मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से आजादी

बीते दिनों रामपुर में सुबह देर से उठने पर एक औरत के पति ने उसे तीन तलाक दे दिया. सुप्रीम कोर्ट में रोक लगने के बाद भी देशभर में तीन तलाक के सैकड़ों मामले सामने आए हैं.

मुरादाबाद की रहने वाली वरिशा को उस के पति ने मनमुताबिक दहेज न देने के चलते तीन तलाक देने की धमकी दी है. वरिशा ने आरोप लगाया कि उन से एक कार और 10 लाख रुपए नकद अपने मायके से लाने को कहा गया.

सुप्रीम कोर्ट ने 22 अगस्त, 2017 को तीन तलाक को गैरकानूनी करार दिया था. माना जा रहा था कि तीन तलाक पर रोक लगेगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका है. मुसलिम तबके में तलाक के मामलों को देखें तो 4 तलाकशुदा औरतों की तुलना में सिर्फ एक मर्द ही तलाकशुदा है.

जनगणना के आंकड़े भी यही बताते हैं कि 2001 से 2011 के बीच मुसलिम औरतों को तलाक देने में 40 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. जब तलाक के आंकड़ों की बात चली है तो फिर तलाकशुदा औरतों की हालत पर गौर करने के लिए 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर दूसरे नजरिए से भी नजर डालनी होगी.

2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक, प्रति एक लाख मुसलिमों में 1590 तलाकशुदा मर्द हैं, जबकि हिंदू मर्दों में यह आंकड़ा 1470 प्रति लाख है. फर्क बहुत कम है.

देश में प्रति एक लाख औरतों में से महज 3100 औरतें तलाकशुदा हैं, लेकिन इन में बगैर तलाक के छोड़ी हुई औरतें भी शामिल हैं.

आंकड़े बताते हैं कि मुसलिम औरतों में प्रति एक लाख में 5630 औरतें तलाकशुदा हैं, जबकि हिंदू औरतों में यह आंकड़ा केवल 2600 ही बताया जाता है.

इस से साफ जाहिर है कि मुसलिम समाज में तलाकशुदा औरतों की आबादी तलाकशुदा मर्दों के मुकाबले साढ़े 3 गुना ज्यादा है.

आंकड़ों की जबानी देशभर में तलाकशुदा औरतों की आबादी में सब से ज्यादा 39 फीसदी 20 से 34 साल की उम्र की हैं, जबकि मुसलिम समुदाय में इस उम्र सीमा की सब से ज्यादा तलाकशुदा औरतें हैं.

तलाकशुदा औरतों में 43.9 फीसदी औरतें 20 से 34 साल की उम्र की हैं, जबकि इसी उम्र सीमा में सिख समुदाय में 42.2 फीसदी, बौद्ध समुदाय में 40 फीसदी, हिंदू समाज में 37.6 फीसदी, ईसाई समाज में 33.5 फीसदी और जैन समाज में 25.5 फीसदी औरतें हैं.

तलाकशुदा औरतों में 19 साल से कम उम्र की औरतें 3.2 फीसदी हैं. इस में भी मुसलिम औरतों की हिस्सेदारी सब से ज्यादा 3.9 फीसदी है.

हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन और ईसाई समुदाय में तलाक अदालत के जरीए ही हो सकता है. लिहाजा, इन समुदायों में तलाक पर इतना बवाल नहीं मचता, लेकिन मुसलिम समाज में जबानी तलाक को मंजूरी है और आसान होने के चलते इसी का चलन भी ज्यादा है.

इन आंकड़ों से साफ है कि एक बार में तीन तलाक रोकने के लिए एक सख्त कानून बनाए जाने की जरूरत पहले से महसूस की जा रही थी. एक बार में तीन बार तलाक यानी तलाक ए बिद्अत को जुर्म ऐलान करने और सजा तय करने संबंधी विधेयक गुरुवार, 28 दिसंबर, 2017 को लोकसभा में तकरीबन 6 घंटे की लंबी बहस के बाद पास हो गया. पर अब राज्यसभा में अटक गया है.

लोकसभा में पेश तीन तलाक बिल के मुताबिक, अब जबानी, लिखित या किसी इलैक्ट्रौनिक तरीके जैसे ह्वाट्सऐप, ईमेल और एसएमएस से एकसाथ तीन तलाक देना गैरकानूनी व गैरजमानती भी होगा. इस कानून में एक बार में तीन तलाक कहना अपराध होगा और   कुसूरवार को 3 साल की सजा होगी. इस में औरत अपने नाबालिग बच्चों की सिक्योरिटी और गुजारा भत्ते का दावा भी कर सकेगी.

यकीनी तौर पर यह बिल जकिया हसन, उत्तराखंड की सायरा बानो, फरहत नकवी, यासमीन, नगमा जैसी सैकड़ों मुसलिम औरतों की जद्दोजेहद और लंबी कोशिश की जीत है.

दरअसल, मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड अगर समय के साथ तीन तलाक को खत्म करने की कोशिश करता तो आज अदालत को दखल नहीं देना पड़ता और सरकार को बिल नहीं लाना पड़ता.

बंगलादेश, मिस्र, मोरक्को, इराक, इंडोनेशिया, मलयेशिया, सूडान, संयुक्त अरब अमीरात, जौर्डन, कतर, श्रीलंका व पाकिस्तान समेत 22 मुसलिम देशों में बहुत पहले से ही तीन तलाक को कानून बना कर रोका जा चुका है.

मिस्र ने साल 1929 में ही इस पर रोक लगा दी थी. लेकिन भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष व लोकतांत्रिक देश में तीन तलाक का जारी रहना चिंता की बात थी. इसीलिए देश की सब से बड़ी अदालत ने कई मुसलिम औरतों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए तीन तलाक को गैरकानूनी करार दे कर लाखों मुसलिम औरतों की आबरू की हिफाजत की थी और सरकार से इस पर कानून बनाने के लिए कहा था.

तीन तलाक के खिलाफ आए बिल पर जब कानून बन जाएगा तो इस से मुसलिम औरतों की आबरू की हिफाजत होगी, उन्हें कानूनी सिक्योरिटी मिलेगी और इज्जत से जीने का हक मिलेगा. साथ ही, उन के पास तीन तलाक के खिलाफ एक कानूनी हथियार होगा.

अब यह भी दिलचस्प है कि इस कानून का असर क्या होगा मुसलिम औरतों को अब अगर कोई तीन तलाक देता है तो उन के सामने क्या रास्ता होगा इस से उन की जिंदगी में क्या कुछ बदलेगा. तीन तलाक विरोधी कानून लागू होने के बाद अगर कोई पति अपनी पत्नी को एक समय में तीन बार तलाक देने की बात कहता है तो पत्नी कानून की शरण में जा कर इंसाफ की लड़ाई लड़ सकेगी यानी यह कानून मुसलिम औरतों को कानूनी ताकत देगा.

तीन तलाक का बनने वाला नया कानून पीडि़त औरत को मजिस्ट्रेट के पास जाने का मौका देगा. इस से वह औरत अपने साथ हुई नाइंसाफी के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ सकेगी.

एकसाथ तीन तलाक देने वाले को एक साल से 3 साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है. इस के लिए पत्नी को कोर्ट में यह साबित करना पड़ेगा कि उस के पति ने उसे एक समय में तीन तलाक दिया है.

