सच को छिपा कर रखा गया, लेकिन पर जब यह पूरी तरह उजागर हुआ तो साफ यह हुआ कि बस्तर में कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज है ही नहीं. आएदिन सीआरपीएफ के जवान आदिवासी औरतों की इज्जत से खिलवाड़ किया करते हैं.

अब से तकरीबन 6 महीने पहले भी आधा दर्जन आदिवासी लड़कियों के नक्सली होने के शक में उन के स्तन तक निचोड़ कर देखे गए थे.

इन से अच्छे हैं नक्सली

सेना के जवानों के सामने आदिवासी लड़कियों को नाचने पर क्यों मजबूर किया गया, इस की जांच हो तो कई चौंका देने वाली बातें उजागर होंगी. पर अफसोस, इन भोलेभाले आदिवासियों से किसी को कोई सरोकार नहीं है. सभ्य समाज की नजर में ये गंवार हैं और मीडिया तभी यहां पहुंचता है, जब नक्सली कोई जोरदार धमाका कर जवानों को उड़ा देते हैं.

हर कोई जानता है कि नक्सली आदिवासियों के हिमायती हैं. उन का मानना है कि पहले पूंजीपति और जमींदार आदिवासियों का शोषण करते थे, अब वही काम बस्तर में तैनात सेना के जवानों के जरीए कराया जा रहा है और इस की जिम्मेदार सरकार है, जो नहीं चाहती कि आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन का उन का बुनियादी हक मिले.

नक्सली चूंकि सेना के जवानों से आदिवासियों की हिफाजत करते हैं, इसलिए उन्हें देशद्रोही करार देते हुए बदनाम कर दिया जाता है. पूरे देश में हवा ऐसी बनाई जाती है, जैसे नक्सली कोई आतंकी या समाज के दुश्मन हों. सेना के जवानों से परेशान इन आदिवासियों की हिफाजत नक्सली करते हैं, तो इस की एवज में आदिवासी भी उन का साथ और माली इमदाद देते हैं.

अरबों रुपए सरकार इन जवानों की तैनाती और खानेपीने पर खर्च कर रही है, पर वे आदिवासियों को तंग करते हैं, तो नक्सलियों की इस दलील को एकदम खारिज नहीं किया जा सकता कि सरकार की मंशा सेना के जवानों से आदिवासियों को इतना परेशान करा देने की है कि वे खुद जंगल छोड़ कर भागने लगे और कुदरती तोहफों से भरपूर बस्तर उद्योगपतियों को दिया जा सके.

मुमकिन है कि यह पूरा सच न हो, पर पालनार की घटना से यह तो उजागर होता है कि जवानों की मंशा और इरादे ठीक नहीं थे, जो घर और बीवी छोड़ कर सालों से बस्तर के कैंपों में रह रहे हैं और अपनी सैक्स की भूख मिटाने के लिए आदिवासी औरतों को निशाना बनाते हैं. ऐसे में कोई उन्हें बचाने नहीं आता. आते हैं तो नक्सली और वे भी सीधे बारूदी सुरंगें लगा कर जवानों को थोक में मारते हैं.

इन दोनों के बीच पिस रहा है तो बेचारा आदिवासी समाज, जिसे यह समझ नहीं आ रहा कि आखिर क्यों हजारों जवानों को सरकार ने इस दुर्गम इलाके में रख छोड़ा है, जो करने के नाम पर आदिवासियों को आएदिन परेशान करते हैं और अब तो होस्टलों में घुस कर लड़कियों को भी नहीं बख्श रहे हैं.

आदिवासियों को जवानों से भले और हमदर्द नक्सली लगते हैं, तो इस में हैरत की बात क्या?

दूसरी कई मांगों और पालनार गर्ल्स होस्टल मामले के विरोध में कई आदिवासी संगठनों ने 5 सितंबर, 2017 को बस्तर बंद का ऐलान किया था, जो कामयाब रहा था.

पहली दफा कुछ गैरआदिवासियों ने भी उन का साथ दिया था. शायद ये लोग भी सेना के जवानों से आजिज आने लगे हैं. पर सरकार जवानों को यहां से हटाएगी, ऐसा लग नहीं रहा.

