प्रदेश सरकार जिस तरह से धार्मिक प्रपंच का सहारा ले रही है, उस से बुनियादी मुद्दे पूरी तरह से हाशिए पर चले गए हैं. अयोध्या में दीवाली पूजन, चित्रकूट में मंदाकिनी नदी की आरती, आगरा में ताजमहल का विवाद, कांवड़ यात्रा पर फूल वर्षा, धार्मिक शहरों को प्रमुख पर्यटन क्षेत्र के रूप में प्रचार करना और मुख्यमंत्री के सरकारी आवास को गंगा जल से पवित्र कराना कुछ ऐसे प्रपंच हैं, जिन का प्रचार ज्यादा हो रहा है. सरकार बुनियादी मुद्दों पर भी केवल बातें ही कर रही है, पर विकास की किसी योजना को ले कर ठोस काम नहीं कर रही है.
अगर अयोध्या की बात करें, तो वहां के खर्च के संबंध में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कहना है कि अयोध्या का खर्च संतमहात्माओं ने किया. सरकार ने कोई खर्च नहीं किया.
यह बात किसी के गले उतरने वाली नहीं है. अयोध्या में दीवाली की तैयारी एक हफ्ता पहले से राजधानी लखनऊ के अफसर अपनी निगरानी में करा रहे थे. अखबारों में जो बड़ेबड़े इश्तिहार छपे थे, उन का खर्चा क्या किसी संतमहात्मा ने दिया था?
किसी भी शहर में सड़क, बिजली, पानी का इंतजाम करना ही वहां का विकास करना नहीं होता है, बल्कि लोगों को रोजगार मिले, बेरोजगारी कम हो, लोग कामधंधे में लगें, इस से ही समाज में अमनचैन आता है. सड़कें कितनी ही अच्छी बन जाएं, अगर रोजगार नहीं होगा तो लोग अपराध करेंगे. अयोध्या का सच दीवाली के दिन नहीं दिखा. आयोजन की भव्य चकाचौंध में वह सच कहीं खो गया था.
अयोध्या की दीवाली का कड़वा सच अगली सुबह तब दिखा, जब बच्चे घर में सब्जी बनाने के लिए जलाए गए दीयों में बचे तेल को एक जगह इकट्ठा कर रहे थे.
दरअसल, दीवाली की सुबह तो अयोध्या में रामराज होना चाहिए था, जहां किसी को कोई कष्ट नहीं होता. रामराज तभी सच हो सकता है, जब समाज का गरीब से गरीब आदमी खुशहाल नजर आए.
भाजपा के संस्थापक रहे पंडित दीनदयाल उपाध्याय की अंत्योदय की सोच में भी समाज का वही गरीब आदमी था. वे उस को ही खुशहाल बनाने का काम कर रहे थे. आज उस गरीब आदमी का सच दीयों से तेल इकट्ठा करता दिखता है. किसी भी सरकार के लिए इस से शर्म की बात और क्या हो सकती है कि समाज के गरीब आदमी का चेहरा ऐसा दिखता है.
आजादी के बाद से हर सरकार गरीबों की भलाई की ही बात करती है.
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आजादी के 70 साल बाद भी भारत का गरीब दीयों से तेल इकट्ठा करता दिखता है. गरीब इसलिए गरीब है, क्योंकि उस के पास काम नहीं है. देश में भीख मांगने वालों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है. हर जगह ऐसे लोग रोटी के एकएक टुकड़े के लिए जद्दोजेहद करते देखे जा सकते हैं.
अगर धार्मिक प्रपंच को छोड़ कर सरकारों ने बुनियादी सुविधाओं और रोजगार की दिशा में काम किया होता तो गरीबी रेखा से नीचे गुजरबसर करने वालों की तादाद लगातार बढ़ती नहीं.
सरकारी नीतियों से गरीबी रेखा के ऊपर और नीचे के लोग ही नहीं, बल्कि मध्यमवर्गीय परिवार भी गरीबी रेखा के करीब पहुंच गए हैं. बच्चे पढ़ रहे हैं, उन के पास कोई काम नहीं है. सरकारें भी दिखाने के लिए उन को ट्रेनिंग देने का काम करती हैं, पर इस से कितने नौजवानों को रोजगार मिला, यह देखने वाली बात है.
कौशल विकास योजना को ले कर पूरे देश में बड़े जोरशोर से काम हो रहा है. इस योजना के तहत ट्रेनिंग पाए लोगों में से कितनों को रोजगार से जोड़ा जा सका, इस का सच सामने रखना चाहिए. सरकारी आंकड़े पूरा सच नहीं दिखाते. ऐसे में सरकार को सामाजिक आंकड़ों को भी देखना चाहिए.
जिस अयोध्या के विकास के लिए पूरी सरकार एकजुट है, कम से कम वहां तो रामराज दिखना चाहिए. राम को आदर्श मानने वाले नेता क्या कभी रात में अपनी पहचान बदल कर अयोध्या की गलियों का सच देखने गए हैं? मंत्री के लिए अफसर रैड कारपेट बिछा कर सबकुछ ठीक होने का दावा हमेशा करते हैं. नेता की जिम्मेदारी होती है कि रैड कारपेट को हटा कर नीचे छिपे सच को देखे. संविधान ने इसीलिए उसे पढ़ेलिखे अफसर से भी ऊपर का दर्जा दिया है. कागज में धर्म की नगरी को पर्यटन स्थल का दर्जा देने से वहां का भला नहीं होने वाला.
अखिलेश यादव की सरकार के समय भी नैमिष और मिश्रिख को पर्यटन का दर्जा दिया गया था. सड़कें बनीं, बसें चलीं, इश्तिहार छपे, इस के बाद भी वहां के हालात नहीं बदले. आज भी वहां के लोगों के पास कोई रोजगार नहीं है.
सरकार की तमाम सुविधाएं मिलने के बावजूद भी कांवड़ यात्रा करने वाले रास्ते भर परेशान और लोगों से मदद मांगते दिखे. सरकार ने कांवड़ मार्ग पर पुष्प वर्षा का वादा किया, पर वे पुष्प कांवड़ यात्रा करने वालों के सफर को सुखद नहीं बना पाए. अगर पुष्प वर्षा से कांवड़ यात्रियों को सुविधा मिल जाती तो वे मदद क्यों मांगते दिखते?
धर्म के नाम पर जनता को बहुत समय तक बुनियादी मुद्दों से दूर नहीं रखा जा सकता है. जरूरत इस बात की है कि बेरोजगारों के लिए काम के मौके बढ़ाए जाएं. जब तक लोगों के लिए रोजगार नहीं होगा तब तक भुखमरी बनी रहेगी. न मजदूर खुश होगा और न किसान. वह ऐसे ही दीयों के बचे तेल से अपने घर की सब्जी बनाने के इंतजाम करता रहेगा. सरकार कितने भी किसानों के लोन माफ कर दे, कुछ ही दिनों में फिर से वही हालात बन जाएंगे.
धार्मिक प्रपंच में जुटे लोग इस बात को समझ लें कि अगर कोई भूखा है तो वह किसी भी तरह से धार्मिक प्रवचन न कर सकता है और न सुन सकता है.
जिस समय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दीप जला कर अयोध्या में खुशियों की दीवाली मना रहे थे, भूखे पेट रहने वालों की नजर उन दीयों पर रही होगी. वे सोच रहे होंगे कि दीए जल्दी से जल्दी बुझ जाएं, जिस से दीयों का तेल बचा रह सके. उन की खुशी दीयों के जलने में नहीं, उन के बुझने में थी. उन की भूख तो जलने वाले दीयों से नहीं, बुझे दीयों से बुझी, जिन से उन को सब्जी बनाने के लिए तेल मिल सका.
अयोध्या की ऐसी दीवाली के सच को समझ कर गरीब आदमी की खुशहाली से ही समाज में बदलाव होगा. भूखे पेट तो धर्म की चर्चा भी नहीं होती.
भीमा कोरेगांव 2 जगहों के नामों के मेल से बना है. भीमा नदी का नाम है, जो कोरेगांव नाम के एक गांव से गुजरती है, इसीलिए इस गांव को भीमा कोरेगांव कहा जाता है.
यह गांव पुणे से 20 किलोमीटर की दूरी पर बसा है. इस गांव में एक स्मृतिस्तंभ है, जिसे अंगरेज सरकार ने बनवाया था. इस स्तंभ को विजयस्तंभ या शौर्यस्तंभ भी कहा जाता है. इस शौर्यस्तंभ को देखने के लिए हर साल 1 जनवरी को महाराष्ट्र के दूरदराज से लोग आते हैं. आजकल तो देश के दूसरे हिस्सों से भी लोग यहां आने लगे हैं.
इस साल भी 1 जनवरी को भीमा कोरेगांव का शौर्यस्तंभ बनने के 200 साल पूरे होने के मौके पर लाखों लोग आ रहे थे, लेकिन कुछ कट्टर लोगों ने भीमा कोरेगांव को योजना बना कर दंगल का मैदान बना दिया.
ऐसे में भीमा कोरेगांव के वीरता से भरे इतिहास के बारे में जानना बेहद जरूरी है कि आखिर क्यों देश का दलित तबका इस शौर्यस्तंभ को अपनी विजयगाथा के रूप में देख रहा है, क्या है भीमा कोरेगांव का इतिहास?
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भीमा कोरेगांव की जड़ें सामाजिक नाइंसाफी और वर्ण व्यवस्था से जुड़े जोरजुल्म से संबंध रखती हैं. सन 1680 में शिवाजी की हत्या और उन के बेटे संभाजी के 1689 में औरंगजेब द्वारा मारे जाने के बाद उन के राज्य को उन के ब्राह्मण सलाहकार पेशवाओं ने हड़प लिया था. सत्ता में आते ही देशस्थ ब्राह्मण पेशवाओं ने वर्ण व्यवस्था का कड़ाई से पालन करने का हुक्म दिया था.
दलितों को मंदिरों व तालाब में जाने और पढ़ाईलिखाई करने की मनाही थी. दलितों द्वारा किसी ऊंची जाति वाले को छू लेना पाप समझा जाने लगा था. दलितों के रास्ते पर चलते समय थूकने के लिए गले में मटका और रास्ता साफ करने के लिए कमर पर झाड़ू बांधी जाती थी. उन्हें 12 बजे के पहले और 3 बजे के बाद रास्ते से गुजरना मना था. उन्हें गांव के बाहर बदहाली में रहना पड़ता था.
अगर कोई दलित मंदिरों के आसपास भी दिखता था तो उस को सजा देने का पेशवा का हुक्म था. अगर रास्ते में कोई ब्राह्मण मिलता था तो दलितों को पेट के बल जमीन पर लेट कर हाथ जोड़ने का नियम था. बाजीराव के समय अगर कोई भी दलित पेशवा के तालीमखाने के सामने से गुजरता था, तो गुलटेकडी के मैदान में उस दलित के सिर को गेंद और तलवार को डंडा बना कर खेल खेला जाता था.
बांबे गजट 1884-85 में लिखा है कि अगर कोई भी दलित गांवों में कुएं के पास से गुजरेगा तो उस की छाया कुएं पर न पड़े, इस डर से उसे घुटने के बल चलना पड़ता था. दलितों पर कोई भी जुल्म हो, उसे उन्हें सहना पड़ता था. वे किसी के पास गुहार नहीं लगा सकते थे. उन के पास कुछ भी हक नहीं थे. नए किले, इमारत, पुल, तालाब के बनने के समय पायाभरणी में दलितों की बलि दी जाती थी. यह बड़ी दर्दनाक प्रथा थी. लोककथाओं में इस का साफतौर पर जिक्र किया गया है. उस समय उन्हें दलित नहीं कहा जाता था.
लेकिन दलितों के पास जुल्मों को सहन करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. वजह, वे मालीतौर पर लाचार थे. पर कोई भी तबका ऐसी बेइज्जती और नाइंसाफी कब तक सहेगा किसी का साथ मिलने के बाद वह आवाज तो उठाएगा ही. उन के दिमाग में बैठा दिया गया था कि यह दंड उन्हें पिछले जन्म के पापों के कारण मिले हैं.
तब दलितों (महारों) की अपनी अलग फौज थी. वे लड़ाके थे, लेकिन व्यवस्था से पूरी तरह जकडे़ हुए थे. लड़ाई के समय भी उन्हें ऊंची जाति के सैनिकों को छूना मना था. उन के तंबू अलग बने होते थे. उन का खाना अलग पकाया जाता था. राजा अपने राज्य की सीमाएं बढ़ाने के लिए आपस में लड़ाई करते थे. जैसे हिंदू राजाओं के पास मुसलिम सैनिक थे, वैसे ही मुसलिम शासकों के पास हिंदू सैनिक हुआ करते थे. उन्हें जहां इज्जत और अच्छी तनख्वाह मिल जाती थी, वहां वे नौकरी करते थे. धर्मांधता लोगों पर हावी नहीं थी.
1 जनवरी, 1818 को अंगरेजों और बाजीराव पेशवा द्वितीय के बीच नदी के किनारे कोरेगांव में लड़ाई होने वाली थी. लड़ाई से पहले दलितों (महारों) ने पेशवाओं के सामने एक प्रस्ताव रखा था कि अगर हम आप के साथ मिल कर अंगरेजों के खिलाफ लड़ते हैं, तब हमारे सामाजिक हालत में बदलाव होगा और इनाम के तौर पर जमीन देने की पेशकश रखी गई थी. लेकिन पेशवाओं ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था. आखिर में महार सैनिकों ने अंगरेजों के साथ मिल कर पेशवाओं के खिलाफ लड़ने का फैसला किया था.
इस लड़ाई में अंगरेजों के साथ केवल 500 महार सैनिक थे. इन महार सैनिकों ने पेशवा की 25000 सैनिकों की फौज को हराया था. इस लड़ाई में बहुत से महार सैनिक मारे गए थे. इन सैनिकों की याद में अंगरेजों ने भीमा कोरेगांव में एक शौर्यस्तंभ खड़ा किया था, जिस पर 22 महार सैनिकों के नाम लिखे गए थे. इस तरह दलितों ने अपनी बेइज्जती और नाइंसाफी का बदला लिया था.
इन महार सैनिकों को नमन करने के लिए डाक्टर भीमराव अंबेडकर हमेशा 1 जनवरी को भीमा कोरेगांव जाते थे. उन के बाद उन के अनुयायी हर साल वहां जाने लगे.
पेशवा के राज के बाद वहां के दलितों के सामाजिक और माली हालात में बदलाव आना शुरू हुआ था. अंगरेज शासक भारत में केवल दलितों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे बहुजन समाज को आगे बढ़ाने के लिए बेहतर शासक साबित हुए थे. उन के समय से बहुजन समाज में सामाजिक, माली व धार्मिक बदलाव होने शुरू हो गए थे. उन्हें पढ़नेलिखने के मौके हासिल हुए थे. आगे चल कर आजाद भारत में संविधान द्वारा उन्हें वे हक मिलने लगे थे, जिन्हें सदियों से मनुस्मृति ने जकड़ रखा था.
धर्मशास्त्रों से बहुजनों को मिले छुटकारे से धर्म के ठेकेदारों और शास्त्रों की हिमायती जमात को झटका लगा था. उन्हें अपनी पुरानी मनुवादी सोच को मजबूत करना था. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बनने को इसी नजरिए से देखना चाहिए.
आज संघ और उस की कई शाखाओं ने देश के सामने वही माहौल खड़ा करने की कोशिश की है. दूसरे दलों के बहुत से नेता भी इसी सोच के हैं, पर वोटों की खातिर चुप रहते हैं.
1 जनवरी, 2018 से 5 दिन पहले वढू गांव में गोविंद गणपत गायकवाड़ की समाधि की छत को शिवप्रतिष्ठान हिंदुस्तान के कार्यकर्ताओं ने तोड़ दिया था. संभाजी भिड़े ने इस संस्था शिवप्रतिष्ठान को बनाया है.
जब औरंगजेब के हुक्म पर शिवाजी महाराज के बेटे संभाजी महाराज को पकड़ कर उन को मार कर नदी में फेंक दिया था तो उसी गोविंद गणपत गायकवाड़ ने नदी में उतर कर संभाजी महाराज के शरीर के टुकड़ों को जमा किया था और उन टुकड़ों को सिल कर उन्हें जलाया गया था. उसी जगह पर संभाजी महाराज की समाधि बनाई गई थी. गोविंद गायकवाड़ की समाधि भी वढू गांव में संभाजी महाराज की समाधि के पास बनी है.
संभाजी भिड़े के शिवप्रतिष्ठान द्वारा इस के विरोध में प्रचार किया जा रहा है. कुछ गांव वालों के मुताबिक, जब समाधि की छत तोड़ी गई तब यहां पर दंगा कराने की धमकी दी गई थी.
भीमा कोरेगांव के शौर्यस्तंभ पर महार सैनिकों को नमन करने के लिए महाराष्ट्र और देश के अनेक राज्यों से 1 जनवरी, 2018 को लोग आने लगे थे. इस साल शौर्यस्तंभ के 200 साल पूरे होने के मौके पर ज्यादा लोग आ रहे थे. इन लोगों पर अचानक मनोहर उर्फ संभाजी भिड़े के शिवप्रतिष्ठान और हिंदू एकता के अध्यक्ष मिलिंद एकबोटे के कार्यकर्ताओं द्वारा पहले से योजना बना कर हमला किया गया. इस हमले में
40 गाडि़यों को तोड़ा और जला दिया गया. पत्थरबाजी में अनेक बच्चे, औरतें और मर्द घायल हो गए. एक आदमी की जान भी चली गई.
इस बवाल की वजह रहे मनोहर उर्फ संभाजी भिड़े और हिंदू एकता के अध्यक्ष मिलिंद एकबोटे. उन के ऊपर एट्रोसिटी ऐक्ट के तहत एफआईआर दाखिल हो गई, लेकिन अभी तक उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया है. पुलिस रिकौर्ड के मुताबिक उन पर पहले भी मामले दर्ज हुए हैं.
संभाजी भिड़े व मिलिंद एकबोटे हिंदुत्व का सहारा ले कर मराठा नौजवानों को मुसलिमों और दलितों के खिलाफ भड़का रहे हैं. उन को झूठा, मनगढंत इतिहास बताया जा रहा है.
संभाजी भिड़े के एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी शामिल हो चुके हैं, इसीलिए शायद उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा रहा है. आखिर आतंक फैलाने वाले ऐसे लोगों को क्यों बचाया जा रहा है क्या दलितों पर हुए हमले को सरकारी समर्थन हासिल है?
आज तक कभी भी भीमा कोरेगांव के लोगों ने 1 जनवरी को अपनी दुकानें बंद नहीं की थीं, लेकिन इस साल गांव में बंद रखा गया. इतना ही नहीं, ग्राम पंचायत द्वारा बाकायदा गांव में बंद रखने का प्रस्ताव पास किया गया. लोगों को मारने के लिए पहले ही पत्थर लाए गए थे. दंगाइयों के हाथों में भगवा झंडे थे. वायरल हुए वीडियो में दंगा करने वाले लोग पुलिस प्रशासन अपने साथ होने का दावा कर रहे थे. ब्राह्मणी व्यवस्था व मीडिया ने इसे दलित बनाम मराठा और दलित बनाम हिंदू का रूप दिया.
दलितों पर हुए हमले के विरोध में और संभाजी भिड़े व मिलिंद एकबोटे को गिरफ्तार करने के लिए दलित संगठनों द्वारा महाराष्ट्र में बंद रखा गया. यह बंद भीमा कोरेगांव के निहत्थे लोगों पर किए गए हमले के विरोध में था, लेकिन पुलिस ने बंद में शामिल लोगों को गिरफ्तार कर उन्हें जेल में डाला, उन के ऊपर केस दर्ज किए गए. मीडिया ने भीमा कोरेगांव के इस कांड को जानबूझ कर नहीं दिखाया. सच को दबाने की कोशिश की गई. उलटे दलितों को ही इस का जिम्मेदार बताया जाने लगा.
भीमा कोरेगांव दंगे के विरोध में जिन लोगों ने आंदोलन किया, उन्हें कौंबिंग आपरेशन द्वारा पकड़ा जा रहा है, लेकिन जिन्होंने दंगा शुरू किया उन्हें अभी तक पकड़ा नहीं गया है. वे न केवल खुलेआम घूम रहे हैं, बल्कि कुछ को पुलिस प्रोटैक्शन दी गई है.
उत्तर प्रदेश के चंद्रशेखर आजाद ने दंगाइयों के विरोध में अपनी हिफाजत के लिए आवाज उठाई तो उन पर रासुका लगा दिया गया. गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवाणी ने मनुवादियों के खिलाफ आवाज उठाई तो उन्हें देशद्रोही कहा गया.
क्या भारत भी अब धार्मिक तालिबानी सोच की ओर बढ़ रहा है सहिष्णु भारत में लोग असहिष्णु बन रहे हैं. देश के दलितों, आदिवासियों व अन्य पिछड़ा वर्ग को इस स्थिति से निबटने के जवाब ढूंढ़ने होंगे.
बौलीवुड के दिग्गज एक्टर जितेंद्र मुश्किलों से घिर गए हैं. उनपर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा है, और हैरान करने वाली बात यह है कि उन पर यह आरोप किसी और ने नहीं, उनकी ही फुफेरी बहन (बुआ की बेटी) ने लगाया है. खुद को पीड़ित बताते हुए उनकी बहन ने खुलासा किया है कि जब वह 18 साल की थी और जितेंद्र 28 साल के थे, जितेंद्र ने उनके साथ इस वारदात अंजाम दिया था.
जितेंद्र की फुफेरी बहन ने उनके खिलाफ हिमाचल प्रदेश में शिकायत भी की है उन्होंने अभिनेता के खिलाफ जल्द एफआईआर दर्ज करने और गिरफ्तारी की मांग की है.
जितेंद्र के खिलाफ पीड़िता ने शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें आरोप है कि 47 साल पहले अभिनेता ने उनका यौन शोषण किया था.
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47 साल पुराना मामला
पीड़िता ने खुलासा किया है की 1971 में एक होटल के कमरे में जितेंद्र ने उनका यौन उत्पीड़न किया. उनका कहना है कि उस समय जितेंद्र 28 साल के थे और पीडि़ता 18 साल की. पीडि़ता के मुताबिक जितेंद्र उन दिनों शिमला में शूटिंग में व्यस्त थे जब उन्होंने यौन उत्पीड़न करने का मन बनाया था. पीडि़ता के लिए उन्होंने खुद नयी दिल्ली से शिमला आने की व्यवस्था की थी.
ऐसे बने हालात
पीडि़ता का कहना है की जब वो शिमला पहुंची तो रात हो चुकी थी और जितेंद्र नशे की हालत में धुत थे. जिस होटल में वो ठहरी थीं जितेंद्र वहां नशे में पहुंचे और उनके कमरे में आ गए. कमरे में आते ही जितेंद्र ने दो बिस्तरों को आपस में जोडा़ और उनके साथ उत्पीड़न किया. फिलहाल जितेंद्र ने अपने बयान में इस घटना को काल्पनिक बताया है और सभी आरोपों को झूठा कहा है. बता दें कि अभी जितेंद्र 75 साल के हैं और उन्होंने अपने फिल्मी करियर में एक से बढ़कर एक कई हिट फिल्में दी हैं.
इस वजह से अभी तक चुप रहीं
पीडि़ता 47 साल से इस मामले पर चुप क्यों रहीं इस पर उन्होंने कहा कि वह इतने दिनों तक इसलिए चुप रहीं क्योंकि अगर उनके मां-बाप को इस बारे में पता लगता तो उन्हें बहुत ठेस पहुंचती. अब उनके मां-बाप इस दुनिया में नहीं हैं इसलिए लंबे समय के बाद अब उन्होंने अपनी यौन उत्पीड़न की बात जगजाहिर की है. इसके अलावा ‘#Me_too’कैम्पेन ने हिम्मत दी.
‘#Me_too’ सोशल मीडिया पर एक कैम्पेन चलाया गया था जिसमें बौलीवुड़ से लेकर हर आम महिला ने हिस्सा लिया. #MeToo जैसे नारीवादी जागरूकता अभियानों के बाद बौलीवुड से लेकर हौलीवुड अभिनेत्रियों ने समय-समय पर अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को मुखरता से रखा है. इस कैम्पेन के तहत जिस भी महिला के साथ कभी भी किसी भी तरह का उत्पीड़न हुआ हो वो अपनी सोशल वाल पर’#Me_too’ लिख कर अपना दर्द पूरी दुनिया से बांट सकती है.
देश के गांवदेहातों में ही नहीं कसबों और शहरों की गरीब बस्तियों में भी पढ़ाईलिखाई, साथ नौकरियां करने, साथ चलने के बावजूद जाति और धर्म के भेद आज भी 100 साल पुराने लगते हैं. गुजरात चुनावों में अगर जाति का भूत बोतल से फिर बाहर निकल कर आता दिखा तो सिर्फ इसलिए कि नरेंद्र मोदी और उन की भारतीय जनता पार्टी को लगा कि विकास के मुद्दों पर जिन ऊपरी जातियों को इकट्ठा किया था, वे छिटक रही हैं और राहुल गांधी पर हिंदू धर्म विरोधी यानी जाति को भड़काने का आरोप लगा दो.
राहुल गांधी ने खुद तो कुछ नहीं कहा पर भाजपा समर्थक मीडिया ने इतना कुछ कांग्रेसियों के मुंह से निकलवा लिया कि जाति का सवाल देशभर में सुलगने लगा है. थोड़े ऊंचे पाटीदारों और बहुत नीचे दलितों का साथ हो जाना बहुत ऊंचों को अपनी सत्ता पर हमला दिखा है और इसीलिए जब महाराष्ट्र में भीमा कोरेगांव में दलितों की एक जाति महार के लाखों लोग पेशवाओं की हार की 200वीं बरसी मनाने पहुंचे तो ऊंची जातियों का गुस्सा भड़क उठा.
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गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार पहले से जाति के खुले घावों से कराह रहे हैं. अन्य राज्यों में यह कैंसर है पर छिपा है और पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है. यह जिंदगी का हिस्सा है जहां घाव की चीराफाड़ी होने लगी है. लोग समझने लगे हैं कि उन के घावों को कुरेद कर उन्हें काम करने, वह भी लगभग मुफ्त में, मजबूर करा जा रहा है तो आज जो अकेली जबान उन्हें मिली है, वोट की जबान, का इस्तेमाल करने लगे हैं.
भीमा कोरेगांव देश के हर हिस्से में हर रोज छोटे पैमाने पर दोहराया जाता है. इस के समाचार नहीं बनते क्योंकि यह आम बात मानी जाती है. कांग्रेस की खूबी थी कि उस ने बरसों इस की दवा ढूंढ़ रखी थी, ऐसी अफीम जिसे खा कर वे चुप हो जाते थे. भाजपा के पास इस की दवा मंदिर हैं जहां इन्हें अंदर आने की इजाजत दे कर मगर अलग कतार में खड़ा कर बेइज्जत कर के भिखारियों की तरह 2 दाने दे दिए जाते हैं. चूंकि मंदिर में जगह मिल रही थी, दलित सोच रहे थे कि उन का भी भगवान कल्याण करेंगे. पर जहां मंदिर ऊंची जातियों के दूसरों से बेहतर पैदायशी होने के सुबूत बन गए, दलितोंपिछड़ों के नीचे होने का अहसास बढ़ाते गए.
जिन पिछड़ों व दलितों ने केसरिया दुपट्टा पहना था वे अब दुविधा में हैं कि वे किस राह पर चलें? उन के कल के नेता जगजीवन राम, कांशीराम, उदित राज, मायावती, रामविलास पासवान थे पर सब सत्ता सुख भोगने में लग गए, पूरियों की टुकड़न से मुंह बंद कर दिया गया उन का. अब जिग्नेश मेवाणी, चंद्रशेखर आजाद जैसे नेता निकल रहे हैं.
बजाय जाति भेद को पैदा होने से रोकने के, ऊंची जातियों का रवैया बड़ा दोगलापन लिए है. वे अपने नाम के आगे जाति लगाते हैं, कुंडली बनवाते हैं, मंदिरों में हजारों का दान करते हैं, जाति में शादी करते हैं पर आरक्षण पर हल्ला मचाते हैं, जिग्नेश मेवाणी और चंद्रशेखर आजाद पर जातिवादी होने का दोष मढ़ते हैं.
जाति तब खत्म होगी जब नीची जातियों को थोड़ा पैसा मिलेगा. उन्हें काम, काम के बदले दाम और इज्जत से नाम तीनों चाहिए. ये तीनों ऊंची जातियां देने को तैयार नहीं हैं– न पहले थीं, न आगे रहेंगी. ये हल्ले होते रहेंगे. दलित नेताओं को कानून और डंडों के साथ बासी पूरी दे कर चुप कराया जाता रहेगा. भीमा कोरेगांव के बाद उफना तूफान ठंडी होती आग पर चढ़ा पानी है जो एक उबाल के बाद ठंडा हो जाएगा.
देश में बेरोजगारी का आलम यह है कि पक्की ठीकठाक लंबी नौकरी देने वाली सेना की भरती पर आमतौर पर हर जगह धक्कामुक्की तो होती ही है, अकसर लाठीचार्ज होता है, पुलिस बंदोबस्त करना पड़ता है और कई दफा इस दौरान एकदो मौतें हो जाती हैं. सासाराम, बिहार में मिलिटरी पोलिस कंपाउंड में घुसने के समय भीड़ में कुचलने से 1 की मौत हो गई और 4 बुरी तरह घायल हो गए.
यह 6000 की भीड़ सर्दियों के दिनों में सुबह 3 बजे देशभक्ति के जज्बे की वजह से रिक्रूटमैंट सैंटर पर नहीं खड़ी थी. यह तो एक ऐसी नौकरी पाना चाहती थी जिस में खाने, पीने, रहने, कपड़ों, घूमने के साथ एक अच्छी पगार भी मिलती हो.
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देश के गांवोंकसबों में आज जो मारामारी सरकारी नौकरियों की है वह साफ जाहिर करती है कि देश का माहौल ऐसा है कि अपनी मेहनत के बलबूते पर अच्छी जिंदगी बिताना हरेक के बस का नहीं. सरकार नौकरियां देने के कितने वादे करती रहे, असल यही है कि आज न खेतों में नौकरियां हैं, न कारखानों में, न दुकानों में और न दफ्तरों में.
यह देश की असल आर्थिक स्थिति की पोल तो खोलती ही है, यह भी साबित करती है कि अपनी मनचाही नौकरी पाना अब मुश्किल होता जा रहा है. यहां के लोगों को अपने पर इतना कम भरोसा है कि वे पक्की सरकारी नौकरी ही लपकना चाहते हैं जिस में काम कम हो, वेतन ठीकठाक, पर यदि ऊपरी कमाई हो तो पौबारह. अगर राजस्थान में चपरासी की नौकरी के लिए इंजीनियर परचा भरते हैं और विधायक का बेटा ही सिफारिश के बलबूते पर नौकरी पाता है. इस पर चौंकने की जरूरत नहीं. यह तो होना ही है.
यहां मुफ्त की रोटियों को बड़ी इज्जत मिलती है. समाज पंडोंमुल्लाओं को सिरआंखों पर रखता है. जो न एक तिनका उगाते हैं और न एक पैसे का सामान बनाते हैं या बेचते हैं. काम करने वालों को तो यहां शूद्र और अछूत कहा जाता रहा है और आरक्षण के बलबूते उन्हें कुछ लाख सरकारी नौकरियां ही मिली हैं, जबकि उन की गिनती पूरी जनसंख्या में 80-85 फीसदी है. बाकी 10-15 फीसदी से आने वालों ने ही सरकारी नौकरियों पर कब्जा कर रखा है और इसीलिए सब से निचली रैंक के लिए हो रही भरती पर हर जगह हजारों जमा हो जाते हैं.
यह देश के लिए परेशानी की बात होनी चाहिए. दूसरे कई देशों में सदियों तक सेना में भरती के लिए जबरदस्ती की जाती थी पर यहां हमेशा ही इसे नियामत समझा गया है क्योंकि इस में पैसा, परमानैंसी और पौवर तीनों हैं. यह बेरोजगारी का हल नहीं है, यह बदन पर हर जगह बहते नासूरों को मैले कपड़ों से ढकना भर है.
औरतों की माहवारी/मासिक धर्म को लेकर चली आ रही भारतीय संस्कृति व सामाजिक परंपरा पर चोट करने के साथ ही मासिक धर्म के दौरान औरतों की स्वच्छता और उनके अच्छे स्वास्थ्य की चिंता करने वाली फिल्म ‘‘पैडमैन’’ की कहानी यूं तो पैडमैन कहे जाने वाले तमिलनाडु निवासी अरूणाचलम मुरूगनाथन की कहानी है. पर इसमें काल्पनिक कहानी व काल्पनिक पात्रों को ज्यादा तरजीह देकर इंटरवल से पहले इसे कुछ ज्यादा ही मेलोड्रामैटिक बना दिया गया है.
माहवारी के पांच दिन औरतों द्वारा गंदा कपड़ा, राख, पत्ता आदि का उपयोग करने की बजाय सैनेटरी नैपकीन पैड के उपयोग की वकालत करने वाली फिल्म ‘पैडमैन’ में दावा किया गया है कि सिर्फ 12 प्रतिशत भारतीय महिलांए ही सैनेटरी नैपकीन पैड का उपयोग करती हैं. यदि यह आंकड़ा सही है, तो चिंता का विषय है.
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फिल्म ‘‘पैडमैन’’ की कहानी महेश्वर, मध्यप्रदेश में रह रहे वेल्डिंग का काम करने वाले युवक लक्ष्मी कांत चौहान (अक्षय कुमार) की गायत्री (राधिका आप्टे) संग शादी से होती है. शादी के बाद अपनी पत्नी से प्यार करने वाला लक्ष्मी काफी खुश है. लेकिन उसे यह पसंद नहीं कि माहवारी के पांच दिन उसकी पत्नी घर से बाहर बैठे और गंदे कपड़े का उपयोग करे. वह दवा की दुकान पर जाकर अपनी पत्नी गायत्री के लिए55 रूपए में सैनेटरी नैपकीन पैड खरीदकर लाता है.
उसे पैड मांगने में कोई शर्म नहीं महसूस होती. पर गायत्री इतना महंगा पैड उपयोग नहीं करना चाहती. उसका मानना है कि इससे घर में दूध नहीं आ पाएगा. गायत्री अपने पति लक्ष्मी को समझाती है कि वह औरतों के मसले पर अपना दिमाग न खपाए. पर पत्नी की तकलीफ लक्ष्मी कोबर्दाश्त नहीं. ऊपर से डौक्टर उसे बताता है कि जो औरतें माहवारी के पांच दिनों में पत्ता, गंदा कपड़ा या राख का उपयोग करती हैं, वह बीमारी को दावत देती हैं. तब लक्ष्मी प्रसाद एक पैड को खोलकर देखता है, तो उसे पता चलता है कि मलमल के कपड़े के अंदर कुछ रूई/कापुस/कपास लपेटा गया है.
तो वह कहता है कि चवन्नी की रूई के लिए 55 रूपए मांगे जा रहे हैं. अब वह दुकान से कपड़ा व रूई खरीदकर अपनी पत्नी को पैड बनाकर देता है. गायत्री अगली माहवारी की रात उस पैड का उपयोग करती है, पर कोई फायदा नहीं होता और वह पुनः वही गंदा कपड़ा उपयोग करने लगती है. तब लक्ष्मी दुबारा प्रयास कर पैड बनाता है और इस बार वह पड़ोस की लड़की को पहली बार माहवारी होने पर वह पैड देता है. इससे हंगामा मच जाता है. लक्ष्मी की मां लक्ष्मी की दो छोटी बहनों को बड़ी बहन की ससुराल में रहने भेज देती हैं. लोग उसे पागल कहने लगते हैं.
गांव के लेाग लक्ष्मीकांत के इस काम को गंदा बताते हैं. बच्चे औरतों की माहवारी को क्रिकेट मैच की संज्ञा देते हैं. एक दिन फैक्टरी में फैक्टरी का एक मालिक कहता है कि कोई भी चीज ग्राहक को देने से पहले खुद उसका उपयोग करके उसके सही होने का आकलन कर लेना चाहिए. अब लक्ष्मी नए सिरे से पैड बनाता है. और खुद उस पैड को पहनकर सायकल चलाता है, साथ में खून पैड में जाता रहे, ऐसी थैली लगा रखी है. जब उसकी पैंट लाल रंग से भीग जाती है, तो वह महेश्वर की नर्मदा नदी में कूद जाता है. इस पर गांव की पंचायत बैठती है. बीच पंचायत मेंगायत्री का भाई आकर उसे अपने साथ ले जाते हैं. अंततः पंचायत के निर्णय से पहले ही लक्ष्मी ऐलान कर देता है कि वह गांव छोड़कर जा रहा है.
लक्ष्मी शहर पहुंचकर एक प्रोफेसर के घर पर नौकरी करने लगता है. जहां प्रोफेसर के बेटे की सलाह पर कम्पयूटर पर गूगल की मदद से अमेरिका व मलेशिया से पैड बनाने में उपयोग होने वाला पदार्थ तथा करोड़ों की मशीन की कार्यशैली देखकर एक सूदखोर से कर्ज लेकर नब्बे हजार में नई मशीन का ईजाद करता है. इस मशीन की मदद से जो सैनेटरी नैपकीन पैड बनता है, उसकी कीमत सिर्फ दो रूपए होती है. नाटकीय तरीके से इस पैड का पहला उपयोग परी (सोनम कपूर) करती है. परी तबला वादक होने के साथ साथ एमबीए की विद्यार्थी है.
परी के पिता आईआईटी में है. परी के कहने पर उसके पिता दिल्ली में आयोजित समाज उपयोगी नई खोज प्रतियोगिता में लक्ष्मी को उसकी मशीन के साथ बुलवाते है. जहां उसे दो लाख रूपए का पुरस्कार मिलता है. उसके बाद परी के साथ मिलकर लक्ष्मी इस पैड को गांव की औरतों तक पहुंचाने, जरुरतमंद औरतों को बैंक से कर्ज दिलवाकर उन्हे मशीन बेचते हैं, जिससे वह महिलाएं अपने गांव में पैड बनाकर औरतों को दो रूपए में बेचे.
उधर गायत्री के भाई चाहते हैं कि गायत्री, लक्ष्मी प्रसाद को तलाक देकर नई जिंदगी शुरू करे, इधर लक्ष्मी प्रसाद अमेरिका में युनाइटेड नेशन में पुरस्कार हासिल करता है. वापस भारत लौटते हुए उसे खबर मिलती है कि भारत सरकार उसे पद्मश्री देने जा रही है. यह खबर अखबारों में छपती हैं. गायत्री के भाईयों को अपराध बोध होता है. लक्ष्मी के गांव के लोग उसे सम्मान देने लगते हैं. फिल्म के अंत में लक्ष्मी प्रसाद रक्षा बंधन पर अपनी बहनों को उपहार में सैनेटरी नैपकीन पैड देते नजर आते हैं.
नारी उत्थान ही नहीं बल्कि नारी के स्वास्थ्य के संदर्भ में एक अति उपयुक्त व जरुरी विषय पर बनी यह सामाजिक फिल्म कई जगह सरकारी जुमलों के अलावा अति मेलोड्रामैटिक फिल्म बनकर रह जाती है. लेखक ने थोड़ी मेहनत की होती तो यह फिल्म काफी बेहतर बन सकती थी. फिल्म बेवजह लंबी बनायी गयी है. इंटरवल से पहले यह फिल्म निराश करती है. फिल्मकार ने एक तरफ कम्प्यूटर, गूगल सर्च व मोबाइल युग की बात की है तो दूसरी तरफ ऐसे अंधविश्वास फैलाने वाले सीन रखे हैं, जिन पर कोई भी आम इंसान यकीन नहीं करता.
मसलन-हनुमान जी को एक नारियल पकड़ाएं, कुछ देर बाद टुकड़े के रूप में प्रसाद का मिलना या भगवान कृष्ण के हाथों लड्डू के प्रसाद का मिलना आदि बेवकूफी भरे सीन किस सोच के साथ रखे गए हैं, यह तो अक्षय कुमार व आर बालकी ही बेहतर जाने. फिल्म 2018 में बनी है,जब भारत के गांव गांव में मोबाइल फोन व इंटरनेट हावी है. पर इस तरह के दृश्यों को दिखाकर फिल्मकार क्या साबित करना चाहते हैं, यह तो वही जानें.
इंटरवल से पहले फिल्म की पटकथा में कसाव की जरुरत थी, जिस पर ध्यान नहीं दिया गया. इंटरवल के बाद सोनम कपूर के किरदार के साथ ही फिल्म में रोचकता बढ़ती है और अंततः फिल्म दर्शकों के बीच अपनी पकड़ बनाने में कामयाब रहती है. फिल्म के संवाद प्रभावित नहीं करते हैं. फिर भी फिल्म के निर्देशक आर बालकी मासिक धर्म की स्वच्छता के आस पास के सामाजिक प्रचलन और मासिक धर्म व सेनेटरी नैपकीन पैड को टैबू बनाए जाने पर गहरी चोट करने में सफल रहे हैं.
जहां तक अभिनय का सवाल है तो फिल्म में अक्षय कुमार, राधिका आप्टे और सोनम कपूर तीनों ने ही अपने अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है. औरतों से जुड़े अति संजीदा मुद्दे पर आधारित इस फिल्म में अति संजीदा किरदार निभाना अक्षय कुमार के लिए रस्सी पर चलना जैसा कठिन रहा, पर वह लोगों का दिल जीतने में कामयाब रहते हैं. राधिका आप्टे ने साबित कर दिखाया कि वह हर तरह के बाखूबी किरदार निभा सकती हैं. सोनम कपूर के अभिनय में काफी सहजता रही.
फिल्म के संगीतकार अमित त्रिवेदी ने विषय के अनुरूप संगीत पिरोया है. फिल्म के कैमरामैन पी सी श्रीराम ने महेश्वर की खूबसूरती को बहुत बेहतरीन तरीके से कैमरे में कैद किया है. कुछ कमियों के बावजूद ‘‘पैडमैन’’ ऐसी फिल्म है, जो अंततः दर्शकों के मन में बेहतर कल की उम्मीद जगाती है. नारी के मासिक धर्म व सैनेटरी नैपकीन की उपयोगिता पर यह फिल्म जिस तरह से बात करती है, उसके लिए इसे देखा जाना चाहिए.
दो घंटे 19 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘पैडमैन’’ का निर्माण ट्विंकल खन्ना, क्रियाज इंटरटेनमेंट, एसपीई फिल्मस इंडिया, केप आफ गुड फिल्मस और होप प्रोडक्शन ने मिलकर किया है. फिल्म की कहानी ट्विंकल खन्ना की किताब ‘‘द लीजेंड आफ लक्ष्मीप्रसाद’’ पर आधारित और तमिलनाड़ु के असली पैडमैन कहे जाने वाले अरूणाचलम मुरूगनाथन के जीवन की कहानी से प्रेरित है. फिल्म के लेखक व निर्देशक आर बालकी, कैमरामैन पी सी श्रीराम, संगीतकार अमित त्रिवेदी, सूत्रधार अमिताभ बच्चन तथा फिल्म के कलकार हैं-अक्षय कुमार, राधिका आप्टे,सोनम कपूर, सुधीर पांडे, माया अलघ, अमिताभ बच्चन व अन्य.
अभिनेता शाहरुख खान की फिल्म कोयला से फेमस हुई बॉलीवुड की हौट एक्ट्रेस दीपशिखा नागपाल का एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. एक्स बिग बॉस कंटेस्टेंट रह चुकी दीपशिखा इस वीडियो में सरेआम अपने मोहल्ले के लड़कों पर डोरे डालती नजर आ रहीं हैं. इसी दौरान कुछ ऐसा होता है कि जिससे सबकी आखें फटी की फटी रह जाती हैं.
इस वीडियो में दीपशिखा बालकनी में कपड़े सुखाने के लिए डालती नजर आ रही हैं. पूरे मोहल्ले में फेमस इस महिला को देखने के लिए लोग गली में इक्कठा हो जाते हैं. नीचे खड़े लोग कहते हैं आज तो ये गिरेगी, पक्का गिरेगी और ऐसा ही हुआ. कपड़े सुखाते हुए वह बालकनी से गिर जाती हैं. लेकिन उन्हीं के घर में रह रहा एक किराएदार ऐन मौके पर पहुंचकर उन्हें बचा लेता है.
इस वीडियो को अब तक करोड़ो लोग देख चुके हैं. आइए आपको दिखाते हैं लोगों को अपनी अदाओं से घायल करती दीपशिखा का ये वीडियो.
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साल 2012 में आई फिल्म ‘बर्फी’ से इंडस्ट्री में कदम रखने वाली इलियाना पिछले कई सालों से कथित तौर पर औस्ट्रेलियन फोटोग्राफर एंड्रयू नीबोन के साथ रिलेशनशिप में हैं. हालांकि, उन्होंने अपने रिश्ते के बारे में कभी खुलकर बात नहीं की. पिछले साल क्रिसमस के मौके पर इलियाना ने एंड्रयू को पति कहकर इंस्टाग्राम पर संबोधित किया था, जिसके बाद चर्चाएं गर्म थी कि जोड़ी ने शादी कर ली है.
हाल में उनकी फिल्म ‘रेड’ के ट्रेलर लौन्च के मौके पर उनके को-स्टार अजय देवगन ने भी इस मुद्दे पर सवाल पूछ ही लिया. जब अजय ने यह पूछा कि क्या इलियाना शादीशुदा हैं या नहीं तो उन्होंने इस बात से इनकार नहीं किया, हालांकि इस बारे में उन्होंने और ज्यादा बात नहीं कि लेकिन यह जरूर स्वीकार किया कि वह अपनी पर्सनल और प्रफेशनल लाइफ में काफी खुश हैं और अपनी निजी जिंदगी पर ज्यादा बात नहीं करना चाहतीं.
शादीशुदा होने के सवाल पर एक्ट्रेस ने कहा, “मुझे नहीं पता कि इस मामले में क्या कहना चाहिए. प्रोफेशनली और पर्सनली मैं अच्छा काम कर रही हूं. मुझे नहीं लगता कि इस मामले में कुछ कमेंट करने की जरुरत है. मैंने हमेशा अपनी पर्सनल लाइफ को प्राइवेट रखा है. मुझे इस बारे में बात करना पसंद नहीं है. लेकिन जो भी है सब सामने है.”
इलियाना ने भले ही मीडिया से बौयफ्रेंड के बारे में कुछ नहीं कहा. लेकिन उनका इंस्टाग्राम अकाउंट एंड्रयू के साथ तस्वीरों से भरा हुआ है.
बता दें कि बौलीवुड ऐक्ट्रेस इलियाना डिक्रूज एक बार फिर अजय देवगन के साथ अपनी अगली फिल्म ‘रेड’ में दिखाई देंगी. इसमें वह इनकम टैक्स कमिश्नर बने अजय की पत्नी की भूमिका में दिखेंगी. इससे पहले वह अजय के ही साथ फिल्म ‘बादशाहो’ में नजर आई थीं.
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20 नवंबर, 2016 को कानपुर के पास पुखरावां में ‘पटनाइंदौर ऐक्सप्रैस’ ट्रेन को बम से उड़ाने की साजिश के मास्टरमांइड शमसुल हुदा की गिरफ्तारी के बाद पता चला कि उस के तार नेपाल और आईएसआई से जुड़े हुए थे. इस हादसे से एक बार फिर यह साबित हो गया है कि आईएसआई नेपाल के रास्ते भारत में आतंकी वारदातों को फैलाने की मुहिम में लगा हुआ है. शमसुल हुदा पिछले कई सालों से भारतनेपाल के सरहदी इलाकों में अपना नैटवर्क फैलाने में लगा हुआ था. आईएसआई के इशारे पर वह कई दिनों से ड्रग्स, हथियार और नकली नोटों को भारत भेजने का काम कर रहा था.
नेपाल के बारा जिले के मोनाजिर अंसारी, आशीष सिंह, उमेश कुर्मी और शंभू के साथ मिल कर शमसुल हुदा अपनी मजबूत पकड़ बना चुका था. उस के बाद ही आईएसआई ने उसे पालनापोसना शुरू किया. ‘पटनाइंदौर ऐक्सप्रैस’ ट्रेन को दुघर्टनाग्रस्त करने के बाद वह दुबई भाग गया था. पुलिस की जांच में खुलासा हुआ है कि शमसुल हुदा का साथी मुजाहिर अंसारी दाऊद इब्राहिम का गुरगा है. कानपुर रेल हादसे में मुजाहिर अंसारी भी शामिल था.
कानपुर ट्रेन हादसे के बाद भी तकरीबन एक दर्जन रेल हादसे करने की साजिश रची जा चुकी थी. बिहार और उत्तर प्रदेश में ही ज्यादातर रेल हादसे करने की प्लानिंग थी. दाऊद इब्राहिम की डी कंपनी ने भारत में दहशत फैलाने के लिए सीरियल बम ब्लास्ट करने की अपनी पुरानी आदत में बदलाव कर रेलगाडि़यों को उड़ाने की योजना को अंजाम देना शुरू कर दिया.
शमसुल हुदा मूल रूप से नेपाल का रहने वाला है और आईएसआई एजेंट है. नेपाल में उस का एक रेडियो स्टेशन भी है. वह नेपाल के राष्ट्रीय मधेशी समाजवादी पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़ चुका है. चुनाव लड़ने के दौरान शमसुल हुदा के सिर पर ढाई करोड़ रुपए का कर्ज हो गया. उस के बाद उस ने पैसा कमाने और कर्ज चुकाने के लिए कई काम किए, पर नाकाम रहा. बाद में वह पैसा कमाने के लालच में आतंकी संगठन से जुड़ गया.
3 साल पहले शमसुल हुदा सैलानी वीजा पर पहली बार दुबई गया था. दुबई में उस की मुलाकात पाकिस्तानी नागरिक मोहम्मद सफी से हुई. मोहम्मद सफी ने ही उसे भारत में बम धमाका करने की जिम्मेदारी सौंपी थी. शमसुल हुदा के खिलाफ नेपाल के बारा इलाके में पहले से ही कई आपराधिक मामले दर्ज हैं.
शमसुल हुदा दुबई के रास्ते 2 बार पाकिस्तान जा चुका है. वह आईएसआई एजेंट मोहम्मद सफी के साथ पाकिस्तान गया था और सफी ने ही उस की आतंकी संगठन जमात ए उद दावा के मुखिया हाफिज सईद से मुलाकात कराई थी. कानपुर में रेल हादसे को अंजाम देने के बाद भी वह पाकिस्तान गया था और उसे आईएसआई के हार्डकोर सदस्य का दर्जा दिया गया था. उस के कुछ दिनों बाद ही बिहार के मोतीहारी जिले के घोड़ासहन रेल हादसे को अंजाम देने में नाकाम रहने पर आईएसआई ने उसे जम कर लताड़ लगाई थी.
लंबे समय तक पुलिस को छकाने में कामयाब रहने वाला शमसुल हुदा 7 फरवरी, 2017 को काठमांडू में नेपाल पुलिस के चंगुल में फंस गया था. नेपाल पुलिस ने उस का पासपोर्ट और सैलानी वीजा जब्त कर लिया, जिस की बदौलत वह दुबई पहुंच कर आतंकी हरकतों में शामिल हुआ था.
पासपोर्ट में दर्ज आंकड़ों के मुताबिक, उस ने पाकिस्तान समेत दुबई और मलयेशिया में लगातार सफर किया था. नेपाल और भारत की पुलिस मिल कर मामले की जांच में जुटी हुई हैं. शमसुल हुदा के इंटरनैशनल आतंकी कनैक्शन को खंगालने के लिए इंटरपोल की मदद ली जा रही है.
शमसुल हुदा ने नेपाल पुलिस को बताया कि रेल हादसे को अंजाम देने के लिए उसे एक करोड़ रुपए दिए गए थे. उस में से 63 लाख रुपए जाली थे. यह रकम हवाला के जरीए दुबई से नेपाल में ब्रजकिशोर गिरि तक पहुंचाई गई थी.
ब्रजकिशोर गिरि नेपाल में आईएसआई एजेंट मोहम्मद सफी के संपर्क में था. मोहम्मद सफी जाली नोटों का बहुत बड़ा नैटवर्क चलाता है. उस का नैटवर्क दुबई, पाकिस्तान, बंगलादेश और नेपाल तक फैला हुआ है. नेपाल के रास्ते भारत में नकली नोट खपाने का वह बड़ा खिलाड़ी है. भारत में नोटबंदी के बाद उस का नैटवर्क बुरी तरह से तबाह हो गया.
कानपुर में रेल पटरी को बम से उड़ाने के लिए मोती के साथ शमसुल हुदा का भतीजा जियाउल भी गया था. इस के अलावा बृजकिशोर गिरि, राकेश यादव और गजेंद्र यादव भी पुखरावां पहुंचे थे. मोती, मुकेश और उमाशंकर को घोड़ासहन इलाके से, बृजकिशोर गिरि, मुजाहिर अंसारी और शंभू गिरि उर्फ लड्डू को नेपाल से व जियाउल और जुबैर को दिल्ली से पकड़ा था.
पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, आईएसआई और डी कंपनी ने शमसुल हुदा को भारत में रेल पटरियों पर ब्लास्ट कर के रेल हादसा कराने की जिम्मेदारी सौंप रखी थी. बहरहाल, कानपुर रेल ब्लास्ट में पकड़े गए अपराधियों के खुलासे के बाद यह साफ हो गया है कि बिहार और नेपाल के सैकड़ों बेरोजगार नौजवानों को रुपयों का लालच दे कर दहशत फैलाने के काम में लगा दिया गया है.
कस्टम और एसएसबी में तकरार
भारत और नेपाल के सरहदी इलाकों में तस्करों को रोकने के बजाय कस्टम और एसएसबी यानी सशस्त्र सीमा बल आपसी तनातनी में उलझी रहती हैं. दोनों महकमों का आरोप है कि वे एकदूसरे के काम में टांग अड़ाते हैं, जिस से तस्करों पर अंकुश लगाने में अकसर काफी मुश्किलें आती हैं. सरहदी इलाकों में नकली नोट, नशीली चीजें, मानव तस्करी वगैरह का धंधा काफी पहले से फलताफूलता रहा है. पिछले कुछ सालों से आतंकी वारदातों में खासा इजाफा हो चुका है.
बिहार के तकरीबन 750 किलोमीटर तक की भारतनेपाल सरहद पर कस्टम और एसएसबी के अलगअलग काम हैं. दोनों की जवाबदेही अलगअलग है. इस के बाद भी दोनों महकमों के अफसरों और मुलाजिमों के बीच तकरार बनी रहती है. कस्टम अफसरों का आरोप होता है कि एसएसबी के लोग हमेशा उन के कामों में बेवजह दखल देते रहते हैं, जिस से काम करने में खासी दिक्कत आती रहती है. एसएसबी को न तो तस्करी का सामान जब्त करने और न ही गिरफ्तार करने का अधिकार है. अगर एसएसबी के जवान किसी तस्कर को सामान के साथ पकड़ते हैं, तो उन्हें कस्टम के हवाले कर मामले से अलग हो जाना चाहिए, लेकिन वे इस काम में पूरी तरह से भिड़ जाते हैं. इस खटास को दूर करने के लिए दोनों महकमों के अफसरों की कई बैठकें हो चुकी हैं, पर कोई नतीजा नहीं निकल सका है.
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22 दिसंबर, 2016 की बात है. जयपुर में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. शाम करीब साढे़ 7 बजे राजस्थान पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) के एडिशनल एसपी आशीष प्रभाकर ने अपने मोबाइल से पुलिस कंट्रोल रूम को फोन किया. उन्होंने अपना परिचय देते हुए कहा, ‘‘शिवदासपुरा इलाके में विधानी चौराहे के पास एक कार में एक महिला और एक पुरुष के शव पड़े हैं.’’ कंट्रोल रूम का ड्यूटी अफसर कुछ और पूछ पाता, इस से पहले ही एएसपी प्रभाकर ने फोन काट दिया. ड्यूटी अफसर ने फोन की विश्वसनीयता जानने के लिए पुलिस अधिकारियों के फोन नंबरों की सूची निकाली. उस में एएसपी आशीष प्रभाकर का मोबाइल नंबर देख कर ड्यूटी अफसर ने उस नंबर पर फोन लगाया, लेकिन फोन नो रिप्लाई जाता रहा. कई बार ट्राई करने के बाद भी आशीष के मोबाइल नंबर पर कोई रेस्पांस नहीं मिला.
थकहार कर ड्यूटी अफसर ने पैट्रोलिंग पुलिस टीमों को वायरलैस पर शिवदासपुरा इलाके में विधानी चौराहे के पास कार में 2 शव पड़े होने की सूचना प्रसारित कर दी. वायरलैस संदेश मिलते ही पैट्रोलिंग पुलिस टीमें विधानी चौराहे की ओर रवाना हो गईं. वहां उन्होंने कई जगह देखा, लेकिन ऐसी कोई कार नजर नहीं आई. कई लोगों से पूछताछ भी की, लेकिन किसी कार के एक्सीडेंट होने की भी कोई जानकारी नहीं मिली.
फोन पर मिली सूचना झूठी होगी, यह सोच कर पैट्रोलिंग टीमें वापस लौटने लगीं, तभी एक पैट्रोलिंग टीम को विधानी चौराहे से करीब 500 मीटर दूर एक निर्माणाधीन अस्पताल के सामने पुलिस की बत्ती लगी सरकारी स्कौर्पियो कार खड़ी नजर आई. पुलिस टीम उत्सुकतावश उस कार के पास गई. कार में कोई हलचल नजर नहीं आ रही थी.
