Nitish Kumar को पटकनी देने के लिए भाजपा का चक्रव्यूह

बिहार की राजनीति में इन दिनों काफी हलचल मची हुई है. इस हलचल के कई कारण हैं. सब से बड़ा कारण यह है कि विधानसभा चुनाव समय से पहले हो सकते हैं. तय अवधि के तहत चुनाव नवंबर में होने हैं. लेकिन भाजपा को एक ‘अज्ञात डर’ है कि Nitish Kumar के स्वास्थ्य को देखते हुए तय वक्त पर चुनाव कराने से राजग की जीत में संशय हो सकता है.

भाजपा ने अपने ‘पिछड़े’ चेहरे सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाने की तैयारियां शुरू कर दी हैं. नीतीश कुमार की पार्टी की ताकत लगातार घटी है. कभी विधानसभा में जनता दल (एकी.) सब से बड़ी पार्टी थी, फिर वह भाजपा से नीचे आ गई थी. पिछले विधानसभा चुनाव में तो जद (एकी.) तीसरे नंबर की पार्टी बन कर रह गई है. महज 43 विधायकों के बल पर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं.

भाजपा को लगता था कि नीतीश कुमार चुनाव से पहले स्वयं मुख्यमंत्री पद छोड़ देंगे पर वे कोई बड़ी डील करने से पहले मुख्यमंत्री पद छोड़ने को तैयार नहीं हैं. इधर उन के बेटे निशांत का चेहरा भी सामने लाया गया है. ऐसे में नीतीश कुमार भारतीय जनता पार्टी नेतृत्व के लिए सिरदर्द बनते जा रहे हैं, मगर भाजपा की मजबूरी है कि अगर केंद्र में सत्ता बनाए रखनी है, तो नीतीश कुमार की जीहुजूरी करनी होगी, नहीं तो फिर लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव तो नीतीश कुमार के लिए बांहें फैला कर खड़े ही हैं.

उल्लेखनीय है कि भाजपा ने अपनी सोचीसमझी रणनीति के तहत आरिफ मोहम्मद खान को बिहार का राज्यपाल बनाया है. भाजपा का जनाधार और बढ़ाने के लिए राज्यपाल तुरुप का पत्ता बन गए हैं.

बिहार की राजनीति में इन दिनों कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं. सब से बड़ी अटकल यह है कि भाजपा विधानसभा चुनाव समय से पहले करा सकती है. इस के कई कारण बताए जा रहे हैं.

पहला कारण यह है कि भाजपा को डर है कि नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को देखते हुए तय वक्त पर चुनाव कराने से राजग की जीत में संशय हो सकता है.

दूसरा कारण यह है कि भाजपा अपने ‘पिछड़े’ चेहरे सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाने को आतुर है.

तीसरा कारण यह है कि नीतीश कुमार की पार्टी की ताकत लगातार घटी है. कभी विधानसभा में जद (एकी.) सब से बड़ी पार्टी थी, फिर वह भाजपा से नीचे आ गई. पिछले विधानसभा चुनाव में तो जद (एकी.) तीसरे नंबर की पार्टी बन कर रह गई. महज 43 विधायकों के बल पर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं.

चौथा कारण यह है कि भाजपा को भरोसा था कि नीतीश कुमार चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद छोड़ देंगे, पर वे इस मूड में नहीं हैं. अब तो उन के बेटे निशांत का चेहरा भी सामने है.

एक कारण यह भी है कि भाजपा ने अपनी सोचीसमझी रणनीति के तहत ही आरिफ मोहम्मद खान को बिहार का राज्यपाल बनाया है. राष्ट्रपति शासन की नौबत आई तो राज्यपाल के जरीए भाजपा चुनाव से पहले अपना एजेंडा आगे बढ़ा सकेगी.

इन सभी कारणों के चलते बिहार की राजनीति में इन दिनों काफी हलचल मची हुई है. भारतीय जनता पार्टी के साथ राष्ट्रीय जनता दल और नीतीश कुमार का घातप्रतिघात धीरेधीरे बढ़ता जा रहा है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बिहार की राजनीति में आने वाले दिनों में क्या होता है.

Hindi Story: अजनबी – भारती अपने परिवार के प्यार से क्यों वंचित रही?

Hindi Story: ‘‘देखिए भारतीजी, आप अन्यथा  न लें, आप की स्थिति को देखते हुए तो मैं कहना चाहूंगी कि अब आप आपरेशन करा ही लें, नहीं तो बाद में और भी दूसरी उलझनें बढ़ सकती हैं.’’

‘‘अभी आपरेशन कैसे संभव होगा डाक्टर, स्कूल में बच्चों की परीक्षाएं होनी हैं. फिर स्कूल की सारी जिम्मेदारी भी तो है.’’

‘‘देखिए, अब आप को यह तय करना ही होगा कि आप का स्वास्थ्य अधिक महत्त्वपूर्ण है या कुछ और, अब तक तो दवाइयों के जोर पर आप आपरेशन टालती रही हैं पर अब तो यूटरस को निकालने के अलावा और कोई चारा नहीं है.’’

डा. प्रभा का स्वर अभी भी गंभीर ही था.

‘‘ठीक है डाक्टर, अब इस बारे में सोचना होगा,’’ नर्सिंग होम से बाहर आतेआते भारती भी अपनी बीमारी को ले कर गंभीर हो गई थी.

‘‘क्या हुआ दीदी, हो गया चेकअप?’’ भारती के गाड़ी में बैठते ही प्रीति ने पूछा.

प्रीति अब भारती की सहायक कम छोटी बहन अधिक हो गई थी और ऊपर वाले फ्लैट में ही रह रही थी तो भारती उसे भी साथ ले आई थी.

‘‘कुछ नहीं, डाक्टर तो आपरेशन कराने पर जोर दे रही है,’’ भारती ने थके स्वर में कहा था.

कुछ देर चुप्पी रही. चुप्पी तोड़ते हुए प्रीति ने कहा, ‘‘दीदी, आप आपरेशन करा ही लो. कल रात को भी आप दर्द से तड़प रही थीं. रही स्कूल की बात…तो हम सब और टीचर्स हैं ही, सब संभाल लेंगे. फिर अगर बड़ा आपरेशन है तो इस छोटी सी जगह में क्यों, आप दिल्ली ही जा कर कराओ न, वहां तो सारी सुविधाएं हैं.’’

भारती अब कुछ सहज हो गई थी. हां, इसी बहाने कुछ दिन बच्चों व अपने घरपरिवार के साथ रहने को मिल जाएगा, ऐसे तो छुट्टी मिल नहीं पाती है. किशोर उम्र के बच्चों का ध्यान आता है तो कभीकभी लगता है कि बच्चों को जितना समय देना चाहिए था, दिया नहीं. रोहित 12वीं में है, कैरियर इयर है. रश्मि भी 9वीं कक्षा में आ गई है, यहां इस स्कूल की पिं्रसिपल हो कर इतने बच्चों को संभाल रही है पर अपने खुद के बच्चे.

‘‘तुम ठीक कह रही हो प्रीति, मैं आज ही अभय को फोन करती हूं, फिर छुट्टी के लिए आवेदन करूंगी.’’

स्कूल में कौन सा काम किस को संभालना है, भारती मन ही मन इस की रूपरेखा तय करने लगी. घर में आते ही प्रीति ने भारती को आराम से सोफे पर बिठा दिया और बोली, ‘‘दीदी, अब आप थोड़ा आराम कीजिए और हां, किसी चीज की जरूरत हो तो आवाज दे देना, अभी मैं आप के लिए चाय बना देती हूं, कुछ और लेंगी?’’

‘‘और कुछ नहीं, बस चाय ही लूंगी.’’

प्रीति अंदर चाय बनाने चल दी.

सोफे पर पैर फैला कर बैठी भारती को चाय दे कर प्रीति ऊपर चली गई तो भारती ने घर पर फोन मिलाया था.

‘‘ममा, पापा तो अभी आफिस से आए नहीं हैं और भैया कोचिंग के लिए गया हुआ है,’’ रश्मि ने फोन पर बताया और बोली, ‘‘अरे, हां, मम्मी, अब आप की तबीयत कैसी है, पापा कह रहे थे कि कुछ प्राब्लम है आप को…’’

‘‘हां, बेटे, रात को फिर दर्द उठा था. अच्छा, पापा आएं तो बात करा देना और हां, तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है? नीमा काम तो ठीक कर रही है न…’’

‘‘सब ओके है, मम्मी.’’

भारती ने फोन रख दिया. घड़ी पर नजर गई. हां, अभी तो 7 ही बजे हैं, अजय 8 बजे तक आएंगे. नौकरानी खाना बना कर रख गई थी पर अभी खाने का मन नहीं था. सोचा, डायरी उठा कर नोट कर ले कि स्कूल में कौन सा काम किस को देना है. दिल्ली जाने का मतलब है, कम से कम महीने भर की छुट्टी. क्या पता और ज्यादा समय भी लग जाए.

फिर मन पति और बच्चों में उलझता चला गया था. 6-7 महीने पहले जब इस छोटे से पहाड़ी शहर में उसे स्कूल की प्रधानाचार्य बना कर भेजा जा रहा था तब बिलकुल मन नहीं था उस का घरपरिवार छोड़ने का. तब उस ने पति से कहा था :

‘बच्चे बड़े हो रहे हैं अजय, उन्हें छोड़ना, फिर वहां अकेले रहना, क्या हमारे परिवार के लिए ठीक होगा. अजय, मैं यह प्रमोशन नहीं ले सकती.’

तब अजय ने ही काफी समझाया था कि बच्चे अब इतने छोटे भी नहीं रहे हैं कि तुम्हारे बिना रह न सकें. और फिर आगेपीछे उन्हें आत्मनिर्भर होना ही है. अब जब इतने सालों की नौकरी के बाद तुम्हें यह अच्छा मौका मिल रहा है तो उसे छोड़ना उचित नहीं है. फिर आजकल टेलीफोन, मोबाइल सारी सुविधाएं इतनी अधिक हैं कि दिन में 4 बार बात कर लो. फिर वहां तुम्हें सुविधायुक्त फ्लैट मिल रहा है, नौकरचाकर की सुविधा है. तुम्हें छुट्टी नहीं मिलेगी तो हम लोग आ जाएंगे, अच्छाखासा घूमना भी हो जाएगा.’’

काफी लंबी चर्चा के बाद ही वह अपनेआप को इस छोटे से शहर में आने के लिए तैयार कर पाई थी.

रोहित और रश्मि भी उदास थे, उन्हें भी अजय ने समझाबुझा दिया था कि मां कहीं बहुत दूर तो जा नहीं रही हैं, साल 2 साल में प्रधानाचार्य बन कर यहीं आ जाएंगी.

यहां आ कर कुछ दिन तो उसे बहुत अकेलापन लगा था, दिन तो स्कूल की सारी गतिविधियों में निकल जाता पर शाम होते ही उदासी घेरने लगती थी. फोन पर बात भी करो तो कितनी बात हो पाती है. महीने में बस, 2 ही दिन दिल्ली जाना हो पाता था, वह भी भागदौड़ में.