तीन तलाक पीडि़त पत्नी और बच्चों को इज्जत की जिंदगी जीने के लिए गुजारा भत्ता मिलेगा. साथ ही, पत्नी अपने नाबालिग बच्चों की सिक्योरिटी की भी हकदार है. लेकिन इसी के साथ कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं कि पति जब जेल में होगा तो पत्नी और बच्चों का खर्च कौन देगा जब तीन तलाक गैरकानूनी है तो सजा क्यों और कैसी और किसी तीसरे की शिकायत पर केस कैसे क्या इस से तीन तलाक रुक जाएगा. यह हिंदू सरकार की मनमानी है.

शरीअत में तलाक ए अहसन और तलाक ए हसन नाम से शादी खत्म करने के 2 और रास्ते हैं. इस के तहत एक तय समय के अंतराल के बाद तलाक कहने का प्रावधान है और सुलह की गुंजाइश रखी गई है.

तलाक की यह प्रक्रिया काजी या मौलवी की देखरेख में गवाहों के साथ होती है. इसीलिए मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड के इन दावों में कोई दम नहीं है कि इस के जरीए सरकार शरीअत में दखल देना चाहती है.

देश के कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने लोकसभा में कहा कि यह केवल तलाक बिद्दत को ले कर है.

बिल पेश होने के बाद जिस तरह से मुसलिम औरतों ने खुशी जाहिर की है और बड़ी तादाद में वे कानून मंत्री से मिलने उन के घर गईं, उस से लगता है कि तीन तलाक के खिलाफ कठोर कानून यकीनी तौर पर जरूरी है.

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डोनाल्ड ट्रंप का येरूशलम को राजधानी मानना

येरूशलम को इसराईल की राजधानी का दरजा देने की अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की घोषणा से विश्व राजनीति में तूफान आ गया है. यह अमेरिका की कूटनीतिक रणनीति के बदलाव का संकेत है और अमेरिका दुनिया का पहला देश बना जो आधिकारिक रूप से येरूशलम को इसराईल की राजधानी के रूप में मान्यता दे रहा है.

इतिहास में येरूशलम को यहूदियों की राजधानी होने के प्रमाण उपलब्ध हैं. ट्रंप ने अमेरिका के दूतावास को तेलअवीव से येरूशलम में शिफ्ट करने की भी घोषणा तो कर दी है लेकिन, यह इतना भी आसान काम नहीं है. अमेरिका की विदेश नीति का यह बदलाव मिडिल ईस्ट (खाड़ी देशों) के शक्ति संतुलन को बिगाड़ कर हिंसा भड़काने का कारण बन सकता है. अरब देश इस फैसले का उग्र विरोध कर रहे हैं.

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि येरूशलम को इसराईल और फिलिस्तीन दोनों ही अत्यंत पवित्र मानते हैं. येरूशलम की भूमि को 3 धर्मों ईसाई, यहूदी व इसलाम में पवित्र माना गया है. इसराईल और फिलिस्तीन में लंबे समय से यह संघर्ष का कारण बना हुआ है. दोनों ही इस पर अपना नैसर्गिक अधिकार मानते हैं. इसराईल शुरू से ही इस पर दावा करता रहा है जबकि फिलिस्तीन इसे अपने देश की भविष्य की राजधानी मानता है.

1948 में इसराईल के स्वतंत्र राष्ट्र बनने से अभी तक किसी भी देश ने येरूशलम को इसराईल की राजधानी का दरजा नहीं दिया है. अपने कदम से मध्य एशिया में अमेरिका के समर्थक सऊदी अरब के शाह सलमान और मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतेह अलसीसी की चेतावनी को भी डोनाल्ड ट्रंप ने खारिज कर दिया है. इसराईल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने इस कदम का दिल खोल कर स्वागत किया है जबकि फिलिस्तीन ने इसे मध्य एशिया में शांति प्रक्रिया खत्म होने का सूचक माना है. गाजा में ट्रंप और इसराईल के विरोध में उग्र हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं.

येरूशलम का इतिहास यहूदियों के संघर्ष, बलिदान और त्याग का रहा है. हिब्रू में येरूशलम को येरूशलाइम और अरबी में अलकुद्स के नाम से जाना जाता है. दुनिया का यह प्राचीन शहर बारबार आक्रमणकारियों का शिकार रहा है. यहीं से 3 धर्मों के उद्गम की मान्यता भी है, इसलिए ईसाई, यहूदी और इसलाम धर्म में इस जगह का विशिष्ट स्थान है. यही संघर्ष का कारण भी है. इस शहर की आत्मा पुराने शहर में दिखती है. संकरी गलियां, ऐतिहासिक स्थापत्य के विलक्षण नमूने इस के 4 भागों को ईसाई, मुसलिम, यहूदी और आर्मेनियन से जोड़ते हैं.

ईसाई धर्म : इसराईल में ईसाई हिस्से में पवित्र सेपुलकर चर्च है जो प्राचीनतम ईसा मसीह की गाथाओं से जुड़ा है कि यहीं ईसा को सूली पर चढ़ाया गया और कहा जाता है कि यहीं ईसा फिर से जीवित हुए.

इसलाम धर्म : मुसलिम हिस्से में गुंबदाकार डोम औफ रौक अथवा कुव्वतुल सखरह और अलअक्सा मसजिद हैं जो मुसलिमों के लिए हरम अलशरीफ यानी पवित्र स्थान है. मान्यता है कि पैगंबर मोहम्मद साहब मक्का से यहां आए और यहीं सभी पैगंबरों से दुआ की और वे यहीं से जन्नत तशरीफ ले गए.

यहूदी धर्म : यहूदी हिस्से में पवित्र दीवार है जहां अतीत में यहूदियों का मंदिर था, जिस की दीवारें आज भी इतिहास की निशानी के रूप में बची हुई हैं. यह यहूदियों की पवित्रतम जगह ‘होली औफ होलीज’ है. यहां लाखों यहूदी आ कर प्रार्थना करते हैं.

अमेरिका के फैसले के कारण

अमेरिका ने अपने इस ऐतिहासिक कदम से इसराईल-यहूदियों के प्रति अपनी पक्की दोस्ती पर फिर से मुहर लगा दी है. इस रणनीतिक फैसले से ट्रंप ने अमेरिका में रह रहे यहूदियों की शक्तिशाली लौबी को संतुष्ट कर दिया है. अमेरिका के विकास में यहूदियों का बड़ा हाथ है और ट्रंप ने उन का समर्थन पा कर अपने देश में अपनी स्थिति मजबूत कर ली है.

येरूशलम शहर पर हजारों सालों से कब्जा करने की जंग लड़ी गई. येरूशलम के लिए धर्मयुद्ध लड़े गए. लेकिन इतिहास और अतीत के अन्याय का प्रतिफल अब इसराईल को प्राप्त हो सकेगा. यह सभ्यताओं के संघर्ष का जीवंत उदाहरण है. ट्रंप के फैसले से द्विराष्ट्र की संभावना खारिज हो गई है जिस के अनुसार, येरूशलम को भविष्य में 2 हिस्सों में बांट कर यहूदियों और फिलिस्तीन के अंतहीन संघर्ष को समाप्त करने का सब से कारगर समाधान समझा जा रहा था. वैसे, ट्रंप ने अविभाजित येरूशलम शब्द का प्रयोग नहीं किया है, इसलिए यह विश्व कूटनीति में ट्रंप की नई चाल साबित होगी.

ट्रंप की घोषणा के माने

येरूशलम को इसराईल की राजधानी मानने की घोषणा कर ट्रंप ने अपने कार्यकाल में इसराईल-फिलिस्तीन समस्या का समाधान करने के स्पष्ट संकेत दे कर, श्रेय लेने की इच्छा व्यक्त कर दी है. इस से फिलिस्तीन की स्थिति और कमजोर हो गई है जबकि इसराईल सशक्त हो गया है. यही कारण है कि अरब राष्ट्र हिंसक हो रहे हैं और इसराईल में जश्न मनाए जा रहे हैं.

विश्व राजनीति में तूफान

ट्रंप के येरूशलम को इसराईल की राजधानी का दरजा देने की घोषणा से पूरी दुनिया में भूचाल आ गया है. फ्रांस, जरमनी, ईरान ट्रंप के इस फैसले का समर्थन नहीं कर रहे हैं. भारत के लिए दुविधा की स्थिति है, सो, उस ने संतुलित प्रतिक्रिया व्यक्त की है.

इस सब से यह स्पष्ट हो जाता है कि इन परिस्थितियों में डोनाल्ड ट्रंप की घोषणा से विश्व राजनीति और इसराईल को ले कर नए समीकरण बनेंगे और यहूदी फिर से नए संघर्ष में उलझेंगे जो उन का इतिहास रहा है. आइए, यहूदियों के संघर्ष का ऐतिहासिक परिचय लें.

इसराईल निहायत छोटा सा देश है जो पश्चिमी एशिया की विकट भौगोलिक परिस्थितियों, चहुंओर दुश्मनों से घिरे होने के बावजूद संघर्ष में कभी घुटने नहीं टेकता. उस का मूल मंत्र है- ‘हम नहीं कहते कि हमारे ऊपर आतंकी हमला मत करो, लेकिन याद रखो, अगर हमारा एक नागरिक मारा गया तो हम उस देश में घुस कर उस के हजारों नागरिक मार डालेंगे.’

इसराईल की खूबियां

इतिहास में मिसाल बने यहूदी कई माने में अन्य प्रजातियों से अग्रणी हैं. कम संख्या होते हुए भी कड़ी मेहनत, दृढ़निश्चय, ईमानदार प्रयास, उच्च मनोबल, अजेय जज्बा, स्वाभिमान, देशभक्ति में उन को कोई संदेह नहीं है. इसलिए दुनिया के किसी भी कोने में रहने के बावजूद यहूदियों ने वहां अपनी योग्यता के दम पर दबदबा कायम किया है. उन्होंने व्यापार, वाणिज्य, कला, विज्ञान, साहित्य, शिक्षा के उच्च मापदंड स्थापित किए हैं. उन की काबिलीयत और मेहनतकश जीवन हमलावरों के नफरत का कारण बने. जब जिस का वश चला उन को अपनी धरती से बेदखल किया, इसलिए 1948 तक वे दरदर की ठोकरें खाते रहे. अनेक महान वैज्ञानिक यहूदी थे, जैसे आइंस्टाइन, आटोहोन यहूदी थे. यदि हिटलर यहूदियों का संहार नहीं करता तो शायद यहूदी जरमनी से पलायन कर अमेरिका में शरण नहीं लेते. तब परमाणु बम हिटलर के पास होता जो अमेरिका को मिला, जिस से वह दुनिया का नेता बन बैठा.

इसराईल चारों तरफ से दुश्मनों से घिरा है. दांतों के बीच जीभ की तरह उस की सुरक्षा आसान नहीं. बेइंतहा खतरों को झेलते हुए इसराईल का प्रथम उद्देश्य हर कीमत पर अपनी सुरक्षा करने की गारंटी बन गया है.

इसराईल एकमात्र यहूदी राष्ट्र है जो आकार और जनसंख्या में बहुत छोटा है. विकट भौगोलिक परिस्थितियां, संसाधनों की कमी के बावजूद इसराईल ने विकास की मिसालें कायम की हैं. प्राचीन शास्त्रीय भाषा हिबू्र यहां पुनर्जीवित हुई है. यहां महिलाओं को भी अनिवार्यरूप से सैनिकसेवा करनी होती है.

इसराईल का सैटेलाइट सिस्टम अनोखा है जिसे वह गुप्त रखता है. इसलिए कोई भी दुश्मन उस की तरफ आंख उठा कर भी नहीं देखता. सीमित पेयजल के बावजूद इसराईल ने 7 गुना खाद्यान्न की उत्पादन वृद्धि का चमत्कार कर दिखाया है. 20वीं सदी से 21वीं सदी में यहां हरियाली बढ़ी है.

इसराईल की वायुसेना का कोई मुकाबला नहीं. यह संपूर्ण देश ही बैलिस्टिक मिसाइल से लैस है. सो, इसराईल पर अगर दुश्मन रौकेट दागते हैं तो इस का मतलब है उन की मौत निश्चित है. कंप्यूटर के मामले में इसराईल का मुकाबला नहीं है. जन्म के बाद उस ने 7 लड़ाइयां लड़ी हैं. जिन में वह विजयी रहा है. अपनी राष्ट्रीय आय का सब से ज्यादा हिस्सा वह अपनी सुरक्षा पर खर्च करता है.

इसराईल सुरक्षात्मक नीति की जगह आक्रामक नीति पर चलता है. उस का ध्येय है- ‘अगर किसी ने हमारा एक नागरिक मारा तो हम उस के देश में घुस कर उस के हजार नागरिक मार डालेंगे.’ उस के दुश्मनों का संसार के किसी भी कोने में जिंदा रहना संभव नहीं. इसराईल में 90 प्रतिशत घरों में सौर ऊर्जा प्रयोग की जाती है. व्यापारिक मामलों में इसराईल का विश्व में तीसरा स्थान है. वहां 3,000 से ज्यादा हाईटैक कंपनियां हैं. इसराईल का सब से ज्यादा शरणार्थियों को अपने यहां बसाने का रिकौर्ड है. दुनियाभर के यहूदियों को जन्म लेते ही इसराईल की नागरिकता मिल जाती है. फिर उस का मन करे तो वहां बस सकता है.

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गुप्तचर संस्था मोसाद

मोसाद के बिना इसराईल की कल्पना भी असंभव है. यह वहां की गुप्तचर संस्था है जो पूरी दुनिया से बेजोड़ है. चूंकि हजारों साल यहूदियों ने अपने अस्तित्व और राष्ट्र के लिए संघर्ष किया, इसलिए इसराईल देश की स्थापना के साथ ही ऐसे संगठन की जरूरत महसूस हुई जो पूरी दुनिया में इसराईल को महफूज रखे. अभी तक मोसाद यहूदियों के मापदंडों पर खरी उतरी है. इतिहास में इस की 13 दिसंबर, 1949 को स्थापना हुई. रोचक तथ्य यह है कि इसराईल के प्रधानमंत्री इसी संगठन से निकले हुए होते हैं.

