चीन और अमेरिका में लगी बराबरी की होड़

चीन अब अमेरिका की जगह लेने की तैयारी में है और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका फर्स्ट के नाम पर अपना दखल दूसरे देशों में कम कर रहे हैं, जबकि चीन बढ़ा रहा है. इस का असर भारत पर भी पड़ेगा. अमेरिका ने एच1बी1 वीजा को सख्त बना कर करीब 40,000 भारतीय युवाओं के लिए अमेरिका में जा कर नौकरी पाने के मौके खत्म कर दिए हैं.

अमेरिका ने अपनी आईटी कंपनियों से कह दिया है कि  जहां भी दूसरे देशों से आए लोग काम कर रहे हैं उन्हें निकाल कर केवल अमेरिकियों को रखा जाए चाहे वे महंगे हों, आलसी हों या उतने योग्य न हों. यह ठीक वैसे ही है जैसे मुंबई में शिवसेना बीचबीच में फरमान जारी कर देती है कि महाराष्ट्र में टैक्सियां, आटो सिर्फ मराठी चलाएंगे, बिहारी या पंजाबी नहीं. शिवसेना का जन्म दक्षिण भारतीयों के खिलाफ बाल ठाकरे के गुस्से से हुआ था पर आज 40 साल बाद भी हाल वही है.

अमेरिका ने अपने पुराने दोस्त पाकिस्तान से हाथ खींचने की तैयारी कर ली है. भारत को इस पर खुश होने की जरूरत नहीं क्योंकि चीन उस की जगह लेने को तैयार है. भारत जल्दी ही नेपाल, भूटान, म्यांमार और पाकिस्तान में चीन की भारी मौजूदगी पाएगा. अगर चीन को कभी भारत को डराना हो तो उस के लिए यह बाएं हाथ का काम होगा और भारत अब 1962 की तरह अमेरिका के आगे बचाओबचाओ की गुहार भी न लगा सकेगा.

भारत की सरकार फिलहाल खुश है कि मुसलिम देशों के अमेरिका जाने वालों पर डोनाल्ड ट्रंप रोकटोक लगा रहे हैं पर, वह यह भूल रही है कि अमेरिका तो अपना बचाव चीन, रूस, मुसलिम देशों से कर सकता है क्योंकि वह अमीर है, बेहद अमीर.

चीन फिलहाल पाकिस्तान से गुजरता रेल व सड़क रास्ते बना रहा है ताकि चीनी माल खाड़ी के देशों में जल्दी पहुंच जाए. वहीं, इस रास्ते से चीनी टैंक भी पाकिस्तान के रास्ते पंजाब व राजस्थान पहुंच सकते हैं. चीन माउंट एवरैस्ट में छेद कर तिब्बत से नेपाल तक सुरंग का रास्ता बना रहा है ताकि इन देशों से लेनदेन बढ़ सके. वहीं, इस सुरंग से चीनी सैनिक भी आ सकते हैं.

ऐसे में भारत की हालत अजीब होगी. हम से तो अपना देश ही नहीं संभलता. देशरक्षा के नाम पर हम झंडा लहराते हैं, हल्ला मचाते हैं या सच दिखाने वाले

को देशद्रोही कह कर चुप करा देते हैं. अमेरिका की नई नीति, चीन का उस की जगह लेना, चीन को अपना दुश्मन बनाना हमें महंगा पड़ेगा. मंगोल मुगलों ने अरसे तक भारत पर राज किया है. क्या यह दोहराया जाएगा?

मैं बीवी के ऊपर लेट कर हमबिस्तरी करने पर भी जल्दी पस्त हो जाता हूं. क्या करूं.

सवाल
मैं 22 साल का हूं. फोरप्ले के बाद बीवी के ऊपर लेट कर हमबिस्तरी करने पर भी महज 30 सैकंड में मैं पस्त हो जाता हूं. इस नाकामी पर बीवी के ताने सुन कर खुदकुशी करने का मन करता है. मैं क्या करूं?

जवाब

तजरबे की कमी के चलते ऐसा हो रहा होगा. आप एक बार मामला निबटने के बाद फिर से कोशिश करें, तो दूसरी पारी ज्यादा देर तक टिकेगी और धीरेधीरे आप का हौसला बढ़ जाएगा. अगर फिर भी 30 सैकंड में इजाफा न हो, तो किसी माहिर डाक्टर से इलाज कराएं. नीमहकीमों से कतई न मिलें.

देखें माधुरी दीक्षित की पहली मराठी फिल्म का फर्स्ट लुक

बौलीवुड की सदाबहार अभिनेत्री माधुरी दीक्षित की पहली मराठी फिल्म ‘बकेट लिस्ट’ का पहला लुक जारी हो गया है जिसमें वह साड़ी में बेहद सादगी भरे अंदाज में नजर आ रही हैं. बता दें, माधुरी ने खुद अपने ट्विटर पर इस फिल्म के फर्स्ट लुक को शेयर किया है. इस फिल्म के पोस्टर में वह काफी सिंपल लुक में नजर आ रही हैं और हमेशा की तरह काफी खूबसूरत लग रही हैं.

माधुरी ने रविवार को ट्विटर पर यह लुक साझा किया. पोस्टर में वह हरे रंग की पारंपरिक साड़ी और मंगलसूत्र पहने और माथे पर लाल बिंदी सजाए नजर आ रही हैं. उन्होंने अपने बाल बांध रखे हैं. बेहद कम मेकअप में माधुरी का यह लुक कुछ हद तक फिल्म ‘इंग्लिश विंग्लिश’ में श्रीदेवी के लुक की याद दिलाता है. माधुरी की इस फिल्म का निर्देशन तेजस प्रभा विजय देओस्कर कर रहे हैं.

माधुरी ने कहा, “यह हर घर ही कहानी है, लेकिन इसमें कुछ खास भी है. यह न केवल आपको उम्मीद और प्रेरणा देगी बल्कि आपको अपने जीवन को वास्तविक अंदाज में जीने के लिए भी प्रोत्साहित करेगी.”

बता दें, श्रीदेवी ने फिल्म इंग्लिश-विंग्लिश में काफी सिंपल हाउसवाइफ का किरदार निभाया था जिसमें उन्हें इंग्लिश नहीं आती थी और इस वजह से उन्होंने सबसे छुप कर इंग्लिश सीखी थी, लेकिन माधुरी की इस फिल्म के बारे में अभी तक ज्यादा जानकारी नहीं मिली है. खैर यह देखना दिलचस्प होगा कि मराठी फिल्म में डेब्यू करने जा रहीं माधुरी इस फिल्म से दर्शकों के दिलों पर अपना जादू चला पाती हैं या नहीं.

अमीषा पटेल की तस्वीर पर बोले लोग, ‘पौर्नस्टार बन जाओ’

बौलीवुड की बहुत-सी ऐसी एक्ट्रेस हैं, जिन्होंने फिल्म इंडस्ट्री की लाइम लाइट से काफी दूरी बना ली हैं ऐसी ही एक बोल्ड एक्ट्रेस है अमीषा पटेल. बौलीवुड अभिनेत्री अमीषा पटेल भले ही काफी समय से फिल्मों से दूर हैं लेकिन समय समय पर वे अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर करती रहती हैं. हाल ही में अमीषा पटेल ने सोशल मीडिया पर अपनी बेहद हौट एण्ड सेक्सी तस्वीर पोस्ट की है. जिसे लेकर सोशल मीडिया यूजर्स उन्हें ट्रोल कर रहे हैं. इस तस्वीर में अमीषा ने ब्लैक कलर का सेक्सी आउटफिट पहना हुआ है.

अमीषा इस आउटफिट में काफी यंग भी लग रही है. उनके कातिलाना अंदाज ने तो तस्वीर में चार-चांद लगा दी है. वह इस उम्र में भी कितनी हौट और ग्लैमरस है, इसका अंदाजा उनकी इस तस्वीर से लगाया जा सकता है. इस फोटो को देखकर कोई बी नही कह सकता कि अमीषा 42 की हैं, क्योंकि वह इस फोटो में अपनी हौटनेस और बोल्ड अवतार से 26 साल की हिरोईनों को भी मात दे रही हैं.

फैंस जहां अमीषा की इन तस्वीरों की तारीफें करते नहीं थक रहे हैं वहीं ऐसे सोशल मीडिया यूजर्स की भी कमी नहीं है जो उनके इस तस्वीर पर बेहद भद्दे कमेंट्स कर रहे हैं. कुछ यूजर्स ने तो उन्हें कमेंट बौक्स में पौर्नस्टार बनने की भी सलाह दे डाली है. भद्दे कमेंट्स का सिलसिला यहीं नहीं रुका. कुछ यूजर्स ने तो ऐसे कमेंट्स भी किए हैं जिनके बारे में यहां जिक्र नहीं किया जा सकता है.

खैर काफी समय से फिल्मों से दूर अमीषा को उनके फैंस फिल्मों में देखने के लिए काफी बेसब्र हैं. हालांकि अमीषा भी उनकी इस बेसब्री को समझती हैं और अक्सर सोशल मीडिया पर अपनी खूबसूरत तस्वीरें साझा करती रहती हैं.

अमीषा पटेल फिल्मी दुनिया की सबसे ज्यादा मासूम फेस रखने वाली एक्ट्रेस हैं. उन्होंने फिल्म कहो ना प्यार है से अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की थी. इस फिल्म में रितिक रोशन उनके साथ थे. यह फिल्म काफी बड़ी हिट भी हुई.

घूमर गाने में नहीं दिखेगी दीपिका पादुकोण की कमर

संजय लीला भंसाली के निर्देशन में बनी फिल्म ‘पद्मावत’ में महारानी पद्मावती की भूमिका निभा रहीं एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण के डांस ‘घूमर’ में बड़ा बदलाव किया गया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक गाने के जिन हिस्सों में दीपिका की कमर दिख रही है उसे कम्पयूटर ग्राफिक्स के जरिए छिपाया गया है. दरअसल, जिन हिस्सों में दीपिका की कमर उनके घाघरे से दिख रही है उन्हें महारानी पद्मावती की छवि के विपरीत पाया गया है, जिसके बाद इस गाने में जरूरी बदलाव करने की बात कही गई थी.

एक खबर के मुताबिक सेंसर बोर्ड के सामने जब फिल्म की स्क्रीनिंग की गई तब गाने में ये बदलाव करने की बात बोर्ड के द्वारा कही गई. सूत्रों के मुताबिक केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) की जांच कमेटी ने फिल्म के प्रोड्यूसर्स से ‘घूमर’ गाने में मौजूद उन सभी शौट्स को हटाने की मांग की थी, जिनमें दीपिका की कमर दिख रही थी. हालांकि इस तरह की एडिटिंग से गाने की कौरियोग्राफी बिगड़ जाएगी, इसलिए डायरेक्टर ने दीपिका की बेली को कम्प्यूटर ग्राफिक्स के जरिए छिपाने को प्राथमिकता दी.’

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सेंसर बोर्ड की ओर से सुझाए गए जरूरी बदलाव करने के बाद निर्माताओं ने फिल्म के अंतिम स्वरूप को जमा करा दिया है, लेकिन ‘पद्मावत’ को अभी तक सेंसर बोर्ड की ओर से सर्टिफिकेट जारी नहीं किया गया है. सूत्रों के मुताबिक फिल्म की स्क्रीनिंग और इसे लेकर चर्चा शाम पांच बजे से रात दो बजे तक हुई थी. सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी वहां मौजूद थे और बड़े इतिहासकार भी इस स्क्रीनिंग में शामिल हुए थे. बोर्ड के सदस्यों को इस फिल्म की कहानी में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं दिखा, उन्होंने केवल कुछ छोटे बदलाव करने की सलाह दी.

‘पद्मावत’ के निर्माताओं ने जरूरी बदलाव करते हुए फिल्म के अंतिम स्वरूप को सेंसर बोर्ड को सौंप दिया है, हालांकि इसे अभी बोर्ड की ओर से सर्टिफिकेट नहीं मिला है. पहले कहा जा रहा था कि फिल्म में 300 कट लगाने की बात सेंसर बोर्ड ने कही है, लेकिन इस खबर का खंडन खुद प्रसून जोशी ने कर दिया. उन्होंने कहा कि निर्माताओं ने पांच बदलावों के साथ फिल्म के अंतिम स्वरूप को जमा करा दिया है. फिल्म पद्मावत 25 जनवरी को रिलीज होगी.

उत्तर प्रदेश में रीलीज होगी फिल्म

इसी बीच निर्देशक संजय लीला भंसाली की फिल्‍म ‘पद्मावत’ के लिए एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है. बीजेपी शासित गुजरात में इस फिल्‍म को न दिखाए जाने के फैसले के ठीक एक दिन बाद खबर आई कि इस फिल्‍म को उत्तर प्रदेश में ग्रीन सिग्नल मिल गया है. रिपोर्ट्स की मानें तो योगी आदित्‍यनाथ की उत्तर प्रदेश सरकार ने इस फिल्‍म को उत्‍तर प्रदेश में रिलीज होने पर हामी भर दी है. सेट्रल बोर्ड औफ फिल्‍म सर्टिफिकेशन (सेंसर बोर्ड) ने ‘पद्मावत’ को सर्टिफिकेट दे दिया है और अब यह फिल्‍म 25 जनवरी को रिलीज होने वाली है.

गोवा में भी मिल चुकी है हरी झंडी

गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर का कहना है कि अगर सेंसर बोर्ड ने ‘पद्मावत’ को प्रमाणित कर दिया है तो गोवा सरकार को राज्य में फिल्म की रिलीज को लेकर कोई आपत्ति नहीं है. पर्रिकर ने कहा, “यदि उनके पास सेंसर प्रमाण-पत्र है, तो हमें कोई आपत्ति नहीं है. यदि कानून-व्यवस्था का कोई मुद्दा है, तो हम इसे देख लेंगे.” उन्होंने कहा, “अब तक, हमें फिल्म रिलीज होने की कोई सूचना नहीं मिली है. यदि इसके पास सेंसर प्रमाणपत्र है तो हम इसे नहीं रोक रहे.” उन्होंने कहा, “यदि वे कुछ संशोधनों के साथ सेंसर प्रमाणपत्र के साथ आते हैं, तो हमें इसमें हस्तक्षेप का कोई बड़ा कारण नहीं दिख रहा है.”

पाकिस्तान में हुकूमत के खिलाफ गुस्से की वजह

कसूर फिर से एक मासूम के साथ दरिंदगी को लेकर विवाद में है. सात साल की जैनब के साथ दुष्कर्म और फिर उसके कत्ल ने बदसूरत तस्वीर फिर से पेश की है. बीते मंगलवार को जैनब लापता हुई थी. ट्यूशन के लिए जाते वक्त रास्ते से उसे अगवा किया गया था, और बुधवार को उसकी लाश बेहद दर्दनाक हालत में कचरे के ढेर से बरामद हुई.

साल 2015 में ही इस इलाके में चाइल्ड पोर्नोग्राफी से जुड़े एक नेटवर्क का पता चला था, जिसके ब्योरे भयानक थे. वह नेटवर्क कई वर्षो से कसूर जिले में सक्रिय था, और उसने इलाके के कई मासूमों को अपनी हवस का शिकार बनाया था. उस मामले के खुलासे के बाद भी बड़े पैमाने पर जन-आक्रोश दिखा था, बावजूद इसके पाकिस्तान का क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम सुस्त बना रहा.

जैनब के अपहरण और बलात्कार से पहले कसूर सिटी के दो किलोमीटर के दायरे में कम से कम 12 ऐसी ही घटनाएं पिछले दो साल के भीतर घटीं, मगर उनमें से एक भी मामले को अब तक सुलझाया नहीं जा सका है. मगर इस बार अवाम का गुस्सा पंजाब सूबे की सड़कों पर दिख रहा है. पिछले दो दिनों से यहां-वहां की सड़कों पर दंगे-से हालात हैं. आक्रोशित भीड़ पर पुलिस की फायरिंग में दो लोगों की जान भी गई है. इससे कोई मतलब नहीं कि दरिंदगी का शिकार बन रहे बच्चों का वास्ता समाज के किस तबके से है, उनके साथ हो रहे अपराध काफी बर्बर सूरत अख्तियार करने लगे हैं.

पाकिस्तान में हुकूमत के खिलाफ लोगों, खासकर नौजवानों में जो गुस्सा है, वह दरअसल अपने नागरिकों की हिफाजत के प्रति सरकारी बेरुखी से ही उपजा है. मुल्क में आपराधिक वारदात की तफ्तीश का स्तर इतना ऊंचा नहीं कि वह उसे किसी अंजाम तक पहुंचा सके, यहां तक कि ज्यादती के शिकार खौफजदा बच्चों से किस संजीदगी से पूछताछ होनी चाहिए, इसकी सलाहीयत भी पुलिस में नहीं दिखती.

इसलिए समाज के दरिंदों से निपटने के लिए पाक के क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम की खामियों को फौरन दूर किया जाना चाहिए. जनता के बीच के ही इन भेड़ियों को सड़क पर छुट्टा घूमने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए.

पुश्तैनी धंधे की जगह नौकरी

कहने को तो यह एक कमउम्र छात्र द्वारा पढा़ई में नाकाम रहने पर खुदकुशी जैसा बुजदिलीभरा कदम उठाने की नादानी है लेकिन इस में एक छटपटाहट और अहम संदेश भी है जिसे अगर वक्त रहते नहीं समझा गया तो कई और हर्ष बदलाव की राह में यों ही भटके नजर आ सकते हैं.

भोपाल के 52 क्वार्टर्स, पंचशील नगर में रहने वाले 15 वर्षीय  हर्ष ने 20 जून को खुदकुशी कर ली. वजह थी 9वीं की कक्षा में लगातार फेल होना. इस पर उस के मांबाप आएदिन उसे नसीहत दिया करते थे जो उन का हक भी था और जिम्मेदारी भी. हालांकि इस बात का उन्हें कतई अंदाजा नहीं था कि हर्ष उन की डांटफटकार और समझाइश को इस तरह लेगा.

हर्ष के पिता सुनील कुमार पेशे से ड्राइवर हैं. उन्हें परिवार के गुजारे लायक ही आमदनी हो पाती है. सुनील की ख्वाहिश थी कि उन के बेटे पढ़लिख कर अच्छी पगार वाली नौकरी कर इज्जत की जिंदगी जिएं. इस के लिए वे बेटों की पढ़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ते थे. अपनी यह ख्वाहिश वे बेटों पर जाहिर भी कर चुके थे कि उन्हें ड्राइवरी जैसा छोटा काम नहीं करना है जिस में न इज्जत है न खास पैसा.

यह बात सुनील को वक्त रहते समझ आ गई थी कि अगर बेटों की जिंदगी बनानी है तो उन्हें बेहतर शिक्षा दिलानी जरूरी है. खुद पर जो गुजरी, उस के शिकार बेटे न हों, इस बाबत वे अकसर तीनों बेटों को पढ़ाईलिखाई की अहमियत बताया करते थे. पर सुनील को यह अंदाजा नहीं था कि मंझला बेटा हर्ष उन की उम्मीदों और नसीहतों के बोझ तले दब कर मर जाएगा.

छटपटाहट छुटकारे की

सामाजिक बदलाव का यह वह दौर है जिस में ब्राह्मणों द्वारा बनाई वर्ण व्यवस्था खत्म नहीं हो रही, बल्कि नईनई शक्लों में सामने आ रही हैं. समाज और देश में ऊंची जाति वालों की पूछपरख और दबदबा बरकरार है लेकिन छोटी जाति वालों को भी थोड़ाबहुत पूछापरखा जाता है जब वे पढ़लिख कर पैसा कमाने लगते हैं और अच्छी पगार वाली नौकरी हासिल कर लेते हैं.

इन छोटी जाति वालों में पिछड़ों की तादाद ज्यादा है. वे अब तक पुश्तैनी धंधों के सहारे पेट पाल रहे थे, मसलन बढ़ई या लोहार यानी लकड़ी या लोहे का काम. नाई जाति के लोगों का हजामत का काम करना था. कुशवाहा या काछी जमीन वालों के खेतबगीचों में नौकरी करते थे. धोबी कपड़े धो रहे थे और यादव दूध व मवेशियों का धंधा कर रहे थे.

हाल के समय तक हर काम जाति के हिसाब से ही हो रहा था जिस में नई पीढ़ी, पुश्तैनी धंधा कर गुजर कर रही थी. इस दौरान इकलौती बात यह हुई कि हर स्तर पर पढ़ाईलिखाई ने जोर पड़ा. नतीजतन, थोक में बच्चे स्कूल की तरफ भेजे जाने लगे. जो पढ़ गए वे मिसाल बन गए यानी नौकरी में लग कर ऐशोआराम की जिंदगी जीने लगे. जो नहीं पढ़ पाए वे वापस अपने पुश्तैनी धंधों में लग गए.

इस बदलाव में अच्छी बात यह भी हुई कि जाति की बिना पर चलते पुश्तैनी धंधों की तरफ लौटने वालों की तादाद काफी कम रही. अधिकतर नौजवानों ने पढ़ाईलिखाई को तवज्जुह दी क्योंकि यह उन्हें दिखने भी लगा था और समझ भी आने लगा था कि उन के बापदादों की कोई खास इज्जत नहीं थी जो हाड़तोड़ मेहनत कर गुजारे लायक कमा पाते थे.

यह तबका, दरअसल, पिछड़ी जातियों का है जो आजादी के बाद तक पुश्तैनी धंधा ही करता रहा था. इन जातियों के लोगों से दलितों की तरह छुआछूत या जाति की बिना पर ज्यादा अत्याचार नहीं किया जाता था. इन्हें अछूत जाति वालों की तरह दुत्कारा व लतियाआ नहीं जाता था. लेकिन इस का यह मतलब भी नहीं कि इन्हें इज्जत देते हुए बराबरी से ऊंची जाति वाले अपने साथ में बैठालते थे.

चूंकि इन का पुश्तैनी धंधा मैला ढोने या चमड़े के सामान बनाने का नहीं था, इसलिए इन्हें मंदिरों में जाने से भी नहीं रोका जाता था. इस की दूसरी

अहम वजह यह थी कि इन के पास देवीदेवताओं की मूर्तियों के सामने चढ़ावे लायक पैसा होता था. इतना जरूर था कि गांवदेहातों में ये अगड़ों की बराबरी से मकान बना कर नहीं रह सकते थे. फिर भी हर तरह से इन की हैसियत थी शूद्रों जैसी ही.

इस बदहाली को इस तबके की हर पीढ़ी ने समझा और धीरेधीरे पुश्तैनी ध्ांधों से किनारा करना शुरू कर दिया. 60-70 के दशक तक पिछड़ी जातियों के बच्चे 5वीं-8वीं तक पढ़ कर छोटीमोटी सरकारी नौकरियों में आने लगे थे पर इन की तादाद बहुत ज्यादा नहीं थी. लेकिन जितनी भी थी उस से दूसरों ने यह सबक तो ले ही लिया कि अगर थोड़ी और मेहनत कर ऊंची जाति वालों के बराबर पढ़ लिया जाए तो ग्रेजुएट हो कर गाड़ी और साहबी वाली नहीं, तो क्लर्की तो मिल ही सकती है. इस वक्त में इन जातियों की गिनती आरक्षण की हैसियत से सामान्य जाति में ही होती थी.

जाहिर है इन की टक्कर सामान्य जाति के छात्रों से थी जिन के पास पढ़ाईलिखाई का अच्छा घरेलू और सामाजिक माहौल होने के अलावा दूसरी तमाम सहूलियतें थीं. सियासी लिहाज से समझें तो मुलायम सिंह और लालू प्रसाद यादव जैसे पिछड़े पढ़लिख कर राजनीति में अच्छे मुकाम तक आए. इसी तरह 70 के दशक के बाद सरकारी नौकरियों में पिछड़ी जाति वालों की तादाद बढ़ी.

उठाया जोखिम, हुए कामयाब

पिछड़े तबके के छात्रों को दोहरी मेहनत करनी पड़ती थी. बच्चे पढ़ें, इस बात पर घर के बड़ेबूढ़ों को खास एतराज नहीं था पर उन पर पुश्तैनी धंधे में हाथ बंटाने का दबाव रहता था. कुछ तो पुश्तैनी धंधे से लगाव और कुछ नौकरी की गारंटी न होने का जोखिम इस की वजहें थीं.

पीढ़ीदरपीढ़ी और दशकदरदशक पिछडे़ तबके के लोगों को नौकरियां रास आने लगीं. इसे कई मामलों से आसानी से समझा जा सकता है. विदिशा के तोपपुरा महल्ले में रहने वाले नारायण सेन की हजामत की दुकान बजरिया इलाके में थी. उन के तीनों बेटे स्कूल गए पर सुबहशाम उन्हें पिता के साथ दुकान पर ग्राहकों की दाढ़ी बनानी पड़ती थी. इस से उन्हें पढ़ने का वक्त कम मिलता था.