ठीक है, अब लंबी छुट्टी ले कर जाएगी तो कुछ दिन आराम से सब के साथ रहना हो जाएगा.

9 बजतेबजते अजय का ही फोन आ गया. भारती ने उन्हें डाक्टर की पूरी बात विस्तार से बता दी थी.

‘‘ठीक है, तो तुम फिर वहीं उसी डाक्टर के नर्सिंग होम में आपरेशन करा लो.’’

‘‘पर अजय, मैं तो दिल्ली आने की सोच रही थी, वहां सुविधाएं भी ज्यादा हैं और फिर तुम सब के साथ रहना भी हो जाएगा,’’ भारती ने चौंक कर कहा था.

‘‘भारती,’’ अजय की आवाज में ठहराव था, ‘‘भावुक हो कर नहीं, व्यावहारिक बन कर सोचो. दिल्ली जैसे महानगर में जहां दूरियां इतनी अधिक हैं, वहां क्या सुविधाएं मिलेंगी. बच्चे अलग पढ़ाई में व्यस्त हैं, मेरा भी आफिस का काम बढ़ा हुआ है. इन दिनों चाह कर भी मैं छुट्टी नहीं ले पाऊंगा. वहां तुम्हारे पास सारी सुविधाएं हैं, फिर आपरेशन के बाद तुम लंबी छुट्टी ले कर आ जाना. तब आराम करना. और हां, आपरेशन की बात अब टालो मत. डाक्टर कह रही हैं तो तुरंत करा लो. इतने महीने तो हो गए तुम्हें तकलीफ झेलते हुए.’’

भारती चुप थी. थोड़ी देर बात कर के उस ने फोन रख दिया था. देर तक फिर सहज नहीं हो पाई.

वह जो कुछ सोचती है, अजय उस से एकदम उलटा क्यों सोच लेते हैं. देर रात तक नींद भी नहीं आई थी. सुबह अजय का फिर फोन आ गया था.

‘‘ठीक है, तुम कह रहे हो तो यहीं आपरेशन की बात करती हूं.’’

‘‘हां, फिर लंबी छुट्टी ले लेना…’’ अजय का स्वर था.

प्रीति जब उस की तबीयत पूछने आई तो भारती ने फिर वही बातें दोहरा दी थीं.

‘‘हो सकता है दीदी, अजयजी ठीक कह रहे हों. यहां आप के पास सारी सुविधाएं हैं. नर्सिंग होम छोटा है तो क्या हुआ, डाक्टर अच्छी अनुभवी हैं, फिर अगर आपरेशन कराना ही है तो कल ही बात करते हैं.’’

भारती ने तब प्रीति की तरफ देखा था. कितनी जल्दी स्थिति से समझौता करने की बात सोच लेती है यह.

फिर आननफानन में आपरेशन के लिए 2 दिन बाद की ही तारीख तय हो गई थी.

अजय का फिर फोन आ गया था.

‘‘भारती, मुझे टूर पर निकलना है, इसलिए कोशिश तो करूंगा कि उस दिन तुम्हारे पास पहुंच जाऊं पर अगर नहीं आ पाऊं तो तुम डाक्टर से मेरी बात करा देना.’’

हुआ भी यही. आपरेशन करने से पहले डाक्टर प्रभा की फोन पर ही अजय से बात हुई, क्योंकि उन्हें अजय की अनुमति लेनी थी. सबकुछ सामान्य था पर एक अजीब सी शून्यता भारती अपने भीतर अनुभव कर रही थी. आपरेशन के बाद भी वही शून्यता बनी रही.

शरीर का एक महत्त्वपूर्ण अंग निकल जाने से जैसे शरीर तो रिक्त हो गया है, पर मन में भी एक तीव्र रिक्तता का अनुभव क्यों होने लगा है, जैसे सबकुछ होते हुए भी कुछ भी नहीं है उस के पास.

‘‘दीदी, आप चुप सी क्यों हो गई हैं, आप के टांके खुलते ही डाक्टर आप को दिल्ली जाने की इजाजत दे देंगी. बड़ी गाड़ी का इंतजाम हो गया है. स्कूल के 2 बाबू भी आप के साथ जाएंगे. अजयजी से भी बात हो गई है,’’ प्रीति कहे जा रही थी.

तो क्या अजय उसे लेने भी नहीं आ रहे. भारती चाह कर भी पूछ नहीं पाई थी.

उधर प्रीति का बोलना जारी था, ‘‘दीदी, आप चिंता न करें…भरापूरा परिवार है, सब संभाल लेंगे आप को, परेशानी तो हम जैसे लोगों की है जो अकेले रह रहे हैं.’’

पर आज भारती प्रीति से कुछ नहीं कह पाई थी. लग रहा था कि जैसे उस की और प्रीति की स्थिति में अधिक फर्क नहीं रहा अब.

हालांकि अजय के औपचारिक फोन आते रहे थे, बच्चों ने भी कई बार बात की पर उस का मन अनमना सा ही बना रहा.

अभी सीढि़यां चढ़ने की मनाही थी पर दिल्ली के फ्लैट में लिफ्ट थी तो कोई परेशानी नहीं हुई.

‘‘चलो, घर आ गईं तुम…अब आराम करो,’’ अजय की मुसकराहट भी आज भारती को ओढ़ी हुई ही लग रही थी.

बच्चे भी 2 बार आ कर कमरे में मिल गए, फिर रोहित को दोस्त के यहां जाना था और रश्मि को डांस स्कूल में. अजय तो खैर व्यस्त थे ही.

नौकरानी आ कर उस के कपड़े बदलवा गई थी. फिर वही अकेलापन था. शायद यहां और वहां की परिस्थिति में कोई खास फर्क नहीं था, वहां तो खैर फिर भी स्कूल के स्टाफ के लोग थे, जो संभाल जाते, प्रीति एक आवाज देते ही नीचे आ जाती पर यहां तो दिनभर वही रिक्तता थी.

बच्चे आते भी तो अजय को घेर कर बैठे रहते. उन के कमरे से आवाजें आती रहतीं. रश्मि के चहकने की, रोहित के हंसने की.

शायद अब न तो अजय के पास उस से बतियाने का समय है न पास बैठने का, और न ही बच्चों के पास. आखिर यह हुआ क्या है…2 ही दिन में उसे लगने लगा कि जैसे उस का दम घुटा जा रहा है. उस दिन सुबह बाथरूम में जाने के लिए उठी थी कि पास के स्टूल से ठोकर लगी और एक चीख सी निकल गई थी. दरवाजे का सहारा नहीं लिया होता तो शायद गिर ही पड़ती.

‘‘क्या हुआ, क्या हुआ?’’ अजय यह कहते हुए बालकनी से अंदर की ओर दौडे़.

‘‘कुछ नहीं…’’ वह हांफते हुए कुरसी पर बैठ गई थी.

‘‘भारती, तुम्हें अकेले उठ कर जाने की क्या जरूरत थी? इतने लोग हैं, आवाज दे लेतीं. कहीं गिर जातीं तो और मुसीबत खड़ी हो जाती,’’  अजय का स्वर उसे और भीतर तक बींध गया था.

‘‘मुसीबत, हां अब मुसीबत सी ही तो हो गई हूं मैं…परिवार, बच्चे सब के होते हुए भी कोई नहीं है मेरे पास, किसी को परवा नहीं है मेरी,’’ चीख के साथ ही अब तक का रोका हुआ रुदन भी फूट पड़ा था.

‘‘भारती, क्या हो गया है तुम्हें? कौन नहीं है तुम्हारे पास? हम सब हैं तो, लगता है कि इस बीमारी ने तुम्हें चिड़चिड़ा बना दिया है.’’

‘‘हां, चिड़चिड़ी हो गई हूं. अब समझ में आया कि इस घर में मेरी अहमियत क्या है… इतना बड़ा आपरेशन हो गया, कोई देखने भी नहीं आया, यहां अकेली इस कमरे में लावारिस सी पड़ी रहती हूं, किसी के पास समय नहीं है मुझ से बात करने का, पास बैठने का.’’

‘‘भारती, अनावश्यक बातों को तूल मत दो. हम सब को तुम्हारी चिंता है, तुम्हारे आराम में खलल न हो, इसलिए कमरे में नहीं आते हैं. सारा ध्यान तो रख ही रहे हैं. रही बात वहां आने की, तो तुम जानती ही हो कि सब की दिनचर्या है, फिर नौकरी करने का, वहां जाने का निर्णय भी तो तुम्हारा ही था.’’

इतना बोल कर अजय तेजी से कमरे के बाहर निकल गए थे.

सन्न रह गई भारती. इतना सफेद झूठ, उस ने तो कभी नौकरी की इच्छा नहीं की थी. ब्याह कर आई तो ससुराल की मजबूरियां थीं, तंगहाली थी. 2 छोटे देवर, ननद सब की जिम्मेदारी अजय पर थी. सास की इच्छा थी कि बहू पढ़ीलिखी है तो नौकरी कर ले. तब भी कई बार हूक सी उठती मन में. सुबह से शाम तक काम से थक कर लौटती तो घर के और काम इकट्ठे हो जाते. अपने स्वयं के बच्चों को खिलाने का, उन के साथ खेलने तक का समय नहीं होता था, उस के पास तो दुख होता कि अपने ही बच्चों का बालपन नहीं देख पाई.

फिर यह बाहर की पोस्ंिटग, उस का तो कतई मन नहीं था घर छोड़ने का. यह तो अजय की ही जिद थी, पर कितनी चालाकी से सारा दोष उसी के माथे मढ़ कर चल दिए.

इच्छा हो रही थी कि चीखचीख कर रो पड़े, पर यहां तो सुनने वाला भी कोई नहीं था.

पता नहीं बच्चों से भी अजय ने क्या कहा था, शाम को रश्मि और रोहित उस के पास आए थे.

‘‘मम्मी, प्लीज आप पापा से मत लड़ा करो. सुबह आप इतनी जोरजोर से चिल्ला रही थीं कि अड़ोसपड़ोस तक सुन ले. कौन कहेगा कि आप एक संभ्रांत स्कूल की पिं्रसिपल हो,’’ रोहित कहे जा रहा था, ‘‘ठीक है, आप बीमार हो तो हम सब आप का ध्यान रख ही रहे हैं. यहां पापा ही तो हैं जो हम सब को संभाल रहे हैं. आप तो वैसे भी वहां आराम से रह रही हो और यहां आ कर पापा से ही लड़ रही हो…’’

विस्फारित नेत्रों से देखती भारती सोचने लगी कि अजय ने बच्चों को भी अपनी ओर कर लिया है. अकेली है वह… सिर्फ वह…

Hindi Story: दूसरी शादी – एक पत्नी ने कराई पति की दूसरी शादी

Hindi Story: वह रात कयामत की रात थी. मैं और मेरी बीवी उदास थे, क्योंकि मैं दूसरी शादी करने जा रहा था. लेकिन इस बात से मैं उतना दुखी नहीं था, जितनी वह गमगीन थी.