नांदेड़ में भाजपा की हार के मायने

नांदेड़ महाराष्ट्र का एक छोटा शहर है, पर बहुत छोटा भी नहीं. यहां रोजाना हवाई सेवा चलती है, क्योंकि 10वें सिख गुरु गोबिंद सिंह का 1708 में यहीं देहांत हुआ था और उन्होंने ही सिख पंथ के नेता की जगह गुरु ग्रंथ को दी थी. 6 लाख की आबादी वाले इस शहर का नाम तब चमका, जब यहां 11 अक्तूबर, 2017 को हुए कारपोरेशन के चुनाव में इतिहास रच डाला.

उम्मीद थी कि यहां भारतीय जनता पार्टी ही जीतेगी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस डेरा जमाए हुए थे और 2012 के चुनाव में 41 सीटें जीत कर राज कर रही कांग्रेस को हराने के लिए कमर कसे हुए थे.

नतीजे चौंकाने वाले निकले. 81 सीटों में से 73 कांग्रेस को मिलीं, भारतीय जनता पार्टी को 6, शिव सेना को एक व शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को बड़ा अंडा मिला. कांग्रेस के अशोक चव्हाण ने राहुल गांधी को तोहफा दे दिया कि भाजपा की हर जगह जीत की कोई गारंटी नहीं.

यह ठीक है इस शहर में मुसलिम व दलित वोटर ज्यादा हैं और 2014 में भी नरेंद्र मोदी की लहर में यह सीट कांग्रेस के पास रही थी, पर उम्मीद थी कि जिस तरह नरेंद्र मोदी का दबदबा बढ़ रहा था उस में कांग्रेस की दाल सिर्फ दलदल बन कर रह जाएगी.

नांदेड़ जीत कर कांग्रेस को नया जोश मिला है कि मेहनत की जाए तो सरकार को पटकनी दी जा सकती है. जरूरत है एक ठीकठाक लीडर की और बड़ी पार्टी की लड़ने की मंशा की.

आज जनता बुरी तरह नोटबंदी, टैक्सबंदी, मांसबंदी, मुंहबंदी, सोचबंदी, शौचबंदी, आधारबंदी से कराह रही है. नारे चाहे यह मुक्त भारत, वह मुक्त भारत के लग रहे हों, देश में असल लहर तो मुक्ति मुक्त भारत की चलाई जा रही है, जिस में मुट्ठीभर दरबारी और भगवाधारी पूरे देश को मुसलिम देशों की तरह धर्म के नाम पर चलाने की कोशिश में लगे हैं. नांदेड़ ने जताया है कि यह कोशिश उलटवार कर सकती है और मुक्ति दिलाने वाले को ताकत से मुक्त कर सकती है.

लोकतंत्र और वोटतंत्र में बहुत खराबियां हैं, पर फिर भी अपनी राय को जाहिर करने और अपने गुस्से को वोट से पहुंचाने की ताकत अब भी आम लोगों के हाथों में है. जल्दी ही गुजरात व हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और इन पर नांदेड़ के चुनाव का असर पड़ सकता है.

वैसे, इसी तरह के परिणाम 2014 में भी आए थे, जब मोदी लहर के बावजूद अरविंद केजरीवाल दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीत गए थे, पर फिर कारपोरेशन के चुनाव हार गए थे. नांदेड़ एक फुस अनार भी साबित हो सकता है और महाबम भी. यही कुछ पंजाब के गुरदासपुर में हुआ, जहां भाजपा की विनोद खन्ना की सीट पर कांग्रेस ने तकरीबन 3 लाख वोटों से जीत हासिल की.

जब स्टेज पर एक दूसरे के कपड़े उतारने लगे ये सितारे, देखिए वायरल वीडियो

बौलीवुड सितारों के कई डांस शो आपने देखे होंगे, लेकिन आज जो वीडियो हम आपको दिखाने जा रहे हैं उसने इंटरनेट पर आ लगा दी है. इस वीडियो में डांस कर करते हुए दो सितारे एक दूसरे के कपड़े उतारने लगे और उसके बाद जो हुआ उसे देखने के लिए आपको ये वीडियो देखना होगा.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें