ममता का कातिल : बेटे ने की मां की हत्या

50 वर्षीय इंसपेक्टर ज्ञानेश्वर गणोरे महानगर मुंबई के उपनगर सांताकु्रज (पूर्व) की प्रभात कालोनी की ए.जी. पार्क इमारत की तीसरी मंजिल पर स्थित फ्लैट नंबर 303 में परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी दीपाली के अलावा 20 साल का बेटा सिद्धांत गणोरे था. इस समय वह मुंबई उपनगर के थाना खार में तैनात थे.

थाना खार में तैनाती होते ही उन्हें महानगर मुंबई के हाईप्रोफाइल शीना बोरा हत्याकांड जैसे मामले की जांच से जूझना पड़ा था. इस मामले की सूचना सब से पहले उन्हें ही मिली थी. इस के बाद थानाप्रभारी दिनेश कदम के साथ मिल कर उन्होंने इस हत्याकांड की तह तक पहुंच कर शीना बोरा के गुनहगार पीटर मुखर्जी और उन की पत्नी इंद्राणी मुखर्जी के साथ उन के ड्राइवर को सलाखों के पीछे पहुंचाया था. इस के बाद इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी.

यही इंसपेक्टर ज्ञानेश्वर गणोरे 16 मई, 2017 की सुबह 11 बजे पत्नी दीपाली और बेटे सिद्धांत के साथ नाश्ता कर के अपनी ड्यूटी पर चले गए थे. दरअसल, उन्हें एक अतिमहत्त्वपूर्ण केस की तैयारी करनी थी. उस दिन वह काफी व्यस्त रहे. शाम 6 बजे के करीब घर का हालचाल लेने के लिए उन्होंने फोन किया तो फोन बेटे सिद्धांत ने उठाया. उन्होंने पत्नी के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘मां सिनेमा देखने गई हैं, देर रात तक लौटेंगी. मैं भी अपने दोस्त के यहां जा रहा हूं.’’

घर का हालचाल ले कर ज्ञानेश्वर गणोरे फिर उसी केस की फाइलों में व्यस्त हो गए थे. सारा काम निपटा कर रात 11 बजे के करीब वह घर पहुंचे तो घर का दरवाजा बंद था. कई बार डोरबेल बजाने और दरवाजा खटखटाने के बाद भी जब दरवाजा नहीं खुला तो उन्होंने पत्नी और बेटे को फोन किया. लेकिन दोनों का फोन बंद होने से बात नहीं हो सकी.

फोन बंद होने से ज्ञानेश्वर गणोरे को चिंता हुई. उन्होंने पड़ोसियों से पूछा कि बाहर जाते समय सिद्धांत घर की चाबी तो नहीं दे गया? लेकिन वह किसी को चाबी नहीं दे गया था, इसलिए अब उन के पास इंतजार करने के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं था. वह इंतजार करने लगे. रात के एक बज गए, अब तक न उन की पत्नी आईं और न ही बेटा. उन का कोई फोन भी नहीं आया.

ज्ञानेश्वर गणोरे को चिंता हुई. उन के मन में तरहतरह के बुरे खयाल आने लगे. चिंता बेचैनी में बदली तो वह पुलिसिया अंदाज में फ्लैट की चाबी ढूंढने लगे. काफी मेहनत के बाद आखिर उन्हें चप्पलों की रैक में फ्लैट की चाबी मिल गई. फ्लैट का दरवाजा खोल कर वह अंदर पहुंचे तो जिस बात को ले कर उन्हें बुरे खयाल आ रहे थे, वही हुआ था.

उन की आंखों के सामने जो मंजर था, उस ने उन के होश उड़ा दिए थे. सामने ही हाल के फर्श पर उन की पत्नी दीपाली का लहूलुहान शव पड़ा था. लाश के आसपास फर्श पर खून ही खून फैला था.

कुछ समय तक तो वह पत्नी का शव देखते रहे. उस के बाद एक अनुभवी पुलिस अधिकारी होने के नाते उन्होंने खुद को संभाला और सावधानीपूर्वक फ्लैट का जायजा लिया. पत्नी की हत्या हो चुकी थी और बेटा गायब था. मामला काफी गंभीर था, इसलिए उन्होंने तुरंत इस बात की जानकारी पुलिस कंट्रोल रूम और थाना वाकोला पुलिस को दे दी.

सूचना मिलते ही थाना वाकोला के थानाप्रभारी महादेव बावले ने तुरंत डायरी बनवाई और 10-15 मिनट में ही पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. इस बीच यह खबर सोसायटी में फैल गई थी, जिस से रात 2 बजे भी इमारत के कंपाउंड में काफी लोगों की भीड़ जमा हो गई थी.

पुलिस टीम भीड़ के बीच से होते हुए लिफ्ट द्वारा फ्लैट नंबर 303 के सामने पहुंची तो फ्लैट के बाहर ही गैलरी में इंसपेक्टर ज्ञानेश्वर गणोरे खड़े मिल गए. पड़ोसी उन्हें धीरज बंधा रहे थे. महादेव बावले उन से औपचारिक बातचीत कर सहायकों के साथ फ्लैट में दाखिल हुए तो उन के साथ ज्ञानेश्वर गणोरे भी अंदर आ गए.

फ्लैट के अंदर का दृश्य काफी मार्मिक  था. इंसपेक्टर ज्ञानेश्वर गणोरे की पत्नी दीपाली की हत्या बड़ी ही बेरहमी से की गई थी. हत्या जिस चाकू से की गई थी, वह लाश के पास ही पड़ा था. मृतका के शरीर पर 10-11 घाव थे, जो काफी गहरे थे. इस से लग रहा था कि हत्यारे ने पूरी ताकत से वार किए थे.

इस के अलावा पुलिस को जो खास बात देखने को मिली, वह मृतका के खून से दीवार पर लिखा एक संदेश था. संदेश के नीचे एक स्माइली भी बना था. निश्चित ही वह हत्यारे का लिखा था. संदेश में लिखा था, ‘टायर्ड औफ हर. कैच मी एंड हैंग मी’ यानी इस से थक गया था. मुझे पकड़ो और फांसी पर लटका दो. यह संदेश सभी को अटपटा और रहस्यमय लगा.

महादेव बावले सहायकों के साथ घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर रहे थे कि मुंबई के सीपी दत्तात्रय पड़सलगीकर, जौइंट सीपी देवेन भारती, एसीपी चेरिंग दोरजे, एडीशनल सीपी अनिल कुंभारे भी आ गए. इन्हीं अधिकारियों के साथ पुलिस की क्राइम ब्रांच की टीम और फोरैंसिक टीम भी आई थी.

फोरैंसिक टीम का काम खत्म हो गया तो पुलिस अधिकारियों ने भी घटनास्थल और लाश का बारीकी से निरीक्षण किया. इस के बाद थानाप्रभारी महादेव बावले तथा क्राइम ब्रांच की टीम को दिशानिर्देश दे कर सभी अधिकारी चले गए.

अधिकारियों के जाने के बाद महादेव बावले और क्राइम ब्रांच पुलिस ने घटनास्थल की सारी औपचारिकताएं पूरी कर के चाकू, मृतका दीपाली तथा सिद्धांत का मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले लिया और लाश को पोस्टमार्टम के लिए विलेपार्ले कूपर अस्पताल भिजवा कर थाने आ गए.

घटनास्थल की स्थिति से स्पष्ट था कि मामला सीधासादा बिलकुल नहीं था. एक पुलिस अधिकारी की पत्नी की हत्या हो चुकी थी और बेटा गायब था. इस से यह भी अंदाजा लगाया जा रहा था कि किसी ने इंसपेक्टर ज्ञानेश्वर गणोरे से बदला तो नहीं लिया?

क्योंकि पुलिस अधिकारी होने के नाते उन का ऐसे तमाम अपराधियों से वास्ता पड़ा होगा, जो काफी शातिर रहे होंगे. यह काम कोई ऐसा अपराधी कर सकता था, जो उन से काफी नाराज रहा हो. उन्हें सबक सिखाने के लिए उस ने उन की पत्नी की हत्या कर बेटे का अपहरण कर लिया हो और दीवार पर संदेश लिख कर उन्हें चुनौती दी हो?

लेकिन दीवार पर लिखे संदेश के एकएक शब्द और वह स्माइली पर गंभीरता से विचार किया गया तो इस का कुछ अलग ही अर्थ निकल रहा था. यह बच्चों जैसा संदेश किसी शातिर अपराधी के दिमाग की उपज नहीं हो सकती थी. एक ओर जांच अधिकारी आपस में इस मामले को ले कर उलझे हुए थे, वहीं इंसपेक्टर ज्ञानेश्वर गणोरे भी अपने घर में घटी इस घटना पर गंभीरता से विचार कर रहे थे.

काफी सोचनेविचारने के बाद ज्ञानेश्वर गणोरे को अपने ही खून पर संदेह होने लगा. उन्होंने तुरंत इस बात की जानकारी थानाप्रभारी महादेव बावले को दे दी, क्योंकि वह अपने बेटे सिद्धांत की लिखावट से अच्छी तरह परिचित थे.

