बाहुबली जैसी फिल्म मेरे करियर के लिये ठीक नहीं : प्रभास

पिछले साल की ब्‍लौक बस्‍टर फिल्‍म ‘बाहुबली 2’ ने हिंदी सिनेमा में कमाई से लेकर पौपुलरटी तक हर चीज में इतिहास रच दिया. इस फिल्‍म के हर किरदार को लोगों ने स्‍टार बना दिया और निर्देशक एस. राजमौली की इस कल्‍पना को लोगों ने बौक्‍स औफिस का ही बाहुबली बना दिया. लेकिन इस फिल्‍म के बाहुबली यानी एक्‍टर प्रभास अब इस फिल्‍म में फिर से बाहुबली नहीं बनना चाहते.

साल 2015 में रिलीज हुई फिल्‍म ‘बाहुबली’ के सवाल कि आखिर ‘कटप्पा ने बाहुबली को क्‍यों मारा’ का जवाब लोगों को इस फिल्‍म के साल 2017 में रिलीज हुए सीक्‍वेल में जानने को मिला. ‘बाहुबली 2’ की रिलीज के बाद से ही लोगों को इस फिल्‍म का खुमार कुछ ऐसा चढ़ा कि हर कोई इसके एक और सीक्‍वेल का इंतजार कर रहा है, लेकिन अगर इस फिल्‍म का सीक्‍वेल आया तो दर्शकों को फिर से प्रभास ‘बाहुबली’ के रूप में न दिखाई दें.

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एक खबर के अनुसार मीडिया से बात करते हुए प्रभास ने कहा है, ‘फिल्म बहुत अच्छी थी लेकिन मैं इस तरह की फिल्म दोबारा नहीं करूंगा. ये मेरे करियर के लिए ठीक नहीं है. ये फिल्म मेरे करियर के लिए बड़ा रिस्क थी क्योंकि मैंने 5 साल इसे दिए.’ बता दें कि इस फिल्‍म के लिए प्रभास ने 5 साल तक कोई फिल्‍म नहीं की और उन्‍होंने इस फिल्‍म के लिए अपनी डाइट पर काफी खर्च भी किया.

प्रभास ने एक इंटरव्‍यू में कहा, ‘एक्‍टर्स के पास सीमित समय होता है. मैं मानता हूं कि अब मैं एक फिल्म को पांच साल नहीं दे सकता हूं. अगर मैं किसी काम को इतना समय देता भी हूं तो साथ-साथ मैं दूसरे प्रोजेक्ट भी करता रहूंगा क्योंकि उम्र भी एक चीज है. यह मेरे करियर के लिए सही नहीं होगा.’

बता दें कि निर्देशक राजामौली की इस फिल्म ने रिकौर्ड तोड़ कमाई की थी. इस फिल्‍म ने पहले ही दिन भारत में 100 करोड़ की कमाई का जादुई रिकौर्ड बनाया था. इस फिल्‍म के हिंदी वर्जन ने सबसे ज्‍यादा कमाई की थी.

नोरा फतेही का डांस वीडियो हुआ वायरल

कनाडियन डांसर और मौडल नोरा फतेही की एंट्री सलमान खान के रिएलटी शो बिग बौस सीजन 9 में हुई, हालांकि वो ज्यादा समय तक बिग बौस के घर में टिक नही पाईं. लेकिन इस शो के जरिए उन्होंने अपने हुनर से दुनिया को रुबरू कराया. अपने हुनर के बदौलत एक नई पहचान बनाई जिसके चलते उन्हें कई औफर मिलने लगे. नोरा फतेही का पहले पंजाबी सिंगर हार्डी संधु के साथ ‘Naah’ गाना आया, जिसमें उनके वैली डांस ने कहर ढा दिया.

नोरा और हार्डी संधू का यह गाना काफी पौपुलर है और इस गाने को अब तक 7.9 मिलियन लोग देख कर चुके हैं. लिहाजा अब ‘Naah’ के बाद उनका स्वैग से स्वागत का अरेबिक फ्यूजन और उनकी फिल्म का ट्रेलर आया है, जिसे खुद सलमान खान ने शेयर किया है. नोरा बौलीवुड में दस्तक दे चुकी हैं और उनकी अपकमिंग फिल्म का ट्रेलर भी चर्चा में है.

नोरा फतेही ने अपनी अपकमिंग सायकोलौजी थ्रिलर फिल्म My Birthday Song का ट्रेलर जारी किया. गुरुवार को अपने ट्विटर एकाउंट पर एनटेरटेनमेंट क्रिटिक तरण आर्दश ने भी ट्रेलर को ट्वीट कर इस फिल्म के बारे में जानकारी दी. इस फिल्म को अभिनेता संजय सूरी निर्देशित कर रहे हैं. यह फिल्म 19 जनवरी को रिलीज होगी.

ट्रेलर की शुरुआत में सब एक साथ बर्थडे मनाते हुए नजर आ रहें हैं और नोरा फतेही उन्हें उनका बर्थडे केक खिलाते दिखाई दे रही हैं, जिसके बाद नोरा और समीर साथ में समय बिताते हैं. फिर अचानक से समीर नोरा को पहचान नहीं पाता और चिल्लाने लगता है. ट्रेलर में दिखाया जा रहा है कि एक लड़की, समीर सोनी पर शादी के बाद के अफेयर का आरोप लगा रही हैं. 1 मिनट 57 सेकेंट के ट्रेलर में काफी कुछ सस्पेंस में है.

फिल्म में मिस इंडिया औस्ट्रेलिया रह चुकीं जेनिया भी नजर आएंगी. फिल्म की लीड एक्ट्रेस नोरा फतेही ने बिग बौस-9 में वाइल्ड कार्ड कंटेस्टेंट के तौर पर एंट्री की थी लेकिन वे तीन हफ्ते के बाद ही शो से बाहर हो गई थीं. हालांकि शो के जरिए उनके अंदर के हुनर को बाहर काफी पहचान मिली. 25 वर्षीय नोरा ने बौलीवुड फिल्म ‘रोरः टाइगर्स औफ द सुंदरवन’ से अपने करियर की शुरुआत की थी. उसके बाद वे ‘क्रेजी कुक्कड़ फैमिली’ में भी नजर आईं लेकिन उनकी फिल्में बौक्स औफिस पर कमाल ना कर सकी. कमाई के सारे रिकौर्ड तोड़ चुकीं बाहुबली में भी नोरा ने आइटम सौन्ग किया है जिससे नूरा ने काफी सुर्खियां बटोरीं.

मलाइका की हमशक्ल ने आइटम डांस से मचाया धमाल

बौलीवुड की मुन्नी यानी मलाइका अरोड़ा खान ने कई आइटम सौन्ग पर डांस किया है. उन्होंने जितने भी आइटम सौन्ग किये हैं, उसने तहलका मचाया है. कई फिल्में तो ऐसी हैं जो बेशक बौक्स औफिस पर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकीं हो लेकिन मलाइका का आइटम सौन्ग दर्शकों के दिलों पर छा गया.

इसलिए तो अपने जलवों और आइटम सौन्ग से करोड़ों दिलों पर राज करने वाली मलाइका को आइटम क्वीन भी कहा जाता है. लेकिन लगता है कि अब मलाइका अरोड़ा की हमशक्ल और साउथ इंडियन सिनेमा की ‘मलाइका’ हिना पांचाल उन्हें टक्कर देने और उनका पत्ता काटने के लिए अपना एक आइटम सौंग लेकर आई हैं.

हिना भी मलाइका की तरह अपनी मस्त मस्त अदाओं के जलवें अपने जबरदस्त डांस से दिखा रही हैं. हम आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हिना का आइटम सौन्ग ‘ऐ राजा’ रिलीज हो गया है जो ‘जाने क्यों दे यारों’ फिल्म का है. इस आइटम सौन्ग में वे जबरदस्त डांस के साथ अपने जलवें बिखेरते और मलाइका अरोड़ा को चैलेंज करती नजर आ रही हैं.

इस फिल्म को अक्षय आनंद ने डायरेक्ट किया है. इस सौन्ग में वे गांव की बाला बनी हैं और कमाल की लग रही हैं. इस गाने में कबीर बेदी भी नजर आ रहे हैं, जो हिना के डांस का भरपूर लुत्फ ले रहे हैं. इस गाने में वे मलाइका अरोड़ा से किन्हीं मायनों में कम नहीं लग रही हैं.

उनके बारे में बौलीवुड की सीनियर कोरियोग्राफर सरोज खान ने एक बार कहा था, “मैं बौलीवुड को एक नई हुनरमंद डांसिंग स्टार दे रही हूं. आज उनका डांस देखकर सरोज खान की बात सच होती नजर आ रही है.

‘मलाइका अरोड़ा’ यानी एक्ट्रेस हिना पांचाल ने हाल में ही टौपलेस फोटोशूट भी कराया है. इन तस्वीरों में एक्ट्रेस का हौट एंड बोल्ड अवतार नजर आ रहा है. सभी तस्वीरों में हिना बहुत ही गौर्जियस दिख रही हैं. तस्वीरों में काफी हद तक उनका चेहरा मलाइका अरोड़ा से मिलता-जुलता लग रहा है. इतना ही नहीं साउथ की हिना की ये तस्वीरें इंडस्ट्री में काफी सनसनी फैला रही हैं.

गौरतलब है कि हिना पांचाल हिंदी, तमिल और तेलगु फिल्म इंडस्ट्री में एक जाना-माना नाम है. हिना ने ज्यादा फिल्में तो नहीं की, लेकिन उन्होंने कई फिल्मों में आइटम डांस कर काफी चर्चा बटोरी है. हिना को एक चर्चित मैगजीन ने आइटम गर्ल्स की लिस्ट में 7वां स्थान दिया है.

उन्होंने हुक्का, मोहल्ला, बेबो बेबो, राजू ओ राजू, बोगन जैसे आइटम सौन्ग किए हैं. बता दें कि 2015 में फोर्ब्स इंडिया की 100 सेलिब्रिटी की लिस्ट में भी हिना पांचाल को शामिल किया गया था.

कब समझेगा पाकिस्तान : युद्ध और गलबहियां एकसाथ नहीं

2018 में अपने पहले ट्वीट से ही अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को सीधा और सख्त संदेश दिया और निशाना भी सही मौके पर सही जगह लगा. आतंकवाद पर पाकिस्तान की दोहरी नीति नई बात नहीं. इसने हर वह काम किया, जिससे दुनिया को तकलीफ हुई. वाशिंगटन भी लंबे समय से इसकी आलोचना करता रहा है कि वह उन हक्कानी नेटवर्क और अफगान तालिबान जैसे आतंकी समूहों की मदद करता है, जिनकी करतूतें किसी से छिपी नहीं हैं. ये अफगानिस्तान में अमेरिकी और गठबंधन सेनाओं पर हमले कर पाकिस्तान में शरण लेते रहे.

पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन आरोपों को भले नकारे, लेकिन हमेशा इनका मददगार रहा. बराक ओबामा भी पाकिस्तान से इसी तरह परेशान थे. अगस्त 2016 में उन्होंने भी पाकिस्तान को मिलने वाली 300 करोड़ डॉलर की सहायता इसीलिए रोकी थी. ट्रंप प्रशासन ने तो पिछली गरमियों में ही सहायता रोककर इस्लामाबाद को रुख का संकेत दे दिया था.

दरअसल इस मुद्दे पर ओबामा जितना सही थे, ट्रंप भी उतने ही सही हैं, लेकिन पाकिस्तान को रास्ते पर लाने के लिए शायद इतना ही काफी न हो. निश्चित तौर पर अतीत में तो इतना भी नहीं हुआ. इसे कैसे सही ठहराया जा सकता है कि आप आतंकवाद विरोध के नाम पर सैकड़ों-लाखों मिलियन डॉलर की सहायता एक ऐसे देश को देते रहें, जो आतंकवादी संगठनों को पनाह देता हो. आतंकवाद की अपने तरीके, अपनी सुविधा से व्याख्या करता हो. जबकि सच यही है कि आतंकवाद किसी भी रूप में हो, खतरनाक ही होता है. अच्छा या बुरा आतंकवाद जैसा कुछ नहीं होता, लेकिन पाकिस्तान अपनी सुविधा से इसी नीति पर चलता है. उसे समझना होगा कि ‘युद्ध और गलबहियां’ एकसाथ संभव नहीं हैं.

यह न तो अमेरिकी हित में है, न शेष पश्चिम के. यह पाकिस्तान और उसकी पहले से ध्वस्त अर्थव्यवस्था के लिए भी उचित नहीं है. दरअसल साल-दर-साल मिलती रही भारी-भरकम अमेरिकी मदद ने इसके नेताओं को हकीकत का अंदाज ही नहीं होने दिया. अब मदद रुकने का साफ और सीधा संदेश शायद इन्हें कोई सबक दे सके.

हेमा सरदेसाई ने मिशेल रहेजा संग रचा नया इतिहास

बौलीवुड की मशहूर गायक हेमा सरदेसाई और टीवी कलाकार मिशेल रहेजा ने हौलीवुड में अंतरराष्ट्रीय एकाकी गीत ‘‘पावर आफ लव’’ के साथ एक नए इतिहास को रचा है. इस गीत के निर्माता हौलीवुड के स्वतंत्र निर्माता व ग्रैमी पुरस्कार विजेता टोनी मर्सिडीज हैं. इस गीत को सोमवार को अमरीका के मैनहेट्टन में जारी किया गया.

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अपने इस गीत की चर्चा करते हुए हेमा सरदेसाई ने कहा-‘‘  यह प्रेरणादायक गीत है. मुझे यकीन है कि इंसान जब भी किसी परेशानी में होगा, तो वह हमारे गीत ‘‘पावर आफ लव’’ यानी कि ‘प्यार की शक्ति’ को सुनकर नई चेतना का अहसास करेगा और इंसान खुश हो जाएगा. इस गीत में आशा है. हमने इसे दिल से गाया है.

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हमारे लिए गर्व की बात है कि विश्व प्रसिद्ध टोनी मर्सडीज ने हम पर यकीन किया और विदेशी मीडिया के सामने हमारी प्रशंसा की. मैं मिशेल रहेजा की भी आभारी हूं. मुझे पता था कि मिशेल ने टीवी में अभिनय करने के अलावा एक सीरियल में गीत भी गाया है. इसलिए मैने उन्हें फोन करके अपने साथ इस गीत को गाने के लिए कहा, तो वह तुरंत तैयार हो गए.’’

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हेमा सरदेसाई का यह गीत ‘‘स्ट्रांगर एंड स्ट्रांगर’’का हिस्सा है.

अंधविश्वास : धर्म की आड़ में डराने की साजिश

हमारे समाज में फैले ज्यादातर अंधविश्वासों की जड़ में फुजूल के डर हैं और वे सारे डर ढोंगीपाखंडियों की देन हैं. दरअसल, जन्म से ही बारबार ऐसी घुट्टी पिलाई जाती है कि लोग आंखें मूंद कर ऊलजुलूल बातों पर भरोसा करने लगते हैं.

ज्यादातर लोगों में तालीम, सूझबूझ व नए नजरिए की कमी है, इसलिए 21वीं सदी में भी बहुत से लोगों की सोच बहुत पीछे व नीचे है. नतीजतन, वे रोजमर्रा के मसलों को खुद नहीं सुलझा पाते. कर्ज, गरीबी, बीमारी व बेकारी को भी वे अपने पापों का फल या बदकिस्मती का नतीजा मान कर बाबाओं व तांत्रिकों की शरण में जाते रहते हैं.

शातिर लोग आम जनता की इसी कमजोरी का फायदा उठाते हैं. भाग्य, भगवान, पाप, अपशकुन, ग्रह चाल, दिशाशूल, शनि की साढ़ेसाती, राहूकेतु मारकेश, मूल, पंचक, भद्रकाल सर्पयोग, पितृदोष और वास्तुदोष में ऊलजुलूल खराबी बताते हैं, इसलिए कई तरह के डर लोगों के मन में जानबूझ कर डाले जाते हैं ताकि उन्हें मनमाने तरीके से भुनाया जा सके.

कई पुश्तों से इसी घंधे में लगे एक शख्स ने बताया कि असल बात तो यह है कि बगैर डर के तो कभी कोई अपनी जेब से कुछ निकालता ही नहीं इसलिए बच्चों का पेट पालने के लिए कुछ न कुछ जुगाड़ तो करना ही पड़ता है.

इसी गरज से धर्म का प्रचार करने वालों ने सदियों से लोगों को झांसा देने, डराने व उस डर को भुनाने की तमाम साजिशें रची हैं. कथाओं, प्रवचनों, किताबों व तसवीरों के जरीए तमाम तरह के झूठे किस्सेकहानियां फैलाई गईं. जीने से मरने तक में कर्मकांड कराने को बेहद जरूरी बताया गया. ग्रह शांति के उपाय, दानपुण्य, तीर्थ, पूजापाठ, गंडेतावीज, यंत्र, तंत्र और मंत्र बनाए गए.

गौरतलब है कि बुरा होने के डर से बचने के लिए पांखडियों द्वारा जो भी उपाय बताए जाते हैं, उन में से कोई भी ऐसा नहीं होता जो बगैर पैसा खर्च

किए मुफ्त में पूरा होता हो. पूजापाठ व गंडेतावीज जैसे ज्यादातर उपाय बहुत खर्चीले होते हैं, फिर भी लोग डर के मारे उन्हें करतेकराते रहते हैं इसलिए धर्म का प्रचार करने वालों की दुकानें चलती रहती हैं.

नतीजतन, बहुत से कम पढ़ेलिखे, कमजोर, पिछड़े व भोलेभाले भक्तों का खुद पर यकीन ही नहीं रहा. वे मानने लगते हैं कि जो कुछ भी होता है वह सब भगवान की मरजी से होता है. एक पत्ता भी हिलता है तो ऊपर वाले की मरजी से ही हिलता है. उसी की मेहर पाने के चक्कर में फंस कर वे अपनी जेब हलकी करते रहते हैं और डराने वाले अपना घर भरते रहते हैं.

डर के चक्कर में वक्त की बरबादी व माली नुकसान ही नहीं होता बल्कि जहांतहां जवान औरतें ढोंगी संतमहंतों व बाबाओं वगैरह के चक्कर में फंस कर अपनी इज्जतआबरू गंवाती रहती हैं और बाद में पछताती हैं.

कुलमिला कर इस गोरखधंधे में फायदा डरा कर लूटने वाले मक्कारों का होता है और हर तरह से नुकसान डरपोक लोगों का होता है.

बढ़ती गई साजिश

लोगों के मन में डर बिठाने का गोरखधंधा इतने जोरों से फलफूल रहा है कि हमारे समाज में हिम्मती लोग उंगलियों पर गिनने लायक रह गए हैं. ज्यादातर पढ़ेलिखों के मन में भी तरहतरह के डर समाए रहते हैं इसलिए आने वाले हादसों व बुरे वक्त से बचने के लिए लोग अपनी उंगलियों में तरहतरह की अंगूठियां पहने रहते हैं.

किसी को डराने के मामले में काले रंग को सब से ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है. मसलन किसी ने भी आज तक यमराज को नहीं देखा, लेकिन तसवीरों में उन्हें बड़ीबड़ी मूंछों वाला, काले रंग का, डरावना व भैंसे पर सवार दिखाया जाता है.

लोगों के मन में सब से ज्यादा डर शनि की खराब दशा होने का डाला जाता है ताकि खूब दान मिले व चढ़ावा आए. नतीजतन, जहांतहां सड़क किनारे शनिदेव के काले मंदिर भी खूब धड़ल्ले से बन, बढ़ व फलफूल रहे हैं. शनिदान का उपाय करने के लिए उकसाया जाता है और आखिरकार लोग डर कर ठगों के झांसे में आ ही जाते हैं.

बेहिसाब हैं डर

धर्म के ठेकेदारों ने अपने फायदे के लिए तमाम तरह की गलतफहमियां लोगों के दिमाग में भर रखी हैं. ज्यादातर लोग उन से उबर ही नहीं पाते इसलिए उन को हर कदम, हर बात व हर काम में डर ही डर बना रहता है. बिल्ली रास्ता काट जाए तो हादसे का डर, बिल्ली मर जाए तो पाप लगने का डर और चलते समय अगर कोई छींक दे तो बुरा होने का डर सताने लगता है.

डर के साए में रह कर जीने से तरक्की रुकती है. उपाय कर के डर से नजात पाने के चक्कर में लोग लुटते रहते हैं. हमारे समाज में जानबूझ कर ऐसा माहौल बनाया गया है जिस से लोग फुजूल की बातों में उलझ कर डरे रहें, उन की ऊलजुलूल बातों को मानते रहें और अपनी हिफाजत व बचने के लिए पंडेपुजारियों को चढ़ावा चढ़ाते रहें.

हर किसी की जिंदगी में छोटेबड़े कई तरह के मसले आतेजाते रहते हैं. धर्म के धंधेबाजों ने हर मसले को कर्मों का फल व पिछले जन्मों के पाप से जोड़ रखा है ताकि दिमाग कुंद रहे. ऐसे तमाम लोग हैं जो अपने मसलों को सुलझाने के लिए पंडेपुजारियों के पास जाते हैं. यहीं से डराने व उपायों के नाम पर ठगने की शुरुआत होती है.

यह है नुकसान 

डर के इस गोरखधंधे से बहुत से सामाजिक व माली नुकसान हैं. डर के चलते ही हमारे समाज में तमाम तरह की रूढि़यां आज भी बरकरार हैं. लोगों के मन में डाले गए इस डर की वजह से ही अनगिनत दाढ़ीचोटी वाले मौज मार रहे हैं. इन की वजह से ही गरीब और गरीब हो रहे हैं.

जहांतहां भटकने, चढ़ावा चढ़ाने, दान कर के ग्रह की दशा सुधारने व पंडेपुजारियों को हलवापूरी खिलाने से कभी कोई मसला हल नहीं होता. डर कर भागने से कभी किसी की जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आ सकता है.

सोचने की बात है कि यदि ऐसा कुछ होता तो दुनिया में कहीं भी कोई गरीब, बीमार व परेशान नहीं होता इसलिए सच को समझना जरूरी है.

आज विज्ञान का जमाना है. नए नजरिए से हर बात को तर्क की कसौटी पर कसना और परखना बेहद जरूरी है. पुरानी, गलीसड़ी, बेकार व बेमतलब की बातों को पीछे छोड़ें. उन से नाता तोड़ें. फुजूल के खौफ अपने मन में कभी न पालें. डराने वालों से दूर रहें. साथ ही उन्हें भूल कर भी बढ़ावा न दें. तालीम, चौकसी और जागरूकता ही इनसान को हिम्मती बनाती है.

शर्मनाक : किसानों की बदहाली, गांवों की परेशानी

सरकार और राजनीतिबाजों के लाख वादों के बावजूद किसानों की हालत बद से बदतर होती जा रही है. किसान अपनी घटती आमदनी से गुस्से में हैं, वहीं उन्हें उन की उपज की वाजिब कीमत नहीं मिल पा रही है. सरकार जो न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है उस में भी नानुकर की जाती है. भ्रष्ट अफसर और नेता व मंडी के बिचौलिए मिल कर किसानों की जेब में उन की फसल की कीमत नहीं पहुंचने देते.

यहां तक कि फसल की उत्पादन लागत भी नहीं निकल पाती. यही वजह है कि आएदिन किसानों की खुदकुशी की घटनाएं हो रही हैं.

गुजरात के पटेल बहुल सौराष्ट्र में किसानों की हालत बहुत नाजुक है. यहां के पाटीदार किसान केवल आरक्षण को ले कर ही भारतीय जनता पार्टी की  सरकार से नाराज नहीं है, बल्कि फसल की वाजिब कीमत न मिल पाने से भी गुस्से में हैं.

प्रदेश में विधानसभा चुनावों के प्रचार में विकास का खूब शोरगुल हुआ पर 11 जिलों में फैले सौराष्ट्र के मूंगफली और कपास के किसान फसल की वाजिब कीमत न मिलने के चलते खासा नाराज हैं.

सौराष्ट्र में पटेल समुदाय के किसानों की काफी तादाद है. यहां पटेलों के पास सब से ज्यादा जमीन है. इन किसानों ने प्रदेश की भाजपा सरकार को चेतावनी दी है. इलाके के पटेल किसान शहरों में कारोबार करते हैं जबकि गांवों में इस समुदाय की मुख्य आमदनी खेती ही है. सरकारी नीतियों और वादाखिलाफी से गैरपटेल भी नाराज हैं.

सौराष्ट्र में कपास और मूंगफली

2 प्रमुख फसलें होती हैं. किसान इन फसलों की लागत के मुकाबले में घटती आमदनी की शिकायतें कर रहे हैं. इन फसलों की बोआई में जितना खर्च आता है उतनी कीमत वापस नहीं मिल पा रही है. सरकार ने कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रति 20 किलो का 900 रुपए तय किया है. मूंगफली किसानों के लिए भी यही मूल्य तय किया गया पर प्राइवेट बिचौलिए उन्हें प्रति 20 किलो के 500 से 600 रुपए ही देते हैं.

जूनागढ़ के अगरतेर गांव के मूंगफली किसान दिनेश पटेल कहते हैं, ‘‘मैं अक्तूबर महीने में सरकारी एजेंसियों को अपनी फसल बेचने गया था पर फसल उत्पादन की मूल लागत भी नहीं मिल पाई. भुगतान भी 20 से 50 दिन में मिलता है.’’

एक कपास व्यापारी प्रति 20 किलो कपास में 400 से 500 रुपए बचा सकता है. इस बार फसल अच्छी हुई है पर किसानों को भरोसा नहीं है कि उन्हें इस की अच्छी कीमत मिल पाएगी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कपास पर 1500 रुपए न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का वादा किया था. उधर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी कह रहे हैं कि उन की पार्टी सत्ता में आई तो न्यूनतम समर्थन मूल्य किसानों को एडवांस में देंगे और किसानों का कर्ज माफ कर देंगे. पर किसानों को दोनों नेताओं के वादों पर भरोसा नहीं है.

न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार द्वारा विभिन्न उत्पादों पर तय किया जाता है. सरकार इन कृषि उत्पादों को खरीदती है तो किसानों को उसी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर भुगतान किया जाता है. पर यह सिर्फ दिखावा है. कृषि मंडियों में दलालों और भ्रष्ट अफसरों की मिलीभगत का बोलबाला है.

गुजरात के 57 फीसदी लोग गांवों में रहते हैं और उन की आमदनी का मुख्य साधन खेती ही है. प्रदेश के तकरीबन 2 करोड़ मजदूर खेत मालिकों के ऊपर अपनी जिंदगी बसर कर रहे हैं. जब खेत मालिकों को ही फसल पर मुनाफा नहीं मिल पाएगा तो वे खेतों में काम करने वाले मजदूरों को मजदूरी कैसे चुका पाएंगे?

कपास किसानों के लिए पिछले 3 साल खराब गए हैं. साल 2015 में कम बारिश से फसल नहीं हुई. अगली बार कीड़े ने फसल बरबाद कर दी और इस बार बंपर फसल के बावजूद कम समर्थन मूल्य से किसानों को घाटा उठाना पड़ रहा है.

ये हालात केवल गुजरात में ही नहीं, तकरीबन हर प्रदेश में हैं. बुंदेलखंड, विदर्भ जैसे इलाकों के किसान भी इसी परेशानी से जूझ रहे हैं. ऐसे हालात के चलते न तो किसानों की तरक्की हो पा रही है, न गांवों की. इसी वजह से किसानों की खुदकुशी की घटनाओं में कमी नहीं हो पा रही है.

सरकार किसानों और गांवों की तरक्की चाहती है तो किसानों को अपनी फसल बेचने की आजादी देनी चाहिए. उन्हें मंडी के नियमकायदों के शिकंजे से मुक्त करा कर खुले में अपनी मरजी से फसल की वाजिब कीमत और मुनाफा वसूलने देना चाहिए.

किसान जब अपनी फसल खेत से ले कर चलता है तो उसे हर चौराहे पर दक्षिणा चढ़ानी पड़ती है. ट्रक का किराया, ट्रैफिक पुलिस को घूस, मंडी में बैठे बाबुओं और दलालों को भेंट चढ़ाने में ही किसान की जेब खाली हो जाती है. आखिर में उस के पल्ले कुछ नहीं बचता. सरकार क्या किसानों को मंडी और दलालों से मुक्त कराएगी? किसानों की तरक्की में ही गांवों की तरक्की है. जब तक किसानों का विकास नहीं हो पाएगा तब तक गांव भी पिछड़ते रहेंगे.