हमारी शादी को 6 साल हो चुके थे. हजार कोशिशों के बावजूद हमारे आंगन में कोई फूल नहीं खिला था. इस कमी को ले कर मैं कुछ उदास रहने लगा था और नर्गिस की तरफ से मन भी हटने लगा था. जबकि उस के प्यार में कोई फर्क नहीं आया था. वह मुझे भी समझाती कि मैं नाउम्मीद न होऊं, कभी न कभी तो उस की गोद जरूर हरी होगी.

नर्गिस को मैं ने पहली रात से ही प्यार दिया था, आम पतियों की तरह. अपना प्यार जताने के लिए चालू किस्म के डायलागभी बोले थे. मगर सच तो यह है कि मुझे औरतों की वफा पर कभी पूरा विश्वास नहीं रहा. मैं तो इस कमी के चलते यहां तक सोचने लगता कि औलाद की चाह में औरतें कभीकभी गलत कदम भी उठा लेती हैं. नर्गिस एक प्राइवेट फर्म में काम करने जाती है. क्या पता वहभी…

खैर, इन बातों की मुझे खास चिंता नहीं थी. मेरे मन में तो अब बस, एक ही ख्वाहिश करवटें ले रही थी, दूसरी शादी करने की ख्वाहिश. लेकिन नर्गिस से यह बात कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी. मैं बड़े ही पसोपेश में था कि तभी मुझे मां का एक खत मिला. खत पढ़ कर मेरा दिल बागबाग हो गया. उन्होंने मेरी दूसरी शादी करने का इरादा जाहिर किया था. लड़की भी उन्होंने ढूंढ़ ली थी और जल्द ही मेरा निकाह कर देना चाहती थीं. सिर्फ मेरी मां का ही नहीं, मेरे भाईबहनों का भी यही इरादा था.

खत पा कर जैसे मुझ में हिम्मत सी आ गई. आफिस से छूटते ही मैं सीधे घर पहुंचा और खत नर्गिस के हाथ में थमा दिया.

वह खत पढ़ने के बाद हैरत से बोली, ‘‘यह सब क्या है?’’

‘‘भई, मेरे घर वालों ने मेरी दूसरी शादी का इरादा जाहिर किया है, और क्या है. वैसे तुम क्या कहती हो?’’

वह कोई जवाब देने के बजाय उलटे मुझ से ही सवाल कर बैठी, ‘‘आप क्या कहते हैं?’’

‘‘भई, मैं तो सोच रहा हूं कि अब मुझे दूसरी शादी कर ही लेनी चाहिए. शायद इसी बहाने हमारा सूना आंगन चहक उठे,’’ इतना कह कर मैं उस का चेहरा पढ़ने लगा. उस के चेहरे पर उदासी उमड़ आई थी.

मैं फिर बोला, ‘‘अब तुम भी कुछ कहती तो अच्छा होता.’’

‘‘मैं क्या कहूं, जैसा आप बेहतर समझें, करें.’’

हमारे बीच कुछ देर खामोशी रही. मैं उस के मुंह से कोई स्पष्ट बात सुनना चाहता था, लेकिन वह कुछ कहने के लिए जैसे तैयार ही नहीं थी.

मैं ने उसे फिर कुरेदा, ‘‘नर्गिस, मुझे तो अब औलाद का सुख पाने का यही एक रास्ता नजर आ रहा है. फिर भी तुम साफसाफ कुछ कह देती तो मुझे यह कदम उठाने में आसानी हो जाती.’’

‘‘इस बारे में एक औरत भला साफ- साफ क्या कह सकती है?’’ वह मेरे सामने एक सवाल छोड़ कर रसोई में चली गई.

मैं सोचने लगा, नर्गिस ठीक ही कहती है. कोई औरत अपने मर्द को दूसरी शादी की इजाजत कैसे दे सकती है. यह काम तो मर्दों की मर्जी का है. वे चाहें तो दूसरी क्या 4-4 शादियां करें. मैं भी कितना बड़ा बेवकूफ हूं, यह सोच कर मैं मुसकरा उठा और शादी करने का मेरा इरादा पुख्ता हो गया.

घंटे भर बाद जब वह खाना बना कर कमरे में आई तो मैंने कहा, ‘‘नर्गिस, कल मैं घर जा रहा हूं.’’

उस ने मेरी बात को नजरअंदाज करते हुए पूछा, ‘‘खाना खाइएगा, लगाऊं?’’

‘‘हां, ले आओ,’’ मैं ने कहा तो वह सिर झुकाए चली गई.

कुछ देर बाद वह मेरा खाना ला कर मेरे पास ही बैठ गई. मैं ने सिर्फ अपनी प्लेट देख कर पूछा, ‘‘अरे, क्या तुम नहीं खाओगी?’’

‘‘मुझे भूख नहीं है,’’ कह कर वह खामोश हो गई.

मैं ने भी उस से जिद नहीं की और चुपचाप खाने लगा, क्योंकि मैं जानता था कि उस की भूखप्यास तो मां का खत पढ़ते ही मर गई होगी, इसलिए जिद करना बेकार था.

खाना खाने के बाद हम दोनों चुपचाप बिस्तर पर आ गए. मेरे दिमाग में उथलपुथल मची हुई थी. शायद उस के भी दिमाग में कुछ चल रहा होगा. मैं सोच रहा था कि मुझे ऐसा करना चाहिए या नहीं? नर्गिस मुझ से बेहद प्यार करती है. कैसे बर्दाश्त करेगी मेरी दूसरी शादी? इस गम से तो वह मर ही जाएगी.

जब अभी से उस की यह हालत हो रही है तो आगे न जाने क्या होगा. उस की तबीयत भी ठीक नहीं है. आज ही डाक्टर को दिखा कर आई है. मैं ने उस से पूछा भी नहीं कि डाक्टर ने क्या कहा. अपनी दूसरी शादी के चक्कर में कितना स्वार्थी हो गया हूं मैं.

फिर जैसे मेरे अंदर से किसी ने कहा, ‘नौशाद, इतना सोचोगे तब तो कर ली शादी. अरे, आजकल तो औरत खुद अपने मर्द को छोड़ कर दूसरी शादी कर लेती है और तुम मर्द हो कर इतना सोच रहे हो. और फिर तुम तो अपनी बीवी को तलाक भी नहीं दे रहे. कुछ दिन वह जरा उदास रहेगी, फिर पहले की तरह हंसनेबोलने लगेगी. इसलिए अब उस के बारे में सोचना बंद करो और अपना काम जल्दी से कर डालो. मौका बारबार नहीं आता.’

सुबह आंख खुली तो नर्गिस मेरा नाश्ता तैयार कर चुकी थी. उस ने मेरी पसंद का नाश्ता खीर और पूरी बनाई थी. नाश्ता भी मुझे अकेले ही करना पड़ा. बहुत कहने पर भी उस ने मेरा साथ नहीं दिया.

मैं ने उसे समझाया, ‘‘नर्गिस, तुम क्यों इतनी उदास हो रही हो? मैं दूसरी शादी ही तो करने जा रहा हूं, तुम्हें छोड़ तो नहीं रहा. अगर इसी बहाने मैं बाप बन गया तो तुम्हारा सूनापन भी दूर हो जाएगा.’’

वह खामोश रही. एकदम खामोश. मुझे उस की खामोशी से घबराहट सी होने लगी और जल्दी से घर से निकल जाने को मन करने लगा.

मैं ने झटपट अपना सूटकेस तैयार किया, कपड़े पहने और यह कहते हुए बाहर निकल आया, ‘‘नर्गिस, मुझे लौटने में 10-15 दिन लग सकते हैं. तुम अपना खयाल रखना.’’

मैं रिकशा पकड़ कर स्टेशन पहुंचा. टिकट कटा कर एक्सप्रेस गाड़ी पकड़ी और धनबाद से रफीगंज पहुंच गया.

फिर चौथे ही दिन फरजाना नाम की एक लड़की से चंद लोगों की मौजूदगी में मेरा निकाह हो गया. वह लड़की गरीब घर की थी, लेकिन पढ़ीलिखी और खूबसूरत थी.

फरजाना को अपनी दूसरी बीवी के रूप में पा कर मुझ में जैसे नई उमंगें भर गईं. मैं ने 20 दिन उस के साथ बहुत मजे में गुजारे. मेरे परिवार वाले भी उस से बहुत खुश थे. नईनई बीवी का मुझ पर ऐसा नशा छाया कि मुझे नर्गिस की कई दिनों याद तक नहीं आई.

फिर मुझे नर्गिस की चिंता सताने लगी. उस के बारे में बुरेबुरे खयाल आने लगे. फिर एक दिन मैं ने अचानक धनबाद की गाड़ी पकड़ ली.

ट्रेन से उतर कर जब स्टेशन से बाहर आया तो मुझे डा. असलम मिल गए. वह मुझे देखते ही लपक कर पास आते हुए बोले, ‘‘भई, मुबारक हो. मैं कब से ढूंढ़ रहा हूं तुम्हें मुबारकबाद देने को.’’

उन के मुंह से ये शब्द सुन कर मैं सोचने लगा कि मेरी शादी के बारे में इन्हें कैसे पता चल गया. शायद नर्गिस ने इन्हें बताया हो.

मैं ने झेंपते हुए उन की मुबारकबाद का शुक्रिया अदा किया तो वह कहने लगे, ‘‘भई, सिर्फ शुक्रिया से काम नहीं चलेगा, कुछ खिलानापिलाना भी पड़ेगा. बड़ी तपस्या का फल है.’’

‘‘तपस्या का फल…’’ मैं कुछ समझा नहीं. मैं हैरत से बोला तो वह शरारत भरे अंदाज में कहने लगे, ‘‘शरमा रहे हो. होता है, होता है. पहली बार बाप बन रहे हो न, इसलिए.’’

‘‘बाप… डाक्टर साहब, आप क्या कह रहे हैं. मेरी समझ में तो सचमुच कुछ भी नहीं आ रहा,’’ मेरी हैरानी बदस्तूर जारी थी.

उन्होंने कहा, ‘‘मियां, नाटकबाजी बंद करो और मेरी एक बात ध्यान से सुनो, तुम्हारी वाइफ बहुत कमजोर है. उस का जरा खयाल रखो, नहीं तो डिलीवरी के समय परेशानी हो सकती है.’’

यह सुन कर मेरी हैरत और खुशी का ठिकाना नहीं रहा. हैरत इसलिए हुई कि नर्गिस ने इतनी बड़ी खुशी की बात मुझ से छिपाए क्यों रखी. मैं ने उन से फिर पूछा, ‘‘डाक्टर साहब, आप सच कह रहे हैं? मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा.’’

वह मेरा हैरानी भरा चेहरा देख कर बोले, ‘‘क्या वाकई तुम्हें मालूम नहीं है?’’

‘‘हां, मैं सच कह रहा हूं. यह आप को कब पता चला?’’

‘‘जिस दिन तुम आफिस जाते वक्त अपनी वाइफ को मेरे चेंबर में छोड़ कर गए थे. मैं तुम्हें मुबारकबाद भी देना चाहता था, लेकिन फिर नर्गिस से पता चला कि तुम किसी काम से घर चले गए हो. मगर ताज्जुब है, नर्गिस ने तुम्हें यह बात नही बताई,’’ वह सिर हिलाते हुए आगे बढ़ गए.

मैं जल्दी से रिकशा पकड़ कर सीधे घर पहुंचा. उस वक्त नर्गिस गुमसुम सी कमरे में बैठी हुई थी. मैं ने जाते ही उस से पूछा, ‘‘नर्गिस, यह मैं क्या सुन रहा हूं? तुम ने मुझ से इतनी बड़ी बात छिपाए रखी?’’

वह कुछ देर मेरी तरफ देखती रही, फिर उदास स्वर में बोली, ‘‘नहीं छिपाती तो आप दूसरी शादी कैसे करते.’’

‘‘इस का मतलब है, तुम भी यही चाहती थीं कि मेरी दूसरी शादी हो जाए?’’

‘‘मैं नहीं, सिर्फ आप चाहते थे, आप. आप ही के दिल में दूसरी शादी की तमन्ना पैदा हो गई थी. एक औरत तो कभी नहीं चाहेगी कि उस की कोई सौतन आए. सिर्फ औलाद नहीं होने से हमारा प्यार कम होने लगा था, मेरी तरफ से आप का मन हटने लगा था. आप की नजर में मेरी कोई कीमत नहीं रह गई थी. मुझ से दिली प्यार नहीं रह गया था. और मेरा प्यार इतना कमजोर नहीं कि अपनी कोख में पल रहे बच्चे का सहारा ले कर मैं आप को अपने इरादे से रोकती.’’

उस रात की निरंतर चुप्पी के बाद आज वह खूब बोली और फिर फूटफूट कर रोने लगी. मेरे पास उस का कोई जवाब नहीं था.

मैं ने उस के आंसुओं को पोंछते हुए कहा, ‘‘नर्गिस, मैं औलाद के लिए नहीं, बल्कि दूसरी शादी के लिए लालायित हो गया था और भूल कर बैठा. अब शायद इस भूल की सजा भी मुझे काटनी पड़ेगी.’’

वह मुझे माफ कर के मेरे गले से लग गई थी.

आज इस बात को लगभग 15 साल गुजर चुके हैं. मैं 6 बच्चों का बाप बन गया हूं. 3 नर्गिस के हैं और 3 फरजाना के. 2 शादियां कर के जैसे दो नावों की सवारी कर रहा हूं. बहुत टेंशन में रहता हूं.

नर्गिस तो बहुत सूझबूझ वाली और संवेदनशील औरत है. लेकिन फरजाना छोटीछोटी बात पर भी मुझ से झगड़ती और ताने सुनाती रहती है. आज मैं बहुत पछता रहा हूं. सोचता हूं, आखिर मैं ने दूसरी शादी क्यों की?

Best Hindi Kahani: बिगड़ी हुई लड़की – गुड़िया का अनोखा राज

Best Hindi Kahani: भारी बदन की और गोरीचिट्टी खालाजान पानदान खोले बैठी थीं. बड़े से देशी पान का डंठल तोड़ कर पान फैला कर उस में पानदान से तांबे की छोटीछोटी चमचियों से चूना और कत्था लगाते हुए वे मुझ से कहने लगीं, ‘‘देख रानी बिटिया, यह तो मर्दमारनी है. तेरा घर बिगड़वा देगी. देखा नहीं, कैसे बालों की लटें चेहरे पर डाले घूम रही है खसमखानी. ‘‘अभी पिछले हफ्ते ही दाना साहब मियां की मजार के पास, वह जो गुड्डू पगला रहता है न, इसे छेड़ने लगा था. और यह उसे मर्दानी गालियां दे रही थी.

वह तो अच्छा हुआ तेरे खालू साहब उधर से गुजर रहे थे. उन्होंने गुड्डू को डांट कर भगाया और इसे भी चुप करा कर घर भेजा. अगर तू थोड़ा रुक जाए, तो मैं तेरे लिए कोई उम्रदराज कामवाली ढूंढ़ दूंगी.’’मैं बड़ी कशमकश में थी. मुझे फौरन ही किसी कामवाली की सख्त जरूरत थी. मेरा एकाध दिन में मेजर आपरेशन होने वाला था. डाक्टरनी ने साफसाफ लफ्जों में कह दिया था कि यह बच्चा नौर्मल डिलीवरी से नहीं हो सकता. आपरेशन करना जरूरी है. कुछ अंदरूनी प्रौब्लम है.

मैं ने एक नजर गुडि़या पर डाली थी. जब वह खालाजान के घर का काम निबटा कर 1-2 सैकंड को खालाजान के सामने खड़ी हुई, जैसे कह रही हो कि काम निबट चुका है, अब मैं घर जाऊं? मगर उस ने मुंह से कुछ नहीं कहा. खालाजान ने उस का मतलब समझ लिया और आंख के इशारे से ही उसे जाने की इजाजत दे दी.पहली नजर में मुझे गुडि़या सांवली रंगत की छरहरे बदन की तकरीबन 15-16 साल की एक चटपटी सी लड़की लगी. बालों की एक लट उस ने कर्ल कर रखी थी.

वही घुंघराले बालों की लट उस के बाएं गाल को छूती हुई झूल रही थी और अच्छी लग रही थी.मैं ने मन ही मन तय कर लिया कि इसे काम पर जरूर रखूंगी. 2 छोटे बच्चों को कुछ देर देखेगी, फिर झाड़ूपोंछा करने के बाद अगर मौका लगा तो खाना भी बना दिया करेगी. मुझे उस की साफसफाई ने सब से ज्यादा प्रभावित किया. अमूमन काम वाली औरतें गंदे कपड़े पहने रहती हैं, जबकि वह साफसुथरे कपड़े पहने हुए खुद भी साफसुथरी नजर आ रही थी.गुडि़या जब पहले दिन मेरे घर आई, वही घुंघराली लट गाल को छूती हुई थी. आंखों में काजल लगा था, जो पहली नजर में ही दिखाई दे जाए.

मैं ने गुडि़या का तीखी नजरों से जायजा लिया. वह इकहरे बदन की सांवली सी लड़की थी. उम्र के लिहाज से स्वभाव में थोड़ी लापरवाही और झिझक थी. होशियार औरत किसी दूसरी औरत को किसी पहुंचे हुए हकीम की तरह नब्ज नहीं, बल्कि चेहरा देख कर ही उस के पेट, दिल और दिमाग का हाल जान ही लेती है.पहले दिन मैं ने गुडि़या को घर का पूरा काम समझाया. उस के परिवार का पूरा हाल जाना. वह एक टूटेबिखरे परिवार की लड़की थी. उस की मां 2 बच्चे छोड़ कर महल्ले के ही पति के एक दोस्त के साथ दिल्ली भाग कर भजनपुरा महल्ले में रहती थी. भाई उस से छोटा था.

उसे बाप ने एक मोटर मेकैनिक की दुकान पर लगा दिया था. बाप खुद एक लौंड्री पर कपड़े प्रैस करने का काम करता था. डाल से टूटा पत्ता और डोर से टूटी पतंग गरीब की जोरू की तरह होती है, जिसे हर कोई मुफ्त का माल समझ कर झपटना चाहता है. जाहिर है, जमाने ने गुडि़या को इतनी आसानी से नहीं बख्शा होगा. फब्तियों और छींटाकशी की तो उसे इतनी आदत हो गई होगी कि वे अब उस के लिए बेअसर हो गई होंगी.मैं ने पहले ही दिन से गुडि़या को काम समझाने के साथसाथ नैतिकता का पाठ भी पढ़ाना शुरू कर दिया था, ‘‘देखो गुडि़या, अच्छी लड़कियां बालों की लटें नहीं निकालतीं, कभी पान नहीं खातीं और रास्ते में चलते हुए कभी इधरउधर देख कर हंसीठट्ठा नहीं करतीं.’’गुडि़या मेरी नसीहत सुन कर ऐसे मुसकराई, जैसे टीचर की बातों से बोर हो कर लड़कियां मुसकराने लगती हैं.

शाम को अख्तर साहब के आने पर मैं ने गुडि़या की सारी दास्तान उन्हें सुनाई और खालाजान ने जो गुडि़या के बारे में किस्से बयान किए थे, वे भी बताए.अख्तर साहब फौरैस्ट अफसर थे. 5 फुट, 10 इंच कद. भरा पर तंदुरुस्त कसरती बदन. भरी मूंछों में वे बहुत हैंडसम लगते थे. जंगलजंगल की खाक उन्होंने छानी थी. वे दुनिया देखेभाले थे. वैसे भी उन्हें घर आने की फुरसत ही कब मिलती थी. जब भी घर आने का समय मिलता, तो वे घर के कामों में ही बिजी रहते. मेरी बातें सुन कर अख्तर साहब बोले, ‘‘तुम्हें काम से मतलब है, इसलिए काम से ही मतलब रखो. सलोनी के कुछ बड़े होने तक तो इसे रखना ही पड़ेगा.

इसे मजबूरी समझ लो या जरूरत.’’खालाजान को जब मैं ने जा कर बताया कि गुडि़या को मैं ने घर के कामकाज के लिए रख लिया है, तो उन के मुंह का स्वाद मानो कसैला हो गया.  वे मुंह बिगाड़ कर मुझे ऊंचनीच का लैक्चर देने लगीं.शाम के समय जब खालू साहब अपनी फ्रूट की आड़त से घर आए तो खालाजान फिर गुडि़या का दुखड़ा ले बैठीं, ‘‘कलमुंही, महल्ले के आवारा लड़कों से बहुत नैनमटक्का करती है. दीदे तो इतने फट गए हैं कि उस की बेहयाई देख लो, तब भी हयाशर्म नहीं है उसे. बस, दांत फाड़ कर हंस देती है.’’खालू साहब चुपचाप पानी पीते रहे.

कुछ ‘हांहुं’ भी न की. खालाजान की बड़ी लड़की शमा खालू साहब को चाय देने के बाद जब मुड़ी, तो वह मुसकरा रही थी.खालाजान की छोटी लड़की आयशा तेज आवाज में अपनी पढ़ाई कर रही थी. वह भी अब चुप हो कर खालाजान की बातें दिलचस्पी से सुनने लगी.

शमा ने मेज पर नाश्ता लगा दिया, तो मैं ने सेब का एक टुकड़ा उठाया और खालाजान से बोली, ‘‘खालाजान, आजकल कामवाली आसानी से नहीं मिलती है और जब जरूरत हो तो कतई दिखाई नहीं देती. आप उम्रदराज कामवाली मेरे लिए कहां से ढूंढ़तीं?’’खालाजान तखत पर बैठ कर खालू साहब और अपने लिए पानदान खोल कर पान बनाने लगीं. वे मेरी बात से सहमत थीं, मगर गुडि़या से न जाने क्यों उन्हें कुढ़न थी, जबकि वे खुद उस से अपने घर का काम करा रही थीं.