ज्ञानेश्वर गणोरे के संदेह के बाद राइटिंग एक्सपर्ट से उस संदेश की जांच कराई गई तो रिपोर्ट के अनुसार ज्ञानेश्वर गणोरे की बात सही निकली. उस के बाद सिद्धांत की तलाश शुरू हुई. इमारत और आसपास लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी निकलवा कर देखी गई. इस के बाद तो साफ हो गया कि दीपाली की हत्या किसी और ने नहीं, सिद्धांत ने ही की है. फिर तो पुलिस उस की तलाश में जीजान से जुट गई.

पुलिस को अपने सूत्रों से पता चला कि वह सूरत गया था, ज उसे राजस्थान के जोधपुर जाने वाली गाड़ी में बैठते देखा गया है. वह कहां जा रहा था, इस बात का अंदाजा नहीं लग रहा था.

पुलिस इस कोशिश में जुट गई कि वह जोधपुर से आगे न जा सके. इस के लिए वाट्सऐप द्वारा सिद्धांत का फोटो भेज कर जोधपुर के पुलिस कमिश्नर से बात की गई. उन्होंने इस मामले को जोधपुर रेलवे स्टेशन के नजदीक स्थित थाना उदयमंदिर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर मदनलाल नवीवाल को सौंप दिया.

मदनलाल नवीवाल ने तुरंत एक टीम गठित की, जिस में एएसआई पूनाराम, जय सिंह, सिपाही पुनीत त्यागी और विनोद शर्मा को शामिल किया. अपनी इस टीम के साथ वह सिद्धांत की गिरफ्तारी के लिए स्टेशन के आसपास लग गए.

दूसरी ओर मुंबई पुलिस भी खामोश नहीं बैठी थी. वह भी मामले पर नजर गड़ाए हुए थी. इस का नतीजा यह निकला कि मुंबई पुलिस ने सिद्धांत के ईमेल को ट्रैस कर लिया और इस बात की जानकारी थाना उदयमंदिर पुलिस को दे दी. उदयमंदिर पुलिस ने तुरंत रेलवे स्टेशन के पास स्थित होटल धूम में छापा मार कर सिद्धांत गणोरे को गिरफ्तार कर लिया.

दरअसल, सिद्धांत गणोरे जोधपुर पहुंचतेपहुंचते काफी थक चुका था. वह आराम करने के लिए धूम होटल में कमरा लेने पहुंचा तो वहां उसे आईडी की जरूरत पड़ी. इस के लिए उस ने एक नया मोबाइल फोन खरीदा और जब उस में अपना मेल लौगिन किया तो मुंबई पुलिस को उस के जोधपुर में होने की जानकारी मिल गई.

इस बात की सूचना उदयमंदिर पुलिस को दी गई तो उन्होंने उसे गिरफ्तार कर लिया. इंसपेक्टर मदनलाल नवीवाल ने सिद्धांत गणोरे से पूछताछ कर उसे थाना वाकोला पुलिस के हवाले कर दिया. थाना वाकोला पुलिस सिद्धांत गणोरे को मुंबई ले आई और उस से पूछताछ की तो दीपाली गणोरे की हत्या की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी.

यह सच है कि मांबाप कभी भी अपने बच्चों से न तो ईर्ष्या करते हैं और न दुर्व्यवहार. उन के डांटफटकार और मारपीट में भी उन का कोई स्वार्थ नहीं होता. वह मारतेपीटते भी हैं तो बच्चे की भलाई के लिए ही. क्योंकि वे हमेशा अपने बच्चों की भलाई चाहते हैं. लेकिन अब समय काफी बदल गया है. बच्चे इलैक्ट्रौनिक युग में जी रहे हैं. वे वैसा ही सोचते हैं, जैसा घर का माहौल होता है. घर के वातावरण का बच्चों के दिमाग पर गहरा असर पड़ता है. ऐसा ही सिद्धांत गणोरे के साथ भी हुआ.

इंसपेक्टर ज्ञानेश्वर गणोरे महाराष्ट्र के देवलाली कैंप के जनपद भगूर के रहने वाले थे. उन के पिता खेतीकिसानी करते थे. वह गांव में ही रह कर पढ़ेलिखे. लेकिन उन के मन में कुछ करने की तमन्ना थी, यही वजह थी कि पढ़ाई पूरी होते ही वह सबइंसपेक्टर के रूप में पुलिस विभाग में भरती हो गए. वह मेहनती तो थे ही, ईमानदार भी थे, इसलिए आज वह मुंबई पुलिस में इंसपेक्टर हैं.

पुलिस की नौकरी में आने के बाद उन की शादी दीपाली से हुई थी. दीपाली एलएलबी किए थी. पति की तरह वह भी महत्त्वाकांक्षी थी. वह एक प्रतिष्ठित वकील बनना चाहती थी. इस के लिए ज्ञानेश्वर गणोरे ने बेटे सिद्धांत के जन्म के बाद उसे एलएलएम की पढ़ाई के लिए लंदन भेज दिया था. यह अलग बात है कि लंदन से लौटने के बाद दीपाली ने कुछ दिनों ही वकालत की थी.

ज्ञानेश्वर गणोरे का बेटा सिद्धांत पहले तो पढ़ने में ठीक था, लेकिन हाईस्कूल के बाद उस का दाखिला मुंबई में करवाया गया तो पता नहीं क्या हुआ कि यहां उस का पढ़ाई में मन नहीं लगा. इंटर तो उस ने किसी तरह कर लिया, लेकिन कालेज के दूसरे साल में वह फेल हो गया. इस की वजह थी, घर का माहौल.

दरअसल, घर में अकसर मातापिता में लड़ाईझगड़ा होता रहता था. दीपाली को शक था कि उस के पति का किसी महिला से अफेयर है. सिद्धांत को यह पसंद नहीं था. वह मांबाप के रोजरोज के लड़ाईझगड़े से ऊब चुका था.

लेकिन मांबाप सिद्धांत को पढ़ालिखा कर इंजीनियर बनाना चाहते थे. पर उन का यह सपना पूरा नहीं हो सका. मांबाप के प्यार से वंचित सिद्धांत की दोस्ती कालेज के कुछ आवारा युवकों से हो गई थी, जिन के साथ रह कर वह ड्रग्स लेने लगा था.

इस बात की जानकारी दीपाली और ज्ञानेश्वर गणोरे को हुई तो उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. दोनों सिद्धांत पर नजर रखने लगे. उस के फोन और लैपटौप के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी गई. इस से सिद्धांत परेशान रहने लगा.

दीपाली ने कोशिश कर के सिद्धांत का दाखिला बांद्रा के नेशनल कालेज में बीएससी में करवा दिया. वह खुद सिद्धांत को कालेज छोड़ने जाती थीं, लेकिन उन के वापस आते ही सिद्धांत अपने आवारा और नशेड़ी दोस्तों के साथ निकल जाता. घर में दीपाली उस के साथ मां की तरह नहीं, तानाशाह जैसा व्यवहार करती थीं. उस की किताबें, नोटबुक और लैपटौप चेक करती थीं.

काम पूरा न होने पर उस से तरहतरह के सवाल करतीं और ताना मारतीं. अगर ज्ञानेश्वर गणोरे बेटे का पक्ष लेते तो वह उन से भी उलझ जातीं. यह सब सिद्धांत को अच्छा नहीं लगता था.

घटना वाले दिन सिद्धांत ने मां से कुछ पैसे मांगे. दीपाली ने पैसे देने से साफ मना कर दिया. मांबेटे के बीच कहासुनी होने लगी तो ज्ञानेश्वर गणोरे दोनों को समझाबुझा कर अपनी ड्यूटी पर चले गए, लेकिन दीपाली शांत नहीं हुईं. वह सिद्धांत को अपनी मार्कशीट दिखाने को कह रही थीं, लेकिन सिद्धांत मार्कशीट दिखाता कैसे, उस ने तो परीक्षा ही नहीं दी थी. यह जान कर दीपाली को गुस्सा आ गया.

सिद्धांत को आड़ेहाथों लेते हुए उन्होंने उसे खूब खरीखोटी सुनाई. दीपाली की बातें सिद्धांत के बरदाश्त से बाहर होती जा रही थीं. जब उस की सहनशक्ति समाप्त हो गई तो उस का मानसिक संतुलन बिगड़ गया. पहले तो उस ने अपने हाथों की नसें काट कर आत्महत्या करनी चाही. लेकिन अचानक उस का विचार बदल गया. आत्महत्या करने के बजाय उसे अपनी मां दीपाली की हत्या करना उचित लगा.

वह किचन में गया और सब्जी काटने वाला चाकू उठा लाया. दीपाली हाल में बैठी टीवी देख रही थीं. वह उन के पास पहुंचा और उन पर हमला कर दिया. अचानक हुए हमले से दीपाली संभल नहीं सकीं और फर्श पर लुढ़क गईं. वह चीखतीचिल्लाती रहीं, पर सिद्धांत को उस पर जरा भी दया नहीं आई. आखिर उस ने उन्हें मौत के घाट उतार कर ही दम लिया.