ऐरावत का इंतजार : क्या देश में आ पाया ऐरावत

महाराजा ने एकाएक ऐलान किया कि वे देश में ऐरावत हाथी लाएंगे. महाराजा के ऐलान पर किसी को शक करने की जरूरत ही नहीं पड़ी. महाराजा जो कहें वही सही. सभी ने महाराजा की तारीफ की. कहने लगे जो ऐरावत हम ने पुराणों में पढ़ा है वह अब हमारे सामने होगा. दूध जैसा सफेद. दूब खाने वाला. उस के पंख होंगे. पलक झपकते ही चाहे जहां उड़ कर जा सकेगा. सुबहसुबह उस के दर्शन करने से दिन अच्छा जाता है.

लेकिन विकास का शिकार बने आदिवासियों को एकदम यकीन नहीं हुआ. उन्होंने सोचा कि जब उन के जंगलों की हजामत की जा रही थी और जमीन का सीना खोदा जा रहा था तब तो उन्होंने कोई सोने का हिरन नहीं देखा था. तो यह ऐरावत हाथी कैसे आ सकता है? वे सब मिल कर गांव के मास्टरजी के पास पहुंचे.

‘‘मास्टर साहब, क्या यह सच है कि अपने यहां पंख वाला ऐरावत हाथी आने वाला है?’’

‘‘क्या बकते हो?’’ मास्टर साहब ने नाराज हो कर कहा.

गांव वालों ने कहा कि लेकिन हमारे महाराजा का तो यही कहना है.

मास्टर साहब कई सालों से इस खुले शौचालय वाले गांव में रह रहे थे. इस वजह से उन की पत्नी शहर में रह रही थी. दूसरे गांवों में तो कागजों पर कई शौचालय बन चुके थे, लेकिन यहां तो वह भी नहीं. कई बार तबादले की कोशिश की लेकिन यहीं सड़ रहे थे.

इस बार पक्की उम्मीद थी. आखिर में मास्टर साहब ने महाराजा के जन्मदिन पर स्कूल में रंगारंग कार्यक्रम करवाया और उन्हें शुभकामना संदेश भिजवाया. ऐसे में महाराजा के ऐरावत हाथी लाने की बात पर शक करना यानी देशद्रोह माना जा सकता है.

मास्टर साहब डर गए. उन्होंने हा कि जब महाराजा कह रहे हैं तो जरूर ऐरावत हाथी आएगा.

गांव वालों को विश्वास नहीं हुआ. वे सरपंच के पास गए. सरपंच किसी जमाने में हिंदी साहित्य के अच्छे छात्र माने जाते थे. भक्तिकाल उन की रगरग में समाया हुआ था.

उन्होंने भी महाराजा की बात का समर्थन किया. उन्होंने गांव वालों को समझाया कि ऐरावत की लीद में औषधि गुण होते हैं. इसे शरीर पर चुपड़ने से चमड़ी की बीमारी नहीं होती. इस के मूत्र से स्नान करने से गंगा नहाने जितना पुण्य मिलता है.

महामंत्री ने राज खोला कि रावण के पास भी ऐरावत हाथी था, लेकिन ऐन दशहरे के दिन वह नाराज हो कर राम की सेना में चला गया, इसलिए रावण की मौत हो गई.

महाराजा के शिक्षा मंत्री ने कहा कि ऐरावत सिर्फ दूध पीता है और हीरेमोती खाता है. वह हथिनी की गंध पा कर ही अपने शरीर से बच्चा पैदा करता है.

उधर महाराजा ने प्रजा को बताया कि देश के स्वर्णिम काल में ऐरावत हाथी थे, लेकिन पिछली खानदानी राजशाही के पापाचार के चलते वे खत्म हो गए.

उन्होंने आगे कहा कि खानदानी महाराजा तो अरबी गधा तक नहीं ला पाए, लेकिन हम देश का पुराना गौरव वापस लाएंगे. जो अभी भूंक रहे हैं वे देखेंगे कि भले दिन आएंगे और देश में ऐरावत की धूम होगी.

उन्होंने वेदों का हवाला देते हुए कहा कि सूरदास ने भी अपनी कविता रामलला नहछू में ऐरावत का जिक्र किया है. इस पर उन के दीवान ने उन के कान में कहा कि तुलसीदास रामभक्त थे इसलिए उन्होंने रामलला नहछू कविता लिखी.

सूरदास तो कृष्ण भक्त थे. महाराजा ने बिना रुके उसी जोश में कहा कि सूरदास ने कृष्णलला नहछू में ऐरावत हाथी के गुण लिखे हैं.

उन्होंने आगे कहा कि वे देश का स्वर्णकाल वापस लाने को कृतसंकल्प थे. वह ऐरावत पर सवार हो कर आएगा. ऐरावत किसी ऐसेवैसे देश से नहीं बल्कि सूरज के देश से लाएंगे. वे खुद उसे लाने जाएंगे.

अब तो गांव में सिर्फ ऐरावत हाथी की बातें होने लगीं. आखिर महाराजा जो कह रहे हैं. उन के हाथ में जादू है. जानते नहीं, कैसे उन्होंने देखते ही देखते गंदा पैसा गायब कर दिया था. कैसे वे बिना बताए बेधड़क दुश्मन के देश में घुस गए थे और हलवा खा आए थे. अब वे गटर को पवित्र नदी बना कर ही रहेंगे.

महाराजा की जादूगरी के किस्से गरमागरम पकौडि़यों की खुशबू की तरह फैलने लगे. इस वजह से इंद्रदेव की नाराजगी और उस वजह से किसानों की आत्मा का परमात्मा से मिलन, रोजगार की बाट जोहते नौजवान, सस्ती दालरोटी की उम्मीद लगाए गरीब जैसे मुद्दे इतिहास में जमा हो गए.

सभी ऐरावत पर सवार होने की सोचने लगे. बगैर जाने कि वे उस पर सवार होने की हैसियत रखते भी हैं या नहीं. वह कैसे पंख फड़फड़ाते हुए पलक झपकते ही कहां से कहां पहुंच जाएगा. वह बादलों से भी ऊपर उड़ेगा. ऊपर से धरती कैसी दिखेगी, यही सोचसोच कर वे रोमांचित हो रहे थे.

ऐरावत के स्वागत की तैयारियां होने लगीं. वह कोई ऐरागैरा हाथी तो था नहीं इसलिए उस के रास्ते भी खास होने थे. गंदगी भरी धरती पर तो वह चल ही नहीं सकता. उस के लिए रेशम की चादरें बिछाई जाएंगी. धरती के नीचे, धरती पर और धरती के ऊपर भी.

देश में तो इतना रेशम नहीं था इसलिए विदेशों से रेशम की चादरें मंगवाने की कोशिशें की जाने लगीं. सौदा पक्का करने के लिए महाराजा खुद विदेश दौरे पर रहने लगे. सारा देश मानो ऐरावत के सपनों में खो गया.

शशि कपूर : एक सितारा टूट गया

जाते हुए साल 2017 के आखिरी यानी दिसंबर महीने के पहले सोमवार यानी 4 तारीख का दिन फिल्मी दुनिया के लिए एक काली रात बन गया. कपूर खानदान के चमचमाते सितारे शशि कपूर ने इसी दिन अपनी अंतिम सांस ली.