इस के बाद भी 2 बेटे ग्रेजुएट हो गए, एक को नौकरी मिल गई. दूसरे को नहीं मिली तो उस ने अपनी दुकान में कुछ पैसा लगा कर उसे चमका दिया और हेयर कटिंग सैलून का बोर्ड लगा दिया. सीताराम नाम के जिस बेटे ने दुकान संभाली उस की पढ़ेलखे होने के चलते पूछपरख भी थी. लिहाजा, उस ने पिता  से ज्यादा पैसा कमाना शुरू कर दिया.

दूसरे बेटे ओमप्रकाश को सरकारी नौकरी मिली तो वह रिश्तेदारी और समाज में साहब कहलाने लगा. उस ने अपने दोनों बच्चों को कौन्वैंट स्कूल में दाखिला दिलाया जिस से वे और पढ़लिख कर उस से भी अच्छी नौकरी हासिल करें. छोटे भाई की देखादेखी सीताराम ने भी तय कर लिया कि वह अपने बच्चों से यह पुश्तैनी धंधा नहीं करवाएगा, बल्कि पढ़ालिखा कर बड़ा आदमी बनाएगा.

इस की वजह यह थी कि नौकरी में इज्जत और पैसा दोनों हैं. खुद ओमप्रकाश मानता है कि जब उस ने सरकारी दफ्तर में नौकरी करनी शुरू की तो कुछ साथी मजाक में और कुछ सचमुच में नाई जाति का होने को ले कर ताना मारा करते थे, लेकिन धीरेधीरे सब ठीक हो गया.

अब इन दोनों के चारों बच्चे जिन में एक लड़की भी है, इंजीनियर हैं. इन बच्चों को नहीं मालूम कि उन के दादा ने कैसी जिंदगी जी और हाथ में लोगों की दाढ़ी के कटे बाल ले कर घर चलाया. ओमप्रकाश कहता है कि जब मैं अपने बच्चों को बताता हूं कि कैसे हजामत बनाबना कर और फिर पढ़ कर हम एक बेहतर मुकाम तक पहुंचे तो उन्हें हैरानी होती है. ओमप्रकाश अब 55 साल का हो कर साहब हो गया है और उस के पास ठीकठाक पैसा व जायदाद है जिसे वह अपनी पूछपरख की बड़ी वजह मानता है.

अब इन दोनों भाइयों को एक नई चिंता यह लग गई है कि अब मुकम्मल पढ़ाईलिखाई के बाद भी नातीपोतों को अच्छी नौकरी नहीं मिलना क्योंकि पिछड़ी जातियों के आरक्षित कोटे का कट औफ सामान्य जाति के बराबर जाने लगा है. नई पीढ़ी उन की तरह पुश्तैनी धंधे की तरफ किसी भी शर्त पर नहीं लौटने वाली. लिहाजा, उस पर पढ़ाई का दबाव सुरसा के मुंह की तरह बढ़ रहा है.

घर और घाट के बीच

एक सीताराम या ओमप्रकाश के ही नहीं, बल्कि करोड़ों पिछड़ी जाति वालों के बच्चे नहीं जानते कि उन के दादापरदादा कौन सा धंधा करते थे. इन बच्चों की नजर और मकसद दोनों नौकरियां हैं. इन्हें यह भी समझ आ गया है कि अगर अव्वल नहीं आए तो नौकरी नहीं मिलेगी. और तब, ये घर के रहेंगे, न घाट के.

नतीजतन, इन बच्चों पर उन के मांबाप की उम्मीदों और नसीहतों का दबाव बढ़ रहा है. इसलिए वे तनाव में जी रहे हैं. तमाम बड़े और नामी स्कूलों में आधी तादाद पिछड़े वर्ग के छात्रों की है. मैडिकल, इंजीनियरिंग और मलाईदार सरकारी नौकरियों में भी ये तकरीबन 35 फीसदी हैं, लेकिन अब मुश्किलें पेश आने लगी हैं.

रेलवे में एक इंजीनियर सुरेश विश्वकर्मा की मानें तो मंडल कमीशन लागू होने के बाद पिछड़ों को धड़ाधड़ नौकरियां आरक्षण के चलते मिली थीं. पर अब कंपीटिशन बहुत बढ़ गया है जिस में बने रहने के लिए हमारे बच्चों को जरूरत से ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है. हम समाज की मुख्यधारा में आ गए हैं पर इस में बने रहने के लिए जरूरी है कि हमारे बच्चे हम से भी बेहतर करें.

सुरेश का यह भी कहना है कि अगर हमारे बच्चों को अच्छी नौकरी नहीं मिली तो उन की हालत जाति की बिना पर बापदादों से बदतर हो जाएगी. उन के पास तो अपने पुश्तैनी धंधे का हुनर था पर इन के पास वह नहीं है. हमारे पास सवर्णों सरीखी जायदाद भी नहीं है. हमारा कमाया एक हद तक ही इन का साथ दे पाएगा.

बच्चों की जबानी

भोपाल के एक कौन्वैंट स्कूल में पढ़ रही 11वीं की छात्रा नेहा का कहना है कि वह देश के किसी बड़े इंस्टिट्यूट से एमबीए कर किसी अच्छी कंपनी में तगड़ी पगार वाली नौकरी पाना चाहती है और इस के लिए अभी से तैयारी कर रही है. नेहा साफ कहती है कि अब पिछडे़ वर्ग का आरक्षण नौकरी की गारंटी नहीं रहा और सरकार के पास भी देने के लिए नौकरियां नहीं हैं.

नेहा की तरह ही 12वीं के सुयश कुशवाह की ख्वाहिश सौफ्टवेयर इंजीनियर बन कर अमेरिका जाने की है. उस का डर यह है कि अगर पढ़ाई में अव्वल नहीं रहा तो वह कहीं का नहीं रह पाएगा.

पिछड़े वर्ग की ही भोपाल की एक प्रोफैसर का कहना है कि पिछड़े तबके के अधिकांश बच्चों का ख्वाब अब पुश्तैनी धंधा नहीं, बल्कि तगड़ी पगार वाली नौकरी है. उन की मंशा मुख्यधारा में जुड़ने की है और इस का रास्ता तगड़ी पगार वाली नौकरियों से हो कर ही जाता है. इस प्रोफैसर का मानना है कि यह ठीक है कि पिछड़े वर्ग में भी ऊंची जाति वाले, मसलन यादव, कुशवाह, साहू, नामदेव, ताम्रकार, किरार, लोधी और रिजर्वेशन वाले क्षत्रिय ज्यादा तादाद में बड़ी नौकरियों में आ रहे हैं लेकिन उन की देखादेखी उन से नीचे वाले भी पढ़ने के लिए आ रहे हैं.

दरअसल, इन बच्चों पर बदलाव का और पढ़ कर कुछ बन जाने का दबाव ज्यादा है, इसलिए वे ज्यादा तनाव में भी हैं. ये छात्र अगर पढ़ाई में खुद को जरा सा भी फिसड्डी महसूस करते हैं तो तनाव की गिरफ्त में आ जाते हैं और अब तो हर्ष की तरह खुदकुशी भी करने लगे हैं. पढ़ाईलिखाई में पिछड़ने पर जो छात्र खुदकुशी कर लेते हैं उन में, एक अंदाजे के मुताबिक, 50 फीसदी पिछड़ी जातियों के होते हैं. बिलाशक जमाना पिछड़ों का है. वे हर क्षेत्र में आगे आ रहे हैं. पर नई पीढ़ी को आगे बने रहने के लिए जो मशक्कत करनी पड़ रही है, वह बेहद महंगी भी है.

सोशल मीडिया कहीं बढ़ा न दे दूरियां

सोशल मीडिया के अधिक इस्तेमाल और घटती, वैवाहिक संतुष्टि के बीच सीधा संबंध है. सोशल मीडिया वैवाहिक जीवन की गुणवत्ता और प्रसन्नता को कम कर रहा है. इस से तलाक के मामले लगतार बढ़ रहे हैं.

कंप्यूटर्स इन ह्यूमन बिहेवियर नामक पत्रिका के एक अध्ययन के मुताबिक फेसबुक इस्तेमाल करने वालों की संख्या में 20 फीसदी की वार्षिक वृद्घि के साथ तलाक दर में 2.18 से 4.323 फीसदी तक की वृद्घि दर्ज की गई है.

सुनने में भले ही अजीब लगे पर यह सच है कि सोशल नैटवर्किंग साइट्स पर आप का व्यवहार आप के जीवनसाथी का दिल दुखा सकता है. यह बात बहुत से अध्ययनों में स्पष्ट हो चुकी है. रिश्तों के मनोविज्ञान में सोशल मीडिया की उलझनें अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगी हैं. अध्ययनों के मुताबिक, जो लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं करते वे अपनी वैवाहिक जिंदगी में 11 फीसदी तक अधिक प्रसन्न रहते हैं.

सोशल मीडिया किस तरह से रिश्तों को प्रभावित कर रहा है, यह बात हालफिलहाल की इन घटनाओं से स्पष्ट है-

दिल्ली की गीता कालोनी इलाके में एक युवक ने खुद को इसलिए गोली मार ली क्योंकि उसे शक था कि उस की बीवी का किसी पुलिस वाले के साथ अफेयर चल रहा है.

हसीन नाम के इस 32 वर्षीय युवक ने 14 जून की सुबह अपनी पत्नी का मोबाइल देखा तो उस में एक पुलिस वाले से की गई चैटिंग नजर आई. इसी बात पर दोनों के बीच झगड़ा हुआ. झगड़े के दौरान हसीन ने खुद को गोली मार कर खुदकुशी कर ली.

पुणे में 34 साल के आईटी प्रोफैशनल राकेश ने जनवरी में पत्नी की हत्या करने के बाद आत्महत्या कर ली. वजह बहुत छोटी सी थी. राकेश की पत्नी सोनाली ने पर्सनल चीजें व्हाट्सऐप पर शेयर की थीं.

सुसाइड नोट में राकेश ने इस बात का जिक्र किया था कि शादी के 6 वर्षों बाद भी उन की कोई संतान नहीं थी और इस के लिए दंपती का इलाज चल रहा था. पत्नी अपनी मैडिकल डिटेल्स सोशल मीडिया पर फ्रैंड्स और रिलेटिव्स से शेयर किया करती थी. इसी वजह से उन के बीच झगड़े होते रहते थे.

चंडीगढ़ की एक महिला ने तलाक का फैसला ले लिया क्योंकि उस का पति देररात तक व्हाट्सऐप पर ऐक्टिव रहता था. महिला ने डीएलएसए यानी डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विसेज अथौरिटी से इस संदर्भ में सहायता मांगी. महिला का कहना था कि वह अपने मांबाप के घर गई हुई थी. रात में पति से व्हाट्सऐप पर बातें कर वह सोने चली गई. फिर जब सुबह

उस ने व्हाट्सऐप पर पति का औनलाइन स्टेटस चैक किया तो पाया कि उस का पति देररात तक व्हाट्सऐप पर ऐक्टिव था. इसी आधार पर महिला ने शक जाहिर किया कि उस के पति का किसी महिला के साथ अफेयर चल रहा है.

कुछ ऐसा ही मामला है जब एक महिला अपने पति द्वारा नैटवर्किंग साइट्स पर कमैंट्स न किए जाने के कारण झगड़ पड़ी. दरअसल, उस के पति ने उस की नई अपलोड की गई फोटोज को लाइक नहीं किया था और न ही कोई कमैंट किया था. महिला का दावा है कि उस की सारी सहेलियों ने फोटोज लाइक किए सिवा उस के पति के.

सोशल मीडिया की बढ़ती घुसपैठ

एक समय था जब किसी को संदेश भेजने के लिए कबूतरों और पोस्टकार्डों का सहारा लेना पड़ता था. महीनों इंतजार के बाद कोई खैरखबर मिलती थी. आज सोशल मीडिया की बदौलत सात समंदर पार बैठे व्यक्ति को भी पलभर में लंबेलंबे संदेश भेजे जा सकते हैं, उस से बातें की जा सकती हैं.

सब से पहले 1995 में क्लासमेट्स डौट कौम नाम से स्कूलकालेज के लोगों को जोड़ने के लिए पहली सोशल साइट की शुरुआत हुई थी. बाद में 2004 में मार्क जुकरबर्ग द्वारा फेसबुक के ईजाद के बाद तो जैसे सोशल मीडिया क्षेत्र में क्रांति आ गई. इसे और भी ज्यादा बढ़ावा मिला जब मोबाइल फोन के जरिए घरघर में सोशल मीडिया ने अपनी पैठ बना ली. आज विश्व में करीब 200 से ज्यादा नैटवर्किंग साइट्स हैं जिन में फेसबुक, ट्विटर, औरकुट, माई स्पेस, लिंक्डइन, इंस्टाग्राम, फ्लिकर, व्हाट्सऐप आदि प्रमुख हैं.

आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2016 में जब पूरी दुनिया की आबादी 7.3 अरब थी तो 3.4 अरब से ज्यादा लोग इंटरनैट इस्तेमाल कर रहे थे. ऐक्टिव सोशल मीडिया यूजर्स की बात करें, तो यह संख्या 2.3 अरब से ज्यादा थी.

भारत में कुल आबादी का करीब 28.4 फीसदी यानी 37 करोड़ लोग इंटरनैट का प्रयोग कर रहे हैं. जिन में से 10.3 व्यक्ति ऐक्टिव यूजर्स हैं.

नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक, औनलाइन सक्रिय रहने वाले 42 फीसदी वयस्क एक से अधिक सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर व्यस्त रहते हैं.

एकतरह से सोशल मीडिया ने दुनिया मुट्ठी में कर ली है, मगर साथ ही यह रिश्तों में जहर घोलने का काम भी करने लगा है. इस के मनोवैज्ञानिक, शारीरिक, मानसिक प्रभाव खतरनाक साबित हो रहे हैं. जरमनी में हुए एक शोध के मुताबिक, सोशल मीडिया के कारण 35 फीसदी लोगों को रिलैक्स होने और सोने में परेशानी आती है जबकि 55 फीसदी लोग परेशान व चिंतित महसूस करते हैं.

मनोवैज्ञानिक असर

सोशल मीडिया का अधिक इस्तेमाल करने वालों में भावनात्मक समस्याएं पैदा हो जाती हैं. उन का जीवन मशीनी हो जाता है. ऐसे में पतिपत्नी एकदूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़ाव महसूस नहीं करते जबकि अंतरंग रिश्ते में भावनाएं प्रमुख भूमिका निभाती है.

ये समस्याएं तब और भी बढ़ जाती हैं जब पतिपत्नी या दोनों एकदूसरे के बजाय विभिन्न सोशल साइटों पर अधिक समय बिताने लगते हैं. इस से दोनों के बीच विश्वास का मुद्दा आ जाता है. उन्हें लगता है कि उन का जीवनसाथी उन से प्यार नहीं करता, उन की परवा नहीं करता या किसी और के साथ संबंध में है.

केरल स्थित बिशप हेबर कालेज में हुए एक शोध के मुताबिक, भारत में तलाक के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. पहले इस के सामाजिक और आर्थिक पहलू ही प्रमुख थे लेकिन आधुनिक जीवनशैली ने अब मनोवैज्ञानिक पहलू भी जोड़ दिया है.

इस संदर्भ में दिल्ली के बीएलके हौस्पिटल के मनोवैज्ञानिक डा. मनीष जैन कहते हैं, ‘‘आज लोग फेसबुक प्रोफाइल्स से आकर्षित हो कर दोस्त बना लेते हैं और झटपट शादी करने का फैसला ले लेते हैं. जो रिश्ता आकर्षण से शुरू होता है वह अकसर ईर्ष्या पर खत्म होता है. जब पति या पत्नी, दोनों में से किसी को लगता है कि उन का जीवनसाथी उन्हें नजरअंदाज कर रहा है तो वे एंग्जाइटी का शिकार हो जाते हैं.

असुरक्षा की भावना उन्हें कुछ ऐसे कदम उठाने को मजबूर कर देती है जो उन के वैवाहिक जीवन को टूटने के कगार पर ले जाते हैं. वे दूसरे पुरुषों

या महिलाओं से साइबर रिलेशन विकसित कर लेते हैं ताकि वे अपने अकेलेपन को दूर कर सकें. इन वर्चुअल रिश्तों का प्रभाव वास्तविक रिश्तों पर पड़ता है जो आखिरकार उन्हें तलाक की ओर ले जाता है.’’