गुडि़या घर का सारा काम खत्म करने के बाद सलोनी को गोद में ले कर खिलाने लगती, तो कभी बाहर गली की दुकान से उस के लिए चौकलेट या बिसकुट खरीद लाती. धीरेधीरे वह मेरे घर में काफी हिलमिल गई थी. अब उस की लटें भी धीरेधीरे लंबी हो कर बालों में समा गई थीं और वह कभी पान खा कर भी नहीं आती थी.कुछ अरसा गुजरा. इसी बीच गुडि़या का बाप और भाई भी कई बार गाहेबगाहे किसी न किसी काम से घर आने लगे थे. वे निश्चिंत थे कि गुडि़या मेरे घर में पूरी तरह से महफूज है.

अब गुडि़या धीरेधीरे मेरी सभी नसीहतों पर भी अमल करने लगी. पहली बार जब मेरे साथ बाजार गई, तो काफी घबराई सी पूरे बाजार में मेरे साथ चिपक कर चलती रही. मैं ने उस के चेहरे की घबराहट को समझा. घर की गली से निकल कर बाजार तक पहुंचने तक मैं ने देखा कि कुछ मनचले थोड़ी दूर तक उस का पीछा करते रहे, मगर मेरे साथ रहने की वजह से वे रास्ते में ही रुक गए.

किसी ने कोई फिकरा भी नहीं कसा. घर आ कर मैं ने गुडि़या से पूछा कि वह बाजार जाते समय इतनी घबराई हुई क्यों थी? पहले तो वह खामोशी से नीचे जमीन की तरफ देखती रही, फिर जब उस ने नजरें उठाईं, तो उस की आंखों में आंसू झिलमिला रहे थे. गुडि़या ने बताया, ‘‘जब से मेरी मां ने घर से बाहर कदम रखा है, दुनिया मेरी दुश्मन हो गई है.

लोगों ने मेरी मां की बदचलनी का लेबल मेरे माथे पर चिपका दिया है. मैं जहां भी जाती हूं, लोग मेरी तरफ इस तरह देखते हैं कि जैसे कोई अजूबा हूं.‘‘गलती मां ने की थी, सजा मैं भुगत रही हूं. फिर मैं ने सोचा कि दुनिया से लड़ने के लिए दुनिया जैसा ही बनने का नाटक करना पड़ेगा, इसलिए मैं ने दूसरा रास्ता अख्तियार कर लिया. लड़कों के छेड़े जाने पर उन्हें मर्दानी गालियां देती. हावभाव ऐसे कर लिए जैसे कोई बिगड़ैल लड़की हूं, ताकि मनचले मुझ से आंख न मिला सकें.

’’मैं ने गुडि़या को समझाया, ‘‘अब तुझे किसी तरह का नाटक करने की जरूरत नहीं है. तेरी तरफ अगर किसी ने आंख भी उठाई तो उस की खैर नहीं होगी. बस, तू महल्ले में बेवजह घूमना छोड़ दे.’’गुडि़या अब मेरे घर के सदस्य जैसी हो गई थी. सुबह आ कर घर का सारा कामधाम अपनेआप बड़ी जिम्मेदारी से करती. काम खत्म करने के बाद सलोनी को घंटों खिलौनों से खिलाती. मैं भी अब उस के खाने और खर्चे का पूरा खयाल रखती. हमारे घर में रहने की वजह से अब वह बेखौफ आतीजाती.

अब उस ने खालाजान के घर का काम भी छोड़ दिया था.एक दिन गुडि़या के बाप ने आ कर बताया कि एक रिश्तेदार के लड़के से गुडि़या की शादी की बात चल रही है, आप की क्या राय है?अब सलोनी भी 3 साल की हो गई थी. वह नर्सरी में जाने लगी थी. मुझे भी अब गुडि़या की तरफ से जिम्मेदार होने का अहसास होने लगा था. मैं ने गुडि़या के बाप से कहा, ‘‘आप शादी की तारीख तय कीजिए. हम शादी में हर तरह से मदद करेंगे.’’कुछ दिनों बाद गुडि़या दुलहन बन कर ससुराल जाने लगी.

मुझ से जो बन सका, मैं ने उस की शादी में जिम्मेदारी निभाई.विदा होते समय गुडि़या मुझ से लिपट कर रोने लगी. हिचकियां लेने के बीच वह कह रही थी, ‘‘मेरी मां ने तो मेरे साथ कुछ नहीं किया, मगर आप ने मां की तरह मुझे सहारा दिया. मुझे अच्छेबुरे की समझ दी. हिफाजत की मेरी. मैं आप को कभी नहीं भूलूंगी.’’गुडि़या के जाने के बाद मुझे कुछ अधूरापन सा महसूस हुआ.

घर में अजीब सी खामोशी छाई रहती, मगर मेरे दिल में सुकून था कि गुडि़या अपनी नई दुनिया में खुश थी और जमाने का बिगड़ी हुई लड़की का लेबल उस के माथे से मिट चुका था.एक दिन खालाजान के घर से एक बुरी खबर सुनने को मिली. मैं दौड़ीदौड़ी उन के घर पहुंची. वे मुझे देखते ही चिपट कर रोने लगीं. मैं ने उन को धीरज बंधाया, तो टुकड़ोंटुकड़ों में उन्होंने बताया कि उन की बड़ी लड़की शमा महल्ले के ही एक आवारा लड़के के साथ सुबहसुबह ही घर में रखे सारे जेवर और नकदी ले कर भाग गई.

खालू साहब सुबह से ही उस की तलाश में निकले हुए हैं. छोटी लड़की आयशा सहमी सी डरीडरी निगाहों से खालाजान को देख रही थी और घर में सन्नाटा पसरा हुआ था. Best Hindi Kahani

रात को बैड पर जाने से पहले करें ये काम, Sex Life बन जाएगी खुशहाल

Sex Life: अकसर शादी के कुछ समय बाद पतिपत्नी की सैक्स लाइफ में फीकापन आने लगता है, जिस से पतिपत्नी का रिश्ता कमजोर होने लगता है. दोनों एकदूसरे से इरिटेट होने लगते हैं और इस का कारण है नौर्मल और बोरिंग सैक्स रूटीन. आज हम आप को बताएंगे कुछ ऐसे टिप्स, जिन्हें आप अगर बैड पर जाने से पहले ट्राई करेंगे, तो आप की सैक्स लाइफ में कभी कोई प्रौब्लम नहीं आएगी.

पत्नियां अकसर घर के कामों में थक जाती हैं और वे काम निबटा कर सीधे बैड पर आ जाती हैं, जिस से कि पतियों को उन के अंदर कोई इंट्रस्ट नहीं आता, लेकिन वहीं अगर पत्नी घर के कामों से फ्री होकर नहा ले और एक सैक्सी सी ड्रैस पहन कर परफ्यूम लगा कर बैड पर आएं, तो पति खुद को उस के करीब आने से रोक नहीं पाएगा.

दूसरी तरफ पति को अपने काम और नौकरी की थकावट को कुछ देर के लिए भूल कर पत्नी के साथ समय बिताना चाहिए, जिस से कि उन दोनों के बीच की दूरियां कम हो सकें. कुछ आदमी अपनी थकावट के बाद शराब का सहारा लेते हैं और खाना खा कर सो जाते हैं, तो ऐसा करने से वे आपना शादीशुदा जीवन बरबाद कर देते हैं. आदमी को घर आ कर अपनी पत्नी के साथ प्यारभरी बातें करनी चाहिए, जिससे कि वे दोनों एकदूसरे से कनैक्टिड फील करें.

अपने काम को कुछ समय के लिए भूल कर पतिपत्नी को एकदूसरे के साथ घूमने भी जाना चाहिए जैसा कि किसी रोमांटिक कैंडल लाइट डिनर या फिर लौंग ड्राइव पर, ताकि दोनों के बीच का प्यार कभी कम न हो पाए और दोनों को किसी और की जरूरत महसूस न हो. हमेशा ऐसा लगे कि अगर उन का पार्टनर साथ है, तो उन्हें किसी तीसरे की जरूरत नहीं है.

Blackmail: एक लड़का मुझे ब्लैकमेल कर रहा है कि वह मेरी वीडियो वायरल कर देगा

Blackmail: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मैं 22 साल की लड़की हूं और दिल्ली की रहने वाली हूं. दरअसल, कालेज में मेरा एक बौयफ्रैंड है और हम दोनों एकदूसरे से बेहद प्यार करते हैं. एक बार मैं और मेरा बौयफ्रैंड कालेज खत्म होने के बाद एक क्लासरूम में रोमांस कर रहे थे और एकदूसरे के होंठों से होंठ मिलाए किस कर रहे थे. उसी समय हमारे ही कालेज के एक लड़के ने हमारी वीडियो बना ली. अगले दिन उस लड़के का मेरे पास मैसेज आया जिस में मेरी वही वीडियो थी और साथ ही लिखा हुआ था कि वह मेरी वीडियो पूरे कालेज में वायरल कर देगा और साथ ही इंटरनैट पर भी डाल देगा. मैं ने उसे ऐसा करने से मना किया तो उस ने वीडियो डिलीट करने की एक शर्त रखी है कि मुझे उस के साथ सैक्स करना पड़ेगा जो कि मैं कभी नहीं करूंगी. मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब –

सब से पहले गलती आप की है कि आप को किसी भी पब्लिक प्लेस पर ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिस से कि कोई आपकी वीडियो बना सके और आप ने तो वैसे भी अपने कालेज के ही क्लासरूम में अपने बौयफ्रैंड के साथ रोमांस किया जहां आप को कोई भी देख सकता था. आप खुद सोचिए कि अगर आप को वहां आप का कोई प्रोफैसर देख लेता, तो क्या होता.

खैर, उम्मीद है कि आप ऐसी गलती दोबारा नहीं दोहराएंगी. अब बात करें उस लड़के की तो आप उस लड़के की शर्त मानने से साफ मना कर दें, क्योंकि जितना आप घबराएंगी या डरेंगी उतना ही वह आपको और डराएगा और कोई भरोसा नहीं है कि उस की शर्त मानने के बाद भी वह वीडियो डिलीट कर देगा.

बेहतर यही होगा कि आप उस को साफ मना करें और अगर फिर भी वह आप को ज्यादा परेशान करता है तो आप अपने बौयफ्रैंड के साथ पुलिस की सहायता ले सकते हैं, क्योंकि आजकल पुलिस ऐसे केस को बड़े ही ध्यान से सुलझाती है और पीड़ित की पहचान को पूरी तरह से गुप्त रखती है जिस से कि बदनामी न हो.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर पर 8588843415 भेजें.

Hindi Story: इज्जत की खातिर – क्यों एक बाप ने की बेटी की हत्या

Hindi Story: सरपंच होने के नाते इंद्राज की सारे गांव में तूती बोलती थी. उन के पास से गुजरते समय लोग सहम जाते थे. किसी की जोरू भागी हो, कोई इश्क या नाजायज संबंध का मामला हो या खेती का मामला हो, सब का फैसला इंद्राज ही करते थे. आसपास के 4 गांवों के मामले इंद्राज ही निबटाते थे.

‘‘मातादीन, नीम के नीचे चारपाई बिछाओ. हम अभी आते हैं,’’ इंद्राज ने आवाज लगाई.

‘‘जी मालिक, अभी बिछाते हैं,’’ हमेशा इंद्राज के आदेशों के इंतजार में रहने वाले नौकर ने जवाब दिया.