यह संगठन संपूर्ण विश्व में इसराईल के हितों की रक्षा करता है. उस की तरफ उठने वाली हर आंख को फोड़ देना उस का उद्देश्य है. इस का नामकरण यहूदी पैगंबर मूसा के नाम पर हुआ. साफ है कि यहूदी असंभव से असंभव परिस्थितियों में भी हार मानने वाले नहीं हैं. उन का राष्ट्रवाद पूरे विश्व के लिए अनुकरणीय है. आगामी राजनीतिक परिदृश्य पूरी दुनिया के लिए कुतूहल का विषय होगा. अमेरिका और इसराईल के नए राजनीतिक समीकरण विश्व में क्या गुल खिलाते हैं, यह फिलहाल भविष्य के गर्भ में है.

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अगले साल वैलेंटाइन पर रिलीज होगी फिल्म ‘गली बौय’

आलिया भट्ट और रणवीर सिंह की फ्रेश जोड़ी को स्‍क्रीन पर साथ देखने के लिए उनके फैन्‍स काफी बेकरार है. ऐसे में इन दोनों के फैन्‍स के लिए खुशखबरी आई है. आलिया रणवीर की फिल्‍म ‘गली बौय’ अगले साल वैलेंटाइन्‍स डे पर रिलीज होने वाली है.

आलिया और रणवीर दोनों ने इस फिल्‍म की रिलीज डेट के साथ ही अपना पहला लुक भी सोशल मीडिया पर शेयर किया है. इस फिल्‍म का निर्देशन जोया अख्तर कर रही हैं. ‘गली बौय’ के लिए रणवीर ने अपना काफी वजन घटाया है. इस फिल्‍म के लुक की बात करें तो दोनों ही किरदार काफी इंटेंस लुक में नजर आ रहे हैं.

जोया अख्‍तर के साथ ‘दिल धड़कने दो’ के बाद यह रणवीर सिंह की दूसरी फिल्‍म होगी. जोया बड़े सितारों वाली फिल्मों के बजाय उम्दा कहानियों वाली फिल्मों के बेहतर प्रदर्शन करने के नए चलन को ‘एक बड़ा सकारात्मक बदलाव’ मानती हैं. आप भी देखें आलिया और रणवीर का यह लुक.

गली बौय’ के डायलोग जोया अख्‍तर के भाई फरहान अख्‍तर लिख रहे हैं. अपनी इस नई फिल्‍म के लिए रणवीर सिंह काफी तैयारी कर रहे हैं और अपने बाल कटवाकर वह अपने इस नए किरदार के लिए भी तैयार हो गए हैं. इस फिल्‍म में रणवीर सिंह एक रैपर बने नजर आएंगे. जोया अख्‍तर की यह फिल्‍म एक ऐसे लड़के की कहानी है जो मुंबई की झुग्‍गी बस्‍ती में रहता है और फिर रैपर बनता है.

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सोशल मीडिया पर छाया अभिनेत्री का बोल्ड अवतार

तेलुगू इंडस्ट्री से बौलीवुड में एंट्री करने वाली अभिनेत्री रकुल प्रीत सिंह फिल्म या‍रियां के बाद एक बार फिर बौलीवुड में छाने को तैयार है. ये पंजाबी कुड़ी इन दिनों अपनी अपकमिंग फिल्म अय्यारी को लेकर चर्चा में हैं. वह इस फिल्म में एक्टर सिद्धार्थ मल्होत्रा और मनोज बाजपेयी के साथ नजर आएंगी.

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पिछले काफी समय से अपनी फिल्म के प्रमोशन में जुटी रकुल प्रीत अब अपने एक बोल्ड फोटोशूट को लेकर सुर्खियों में आ गई हैं. उन्होंने एक प्रतिष्ठित मैगजीन के लिए ये बोल्ड अवतार लिया है. इस फोटोशूट की कुछ तस्वीरों को रकुल ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर किया है. रकुल के ये फोटोज काफी वायरल हो रहे हैं.

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मैगजीन के लिए कराए गये इस बोल्ड फोटोशूट में वह काफी खूबसूरत और स्टनिंग लग रही हैं. इन तस्वीर में रकुल व्हाइट शौर्ट ड्रैस में नजर आ रही हैं. इस फोटो में उन्होंने फ्लावर प्रिंट का श्रग लिया हुआ है.

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आपको बता दें कि दिल्ली के पंजाबी परिवार में जन्मीं रकुल प्रीत ने कन्नड़ इंडस्ट्री से अपने ऐक्टिंग करियर की शुरुआत की. उन्होंने दिल्ली के जीसस एंड मैरी कौलेज से पढ़ाई पूरी की और 18 साल की उम्र में ही मौडल के रूप में अपना सफर शुरू कर दिया था. एक्टर के अलावा रकुल गोल्फ खिलाड़ी भी हैं और नेशनल लेवल पर खेल भी चुकीं है. रकुल का हैदराबाद में एक जिम भी है. बताया जाता है कि शहर में उन्‍होंने 3 करोड़ रुपये का मकान भी खरीदा है ज‍समें वह अपने माता-पिता के साथ रहती हैं.

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रकुल ने साल 2014 में फिल्म यारियां से बौलीवुड में डेब्यू किया था. रकुल की फिल्म अय्यारी पहले 9 फरवरी को रिलीज होने वाली थी लेकिन फिल्म में कुछ बदलाव की वजह से इसे अब 16 फरवरी को सिनेमाघरों में रिलीज किया जाएगा. देखते हैं बौलीवुड में इस फिल्म के जरिए रकुल का करियर ग्राफ किस मुकाम तक पहुंचता है.

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मिशन इन्पौसिबल : क्या आपने देखा पर्दे के पीछे का वीडियो

हौलीवुड अभिनेता टौम क्रूज अपकमिंग फिल्म ‘मिशन इन्पौसिबल’ को लेकर सुर्खियों में हैं. हाल ही में फिल्म का ट्रेलर रिलीज हुआ है. ट्रेलर में टौम जबरदस्त एक्शन करते हुए नजर आ रहे हैं. लेकिन इसी दौरान अभिनेता टौम क्रूज ने फिल्म ‘मिशन इन्पौसिबल’ के एक वीडियो को सोशल मीडिया पर शेयर किया है.

वीडियो में टौम जबरदस्त एक्शन करते हुए नजर आ रहे हैं. टौम ने वीडियो शेयर करते हुए लिखा वह हमेशा से इस तरह की फिल्म करना चाहते थे, यहां देखिए हेलीकौप्टर स्टंट का लुक. वीडियो में टौम हेलीकौप्टर स्टंट करते हुए नजर आ रहे हैं. फिल्म ‘मिशन इन्पौसिबल: फौलआउट’ सीरीज का छठी फिल्म है.

हौलीवुड अभिनेता टौम ने अपने औफिशियल ट्विटर अकाउंट से एक वीडियो शेयर किया है. वीडियो में वह एक हेलीकौप्टर स्टंट की शूटिंग करते हुए नजर आ रहे हैं. वीडियो को शेयर करते हुए टौम ने कैप्शन लिखा, वह हमेशा से इसी तरह की सीरीज को करना चाहते थें.

55 साल के टौम वीडियो में जबरदस्त स्टंट करते हुए नजर आ रहे हैं. वीडियो में फिल्म के प्रोडक्शन हाउस से जुड़े हुए लोग भी नजर आ रहे हैं. टौम वीडियो में हेलीकौप्टर स्टंट करते हुए दिखाई दे रहे हैं. टौम की सुरक्षा के लिए प्रोडक्शन हाउस की ओर से 13 हेलीकौप्टर लगाए गए थे जिनमें कैमरे भी लगे थे. टौम से पहले किसी अन्य इस तरह के स्टंट को नहीं किया. वीडियो में लोग कहते हुए नजर आ रहे है कि टौम किसी भी काम को पूरे मन और फोकस होकर करते हैं.

