झारखंड में जमशेदपुर के नजदीक बसे गांव लावाजोर में बना है हाथीखेदा मंदिर. वहां रोजाना हजारों की तादाद में लोग जाते हैं. उन की मन्नत पूरी हो या न हो, पर भेड़ की बलि वे जरूर देते हैं. पर यहां का प्रसाद औरतें नहीं खा सकतीं. चढ़ाया गया प्रसाद चाहे भेड़ का मांस हो या नारियल का, उन के प्रसाद खाने पर बैन है. औरतें पूजा करने के बाद मंदिर के बाहर बने ढेर सारे झोंपड़ेनुमा होटलों में जा कर अपना पेट भर सकती हैं.
हाथीखेदा मंदिर में हाथी की पूजा होती है. यह मंदिर जिस जगह पर बना हुआ है उस के चारों ओर दलमा के ऊंचेऊंचे जंगल हैं. इसे दलमा पहाड़ भी कहते हैं.
यह भी झारखंड में सैलानियों के घूमनेफिरने की एक मशहूर जगह है. इस में अनेक जंगली जानवर रहते हैं. दलमा पहाड़ के ऊंचे घने जंगलों में हाथियों का खासतौर पर वास है. कभीकभी हाथियों के झुंड जंगलों से निकल कर बाहर चले आते हैं और गांवोंबस्तियों में घुस कर खूब तबाही मचाते हैं. वे घर तोड़ डालते हैं. लोगों को मार डालते हैं. खेतखलिहानों में उगाई गई धान की फसल को भी रौंद डालते हैं.
जंगलों में रहने वाले यहां के आदिवासी बहुत ही अंधविश्वासी होते हैं. वे हाथी को भगवान का प्रतीक मानते हैं. इसे देवता का प्रकोप मान कर बचने के लिए उन्होंने हाथी की मूर्ति रख कर उस की पूजा करना शुरू कर दिया था.
यह मंदिर एक ट्रस्ट द्वारा चलाया जाता है और यहां एक पंडित भी है. पूरे मंदिर में उस की चलती है. मंदिर की आमदनी से ही मंदिर से थोड़ा हट कर उस का परिवार एक महलनुमा हवेली में रहता है. मंदिर में पूजापाठ की जिम्मेदारी उस के ही घर के लोग संभालते हैं.
यहां रोजाना चढ़ावे के रूप में लोग प्रसाद के अलावा 11 रुपए से 11 सौ रुपए तक चढ़ाते हैं. जिस जगह हाथी की पूजा होती है उस के ठीक पीछे भेड़ की बलि दी जाती है.
बलि वाली जगह का मंजर देख कर जी मिचलाने लगता है. बलि देने के लिए जो भेड़ खरीदी जाती है उस की कीमत प्रति भेड़ तकरीबन एक हजार रुपए से 5-6 हजार रुपए तक हो सकती है. बलि देने से पहले 100 से 150 रुपए की परची कटानी पड़ती है. भेड़ की बलि चढ़ाने वाला उस परची को ले कर वधस्थल पर जाता है. वहां 2 आदमी रहते हैं. सामने ही वध करने वाला खूंटा गड़ा हुआ है.
देखते ही देखते एक आदमी बड़ी बेरहमी से भेड़ की पीठ के बालों को अपनी मुट्ठी से कस कर पकड़ कर उस का गला सीधे वध वाले खूंटे में फंसा देता है. इस के बाद एक आदमी, जिस ने बस धोती बांधी होती है, एक धारदार कटार से भेड़ का सिर धड़ से अलग कर देता है. भेड़ काटतेकाटते उस आदमी की सफेद धोती पूरी तरह से खून में सन जाती है.
बिना सिर की छटपटाती भेड़ की दोनों पिछली टांगें पकड़ कर एक आदमी फुरती से उसे जमीन पर फेंक देता है. भेड़ की बलि देने वाले शख्स को मरी हुई वह भेड़ सौंप दी जाती है. भेड़ की बलि देने का यह सिलसिला बिना रुके चलता रहता है.
कटी हुई भेड़ को प्रसाद के रूप में पका कर खाने के लिए लोग अपने साथ 2-4 दोस्तों को भी वहां ले जाते हैं. चूंकि औरतों को वह प्रसाद खाना नहीं होता है और न ही उसे घर ले जाना होता है, इसलिए वहीं मंदिर के बाहर भेड़ को काटनेछांटने वाले और पकाने वाले मौजूद रहते हैं. वे इस के लिए बाकायदा पैसा भी वसूलते हैं.
लोगों में अंधविश्वास का आलम यह है कि यहां आने वाले तथाकथित भक्त नारियल पर ‘जय हाथीखेदा बाबा’ के नाम से छपे लाल कपड़े को लपेट कर पेड़पौधों पर टांग देते हैं. यहां जितने भी पेड़पौधे हैं तकरीबन सभी की डालों और तनों पर ऐसे बेहिसाब नारियल बंधे देखे जा सकते हैं.
बताया जाता है कि जिस की मन्नत पूरी हो जाती है वह यहां आ कर पेड़ से बंधे नारियल को खोल देता है और हाथीखेदा बाबा की पूजा करता है. ऐसे कई लोग हैं जो किसी न किसी दुख से दुखी हो कर सुख की तलाश में यहां आ कर पेड़ों पर नारियल बांध जाते हैं. ज्यादातर लोग औलाद पाने की चाह में यहां आते हैं.
इसी तरह कुछ लोग अपनी हैसियत के हिसाब से पीतल से ले कर कांसे की छोटीबड़ी घंटियां भी मंदिर में चढ़ाते हैं. यहां की दीवारों पर बेहिसाब घंटियां रखी देखी जा सकती हैं.
कणकण में भगवान और चौरासी लाख देवीदेवताओं वाले इस देश में पता नहीं लोगों की अक्ल तब कहां चली जाती है, जब सामने ही कितने भूखेनंगे गरीब आदिवासी मर्दऔरत और बच्चे हाथ में कटोरा लिए भीख मांगते नजर आते हैं लेकिन कोई उन्हें खाना नहीं खिलाता है.
दान की कमाई से मंदिर को भव्य रूप दिया जा रहा है जबकि वहां से जूतेचप्पलों की चोरी होती रहती है.
खाने से बचा हुआ भेड़ का मांस होटल वाले बेचते भी हैं. यहां आजकल देशी महुआ की शराब से ले कर अंगरेजी शराब तक मिलती है. टाटा और इस इलाके के आसपास के शहरों से यहां ऐसे मनचले नौजवानों की टोलियां भी आती हैं जो खापी कर हुड़दंग मचाते हुए हाईवे पर तेज रफ्तार में मोटरसाइकिल चलाती हैं.
हजारों रुपए खर्च कर के यहां आने वाले अंधविश्वासियों की मन्नत पूरी होती भी है या नहीं, यह तो पता नहीं, लेकिन हाथीखेदा मंदिर की कमाई अपनी ऊंचाइयों पर है.
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जिस धार्मिक तालीबानी खतरे का डर था वह अपने घिनौने रूप में सामने है. पिछले कुछ सालों से फैलाया जा रहा नफरत का बीज अब फल बन कर गिरने लगा है. इस के नतीजे में वह घिनौना चेहरा सामने खड़ा है जिस को देख पाना किसी भी इनसान के लिए मुश्किल है.