इंद्राज एक गिलास छाछ पी कर घर से निकलते हुए बेदो देवी को आदेश देते हुए बोले, ‘‘आज पुनिया गांव से बुलावा आया है. बाहर लोग बैठे हैं. एक दिन की भी फुरसत नहीं मिलती. तुम जरा सुमन का खयाल रखना. वह कहीं आएजाए नहीं,’’ इतना कह कर इंद्राज बाहर निकल कर चारपाई पर बैठ गए.

‘‘क्या है रे छज्जू, क्या बात हो गई?’’ इंद्राज ने चारपाई के पास खड़े लोगों में से एक से पूछा, जो फरियाद ले कर आया था.

‘‘हुजूर, कालू अहीर का लड़का हमारी लड़की को जबरन उठा ले गया था और उस ने एक रात उसे अपने पास रखा भी,’’ छज्जू ने हाथ जोड़ कर कहा.

‘‘तो यह बात है…’’ अपने सिर को हिलाते हुए सरपंच ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम सब गांव पहुंचो. वहां के पंच से कह देना कि हम वहां पर पंचायत करने आ रहे हैं.

‘‘और हां, कालू से कह देना कि गांव छोड़ कर कहीं बाहर न जाए.’’

‘‘बाबूजी, पास के गांव में मेला लगा है. सुषमा और सुमरन के साथ क्या मैं भी मेला देखने चली जाऊं?’’ जब पुनिया गांव के लोग चले गए, तो सुमन इंद्राज से इजाजत लेने आई.

‘‘हमारी बेटी मेले में जा कर इठलाएबलखाए, यह हमें मंजूर नहीं,’’ इंद्राज ने अपनी कटीली रोबदार मूंछों पर हाथ फेरते हुए कहा. बेचारी सुमन अपना सा मुंह ले कर लौट गई.

सुमन के जिद करने पर उस की मां बेदो देवी ने उसे अपने पिता से इजाजत लेने को कहा. वह अपनी तरफ से बेटी को भेज नहीं सकती थी, क्योंकि वह इंद्राज के सनकी दिमाग को अच्छी तरह जानती थी.

मातादीन मोटरसाइकिल को चमका रहा था. इंद्राज के आवाज लगाने पर वह मोटरसाइकिल ले कर उन के सामने खड़ा हो गया.

इंद्राज ने मोटरसाइकिल पर अपने पीछे 2 लठैतों को भी बैठा लिया और तेजी से पुनिया गांव की ओर चल पड़ा.

मोटरसाइकिल पंचों के पास जा कर ठहरी. सभी पंच पहले से ही सरपंच इंद्राज की राह देख रहे थे.

‘नमस्ते सरपंचजी,’ सभी पंचों ने कहा.

‘‘नमस्ते,’’ इंद्राज से उन लोगों ने हाथ मिलाया और बेहद इज्जत के साथ उन्हें बीच वाले आसन पर अपने साथ बैठाया.

‘‘कालू और छज्जू हाजिर हों,’’ गांव के एक हरकारे ने जोरदार आवाज लगाई. कालू और छज्जू हाथ जोड़े सामने आ कर खड़े हो गए.

पंचों ने उन से बैठने को कहा, तो वे दोनों सहमी बिल्ली की तरह बैठ गए.

पंचों का फैसला सुनने के लिए एक तरफ औरतें और दूसरी ओर मर्द खड़ेहो गए.

‘‘हां, तो अपनीअपनी शिकायत पेश करो…’’ इंद्राज ने हांक लगाई, ‘‘छज्जू की बात तो हम सुन चुके हैं, अब कालू की बारी है.’’

‘‘जी हुजूर, छज्जू की बेटी सुमतिया अपनी मरजी से गोलू के साथ भागी थी,’’ कालू ने गिड़गिड़ाते हुए उन से कहा.

‘‘सुमतिया को तुरंत हाजिर करो,’’ दाताराम पंच ने कहा.

सुमतिया और गोलू भी वहां पहले से मौजूद थे. सुमतिया सलवारसूट में थी. पंच की पुकार पर वह सामने आ कर खड़ी हो गई.

‘‘क्यों, तू अपनी मरजी से भागी थी?’’ इंद्राज ने कड़क आवाज में पूछा.

लेकिन सुमतिया शर्म की वजह से कुछ बोल नहीं पा रही थी. वह सिर झुका कर खड़ी रही.

पंचों के दोबारा पूछने पर सुमतिया ने ‘हां’ में जवाब दिया.

‘‘गोलू ने तुम्हारे साथ कुछ गलत तो नहीं किया?’’ इस सवाल पर सुमतिया झेंप गई और कोई जवाब नहीं दे पाई.

पंचों ने सजा देने के लिए आपस में सलाह करनी शुरू कर दी. आखिर में सरपंच ने फैसला सुनाते हुए कहा, ‘‘चूंकि दोनों की बिरादरी एक है, इसलिए इन दोनों की शादी कर देनी चाहिए.’’

इस के बाद सरपंच ने छज्जू से कहा, ‘‘सुमतिया अपनी मरजी से भागी थी. गोलू उसे जबरन नहीं ले गया था. लेकिन तुम ने पंचों से झूठ बोला. तुम को तो वैसे भी अपनी बेटी एक दिन ब्याहनी ही थी, इसलिए सजा के तौर पर तुम कालू को 2 बीघा जमीन, 2 बैल और 4 तोले सोना दोगे.’’

सजा सुन कर छज्जू को पसीना आ गया. वह गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘हुजूर, यह तो बहुत ज्यादा है. मैं इतना कहां से दे पाऊंगा?’’

‘‘लड़की को काबू में नहीं रख सकता, चला है बात करने…’’ इंद्राज ने जोर से झाड़ लगाई, ‘‘अगर नहीं दे सकते, तो जमीन गिरवी रख कर मुझ से कर्ज ले लेना.’’

कर्ज के नाम से छज्जू के पैरों तले जमीन हिलने लगी. उसे पता था कि एक बार का कर्ज पीढि़यों तक नहीं चुकता. उस के दादा ने एक बार कर्ज लिया था, तो वह अभी तक चला आ रहा था, पर पंचों का फैसला उसे मानना ही पड़ा.

कुछ महीने की मुहलत लेने के बाद एक दिन छज्जू खेत के कागजात ले कर इंद्राज के पास पहुंचा.

इंद्राज उस से अंगूठा लगवाने वाले ही थे कि अचानक वहां परेशान सा मातादीन आ गया.

‘‘देखिए माईबाप, सुमन बिटिया को क्या हो गया?’’ मातादीन हांफते हुए कहने लगा, ‘‘बिटिया उलटी पर उलटी किए जा रही है. जल्दी से डाक्टर को बुला लाऊं क्या?’’इंद्राज ने सुना तो फौरन घर के अंदर की ओर भागे.

‘‘क्या हुआ सुमन को?’’ इंद्राज ने अपनी बीवी बेदो देवी से सख्त लहजे में पूछा.

‘‘होना क्या है? किसी का पाप पेट में पाल रही है,’’ बेदो देवी सुमन को पीटते हुए बोली.

‘‘कुछ बताया इस ने किस का है?’’ इंद्राज की अकड़ अब कुछ हद तक ढीली हो गई.

‘‘मुरेना, चरण अहीर का लड़का. वही सरपंच, जिस से पिछले साल आप की ठन गई थी,’’ बेदो देवी ने याद दिलाते हुए कहा, ‘‘इस कलमुंही ने तो हमारी इज्जत को रौंद कर रख दिया. हम कहीं के नहीं रहे.’’

‘‘धीरे बोलो बेदो, आसपास और भी कान हैं. अब रात को ही इस का कुछ इंतजाम करते हैं.’’

‘‘हमारे खानदान की तो इस ने नाक कटा दी. इज्जत और न मिट्टी में मिला दिया. 4 गांवों के सरपंच को अब अपने घर का फैसला करना मुश्किल होगा,’’ बेदो देवी बड़बड़ाई.

रात होते ही लड़की के नाना को बुला लिया गया. वह भी अग्रोहा गांव के सरपंच थे. तीनों ने आपस में सलाह कर सुमन को सल्फास पीने पर मजबूर कर दिया. अपनी इज्जत बचाने का उन्हें और कोई रास्ता नजर नहीं आया.

सुबह तक सुमन जिंदगी और मौत के बीच छटपटाती रही. खुदकुशी का बहाना बना कर वे लोग उसे शहर के सरकारी अस्पताल ले गए. उस की हालत से लग रहा था कि वह रास्ते में ही मर जाएगी. मगर अस्पताल पहुंचने तक वह जिंदा रही.

डाक्टर ने उसे तुरंत भरती कर लिया, लेकिन डाक्टर ने पुलिस को फोन कर दिया. डाक्टर की नजर में वह पुलिस केस था.

पुलिस आई, तो सुमन के बयान पर तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया. दूसरे दिन अखबारों में बड़ेबड़े अक्षरों में छपा, ‘इज्जत की खातिर जवान बेटी को मौत की नींद सुला दिया गया.’

Bhojpuri Interview: भोजपुरी में छोटी और कुंठित फिल्में बन रही हैं – अवधेश मिश्रा

Bhojpuri Interview: भोजपुरी सिनेमा इंडस्ट्री में खलनायक का किरदार निभाने वाले कई ऐसे चेहरे हैं, जिन को परदे पर देख कर डर लगने लगता है. उन्हीं एक्टरों में से एक हैं अवधेश मिश्र, जो रविकिशन के बाद भोजपुरी के ऐसे ऐक्टर है, जिन्होंने भोजपुरी के साथसाथ तमिल सिनेमा और बौलीवुड में भी अपने दमदार रोल से दर्शकों के ऊपर अमिट छाप छोड़ी है.

अवधेश मिश्रा खलनायक के रूप में जितनी बार भी परदे पर नजर आते हैं, दर्शकों का रोमांच उतना ज्यादा बढ़ता जाता है. भोजपुरी सिनेमा इंडस्ट्री में खलनायक का किरदार निभाने में उन का कोई सानी नहीं है. उन की खलनायकी से दर्शक स्क्रीन के सामने जोश में भर उठते हैं. भोजपुरिया बैल्ट में विलेन के रूप में अवधेश मिश्र की तुलना बौलीवुड के अमरीश पुरी और आशुतोष राणा जैसे ऐक्टरों से की जाती है. उन्होंने साल 2014 में तमिल फिल्म ‘पूजाई’ और साल 2015 में बौलीवुड फिल्म ‘डर्टी पौलिटिक्स’ में लीड विलेन के रूप में दर्शकों का मन मोह लिया था. उन के फिल्मी सफर को ले कर लंबी बातचीत हुई. पेश हैं, उसी के खास अंश :

भोजपुरी फिल्मों में आप का शुरुआती सफर कैसा रहा?

जब मैं ने सिनेमा इंडस्ट्री में कदम रखा, तो शुरुआती दिनों में काफी संघर्ष का सामना करना पड़ा. लेकिन उस बुरे वक्त में मेरी पत्नी ने हाथ थाम कर मेरा मनोबल बढ़ाया. फिर समय ने पलटी ली और मुझे भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री सहित तमिल और हिंदी फिल्मों में लीड विलेन के तौर पर काम मिलना शुरू हुआ.