पैट्रोलिंग अधिकारी ने स्कौर्पियो पर टौर्च से रोशनी डाली तो वह हैरान रह गया. कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे व्यक्ति का सिर स्टीयरिंग पर टिका हुआ था और खून बह रहा था. पैट्रोलिंग टीम के इंचार्ज ने टौर्च की रोशनी से कार के अंदर झांक कर देखा तो आगे की सीट पर बैठी एक महिला भी मृत पड़ी दिखाई दी. महिला के शरीर से भी खून बह रहा था.
पैट्रोलिंग टीम ने घटना की सूचना तुरंत अधिकारियों को दी. सूचना मिलने के कुछ देर बाद ही शिवदासपुरा एसीपी मौके पर पहुंच गए. थोड़ी देर बाद पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल, एटीएस के मुखिया उमेश मिश्रा सहित कई अन्य अधिकारी भी वहां आ गए. कार की ड्राइविंग सीट पर मृत अवस्था में पड़े व्यक्ति को पुलिस अधिकारियों ने तुरंत पहचान लिया. वह एटीएस के एएसपी आशीष प्रभाकर थे. उन के पास ही कार में आगे की सीट पर मृत पड़ी महिला की उस वक्त शिनाख्त नहीं हो सकी. अलबत्ता कार में शराब की खाली बोतल और चिप्स के पैकेट पड़े मिले. आशीष का सर्विस रिवौल्वर भी उन के हाथ में था.
मौके के हालात से लग रहा था कि एएसपी आशीष ने सर्विस रिवौल्वर से पहले कार में अगली सीट पर बैठी महिला को गोली मारी और उस के बाद उसी रिवौल्वर से अपनी कनपटी पर गोली मार ली. सिर में गोली लगने से आशीष की भी मौत हो गई.
यह खबर मिलने पर आशीष के बैचमेट कई अधिकारी वहां पहुंच गए. उन्होंने महिला का शव देख कर यह बात साफ कर दी कि वह आशीष की पत्नी नहीं, बल्कि फ्रैंड थी. लेकिन मृतका का नामपता कोई अधिकारी नहीं बता सका. अलबत्ता आशीष के साथी अधिकारियों से यह बात जरूर पता चली कि उन दिनों आशीष घरेलू विवाद की वजह से तनाव में चल रहे थे. इसी के चलते कुछ समय से वह उदास रहते थे.
कार की जांचपड़ताल के दौरान इस बात के सबूत भी मिले कि आशीष और उन की महिला मित्र के बीच छीनाझपटी हुई थी. 2 गोलियां कार के गेट के शीशे पर और एक गोली कार की छत में लगी मिली. इस से अधिकारियों को लगा कि आशीष ने सुसाइड के लिए जैसे ही अपना सर्विस रिवौल्वर निकाला होगा, तभी उन का अपनी महिला मित्र ने विवाद हुआ होगा. महिला मित्र ने आशीष का रिवौल्वर वाला हाथ पकड़ा होगा, इसी दौरान गोलियां कार के गेट और छत पर लगी होगीं.
अधिकारियों को कार में आशीष के पास से एक सुसाइड नोट भी मिला. सुसाइड नोट में आशीष ने अपनी पत्नी से माफी मांगते हुए लिखा था कि वह गलत रास्ते पर चले गए थे और एक महिला उन्हें ब्लैकमेल कर रही थी. पत्नी अनीता को संबोधित करते हुए उन्होंने सुसाइड नोट में आगे लिखा था कि ‘मैं अपने दोनों बच्चों के लिए बहुत कुछ करना चाहता था, लेकिन समस्या कुछ ज्यादा बढ़ गई थी. इसलिए मुझे ऐसा करना पड़ा, मुझे माफ कर देना.’
सुसाइड नोट मिलने से यह माना गया कि आशीष ने महिला मित्र को कार में बैठाने से पहले ही पूरा मन बना कर सुसाइड नोट लिख लिया होगा. कार में आशीष का मोबाइल भी मिला.
पुलिस अधिकारियों ने आशीष के घर वालों को सूचना दे कर मौके पर बुला लिया. आशीष की पत्नी अनीता उस समय जयपुर में ही चौड़ा रास्ता स्थित अपने मायके में रह रही थीं. आशीष के ससुराल वाले और परिजन घटनास्थल पर आ गए. उन की मौजूदगी में पुलिस ने आवश्यक काररवाई की. विधि विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) के अधिकारियों ने मौके से जरूरी सबूत जुटाए. प्राथमिक काररवाई के बाद रात को ही आशीष और उन की महिला मित्र के शव पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेज दिए गए.
आशीष करीब 20 दिनों पहले ही एटीएस में आए थे. इस से पहले उन्होंने राजस्थान पुलिस अकादमी में 10 महीने की ट्रेनिंग पूरी की थी. घटना से करीब एक महीना पहले पुलिस अकादमी में वह ट्रेनिंग के दौरान लापता हो गए थे. जब काफी देर तक उन का मोबाइल कनेक्ट नहीं हुआ तो उन की पत्नी अनीता ने पुलिस अधिकारियों को सूचना दे कर नाकाबंदी करवाई थी. बाद में वह जयपुर में ही जलमहल के पास मिले थे. आशीष के अचानक ट्रेनिंग से गायब होने पर काफी विवाद भी हुआ था. बहरहाल, बाद में उन की नियुक्ति एटीएस में हो गई थी.
जांचपड़ताल में यह बात सामने आई कि उस दिन सुबह रोजाना की तरह आशीष करीब 10 बजे अपने औफिस पहुंच गए थे. दिन भर काम करने के बाद वह शाम करीब साढे़ 5 बजे औफिस से निकले थे. उस समय वह अकेले ही थे. बाद में उन्होंने अपनी महिला मित्र को साथ लिया होगा. महिला मित्र के साथ वह सरकारी कार में करीब 2 घंटे तक घूमते रहे. इधरउधर घूमने के बाद वह शिवदासपुरा क्षेत्र में विधानी चौराहे के पास पहुंचे थे. पुलिस रात भर मामले की जांचपड़ताल में जुटी रही.
जांच में सामने आया कि राजस्थान में इंडियन मुजाहिदीन के मौड्यूल को तोड़ने में अहम भूमिका निभाने वाले आशीष पूनम के प्रेमजाल में फंसे हुए थे. आशीष करीब 40 साल के थे. पुलिस को घटना के दूसरे दिन एक और सुसाइड नोट मिला. उस में उन्होंने लिखा था कि पूनम शर्मा ने उन की जिंदगी बरबाद कर दी है. उस ने प्रदेश के कई पुलिस और अन्य अधिकारियों को भी अपनी सुंदरता के जाल में फांस रखा था. वह अपने साथियों के साथ मिल कर मुझे ब्लैकमेल कर रही थी.
एक पुलिस अफसर होने के नाते मैं ने उसे सजा दे दी. आशीष ने इस दूसरे सुसाइड नोट में लिखा था कि पूनम ने प्यार का नाटक कर मुझे व मेरे परिवार को तबाह कर दिया. वह अफसरों को अपनी सुंदरता के जाल में फंसाती थी. अपने इस सुसाइड नोट में आशीष ने पूनम के अलावा रोशन, दीपक, उमेश, प्रभाकर, महेश, नरसीराम व मुकेश मीणा आदि 7 लोगों के नाम और 5 मोबाइल नंबर लिख कर कहा था कि पुलिस इन से पूछताछ करे.
दूसरे दिन आशीष के साथ कार में मृत मिली उन की महिला मित्र की शिनाख्त हो गई. वह पूनम ही थी. इस के बाद पुलिस ने शिवदासपुरा थानाप्रभारी की रिपोर्ट पर आशीष प्रभाकर के खिलाफ पूनम की हत्या करने और उस के बाद सुसाइड करने का मामला दर्ज कर लिया. आशीष और पूनम के शवों का पोस्टमार्टम कराने के बाद पुलिस ने शव उन के घर वालों को सौंप दिए.
शव सौंपे जाते समय पूनम के घर वालों ने आरोप लगाया कि आशीष ने पूनम की हत्या कर दी और मरतेमरते उसे बदनाम भी कर गया. पूनम के घर वालों का कहना था कि उस के मोबाइल में न तो आशीष की कोई फोटो है और न ही नंबर. आशीष इस मामले को गलत दिशा दे कर खुद को सही साबित करना चाहता है.
पूनम का शव उस के घर वाले उसी दिन अलवर जिले के टहला थाना इलाके के गांव रामपुरा ले गए. रामपुरा में पूनम की अंत्येष्टि कर दी गई. दूसरी ओर आशीष के घर वालों ने आशीष के शव का जयपुर में ही अंतिम संस्कार कर दिया.
पुलिस की शुरुआती जांचपड़ताल में आशीष व पूनम की जो प्रेम कहानी सामने आई, वह इस प्रकार है—
आशीष अजमेर में अलवर गेट के रहने वाले जानेमाने साहित्यकार प्रफुल्ल प्रभाकर के बेटे थे. उन की 2 बहनें हैं. एक बहन की ससुराल जयपुर में है और दूसरी की ग्वालियर में. आशीष ने अजमेर के सेंट एंसलम से स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद डीएवी कालेज से ग्रैजुएशन किया. घर में साहित्य का माहौल होने के कारण आशीष ने बाद में पत्रकारिता की पढ़ाई की. उन्होंने एक साल तक एक दैनिक अखबार में बतौर ट्रेनी नौकरी भी की. बाद में उन का चयन राजस्थान पुलिस सेवा (आरपीएस) में हो गया. आशीष अपने काम के प्रति ईमानदार थे. वह शरमीले और सीधेसादे माने जाते थे.