21वीं सदी के भारत में 69 सालों के लोकतंत्र का अगर यही हासिल है तो उस का पूरा बनने पर ही सवाल खड़ा हो जाता है. राजस्थान के राजसमंद से सामने आई एक वारदात और उस की आग की लपटों में कोई एक बेबस इनसान नहीं, बल्कि देश का पूरा संविधान व लोकतंत्र जल रहा है.
यह इनसानियत को शर्मसार करने वाली वह तसवीर है, जो बताती है कि अब कुछ बचा नहीं है. अगर बचे हैं तो सिर्फ अपराधी गिरोह और उन का नंगा नाच जो धर्म का वेश धर कर पूरी इनसानियत को लील जाने के लिए तैयार हैं.
राजसमंद की एक वारदात की तसवीरें और वीडियो वायरल हुए. जिहाद का बदला लेने के लिए एक मुसलमान मजदूर की वहशी तरीके से हत्या कर उस की लाश को जला दिया गया.
खबरों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल के मालदा का एक मजदूर राजसमंद में अपने परिवार के साथ मजदूरी करता था. हत्या करने वाले शख्स ने उसे काम देने के बहाने अपने पास बुलाया. हत्यारे का नाम शंभुलाल रैगर है. उस ने 50 साल के एक अधेड़ आदमी, जिस का नाम मोहम्मद अफराजुल बता रहे हैं, की पहले कुल्हाड़ी और तलवार से बेरहमी से हत्या की, फिर उस की लाश को जला दिया गया.
इस पूरी वारदात का शंभुलाल ने अपने एक दोस्त की मदद से न केवल वीडियो बनाया, बल्कि उस ने हत्या और लाश को जलाने की बात को भी माना.
इस वीडियो में दिखा कि अफराजुल आगे चल रहे थे और उन के पीछे शंभुलाल था. मौका पाते ही शंभुलाल ने पीछे से अफराजुल पर हमला कर दिया. इस हमले में उन पर 1-2 नहीं बल्कि कई बार वार किया गया. उस के बाद शंभुलाल ने अपनी मोटरसाइकिल से तलवार निकाल ली और अफराजुल का गला काट दिया.
इस के पहले अफराजुल लगातार उस से अपनी जान की भीख मांग रहे थे, लेकिन शंभुलाल पर इस का कोई असर नहीं पड़ता दिखा. फिर शंभुलाल ने अफराजुल को आग के हवाले कर दिया.
वीडियो में शंभुलाल ने हत्या की बात कबूल की है. उस ने कहा कि यह तुम्हारी हालत होगी. ये हमारे देश में लव जिहाद करते हैं. अगर ऐसा करोगे तो हर जिहादी की हालत ऐसी ही होगी. जिहाद खत्म कर दो.
इस के अलावा एक दूसरे वायरल वीडियो में एक शख्स ने कहा कि यह हत्या हिंदुत्व को बचाने के लिए की गई है. उस शख्स ने कहा कि मेवाड़ को बचाना है. मेवाड़ को एक हो कर इसलामिक जिहाद को यहां से निकालना है, इसलिए मेवाड़ के सभी भाईबहनो, मैं ने जो किया है चाहे अच्छा है या गलत है, लेकिन मुझे जो लगा मैं ने किया.
बोया बीज बबूल का…
तमाम तरह के धर्म अब इनसानियत के दुश्मन बन चुके हैं. इसलाम के आदेश के मुताबिक मुसलमानों ने तलवारें उठाईं. आज अफगानिस्तान, पाकिस्तान में रोज चरमपंथियों द्वारा इनसानियत का कत्ल किया जा रहा है.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने यरुशलम को इजरायल की राजधानी यों ही नहीं बताया है. यरुशलम को ले कर जो लड़ाइयां हुई थीं उन को दोबारा जिंदा किया जा रहा है. धर्म के नाम पर इनसानियत की हत्या करने की साजिश रची जा रही है और यह भूख सिर्फ और सिर्फ सब से ताकतवर दिखने व पूंजी लूटने की है. जो खुद अपनेआप को नहीं बचा पाया, उस के मानने वाले दावा तो दुनिया को बचाने का काम कर रहे हैं लेकिन बहुत खूनखराबा सदियों तक यीशु के इन्हीं मानने वालों ने किया है.
भारत की हालत भी ज्यादा अच्छी नहीं रही है. वर्ण भेद के आधार पर ब्राह्मण धर्म की सोच भी इनसानियत को कमजोर करने वाली रही है. ब्राह्मण धर्म के जोरजुल्म की मारी जनता ने बगावत कर बौद्ध परंपरा अपना ली तो पुष्यमित्र शुंग द्वारा सत्ता हथियाने के बाद बौद्धों पर जुल्म करने का सिलसिला चल पड़ा था.
जब भी ब्राह्मण धर्म कमजोर हुआ तो इस देश में शांति रही और जब भी ब्राह्मण धर्म मजबूत हुआ, बहुसंख्यक जनता पर जुल्म ढहाए गए. इतिहास इन के जुल्मों की कथाओं से भरा पड़ा है. तेल की कड़ाहियों में बौद्धों को जिंदा डाल कर मारा गया था. दलितों को कभी इनसान ही नहीं माना गया था. आज इन के 33 करोड़ देवीदेवता धर्म बचाने में नाकाम हो गए हैं, लेकिन अनोखी बात देखो कि एक अंबेडकर का लिखा ग्रंथ इस देश को चला रहा है. यह इन लोगों को फूटी आंख नहीं सुहाता है.
आजादी के आंदोलन के समय भी धर्मांधता के कीचड़ में पूरा का पूरा आंदोलन फंसा हुआ था. दलितों को अंगरेजी राज में खुली हवा में सांस लेने की छूट मिली थी. वे किसी भी हालत में इसे खोना नहीं चाहते थे और उन की लड़ाई की अगुआई अंबेडकर कर रहे थे.
अंगरेजों की विदाई के बाद ब्राह्मणवादी पूरी तरह सत्ता पर कब्जा करना चाहते थे इसलिए तमाम हिंदू संगठन इस के जुगाड़ में लग गए थे. मुसलिमों की अगुआई जिन्ना जैसे लोग कर रहे थे. हक की आड़ में ब्राह्मणों व मुसलमानों ने अपनेअपने धर्म के आधार पर देश का बंटवारा करा दिया था. बेचारे दलित, किसान और आदिवासी कहां जाते?
दलितों के लिए तो अंबेडकर ने संविधान में पुख्ता इंतजाम किए लेकिन तालीम की कमी में वे ज्यादा समझ नहीं पाए. किसान तो बेचारे सदियों से अनाथ ही थे और आजादी के बाद भी अनाथ से ही हो कर रह गए.
अब राजसमंद कांड में सीधेतौर पर तो कोई हिंदूवादी संगठन जिम्मेदार नहीं है लेकिन इन हिंदूवादी संगठनों द्वारा 90 साल से की जा रही मेहनत का नतीजा इसे जरूर माना जा सकता है.
बाबरी मसजिद ढहाने के बाद इस में एकाएक तेजी आई थी जिस में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की सरकारों ने भी खूब सहयोग दिया.
जब धर्म के नाम पर नफरत के बीज बोए जाएंगे तो उन्हीं के नतीजे दरिंदों की इस तरह की दरिंदगी के रूप में ही सामने आएंगे. इस वारदात के समर्थक दूसरी वारदातों के उदाहरण दे कर कट्टर सोच को ढो रहे हैं.