अपनी जन्म देने वाली मां की हत्या कर के सिद्धांत खड़ा ही हुआ था कि पिता का फोन आ गया. उस ने फोन रिसीव कर के बड़ी ही शांति से कहा कि मां फिल्म देखने गई हैं. वह देर रात तक आएंगी. वह भी बाहर जा रहा है. पिता से बात करने के बाद सिद्धांत ने चाकू मां की लाश के पास फेंका और भड़ास निकालने के लिए उस ने मां के खून से दीवार पर संदेश लिख कर उस के नीचे स्माइली बना दिया.

इस के बाद उस ने बैडरूम में रखी अलमारी में रखे 2 लाख रुपए निकाले और अपने तथा मां के फोन को बंद कर के सिम निकाल कर अपने पास रख लिया. पुलिस अधिकारी का बेटा होने के नाते उसे पता था कि मोबाइल रखना खतरे से खाली नहीं है. उस ने सोचा तो ठीक था, लेकिन पकड़ा मोबाइल फोन से ही गया.

अब तक रात के 8 बज चुके थे. उस के पिता कभी भी आ सकते थे, इसलिए अब वह वहां से निकल जाना चाहता था. घर से बाहर आ कर वह सांताकु्रज लोकल स्टेशन पहुंचा, जहां से बोरीवली गया. वहां से गुजरात एक्सप्रैस पकड़ कर सूरत और वहां से जोधपुर एक्सप्रैस से जोधपुर चला गया. जोधपुर से कहीं और जाता, उस के पहले ही पुलिस ने उसे पकड़ लिया.

पूछताछ के बाद थानाप्रभारी महादेव बावले ने सिद्धांत के खिलाफ मां की हत्या का मुकदमा दर्ज कर अदालत में पेश किया, जहां से उसे आर्थर रोड जेल भेज दिया गया. सिद्धांत अपनी ही मां की हत्या के आरोप में जेल में बंद है. लेकिन उसे मां की हत्या का जरा भी अफसोस नहीं है. सोचने वाली बात यह है कि अगर बेटे इस तरह क्रूर हो जाएंगे तो मांबाप की ममता का क्या होगा.

अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी में महिला अध्यक्ष

अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी में इस बार स्टूडैंट यूनियन की अध्यक्ष एक लड़की नबा नसीम चुनी गई है और यही नहीं वह जिस दिन चुनी गई उस दिन मोटरबाइक चलाती यूनियन के कार्यालय पहुंची. नबा नसीम ने लड़कियों के लिए खास प्रोग्राम बनाए हैं और उन्हें पुरानी सोच से निकालने का फैसला करा है.

भारत के मुसलिमों के लिए यह अच्छा संदेश है. भारत में मुसलिम समुदाय भारतीय जनता पार्टी के भगवा गैंग का निशाना बना रहता है. कभी वे मसजिद का मामला उठाते हैं, कभी ट्रिपल तलाक का, कभी लव जिहाद का, कभी ज्यादा बच्चों का, तो कभी हिजाब का. मुसलिम समुदाय आज के युग की जरूरतों और पुरानी दकियानूसी सोच के बीच उलझा रहता है.

नबा नसीम जैसी लड़कियां मुसलिम समाज को घिसेपिटे अंदाज से जीने से निकाल सकती हैं और उसे भारत की आजादी का पूरा फायदा उठाने का मौका दे सकती हैं. मुसलिम समाज को अब लंबी दाढ़ी वाले टोपीधारी नेता नहीं चाहिए जो पुरानी सोच पर नई कौम की जरूरतों को दबाने की कोशिश कर रहे हैं.

भारत के मुसलमानों को हिंदू खौफ से निकालना होगा, क्योंकि यह हिंदू खौफ पैदा करने वाले मुट्ठीभर पंडेनुमा लोग हैं जो मुसलमानों को ही नहीं, पिछड़ों, अछूतों, दलितों को भी दुश्मन मानते हैं. हाल तक हिंदू नेता पिछड़ोंदलितों के घर खाना तक नहीं खाते, हां उन से काम करवाने और विरोधियों को पिटवाने की जुगत बनाते रहते थे.

नबा नसीम जैसी नेताओं को साफ करना होगा कि वे धर्म के कट्टरपन से मुसलिम लड़कियों को निकालेंगी. अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी में यह आसान नहीं पर नेता तो वही है न जो आगे बढ़चढ़ कर काम करे. नबा नसीम को बुलेट की स्पीड पर लड़कियों को निकालना पड़ेगा क्योंकि उन के घरों में और माहौल में पिछले 40-50 सालों में बहुत थोड़ा सा फर्क आया है. मुसलिम नेता तो अपने लिए राजनीति करते रहे हैं और मुसलिम वोटों की खरीदफरोख्त कर पाने के लिए हर बदलाव के खिलाफ खड़े रहे हैं. आज के युवा होते मुसलमानों को नई हवा की आदत डालनी होगी और एक तरफ कट्टर हिंदू गैंगों से निबटना होगा तो साथ ही अपनी खुद की शरीअती सोच से भी आजादी पानी होगी.

भारत के मुसलिम युवाओं के पास आज बहुत मौके हैं. हिंदू जमात ने उन्हें अल्पसंख्यक बना रखा है वरना उन की इतनी गिनती है कि उन्हें किसी तरह की बैसाखी नहीं चाहिए और वे खुद की देखभाल आसानी से कर सकते हैं. नबा नसीम जैसे नेता हर यूनिवर्सिटी में पैदा होने चाहिए ताकि देश दोनों तरफ के कट्टरपंथियों को मुंहतोड़ जवाब दे सके.

‘आप’ में राज्यसभा टिकट बंटवारे पर घमासान

आम आदमी पार्टी ने बुधवार को राज्यसभा की तीन सीटों के लिए संजय सिंह, सुशील गुप्ता और एनडी गुप्ता को उम्मीदवार घोषित कर दिया. ‘आप’ के वरिष्ठ नेता संजय सिंह पीएसी के सदस्य हैं. सुशील गुप्ता कारोबारी हैं और एनडी गुप्ता चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं. उम्मीदवारों की घोषणा होते ही पार्टी में घमासान मच गया. पार्टी के वरिष्ठ नेता कुमार विश्वास समेत कई नेताओं ने इस फैसले का विरोध किया.

कुमार ने खुद को एक ‘शहीद’ करार देते हुए कहा कि अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ बोलने की वजह से उच्च सदन के लिए उनकी अनदेखी की गई. वहीं सूत्रों के मुताबिक ‘आप’ नेता आशुतोष ने भी पीएसी की बैठक में अरबपति कारोबारी के नाम पर आपत्ति जताई. वह पीएसी की बैठक में भी देर से पहुंचे.

उम्मीदवारों की घोषणा से पहले मुख्यमंत्री आवास पर ‘आप’ विधायकों की बैठक हुई. इसके बाद ‘आप’ की राजनीतिक मामलों की कमेटी (पीएसी) ने तीनों के नाम पर मुहर लगा दी. बैठक के बाद उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा, सुशील गुप्ता ने दिल्ली-हरियाणा में शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है. वे करीब 15 हजार बच्चों को निशुल्क शिक्षा मुहैया करा रहे हैं. दूसरे उम्मीदवार, नारायण दास (एनडी) गुप्ता आईसीएआई (इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट ऑफ इंडिया) के पूर्व अध्यक्ष हैं. तीसरे प्रत्याशी संजय सिंह हैं जो शुरू से ही ‘आप’ के संगठनात्मक ढांचे को मजबूत कर रहे हैं.

मिलिए आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों से

अरबपति व्यापारी

सुशील गुप्ता कांग्रेस के टिकट पर 2013 में विस चुनाव लड़े थे, पर हार गए थे. उन्होंने अपने पास 160 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति होने की घोषणा की है. निजी और परमार्थ स्कूलों की श्रृंखला चलाते हैं.

चार्टर्ड अकाउंटेंट

नारायण दास गुप्ता चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रह चुके हैं. हरियाणा से ताल्लुक रखते हैं और समय समय पर पार्टीको राय देते रहे हैं.

आप कार्यकर्ता

संजय सिंह सामाजिक कार्यकर्ता रहे हैं और यूपी के सुल्तानपुर के रहने वाले हैं. वह केजरीवाल के विश्वस्त लोगों में शुमार माने जाते हैं और उनके साथ इंडिया अगेंस्ट करप्शन के आंदोलन के दिनों से ही रहे हैं.

केजरीवाल के फैसले से हैरान हूं: योगेंद्र यादव

आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता योगेंद्र यादव ने ट्वीट किया, मैने पिछले तीन सालों में ना जाने कितने लोगों से कहा कि केजरीवाल में और जो भी दोष हों मगर कोई उसे खरीद नहीं सकता. आज क्या कहूं? हैरान हूं.

सुशील को तो पहले से जानकारी थी: माकन

राज्यसभा उम्मीदवारी पर कांग्रेस ने भी सवाल उठाया. दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन ने ट्वीट किया कि सुशील गुप्ता नवंबर के शुरू में ही अपने संभावित नामांकन के बारे में जानते थे. अन्यथा, सुशील अच्छे आदमी हैं जो अपने परमार्थ के लिए जाने जाते हैं.