काफी समय से आशीष जयपुर में रह रहे थे. जयपुर में अजमेरी गेट के पास उन्हें पुलिस क्वार्टर मिला हुआ था. दिल्ली पुलिस की स्पैशल सेल और राजस्थान एटीएस ने मार्च 2014 में जयपुर और जोधपुर में एक साथ काररवाई कर के इंडियन मुजाहिदीन मौड्यूल का खुलासा किया था.
इस में आईएम का सरगना तहसीन अख्तर उर्फ मोनू, बम मेकर वकास और जयपुर, जोधपुर तथा सीकर से कई लोग गिरफ्तार हुए थे. इस मामले की खोजबीन आशीष प्रभाकर ने की थी. पुलिसकर्मियों की हत्या कर करीब सवा साल पहले हिरासत से फरार हुए कुख्यात अपराधी आनंदपाल के गिरोह के कुछ गुर्गे पकड़ने में भी आशीष की अहम भूमिका रही थी.
कुछ साल पहले उन्होंने जयपुर में गोपालपुरा बाईपास पर अपने किसी परिचित के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने के लिए कोचिंग इंस्टीट्यूट खोला था.
पूनम अलवर जिले के रामपुरा गांव के रहने वाले लक्ष्मणप्रसाद शर्मा की बेटी थी. पूनम की शादी सन 2011 में हो गई थी, लेकिन कुछ समय बाद ही उस का पति से झगड़ा हो गया. उस समय जयपुर के माणक चौक थाने में पूनम की ओर से दहेज प्रताड़ना का केस दर्ज कराया गया था. आशीष तब माणक चौक इलाके के सर्किल अफसर थे. पूनम की अपने केस के सिलसिले में आशीष से मुलाकात होती थी. इन्हीं मुलाकातों के दौरान पूनम की आशीष से नजदीकियां बढ़ गईं. इस बीच पूनम का अपने पति से तलाक हो गया.
पूनम पढ़ीलिखी थी. पति से तलाक के बाद वह सरकारी नौकरी हासिल करने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने लगी. पूनम की इच्छा राजस्थान प्रशासनिक सेवा (आरएएस) की अधिकारी बनने की थी. इस के लिए वह आरएएस की कोचिंग करने लगी. आशीष प्रभाकर ने गोपालपुरा बाईपास पर कोचिंग सेंटर खोला तो पूनम उसी में पढ़ने के लिए जाने लगी. इसी दौरान पूनम और आशीष की प्रेमकहानी तेजी से आगे बढ़ने लगी.
सन 2011-12 में शुरू हुई पूनम और आशीष की प्रेमकहानी में करीब 6 महीने पहले उस समय मोड़ आ गया, जब पूनम आशीष पर शादी के लिए दबाव बनाने लगी. इस से आशीष का घरपरिवार बिखरने की नौबत आ गई. घटना से करीब एक महीने पहले आशीष जब आरपीए में ट्रेनिंग कर रहे थे, तब एक दिन आशीष का पूनम से किसी बात पर विवाद हो गया. इस पर पूनम ने जयपुर के बजाजनगर थाने जा कर आशीष प्रभाकर के खिलाफ प्रताड़ना की शिकायत दर्ज करा दी. आशीष को जब इस बात का पता चला तो वह घर से गायब हो गए और ट्रेनिंग छोड़ कर चले गए.
घटना वाले दिन 22 दिसंबर को एएसपी आशीष प्रभाकर शाम करीब साढ़े 5 बजे एटीएस औफिस से निकले. वहां से वह सीधे पूनम के निवास पर गए. इस दौरान उन्होंने शराब भी पी. पूनम को अपनी सरकारी कार स्कौर्पियो में साथ ले कर वह काफी देर तक सड़कों पर घूमते रहे. बाद में वह शिवदासपुरा इलाके में विधानी चौराहे की तरफ चले गए. वहां पहुंच कर आशीष ने फिर शराब पी. इस दौरान उन की पूनम से अपने संबंधों को ले कर बात होती रही.
रात करीब साढ़े 7 बजे आशीष ने अपने मोबाइल से पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर के 2 लोगों के शव पड़े होने की सूचना दी. इस के कुछ देर बाद ही आशीष ने अपना सर्विस रिवौल्वर निकाल लिया. आशीष के हाथ में रिवौल्वर देख कर पूनम घबरा गई. कार में आगे की सीट पर बैठी पूनम ने आशीष से रिवौल्वर छीनने की कोशिश की. इसी छीनाझपटी में रिवौल्वर से गोलियां चल गईं. ये गोलियां कार के शीशे और छत पर लगीं.
आशीष की पकड़ मजबूत थी. उन्होंने रिवौल्वर नहीं छोड़ा, बल्कि इस की जगह पूनम की दाईं कनपटी पर रिवौल्वर लगा कर गोली दाग दी. गोली लगते ही पूनम के सिर से खून का फव्वारा फूट निकला. वह सीट पर लुढ़क गई. आशीष को जब लगा कि पूनम मर चुकी है तो कुछ क्षण बाद उन्होंने अपने सर्विस रिवौल्वर से ही अपनी कनपटी पर गोली मार ली.
गोली लगते ही आशीष के सिर से भी खून निकलने लगा. ड्राइविंग सीट पर बैठे आशीष स्टीयरिंग पर ही लुढ़क गए. बाद में पुलिस को आशीष के रिवौल्वर की मैगजीन में 7 जिंदा कारतूस और कार में गोलियों के 2 खोखे मिले.
मामले की जांच के लिए पुलिस ने एएसपी आशीष प्रभाकर और पूनम के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाईं. इस से पता चला कि आशीष की पूनम से घटना के दिन से पहले 17 दिसंबर को बात हुई थी. जांच में यह भी जानकारी मिली कि आशीष ने दूसरे सुसाइड नोट में 7 लोगों के नाम लिखते हुए जो 5 मोबाइल नंबर लिखे थे, उन में 3 नंबर आशीष प्रभाकर और 2 नंबर पूनम के नाम से जारी हुए थे. पुलिस यह जांच कर रही है कि इन मोबाइल नंबरों के सिमकार्ड का उपयोग कौन कर रहा है. पुलिस यह भी पता लगा रही है कि पूनम के माध्यम से कोई व्यक्ति आशीष को ब्लैकमेल तो नहीं कर रहा था.
घटना के एक सप्ताह बाद 28 दिसंबर, 2016 को जांचपड़ताल के दौरान पुलिस को एटीएस कार्यालय में आशीष प्रभाकर के कमरे की तलाशी के दौरान उन की अलमारी से 2 सुसाइड नोट और मिले. इन में एक सुसाइड नोट में उन्होंने मातापिता से माफी मांगते हुए लिखा था कि ‘मैं आप का अच्छा बेटा साबित नहीं हो सका.’ बच्चों के नाम लिखे गए दूसरे सुसाइड नोट में उन्होंने लिखा था कि ‘मेरी तरह गलत रास्ते पर मत चले जाना. तुम लोग पढ़ाई करना, कभी हिम्मत मत हारना.’
ये 2 सुसाइड नोट और मिलने से यह बात सामने आई कि आशीष ने पूनम की हत्या करने के बाद सुसाइड करने की योजना पहले ही बना ली थी. आशीष ने घटना को अंजाम देने से पहले 4 सुसाइड नोट लिखे थे. इन में 2 नोट वह अपने औफिस की अलमारी में छोड़ गए थे और 2 नोट साथ ले गए थे.
कथा लिखे जाने तक पुलिस मामले की जांचपड़ताल में जुटी थी. मामले की तह तक जाने के लिए पूनम व आशीष के घर वालों के बयान लिए गए हैं. वहीं एटीएस के अधिकारियों व कर्मचारियों के बयान भी लिए गए हैं. पुलिस का मानना है कि मर्डर और सुसाइड की यह मिस्ट्री बेवफाई के इर्दगिर्द घूमती नजर आ रही है. पुलिस अफसर का मामला होने के कारण फिलहाल पुलिस इस मामले में पूरी गोपनीयता बरत रही है.
अफसरों का मानना है कि पूनम व प्रभाकर की कुछ समय से बात नहीं हो रही थी. इस का बड़ा कारण यह था कि पूनम की कुछ अन्य लोगों से मोबाइल पर बातचीत होती थी. संभवत: इसी बात से प्रभाकर खफा थे. उन्होंने इस बारे में कई बार पूनम को समझाने की कोशिश की, लेकिन पूनम ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. संभवत: पूनम की हत्या की वजह यह भी हो सकती है.
जयपुर में तैनात राजस्थान कैडर के आईपीएस अधिकारी पंकज चौधरी ने इस मामले में पुलिस विभाग पर ही सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने फेसबुक पेज पर पोस्ट किया था कि आशीष प्रभाकर की मौत टाली जा सकती थी. एक होनहार अधिकारी समाज और पुलिस विभाग पर कई सवाल छोड़ गए हैं. मैं जितना इस अधिकारी के बारे में जान सका हूं, यह पुलिस के लिए बड़ा नुकसान है.
ऐसे क्या कारण रहे कि पुलिस विभाग को इस अधिकारी की मानसिक दशा का आभास नहीं हो सका. पुलिस विभाग एक परिवार के रूप में है. क्या आशीष को सब से ज्यादा असुरक्षा और भय अपने ही विभाग से था, जो अपनी व्यथा विभाग के सामने रखने की हिम्मत नहीं जुटा सका. अगर ब्लैकमेलिंग व चीटिंग से परिवार तबाह होने के कगार पर था तो पुलिस पर भरोसा होना चाहिए था. इस के बदले उन्होंने यह मान लिया कि विभाग के अधिकारी उन का पक्ष नहीं मानेंगे और उन्हें हंसी का पात्र बना देंगे.
– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
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