आज भोजपुरी सिनेमा केवल टैलीविजन और यूट्यूब तक ही सिमट कर रह गया है. इस की क्या वजह है?

भोजपुरी में पहले जब फिल्में बनती थीं, तो सिनेमाहाल में रिलीज होती थीं. आजकल भोजपुरी में फिल्में ही नहीं, बल्कि टैली फिल्में बन रही हैं, जो टैलीविजन पर प्रसारित और रिलीज होती हैं. इस की 80 फीसदी औडियंस औरतें हैं. जब किसी खास औडियंस को ध्यान में रख कर एक ही ढर्रे पर फिल्में बनेंगी, तो ये फिल्में सिनेमाहाल तक नहीं जा पाती हैं. यही वजह है कि भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री दूसरी फिल्म इंडस्ट्री से काफी पीछे छूट गई है.

आप ने दूसरी फिल्म इंडस्ट्री से भोजपुरी के पिछड़ने की बात कही है. भोजपुरी फिल्में कहां पीछे छूट रही है?

भोजपुरी फिल्में साउथ और बौलीवुड की फिल्मों से बहुत पीछे छूट चुकी हैं. दूसरी फिल्म इंडस्ट्री में माहिर डायरैक्टर और कलाकार होते हैं, वहां सिनेमा को बहुत ऊंचा दर्जा दिया जाता है, जबकि भोजपुरी सिनेमा को नाम और पैसा कमाने का जरीया मान लिया गया है. दूसरी फिल्म इंडस्ट्री के लोग सिनेमा के लिए कुछ भी कर सकते हैं, जबकि भोजपुरी वाले खुद के लिए कुछ भी कर सकते हैं.

आप भोजपुरी सिनेमा इंडस्ट्री को किस मुकाम पर देख पा रहे हैं?

पहली बात तो यह कि भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री नाम की कोई चीज बची ही नहीं है, क्योंकि कुछ लोगों ने इसे फिल्म इंडस्ट्री से अलबम इंडस्ट्री बना दिया है.

क्या वजह है कि भोजपुरी फिल्मों के मूल दर्शक भोजपुरी सिनेमा से कटते जा रहे हैं?

यहां के सिंगर्स ने भोजपुरी सिनेमा को दर्शक की जगह श्रोता बना दिया है. इसलिए भोजपुरी के लिए अच्छा सोचने और करने वालों को फिर से भोजपुरी सिनेमा के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी. मैं ने भोजपुरी सिनेमा के जीवनकाल में एक भोजपुरी कलाकार, निर्माता और निर्देशक के तौर पर बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन अब लड़ाई और भी गंभीर है.

पिछले कुछ सालों से सासबहू वाले एकजैसे टाइटिल की बाढ़ सी आ गई है. इस की क्या वजह है?

भोजपुरी फिल्मों का टाइटिल जो है, भोजपुरिया बैल्ट की औरतों को देख कर तय किया जा रहा है. भोजपुरिया बैल्ट में सास, बहू, ननद, भौजाई वगैरह के रिश्ते में खटास और कुंठा बढ़ती जा रही है. समाज जिस कुंठा से घिरा हुआ है, भोजपुरी में उसी कुंठा को टारगेट कर के फिल्में बन रही हैं.

महिला दर्शक फिल्मों के कैरेक्टर की जगह खुद को रख कर देखती हैं, इसलिए सासबहू वाली फिल्में ज्यादा पसंद की जा रही हैं. मेरा मानना है कि भोजपुरी में छोटी और कुंठित फिल्में बन रही हैं.

जब फिल्में सिनेमाहाल में रिलीज नहीं हो रही हैं, तो इन की कामयाबी का पैमाना कैसे मापा जाता है?

भोजपुरी फिल्मों की कामयाबी का पैमाना आजकल टैलीविजन के पैमाने पर निर्भर है, जिसे हम टीआरपी और जीआरपी के नाम से जानते हैं. लेकिन फिल्में कामयाबी मापने का यह पैमाना मु?ो मजाक जैसा लगता है.

आप की तुलना अमरीश पुरी और आशुतोष राणा जैसे दिग्गज विलेन से की जाती है. यह सुन कर आप को कैसा लगता है?

मेरी तुलना जब भी अमरीश पुरी और आशुतोष राणा जैसे कलाकारों से होती है, तो दुख होता है. क्योंकि यहां एक घटिया से घटिया अलबम भी मिलियन में देखा जाता है और अच्छे विषय, अच्छे कलाकारों व तकनीकी के साथ बनी फिल्म को दर्शक ही नहीं मिलते हैं. टीआरपी, जीआरपी और मिलियन के जमाने में सब मजाक लगने लगा है. इसलिए मेरा मानना है कि मैं अवधेश मिश्र ही रहूं और उसी रूप में मेरी पहचान हो.

उत्तर प्रदेश की तुलना में बिहार में भोजपुरी फिल्मों की शूटिंग न होने की कोई खास वजह?

पिछले कई सालों से बिहार में भोजपुरी फिल्मों की शूटिंग थम सी गई गई है. फिल्मकार बिहार सरकार के असहयोगी रवैए के चलते बिहार का रुख नहीं करते हैं, जबकि बिहार में सब से ज्यादा भोजपुरी फिल्में देखी जाती हैं.

हाल ही में भोजपुरी जगत के कुछ लोगों ने बिहार सरकार से मुलाकात की थी. आशा है, जल्दी ही बिहार में फिर से भोजपुरी शूटिंग की शुरुआत होगी. फिल्म प्रोत्साहन के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार बहुत अच्छी है.

भोजपुरी सिनेमा को पीछे धकेलने में आप किस को दोषी मानते हैं?

भोजपुरी सिनेमा को पीछे धकेलने में केवल दोषी आजकल के सिंगर्स हैं, जिन्होंने भोजपुरी को बहुत पीछे धकेल दिया है.

Bahujan Samaj Party में दरार

Bahujan Samaj Party को नई दिशा देने की कोशिश में जुटे आकाश आनंद को मायावती ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है. एक बार फिर सवाल उठ गया है कि क्या मायावती का मकसद बसपा को पूरी तरह तबाह कर देना है?

दरअसल, आकाश आनंद ने अपने एक संबोधन में मायावती के कुछ करीबियों पर पार्टी के हित का ध्यान न रखने का आरोप लगाया था. यह बात बसपा सुप्रीमो मायावती को पसंद नहीं आई और पाटी को लगातार मिल रही हार की बौखलाहट भी आकाश आनंद के बाहर होने की अहम वजह बन गई.

परिवारवाद के खिलाफ बोलने वाली मायावती आखिरकार खुद भी उसी राह पर चल पड़ी थीं. यह उन की सब से बड़ी गलती थी. अगर कांशीराम चाहते तो वे भी अपने किसी भाईभतीजे को बसपा सौंप सकते थे, मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया और भारतीय राजनीति में ऐसा काम किया, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता.

लेकिन कुछ समय पहले मायावती ने पहले तो अपने भतीजे आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर खांटी बसपाइयों को भीतर ही भीतर नाराज कर दिया, फिर हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली सरीखे राज्यों में हुए चुनाव की सारी जिम्मेदारी आकाश आनंद को सौंपी.

आकाश आनंद इन राज्यों में बसपा को दोबारा मुख्यधारा में लाने के लिए खासी मेहनत करते दिखाई दिए और एक दफा उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था, ‘हमारे कुछ पदाधिकारी पाटी को फायदा पहुंचाने के बजाय नुकसान पहुंचा रहे हैं. गलत लोग गलत जगह पर बैठे हैं, जिस से पार्टी को नुकसान हो रहा है. यह चीज मैं ने भी महसूस की. मु?ो भी काम करने में बहुत दिक्कत आ रही है.

‘कुछ लोग हमें भी काम नहीं करने दे रहे हैं. कुछ लोग ऐसे बैठे हैं, जिन को अभी हम छेड़ नहीं सकते. जिन को हम हिला नहीं सकते. जिस तरह से पार्टी चल रही है, उस में काफी कमियां हैं.’

दरअसल, आकाश आनंद ने जिस तरह खुल कर पार्टी की खामियों के बारे में कार्यकर्ताओं से मंच से बात की, वह बड़ेबड़े नेताओं को पसंद नहीं आ रही थी. इस से पार्टी के बीच आकाश आनंद को ले कर विरोध के स्वर उठने लगे.

नतीजतन, मायावती ने वही किया, जो उन के आसपास बैठे लोगों ने उन्हें बताया और मजबूर कर दिया.

बसपा सुप्रीमो मायावती ने आकाश आनंद को जिम्मेदारी सौंपी थी कि वे नौजवानों को बसपा के साथ जोड़ें, पर लगता है कि मायावती को अपने भतीजे के काम करने का तरीका पसंद नहीं आया.

अगर मायावती को बहुजन समाज पार्टी को सचमुच कांशीराम के पदचिह्नों पर आगे ले जाना है, तो आकाश आनंद जैसे लोगों को अहमियत देनी ही पड़ेगी. यह नहीं भूलना चाहिए कि बसपा का जो असर बहुजन समाज पर था, आज वह धीरेधीरे कमजोर होता जा रहा है, तो उस की एक अहम वजह मायावती के काम करने के तरीके हैं.

Hindi Kahani: गहरी चाल – क्या थी सुनयना की चाल

Hindi Kahani: सुनयना दोनों हाथों में पोटली लिए खेत में काम कर रहे पति और देवर को खाना देने जा रही थी. उसे जब भी समय मिलता, तो वह पति और देवर के साथ खेत के काम में जुट जाती थी.

अपनी धुन में वह पगडंडी पर तेज कदमों से चली जा रही थी, तभी सामने से आ रहे सरपंच के लड़के अवधू और मुनीम गंगादीन पर उस की नजर पड़ी. वह ठिठक कर पगडंडी से उतर कर खेत में खड़ी हो गई और उन दोनों को जाने का रास्ता दे दिया.

अवधू और मुनीम गंगादीन की नजर सुनयना की इस हरकत और उस के गदराए जिस्म के उतारचढ़ावों पर पड़ी. वे दोनों उसे गिद्ध की तरह ताकते हुए आगे बढ़ गए.

कुछ दूर जाने के बाद अवधू ने गंगादीन से पूछा, ‘‘क्यों मुनीमजी, यह ‘सोनचिरैया’ किस के घर की है?’’

‘‘यह तो सुखिया की बहू है. जा रही होगी खेत पर अपने पति को खाना पहुंचाने. सुखिया अभी 2 महीने पहले ही तो मरा था. 3 साल पहले उस ने सरपंचजी से 8 हजार रुपए उधार लिए थे. अब तक तो ब्याज जोड़ कर 17 हजार रुपए हो गए होंगे,’’ अवधू की आदतों से परिचित मुनीम गंगादीन ने मसकेबाजी करते हुए कहा.

‘लाखों का हीरा, फिर भी इतना कर्ज. आखिर हीरे की परख तो जौहरी ही कर सकता है न,’ अवधू ने कुछ सोचते हुए पूछा, ‘‘और मुनीमजी, कैसी है तुम्हारी वसूली?’’