जनता से विश्वासघात किया: मनोज तिवारी

भाजपा के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधा. तिवारी ने कहा कि केजरीवाल ने राज्यसभा चुनावों के लिए दो कारोबारियों को उम्मीदवार बनाकर जनता के साथ विश्वासघात किया है.

मनीष सिसोदिया, उपमुख्यमंत्री, दिल्ली सरकार

अरविन्द केजरीवाल उच्च सदन में दिल्ली का प्रतिनिधित्व करने के लिए तीन जानी-मानी हस्तियां चाहते थे. हमने मीडिया, शिक्षाविदों और कानूनविदों सहित 18 लोगों से संपर्क किया था. इसके बाद उम्मीदवारों के नाम का चयन किया गया.

कुमार विश्वास, वरिष्ठ नेता आम आदमी पार्टी

लगभग डेढ़ साल पहले केजरीवाल ने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मुस्कान के साथ कहा था, हम आपको खत्म कर देंगे, लेकिन आपको शहीद नहीं बनने देंगे. मैं उन्हें बधाई देता हूं कि मैंने अपनी शहादत स्वीकार कर ली है.

इस बौलीवुड एक्ट्रेस का बाथटब सीन हुआ लीक

सलमान खान की हीरोइन और बिगबौस की कंटेस्टेंट रह चुकी एक्‍ट्रेस महक चहल इन दिनों काफी परेशान हैं. उनकी परेशानी की वजह कुछ और नहीं बल्कि उनका एक हौट वीडियो है, जिसमें वह बाथ टब में बैठी नजर आ रही हैं. सुपरस्टार सलमान खान की फिल्म ‘वान्टेड’ में काम कर चुकीं महक इस पूरे मामले से काफी अपसेट हैं. बताया जाता है कि बाथटब सीन का जो वीडियो लीक हुआ है, वह उनकी आगामी फिल्‍म ‘निर्दोष’ का है.

bollywood

फिलहाल यह वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है. इसे पौप डायरिज नाम के यूट्यूब अकाउंट से शेयर किया गया है. इस वीडियो को अब तक 3,930 व्यूज मिल चुके हैं.

वीडियो को लेकर महक कहती हैं- मैं उस समय हैरान रह गई जब मेरी सहेली ने मुझे यह क्लिप दिखाई. मुझे तब ध्यान आया कि यह मेरी फिल्म ‘निर्दोष’ का सीन है. मैंने इसकी जानकारी अपने डायरेक्टर प्रदीप और सुब्रतो को दी. वे अब इस मामले को देख रहे हैं.

उन्होंने आगे कहा- हमने बहुत कम लोगों की मौजूदगी में इस सीन को शूट किया था. हम उस शख्स को ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं जिसने इस सीन को लीक किया है. एक एक्टर होने के नाते यह पहली बार था जब मैंने किसी सेंशुअल सीन को शूट किया हो. मुझे समझ नहीं आ रहा है कि क्या करुं, कैसे अपने गुस्से को शांत करूं और इसे शब्दों में कैसे बयां करूं?

bollywood

निर्दोष में महक के साथ अरबाज खान और मंझरी फणनीस, अश्मित पटेल और मुकुल देव भी अहम भूमिकाओं में नजर आएंगे. इसे प्रदीप रंगवानी और सुब्रतो पौल ने डायरेक्ट किया है. ‘निर्दोष’ एक हत्या के रहस्य से जुड़ी कहानी है, जो 19 जनवरी को सिनेमाघरों में रिलीज होगी. महक और फिल्म निर्देशक कुछ भी कहे लेकिन फिल्म के रिलीज होने से कुछ दिन पहले ही इस वीडियो का लीक होना काफी अजीब है. इसे देखकर ऐसा लग रहा है जैसे ये सब पब्लिसिटी के लिए किया जा रहा है.

बता दें कि महक ने वांटेड, नई पड़ोसन, यमला पगला दीवाना में काम किया है. वे बिग बौस सीजन 5 में प्रतिभागी के तौर पर हिस्सा ले चुकी हैं. इसके अलावा उन्होंने फिल्मों में कुछ आइटम सौन्ग भी किए हैं. महक चहल कलर्स पर आने वाले शो ‘कवच’ में भी काम कर चुकी हैं.

बिहार : नीतीश कुमार की जायज मांग

भारतीय जनता पार्टी से नाता जोड़ लेने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की चमचमाहट कम हो गई है क्योंकि जिसे कहते हैं उन्होंने थूक कर चाटना वह उन्होंने किया है और उस पार्टी के तलवों में जा बैठे हैं जिसे रातदिन कट्टरवादी, जातिवादी और न जाने क्याक्या कहते रहे. गद्दी पर बैठे हैं तो फिर भी वे कई बार सही बातें भी कहते हैं. उन्होंने अब मांग की है कि बिहार की शराबबंदी की तरह देशभर में शराबबंदी की जाए.

बिहार में शराबबंदी के बाद अपराध भी कम हुए हैं और लोगों में बीमारी भी कम हुई है. सरकार को शराब कर से नुकसान हुआ है उस का कई गुना फायदा जनता को मिला है, खासतौर पर घरवालियों और बच्चों को.

शराब कोई खाना नहीं कि इस के बिना आदमी जी नहीं सकता पर एक बार इस की लत पड़ जाए तो वह किसी की जान भी ले सकता है कि 2 घूंट मिल जाए. शायद इसी आदत के लिए शराब जबरन पिलवाई गई थी ताकि इस पर रोकटोक लगा कर टैक्स भी वसूला जा सके और इस का लालच दे कर लोगों से ज्यादा काम करवाया जा सके. अपराध और शराब का नाता तो पुराना है. दुनियाभर की फौजों को शराब पिला कर लड़वाया गया है.

दुनियाभर के शराबखाने असल में अपराधियों के अड्डे हैं और सरकारें उन्हें पनपने देती हैं क्योंकि यहीं से अपराधियों को आसानी से पकड़ा जा सकता है. शराब के सहारे सरकारों ने अरबों रुपया हर साल लोगों की जेबों से निकलवाया है. शराब कंपनियों ने जम कर इश्तिहारों पर पैसा खर्च किया है ताकि सिनेमा, अखबारों, कहानियों में शराब का बखान करा जा सके. 1950 से 1980 तक की फिल्मों में तो खलनायक ही पीते थे पर फिर दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र आदि ने शराब को ऊंची जगह दी.

आज सरकारें भी अपनी हर पार्टी में शराब परोसती हैं कि यह तो पार्टी करने का ही मुख्य उद्देश्य है. ऐसे में शराबबंदी का नाम लेना ही बेकार है. नीतीश कुमार जो वैसे ही ढुलमुल नेता साबित हो चुके हैं अब इस बंदी की वकालत करते भी अच्छे नहीं लगते क्योंकि वे क्या सही कह रहे हैं, क्या गलत अब पता नहीं चलता. कल को उन्हें कोई शराब कंपनी 1000 करोड़ रुपए कुरसी बचाए रखने के लिए दे जाए तो शायद वे इस से मिलने वाले टैक्स की महिमा गाने लगें.

शराब को घरघर पहुंचाने का काम सरकारों ने ही किया है वरना जहरीली शराब के डर के कारण ही लोग शराब पीना बंद कर देते. यदि शराबबंदी करनी है तो शराब फैक्टरियां बंद करें. घरों के पिछवाड़े जो बनेगी वह घटिया होगी और उस को बेचने कोई नहीं जाएगा. लोग नशे में फिर भी डूबेंगे पर कम से कम सरकार के हाथ तो काले नहीं होंगे.

मदरसों में मौडर्न तालीम है वक्त की जरूरत

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार के एक फैसले ने सर्दी शुरू होने के पहले ही गरमाहट पैदा कर दी. योगी सरकार ने ऐलान किया है कि प्रदेश के मदरसों में भी मौडर्न तालीम दी जाएगी.

इसी कड़ी में सरकार की तरफ से एक फरमान जारी किया गया, जिस में साफ लफ्जों में कहा गया कि सरकार मदरसों में मौडर्न तालीम दे ताकि वहां के छात्र भी हिंदी, अंगरेजी मीडियम स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों से बराबरी कर सकें.

उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने ट्वीट किया कि मदरसों में एनसीईआरटी की किताबों से पढ़ाई होगी. मंत्री के ट्वीट के मुताबिक, आलिया (इंटरमीडिएट) लैवल पर गणित और विज्ञान को अनिवार्य किया जाएगा.

देश में मुसलिम आबादी की बात की जाए तो वह तकरीबन 15 करोड़ के आसपास है लेकिन उन की आबादी के हिसाब से स्कूल, कालेज या यूनिवर्सिटी में मुसलिमों की तादाद काफी कम है. आजादी के 70 साल बाद भी मुसलिमों के हालात बेहतर होने के बजाय लगातार खराब होते गए हैं.

केंद्र और राज्य में सरकारें आती रहीं, सभी ने वोटों के लिए मुसलिमों से लुभावने वादे किए, लेकिन जब सत्ता में आए तो बेगानों की तरह भुला दिए गए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी भाषणों में कहा कि हम मदरसों के बच्चों के एक हाथ में कुरआन और दूसरे हाथ में कंप्यूटर देखना चाहते हैं.