फैमिली ला फर्म मैकिनले इरविन के अध्ययन के मुताबिक, 3 में से 1 शादी औनलाइन अफेयर्स, फेसबुक ऐक्टिविटीज आदि के कारण टूट रही हैं. इस अध्ययन में ऐसी कई बातें निकल कर आई हैं जो सोशल मीडिया की वजह से रिश्तों के प्रभावित होने की वजह दर्शाती हैं.

विवादों की जड़ :  4 में से 1 विवाहित व्यक्ति ने स्वीकार किया कि हफ्ते में 1 दिन जीवनसाथी से उन की बहस इस बात पर होती है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल कितना किया जाना चाहिए. 17 फीसदी ने कहा कि उन का अपने जीवनसाथी के संग रोज सोशल मीडिया ऐक्टिविटीज को ले कर झगड़ा होता है. 58 फीसदी लोगों ने स्वीकार किया कि वे अपने जीवनसाथी का पासवर्ड जानते हैं जबकि इस बात की खबर जीवनसाथी को नहीं है.

ईर्ष्या का गढ़ :  एक तरफ तो लोग सोशल मीडिया पर बेमतलब के अपडेट्स करते रहते हैं, दूसरी ओर यह ईर्ष्या और वैमनस्य की वजह भी बनता जा रहा है. किसी और को किए गए कमैंट्स और लाइक्स कब आप के जीवनसाथी के दिल में ईर्ष्या की आग लगा दें, कोई नहीं जानता. अध्ययन में मौजूद 10 फीसदी से ज्यादा लोगों ने स्वीकारा कि फेसबुक ईर्ष्या और मुसीबतों का स्रोत है. 15 फीसदी लोगों ने माना कि सोशल मीडिया उन की वैवाहिक जिंदगी की शांति के लिए बहुत बड़ा खतरा है. 16 फीसदी लोगों ने फेसबुक की वजह से अपने रिश्ते में ईर्ष्या पैदा होने की बात स्वीकारी.

समय की बरबादी :  अध्ययन में पाया गया कि व्यक्ति सोशल मीडिया में क्या कर रहा है, इस से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि वह इस में कितना समय बिता रहा है. बरबाद किया जाने वाला यह व्यक्त ही दंपती के बीच विवाद की जड़ होता है.

शक का आधार :  3 में से 1 व्यक्ति अपने जीवनसाथी से सोशल मीडिया पासवर्ड छिपाता है, भले ही विवाह को सदा से ऐसा बंधन माना जाता रहा है जिस में कोई भी बात राज नहीं रखनी चाहिए, मगर करीब  33 फीसदी लोग अपने साथी की जासूसीभरी नजरों से छिपने के लिए पासवर्ड बताने से बचते हैं. 10 में से 1 व्यक्ति द्वारा अपने साथी से फेसबुक की कई खास पोस्ट्स और मैसेजेज आदि छिपाने की बात भी स्वीकारी गई है. करीब 8 से 10 फीसदी लोगों के गोपनीय सोशल मीडिया अकाउंट्स पाए गए.

बढ़ती है दरार :  25 फीसदी लोगों ने स्वीकारा कि सप्ताह में 1 दिन फेसबुक की वजह से पार्टनर के साथ उन की लड़ाई छिड़ जाती है. 5 में से 1 व्यक्ति के मन में अपने रिश्ते को ले कर संदेह पाया गया और इस की वजह फेसबुक पर पार्टनर द्वारा की जा रही कोई संदेहास्पद गतिविधि होती है.

दरअसल, जब भी व्यक्ति अपने साथी के सोशल मीडिया से जुड़े अकाउंट खंगालता है, कुछनकुछ गलत पोस्ट या फोटोज उसे नजर आ ही जाते हैं. ऐसे में वह अपने रिश्ते को ले कर असहज हो जाता है. उसे डर रहने लगता है कि कहीं उस का पार्टनर किसी और के करीब तो नहीं? यही डर और असहजता धीरेधीरे विवाद के रूप में प्रकट होने लगती है. किसी अंजान नंबर से आने वाले फोनकौल्स या मैसेजेज की वजह से घर में घमासान हो जाता है.

लाइक्स और कमैंट्स के चक्कर में समय बरबाद करने वाले व्यक्ति, जीवनसाथी या घर पर पूरा ध्यान नहीं दे पाते. ऐसा लोग वर्चुअल वर्ल्ड में तो लोकप्रिय रहते हैं मगर अपने जीवनसाथी और आसपास के लोगों के साथ उन के रिश्ते कमजोर पड़ने लगते हैं.

सोशल मीडिया से औनलाइन अफेयर्स होने के मौके बढ़ जाते हैं. ‘फेसबुक ऐंड योर मैरिज’ पुस्तक के लेखक जैसन क्राफ्सकी कहते हैं कि जब दंपती सोशल मीडिया साइट्स का प्रयोग करते हैं तो इतना ही काफी नहीं कि आप का इरादा अच्छा हो. वैसे भी, ज्यादातर अफेयर इसलिए शुरू नहीं होते कि आप ऐसा करना चाहते थे, बल्कि सोशल मीडिया द्वारा लोगों के सामने इस तरह के प्रलोभन रखे जाते हैं कि व्यक्ति अनायास ही उस रास्ते पर चल पड़ता है.

जरूरी है कि व्यक्ति अपने जीवन में संतुलन बना कर चले. कई मानों में सोशल मीडिया में ऐक्टिव रहना जरूरी हो जाता है. मगर यह भी ध्यान रखें कि यह वर्चुअल वर्ल्ड है, रियल नहीं. यदि हम इसे जरूरत से ज्यादा समय देंगे तो रियल रिलेशनशिप सैकंडरी बनने लगेगी, दूरियां बढ़ेंगी और झगड़े होंगे. बेहतर है कि शुरू से इस तरह बैलेंस बना कर चलें कि आप का जीवनसाथी आप की जिंदगी में सदा अपनी अहमियत महसूस करता/करती रहे.

तुम सिर्फ मेरी हो : प्यार और तकरार की कहानी

14 मई, 2017 की रात देवरिया जिले के थाना तलकुलहवा के गांव बघड़ा महुआरी का रहने वाला 42 साल का शरीफ अंसारी खाना खा कर लेटा था कि उस के मोबाइल फोन की घंटी बज उठी. उस ने मोबाइल उठा कर देखा तो नंबर जानापहचाना था. उस ने फोन रिसीव कर के बात की. उस के बाद उठ कर पत्नी से कहा, ‘‘मैं थोड़ी देर में आता हूं.’’

इतना कह कर शरीफ जिन कपड़ों में था, उन्हीं में घर से बाहर निकल गया. उस के जाने के बाद पीछेपीछे पत्नी जसीमा भी निकल गई. घर से निकलते समय जसीमा ने छोटे बेटे अजहरुद्दीन से वही कहा था, जो शरीफ ने घर से निकलते समय कहा था.

थोड़ी देर में लौट कर आने को कह कर गए पतिपत्नी पूरी रात लौट कर नहीं आए तो अब्बू की चिंता में अजहरुद्दीन और उस की पत्नी हसीना ने किसी तरह रात बिताई. सवेरा होते ही अजहरुद्दीन अब्बू की तलाश में निकल पड़ा. 8 बजे के करीब गांव से एक किलोमीटर दूर शाहपुर पुरैना नहर के पास शरीफ अंसारी की सिरकटी लाश मिली. इस के बाद बघड़ा गांव के दक्षिणी गंडक नदी के पास जसीमा की सिरकटी लाश मिली.

खबर पा कर अजहरुद्दीन शाहपुर पुरैना नहर पर पहुंचा तो वहां काफी भीड़ जमा थी. हत्यारों ने बड़ी बेरहमी से शरीफ की हत्या की थी. सिर काटने के साथ उस के दोनों हाथ भी काट कर अलग कर दिए थे. शरीफ की लाश से करीब 1 किलोमीटर दूर जसीमा की लाश पड़ी थी.

हत्यारे ने उस का भी सिर धड़ से अलग करने के साथ, उस का बायां हाथ, बायां वक्षस्थल और स्त्री अंग पर धारदार हथियार से वार किए थे. थोड़ी ही देर में इस हत्याकांड की खबर जंगल की आग की तरह पूरे इलाके में फैल गई थी.

जिस तरह से पतिपत्नी की हत्याएं की गई थीं, उस से साफ लग रहा था कि हत्यारे को मृतकों से काफी नफरत थी. सूचना पा कर शरीफ के सासससुर भी आ गए थे. दिल दहला देने वाली इस घटना की सूचना थाना तरकुलहवा के थानाप्रभारी राजाराम यादव को भी मिल चुकी थी.