शशि कपूर का वजूद किसी परिचय का मुहताज नहीं है. ऐतिहासिक फिल्म ‘मुगल ए आजम’ में अकबर का बेमिसाल किरदार निभाने वाले पृथ्वीराज कपूर के छोटे बेटे शशि कपूर अपने मशहूर भाइयों राज कपूर और शम्मी कपूर से किसी भी लिहाज से कतई कम नहीं थे.

मोती जैसे चमचमाते दांतों के लिए दुनियाभर में मशहूर शशि कपूर अपने खानदान के सब से ज्यादा हैंडसम हीरो माने जाते थे. इस मामले में राज कपूर के मझले बेटे ऋषि कपूर का नंबर अपने चाचा शशि कपूर के बाद आता है.

यों तो शशि कपूर ने हर किस्म के किरदार निभाए थे, मगर रोमांटिक फिल्मों में उन्हें ज्यादा ही पसंद किया जाता था. इस मामले में रोमांटिक सुपरस्टार राजेश खन्ना के बाद शशि कपूर का ही जलवा था. तमाम हीरोइनों के साथ उन की रोमांटिक जोडि़यां मशहूर थीं.

महज 79 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कहने वाले शशि कपूर पिछले काफी अरसे से बीमार चल रहे थे. मुंबई के मशहूर कोकिला बेन अस्पताल में उन का इलाज चल रहा था. इसी अस्पताल में 4 दिसंबर को शाम के 5:20 बजे उन्होंने आखिरी सांस ली. वे अपने पीछे 2 बेटों और 1 बेटी को छोड़ गए.

शशि कपूर ने 116 हिंदी फिल्मों के अलावा कई दूसरी भाषाओं की फिल्मों में भी काम किया था. बेहतरीन अभिनय के लिए उन्हें साल 2011 में ‘पद्मभूषण’ अवार्ड से सम्मानित किया गया था. इस के अलावा साल 2015 में उन्हें ‘दादा साहेब फालके अवार्ड’ से भी नवाजा गया था.

कोलकाता में 18 मार्च, 1938 को जनमे शशि कपूर का नाम बलबीर राज पृथ्वीराज कपूर रखा गया था. चूंकि उन के पिता और दोनों बड़े भाई अभिनय की दुनिया से जुड़े हुए थे, लिहाजा शशि कपूर का इरादा भी फिल्मी हीरो बनने का ही था.

साल 1948 में ‘आग’ और 1951 में ‘आवारा’ फिल्मों में अपने बड़े भाई राज कपूर के बचपन की भूमिकाएं निभा कर शशि कपूर ने ऐक्टिंग की शुरुआत की. 1961 में आई फिल्म ‘धर्मपुत्र’ बतौर हीरो उन की पहली फिल्म थी, जिस का डायरैक्शन नामी डायरैक्टर यश चोपड़ा ने किया था. इसी फिल्म से दर्शकों ने उन्हें पहचानना शुरू कर दिया था.

शशि कपूर की कामयाब और यादगार फिल्मों में ‘प्रेम कहानी’, ‘फकीरा’, ‘फांसी’, ‘दीवार’, ‘वक्त’, ‘सिद्धार्थ’, ‘जबजब फूल खिले’, ‘कभीकभी’, ‘सत्यम शिवम सुंदरम’, ‘नई दिल्ली टाइम्स’, ‘चोर मचाए शोर’, ‘शर्मीली’, ‘इजाजत’ व ‘अलगअलग’ वगैरह के नाम लिए जा सकते हैं.

बतौर फिल्म निर्माता उन्होंने ‘जुनून’, ‘कलयुग’, ‘36 चौरंगी लेन’, ‘उत्सव’, ‘विजेता’ व  ‘अजूबा’ जैसी चर्चित फिल्में बनाईं. इस के अलावा उन्होंने राज कपूर की फिल्मों ‘श्रीमानश्रीमती’ व ‘दूल्हादुलहन’ में असिस्टैंट डायरैक्टर के रूप में भी काम किया था.

शशि कपूर की तमाम नायिकाओं के साथ रोमांटिक जोडि़यां बनीं और कई हीरोइनों के साथ उन के इश्क के चर्चे मशहूर हुए, मगर उन्होंने अपनी थिएटर की साथी जैनिफर कैंडल से सच्चा प्यार किया. 1959 में शशि कपूर व जैनिफर की शादी हुई. जैनिफर भी अपने पिता की थिएटर कंपनी में काम करती थीं. शशि कपूर उन्हें अपनी प्रेरणा मानते थे.

शशि कपूर व जैनिफर के 3 बच्चे हुए. बड़ा बेटा कुणाल कपूर एक विज्ञापन फिल्म निर्माता के रूप में काफी कामयाब रहा, पर बतौर अभिनेता वह ज्यादा सफल नहीं रहा. छोटा बेटा करण कपूर भी एक मौडल व अभिनेता है, मगर उसे भी खास कामयाबी नहीं मिल सकी.

उन की बेटी संजना कपूर ने भी कई फिल्मों में काम किया, मगर अब वे दादा पृथ्वीराज कपूर द्वारा बनाए गए पृथ्वी थिएटर का काम संभालती हैं.

शशि कपूर अपने हर काम में जैनिफर को शामिल करते थे. फिल्म ‘जुनून’ की नायिका हालांकि नफीसा अली थीं, मगर इस फिल्म में जैनिफर ने भी एक खास किरदार निभाया था. साल 1984 में जैनिफर की मौत ने उन्हें एकबारगी तोड़ कर रख दिया था और तभी से उन की सेहत खराब रहने लगी थी.

80 के दशक के बाद उन्होंने हीरो की भूमिकाएं करना बंद कर दिया था और सिर्फ चरित्र भूमिकाओं तक खुद को समेट लिया था.

1984 की फिल्म ‘उत्सव’ में वे अमिताभ बच्चन को लेना चाहते थे, मगर बिजी होने के कारण अमिताभ बच्चन उस फिल्म में काम नहीं कर पाए थे. बाद में वही किरदार शशि कपूर ने खुद निभाया था.

साल 1991 में उन्होंने अमिताभ बच्च, डिंपल कापडि़या, सोनम और अपने भतीजे ऋषि कपूर को ले कर फिल्म ‘अजूबा’ बनाई थी, जो काफी अलग किस्म की फिल्म थी. बच्चों ने उसे खासा पसंद किया था.

राजेश खन्ना के साथ उन्होंने राज खोसला की फिल्म ‘पे्रम कहानी’ में तो हमउम्र युवक का किरदार निभाया था, मगर फिल्म ‘अलगअलग’ में उन्होंने मोटे और अधेड़ डाक्टर का किरदार बखूबी निभाया था. राजेश खन्ना प्रोडक्शन की इस फिल्म में शशि कपूर के काम को काफी ज्यादा पसंद किया गया था.

साल 1998 के बाद शशि कपूर ने फिल्मों में काम करना या फिल्म बनाना बिलकुल बंद कर दिया था, क्योंकि उन की सेहत इस लायक नहीं रह गई थी.

शशि कपूर की रोमांटिक जोड़ी नंदा, राखी, शर्मिला टैगोर, हेमा मालिनी, रेखा, जीनत अमान, मौसमी चटर्जी व परवीन बाबी वगैरह तमाम हीरोइनों के साथ खूब हिट रही थी, पर नंदा के साथ उन की जोड़ी को बहुत ज्यादा पसंद किया गया.