धर्म के नाम पर जो हत्या, मारपीट व भेदभाव की घटनाएं हो रही हैं उन के कुसूरवारों को अदालत जाना भी नहीं पड़ रहा. पर जो उन की पोलपट्टी खोलते हैं उन पर मुकदमे दर्ज हो जाते हैं. धर्म इनसानियत का हत्यारा है, पर इस पर लगाम लगाने की कभी किसी में हिम्मत नहीं है.
गहरी साजिश की बूराजसमंद में अफराजुल के परिवार ने हत्यारों के लिए फांसी की सजा की मांग की है. उन्होंने कहा है कि जिन लोगों ने उन की जानवरों की तरह हत्या की है और फिर उन की वीडियो को पूरी दुनिया में दिखाया है उन्हें सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए.
अफराजुल की बीवी गुलबहार ने कहा, ‘‘मैं उन लोगों के लिए फांसी की सजा चाहती हूं जिन्होंने मेरे पति की इतने घिनौने तरीके से हत्या की है. मैं इंसाफ चाहती हूं. वे इसलिए मारे गए क्योंकि वे मुसलिम थे.’’
3 बेटियों के पिता अफराजुल को अपनी छोटी बेटी की शादी के लिए घर लौटना था. परिवार के सदस्यों के मुताबिक, अफराजुल पिछले 12 सालों से राजस्थान में मजदूरी कर रहे थे. हर 2 महीने के बाद वे घर चले आते थे.
उन के पास जमीन का एक टुकड़ा था लेकिन उस से परिवार का भरणपोषण नहीं हो पाता था.
अफराजुल की भतीजी जीनत खान ने कहा, ‘‘इस में गहरी साजिश की बू आ रही है और कई बड़े लोग शामिल हैं. एक मजदूर भला क्या कर सकता है? जिस तरह से सोशल मीडिया पर इसे फैलाया गया है, उस से लगता है कि इस के पीछे एक गहरी साजिश है.’’
बहुत से लोगों ने शंभुलाल की तसवीर ‘माई हीरो शंभु भवानी’ के साथ अपने ट्विटर या फेसबुक के लिए प्रोफाइल फोटो डाला है. इन समर्थकों के नाम के साथ लगी जाति की पहचान करने पर चौंकाने वाला सच सामने आता है.
इस हत्याकांड का समर्थन कर रहे लोगों में से 95 फीसदी ऊंची जाति के हिंदू हैं जो शंभुलाल रैगर नामक एक दलित की हरकत को जायज ठहरा रहे हैं.
लोगों के बीच यह झूठ फैलाया जा रहा है कि आतंकी हमले का शिकार हुए बंगाली मजदूर अफराजुल ने हत्यारे शंभुलाल की बहन से शादी कर रखी थी और उसे भगा कर पश्चिम बंगाल ले गया था, जबकि सच तो यह है कि कातिल की बहन तो छोडि़ए उस की किसी रिश्तेदार से भी पीडि़त का कोई संबंध नहीं था. वे तो हत्यारे शंभुलाल को ठीक से जानते तक नहीं थे. उन्हें कातिल ने महज मुसलमान होने की वजह से हमले का शिकार बनाया और बड़ी बेरहमी से पहले तो काटा और फिर जला डाला.
इस वारदात को सिर्फ सनकी आदमी की सनक में किया गया आम अपराध बता देना नफरत के उन कारोबारी संगठनों की तरफदारी करना है जो अपनी जहरीली सोच से कमजोर दिमाग के नौजवानों को फंसा कर आत्मघाती दस्ते तैयार कर रहे हैं.
राजसमंद हत्याकांड यह भी साबित करता है कि दलित नौजवानों का तालिबानीकरण किया जा रहा है. उन के जरीए मौत के सौदागर अपना आतंकी खेल खेलने में कामयाब हो रहे हैं. इस से ऊंची जाति के सांप्रदायिक लोग एक तीर से कई शिकार करने की कोशिश कर रहे हैं.
वे दलितों और मुसलमानों को आमनेसामने की एक न खत्म होने वाली लड़ाई में झोंक कर खुद महफूज होने की कोशिश में हैं. इसी के साथ वे दलित नौजवानों को अपराधी बनाने का काम भी कर रहे हैं ताकि वे हत्या, दंगे, लूट, हमले जैसी वारदातें करते रहें और जेलों में बरसों सड़ते रहें. इस तरह एक शख्स ही नहीं बल्कि उस का पूरा परिवार ही बरबाद हो जाए.
दलितों और मुसलिमों को आपसी लड़ाई में धकेल कर भारत के कट्टर लोग सारे साधनों व संसाधनों पर काबिज हो कर अमीरी भोगते रहना चाहते हैं. यह एक घिनौनी साजिश है. इस के शिकार दलित हो चुके हैं.
दलित नौजवानों को बड़े पैमाने पर उन उग्र संगठनों से जोड़ा जा रहा है जिन के जरीए हिंसक वारदातें कराई जा सकें. हुड़दंग करने, दंगे फैलाने, त्रिशूल बांटने, शस्त्र पूजा कराने, चाकूबाजी और मुकदमे कराने, हत्याएं कराने व जेल भेजने के लिए ये नए बने कट्टर बहुत काम आते हैं.
हालांकि ये तभी तक हिंदू माने जाते हैं जब तक सामने मुसलमान हो या चुनाव होने हों. बाकी समय में इन को नीच हिंदू के तौर पर ही माना जाता है. धर्म की प्रयोगशाला में आज दलितों की औकात लैबोरेटरी में चीरफाड़ किए जाने वाले मेढ़कों जैसी हो गई है.
एक फर्जी किस्म की ऊपरीऊपरी कुछ मिनटों की इज्जत मिल जाने और थोड़ेबहुत पैसे पा कर आज के भटके दलित नौजवान अपनी जान पर खेल कर हमलावर तक बनने को तैयार हैं. वे कुछ भी सोचविचार नहीं कर पा रहे हैं. उन पर हिंदुत्व इतना हावी हो गया है कि वे खुद को धर्मयोद्धा समझ कर मरनेमारने पर उतारू हैं.
आज देश का दलित किशोर और नौजवान जिंदा बम बन कर खुदकुशी की राह पर चल पड़ा है. उन्हें धर्म से इतना भर दिया गया है कि भस्मासुर बन कर खुद का ही नुकसान कर रहे हैं. वे अब मनु के गीत गा रहे हैं. आरक्षण हटाने की मांग भी वे अब कर रहे हैं.
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फिल्ममेकर इम्तियाज अली की पिछली फिल्म ‘जब हैरी मेट सेजल’ को भले ही दर्शकों की सरहाना न मिली हो लेकिन उसके बाद अब अली एक बार फिर अपने नए प्रोजेक्ट के साथ तैयार हैं. इस बार इम्तियाज एक पुरानी मशहूर प्रेम कहानी को अपने अंदाज में बड़े पर्दे पर उतारने वाले हैं और इस फिल्म के लिए उन्होंने एकता कपूर के साथ हाथ मिलाया है. इम्तियाज और एकता की एक साथ यह पहली फिल्म है. इस फिल्म का नाम ‘लैला मजनू’ है और फिल्म के फर्स्ट पोस्टर को भी रिलीज कर दिया गया है.