सूचना मिलते ही वह भी सहयोगियों एसआई शैलेंद्र कुमार, भूपेंद्र सिंह, गुफरान अंसारी, वीरबहादुर सिंह, सिपाही राहुल सिंह, मनीष दुबे, प्रद्युम्न जायसवाल, रविशंकर श्रीवास्तव, कैलाशचंद्र यादव, दुर्गेश चौरसिया, श्यामनारायण पांडेय, देवव्रत यादव और अनुराग यादव के साथ घटनास्थल पर आ पहुंचे थे.

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चलने से पहले उन्होंने इस घटना की सूचना एसपी का कार्यभार देख रहे एडीशनल एसपी चिरंजीवनाथ सिन्हा और सीओ (नगर) अजय सिंह को दे दी थी, इसलिए थोड़ी ही देर में ये अधिकारी भी घटनास्थल पर आ गए थे. जब इस बात की जानकारी गोरखपुर जोन के आईजी मोहित अग्रवाल और डीआईजी नीलाब्जा चौधरी को हुई तो ये अधिकारी भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

घटनास्थल के निरीक्षण के बाद पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि घटना को कम से कम 3 लोगों ने मिल कर अंजाम दिया होगा. लेकिन अहम सवाल यह था कि हत्यारों ने इस तरह जघन्य तरीके से ये हत्याएं क्यों की थीं? आखिर हत्यारों से मृतकों की ऐसी क्या दुश्मनी थी?

पुलिस ने मृतकों के बेटे अजहरुद्दीन से उस की किसी से दुश्मनी के बारे में पूछा तो उस ने किसी से दुश्मनी होने से साफ मना कर दिया. पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई कर दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया.

इस के बाद थाने लौट कर राजाराम यादव ने मृतकों के छोटे बेटे अजहरुद्दीन की ओर से अपराध संख्या 106/2017 पर भादंवि की धरा 302 एवं 4/32 आर्म्स एक्ट के तहत अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर आगे की जांच शुरू कर दी.

हत्यारों को पकड़ने के लिए चिरंजीवनाथ सिन्हा ने पुलिस की 3 टीमें गठित कीं. एक टीम की कमान उन्होंने खुद संभाली तो दूसरी टीम की कमान राजाराम यादव को सौंपी. तीसरी टीम क्राइम ब्रांच की थी. उसी शाम देवरिया के एसपी के रूप में राजीव मल्होत्रा को भेजा गया.

पूछताछ में अजहरुद्दीन ने बताया था कि रात 12 बजे के करीब किसी का फोन आया था. फोन पर बात करने के बाद अब्बू थोड़ी देर में लौट आने की बात कह कर घर से निकल गए थे. अम्मी भी अब्बू के पीछेपीछे चली गई थीं. वह पूरी रात दोनों का इंतजार करता रहा, पर वे लौट कर नहीं आए. सुबह वह अम्मीअब्बू की तलाश में निकला तो उन की लाशें मिलीं.

फोन आने की जानकारी पा कर पुलिस ने मृतक शरीफ के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. घटना वाली रात 12 बजे के करीब उस के मोबाइल पर जो आखिरी फोन आया था, उस पर शरीफ की फोन करने वाले से करीब 1 मिनट बात हुई थी. पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया तो वह नंबर उसी गांव के रहने वाले अरविंद प्रसाद का निकला.

पूछताछ में पता चला कि अरविंद और शरीफ दोनों गहरे मित्र थे. जंगल में लकड़ी काटने दोनों एक साथ जाया करते थे. इस के अलावा अरविंद गांव के बाहर अंडे की दुकान लगाता था. अरविंद और उस के छोटे भाई का शरीफ के घर काफी आनाजाना था. इस का मतलब था, दोनों परिवारों में संबंध काफी मधुर थे.

पुलिस को अरविंद पर शक हुआ तो संदेह के आधार पर पुलिस उसे और उस के छोटे भाई को हिरासत में ले कर पूछताछ के लिए थाना तरकुलहवा ले आई. राजाराम यादव ने दोनों भाइयों से अलगअलग सख्ती से पूछताछ की. इस पूछताछ में अरविंद के भाई ने बताया कि अरविंद रात से ही काफी परेशान और बेचैन था. शायद उसी ने शरीफ और उस की पत्नी जसीमा की हत्या की है.

इस के बाद पुलिस और सख्त हो गई. इस के बावजूद अरविंद पुलिस को दाएंबाएं घुमाता रहा. लेकिन जब अरविंद को लगा कि पुलिस उसे छोड़ने वाली नहीं है तो उस ने शरीफ और उस की पत्नी जसीमा खातून की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने पुलिस को दोनों हत्याओं की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

करीब 35 साल का अरविंद प्रसाद जिला देवरिया के थाना तरकुलहवा के गांव बघड़ा महुआरी में रहता था. उस के पिता रामदास प्रसाद उर्फ गेंदा प्राइवेट नौकरी करते थे. भाईबहनों में अरविंद सब से बड़ा था. उसे कोई नौकरी नहीं मिली तो उस ने गांव के बाहर अंडे की दुकान खोल ली. इस से उस का खर्च आसानी से निकल जाता था.

अरविंद की गांव के ही रहने वाले शरीफ अंसारी से खूब पटती थी. शरीफ मेहनतमजदूरी कर के परिवार को पाल रहा था. शरीफ और अरविंद रात में जंगल से चोरी से लकडि़यां काट कर भी बेचते थे. अरविंद की यारी शरीफ से हुई तो यह यारी घर की दहलीज लांघ कर कमरे के अंदर तक पहुंच गई.

अरविंद शरीफ के घर बेरोकटोक आताजाता था. इसी आनेजाने में अरविंद का दिल शरीफ की पत्नी जसीमा खातून पर आ गया. शरीफ के कहीं चल जाने पर अरविंद घंटों उस के घर बैठ कर जसीमा से बातें करने के साथ हंसीमजाक भी किया करता था. जसीमा को यह सब बहुत अच्छा लगता था. इसी का नतीजा था कि 4 बच्चों की मां होने के बावजूद जसीमा उस के प्यार में कैद हो गई.

इस के बाद अरविंद अपनी कमाई जसीमा पर लुटाने लगा. दोनों अपने इस संबंध से खुश थे, लेकिन उन के इस अवैध संबंधों की खुशबू गांव में फैली तो बात शरीफ अंसारी तक पहुंच गई. शरीफ को यह बात बड़ी बुरी लगी. अरविंद उस का दोस्त था. लेकिन उस ने दोस्ती में दगा की थी. उस ने पत्नी को ही नहीं, अरविंद को भी आड़े हाथों लिया. इतना ही नहीं, गुस्से में उस ने अरविंद को कई थप्पड़ जड़ कर पत्नी से दूर रहने को कहा.

इस के बाद अरविंद शरीफ के घर जाने की कौन कहे, उधर देखना भी बंद कर दिया. इसी तरह 6-7 महीने बीत गए. इस बीच अरविंद न शरीफ से मिला और न ही उस के घर गया. लेकिन परपुरुष की आदी हो चुकी जसीमा के गांव के अन्य पुरुषों से नाजायज संबंध बन गए. अरविंद से यह बात छिपी नहीं रही. जसीमा की इस बेवफाई से अरविंद चिढ़ गया.

एक दिन अरविंद शरीफ की नजरें बचा कर जसीमा से उस के घर जा कर मिला. उस ने उसे समझाया कि वह जो कर रही है, ठीक नहीं कर रही है. वह सिर्फ उस की है. उसे कोई देखे या छुए, उसे अच्छा नहीं लगता. पर जसीमा ने उस की एक नहीं सुनी और उसे खुद से दूर रहने को कहा. यही नहीं, उस ने कहा कि अगर उस ने उस की बात नहीं मानी तो वह उस की पति से शिकायत कर देगी.

फिर क्या था, अरविंद और चिढ़ गया. उस ने जसीमा से बदला लेने का निश्चय कर लिया. इस के लिए उस ने उस के पति शरीफ को विश्वास में लिया और अपनी गलती के लिए माफी मांग ली. शरीफ ने सारे गिलेशिकवे भुला दिए और उसे माफ कर दिया.

इस के बाद दोनों पहले जैसे दोस्त बन गए. अरविंद के मन में क्या चल रहा है, शरीफ को पता नहीं था. एक तीर से 2 निशाने साधने वाली बात सोच कर अरविंद ने शरीफ से उस की पत्नी के गैरमर्दों से संबंध वाली बात बता दी.