नंदा के साथ उन्होंने ‘जबजब फूल खिले’, ‘जुआरी’, ‘देखो रूठा न करो’, ‘नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे’, ‘मोहब्बत इस को कहते हैं’, ‘चारदीवारी’ व ‘राजा साहब’ वगैरह यादगार व कामयाब फिल्मों में काम किया था.

नायकों में अमिताभ बच्चन के साथ उन्हें सब से ज्यादा पसंद किया गया. यश चोपड़ा की फिल्म ‘दीवार’ में वे अमिताभ बच्चन के छोटे भाई बने थे, तो यश चोपड़ा की ही ‘सिलसिला’ में वे अमिताभ बच्चन के बड़े भाई के रूप में नजर आए.

इन के अलावा ‘सुहाग’, ‘दो और दो पांच’, ‘कभीकभी’, ‘काला पत्थर’ व ‘त्रिशूल’ वगैरह फिल्मों में भी अमिताभ व शशि कपूर की जुगलबंदी को काफी पसंद किया गया.

शशि कपूर पत्रकारों की बहुत इज्जत करते थे और पूरे मन से बातचीत करते थे. एक बातचीत के दौरान उन्होंने बताया था कि उन की मां उन्हें ‘फ्लूकी’ कहती थीं, क्योंकि उन का जन्म बगैर योजना के हो गया था. राज कपूर के बाद 2 बेटे और हुए थे, जो छोटी उम्र में ही गुजर गए थे. फिर शम्मी कपूर पैदा हुए थे. फिर साल 1933 में उन की बहन उर्मिला का जन्म हुआ था.

इस के बाद शशि कपूर के मातापिता ने मान लिया था कि उन का परिवार पूरा हो गया. मगर 5 साल बाद उन की मां फिर से गर्भवती हो गईं. यह जान कर वे बहुत शर्मिंदा हुईं.

शशि कपूर की मां ने उन्हें समझदार होने के बाद बताया कि वे उन के जन्म से पहले जानबूझ कर साइकिल से गिरीं, सीढि़यों से गिरीं ताकि पेट गिर जाए. इस के लिए उन्होंने कुनैन व पपीता जैसी कई चीजें भी खाईं, मगर शशि कपूर को पैदा होना ही था और वे परिवार के चौथे बच्चे के रूप में पैदा हो ही गए.

शशि कपूर के मुताबिक इसी वजह से वे खुद को एक फ्लूक शख्स और फ्लूक कलाकार मानते थे, जो दुनिया में अचानक आ गया.

शशि कपूर से जुड़ी न जाने कितनी बातें व यादें मौजूद हैं, पर इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि यह हंसतामुसकराता कलाकार अब हमारे बीच मौजूद नहीं है.

साल 1985 में फिल्म ‘नई दिल्ली टाइम्स’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पाने वाले शशि कपूर को अब उन की फिल्मों में ही देखा जा सकेगा.

2 करोड़ का इनामी डाकू बन गया शांतिदूत

मध्य प्रदेश के जिला भिंड के गांव सिंहपुरा के रहने वाले सीधेसादे पंचम सिंह लड़ाईझगड़े से दूर रहकर शांतिपूर्वक जीवन गुजार रहे थे. उन्हें अपने परिवार की खुशियों से मतलब था, जिस में उन के मातापिता, एक भाई और एक बहन के अलावा पत्नी थी. शादी के कई साल बीत जाने के बाद भी वह पिता नहीं बन पाए थे.

कदकाठी से मजबूत पंचम सिंह निहायत ही शरीफ और मेहनती आदमी थे. अपनी खेतीबाड़ी में जीतोड़ मेहनत कर के वह अपने परिवार को हर तरह से सुखी रखने की कोशिश कर रहे थे. अब तक उन की उम्र लगभग 35 साल हो चुकी थी.

लेकिन एक बार हुए झगड़े में पंचम सिंह की ऐसी जबरदस्त पिटाई हुई कि उन के बचने की उम्मीद नहीं रह गई. इस के बावजूद पुलिस ने पिटाई करने वालों के बजाय बलवा करने के आरोप में उन्हें ही जेल भेज दिया. प्रताडि़त किया अलग से. यह सन 1958 की बात है.

दरअसल, गांव में पंचायत के चुनाव हो रहे थे. प्रचार अभियान जोरों पर था. पंचम की साफसुथरी छवि थी, जिस से गांव के ज्यादातर लोग उन्हें पसंद करते थे. इसलिए दबंग किस्म के लोगों की एक पार्टी ने चाहा कि वह उन के लिए प्रचार करें.

वे लोग गरीबों पर जुल्म किया करते थे, जो पंचम सिंह को पसंद नहीं था. लेकिन चाह कर भी वह इस बारे में कुछ नहीं कर सकते थे. उन्हें राजनीति में भी कोई विशेष रुचि नहीं थी, इसलिए उन्होंने उन का प्रचार करने से साफ मना कर दिया. तब उन्होंने उन्हें धमकाया.

इस का परिणाम यह निकला कि वह उस प्रत्याशी के प्रचार में जुट गए, जो उन दबंगों के विरोध में खड़ा था. पंचम की निगाह में उस का जीतना गांव वालों के लिए अच्छा था. इस का असर यह हुआ कि उन दबंगों ने उन्हें अकेले में घेर कर इस तरह पीटा कि उन के पिता उन्हें बैलगाड़ी से अस्पताल ले गए, जहां 20 दिनों तक उन का इलाज चला.

इसी बीच उन पर झूठा मुकदमा दर्ज कर के पुलिस ने अस्पताल में उन के बैड पर पहरा लगा दिया. 20 दिनों बाद वह अस्पताल से डिस्चार्ज हुए तो उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. जमानत पर घर आने के बाद भी दबंग उन्हें परेशान करते रहे. घर वालों से भी मारपीट की गई, जिस में पिता ही नहीं, भाई और बहन भी घायल हुए.

इस मामले में पुलिस दबंगों के खिलाफ काररवाई करने के बजाय पंचम को ही दोषी ठहरा कर पकड़ ले गई. पुलिस ने उन्हें आदतन बलवाकारी कहना शुरू कर दिया, साथ ही कानूनी रूप से उन्हें ‘बाउंड’ करने की काररवाई भी शुरू कर दी. पुलिस की ओर से उन्हें धमकाया भी जाता रहा कि जल्दी ही उन्हें कई झूठे मुकदमों में फंसा दिया जाएगा, जिन में उन्हें जमानत मिलनी मुश्किल हो जाएगी. फिर वह सारी जिंदगी जेल में सड़ते रहेंगे.

पंचम सिंह को अपनी बरबादी साफ दिखाई देने लगी थी. पानी जब सिर के ऊपर से गुजरने लगा तो दूसरा कोई उपाय न देख पंचम सिंह बीहड़ में कूद कर चंबल घाटी के कुख्यात दस्युसम्राट मोहर सिंह के गिरोह में शामिल हो गए. इस के बाद उन्होंने इस गिरोह की मदद से खुद को और घर वालों को पीटने वाले 12 लोगों को चुनचुन कर मौत के घाट उतार दिया.

इसी एक कांड के बाद पूरे इलाके में पंचम सिंह के आतंक का डंका बजने लगा. इस के बाद किसी में इतना दम नहीं रहा कि उन के परिवार की ओर आंख उठा कर भी देख ले. किसी में इतनी हिम्मत नहीं रही कि उन के खिलाफ पुलिस में जा कर शिकायत कर दे.