आज के मौडर्न दौर में मुसलिम तरक्की के रास्ते में कैसे पीछे छूट गए? आखिर क्या वजह है इन के पिछड़ने की? आप भोपाल स्टेशन उतरिए तो वहां आप को ज्यादातर आटोरिकशा ड्राइवर और कुली मुसलिम ही मिलेंगे, फर्नीचर की दुकानों में कारीगर मुसलिम, सब्जी बेचने वाले मुसलिम.

यह तसवीर सिर्फ भोपाल शहर की नहीं, बल्कि हमारे देश के ज्यादातर हिस्सों की है. इस की अहम वजह क्या है?

मुसलिम कौम दुनियावी जिंदगी से ज्यादा दीन पर अमल करती है, लेकिन दूसरे मुसलिम मुल्कों की तरह भारत के मुसलिम दीन और दुनिया में तालमेल नहीं बिठा पाए. साल 2011 की जनगणना ने मुसलिमों की सचाई को और भी ज्यादा उजागर कर दिया.

आंकड़े बताते हैं कि भारत में 42.72 फीसदी से ज्यादा मुसलिम अनपढ़ हैं. जैन समदुय में महज 13.57 फीसदी अनपढ़ हैं, जबकि दोनों ही समुदाय अल्पसंख्यक माने जाते हैं.

जैन समुदाय के 25.7 लोग ग्रेजुएट हैं, जबकि मुसलिमों में यह आंकड़ा सिर्फ 2.8 फीसदी है. ईसाइयों में 8.8 फीसदी और सिखों में 6.4 फीसदी लोग ग्रेजुएट हैं. मुसलिम अपने बच्चों को आज भी पारंपरिक तौर पर मदरसों में ही पढ़ाना पसंद करते हैं या फिर यह उन की मजबूरी है.

देश में मुसलिमों की आबादी तकरीबन 15 करोड़ है, जिस में से 24.9 फीसदी लोग भीख मांग कर गुजारा करते हैं. सच्चर कमेटी ने काफी पहले ही अपनी रिपोर्ट में मुसलिमों की बदहाली के बारे में बताया था और यह भी कहा था कि इन के हालात दलितों से भी ज्यादा बदतर हैं. जिस देश में, समाज में या किसी कौम में जब पढ़ाईलिखाई का लैवल नीचा रहता है, तो वहां की ज्यादातर आबादी भी गरीब होती है.

भारत में सब से कम पढ़ेलिखे लोग मुसलिम हैं. एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा. कम पढ़ना या अपढ़ता भी गरीबी की एक अहम वजह हो सकती है, लेकिन सरकार तालीम के प्रसार के लिए तरहतरह की योजनाओं से सभी समुदाय के बच्चों को आगे बढ़ने का खुला मौका मुहैया करा रही है, इस के बावजूद यह तबका अनपढ़ है.

जानेमाने लेखक असगर वजाहत का कहना सही है कि उत्तर भारत का मुसलिम समाज कई धार्मिक मुद्दों पर बंटा हुआ है. यह बंटवारा इतना ज्यादा कर दिया गया है कि आपस में बातचीत तक बंद है. ज्यादातर धर्मगुरु तालीम पर बल नहीं देते, क्योंकि पढ़ालिखा मुसलिम उन के चंगुल से आजाद हो जाता है और यही धर्मगुरु नहीं चाहते हैं.

कुछ लोग तो तालीम के प्रति सचेत करने व जागरूकता फैलाने के लिए कार्यक्रम चला रहे हैं, लेकिन परेशानी इस बात की है कि कुछ समय बाद इस तरह के कार्यक्रम मजहबी चोला ओढ़ लेते हैं. जिस मकसद के लिए उन का संगठन बना था, वो धार्मिक कामों में ज्यादा ध्यान देने लगता है.

आज के दौर में जहां अंगरेजी मीडियम स्कूल के बच्चों को मौडल्स, तसवीर, प्रोजैक्टर वगैरह कई तरह की मौडर्न तकनीक का इस्तेमाल कर के पढ़ा रहे हैं, वहीं मदरसे में बच्चों को आज भी पुराने ढर्रे पर पढ़ाया जा रहा है. इस से पढ़ने वाले बच्चों को सही जानकारी नहीं मिल पाती है.

मदरसों में आज भी छोटी जमात के बच्चों को समझाने के बजाय पढ़ाई के नाम पर सिर्फ रटाया जाता है. उन का गणित, विज्ञान और कंप्यूटर से दूरदूर तक का कोई वास्ता नहीं होता है.

मदरसे में पढ़ कर किसी तरह की नौकरी का सपना संजोना सपना ही है, क्योंकि वहां ऐसी तालीम नहीं दी जाती जिस से रोजगार मिले.

भोपाल में तर्जुमा वाली मसजिद के छात्र मौलाना इरशाद और अब्दुल हसीब से जब यह पूछा गया कि क्या आप चाहते हैं कि मदरसों में भी मौडर्न तालीम के तहत तसवीर, मौडल्स या प्रोजैक्टर के जरीए पढ़ाया जाए तो इन छात्रों का कहना था कि ऐसा करना इसलाम के खिलाफ है और यह गुनाह का काम है, इसलिए इस के इस्तेमाल की जरूरत नहीं है.

वहीं बरअक्स कारी आजम का कहना था कि आज के हालात के मद्देनजर मदरसों में भी मौडर्न तालीम बहुत ही जरूरी है इसलिए अंगरेजी मीडियम स्कूलों की तरह यहां भी बच्चों को पढ़ाने और समझाने के लिए तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए.

मौलाना यूसुफ नदवी कहते हैं कि मदरसों में मौडर्न पढ़ाईलिखाई जायज ही नहीं, बल्कि वक्त को देखते हुए बहुत जरूरी है. छोटी जमात के बच्चों को समझाने के लिए तकनीक का इस्तेमाल जरूरी है, खासतौर से भाषा की पढ़ाई में.

कई बड़े मदरसों में अरबी, उर्दू के साथ ही साथ हिंदी, अंगरेजी, विज्ञान और कंप्यूटर की क्लासें भी चलती हैं, लेकिन सिर्फ बड़े मदरसों में पढ़ा कर ज्यादा फायदा नहीं होगा, इसलिए सभी मदरसों में ऐसी मौडर्न तालीम दी जाए.

मुसलिम भी बेडि़यों को तोड़ कर वक्त के साथ कदम से कदम मिला कर चलना ही नहीं, बल्कि तेजी से दौड़ लगाना चाहते हैं. इस के लिए पहल उन्हें ही करनी होगी तभी मुख्यधारा में आ सकते हैं.

पिछले कुछ सालों में मुसलिम तालीम के लिए कई संगठन ईमानदारी के साथ काम कर रहे हैं. उन की इस मुहिम को कामयाबी भी मिल रही है, लेकिन उतनी तेजी से नहीं, जितनी जरूरत है. एक बात और है कि मुसलिम लड़कों के मुकाबले मुसलिम लड़कियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं.

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पढ़ने से साफ हो जाता है कि मुसलिम के उन्हीं इलाकों में मदरसे ज्यादा हैं, जहां उन के लिए प्राइवेट या सरकारी स्कूल मौजूद नहीं हैं, इसलिए सरकार को चाहिए कि वह मुसलिम बहुल इलाकों में स्कूल खोले, जहां मुसलिम बच्चे भी स्कूल में पढ़ कर आगे बढ़ सकें.

मुसलिम समाज में पढ़ाई अधूरी छोड़ने वाले बहुत ज्यादा हैं और गंवई इलाकों में लड़कियों की तालीम छोड़ देने की दर लड़कों से ज्यादा है, जबकि शहरों में यह दर कम है.

साल 2015 में भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने मुसलिमों की हालत में सुधार के लिए सरकारी और सामाजिक लैवल पर सकारात्मक कदम उठाए जाने की जरूरत पर जोर दिया था.

रंगनाथ मिश्र कमेटी ने भी मुसलिमों को 10 फीसदी रिजर्वेशन देने का प्रस्ताव दिया था. लेकिन इन सिफारिशों पर कभी अमल नहीं किया गया. यही वजह है कि मुसलिमों की हालत आज भी खराब चल रही है. सरकार वक्तवक्त पर मुसलिमों के लिए कई तरह के लुभावने वादे कर के उन्हें अपने लिए वोट बैंक समझ कर झुनझुना पकड़ा देती है.

गरीबी भी तालीम के प्रति अनदेखी की एक अहम वजह है, इसलिए सरकार को मुसलिमों के साथ मिल कर समाधान ढूंढ़ना चाहिए. इस के समाधान के बिना उन्हें मुख्यधारा में शामिल नहीं किया जा सकता. गरीब मुसलिमों से जब उन के बच्चों के पढ़ाई छोड़ कर काम करने पर बात की जाती है तो उन का साफ कहना होता है, ‘‘नौकरी तो मिलने से रही, पर अगर बच्चों को वक्त पर काम नहीं सिखाया तो आवारा घूमेंगे…’’

एक बात एकदम साफ है कि सरकार ने मुसलिमों को इस तरह बना दिया है, अगर उन्हें प्यास लगती है तो सरकार के पास पानी के लिए आते हैं. सरकार उन्हें बारबार पानी पिलाती है, कभी वक्त पर तो कभी बेवक्त. लेकिन उन की प्यास बुझाने के लिए किसी भी सरकार ने आज तक कोई ऐसा ठोस काम नहीं किया, जिस से मुसलिमों को पानी पीने के लिए सरकार का चक्कर न काटना पड़े. वोटों के लिए ऐसी मंशा सभी सरकारों की रही है.