पहले तो शरीफ ने उस की बात पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जल्दी ही जसीमा की सच्चाई उस के सामने आ गई. फिर तो उस ने जसीमा की जम कर खबर ली. लेकिन इस के बाद भी अरविंद अपने मकसद में कामयाब नहीं हुआ. उस ने दिल की बात जसीमा से कही तो उस ने उसे झिड़क कर भगा दिया.

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जसीमा का जवाब सुन कर अरविंद ठगा सा रह गया. उस के मना करने से अरविंद का दिल टूट गया. अब वह ईर्ष्या की आग में जलने लगा. इसी ईर्ष्या ने उस के दिल में नफरत के बीज बो दिए. इस का नतीजा यह निकला कि उस ने शरीफ और उस की पत्नी को सजा देने का मन बना लिया.

इस की वजह यह थी कि शरीफ द्वारा की गई बेइज्जती वह अभी तक भुला नहीं पाया था. जसीमा से तो वह नाराज था ही. नफरत की आग में जल रहे अरविंद ने दोनों को रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया.

अरविंद ने दोनों को सबक सिखाने की जो योजना बनाई, उस के अनुसार उस ने 14 मई, 2017 की रात 12 बजे शरीफ को फोन कर के शाहपुर पुरैना के जंगल में लकड़ी काटने के लिए बुलाया. शरीफ अजहरुद्दीन से थोड़ी देर में लौटने को कह कर घर से निकल गया.

अरविंद पूरी तैयारी के साथ आया था. उस के पास लकड़ी काटने वाला तेज धार वाला दाब था. थोड़ी देर में शरीफ उस के पास पहुंचा तो अरविंद ने उसे लकड़ी काटने के लिए पेड़ पर चढ़ने को कहा. शरीफ जैसे ही पेड़ पर चढ़ने के लिए आगे बढ़ा, पीछे से अरविंद ने पूरी ताकत से उस की गरदन पर दाब का वार कर दिया.

वार इतना जोरदार था कि उसी एक वार में शरीफ का सिर धड़ से कट कर अलग हो गया. बेइज्जती का बदला लेने के लिए अरविंद ने उस के दोनों हाथ और पैर काट कर अलग कर दिए. संयोग से तभी पति के पीछेपीछे जसीमा भी वहां पहुंच गई.

उसे देख कर अरविंद घबरा गया. पकड़े जाने के डर से उस ने उसी दाब से उसे भी मौत के घाट उतार दिया. इस के बाद पहचान छिपाने के लिए उस ने उस का भी सिर धड़ से काट कर 1 किलोमीटर दूर गंडक नदी में ले जा कर फेंक दिया. साक्ष्य मिटाने के लिए जसीमा की लाश को उस ने ले जा कर पुरैना नहर के पास फेंका. इस के बाद गंडक नदी में खून साफ कर के घर लौट आया.

पूछताछ के बाद पुलिस ने अरविंद को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. प्रेम और क्रोध में अंधे अरविंद ने जो किया, वह गलत था. अब उसे अपने किए पर पश्चाताप हो रहा है. लेकिन अब पछताने से क्या होगा? उस ने 2 लोगों की जान तो ले ही ली. अब उसे इस की सजा अवश्य मिलेगी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

चुनावों पर हावी होता धर्म

गुजरात और हिमाचल प्रदेश की विधानसभाओं के चुनाव जीत कर भारतीय जनता पार्टी ने साबित कर दिया है कि नोटबंदी और जीएसटी की चोटों के बावजूद देश को धर्मजनित पार्टी की ही प्राथमिकता है. 2014 में भारतीय जनता पार्टी को नरेंद्र मोदी ने भगवा झंडे पर लेकिन भगवा रंग के बगैर विकास व स्वच्छ सरकार बनाने के नाम पर जिताया था. पर 2017 के आतेआते इन दोनों वादों की कलई धुल गई और असल कट्टरवादी भाजपा सामने आ गई जिस में मंदिर, पूजापाठ, वर्णव्यवस्था, मुसलिम विरोध पहली जरूरतें हैं. जनता ने ऐसी ही पार्टी को सिर पर रखा हुआ है.

लोकतंत्र हो या राजतंत्र, आखिरकार शासकों को जनता की सहमति तो चाहिए ही होती है. जनता को नाराज कर के कोई भी शासक लंबे समय तक राज नहीं कर पाता. तानाशाह भी कुछ न कुछ ऐसा करते रहे हैं जिस से जनता को लगता रहे कि शासक असल में उसी का भला सोच रहा है.

गुजरात विधानसभा के चुनावों में राहुल गांधी ने जम कर नोटबंदी और जीएसटी पर तीर चलाए थे. अल्पेश ठाकोर, जिग्नेश मेवाणी और हार्दिक पटेल ने जातियों के साथ होने वाले भेदभाव व उन की आर्थिक दुर्दशा के सवाल उठाए थे. इन चारों को धर्म से लेनादेना न के बराबर था. पर इन की नहीं चली. भारतीय जनता पार्टी का धार्मिक तूफान सब को भगवाई रंग में भिगोता चला गया और वे चारों आज असहाय से खड़े हैं.

बस, आशा की किरण इस में है कि भगवाई भूकंप के गढ़ में 22 सालों बाद भारतीय जनता पार्टी को एक मजबूत टक्कर मिली है. इस से पहले कई विधानसभा और लोकसभा चुनावों में टोकनबाजी ही होती थी. कांग्रेस न के बराबर खड़ी होती थी, यह मान कर कि वह तो हारेगी ही. इस बार एकएक सीट के लिए भाजपा को लड़ना पड़ा है. जो

7 सीटों की बढ़त भाजपा को मिली है वह इतनी कम है कि चुनावी गिनती के समय कितनी ही सीटों पर ऐसा लगता था कि जनता ने कांग्रेस को ही वोट दिया है.

गुजरात का इलाका दशकों से कट्टर और कट्टर विरोधियों का गढ़ रहा है. एक तरफ यहां के ऊंची जातियों के लोग अपनेआप को धर्मश्रेष्ठ मनवाने की कोशिश करते हुए भक्ति रस में अपने को डुबोते रहे हैं तो दूसरी ओर वर्णव्यवस्था की बंदिशों को तोड़ने वाली कर्मठ जातियां धर्म के सहारे ही अपने वजूद को बचाने की कोशिश करती रही हैं. यहां के लोगों की अपनी जो भी समृद्धि है, उस के लिए वे कर्मठता को कम, पूजापाठ को ज्यादा श्रेय देते रहे हैं.

इसी को राजनीति में पहले रामधुन से भुनाया गया है और अब मंदिर वहीं बनाएंगे से. 2017 के चुनावों में राहुल गांधी समेत सभी नेताओं को राज्य के सभी मंदिरों में मत्थे टेकने पड़े. राज्य के बड़े कारखानों, व्यापारियों की मंडियों, बांधों, नहरों, बंदरगाहों की चर्चा कम रही. नरेंद्र मोदी ने खुद बुलेट ट्रेन की बात करनी बंद कर दी और राहुल गांधी कितने हिंदू हैं, इस पर चर्चा चलवा दी. यह गुजराती मानस के दिल को छूने वाली बात है जो दशकों से अपने से ऊंची जाति के पायदान पर खड़े होने के चक्कर में ज्यादा लगा रहता है बजाय सफल व्यापार को सरल बनवाने के.

यह व्यापारी वर्ग जम कर जीएसटी और नोटबंदी का विरोध कर रहा है पर वोट देते समय उसे फिर अपनी पहली प्राथमिकता नजर आ गई. नरेंद्र मोदी अपने राज्य में जीत गए, पर हां, 2012 के मुकाबले में 12 सीटों को हार कर, 2014 के लोकसभा चुनावों के आधार पर 65 विधानसभा क्षेत्रों में हार कर. पर जीत वे गए ही हैं और इसी के साथ जीएसटी व नोटबंदी भी जीत गई हैं.

इस जीतहार का अगले सालों पर असर पड़ेगा. राहुल गांधी अब टक्कर की पार्टी खड़ी कर सकेंगे. नरेंद्र मोदी को दूसरे राज्यों के चुनावों की खास तैयारी करनी होगी. अब विकास और स्वच्छ शासन की बातों का भरोसा कम रहेगा. चुनाव धर्म के नाम पर लड़े जाएंगे.

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