टौम के द्वारा शेयर किए गए वीडियो को अब तक 2 लाख 60 हजार से ज्यादा लोग देख चुके हैं इसके साथ ही 15 हजार लोग वीडियो को लाइक कर चुके हैं. वीडियो में जौन के फैंस कमेंट कर अपना रिएक्शन भी दे रहे हैं. टौम के वीडियो में कुछ लोगों ने कमेंट कर लिखा, आप में दीवानगी है और इसलिए हम आपको प्यार करते हैं. कुछ लोगों ने लिखा, मिशन इम्पौसिबल में सबकुछ रियल होता है इसलिए ही हम उसे पसंद करते हैं. टौम क्रूज के ट्विटर पर 6 मिलियन से ज्यादा फौलोवर्स हैं.

VIDEO : अगर प्रमोशन देने के लिए बौस करे “सैक्स” की मांग तो…

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इस एक्ट्रेस का टौपलेस फोटोशूट हुआ वायरल

बौलीवुड में अक्सर ही कोई ना कोई हिरोईन अपने हौट फोटोशूट को लेकर सुर्खियां बटोरती ही रहती हैं. इसी लिस्ट में अब एक और नाम जुड़ गया है. ये अभिनेत्री कोई और नहीं बल्कि सुल्तान, शानदार, नाम शबाना और नूर जैसी हिट फिल्मों का हिस्सा रहीं अभिनेत्री शिबानी दांडेकर है.

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शिबानी दांडेकर ने हाल ही में टौपलैस फोटोशूट कराया है. फोटोशूट की तस्वीरें उन्होंने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट से भी शेयर की हैं. ये तस्वीरें खूब वायरल हो रही हैं. बेहद ही हौट और बोल्ड दिखने वाली उनकी तस्वीरें बौलीवुड की कई हौट और सेक्सी हिरोईनों को टक्कर दे रही है.

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सोशल मीडिया पर वायरल हो रही उनकी टौपलेस तस्वीरों पर कुछ लोगों ने भद्दे कमेंट भी किए हैं. एक यूजर ने लिखा- आखिर यह किस तरह की बहादुरी है? लेकिन एक ओर जहां उन्हें लोग सोशल मीडिया पर ट्रोल कर रहे हैं वहीं उनकी इस तस्वीर को कुछ ही घंटों में 50 हजार से ज्यादा लोग लाइक कर चुके हैं.

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब शिबानी ने टौपलेस फोटोशूट कराया हो. इससे पहले भी वह इस तरह की तस्वीरें खिंचवा कर सुर्खियों में आ चुकी हैं.

सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने वाली शिवानी अब तक अपने इंस्टाग्राम अकाउंट से तकरीबन ढाई हजार तस्वीरें अपलोड कर चुकी हैं. 9 लाख से ज्यादा लोग उन्हें इंस्टाग्राम पर फौलो करते हैं. शिबानी ने मौडलिंग से लेकर एक्टिंग और सिंगिंग तक के क्षेत्र में अपना हुनर दिखाया है.

शिबानी की खुद के नाम से एक वेबसाइट भी है जहां पर आप उसकी तस्वीरों से लेकर उनकी ब्लौग तक सब कुछ देख सकते हैं. इतना ही नहीं इसी वेबसाइट से शिबानी को किसी इवेंट के लिए संपर्क किया जा सकता है.

हाल ही में शिबानी ने भी फिल्म ‘पैडमैन’ की रिलीज से पहले चल रहा ‘पैडमैन चैलेंज’ लिया था और सैनिटरी पैड के साथ अपनी तस्वीर अपलोड की थी.

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साप्ताहिक बाजार : ग्राहक और दुकानदार का जलाए चूल्हा

भारतीय जनता पार्टी की पौलिसियां ऐसी हैं कि बड़े अमीर उद्योगपतियों के दिन अच्छे आ रहे हैं पर छोटे व्यापारियों पर गाज गिर रही है. शेयर मार्केट में जबरदस्त उछाल आ रहा है पर साधारण बाजारों व साप्ताहिक बाजारों में ठंडक बढ़ रही है. यह सरकार की जीएसटी, नोटबंदी, सीलिंग, औनलाइन अनुमतियों, कैशलैस व्यापार जैसी नीतियों की वजह से हो रहा है.

इन सब बातों से तमाम सवाल दिलोदिमाग पर गहरा असर करते हैं जैसे क्या कोई आदमी कम जमापूंजी लगा कर 10-12 कामगारों को अपने पास रख कर मोबाइल फोन बना सकता है और अगर ऐसा हो भी जाए तो क्या वह अपने बनाए गए मोबाइल फोन बाजार में बेच कर अच्छा मुनाफा कमा सकता है?

ऐसा मुमकिन सा नहीं लगता है, क्योंकि बाजार में कम दामों पर नई टैक्नोलौजी वाले मोबाइल फोन मुहैया हैं. मुहैया क्या उन की भरमार है जो बड़े पैमाने पर बनते हैं जिन में सैकड़ों लोग काम करते हैं और अरबों की पूंजी लगी होती है-धन्ना सेठों की.

दूसरा सवाल. क्या कोई आदमी कम पूंजी लगा कर 10-12 कामगारों को अपने पास रख कर अगरबत्ती और धूपबत्ती बनाने का कारोबार कर के मुनाफा कमा सकता है, चाहे उस का बनाया गया सामान ब्रांडेड न भी हो हां, ऐसा हो सकता है और हो भी रहा है. वजह, ऐसे घरेलू सामान बनाने और उसे बेचने के लिए बड़े बाजार या किसी मौल की जरूरत नहीं होती है बल्कि अगर उन्हें अलगअलग शहरों, कसबों और यहां तक कि गांवों के साप्ताहिक बाजारों में भी बेचा जाए तो ग्राहक खूब मिल सकते हैं.

साप्ताहिक बाजरों की रौनक ही अलग होती है. वहां छोटेछोटे दुकानदारों का जमावड़ा होता है. वहां लोग अपनी दैनिक जिंदगी से जुड़ी चीजें खरीदते हैं. तकरीबन दोपहर को लगने वाले ऐसे बाजार शाम का अंधेरा होने के बाद धीरेधीरे उठने लगते हैं. कुछ तो रात के 10-11 बजे तक भी रौनक बनाए रखते हैं.

ऐसे बाजारों में सबकुछ बिकता है जैसे सब्जियां, कपड़े, मसाले, फल, रसोई के दूसरे सामान, बच्चों के खिलौने, कपड़े व नकली चमचमाते गहने तक. कहींकहीं पर तो पुराने मोबाइल फोन, बिजली का सामान, मिठाइयां, नमकीन व खानेपीने के दूसरे सामान भी मिल जाते हैं. मोलभाव करो. एक चीज पसंद न आए तो दूसरी चीज खरीद लो.

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ऐसे साप्ताहिक बाजार महंगाई की मार से बचने के उपाय लगते हैं. इन में सस्ती चीजें आसानी से मिल जाती हैं. यहां तक कि दालचावल, मसाले किलो के हिसाब से तो मिलते ही हैं, साथ ही अगर कोई 100 ग्राम या पाव, किलो भी खरीदना चाहे तो उसे मायूसी हाथ नहीं लगती है.

22 साल का रमेश पिछले 4 साल से अपने पिता के साथ साप्ताहिक बाजार में दुकान लगाता है. रमेश रहता तो दिल्ली के नांगलोई इलाके में है लेकिन उसकी दुकान हर दिन अपनी जगह बदल लेती है. कभी दक्षिणपुरी में तो कभी कल्याणपुरी में. कभी चिराग दिल्ली में तो कभी मालवीय नगर में. इसी तरह दूसरी तमाम जगहों पर भी.

रमेश की दुकान इन साप्ताहिक बाजारों में उस की साइकिल पर लगती है जिस में वह औरतों और बच्चों के कपड़े बेचता है. इस साइकिल पर साड़ी, ब्लाउज, पेटीकोट और बच्चों के कपड़े टांगे जाते हैं और ग्राहकों को लुभाने के लिए रमेश अजीब तरह की आवाज दे कर उन्हें अपने पास बुलाता है.

कुछ थोड़े बड़े दुकानदार भी होते हैं. उन में से एक हैं 51 साल के ज्ञानीदास. उन की दुकान लकड़ी के तख्तों पर सजती है. वे चादरें बेचते हैं. उन की दुकान पर चादरों की भरमार रहती है. ज्ञानीदास बड़े दुकानदार हैं. वे गल्ले पर बैठते हैं जबकि उन के 2 बेटे और 3 नौकर ग्राहकों से रूबरू होते हैं, पर हरदम उन की पैनी नजर हर ग्राहक पर रहती है.

तीनों नौकरों का काम है हाथ हिलाहिला कर और शोर मचा कर लोगों को अपनी दुकान की ओर खींचना. ज्ञानीदास की नजर अपने गल्ले के अलावा नौकरों पर भी रहती है कि कहीं वे कामचोरी तो नहीं कर रहे हैं.

अपनी दुकान के बारे में ज्ञानीदास ने बताया, ‘‘मैं पिछले 28 साल से इस धंधे में हूं. साप्ताहिक बाजार में ग्राहक को यह यकीन दिलाना बड़ा जरूरी होता है कि वह जो सामान हम से खरीद रहा है वह सही है या नहीं. चादर बेचने के धंधे में सब से बड़ी मुसीबत यह होती है कि ग्राहक को चादर के छोटी होने, धो कर सिकुड़ने या रंग निकल जाने का डर रहता है.

‘‘हमारे पास कुछ चादरें ऐसी होती हैं जिन की हम गारंटी नहीं लेते हैं, पर जरूरी नहीं है कि वे खराब ही निकलें. ऐसी चादरें अमूमन सस्ती होती हैं जिन्हें मजदूर तबका ज्यादा खरीदता है. थोड़ी महंगी चादरों का हमें पता होता है कि वे ग्राहक को धोखा नहीं देंगी.’’

ऐसे साप्ताहिक बाजारों में कुछ लोगों की रोजीरोटी दुकानदारों से भी होती है. पूर्वी दिल्ली इलाके में लगने वाले साप्ताहिक बाजार में 49 साल के मोहम्मद अब्दुल पिछले कई सालों से दुकानदारों को बैटरी से चलने वाली ऐसी लाइटें किराए पर देते हैं जो शाम के बाद उन के बहुत काम आती हैं.

इस बारे में मोहम्मद अब्दुल ने बताया, ‘‘मैं यहां के दुकानदारों को

10 रुपए रोजाना के हिसाब से एक बैटरी लाइट किराए पर देता हूं. मेरी तकरीबन 150 ऐसी लाइटें किराए पर चढ़ती हैं. इस से फायदा यह होता है कि बहुत

से दुकानदारों को बिजली की समस्या से नहीं जूझना पड़ता है. हमारी बैटरी लाइटें दूसरे साप्ताहिक बाजारों में भी किराए पर भेजी जाती हैं.’’

नमकीनबिसकुट और बेकरी में बनने वाली खाने की दूसरी चीजें बेचने वाले श्यामचरण ‘बिसकुट वाले’ बताते हैं, ‘‘जिस भी साप्ताहिक बाजार में हम दुकान लगाते हैं, वहां पर कई ग्राहक तो हमारे परमानैंट ग्राहक बन जाते हैं. हमारा माल लोकल बेकरी का बना होता है. लेकिन हमारी कोशिश यही रहती है कि ग्राहक को चीज अच्छी मिले ताकि वह बारबार हम से ही सामान खरीदे.

‘‘लेकिन इन साप्ताहिक बाजारों में कुछ समस्याएं भी होती हैं. सरकारी आदमी दुकान लगाने की परची तो हम से काट लेते हैं, पर सुविधाओं के नाम पर हमें ज्यादा कुछ नहीं मिलता है. साफसफाई की जिम्मेदारी भी हम पर आ जाती है. सुरक्षा के इंतजाम भी खास नहीं रहते हैं. जेब काटने की वारदातें भी आएदिन होती रहती हैं. ग्राहक सामान खरीदने से ज्यादा अपनी जेब में रखे बटुए के लिए फिक्रमंद रहते हैं.

‘‘चूंकि ऐसे साप्ताहिक बाजार हमारी रोजीरोटी हैं, इसलिए सरकार को चाहिए कि वह हमें दुकान लगाने के लिए शैड वगैरह मुहैया करा दे जिस से हर मौसम में हम बेखौफ अपनी दुकान चला सकें. इस से ग्राहकों को भी किसी तरह की परेशानी नहीं होगी.’’

सवाल उठता है कि अगर ऐसे किसी साप्ताहिक बाजार में किसी नए आदमी को दुकान लगा कर अपना कारोबार जमाना है तो वह क्या करे?

दरअसल, कहने को ये चलतेफिरते सातों दिन के बाजार होते हैं, पर इन में दुकान लगाने वाले लोगों की जगह धीरेधीरे पक्की होती जाती है. नगरनिगम इन से 15 रुपए रोजाना की परची काट कर शुल्क वसूल करता है. एक बार जम जाने के बाद दुकानदार चाहे तो अपनी जगह को बेच सकता है या फिर किराए पर भी दे सकता है जिस से कोई नया दुकानदार उस जगह का इस्तेमाल कर सकता है. लेकिन कोई नया दुकानदार कहीं भी किसी भी जगह पर अपनी दुकान सजा कर नहीं बैठ सकता है क्योंकि हर साप्ताहिक बाजार में बैठने वाले दुकानदारों की एक तय संख्या होती है. नगरनिगम वाले और पुराने दुकानदार नए लोगों को आने नहीं देते.

बहरहाल, गांवकसबों और शहरों में लगने वाले ऐसे साप्ताहिक बाजार बहुत से लोगों के लिए जीवनरेखा बन गए हैं. दुकानदार अलगअलग इलाकों में जा कर सामूहिक दुकानें लगाते हैं और रोजमर्रा की चीजों को ग्राहकों तक पहुंचाते हैं. इस से ग्राहकों को अपने बजट के हिसाब से सस्ता सामान मिल जाता है, साथ ही दुकानदारों के घरों में भी दोनों समय का चूल्हा आसानी से जलता रहता है.

कानून को ऐसे दिखाते हैं ठेंगा

भोगलजंगपुरा मार्केट एसोसिएशन की एक याचिका के मद्देनजर हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने अपने आदेश में दक्षिणी दिल्ली नगरनिगम को यह तय करने का निर्देश दिया था कि भोगलजंगपुरा इलाके में चल रहा साप्ताहिक मंगल बाजार अब वहां हर दिन सोमवार को लगे.

हाईकोर्ट ने कहा कि जब नगरनिगम कानून में प्रावधान है कि किसी इलाके में अवकाश होगा उसी दिन वहां साप्ताहिक बाजार लगेगा, तो इस कानून का पालन क्यों नहीं हो रहा है. जब भोगलजंगपुरा इलाके में साप्ताहिक अवकाश सोमवार को होता है तो किस आधार पर वहां पटरी पर लगने वाले साप्ताहिक बाजार को मंगलवार को लगाने की इजाजत दी गई?

इस के अलावा साप्ताहिक बाजारों में दूसरी कमियां भी देखी जाती हैं. वहां कितने दुकानदार बैठेंगे और कितनों का हिसाब रखा जाता है, इस में भी गड़बड़ी की जाती है. दुकानदार ज्यादा होते हैं जबकि रिकौर्ड में उन्हें कम दिखाया जाता?है. उन से वसूले जाने वाले शुल्क में भी गड़बड़ी होती?है. अगर किसी वार्ड में 3 से 4 साप्ताहिक बाजार लगते हैं तो वहां नगरनिगम के रिकौर्ड में एक ही साप्ताहिक बाजार दिखाया जाता है.

साथ ही, साप्ताहिक बाजारों से गैरकानूनी वसूली करने वाले गुंडों का भी आतंक कम नहीं है. नगरनिगम भी जानता है कि दुकानदारों से जबरन वूसली होती है जिस से नगरनिगम को नुकसान होता है?क्योंकि जमीन तो उस की होती है. नगरनिगम इस सिलसिले में सही फैसले करने का आश्वासन तो दुकानदारों को देता है, लेकिन कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आता है.

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राजनीति में रजनीकांत

दक्षिण भारत की फिल्मों के सुपरस्टार हीरो रजनीकांत ने आखिरकार राजनीति में आने का मन बना ही लिया है. उन्होंने एक नई राजनीतिक पार्टी बनाने की बात कही है. वैसे वे राजनीति में आ कर क्या करेंगे, अब तक इस बात का कोई राजनीतिक नजरिया सामने नहीं आया है.

सामाजिक आंदोलन से निकल कर आए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक नजरिया अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान उन के नई पार्टी बनाने के ऐलान से पहले ही साफ हो चुका था. वे देश की भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव की बात करते थे.

रजनीकांत राजनीति में भ्रष्टाचार की बात मानते तो हैं, पर उन्होंने इस के खिलाफ कोई रोडमैप पेश नहीं किया है, जैसा कि जनलोकपाल बिल के लिए अरविंद केजरीवाल अपना संकल्प दोहराते थे.

तमिलनाडु की राजनीति में 2 द्रविड़ पार्टियों के बीच रजनीकांत कहां जगह बना पाएंगे, यह साफ नहीं है. ये दोनों पार्टियां बारीबारी से सत्ता में आती रही हैं. राज्य की राजनीति में दोनों पार्टियां द्रविड़ और गैरद्रविड़ के अपनेअपने जातीय, वर्गीय आधार पर टिकी हैं. यहां द्रविड़ और गैरद्रविड़ जातियों में ऊंचनीच, भेदभाव, आपसी जलन का टकराव चलता आया है.

वैसे भी फिल्मों में मशहूर होना अलग बात है. भले ही ऐसे कलाकार राजनीति में आ कर अपनी लोकप्रियता भुनाने में कामयाब हो जाएं, सत्ता की कुरसी पर जा बैठें, पर राजनीति में आ कर कोई बदलाव या करिश्मा कर पाएंगे, मुश्किल है.

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रुपहले परदे से अमिताभ बच्चन, सुनील दत्त, विनोद खन्ना, धर्मेंद्र, वहीदा रहमान, गोविंदा, रेखा, हेमामालिनी, स्मृति ईरानी जैसे सितारों की लंबी फेहरिस्त है, पर फिल्मी परदे पर सुनी जाने वाली इन की बुलंद आवाज संसद में तकरीबन खामोश ही रही. संसद में ये महज शोपीस बने दिखाई दिए. जनता के लिए बहुत कम मुद्दे इन सितारों ने उठाए. इन की कोई बदलाव वाली सोच कभी सामने नहीं आई.

लाखोंकरोड़ों प्रशंसकों के चहेते खिलाड़ी भी संसद में आ कर जनता के पैसे से सुविधाएं और मोटा पैसा पाते रहे. क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर और फिल्म हीरोइन रेखा तो अपने कार्यकाल में संसद में न के बराबर दिखाई देते हैं. संसद के अधिवेशनों में भी नदारद रहते हैं. इन की हाजिरी को ले कर कई बार सवाल उठे हैं. न सचिन तेंदुलकर खेलों के लिए कोई सुधार की बात संसद में रख सके, न ही रेखा जैसे फिल्म सितारे.

तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी सितारों का आना नई बात नहीं है. यहां की जनता की फिल्मी सितारों के प्रति दीवानगी जगजाहिर है. लोग सितारों से भावनात्मक रूप से जुड़े रहते हैं.

दक्षिण भारत से ही एमजी रामचंद्रन, जे. जयललिता, एम. करुणानिधि जैसे नेता फिल्मों से आए, पर वे राज्य को भ्रष्टाचार, जातिवाद, मजहब, क्षेत्रीयता, भाषा को ले कर छोटी सोच से छुटकारा नहीं दिला पाए.

कुछ समय पहले दक्षिण भारत के लोकप्रिय सुपरस्टार चिरंजीव राजनीति में आए थे. उन्होंने अपनी नई पार्टी ‘प्रजा राज्यम’ बनाई थी, पर रुपहले परदे पर धमाल मचाने वाले हीरो राजनीति में फुस नजर आए.

साल 2009 में आंध्र प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में उन्हें 295 सीटों में से महज 18 सीटें ही मिलीं. 2 सीटों पर खड़े हुए चिरंजीवी एक सीट पर हार गए. बाद में उन्हें कांग्रेस में शामिल होना पड़ा.

सुपरस्टार के रूप में रजनीकांत को पसंद करने वालों की तादाद बहुत ज्यादा है. जो लोग उन्हें पसंद करते हैं, वे किसी खास जाति, धर्म, क्षेत्र, वर्ग या विचारधारा से जुड़े नहीं हैं. उन्हें कलाकार के रूप में पसंद करने वालों का दायरा बहुत बड़ा है, पर राजनीति में ऐसा नहीं होता. राजनीति में जाति, धर्म एक कड़वी सचाई है. ऐसे में रजनीकांत खुद किसी न किसी विचारधारा के प्रतीक बन कर रह जाएंगे.

निचले तबके से आने वाले शिवाजी राव गायकवाड़ नाम के इस सितारे के स्वीकार करने का दायरा उतना बड़ा नहीं रह पाएगा. राजनीति में आने पर उन की अपने प्रशंसकों से दूरी बन जाएगी. विपक्ष उन की जाति पर सवाल उठाएगा, जैसा कि फिल्म ‘कबाली’ में सोशल मीडिया पर उन के दलित होने का प्रचार किया गया. उन पर राजनीति से प्रेरित हमले होंगे. नीचे गिराने के लिए हर तरह से कीचड़ उछाला जाएगा. उन का हाल चिरंजीवी जैसा हो सकता है.

आज देश को नई सोच वाले क्रांतिकारी नौजवान नेताओं की जरूरत है. बेंगलुरु ट्रांसपोर्ट सेवा में बस कंडक्टर की नौकरी से अपना कैरियर शुरू करने वाले 67 साला रजनीकांत मिस्टर इंडिया या मिस्टर तमिलनाडु बन पाएंगे, मुश्किल है.

फिल्मों के चमत्कार असली जिंदगी से बहुत अलग हैं. राजनीति की जमीन बड़ी खुरदरी है, जहां बेशुमार समस्याओं की हकीकत से रूबरू होना पड़ता है. इस के लिए लकीर के फकीर नहीं, कुछ अलग और नया करने वाले हीरो चाहिए.

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शिक्षक और योग्यता

भारत में शिक्षा का क्या स्तर है, यह साफ हुआ उत्तर प्रदेश के टीचर्स एलिजिबिलिटी टैस्ट के परिणाम से, जिस में बीएड के 92 फीसदी उम्मीदवार फेल हो गए. बीएड को अपनेआप में शिक्षा देने की सही ट्रेनिंग माना जाता रहा है पर बीएड की परीक्षाओं में इस कदर धांधली चल रही है कि इस का प्रमाणपत्र उठाए घूम रहे युवाओं को कुछ भी नहीं आता. इसीलिए टीचर्स एलिजिबिलिटी टैस्ट शुरू करना पड़ा. इस टैस्ट में बैठे 5 लाख 31 हजार में से सिर्फ 4 हजार अभ्यर्थी पास हो पाए.

देश का युवा आज किस तरह के शिक्षकों को झेल रहा है, यह टैस्ट से साफ हो गया. बीएड की परीक्षा का कोई मापदंड नहीं रह गया और उस का कोर्स करने वाले अपनी पढ़ाई के बारे में कुछ नहीं जानते.

अपने को विश्वगुरुसाबित करने में लगा देश असल में बेहद अशिक्षित, अनुशासनहीन और अयोग्य है. वह कोई काम ढंग से नहीं कर सकता. हमारे यहां लोकतंत्र है पर वह नाम का है, क्योंकि लोकतंत्र की मूल भावनाओं पर यहां स्वाधिकार व कट्टरपंथी सोच का कब्जा है. स्कूलकालेजों से जो शिक्षा हमें मिलती है वह हमें और ज्यादा बेईमानी सिखाती है. हमारे यहां पढ़ाने वाले अपने पद को महान समझते हैं, अपने ज्ञान को नहीं. वहीं वे छात्रों को सिखाते हैं कि किसी तरह पद पा लो चाहे योग्यता हो या न हो. आम जीवन में योग्य लोगों की उतनी इज्जत नहीं होती है जितनी जुगाड़ुओं की.

टीचर्स एलिजिबिलिटी टैस्ट में बैठने वाले अधिकांश यही सोच कर बैठते हैं कि जिस तरह वे लेनदेन कर के पिछली परीक्षाएं पास करते रहे हैं, यह भी पहुंच, नकल, हेरफेर के बल पर पास कर लेंगे और फिर शिक्षक बन कर अगली पीढ़ी को यही पाठ पढ़ाएंगे.

देश में शिक्षासुधार के नाम पर सैकड़ों समितियां बनी हैं, विशेषज्ञों ने हजारों घंटे दिमाग लगाया है, अरबों रुपया इस पर लगाया गया है पर नतीजा क्या है? यह पूरा सिस्टम जो थोड़ेबहुत योग्य लोग निकालता है उन में से आधे से ज्यादा देश छोड़ देते हैं और बाकी गुस्से में कानून को तोड़नेमरोड़ने का काम शुरू कर देते हैं. इन योग्यों में से भी अधिकांश देश की मूल बीमारी से ग्रसित ही होते हैं.

देश जिस दिशा की ओर बढ़ रहा है उस से किसी सुधार की अपेक्षा तो है नहीं. यहां तो कानून, संविधान और स्वतंत्रता को अशिक्षा की आग में झोंक देने की बात हो रही है. टीईटी का परिणाम देश की वर्तमान स्थिति की एक इमेज है. उस पर रोएं तो वे, जो सिस्टम को ठीक करना चाहते हैं. यहां तो सिस्टम के कर्णधार ही उसे तोड़ देना चाहते हैं और नए सिस्टम को अराजकता का नाम देना चाहते हैं.

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इस फिल्म में सलमान के होंगे 5 अवतार

बौलीवुड एक्टर सलमान खान अक्सर ही ईद पर अपने फैन्स के लिए कोई न कोई फिल्म लेकर आते हैं और एक बार फिर वह अपने फैन्स के लिए नई फिल्म ला रहे हैं और इसके लिए उन्होंने डेट भी डिसाइड कर ली है. वह इस फिल्म को 2019 की ईद पर रिलीज करेंगे. सलमान की इस फिल्म का नाम ‘भारत’ है और इसे अतुल अग्निहोत्री प्रोड्यूस कर रहे हैं और फिल्म को अली अब्बास जफर डायरेक्ट करेंगे.

इसी साल अप्रैल से शुरू की जाएगी शूटिंग

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस फिल्म की शूटिंग इसी साल अप्रैल से शुरू की जाएगी. दरअसल, सलमान इससे पहले अली अब्बास के साथ ‘सुल्तान’ और ‘टाइगर जिंदा है’ में काम कर चुके हैं. सलमान की अब्बास के साथ यह तीसरी फिल्म होगी. खबरों कि मानें तो सलमान इस फिल्म में पांच अलग-अलग लुक में नजर आएंगे और ऐसा भी कहा जा रहा है कि इस फिल्म में सलमान को 18 साल के लड़के से लेकर 70 साल की उम्र के बूढ़े तक की भूमिका में दिखाया जाएगा. वहीं, सलमान के लुक टेस्ट इसी महीने शुरू हो सकते हैं.

अगले साल दो फिल्में लेकर आ रहे हैं सलमान

अगले साल ‘भारत’ के साथ-साथ सलमान की एक और बड़ी फिल्म दर्शकों के सामने होगी. ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श के मुताबिक, 2019 क्रिसमस पर सलमान खान अपनी फिल्म ‘किक (2014)’ का सीक्वल ‘किक 2’ लेकर आ रहे हैं. एक्शन से भरपूर इस फिल्म का निर्देशन साजिद नाडियाडवाला करेंगे, जिन्होंने ‘किक’ के जरिए निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखा था. इसका मतलब है कि अगले साल ईद और क्रिसमस को सलमान ने पहले ही बुक कर लिया है.

सबसे महंगी फिल्म होगी ‘भारत’

खबरों कि मानें तो ‘भारत’ सलमान खान की अब तक की सबसे महंगी फिल्म होगी. बताया जा रहा है कि सलमान की इस फिल्म का बजट 200 करोड़ का होगा. इसकी वजह यह है कि सलमान खान इस फिल्म में पांच अलग-अलग लुक में नजर आएंगे और इस फिल्म के लिए ग्राफिक्स और वीएफएक्स पर भी काफी पैसे खर्च होने वाले हैं.

VIDEO : सर्दी के मौसम में ऐसे बनाएं जायकेदार पनीर तवा मसाला…नीचे देखिए ये वीडियो

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