इस नए फैसले के पीछे योगी आदित्यनाथ की नीयत भी साफ नहीं है कि वे वाकई मदरसों में पढ़ाई कराना चाहते हैं या केवल दखलअंदाजी का रास्ता ढूंढ़ रहे हैं. जिस तरह का माहौल आज बना हुआ है, उस में सुधार के कदम को अगर शक की निगाहों से देखा जा रहा है तो कोई हैरत की बात नहीं है.

प्रेम विवाह : पिछड़ों में जातियों का चक्कर

बीए की पढ़ाई के दौरान रेखा और राजेश में प्यार हो गया था. वे दोनों कानपुर के रहने वाले थे और वहीं साथसाथ पढ़ रहे थे. पढ़ाई के बाद रेखा स्कूल में टीचर हो गई और राजेश अपनी नौकरी के लिए कोशिश करने लगा. रेखा पिछड़ी बिरादरी में सचान जाति की थी जबकि राजेश यादव बिरादरी से था.

नौकरी के बाद रेखा के घर वाले उस की शादी के लिए रिश्ता देखने लगे. तब रेखा ने अपने घर वालों को राजेश से अपने प्रेम संबंधों के बारे में बताया. रेखा के घर वाले इस के लिए तैयार नहीं थे. रेखा ने समझाया तो उस के घर वाले राजेश से भी मिले. राजेश उन को पसंद था.

रेखा के घर वाले अपनी बेटी के रिश्ते की बात करने राजेश के घर वालों से मिले तो वे लोग इस बात से खफा हो गए कि यादव लड़के की शादी सचान लड़की से कैसे होसकती है? इस बात पर दोनों ही परिवारों में काफी बहस हुई.

रेखा सरकारी नौकरी में थी. ऐसे में राजेश के घर वालों को बाद में यह रिश्ता कबूल हो गया पर उस के रिश्तेदार इस के लिए राजी नहीं हुए.

रेखा और राजेश की शादी तो हो गई पर उस में राजेश की बिरादरी के बहुत से लोग और नातेरिश्तेदार शामिल नहीं हुए. शादी के बाद रेखा  ससुराल आ गई. यहां भी उस से अच्छा बरताव नहीं किया जाता था. ऐसे में वह शहर में ही किराए का घर ले कर रहने लगी.

आज भी ससुराल की बाकी बहुओं के साथ रेखा का तालमेल अच्छा नहीं हो सका है. तीजत्योहार पर जब कभी वह ससुराल जाती भी है तो उसे भेदभाव झेलना पड़ता है.

कुर्मी और यादव पिछड़ी जातियों में सब से मजबूत और करीबी जातियां मानी जाती हैं. पिछड़ी जातियों में कई ऐसी जातियां भी हैं जो अतिपिछड़ी जातियां  हैं. वे सामाजिक और माली रूप से दलित जातियों के करीब आती हैं. इस तरह की तकरीबन 17 जातियां हैं जो बारबार सरकारी तौर पर मांग कर रही हैं कि उन को दलित माना जाए. ये जातियां वैसे तो पिछडे़ तबके में आती हैं इस के बाद भी पिछडे़ तबके की दूसरी जातियों में शादी नहीं कर पाती हैं.

सामाजिक चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘पिछड़ी जातियों में भी अगड़ों की तरह जाति और गोत्र का फर्क माना जाता है. आमतौर पर शादियां अपनी बिरादरी में ही होती हैं. एक ही जाति की दूसरी उपजातियों तक में प्रेम विवाह करना आसान नहीं होता है.

‘‘शादीब्याह में जाति का जो चक्कर अगड़ी जातियों में है वही चक्कर पिछड़ी जातियों में भी है. जहां पर लड़की सरकारी नौकरी कर रही है वहां पर तो लड़के वाले उस को स्वीकार भी कर लेते हैं लेकिन अगर सामान्य शादी होती है तो गैरजातियों में प्रेम विवाह बहुत ही से मुश्किल होता है.’’

नहीं है आजादी

दहेज का जो चलन पहले अगड़ी जातियों में था अब वह पिछड़ी जातियों में भी बढ़ने लगा है. यहां अब दहेज का दिखावा अगड़ों से ज्यादा बढ़ता जा रहा है. दहेज के लालच में ही मनपसंद शादी की आजादी नहीं है.

लोगों को लगता है कि अगर लड़का या लड़की अपनी पसंद से शादी कर लेंगे तो दहेज नहीं मिलेगा. इस की वजह से पिछड़ी जातबिरादरी में भी प्रेम विवाह के समय जातियों की जकड़न मजबूत होती जा रही है.

विश्व शूद्र महासभा के जगदीश पटेल कहते हैं, ‘‘जाति की जो व्यवस्था अगड़ी जातियों ने बनाई, दलित और पिछडे़ उसी आधार पर चल रहे हैं. जिस तरह से अगड़ी जातियों में ठाकुर, ब्राह्मण, बनिया जैसी जातियां हैं और वे अपनी जाति में भी सभी जातियों में शादियां नहीं करतीं उसी तरह से पिछड़ी जातियों में भी अपनी ही जाति में शादी करने का रिवाज है. पिछड़ी जातियों में अतिपिछड़ी जातियों के बीच शादी किसी कीमत पर नहीं होती.

‘‘अगर किसी मजबूरी में शादी हो भी जाए तो लड़की को ससुराल में तालमेल बिठाने में दिक्कत आती है. वहां उस के साथ भेदभाव होता है. दूसरी बहुओं के मुकाबले उसे कम इज्जत दी जाती है. इस की मूल वजह पढ़ाईलिखाई की कमी, सामाजिक दबाव और दहेज की बीमारी है.’’

असल में पिछड़ी जातियों में से कुछ जातियां जैसे यादव, कुर्मी खुद को राजपूत जातियां मानती हैं. वे लोग अपनेआप को अगड़ी जातियों में शुमार करते हैं. ऐसे में ये जातियां राजपूतों की ही तरह से अपनी जाति में शादी करती हैं. जाति में भी गोत्र और उपजातियों का ध्यान रखती हैं.

शादियों में इस का पूरा खयाल रखा जाता है. दूसरी जातियों में वे लोग शादी नहीं करते. अपने से ऊंची जातियों में प्रेम विवाह की इजाजत मिल भी जाए तो अपने से निचली जाति में प्रेम विवाह को कभी मंजूरी नहीं मिलती.

मिलती नहीं इज्जत

लोध बिरादरी भी पिछड़ों की एक बिरादरी है. इस को पिछड़ों में राजपूत जातियों जैसे यादव और कुर्मी से नीचे का माना जाता है. लोध बिरादरी में यादव या कुर्मी शादियां नहीं करते. किसी मजबूरी में इस तरह की शादी हो भी जाए तो उस को इज्जत नहीं मिलती है.

उत्तर प्रदेश में लोध बिरादरी तादाद में ज्यादा है. यह कुर्मी और यादव के बाद सब से मजबूत जाति मानी जाती है. लोध जाति की नेहा का प्रेम विवाह यादव जाति के रामपाल से हो गया.

आजमगढ़ के रहने वाले नेहा और रामपाल दोनों ही सरकारी नौकरी में थे. एक ही स्कूल में पढ़ाते थे. वहीं से दोनों के बीच प्रेम संबंधों की शुरुआत हुई.

शादी की बात पर दोनों घरों में एकराय नहीं थी. रामपाल के घर वाले नेहा से शादी करने को तैयार नहीं थे. इस की वजह दहेज थी. रामपाल सरकारी नौकरी में था. उस की शादी में अच्छा दहेज और कार मिलने की उम्मीद थी.

रामपाल ने घर वालों का विरोध कर के नेहा से शादी कर ली. रामपाल की शादी में मुश्किल से उस के मातापिता और भाई शामिल हुए. रामपाल की बहन और उस के दूसरे नजदीकी रिश्तेदार तक शामिल नहीं हुए.

शादी के बाद जब नेहा ससुराल गई तो उस की जेठानी और सास का बरताव बदला हुआ था. नेहा को यह देख कर बहुत पीड़ा हुई. वह बड़ी मुश्किल से ससुराल में एक हफ्ता रही. इस के बाद वह शहर चली आई. रामपाल और नेहा ने काफी कोशिश के बाद अपना तबादला शहर में करा लिया.

नेहा कहती है, ‘‘मेरी सास और जेठानी दोनों ही स्कूल में पढ़ाती हैं. वे पढ़ीलिखी और समझदार हैं. इस के बाद भी जाति को ले कर उन की सोच वही पुरानी दकियानूसी है. मेरे पति के सामने तो वे मुझ से अच्छा बरताव करती थीं पर उन के जाते ही मुझ से बात नहीं करती थीं. मुझे कभी रसोईघर में खाना नहीं बनाने दिया गया.