चंबल के बीहड़ों के बारे में कहा जाता था कि वहां बंदूक की नोक पर समानांतर सत्ता चलती थी. चौथी तक पढ़े और मात्र 14 साल की उम्र में वैवाहिक बंधन में बंध गए पंचम सिंह ने एक ही झटके में इस कहावत को चरितार्थ कर दिया था.

इस तरह एक शरीफ आदमी दिलेर डकैत बन कर कत्ल और लूटपाट करने लगा था. देखते ही देखते वह अनगिनत आपराधिक मामलों में नामजद हो गए. पुलिस उन्हें पकड़ने के लिए परेशान थी. उन की गिरफ्तारी के लिए अच्छाखासा इनाम रख दिया गया, जो बढ़तेबढ़ते 1970 तक 2 करोड़ तक पहुंच गया.  डाकू पंचम सिंह का नाम सब से ज्यादा वांछित दस्यु सम्राटों में आ गया था.

अब तक पंचम सिंह एक सिरफिरे दस्यु सम्राट के रूप में प्रसिद्ध हो गए थे. इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में उन्होंने उन्हें चैलेंज कर दिया था कि उन के इलाके में उन के बजाय उन की सरकार बेहतर चलेगी. इस से नाराज हो कर इंदिरा गांधी ने चंबल में बमबारी कर के डाकुओं का सफाया करने का आदेश दे दिया था, लेकिन बाद में इस आदेश को वापस ले कर डाकुओं से आत्मसमर्पण कराने पर विचार किया जाने लगा था.

आखिरकार इंदिरा गांधी ने जयप्रकाश नारायण को डकैतों से आत्मसमर्पण कराने की जिम्मेदारी सौंपी. उन की पहल पर 3 मांगों की शर्त के साथ कई दस्यु सम्राट अपने साथियों के साथ आत्मसमर्पण को तैयार हो गए. अपनी आत्मा की आवाज पर सन 1972 में पंचम सिंह ने भी अपने साथियों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया था. उन लोगों पर लूटपाट और फिरौती के लिए अपहरण के अनगिनत मुकदमों के अलावा 125 लोगों की हत्या का मुकदमा चला.

अदालत ने इन आरोपों के आधार पर उन्हें फांसी की सजा सुनाई. पंचम सिंह का 556 डाकुओं का गिरोह था. इन सभी ने अपने सरदार के साथ आत्मसमर्पण किया था और अब इन सभी को एक साथ फांसी की सजा हुई थी.

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने फांसी का विरोध करते हुए इस के खिलाफ आवाज उठाने के अलावा संबंधित अदालतों में अपील भी की. उन का कहना था कि वह डकैतों से इसी शर्त पर आत्मसमर्पण करवाने में सफल हुए थे कि सरकार उन पर दया दिखाते हुए उन्हें सुधरने का मौका देगी.

इस के बाद सभी डकैतों की फांसी की सजा उम्रकैद में बदल दी गई थी. इस के साथ इन कैदियों की यह शर्तें भी स्वीकार कर ली गई थीं कि उन्हें खुली जेल में रह कर खेतीबाड़ी करते हुए परिवार के साथ सजा काटने का मौका दिया जाए.

पंचम सिंह को उसी तरह के अन्य दुर्दांत कैदियों के साथ मध्य प्रदेश की खुली मूंगावली जेल में रखा गया. वहीं पर उन की जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा बीता.

एक बार ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा जीवन क्या है, विषय पर जेल में एक ऐसी प्रदर्शनी लगाई गई, जो निरंतर 3 सालों तक लगी रही. प्रदर्शनी द्वारा कैदियों को जीवन के उज्ज्वल पक्ष से संबंधित जानकारियां और शिक्षाएं भी दी जाती रहीं. कैदियों को न केवल राजयोग का अभ्यास कराया जाता था, आध्यात्मिक ज्ञान से सराबोर करने के प्रयास भी किए जाते रहे. इस से क्या हुआ कि अतीत के दुर्दांत डकैतों के जीवन में आध्यात्मिक उन्नति के चिह्न परिलक्षित होने लगे.

दस्यु सम्राट कहे जाने वाले पंचम सिंह भी उन्हीं में से एक थे. उन का कुछ ऐसा हृदय परिवर्तन हुआ कि अंततोगत्वा वह भी इसी राह पर चल पड़े. बाद में जब उन के अच्छे आचरण को देखते हुए उन की बाकी की सजा माफ कर दी गई तो वह कहीं और जाने के बजाय उन्हीं शिक्षाओं का हिस्सा बन कर शांतिदूत के रूप में इस का प्रचार करने लगे.

इसी सिलसिले में कुछ समय पहले पंचम सिंह मोहाली के ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के सुखशांति भवन में आए. अपने जीवन के अनुभव बांटते हुए उन्होंने बताया कि अपने डकैत जीवन में भी वह समाजसेवा के कामों को तरजीह दिया करते थे.

उन के अधीन 3 राज्यों मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कई इलाके थे, जहां के संपन्न लोगों से वह उन की कमाई का 10 फीसदी हिस्सा वसूल कर के उसी इलाके के गरीब परिवारों की लड़कियों की शादी पर खर्च करने के अलावा अस्पतालों और स्कूलों को दान कर दिया करते थे.

डाकुओं के अपने नियम होते थे, जिन पर सभी डकैतों को निश्चित रूप से चलना होता था. पंचम सिंह के अनुसार, उन्होंने कभी भी बच्चों या महिलाओं को परेशान नहीं किया, न ही उन के गिरोह का कोई सदस्य किसी महिला को बुरी नजर से देखने का दुस्साहस कर सका. हां, जिस किसी ने भी उन की मुखबिरी की, उसे उन्होंने किसी भी कीमत पर नहीं बख्शा.

इस समय 94 साल के हो चुके पंचम सिंह के बताए अनुसार, उन की गिरफ्तारी पर 2 करोड़ का इनाम था, लेकिन वह कभी पकड़े नहीं गए. पुलिस से हुई एक मुठभेड़ में उन की दाईं बाजू में गोली लगी थी, वह तब भी बच निकले थे.

अपने आत्मसमर्पण के बाद उन्होंने फूलन देवी, मलखान सिंह, सीमा परिहार और सुमेर गुर्जर का भी आत्मसमर्पण कराने में मदद की थी. इस के अलावा उन्होंने दक्षिण भारत के चंदन तस्कर वीरप्पन से मिल कर अभिनेता राजकुमार को उस के चंगुल से मुक्त करवाने में पुलिस की मदद की थी.

देश की युवा पीढ़ी के लिए उन का संदेश है कि विपरीत परिस्थितियों में भी वे कभी मर्यादा न खोएं. एकता, सत्य और दृढ़संकल्प हो कर जिस ने भी परिस्थितियों को अपने वश में किया, वह महान हुआ है. अपनी एक दिनचर्या बना कर उस पर दृढ़ता से अमल करना श्रेयस्कर रहता है.

एक डाकू होने और हर पल विपरीत परिस्थितियों में जीने के बावजूद पंचम सिंह ने अपनी मर्यादा को बचाए रखा, यही उन के जीवन की सब से बड़ी उपलब्धि है.

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