इस फिल्म का निर्माण बालाजी मोशन पिक्चर्स के बैनर तले किया जाएगा और इस बार वह खुद नहीं बल्कि उनके भाई शाजिद अली फिल्म का निर्देशन करेंगे. शाजिद इस फिल्म से निर्देशन के क्षेत्र में कदम रख रहे हैं. इस फिल्म को 4 मई को रिलीज किया जाएगा और फिल्म के फर्स्ट पोस्ट को शेयर कर दिया गया है. फिल्म के इस पोस्टर में लैला और मजनू पहाड़ो के बीच नजर आ रहे हैं.
गौरतलब है कि ‘लैला मजनू’ की इस प्रेम कहानी को इससे पहले 1976 में इसी नाम से आई फिल्म के जरिए दिखाया गया था. 1976 में रिलीज हुई लैला मजनू में ऋषि कपूर और रंजीत कौर ने एक साथ काम किया था. वहीं एकता कपूर ने भी इम्तियाज के साथ इस प्रोजेक्ट को करने की जानकारी सोशल मीडिया पर शेयर की. एकता ने एक ट्वीट में लिखा, मास्टर स्टोरीटेलर इम्तियाज के साथ एपिक लव स्टोरी लैला मजनू को रीक्रिएट करने को लेकर उत्साहित हूं.
बता दें कि आखिरी बार इम्तियाज ने शाहरुख खान की फिल्म ‘जब हैरी मेट सेजल’ को डायरेक्ट किया था लेकिन दर्शकों को शाहरुख और अनुष्का की फिल्म पसंद नहीं आई थी. फिल्म ने भले ही अच्छा कारोबार किया था लेकिन फिल्म की कहानी को क्रिटिक्स द्वारा सराहा नहीं गया था.
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2010 में मुंबई के कोलाबा इलाके में सैनिकों की विधवाओं के लिए बनायी गयी 31 मंजिला इमारत ‘‘आदर्श हाउसिंग सोसायटी’’ का घोटाला सामने आया था और तब महाराष्ट्र राज्य के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक चौहाण को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी थी. उसी चर्चित ‘आदर्श सोसायटी घोटाले’ पर आधारित नीरज पांडे की फिल्म ‘‘अय्यारी’’ महज एक सिर दर्द है. फिल्म के कुछ संवादों से यह बात उजागर होती है कि यह फिल्म महज वर्तमान सरकार के एजेंडे पर बनायी गयी है. जब भी फिल्मकार सरकारी एजेंडे पर काम करता है, तो वह फिल्म को बर्बाद ही करता है. कम से कम ‘वेडनेस डे’, ‘बेबी’, ‘स्पेशल छब्बीस’ जैसी फिल्मों के फिल्मकार से तो यह उम्मीद नहीं थी.
फिल्म की कहानी के केंद्र में भारतीय सेना के दो अफसर कर्नल अभय सिंह (मनोज बाजपेयी) और मेजर जय बख्शी (सिद्धार्थ मल्होत्रा) हैं. जय अपने वरिष्ठ अधिकारी कर्नल अभय सिंह की काफी इज्जत करता है और उसका मानना है कि उसने उनसे बहुत कुछ सीखा है. सेना के सर्वोच्च अफसर यानी कि जनरल प्रताप मलिक (विक्रम गोखले) ने देश की सुरक्षा और देश के तमाम विरोधियों को खत्म करने के लिए सरकार से इजाजत लेकर सात सदस्यीय एक नई यूनिट का गठन करते हैं, जिसके मुखिया हैं कर्नल अभय सिंह. इसी यूनिट का हिस्सा हैं मेजर जय बख्शी और माया (पूजा चोपड़ा).
जनरल प्रताप मलिक ने इस यूनिट के लिए बीस करोड़ रूपए भी मुहैय्या किए हैं. कर्नल अभय सिंह के कहने पर मेजर जय बख्शी एक ऐसे हैकर की खोज करते हुए सोनिया गुप्ता (रकुल प्रीत सिंह) तक पहुंचते हैं, जो कि इंटरनेट और कंप्यूटर व लैपटाप को हैक कर सारी जानकारी हासिल कर सके. सोनिया से हैकिंग सीखते सीखते दोनो एक दूसरे के प्यार में बंध जाते हैं. जय बख्शी, सोनिया से उद्योगपति अभिमन्यू बनकर मिलते हैं, सब कुछ सीखने व प्यार में पड़ने के बाद अंततः सोनिया को पता चलता है कि वह आर्मीमैन हैं. तब जय उसे समझाता है कि उसे नाम बदलकर क्यों मिलना पड़ा. अब जय के हर काम में साथ देने के लिए मौजूद हैं सोनिया.
कर्नल अभय सिंह के कहने पर जय चार लोगों के फोन को सर्विलेंस पर डाल कर उनकी बातचीत सुनना शुरू करते हैं. पर ऐसा करते हुए उसे कुछ ऐसी जानकारी मिलती है कि वह चार की संख्या बढ़ाकर 22 कर देता है. जबकि अभय सिंह कायरो, इजिप्ट में किसी को पकड़ने गया हुआ है. जबकि भारत में रहते हुए जय के दिमाग में नया फितूर आता है और वह एक नयी योजना बनाता है. जिसके तहत वह मुंबई के कोलाबा में छह मंजिल की बजाय 31 मंजिला बनी इमारत के वाचमैन बाबूराव (नसिरूद्दीन शाह) को गुप्त तरीके से दिल्ली के एक लौज में ठहरा देता है. और सारी रिकौर्डिंग लेकर वह सोनिया के साथ लंदन जाने की तैयारी में है. इधर कर्नल अभय सिंह अपने काम को अंजाम देकर भारत वापस लौट रहे हैं.
तभी रिटायर्ड लेफ्टीनेंट जनरल गुंरिंदर सिंह (कुमुद मिश्रा), जनरल प्रताप मलिक से मिलते हैं. और उन पर लंदन में रह रहे पूर्व भारतीय सैनिक और वर्तमान में पूरे विश्व के मशहूर हथियार विक्रेता मुकेश कपूर (आदिल हुसेन) की कंपनी के हथियारों को चार गुना ज्यादा दामों में खरीदने के लिए दबाव डालते हैं. इसके एवज में वह सैनिकों की विधवाओं के लिए ढाई मिलियन डालर की रकम देने की पेशकश करते हैं. जब प्रताप मलिक कहते हैं कि वह नही बिकेंगे, तो गुंरिंदर सिंह धमकी देते हैं कि वह उनकी चोरी छिपे बनायी गयी यूनिट के सात सदस्यों की जानकारी ना सिर्फ पूरे देश के सामने रख देंगे, बल्कि वह यह भी साबित कर देंगे कि उन्होंने बीस करोड़ रूपए गलत तरीके से खर्च किए हैं.
वास्तव में गुरिंदर सिंह सेना का जनरल अपने पसंदीदा आर्मीमैन को बनवाना चाहते हैं. गुरिंदर सिंह के साथ एक न्यूज चैनल की मालिक काम्या भी जुड़ी हुई हैं. पता चलता है कि जय बख्शी ने दस करोड़ के एवज में गुरिंदर को सारी जानकारी देने का सौदा किया है. जनरल मलिक देश के रक्षा मंत्री से मिलकर सारी बात बताते हैं. रक्षा मंत्री कहते हैं कि इस मसले को खुद ही संभाले .
कर्नल अभय सिंह के भारत पहुंचने से पहले ही जय बख्शी तमाम रिकार्डिंग व रिकार्डस लेकर गायब हो जाता है. उधर जनरल प्रताप मलिक अपने घर पर कर्नल अभय को बुलाकर घटनाक्रम पर बात करते हैं. और उसे आदेश देते हैं कि देश की सुरक्षा पर आंच नही आनी चाहिए व देश को बेचने वाले कामयाब नहीं होने चाहिए. पर वह उसकी यूनिट को पहचानने से इंकार करने की बात भी कहते हैं. अब अभय, जय की तलाश में लग जाता है. जय एक व्हील चेअर पर बैठी औरत का रूप धर कर उसी फ्लाइट से लंदन रवाना होता है, जिसमें अभय सिंह है. अब अभय सिंह, जय बख्शी और सोनिया तीनों लंदन पहुंच जाते हैं.
लंदन में तारिक अली (अनुपम खेर) की मदद से अभय एक चाल चलकर मुकेश कपूर (आदिल हुसेन) से भी मिलता हैं. मुकेश कपूर के सामने एक प्रस्ताव रखकर जय व सोनिया को खत्म करने की बात करता है. फिर अभय सिंह, मुकेश के आदमियों से जय को बचाते हुए जय व सोनिया से मिलते हैं.
जय, अभय सिंह से कहता है कि वह गद्दार नही हैं. वह बताता है कि देश के बड़े राजनेता, नौकरशाह सहित तमाम लोग किस तरह देश को बेच रहे हैं. और वह ऐसे लोगों के खिलाफ काम कर रहा है. जय के ही कहने पर कर्नल अभय सिंह दिल्ली आकर भालेराव से मिलता है. फिर काम्या के माध्यम भालेराव द्वारा बयान की गयी ‘आदर्श घोटाले’ की कहानी को न्यूज चैनल पर प्रसारित करवाता है. हड़कंप मचता है. गुरिंदर सिंह आत्महत्या कर लेते हैं. अंत में मेजर जय बख्शी, कर्नल अभय सिंह से मिलने आते हैं.
2 घंटे 40 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘अय्यारी’’ की पटकथा में तमाम खामियों के चलते पूरी फिल्म सिरदर्द बनकर रह जाती है. फिल्म को बेवजह लंबी बनाया गया है. कहानी को सीधी सरल भाषा में बयां करने की बजाय बहुत घुमाफिरा कर बयां किया गया है. सिद्धार्थ मल्होत्रा व रकुल प्रीत की प्रेम कहानी को फ्लैश बैक में जिस तरह से दिखाया गया है, वह और अधिक बोर करती है. जबकि इसकी जरुरत ही नहीं थी. फिल्म में रोमांच कुछ है ही नहीं. निर्देशक के तौर पर नीरज पांडे अपनी प्रतिभा को खत्म कर चुके हैं. नीरज पांडे अपनी पिछली कई फिल्मों में जो कुछ नाटकीयता व जिस तरह के दृश्यों का संयोजन करते रहे हैं, उसे ही इस फिल्म में भी दोहराया है. फिल्म के शुरू होने के आधे घंटे बाद ही नीरज पांडे की फिल्म पर से पकड़़ छूट जाती है. फिल्म का गीत संगीत भी प्रभावित नहीं करता.
फिल्म का नाम अय्यारी है. इसे जायज ठहराने के लिए जबरन फिल्म में एक घटनाक्रम को फ्लैशबैक में दिखाया गया है. और कहा गया है कि कर्नल अभय सिंह अय्यारी यानी कि रूप बदलने में माहिर हैं, मगर मूल कहानी के दौरान वह कभी अपने इस रूप में नजर नहीं आते.
जय बख्शी के किरदार में सिद्धार्थ मल्होत्रा कहीं से भी नहीं जमते हैं. माया के किरदार में पूजा चोपड़ा को जाया किया गया है. सोनिया के किरदार में रकुल प्रीत सिंह महज एक ग्लैमरस गुड़िया के अलावा कुछ नजर नहीं आती. मनोज बाजपेयी, आदिल हुसैन, विक्रम गोखले, राजेश तैंलंग ने ठीक ठाक अभिनय किया है.
फिल्म को अति खूबसूरत लोकेशनों पर फिल्माया गया है. दृश्यों को नयन सुख योग्य बनाने के लिए कैमरामैन सुधीर पलसाने बधाई के पात्र हैं.
2 घंटे 40 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘अय्यारी’’ का निर्माण शीतल भाटिया, धवल गाला, जयंतीलाल गाला, करण शाह ने मोशन पिक्चर्स कैपिटल के साथ मिलकर किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक नीरज पांडे, संगीतकार रोचक कोहली व अंकित तिवारी, कैमरामैन सुधीर पलसाने तथा फिल्म के कलाकार हैं-मनोज बाजपेयी, सिद्धार्थ मल्होत्रा, विक्रम गोखले, पूजा चोपड़ा, रकुल प्रीत सिह, आदिल हुसैन, राजेश तैलंग व अन्य.
इन दिनों सीरियल ‘‘महाकाली : अंत ही आरंभ है’’ में राक्षस के किरदार में नजर आ रहें लिलिपुट 1975 से बौलीवुड में अभिनेता व लेखक के रूप में सक्रिय होते हुए अपने शारीरिक कद के चलते कभी स्टार नहीं बन पाए. वह महज हास्य अभिनेता ही बनकर रह गए. जबकि बौलीवुड में उन्हे अमिताभ बच्चन के साथ काम करने का अवसर भी मिला, पर हर बार उनकी यह फिल्में बन नहीं पायी. इसे वह महज किस्मत का खेल मानते हैं.
जी हां! सबसे पहले सुभाष घई ने लिलिपुट को अमिताभ बच्चन के साथ अपनी एक फिल्म का मुख्य विलेन बनाया था. मगर यह फिल्म भी बनी नहीं. इसका जिक्र करते हुए लिलिपुट कहते हैं- ‘‘अमिताभ बच्चन के साथ मुख्य विलेन निभाने का सुभाष घई का जो आफर मिला था, उसकी बड़ी रोचक कहानी है. बात उस वक्त की है, जब मैं मुंबई आया था और मेरे संघर्ष के दिन चल रहे थे. उन दिनों में मेरा एक नाटक ‘दंगा’ काफी चर्चित हुआ था. इसमें मैं पांच अलग अलग किरदार निभाता था. इस नाटक को देखने के लिए सुभाष घई जी आए थें. वह नाटक देखकर काफी प्रभावित हुए.
नाटक खत्म होने के बाद मैं अपना मेकअप छुड़ाने लगा, पर उन्होंने मेरा इंतजार किया. मुलाकात हुई, बात हुई. उन दिनों हम आत्माराम जी के लिए फिल्म ‘शरारत’ लिख रहे थे, उन्हें पता था कि मेरे पास रहने के लिए जगह नहीं है. तो उन्होंने मुझे अपने आफिस में ही रहने की जगह दे दी थी. मैं सीरियल ‘इधर उधर’ भी लिख रहा था. रामानंद सागर जी के लिए भी काम कर रहा था. फुर्सत में हम ताश खेलते रहते थे. एक दिन सुभाष घई का फोन आया उन्होंने आफिस बुलाया. मैं काफी काम कर रहा था, फिर भी उस वक्त मेरे पास पैसे की तंगी थी. अंधेरी पूर्व से बांदरा जाना था. पैदल जाने पर पहुंचना मुश्किल था. बस या टैक्सी का किराया देने के पैसे नहीं थे. तभी मेरा एक गैर फिल्मी दोस्त मुझसे मिलने आया, उसके पास गाड़ी थी. उसे मैने बताया,तो उसने कहा कि चलो मैं छोड़ देता हूं. सुभाष घई के आफिस में मेरी अच्छी आवभगत हुई. जिससे मुझे आश्चर्य हुआ. उन दिनों मैं कुछ फिल्में लिखने के साथ ही रामानंद सागर की एक फिल्म, ‘चिंगारी’, ‘पत्तों की बाजी’ सहित पांच छह फिल्मों में अभिनय कर रहा था, जिनकी शूटिंग चल रही थी.’’
वह आगे कहते हैं- ‘‘मैं सुभाष घई से मिला, उन्होंने कहा कि सुना है कि बहुत व्यस्त हो. मेरी फिल्मों के नाम पूछे और कहा कि सारी फिल्में छोड़ दो. मैने उनसे कहा कि मेरी औकात तो नहीं है कि जिनकी फिल्मों की कुछ दिन शूटिंग की है, उन्हें मना कर दूं. पर जो फिल्में शुरू नहीं हुई है, उनके पास जाकर हाथ पांव जोड़कर उन्हें मना कर सकता हूं. तब सुभाष घई ने कहा कि, ठीक है, मैं सब संभाल लूंगा. उन्होंने कहा कि वह मुझे एक फिल्म में मुख्य विलेन का किरदार दे रहे हैं, जिसके हीरो अमिताभ बच्चन हैं. आप यह समझ ले कि उनकी बात सुनकर मैं बेहोश नहीं हुआ. पर वह चाहते थे कि उनकी फिल्म से पहले मेरी फिल्में रिलीज न हो.
मैंने अपने दोस्त की सलाह न मानते हुए सभी फिल्में छोड़ दी. पर मेरी किस्मत खराब थी कि वह फिल्म नहीं बनी. जबकि उनका आफर अच्छा था. मासिक खर्च, मकान व गाड़ी देने का वायदा किया था, पर उन्होंने साइन नहीं किया. लेकिन जिन फिल्मों की शूटिंग चल रही थी, उनकी शूटिंग करने से मना नहीं किया. एक दिन महबूब स्टूडियो में मिलने के लिए बुलाया. कई लोगों के सामने मेरे अभिनय की तारीफ की. फिर एक दिन आफिस बुलाकर कहा कि अमिताभ जी बीमार हो गए हैं, इसलिए फिल्म बंद कर रहा हूं. अब आप स्वतंत्र हैं. इस फिल्म में मेरा किरदार काफी जटिल था. उसे लंबे कद के इंसानों से नफरत होती है. बहुत ही कनिंग और तेज दिमाग वाला किरदार था.’’
इसके बाद लिलिपुट को अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म ‘आलीशान’ मिली थी, पर दस दिन के बाद यह फिल्म भी बंद हो गयी. इसकी चर्चा करते हुए लिलिपुट कहते हैं- ‘‘फिर एक फिल्म ‘आलीशान’ जावेद अख्तर भाई ने दिलवायी. इसमें अमिताभ बच्चन के साथ मेरा पैरलल किरदार था. हमने फिल्मालय स्टूडियों में दस दिन शूटिंग भी की, पर यह फिल्म भी नहीं बनी. इसके बाद एक फिल्म और मिली थी, वह भी नही बनी. तब मैने अमिताभ बच्चन के लिए कहा था- ‘डोंट ट्राय टू अट्रैक्ट मी. ’मैने यह जोक अमिताभ बच्चन जी को भी सुनाया था. अब इसे आप किस्मत ही कहेंगे. जब किस्मत खराब हो, तो क्या करेंगे.’’
आप मानते हैं कि आपकी किस्मत खराब थी, पर कर्म का भी अपना महत्व होता है. और आप कर्म कर रहे थे. इस पर लिलिपुट ने कहा- ‘‘आपने सही कहा. तभी तो कई बार किस्मत भी इंसान से हार जाती है. मैं जहां भी जिस मुकाम पर हूं, वहां किस्मत ने ही पहुंचाया है. मेरा मानना है कि किस्मत और कर्म, पति पत्नी की तरह हैं. पति के बिना पत्नी का और पत्नी के बिना मर्द का गुजारा नहीं. वैसे ही कर्म और किस्मत का एक दूसरे के बिना गुजारा नहीं. यह लिलिपुट का दर्शन शास्त्र है. इतना ही नहीं मुझे अमिताभ बच्चन के साथ चौथा मौका फिल्म निर्देशक शाद अली ने फिल्म ‘बंटी और बबली’ में दिया था. तब मैने उनसे कहा था कि सोच लो, फिल्म बंद न हो जाए, पर यह फिल्म बनी और सफल हुई.’’
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आलिया भट्ट और सिद्धार्थ मल्होत्रा के बीच समझौते की सारी उम्मीदें खत्म हो चुकी हैं. करण जौहर ने अपनी तरफ से इनके बीच समझौता कराने की सारी कोशिशे की, मगर आलिया भट्ट ने हमेशा के लिए सिद्धार्थ मल्होत्रा से पीछा छुड़ाकर फिल्म ‘‘ब्रह्मास्त्र’’ के अपने सह कलाकार रणबीर कपूर के संग प्यार की पेंगे बढ़ानी शुरू कर दी हैं.
सूत्र यहां तक दावा करते हैं कि एक तरफ आलिया भट्ट और रणबीर कपूर एक दूसरे के घर में काफी समय बिताने लगे हैं, तो दूसरी तरफ आलिया भट्ट अब सिद्धार्थ मल्होत्रा का चेहरा तक नहीं देखना चाहती. इसी के चलते करण जौहर ने अपने बच्चों के पहले जन्मदिन पर आलिया भट्ट और सिद्धार्थ मल्होत्रा को अलग अलग समय पर बुलाया था.
मगर आलिया भट्ट और सिद्धार्थ मल्होत्रा के अलगाव के चलते ‘आशिकी 3’ के साथ ही ‘सड़क 2’ का निर्माण अधर में लटक गया है. सूत्र बता रहे हैं कि कुछ दिन पहले संजय दत्त ने महेश भट्ट और पूजा भट्ट से मिलकर ‘‘सड़क 2’’ को लेकर लंबी चर्चा की, पर कोई हल नहीं निकला. ज्ञातब्य है कि ‘‘सड़क 2’’ में आलिया भट्ट और सिद्धार्थ मल्होत्रा के संग पूजा भट्ट व संजय दत्त के भी अहम किरदार हैं.
सूत्रों का दावा है कि अब आलिया भट्ट किसी भी सूरत में सिद्धार्थ मल्होत्रा के संग प्रोफेशनल रिश्ते भी नहीं रखना चाहती. इसलिए अब सवाल उठ रहा है कि ‘सड़क 2’ का क्या होगा?
मजेदार बात यह है कि इस सवाल का जवाब आलिया भट्ट के पिता और फिल्म ‘‘सड़क 2’’ के निर्माता महेश भट्ट भी नहीं दे पा रहे हैं. महेश भट्ट हमेशा हर सवाल का जवाब बेबाकी के साथ देने के लिए माहिर हैं. लेकिन हाल ही में मुंबई में एक समारोह के दौरान जब महेश भट्ट से ‘सड़क 2’ को लेकर सवाल किया गया, तो महेश भट्ट ने इसका जवाब देने की बजाय मीडिया की अनेदखी कर चलते बने.
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बौलीवुड इंडस्ट्री यानी कि ग्लैमर की दुनियां, यहां ज्यादातर लड़कियां ग्लैमर की चकाचौंध से प्रभावित होकर ही आती हैं. हां, बेशक यहां प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है पर नाम पैसा कमाने के चक्कर में वो खुद को भूल जाती हैं और खुद को साबित करने के चक्कर में अपनाती हैं बोल्ड अवतार. इनमें कई अभिनेत्रियां ऐसी भी हैं जिन्हें बौलीवुड इंडस्ट्री में अन्दर आने का और कोई रास्ता नजर नहीं आता. ऐसे में उन्हें नजर आता है केवल एक ही रास्ता और फिर ये बोल्ड अवतार लेना उनकी मजबूरी बन जाती है. इस मजबूरी को ही वो अपनी पहचान बनाती हैं ताकि इस इंडस्ट्री में टिक सकें.
आपने अक्सर देखा होगा कि समय समय पर कुछ छोटे पर्दे की आदाकारा और वो हसिनाएं जिन्हें फिल्में नही मिल रही, बोल्ड फोटोशूट कराती हैं ताकि अपने अंग प्रदर्शन के बल पर ही सही, पर इस इंडस्ट्री में टिकी रहें.
बौलीवुड में कई अभिनेत्रियां ऐसी भी हैं जो सिर्फ अपने बोल्ड अंदाज के बल पर टिकी हुई हैं. आज हम आपको इन्हीं लिस्ट में शामिल कुछ अभिनेत्रियों के बारें में बताने जा रहे हैं, जिनके अभिनय को ना तो तारीफ मिली और ना ही इनकी प्रतिभा इनके करियर को सवारने के कुछ काम आई, मगर पर्दे पर हौटनेस का तड़का लगाकर और अंग प्रदर्शन करके इनका फिल्मी सफर चल पड़ा.
उर्वशी रौतेला
अगर खूबसूरती की बात करें तो उर्वशी रौतेला किसी से कम नहीं है. इन्होंने सनी देओल के साथ फिल्म ‘सिंह साहब दी ग्रेट’ से बौलीवुड में कदम रखा था, लेकिन इस फिल्म के बाद उर्वशी रौतेला ने ऐसी फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया जिसे आप अपने परिवार के साथ बैठ कर नहीं देख सकते. अब इनकी आने वाली फिल्म ‘हेट स्टोरी 4’ भी एक बोल्ड फिल्म ही है. वो अपने इस बोल्ड अवतार को अपनी पहचान बनाकर ही इंडस्ट्री में टिके रहना चाहती हैं. देखना ये है कि हेट स्टोरी 4 इनके करियर को कितनी उड़ान देता है.
जरीन खान
जरीन खान ने इंडस्ट्री के सबसे महंगे अभिनेता सलमान खान के साथ फिल्म ‘वीर’ से अपने करियर की शुरुवात की थी. यह फिल्म चाहे हिट नहीं हुयी थी पर एक पारिवारिक फिल्म थी. लेकिन उसके बाद तो इनको सिर्फ बोल्ड फिल्मों में ही देखा गया है. इनकी पिछली कुछ फिल्मों को देखा जाये तो सिर्फ बोल्डनेस के अलावा उनमे कुछ नहीं दिखता.
ईशा गुप्ता
ईशा गुप्ता ने अपनी पहली फिल्म में बोल्डनेस की सारी हदें पर कर दी थी. इसके बाद उन्होंने कुछ अच्छी फिल्मो में काम किया लेकिन दर्शको ने उनके एक्टिंग को ज्यादा पसंद नहीं किया. आजकल कुछ समय से वो अपने बोल्ड तस्वीरों को लेकर फिर से सुर्खियों में बनी हुई हैं. जिसे देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि ईशा गुप्ता अपने बोल्डनेस को हथियार बनाकर एक बार फिर से इंडस्ट्री में एंट्री लेना चाहती हैं.
अमीषा पटेल
करियर तो इनका सुपरहिट शुरू हुआ था पर ये आगे कामयाबी की सीढ़ियां ज्यादा चढ़ नहीं पायी. फिल्मों की कमी के चलते इन्होंने भी अंगप्रदर्शन की राह पकड़ी पर वहां भी ये ज्यादा कामयाबी हासिल नहीं कर पायी.
सनी लियोन
ये अभिनेत्री वैसे तो ऐसी इंडस्ट्री से आती है जहां का इमेज तो पहले से ही खराब है. अगर बौलीवुड की बात करें तो इनको आइटम सांग्स में ज्यादा देखा गया है और लीड रोल्स में कम. अगर इनकी फिल्मी सफर पर नजर डालें तो इन्हें या तो आइटम सांग्स या फिर बोल्ड फिल्मों में ही काम करने का मौका मिला है और ये इसी के बल पर यहां चल रही हैं.
इंटरनेट पर इन दिनों एक खूबसूरत मलयाली एक्ट्रेस प्रिया प्रकाश वारियर छाई हुई है. सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो ने उसे इंटरनेट सेंसेशन बना दिया है. लेकिन प्रिया आखिर है कौन? इंटरनेट पर उसका चेहरा आपकी नजरों के सामने से भी गुजरा होगा और आप भी सोच रहे होंगे कि यह लड़की कौन है? तो चलिए आपको बताते हैं प्रिया के बारे में.
18 साल की प्रिया वारियर केरल की रहने वाली हैं, जिस वायरल वीडियो में वह अपने खूबसूरत एक्सप्रेशन्स का जलवा बिखेरती दिख रही हैं वह एक मलयाली गाना ‘मानिका मलयारा पूवी’ है. यह गाना उनकी अप्कमिंग फिल्म ‘ओरू अदार लव’ (Oru Adaar Love) का है और इस गाने ने इंटरनेट पर धूम मचा दी है. यूट्यूब पर रिलीज होने के दो दिनों के अंदर ही इसके व्यूज 45 लाख तक पहुंच गए हैं और यह लगातार बढ़ रहे हैं.
प्रिया त्रिशूर जिले के पूंगुन्नम की रहने वाली हैं. अभी वह विमला कौलेज से बी.कौम की पढ़ाई कर रही हैं. प्रिया एक सक्रिय फेसबुक और इंस्टाग्राम यूजर हैं और सोशल मीडिया पर उनकी फैन फौलोइंग के बारे में जानकर आप हैरान रह जाएंगे. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इंस्टाग्राम अकाउंट बनाने के एक दिन के भीतर ही उनके 6 लाख फौलोअर्स हो गए थे. अभी इंस्टाग्राम पर उनके 7 लाख 30 हजार से ज्यादा फौलोअर्स हैं और यह तादाद भी बढ़ने पर ही है. ‘ओरू अदार लव’ से प्रिया फिल्म इंडस्ट्री में अपना डेब्यू करने जा रही हैं. यह फिल्म 3 मार्च 2018 को रिलीज होने जा रही है.
यह उनकी पहली फिल्म होगी लेकिन इससे पहले वह फैशन की दुनिया में भी कमाल दिखा चुकी हैं. खबर के मुताबिक, प्रिया Aiswaryarani 2017 और कोच्चि में एक फैशन शो में रैंप वौक भी कर चुकी हैं. यूट्यूब पर उनकी अपकमिंग फिल्म के गाने को जबरदस्त हिट्स मिले हैं और माना जा रहा है उनकी फिल्म भी उतनी ही जबरदस्त हिट साबित होगी. फिल्म ‘ओरु अडार लव’ के डायरेक्टर उमर लुलु हैं. फिल्म में शान रहमान ने म्यूजिक दिया है. वैसे जानकारी के लिए आपको बता दें कि इस गाने पर कई फनी Memes और स्पूफ वीडियोज भी सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहे हैं.
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले का उमरी खुर्द गांव. वहां के एक लड़के ने एक दिन कागज पर एक बौडी बिल्डर की तसवीर बनाई और लिखा ‘वर्ल्ड चैंपियन’. उस ने वह तसवीर अपनी मौसी की बेटी राधा को थमा दी और कहा कि एक दिन मेरे नाम के आगे ऐसा लिखा होगा. राधा उस लड़के के सपने पर मुसकराई. बात आईगई हो गई.
कौन था वह लड़का जिस के मन में बौडी बिल्डर बनने का फुतूर इस हद तक सवार था कि वह तसवीर बना कर उस ने खुद को ही चैलेंज दे दिया था? क्या वह अपने इस जुनून को पूरा कर पाया?
हां, उस लड़के यतींद्र सिंह ने न सिर्फ अपनी कही बात का मान रखा, बल्कि आज वह जिस मुकाम पर है, लोग उस के गठीले बदन को देख कर दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं.
पेश हैं, बौडी बिल्डिंग में कई नैशनल व इंटरनैशनल मैडल जीतने वाले यतींद्र सिंह से हुई बातचीत के खास अंश:
ऐसी कौन सी वजह थी कि आप बस बौडी बिल्डर ही बनना चाहते थे?
मैं सहारनपुर में एक संयुक्त परिवार में रहा हूं. 7वीं क्लास में मुझे होस्टल वाले एक स्कूल में पंजाब भेज दिया.
वहां सब बच्चों की लंबाई मुझ से ज्यादा थी और शरीर भी गठीले थे. मैं दुबलापतला था और कद में भी काफी छोटा था.
समय बीतने लगा और मैं 10वीं क्लास में पहुंच गया. तब हमारे स्कूल में जिम के लिए सामान आया था. लेकिन जो जिम बनाया गया उस में वे ही बच्चे कसरत कर सकते थे जो 11-12वीं क्लास के थे और जिन्हें स्कूल की तरफ से वेट लिफ्टिंग करने की इजाजत मिली हुई थी.
एक दिन मैं किसी को बिना बताए जिम में चला गया. मैं अभी मशीनें देख ही रहा था कि पता नहीं कहां से हमारे वार्डन वहां आ गए और उन्होंने बिना मुझ से पूछे ही डंडे से मारना शुरू कर दिया.
उस दिन के बाद मैं ने सोच लिया था कि अब इस स्कूल में नहीं रहना है और अब मैं सिर्फ ऐक्सरसाइज ही करूंगा. लेकिन मां के कहने पर मैं ने वहीं से 10वीं का इम्तिहान दिया और रिजल्ट आने के बाद वापस सहारनपुर आ गया. वहां मैं ने एक जिम जौइन किया और असद नफीस कोच से मिला. उन्होंने मेरी जिंदगी बदल दी.
कोच असद नफीस की मेहनत कैसे रंग लाई?
तब मेरी उम्र तकरीबन 16 साल थी. वे मेरे पहले प्रोफैशनल ट्रेनर थे. ट्रेनिंग के 6 महीने के अंदर ही मेरी स्कूल की कमीज टाइट होने लगी थी. यह सब इसलिए मुमकिन हुआ था क्योंकि मैं ने अपने ट्रेनर की कही हर बात मानी थी. अपने खानपान पर बहुत ध्यान दिया था. मैं ने खाने का जो समय बांध रखा था उसी समय खाता था, चाहे कुछ भी हो जाए.
क्या आप के इस रूटीन से स्कूल वालों को कोई दिक्कत नहीं हुई?
टीचरों ने प्रिंसिपल को शिकायत कर दी थी कि यह तो हर थोड़ीथोड़ी देर में खाता रहता है. पर पता नहीं क्यों, शायद मेरे जुनून को देख कर उन्होंने मुझे इजाजत दे दी थी.
उन्हीं दिनों की बात है. एक दिन मेरे ट्रेनर असद नफीस ने कहा कि हम जिम का एक कंपीटिशन करा रहे हैं, तू भी हिस्सा ले ले.
उस कंपीटिशन को देखने लोग भी कम आए थे. वहां मैं विजेता बना था. मैं ने सहारनपुर के एक नामी जिम के सब से अच्छे लड़के को हराया था. मुझे बतौर इनाम एक शील्ड मिली थी.
आप की इस जीत पर घर वालों का कैसा रवैया रहा?
पिताजी को अच्छा लगा था. कुछ लोगों ने मेरी जीत को नजरअंदाज भी किया. किसी ने तो इतना तक कह दिया था कि ऐसी शील्ड तो बाजार में 100-100 रुपए में मिल जाती हैं. शायद वे नहीं चाहते थे कि मैं आगे बढ़ूं, क्योंकि आज अगर इस का मनोबल बढ़ा दिया तो कल यह हमारे बच्चों से आगे निकल जाएगा.
क्या इस बात का आप पर बुरा असर पड़ा था?
‘ऐसी शील्ड तो 100-100 रुपए में आती हैं’ वाली बात मेरे मन से नहीं निकल पा रही थी, इसलिए तब से ले कर आज तक मैं शील्ड ही इकट्ठा कर रहा हूं. मैं तो कहूंगा कि हमें अपने सपने को हर सांस में जीना चाहिए.
बहुत से नौजवान 3-4 महीने में अपनी बौडी बना लेना चाहते हैं. इसका क्या नुकसान है?
3-4 महीने में बौडी बनाने की सोच में नौजवानों की कोई गलती नहीं होती है. वे तो चाहेंगे कि आज जिम जौइन किया और कुछ ही दिनों में उन के मनमुताबिक रिजल्ट भी मिलने लग जाए. इस के लिए वे बाजार में मिलने वाली ताकत बढ़ाने वाली दवाओं के बारे में अपने कोच से पूछते हैं.
यहां कोच की जिम्मेदारी बनती है कि ट्रेनिंग ले रहे नौजवानों को क्या सीख देनी है. चंद रुपए के लालच में नौजवानों को शौर्टकट रास्ता न सुझाएं.
क्या कोई शाकाहारी भी अच्छा बौडी बिल्डर बन सकता है?
जी हां, बिलकुल बन सकता है. कुछ भी हासिल करने के लिए हमारा दिमागी तौर पर मजबूत होना बहुत जरूरी है. मन से यह बात निकाल दें कि क्योंकि मैं शाकाहारी हूं तो अच्छा बौडी बिल्डर नहीं बन सकता.
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