‘‘वे मेरी ननद को मुझ से बात नहीं करने देती थीं. मेरी सास कहती थीं कि मेरे आने से ननद की अच्छी शादी नहीं हो पाएगी. वे यह भी कहती थीं कि मैं ने उन के बेटे को फंसा कर शादी कर ली, नहीं तो उस को अच्छा दहेज मिलता.’’

काबिल लड़कों की कमी

पहले प्रेम विवाह के मामले कम होते थे. अब पिछडे़ तबकों में भी लड़कियां पढ़ने लगी हैं. ऐसे में वे लड़कों से ज्यादा काबिल साबित होती जा रही हैं. पहले लड़कियां जहां मांबाप की बात मान कर शादियां कर लेती थीं पर अब ऐसा नहीं हो रहा है. अब ये मनपसंद शादी का हक मांगने लगी हैं. कालेज से ले कर प्रतियोगी इम्तिहानों के लिए बाहर रहने के दौरान इन के गैरजातियों में प्रेम संबंध होने लगे हैं. अब ये मातापिता के तय किए जातीय रिश्ते में शादी नहीं करना चाहतीं. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार में पिछले कुछ सालों में टीचर बनने वालों में लड़कियों की तादाद सब से ज्यादा है.

केवल सरकारी स्कूलों में ही नहीं बल्कि प्राइवेट स्कूलों में भी टीचर के तौर पर पिछड़ी जातियों की लड़कियां सब से ज्यादा हैं. स्कूल के साथसाथ पुलिस, पीएसी और दूसरी जगहों पर पिछड़ी जातियों की लड़कियों की तादाद सब से ज्यादा है. शहरों में बड़ी तेजी से निजी सुरक्षा यानी सिक्योरिटी और मौल्स में लड़कियों, वह भी पिछड़ी जाति की लड़कियों की तादाद बढ़ी है. ब्यूटीपार्लर और नर्सिंग जैसे कोर्स कर के अपना खुद का काम  भी शुरू किया है. पढ़ीलिखी लड़कियों में दलितों के मुकाबले पिछड़ी जातियों की तादाद ज्यादा है.

नर्सिंग का कोर्स कर चुकी पारुल मौर्य बिरादरी की है. घर वालों ने उस की शादी अपनी ही बिरादरी के एक लड़के से तय कर दी. लड़के के घर वालों ने शर्त रखी कि लड़की को शादी के बाद नौकरी छोड़नी होगी.

यह बात पारुल को मंजूर नहीं थी. वह जिस लड़के से शादी करना चाहती थी, वह पिछड़ी जाति का था. ऐसे में यह रिश्ता उस के घरपरिवार को मंजूर नहीं था. ऐसे में पारुल ने शादी न करने का फैसला ले लिया.

पारुल कहती है, ‘‘पढे़लिखे लोगों में भी जाति का कट्टरपन पहले की ही तरह कायम है. इस में कोई बदलाव नहीं आ रहा है. अलगअलग उदाहरणों में अलग वजह से जो बदलाव दिखते हैं उस से पूरे समाज की सोच का पता नहीं चल सकता. समाज का एक बड़ा हिस्सा अभी भी मनपसंद शादी की आजादी नहीं देता. जब पढे़लिखे समाज मेें यह बदलाव नहीं आ रहा है तो बाकी से क्या उम्मीद की जाए.’’

लड़कियों का विरोध

असल में पिछड़ी जातियों में जाति का शिकंजा सब से ज्यादा कसा हुआ है. जाति और उपजाति का भेदभाव यहां पर सब से ज्यादा है. बहुत सी जातियों में जातिगत पंचायतें हैं. कुछ समय पहले तक पिछड़ी जातियों में ऐसी मुहिम चली थी कि जाति में बराबरी आए. समाजवादी आंदोलन के तहत इस दिशा में नेताओं ने काम भी शुरू किया था.

90 के दशक में जब जाति और धर्म पर आधारित सोच बदली और वोट बैंक के लिए जातियों में खेमेबंदी शुरू हुई तो जातियों के बीच खाई और भी चौड़ी होती चली गई. धर्म आधारित राजनीति ने जाति की खेमेबंदी को बढ़ावा दिया.

असल में यहां पंडेपुजारियों का अपना फायदा भी था. वे चाहते थे कि जाति और धर्म का जो चलन ऊंची जातियों की शादीब्याह में है वह दलित और पिछड़ी जातियों में भी बना रहे. पंडेपुजारियों को यह डर था कि अगर लोग मनपसंद शादी करने लगेंगे तो इन का धर्म का धंधा चौपट हो जाएगा इसलिए ये लोग लड़कियों की बदलती सोच को दरकिनार करना चाहते हैं.

राजनीति में हर जाति का अपना नेता हो गया है. वे लोग चाहते हैं कि जातिगत खेमेबंदी चलती रहे जिन से उस को वोट मिलते रहें. वोट और धर्म का धंधा तभी तक चलेगा जब तक लोग जातिधर्म के नाम पर लड़तेझगड़ते रहेंगे. राजनीतिक दल खासकर पिछड़ी जातियों में पकड़ रखने वाले लोग जाति के खिलाफ बात करने से बचने लगे हैं. समाजवादी विचारधारा के लोग पहले जाति के खिलाफ समाज में संदेश देने का काम करते थे, पर अब वे भी इस से बचने लगे हैं.

मुश्किल है गैरधर्म में शादी करना गैरधर्म में शादी को ले कर अगड़ी जातियों में भले ही सोच में  ड़ाबहुत बदलाव आया हो पर पिछड़ी जातियों में यह किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं है.

उत्तर प्रदेश के पश्चिमी हिस्से में ‘लव जिहाद’ का मुद्दा इसीलिए सब से अधिक कारगर हो गया क्योंकि वहां पर दलित और पिछड़ी जातियों के प्रेम संबंध गैरबिरादरी में होने लगे थे. यहां पर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं कि एक बार किसी परिवार को अपनी जाति में शादी करने के लिए राजी करना आसान हो सकता है पर जैसे ही गैरधर्म में शादी की बात आती है तो परिवार किसी भी सूरत में राजी नहीं होता है. कई बार ऐसे प्र्रेम संबंधों को ही जबरन बलात्कार की कैटीगरी में लाया जाता है.

ज्यादातर मामलों में लड़की वाले यह साबित करते हैं कि लड़की नाबालिग है. नाबालिग लड़की को ले कर सख्त कानून होने से लड़के के परिवार वालों को तत्काल जेल जाना पड़ जाता है. उन की जमानत भी नहीं हो पाती है.

सहारनपुर की रहने वाली रेहाना के भाई ने एक पिछड़ी जाति की लड़की निशा से प्रेम किया. जब घर वाले इस शादी के लिए राजी नहीं हुए तो निशा और उस के पति घर से बाहर दिल्ली चले गए. इस का विरोध करते हुए पिछड़ी जातियों के लोगों ने रेहाना के घर पर हमला कर दिया. वे लोग रेहाना के साथ गलत बरताव करना चाहते थे. रेहाना बच गई, पर अब उसे गांव से बाहर रहना पड़ता है.

रेहाना बताती है कि ऐसे बहुत से मामले हैं जहां पर गैरधर्म में शादी को मंजूर नहीं किया गया. इस वजह से या तो ऐसे संबंध टूट गए या फिर अपने शहर से दूर हो कर रहने लगे. राजनीति के चक्कर ने इसे ‘लव जिहाद’

का मसला बना दिया. ऐसे में गैरधर्म के बीच शादी की दूरी घटने के बजाय और बढ़ती गई.

बेवजह नहीं चुंबन सीन : इशिता दत्ता

तेलुगु फिल्म से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली हीरोइन इशिता दत्ता की बचपन से इच्छा थी कि उन्हें ऐक्टिंग करने का मौका मिले और यह प्रेरणा उन्हें अपनी हीरोइन बहन तनुश्री दत्ता से मिली जो उन्हें हमेशा अपनी इच्छा से जुडे़ काम करने की सलाह दिया करती थीं. इतना ही नहीं, आज भी किसी काम को करने से पहले इशिता अपनी बहन की राय जरूर लेती हैं.

झारखंड के जमशेदपुर शहर की रहने वाली इशिता दत्ता अभी अपने मातापिता के साथ मुंबई में रहती हैं. हाल ही में उन की फिल्म ‘फिरंगी’ बड़े परदे पर आई है. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश :

फिल्म ‘फिरंगी’ को करने की क्या वजह थी?

इस से पहले मैं ने हिंदी फिल्म ‘दृश्यम’ की थी. इस फिल्म में मैं ने अजय देवगन की बेटी का किरदार निभाया था. उस फिल्म में कास्टिंग डायरैक्टर विकी सदाना ने मेरी कास्टिंग कराई थी. फिल्म ‘फिरंगी’ में भी उन्होंने मुझे मेरे किरदार के बारे में बताया और औडीशन के लिए तैयार होने को कहा. कई औडीशन के बाद मैं चुनी गई.