‘‘तकाजा चालू है बेटा. जब तक सरपंचजी तीर्थयात्रा से वापस नहीं आते, तब तक इस हीरे से थोड़ीबहुत वसूली आप को ही करा देते हैं.’’

‘‘मुनीमजी, जब हमें फायदा होगा, तभी तो आप की तरक्की होगी.’’

दूसरे दिन मुनीम गंगादीन सुबहसुबह ही सुनयना के घर जा पहुंचा. उस समय सुखिया के दोनों लड़के श्यामू और हरिया दालान में बैठे चाय पी रहे थे.

गंगादीन को सामने देख श्यामू ने चाय छोड़ कर दालान में रखे तख्त पर चादर बिछाते हुए कहा, ‘‘रामराम मुनीमजी… बैठो. मैं चाय ले कर आता हूं.’’

‘‘चाय तो लूंगा ही, लेकिन बेटा श्यामू, धीरेधीरे आजकल पर टालते हुए 8 हजार के 17 हजार रुपए हो गए. तू ने महीनेभर की मुहलत मांगी थी, वह भी पूरी हो गई. मूल तो मूल, तू तो ब्याज तक नहीं देता.’’

‘‘मुनीमजी, आप तो घर की हालत देख ही रहे हैं. कुछ ही दिनों पहले हरिया का घर बसाया है और अभीअभी पिताजी भी गुजरे हैं,’’ श्यामू की आंखों में आंसू भर आए.

‘‘मैं तो समझ रहा हूं, लेकिन जब वह समझे, जिस की पूंजी फंसी है, तब न. वैसे, तू ने महीनेभर की मुहलत लेने के बाद भी फूटी कौड़ी तक नहीं लौटाई,’’ मुनीम गंगादीन ने कहा.

तब तक सुनयना गंगादीन के लिए चाय ले कर आ गई. गंगादीन उस की नाजुक उंगलियों को छूता हुआ चाय ले कर सुड़कने लगा और हरिया चुपचाप बुत बना सामने खड़ा रहा.

‘‘देख हरिया, मुझ से जितना बन सका, उतनी मुहलत दिलाता गया. अब मुझ से कुछ मत कहना. वैसे भी सरपंचजी तुझ से कितना नाराज हुए थे. मुझे एक रास्ता और नजर आ रहा है, अगर तू कहे तो…’’ कह कर गंगादीन रुक गया.

‘कौन सा रास्ता?’ श्यामू व हरिया ने एकसाथ पूछा.

‘‘तुम्हें तो मालूम ही है कि इन दिनों सरपंचजी तीर्थयात्रा करने चले गए हैं. आजकल उन का कामकाज उन का बेटा अवधू ही देखता है.

‘‘वह बहुत ही सज्जन और सुलझे विचारों वाला है. तुम उस से मिल लो. मैं सिफारिश कर दूंगा.

‘‘वैसे, तेरे वहां जाने से अच्छा है कि तू अपनी बीवी को भेज दे. औरतों का असर उन पर जल्दी पड़ता है. किसी बात की चिंता न करना. मैं वहां रहूंगा ही. आखिर इस घर से भी मेरा पुराना नाता है,’’ मुनीम गंगादीन ने चाय पीतेपीते श्यामू व हरिया को भरोसे में लेते हुए कहा.

सुनयना ने दरवाजे की ओट से मुनीम की सारी बातें सुन ली थीं. श्यामू सुनयना को अवधू की कोठी पर अकेली नहीं भेजना चाहता था. पर सुनयना सोच रही थी कि कैसे भी हो, वह अपने परिवार के सिर से सरपंच का कर्ज उतार फेंके.

दूसरे दिन सुनयना सरपंच की कोठी के दरवाजे पर जा पहुंची. उसे देख कर मुनीफ गंगादीन ने कहा, ‘‘बेटी, अंदर आ जाओ.’’

सुनयना वहां जाते समय मन ही मन डर रही थी, लेकिन बेटी जैसे शब्द को सुन कर उस का डर जाता रहा. वह अंदर चली गई.

‘‘मालिक, यह है सुखिया की बहू. 3 साल पहले इस के ससुर ने हम से 8 हजार रुपए कर्ज लिए थे, जो अब ब्याज समेत 17 हजार रुपए हो गए हैं. बेचारी कुछ और मुहलत चाहती है,’’ मुनीम गंगादीन ने सुनयना की ओर इशारा करते हुए अवधू से कहा.

‘‘जब 3 साल में कुछ भी नहीं चुका पाया, तो और कितना समय दिया जाए? नहींनहीं, अब और कोई मुहलत नहीं मिलेगी,’’ अवधू अपनी कुरसी से उठते हुए बोला.

‘‘देख, ऐसा कर. ये कान के बुंदे बेच कर कुछ पैसा चुका दे,’’ अवधू सुनयना के गालों और कानों को छूते हुए बोला.

‘‘और हां, तेरा यह मंगलसूत्र भी तो सोने का है,’’ अवधू उस के उभारों को छूता हुआ मंगलसूत्र को हाथ में पकड़ कर बोला.

सुनयना इस छुअन से अंदर तक सहम गई, फिर भी हिम्मत बटोर कर उस ने कहा, ‘‘यह क्या कर रहे हो छोटे ठाकुर?’’

‘‘तुम्हारे गहनों का वजन देख रहा हूं. तुम्हारे इन गहनों से शायद मेरे ब्याज का एक हिस्सा भी न पूरा हो,’’ कह कर अवधू ने सुनयना की दोनों बाजुओं को पकड़ कर हिला दिया.

‘‘अगर पूरा कर्ज उतारना है, तो कुछ और गहने ले कर थोड़ी देर के लिए मेरी कोठी पर चली आना…’’ अवधू ने बड़ी बेशर्मी से कहा, ‘‘हां, फैसला जल्दी से कर लेना कि तुझे कर्ज उतारना है या नहीं. कहीं ऐसा न हो कि तेरे ससुर के हाथों लिखा कर्ज का कागज कोर्ट में पहुंच जाए.

‘‘फिर भेजना अपने पति को जेल. खेतघर सब नीलाम करा कर सरकार मेरी रकम मुझे वापस कर देगी और तू सड़क पर आ जाएगी.’’

सुनयना इसी उधेड़बुन में डूबी पगडंडियों पर चली जा रही थी. अगर वह छोटे ठाकुर की बात मानती है, तो पति के साथ विश्वासघात होगा. अगर वह उस की बात नहीं मानती, तो पूरे परिवार को दरदर की ठोकरें मिलेंगी.

कुछ दिनों बाद मुनीम गंगादीन फिर सुनयना के घर जा पहुंचा और बोला, ‘‘बेटी सुनयना, कर लिया फैसला? क्या अपने गहने दे कर ठाकुर का कर्ज चुकाएगी?’’

‘‘हां, मैं ने फैसला कर लिया है. बोल देना छोटे ठाकुर को कि मैं जल्दी ही अपने कुछ और गहने ले कर आ जाऊंगी कर्जा उतारने. उस से यह भी कह देना कि पहले कर्ज का कागज लूंगी, फिर गहने दूंगी.’’

‘‘ठीक है, वैसे भी छोटे ठाकुर सौदे में बेईमानी नहीं करते. पहले अपना कागज ले लेना, फिर…’’

वहीं खड़े सुनयना के पति और देवर यही सोच रहे थे कि शायद सुनयना ने अपने सोने और चांदी के गहनों के बदले पूरा कर्ज चुकता करने के लिए छोटे ठाकुर को राजी कर लिया है. उन्हें इस बात का जरा भी गुमान न हुआ कि सोनेचांदी के गहनों की आड़ में वह अपनी इज्जत को दांव पर लगा कर के परिवार को कर्ज से छुटकारा दिलाने जा रही है.

‘‘और देख गंगादीन, अब मुझे बेटीबेटी न कहा कर. तुझे बेटी और बाप का रिश्ता नहीं मालूम है. बाप अपनी बेटी को सोनेचांदी के गहनों से लादता है, उस के गहने को उतरवाता नहीं है,’’ सुनयना की आवाज में गुस्सा था.

दूसरे दिन सुनयना एक रूमाल में कुछ गहने बांध कर अवधू की कोठी पर पहुंच गई.

‘‘आज अंदर कमरे में तेरा कागज निकाल कर इंतजार कर रहे हैं छोटे ठाकुर,’’ सुनयना को देखते ही मुनीम गंगादीन बोला.

सुनयना झटपट कमरे में जा पहुंची और बोली, ‘‘देख लो छोटे ठाकुर, ये हैं मेरे गहने. लेकिन पहले कर्ज का कागज मुझे दे दो.’’

‘‘ठीक है, यह लो अपना कागज,’’ अवधू ने कहा.

सुनयना ने उस कागज पर सरसरी निगाह डाली और उसे अपने ब्लाउज के अंदर रख लिया.

‘‘ये गहने तो लोगों की आंखों में परदा डालने के लिए हैं. तेरे पास तो ऐसा गहना है, जिसे तू जब चाहे मुझे दे कर और जितनी चाहे रकम ले ले,’’ अवधू कुटिल मुसकान लाते हुए बोला.

‘‘यह क्या कह रहे हो छोटे ठाकुर?’’ सुनयना की आवाज में शेरनी जैसी दहाड़ थी.

अवधू को इस की जरा भी उम्मीद नहीं थी. सुनयना बिजली की रफ्तार से अहाते में चली गई. तब तक गांव की कुछ औरतें और आदमी भी कोठी के सामने आ कर खड़े हो गए थे. वहां से अहाते के भीतर का नजारा साफ दिखाई दे रहा था.

लोगों को देख कर नौकरों की भी हिम्मत जाती रही कि वे सुनयना को भीतर कर के दरवाजा बंद कर लें. अवधू और गंगादीन भी समझ रहे थे कि अब वे दिन नहीं रहे, जब बड़ी जाति वाले नीची जाति वालों से खुलेआम जबरदस्ती कर लेते थे.

सुनयना बाहर आ कर बोली, ‘‘छोटे ठाकुर और गंगादीन, देख लो पूरे गहने हैं पोटली में. उतर गया न मेरे परिवार का सारा कर्ज. सब के सामने कह दो.’’

‘‘हांहां, ठीक है,’’ अवधू ने घायल सांप की तरह फुंफकार कर कहा.

सभी लोगों के जाने के बाद अवधू और गंगादीन ने जब पोटली खोल कर देखी, तो वे हारे हुए जुआरी की तरह बैठ गए. उस में सुनयना के गहनों के साथसाथ गंगादीन की बेटी के भी कुछ गहने थे, जो सुनयना की अच्छी सहेलियों में से एक थी.

‘अब मैं अपनी बेटी के सामने कौन सा मुंह ले कर जाऊंगा. क्या सुनयना उस से मेरी सब करतूतें बता कर ये गहने ले आई है?’ सोच कर गंगादीन का सिर घूम रहा था.

अवधू और गंगादीन दोनों समझ गए कि सुनयना एक माहिर खिलाड़ी की तरह बहुत अच्छा खेल खिला कर गई है.

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