जब मैं इस फिल्म की टीम से मिली तो पहली मुलाकात में इस की कहानी मुझे रोचक लगी. साथ ही, इतने दिनों तक बे्रक के बाद मुझे एक अच्छी फिल्म करने का औफर मिल रहा था जो बड़ी बात थी.

इस से पहले आप ने टैलीविजन में भी काम किया है. टैलीविजन से फिल्मों में आना कैसे हुआ? आप दोनों में क्या फर्क महसूस करती हैं?

दरअसल, मैं ने पहले फिल्म और उस के बाद टैलीविजन में काम किया है. फिल्म ‘दृश्यम’ के बाद मुझे हर कोई वैसी ही छोटी लड़की के किरदार निभाने का औफर दे रहा था और मुझे वैसा काम नहीं करना था इसलिए मैं मना करती रही.

उसी दौरान मुझे टैलीविजन सीरियल ‘एक घर बनाऊंगा’ का औफर मिला. वह मुझे पसंद आया औैर मैं ने कर लिया.

मुझे काम करते रहना पसंद है. मैं घर बैठ कर समय को बरबाद नहीं करना चाहती थी.

आजकल फिल्म से टीवी और टीवी से फिल्मों में आना आम बात है. बडे़बड़े कलाकार भी टीवी पर आ रहे हैं. इस के अलावा आजकल टीवी की शूटिंग फिल्मों के जैसे ही हो रही है. टीवी में समय की कमी की वजह से काम बहुत ज्यादा होता है जबकि फिल्म में काम आराम से होता है.

क्या ऐक्टिंग करना एक इत्तिफाक था या बचपन से इच्छा थी?

मेरे लिए ऐक्टिंग जौब नहीं बल्कि एक इच्छा थी. मेरी बहन ने इस बात पर बल दिया और मैं इस क्षेत्र में चली आई. मैं ने मास मीडिया में पढ़ाई पूरी करने के बाद कई जगहों पर अपना पोर्टफोलियो भेजा और मुझे पहले तेलुगु फिल्म में काम करने का मौका मिला. यहीं से मेरे अंदर प्रेरणा जगी और अब मैं इस क्षेत्र में अच्छा काम करना चाहती हूं.

मेरे कैरियर की सपोर्ट सिस्टम मेरी दीदी ही हैं. उन्होंने मुझे फिल्म इंडस्ट्री की बारीकियों को समझाया है. दीदी कहती हैं कि जब भी कोई काम करने की इच्छा हो तो उसे कर लेना चाहिए ताकि बाद में अफसोस न हो.

यहां तक पहुंचने में परिवार का सहयोग कितना रहा?

उन्होंने बहुत सहयोग दिया है, जमशेदपुर से वे मुंबई रहने चले आए ताकि हमें सुविधा हो. मैं ने हमेशा काम के साथ परिवार का बैलैंस रखा है. फुरसत मिलते ही उन के साथ समय बिताना पसंद करती हूं. काम मेरे ऊपर इतना हावी नहीं होता है कि मैं परिवार और दोस्तों को भूल जाऊं इसलिए मुझे कभी तनाव नहीं होता.

फिल्मों में चुंबन सीन करने में आप कितनी सहज होती हैं?

अभी तक तो मैं ने कोई फिल्म ऐसी नहीं की है. लेकिन स्क्रिप्ट की जरूरत पर करना पडे़गा. पर मैं सहज नहीं हूं. ग्लैमर के लिए मैं ऐसे सीन नहीं कर सकती.

आगे किस तरह की फिल्में करने की इच्छा रखती हैं?

मैं ने अभी तो शुरुआत की है. मेरी एक ऐक्शन फिल्म करने की इच्छा है. मैं इम्तियाज अली के डायरैक्शन में बनी फिल्म करना चाहती हूं.

आप कितना फैशनेबल हैं? आप को किस तरह का खानपान पसंद है?

मैं बंगाली हूं और हर तरह का खाना पसंद करती हूं. मिठाई खूब पसंद हैं. समय मिले तो खाना भी बना लेती हूं. मैं चिकन बिरयानी और आइसक्रीम बना लेती हूं. कंफर्ट लैवल को ध्यान में रख कर ड्रैस पहनती हूं. मैं इंडियन और वैस्टर्न हर तरह की पोशाक पहनती हूं. मुझे चटकीले रंग के कपड़े पसंद हैं जिस में पीला रंग मेरा पसंदीदा है.

मेकअप कितना पसंद करती हैं?

पहले मुझे मेकअप का शौक था, पर अब नहीं है क्योंकि हमेशा लगाना पड़ता है. रात को सोने से पहले अच्छी तरह से मेकअप उतारना नहीं भूलती.

आप खाली समय में क्या करना पसंद करती हैं?

मुझे पालतू जानवरों से बहुत लगाव है. मेरे पास एक डौगी है जिस का नाम मैं ने हैप्पी रखा है. उस के साथ मैं खेलती हूं. जब भी मैं काम से घर लौटती हूं तो वह मेरा स्वागत खुशी से करता है. उसे देखते ही मेरी थकान दूर हो जाती है. इस के अलावा मैं अपना खाली समय दोस्तों और अपने परिवार के साथ बिताती हूं.

राखी सावंत को दरियाई घोड़ा कहकर फैन्स ने बनाया मजाक

बौलीवुड एक्ट्रेस राखी सावंत अक्सर ही अपने बयानों और तस्वीरों की वजह से चर्चा में बनी रहती हैं. एकबार अपनी तस्वीरों को लेकर वह खबरों में हैं. दरअसल राखी ने नए साल के मौके पर अपनी एक तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर की है. इस तस्वीर में राखी रेड एंड ब्लैक कलर की प्रिंटेड स्विमसूट पहने पूल साइड पर बैठी नजर आ रही हैं. इसी के साथ वह फोटो में नीले रंग का सनग्लास लगाई हुई हैं.

वैसे तो इस स्विमसूट में वह काफी हौट नजर आ रही हैं, लेकिन लगता है उनकी यह तस्वीर कुछ लोगों को जरा भी पसंद नहीं आई और उन्होंने कमेंट बौक्स में अश्लील और भद्दे कमेंट करने शुरू कर दिए. और फिर देखते ही देखते राखी अपनी ही पोस्ट पर ट्रोल होने लगीं.

22 घंटे के भीतर राखी सावंत की इस तस्वीर को महज 5 हजार लोगों ने ही लाइक किया है लेकिन जहां तक बात इस फोटो पर किये गये कमेंट्स की है तो तमाम लोगों ने इस तस्वीर पर नकारात्मक कमेंट्स ही किए हैं. उनकी शरीर के हिसाब से छोटे और तंग स्विसूट का मजाक बनाते हुए एक यूजर ने लिखा- बाकी सब तो ठीक है बस थोड़ा टाइट हो गया.

इतना ही नहीं एक यूजर ने तो राखी को दरियाई घोड़ा तक कह डाला. यूजर ने कमेंट बौक्स में लिखा- दरियाई घोड़ा पानी के बाहर सुस्ताता हुआ. एक और यूजर ने लिखा- मेरा तो उल्टी करने का मन हो गया है. इसी तरह के तमाम अश्लील और भद्दे कमेंट कमेंट्स यूजर्स ने इस पोस्ट पर किए हैं.

गौरतलब है कि राखी सावंत हाल ही में अपने एक वीडियो को लेकर विवादों में रही थीं. इस वीडियो में राखी सावंत कंडोम ब्रांड का विज्ञापन करते हुए और अपने पसंदीदा कंडोम फ्लेवर को बताते हुए नजर आ रही थीं.

दिशा पटानी ने फिर बिखेरा हौटनेस का जलवा

बौलीवुड अभिनेत्री और टाइगर श्रौफ की गर्लफ्रेंड दिशा पटानी ने फिल्म ‘बागी 2’ की शूटिंग से ब्रेक लेकर न्यू ईयर का सेलिब्रेशन करने के लिए श्रीलंका को चुना था.

bollywood

अपने बौयफ्रेंड टाइगर श्रौफ के साथ न्यू ईयर हौलिडे सेलिब्रेट कर रही दिशा पटानी एक बार फिर अपने फोटोशूट को लेकर चर्चा में हैं. इस फोटोशूट में वह काफी बोल्ड नजर आ रही हैं.

bollywood

दिशा ने अपने इस फोटोशूट की तस्वीर इंस्टाग्राम पर भी शेयर की है. बता दें कि उनका ये हौट अवतार सोशल मीडिया पर भी खूब वायरल हो रहा है. इसे अब तक सात लाख लाइक मिले चुके हैं.

bollywood

इससे कुछ दिन पहले ही एयरपोर्ट पर रणवीर सिंह और दिशा पटानी की फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हुई.

जिसमें यह तीनों एयरपोर्ट पर मस्‍तीभरे अंदाज में दिख रहे थे. तस्वीर में टाइगर दिशा की गोद में बैठे नजर आ रहे थे और उनके साथ रणवीर सिंह भी मौजूद थे. टाइगर, दिशा और रणवीर सिंह श्रीलंका जा रहे थे.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें